Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 110 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

भाग 152

धीरे-धीरे सभी अपने-अपने शयन कक्ष की तरफ बढ़ चले।



शयन व्यवस्था आज बदली हुई थी.. सोनू सुगना के बच्चों के साथ उसके कमरे में सो रहा था. लाली और सुगना दोनों आज एक ही बिस्तर पर पड़े गप्पे मार रहे थे कुछ देर तक कजरी और पदमा भी उनके साथ थी परंतु थोड़ी ही देर बाद उन्हें नींद आने लगी और वह अपनी अपनी जगह पर सोने चली गई इस वक्त कल तीन लोग जाग रहे थे लाली और सुगना और उन दोनों का प्यारा सोनू….

सोनू को सुगना का इंतजार था और लाली को सुगना का…



कुछ होने वाला था…

अब आगे…

सुगना ने आगे की कमान संभाली उसने लाली को आज अपने कमरे में सोने के लिए आमंत्रित कर लिया यद्यपि पहले लाली और सुगना ने लाली के कमरे में सोने की बात की थी परंतु सुगना ने लाली को अपने सयन कक्ष में सोने के लिए मना लिया।

सुगना की वासना में डूबा सोनू लाली के कक्ष में बच्चों के साथ सोने चला गया। आज पूरा परिवार एकत्रित था ऐसी अवस्था में सोनू और सुगना का मिलन कठिन था। घर में जितने कमरे थे शायद सोने वाले उससे ज्यादा थे। पर सुगना ने स्वयं मन बना लिया था उसने स्वयं चुदने के लिए बिसात बिछा ली थी। आखिर वह घर की मालकिन थी और इस परिवार में सरयू सिंह के बाद सबसे ज्यादा सम्मानित। उसकी बात काटने का साहस किसी में नहीं था ऐसा नहीं की डर की वजह से अपितु सभी उसका सम्मान करते थे।

रात के 11:00 बज चुके थे सभी अपने-अपने कक्ष में आराम कर रहे थे तभी लाली अपने कक्ष से सुगना के कक्ष में जाने के लिए निकली वह एक खूबसूरत नाइटी पहनी हुई थी। तभी कजरी ने उसे सुगना के कमरे जाते हुए देख लिया सुगना अपने बिस्तर पर अकेली थी कजरी को कुछ अटपटा सा लगा उसने आखिरकार लाली से पूछ ही लिया अरे

“ इतना राति के कहां जात बाड़े”

लाली अचानक आए प्रश्न से घबरा गई परंतु तभी अंदर से सुगना ने आवाज दी

“ अरे कुछ ना कई दिन हो गैल हमनी के बतियवला रऊआ सूत् रही हम लोग रात भर बतियाएब जा”

“ बच्चा सब कहां बा?” कजरी ने सुगना के बच्चों के बारे में पूछा

“सब अपना मामा साथ सुतल बा “

कजरी अब तक समझ चुकी थी कि सुगना और लाली ने आज सचमुच रतजगा करने का प्लान बना लिया था उसने और सवाल ना किया और अपनी आंखों में नींद लिए अपने कमरे की तरफ चली गई।

पूरा घर एक बार फिर रात के सन्नाटे में था लाली और सुगना बिस्तर पर आ चुके थे उधर सोनू सुगना के बारे में सोचता हुआ अपनी नींद से युद्ध कर रहा था।

पूरी तरह थके होने के बावजूद उसे जो मिलने वाला था उसकी आस में उसकी आंखें जाग रही थी।

सुगना बिस्तर पर थी और उसने अब भी साड़ी ब्लाउज पहना हुआ था लाली ने उसे इस अवस्था में देखते ही पूछा “अरे कपड़ा ना बदल लेले हा”

सुगना में अपनी नशीली आंखों से लाली की तरफ देखा और अपने ब्लाउज का हुक स्वयं अपनी उंगलियों से खोलते हुए बोली

“मैडम कपड़े की क्या जरूरत है?

लाली समझ चुकी थी सुगना आज मूड में थी हिन्दी में बोलकर सुगना ने लाली को अपने चुलबुले पान से मोहित कर लिया था। कुछ ही देर में दोनों सहेलियां पूरी तरह नग्न लिहाफ के अंदर एक दूसरे की बाहों में थी।

नंगी सुगना को अपनी बाहों में भरने का जो सुख सोनू उठता था उसकी बीवी भी उसे कमतर न थी लाली को सुगना को बाहों में भरना बेहद पसंद था।

लाली ने सुगना को अपने आलिंगन में भर लिया और अपनी दाहिनी जांघ सुगना की जांघों के बीच के जोड़ पर धीरे-धीरे रगड़ने लगी। अपनी हथेलियां से वह सुगना की पीठ सहलाए जा रही थी और अपनी चूचियों से उसकी चूचियों को महसूस कर रही थी।

ऐसा नहीं था की लाली और सुगना आज पहली बार एक दूसरे से अंतरंग हो रही थी पर आज कुछ अनोखा था।

लाली की वासना सुगना से जागृत थी सुगना की सोनू से और सोनू उसका तो कहना है क्या सुगना ने जो उसे आश्वासन दिया था वह उसे सोच कर ही मगन था और सुगना के इशारे का इंतजार कर रहा था।

लाली और सुगना का आलिंगन धीरे-धीरे और कामुक होता गया…लाली की उंगलियों ने सुगना के बुर के होठों को फैलाते हुए..कामुक स्वर में पूछा..

“ए सुगना तोर मन ना करेला का?

सुगना जो लाली के स्पर्श का आनंद ले रही थी अचानक सचेत हुए बोली..

“काहे के…?”

लाली ने कुछ कहा नहीं परंतु सुगना की चिपचिपी बुर में अपनी दो उंगलियां आगे पीछे करके इशारे से अपनी बात कही…

सुगना ने हाथ बढ़ाकर लाली को रोकने की कोशिश की.. और अपनी कामुक आवाज में का कहा

आह…तनी धीरे से…

लाली रुकी नहीं और उसकी बुर की दरार में अपनी उंगल को बड़ी अदा से घूमाते हुए बोली..

बोल ना मन ना करेला का?

अब मन करबो करी तो का करी?

अब तू भी दोसर ब्याह कर ले…रतनवा वापस ना आई ई पक्का बा।

लाली ने अपनी बात स्पष्ट कर दी।

सुगना को अब तक आभास नहीं था कि घरवाले उसके और मनोहर के बारे में ख्याली पुलाव पका रहे हैं और अब कजरी ने लाली को भी अपनी तरफ कर लिया था।

सुगना अनजान थी उसने लाली की बात को हल्के में लिया और बोला

अच्छा बड़ा ब्याह करावे के सोच ले बाडू केकरा से कर ली…सुगना ने लाली की चूचियों को मसलते हुए आगे कहा

चल तोरा से ही कर लेत बानी….. सुगना ने लाली को अपने आलिंगन में कसकर दबा लिया।

सुगना जब कामुक होती थी तो उसके आगोश में चाहे मर्द हो या स्त्री दोनों में उत्तेजना भर जाती थी आज लाली भी सुगना की कामुकता में खो गई थी दोनों सहेलियां एक दूसरे में गुत्थमगुत्था हो गई और उनकी उंगलियां एक दूसरे का स्खलन करने का प्रयास करने लगी।

लाली के दिमाग में अब भी कजरी की बातें घूम रहीं थीं..वह अपनी भावनाओं पर काबू नहीं कर पाई और एक बार फिर बोल उठी

ए सुगना साच बोल ना दोसर बियाह करबे?

काहे पूछत बाड़े? सुगना लाली के प्रश्नों को अब गंभीरता से ले रही थी।

सुगना ने जिस प्रकार अपनी आंखों को बड़ी कर या प्रश्न पूछा था लाली खुद एक बार के लिए सकपका गई उसे एक पल के लिए लगा शायद उसे इस प्रश्न पर अभी इस वक्त इतना जोर नहीं देना चाहिए था।

छोड़ जाए दे…लाली ने बात बदलते हुए कहा।

पर अब सुगना की उत्तेजना मैं व्यवधान आ चुका था उसने लाली को उकसाते हुए कहा

“बताओ ना कहे पूछता बा?”

लाली भी कम चतुर ना थी उसने बड़ी संगीदगी से कहा..

“सोनू के हमारा हमारा झोली में डालकर ते ता हमार जिंदगी सवार दिहले…. ते जिंदगी भर अकेले रहबे का…? भतार के सुख तोरा जीवन में कब आई हम ईहे चिंता करेनी”

सुगना ने एक बार फिर लाली को अपने आलिंगन में भरा और उसके होठों को चुमते हुए बोली…

“जब तक हमर लाली और सोनू हमरा के अपन परिवार मनीहे हमारा केहू के जरूरत नइखे”

सोनू का नाम सुनते ही लाली के दिमाग में एक बार फिर उसका शक घूमने लगा सुगना के सुहाग के इत्र की खुशबू उसने सोनू के लंड से वह पहले ही सूंघ चुकी थी जिसका माकूल उत्तर उसे अब तक नहीं मिला था। सोनू और सुगना दोनों भाई बहन बड़ी चतुराई से उसे दिन लाली के प्रश्नों का अधूरा उत्तर देकर बच निकले थे।

अच्छा सुगना एक बात पूछी…लाली ने सुगना की सहमति लेने की कोशिश की।

ते ता मजा लेवल छोड़कर सवाल जवाब करे लगले…पूछ का पूछे के बा? सुगना ने अपनी आंखें बड़ी करते हुए लाली के चेहरे पर अपनी प्रश्नवाचक निगाहें केंद्रित कर दीं..

ते सोनू के सच में माफ कर देले बाड़े…

काहे खातिर? सुगना को लाली का यह प्रश्न पूरी तरह बेमानी लगा ..

“ऊ जवन दिवाली के रात तोहरा संग कईले रहे” लाली ने हिम्मत जुटाकर अपनी बात कह दी।

सुगना के दिमाग में उसे दीपावली की काली रात की यादें ताजा हो गई जब सोनू ने पहली बार उसे जबरदस्ती चोदा था परंतु अब उस काली रात का दाग सुगना के जीवन में सुरों का राग बिखेर गया था। सोनू और सुगना को करीब लाने में उसे रात की अहम भूमिका थी जो नहीं होना था वह घटित हुआ था और उसने धीरे-धीरे पहले सुगना और सोनू को दूर किया और फिर इतना करीब ला दिया की ना तो सोनू सुगना के बिन रह सकता था और ना ही सुगना सोनू के बिन।

“का सोचे लगले?” लाली ने सुगना की तंद्रा भंग की…

सुगना सोनू के बारे में सोचकर पूरी तरह गर्म हो चुकी थी उसने लाली को फिर अपने आगोश में भर लिया और अपने घुटनों को लाली की बुर से रगड़ने लगी..

बोल ना..लाली ने अपनी उंगलियों को उसकी बुर को अंदर से कुरेदते हुए पूछा..

जाए दे अब माफ करे के अलावा चारा भी का बा.. ओकर मन तू ही बढ़वले रहलू हमारा सब मालूम बा…

सुगना ने अपनी उत्तेजना पर काबू करते हुए कहा पर प्रत्युत्तर में अपनी हथेली से लाली की लिसलिसी बुर को घेर लिया…

दोनों सहेलियां एक दूसरे को स्खलित करने में लग गयी। दोनों सहेलियां सोनू को अपने-अपने परिपेक्ष में देख रही थी। एक दूसरे के काम अंगों से खेलते हुए दोनों सहेलियां एक दूसरे को पहले स्खलित करने का प्रयास करने लगीं।

हमेशा की तरह लाली हार गई उसकी जांघें उसकी बुर को सिकोड़ सिकोड़ कर मदन रस उत्सर्जित करने लगीं। सुगना अपनी उत्तेजना और कामुकता से स्त्री और पुरुष दोनों को पूरे उत्साह और उमंग के साथ स्खलित करने की क्षमता रखती थी।

लाली के मुंह से आ…आह….आई…..हम्ममम की कराह आने लगी सुगना ने तुरत अपने होंठ उसके होंठों से सटा दिए और उसकी आवाज को बाहर आने से रोक लिया।

सुगना लाली के स्खलन को और भी आनंददायक बनाने के लिए अपनी उंगलियां लाली की बुर में थिरकाए जा रही थी ..

स्खलन चेतना शून्य कर देता है …लाली झड़ रही थी उसने न जाने कब अपनी उंगलियां सुगना की बुर से हटा दी और सुगना के मदमस्त कूल्हों को अपने हाथों से महसूस करते हुए उसे अपनी तरफ खींचने लगी।

वासना का तूफान थम चुका था लाली धीरे-धीरे नरम पड़ती गई और कुछ ही पलों में वह पीठ के बल लेटे लेटे अपनी सांसों को नियंत्रित करने का प्रयास करने लगी..

सुगना लाली की चूचियों को धीरे-धीरे सहलाई जा रही थी…

लाली की सांसों को सहज होते हुए देख सुगना ने लाली के कान में कहा

तनी आराम कर हम पेशाब करके आवत बानी…

सुगना उठी उसने लाली की नाइटी पहन ली। अपना साड़ी ब्लाउज वह पहले ही खोलकर एक तरफ रख चुकी थी और तुरंत साड़ी पहनना कठिन था। सुगना ने ऐसा जानबूझकर किया था ताकि वह लाली को अचानक कमरे से बाहर आने से रोक सके उसकी नाइटी उसने स्वयं पहन ली थी।

सुगना धीरे से कमरे से बाहर निकली पर दरवाजे तक पहुंचते पहुंचते उसे अचानक ही खांसी आई यह अप्रत्याशित था और हो भी क्यों ना सुगना पूरी तरह स्वस्थ थी अचानक खांसी का आना अनायास ही नहीं था सुगना ने सोनू के कान में जो कहा था शायद यह उसका संकेत ही था इधर सुगना गलियारे से होते हुए बाथरूम की तरफ बड़ी परंतु बाथरूम ना जाकर रसोई घर में चली गई बाहर खिड़की से आ रही रोशनी में उसने अपने सधे हुए हाथों से किचन के स्लैब पर रखे इक्का-दुक्का बर्तनों को व्यवस्थित किया इससे पहले कि वह अपना कार्य पूर्ण कर पाती सोनू रसोई में आ चुका था और अगले पल उसे अपने आलिंगन में भर चुका था।

सोनू ने सुगना को पीछे से आलिंगन में भर रखा था उसके हाथ सुगना की चूचियों को अपनी हथेलियां में थामे हुए थे और सोनू अपने गाल सुगना के गालों से उसके कानों से और अपनी टुड्डी सुगना के गर्दन पर रगड़ रहा था।

सुगना की वासना भी चरम पर थी और सोनू का लंड तो न जाने कितनी बार सुगना के इंतजार में खड़ा हो रहा था और फिर सुगना के सिग्नल के इंतजार में नरम गरम हो रहा था।

“सोनू अब जल्दी से कर ले आज घर में सब केहू बा कभी भी कोई आ सके ला” सुगना ने बेहद धीमी आवाज में फुसफुसाते हुए कहा..

“का कर ली?”

सोनू ने सुगना को छेड़ते हुए वह गंदी बात बोलने के लिए उकसाया जिससे सुगना हमेशा बचना चाहती थी। आखिर वह किस्म से अपने छोटे भाई को उसे चोदने के लिए बोलती

समय कम था उसे सोनू का मन रखना था उसने अपनी गर्दन घुमाई उसके कानों पर अपने होंठ लगाएं और इसी दौरान अपनी हथेलियां को नीचे ले जाकर सोनू के तने हुए लंड को अपनी हथेलियां से थाम लिया और उसके कान में बेहद उत्तेजक अंदाज में बोला।

“बदमाश अपना दीदी के रस में डूब के अपना गर्दन पर फेर से दाग लगा ले…”

.सुगना मुस्कुराने लगी।

सुगना को मुस्कुराते हुए देखना किसी भी मर्द की उत्तेजना को चरम पर पहुंचने के लिए काफी था। सोनू का लंड भी थिरक उठा.. सुगना ईसी दौरान पलट कर सीधी हो गई थी और सोनू की हथेलियां उसके नितंबों को सहलाने लगी।

वासना चरम पर थी। एक ही झटके में सोनू ने सुगना को उठाकर किचन के स्लैब पर बैठा दिया नाइटी न जाने कब सुगना के नितंबों के ठीक नीचे आ चुकी थी और सुगना की जांघें खुल चुकी थी सोनू ने अपने लंड से अपनी सुगना दीदी की उस सुनहरी गुफा को जांचने की कोशिश की जिसे सुगना ने सोनू को दहेज स्वरूप दे दिया था।

सोनू ने अपने लंड से सुगना की बुर के होठों को चूमने की कोशिश की और उसकी खुशी का ठिकाना ना रहा होठों पर आई लार सोनू के पारखी लंड ने तुरंत महसूस कर ली और सोनू का दिल बाग बाग हो गया सच में सुगना दीदी भी उसका उतना ही इंतजार कर रही थी जितना वह स्वयं।

इधर सोनू के लंड ने सुगना की बुर को चुम्मा उधार सोनू एक बार फिर सुगना के अधरों को चूमते हुए बोला।

“तु हूं इंतजार एक करत रहलु हा का?”

सोनू मैं अपने होठों पर मुस्कुराहट लाते हुए बोला उसे सच में यह यकीन नहीं था कि सुगना इतनी उत्तेजित होगी।

सुगना शर्मा गई…पर सोनू को काहे..

सोनू अपने लंड से सुगना के की बुर का जायजा लेते हुए बोला..

ई ता लार टपकावत बिया….

सोनू अपना लंड सुगना की बुर पर रगड़कर सुगना की उत्तेजना को और भी ज्यादा बढ़ा रहा था।

सुगना को इंतजार था कि कब सोनू का लंड उसकी बुर को चीरता हुआ है उसकी नाभि को चूम ले परंतु सोनू की यह छेड़छाड़ उसे बेचैन कर रही थी।

एक तो समय कम था दूसरा सोनू की यह हरकत उसे पसंद तो आ रही थी पर वह समय बर्बाद नहीं करना चाहती थी। वह अपने दोनों हाथ स्लैब पर रख अपनी जांघों को उठाए अपने कूल्हे को स्लैब के किनारे रख सोनू का लंड लेने को तैयार थी परंतु सोनू की छेड़छाड़ को रोकने के लिए उसने अपना एक हाथ ऊपर उठाया और सोनू के गालों पर मीठी चपत लगाते हुए बोली

“ सोनू अब जल्दी से कर ले “

“का कर ली” सोनू रुकने वाला नहीं था। उसने एक बार के लिए लंड के सुपाड़े को सुगना की बुर में थोड़ा सा घुसा दिया पर तुरंत ही निकालकर उसे फिर से सुगना के भगनासे पर रगड़ने लगा।

“बदमाश जल्दी से अपना दीदी के बुर……के……चो………

सुगना अपना वाक्य पूरा कर पाती इससे पहले सोनू का लंड गर्म रॉड की तरह सुगना की बुर में धंसता चला गया सोनू के होठों में सुगना के होठों को अपने आगोश में ले लिया और अगले ही पल सोनू की कमर आगे पीछे होने लगी ।

दोनों भाई बहन अपने अंदर तूफान संजोए हुए थे कुछ कहने सुनने को बाकी ना था सोनू के कूल्हे और कमर तेजी से आगे पीछे हो रही थी सुगना असीम आनंद में डूबी हुई अपने अंदर भराव महसूस कर रही थी.. सुगना एक तो पहले ही गर्म थी और अब सोनू के मजबूत लंड को अपने अंदर समाहित कर तृप्त हो चुकी थी। सुगना अमरबेल की भांति सोनू से लिपट चुकी थी और अपनी बुर को सिकोड़ कर उसके लंड को पूरी तरह अपनी और खींचे हुए थी। यह आत्मीय संभोग ज्यादा देर न चल सका उत्तेजना दोनों में चरम पर थी।

सुगना स्खलन को तैयार थी उधर सोनू भी पिछले कुछ समय से सुगना का इंतजार करते हुए अपना लावा इकट्ठा कर चुका था यह पहला अवसर था की सोनू सुगना के इंतजार में इतना गर्म हो चुका था कि वह कुछ ही पलों में झड़ने को तैयार था। सुगना और सोनू दोनों की सांस तेज चल रही थी और उतनी ही तेजी से सोनू का लंड सुगना की बुर में में और गहरे और गहरे तक उतर जाना चाह रहा था ।

सोनू के अंडकोष किचन की स्लैब से टकरा रहे थे पर लंड सुगना की बुर की नमी और गरम गुफा में डुबकियां लगा रहा था।

वासना के आवेग की तीव्रता और उससे भी ज्यादा तीव्र थी सोनू के लंड से निकलती वीर्य की धार। सुगना की गर्भाशय पर सोनू के लंड ने जितनी कोमल चोट पहुंचाई थी अब अपने वीर्य की धार से उसे पुचकार रहा था और सुगना की बुर भी प्रेम रस उत्सर्जित कर जैसे सोनू के लैंड को तसल्ली दे रही हो।

सोनू और सुगना एक हो चुके थे सुगना अपने हाथ किचन स्लैब से उठाकर सोनू की गर्दन पर लपेट चुकी थी वासना का आवेग थमते ही सुगना ने स्वयं को व्यवस्थित करने की कोशिश की पर अपने हाथ पीछे वक्त करते वक्त अचानक उसका हाथ किचन स्लैब पर दूर रखें एक गिलास से टकरा गया और वह नीचे गिर पड़ा। रात्रि के सन्नाटे में बर्तन गिरने की आवाज उन सभी तक पहुंची जो अर्ध जागृत थे

कजरी की आवाज आई

“का भईल”

सुगना और सोनू दोनों झटपट अलग हुए दोनों में से किसी ने उत्तर नहीं दिया तभी कजरे की आवाज दोबारा आई

के बा रसोई में ?

जब तक सुगना स्वयं को व्यवस्थित कर जवाब देती तब तक कजरी गलियारे में आ चुकी थी सोनू किचन से गलियारे में निकल रहा था उसने कहा

“कोनो बात नईखे रसोई में पानी पिए गइल रहनि हा दीदी टकरा के गिलास नीचे गिर गईल हा

सोनू ने बात बना ली थी । परंतु सोनू की आवाज अंदर लाली के कमरे में लिहाफ ओढ़ के पड़ी नंगी लाली ने सुन ली। सुगना तो बाथरूम गई थी वह रसोई घर कैसे पहुंच गई लाली कुछ सोच पाने की स्थिति में नहीं थी इतने में सुगना ने कमरे में प्रवेश किया।वह अभी भी अपनी सांसों पर काबू पाने का प्रयास कर रही थी

“का भईल काहे आतना देर हो गईल हा?”

अरे सोनूआ प्यासल रहल हा उ हो रसोई में पानी पिए आ गइल हा…

सुगना ने जो बात कही थी वह सच थी सोनू प्यासा था पर पानी के लिए नहीं अपित सुगना की जांघों के बीच उस सुनहरी गुफा से रिस रहे अमृत रस का…

सुगना ने सूरज का मन रख लिया था और अपना वादा पूरा कर दिया था। सुगना ने जो हिम्मत दिखाई थी उसका यकीन सोनू को नहीं था कैसे घर की सबसे चहेती सुगना ने भरे पूरे परिवार जनों के बीच आज सोनू के साथ अपने ही घर में संभोग कर उसे आश्चर्यचकित कर दिया था।

धीरे-धीरे सुगना और सोनू के मिलन अब स्वाभाविक रूप से होने लगे परंतु सोनू और सुगना के बीच जब भी कभी सेक्स होता उसमें हर बार नयापन होता सुगना अपनी वासना की परतें एक-एक करके खोलती और सोनू उसमें और उलझ जाता। सोनू ने भी सुगना के साथ हर उसे जगह और अवस्था में संभोग किया जिसकी परिकल्पना उसने अपनी युवा अवस्था में की थी शायद उसके सपने लाली भी पूरे नहीं कर पाती परंतु सुगना ने तो जैसे सोनू के लिए बनी थी। उसने अपना जीवन सोनू के कुर्बान कर दिया था।

सोनू के गर्दन का दाग उनके मिलन का एकमात्र गवाह था जो बार-बार सोनू और सुगना को याद दिलाता की कुछ गलत हो रहा था पर वासना में डूबे सुगना और सोनू उसे नजरअंदाज कर इस दलदल में और गहरे तक उतरते जा रहे थे।

समय बीतता गया सुगना और सोनू के मिलन की यादें उनके दिलों दिमाग में एक अमिट छाप बनती गई यह यादें महत्वपूर्ण थी आने वाले समय में सुगना के पास इन यादों का ही सहारा था और शायद सोनू के पास भी।

कुछ वर्षों बाद ही सोनू और सुगना की खुशियों पर ग्रहण लग गया परिवार में कुछ ऐसा हुआ जिसे सब कुछ तहस-नहस कर दिया वासना का अतिरेक सुगना के परिवार को अचानक वासना विहीन कर गया यह अवांछित घटना थी

सरयू सिंह की मृत्यु।

सरजू सिंह की मृत्यु कैसे हुई यह प्रश्न उतना ही कठिन था जितना कि कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा पर कुछ प्रश्नों के उत्तर भविष्य के गर्भ में दफन होते हैं नियति इस कामुक किताब के पन्ने पलट रही थी और इस जटिल प्रश्न का उत्तर ढूंढ रही थी।

शेष अगले भाग में

 
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कहानी को मन लगाकर पढ़िए एपिसोड नंबर 147 ही वह एपिसोड है जिसे आप खोज रहे हैं वैसे मैंने उसे आपको भेज भी दिया है
 
जस्ट क्लिक एपिसोड नंबर 132 ऑन इंडेक्स
 
प्रिय पाठकों,

सच कहूं तो अब इस कहानी को लिखने के लिए मेरे पास समय की कमी है मैं कभी-कभी कुछ अध्याय लिखनेकी कोशिश करता हूं परंतु उसकी उपयोगिता अब शायद मेरी नजर में कुछ कम हो गई हैं।

अब तक का साथ अच्छा रहा जब कभी समय मिला तू कहानी के बाकी एपिसोड भी लिखने की कोशिश करूंगा और जब कुछ अपडेट रेडी हो जाएंगे तब आप सब के बीच प्रस्तुत होऊंगा।

आप सबको हुई सुविधा के लिए खेद है।
 
भाग 153

समय बीतते देर नहीं लगती। आज नियति सुगना और सोनू को पुनः याद कर रही थी। जहां उसने उन्हें रंगरलियां मनाने के लिए छोड़ा था वहां से जीवनधारा आगे बढ़ चुकी थी। बारह वर्षों से ऊपर का वक्त बीत चुका था। सुगना का परिवार भी अब बदल चुका था और बनारस का शहर भी।

गंगा किनारे एक खूबसूरत सी हवेली अपने पट खोल, अपनी कथा सुनने को तैयार थी। हवेली की खूबसूरती देखते ही बनती थी। सामने बड़ा सा घास का मैदान आधुनिक साज सज्जा से सुसज्जित पुष्प वाटिका हवेली की खूबसूरती में चार चांद लगा रही थी। विकास के पिता ने यह हवेली बड़ी लगन और मेहनत से अपने परिवार के लिए बनाई थी, लेकिन विधि का विधान ही कुछ ऐसा था कि वो उस हवेली का सुख नहीं भोग पाए ।

दरअसल उनका पूरा परिवार सड़क दुर्घटना में खत्म हो गया था शायद विधाता ने उन्हें अपने पास बुला लिया था, और उनकी पूरी दुनिया एक झटके में खत्म हो गई। बच गए तो सिर्फ विकास और सोनी।

यह संयोग कहिए या विडंबना इस हवेली को आने वाले समय में कई पापों का गवाह बनना था।, यह हवेली दो लोगों के लिए किसी किले से कम नहीं थी। सोनी को यह हवेली अकेले काटने दौड़ती थी। अंततः, विकास ने अपने मित्र सोनू, सुगना और लाली को अपनी हवेली में रहने के लिए सादर आमंत्रित किया। दरअसल, यह कहना ज्यादा उचित होगा कि वह अनुरोध था। और अंततः लाली और सुगना अपने परिवार के साथ हवेली में रहने आ गए। सोनू ने भी अपनी सहमति दे दी। विकास और सोनू अक्सर काम के सिलसिले में बाहर ही रहते पर परिवार को साथ रहने का अवसर मिला गया था।

आज कई वर्षों बाद, इस कहानी के पात्रों में स्वाभाविक बदलाव आ चुका था बच्चे जवान हो गए थे। दीपावली की छुट्टियों में आज परिवार के सभी बच्चे आए हुए थे। संयोग से आज विद्यानंद के आश्रम से एक उनके एक शिष्य हवेली में पधारे थे। पूरे परिवार ने उनका अभिवादन किया और आलीशान बैठक में उन्हें बैठने के लिए स्थान दिया गया। छुट्टी का दिन होने के कारण पूरा परिवार घर पर ही था और धीरे-धीरे सभी बैठक में उन शिष्य से मिलने के लिए एकत्रित हो गए।

सोनी, जो अब लगभग 36-37 वर्ष की अधेड़ महिला बन चुकी थी, हवेली की मालकिन तो थी ही, और इस समय घर की मुखिया भी बन चुकी थी। यद्यपि वह सुगना का बहुत आदर करती थी , लेकिन परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बन गईं कि सुगना ने स्वेच्छा से परिवार के मुखिया के लिए सोनी को ही उत्तरदायित्व दे दिया था जो लाली को भी स्वीकार्य था। अब पूरे घर का दारोमदार सोनी पर आ चुका था, और वह इसे बखूबी निभा भी रही थी। सोनी कुछ कुछ आज की तमन्ना भाटिया की तरह दिखाई पड़ने लगी थी। उसकी गदर जवानी अब भी कामुक मर्दों में ताजगी भरने को तत्पर थी। पर विकास अब तृप्त हो चुका था और वासना से परे हो चुका था। अथक प्रयास करने के बावजूद वह सोनी को गर्भवती नहीं कर पाया था। और सोनी के गर्भ धारण के लिए उचित अनुचित सभी प्रयास विफल हो चुके थे।

सोनी ने विद्यानंद के शिष्य से मुखातिब होते हुए कहा, "महाराज, आपका हमारे निवास पर स्वागत है। पहले मैं आपका परिचय अपने परिवार से करवा दूं।" शिष्य अब भी भवन की आलीशान सजावट से प्रभावित था और उसकी निगाहे एक बड़े आदमकद चित्र पर अटकी हुईं थी। पर अब उसने अपना ध्यान सोनी पर केंद्रित कर लिया।

सोनी एक खूबसूरत और प्रभावशाली महिला थी, जिसका दमकता हुआ चेहरा और अमीरों जैसा हाव-भाव उसे और भी प्रभावशाली बना रहे थे। सोनी ने शिष्य का ध्पास बैठी एक सौम्य महिला की और आकर्षत करते हुए कहा, "महाराज, यह मेरी दीदी सुगना हैं।"

शिष्य ने देखा, और उसे एक बेहद सुंदर, दमकती चेहरे पर बच्चों जैसी मासूमियत लिए श्वेत साड़ी में लिपटी सुगना दिखाई दी। सुगना, जो लगभग 40 वर्ष की उम्र में भी अब भी उतनी ही प्यारी और आकर्षक दिखाई पड़ रही थी। वो एक दिव्य आत्मा की तरह श्वेत वस्त्रों में सुसज्जित थी। पर चेहरा और शरीर उसकी उमर को धोखा देते हुए उसे अब भी युवा दर्शा रहे थे पर श्वेत पहनावा उसके व्यक्तित्व में वैराग्य का अंश अवश्य दिखा रहा था। उसका रूप लावण्य अब भी देखने लायक था। सुगना ने शालीनता से शिष्य को अभिवादन किया और चुप हो गई। शिष्य अब भी सुगना के बारे में सोच रहा था।

ये लाली दीदी है। शिष्य ने एक अधेड़ महिला की तरफ देखा जो सुगना के समीप बैठी थी।


लाली अब पूरी तरह से बदल चुकी थी। उसके भाव, चाल-ढाल, सब कुछ सेठानी जैसे हो चुके थे। उसने अपनी शारीरिक बनावट पर शायद उतना ध्यान नहीं दिया, जिससे उसकी खूबसूरती पर निश्चित तौर पर असर पड़ा था। लेकिन लाली के चेहरे पर खुशी की झलक थी, और इसमें कोई हैरानी की बात नहीं थी। सोनू के साथ बिताए गए पिछले कई वर्षों में उसे बहुत खुशी मिली थी, और अब वह अकेली ही सोनू के साथ समय बिता रही थी।

लेकिन सुगना और सोनू के बीच कुछ ऐसा था, जिसे किसी की नजर लग गई थी अन्यथा हरदम खुश और खिलखिलाती सुगना शायद इतनी संजीदा कभी ना होती।

अब बारी युवा पीढ़ी की थी सबसे पहले एक सुंदर सी तरुणी जो कुछ-कुछ आज की हीरोइन अन्नया पांडे की तरह दिखाई पड़ती थी। लंबी छरहरी और कमनिय काया लिए शिष्य की तरफ देख रही थी। रंग कुछ सांवला ही था उसने विद्यानंद के शिष्य को प्रणाम किया और बोला मैं “मालती”

पुत्री आपके पिता का नाम क्या है “जी रतन” पर अब वह यहां नहीं रहते न जाने क्यों उन्होंने संन्यास ले लिया है। शिष्य रतन को भी जानता था कि रतन उनके ही आश्रम में विद्यानंद का शिष्य बन चुका था। और अब आश्रम में एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा रहा था।

मालती के ठीक बगल रीमा बैठी हुई थी वह भी अब जवान हो चुकी थी वह कुछ-कुछ जानवी कपूर जैसे दिखाई पड़ रही थी। रीमा शायद सभी पाठकों को याद नहीं हो इसलिए बताना चाहूंगा कि यह कि वह लाली और स्वर्गीय राजेश (लाली के पूर्व पति) की पुत्री थी।

इसके ठीक बगल दूसरे सोफे पर नवाजुद्दीन सिद्दीकी जैसा दिखाई पढ़ने वाला और चेहरे पर एक शातिर मुस्कान लिए अपनी नज़रें झुकाए अपने पैरों से मजबूत संगमरमर को कुरेदने की कोशिश करता हुआ राजा बैठा था। ऐसा प्रतीत होता था जैसे वह इस घर का ही नहीं था इस घर के बाकी सदस्य जितने शालीन और सुसंस्कृत दिखाई पड़ते थे राजा ठीक उनसे उलट था रंग रूप से और अपनी हरकतों से वह एक छपरी की भांति दिखाई पड़ता था फिर भी परिवार उसे बर्दाश्त करता आ रहा था। राजा वही था जो सुगना के गर्भ से ज़रूर जन्म लिया था पर उसके DNA में राजेश के अंश था। नियति स्वयं विस्मित थी कि फूल जैसी सुगना के गर्भ से यह कैसा पाप विधाता ने इस धरती पर लाया था।

राजा के ठीक बगल में रणबीर कपूर जैसी सुगठित शरीर और मासूम चेहरा लिए सूरज बैठा था। शिष्य ने एक नजर सूरज को देखा और अगले ही पल उसकी नज़रें एक बार फिर उसे आदम का चित्र की तरफ चली गई। सूरज हूबहू सरयू सिंह की तरह दिखाई पड़ने लगा था। शिष्य के मन में संशय उत्पन्न होता इससे पहले ही सोनी बोल उठी

“ वह सूरज के दादाजी हूं सरयू सिंह।”

शिष्य सूरज को एकटक देखता ही रह गया कितना सुंदर कितना मासूम और कितने तेजस्वी शरीर का मालिक था सूरज ईश्वर ने जैसे उसे बड़े सलीके से बनाया था और हो भी क्यों ना? सरयू सिंह जैसे तेजस्वी मर्द और फूल जैसी सुगना के गर्भ से जन्मा सूरज हर दिल अजीज था और सभी लड़कियों और युवतियों के लिए कामदेव का अवतार था।

इसी समय हवेली की बैठक में एक युवा युगल ने प्रवेश किया। लगभग 25 26 वर्ष की उम्र का हट्टा कट्टा मर्द , और साथ में बेहद शालीन और सुकुमार जवानी की दहलीज पर कदम रख रही किशोरी मधु। यह शख्स लाली और राजेश का पहला पुत्र राजू था और उसके साथ आई लड़की सुगना की पुत्री के रूप में पल रही मधु थी..

इस घर में युवा पीढ़ी में मधु शायद सबसे खूबसूरत थी अपने भाई सूरज से भी ज्यादा पर मर्द और औरत की खूबसूरती में तुलना करना कठिन था दोनों एक से बढ़कर एक थे। मधु सोनू और लाली के मिलन से जन्मी मधु ने यद्यपि लाली के गर्भ से जन्म लिया था परंतु वह शुरू से ही सुगना की पुत्री के रूप में पल रही थी। उसने सोनू की खूबसूरती पाई थी और सुगना के लालन-पालन से उसमें स्त्री सुलभ सारे गुण थे। अपनी कमनीय काया और मासूम चेहरे तथा कसे हुए बदन से वह एक आदर्श किशोरी की भांति दिखाई पड़ रही थी। मधु ने घर में अपरिचित व्यक्ति को देखकर तुरंत ही अपना दुपट्टा ठीक किया और तुरंत ही हाथ जोड़कर उनका अभिवादन किया।

सोनी ने एक बार फिर मधु और राजू का परिचय कराया धीरे-धीरे विद्यानंद के आश्रम से जुड़ी कई सारी बातें होने लगी पर शिष्य क्या ध्यान अब भी उस आदम का चित्र पर अटका हुआ था।

सरयू सिंह के आदमकद तस्वीर पर चढ़ी हुई रंग बिरंगी माला यह साबित कर रही थी कि वह अब इस दुनिया में नहीं है परंतु उनके जैसे तेजस्वी पुरुष की इस अवस्था में मृत्यु अकल्पनीय थी ऐसे बलिष्ठ और मर्दाना व्यक्तित्व के धनी सरयू सिंह की अकाल मृत्यु क्यों हुई यह प्रश्न बार-बार विद्यानंद के शिष्य को विचलित किए हुए था परंतु उसे पूछ अपने की हिम्मत शायद वह नहीं जुटा पा रहा था इधर परिवार के सदस्य बार-बार उसका ध्यान अपनी बातों से विद्यानंद के आश्रम के बारे में खींच लेते थे और वह मजबूरन अपनी जिज्ञासा को काबू कर सुगना और लाली के परिवार के बच्चों की जिज्ञासाओं को बुझाने में लग जाता।

इसे हवेली में पल रहे युवा जैसे-जैसे जवान हो रहे थे उनमें कामुकता का आना भी स्वाभाविक था लाली और राजेश का पुत्र राजू जो घर में सबसे बड़ा था न जाने कब उसका दिल मालती पर आ गया था। मालती जो जो रतन और बबीता की पुत्री थी और इस समय सुगना के परिवार में उसकी पुत्री के रूप में पल रही थी। राजू धीरे-धीरे मालती की ओर आकर्षित होता गया और दोनों एक दूसरे के करीब आते गए यद्यपि उनके इन संबंधों की भनक किसी को भी नहीं थी और परिवार में अब भी सब एक दूसरे के समक्ष मुंहबोले भाई बहन की तरह ही थे परंतु मौका पाते ही राजू और मालती एक हो जाते। राजू और मालती एक दूसरे से अपने जिस्मानी प्यास भी बुझाने लगे थे। राजू सोनू की ही भांति सरकारी नौकरी के लिए तैयारी कर रहा था वह मालती को अपनी पत्नी बनने के लिए आतुर था परंतु बिना किसी उचित पद और अपने पैरों पर खड़े हुए वह यह बात अपने परिवार के समक्ष नहीं रख सकता था तब तक के लिए उसने मालती को मुंह बोली बहन जैसा ही रहने दिया पर वासना पूर्ति के दौरान दोनों एक दूसरे के लिए प्रेमी-प्रेमिका की तरह ही हो गए थे।

राजू और मालती का संबंध चाहे सबसे छिपा हो परंतु घर के सबसे हरामी इंसान राजा से छुपा रहना असंभव था उसे यह भनक लग चुकी थी।

सुगना और लाली बखूबी इस बात को जानते थे कि आग और फूंस एक दूसरे के समक्ष नहीं रखे जा सकते वह दोनों स्वयं ऐसे कामुक संबंधों की गवाह थी जो परिवार के बीच बड़ी आसानी से बन गए थे उन्हें इस बात का अंदेशा बखूबी था अतः उन्होंने घर की जो व्यवस्था बनाई थी उसके हिसाब से राजा और राजू को एक कमरा दिया गया था। ऐसा नहीं था कि घर में कमरों की कमी थी परंतु सुगना और लाली ने किसी को भी ऐसा एकांत नहीं देना चाहती थी जो उनके बीच कामुक संबंधों को बढ़ाने में मदद करें।

जहां एक तरफ राजू एक गंभीर और संजीदा व्यक्ति था वहीं दूसरी तरफ उसका छोटा भाई राजा अव्वल दर्जे का हरामि था उसका ना तो पढ़ाई में मन लगता और नहीं अपने व्यक्तित्व को निखारने में उसका तो जन्म जैसे छिछोरी हरकतें करने में के लिए ही हुआ था शायद सुगना और लाली ने राजू और राजा को साथ रखने का फैसला भी इसीलिए किया था ताकि राजा राजू से कुछ सीख सके और शायद पटरी पर वापस लौट सके।

इसी प्रकार मालती और राजू की बहन रीमा दोनों एक कमरे में रहती थी। मालती यह स्वीकार कर चुकी थी कि उसे आने वाले समय में एक ग्रहणी के रूप में ही रहना है और उसने अपनी पढ़ाई धीरे-धीरे कॉरेस्पोंडेंस कोर्स में कन्वर्ट कर ली थी वह अक्सर घर पर ही रहती और कॉलेज जाने के झंझट से बच चुकी थी दूसरी तरफ रीमा एक आधुनिक लड़की थी जो इस समय कॉलेज में पढ़ रही थी और अपनी जवानी को कॉलेज के लड़कों से बचाते हुए धीरे-धीरे और भी मादक बन रही थी रीमा अब तक पुरुष संसर्ग से अछूती थी परंतु स्त्री और पुरुष के बीच होने वाले समीकरण से पूरी तरह वाकिफ थी उसे पता था युवा और कामुक मर्दों से किस प्रकार डील करना है कितना समीप आना है और कितना दूर जाना है अपनी वासना पूर्ति के लिए उसने अभी खुद पर ही भरोसा कायम रखा था और उसके लिए हस्तमैथुन आम था वह अब अपने वांछित पुरुष की तलाश में अब भी भटक रही थी।

सूरज को जब-जब वह देखती उसे अपना आदर्श पुरुष दिखाई पड़ता पर सूरज उम्र में उससे छोटा था और घर में तीनों बहनों का प्यार था। पर दिल का क्या रीमा की कामुक कल्पनाओं में सूरज बरबस ही आ टपकता और वासना के उन्माद में रीमा उसे नहीं रोकती और न जाने क्यों उसका स्खलन पूरे उन्माद और आनंद के साथ पूर्ण होता।


रीमा को इस बात के लिए कोई आत्मग्लानि नहीं थी आखिर यह एक कल्पना थी वैसे भी सूरज उसका अपना सगा भाई नहीं था इसलिए कम से कम वह अपनी कल्पनाओं में इस काल्पनिक सुख को जी रही थी। वैसे उसका व्यवहार सूरज के प्रति एक हम उम्र छोटे भाई की तरह ही था। सूरज बात को इस बात का कतई इल्म नहीं था कि रीमा दीदी उसके बारे में ऐसा कुछ सोचती है।

मधु जो सुगना की सबसे लाडली थी और भविष्य में विद्यानंद की कही गई बातों के अनुसार सूरज की मुक्ति का मार्ग थी उसे सुगना ने बड़े नाजों से पाला था वह हमेशा उसे अपने साथ सुलाती और अपने साथ ही रखती मधु धीरे-धीरे जवान हो रही थी सुगना जब-जब मधु को देखती उसे आने वाले समय की कल्पना बरबस ही करनी पड़ती जब उसे अपने पुत्र सूरज और मधु के बीच होने वाले संभोग की गवाह बनना था शायद यही सूरज की मुक्ति का मार्ग था। सुगना ने न जाने मधु को पाने के लिए कितनी मिन्नतें की थी और कितनी मनौतिया मांगी थी।

सुगना भली भांति यह जानती थी की यह दुष्कर कार्य उसे सफल करना था अन्यथा सूरज की मृत्यु के लिए उसे स्वयं घृणित पाप से गुजरना होगा जो वह कतई नहीं चाहती थी। अपने पुत्र से साथ संभोग………सुगना यह बात सोच भी नहीं सकती थी पर विधि के विधान को पढ़ने में वह अक्षम थी मधु उसकी पहली और आखिरी उम्मीद थी जिससे वह अपने पुत्र कॉल शाप मुक्त कर सकती थी।

बहरहाल नियति ने अपनी भी साथना बढ़ा दी थी आने वाले समय में उसे विधाता द्वारा लिखी गई लिखे गए सुगना के परिवार के भाग्य को मूर्त रूप लेते हुए देखना था।

लाली और सोनी का अपना अलग-अलग कमरा था वह दोनों अपने पतियों के साथ रहती थी पर अक्सर उन दोनों के पति बाहर ही रहते थे सोनू की पोस्टिंग बनारस से हटकर इलाहाबाद में थी और विकास अक्सर अपने व्यवसाय के सिलसिले में उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरों में घूमता रहता था।

घर में सिर्फ सूरज ही था जिसे एक अलग कमरा दिया गया था शायद सबका विश्वास सूरज पर था और इस पर किसी ने आपत्ति भी नहीं की थी। सूरज डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहा था वह एक होनहार लड़का था और सर्वगुण संपन्न था पर हाय रे दुर्भाग्य न जाने उसे कौन सा शाप लगा था युवावस्था की दहलीज पर पहुंचने के बावजूद भी उसके कामांग में कोई हलचल नहीं थी। सूरज खुद डॉक्टरी की पढ़ाई पढ़ने के बावजूद इस बात का उत्तर ढूंढ नहीं पा रहा था कि क्यों उसके लिंग में कोई उत्तेजना क्यों नहीं होती? ऐसा नहीं था कि उसका लण्ङ सामान्य नहीं था अपितु उसका लंड बेहद ही आकर्षक और सुडौल था पर उसमें तनाव नहीं आता था। शायद यह शाप का ही असर था । परंतु सूरज इस शाप से कतई अनजान था । लिंग में तनाव नहीं आने से बात उसे बार-बार खा जा रही थी।

उसके मन में अब यह धीरे-धीरे तनाव का कारण बन रहा था परंतु यह बात ऐसी थी कि उसे वह किसी से साझा भी नहीं कर सकता था अपने मृदुल स्वभाव गठीले शरीर और सुंदर तेजस्वी चेहरे से कई लड़कियों काचहेता था परंतु वह अपनी कमी को जानता था और किसी भी लड़की के समीप आने से घबराता था यद्यपि इस समय उसे पढ़ाई का सहारा था जिसके सहारे वह अपना समय व्यतीत करता परंतु मन के होने किसी ने किसी कोने में यह बात उसे खा जा रही थी।

बैठक कक्ष से बच्चे एक-एक करके अपने अपने कार्यों में तल्लीन हो गए और विद्यानंद के शिष्य से बात करने के लिए अब सिर्फ सोनी और सुगना ही कमरे में बच गए थे लाली चाय पान के प्रबंध के लिए रसोई कक्ष में थी।

शिष्य विद्यानंद के शिष्य से अब और उत्सुकता बर्दाश्त नहीं हुई उसने अपना ध्यान एक बार फिर सरयू सिंह के चित्र की तरफ किया और पूरी संगीदगी से सुगना से पूछा

इन दिव्य पुरुष की अकाल मृत्यु कैसे हुई …कृपया मुझे सच बताइएगा। सुगना और सोनी को शिष्य से अंतिम शब्द की उम्मीद नहीं थी उसने सच शब्द पर विशेष जोर दिया था।

कमरे में जैसे सन्नाटा पसर गया सोनी और सुगना एक दूसरे को देख रहे थे उनके होंठ अचानक सूख गए…

इस प्रश्न का उत्तर देना कठिन था जो उत्तर अब तक परिवार बाकी सब को देता आया था वह बात न जाने क्यों आज सोनी और सुगना के मुख से नहीं निकल रही थी।

दोनों एक दूसरे को क्यों किमकर्तव्य विमूढ़ भाव से देख रहे थे हलक से आवाज निकलने को तैयार न थी तभी लाली कमरे में अपने हाथों में छाया की तश्तरी लिए हुए अंदर आई और सोनी और सुगना को इस विषम स्थिति से बचा लिया विद्यानंद के शिष्य को चाय देते हुए कहा…

महाराज रतन जी के बारे में बताइए कैसे हैं वह। विद्यानंद का शिष्य लाली के प्रश्न में उलझा गया। उधर सुगना का कलेजा धक-धक कर रहा था उसे दीपावली का वह कल दिन याद आ रहा था जब सरयू सिंह ने अंतिम सांस ली थी सुगना का कलेजा मुंह को आने लगा। सोनी की भी हालत खराब थी सुगना से और बर्दाश्त नहीं हुआ वह बैठक कब से उठकर अपने कक्ष की ओर जाने लगी उसने शिष्य से अनुमति लेना भी उचित न समझा । लाली ने सुगना की स्थिति को महसूस कर सोनी से पूछा क्यों क्या हुआ सुगना की तबीयत ठीक तो है ना। सोनी ने लाली के प्रश्न का फायदा उठाया और वह स्वयं उठती हुई बोली देखकर आती हूं ….सोनी सुगना के पीछे-पीछे उसके कक्ष में आ गई।

लाली के प्रश्न का उत्तर देने के बाद शिष्य ने जो प्रश्न सुगना और सोने से किया था उसने वही प्रश्न लाली के समक्ष दोहरा दिया।

लाली मैं इधर-उधर देखा और धीमे स्वर में सरयू सिंह के निधन का कारण शिष्य को बताने लगे..

लाली सच्चाई से अनभिज्ञ थी उसे उतना ही ज्ञात था जितना सभ्य समाज के लिए जरूरी था सरयू सिंह के पाप सोनी और सुगना के हृदय में दफन थे.. जो अपनी यादों में कोई उस काले दिन को याद कर रही थी। जिसने उनका पूरा जीवन ही बदल दिया था।

शेष अगले भाग में…
 
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