रिस्तोमे प्यारकी अनुभुती
अध्याय - १५३
कहातो देवायतने मंजुके होठोको चुमलीया.. तो मंजु सरमा गइ.. ओर जटसे आजु बाजुकी ओर देखकर देवायतको हसते हुअे अेक मुका जड दीया.. ओर देवायतको कारमे बेठते उनको कामुक नजरोसे देखते मुस्कुराती रही.. फीर देवायत कार लेकर नीकल गया.. तो मंजुभी घरके अंदर आगइ.. ओर नीर्मला भुमीकाके पास जाकर बैठ गइ.. जब भुमीने चाइ नास्ता करलीया तो सब लोग राजीवके पास बैठकर गप्पे लगाने लगे....अब आगे
तब इस गांवसे दुर लता ओर रमाभी अपने अपने कमरेमे आराम कर रही थी.. तब लताको लखनसे ज्यादा देवायतकी याद सता रही थी.. उनकी सादीसे पहेले वो कैसे देवायतके साथ बीन्दास्त बाते ओर उनकी मस्तीया कीया करती थी.. ओर सादीकी खरीदी करके घर आते वक्त वो कैसे देवायतके साथ नैन मटक कर रहीथी.. उसीके बारेमे सोचते लता अकेली ही अपने रुममे आराम करते मंद मंद सरमाते मुस्कुरा रही थी..
तो दुसरी ओर रमाभी बडी असंमजमे फसी हुइथी.. अेक तो लखनने पहेलेसेही रमाके दिलपे कब्जा करलीया था.. वो सारा दिन उसीके बारेमे सोचती रहेती थी.. ओर जबसे लताने उसे लखनसे बात करनेको कहाथा तबसे ही वो लखनके बारेमे बहुत गहेराइसे सोच रहीथी.. की लखनको फोन करे की नही.. उसने साम तक लखनके फोनका इन्तजार भी कीया.. लेकीन लखनका फोन नही आया..
तब वो अपने रुममे आराम करते लखनके बारेमे सोचमे डुबी हुइ थी.. वो अब लखनकी ओर पुरी तराह ढल चुकी थी.. लखन उसे अच्छा लगने लगाथा.. वो अपनी बेटी नीलमको लखनके साथ सेट करनेका सपना देखने लगी.. वो बडी दुवीधामे फसी हुइ थी.. की वो लखनके साथ रीलेशन रखे या ना रखे.. तो भावेश भी रमाकी बगलमे गहेरी नींद सोया हुआथा.. ओर आखीर हींमत करके उसने लखनसे बात करनेकी ठानली..
ओर पासमे पडा फोन उठालीया.. तो दुसरी ओर लखनभी रजीयाकी जबरदस्त चुदाके कारण थका हुआ था.. तो सीधाही खेतोपे जाकर गोडाउनमे अपने भाइकी ओफीसके रुममे आराम करने चला गया.. ओर वही बेडपे लेटकर आराम करने लगा.. तभी उनके फोनकी रींग बजने लगी.. लखनने फोनकी स्क्रीनमे देखातो रमा भाभीका फोन था.. तो स्क्रीनपे नाम देखते ही लखनके चहेरेपे कातील मुस्कुरान आगइ.. ओर उसने लेटे लेटेही फोन उठाके अपने कानपे लगा दीया..
रमा : (सरमाते धीरेसे) हेलो.. कौन..? क्या लखनजी बोल रहे हे..?
लखन : (मुस्कुराते) हां भाभी.. कहीये.. मे लखनही बोल रहा हु.. कैसी हे आप..? आखीर हमारी याद आही गइ.. कहो..
रमा : (सर्मसार होते धीरेसे) लखनजी.. क्या आप मुजसे नाराज हे..?
लखन : (हसते) अरे.. नहीतो..? ये आपको कीसने कहाकी हम आपसे जाराज हे..
रमा : (सरमाते धीरेसे) बस अैसेही.. आप लतादीदीको छोडने आये तो मेरे साथ बात तक नही की.. तो लतादीदीने कहाकी मे आपसे बात करलु.. तो आपको फोन करदीया.. क्या आप सचमे मुजसे नाराज नही..? तो फीर मेरे साथ बोलते क्यु नही..?
लखन : (कातील मुस्कानसे) भाभी.. बुरा मत मानना.. आपको भी पता हे मे आपसे बात क्यु नही करता.. मेने भाइ ओर सृतीभाभीकी सादीमे आपको कुछ पुछा हे.. बस उसीका जवाब चाहीये.. तबतक मे आपसे बात नही करुगा.. भाभी.. आप सचमे मुजे पसंद आगइ हे.. मे आपको पसंद करने लगा हु.. बस इसीका जवाब चाहीये मुजे.. फीर मे तैय करुगा की आपसे बात करनी चाहीये की नही..
रमा : (बहुतही सर्मसार होते धीरेसे) लखनजी प्लीज.. ये क्या बात हुइ..? मत कीजीये अैसी बाते.. मे आपके सालेकी बीवी हु.. आपकी भाभी.. ये नही हो सकता.. आप समजते क्यु नही..?
लखन : (हसते) भाभी.. समजना मुजे नही आपको हे.. अगर यही कहेनेके लीये फोन कीया हे तो फोन रख दीजीये.. मुजे नही करनी आपसे बात.. बस मुजे इतना पता हे मे आपको बहुत पसंद करता हु..
रमा : (थोडी परेसान होते धीरेसे) लखनजी.. प्लीज.. अब मे आपसे क्या कहु..? आप क्यु जीद कर रहे हे..? ये नही हो सकता.. मे आपके सालेकी बीवी हु.. अगर कीसीको पता चलेगातो मे कहीकी नही रहुगी.. आप समजते क्यु नही..? मेनेतो आपके बारेमे कुछ ओरही सोचा हे.. अब मे आपसे क्या कहु..?
लखन : (थोडा सीरीयस होते) भाभी.. क्या..? आप कीस बारेमे बात कर रही हे..? आपने मेरे बारेमे क्या सोचा हे..? कहीये मुजे..
रमा : लखनजी प्लीज.. इस बारेमे हम फोनपे चर्चा नही कर सकते.. ओर ये बात अभी सीर्फ हम दोनोके बीचही रखनी हे.. तो प्लीज.. जब हम दोनो अकेले मीलेगे तब इस बारेमे बात करेगे.. आप इस बातका जीक्र लतादीदीसे भी मत करना.. इस बात सीर्फ हम दोनोके बीच ही रखनी हे.. क्युकी बात ही कुछ अैसी हे.. लेकीन.. आप मुजसे बाते कीजीये.. प्लीज.. जबसे वहा सादीमेसे आइ हु आपही के बारेमे सोच रही हु.. आप मुजसे बात नही करते तो मुजे अच्छा नही लगता..
लखन : (मुस्कुराते) भाभी.. अेक बात कहु.. सायद इसेही प्यार कहेते हे.. लगता हे आपको कीसीने सच्चे दीलसे प्यार नही कीया.. तभी तो आप अैसा केह रही हो.. भाभी.. अैसा तब होता हे जब हमे कीसीसे सच्चे दिलसे प्यार हो जाता हे.. आपको भी मुजसे सच्चा प्यार होगया हे.. लेकीन आप जताना नही चाहती.. भाभी.. आइ लव यु.. प्लीज.. कबुल कर लीजीये मेरे प्यारको.. वरना मुजे हमेसाके लीये भुल जाइअे..
रमा : (सरमाते धीरेसे) ओह.. लखनजी.. आप फीर सुरु होगये..? अरे बाबा मे ये सब नही कर सकती.. अगर कीसीको पता चल गयानां.. तो हम दोनोही मुसीबतमे फस जायेगे.. हो सकता हे आप जो केह रहे हो ये सब बाते सच हो.. लेकीन फीरभी मे आपको वो प्यार नही दे सकती जो आप चाहते हो.. मेरी भी कुछ मजबुरीया हे.. मे आपके भाइको धोखा नही दे सकती.. प्लीज.. आप इस प्यारको भुल जाइअे..
लखन : (मुस्कुराते) ठीक हे भाभी.. अेक बात बताइअे.. क्या इस प्यारको आप भुल सकती हे..? ओर मुजे नही पता आप मुजे अकेले मीलकर मेरे साथ कीसके बारेमे ओर कीस तराहकी बाते करना चाहती हे.. वोतो हम मीलेगे तबही पता चलेगा.. लेकीन आप फीकर मत करो..
हमारे बारेमे कीसीकोभी पता नही चलेगा.. आइ प्रोमीस.. जबभी हम दोनो अकेले होगे तबही हम प्यार करेगे.. बाकी हमारा ये सहेलज नंनदोइ वाला रीस्ता अैसेही चलता रहेगा.. तो अब आपको क्या प्रोबलेम हे..? अगर मेरा प्यार आपको कबुल नही हे तो आप मुजसे बात क्यु कर रही हे..? फोन रख दीजीये..
रमा : (थोडी परेसान होते) लखन.. लखन.. प्लीज.. फोन मत काटीयेगा.. मुजसे आपसे बात करनी हे.. आपसे बात करके अेक सुकुनसा मीलता हे.. आपको नही पता मेने आपके लीये कीतने आंसु बहाये हे.. मुजे यहा कही चेइनही नही मीलता.. क्या अपनी भाभीको ओर रुलाना चाहते हे..? प्लीज.. मुजसे बात करीये..
लखन : (मुस्कुराते) हंम.. तो आपको मेरा प्यार कबुल हे.. भाभी.. मेने जबसे आपको देखा हे तबसे मेरीभी हालत आपहीकी तराह हे.. बस इसे ही प्यार कहेते हे.. आप मानो या ना मानो.. लेकीन ये सच हेकी आपको मुजसे प्यार हो गया हे.. भाभी.. बस अेक बार केह दीजीये.. की आपभी मुजसे प्यार करती हे..
रमा : (सर्मसार होते धीरेसे) लखनजी.. प्लीज.. क्यु मेरे साथ जबरदस्ती कर रहे हे.. ये नही हो सकता.. मे आपके भाइको धोखा नही दे सकती.. ओर आपको छोडभी तो नही सकती..
लखन : (थोडा सख्तीसे) ठीक हे भाभी.. मेने कभी कीसीके साथ जबरदस्ती नही की.. अगर आपको लगता हेकी मे आपके साथ जबरदस्ती कर रहा हु.. तो अब आप मुजसे बातही मत कीजीये.. अब आप मुजसे तबही बात करेगी.. जब मेरे प्यारको आप कबुल करलेगी.. तबतक आप मुजे फोनभी नही करेगी.. गुड बाय..
रमा : (जटसे रोने जैसी आवाजमे) ल..ख..न.. लखनजी.. प्लीज.. फोन मत काटना..
रमा थोडा जोरोसे चीला पडी.. लेकीन तबतक लखनने फोन काट दीयाथा.. तब रमा बहुत परेसान होगइ.. ओर फोन साइडमे रखकर उसने दोनो हाथोसे अपना चहेरा छुपा लीया.. ओर उनकी आंखोसे आंसुओ की धारा बहेने लगी.. ओर वो आंसु बहाते अैसेही थोडी देर जडवत बैठी आंसु बहाती रही.. फीर बाथरुममे जाकर मुहको साफ करलीया.. ओर वापस आकर बेडपे बैठ गइ.. ओर लखनके बारेमे सोचमे डुबी रही..

रमा : (मनमे) हे भगवान.. मे क्या करु.. जालीमने मुजे कहा फसादी.. वो केह रहेथे वो सच भी तो हे.. मे आज तक भानुके लीये भी इतनी नही तडपी.. उनके लीये तो मेने कभी आंसु भी नही बहाये.. जालीमने मुजपे क्या जादु करदीया हे.. जो मे उसीके बारेमे सोचती रहेती हु.. मेने उनको अपने दिमागसे नीकालनेकी कीतनी भी कोसीस करली.. लेकीन वो हे की नीकलते ही नही.. मुजे मेरी नीलुके लीये सबकुछ करना हे..
मे नीलुका ब्याह उनसे करवाकेही दम लुगी.. लेकीन इस बारेमे मे लतादीदीसे बातभी तो नही कर सकती.. उसे मे क्या कहेती..? की मेरी बेटीको आपकी सौतन बनालो..? क्या ये बातको वो स्वीकार कर लेगी..? नही नही.. इस बारेमे मुजे डायरेक्ट लखनसे ही बात करनी पडेगी.. वो जवान हे.. अगर नीलुके बारेमे उसे कहुगी तो वो खुद इस मामलेमे आगे बढेगे.. ओर नीलुसे प्यार होतेही नीलुसे सादी कर लेगे..
तो हमे कोइ जंजट ही नही करनी पडेगी.. लेकीन वो जालीम हेकी नीलुके बजाये मुजसे प्यार करते हे.. ओर मेभी तो उसे प्यार करने लगी हु.. तभीतो हर वक्त मुजे उसीका खयाल आता हे.. अब मे क्या करु..? क्या मेरी नीलुके लीये मुजे उनका प्यार कबुल करलेना चाहीये..? हां.. यही सही रहेगा.. कीसीको क्या पता चलेगाकी हम दोनोभी प्यार करते हे.. मुजेभी पता हे उनकोतो सीर्फ मेरे जीस्मके साथ ही खेलना हे..
लेकीन उस जालीमको क्या पताकी मे उसे सच्चे दिलसे प्यार करने लगी हु.. ओर वैसेभी अब भानुमे वो पहेले वाला जोस नही रहा.. अगर मे मेरे तनकी प्यास लखनसे बुजाउ तो इसमे क्या गलत हे.. भानुभी तो कही बहार मुह मारता होगा.. इसीलीयेतो उस दिन लखन केह रहेथे.. की उनको सम्हालनेके लीये बहुत सारी औरते हे.. तो फीर मे पीछे क्यु हटु..? जो भी हो मुजे लखनकी बात मान लेनी चाहीये.. अब मुजे मीलेगे तब मे इस बारेमे खुद उनसे बात करुगी..