भाग 168
सरयू सिंह की तेजी से हिलती हुई कमर और सोनी की हालत देखकर सुगना से रहा नहीं गया उसने खिड़की से ही पुकारा
बाबूजी…. तनी धीरे से ….सुगना के मुंह से यह वाक्य सुनते ही सरयू सिंह ने सुगना की तरफ देखा.. सुगना को उनकी आंखों में वही पुरानी वासना दिखाई पड़ी जिसका आनंद वह अब तक लेती आई थी। उसे अफसोस हुआ उसने यह आखिरकार क्यों बोला। वो खिड़की पर से हट गई पर अब देर हो चुकी थी सुगना की यह कामुक कराह सरयू सिंह के तन बदन में आग लगा गई वो अपनी वासना के चरम पर पहुंच गए। उनका बदन ऐंठने लगा…
नियति साँसे रोके विधाता की लिखी किताब के पन्ने पलटने लगी।
अब आगे..
यह कामुक उदगार सुगना के मुंह से मंदिर में बज रही घंटियों की भांति सरयू सिंह के कानों में बजने लगा। अतीत में न जाने उन्होंने सुगना के मुख से यह कामुक कर कितनी बार सुनी थी और हर बार पूरे तन मन से सुगना और अपनी कामवासना को शांत किया था।
उन्होंने अपने लंड को पूरी तरह सोनी को सुगना मानकर उसके गर्भ में उतार दिया सोनी को ऐसा लगा जैसे उसका पेट ऊपर की तरफ चढ़ गया। सोनी को सांस लेने में भी दिक्कत हो रही थी सरयू सिंह ने अपना लंड पीछे किया पर शायद खुद को संभाल नहीं पाए उनके मुख से एक आह ….निकली.. जो कामुक कतई नहीं थी।
वीर्य की पहली धार भी निकलने को तैयार थी परंतु …
नियति ने सरयू सिंह को उनके किए की सजा देने की ठान ली….
सरयू सिंह का लंड अचानक ही सोनी की बुर से बाहर आ गया…
वीर्य की पहली धार बाहर आई परंतु सोनी की प्यासी बुर की जगह वह उसके पेट उसकी चूचियों और चेहरे पर गिरी। अगले ही पल और सरयू सिंह एक कटी हुई लाश की तरह अचानक पीछे की तरफ गिर गए।
लंड से वीर्य की धार पिचकारी की भांति रह रह कर निकल रही थी और उनके शरीर से प्राण भी।
सोनी हड़बड़ा कर बिस्तर से उठी और उसने सुगना को आवाज़ लगाई सुगना स्वयं सांकल खोलकर अंदर आ गई और दोनों बहने सरयू सिंह के सर को अपने हाथों से सहलाने लगी.. सरयू सिंह बार-बार सुगना सुगना पुकारे जा रहे थे उनके लंड वीर्य अभी भी निकल रहा था जो नग्न सोनी के शरीर पर और सुगना पर गिर रहा था। मरते समय भी वह अपने वीर्य से उनकी प्यारी सुगना और उसकी अपनी अप्सरा सोनी को नहला रहे थे।
सुगना और सोनी दोनों उनका सर सहला रही थी सोनी ने लोटे से उन पर उन्हें पानी पिलाने की कोशिश परंतु सरयू सिंह परलोक के दरवाजे पर पहुंच चुके थे उन्होंने अंतिम बार सुगना को अपनी तरफ खींचा और उनके माथे पर चुंबन लेते हुए बोले …
हमार गलती माफ करती दिहे…हम पापी हई…सुगन आश्चर्य से उनकी तरफ देख रही थी उसे समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर सरयू सिंह ने कौन सा पाप किया है।
सरयू सिंह ने सोनी को भी अपनी तरफ खींचा और उसके भी माथे को चूमते हुए बोले…
हमरा के माफ कर दीह…... तहर काम ना भईल……सरयू सिंह तेजी से हांफने लगे…और अपनी अंतिम सांसों पर काबू करने की नाकाम कोशिश करते हुए बोले
पर हम आशीर्वाद देत बानी तहर कोख जरूर हरिहर होई…….सूरज….सूरज…सु…र…….
सरयू सिंह अपनी बात पूरी नहीं कर पाए…पर सोनी के दिमाग में सूरज जैसे खूबसूरत बच्चे की तस्वीर घूम गई जिसके लिए वह यह अनुष्ठान करने आई थी.
सरयू सिंह ने अपनी पलकें बंद कर ली और परलोक सिधार गए। नियति ने उन्हें उनके किए के लिए सजा दे दी थी। नियति उनकी मनोदशा जान रही थी। यह जानने के पश्चात भी कि सुगना उनकी अपनी पुत्री है आज वह उसे अपनी वासना में फिर घसीट लाए थे जो कि एक निक्रिस्ट पाप था।
सुगना और नंगी सोनी फफक फफक कर रो रही थी।
सरयू सिंह का दुखद अंत हो चुका था और सोनी की कोख एक बार फिर प्यासी ही छूट गई थी।
सरयू सिंह के प्राण पखेरू उड़ते ही कमरे का वातावरण एक भारी और डरावनी खामोशी में डूब गया। वह पुरुष, जो कुछ ही क्षण पहले वासना और शक्ति का प्रतीक बना हुआ था, अब केवल एक बेजान देह मात्र रह गया था। नियति का चक्र अपनी पूरी क्रूरता के साथ घूम चुका था।
उस शांत कमरे में केवल सोनी और सुगना के सिसकने की आवाजें गूँज रही थीं।
सुगना के कानों में सरयू सिंह के अंतिम शब्द "हमार गलती माफ करती दिहे… हम पापी हई…" किसी जलते हुए लोहे की तरह चुभ रहे थे।
सरयू सिंह ने कौन सा पाप किया था…सुगना इस बात से अभी पूरी तरह अनभिज्ञ थी…. उधर सोनी सरयू सिंह के अंतिम शब्द याद कर रही थी
तोहर कोख जरूर हरिहर होई सूरज… सूरज…..
सूरज का नाम सोनी के जेहन में तेजी से गूंजने लगा.. सूरज….. सूरज….. सूरज…… सूरज….. आवाज लगातार तेज होती जा रही थी… ऐसा लगा जैसे हवेली की दीवारें चीख चीख कर सूरज का नाम पुकार रही है…
सोनीअचकचा कर उठ गई…अतीत से वर्तमान का सफर कुछ पलों का था।
सोनी का स्वप्न टूट चुका था वह उठकर बैठ गई सूरज शब्द अभी भी उसके दिमाग में घूम रहा था क्या सरयू सिंह कुछ कहना चाहते थे…
अब तक तो वह यही समझती आई थी की सरयू सिंह उसे सूरज जैसा बेटा पाने का आशीर्वाद दे रहे थे परंतु……अब बदली हुई परिस्थितियों में…सूरज…… के साथ….
सोनी सोच में पड़ गई…
हे भगवान क्या उन्होंने जो सोचा था क्या वह अब घटित हो रहा है …क्या उन्होंने उसके गर्भधारण के लिए सूरज की परिकल्पना की थी…हे विधाता यह क्या हो रहा है सोनी को कुछ समझ नहीं आ रहा था। वह अभी तुरंत नींद से जागी थी उसने अपने सर को झटका दिया और वापस अपनी खोई हुई निद्रा वापस लाने का असफल प्रयास करने लगी..
उधर सूरज के कमरे में..
सुगना के मालिश करके जाने के बाद, सूरज की आँखों से नींद कोसों दूर थी। उसे अपनी मौसी सोनी पर गुस्सा आ रहा था जिसने उसके अरमानों पर पानी फेर दिया था। उसने आज की रात के लिए न जाने कितनी कल्पनाएं की थी। पर अब अपने हाथों में अपना लंड लिए सोनी के बारे में ही सोच रहा था। बंद आँखों के पीछे केवल सोनी द्वारा किया गया मुखमैथुन और वह अद्भुत स्खलन घूम रहा था। सूरज अपने तने हुए लंड को सहलाते हुए अपनी कल्पनाओं में अब सोनी को मर्यादाओं से परे जाकर नग्न कर रहा था।
बिस्तर की चादर उसे कांटों की तरह चुभ रही थी। उसने करवट बदली, पर उसकी बंद आँखों के सामने बार-बार वही दृश्य आ रहा था—बाथरूम में सोनी का घुटनों के बल बैठना और फिर उसके पुरुषत्व को अपने मुख की ऊष्म गहराइयों में समेट लेना।
सूरज का हाथ उस 'मखमली स्तंभ' को तेजी से सहलाने लगा, जो अब तक मर्यादा की हर सीमा को पार कर और सख्त हो चुका था। उसकी कल्पना अब उस मुखमैथुन से कई कदम आगे निकल चुकी थी। काश! सोनी मौसी अचानक ही बाथरूम से निकल न जाती। वह कल्पना में डूबता गया और सोचता गया। वह अपने कांपते हाथों से सोनी की उस रेशमी नाइटी की डोरियाँ खोल रहा है। नाइटी सरककर फर्श पर गिरती है और उसके नीचे से सोनी का वह कंचन जैसा तराशा हुआ बदन धीरे-धीरे उजागर होता है।
सूरज की कल्पना में सोनी अब पूरी तरह नग्न थी। उसे सोनी के वे भारी और पुष्ट उरोज याद आने लगे, जो आज दोपहर उसके सीने से सटे थे। वह महसूस कर रहा था कि कैसे वह अपनी दोनों हथेलियों में उन मांसल अंगों को भरकर भींच रहा है। सोनी की पतली कमर का वह गहरा मोड़ और वह नाभि-कुंड उसकी नसों में लावा बहा रहा था।
सूरज ने अपनी आँखें और भी कसकर बंद कर लीं। वह देख रहा था कि वह सोनी को बिस्तर पर झुका चुका है। वह सोनी से नजरे नहीं मिल पा रहा है मर्यादा की लकीर अभी उसे अपनी नज़रे चुराने पर मजबूर कर रही है। पर सोनी स्वयं'डॉगी स्टाइल' की उस मुद्रा में अगर उसे निमंत्रण दे रही है। सोनी के पुष्ट नितंबों का उभार उसकी आँखों के सामने था। वह कल्पना कर रहा था कि वह पीछे से अपनी पूरी ताकत के साथ उस काल्पनिक गुलाबी दरार को चीरते हुए अपने लंड को उसके भीतर गहरे तक उतार रहा है।
उसे लग रहा था कि दीवार के उस पार सोनी भी शायद इसी तरह की कश्मकश में जल रही होगी और अपनी जांघें फैलाए उसका इंतजार कर रही होगी। सूरज की कल्पना बेलगाम हो रही थी।
मर्यादा की चादर अब बहुत झीनी हो चुकी थी, और वासना का तूफ़ान सूरज और सोनी के बीच मर्यादा की नींव हिलाने को तैयार था।
इस अद्भुत कल्पना और उत्तेजना के शिखर पर पहुंचकर सूरज का वीर्य स्खलित हो गया। उसने अपनी पजामी को ही उस वीर्य को सोख लेने दिया।
सोनी सूरज के लिए अब केवल 'मौसी' नहीं अभी तू एक काम पिपासु स्त्री की भांति दिखाई पड़ रही थी। हस्तमैथुन के बाद भी उसके शरीर की वह आदिम आग शांत नहीं हुई। उसका पुरुषत्व जैसे किसी अलौकिक प्यास से तड़प रहा था। सूरज को भी यह आभास हो चला था कि जब तक उसकी मौसी सोनी अपने होठों से इस लंड को नहीं छुएगी इसका तनाव कम नहीं होगा।
सूरज ने पूरी रात करवटें बदलते हुए बिताई और सुबह के 5:30 बजे, जब भोर की पहली किरण ने दस्तक दी, उसने सोनी के कमरे के दरवाजे पर दस्तक दे दी।
सोनी हड़बड़ाकर उठी। उसने अपने बिखरे कपड़े ठीक किए और दरवाजा खोला। सामने सूरज खड़ा था—आँखों में रात भर जागने की थकान और चेहरे पर एक अजीब सी बेबसी।
सूरज (रुँधे गले से): "मौसी..." सूरज सिसकने लगा।
सोनी: "क्या हुआ सूरज?" सोनी ने उसके रुआँसे चेहरे को देखकर पूछा।
सूरज: "मैं रात भर सो नहीं पाया हूँ।"
सोनी ने एक गहरी नजर उस पर डाली। उसने पूरी आत्मीयता से पूछा, "क्यों? क्या बात है सूरज? तबीयत तो ठीक है?"
सूरज: "मौसी, कल रात से ही यह... यह तनाव कम नहीं हो रहा।"
सोनी: "पर ये हुआ कैसे?"
सूरज: "जब सोफे पर मालती और रीमा दीदी ने मेरा अंगूठा सहलाया था, तभी से। रात में माँ ने मालिश भी की, पर उनके हाथ की छुअन से कुछ नहीं हुआ। मौसी, हाथ का दर्द तो चला गया, पर यहाँ... यहाँ बहुत दिक्कत है।"
सूरज की नजरें अपनी पजामी के उस उभरे हुए हिस्से पर टिकी थीं, जो उसकी बेचैनी की गवाही दे रहा था। सोनी का दिल जोर से धड़का। उसने एक पल के लिए बाहर गलियारे में झाँका और फिर उसे अंदर बुला लिया।
सोनी (धीमी आवाज में): "अंदर आ जा... और अपनी आँखें बंद कर ले।"
सूरज ने बिना कोई सवाल किए आदेश का पालन किया। कमरे में हल्की रोशनी और सुबह की शांति के बीच, सोनी एक बार फिर घुटनों के बल नीचे बैठी। उसने कांपते हाथों से उसकी पजामी की डोरी ढीली की और उस प्रचंड, सुगठित और तने हुए अंग को बाहर निकाला।
सूरज के उस मखमली स्तंभ पर सूखे हुए काम-रस की वह विशिष्ट गंध अब और भी मादक हो चुकी थी। पजामी से भी सूरज के वीर्य की अनोखी गंध आ रही थी। सोनी की नस-नस में एक सिहरन दौड़ गई। उसने अपनी भावनाओं पर पत्थर रखते हुए, झुककर अपने कोमल होंठों से उस गर्म और फौलादी अंग को स्पर्श किया। उस स्पर्श से सूरज के पूरे बदन में एक लहर दौड़ गई, पर लिंग का तनाव गायब हो गया।
सोनी ने उस मखमली अहसास को महसूस किया, पर खुद को और आगे बहकने से रोक लिया। उसने जल्दी से पजामी ऊपर की और खड़ी हो गई।
सोनी (गंभीर स्वर में): "अब जा और सोने की कोशिश कर। और सुन सूरज... अपने अंगूठे को संभाल कर रख। इन सब बातों से जितना दूर रहेगा, उतना अच्छा है; अन्यथा तेरी पढ़ाई और भविष्य पर इसका असर पड़ेगा।"
सूरज कुछ कहना चाहता था, पर सोनी की आँखों में जो दृढ़ता और आदेश था, उसने उसे चुप कर दिया। वह बिना कुछ बोले, भारी कदमों से अपने कमरे की ओर लौट गया, जबकि सोनी वहीं खड़ी अपनी ही सांसों की गति को सामान्य करने की कोशिश कर रही थी।
अगली सुबह सब कुछ सामान्य था। सोनी और सूरज यथासंभव नजरें नहीं मिला रहे थे। यदि कहीं दोनों एक-दूसरे से टकराते भी, तो भी सोनी का मर्यादित व्यवहार सूरज की उम्मीदों पर पानी फेर देता। सुगना ने आज सुबह भी सूरज के हाथ की मालिश की, जादुई अंगूठे को भी सहलाया, पर सब कुछ सामान्य रहा।
सूरज कॉलेज पहुँच गया, जहाँ उसकी प्रेमिका रोजी उसका बेसब्री से इंतजार कर रही थी। कॉलेज के गलियारों में सूरज और रोजी की जोड़ी किसी मिसाल से कम नहीं थी, लेकिन सूरज के भीतर एक ऐसा द्वंद्व चल रहा था जिसकी खबर किसी को न थी। मेडिकल की मोटी किताबों के बीच जब वह अपनी आँखें मूँदता, तो उसे रोजी का मासूम चेहरा नहीं, बल्कि मौसी सोनी का वह मादक और वर्जित सान्निध्य याद आता।
एक-दो दिन और बीत गए। सोनी ने सूरज से दूरी बनाकर रखी और सूरज की माँ उसके हाथों की मालिश करती रही। सूरज की तड़प बढ़ती जा रही थी, पर सोनी अपनी मर्यादा लाँघने को तैयार नहीं थी। सूरज बेमन से कॉलेज जाता।
कॉलेज के कैंपस में जहाँ अमलतास के फूल बिछ जाते थे, वहाँ सूरज और रोजी की जोड़ी किसी रूमानी फिल्म के दृश्य जैसी लगती थी। लेकिन इस सुनहरी तस्वीर के पीछे एक कड़वा सच छिपा था—सूरज की बढ़ती हुई बेरुखी और रोजी का टूटता हुआ विश्वास।
रोजी, जिसका यौवन किसी तराशे हुए संगमरमर की तरह दमकता था, सूरज के करीब रहकर भी उससे कोसों दूर महसूस कर रही थी। इस मानसिक और शारीरिक दूरी को पाटने के लिए उसने कई जतन किए, पर नतीजा सिफर रहा। लाइब्रेरी के पीछे वाले एकांत कोने में, जब रोजी सूरज के सीने से लगकर अपनी आँखें मूँद लेती, तो उसे उम्मीद होती कि सूरज की बाहें उसे और कसकर थाम लेंगी। वह अपनी तेज होती धड़कनों के जरिए सूरज को यह बताना चाहती थी कि उसका रोम-रोम उसे पुकार रहा है। लेकिन सूरज पत्थर की मूरत बना रहता। उसके हाथ रोजी की कमर पर तो होते, पर उनमें वह 'अधिकार' और 'तड़प' गायब थी। सूरज की नजरें शून्य में कहीं भटक रही होतीं, जहाँ बार-बार सोनी मौसी का वह चेहरा और वह बाथरूम वाला वाकया कौंध जाता था।
रोजी अक्सर अपनी बात कहने के लिए शब्दों का नहीं, स्पर्श का सहारा लेती। जब वह प्यार से सूरज के गालों को चूमती या उसके होंठों के करीब आती, तो सूरज प्रतिक्रिया तो देता, पर वह किसी मशीनी क्रिया जैसी होती। रोजी को महसूस होता कि सूरज का 'मन' उस स्पर्श में शामिल नहीं है। उसे लगता जैसे वह किसी ऐसे व्यक्ति के साथ है जो शरीर से तो वहाँ मौजूद है, पर जिसकी आत्मा कहीं और कैद है। रोजी की खूबसूरती सूरज के लिए जैसे बेअसर होती जा रही थी।
"सूरज, क्या मैं अब तुम्हें अच्छी नहीं लगती?" रोजी ने कई बार भीगी आँखों से पूछा। सूरज का हर बार 'थकान' या 'पढ़ाई का बोझ' कहकर बात टाल देना रोजी के दिल को छलनी कर देता था।
सूरज की इस बेरुखी की असली वजह वह 'वर्जित आकर्षण' था जो उसने अपनी मौसी के साथ महसूस किया था। जब रोजी उसे गले लगाती, तो उसे मौसी की उस रात की 'रेशमी नाइटी' की छुअन याद आती। रोजी का निश्छल प्रेम उसे उस 'आदिम प्यास' के सामने छोटा लगने लगा था, जो सोनी मौसी ने अनजाने में उसके भीतर जगा दी थी।
एक दिन रोजी अपनी सहेलियों, महक और टीना के साथ बैठी थी। उसने धीमी आवाज़ में अपनी व्यथा साझा की। महक और टीना, जो प्रेम और देह की वर्जनाओं को पार कर चुकी थीं, रोजी की बातें सुनकर हैरान रह गईं।
महक: "रोजी, पुरुष का प्रेम केवल उसकी आँखों में नहीं, उसकी छुअन की शिद्दत में होता है। अगर सूरज पत्थर बना रहता है, तो शायद तुमने अभी तक अपनी स्त्रीत्व की उस अग्नि को नहीं सुलगाया है जो किसी भी पुरुष के संयम को पिघला दे।"
टीना: "देख रोजी, ईश्वर ने तुझे एक ऐसी काया दी है जो किसी भी शिल्पी का स्वप्न हो सकती है। तेरे ये तराशे हुए उभार, तेरी कमर की ढलान और तेरी आँखों में तैरता यह नशा—ये सब केवल देखने के लिए नहीं हैं। पुरुष का पुरुषत्व तब तक पूर्णतः जागृत नहीं होता जब तक वह स्त्री के पूर्ण समर्पण का अनुभव न कर ले। तूने अब तक उसे केवल अपना चेहरा दिखाया है, अपनी रूह की प्यास और बदन की पुकार नहीं।"
सहेलियों ने उसे काम-कला के उन सूक्ष्म पहलुओं के बारे में बताया जहाँ मौन भी मुखर हो जाता है। उन्होंने समझाया कि स्त्री का शरीर एक जीती-जागती कविता है। महक ने उसे प्रेरित करते हुए कहा: "जब तू उसके करीब हो, तो केवल एक प्रेमिका मत बन, एक ऐसी मोहिनी बन जा कि उसे दुनिया का हर बंधन तुच्छ लगने लगे। उसे तेरी देह के उस सुगंधित आकर्षण में डूबने दे।"
रोजी को अहसास हुआ कि शायद समर्पण ही वह चाबी है जो सूरज के मन के बंद दरवाजे खोल सकती है। उसने तय किया कि वह अब अपनी सुंदरता को केवल एक आभूषण नहीं, बल्कि एक अस्त्र की तरह प्रयोग करेगी। वह सूरज को उस चरम सुख की दहलीज तक ले जाएगी, जहाँ पहुँचकर इंसान सब कुछ भूल जाता है और अपनी संगिनी के तन-बदन और रूह में समा जाता है।
उसने अपने जन्मदिन को एक 'अंतिम हथियार' की तरह इस्तेमाल करने का सोचा। उसने मन ही मन ठान लिया कि वह अपनी पूरी गरिमा और सुंदरता को सूरज के सामने 'समर्पित' कर देगी, ताकि सूरज के मन से हर दूसरा ख्याल मिट जाए और सिर्फ 'रोजी' ही शेष रहे।
शेष अगले भाग में