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EPISODE – 70
कुछ खुलासा पिछली एपिसोड्स का एंड एक्सप्लनेशन….
कुछ दोस्तों के कमैंट्स के चलते, कुछ कन्फूसिओं नोट किया… इस लिए ये ज़रूरी समझा के नए अपडेट देने से पहले कुछ बातें दोहरा दी जयें…
गोविन्द के असली बाप जिन को वो बापू बुलाता हे… उन का नाम… कैलाश नाथ हे… असली माँ का नाम रजनी हे और ग्विंड उन को माँ hi कहता हे…
गोविन्द सीमा को बचता हे घुँडो से तो लाला जीवट राम उस को अपना बीटा बना लेते हैं… गोविन्द उन को पापा कहता हे… लाला जी की पत्नी का नाम गंगा देवी हे… जिन को गोविन्द माँ कहता हे…
लाला जी अपनी पत्नी गंगा देवी से बोहत प्यार करते हैं और 7-8 साल पहले जब गंगा देवी का ऑपरेशन हुआ और उन के उतेरुस और ओवरीज़ निकलने के कारन वो सेक्स द्वारा कुछ दर और खौफ के कारन अपने पति “लाला जी” को अपने पास नहीं आने देती थी…
लाला जी सेक्स न होने की वजा से परेशां थे तो उन के मैनेजर ने उन को लत लगा दी थी कोठे की… लाला जी एक कोठे पर जाने लगे और 7-8 साल वो उस कोठे पर जाते रहे… उन का सम्बन्ध हो गया था तेजस्वी बाई से जो खुद उस वक़्त एक तवायफ और अब नायिका हैं कोठे की… तेजस्वी बाई उन से खूब माल लूट रही थी… तेजस्वी बाई ने झूट बोलै लाला जी से के उन के नाजायज़ सम्बन्ध के कारन एक बची पैदा हुई हे… और वो अब 5 साल की थी…
हकीकत मैं उन दिनों शहर के एक और सेठ “सय्यानी सेठ” भी कोठे पर आते थे और उन के साथ भी तेजस्वी बाई के सम्बन्ध थे… उस 5 साल की लड़की का नाम हे “परीक्षा”.
तेजस्वी बाई ने काफी समय पहले एक बची खरीदी थी जो अब 18 साल की हो चुकी थी… उस का नाम “ानिका” हे… ानिका को तेजस्वी बाई ने पला और बारे किया और उस की ट्रेनिंग पूरी तरह से एक तवायफ की तरह से की… ानिका ने रक़्स, मुजरा, और गणना गण सीखा… और साथ साथ उस को ये भी सिखाया गया के कैसे एक मर्द को रिझाते हैं… अब 18 साल की होने के बाद उस की “नाथ” उतरनी हे… कोठे की रिवायत के अनुसार “नाथ” कुंवारी लड़की की इस तरह से उतारते हे के उससे बेचा जाता हे एक बरी क़ीमत पर और खरीदने वाले की मर्ज़ी हे के वो शादी करे या फिर बिना शादी के नाजायज़ सम्बन्ध रखते हुए उस को एक कीप या मिस्ट्रेस (स्वामिनी) की तरह से रखे…
खरीदने वाले मर्द की मर्ज़ी हे शादी के बाद या फिर बिना शादी के 4-5 साल या ज़यादा समय के बाद उस को चोर दे और वो लड़की फिर से कोठे पर आ बैठती हे और बस एक तवायफ की तरह से रक़्स या मुजरा स्टार्ट कर के उस गन्दगी वाली दलदल में पूरी तरह से धंस जाती हे…
अब आते हैं आज के अपडेट की तरफ…
तेजस्वी बाई, सरला और ानिका सब ये समझते हे के ये नौजवान जो देखने में किसी अमीर बाप की औलाद हे और वो सौदा करने और खरीदने आया हे ानिका को…
अब तक गोविन्द ने भी तेजस्वी बाई को नहीं बताया था के वो लाला जी का बीटा हे…
ानिका एक तो इतने साल कोठे पर गुज़ारने के बाद वो ज़ेहनी तौर पर तैयार थी के हर तवायफ की तरह से उस को भी इस रिवायत का सामना करना परे गए और वो भी बिकके गई और फिर साड़ी उम्र उस को रक़्स करना हे और मर्दो की जिस्मानी खाव्हिश को पूरा करना हे… वो न चाहती तो भी उस के पास कोई और चॉइस नहीं थी… ानिका अब तक बोहत परेशन थी के उस को जाने कोण खरीदे गए… अब तक 4 सेठ आ चुके थे जो के 50 साल के ऊपर के थे… और एक घुंडा… नामू दादा थे उन के सामने… बस मोल - भाव हो रहा था… कोई भी सेठ या फिर नामू दादा 3 लाख से ऊपर देने के लिए तैयार नहीं था… तेजस्वी बाई की मांग 5 लाख थी… जब भी कोई खरीदार आता था तो ानिका को उस के सामने ज़र्क़ बारक़ लिबास में गहनों के साथ एक दुल्हन बना कर पेश किया जाता था…
ानिका आज इतना ज़रूर सोच रही थी के ये एक रूपवान युवा हे और उस से भी बढ़ कर उस ने आज इस के लिए अपनी जान भी डाव पर लगा दी थी तो वो एक खिंचाव महसूस कर रही थी इस नौजवान की ओर…
इस कोठे पर उस ने जीतनेय भी सबक़ सीखे थे उन में से प्यार मोहब्बत को कोई भी सबक़ नहीं था… उससे किसी ने नहीं बतया था के वो लड़की हे और किसी नौजवान का खवाब उससे देखने हैं… उससे बस उसी का होकर रहना हे… उस के बचे की माँ बनना हे…
मगर वो एक लड़की तो थी ना… उस के अंदर की औरत भी जाग रही थी… के बस यही नौजवान उससे खरीद कर ले जये और साडी उम्र बस अपना बना कर रखे…
जो मेरा है मैं किसी और को क्यों दूँ ...!!!
मैं अपनी मोहब्बत में बच्चों की तरह हूँ...!!
ानिका का दिल भी धारक रहा था… आज पहली बार उस को पता चला था के उत्तेजित होना कहते किस्से हैं… सरला ने उससे बता दिया था के वही नौजवान जिस ने उससे बचाया था दादा से वो उससे खरीदने आया हे… और वो बस यही दुआएं करती जा रही थी के काश ये नौजवान तेजस्वी बाई की बताई रक़म अदा कर दे… मोल टोल ना करे… अगर इस के अपने बस में होता तो बस ये नौजवान एक इशारा करे तो ये साडी दुनिया चोर कर उस के साथ चल परे… अब बस साडी दुनिया बेगानी लग रही थी… कोई अपना लग रहा था तो बस ये नौजवान…
बस इतनी सी तमन्ना है
तेरे रंग में hi रंग जॉन....
रहूं मैं ज़रा मुझ में
तेरी हो के hi रह जाऊं
किसी से न कहाँ है जो
तुम्ही से बात वह कह दूँ
सभी देते हैं दिल अक्सर
मैं तुझको जान भी दे दूँ
यह है सुकून यह है जूनून
यह है टशन इ इश्क़ है
बस इतनी सी तमना है
तेरे रंग में hi रंग जॉन
रहूं मैं ज़रा मुझ में
तेरी हो के hi रह जाऊं....
मुझसे न दूर जा
इल्तजा है मेरी
मुझ पे हक़ है तेरा
ये जान है तेरी
अब मेरा सब तेरा
ख्वाशीष है बस तेरी
किसी से न कहाँ हैं जो
तुम्ही से बात वह कह दूँ
सभी देते है दिल अक्सर
मैं तुझ को जान भी दे दूँ
इधर कमरे में गोविन्द भी मुन्तज़िर हे… ानिका के आने से पहले उस की पाज़ेब की झंकार की जहां जहां गोविन्द के कानो में सुनाई दे रही थी… उस की धरकने भी बेतरतीब थी… और फिर वो दाखिल हुई कमरे में…
कमरा जैसे रोशन सा होगया…
कुरता शलवार में और उस के ऊपर एक बारे सा दुपट्टा उस के जिस्म को ढांपे हुए था… मगर उस का चेहरा ऐसा था के देखने वाले की नज़र कही और क्यों जाती…
उस की निगाह नीचे थी…
उस के चेहरे पर न कोई मेक उप था न कोई ज़ेवर…
मगर फिर भी उस के चमकती त्वचा, संकीर्ण चहरे का आकार, गुलाबी भरे भरे रास टपकते होंठ, आँखें बारी, काली, अंदर आँखों के थोड़ी बड़ी दूरी, गहरी संकरी भौहें अधिक, लम्बी और गहरी पलकें, उच्च गाल की हड्डियां, संकरी नाक, और नाक में एक बरी सी नाथ…
लम्बा ऊंचा क़द… नितम्ब और सीने के उभार अच्छी तरह से संतुलित, और कमर भी परिभाषित, नितम्ब स्वाभाविक रूप से गोल, शरीर पूरे अनुपात में, कंधे थोड़े गोल हैं जो के सुडौल नितम्बों के साथ पूरी तरह से संरेखित, और पेअर ऊपरी शरीर के अनुपात में…
है अक्स तेरा मयसर जिस सिम्त भी देखों
किआ हर कोई तुम सा है, या सारा जहाँ तुम हो..!
गोविन्द भी नज़र भर कर उस की ओर नहीं देख रहा था… तेजस्वी बाई की बरी नज़र थी… वो हैरान थी के ये नौजवान ानिका की ओर देख भी नहीं रहा…
एक अद्भुत अनुभव था गोविन्द और ानिका दोनों के दिल में…
दोनों एक दुसरे से काफी दूर थे… कमरे में… मगर दिल दोनों के इतने नज़दीक थे के एक दुसरे की धारकानो को सुन प् रहे थे… उन के होंठ खामोश थे… आँखे नीचे…
उन की ख़ामोशी बात कर रही थी…
सरला ने कमरे आकर जैसे कमरे का सकूट तोर दिया…
सरला… “बाई जी… हल्दी और पट्टी ले आयी हूँ… पट्टी कर दूँ…”
तेजस्वी बाई… “नहीं तुम रहने दो… ानिका तुम पट्टी कार्डो…”
ये सुनते hi ानिका जहाँ खुश हुई वही उस को आज पहली बार शर्म और लजा का अनुभव हो रहा था… उस के हाथ कंपनी लगे थे…
गोविन्द तो जान चुक्का था… तेजस्वी बाई दिल में सोच चुकी थी के ये नौजवान अगर काम मोल भी देगा तो वो सौदा कर दे गई ानिका का… और दूसरी तरफ ानिका के लिए ये बारे मुश्किल था के जिस को वो अपने दिल का मालिक मान चुकी थी उस के इतने क़रीब जाये… सब के सामने…
गोविन्द ने सब की मुश्किल आसान करते हुए और तेजस्वी के मैं को अधिक नरम करने के लिए कहा…
गोविन्द… “माँ… अगर बुरा न मनो तो अपने हाथो से कार्डो पट्टी…”
तेजस्वी बाई का दिल ख़ुशी से झूम उठा और वही ानिका का मुंह खुल गया हेरात से के ये नौजवान बाई को माँ कह रहा हे…
गोविन्द अपनी शर्ट के बटन खोलने लगा…
और तेजस्वी बाई ने फ़ौरन से हल्दी की कटोरी उठा ली हाथ में… खुश थी बोहत…
गोविन्द ने शर्ट के बटन खोलने के बाद सिर्फ उसी तरफ का बाज़ू नंगा किया जहा कट था…
ानिका झुकी झुकी नज़र से देख चुकी थी के इस नौजवान का जिस्म कितना मज़बूत और सुन्दर हे… और वो ये भी समझ रही थे के उस के अंदर एक शर्मीला मर्द हे और वो अपने जिस्म की नुमाइश नहीं करता…
तेजस्वी बाई गोविन्द को हल्दी लगते हुए फूँक भी रही थी… उस के कट पर…
पट्टी होने के बाद… तेजस्वी बाई ने गरम दूध भी उठा कर खुद दिया…
गोविन्द वही तेजस्वी बाई के पास बेथ गया… बाई ने सरला और ानिका को भी बैठने को कहा… वो दोनों उन के सामने वाले सोफे पर बेथ गयी….
गोविन्द ने दूध पि लिया तो ऐसा ज़ाहिर किया जेसे उससे कुछ कमज़ोरी से हो रही हे…
तेजस्वी बाई ने कहा… “बीटा अगर चाहो तो मेरे कमरे में कुछ दिएर के लिए आराम कर लो…”
गोविन्द… “नहीं माँ… बस ज़रा सी कमज़ोरी हे… ठीक हो जॉन गए थोड़ी दिएर में… अगर इजाज़त हो तो कुछ दिएर आप की गॉड में सर रख कर लेत जॉन…”
तेजस्वी बाई ने बरी ख़ुशी से उस का सर थमते हुए अपनी गॉड में रख लिया… गोविन्द ने अपनी आँखे बंद कर्ली…
ानिका और सरला के लिए तो जैसे कोई दारमा सा था… ऐसा कहाँ होता हे के एक तवायफ एक नौजवान को एक एक बीटा बना ले और फिर उस के साथ सगी माँ वाली मोहब्बत भी दिखाए…
अब ानिका ने देखा तो नौजवान की आँखे बंद हैं तो इस ने एक भरपूर नज़र डाली उस के चेहरे पर… और बारे प्यार आया उस के शांत मरदाना चेहरे पर…
तेजस्वी बाई ने देखा के गोविन्द की आँखे बंद हे तो बरी शफ़क़त से उस के माथे पर बोसा दिया…
कुछ दिएर यूँही लेते रहने के बाद गोविन्द सीधा होकर बेथ गया…
अब तेजस्वी बाई ने सोचा के कुछ बात को आगे बढ़ाये…
और बोलने लगी… “तुम ने आज मुझे माँ का दर्जा देकर जो मेरा मान सामान किया हे… तो मुझे तुम से ये बात कहते हुए बोहत मुश्किल पेश आ रही हे के में अपनी बेटी का सौदा करूँ और मोल टोल करूँ… जो तुम दो गए वो मुझे क़बूल होगा… मगर में तुम्हारे सुभाव देख कर… तुम्हारे संस्कार देख कर ये भी नहीं कह सकती के तुम इन चक्रो में पारो… मगर में भी अब बूढ़ी हो रही हु… और मेरे लिए यही माल बुढ़ापे का सहारा हे…”
अब गोविन्द ये सोच चूका था के वो लाला जी के बेटे होने की बात अभी नहीं करे गए…
गोविन्द… “एक तो आज के बाद से आप ये फ़िक्र चोर दो के आप का बुढ़ापे में कोई ख्याल नहीं रखे गए… आज से मेरी ज़िम्मेदारी हे के में ने आप को माँ बोलै हे और में ये रिश्ता निभाऊं गए… और आप बताई इन का कितना मोल चाहिए आप को… में कोई मोल टोल नहीं करूँ गए…”
ानिका का दिल तेज़ी से धारक रहा था… उस की दुआ में शिद्दत आती जा रही थी… उस ने सोच लिया था के बस इसी के साथ जाना हे…
इसी का होकर रहना हे…
सरला के लिए ये बातें बरी अजीब थीं… लेकिन वो भी यही दुआ कर रही थी के बाई ये सौदा मंज़ूर कर लें…
तेजस्वी बाई… के लिए जैसे कुछ और कहने के लिए बचा नहीं था…. उस की गर्दन भी नीचे हो गयी थी… “5 लाख मांगे थे… में ने दूसरो से… तुम जीतनेय भी देदो…”
गोविन्द… ने अपने पास से 5 लाख निकल कर देते हुए kaha…“aap इस से ज़यादा भी मांगती तो में देता… बस अब एक कप छाए पिलवा दें…”
तेजस्वी बाई ने सारे रुप्पे उठा कर अपने बैग में रखते हुए सरला को कहा के छाए बना दे…
मगर अब पुर एतमाद और दमकते चहरे के साथ ानिका उठी और बोली… “छाए में बनाऊं गई…”
और सरला को साथ लेकर कमरे से बहार चली गयी…
तेजस्वी गोविन्द के चेहरे को ग़ौर से देखती हुई… “बीटा… एक बात कहु मैं ने भी दुनिया देखि हे… मेरे फैसले से ानिका बोहत खुश हुई हे… इस को तनहा मत चूर्ण… इस का दिल मत तोरणा… आज तक मेने किसी को नहीं बताया… आज तुम्हे बता रही हु…. ानिका मेरी बेटी नहीं हे… ये बोहत छोटी थी के कोई इससे बेच गया था मेरे पास… मगर में ने माँ बन कर पला और अपनी बेटी और इस में मेने कोई फ़र्क़ नहीं किया कभी… मेरी बेटी 5 साल की हे… परीक्षा नाम हे उस का… मेरे और सय्यानी सेठ के सम्बंद की निशानी हे… सय्यानी सेठ अचे आदमी थे… मगर 4 महीने पहले हार्ट अटैक से उन की डेथ हो गयी हे… अब मेरे पास परीक्षा रह जाये गई… और में दुआ करती हु के ानिका के क़दम वापिस न उठे इस या किसी और कोठे की ओर….”
गोविन्द… “बस तो परीक्षा आज से मेरी बहन हे… और में अपनी बहन को भी कैसे रहने दूँ गए इस कोठे पर… और फिर ये भी बात हे के अपनी माँ को भी कैसे रहने दू यहाँ… बस आप अपना पूरा सामान समेत लीजिये गए… मैं कल आप सब को साथ ले जॉन गए… सरला भी हमरे साथ जये गई…”
ये सुनते hi…. तेजस्वी बाई रोने लगी…
गोविन्द ने उस को अपने गले से लगा लिया मगर वो रोटी रही…
उस के आंसू थे के बहे जा रहे थे… हर बहते आंसू के साथ ज़िन्दगी की तल्खियां भी काम हो रही थी… दिल के ग़ुबार धूल रहे थे… जैसे एक रोशन सुबह हो रही थी….
एक तवायफ को एक माँ बन कर ऐसा लग रहा था के जेसे आज hi उस ने जनम लिया हो…
तेजस्वी बाई ने कुछ दिएर के लिए रोना बंद किया और बोली… “कल किस वक़्त आओगे बीटा… भूल तो नहीं जाओगे अपना वादा…”
गोविन्द… “नहीं माँ… ऐसा कैसे हो सकता हे… में कल 2 बजे तक आऊं गए…”
तेजस्वी बाई… “ठीक हे बीटा हम अपना सामान पैक कर लें गए और में ानिका को भी तैयार कर लूँ गई… और अभी तुम रात का खाना भी खा कर जाओ गए… वैसे भी अब यहाँ मुजरा नहीं होगा…”
गोविन्द… “माँ में छाए पि कर रुखसत लूँ गए… में ने आप लोगो के रहने का इंतज़ाम भी करना हे…”
छाए आ चुकी थी…
सरला ने छाए की त्र उठायी हुई थी… उस के पीछे ानिका थी… चेहरे पर अब एतमाद के साथ शर्म और लाज के रंग भीकरें हुए थे…
छाए के कप खुद उठा कर दी ानिका ने पहले तेजस्वी बाई को और बाद में गोविन्द को…
छाए देने के बाद वो जाने लगी तो तेजस्वी बाई ने कहा… “ानिका बीटा तुम भी हमारे साथ बेथ कर छाए पी लो…”
ानिका ने मुस्कुरा कर देखा और फिर शर्म से नज़रे नीचे करते हुए अपनी गर्दन से इंकार करते हुए चली गयी कमरे से बहार…
तेजस्वी बाई… हंसने लगी… “शर्मा गयी हे ानिका…”
सरला भी बहार निकल गयी कमरे से उस के साथ…
छाए ख़तम हुई तो गोविन्द उठा और विदा कहते हुए जाने लगा तो तेजस्वी बाई बोली… “बीटा तुम ने अपना नाम भी नहीं बताया और न ये बताया के किस संसकृ माँ बाप के बेटे हो जिन्हों ने तुम्हे इतना संस्कारी और आज्ञाकारी बनाया हे…”
गोविन्द… जो अब उठ के खरा हुआ था जाने के लिए तैयार… वो बोलै… “मेरा नाम गोविन्द हे और मेरे पिता का नाम लाला जीवट राम हे…”
गोविन्द ने देखा के तेजस्वी बाई के चेहरे के रंग बदल गए थे….
कुछ खुलासा पिछली एपिसोड्स का एंड एक्सप्लनेशन….
कुछ दोस्तों के कमैंट्स के चलते, कुछ कन्फूसिओं नोट किया… इस लिए ये ज़रूरी समझा के नए अपडेट देने से पहले कुछ बातें दोहरा दी जयें…
गोविन्द के असली बाप जिन को वो बापू बुलाता हे… उन का नाम… कैलाश नाथ हे… असली माँ का नाम रजनी हे और ग्विंड उन को माँ hi कहता हे…
गोविन्द सीमा को बचता हे घुँडो से तो लाला जीवट राम उस को अपना बीटा बना लेते हैं… गोविन्द उन को पापा कहता हे… लाला जी की पत्नी का नाम गंगा देवी हे… जिन को गोविन्द माँ कहता हे…
लाला जी अपनी पत्नी गंगा देवी से बोहत प्यार करते हैं और 7-8 साल पहले जब गंगा देवी का ऑपरेशन हुआ और उन के उतेरुस और ओवरीज़ निकलने के कारन वो सेक्स द्वारा कुछ दर और खौफ के कारन अपने पति “लाला जी” को अपने पास नहीं आने देती थी…
लाला जी सेक्स न होने की वजा से परेशां थे तो उन के मैनेजर ने उन को लत लगा दी थी कोठे की… लाला जी एक कोठे पर जाने लगे और 7-8 साल वो उस कोठे पर जाते रहे… उन का सम्बन्ध हो गया था तेजस्वी बाई से जो खुद उस वक़्त एक तवायफ और अब नायिका हैं कोठे की… तेजस्वी बाई उन से खूब माल लूट रही थी… तेजस्वी बाई ने झूट बोलै लाला जी से के उन के नाजायज़ सम्बन्ध के कारन एक बची पैदा हुई हे… और वो अब 5 साल की थी…
हकीकत मैं उन दिनों शहर के एक और सेठ “सय्यानी सेठ” भी कोठे पर आते थे और उन के साथ भी तेजस्वी बाई के सम्बन्ध थे… उस 5 साल की लड़की का नाम हे “परीक्षा”.
तेजस्वी बाई ने काफी समय पहले एक बची खरीदी थी जो अब 18 साल की हो चुकी थी… उस का नाम “ानिका” हे… ानिका को तेजस्वी बाई ने पला और बारे किया और उस की ट्रेनिंग पूरी तरह से एक तवायफ की तरह से की… ानिका ने रक़्स, मुजरा, और गणना गण सीखा… और साथ साथ उस को ये भी सिखाया गया के कैसे एक मर्द को रिझाते हैं… अब 18 साल की होने के बाद उस की “नाथ” उतरनी हे… कोठे की रिवायत के अनुसार “नाथ” कुंवारी लड़की की इस तरह से उतारते हे के उससे बेचा जाता हे एक बरी क़ीमत पर और खरीदने वाले की मर्ज़ी हे के वो शादी करे या फिर बिना शादी के नाजायज़ सम्बन्ध रखते हुए उस को एक कीप या मिस्ट्रेस (स्वामिनी) की तरह से रखे…
खरीदने वाले मर्द की मर्ज़ी हे शादी के बाद या फिर बिना शादी के 4-5 साल या ज़यादा समय के बाद उस को चोर दे और वो लड़की फिर से कोठे पर आ बैठती हे और बस एक तवायफ की तरह से रक़्स या मुजरा स्टार्ट कर के उस गन्दगी वाली दलदल में पूरी तरह से धंस जाती हे…
अब आते हैं आज के अपडेट की तरफ…
तेजस्वी बाई, सरला और ानिका सब ये समझते हे के ये नौजवान जो देखने में किसी अमीर बाप की औलाद हे और वो सौदा करने और खरीदने आया हे ानिका को…
अब तक गोविन्द ने भी तेजस्वी बाई को नहीं बताया था के वो लाला जी का बीटा हे…
ानिका एक तो इतने साल कोठे पर गुज़ारने के बाद वो ज़ेहनी तौर पर तैयार थी के हर तवायफ की तरह से उस को भी इस रिवायत का सामना करना परे गए और वो भी बिकके गई और फिर साड़ी उम्र उस को रक़्स करना हे और मर्दो की जिस्मानी खाव्हिश को पूरा करना हे… वो न चाहती तो भी उस के पास कोई और चॉइस नहीं थी… ानिका अब तक बोहत परेशन थी के उस को जाने कोण खरीदे गए… अब तक 4 सेठ आ चुके थे जो के 50 साल के ऊपर के थे… और एक घुंडा… नामू दादा थे उन के सामने… बस मोल - भाव हो रहा था… कोई भी सेठ या फिर नामू दादा 3 लाख से ऊपर देने के लिए तैयार नहीं था… तेजस्वी बाई की मांग 5 लाख थी… जब भी कोई खरीदार आता था तो ानिका को उस के सामने ज़र्क़ बारक़ लिबास में गहनों के साथ एक दुल्हन बना कर पेश किया जाता था…
ानिका आज इतना ज़रूर सोच रही थी के ये एक रूपवान युवा हे और उस से भी बढ़ कर उस ने आज इस के लिए अपनी जान भी डाव पर लगा दी थी तो वो एक खिंचाव महसूस कर रही थी इस नौजवान की ओर…
इस कोठे पर उस ने जीतनेय भी सबक़ सीखे थे उन में से प्यार मोहब्बत को कोई भी सबक़ नहीं था… उससे किसी ने नहीं बतया था के वो लड़की हे और किसी नौजवान का खवाब उससे देखने हैं… उससे बस उसी का होकर रहना हे… उस के बचे की माँ बनना हे…
मगर वो एक लड़की तो थी ना… उस के अंदर की औरत भी जाग रही थी… के बस यही नौजवान उससे खरीद कर ले जये और साडी उम्र बस अपना बना कर रखे…
जो मेरा है मैं किसी और को क्यों दूँ ...!!!
मैं अपनी मोहब्बत में बच्चों की तरह हूँ...!!
ानिका का दिल भी धारक रहा था… आज पहली बार उस को पता चला था के उत्तेजित होना कहते किस्से हैं… सरला ने उससे बता दिया था के वही नौजवान जिस ने उससे बचाया था दादा से वो उससे खरीदने आया हे… और वो बस यही दुआएं करती जा रही थी के काश ये नौजवान तेजस्वी बाई की बताई रक़म अदा कर दे… मोल टोल ना करे… अगर इस के अपने बस में होता तो बस ये नौजवान एक इशारा करे तो ये साडी दुनिया चोर कर उस के साथ चल परे… अब बस साडी दुनिया बेगानी लग रही थी… कोई अपना लग रहा था तो बस ये नौजवान…
बस इतनी सी तमन्ना है
तेरे रंग में hi रंग जॉन....
रहूं मैं ज़रा मुझ में
तेरी हो के hi रह जाऊं
किसी से न कहाँ है जो
तुम्ही से बात वह कह दूँ
सभी देते हैं दिल अक्सर
मैं तुझको जान भी दे दूँ
यह है सुकून यह है जूनून
यह है टशन इ इश्क़ है
बस इतनी सी तमना है
तेरे रंग में hi रंग जॉन
रहूं मैं ज़रा मुझ में
तेरी हो के hi रह जाऊं....
मुझसे न दूर जा
इल्तजा है मेरी
मुझ पे हक़ है तेरा
ये जान है तेरी
अब मेरा सब तेरा
ख्वाशीष है बस तेरी
किसी से न कहाँ हैं जो
तुम्ही से बात वह कह दूँ
सभी देते है दिल अक्सर
मैं तुझ को जान भी दे दूँ
इधर कमरे में गोविन्द भी मुन्तज़िर हे… ानिका के आने से पहले उस की पाज़ेब की झंकार की जहां जहां गोविन्द के कानो में सुनाई दे रही थी… उस की धरकने भी बेतरतीब थी… और फिर वो दाखिल हुई कमरे में…
कमरा जैसे रोशन सा होगया…
कुरता शलवार में और उस के ऊपर एक बारे सा दुपट्टा उस के जिस्म को ढांपे हुए था… मगर उस का चेहरा ऐसा था के देखने वाले की नज़र कही और क्यों जाती…
उस की निगाह नीचे थी…
उस के चेहरे पर न कोई मेक उप था न कोई ज़ेवर…
मगर फिर भी उस के चमकती त्वचा, संकीर्ण चहरे का आकार, गुलाबी भरे भरे रास टपकते होंठ, आँखें बारी, काली, अंदर आँखों के थोड़ी बड़ी दूरी, गहरी संकरी भौहें अधिक, लम्बी और गहरी पलकें, उच्च गाल की हड्डियां, संकरी नाक, और नाक में एक बरी सी नाथ…
लम्बा ऊंचा क़द… नितम्ब और सीने के उभार अच्छी तरह से संतुलित, और कमर भी परिभाषित, नितम्ब स्वाभाविक रूप से गोल, शरीर पूरे अनुपात में, कंधे थोड़े गोल हैं जो के सुडौल नितम्बों के साथ पूरी तरह से संरेखित, और पेअर ऊपरी शरीर के अनुपात में…
है अक्स तेरा मयसर जिस सिम्त भी देखों
किआ हर कोई तुम सा है, या सारा जहाँ तुम हो..!
गोविन्द भी नज़र भर कर उस की ओर नहीं देख रहा था… तेजस्वी बाई की बरी नज़र थी… वो हैरान थी के ये नौजवान ानिका की ओर देख भी नहीं रहा…
एक अद्भुत अनुभव था गोविन्द और ानिका दोनों के दिल में…
दोनों एक दुसरे से काफी दूर थे… कमरे में… मगर दिल दोनों के इतने नज़दीक थे के एक दुसरे की धारकानो को सुन प् रहे थे… उन के होंठ खामोश थे… आँखे नीचे…
उन की ख़ामोशी बात कर रही थी…
सरला ने कमरे आकर जैसे कमरे का सकूट तोर दिया…
सरला… “बाई जी… हल्दी और पट्टी ले आयी हूँ… पट्टी कर दूँ…”
तेजस्वी बाई… “नहीं तुम रहने दो… ानिका तुम पट्टी कार्डो…”
ये सुनते hi ानिका जहाँ खुश हुई वही उस को आज पहली बार शर्म और लजा का अनुभव हो रहा था… उस के हाथ कंपनी लगे थे…
गोविन्द तो जान चुक्का था… तेजस्वी बाई दिल में सोच चुकी थी के ये नौजवान अगर काम मोल भी देगा तो वो सौदा कर दे गई ानिका का… और दूसरी तरफ ानिका के लिए ये बारे मुश्किल था के जिस को वो अपने दिल का मालिक मान चुकी थी उस के इतने क़रीब जाये… सब के सामने…
गोविन्द ने सब की मुश्किल आसान करते हुए और तेजस्वी के मैं को अधिक नरम करने के लिए कहा…
गोविन्द… “माँ… अगर बुरा न मनो तो अपने हाथो से कार्डो पट्टी…”
तेजस्वी बाई का दिल ख़ुशी से झूम उठा और वही ानिका का मुंह खुल गया हेरात से के ये नौजवान बाई को माँ कह रहा हे…
गोविन्द अपनी शर्ट के बटन खोलने लगा…
और तेजस्वी बाई ने फ़ौरन से हल्दी की कटोरी उठा ली हाथ में… खुश थी बोहत…
गोविन्द ने शर्ट के बटन खोलने के बाद सिर्फ उसी तरफ का बाज़ू नंगा किया जहा कट था…
ानिका झुकी झुकी नज़र से देख चुकी थी के इस नौजवान का जिस्म कितना मज़बूत और सुन्दर हे… और वो ये भी समझ रही थे के उस के अंदर एक शर्मीला मर्द हे और वो अपने जिस्म की नुमाइश नहीं करता…
तेजस्वी बाई गोविन्द को हल्दी लगते हुए फूँक भी रही थी… उस के कट पर…
पट्टी होने के बाद… तेजस्वी बाई ने गरम दूध भी उठा कर खुद दिया…
गोविन्द वही तेजस्वी बाई के पास बेथ गया… बाई ने सरला और ानिका को भी बैठने को कहा… वो दोनों उन के सामने वाले सोफे पर बेथ गयी….
गोविन्द ने दूध पि लिया तो ऐसा ज़ाहिर किया जेसे उससे कुछ कमज़ोरी से हो रही हे…
तेजस्वी बाई ने कहा… “बीटा अगर चाहो तो मेरे कमरे में कुछ दिएर के लिए आराम कर लो…”
गोविन्द… “नहीं माँ… बस ज़रा सी कमज़ोरी हे… ठीक हो जॉन गए थोड़ी दिएर में… अगर इजाज़त हो तो कुछ दिएर आप की गॉड में सर रख कर लेत जॉन…”
तेजस्वी बाई ने बरी ख़ुशी से उस का सर थमते हुए अपनी गॉड में रख लिया… गोविन्द ने अपनी आँखे बंद कर्ली…
ानिका और सरला के लिए तो जैसे कोई दारमा सा था… ऐसा कहाँ होता हे के एक तवायफ एक नौजवान को एक एक बीटा बना ले और फिर उस के साथ सगी माँ वाली मोहब्बत भी दिखाए…
अब ानिका ने देखा तो नौजवान की आँखे बंद हैं तो इस ने एक भरपूर नज़र डाली उस के चेहरे पर… और बारे प्यार आया उस के शांत मरदाना चेहरे पर…
तेजस्वी बाई ने देखा के गोविन्द की आँखे बंद हे तो बरी शफ़क़त से उस के माथे पर बोसा दिया…
कुछ दिएर यूँही लेते रहने के बाद गोविन्द सीधा होकर बेथ गया…
अब तेजस्वी बाई ने सोचा के कुछ बात को आगे बढ़ाये…
और बोलने लगी… “तुम ने आज मुझे माँ का दर्जा देकर जो मेरा मान सामान किया हे… तो मुझे तुम से ये बात कहते हुए बोहत मुश्किल पेश आ रही हे के में अपनी बेटी का सौदा करूँ और मोल टोल करूँ… जो तुम दो गए वो मुझे क़बूल होगा… मगर में तुम्हारे सुभाव देख कर… तुम्हारे संस्कार देख कर ये भी नहीं कह सकती के तुम इन चक्रो में पारो… मगर में भी अब बूढ़ी हो रही हु… और मेरे लिए यही माल बुढ़ापे का सहारा हे…”
अब गोविन्द ये सोच चूका था के वो लाला जी के बेटे होने की बात अभी नहीं करे गए…
गोविन्द… “एक तो आज के बाद से आप ये फ़िक्र चोर दो के आप का बुढ़ापे में कोई ख्याल नहीं रखे गए… आज से मेरी ज़िम्मेदारी हे के में ने आप को माँ बोलै हे और में ये रिश्ता निभाऊं गए… और आप बताई इन का कितना मोल चाहिए आप को… में कोई मोल टोल नहीं करूँ गए…”
ानिका का दिल तेज़ी से धारक रहा था… उस की दुआ में शिद्दत आती जा रही थी… उस ने सोच लिया था के बस इसी के साथ जाना हे…
इसी का होकर रहना हे…
सरला के लिए ये बातें बरी अजीब थीं… लेकिन वो भी यही दुआ कर रही थी के बाई ये सौदा मंज़ूर कर लें…
तेजस्वी बाई… के लिए जैसे कुछ और कहने के लिए बचा नहीं था…. उस की गर्दन भी नीचे हो गयी थी… “5 लाख मांगे थे… में ने दूसरो से… तुम जीतनेय भी देदो…”
गोविन्द… ने अपने पास से 5 लाख निकल कर देते हुए kaha…“aap इस से ज़यादा भी मांगती तो में देता… बस अब एक कप छाए पिलवा दें…”
तेजस्वी बाई ने सारे रुप्पे उठा कर अपने बैग में रखते हुए सरला को कहा के छाए बना दे…
मगर अब पुर एतमाद और दमकते चहरे के साथ ानिका उठी और बोली… “छाए में बनाऊं गई…”
और सरला को साथ लेकर कमरे से बहार चली गयी…
तेजस्वी गोविन्द के चेहरे को ग़ौर से देखती हुई… “बीटा… एक बात कहु मैं ने भी दुनिया देखि हे… मेरे फैसले से ानिका बोहत खुश हुई हे… इस को तनहा मत चूर्ण… इस का दिल मत तोरणा… आज तक मेने किसी को नहीं बताया… आज तुम्हे बता रही हु…. ानिका मेरी बेटी नहीं हे… ये बोहत छोटी थी के कोई इससे बेच गया था मेरे पास… मगर में ने माँ बन कर पला और अपनी बेटी और इस में मेने कोई फ़र्क़ नहीं किया कभी… मेरी बेटी 5 साल की हे… परीक्षा नाम हे उस का… मेरे और सय्यानी सेठ के सम्बंद की निशानी हे… सय्यानी सेठ अचे आदमी थे… मगर 4 महीने पहले हार्ट अटैक से उन की डेथ हो गयी हे… अब मेरे पास परीक्षा रह जाये गई… और में दुआ करती हु के ानिका के क़दम वापिस न उठे इस या किसी और कोठे की ओर….”
गोविन्द… “बस तो परीक्षा आज से मेरी बहन हे… और में अपनी बहन को भी कैसे रहने दूँ गए इस कोठे पर… और फिर ये भी बात हे के अपनी माँ को भी कैसे रहने दू यहाँ… बस आप अपना पूरा सामान समेत लीजिये गए… मैं कल आप सब को साथ ले जॉन गए… सरला भी हमरे साथ जये गई…”
ये सुनते hi…. तेजस्वी बाई रोने लगी…
गोविन्द ने उस को अपने गले से लगा लिया मगर वो रोटी रही…
उस के आंसू थे के बहे जा रहे थे… हर बहते आंसू के साथ ज़िन्दगी की तल्खियां भी काम हो रही थी… दिल के ग़ुबार धूल रहे थे… जैसे एक रोशन सुबह हो रही थी….
एक तवायफ को एक माँ बन कर ऐसा लग रहा था के जेसे आज hi उस ने जनम लिया हो…
तेजस्वी बाई ने कुछ दिएर के लिए रोना बंद किया और बोली… “कल किस वक़्त आओगे बीटा… भूल तो नहीं जाओगे अपना वादा…”
गोविन्द… “नहीं माँ… ऐसा कैसे हो सकता हे… में कल 2 बजे तक आऊं गए…”
तेजस्वी बाई… “ठीक हे बीटा हम अपना सामान पैक कर लें गए और में ानिका को भी तैयार कर लूँ गई… और अभी तुम रात का खाना भी खा कर जाओ गए… वैसे भी अब यहाँ मुजरा नहीं होगा…”
गोविन्द… “माँ में छाए पि कर रुखसत लूँ गए… में ने आप लोगो के रहने का इंतज़ाम भी करना हे…”
छाए आ चुकी थी…
सरला ने छाए की त्र उठायी हुई थी… उस के पीछे ानिका थी… चेहरे पर अब एतमाद के साथ शर्म और लाज के रंग भीकरें हुए थे…
छाए के कप खुद उठा कर दी ानिका ने पहले तेजस्वी बाई को और बाद में गोविन्द को…
छाए देने के बाद वो जाने लगी तो तेजस्वी बाई ने कहा… “ानिका बीटा तुम भी हमारे साथ बेथ कर छाए पी लो…”
ानिका ने मुस्कुरा कर देखा और फिर शर्म से नज़रे नीचे करते हुए अपनी गर्दन से इंकार करते हुए चली गयी कमरे से बहार…
तेजस्वी बाई… हंसने लगी… “शर्मा गयी हे ानिका…”
सरला भी बहार निकल गयी कमरे से उस के साथ…
छाए ख़तम हुई तो गोविन्द उठा और विदा कहते हुए जाने लगा तो तेजस्वी बाई बोली… “बीटा तुम ने अपना नाम भी नहीं बताया और न ये बताया के किस संसकृ माँ बाप के बेटे हो जिन्हों ने तुम्हे इतना संस्कारी और आज्ञाकारी बनाया हे…”
गोविन्द… जो अब उठ के खरा हुआ था जाने के लिए तैयार… वो बोलै… “मेरा नाम गोविन्द हे और मेरे पिता का नाम लाला जीवट राम हे…”
गोविन्द ने देखा के तेजस्वी बाई के चेहरे के रंग बदल गए थे….