Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 109 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

यह जिम्मेदारी मैं आप पर ही सोचता हूं आप अपनी ही भाषा में इस काल्पनिक दृश्य को लिखिए मैं उसे बाद में कहानी में अपनी भाषा में जोड़ दूंगा।

Sure

दीपावली में ही धमाके होते हैं

कहानी में प्रेम और प्रतिरोध का अपना रंग होता है..

महोदय ये अप्राकृतिक मैथुन पर एक दो पैराग्राफ लिखकर भेजिए मैं तो चार लाइन लिख कर थक जाता हूं
 
भाग 150

उधर मनोहर हमेशा इतवार के दिन का इंतजार किया करता था लाली के घर जाने का उसका आकर्षण अब सुगना बन चुकी थी। मनोहर का प्यार एक तरफा था सुगना जैसी पारखी स्त्री भी अब तक मनोहर की मनोदशा से अनजान थी। शायद मनोहर भी महिलाओं को समझता था और अपनी वासना भरी निगाहों पर उसका नियंत्रण कायम था..

सुगना उसके जीवन में एक सुगंध की तरह आ गई थी जिसकी खुशबू वह पूरे हफ्ते तक महसूस करता और जब उसकी यादें धूमिल पड़ती वह उन्हें तरोताजा करने फिर सुगना के घर पहुंच जाता..

सुगना स्वयं सोनू की चमकती गर्दन को दागदार करने के लिए स्वयं अधीर हो रही थी।

सुगना के घर फोन की घंटी बजी

“सुगना दीदी…प्रणाम , हम लोग दीपावली में बनारस आ रहे हैं” यह चहकती आवाज सोनी की थी। उनका इंडिया आने का टिकट कंफर्म हो चुका था और अगले महीने विकास और सोनी अमेरिका से बनारस आ रहे थे।


अब आगे….

बनारस में सुगना से मिलना सोनू के लिए कठिन हो रहा था। फिर भी सुगना सोनू को कभी भी खाली हाथ विदा नहीं करती थी.. और गर्दन के दाग को अक्सर जीवंत जरूर कर देती थी चाहे आकस्मिक हस्तमैथुन, त्वरित मुख मैथुन द्वारा हो या फिर कभी त्वरित संभोग द्वारा।

सुगना के पास सोनू को खुश करने के कई उपाय थे पर सबसे ज्यादा खुशी सोनू को अपने दहेज को देखने और चूमने चाटने में मिलती थी जिसके लिए एकांत आवश्यक था।

लाली को हमेशा से यह कंफ्यूजन बना रहता था की जौनपुर आने के बाद ऐसा क्या हो जाता है कि सोनू की गर्दन पर दाग उभर आता है। सोनू और सुगना के कामुक मिलन का संबंध इस दाग से था लाली इससे अनभिज्ञ थी।

पिछली बार की तरह सुगना के साथ सलेमपुर अकेले जाने दोबारा अवसर कभी प्राप्त नहीं हो रहा था…

सोनू तो सुगना को अपने घर सीतापुर ले जाने की फिराक में था परंतु उसकी मां पदमा ने अपने किसी रिश्तेदार को वहां रख छोड़ा था।

मनुष्य अपनी परिस्थितियों का निर्माता स्वयं होता है।

इस बार सोनू ने अपनी चाल चल दी…

सोनू ने सरयू सिंह का ट्रांसफर बनारस के पास के एक गांव में करवा दिया…यह काम उसने गुपचुप तरीके से किया जिससे सरयू सिंह मजबूरन बनारस आ जाए। सरयू सिंह के बनारस आगमन के कई फायदे थे।

एक तो जौनपुर जाने के पश्चात घर सुगना के घर में कोई मर्द नहीं रहता था सुगना और उसकी मां अकेले रहती थी और सोनू को हमेशा एक डर लगा रहता था। सरयू सिंह की उपस्थिति से घर में एक मर्द की कमी पूरी हो जाती जो गाहे बगाहे जरूरत पड़ने पर पूरे परिवार की मदद कर सकता था। यद्यपि सोनू यह कार्य अपने किसी साथी या मनोहर से भी करा सकता था परंतु अपना अपना होता है।

सरयू सिंह के लिहाज से भी यह अच्छा था क्योंकि उन्हें अक्सर अपने या कजरी के इलाज के लिए बनारस आना पड़ता था सो उनका भी काम आसान हो जाना था।

एक हफ्ते बाद सरयू सिंह कजरी के साथ बनारस शिफ्ट हो चुके थे और अपनी नई पोस्टिंग पर ज्वाइन कर चुके थे।

गांव में उनके दरवाजे पर ताला लटक चुका था। सोनू यही नहीं रुका। अपने घर सीतापुर में रह रहे रिश्तेदार को भी उसने जौनपुर बुला लिया और एक छोटी-मोटी नौकरी लगा दी वह रिश्तेदार अब शनिवार और रविवार के दिन सोनू के घर का ख्याल रखने लगा।

वैसे भी सोनू को पता था गांव में ऐसा कुछ था ही नहीं जिसे चोरी किया जा सके।

सोनू अपनी शतरंज की बिसात बिछा चुका था।

शतरंज की विसात सिर्फ सोनू ने नहीं बिछाई थी अपितू सरयू सिंह भी अपने मन की बात जो उन्होंने मनोहर को लेकर कजरी से की थी वही बात आज पदमा से कर रहे थे। कजरी सरयू सिंह और पदमा के बीच मध्यस्थ का काम कर रही थी उसने पदमा को समझाते हुए कहा

“ए बहिनी जैसे लाली के भाग्य खुल गईल ओकर दोसर बियाह हो गईल …का हमार सुगना के ना हो सकेला?

कजरी ने तो जैसे पदमा के मन की बात कह दी थी अब जब सुगना की सास ने आगे बढ़कर या बात कही थी तो पद्मा ने तुरंत ही अपनी हामी भर दी. पर उसके मन में संशय था अपने संशय को मिटाने के उद्देश्य से उसने आतुरता से कहा..

“पर सुगना तो अभी सुहागन दिया दोसर ब्याह कैसे हो सकेला ?”

अब बारी सरयू सिंह की थी

“अईसन बियाह कौन काम के ? जब पति सन्यासी बैरागी हो होकर घर से भाग गईल बा. “

सरयू सिंह की बातें कजरी को थोड़ा नागवार गुजरी आखिर कुछ भी हो रतन उसका पुत्र था परंतु बात तो सच थी। कजरी ने सरयू सिंह की बात को आगे बढ़ते हुए कहा

अब रतन के भूल जायल ही ठीक बा। उ वापस ना लौटी सुगना सिंदूर जरूर लगावत दिया पर ओकर वापस आवे के अब कोनो उम्मीद नईखे।

पद्मा को उम्मीद की किरण दिखाई पड़ने लगी अब जब सरयू सिंह और कजरी दोनों जो सुगना के साथ ससुर की भूमिका निभा रहे थे जब उन्होंने ही फैसला कर लिया था। पद्मा ने कजरी का हाथ पकड़ते हुए कहा

“ देखा भगवान का चाहत बाड़े पर सुगना से ब्याह के करी “

तीनों के मन में ही एक ही उत्तर था पर कहने की जहमत कजरी ने ही उठाई

“ए बहिनी तहरा मनोहर कईसन लागेले?”

पदमा की अंतरात्मा खुश हो गई

“उ तो बहुत सुंदर लाइका बाड़े पर का ऊ भी ऐसन सोचत होगें”

“यदि तारा पसंद होखे तो उनका मन छुवल जाऊ । आखिर वह भी तो अकेले ही रहले । उनका भी इ दोसर बियाह होखी। सुगना और मनोहर के जोड़ी अच्छा लगी” कजरी ने पदमा से कहा

सरयू सिंह ने भी अपनी सहमति दी और घर के तीनों बुजुर्ग एक मत होकर सुगना के लिए मनोहर को पसंद कर चुके थे। अब बारी थी मनोहर का मन जानने की।

सरयू सिंह ने बेहद चतुराई और अपने अनुभव से कहा कि “सब काम में जल्दी बाजी नइखे करेके मनोहर के धीरे-धीरे आवे जावे द लोग यदि उनका मन में ऐसा कोई बात होगी तो धीरे-धीरे पता लाग ही जाए”

पद्मा ने अपनी बात रखते हुए कहा

“ हां लाली बुची मनोहर के मन छू सकेली..”

बात सच थी लाली सुगना की सहेली थी और मनोहर उसका ममेरा भाई वह बातों ही बातों में मनोहर के दूसरे विवाह और उस दौरान सुगरा का जिक्र कर मनोहर के अंतर्मन को पढ़ सकती थी।

यद्यपि अब तक लाली को ना तो कोई इसका अंदाजा था और नहीं अपने घर के वरिष्ठ सदस्यों के मन में चल रहे इस अनोखे विचार के बारे में कोई आभास।

उधर विकास सोनी का खेत जोत जोत कर थक चुका था परंतु सोनी गर्भधारण करने में अक्षम रही थी जब बीज में दम नहीं था तो फसल क्या खाक उगती..

सोनी की वासना पर ग्रहण लग चुका था। सेक्स अब एक काम की भांति लगता था किसका परिणाम सिफर था। पर सोनी की सपने बदस्तूर जारी थे। सरयू सिंह उसके अवचेतन मन के सपनों के हीरो थे सोनी को यह आभास था कि हकीकत में यह संभव न था। कैसे वह नग्न होकर पितातुल्य सरयू सिंह को उसे चोदने के लिए आमंत्रित करेगी। या सरयू सिंह कैसे उसे नग्न कर उसकी गोरी जांघें फैलाएंगे और उसकी मुनिया को अपनी आंखों से देखेंगे..

आह वह पल कैसा होगा जब वह अपना तना हुआ विशाल लंड अपनी हथेलियों से मसलते हुए उसकी बुर के भग्नाशे पर रगड़ेंगे और उसे धीरे धीरे…..

आह सोनी ने महसूस किया कि आज बाद जागती आंखों से स्वप्न देखने को कशिश कर रही है…बुर में संवेदना जाग चुकी थी…सोनी इस एहसास को और महसूस करना चाहती थी…सरयू सिंह का लंड न सही उसकी जगह उसकी अंगुलियों ने बुर में अपनी हलचल बढ़ा दी. दिमाग में सरयू सिंह के साथ सोनी ने वो सारी कल्पनाएं की जो उसका चेतन मन शायद कभी न कर पाता पर वासना ग्रसित सोनी स्वतंत्र थी और उसकी सोच भी…

आखिर कर सोनी ने हांफते हुए एक सफल स्खलन को पूर्ण किया और ….अपनी नींद लेने लगी।

दिन बीत रहे थे…

उधर रतन मोनी के करीब आने की कोशिश में लगा हुआ था। माधवी यह बात जान चुकी थी और वह मोनी को अपना संरक्षण दी हुए थी वह मोनी कोर्नटन से दूर ही रखना चाहती थी। रतन ने जब में माधवी को धोखे से कूपे में अपने किसी लड़के से बेरहमी से चुदवाया तब से उनमें एक दूरी सी आ गईं थी।

मोनी धीरे धीरे पूरे आश्रम में प्रसिद्ध हो चुकी थी…अपनी सुंदरता कटावदार बदन और चमकते चेहरे की वजह से अनूठी लगती थी। उपर से इतने दिन कूपे में जाने के बावजूद उसका कौमार्य सुरक्षित था।

कूपे में धीरे धीरे रेटिंग सिस्टम भी शुरू हो चुका था..

लड़के कूपे में आई लड़की के सौन्दर्य और उसके कामुक अंगों के आधार पर अपनी रेटिंग देते। मोनी उसमें भी नंबर वन थी।

और इसी प्रकार मोनी ने अपने 11 महीने पूर्ण कर लिए।

विद्यानंद का यह अनूठा विश्वास था की स्त्री योनि को पुरुष यदि लगातार कामुकता के साथ स्पर्श चुंबन और स्पर्श करते रहे तो स्त्री को अपना काउमरीय सुरक्षित करना संभव था उसे संभोग के लालसा निश्चित ही उत्पन्न होती और वह संभोगरत हो ही जाती।

इस अनोखे कूपे का निर्माण भी शायद विद्यानंद ने अपने इसी विश्वास को मूर्त रूप देने करने के लिए बनवाया था। और वह काफी हद तक इसमें सफल भी रहा था। लगभग लड़किया कूपे में जाने के बाद अपना सुरक्षित रखने में नाकामयाब रहीं थी। कोई एक महीना तो कोई दो महीना कुछ चार पांच महीने तक तक भी अपना कौमार्य सुरक्षित रखने में कामयाब रहीं थीं। परंतु मोनी अनूठी थी उसने विद्यानंद की परीक्षा पास कर ली थी और 11 महीने बाद भी उसका कौमार्य सुरक्षित था।

आखिरकार विद्यानंद ने स्वयं मोर्चा संभाला। मोनी की अगली परीक्षा के लिए एक विशेष दिन निर्धारित किया गया। आश्रम में उत्सव का दिन था।

मोनी को आज के दिन होने वाली गतिविधियों का कोई भी पूर्वानुमान नहीं था बस उसे इतना पता था कि आज आश्रम में एक विशेष दिन है जिसमें उसकी अहम भूमिका है।

प्रातः काल नित्य कर्म के बाद उसे एक बार फिर कुंवारी लड़कियों के साथ उपवन भ्रमण के लिए भेज दिया गया सुबह के 10:00 बजे मोनी ने दुग्ध स्नान किया और तत्पश्चात सुगंधित इत्र और विशेष प्रकार की सुगंध से बहे कुंड में स्नान कराया गया।

मोनी का रोम रोम खिल चुका था। उसकी चमकती त्वचा और भी निखर गई थी पूरे शरीर में एक अलग किस्म की संवेदना थी त्वचा का निखार और चमक अद्भुत थी। त्वचा की कोमलता अफगान के सिल्क से भी मुलायम और कोमल थी।

मोनी को श्वेत सिल्क से बने गाउन को पहनाया गया और धीरे-धीरे मोनी आश्रम के उस विशेष कक्ष में उपस्थित हो गई।

विशेष कक्ष को करीने से सजाया गया था। राजा महाराजा के शयन कक्ष भी शायद इतने खूबसूरत नहीं होते होंगे जितना सुंदर आश्रम का यह खूबसूरत कमरा था।

बेहद खूबसूरत आलीशान पलंग पर लाल मखमली चादर बिछी हुई थी। सिरहाने पर मसलंद और तकिया करीने से सजाए गए थे। शयनकश की दीवारें खूबसूरत पेंटिंग और तरह-तरह की मूर्तियों से सुसज्जित थीं। कमरे से ताजे फूलों की भीनी भीनी खुशबू आ रही थी ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे यह संयनकक्ष किसी बाग के अंदर निर्मित किया गया हो।

मोनी भव्यता और सुंदरता दोनों से अभिभूत थी…उसे स्वयं किसी राजमहल की रानी होने का अनुमान हो रहा था धीरे-धीरे उसकी मातहत उसे उसे वैभवशाली पलंग तक ले आई और बेहद विनम्रता से कहा आप पलंग पर बैठ जाइए थोड़ी ही देर में आगे की दिशा निर्देश दिए जाएंगे।

मोनी आश्चर्य से होने वाली घटनाक्रम को अंदाज रही थी। तभी कमरे में एक गंभीर आवाज गूंजी

देवी आप धन्य है.. आप शायद आश्रम की ऐसी पहली युवती है जिसने पिछले 11 महीनो से लगातार पुरुष प्रजाति की सेवा करने के पश्चात भी अपना कौमार्य सुरक्षित रखा है। मैं आपसे काफी प्रभावित हूं। इस आश्रम के नियमों के अनुसार आपको अंतिम परीक्षा से गुजरना होगा। इस परीक्षा में सफल होने के पश्चात आपको भविष्य में किसी कूपे में जाने की आवश्यकता नहीं होगी परंतु यदि आप चाहे तो स्वेच्छा से अवश्य जा सकती है..

इसके अतिरिक्त आपको आश्रम में एक विशेष दर्जा प्राप्त होगा जो निश्चित ही आपके लिए सम्मान का विषय होगा।

यह परीक्षा आपके यौन संयम की ही परीक्षा है जिसमें अब तक आप सफल होती आई है। यदि आप इस परीक्षा में स्वेच्छा से भाग लेना चाहती हैं तो अपने दोनों हाथ जोड़कर खड़े हो जाए और अपना श्वेत वस्त्र स्वयं निकालकर पास पड़ी टेबल पर रख दें। उसी टेबल पर एक रुमाल नुमा कपड़ा रखा होगा उसे स्वयं अपनी आंखों पर बांध ले। आपकी परीक्षा लेने वाला पुरुष शायद आपसे नजरे नहीं मिल पाएगा और आपको भी उसे देखने की चेष्टा नहीं करनी चाहिए यह नियमों के विरुद्ध होगा।

कूपे की भांति इस समय भी आपके पास लाल बटन उपलब्ध रहेगा जो की पलंग के सिरहाने रखा हुआ है आप जब चाहे उसे दबाकर उस व्यक्ति को अपनी गतिविधियां रोकने के लिए इशारा कर सकती है।

ध्यान रहे लाल बटन का प्रयोग सिर्फ तभी करना है जब पुरुष आपसे ज्यादती कर रहा हो…

मुझे विश्वास है कि आप नियम पूरी तरह समझ चुकी होगी। मेरी तरफ से हार्दिक शुभकामनाएं..

वह गंभीर आवाज अचानक ही शांत हो गई. मोनी को यह आवाज कुछ जानी पहचानी लग रही थी परंतु लाउडस्पीकर से आने की वजह से वह पूरी तरह आश्वस्त नहीं हो पा रही थी।

मोनी ने मन ही मन इस परीक्षा में भाग लेने की ठान ली। वैसे भी वह अब तक आश्रम में विशेष सम्मान पाती आई थी उसके मन में और भी ऊपर उठने की लालसा प्रबल थी। मोनी उठकर अपना श्वेत रंग का गाउन उतरने लगी जैसे-जैसे वह गांव उसके बदन का साथ छोड़ता गया मोनी की मादक और चमकती काया नग्न होने लगी। सामने आदमकद दर्पण में अपनी खूबसूरत बदन को निहारती मोनी स्वयं अपनी सुंदरता से अभीभूत हो रही थी।

तरासे हुए उरोज, पतली गठीली कमर.. मादक और भरी-भरी जांघें और उनके जोड़ पर बरमूडा ट्रायंगल की तरह खूबसूरत त्रिकोण जिस पर कुदरत का लगाया वह अद्भुत चीरा जिसके अंदर प्रकृति का सार छुपा हुआ था। मोनी का यह रहस्य अब तक उजागर नहीं हुआ था। वह स्खलित तो कई बार हुई थी पर अपने कौमार्य को बचाने में सफल रहीं थी…

मोनी अपने पैर आगे पीछे कर अपने गदराए नितंबों को देखने का लालच नहीं रोक पा रही थी। वह पीछे पलटी और अपनी गर्दन घूमाकर दर्पण में अपने बदन के पिछले भाग को देखने लगी मोनी के नितंब बेहद आकर्षक थे वह अपनी हथेलियां से उसे छूती और उसकी कोमलता और कसाव दोनों को महसूस करती।

वह मन ही मन ईश्वर को इतनी सुंदर काया देने के लिए धन्यवाद कर रही थी । आखिरकार उसने अपनी आंखों पर सफेद रुमाल को लपेटकर जैसे ही मोनी ने गांठ बंधी उसकी आंखों के सामने के दृश्य ओझल होते गए। उसे इतना तो एहसास हो रहा था कि कमरे में अब भी रोशनी थी परंतु आंखों से कुछ दिखाई पड़ना संभव नहीं था।

वह चुपचाप बिस्तर पर बैठ गई अपनी जांघें एक दूसरे से सटाए वह अपने परीक्षक का इंतजार कर रही थी।

शेष अगले भाग में..
 
आपके विचार उत्तम है पर पहले तो सोनू पुलिस में नहीं है। दूसरे या कहानी एक जासूसी या क्राइम रिलेटेड कहानी नहीं है..

आप एक मेरी कहानी एक सफेदपोश की मौत पढ़िए शायद कुछ आनंद आए।

नियति इस कहानी का प्रमुख किरदार है बार बार उपयोग में लाने से हुई असुविधा के लिए खेद है
 
भाग 151

वह मन ही मन ईश्वर को इतनी सुंदर काया देने के लिए धन्यवाद कर रही थी । आखिरकार उसने अपनी आंखों पर सफेद रुमाल को लपेटकर जैसे ही मोनी ने गांठ बंधी उसकी आंखों के सामने के दृश्य ओझल होते गए। उसे इतना तो एहसास हो रहा था कि कमरे में अब भी रोशनी थी परंतु आंखों से कुछ दिखाई पड़ना संभव नहीं था।

वह चुपचाप बिस्तर पर बैठ गई अपनी जांघें एक दूसरे से सटाए वह अपने परीक्षक का इंतजार कर रही थी।

अबआगे

उधर बनारस में

सरयू सिंह अब सुगना के घर में पूरी तरह सेट हो चुके थे कजरी पदमा और सुगना तीनों मिलजुल कर रहते। यह एक संयोग ही था की सरयू सिंह तीनों ही स्त्रियों से संभोग सुख प्राप्त कर चुके थे।

जहां पद्मा ने सरयू सिंह की युवा अवस्था में उनसे संभोग किया था वही कजरी उनकी भाभी होने के बावजूद पूरे समय तक उन्हें पत्नी का सुख देती रही थी और सुगना….आह … वो तो सरयू सिंह के जीवन में एक सुगन्ध की तरहआई और सरयू सिंह के जीवन को जीवंत कर दिया।

सुगना के साथ बिताया वक्त और कामुक पल ने सरयू सिंह की वासना को एक नए आयाम तक पहुंचाया और उन्होंने सुगना को जैसे अपनी वासना विरासत में दे दी थी। नियति एक पिता से उसकी वासना अपनी पुत्री में स्थानांतरित होते हुए देख रही थी।

परंतु यह सरयू सिंह का दुर्भाग्य ही था कि उन्हें सुगना और अपने बीच के रिश्ते का सच मालूम चल गया अन्यथा वह आज भी जी भर कर सुगना को भोग रहे होते और शायद सुगना भी इसे सहर्ष स्वीकार कर रही होती। सुगना और सोनू के करीब आने में सरयू सिंह की अहम भूमिका थी न तो वह सुगना के आगोश से बाहर जाते और न हीं उस रिक्त स्थान की पूर्ति के लिए सोनू सुगना के और करीब आजाता।

बनारस आने के बाद सरयू सिंह की उत्तेजना शिथिल पड़ रही थी। एकांत का समय कम ही मिल पाता। दिन भर बच्चे उन्हें घेरे रहते और सूरज तो उन्हें बेहद प्यार था वह उसे पढ़ते लिखाते और तरह-तरह के ज्ञान देते। एक गुसलखाना ही ऐसी जगह थी जहां वह अपनी काम पिपासा को गाहे बगाहे शांत करते और इसमें इनका साथ देती सोनी…

यद्यपि सरयू सिंह को यह बखूबी अहसास था कि सोनी से संभोग वह सिर्फ अपनी कल्पनाओं में ही कर सकते थे ऐसा कोई भी कारण या निमित्त न था जिससे उन्हें सोनी को भोगने का अवसर प्राप्त होता। उन्हें कभी-कभी अपनी किस्मत पर भरोसा होता कि जैसे ईश्वर ने सुगना को उनके करीब ला दिया था कभी ना कभी हो सकता है सोनी स्वयं ही उनके करीब आ जाए.. पर विचार मुंगेरीलाल के हसीन सपनों से कम न थे।

सपने उम्मीद की पराकाष्ठा होते हैं जिस उम्मीद की रूपरेखा ना हो वह सपनों में तब्दील हो जाती है।

बहरहाल सरयू सिंह की कामवासना को जिंदा रखने में अब सिर्फ सोनी का ही योगदान था उनकी तीनों परियां अब उनकी वासना का साथ छोड़ चुकी थी परंतु उनका ख्याल रखने में कोई कमी नहीं थी। वह घर के हीरो थे और एक धरोहर की भांति उनकी सेवा होती थी। वो सभी का स्नेह पाते पर उनका लंड स्त्री स्पर्श और कसी हुई बुर के लिए तरसता रहता।

शाम सोनू और लाली जौनपुर से बनारस आने वाले थे..

शाम की चाय का वक्त था सुगना चाय बनाकर लाई और पूरा परिवार चाय पीने लगा तभी सरयू सिंह ने कहा.

“सोचा तनी कल सलेमपुर चल जाई”

कजरी ने उत्सुकता बस पूछा

“काहे का बात ?”

“अरे खेत के मालगुजारी खाती कुछ कागज देबे के बा”

“ आप कहा बस से जाईब सोनू आज आवता सुगना के लेकर चल जाए हमरो कुछ सामान लेके आवेके बा” कजरी ने सरयू सिंह से कहा अब कजरी की वाणी में एक अधिकार महसूस होता जो उम्र के साथ पत्नी की आवाज में महसूस होता है।

सुगना के मन में लड्डू फूटने लगे सोनू का साथ उसके लिए बेहद रोमांचक और कामुक होता था और अब सुगना सोनू के साथ एकांत का इंतजार करती थी। उसने झटपट कजरी की हां में हां मिलाई और बोली

“बाबूजी हम कल सोनू के साथ चल जाएब आप सूरज के ध्यान राख लेब”

तभी पदमा भी बोल उठी

“ओहिजा से तनी सीतापुर भी चल जईहे हमार बक्सा से साल ले ले आईहै”

सुगना को एक पल के लिए लगा जैसे सारा समय आने जाने में ही बीत जाएगा वह थोड़ा सकुचाई परंतु अपनी मां की बात काटने का साहस न जुटा पाई..

सुगना को क्या पता था कि उसकी मां ने उसे जो काम बताया था वह सुगना की मां की लालसा पूरी करने वाला था।

“ठीक बा कॉल तनी जल्दी निकल जाएब..” सुगना मन ही मन बेहद प्रसन्न थी।

पदमा और कजरी शाम के खाने की बातें करने लगी और कुछ ही देर बाद में उनकी तैयारी में लग गई। सुगना ने हमेशा की भांति सोनू के आगमन की खुशी में स्नान किया अपनी मुनिया को धो पोंछ कर चमका दिया खुद को सजाया संवारा। उसे पता था सोनू कुछ पलों के साथ में भी कामुक हो सकता था इसलिए वह हमेशा खुद को सोनू के लिए तैयार रखती थी।

जितना प्यार सोनू अपने दहेज से करता था सुगना को इसका बखूबी अहसास था। सोनू के होंठ सुगना के निचले होठों से मिलन के लिए हमेशा आतुर रहते थे और सुगना अपने सोनू को कतई निराश नहीं करना चाहती थी।

वह अब जानबूझकर सोनू की उपस्थिति में अपनी पैंटी का परित्याग कर देती थी। सोनू और सुगना का साहस बढ़ता जा रहा था उन्हें यह आभास नहीं था कि उनके बीच के कामुक संबंध कभी पकड़े भी जा सकते हैं। सुगना सज धज कर एक ताजा खिले फूल की तरह इधर-उधर मर्डर रही थी उसने संध्या आरती की और घर में चारों तरफ आरती की थाल घूमाने लगी..

सुगना सोनू और लाली का इंतजार कर रहे थी वह बार-बार दरवाजे की तरफ जाती और सोनू की गाड़ी की आहट सुनने के लिए उसके कान तरस रहे थे…

नियती ने सुगना को निराश ना किया कुछ ही देर में गाड़ी की आवाज सुनाई पड़ी और सुगना हाथों में आरती का थाल लिए भागती हुई दरवाजा खोलने गई।

सुगना ने एक हांथ से दरवाजा खुला और सामने मनोहर को देखकर थोड़ा उदास हो गई उसे सोनू का इंतजार था मनोहर का आना अप्रत्याशित था.. वह एक कदम पीछे हटी और तुरंत ही अपने हाथों में पकड़ी आरती की थाल मनोहर के आगे कर दी।

बेहद सलीके से पारंपरिक साड़ी में तैयार हुई, और हाथों में आरती का थाल लिए सुगना.. एक आदर्श स्त्री की भांति मनोहर के सामने खड़ी थी। खूबसूरत बदन, कामुक काया, चमकती त्वचा और बेहद सुंदर मासूम चेहरे के साथ सुगना एक आदर्श युवती की भांति दिखाई पड़ रही थी। मनोहर सुगना को एक टक देखा ही रह गया..

उसके हाथ आरती लेने के लिए आगे बढ़े पर नज़रें सुगना के चेहरे से नहीं हट रही थी। सुगना ने अपनी पलके झुका ली और आरती की थाल के ऊपर घूमते मनोहर के मजबूत हाथों को देखने लगी।

स्थिति आशाए होते हुए देखकर सुगना सतर्क हुई और बेहद संजीदगी से बोली…

“अंदर आइए ……मां मनोहर जी आए हैं” आखरी वाक्यांश कहते हुए सुगना की आज आवाज स्वाभाविक रूप से थोड़ा ऊंची हो गई थी।

मनोहर अंदर आ गया उसने पूछा

“अरे लाली और सोनू अभी तक पहुंचे नहीं क्या ?”

सुगना ने मनोहर को बैठने का इशारा किया और बोली “आते ही होंगे हम लोग भी इंतजार ही कर रहे हैं”

मनोहर स्वयं अपनी आतुरता पर अब खुद को कोस रहा था आखिर इतनी भी क्या जल्दी थी सुगना के घर आ धमकने की परंतु मन ही मन वह सुगना को देखना चाहता था उससे बात करना चाहता था शायद इसीलिए वह अपनी अधीरता पर काबू न कर सका और झटपट सुगना के घर आ धमका था।

सुगना ने रसोई में जाकर अपनी मां पदमा और कजरी को मनोहर के आने की सूचना दी और गिलास में पानी लेकर मनोहर के पास आ गई। जैसे ही सुगना पानी देने के लिए आगे झुकी मनोहर की आंखों ने वह दृश्य देख लिया जिसके बारे में न जाने उसने कितनी बार कल्पना की थी सुगना के दुग्ध कलश जो ब्लाउज के भीतर कैद होने के बावजूद अपने आकार और कोमलता का प्रदर्शन कर रहे थे वह मनोहर की आंखों के सामने नृत्य करने लगे।

मनोहर की आंखें बरबस सुगना की चूचियों पर टिक गई आज पहली बार सुगना में मनोहर की कामुक निगाहों को अपने बदन पर महसूस किया और तुरंत ही अपनी साड़ी का आंचल ठीक किया और दुग्ध कलश पर एक झीना ही सही परंतु मजबूत आवरण डाल लिया

सुगना अपनी आंखें मनोहर से नहीं मिला सकी। मनोहर अब तक उसकी निगाहों में छिछोरा नहीं था वह एक काबिल , संजीदा और सम्मानित व्यक्ति था परंतु आज सुगना ने मनोहर में एक कामुक पुरुष को देखा था। वह तुरंत ही सचेत हो गई। जैसे ही मनोहर ने पानी का गिलास पकड़ा वह खड़ी हो गई और वापस रसोई घर की तरफ चली गई।

कुछ ही देर में उसकी मां पदमा मनोहर के पास आ चुकी थी। सुगना ने बखूबी अपनी मां पदमा को मनोहर से बातें करने के लिए लगा दिया था और किचन में अपनी सास कजरी के साथ रसोई के कार्य में लग गई।

थोड़ी ही देर बाद सोनू और लाली भी पहुंच गए और एक बार फिर सुगना का घर गुलजार हो गया। जब जब सोनू सुगना के आसपास रहता सुगना के पूरे बदन में आनंद की तरंगे दौड़ रही होती। वह सचेत रहती उसे यह बखूबी अहसास रहता है कि सोनू कभी भी उसे अपने आलिंगन में ले सकता है …उसकी चूचियां मीस सकता है उसके होंठ चूम सकता है और अपना बना हुआ लंड उसके नितंबों से सटा सकता है ।

सोनू क्या करेगा यह अप्रत्याशित रहता परंतु कुछ ना कुछ करेगा जरूर सुगना यह बात भली भांति जानती थी।

उधर बच्चों की मौज हो गई थी। सब एक दूसरे से मिलकर शोर शराब करने लगे। सरयू सिंह भी अपना हाट बाजार घूम कर वापस आ चुके थे।

शहर में भी गांव सा माहौल हो गया था घर की भीड़भाड़ बरबस ही गांव की याद दिला देती है।

बातचीत का क्रम आगे बढ़ा और तभी कुछ अप्रत्याशित हुआ सरयू सिंह अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाए और मनोहर से बोल बैठे.

“बेटा मनोहर आगे कब तक अकेले रहने का इरादा है…जो हुआ उसे भूल जाना ही उचित होगा यह जीवन है इसे तो जीना ही है एक साथी रहेगा तो यह जीवन आसानी से सुखद रूप से बीतेगा..”

सोनू भी यह वार्तालाप सुन रहा था वह सरयू सिंह का इशारा बखूबी समझ चुका था उसने भी सरयू सिंह की हां में हां मिलाई और बोला ।

“हां यह बात सच है आपको दूसरा विवाह कर लेना चाहिए…आखिर एक से दो भले”

मनोहर मन ही मन प्रसन्न हो रहा था यद्यपि सरयू सिंह और सोनू की बातों में कहीं भी सुगना का जिक्र न था परंतु मनोहर के दिमाग में सिर्फ और सिर्फ सुगना घूम रही थी वह हर बात को सुगना से ही जोड़कर देख रहा था उसका अंतर्मन इस कल्पना मात्र से खुश हो रहा था।

“हां चाचा जी कभी-कभी सोचता हूं देखता हूं कब कोई उचित जीवनसाथी मिलता है”

अचानक सुगना गरम पकोड़े लेकर उनके बीच हाजिर थी।

क्या अनूठा संयोग था सुगना एक-एक करके पकौड़े अपने पूर्व प्रेमी सरयू सिंह वर्तमान प्रेमी सोनू और अपने मन में सुगना का भविष्य बनने की लालसा लिए मनोहर.. की प्लेट में डाल रही थी।

मुस्कुराती हुई अपनी अल्हड़ जवानी को समेटने की नाकाम कोशिश करती हुई सुगना मनोहर और सोनू दोनों के लंड में जान डालने में कामयाब रही थी सरयू सिंह का तो जैसे स्विच ही ऑफ हो गया था।

सुगना की उपस्थिति में आगे बात करना कठिन था। सरयू सिंह ने बात बदल दी और नरसिम्हा राव के बारे में वार्तालाप करने लगे। बात आई गई हो गई।

सरयू सिंह और मनोहर थोड़ा टहलने के उद्देश्य से गली में चल कमी कर रहे थे

सुगना और लाली दोनों लाली के कमरे में हंसी ठिठोली कर रही थी। सोनू बच्चो के साथ खेल रहा था। तभी सोनू ने लाली को अपने कमरे से निकाल कर बाथरूम की तरफ जाते देखा।

इधर लाली ने बाथरूम का दरवाजा बंद किया और उधर सोनू पलक झपकते ही सुगना के पास था। लाली और सुगना दोनों अपनी साड़ी अपनी जांघों तक उठा रहे थे लाली का उद्देश्य सर्वविदित था और सुगना सोनू का इशारा समझ चुकी थी और कुछ ही पलों में सोनू के अधरों को उसके दहेज पर घूमते महसूस कर रही थी।

सोनू के पास ज्यादा वक्त ना था लाली के कदमों के आहट के साथ ही वह सतर्क हो गया.. सोनू को पता था उसके पास वक्त कम था पर वो उसका सदुपयोग करने में सफल रहा था।

जब तक लाली कमरे के दरवाजे तक पहुंचती सोनूअपने लंड में उत्तेजना लिए कमरे से बाहर निकल रहा था। होंठो पर सुगना की बुर से चुराया मदन रस चमक रहा था। सुगना और सोनू दोनों के चेहरे पर मुस्कुराहट थी और धड़कनें तेज थी और गर्दन के दाग पर भी इसका कुछ असर आ गया था. ऐसा प्रतीत होता था जैसे गर्दन का दाग काम आनंद के अनुरूप और समानुपातिक था।

लाली को एक बार फिर शंका हुई परंतु नतीजा सिफर था… सुगना ने लाली के चेहरे के भाव पढ़ने की कोशिश की और बोला

“का सोचे लगले ?”

लाली के पास कोई उतरना था उसके मन में जो वहम था उसे होठों पर लाना कठिन था पाप था।

लाली और सुगना इधर-उधर की बातें कर रहे थे तभी लाली ने अचानक ही एक नया सुर छेड़ दिया…

ए सुगना अब तेरा मन नहीं करता है क्या?

सोनू से विवाह के पश्चात लाली और सुगना कभी भी अंतरंग नहीं हुईं थीं। और शायद इसकी आवश्यकता भी नहीं थी। फिर भी सुगना ने लाली का इशारा समझ लिया और मुस्कुराते हुए बोली..

काहे का?

लाली ने उसकी चूचियों को मीसते हुए बोला..

“मेरे साथ रजाई में…”

सुगना ने लाली को अपने आलिंगन में कसते हुए कहा

“जब सोनू छोड़ी तब नू….”

दोनों सहेलियां एक दूसरे के आलिंगन में आ गई और लाली ने सुगना के कान में कहा

“आज तू हमारा भीरी सुतिहा”

सुगना ने इशारों ही इशारों में अपनी मौन स्वीकृति दे दी..

तभी सुगना का पुत्र सूरज …कमरे में प्रवेश कर रहा था सुगना लाली से तुरंत ही दूर हो गई…और अपने पुत्र को गोद में लेकर प्यार करने लगी।

कुछ ही देर बाद रात्रि के खाने की तैयारी होने लगी…मनोहर और सुगना की नजरे कई चार हुई और हर बार सुगना ने मनोहर की आंखों में कुछ अलग देखा उसने अपनी नज़रें झुका ली परंतु मनोहर का यह व्यवहार उसे असहज कर रहा था।

घर के तीनों बुजुर्ग जिस प्रकार मनोहर से घुल मिलकर बात कर रहे थे उससे मनोहर को काफी अपनापन महसूस हो रहा था और ऐसा लग रहा था जैसे वह इस परिवार का ही एक हिस्सा हो..

सुगना को लेकर मनोहर के मन में भावनाएं हिलोरे लेने लगी थी। उधर घर के तीनों बुजुर्ग मनोहर को लेकर अब संजीदा हो चुके थे वह अपने ईश्वर से इस जोड़ी को एक करने की मन ही मन गुहार लगा रहे थे…

यह बात अभी सबके मन में ही थी इस पर ना तो अभी लाली से चर्चा हुई थी और ना ही सोनू से। और सुगना तो इस पूरे घटनाक्रम से ही अनभिज्ञ थी।

खाना खाने के पश्चात मनोहर वापस जा चुका था। लाली और कजरी मिलकर किचन में बर्तन साफ कर रही थी तभी कजरी ने अपने मन की बात कह दी..

“ए लाली मनोहर दोसर बियाह ना करिहें का?”

“काहे का बात बा?”

लाली को यह प्रश्न बिल्कुल भी आउट ऑफ सब्जेक्ट लगा।

“कुछ ना …असही पूछता रहनी हां अतना सुंदर और सुशील लइका बाड़े पूरा जीवन अकेले कैसे कटिहें?”

“लेकिन चाची तू ई बात काहे पूछत बाड़ू?”

कजरी लाली के पास गई और उसके कान में धीरे से कहा..

“सोचत बानी की सुगना के भी दोसर बियाह कर दीहल जाओ.. रतन के आवे के अब कोनो उम्मीद नईखे”

लाली के दिमाग में घंटियां बजने लगी उसके लिए यह वार्तालाप कल्पना से परे था इससे पहले की लाली कुछ बोल पाती सुगना रसोई घर में आ धमकी और उसने कजरी को लाली के कान में कुछ बोलते देख लिया और अपनी सास कजरी से बोली..

“अरे कान में क्या बोलत बाड़ू? साफ-साफ बोल”

कजरी ने तुरंत बाद पलट दी और बोली

“कल तोरा सलेमपुर जाए के बा नू इहे बतावत रहनि हा”

अब चौंकने की बारी लाली की थी..

कजरी ने बिना प्रश्न पूछे दोबारा अपनी बात दोहराई

“कल सुगना के सोनू के साथ सलेमपुर जाए के बा कुछ कागज के काम बाटे “

लाली को पिछली बार सुगना और सोनू के एक साथ जाने और लौटने का वक्त याद आ गया जब उसने सुगना के इत्र की खुशबू सोनू के लंड से महसूस की थी.. औरतों और उसके गर्दन का दाग उसे दिन चरम पर था।

लाली तपाक से बोल उठी

“कल हम भी जाएब मां बाबूजी से मिले बहुत दिन हो गइल बा”

लाली ने जिस दृढ़ता से यह बात कही थी उसकी बात काट पाना मुश्किल था। सुगना ने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए कहा

“ठीक बा तू भी चल चलीहा”

सुगना एक पल के लिए तो उदास हो गई परंतु उसे अपनी मां पदमा की बात याद आ गई उसे सीतापुर भी जाना था सुगना मन ही मन मुस्करा उठी इस बार सोनू के साथ अपने इस घर में जिसमें वह जवान हुई थी उसे घर से उसकी किशोरावस्था और बचपन की कई यादें जुड़ी थी सुगना मन ही मन अपनी किशोरावस्था के दिन याद करने लगी।

सुगना को आज लाली के साथ सोना था.. लाली ने स्वयं सुगना के साथ आज अंतरंग होने की इच्छा व्यक्त की थी दोनों सहेलियां पहले भी एक दूसरे की बाहों में अपनी कामुकता शांत करती आईं थी पर सोनू से विवाह होने के बाद यह पहला अवसर था।

सुगना बच्चों और सोनू को दूध देने के लिए उनके कमरे में गई और उसने सोनू के कान में कुछ ऐसा कहा जिससे सोनू के चेहरे पर चमक आ गई उसने सुगना का हाथ चूम लिया। सोनू रात का इंतजार करने लगा।

धीरे-धीरे सभी अपने-अपने शयन कक्ष की तरफ बढ़ चले।

शयन व्यवस्था आज बदली हुई थी.. सोनू सुगना के बच्चों के साथ उसके कमरे में सो रहा था. लाली और सुगना दोनों आज एक ही बिस्तर पर पड़े गप्पे मार रहे थे कुछ देर तक कजरी और पदमा भी उनके साथ थी परंतु थोड़ी ही देर बाद उन्हें नींद आने लगी और वह अपनी अपनी जगह पर सोने चली गई इस वक्त कल तीन लोग जाग रहे थे लाली और सुगना और उन दोनों का प्यारा सोनू….

सोनू को सुगना का इंतजार था और लाली को सुगना का…

कुछ होने वाला था...
 
आपने कहानी पर कई प्रश्न उठाए हैं एक एक करके उत्तर देता हूं..

"उपन्यास की शुरुआत में तत्कालीन पाठकों की रुचि को ध्यान में रखते हुए सेक्स को प्रधानता दी गई है जो समय के साथ न्यायोचित तरीके से कथानक की मांग के अनुसार दर्शाया गया है।"

उपरोक्त वाक्यांश इस कहानी की प्रस्तावना जो हर पेज के टॉप में लिखा गया है से लिया गया है। इस कहानी में सिर्फ और सिर्फ सेक्स परोसन मेरा उद्देश्य कभी नहीं रहा है। इसीलिए हर पुरुष और हर स्त्री में जोड़ी बनाऊं और उन्हें बारी बारी एक बिस्तर पर पहुंचा दूं यह लिखना कठिन है।

सुगना व्याभिचारिणी है या नहीं यह आपकी अपनी समझ है। सरयू सिंह और सोनू से उसका मिलान किन परिस्थितियों में हुआ यह कहानी में बेहद विस्तार से समझाया गया है। वैसे भी सुगना ने सोनू से संबंध तभी बनाए जब वह सरयू सिंह से पूरी तरह अलग हो चुकी थी।

आपने लिखा है की सरयू सिंह मोनी की जवानी से आसक्त थे परंतु कहानी में यह कहीं नहीं लिखा। सरयू सिंह सोनी पर आसक्त थे वह भी उसके उत्तेजक आधुनिक पहनावे को लेकर।

रही बात आपने जो लिखा है की लेखक भी सरयू सिंह और सुगना जैसी दोहरी मानसिकता में जी रहा है तो यह सिर्फ आपकी अपनी सोच है।

मेरा काम तो किरदार गढ़ना है और कहानी की रूपरेखा को नागे बढ़ाना है। अभी तक मैंने जितनी भी कहानी लिखी हैं उसमें कम से कम 20-25 किरदार होंगे उन सब की मानसिकता लेखक से मेल खाए यह कठिन है।

आपकी इच्छा मैं भली भांति समझ रहा हूं और समय-समय पर शायद आपको अपनी सोच और अपेक्षा के हिसाब से कंटेंट मिल जाए।

तब तक के लिए जुड़े रहिए और हो सके तो पर्सनल कमेंट करने से बचीये यह उचित नहीं है।
 
कहानी में आपका स्वागत है मैंने मैंने कुछ एपडाले एपिसोड नहीं डाले है ताकि आप जैसे पाठक हिम्मत करके इस फार्म पर लॉगिन करें और इस कहानी से अपना जुड़ाव अपने कमेंट के माध्यम से दिखाएं अकेला यही एक पारितोषिक है मेरे कहानी लिखने का जिसका मैं हकदार भी हूं और उम्मीद भीरखता हूं ठीक उतना ही जितना आप कहानी के नए एपिसोड के लिए इंतजार करते हैं।

मैं आपका वंचित अपडेट आपको मैसेज पर भेज दिया है
 
कहानी के पटल पर आपका स्वागत है वांछित अपडेट भेज दिया गया है।
 
आपकी सलाह के लिए आभार। लगता हैं आपको सुगना के कैरेक्टर से लगाव हों गया है जुड़े रहिए सुगना रण्डी नहीं है मुझे बखूबी पता है ..अच्छा लगा
 
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