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शेठजी ने जैसे hi अपना आखरी फैसला सुनाया, भीड़ में खड़े लोग आपस में kaana-phoosi करने लगे. सब समझ गए थे की रामलाल का खेल अब हमेशा के लिए ख़तम हो चूका है और अब इस जगह पर दुलारी का राज चलेगा. नवाज़ ने कुटिलता से मुस्कुरा कर फ़ोन आरती के हाथ में थमा दिया.
रामलाल अब भी ज़मीन पर पड़ा रो रहा था, पर नवाज़ ने उसे कालर से पकड़ कर खड़ा किया और कान में फुसफुसाया,
"सुना न मालिक का हुकुम? चलता बन अब यहाँ से, वर्ण अगला थप्पड़ सीधे जान निकल देगा."
रामलाल ने डर के मारे अपनी साइकिल उठायी और बिना पीछे देखे वहां से भाग खड़ा हुआ. दुलारी ने आखरी बार हाथ जोड़कर आरती को धन्यवाद् किया.
आरती इस पूरे तमाशे से बोहोत थक चुकी थी और उसकी सांसें अभी भी थोड़ी तेज़ थी. उसने नवाज़ की तरफ देखा
और कहा,
"नवाज़, चलो अब... मुझे यहाँ बिलकुल अच्छा नहीं लग रहा."
आरती ने जैसे hi देखा की नवाज़ भीड़ के सामने hi उसका हाथ पकड़ लिया , तोह वो एकदम से शर्मा गयी.
गाँव के इतने सारे लोग उन्ही को देख रहे थे, और शेठजी की बहु होने के नाते उनके सामने नवाज़ का इस तरह हाथ पकड़ना उसे अंदर तक झिझक से भर गया.
उसने शर्म के मारे अपनी नज़रें झुका ली
और जल्दी से अपना हाथ पीछे खींच लिया.
वो धीरे से नवाज़ के कान के पास फुसफुसाई,
"नवाज़... क्या कर रहे हो? सब देख रहे हैं. चलो यहाँ से."
नवाज़ ने भीड़ की तरफ देखा और फिर आरती के लाल होते चेहरे को देखकर कुटिलता से मुस्कुरा दिया. वो समझ गया की रानी इस वक़्त शर्म से paani-paani हो रही है. उसने हाथ तोह नहीं पकड़ा, पर बिलकुल उनके साथ सटे हुए चलने लगा ताकि भीड़ को चीयर सके.
दोनों तेज़ कदमो से उस डंडी पर आगे बढे और लोगों का शोर dheere-dheere पीछे छूट गया.
थोड़ी hi देर में सामने नीता का छोटा, सुन्दर और saaf-suthra घर दिखाई दिया. घर के सामने एक छोटा सा बगीचा था जिसमे गुलाब और चमेली के पौदे लगे हुए थे.
दोपहर की धुप में वो छोटा सा आँगन बोहोत शांत और सुकून भरा लग रहा था.
नवाज़ ने घर के दरवाज़े के पास पहुँच कर हलके से कहा,
लो रानी, पहुँच गए नीता के घर.
नवाज़ ने आगे बढ़कर दरवाज़े पर दस्तक दी:
थक... थक... थक...
"नीता... अंदर हो क्या?"
नवाज़ ने थोड़ा ज़ोर से आवाज़ लगाया.. फिर आरती की और देखते हुई कहता है
अब थोड़ा अपना चेहरा नार्मल कर लो, वर्ण वो देख कर डर जाएगी.
नवाज़ ने जब ऐसा कहा तब आरती ने नखरे से अपना मुँह फुलाया और बड़ी hi शरारत भरी नज़रों से नवाज़ को देखने लगी—
बिलकुल उस तस्वीर की तरह, जिसमे उसकी मासूमियत और हल्का सा गुस्सा साफ़ चालक रहा था.
"अच्छा जी... जो हुकुम मेरे प्यारे शोहर का,"
आरती ने नखरे से अपनी आवाज़ को धीमे करते हुए कहा.
और अगले hi पल, बिना किसी की परवाह किये, वो आगे बढ़ी और नवाज़ के गले लग गयी. उसने अपने दोनों हाथ नवाज़ की पीठ पर कास दिए और अपना चेहरा उसके सीने में छुपा लिया.
दोपहर की धुप में, नीता के उस शांत आँगन में, दोनों का एक दुसरे से लिपटना उनके रिश्ते की इस नयी शुरुआत को और भी गहरा कर रहा था.
नवाज़ ने भी मुस्कुरा कर उसे अपनी बाहों में भींचा और उसके बालों को सेहलते हुए फुसफुसाया,
"बस करो रानी, अभी थोड़ी देर पहले भीड़ के सामने शर्मा रही थी, और अब खुद hi इतने जूनून में आ गयी हो? नीता किसी भी वक़्त बहार आ सकती है."
आरती ने थोड़ा हैट कर फिर से वही प्यारा सा मुँह बनाया
और बोली,
"आने दो... अब मुझे किसी का डर नहीं."
ऐसा कहते हुई आरती ने नवाज़ की बाहों से थोड़ा अलग ह. अब उसके चेहरे के भाव एकदम बदल गए थे . उसने अपने बिखरे बाल पीछे किये और बी अपनी आँखें थोड़ी बड़ी करके, सीधे नवाज़ की आँखों में देखा.
उसकी नज़रों में इस वक़्त एक अजीब सा फकर और गहरा जूनून साफ़ चालक रहा था.
"मुझे अब किसी का डर नहीं..."
आरती ने ek-ek शब्द पर ज़ोर देते हुए कहा.
नवाज़ ने उसके इस बदले रूप को देखा तोह देखता hi रह गया. वो कुटिलता से मुस्कुराया,
"अच्छा? सच में डर नहीं लग रहा?"
"हाँ नहीं, बिलकुल नहीं!"
आरती ने उसकी आँखों में आखिरी हद्द तक देखते हुए जवाब दिया. उसके चेहरे पर अब कोई झिझक या शर्म नहीं थी, बल्कि अपने इस नए रिश्ते को लेकर एक अलग hi धीटपणा और घमंड आ चूका था. रस्ते के तमाशे और नवाज़ के उस मरदाना गुस्से ने उसके अंदर के डर को पूरी तरह ख़तम कर दिया था.
नवाज़ ने आरती का ये तीखा और नशीला रूप देखा तोह उसके दिमाग में कल खेत वाले प्लान की चमक और बढ़ गयी. वो आगे बढ़ कर उसके और क़रीब आया
नवाज़ बिलकुल आरती के करीब आ गया, दोनों के बीच की डोरी अब न के बराबर थी. उसने अपनी भरी और नशीली आवाज़ में फुसफुसाया,
"सच में रानी? बिलकुल डर नहीं लगता अब?"
आरती ने बिना अपनी नज़रें हटाए, एक प्यारी और थोड़ी शोख मुस्कान के साथ नवाज़ की आँखों में देखा.
उसका एक हाथ हलके से उसके गले के चैन पर चला गया, जिसे वो उँगलियों से पकड़ते हुए नखरे से बोली,
"नहीं, बिलकुल नहीं!"
उसकी आँखों में इस वक़्त नवाज़ के लिए पूरा समर्पण और एक अजीब सा हक़ साफ़ दिख रहा था. नवाज़ का मरदाना रूप और दुश्मनो को मिटटी में मिला देने का वो गुस्सा देख कर आरती का दिल अब पूरी तरह से नवाज़ का घुलम हो चूका था. गाँव, समाज और परिवार का डर जैसे इस दोपहर के सन्नाटे में कही गायब हो गया था.
नवाज़ ने जब आरती का यह बेहद खूबसूरत और be-parwah रूप देखा, तोह उसने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ा कर उसकी पतली कमर को dhar-dabora और उसे अपने जिस्म से चिपका लिया. आरती की सांसें एक बार फिर से तेज़ होने लगी थीं.
आरती ने नखरे से अपने होंठ को हलके से दांतो टेल दबाते हुए और अपनी नशीली आखों से सीधे नवाज़ के चेहरे को तकते हुए कहा:
"मैं भला क्यों दारूण... जब मेरे साथ मेरा प्यारा शोहर खड़ा हो, जो मेरे खातिर साड़ी दुनिया से भीड़ जाता हो! ऐसा शोहर होगा तोह कौन बेगम डरेगी? जब आप किसी से न डरते हुए, सारे गाँव के सामने मेरा हाथ पकड़ते हो, तोह मैं अब किसी से नहीं डर्टी नवाज़ जी!"
आरती के मुँह से 'नवाज़ जी' और 'शोहर' सुनकर नवाज़ का सीना गर्व से चौड़ा हो गया. उसके होंठों पर एक गहरी और कुटिल मुस्कान तैर गयी. उसने आरती की कमर पर अपनी पकड़ को और मज़बूत किया, जिससे दोनों के जिस्म एक दुसरे में पूरी तरह समां गए. गाँव, समाज और परिवार का डर जैसे इस दोपहर के सन्नाटे में हमेशा के लिए गायब हो गया था.
आरती का ये नया, ढीट और पूरी तरह से उसपर हक़ जताने वाला रूप देख कर नवाज़ का दिल baagh-baagh हो गया. उसके होंठों पर एक गहरी और कुटिल मुस्कान तैर गयी.
"सही में रानी... तू अब सच में मेरी बेगम बनने के काबिल हो गयी है,"
नवाज़ ने उसके चेहरे के बेहद क़रीब आकर धीमे से फुसफुसाया,
"तेरे इस धीटपणे पर तोह ये जान भी हाज़िर है."
आरती ने शरारत से उसके सीने पर हलके से एक मुक्का मारा
रामलाल अब भी ज़मीन पर पड़ा रो रहा था, पर नवाज़ ने उसे कालर से पकड़ कर खड़ा किया और कान में फुसफुसाया,
"सुना न मालिक का हुकुम? चलता बन अब यहाँ से, वर्ण अगला थप्पड़ सीधे जान निकल देगा."
रामलाल ने डर के मारे अपनी साइकिल उठायी और बिना पीछे देखे वहां से भाग खड़ा हुआ. दुलारी ने आखरी बार हाथ जोड़कर आरती को धन्यवाद् किया.
आरती इस पूरे तमाशे से बोहोत थक चुकी थी और उसकी सांसें अभी भी थोड़ी तेज़ थी. उसने नवाज़ की तरफ देखा
और कहा,
"नवाज़, चलो अब... मुझे यहाँ बिलकुल अच्छा नहीं लग रहा."
आरती ने जैसे hi देखा की नवाज़ भीड़ के सामने hi उसका हाथ पकड़ लिया , तोह वो एकदम से शर्मा गयी.
गाँव के इतने सारे लोग उन्ही को देख रहे थे, और शेठजी की बहु होने के नाते उनके सामने नवाज़ का इस तरह हाथ पकड़ना उसे अंदर तक झिझक से भर गया.
उसने शर्म के मारे अपनी नज़रें झुका ली
और जल्दी से अपना हाथ पीछे खींच लिया.
वो धीरे से नवाज़ के कान के पास फुसफुसाई,
"नवाज़... क्या कर रहे हो? सब देख रहे हैं. चलो यहाँ से."
नवाज़ ने भीड़ की तरफ देखा और फिर आरती के लाल होते चेहरे को देखकर कुटिलता से मुस्कुरा दिया. वो समझ गया की रानी इस वक़्त शर्म से paani-paani हो रही है. उसने हाथ तोह नहीं पकड़ा, पर बिलकुल उनके साथ सटे हुए चलने लगा ताकि भीड़ को चीयर सके.
दोनों तेज़ कदमो से उस डंडी पर आगे बढे और लोगों का शोर dheere-dheere पीछे छूट गया.
थोड़ी hi देर में सामने नीता का छोटा, सुन्दर और saaf-suthra घर दिखाई दिया. घर के सामने एक छोटा सा बगीचा था जिसमे गुलाब और चमेली के पौदे लगे हुए थे.
दोपहर की धुप में वो छोटा सा आँगन बोहोत शांत और सुकून भरा लग रहा था.
नवाज़ ने घर के दरवाज़े के पास पहुँच कर हलके से कहा,
लो रानी, पहुँच गए नीता के घर.
नवाज़ ने आगे बढ़कर दरवाज़े पर दस्तक दी:
थक... थक... थक...
"नीता... अंदर हो क्या?"
नवाज़ ने थोड़ा ज़ोर से आवाज़ लगाया.. फिर आरती की और देखते हुई कहता है
अब थोड़ा अपना चेहरा नार्मल कर लो, वर्ण वो देख कर डर जाएगी.
नवाज़ ने जब ऐसा कहा तब आरती ने नखरे से अपना मुँह फुलाया और बड़ी hi शरारत भरी नज़रों से नवाज़ को देखने लगी—
बिलकुल उस तस्वीर की तरह, जिसमे उसकी मासूमियत और हल्का सा गुस्सा साफ़ चालक रहा था.
"अच्छा जी... जो हुकुम मेरे प्यारे शोहर का,"
आरती ने नखरे से अपनी आवाज़ को धीमे करते हुए कहा.
और अगले hi पल, बिना किसी की परवाह किये, वो आगे बढ़ी और नवाज़ के गले लग गयी. उसने अपने दोनों हाथ नवाज़ की पीठ पर कास दिए और अपना चेहरा उसके सीने में छुपा लिया.
दोपहर की धुप में, नीता के उस शांत आँगन में, दोनों का एक दुसरे से लिपटना उनके रिश्ते की इस नयी शुरुआत को और भी गहरा कर रहा था.
नवाज़ ने भी मुस्कुरा कर उसे अपनी बाहों में भींचा और उसके बालों को सेहलते हुए फुसफुसाया,
"बस करो रानी, अभी थोड़ी देर पहले भीड़ के सामने शर्मा रही थी, और अब खुद hi इतने जूनून में आ गयी हो? नीता किसी भी वक़्त बहार आ सकती है."
आरती ने थोड़ा हैट कर फिर से वही प्यारा सा मुँह बनाया
और बोली,
"आने दो... अब मुझे किसी का डर नहीं."
ऐसा कहते हुई आरती ने नवाज़ की बाहों से थोड़ा अलग ह. अब उसके चेहरे के भाव एकदम बदल गए थे . उसने अपने बिखरे बाल पीछे किये और बी अपनी आँखें थोड़ी बड़ी करके, सीधे नवाज़ की आँखों में देखा.
उसकी नज़रों में इस वक़्त एक अजीब सा फकर और गहरा जूनून साफ़ चालक रहा था.
"मुझे अब किसी का डर नहीं..."
आरती ने ek-ek शब्द पर ज़ोर देते हुए कहा.
नवाज़ ने उसके इस बदले रूप को देखा तोह देखता hi रह गया. वो कुटिलता से मुस्कुराया,
"अच्छा? सच में डर नहीं लग रहा?"
"हाँ नहीं, बिलकुल नहीं!"
आरती ने उसकी आँखों में आखिरी हद्द तक देखते हुए जवाब दिया. उसके चेहरे पर अब कोई झिझक या शर्म नहीं थी, बल्कि अपने इस नए रिश्ते को लेकर एक अलग hi धीटपणा और घमंड आ चूका था. रस्ते के तमाशे और नवाज़ के उस मरदाना गुस्से ने उसके अंदर के डर को पूरी तरह ख़तम कर दिया था.
नवाज़ ने आरती का ये तीखा और नशीला रूप देखा तोह उसके दिमाग में कल खेत वाले प्लान की चमक और बढ़ गयी. वो आगे बढ़ कर उसके और क़रीब आया
नवाज़ बिलकुल आरती के करीब आ गया, दोनों के बीच की डोरी अब न के बराबर थी. उसने अपनी भरी और नशीली आवाज़ में फुसफुसाया,
"सच में रानी? बिलकुल डर नहीं लगता अब?"
आरती ने बिना अपनी नज़रें हटाए, एक प्यारी और थोड़ी शोख मुस्कान के साथ नवाज़ की आँखों में देखा.
उसका एक हाथ हलके से उसके गले के चैन पर चला गया, जिसे वो उँगलियों से पकड़ते हुए नखरे से बोली,
"नहीं, बिलकुल नहीं!"
उसकी आँखों में इस वक़्त नवाज़ के लिए पूरा समर्पण और एक अजीब सा हक़ साफ़ दिख रहा था. नवाज़ का मरदाना रूप और दुश्मनो को मिटटी में मिला देने का वो गुस्सा देख कर आरती का दिल अब पूरी तरह से नवाज़ का घुलम हो चूका था. गाँव, समाज और परिवार का डर जैसे इस दोपहर के सन्नाटे में कही गायब हो गया था.
नवाज़ ने जब आरती का यह बेहद खूबसूरत और be-parwah रूप देखा, तोह उसने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ा कर उसकी पतली कमर को dhar-dabora और उसे अपने जिस्म से चिपका लिया. आरती की सांसें एक बार फिर से तेज़ होने लगी थीं.
आरती ने नखरे से अपने होंठ को हलके से दांतो टेल दबाते हुए और अपनी नशीली आखों से सीधे नवाज़ के चेहरे को तकते हुए कहा:
"मैं भला क्यों दारूण... जब मेरे साथ मेरा प्यारा शोहर खड़ा हो, जो मेरे खातिर साड़ी दुनिया से भीड़ जाता हो! ऐसा शोहर होगा तोह कौन बेगम डरेगी? जब आप किसी से न डरते हुए, सारे गाँव के सामने मेरा हाथ पकड़ते हो, तोह मैं अब किसी से नहीं डर्टी नवाज़ जी!"
आरती के मुँह से 'नवाज़ जी' और 'शोहर' सुनकर नवाज़ का सीना गर्व से चौड़ा हो गया. उसके होंठों पर एक गहरी और कुटिल मुस्कान तैर गयी. उसने आरती की कमर पर अपनी पकड़ को और मज़बूत किया, जिससे दोनों के जिस्म एक दुसरे में पूरी तरह समां गए. गाँव, समाज और परिवार का डर जैसे इस दोपहर के सन्नाटे में हमेशा के लिए गायब हो गया था.
आरती का ये नया, ढीट और पूरी तरह से उसपर हक़ जताने वाला रूप देख कर नवाज़ का दिल baagh-baagh हो गया. उसके होंठों पर एक गहरी और कुटिल मुस्कान तैर गयी.
"सही में रानी... तू अब सच में मेरी बेगम बनने के काबिल हो गयी है,"
नवाज़ ने उसके चेहरे के बेहद क़रीब आकर धीमे से फुसफुसाया,
"तेरे इस धीटपणे पर तोह ये जान भी हाज़िर है."
आरती ने शरारत से उसके सीने पर हलके से एक मुक्का मारा