Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 111 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

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लगता है आपने बनारस महोत्सव ठीक से नहीं पढ़ा कहानी मन लगाकर पढ़ने पर ही आनंद आएगा।।। 109अपडेट भेज दिया गया है
 
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In story it has been mentioned that Rajesh has ejeculated thing about sugna while sugna was pretending to sleep this is what sugna could allow...no real sex no imagination as it was only from Rajesh not wholeheartedly from sunga..

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भाग 154

लाली के प्रश्न का उत्तर देने के बाद शिष्य ने जो प्रश्न सुगना और सोने से किया था उसने वही प्रश्न लाली के समक्ष दोहरा दिया।

लाली मैं इधर-उधर देखा और धीमे स्वर में सरयू सिंह के निधन का कारण शिष्य को बताने लगे..

लाली सच्चाई से अनभिज्ञ थी उसे उतना ही ज्ञात था जितना सभ्य समाज के लिए जरूरी था सरयू सिंह के पाप सोनी और सुगना के हृदय में दफन थे.. जो अपनी यादों में कोई उस काले दिन को याद कर रही थी।


अब आगे..

हवेली में विद्यानंद का शिष्य अब प्रस्थान की तैयारी में था उसने जो प्रश्न पूछा था उसका उत्तर उसे अब तक नहीं मिला था लाली ने जो उसे बताया था वह अधूरा सत्य था बहरहाल उसे दान दक्षिणा देकर विदा कर दिया गया पर उसने लाली और सुगना के मन में खलबली मचा दी थी।

“दीदी विद्यानंद के शिष्य आखिर उ सब कहे पूछता रहले ……. सोनी ने आज आशंकित मन से पूछा।

“हमारा का मालूम…” सुगना सच में अनभिज्ञ थी कि अचानक विद्यानंद का शिष्य आज कई वर्षों बाद उनके घर पधार और उसने यह प्रश्न किया। उसके सच शब्द पर विशेष जोर देने का आशय निश्चित ही गूढ़ था परंतु सुगना और सोनी दोनों इसका आशय नहीं समझ सकी।

सरयू सिंह की मृत्यु कैसे हुई यह बात सिर्फ सुगना और सोनी को पता थी उनकी आंखों के समक्ष उस दिन की घटनाएं एक-एक करके घूम गई परंतु उनके आधर न खुले।

विद्यानंद के शिष्य का हवेली में आगमन सुगना के मन में बीते समय की कई स्मृतियाँ जगा गया। विद्यानंद की शिक्षाएँ, उनके सिद्धांत और उनसे जुड़ी भविष्यवाणियाँ एक बार फिर उसके मन में गूंज उठीं। सुगना के लिए संसार में यदि कुछ सबसे महत्वपूर्ण था, तो वह था उसका पुत्र सूरज। अब उसके जीवन का एकमात्र उद्देश्य यही था कि सूरज एक सामान्य, स्वस्थ और सम्मानजनक जीवन जी सके तथा अपने वंश को आगे बढ़ा सके।

सूरज अब युवावस्था की दहलीज़ पर कदम रख चुका था। पढ़ाई में वह सदैव अव्वल रहा, शरीर से भी सुदृढ़ और आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी था। परंतु उसके भीतर एक ऐसा मौन संघर्ष चल रहा था, जिसे वह न तो किसी से कह पाता था और न ही स्वयं पूरी तरह समझ पाता था। मित्रों के बीच जब किशोरावस्था और युवावस्था से जुड़ी सामान्य बातें होतीं, तो वह चुपचाप स्वयं को अलग कर लेता।

सूरज की कद काठी और सुडौल शरीर उसे एक मजबूत युवा के रूप में दर्शाते परंतु जांघों के बीच वह न जाने किस श्राप से ग्रसित था कि एक खूबसूरत लिंग का स्वामी होने के बावजूद अब तक वह उसमें तनाव या संवेदना महसूस नहीं कर पाया था।


ऐसा नहीं है कि उसने अपने हाथों से लिंग मर्दन की कोशिश नहीं परंतु जब लिंग में उत्तेजना ही ना हो तो मैं मैथुन का प्रश्न ही नहीं उठता। सूरज मन ही मन परेशान हो चुका था उसने तरह-तरह की किताबें पड़ी अपने प्रोफेसर से इस प्रकार की समस्या के बारे में बात करने की कोशिश की। अपनी पहचान छुपाए रख कर उसका इलाज खोजना दुरूह कार्य था। कोई भी उपाय काम नहीं आ रहा था समय बीतता गया और अब यह सूरज के तनाव का कारण बनने लगा था।

सूरज को कभी-कभी अपने बचपन की धुंधली याद आती जब उसकी नून्नी उसकी मौसी सोनी के अंगूठा सहलाने के कारण तनाव में आ जाती थी और फिर न जाने कैसे शांत हो जाती। यह यादें इतनी धुंधली थी कि सूरज को उन पर यकीन भी नहीं था।

उसने पुस्तकों में समाधान खोजने की कोशिश की, शिक्षकों से परोक्ष रूप से प्रश्न करने का साहस भी जुटाया, किंतु अपनी पहचान और संकोच के कारण वह कभी खुलकर बात नहीं कर सका। समय बीतता गया और यह अनिश्चितता धीरे-धीरे उसके मन पर बोझ बनने लगी।

उधर सुगना, जिसने स्वयं वैराग्यपूर्ण जीवन अपना लिया था, अपने पुत्र के मन में चल रहे इस द्वंद्व को समझ नहीं पा रही थी। उसे इतना आभास अवश्य था कि विद्यानंद द्वारा कही गई कुछ बातें अभी अधूरी थीं और समय आने पर उसे अपनी आंखों के समक्ष वह पाप घटित होते हुए देखना होगा। पर वह समय अभी दूर था। सूरज अपनी पढ़ाई में व्यस्त था और सुगना उसके भीतर उठ रहे प्रश्नों से अनजान।

इधर कॉलेज में परीक्षा परिणाम घोषित होने का दिन आ पहुँचा। पूरे परिसर में उत्साह और आशंका का मिला-जुला माहौल था। आज सूरज के कॉलेज में विद्यार्थीयो की की गई मेहनत का रिजल्ट आने वाला था सभी के मन में उत्साह था और जो कमजोर थे उनके मन में भय। जैसे ही रामू चपरासी नोटिस बोर्ड की ओर अपने हाथों में कुछ कागज लिए आगे बढ़ा विद्यार्थियों ने उसे घेर लिया । उसने अपने हाथ झटक और बोला

चुपचाप दूर खड़े जाओ वरना फिर वापस चला जाऊंगा

उसकी झल्लाहट स्वाभाविक थी। जिस तरह से बच्चों ने उसे घेर रखा था उसे रिजल्ट को नोटिस बोर्ड पर चिपकाने में दिक्कत महसूस हो रही थी। आखिरकार बच्चों ने अपना गोल घेरा थोड़ा बड़ा किया और रामू चपरासी ने एक-एक करके सारे पन्ने नोटिस बोर्ड पर लगा दिए।

एक बार फिर सूरज ने पूरे कॉलेज में प्रथम स्थान प्राप्त किया। शिक्षक और विद्यार्थी सभी उसे बधाइयाँ देने लगे।

वह सचमुच ईश्वर की विशेष कृति प्रतीत होता था—तेज़ बुद्धि, आकर्षक व्यक्तित्व और गंभीर स्वभाव। वह कम बोलता था, पर उसकी उपस्थिति ही बहुत कुछ कह जाती थी। कॉलेज में बूढ़े बरगद के नीचे बैठी कुछ लड़कियां आपस में बातें कर रही थी

“यार, यह सूरज किसी से दोस्ती क्यों नहीं करता?”


पहली लड़की ने कहा।

“करता तो है, तुझसे बात नहीं करता क्या?”


दूसरी ने जवाब दिया।

“अरे, मैं वैसी वाली दोस्ती की बात कर रही हूँ। आज तक मैंने उसे किसी लड़की के साथ अकेले नहीं देखा।”

तभी तीसरी ने उसकी हाँ में हाँ मिलाई,


“हाँ, यह बात तो सच है। आज तक मैंने सूरज की गर्लफ्रेंड के बारे में कुछ नहीं सुना।”

“लगता है सूरज को आसमान से उतरी अप्सरा चाहिए, तभी उसने आज तक किसी लड़की को प्रपोज़ तक नहीं किया।”

“रोजी, एक बार तू ही उससे दोस्ती बढ़ा न। वैसे भी तू इस कॉलेज की सबसे हॉट लड़की है, और मुझे पता है तू कहीं-न-कहीं यही चाहती है। आजकल लड़का ही क्यों, लड़की भी तो सामने से कदम बढ़ा सकती है।”

रोजी वाकई बेहद खूबसूरत थी—गोरा रंग, नीली आँखें, कंधों तक लहराते भूरे बाल, गालों पर हल्की लाली और चेहरे पर आत्मविश्वास। उसका व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि किसी भी लड़के की हिम्मत नहीं होती थी कि वह आसानी से उसके पास जाकर नज़दीकियाँ बढ़ाने की कोशिश करे।

रोजी ने एक लंबी साँस ली और मुस्कुराते हुए बोली,


“मैं खुद से तो नहीं जाऊँगी, पर अगर वह आया तो रोकूँगी भी नहीं।”

यह कहते हुए उसके चेहरे पर हल्की लालिमा फैल गई।

फिर वह उठ खड़ी हुई और बोली,


“चलो, क्लास का टाइम हो रहा है। वैसे भी सूरज का नाम ले-लेकर तुम लोगों ने इसकी बेचैनी बढ़ा दी है।”

रोजी ने उस लड़की के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, जो अब तक चुपचाप सब सुन रही थी और मन-ही-मन सूरज के बारे में सोच रही थी। उसकी बुर पनिया चुकी थी पर उसे पता था कि उसका प्यार एकतरफा है और सूरज शायद उसके भाग्य में नहीं।

उस लड़की ने शर्माते हुए रोजी के पेट पर हल्का सा मुक्का मारा और बोली,


“ज़्यादा मत बन, अभी तेरी हालत भी मेरी जैसी ही है।”

बात कुछ हद तक सच थी। रोजी सूरज के बारे में सोचती ज़रूर थी, पर वह आत्मसम्मान से भरी हुई थी और खुद आगे बढ़कर उसे प्रपोज नहीं करना चाहती थी।

क्लास का समय होने पर सब अपनी-अपनी जगह बढ़ चले। सूरज हमेशा की तरह शांत और गंभीर मुद्रा में आगे बढ़ गया—अपने भीतर के प्रश्नों और बाहर की दुनिया की अपेक्षाओं के बीच संतुलन साधने की कोशिश करता हुआ।

परिणाम के दिन के बाद कॉलेज का वातावरण फिर से अपनी सामान्य गति में लौट आया, पर सूरज के भीतर कुछ बदल चुका था। प्रथम आने की खुशी क्षणिक थी; उसके पीछे छिपी बेचैनी अब और स्पष्ट होने लगी थी। उसे लगने लगा था कि उसकी सफलता, उसका अनुशासन और उसका गंभीर व्यक्तित्व—सब कहीं न कहीं किसी अनकहे भय को ढँकने का प्रयास भर हैं।

उस शाम वह देर तक कॉलेज की लाइब्रेरी में बैठा रहा। किताबों की कतारें, शांत वातावरण और पन्नों की सरसराहट—यह सब जो उसे सुकून देते थे आज उसका मन उसमें नहीं लग रहा था। उसने मनोविज्ञान और चिकित्सा से जुड़ी कुछ किताबें निकालीं। शब्दों के बीच वह अपने ही प्रश्न ढूँढ रहा था, पर उत्तर अब भी धुंधले थे। वह बार-बार ही सोच रहा था कि आखिर उसके लिंग में तनाव क्यों नहीं आता पर जितनी भी कामुक कल्पनाएं करता पर परिणाम यस का तस। जितना वह पढ़ता, उतना ही उसे एहसास होता कि कुछ संघर्ष ऐसे होते हैं, जिनका समाधान केवल पुस्तकों में नहीं मिलता।

उधर हवेली में सुगना भी असमंजस में थी। सूरज के चेहरे पर बढ़ती गंभीरता उसने महसूस तो की थी, पर उसका कारण समझ नहीं पा रही थी। उसने कई बार चाहा कि बेटे से खुलकर बात करे, पर हर बार शब्द गले में अटक जाते। माँ होने के बावजूद कुछ प्रश्न ऐसे थे, जिन्हें पूछने का साहस वह भी नहीं जुटा पा रही थी।

उसे विद्यानंद के उपदेश की एक बात याद आ गई


“हर समस्या का समाधान समय पर नहीं, सही समय पर होता है।” यह वाक्य उसके मन में देर तक गूंजता रहा।

अगले दिन कॉलेज में रोज़ी ने पहली बार सूरज से स्वयं बात करने का निश्चय किया। यह कोई प्रस्ताव नहीं था, न ही कोई बड़ा कदम—बस एक साधारण-सी बातचीत। कैंटीन के पास उसने सूरज को अकेले खड़े देखा और पास जाकर बोली,


“कांग्रेसुलेशंस, सूरज। तुम हर बार सबको पीछे छोड़ देते हो।”

सूरज ने हल्की मुस्कान के साथ धन्यवाद कहा। उसकी आँखों में विनम्रता थी, पर वही परिचित दूरी भी। बातचीत कुछ मिनट चली—पढ़ाई, कॉलेज और आने वाले इंटर्नशिप के बारे में। रोज़ी को लगा कि सूरज बोलता कम है, पर जब बोलता है तो बहुत सोच-समझकर।

उस छोटी-सी बातचीत के बाद सूरज के मन में हलचल थी। आज पहली बार रोगी ने उसे अकेले में इतनी देर तक बात की थी। उसे एहसास हुआ कि लोग उससे जुड़ना चाहते हैं, पर वह स्वयं ही किसी अदृश्य दीवार के पीछे खड़ा रहता है। क्या यह दीवार उसने स्वयं बनाई है, या यह किसी पुराने डर की देन है—यह प्रश्न उसे भीतर से कचोटने लगा। आज दोपहर में उसने रोजी के बारे में सोचा उसे अपने ख्वाबों की अप्सरा बनाने की कोशिश की जो उसमें कामुकता जागृत कर सके पर परिणाम वही


ढाक के तीन पात

शाम को कमरे में लौटकर उसने खिड़की से बाहर देखा। आसमान में धीरे-धीरे अंधेरा उतर रहा था। उसे लगा जैसे उसका जीवन भी किसी संध्या काल में ठहरा हुआ है—जहाँ न पूरी रोशनी है, न पूरा अंधेरा।

उसी क्षण उसने एक निर्णय लिया। अब वह अपने प्रश्नों से भागेगा नहीं। चाहे समय लगे, चाहे रास्ता कठिन हो, पर उसे स्वयं को समझना होगा। यह केवल उसकी समस्या नहीं थी; यह उसकी पहचान, उसका भविष्य और उसके जीवन की दिशा से जुड़ा प्रश्न था।

दूर हवेली में बैठी सुगना भी उसी रात अनजाने भय से घिरी हुई थी। माँ और पुत्र—दोनों अलग-अलग जगह, अलग-अलग कारणों से—एक ही सत्य के करीब बढ़ रहे थे। समय धीरे-धीरे अपने रहस्य खोलने वाला था।


उधर रोजी……घटनाक्रम को अपनी निगाहों से देख रही थी.

सूरज से हुई वह छोटी-सी बातचीत रोज़ी के मन में अपेक्षा से कहीं ज़्यादा देर तक ठहरी रही। उसे हैरानी इस बात की नहीं थी कि सूरज गंभीर है—यह तो सब जानते थे—हैरानी इस बात की थी कि उसकी आँखों में एक ऐसी दूरी थी, जो किसी घमंड से नहीं, बल्कि किसी गहरे आत्मसंघर्ष से उपजी लगती थी।

रोज़ी स्वयं को जानती थी। कॉलेज में उसका आत्मविश्वास, उसकी हँसी, और उसका खुलापन उसे भीड़ से अलग करता था। लोग उसे “हॉट”, “बोल्ड” और “आउटगोइंग” कहते थे, पर बहुत कम लोग जानते थे कि वह सामने वाले की चुप्पी को भी पढ़ने की कोशिश करती है। सूरज की चुप्पी उसे आकर्षित नहीं—उसे परेशान कर रही थी।

क्लास में बैठी वह बार-बार उसकी ओर देख लेती। सूरज हमेशा की तरह सामने की बेंच पर बैठा, नोट्स बनाता हुआ, जैसे बाकी दुनिया से उसका कोई सीधा सरोकार ही न हो। न लड़कियों की हँसी, न दोस्तों की चुहलबाज़ी—कुछ भी उसे विचलित नहीं करता था।


“कोई इतना अलग कैसे हो सकता है?”

यह सवाल रोज़ी के मन में बार-बार उठ रहा था।

उसने खुद से पूछा—


क्या यह उदासीनता है?

या कोई ऐसा बोझ, जिसे वह किसी को दिखाना नहीं चाहता?

रोज़ी को याद आया कि बातचीत के दौरान सूरज ने आँख मिलाकर बात तो की थी, पर उनमें एक अनकहा संकोच था। जैसे वह हर शब्द बोलने से पहले तय करता हो कि कितना कहना सुरक्षित है। यह सोचकर रोज़ी के भीतर एक अजीब-सी संवेदना जागी—यह आकर्षण नहीं था, यह जिज्ञासा भी नहीं थी; यह किसी को समझने की चाह थी।

शाम को हॉस्टल के कमरे में वह अपनी सहेलियों की बातें सुन रही थी। कोई किसी नए रिश्ते की चर्चा कर रही थी, कोई भविष्य की योजनाओं की। रोज़ी खिड़की के पास खड़ी बाहर देख रही थी। उसे लगा कि सूरज इन सब बातों से बहुत दूर है, जैसे वह अपने ही रास्ते पर अकेले चल रहा हो।

उसी क्षण उसने तय किया—


वह उसे बदलने की कोशिश नहीं करेगी।

वह उसे अपनी तरह बनाने की ज़िद नहीं करेगी।

पर अगर सूरज कभी बोलना चाहे, तो वह सुनने के लिए मौजूद रहेगी।

अगले दिन उसने जानबूझकर सूरज के पास वाली सीट चुनी। कोई बड़ा संवाद नहीं हुआ—बस नोट्स साझा किए गए, एक-दो औपचारिक वाक्य। पर रोज़ी ने महसूस किया कि सूरज की कठोर-सी दिखने वाली दुनिया में भरोसे के लिए बहुत कम जगह है, और वही जगह सबसे कीमती होती है।

उस शाम लौटते समय रोज़ी के मन में एक स्पष्ट भाव था—


यह कोई प्रेम-कथा की शुरुआत नहीं है।

यह किसी ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जिसे समझे जाने की ज़रूरत है।

और शायद, अनजाने में, रोज़ी उस कहानी का हिस्सा बन चुकी थी।

दूर कहीं सूरज अपने ही विचारों में उलझा था, और हवेली में सुगना आने वाले समय की आहट महसूस कर रही थी।


तीन अलग-अलग मन, तीन अलग-अलग दिशाएँ—पर मंज़िल शायद एक ही थी सूरज का पुरुषत्व जागृत करना

उस दिन कॉलेज से लौटते समय मौसम में अजीब-सी नमी थी। आसमान पर बादल थे, पर बारिश नहीं—जैसे कुछ बरसने से पहले खुद को रोक रहा हो। रोज़ी और सूरज लाइब्रेरी से साथ निकले थे। बातचीत सामान्य थी, पर खामोशियों में कुछ नया पल रहा था।

कॉलेज के पुराने बरगद के पास आकर वे रुक गए। यहाँ अक्सर छात्र बैठा करते थे, पर उस समय जगह खाली थी। रोज़ी ने पहली बार महसूस किया कि सूरज की चुप्पी अब उसे अजनबी नहीं लग रही थी। उसमें एक भरोसा था—संकोच के पीछे छिपी हुई सच्चाई।

“तुम बहुत कुछ अपने भीतर रखते हो,”


रोज़ी ने धीरे से कहा।

सूरज ने कुछ उत्तर नहीं दिया, बस पहली बार उसकी आँखों में सीधे देखा। उस दृष्टि में प्रश्न भी था और अनुमति भी—जैसे वह कह रहा हो कि अगर कुछ कहना है, तो अभी।

रोज़ी ने एक क्षण का निर्णय लिया। न जल्दबाज़ी थी, न नाटकीयता। उसने धीरे से आगे बढ़कर सूरज के गाल को हल्के से छुआ और फिर उसके होंठों पर एक क्षणिक, सधा हुआ चुम्बन रख दिया।

वह चुम्बन छोटा था, पर उसका प्रभाव गहरा।

सूरज जैसे ठिठक गया। यह कोई फिल्मी दृश्य नहीं था—यह पहली बार था जब किसी ने उसकी दुनिया में बिना सवाल किए, बिना अपेक्षा रखे, इतनी निकटता दिखाई थी। उसके भीतर कोई दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला। यह शारीरिक प्रतिक्रिया नहीं थी, बल्कि एक भावनात्मक जागरण था—अपने अस्तित्व को स्वीकार किए जाने का।

रोज़ी पीछे हटी। उसकी आँखों में कोई चुनौती नहीं थी, सिर्फ़ स्नेह और सम्मान।

“अगर तुम्हें असहज लगा हो, तो—”


उसने वाक्य पूरा नहीं किया।

“नहीं,”


सूरज ने पहली बार तुरंत उत्तर दिया।

“ऐसा नहीं है।”

उसकी आवाज़ में कंपन था, पर डर नहीं। उस क्षण सूरज ने महसूस किया कि उसके भीतर बहुत समय से सोई हुई संवेदनाएँ—स्पर्श, अपनापन, और स्वीकार्यता—धीरे-धीरे जाग रही हैं। उसने आगे बढ़कर रोजी को अपने आलिंगन में ले लिया और उसके अधरों को बेतहाशा चूमने लगा । रोजी को इतने आत्मीय और गहरे चुंबन की आशा नहीं थी पर जब सूरज स्वयं आगे बढ़कर उसके अधरों को चूम रहा था रोजी ने भी उसका भरपूर साथ दिया । चुंबन की गहराई बढ़ती गई इसका असर रोजी पर तो हुआ पर सूरज के लिंग में उत्तेजना अब भी नहीं आई।

रोजी अपनी वासना पर काबू करते हुए सूरज से अलग हो गई वह इस स्थिति में अब एक पल भी रुकना नहीं चाहती थी उसका दिल तेजी से धड़क रहा था उसने अपनी गर्दन झुका ली अपना बैग गले में लटकाया और बोली

“फिर मिलती हूं “ वह तेज कदमों से सूरत से दूर होती गई… इधर सूरज का मन दुखी हो चला था आज रोजी ने जिस प्रकार उसका साथ दिया था और इतना गहरा चुंबन लिया था इसमें तो किसी भी युवा के लिंग में तनाव भर जाता पर सूरज का श्राप उसे खा जा रहा था। रोजी का यह गहरा और आत्मीय चुंबन भी सूरज के लिंग में उत्तेजना भरने में नाकामयाब रहा।

अगली सुबह दोनों फिर मिले वे दोनों कुछ देर चुप खड़े रहे। न कोई वादा, न कोई परिभाषा। सिर्फ़ एक समझ—कि कुछ बदला है, और यह बदलाव दबाव से नहीं, भरोसे से आया है।

रोज़ी मुस्कुराई।


“जब बोलना चाहो, मैं सुनूँगी,”

कहकर वह वहाँ से चली गई।

सूरज देर तक वहीं खड़ा रहा। बरगद के पत्ते हिल रहे थे।

बरगद के नीचे घटित उस क्षण के बाद सूरज देर तक वहीं खड़ा रहा। मन में हलचल थी—विचार, भावनाएँ, स्मृतियाँ—सब एक साथ उमड़ रही थीं। रोज़ी का चुम्बन कोई साधारण घटना नहीं था; उसने भीतर कुछ छुआ था, यह सूरज भली-भाँति महसूस कर रहा था।

पर उसी के साथ एक और सत्य भी उतना ही स्पष्ट था।

भावनात्मक स्पर्श के बावजूद, उसके शरीर ने कोई उत्तर नहीं दिया।

सूरज ने स्वयं को टटोलने की कोशिश नहीं की—उसे उसकी ज़रूरत भी नहीं पड़ी। वह जानता था। यह मौन, यह शून्य, उसके लिए नया नहीं था। बस इस बार, यह और अधिक स्पष्ट हो गया था।

कमरे में लौटकर वह देर तक आईने के सामने खड़ा रहा। वही चेहरा, वही सुदृढ़ काया—सब कुछ सामान्य था। फिर भी भीतर कहीं कुछ ऐसा था, जो प्रतिक्रिया देना भूल चुका था।


“क्या मेरे भीतर ही कोई कमी है?”

यह प्रश्न अब पहली बार डर के साथ नहीं, बल्कि स्वीकार्यता के साथ उठा।

उसने खुद से झूठ नहीं बोला। रोज़ी के प्रति आकर्षण था—सम्मान था, अपनापन था। उसका स्पर्श उसे अच्छा लगा था। मन ने प्रतिक्रिया दी थी, पर शरीर अब भी किसी अनजाने बंधन में बंधा हुआ था।

उस रात उसे नींद नहीं आई।

उसने फिर से चिकित्सा की किताबें खोलीं, पर इस बार पढ़ने का तरीका अलग था। अब वह समाधान नहीं, समझ ढूँढ रहा था। उसे एहसास होने लगा कि यह समस्या केवल शारीरिक नहीं हो सकती—यह कहीं गहरे जुड़ी है, स्मृतियों से, मन के कोनों में दबी किसी अनुभूति से।

दूसरी ओर, रोज़ी भी बेचैन थी।

उसने सूरज की आँखों में उस क्षण कुछ देखा था—घबराहट नहीं, झिझक नहीं—बल्कि एक शांत उलझन। उसे यह भी महसूस हुआ था कि सूरज पीछे नहीं हटा, अपितु आगे बढ़ा। सूरज ने आगे बढ़कर जिस प्रकार मुनि के आधारों पर गहरा चुंबन लिया था बल्कि लेते ही रहा था उसने स्वयं रोगी को उत्तेजित कर दिया था।

रोज़ी ने खुद से एक वादा किया—


वह जल्दबाज़ी नहीं करेगी। उसे स्वयं अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना था पर सूरज का साथ उसे अच्छा लगने लगा था।

हवेली में, उसी रात, सुगना को अचानक एक अजीब-सा भारीपन महसूस हुआ। बिना किसी स्पष्ट कारण के। उसने दीपक के सामने बैठकर आँखें मूँद लीं। विद्यानंद की आवाज़ जैसे उसके भीतर गूँज उठी—


“जब संकेत मिलने लगें, तब समझो समय निकट है।”

सूरज के भीतर भावनाएँ जाग रही थीं,


रोज़ी धैर्य सीख रही थी,

और सुगना को पहली बार लग रहा था कि जो वह टालती आ रही थी—अब उससे मुँह मोड़ना संभव नहीं।

यह चुप्पी स्थायी नहीं थी।


यह किसी परिवर्तन से पहले का मौन थी।
 
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