Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 14 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

समा जाना तो पूर्णाहूति है अभी कुछ समय पूजा कर लेने दीजिये...
 
धन्यवाद... आप जैसे समीक्षको के वजह से जी लेखकों के चेहरे पर मुस्कान आती है...
 
हमारी नई पाठिका सीमा जी का कहानी के पटल पर हार्दिक स्वागत है।

समाज की मर्यादाओं के तार बिना तोड़े सिर्फ छेड़ते हुए पाठक और पाठिकाओं के कामांगों में हलचल पैदा करना ही कहानी का उद्देश्य है...

जुड़े रहें....

मूक पाठकों से अनुरोध है कि अपने विचार साझा कर कहानी की रोचकता और प्रासंगिकता को बनाये रखें।
 
पिछले भाग में आपने पढ़ा...

सोनू वह खूबसूरत दृश्य मंत्रमुग्ध होकर देख रहा था। गांव की बछिया और गायों की सेवा करते करते बुर से बहने वाली लार का मतलब उसे पता था…

अब आगे..

सोनू अपनी दीदी लाली की रिसती हुई बुर को देख खुद को न रोक पाया उसने झुककर लाली की लाली की बुर को चूमने की कोशिश की परंतु लाली ने उसी समय कमर को थोड़ा हिलाया और लाली की गांड सोनू के होठों से छू गई….

एक पल के लिए सोनू को अफसोस हुआ परंतु लाली के कोमल नितंबों ने सोनू के गालों पर हल्की मसाज कर दी। लाली को अपनी गलती का एहसास हो गया था। सोनू अपने पहले प्रयास में लक्ष्य तक पहुंचने में असफल रहा परंतु सोनू को लाली दीदी का हर अंग प्यारा था।

उसने एक बार फिर प्रयास किया उधर लाली में अपनी गलती के प्प्रायश्चित में अपनी जांघें थोड़ा फैला दी सोनू के होंठ लाली के निचले होठों से सट गए। पहली बार की कसर सोनू ने दूसरी बार निकाल ली। उसने लाली की छोटी सी बुर के दोनों होंठों को अपने मुंह में भर लिया और उसका रस चूसने लगा। सोनू अबोध युवा की तरह लाली की बुर चूस रहा था उसे यह अंदाज नहीं था की वह लाली का सबसे कोमल अंग था। लाली सिहर उठी उसमें अपने हाथ पीछे कर सोनु के सर को पकड़ने की कोशिश की पर असफल रही। उसकी पीठ में थोड़ा दर्द महसूस हुआ।

अपने अनाड़ी और नौसिखिया भाई के होठों में अपनी बुर देकर वह फंस चुकी थी। लाली ने सब कुछ नियति के हवाले छोड़ दिया और कराहते हुए बोली

"बाबु तनि धीरे से….. "

अपनी फूली हुयी बुर को अपने भाई सोनू को सौंप कर वह अपने तकिए में मुंह छुपाए अपने अनाड़ी भाई सोनू के होठों और जीभ की करामात का आनंद लेते हुए अगले कदम का इंतजार करती रही। सोनू जब-जब नितंबों और जांघों के जोड़ पर अपना चेहरा ले जाता लाली के कोमल नितंब और गदराई जाँघे सोनू के चेहरे को पूरी तरह ढक लेते। सोनू अपने सर का दबाव बढ़ा कर अपने होठों को बुर तक ले जाता और लाली की बूर को चूमने का प्रयास करता।

सोनू को अपनी लंबी जीभ का ध्यान आया उसने उसे भी मैदान में उतार दिया। सोनू की जीभ बुर् के निचले भाग पर पहुंचने लगी और लाली की भग्नासा को छूने लगी। लाली उत्तेजना से कांपने लगी उसे लगा जैसे यदि उसने सोनू को नहीं रोका तो कुछ ही देर में सोनू अपना अगला कदम बढ़ा देगा। सोनू की जीभ और होठों से मिल रहे अद्भुत सुख को लाली छोड़ना भी नहीं चाहती थी।

लाली चुदना चाह रही थी पर उसने राजेश को जो वचन दिया था उसे तोड़ना नहीं चाहती थी। उसने अपनी यथास्थिति बनाए रखी। सोनू ने लाली की जाँघे पकड़कर उसे सीधा लिटाने का प्रयास किया। लाली ने दर्द भरी आह भरी। यह लाली ने जानबूझकर किया था। पीठ के बल लेटने पर उसकी नजरें सोनू से निश्चित ही मिलती और वह इस विषम स्थिति से बचना चाहती थी । अपने चेहरे पर वासना लिए अपने छोटे भाई से नजरें कैसे मिलाती। और यदि पीठ के बल लेटने के पश्चात सोनू कहीं संभोग के लिए प्रस्तुत हो जाता तो वह कैसे उसे रोक पाती ? जिस लंड की कल्पना और बातें कर उसने और राजेश ने अपनी कई रातें जवान की थी उसे मना कर पाना लाली के वश में न था।

सोनू ने भी उसे तकलीफ न देते हुए वापस उसी स्थिति में छोड़ दिया। सोनू के होठों से बहती लार और लाली की बुर से रिस रहे काम रस के अंश चादर पर आ चुके थे।

सोनू ने अपने लण्ड को बाहर निकाल दिया तने हुए लण्ड पर अपनी हथेलियां ले जाकर सहलाने लगा। लंड में सनसनी होने से उसे आयोडेक्स की याद आई उसने फटाफट अपने हाथ चादर के कोने से पोछे। लण्ड को पोछने के लिए उसने लाली की साड़ी का पल्लू खींच लिया।

लण्ड की जलन को सिर्फ और सिर्फ लाली की बुर ही अपने मखमली अहसाह से मिटा सकती थी। सोनू बिस्तर पर आ गया और अपनी अपने दोनों पैर लाली की जांघों के दोनों तरफ कर लाली पर झुकता चला गया।

जैसे ही उसके मजबूत लण्ड ने लाली के गदराये नितंबों को छुआ लाली उत्तेजना से कांप उठी। जिस प्रकार छोटे बच्चे लॉलीपॉप देखते ही अपना मुंह खोल देते हैं उसी प्रकार लाली की बुर ने अपने लॉलीपॉप के इंतजार में मुंह खोल दिया।

सोनू सच मे अनाड़ी था। लाली के फुले और कोमल में गोरे और कोमल नितम्ब देखकर वह मदहोश हो चुका था। सोनू व्यग्र हो गया था जैसे ही लंड ने नितंबों को छुआ सोनू ने अपनी कमर आगे बढ़ा दी लण्ड बुर की छेद पर न था लाली दर्द से तड़प उठी। ऐसा लग रहा था जैसे लण्ड नितंबों के बीच नया छेद करने को आतुर था

"बाबू तनि नीचे…" लाली एक पल के लिए राजेश को दिया वचन भूल कर अपनी बुर को ऊपर उठाने लगी।

परंतु नियति निष्ठुर थी जैसे उसने बनारस के आसपास कामवासना को जागृत तो कर रखा था परंतु संभोग पर पाबंदी लगा रखी थी। दरवाजे पर फिर खटखट हुई। सोनू घबरा गया वो फटाफट नीचे उतरा और अपने हथियार को वापस पजामे में भरकर भागकर दरवाजा खोलने गया।

राजेश को देखकर उसकी सिद्धि पिट्टी गुम हो गई अंदर बिस्तर पर लाली अर्धनग्न अवस्था में थी। वह राजेश को क्या मुंह दिखाएगा?

सोनू में जोर से आवाज दी

" दीदी जीजू हैं " लाली ने फटाफट अपने पेटिकोट को ऊपर किया और चादर ओढ़ ली. राजेश और सोनू अंदर आ चुके थे। आयोडेक्स की महक कमरे में फैली थी। राजेश को समझते देर न लगी की सोनू की उंगलियों ने लाली की पीठ का स्पर्श कर लिया है। राजेश का लण्ड खड़ा हो गया। उसे पता था सोनू के स्पर्श से लाली निश्चित ही गर्म हो चुकी होगी और चुदने के लिए तैयार होगी।

सोनू ने अब और देर रहना उचित न समझा उसने लाली से कहा

"दीदी एक-दो दिन आराम कर लीजिए" परसों से बनारस महोत्सव शुरू होने वाला है तब तक पूरी तरह ठीक हो जाइए। दवा टाइम से खाते रहिएगा"

सोनू ने राजेश से अनुमति ली। लाली अब तक करवट ले चुकी थी उसने सोनू से कहा

"बनारस महोत्सव के समय तो हॉस्टल बंद रहेगा ना। तू यहीं पर रहना यहां से हम लोग साथ मे घूमेंगे।"

राजेश ने लाली की बात में हां में हां मिलाई और बोला

"हां सोनू तुम्हारी दीदी तुम्हें देखते ही चहक उठती है इन्हें बनारस महोत्सव दिखा देना"

लाली ने सोनू के मन की बात कह दी थी अपनी प्यारी दीदी लाली के साथ वो 7 दिन सोनू को हनीमून के जैसे लग रहे थे।वो अपने दिल की धड़कन को महसूस कर पा रहा था जो निश्चित ही बढ़ी हुई थी। परंतु उसका लण्ड अपने लक्ष्य के करीब पहुंचकर एक बार फिर दूर हो गया था। लाली और सोनू के काम इंद्रियों पर सिर्फ और सिर्फ उत्तेजना थी और मन में बनारस महोत्सव का इंतजार ।

उधर एसडीएम मनोरमा की जिप्सी में सरयू सिंह ड्राइवर के पीछे वाली सीट पर बैठे थे और सामने बैठी मनोरमा को तिरछी नजरों से निहार रहे थे। मनोरमा को सामने से देखने की हिम्मत सरयू सिंह में ना थी परंतु आज अपनी तिरछी निगाहों से वह उसके गालों कंधों और साड़ी के पल्लू के नीचे से झांकती हुई चुचियों को निहार रहे थे। मनोरमा की कमर और जाँघे भी सरयू सिंह का ध्यान आकर्षित कर रही थी।

मनोरमा भी मन ही मन सरयू सिंह के बारे में सोच रही थी। कैसे यह व्यक्ति गृहस्थ जीवन से दूर एकांकी जीवन व्यतीत कर रहा था मनोरमा को क्या पता था सरयू सिंह कामकला के धनी थे और नियति उन पर मेहरबान थी। मनोरमा स्वयं इस सुख का आनंद पूरी तरह नहीं ले पाती थी उसके पति लखनऊ में सेक्रेटरी थे।

कामवासना की पूर्ति के लिए 400 किलोमीटर की यात्रा करना आसान न था। जब सेक्रेटरी साहब का मन होता वह मनोरमा के पास आ जाते और दो-चार दिनों के प्रवास में जी भर कर मनोरमा को चोदते परंतु मनोरमा को चरम सुख की प्राप्ति कभी कभार ही हो पाती।

मनोरमा जो मिल रहा था उसमें खुश थी उसकी हालत गांव की उस बच्चे जैसी थी जो बालूशाही आकर भी वैसे ही मस्त हो जाता है जैसे शहर के अमीर रसमलाई खाकर। परंतु रसमलाई रसमलाई होती है उसका सुख नसीब वालों को ही मिलता है मनोरमा उस सुख से वंचित थी।

बनारस महोत्सव की तैयारियों में मनोरमा ने बहुत काम किया था उसके कार्यों से प्रसन्न होकर नियति ने मनोरमा के लिए भी रसमलाई बनाई हुई थी। समय और वक्त का इंतजार नियति को था मनोरमा इन बातों से अनजान अपने रुतबे और टीम के साथ बनारस महोत्सव में पहुंच चुकी थी।

मनोरमा के साथ आये सारे पटवारियों ने अलग-अलग हिस्सों में कार्य संभाल लिया। सरयू सिंह को भी सेक्टर 12 के पंडालों का कार्यभार दिया गया। इसी सेक्टर के बगल में मेला अधिकारियों के लिए कई छोटे छोटे कमरे बनाए गए थे जिनमें शौचालय भी संलग्न थे। यह सब कमरे मध्यम दर्जे के थे परंतु पांडाल से निश्चय ही उत्तम थे जिसमें एक बिस्तर लगा हुआ था। मनोरमा को भी एक कमरा मिला हुआ था परंतु वह उसकी हैसियत के मुताबिक न था। सेक्रेटरी साहब और मनोरमा की कमाई हद से ज्यादा थी उसने तय कर रखा था कि वह उस कमरे को छोड़ नजदीक के होटल में रहेगी।

हर पंडाल किसी न किसी संप्रदाय और धर्मगुरुओं से जुड़ा हुआ था। कई पंडाल मेला में आने वाले दुकानदारों और सर्कस वालों ने भी ले रखा था हर पंडाल में लगभग पचास व्यक्तियों के रहने की व्यवस्था थी।

हर पंडाल से लगे हुए शौचालय भी बने थे जिनका उपयोग पंडाल में रह रहे लोग करते। स्त्री और पुरुषों के लिए सोने की व्यवस्था अलग-अलग थी। पंडाल में पवित्रता बनी रहे शायद इसी वजह से स्त्री और पुरुषों को अलग अलग रखा गया था।

स्वामी विद्यानंद का पंडाल भी सेक्टर 12 में ही था। पंडाल के बाहर लगी बड़ी सी प्रतिमा को देखकर सरयू सिंह की आंखें विद्यानंद पर टिक गई। वह चेहरा उन्हें जाना पहचाना लग रहा था परंतु वह पूरी तरह से पहचान नहीं पा रहे थे वह आंखें और नयन नक्श उन्हें अपने करीबी होने का एहसास दिलाते परंतु बढ़ी हुई दाढ़ी और मूछों में चेहरे का आधा भाग ढक लिया था। एक पल के लिए सरयू सिंह के दिमाग में आया कहीं यह बड़े भैया बिरजू तो नहीं?

सरयू सिंह को अपने बड़े भाई बिरजू की काबिलियत पर यकीन नहीं था उन्हें इस बात की कतई उम्मीद नहीं थी कि बिरजू जैसा व्यक्ति इतना बड़ा महात्मा बन सकता था।

सरयू सिंह विद्यानंद के कटआउट में खोए हुए थे तभी मनोरमा वहां आ गई और बोली

"सरयू सिंह जी कहां खोए हुए हैं यह विद्यानंद जी का पंडाल है। देखिएगा उनके अनुयायियों को कोई कष्ट ना हो मैं खुद इनकी भक्त हूं । एक बात और आपके परिवार के लिए भी मैंने इसी पंडाल में व्यवस्था की हुई है। ये लीजिये पास।"

" मैडम कुछ पास और मिल जाते असल में पास पड़ोस वाले भी मुझ पर ही आश्रित हैं"

"कितने …"

सरयू सिंह सोचने लगे उनके दिमाग में हरिया और उसकी पत्नी का चेहरा घूम गया तभी उन्हें अपनी पुरानी प्रेमिका पदमा की याद आई उन्हें खोया हुआ देखकर मनोरमा ने कहा

"परेशान मत होइए यह लीजिए 5 और पास रख लीजिए जरूरत नहीं होगी तो मुझे वापस कर दीजिएगा अब खुश है ना"

सरयू सिंह के दिमाग में सुगना और कजरी का मुस्कुराता हुआ चेहरा घूम गया इतनी दिव्य व्यवस्था में रहकर सुगना और कजरी कितने खुश होंगे यह सोचकर वह मन ही मन हर्षित होने लगे।

"हां एक बात और पीछे कुछ वीआईपी कमरे बने हैं जिसमें अटैच बाथरूम है। यह उस कमरे की चाबी है मैंने आपकी बहू और भाभी को साफ सफाई से रहते हुए देखा है उन्हें यहां का कॉमन बाथरूम पसंद नहीं आएगा आप यह चाभी उन्हें दे सकते हैं वो लोग आवश्यकतानुसार उसका उपयोग कर सकते हैं पर उनसे कहिए गा कि ज्यादा देर वहां ना रहे नहीं तो बाकी लोग शिकायत कर सकते हैं"

सरयू सिंह मनोरमा की उदारता के कायल हो गए। अपने घर में सिर्फ उसे बाथरूम प्रयोग करने और आवभगत कर सुगना और कजरी ने मनोरमा का दिल जीत लिया था।

दिनभर की कड़ी मेहनत के पश्चात बनारस महोत्सव की तैयारियां लगभग पूर्ण हो गई थी विद्यानंद जी का पांडाल सज चुका था। विद्यानंद जी का काफिला भी बनारस आ चुका था और बनारस महोत्सव में उनका पदार्पण कल सुबह ही होना था। बनारस महोत्सव के लगभग सभी पंडालों में हलचल दिखाई पड़ने लगी थी एक खूबसूरत शहर अस्थाई तौर पर बसा दिया गया था। सड़कों पर पीली रोशनी चमक रही थी।पंडालों के अंदर लालटेन और केरोसिन से जलने वाले लैंप रखे हुए थे जमीन पर पुआल बिछाकर और उन पर दरी और चादरों के प्रयोग से सोने के लिए माकूल व्यवस्था बनाई गई थी।

बाहर तरह-तरह के पंडाल जिनमें अलग-अलग प्रकार की वस्तुएं तथा खान-पान की सामग्री भी मिल रही थी। कुल मिलाकर यह व्यवस्था अस्थाई प्रवास के लिए उत्तम थी।

बनारस महोत्सव का पहला दिन

अगली सुबह नित्य कर्मों के पश्चात तैयार होकर सरयू सिंह सुगना और कजरी को याद कर रहे थे वह बार-बार पांडाल से निकलकर बाहर देखते। मनोरमा की गाड़ी जिसे सुगना और कजरी को लेने जाना था अब तक नही आई थी।

तभी एक लाल बत्ती लगी चमचमाती हुई एंबेसडर कार पांडाल के बाहर आकर रुकी।

सरयू सिंह सावधान की मुद्रा में आ गए इस अपरिचित अधिकारी के बारे में वह कुछ भी नहीं जानते थे परंतु गाड़ी पर लगी लाल बत्ती उस अधिकारी और उनके बीच प्रशासनिक कद के अंतर को बिना कहे स्पष्ट कर रही थी

ड्राइवर ने सर बाहर निकाला और सरयू सिंह से ही पूछा

"सरयू सिंह कहां मिलेंगे?"

"जी मैं ही हूँ"

"मुझे मनोरमा मैडम ने भेजा है उन्होंने कहा है कि आप यहीं पंडाल की व्यवस्था में रहिए हां अपने परिवार के लिए कुछ मैसेज देना हो तो दे सकते हैं ड्राइवर ने पेन और पेपर सरयू सिंह की तरफ आगे बढ़ा दिया"

सरयू सिंह ने कजरी और सुगना के लिए संदेश लिखा अपने लिए और कपड़े लाने का भी निर्देश दिया।

कुछ ही देर में गाड़ी धूल उड़ आती हुई सरयू सिंह के गांव सलेमपुर की तरफ बढ़ गई।

आवागमन के उचित साधन ना होने की वजह से गांव से शहर की जिस दूरी को तय करने में सरयू सिंह को 4 घंटे का वक्त लगता था निश्चय ही एंबेसडर कार से वह घंटे भर में पूरी हो जानी थी।

सरयू सिंह सुगना का इंतजार करने लगे। मनोरमा द्वारा दी गई चाबी से वह मनोरमा का कमरा देख आए थे अपनी बहू सुगना से रासलीला मनाने के लिए वह कमरा सर्वथा उपयुक्त था। अपनी बहू को मिला दिखा दिखा कर खुश करना और जी भर चोदना सरयू सिंह का लण्ड खड़ा हो गया। मन में उम्मीदें हिलोरे ले रही थी बनारस महोत्सव रंगीन होने वाला था।

दूर से आ रही ढोल नगाड़ों की गूंज बढ़ती जा रही थी। विद्यानंद जी का काफिला अपने पंडाल की तरफ आ रहा था सरयू सिंह सतर्क हो गए और विद्यानंद जी की एक झलक का इंतजार करने लगे। उन्होंने मन ही मन सोचा यदि वह बिरजू भैया तो निश्चय ही उन्हें पहचान लेंगे। उनका मन उद्वेलित था।

उधर रेलवे कालोनी में सोनू की मालिश और बनारस महोत्सव की ललक ने लाली के दर्द को कम कर दिया था। सुबह अपनी रसोई की खिड़की से बाहर दीवार लगे हुए बनारस महोत्सव के पोस्टरों को देख रही थी। लाली ने चाय चढ़ायी हुई थी परंतु उसका मन नहीं लग रहा था। परसो दोपहर की बात लाली के दिमाग में अभी भी घूम रही थी..

सोनू के लण्ड ने उसकी बुर और गांड के बीच में अपना दबाव बढ़ा कर उसे दर्द का एहसास करा दिया था। परंतु लाली तो जैसे सोनू से नाराज ही नहीं सकती थी। काश सोनू का निशाना सही जगह होता तो वह सामाजिक मर्यादाओं को भूलकर अपने भाई सोनू से चुद गई होती। सोनू के जाने के बाद राजेश बिस्तर पर आ गया था।

लाली के कमर को सहलाते हुए उसने पूछा

" दर्द में कुछ आराम है?"

जब तक लाली उत्तर दे पाती राजेश के हाथ लाली के नितंबों को सहलाते हुए नीचे पहुंच गए। पेटीकोट का नाड़ा खुला हुआ देखकर राजेश प्रसन्न हो गया उसने लाली से कुछ न पूछा। हाथ कंगन को आरसी क्या।

उसकी उंगलियां लाली की बुर पर पहुंच गयी जो चपा चप गीली थी। राजेश को सारे प्रश्नों के उत्तर मिल चुके थे। बुर से बहने वाली लार लाली की उत्तेजक अवस्था को चीख चीख कर बता रही थी। राजेश को समझते देर न लगी कि सोनू के हाथों ने न सिर्फ उस दर्द भरी जगह को सहलाया है अपितु अपनी दीदी के कोमल नितंबों को और अंतर्मन को भी स्पर्श सुख दिया है।

राजेश ने लाली को जांघो से पकड़कर पीठ के बल लिटा दिया। लाली ने इस बार कोई प्रतिरोध न किया। उसका मन बेचैन हो रहा था अपने भाई के इसी प्रयास को उसने दर्द का बहाना कर नकार दिया था। उसे मन ही मन अपने भाई से दोहरा व्यवहार करने का दुख था।

वह क्या करती ? वो राजेश को दिए वचन को वह तोड़ना नहीं चाहती थी। पीठ के बल आते ही लाली का वासना से भरा लाल चेहरा राजेश की आंखों के सामने आ गया। उसने देर ना कि और लाली की जाँघे फैल गयीं। अपने साले सोनू द्वारा गर्म किए गए तवे पर राजेश अपनी रोटियां सेकने लगा.

राजेश ने लाली को चूमते हुए बोला

" मेरी जान मैं लगता है गलत समय पर आ गया?"

"बात तो सही है" लाली ने अपनी आंखें नचाते हुए कहा

राजेश ने अपने लण्ड को लाली की बुर में जड़ तक ठान्स दिया और बोला

"मुझे अफसोस मत दिलाओ"

"आपके लिए ही मैंने अपने भाई को दुखी कर दिया"

"राजेश लाली को बेतहाशा चोदे जा रहा था और उसी उत्तेजना में उसने बेहद प्यार से बोला"

"बनारस महोत्सव के उद्घाटन के दिन ही सोनू को खुश कर देना"

" और आपका वचन?"

"यह तो मुझ पर छोड़ दो…."

लाली खुश हो गई और उत्तेजना में अपनी कमर हिलाने की चेष्टा की पर दर्द की एक तीखी लहर उसकी पीठ में दौड़ गई. लाली ने पैरों को राजेश की कमर पर लपेट लिया वह राजेश को चूमे जा रही थी।

राजेश मुस्कुरा रहा था और लाली को चोदते हुए स्खलित होने लगा... मेरी प्यारी दीदी …..आ आईईईई। लाली ने भी अपना पानी साथ साथ छोड़ दिया….

बनारस महोत्सव के उद्घाटन की राह वह और उसकी बुर दोनों देख रहे थे। गैस पर उबल रही चाय की आवाज से बनारस महोत्सव के पोस्टर से लाली का ध्यान हटा पर बुर् ….. वह तो सोनू की ख्यालों में खोई हुई थी। वह अजनबी और प्रतिबंधित लण्ड से मिलने को आतुर थी…..


शेष अगले भाग में।
 
कहानी के पटल पर आपका स्वागत है।
 
यह कहानी बनारस अंचल के आसपास की है जिसमें नजदीकी रिश्तो में स्वतः ही बन रहे कामुक संबंधों का विवरण है। नए पाठकों के लिए अब तक की कहानी का सारांश इस प्रकार है..

सरयू सिंह और बिरजू दो भाई हैं। बिरजू अपनी पत्नी कजरी को गर्भवती कर साधुओं की टोली के साथ भाग जाता है। सरयू सिंह कजरी के साथ संबंध बना लेते हैं परंतु उससे विवाह नहीं करते हैं पर दोनों में परस्पर प्रेम और मिलन कायम रहता है। कजरी रतन को जन्म देती है।

अपनी जवानी के दिनों में सरयू सिंह का संबंध अपने मामा गांव की एक विवाहिता पदमा से हो जाता है जो एक फौजी की पत्नी है। उससे कामूक संबंधों के दौरान सरयू सिंह के अंडकोशों के पास एक कीड़ा काट लेता है जिसका दाग उनके शरीर पर अब भी है।

कालांतर में फौजी की मृत्यु हो जाती है। पदमा के प्रति सहानुभूति दिखाते हुए सरयू सिंह उसकी बड़ी पुत्री सुगना का विवाह अपने भतीजे रतन से कर देते हैं। क्योंकि यह विवाह रतन की असहमति से होता है और बाल विवाह का रूप होता है रतन इसे स्वीकार नहीं करता और वह मुंबई चला जाता है। वहां उसके संबंध एक अन्य युवती बबीता से बन जाते हैं जो शुरुआत में तो पतिव्रता रहती है परंतु बाद में उसके भी विवाहेतर संबंध हो जाते हैं। रतन का गांव आना जाना लगा रहता है पर सुगना उससे दूरी बना लेती है।

कुछ विशेष परिस्थितियों में सुगना अपने चचेरे ससुर सरयू सिह के करीब आने लगती है और पुत्र की लालसा में अपनी सास कजरी की सहमति से अपने सरयू सिंह से संबंध बना लेती है।

सुगना से अनैतिक संबंध बनाते समय सरयू सिंह के माथे पर भी एक दाग उत्पन्न होता है जो सुगना के साथ कामूक गतिविधियां करते समय बढ़ जाता है। सरयू सिंह और सुगना का प्यार परवान चढ़ने लगता है और वह दोनों जीवन के सारे काम सुख लेते हैं और अंततः सुगना सूरज को जन्म देती है।

सूरज एक विलक्षण बालक है उसके एक अंगूठे में नाखून नहीं है उस विशेष अंगूठे को किसी नजदीकी रिस्ते की स्त्री या लड़की द्वारा सहलाने पर सूरज की नुंनी (गुप्तांग) अपना आकार बढ़ाने लगती है और उसका आकार तभी कम होता है जब वह स्त्री या लड़की अपने होठों से उस नुन्नी को छूती है अन्यथा उसे शांत होने में काफी समय लगता है। यह अप्रत्याशित और आश्चर्यजनक है। इस बात का पता तब चलता है जब सुगना की छोटी जुड़वा बहने सोनी और मोनी सूरज के अंगूठे को सहलाती कौतूहल बस सहला देती हैं।

सुगना के पति रतन की मुम्बई वाली पत्नी बबीता से दो पुत्रियां हैं बड़ी पुत्री मिंकी रतन की पुत्री है परंतु छोटी पुत्री चिंकी बबीता के विवाहेत्तर संबंधों की देन है।

सुगना की एक पक्की सहेली लाली है जो सुगना की ससुराल में सुगना के पड़ोसी हरिया की पुत्री है। लाली का पति राजेश सुगना को बेहद पसंद करता है और उससे संबंध बनाने को आतुर है। सुगना का छोटा भाई सोनू युवा हो चुका है। सोनू भी लाली के प्रति आसक्त है और लाली के बेहद नजदीक आ चुका है। लाली और सोनू को करीब लाने में लाली के प्रति राजेश की अहम भूमिका है।

इसी दौरान बनारस में एक विशेष महोत्सव आयोजित किया जा रहा है जिसमें सरयू सिंह का भाई बिरजू जो शुरुआत में ही भाग गया था ख्याति प्राप्त विद्यानंद स्वामी बनकर वापस बनारस महोत्सव में आया हुआ है।

सरयू सिंह वर्तमान में पटवारी के पद पर कार्यरत हैं और उनकी एसडीएम मनोरमा भी इस बनारस महोत्सव में शरीक हो रही है। नियति कथा के सारे पात्रों को बनारस महोत्सव में या तो पहुंचा चुकी है या पहुंचाने वाली है.. कहानी में इस समय बनारस महोत्सव में हो रहे घटनाक्रम को दर्शाया जा रहा है....

नए पाठक इस कथा सारांश के साथ आगे की कहानी को पढ़ सकते हैं और उसका आनंद भी ले सकते हैं अपने खाली समय में पूर्ववर्ती कथा को पढ़कर आप पात्रों से अपने जुड़ाव को महसूस कर सकते हैं। कहानी में कई जगह सेक्स को विस्तार से दर्शाया गया है मेरी राय में इतना आवश्यक नहीं था फिर भी कई पाठकों के अनुरोध पर मैंने उसे शामिल किया है जिसे पाठक अपनी इच्छा अनुसार या तो पढ़ सकते हैं या नजरअंदाज कर सकते हैं।


आपके सुझाव और प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा मुझे हमेशा रहेगी...
 
प्रतीक्षारत रह कर भी आपने पिछले अपडेट को भुला दिया...

Was it too bad..?

Or you have left this story??
 
बनारस महोत्सव का पहला दिन

सुगना और कजरी सुबह से ही तैयार होकर मनोरमा मैडम द्वारा भेजी जाने वाली गाड़ी का इंतजार कर रहे थीं।




तभी गांव के सकरे रास्ते पर धूल उड़ाती चमचमाती एंबेसडर कार सरयू सिंह के दरवाजे की तरफ आ रही थी गांव के बच्चे उस कार के आगे पीछे दौड़ रहे थे ड्राइवर परेशान हो रहा था और बार-बार हार्न बजा रहा था परंतु गांव के इस माहौल में उसकी सुनने वाला कोई नहीं था। वह मन ही मन बस सोच रहा था हे भगवान में कहा जाहिलों के बीच फस गया।

गांव की धूल एंबेसडर की खूबसूरती को रोक नहीं पाई सुगना और कजरी ने मनोरमा मैडम की जीप की उम्मीद की थी परंतु कार तो उनकी उम्मीद से परे थी।

सफेद रंग का सफारी सूट पहने ड्राइवर कार से बाहर आया और बच्चों को कार से दूर रहने की नसीहत देते हुए उन्हें कार से दूर हटाने लगा। जिस तरह गुड़ पर मक्खियां सटी रहती हैं बच्चे भी घूम घूम कर कार के पास आजा रहे थे।

सुगना और कजरी सतर्क मुद्रा में खड़ी हो गई थी ड्राइवर ने कजरी से पूछा

"सुगना मैडम कौन है?"

सुगना शर्म से लाल हो गई उसे अपने लिए मैडम शब्द की उम्मीद न थी। कजरी को थोड़ा बुरा जरूर लगा पर सुगना उसे जान से प्यारी थी उसने मुस्कुराते हुए कहा

"यही है आपकी सुगना मैडम।"

"मैडम बनारस महोत्सव में चलने के लिए मनोरमा मैडम ने गाड़ी भेजी है। और यह खत सरयू सिंह जी ने दिया है।"

"ठीक है हम लोग आते हैं " सुगना अपनी खुशी को छुपाना चाह रही थी परंतु उसके दांत खूबसूरत होठों से निकलकर उसकी खुशी प्रदर्शित कर रहे थे। थोड़ी ही देर में सुगना और कजरी एम्बेसडर कार की पिछली सीट पर बैठ रहे थे. तभी हरिया की पत्नी ( लाली की मां ) निकलकर बाहर आई… और बोली

"ई झोला लाली के यहां पहुंचा दीह"

सुगना और कजरी को एम्बेसडर कार में बैठा देखकर उसे यकीन ही नहीं हो रहा था।

कजरी ने उससे कहा..

"ठीक बा घर के ख्याल रखीह"

लाली की मां ने हाथ हि

लाकर सुगना और कजरी को विदा किया और ड्राइवर ने कार वापस बनारस शहर की तरफ दौड़ा ली।

उधर विद्यानंद जी के पंडाल में गहमागहमी थी सरयू सिंह पंडाल के आयोजकों में थे परंतु विद्यानंद जी के आने के बाद जैसे उनकी उपयोगिता खत्म हो गई थी। जिस तरह बारात आने के बाद पांडाल लगाने वाले दिखाई नहीं पड़ते उसी प्रकार सरयू सिंह पांडाल के एक कोने में खड़े विद्यानंद की एक झलक पाने को बेकरार थे।

सजे धजे बग्गी में बैठे विद्यानंद पांडाल में बने अपने विशेष कक्ष की तरफ जा रहे थे। समर्थकों और अनुयायियों की भारी भीड़ उन्हें घेरे हुए थी। सरयू सिंह उन्हें तो देख पा रहे थे पर दूरी ज्यादा होने की वजह से वह निश्चय कर पाने में असमर्थ थे कि वह उनके बिरजू भैया हैं या यह सिर्फ एक वहम है।

कुछ ही देर में विद्यानंद जी का पंडाल सज गया श्रोता गण सामने बैठ चुके थे। मंच पर हुई दिव्य व्यवस्था मनमोहक थी और विद्यानंद के कद और ऐश्वर्य को प्रदर्शित कर रही थी । 54- 55 वर्ष की अवस्था में उन्होंने इस दुनिया में एक ऊंचा कद हासिल किया हुआ था। पाठक अंदाजा लगा सकते हैं जिसकी अनुयाई मनोरमा जैसी एसडीएम थी निश्चय ही वह विद्यानंद कितने पहुंचे हुए व्यक्ति होंगे।

कुछ ही देर में स्टेज के पीछे का पर्दा हटा और विद्यानंद जी अवतरित हो गए श्वेत धवल वस्त्रों में उनकी छटा देखते ही बन रही थी। चेहरे पर काली दाढ़ी में कुछ अंश सफेदी का भी था जो उनकी सादगी को उसी प्रकार दर्शाता था जैसे उनका मृदुल स्वभाव।

विद्यानंद जी का प्रवचन शुरू हो गया वह बार-बार दर्शक दीर्घा में बहुत ध्यान से देख रहे थे पता नहीं उनकी आंखें क्या खोज रही थी। श्रोता मंत्रमुग्ध होकर उनके द्वारा बताई जा रहे विवरण को ध्यान से सुन रहे थे।

पंडाल के बाहर एंबेसडर कार आ सुगना और कजरी को लेकर आ चुकी थी। सरयू सिंह बेसब्री से सुगना और कजरी का इंतजार कर रहे थे उन्होंने सुगना और कजरी का सामान लिया और उन्हें रहने की व्यवस्था दिखाई। सुगना और कजरी भी पंडाल में आ गयीं।

सुगना की गोद में सूरज एक खूबसूरत फूल के रूप में दिखाई पड़ रहा था। सूरज का खिला हुआ चेहरा और स्वस्थ शरीर सबका ध्यान अपनी तरफ जरूर खींचता। जितनी सुंदर और सुडौल सुगना थी उसका पुत्र भी उतना ही मनमोहक था ।

पांडाल में पहुंचते ही कजरी और सुगना श्रोता दीर्घा में बैठकर बैठकर पंडाल की खूबसूरती का मुआयना करने लगे वो बीच-बीच में विद्यानंद जी की तरफ देखते परंतु न तो कजरी का मन प्रवचन सुनने में लग रहा था और नहीं सुगना का। कजरी बार-बार विद्यानंद को देखे जा रही थी परंतु उसके मन में एक बार भी उसके बिरजू होने का ख्याल नहीं आया।

जब हैसियत और कद का अंतर ज्यादा हो जाता है तो नजदीकी भी दूर दिखाई पड़ने लगते हैं। विद्यानंद दरअसल बिरजू था यह कजरी की सोच से परे था।

विद्यानंद का एक प्रमुख चेला जो उनकी ही तरह सफेद धोती कुर्ते मैं सजा हुआ पंडाल में बैठी महिलाओं और बच्चों को बेहद ध्यान से देख रहा था। धीरे धीरे वह हर कतार में जाकर महिलाओं और बच्चों से मिलता उनका कुशलक्षेम पूछता और और छोटे बच्चों को लॉलीपॉप पकड़ा कर अपना प्यार जताता।

उसकी हरकतों से ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वह किसी विशेष बच्चे को खोज रहा हो। जैसे-जैसे वह पंडाल के आखिरी छोर तक आ गया उसके चेहरे पर अधीरता दिखाई पड़ने लगी।

वह व्यक्ति सुगना के करीब पहुंचा। सुगना जैसी खूबसूरत अप्सरा जैसी युवती को देखकर उसकी आंखें सुगाना के चेहरे पर ठहर गयीं। सूरज सुगना की चुचियों को बाहर निकालने की कोशिश कर रहा था शायद वह भूखा था। विद्यानंद जी के उस चेले ने सूरज को आकर्षित करने की कोशिश की। अपने मुंह से रिझाने के लिए उसने तरह-तरह की किलकारियां निकाली और सूरज का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करने में सफल हो गया। लाल और सफेद रंग की धारियों वाला लॉलीपॉप उसने अपने हाथों में निकाल लिया। सूरज उस खूबसूरत लालीपाप के आकर्षण से न बच पाया और उसने अपना हाथ लॉलीपॉप लेने के लिए बढ़ा दिया।

यह वही हाथ था जिसके अंगूठे पर नाखून नहीं था। विद्यानंद के शागिर्द ने सूरज का अंगूठा देख लिया और उसके चेहरे पर खुशी देखने लायक थी। कभी वह सूरज को देकहता कभी विद्यानंद को। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उसने कोई आश्चर्य देख लिया हो। उसने लॉलीपॉप सूरज को पकड़ाया और उल्टे पैर मंच की तरफ बढ़ चला। सुगना के बाद भी कतार में बैठे कई बच्चे भी लालीपाप का इंतजार कर रहे थे परंतु विद्यानंद का चेला वापस लौट चुका था।

जिसके भाग्य में लॉलीपॉप था वह मिल चुका था शायद उसकी तलाश पूरी हो चुकी थी। कुछ देर पश्चात विद्यानंद ने अपने प्रवचन से थोड़ा विराम लिया और हॉल में बैठे लोगों के लिए चाय बांटी जाने लगी। वह व्यक्ति एक बार फिर सुगना के पास आया और बोला

"विद्यानंद जी आपको बुला रहे हैं..?

सुगना आश्चर्यचकित थी। न तो वह विद्यानंद को जानती थी और न हीं वह उनकी अनुयायी थी फिर इस तरह से उसे बुलाना? यह बात सुनना की समझ से परे था। परंतु विद्यानंद की हैसियत और प्रभुत्व को वह बखूबी जान रही थी। यह उसके लिए सौभाग्य का विषय था कि इतनी भरी भीड़ में विद्यानंद ने उसे ही मिलने के लिए बुलाया था । उसने कजरी से कहा

"मां चल स्वामी जी का जाने काहे बुलावतारे ?"

उस शागिर्द ने कहा स्वामी जी ने सिर्फ आपको अपने बच्चे के साथ बुलाया है। सुगना की निगाहें सरयू सिंह को खोज रही थी शायद वह उनसे अनुमति और सलाह दोनों चाहती थी परंतु वह कहीं दिखाई नहीं पड़ रहे थे । अंततः विद्यानंद के आमंत्रण को सुगना ठुकरा ना पायी और कजरी की अनुमति लेकर विद्यानंद से मिलने चल पड़ी।

विद्यानंद का कमरा बेहद आलीशान था उनके कमरे को बेहद खूबसूरती से सजाया गया था अपने भव्य आसन पर बैठे विद्यानंद अपनी आंखें बंद किए हुए थे। सुगना के आगमन को महसूस कर उन्होंने आंखें खोली और अपने शागिर्द को देखते हुए बोले

"एकांत"

वह उल्टे पैर वापस चला गया उन्होंने सुगना की तरफ देखा और सामने बने आसन पर बैठने के लिए कहा।

सुगना ने आज सुबह से ही भव्यता के कई स्वरूप देखें अब से कुछ देर पहले बह एंबेसडर कार में बैठकर यहां आई थी और वह इतने बड़े महात्मा विद्यानंद के साथ उनके कमरे में उनके विशेष आमंत्रण पर उपस्थित थी। उसे घबराहट भी हो रही थी और मन ही मन उत्सुकता भी । कमरे में एकांत हो जाने के पश्चात विद्यानंद ने कहा

"देवी आपकी गोद में जो बालक है यह विलक्षण है। मैं आपको कुछ बताना चाहता हूं।" अपने पुत्र को विलक्षण जानकर सुगना खुश हो गई उसने स्वामी जी के सामने हाथ जोड़ लिए और बेहद आत्मीयता से बोली

"जी कहिए"

"मैंने अपने स्वप्न में इस विलक्षण बालक को देखा है और उसे ढूंढते हुए ही इस बनारस महोत्सव में आया हूं। आपका यह पुत्र पति-पत्नी के पावन संबंधों की देन नहीं अपितु व्यभिचार की देन है और यह व्यभिचार अत्यंत निकृष्ट है ऐसे संबंध समाज और मानव जाति के लिए घातक है।

मैं यह बात सत्य कह रहा हूं या असत्य यह आपके अलावा और कोई नहीं जानता परंतु मुझे इस बालक के जन्म का उद्देश्य और इसका भविष्य पता है यदि मेरी बात सत्य है तो आप अपनी पलके झुका कर मेरी बात सुनिए.. अन्यथा मुझे क्षमा कर आप वापस जा सकती हैं। "

सुगना के आश्चर्य का ठिकाना न रहा वह बेहद परेशान हो गई उसके चेहरे पर पसीना आने लगा . विद्यानंद ने फिर कहा

"आप परेशान ना हों यदि मेरी बात सत्य है तो सिर्फ अपनी पलके झुका लें... और यदि मेरी बात गलत है तो निश्चय ही आपका पुत्र वह नहीं है जिसे मैं ढूंढ रहा हूं"

सुगना की पलकें झुक गई उसकी श्रवण इंद्रियां विद्यानंद की आवाज की प्रतीक्षा करने लगी विद्यानंद ने बेहद संजीदा स्वर में कहा..

" यद्यपि इसका जन्म नाजायज और निकृष्ट संबंधों से हुआ है फिर भी इसके पिता और आपमें बेहद प्रेम है जो कि इस बालक में भी कूट कूट कर भरा हुआ है।

परंतु इसके पिता के साथ आपका एक पवित्र रिश्ता है जिसे आप दोनों ने जाने या अनजाने में कलंकित किया है। यह अनैतिक और पाप की श्रेणी में आता है। आने वाले समय में यह बालक एक असामान्य पुरुष के रूप में विकसित होगा जो अति सुंदर, बलिष्ठ, सभ्य, सुसंस्कृत, सुशील, विद्ववान पर अति कामुक होगा।

यदि इसकी कामुकता को न रोका गया तो इसके अंगूठे में जो दिव्य कामुक शक्तियां प्राप्त हैं उससे यह सारे सांसारिक रिश्तों की मर्यादा तार-तार कर देगा और उन्हें कलंकित करता रहेगा।

सांसारिक नजदीकी रिश्तों और मुँहबोले रिश्तों के अलावा किसी अन्य अपरिचित कन्या से मिलने पर इसका पुरुषत्व सुषुप्त अवस्था में रहेगा वह चाह कर भी किसी अन्य कन्या या स्त्री से संबंध नहीं बना पाएगा।"

सुगना थरथर कांपने लगी। अपने जान से प्यारे सूरज के बारे में ऐसी बातें सुनकर वह बेहद डर गई। विद्यानंद एक पहुंचे हुए फकीर थे उनकी बात को यूं ही नजरअंदाज करना कठिन था और तो और उन्होंने उसे देखते ही उसके नाजायज संबंध के बारे में जान लिया था जो निश्चित ही आश्चर्यजनक था पर कटु सत्य था। सुगना को उनकी बातों पर विश्वास होने लगा था।

उसने दोनों हाथ जोड़कर अपनी आंखें बंद किए ही विद्यानंद जी से कहा..

"स्वामी जी तब क्या यह कभी किसी लड़की के साथ विवाह कर सामान्य जीवन व्यतीत नहीं कर पाएगा"

"नहीं देवी, सांसारिक और नजदीकी रिश्तो के अलावा स्त्री मिलन के समय इसकी काम इंद्रियां पूरी तरह निष्क्रिय रहेंगी"

सुगना को सारी बात समझ आ चुकी थी उसने हाथ जोड़कर कहा…

"क्या इसका कोई उपाय नहीं है?

"जैसे इसका जन्म एक अपवित्र संभोग से हुआ है वैसे ही इसका जीवन एक अपवित्र और निकृष्ट संबंध बनाने के पश्चात ही सामान्य होगा"

सुगना के चेहरे से पसीना टपक रहा था। वह यह बात पूरी तरह नहीं समझ पा रही थी या समझना नहीं चाह रही। उसने उत्सुकता से कहा

" महाराज कृपया अपनी बात स्पष्ट करें..

"देवी मैं यह बात कहने में ही आत्मग्लानि महसूस कर रहा हूं आप बस इतना समझ लीजिए की इस बालक का कामसंबंध या तो उस स्त्री या कन्या से होना चाहिए जो इस बालक के माता या पिता की सन्तान हो या फिर….. विद्यानंद चुप हो गए।

"महाराज कहिए ना सुगना अधीर हो रही थी.."

"या फिर आप स्वयं….आपसे…. "

विद्यानंद द्वारा बोली गई बात निश्चित ही निकृष्ट थी। सुगना जैसी पावन और कोमल स्त्री इस मानसिक वेदना को न झेल पाई और बेहोश हो गई...

विद्यानंद ने अपने कमंडल से पानी के छींटे सुगना के मुंह पर मारे और वह एक बार पुनः चैतन्य हुई।

विद्यानंद ने हाथ जोड़कर कहा…

"देवी मेरी यह बात याद रखिएगा परंतु आप किसी से भी साझा मत करिएगा। यह आपके और आपके पुत्र के लिए घातक होगा। समय के साथ आपको मेरी बातों पर यकीन होता जाएगा।

नियति ने मुझे इस बालक के सामान्य होने तक जीवित रहने का निर्देश दिया है। इस बालक को सामान्य करना ही मेरी मुक्ति का मार्ग है।

नियति का लिखा मिटा पाना संभव नहीं है जिसने इसका भाग्य लिखा है वह स्वयं इसका रास्ता बनाएगा। अब आप जाइए और मुझसे मिलने का प्रयास मत कीजिएगा इस विलक्षण बालक के युवावस्था प्राप्त करने के पश्चात आप मुझसे मेरे आश्रम में मिल सकती हैं। एक बात और ….यह बनारस महोत्सव आपके और आपके परिवार के लिए बेहद अहम है सूरज एक भाग्यशाली लड़का है यह आप लोगों के जीवन में आमूलचूल परिवर्तन लाएगा और इसकी मुक्ति का मार्ग भी इसी बनारस महोत्सव के दौरान ही सृजित होगा।".

विद्यानंद द्वारा कही गई बातें सुगना के दिलों दिमाग पर छप चुकी थी। सुगना बड़ी मुश्किल से उठ कर खड़ी हुई। सूरज का लालीपाप खत्म हो चुका था। वह लॉलीपॉप की डंडी को भी उसी तरह चूस रहा था। जिस व्यक्ति ने सुगना को विद्यानंद तक पहुंचाया था वह वापस आया उसने एक और लॉलीपॉप और बच्चे के हाथ में थमाते हुए बोला

"बहुत प्यारा बच्चा है बिल्कुल आप पर गया है।" सुगना को उसकी बात से फिर नाजायज संबंधों की याद आ गई।

सुगना ने कुछ नहीं कहा वह पंडाल में आ चुकी थी कई सारी निगाहें सुगना को देख रही थी। सरयू सिंह और कजरी भी अपने कदम बढ़ाते हुए सुगना की तरफ आ रहे थे। उनके मन में कौतूहल था परंतु सुगना के पास उत्तर देने को कुछ नहीं था।

इधर सुगना बेहद तनाव में आ गयी थी उधर लाली के चेहरे पर लालिमा छाई हुई थी। राजेश ने आज लाली के चुदाई का दिन निर्धारित कर दिया था परंतु उसका प्यारा भाई सोनू अब तक नहीं आया था। बनारस महोत्सव जाने के लिए राजेश और लाली पूरी तरह सजधज कर तैयार थे। दोनों छोटे बच्चे राजू और रीमा भी नए नए कपड़े पहन कर मेला देखने के लिए उत्साह से लबरेज कमरे में उठापटक कर रहे थे ।

"मामा अभी तक नहीं आए?" राजू ने अधीरता से पूछा।

लाली बार-बार दरवाजे के बाहर अपना सर निकालकर सोनू की राह देख रही थी। राजेश ने उसे छेड़ते हुए कहा अरे इतनी अधीर क्यों होती हो अभी रात होने में बहुत वक्त है

लाली फिर शर्मा गई उसने राजेश की तरफ देखा और बोला

"मुझे मेला देखने की पड़ी है और आपको तो हर घड़ी वही सूझता है" लाली ने यह बात कह तो दी परंतु उसकी बुर जैसे लाली का विरोधाभास सुन रही थी। लाली के शब्दों के विपरीत उसकी बुर पनियायी हुई थी आज सुबह से ही लाली ने उसे खूब सजाया संवारा था उसकी उम्मीदें भी जाग उठी थी।

फटफटिया की आवाज सुनकर लाली एक बार फिर सतर्क हो गई और उसका प्यारा भाई और आज रात का शहजादा अपने दोस्त विकास के साथ राजदूत पर बैठा हुआ लाली के दरवाजे के सामने खड़ा था..

लाली उस अपरिचित व्यक्ति को देखकर कमरे के अंदर आ गई और राजेश से बोली

"देखिए सोनू आ गया है शायद उसका दोस्त भी साथ है"

राजेश कबाब में हड्डी बिल्कुल नहीं चाहता था वह बाहर निकला। परंतु आज नियति राजेश और लाली के साथ थी। विकास मोटरसाइकिल से आगे बढ़ चुका था और सोनू अपने कदम बढ़ाते हुए कमरे की तरफ आ रहा था।

कुछ ही देर में घर के बाहर दो रिक्शे खड़े थे राजेश ने लाली से कहा

"जाओ तुम सोनू के साथ बैठ जाओ दोनों बच्चे मेरे साथ बैठ जाएंगे।"

लाली नहीं मानी उसके मन में चोर था वह सोनू के साथ बैठना तो चाहती थी परंतु कहीं ना कहीं उसके मन में शर्मो हया कायम थी.

बनारस महोत्सव पहुंचने के पश्चात लाली का चेहरा देखने लायक था। हर तरफ खुशियां ही खुशियां राजेश ने लाली को मनपसंद सामान खरीदने की खुली छूट दे दी वह आज उसे किसी भी कारण से निराश नहीं करना चाहता था। आखिर उसके ही कहने पर लाली सोनू के करीब आ चुकी थी और उसकी दिली इच्छा आज पूरी करने वाली थी. परंतु राजेश को शायद यह बात नहीं पता थी की जो आग उसने लगाई थी उसे बुझा पाना अब उसके बस में भी नहीं था। नियति लाली और सोनू को अपना मोहरा बना चुकी थी।

राजेश को पता था की लाली और सोनू का यह संबंध लाली सुगना से पचा नहीं पाएगी और यदि ऊपर वाले ने साथ दिया तो सुगना जैसी खूबसूरत और कामसुख से वंचित कोमलंगी उसकी बाहों में आकर उसे जन्नत का सुख जरूर देगी.

इधर राजेश के मन में सुगना का ख्याल आया और उधर सरयू सिंह सुगना और कजरी को लेकर उसी रास्ते पर आ गए। लाली, सुगना को देखकर बेहद प्रसन्न हो गयी। सुगना भी अपनी सहेली को देख, विद्यानंद द्वारा कही गई बातों को दरकिनार कर फूली न समाई। वह दोनों लगभग एक दूसरे की तरफ दौड़ पड़ीं। दोनों की हिलती हुई बड़ी-बड़ी चूचियां आसपास के लोगों का ध्यान खींचने लगी सोनू भी इससे अछूता न था।

आलिंगन में लेते समय हमेशा की तरह दोनों की चुचियाँ एक दूसरे को दबाने का प्रयास करने लगीं। चुचियों के लड़ने का एहसास हमेशा की तरह सुगना और लाली को बखूबी हुआ। वह दोनों एक दूसरे को देख कर मुस्कुरा दीं। कजरी ने छोटी रिया को गोद में लेकर लेकर प्यार किया। सरयू सिंह ने राजेश का हालचाल लिया। राजेश वैसे भी सुगना पर फिदा था और उनके प्रतिद्वंद्वी के रूप में सुगना से नजदीकियां बढ़ा रहा था.

लाली ने राजेश से कहा

"यह तो दिन पर दिन और चमकती जा रही है अपनी साली को पहचान तो रहे हैं ना?"

"सुगना ने झुककर राजेश के चरण छुए और अनजाने में ही अपने दोनों बड़े बड़े नितम्ब उसकी आंखों के सामने परोस दिए। अब तक सोनू भी आ चुका था उसने सुगना के पैर छुए और सुगना ने उसे अपने सीने से सटा लिया और बेहद प्यार से बोली

"अरे सोनू बाबू तू कैसे""

"लाली दीदी के साथ आया हूं मुझे तो पता ही नहीं था कि आप लोग भी यहां आने वाले हैं."

यही मौका था जब सोनू अपने दोनों बहनों के साथ हो लिया राजू अपने पिता राजेश की उंगली पकड़कर चल रहा था और रीमा कजरी की गोद में खेल रही थी। सरयू सिंह ना चाहते हुए भी अपने प्रतिद्वंद्वी राजेश के साथ बनारस उत्सव के बारे में बातें करते हुए टहल रहे थे.

रास रंग का आनंद लेते हुए शाम हो गई। सोनू ने अपनी दोनों बहनों को मेले के आनंद से रूबरू कराया झूला झुलाया और ढेर सारी शॉपिंग करायी।

लाली और राजेश ने सुगना और कजरी से विदा ली तभी कजरी ने कहा

"हमार पंडाल पासे बा लाली की मां कुछ सामान भेज ले बाडी चल लेला"

कुछ ही देर में सभी लोग विद्यानंद के पांडाल में थे। अपना सामान लेकर लाली और राजेश ने विदा ली सुगना ने सोनू से कहा

"बाबू तू यही रुक जा कॉलेज तो नहीं जाना है?"

" नहीं दीदी आज नहीं आज कुछ जरूरी काम है कल फिर आऊंगा"

लाली सोनू का झूठ अपने कानों से सुन रही थी और मन ही मन मुस्कुरा रही थी। लाली की बुर के आकर्षण में बंधा सोनू अपनी सगी बहन को छोड़ लाली के पीछे पीछे चल पड़ा। नियति मुस्कुरा रही थी। सोनू की निगाहें लाली के नितंबों के साथ ऊपर नीचे हो रही थीं।

लाली ने अपना मोहपाश फेंक दिया था...सोनू उसके आकर्षण में बंधा...लाली के घर आ चुका था…..

राजेश अपनी पत्नी लाली की झोली में खुशियां भरने को तैयार था और उधर लाली की जांघो में छुपी सजी धजी बधू अपने नए वर से मिलने को तैयार थी..

लाली के बच्चे राजू और रीमा रास्ते में ही ऊँघने लगे थे मेला घूमने के आनंद में उन बच्चों ने कुछ ज्यादा ही मेहनत कर दी थी। लाली ने उन्हें बिस्तर पर सुला दिया और वापस हॉल में आ गयी।

राजेश अब तक नहाने जा चुका था मेले की भाग दौड़ से लगभग सभी थक चुके थे सिर्फ सोनू ही उत्साह से लबरेज लाली के आगे पीछे घूम रहा था।

राजेश के आने के पश्चात लाली ने सोनू से कहा

"सोनू बाबू तू भी नहा ले मजा आएगा" सोनू खुश हो गया मजा शब्द का मतलब उसने अपनी भावनाओं के अनुसार निकाल लिया था।

थोड़ी ही देर में राजेश और सोनु हॉल में बैठे हुए बातें कर रहे थे।

सोनू ने राजेश से पूछा

"जीजा जी रात में कितने बजे जाना है?"

"1:00 बजे"

सोनू ने घड़ी की तरफ निगाह उठाई जिसकी सुइयां 90 डिग्री का कोण बना रही थी। 9 बज चुके थे।

सोनू खुद को 4 घंटे इंतजार करने के लिए तैयार करने लगा । अपने लण्ड को राजेश की नजरों से बचाकर वह उसे तसल्ली देने की कोशिश कर रहा था।

तभी लाली बाथरूम से नहाकर, लाल रंग की सुंदर नाइटी में लिपटी हुई बाहर आ गयी। शरीर से चिपकी हुई शिफॉन की नाइटी लाली के खूबसूरत शरीर को छुपा पाने में नाकाम थी।

सोनू की निगाहें उसके शरीर पर ब्रा और पेंटी खोजती रही। लाली सीधा किचन में गई और तीन गिलास दूध निकालकर हाल में आ गयी। लाली के दोनों प्रेमी लाली का दूध पीने लगे। मेरा आशय लाली द्वारा लाये गए दूध से था।

नियति छिपकली के रूप में हॉल में दीवाल से चिपकी तीनों की मनोदशा पढ़ रही थी। छिपकली देखकर लाली चिल्लाई राजेश अचानक पीछे पलटा और उसके हाथ का दूध हाल में रखे एकमात्र बिस्तर पर गिर गया।

सोनू और लाली मैं वह दूध साफ करने की कोशिश की परंतु जितना ही वह साफ करते गए बिस्तर उतना ही गंदा होता गया।

लाली ने कहा..

"सोनू बाबू का बिस्तर खराब हो गया मीठे दूध के कारण इसमें चीटियां लगेंगी।"

"कोई बात नहीं सोनू अंदर ही सो जाएगा वैसे भी मुझे रात में चले जाना है।"

"सोनू बाग बाग हो गया उसे इसकी आशा न थी।"

लाली ने राजेश का गिलास उठाया और अपने झूठे ग्लास से दूध उसके क्लास में डालते हुए बोली

"लीजिए मेरा दूध पी लीजिए लाली ने कह तो दिया पर उसका चेहरा शर्म से लाल हो गया जिसे राजेश और सोनू ने बखूबी समझ लिया।"

सोनू ने लाली की झेंप मिटाते हुए कहा

"जीजा जी थोड़ा दूध मेरे ग्लास से भी ले लीजिए पर ...जूठा है"

राजेश ने बड़ी आत्मीयता से कहा

"अब तुम हमसे अलग थोड़ी हो हम सब एक हैं और अपना ग्लास आगे बढ़ा दिया" सोनू राजेश की बातों में छिपे गूढ़ रहस्य को नहीं समझ पाया।

दूध पीने के पश्चात राजेश ने जम्हाई लेते हुए कहा तुम लोग बातें करो मैं चला सोने और उठ कर अंदर आ गया अपनी डबल बेड की रजाई ओढ़ कर वह सो गया।

पर राजेश की आंखों में नींद कहां थी वह तो अपनी खूबसूरत पत्नी लाली और सोनू के मिलन का आनंद लेना चाह रहा था जिसका प्रणेता वह स्वयं था। वह बेसब्री से उनका इंतजार करने लगा उसके कान लाली और सोनू के वार्तालाप अपना ध्यान लगाए हुए थे।

सोनू बात करने के बिल्कुल मूड में नहीं था वह राजेश की नींद में कोई व्यवधान डालना नहीं चाहता था.. लाली किचन में ग्लास साफ करते हुए बोली

"सोनू बाबू जाओ आराम करो मैं भी आती हूं.."

सोनू जाकर बिस्तर के एक किनारे लेट गया उसने लाली के लिए अपने और राजेश के बीच में स्थान खाली छोड़ दिया था। अपनी आंखें बंद किए वह लाली के खूबसूरत शरीर को याद कर अपने लण्ड को सहला रहा था तभी अचानक लाली आ गई।

सोनू की कमर के ऊपर हो रही हलचल को वह बखूबी समझती थी उसने रजाई को सोनू की कमर के ठीक नीचे से पकड़ा और ऊपर उठाते हुए बोली

" मुझे भी आने दे लाली की आंखों के सामने सोनू का तंनाया हुआ लण्ड दिखाई पड़ गया जिसे सोनू अपने हाथों से छिपाने का असफल प्रयास कर रहा था । परंतु देर हो चुकी थी यह तो शुक्र है कि कमरे में पूरी रोशनी न थी सिर्फ एक लाल रंग का नाइट लैंप जल रहा था जो चीजों को देखने और पहचानने के काम आ सकता था.

सोनू ने अपने पैर सिकोड़ कर अपने सीने से सटा लिए और लाली को अंदर आने की जगह दे दी। लाली सोनू और राजेश के बीच में आ चुकी थी.

लाली ने अपने सिरहाने से वैसलीन की एक ट्यूब निकाली और सोनू को देते हुए बोली

तूने उस दिन जो दवा लगाई थी उसकी वजह से ही मैं चलने फिरने लायक हो गई यह क्रीम वही पर लगा दे..

लाली ने करवट ले ली और उसका चेहरा राजेश की तरफ हो गया और पीठ सोनू की तरफ।

सोनू ने वह वैसलीन तर्जनी पर निकाली और लाली की नंगी पीठ की तलाश में अपनी बाकी उंगलियां फिराने लगा। परंतु उस दिन की तरह आज लाली की पीठ नंगी न थी. सोनू ने हिम्मत जुटाकर लाली की नाइटी को नीचे से कमर की तरफ लाना शुरू कर दिया लाली की गोरी और चमकती हुई जान है रजाई के अंदर घुप अंधेरे में अनावृत हो रही थी लाली की बुर पहनी हुई अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रही थी।

नितंबों तक आते-आते सोनू का सब्र जवाब दे गया उसने एक ही झटके में अपना पजामा अलग कर दिया।

लाली की पीठ पर सोनू की उंगलियां घूमने लगी और सोनू का मजबूत लण्ड अपनी दीदी के नितंबों में छेद करने को एक बार फिर आतुर हो गया। रजाई के अंदर हो रही हलचल ने राजेश को सतर्क कर दिया था।

वह लाली की चुचियों पर कब्जा जमाने को लालायित हो गया उसकी हथेलियों ने लाली की नाइटी को सामने से खींच कर उसकी मदमस्त चुचियों को स्वतंत्र कर दिया….

नाइटी लाली के गले तक आ चुकी थी चीरहरण की इस मनोरम गतिविधि में लाली ने भी अपनी आहुति दी और उस सुंदर नाइटी को अपने गले और चेहरे से निकालते हुए बाहर कर दिया एक मदमस्त सुंदरी पूरी तरह वासना से भरी हुई चुदने को तैयार थी….

शेष अगले भाग में।
 
मैंने पहले भी कहा है और आज फिर कहता हूं कि आप कहानी का मर्म बखूबी समझती हैं.

सुगना और सरयू सिंह ने जो संबंध बनाए वह नैतिक या अनैतिक थे यह पाठक अपनी इच्छा अनुसार तय कर सकते हैं।

परंतु सरयू सिंह ने सुगना को उसे गर्भवती करने की बजाय लड्डू में गर्भ निरोधक दवाइयां खिलाकर कई महीनों तक संभोग करते रहे। सुगना भी उस आनंद को छोड़ना नहीं चाहती थी और पुत्र की लालसा को त्याग कर संभोग सुख में रम गई थी। सरयू सिंह के माथे का दाग नियति का इशारा था वह सुगना और सरयू सिंह दोनों को इस संबंध को यथाशीघ्र रोकने का इशारा कर रही परंतु कामाग्नि में जल रहे ससुर और बहू आनंद लेते रहे .

सरयू सिंह और सुगना के काम संबंध यही नहीं रुके पूरी यात्रा के दौरान कजरी भी इस वासना के खेल में शामिल हो गई।

विद्यानंद स्वामी कहीं से भी आदर्श नहीं है वह कलयुगी महात्माओं और फकीरों की तरह है सूरज के बारे में उसे किसी अनजान शक्ति ने बताया है जिसे ढूंढता हुआ वह बनारस महोत्सव आया है उसे अपने परिवार का बखूबी ज्ञान है परंतु न तो वह अपने पुत्र रतन को जानता है न सुगना को।

हां सरयू सिंह और कजरी अब अभी उसकी यादों में है जिसका जिक्र उसने हरिद्वार में किया था।

विद्यानंद त्रिकालदर्शी महात्मा नहीं है जिन्हें भूत भविष्य वर्तमान सभी का ज्ञान सूरज के बारे में उनका आकलन उस अनजान शक्ति द्वारा बताया गया है।

लंबी कहानी के संवादों और भावनाओं को आत्मसात कर पाना इतना आसान नहीं होता मैं समझ सकता हूं पर फिर भी यकीन के साथ कह सकता हूं की जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती जाएगी कहानी का मर्म और दुविधा खत्म होती जाएगी।

सेक्स और उसका रोमांच समय-समय पर पाठकों की जांघों के बीच हलचल मचाता रहेगा।

.धन्यवाद....
 
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