Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 124 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

लिंग का तनाव गायब हुआ लिंग नहीं.....
 
समय बड़ा बलवान समय का इंतजार कीजिये... धीमी आंच पर पैक पकवान मीठे होते हैं सूरज और सोनी के बीच की आँच को और दहकने दीजिए
 
अरे आपकी रोजी तो अंग्रेजन है...

बाकी पाठक लगता है सो गए हैं या उन्हें पढ़ने का समय नहीं मिल पा रहा है।।। अपडेट कुछ जल्दी-जल्दी तो नहीं आ रहे हैं?
 
भाग 170

सूरज ने उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। उसकी हथेलियाँ रोजी की चिकनी पीठ पर रेंगने लगीं और धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ते हुए उन मांसल नितंबों को भींचने लगीं। रोजी ने अपनी आँखें मूंद लीं। उसे यकीन हो गया था कि आज सूरज उसे उस चरम सुख की दहलीज के पार ले जाएगा जिसका वादा उसने खुद से किया था।

सूरज को महसूस हुआ कि मौसी के उस 'अंगूठे वाले उपचार' ने अपना काम कर दिया है। उसकी रगों में दौड़ती आग अब रोजी की कसी हुई जवानी को पिघलाने के लिए तैयार थी।

अब आगे..

फ्लैट के भीतर का माहौल किसी स्वप्नलोक जैसा था। रोजी ने कमरों को मद्धम पीली रोशनी और मोगरे के फूलों की महक से महकाया हुआ था।

रोजी ने उसे फ्लैट को बड़ी मेहनत से इस अदभुत मिलन के लिए तैयार किया था।


योजना के अनुसार, दोनों ने एक-दूसरे के दिए हुए 'विशेष वस्त्रों' के पैकेट थामे और अलग-अलग कमरों में चले गए। यह उनके मिलन की पहली औपचारिक रस्म थी—एक-दूसरे की पसंद में खुद को ढालना।

जब सूरज ने रोजी द्वारा दिए गए पैकेट को खोला, तो उसके भीतर मलमल की एक बेहद महीन सफेद धोती और वैसा ही एक अंगवस्त्र (stole) था। रोजी चाहती थी कि उसका प्रेमी किसी आधुनिक लड़के जैसा नहीं, बल्कि किसी प्राचीन कामदेव जैसा प्रतापी और पौरुष से भरा दिखे। सूरज ने पैकेट में अपने अंतर वस्त्र को ढूंढा पर शायद रोगी ने उसे पैकेट में जानबूझकर वह नहीं रखा था। आखिरकार सूरज को बिना अंडरगारमेंट्स के ही धोती पहनी पड़ी। बिना किसी सहारे के, उसका सुगठित तना हुआ लंड उस झीनी धोती के नीचे अपनी पूरी मर्दानगी के साथ आज़ाद था।

दूसरी ओर, रोजी ने सूरज का दिया हुआ पैकेट खोला .. पैकेट में सिर्फ एक सफेद कुर्ता था वह भी बेहद झीना। ना कोई पेंट ना कोई ब्रा ना पैंटी। रोजी ने मन ही मन सूरज की कामुकता को सराहा पर वह शर्म से पानी पानी हो रही थी। यह कुर्ता इतना बारीक था कि उसकी त्वचा का हर पोर उससे झाँक रहा था। इसमें कोई बटन नहीं थे, बस सामने से दो परतें थीं जो उसकी छाती के उभारों से होती हुई नीचे उसकी जाँघों के जोड़ तक आ रही थीं। रोजी ने खुद को आईने में देखा तो एक तरफ उसे उसकी नग्नता दिखाई पड़ी परंतु दूसरी तरफ वह ईश्वर को धन्यवाद करती नजर आ रही थी कि उसे भगवान ने इतनी सुंदर काया दी थी जो इस सफेद झीने ने कुर्ते में और भी मादक लग रही थी।

ठीक ग्यारह बजे, दोनों कमरों के दरवाजे एक साथ खुले। हॉल के बीचों-बीच जब दोनों की नज़रें मिलीं, तो वक्त जैसे ठहर गया।

सूरज एक टक रोजी के इस अद्भुत रूप को देखे जा रहा था उसकी निगाहें रोजी के मासूम चेहरे से उसकी छाती के के ऊपर उसकी तनी हुई चूचियों और सपाट पेट से होती हुई जांघों के जोड़ पर पहुंच रही थी। उसका दिया हुआ सफेद कुर्ता रोजी की मादक काया को दीक्षा ज्यादा रहा था छुपा कम।

परंतु जांघों के जोड़ पर रोजी उसे झीने ने कुर्ते के किनारो को अपनी मुट्ठी से पकड़ी हुई थी और अपने अमृत कलश के ऊपर एक मुट्ठी का आवरण दी हुई थी सूरज की निगाहें रोजी की नंगी जांघों पर पड़ी. कितनी सुंदर कितनी बेदाग और कितनी चिकनी जांघें थी रोजी की…सूरज के मुंह से एक मीठी आह निकल गई वह ईश्वर से उसे रोजी को उसकी झोली में डालने के लिए कृतज्ञता जाहिर कर रहा था।

रोजी साक्षात कुंदन की मूरत लग रही थी। कुर्ते में बटन न होने के कारण, उसने अपने दोनों हाथों से सामने की परतों को कसकर पकड़ा हुआ था, ताकि उसकी कुंवारी योनि और वक्षों का उतार-चढ़ाव पूरी तरह नुमाया न हो सके । लाज और शर्म से उसकी पलकें झुकी हुई थीं, और उसके गालों पर गुलाबी रंगत तैर रही थी। वह अपनी पवित्रता और कामुकता के बीच एक सुंदर संतुलन बनाए हुए थी।

जब रोजी ने धीरे से अपनी नजरें ऊपर उठाईं, तो उसके सामने 'सूरज' नहीं, बल्कि पौरुष का साक्षात अवतार खड़ा था। धोती की सिलवटें उसके सुगठित पैरों और मजबूत जाँघों को उभार रही थीं। उसका चौड़ा सीना और कसरती कंधे अंगवस्त्र के नीचे से अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहे थे।

लेकिन रोजी की निगाहें जैसे ही सूरज की कमर के नीचे टिकीं, उसकी सांसें अटक गईं। धोती के पतले आवरण के भीतर, सूरज के लिंग का अप्रत्याशित उभार किसी पहाड़ की चोटी की तरह साफ़ दिखाई दे रहा था। अंतर्वस्त्र न होने के कारण, वह भुसावली केले की तरह तना हुआ धोती को फाड़कर बाहर आने को बेताब लग रहा था। रोजी को यकीन नहीं हो रहा था कि यह वही सूरज है जो कल तक 'बेजान' होने की शिकायत कर रहा था। सोनी मौसी का वह जादुई स्पर्श और रोजी के प्रति उसकी दबी हुई वासना ने उसे उत्तेजना से भर दिया था।

सूरज की आँखों में एक अजीब सी चमक थी—जैसे किसी प्यासे को मीठे पानी का झरना मिल गया हो। वह धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए रोजी के पास पहुँचा। रोजी शर्म के मारे और सिमट गई, उसने कुर्ते की परतों को और मजबूती से पकड़ लिया।

सूरज (गहरी और भारी आवाज़ में): "रोजी... तुम आज सिर्फ सुंदर नहीं, तुम एक ईश्वरीय वरदान जैसी लग रही हो।"

सूरज ने अपने मजबूत हाथ रोजी की कमर पर रखे और उसे धीरे से अपनी ओर खींचा। जैसे ही रोजी का कोमल बदन सूरज के फौलादी सीने से टकराया, दोनों के मुंह से एक साथ आह निकली।

रोजी ने जैसे ही आलिंगन में खुद को ढीला छोड़ा, उसके पेट के निचले हिस्से पर सूरज के लिंग का जबरदस्त तनाव महसूस हुआ। वह कोई मामूली छुअन नहीं थी; ऐसा लग रहा था जैसे कोई गर्म दहकता हुआ अंगारा उसके कुंवारेपन की दहलीज पर दस्तक दे रहा हो। रोजी का रोम-रोम खिल उठा। उसके भीतर एक अजीब सी सनसनी दौड़ गई, जिसने उसके घुटनों को कमजोर कर दिया।

सूरज ने उसके कान के पास झुककर फुसफुसाया, "महसूस कर रही हो? ये उत्साह सिर्फ तुम्हारे लिए है।”

रोजी ने अपनी पकड़ कुर्ते से ढीली कर दी और अपने हाथ सूरज के चौड़े कंधों पर रख दिए। वह झीना कुर्ता अब खुल चुका था, और सूरज की धोती और रोजी के बदन के बीच अब कोई पर्दा नहीं बचा था। सूरज की हथेलियाँ अब रोजी के नितंबों की गोलाई को अपने शिकंजे में कसने लगी थीं, और रोजी ने अपना सिर सूरज के कंधे पर टिका दिया, यह जानते हुए कि आज वह पूरी तरह से उसकी होने वाली है।

सोनी मौसी का दिया हुआ आत्मविश्वास और रोजी का यह अद्भुत समर्पण अब एक ऐसी आग में बदलने वाला था, जिसकी तपन वे दोनों उम्र भर नहीं भूलने वाले थे।

बिस्तर की मखमली चादर पर बैठते ही, रोजी के भीतर की झिझक और जिज्ञासा के बीच एक युद्ध छिड़ गया। सूरज ने उसके नाजुक हथेली की अपनी धोती की गांठ पर लाकर उसे खोलने का इशारा किया। रोजी ने अपनी कांपती उंगलियां सूरज की मलमल की धोती की गांठ की ओर बढ़ाईं। जैसे ही उसने उस गांठ को सरकाया, वह बारीक कपड़ा सरक कर नीचे गिर गया।

रोजी की आँखें विस्फारित हो गईं। उसके सामने सूरज की मर्दानगी अपनी पूरी भव्यता और उग्रता के साथ अनावृत थी। पहली बार किसी पुरुष अंग को इतनी निकटता से और इस प्रचंड अवस्था में देखकर रोजी के हलक में जैसे जान अटक गई।

सूरज का वह अंग तना हुआ और सख्त था। उसकी जड़ें इतनी मजबूत थीं कि ऐसा लग रहा था मानो वे सीधे सूरज के हृदय की धड़कनों से ऊर्जा खींच रही हों। ऊपर की ओर बढ़ता हुआ वह अंग गहरा लाल और बैंगनी रंगत लिए हुए था, जिस पर नीली नसें किसी बेल की तरह लिपटी हुई थीं, जो उसमें दौड़ते हुए गर्म खून की गवाही दे रही थीं।

अंग का अग्रभाग (Glans) एक चिकने और चमकीले मुकुट की तरह था, जहाँ से काम-रस की एक नन्हीं सी बूंद छलकने को बेताब थी। रोजी ने मन ही मन सोचा, "क्या कुदरत ने पुरुष को इतना शक्तिशाली और इतना सुंदर बनाया है? यह अंग तो किसी हथियार की तरह कठोर है, पर इसकी त्वचा रेशम जैसी मुलायम दिख रही है।"

रोजी ने हिम्मत जुटाई और अपनी कोमल, मखमली हथेली को धीरे से उस गर्म अंग पर रखा। स्पर्श होते ही उसके पूरे शरीर में बिजली की एक लहर दौड़ गई। वह अंग इतना गर्म था जैसे किसी बुखार से तप रहे व्यक्ति का सर। रोजी डॉक्टरी की पढ़ाई कर रही थी उसका दिमाग भी डॉक्टर की तरह ही चल रहा था। उसने अपनी उंगलियों को उस सख्त लंबाई पर धीरे-धीरे फेरना शुरू किया।

"सूरज... बाप रे इतना सख्त…?" रोजी के स्वर में भय और रोमांच का एक अद्भुत मिश्रण था।

सूरज ने गहरी सांस ली और अपना सिर पीछे की ओर झुका लिया। रोजी की हथेलियों का वह कोमल घर्षण उसे पागल कर रहा था। रोजी अब और भी साहसी हो गई थी। उसने अपनी मुट्ठी में उस वज्र जैसे अंग को भरा और उसे ऊपर-नीचे सहलाने लगी। उसे महसूस हुआ कि जैसे-जैसे वह सहला रही है, वह अंग और भी ज्यादा तनता जा रहा है, मानो वह रोजी की कोमलता को चीरकर बाहर आना चाहता हो।

रोजी की उंगलियों का वह जादुई स्पर्श सूरज के संयम की हर दीवार को ढहा रहा था। जैसे-जैसे रोजी का साहस बढ़ता गया, उसकी हरकतें और भी अधिक लयबद्ध और गहरी होती गईं। वह न केवल अपनी हथेलियों से, बल्कि अपनी भावनाओं से भी सूरज को महसूस कर रही थी।

सूरज की सांसें अब अनियंत्रित हो चुकी थीं। कमरे की हवा में एक अजीब सी गर्माहट और भारीपन छा गया था। रोजी ने जब उसे अपनी गिरफ्त में लेकर धीरे-धीरे सहलाना शुरू किया, तो सूरज को लगा जैसे उसके शरीर का सारा रक्त एक ही दिशा में बहने लगा है।


उसने अपनी उंगलियों के पोरों से उस गर्मी को कुरेदना शुरू किया, जिससे सूरज के मुंह से एक दबी हुई आह निकल गई।

उसने मजबूती से बिस्तर की चादरों को जकड़ लिया, उसकी गर्दन की नसें खिंच गई थीं और उसका पूरा अस्तित्व बस रोजी के उन कोमल हाथों के स्पर्श पर टिक गया था।

जैसे-जैसे रोजी के हाथों की हरकतें बढ़ीं, कमरे का सन्नाटा सूरज की भारी होती सांसों से भरने लगा। रोजी ने अपनी आंखें बंद कर लीं और पूरी तरह से उस अहसास में डूब गई। उसकी मखमली त्वचा और सूरज की उस कठोर गर्माहट के बीच का घर्षण एक ऐसी आग पैदा कर रहा था, जिसे अब बुझाना नामुमकिन था।

रोजी एक बच्चे की तरह उसे अद्भुत खिलौने से खेल रही थी जो उसकी जवानी का पहला खिलौना था। आज से पहले जब भी उसने सूरज के लिंग को महसूस किया था वह एक सभ्य सौम्य और हमेशा झुका हुआ प्रतीत होता था पर आज तो जैसे वह रोजी की जवानी को सलामी दे रहा था।

रोजी ने अब अपनी उंगलियों का दबाव थोड़ा और बढ़ाया और एक विशेष लय (rhythm) के साथ उसे सहलाने लगी। सूरज का पूरा शरीर पसीने की बारीक बूंदों से चमकने लगा था। वह कभी अपनी मुट्ठी को कसती, तो कभी धीरे से उसे ढीला छोड़ देती, जैसे वह सूरज के सब्र का इम्तहान ले रही हो।

सूरज अब और सहन नहीं कर पा रहा था। उसने अपने दोनों हाथ पीछे टिका दिए और अपनी पीठ को हवा में धनुष की तरह मोड़ लिया। उसके गले से निकलने वाली सिसकियाँ अब गहरी कराहों में बदल चुकी थीं।

रोजी ने महसूस किया कि जैसे-जैसे वह ऊपर-नीचे सहला रही है, उसकी मुट्ठी में कैद वह अंग धड़कने लगा है। वह अब और भी ज्यादा सख्त और गर्म हो चुका था, जैसे फटने को तैयार कोई ज्वालामुखी हो।

अचानक, सूरज के शरीर में एक बिजली सी कौंधी। उसने रोजी की कलाई को मजबूती से पकड़ लिया, मानो उसे रुकने या और भी तेज करने का इशारा कर रहा हो। रोजी ने उसकी आँखों में देखा, जहाँ जुनून और समर्पण का एक गहरा समंदर था।

अगले ही पल, सूरज के मुंह से एक लंबी, थकी हुई लेकिन संतोषजनक आह निकली। उसके शरीर के हर अंग ने एक साथ जवाब दे दिया। रोजी और सूरज के बीच का वह पल अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुका था। रोजी ने अपनी पूरी कोशिश की कि वह उस वेग को अपनी मुट्ठी में थाम ले, लेकिन प्रकृति के उस सैलाब को रोकना उसकी कोमल कलाइयों के बस की बात नहीं थी।

जैसे ही सूरज का शरीर पूरी तरह से तना, उसके भीतर संचित सारी ऊर्जा एक तीव्र विस्फोट के साथ बाहर निकलने लगी। रोजी ने उस सख्त और थरथराते हुए अंग को अपनी हथेली में और भी मजबूती से जकड़ने की कोशिश की, ताकि वह उस हलचल को संभाल सके, लेकिन वीर्य का वेग इतना प्रबल था कि वह बार-बार उसकी उंगलियों की पकड़ से छिटकने को आतुर था।


वह धार इतनी शक्तिशाली थी कि वह सीधा ऊपर की ओर उठी, मानो कमरे की छत को छू लेना चाहती हो। रोजी अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से उस अद्भुत नज़ारे को देख रही थी।

वह गर्म और सफेद धार कभी रोजी के गुलाबी गालों को भिगोती, तो कभी उसके कुर्ते के खुले गले से फिसलती हुई उसकी अर्ध-नग्न छाती के उतार-चढ़ाव पर जा गिरती। कुछ बूंदें उसकी जांघों पर बिखरीं, तो कुछ खुद सूरज के पेट पर गिरकर उसकी त्वचा को गर्माहट से भर गईं।

रोजी के चेहरे पर एक शरारती और संतोषजनक मुस्कान थी। वह थकी नहीं थी, बल्कि इस अद्भुत स्खलन की साक्षी बनकर रोमांचित थी। उसने देखा कि कैसे सूरज की आँखें बंद हैं और उसका चेहरा आनंद के एक ऐसे शिखर पर है जहाँ शब्द छोटे पड़ जाते हैं। सूरज उस वक्त जैसे इस दुनिया से परे, आनंद के एक गहरे सागर में गोते लगा रहा था, जहाँ सिर्फ सुकून और तृप्ति थी।

जब अंततः वह हलचल शांत हुई, तो कमरे में सिर्फ उन दोनों की तेज़ चलती सांसों की आवाज़ गूँज रही थी। रोजी ने धीरे से सूरज के सीने से उसके वीर्य को अपनी उंगलियों पर लिया और उसे अपनी तर्जनी और अंगूठे के बीच मसर उसकी चिकनाई को महसूस किया आज पहली बार वह अपने किताबी ज्ञान को हकीकत का जामा पहनाया था और वह हर अनुभव को प्राप्त कर लेना चाहती थी।

सूरज और रोजी के बीच का वह एकांत क्षण अब एक ऐसी पराकाष्ठा पर था, जहाँ शरीर और आत्मा की दूरियाँ मिट चुकी थीं। सूरज ने एक गहरी और तृप्त सांस ली और रोजी को अपनी बांहों के घेरे में कस लिया। उसके बदन पर बिखरा वह चिपचिपा और गर्म वीर्य उनके मिलन की जीवंत गवाही दे रहा था।

रोजी के खूबसूरत बदन पर उसके वीर्य की बूंदे चमक रही थी। सूरज ने अपनी मजबूत हथेलियों से रोजी के शरीर को पोंछने की कोशिश की, लेकिन तभी उसकी उंगलियां रोजी के अर्ध-खुले वक्ष की कोमलता से टकरा गईं।

वे कुंवारी नग्न चूचियाँ, जो अब तक किसी भी स्पर्श से अनभिज्ञ थीं, सूरज की वीर्य से सनी हथेलियों के नीचे मखमल की तरह महसूस हो रही थीं। सूरज ने अपनी उन्हीं गीली हथेलियों से उन कोमल उभारों को धीरे-धीरे सहलाना शुरू कर दिया। वीर्य की वह फिसलन भरी परत रोजी की त्वचा पर फैल गई, जिससे स्पर्श और भी अधिक कामुक और गहरा हो गया।


पहली बार किसी पुरुष का नग्न और अधिकारपूर्ण हाथ अपनी छाती पर महसूस कर रोजी के शरीर में सिहरन दौड़ गई। उसकी उत्तेजना बढ़ती गई, और उसकी सांसें सूरज के चेहरे पर गर्म हवाओं की तरह टकरा रही थीं। सूरज उन कोमल उभारों की नरमी में खोया हुआ था, मानो वह दुनिया के सबसे खूबसूरत अहसास को अपनी मुट्ठी में कैद कर लेना चाहता हो।

अगले ही पल, सूरज ने रोजी को बड़े प्यार से उठाकर अपनी गोद में बैठा लिया। रोजी की टांगें सूरज की कमर के दोनों ओर थीं। सूरज की हथेलियां अभी भी उन चूचियों को सहलाने और उनके आकार को महसूस करने में व्यस्त थीं। इसी बीच, रोजी को अपनी जांघों के बीच एक परिचित और सख्त हलचल महसूस हुई।

सूरज का वह वज्र जैसा अंग, जो स्खलन के बाद भी अपनी गरिमा और अकड़ बनाए हुए था, रोजी की कोमल जांघों से टकराकर उसे चुनौती दे रहा था। रोजी ने अपनी जांघों को थोड़ा और फैलाया, जिससे वह तना हुआ अंग एक बार फिर बाहर निकल आया और रोजी की नज़रों के सामने अपनी मौजूदगी दर्ज कराने लगा।

रोजी ने विस्मय और उत्सुकता भरी नज़रों से उसे देखा और सूरज से पूछा—

"अरे... यह तो अब भी वैसे ही तना हुआ है? क्या इसे थकान नहीं होती?"

सूरज के चेहरे पर एक मदहोश कर देने वाली मुस्कान तैर गई। उसने झुककर रोजी के गुलाबी गालों पर एक लंबा और गहरा चुंबन अंकित किया और फुसफुसाते हुए बोला—

"तुम्हारी खूबसूरती और इस कातिल आगोश में आकर भला यह कैसे सो सकता है ?"

रोजी मुस्कुरा उठी, उसका रोम-रोम अब पूरी तरह जागृत हो चुका था। उसने एक बार फिर उसकी सुपारी जैसे अग्रभाग को छूने के लिए हाथ बढ़ाया, लेकिन वह हिस्सा अब अत्यधिक संवेदनशील हो चुका था। सूरज ने तुरंत उसका हाथ थाम लिया और प्यार भरी झिड़की देते हुए बोला—

"अरे... थोड़ा तो आराम करने दो इसे। अभी इसे तुम्हारी बहुत सेवा करनी है, और मुझे भी तुम्हें खुशियों के उस मुकाम तक ले जाना है जहाँ अब से कुछ देर पहले तुमने मुझे पहुंचाया था।

रोजी का चेहरा शर्म से लाल हो गया…


वह उस मजबूत लिंग अपनी अनछुई और कुवारी बुर में जाते सोच कर सिहर उठी…

तभी रोजी को अपने उस 'सरप्राइज' का ख्याल आया जो उसने इस मिलन की खुशी में मनाने के लिए रखा था। वह बड़ी अदा से सूरज की गिरफ्त से बाहर निकली। यद्यपि सूरज का रोम-रोम उसे अपनी बाहों में कैद रखना चाहता था, पर रोजी की उस शरारती मुस्कान ने उसे मंत्रमुग्ध कर दिया। वह उठी और रसोई की ओर उसे केक को लेने बढ़ गई जो उसने अपने और सूरज के पहले मिलन के उत्सव को मनाने के लिए लिए लाया था।

रोजी जब केक लेकर वापस कमरे की ओर आ रही थी, तो दृश्य किसी अप्सरा के आगमन जैसा था। उसके बदन पर अब भी वह सफेद झीना कुर्ता था, लेकिन अब वह शर्म की बंदिशों से आजाद हो चुकी थी। सूरज की निगाहें उसके चेहरे से फिसलती हुई उसकी जाँघों के उस संधि स्थल पर जाकर टिक गईं, जहाँ रोजी की जवानी का सबसे गहरा राज छुपा था।

कुर्ते की झीनी परत के नीचे से रोजी की बेदाग, गोरी जाँघें किसी तराशे हुए संगमरमर की तरह चमक रही थीं। जाँघों के जोड़ पर, जहाँ उसकी कुंवारी योनि का वास था, वहाँ एक बारीक गुलाबी रेखा जैसा चीरा दिखाई दे रहा था। सूरज उस दृश्य को देखकर सुध-बुध खो बैठा। रोजी ने जब सूरज की प्यासी निगाहों को अपनी कली पर टिका देखा, तो उसने केक के डिब्बे को थोड़ा नीचे कर लिया, मानो उस अनमोल खजाने को सूरज की नज़रों की तपिश से बचा रही हो।

रोजी बिस्तर पर आई और सूरज के बिल्कुल सामने पालथी मारकर बैठ गई। उसने केक को उनके बीच के अंतराल में रखा। पालथी मारकर बैठते ही, रोजी यह भूल गई कि कुर्ते का वह झीना घेरा अब खिंच चुका है। जउसकी जाँघों के बीच छुपी वह कुंवारी 'बुर' (योनि) अपने पंखुड़ी जैसे होंठ खोल चुकी थी।

सूरज की आँखों के ठीक सामने अब वह दृश्य था जिसे देखने के लिए वह बरसों से तड़प रहा था। वह योनि किसी सुनहरे फल के बीच लगे एक गहरे, गुलाबी कट की तरह दिख रही थी—एकदम साफ, बेदाग और कुंवारी। उस कली की मासूमियत और उसकी बनावट इतनी सुंदर थी कि सूरज केक का चाकू थामे हुए भी जड़वत हो गया।

रोजी (शरमाते हुए): "तुम बहुत बदमाश हो गए हो सूरज! केक काटने पर ध्यान लगाओ, मेरी... मेरी तरफ मत देखो।"

सूरज ने मदहोशी में सिर हिलाया, पर उसकी आँखें उस गुलाबी दरार से हट ही नहीं रही थीं। रोजी ने तुरंत स्थिति को भाँपा और वज्रासन की मुद्रा में बैठ गई, जिससे उसकी जाँघें आपस में जुड़ गईं और वह सुंदर दृश्य ओझल हो गया।

सूरज ने केक का प्लास्टिक वाला चाकू पकड़ा और रोजी ने अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया। जैसे ही चाकू ने केक की मुलायम सतह को छुआ, दोनों की धड़कनें एक लय में आ गईं। यह केवल केक काटना नहीं था, बल्कि उनके कौमार्य भंग होने के मार्ग पर पहला कदम था।

केक का एक टुकड़ा काटकर रोजी ने बड़े प्यार से सूरज के मुँह के करीब लाया। लेकिन इससे पहले कि सूरज उसे खाता, रोजी ने अपनी उँगलियों पर लगी क्रीम को सूरज के होंठों पर मल दिया। सूरज ने अपनी जुबान से उन होंठों को साफ़ किया और फिर रोजी की उन क्रीम से सनी उँगलियों को अपने मुँह में ले लिया।

सूरज (भारी आवाज़ में): "केक मीठा है... पर तुम्हारी उँगलियों का स्वाद इससे कहीं ज़्यादा नशीला है।"

रोजी का चेहरा लज्जा से सिंदूरी हो उठा। उसे याद आया कि अब से कुछ देर बाद, वह मजबूत लिंग उसकी उस कुंवारी कली की गहराई नापने वाला है। उस विचार मात्र से उसकी जाँघों के बीच एक अनजानी नमी और सिहरन दौड़ गई। सूरज अब केक को भूल चुका था। उसने अपनी क्रीम लगी उँगलियों को रोजी के कुर्ते के भीतर सरकाया और उसके चुचियों के निप्पल पर की तनी हुई चोटी पर उस ठंडक को लपेट दिया।

रोजी के मुँह से एक दबी हुई सिसकारी निकली।

अरे बहुत ठंडा है….सोनी चिहुंक उठी।

सूरज ने एक पल भी देर नहीं की…. उसने झुक कर रोजी के उसे क्रीम से लिपटे हुए निप्पल को अपने गम होठों से चूस लिया…और एक पल के लिए अपना होंठ उससे अलग करते हुए और रोजी की आंखों में देखते हुए बोला अब ठीक है…

रोजी शर्म से पानी पानी हो रही थी उसने सूरज के सर को खुद से अलग करने की कोशिश की परंतु सूरज रोजी की चूचियों पर लगे क्रीम का आनंद लेने लगा.. रोजी की अधखिली चूचियां सूरज की उत्तेजना को बढ़ा रही थी और उसके होठों में मिठास खोल रही थी..


कमरे में अब केक की मिठास और वासना की गर्माहट एक दूसरे में घुल रही थी। उत्सव की यह शुरुआत अब उस अंतिम अध्याय की ओर बढ़ रही थी, जहाँ सूरज और रोजी एक दूसरे में विलीन होने वाले थे।

नियति इस प्रेमी युगल को देखकर मोहित हो रही थी पर वह मजबूर थी..

शेष अगले भाग में
 
मुझे भी आगे लिखने का मन कर रहा है पर क्या लिखूँ समझ नही आ रहा है
 
सोनी और सूरज का मिलन अभी धीमीआंच में पक रहा है
 
बहुत-बहुत धन्यवाद आप कहानी को मन लगाकर पढ़ते हैं यह अच्छी बात है।

मैंने वह गलती करेक्ट कर दी है।
 
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