रात को सलोनी के घर पर
रात के खाने के बाद तीनों कमरे में थे। प्रभा अचानक उठी, अलमारी खोली और एक मोटा बंडल निकाला। उसने गिनकर पाँच सौ के नोट पति को थमा दिए।
“इसे दे दो... इसे धंधे का बहोत शौक है न!” प्रभा ने सख्त लेकिन कामुक स्वर में आदेश दिया, “अब अगर तुम सिर्फ अपनी बेटी की चूत चोदोगे, तो हर बार चुदाई की कीमत देनी पड़ेगी। कम से कम दो हजार रुपये हर चुदाई का।” लेखिका फनलवर है।
पिताजी ने पैसे गिने और सलोनी की तरफ बढ़ा दिए। सलोनी ने बिना किसी शर्म या विरोध के पैसे ले लिए, उन्हें अपनी भारी चूचियों के बीच दबाते हुए मुस्कुराई और बोली,
“और आपके दोस्तों से मैं कम से कम पाँच हजार रुपये लूँगी हर चुदाई का। अगर माँ को भी आप अपने दोस्तों या बॉस से चुदवाएंगे, तो उन्हें भी कम से कम तीन हजार रुपये दिलवाने पड़ेंगे।”
प्रभा बिच में बोली; " लेकिन बेटी एक बात समज लो धंधा करना इतना आसन नहीं है। वहा खद की नहीं पर ग्राहक की मनमानी चलती है। जो पैसा फेंकता है उसे तमाशा भी देना पड़ता है। यह तो बाप है लेकिन हर कोई तुम्हारा बाप नहीं होता। अच्छा है अपनी मर्जी से चुदवा लो और सामने से पैसे मिलते है तो इकठ्ठा कर लो।"
सलोनी ने पिता की तरफ देखकर शरारत से पूछा, “बाबूजी, अब आप माँ को क्या बताना चाहते हैं?”
पिताजी ने गहरी साँस ली और प्रभा की तरफ देखा। फनलवर की प्रस्तुति।
“प्रभा... अब से तुम अपनी मर्जी से किसी भी मर्द के साथ सेक्स कर सकती हो। मेरे दोस्तों के साथ, मेरे बॉस के साथ... जो भी तुम्हें पसंद आए। बस इतना ध्यान रखना कि वो हमारे परिवार की बदनामी न करे।”
प्रभा की आँखें चमक उठीं। वह बहुत खुश हुई। मन ही मन सोचने लगी - “कल ही परम को बुलाकर पूरा दिन अपनी चूत और गांड मरवाऊँगी।” उसने सलौनी का दिसल से शुक्रिया अदा किया।
लेकिन उसने कुछ नहीं कहा, बस मुस्कुराकर दूसरी तरफ मुड़ गई।
सलोनी तुरंत पापा से लिपट गई, अपनी नंगी देह को उनके शरीर से चिपकाते हुए। फिर वह माँ के पास लेट गई।
पिताजी ने दोनों को देखते हुए कहा, “बेटी, अब तुम और माँ - जब मुन्ना घर पर न हो, तब तक घर में कपड़े पहनने की कोई जरूरत नहीं है। दोनों पूरी तरह नंगी रहोगी।”
प्रभा और सलोनी दोनों खुश हो गईं। फनलवर की रचना।
प्रभा पीछे मुड़ी हुई थी। सलोनी ने उठकर माँ के कपड़े उठाए और बोली, “माँ, सुनाई नहीं दी? अब घर में हमें कपड़ों की जरूरत नहीं है।”
प्रभा मुस्कुराई, उठी और बाकी बचे कपड़े भी उतारकर फेंक दिए। अब तीनों पूरी तरह नंगे थे।
पिताजी ने प्रभा को देखते हुए कहा, “प्रभा... अपनी बेटी का रस नहीं चखोगी?”
प्रभा ने शर्माते हुए लेकिन मुस्कुराते हुए कहा, “अभी तो मूड नहीं है राजा... वैसे भी अब सलोनी कहाँ जाने वाली है। जब मन करेगा, हम माँ-बेटी एक-दूसरे की चूत खाली कर देंगे।”
पिताजी ने प्रभा के पास आकर उसके नंगे बदन को सहलाते हुए कहा, “हाँ प्रभा, मुझे तुमसे माफी माँगनी चाहिए। अब तक मैंने तुम्हारी चूत को पूरी आजादी नहीं दी। मुझे माफ कर दो।”
प्रभा ने पति का लंड पकड़कर सहलाया और बोली, “चलो, जब देर से ही सही, लेकिन सवेरा तो हो ही गया।”
फिर वह सलोनी की तरफ मुड़ी और बोली, “बेटी, तुम्हारी वजह से आज मेरी चूत को आजादी मिल गई है। अब मुझे पति की चिंता नहीं रहेगी। मैं बेझिझक मनमोहक लंडों से खेलूँगी और अपनी चूत का भोसड़ा बनवाती रहूँगी। क्यों जी... सही है ना?”
पिताजी ने जवाब दिया, “हाँ प्रभा, अब तुम अपनी गांड और चूत मनचाहे लंड से चुदवा सकती हो। अगर भरोसेमंद आदमी हो तो मेरे सामने भी चुदवा सकती हो। सलोनी का मजा मैं लेता रहूँगा। आज से सलोनी का माल मेरा है, मैं ही चोदूँगा और मैं ही चुदवाऊँगा। काफी पैसा इकट्ठा कर लेंगे। तुम्हारा माल भी बेचेंगे।”
तीनों इस तरह गंदी-गंदी बातें करते रहे, चुदाई के प्लान, पैसे, दोस्तों के लंड, बॉस की चुदाई... सब कुछ।
धीरे-धीरे तीनों थककर सो गए। निर्मात्री फनलवर।
लेकिन कोई और के कान भी उनकी सारी बातें सुन रहा था...
मुन्ना!
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जुड़े रहिये।
क्रमश:
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