Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 123 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

आप सब की प्रतिक्रियाओं और सोनी की पिक्चर्स भेज कर मेरा मन रखने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।

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1 कहानी के अच्छे और बुरे पहलू के बारे में मुझे सूचित करके

2. कहानी से मिलती-जुलतीकोई उत्तेजक पिक्चर डालकर

3.. कुछ भी और साथी पाठको के पढ़ने लायक
..

अब तक जिन लोगों ने भी 167 की मांग रखी थी उन्हें भेज दिया गया है.
 
इतिहास में एक ऐसी घटना बहुत प्रसिद्ध है जहाँ इन्सेस्ट (निकट रक्त संबंध) और उससे जुड़ी जटिलताओं ने एक पूरे राजवंश को विनाश की ओर धकेल दिया। यह कहानी है स्पेन के हैब्सबर्ग राजवंश के अंतिम राजा, चार्ल्स द्वितीय (Charles II of Spain) की।

यह घटना कामुक आकर्षण से अधिक इस बात का उदाहरण है कि कैसे परिवार के भीतर संबंध बनाने की जिद ने एक इंसान को "श्रापित" जीवन जीने पर मजबूर कर दिया।

हैब्सबर्ग वंश: रक्त की शुद्धता का जुनून16वीं और 17वीं शताब्दी में, स्पेन का हैब्सबर्ग परिवार दुनिया का सबसे शक्तिशाली परिवार था। वे अपनी संपत्ति और सत्ता को बाहर नहीं जाने देना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने एक घातक रास्ता चुना—परिवार के भीतर ही शादियाँ करना।

  • रिश्तों का जाल: चार्ल्स द्वितीय के माता-पिता असल में मामा और भांजी थे। उनके दादा-दादी भी आपस में चचेरे भाई-बहन थे।
  • जेनेटिक परिणाम: लगातार 200 वर्षों तक परिवार के भीतर संबंध बनाने के कारण उनके जीन इतने कमजोर हो गए कि चार्ल्स द्वितीय का जन्म एक 'जेनेटिक आपदा' की तरह था।
चार्ल्स द्वितीय: एक त्रासद जीवनजब चार्ल्स का जन्म हुआ, तो उसे 'एल् हेचिज़ादो' (The Bewitched) या 'जादू-टोना किया हुआ' कहा गया, क्योंकि उसकी स्थिति सामान्य नहीं थी:

  1. शारीरिक विकृति: उसका निचला जबड़ा (Habsburg Jaw) इतना बड़ा था कि वह अपने दांतों को आपस में मिला नहीं पाता था और न ही ठीक से भोजन चबा पाता था। उसकी जीब इतनी मोटी थी कि वह मुश्किल से बोल पाता था।
  2. मानसिक स्थिति: उसे बार-बार दौरे पड़ते थे और उसका मानसिक विकास एक बच्चे जैसा ही रहा।
  3. कामुकता और नपुंसकता: चार्ल्स ने दो शादियाँ कीं, लेकिन वह कभी संतान उत्पन्न नहीं कर पाया। इतिहासकारों का मानना है कि इनब्रीडिंग के कारण वह पूरी तरह नपुंसक था। उसकी पत्नियाँ उसके साथ रहने को एक सजा मानती थीं।
इस घटना से मिलने वाला सबकयह ऐतिहासिक घटना हमें बताती है कि क्यों दुनिया भर की संस्कृतियों और विज्ञान ने इन्सेस्ट को वर्जित माना है:

  • प्रकृति का नियम: प्रकृति 'विविधता' (Diversity) चाहती है। जब समान जीन बार-बार मिलते हैं, तो छिपे हुए रोग और विकृतियाँ बाहर आ जाती हैं।
  • राजवंश का अंत: चार्ल्स द्वितीय की मृत्यु के साथ ही हैब्सबर्ग वंश का स्पेन पर शासन हमेशा के लिए खत्म हो गया। एक छोटा सा परिवार जो अपनी 'शुद्धता' बचाना चाहता था, उसने खुद को ही मिटा लिया।
निष्कर्ष:इन्सेस्ट से जुड़ी कहानियाँ सुनने में भले ही कुछ लोगों को 'कामुक' या 'रोमांचक' लगें, लेकिन वास्तविक जीवन और इतिहास में इनके परिणाम हमेशा विनाशकारी, बीमारी से भरे और मानसिक रूप से पीड़ादायक रहे हैं।
 
भाग 169

रोजी को अहसास हुआ कि शायद समर्पण ही वह चाबी है जो सूरज के मन के बंद दरवाजे खोल सकती है। उसने तय किया कि वह अब अपनी सुंदरता को केवल एक आभूषण नहीं, बल्कि एक अस्त्र की तरह प्रयोग करेगी। वह सूरज को उस चरम सुख की दहलीज तक ले जाएगी, जहाँ पहुँचकर इंसान सब कुछ भूल जाता है और अपनी संगिनी के तन-बदन और रूह में समा जाता है।

उसने अपने जन्मदिन को एक 'अंतिम हथियार' की तरह इस्तेमाल करने का सोचा। उसने मन ही मन ठान लिया कि वह अपनी पूरी गरिमा और सुंदरता को सूरज के सामने 'समर्पित' कर देगी, ताकि सूरज के मन से हर दूसरा ख्याल मिट जाए और सिर्फ 'रोजी' ही शेष रहे।

अब आगे..

शाम को कॉलेज की लाइब्रेरी के सबसे पिछले और सुनसान कोने में, जहाँ पुरानी किताबों की महक हवा में घुली हुई थी, रोजी और सूरज साथ बैठे थे। सूरज का ध्यान अभी भी अपनी एनाटॉमी की किताब पर था, लेकिन रोजी की आँखों में कुछ और ही शरारत और बेचैनी नाच रही थी। सहेलियों की बातों ने उसके भीतर एक नई हिम्मत भर दी थी। उसने धीरे से अपना पैर मेज के नीचे सूरज के पैर से सटाया और अपनी उंगलियों से उसकी कलाई को सहलाने लगी।

रोजी (मधुर और दबी आवाज़ में): "सूरज... तुम हमेशा इन बेजान हड्डियों और मांसपेशियों में खोए रहते हो। कभी इस 'जीते-जागते' जिस्म की धड़कन भी सुनी है?"

सूरज ने चौंककर उसकी ओर देखा। रोजी आज कुछ अलग लग रही थी। उसकी कुर्ती का गला थोड़ा गहरा था और उसकी आँखों में एक अजीब सा निमंत्रण था।

सूरज: "रोजी, तुम जानती हो एग्जाम्स करीब हैं। और वैसे भी, तुम इतनी खूबसूरत लग रही हो कि मेरा ध्यान भटक जाता है।"

रोजी ने एक शरारती मुस्कान बिखेरी और थोड़ा और करीब झुक गई, जिससे उसके इत्र की मादक खुशबू सूरज के नथुनों से टकराई।

रोजी: "अच्छा? ध्यान भटकता है या बस दिखावा करते हो? सच बताओ सूरज, हम इतने वक्त से साथ हैं... क्या तुम आज भी उतने ही 'मासूम' और 'कोरे' हो जितना पहले दिन थे? या किसी और ने इस मेडिकल स्टूडेंट का 'प्रैक्टिकल' ले लिया है?"

सूरज की धड़कनें तेज हो गईं। मौसी के बाद अब रोजी भी उसी राह पर थी।

सूरज (हल्की हंसी के साथ): "प्रैक्टिकल? तुम क्या कहना चाहती हो रोजी?"

रोजी (उसकी शर्ट के कॉलर से खेलते हुए): "मेरा मतलब है कि क्या तुम अब भी 'वर्जिन' हो? क्या तुम्हारी जवानी की ये आग अब तक किसी ने शांत नहीं की? तुम इतने सुगठित और तने हुए दिखते हो कि मुझे यकीन नहीं होता कि तुम अब तक कुंवारेपन का बोझ ढो रहे हो।"

उसने अपनी उंगली सूरज की हथेली पर गोल-गोल घुमाते हुए उसके चेहरे की ओर देखा, मानो उसके मन की गहराई टटोल रही हो।

रोजी: "सच कहूँ तो, मुझे डर लगता है कि कहीं तुम अंदर ही अंदर किसी ज्वालामुखी की तरह फट न जाओ। क्या तुम... क्या तुम मेरे साथ उस 'खास मिलन' के लिए उत्सुक नहीं हो? क्या तुम्हें मेरी बाहों में वो सुकून नहीं चाहिए जिसकी तलाश हर मर्द को होती है?"

सूरज ने गहरी सांस ली। उसके दिमाग में मौसी की छुअन और रोजी का ये खुलापन एक युद्ध छेड़ रहे थे।

सूरज: "रोजी, प्यास तो बहुत है... और हाँ, मैं अब भी 'कोरा' हूँ। पर ये उत्सुकता कभी-कभी इतनी बढ़ जाती है कि मुझे खुद पर काबू पाना मुश्किल लगता है। मैं पत्थर नहीं हूँ, मेरा भी मन करता है कि तुम्हें अपनी बाहों में भरकर उस चरम सुख तक ले जाऊँ।"

रोजी की आँखों में चमक आ गई। उसने सूरज के कान के पास जाकर धीरे से काटा और फुससाई, "तो फिर इस 'कोरेपन' को खत्म क्यों नहीं करते? मैं पूरी तरह तुम्हारी होने के लिए तैयार हूँ। मेरा ये तराशा हुआ बदन सिर्फ तुम्हारी छुअन का इंतजार कर रहा है। बताओ... कब मुझे अपना बनाओगे? मैं तुम्हें अनोखा उपहार देना चाहती हूँ। मैं चाहती हूँ कि हमारे बीच की यह दूरी हमेशा के लिए खत्म हो जाए। उस दिन हम होंगे, और हमारा मिलन होगा।"

उसकी आवाज़ में एक ऐसी खनक और आमंत्रण था जिसे नजरअंदाज करना नामुमकिन था। रोजी ने इशारों ही इशारों में साफ़ कर दिया था कि वह उस दिन अपनी कौमार्य की दहलीज पार कर सूरज के साथ पूर्ण मिलन के सुख को अनुभव करना चाहती है।

सूरज, जो अब तक मौसी सोनी की यादों के 'हस्तमैथुन' और कल्पनाओं के भंवर में फंसा हुआ था, रोजी की इस प्रत्यक्ष और जीवंत पेशकश से चौंक उठा। एक पल के लिए सोनी का चेहरा धुंधला हुआ और रोजी का यौवन उसकी आँखों में चमकने लगा। जब उसने देखा कि उसकी प्रेमिका, जो उसे बेपनाह चाहती है, खुद आगे बढ़कर अपनी देह और आत्मा को उसे समर्पित करने का आह्वान कर रही है, तो सूरज के भीतर का पुरुष जाग उठा। उसे लगा कि शायद यही वह रास्ता है जो उसे मौसी के प्रति अपनी उस 'अतृप्त और वर्जित प्यास' से मुक्ति दिला सकता है।

सूरज भावुक हो गया और उसने रोजी को अपने आलिंगन में ले लिया। दोनों प्रेमी एक-दूसरे में समा जाने की कोशिश करने लगे। रोजी अमरबेल की तरह सूरज से लिपटी हुई थी और अपने कानों पर सूरज की सांसों की गर्मी महसूस कर रही थी। तभी सूरज ने उसके चेहरे को खुद से अलग किया और उसके होंठों को चूम लिया। चुंबन की गहराई बढ़ती गई और सूरज पूरे तन-मन से रोजी की पीठ पर अपनी हथेलियाँ फिराता रहा, यहाँ तक कि उसकी हथेलियों ने रोजी के नितंबों का भी जायजा लेने की कोशिश की। रोजी ने कोई प्रतिरोध नहीं दिखाया, अपितु सूरज का यह प्यार देखकर वह पिघल गई थी।

किसी अनजान की आहट से दोनों अलग हुए। पर सूरज का दुर्भाग्य, रोजी जैसी सुंदरी के इस काम-निमंत्रण और अद्भुत आलिंगन के बावजूद उसके लिंग में कोई तनाव नहीं आया।

पर रोजी के इस समर्पण ने सूरज के मन में एक नई ऊर्जा भर दी। वह खुश था, उत्साहित था। उस शाम वे दोनों घंटों तक एक-दूसरे का हाथ थामे बैठे रहे।


अगले रविवार को रोजी का जन्मदिन था। उसने इस दिन को यादगार बनाने के लिए एक साहसी निर्णय लिया। उसने अपनी सहेली के सूने पड़े फ्लैट की चाबियाँ हासिल कीं और सूरज को एक 'एकांत में' मुलाकात का न्योता दे दिया।

सूरज अब जब रोजी को देख रहा था, तो उसकी नजरों में वह बेरुखी नहीं, बल्कि प्यार की वह चमक थी जो अब वासना का रूप लेकर मिलन की पराकाष्ठा प्राप्त करने वाली थी। रोजी के तराशे हुए बदन की कल्पना अब उसे उत्तेजित करने लगी थी, पर लिंग के तनाव का वही हाल था। सूरज ने मन ही मन तय कर लिया था कि वह रविवार को रोजी के प्रेम की गहराई में उतरकर अपनी उन तमाम बेचैनियों को शांत कर देगा जो उसे रात भर जगाए रखती थीं। अब इंतज़ार था तो बस उस 'सुनहरे संडे' का, जहाँ मर्यादा और प्रेम का एक नया संगम होने वाला था।

सूरज के मन का बोझ हल्का हो चुका था। रोजी के निमंत्रण ने जहाँ उसे एक नई राह दिखाई थी, वहीं उसके मन के कोने में छिपा वह डर कि 'क्या वह उस मिलन को पूर्ण कर पाएगा', उसे रह-रहकर कचोट रहा था।


घर पहुँचने के बाद, शाम की हल्की धुंधली रोशनी में जब सोनी मौसी चाय का प्याला लेकर उसके कमरे में दाखिल हुईं, तो उन्होंने सूरज की आँखों में पसरी उस अनजानी चिंता को तुरंत पढ़ लिया।

सोनी ने चाय की मेज पर प्याला रखा और सूरज के करीब बैठते हुए बड़े ही आत्मीय स्वर में पूछा।

सोनी: "क्या बात है सूरज? आज फिर चेहरा लटका हुआ है? कॉलेज से तो तुम बड़े उत्साह में लौटे थे, फिर अचानक ये उदासी कैसी?"

सूरज ने एक ठंडी आह भरी। वह जानता था कि इस दुनिया में सोनी ही वह शख्स है जो बिना कहे उसकी शारीरिक और मानसिक तड़प को समझ सकती है। उसने अपनी हिचक को एक तरफ रखा और अपनी मौसी की आँखों में झाँकते हुए बोला।

सूरज: "मौसी... मैं एक अजीब कशमकश में हूँ। रोजी ने मुझे रविवार को अपने जन्मदिन पर बुलाया है।"

सोनी ने अनजान बनते हुए पूछा, "कौन रोजी?"

सूरज: "अरे मौसी, मेरी दोस्त!"

सोनी (रोजी का चेहरा जेहन में लाते हुए): "अच्छा, वह जो तेरे जन्मदिन पर आई थी? अरे, वह तो एकदम गुड़िया जैसी है। बहुत सुंदर लगती है। वह तुझे पसंद करती है?"

सूरज के चेहरे पर लालिमा छा गई, वह शर्मा गया। सोनी ने सूरज का हाथ पकड़ लिया, परंतु यह ध्यान रखा कि वह अंगूठा उसकी उंगलियों से दूर ही रहे। वह उसकी हथेलियाँ सहलाते हुए बोली, "अरे, मैं तेरी मौसी भी हूँ और दोस्त भी। मुझे शर्माने की जरूरत नहीं है, मुझसे खुलकर अपनी बात बता सकता है।"

सूरज ने सधी हुई जुबान में धीरे से बोला, "मौसी, रोजी ने मुझे अपने जन्मदिन पर एकांत में बुलाया है।"

सोनी: "यह तो खुशी की बात है, सूरज। रोजी तुम्हें बहुत प्यार करती है। इसमें परेशानी की क्या बात है?"

सूरज (बेबसी से जाँघों के बीच इशारा करते हुए): "परेशानी प्यार को लेकर नहीं है मौसी... परेशानी इसे लेकर है।"

सोनी: "सूरज, तूने कहा कि रोजी तुझे एकांत में बुला रही है... पर मुझे ये तो बता कि तू उसके बारे में सोचता क्या है? वह दिखने में कैसी है? मेरा मतलब है, तेरे लिए उसकी सुंदरता के क्या मायने हैं?"

सूरज थोड़ा हिचकिचाया, फिर अपनी यादों की परतों को खोलने लगा। उसकी आँखों में एक चमक सी आ गई।

सूरज: "मौसी, वो... वो बहुत अलग है। उसकी त्वचा एकदम कुंदन जैसी दमकती है। जब वो चलती है, तो ऐसा लगता है जैसे कोई कविता आकार ले रही हो। उसकी आँखें हमेशा कुछ न कुछ कहती रहती हैं, जैसे उनमें कोई गहरा समंदर छुपा हो।"

सोनी ने देखा कि सूरज अब अपनी झिझक छोड़ रहा है। उसने उसकी हथेलियों को सहलाना शुरू किया, जिससे सूरज के भीतर का संकोच और कम होने लगा।

सोनी (मुस्कुराते हुए): "सिर्फ आँखें ही? और क्या अच्छा लगता है तुझे उसमें? आखिर तू एक मेडिकल स्टूडेंट है, तेरी नजर तो पारखी होगी ही।"

सूरज ने गहरी सांस ली और थोड़ा और खुल गया।

सूरज: "मौसी, उसकी गर्दन... बहुत सुराहीदार है। जब वो अपने बाल पीछे करती है, तो उसके कानों के पीछे की वो छोटी सी जगह मुझे बहुत आकर्षित करती है। और उसकी मुस्कुराहट... जब वो हंसती है, तो उसके होंठों की जो बनावट है, वो किसी को भी मदहोश कर दे। मैंने... मैंने उसे लाइब्रेरी के अंधेरे कोने में महसूस किया है, मौसी।"

सोनी (धीमी आवाज़ में): "महसूस किया? मतलब, क्या तूने उसे कभी करीब से छुआ है?"

सूरज अब पूरी तरह सोनी के प्रभाव में था। उसने उन पलों का वर्णन करना शुरू किया जो अब तक उसके सीने में दफन थे।

सूरज: "हाँ मौसी... आज लाइब्रेरी में जब हम अकेले थे, तो उसने मेरा हाथ थामा। उसकी उंगलियाँ मेरी कलाई पर रेंग रही थीं। फिर उसने मुझे चूम लिया। उसके होंठों का स्पर्श इतना कोमल और गर्म था कि लगा जैसे मैं पिघल जाऊँगा। मैंने उसे अपनी बाहों में भरा, उसे कसकर भींचा। मेरा हाथ उसकी पीठ पर था, और फिर धीरे-धीरे... मौसी अब बस…सूरज शर्मा गया।"

सोनी की सांसें थोड़ी तेज हुईं, पर उसने खुद पर काबू रखा और सूरज को और बोलने के लिए उकसाया।

सोनी: "तो फिर? उसने तुझे इतवार को बुलाया है, क्या उसने कुछ साफ़ तौर पर कहा?"

सूरज: "उसने कहा कि वह अपना जन्मदिन मेरे साथ अकेले बिताना चाहती है। उसने एक फ्लैट का इंतजाम किया है। पर मुझे घबराहट हो रही है।"

सोनी…इसमें घबराने की क्या बात है?

सूरज की आवाज़ में अचानक एक भारीपन आ गया। वह उत्साह जो अभी तक झलक रहा था, अब एक गहरी निराशा में बदल गया। उसने सोनी की ओर अपनी बेबस नजरों से देखा।

सूरज: "पर मौसी... यही तो त्रासदी है। जब मैं उसे चूम रहा था, जब मेरी हथेलियाँ उसके जिस्म के उतार-चढ़ाव का जायजा ले रही थीं, जब उसका इतना सुंदर बदन मेरे आलिंगन में था... तब भी मेरे इस नामकूल में कोई हरकत नहीं हुई। मेरा लिंग एकदम बेजान रहा। मुझे ऐसा लगा जैसे मैं अंदर से मर चुका हूँ।"

उसने अपना सिर झुका लिया और सोनी के हाथों को कसकर पकड़ लिया। सोनी ने सूरज के चेहरे को ऊपर उठाया। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक और विजय का भाव था। उसने सूरज के माथे को चूमते हुए उसे सांत्वना दी।

सोनी: "तू फिक्र मत कर मेरे बच्चे। तू उस दिन जाएगा और तू एक 'मर्द' की तरह पेश आएगा। तूने अपनी बात मुझसे कह दी, यही बहुत है। मैं तुझे उस दिन तैयार करके भेजूँगी। मेरा हाथ जब तेरे उस जादुई अंगूठे पर पड़ेगा, तो तेरी रगों में वो आग भरेगी जो पूरे दिन नहीं बुझेगी। तू रोजी को वह तोहफा देगा जो वो कभी नहीं भूल पाएगी।"

सूरज को लगा जैसे उसके ऊपर से कोई बहुत बड़ा बोझ हट गया हो। उसे अपनी मौसी के शब्दों पर अटूट विश्वास था। वह नहीं जानता था कि यह 'उपचार' उसे किस दिशा में ले जा रहा है। सूरज की आँखों में चमक लौट आई। उसे लगा जैसे उसकी डूबती नैया को किनारा मिल गया हो। भावनाओं के आवेग में आकर उसने सोनी को आलिंगन में भरने के लिए हाथ बढ़ाए, लेकिन सोनी ने बड़ी चतुराई और शालीनता से उसे रोक दिया। उन्होंने झुककर उसके माथे पर एक पवित्र चुंबन अंकित किया।

सोनी: "मर्यादा मत भूल सूरज... तेरी खुशी रोजी के साथ है।"

सूरज ने सोनी की चमचागिरी करते हुए कहा

“ मौसी आप तो मेरे लिए भगवान हो मेरी खुशियों की चाभी आपके ही पास है”

अच्छा बच्चू मुझे मस्का लगा रहा है पर मैं पिघलने वाली नहीं हूं । पर हां तुझे रोजी के लिए तैयार कर दूंगी यह मेरा वादा है।

सूरज खुश हो गया और उसका चेहरा खिल उठा।

तभी दरवाजे पर सुगना (सूरज की माँ) की आहट हुई। सूरज के खिले हुए चेहरे और सोनी की मुस्कुराहट को देखकर सुगना का मन भी प्रसन्नता से भर गया। वह अंदर आई और सोनी के कंधे पर हाथ रखते हुए बोली।

सुगना: "अरे वाह! सोनी, तू तो इस लड़के के लिए सच में कोई वरदान जैसी है। कॉलेज से आने के बाद ही इसका चेहरा बुझा हुआ था, और तेरे आते ही जैसे सूरज खिल उठा। कौन सा जादू कर दिया है तूने इस पर?"

सोनी ने तिरछी नजरों से सूरज को देखा और हंसते हुए कहा, "दीदी, जादू-वादू कुछ नहीं... बस इसकी डॉक्टरी की पढ़ाई का तनाव कम कर रही थी। आखिर आपका बेटा बड़ा डॉक्टर जो बनने वाला है!"

सुगना ने सूरज के सिर पर हाथ फेरा। वह इस बात से अनभिज्ञ थी कि पर्दे के पीछे 'अंगूठे' और 'पौरुष' का कौन सा खेल चल रहा है।

शनिवार की दोपहर, कॉलेज की कैंटीन से निकलकर सूरज जब कॉफी शॉप की ओर जा रहा था, उसका मन एक अजीब से भंवर में था। रास्ते भर उसके दिमाग में रोजी का वह 'बार्बी डॉल' जैसा अक्स घूमता रहा। उसने कल्पना की कि कल जब वह उस एकांत फ्लैट में होंगे, तो वह पहली बार रोजी के उन अंगों को देख पाएगा जो अब तक सिर्फ कपड़ों की परतों में छिपे थे।

उसने सोचा कि रोजी की वह मखमली त्वचा, जो सूरज की रोशनी में कुंदन की तरह दमकती है, उसके हाथों के नीचे कैसी महसूस होगी? उसकी कल्पनाओं में रोजी के उभरे हुए वक्ष और उसकी पतली कमर का वह उतार-चढ़ाव एक संगीत की तरह बज रहा था। उसने कल्पना की कि वह रोजी की कुर्ती की डोरी खींच रहा है और वह 'संगमरमर की मूरत' धीरे-धीरे उसके सामने अनावृत हो रही है। रोजी का वह सुगठित और तना हुआ बदन, जो अभी-अभी पूर्ण यौवन की मादकता से भरा था, सूरज की बंद आँखों के सामने नाचने लगा। उसे लगा जैसे वह रोजी के रेशमी बदन पर अपनी उंगलियों से कोई इबारत लिख रहा हो।

कॉफी शॉप के एक कोने में, जहाँ हल्की खुशबू और मंद संगीत का माहौल था, रोजी उसका इंतज़ार कर रही थी। उसने गहरे नीले रंग का सूट पहना था, जिसमें उसका गोरा रंग और भी निखर आया था।

रोजी (धीमी और रसभरी आवाज़ में): "सूरज... कल का दिन मेरे लिए सिर्फ जन्मदिन नहीं है। मैं चाहती हूँ यह दिन हम दोनों के जीवन में यादगार हो। कल ग्यारह बजे... सिर्फ तुम और मैं।"

सूरज ने मेज पर रखी उन चाबियों को देखा। रोजी की आँखों में एक अजीब सी 'प्यास' थी, एक ऐसा निमंत्रण जिसे ठुकराना नामुमकिन था। दोनों ने कल की रूपरेखा तय की—एक-एक पल, एक-एक छुअन की योजना उनके जेहन में पहले ही बन चुकी थी। कॉफी खत्म कर जब वे अलग हुए, तो दोनों के भीतर मिलन की ज्वाला धधक रही थी।

दोनों प्रेमी युगल एक दूसरे के लिए उपहार खरीदने बाजार की तरफ चल पड़े। युवाओं के भी अपनी कल्पनाएं होती हैं सूरज और रोगी ने एक दूसरे के लिए अनोखे उपहार खरीदे उन्हें पैक कराया और लेकर अपने-अपने घर की तरफ चल पड़े।

घर पहुंचने के बाद सोनी सूरज का इंतजार कर रही थी जैसे ही उसने सूरज के हाथ में रंग बिरंगा पैकेट देखा उसने सूरज के हाथों से झटके से छीन लिया और बोला

“अरे वाह….आज पहली बार अपनी मौसी के लिए गिफ्ट लेकर आया”

सूरज ने शर्माते हुए कहा “मौसी यह रोजी के जन्मदिन के लिए है…”

“क्या है इसमें ?मुझे देखना है आखिर देखो तो मेरे सूरज की पसंद कैसी है” सोनी बच्चों की भांति उछल रही थी सूरज उसे रोकना चाह रहा था परंतु सोनी मानने को तैयार नहीं थी।

आखिरकार सूरज ने अपनी सहमति दे दी और सोनी ने वह अनोखा पैकेट खोल दिया…वह उपहार सचमुच लाजवाब था…

सूरज की पसंद और कल्पनाएं लाजवाब थी…सोनी को सूरज पर गर्व हो रहा था…. सूरज अब जवान हो चुका था और उसकी भावनाएं भी..

रविवार की सुबह सूरज के लिए किसी परीक्षा से कम नहीं थी। वह तैयार तो था, पर मन के किसी कोने में वही 'बेजान' होने का डर उसे खाए जा रहा था। तभी सोनी मौसी उसके कमरे में आईं। आज उनकी आँखों में एक अलग ही अधिकार और आत्मविश्वास था।

सोनी: "सूरज, तू घबरा क्यों रहा है? मैंने कहा था न, तू आज एक विजेता की तरह जाएगा।"

उन्होंने सूरज के पास आकर उसका दाहिना हाथ अपने हाथों में लिया। सोनी की हथेलियाँ बेहद नर्म और गर्म थीं। उन्होंने सूरज के हाथ के अंगूठे को अपनी उंगलियों से सहलाने लगीं।

हमेशा की तरह सूरज के लिंग में तनाव भरने लगा। सूरज के पेट का उभार कुछ ज्यादा ही दिखाई पड़ने लगा और सूरज को बेचैनी महसूस होने लगी। सोनी ने शायद अंगूठे को कुछ ज्यादा ही सहला दिया..

मौसी बस “फट जाएगा… बहुत ज्यादा हो गया सूरज अपने पेंट को आगे पीछे कर उसे तने हुए लंड को अपने पेट में व्यवस्थित करने की कोशिश करने लगा पर उसे अब भी परेशानी हो रही थी।

सोनी सूरज के चेहरे पर तनाव महसूस कर रही थी शायद उसके लिंग में तनाव हद से ज्यादा हो गया था..

सोनी ने सूरज की तरफ देखकर उसे अपनी आंखें बंद करने के लिए कहा और पेट की जिप खोलकर उसे तने हुए लंड को बाहर निकाल लिया। बात सच थी सूरज का लिंग सामान्य से कहीं ज्यादा तना हुआ और बेहद बड़ा दिखाई पड़ रहा था…

रोजी अभी-अभी जवानी की दहलीज पर कदम रखी थी और अब तक कुंवारी थी। इस अवस्था में इस विशाल लंड को आत्मसात कर पाना उसके लिए असंभव था। सोनी को अपने पुराने दिन याद आ रहे थे जब उसे अपने पति विकास का छोटा सा लंड भी बहुत बड़ा दिखाई पड़ता था और उसे अपनी जांघों के बीच पनाह देने में ही उसके पसीने छूट जाते थे।

आखिरकार सोनी ने एक बार फिर अपने होंठ गोल किए और सूरज के लंड का तनाव गायब कर दिया और फिर पुनः उसके अंगूठे को प्यार से सहलाते हुए उसमें तनाव भरा पर आवश्यकता के अनुसार..

अब तक सूरज अपनी आंखें खोल चुका था.. उसने सोनी का हाथ पकड़ लिया और बोला मौसी बस वो अभी बच्ची जैसी है ज्यादा होने पर तकलीफ हो सकती है…

सोनी मुस्कुरा उठी उसे यह देखकर अच्छा लगा कि सूरज को रोजी की चिंता है और वह वासना में डूबा हुआ वहशी नहीं है..

सोनी ने सूरज का अंगूठा तो छोड़ दिया पर सूरज के तने हुए लंड को अपनी कोमल उंगलियों से सहलाते हुए बोली..बेस्ट ऑफ लक

सूरज खुश हो गया उसने अपने तने हुए लंड को पैंट के अंदर किया.. और सोनी को अपने आलिंगन में भरता हुआ बोला..

मौसी थैंक यू…

सोनी ने सूरज को उसका गिफ्ट पकड़ाते हुए कहा" अब जा... रोजी तेरा इंतज़ार कर रही है। आज उसे वो सुख देना पर प्यार से । मेरा आशीर्वाद और ये 'जादू' तेरे साथ है

सूरज जब उस फ्लैट पर पहुँचा, तो उसका आत्मविश्वास सातवें आसमान पर था। रोजी ने दरवाजा खोला। वह गुलाबी पारभासी (translucent) नाइटी में किसी अप्सरा जैसी लग रही थी। उसके बदन की खुशबू और उस लिबास की झलकी ने सूरज के भीतर के 'सोए हुए शेर' को झकझोर दिया।

बिना कुछ कहे, सूरज ने रोजी को अपनी बाहों में भर लिया। आज उसका आलिंगन कमजोर नहीं था। रोजी ने सूरज की जांघों के बीच की गर्मी को महसूस किया वह बेहद प्रसन्न हो गई।

रोजी: "सूरज... तुम... आज तो पूरे मूड में हो?"

सूरज ने उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। उसकी हथेलियाँ रोजी की चिकनी पीठ पर रेंगने लगीं और धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ते हुए उन मांसल नितंबों को भींचने लगीं। रोजी ने अपनी आँखें मूंद लीं। उसे यकीन हो गया था कि आज सूरज उसे उस चरम सुख की दहलीज के पार ले जाएगा जिसका वादा उसने खुद से किया था।

सूरज को महसूस हुआ कि मौसी के उस 'अंगूठे वाले उपचार' ने अपना काम कर दिया है। उसकी रगों में दौड़ती आग अब रोजी की कसी हुई जवानी को पिघलाने के लिए तैयार थी।


शेष अगले भाग में

कृपया अपडेट पढ़ने के बाद अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें यदि लिखने पढ़ने में दिक्कत है तो हमारी महिला पाठकों के लिए सूरज के खूबसूरत लिंग की तस्वीर साझा करे... उसे यदि उसे सोनी द्वारा चूमते हुए दिखा सकते हैं तो अति उत्तम..


पर शांत मत बैठिएगा मुझे आप सबका इंतजार रहता है...
 
167 के लिए शानदार अपडेट अति उत्तम यह सब लिखने से काम नहीं चलेगा

अपने मन में चल रही सोनी की एक पिक्चर भेजनी होगी
 
अरे वाह आपकी कल्पना तो आपके DP जैसी खूबसूरत है। यू ही कुछ लिखते पढ़ते रहिए ....कुछ भेजते रहिए
 
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