Kya Govind yunhi tarasta rahe ga - Page 11 - SexBaba
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Kya Govind yunhi tarasta rahe ga

EPISODE – 70

कुछ खुलासा पिछली एपिसोड्स का एंड एक्सप्लनेशन….

कुछ दोस्तों के कमैंट्स के चलते, कुछ कन्फूसिओं नोट किया… इस लिए ये ज़रूरी समझा के नए अपडेट देने से पहले कुछ बातें दोहरा दी जयें…

गोविन्द के असली बाप जिन को वो बापू बुलाता हे… उन का नाम… कैलाश नाथ हे… असली माँ का नाम रजनी हे और ग्विंड उन को माँ hi कहता हे…

गोविन्द सीमा को बचता हे घुँडो से तो लाला जीवट राम उस को अपना बीटा बना लेते हैं… गोविन्द उन को पापा कहता हे… लाला जी की पत्नी का नाम गंगा देवी हे… जिन को गोविन्द माँ कहता हे…

लाला जी अपनी पत्नी गंगा देवी से बोहत प्यार करते हैं और 7-8 साल पहले जब गंगा देवी का ऑपरेशन हुआ और उन के उतेरुस और ओवरीज़ निकलने के कारन वो सेक्स द्वारा कुछ दर और खौफ के कारन अपने पति “लाला जी” को अपने पास नहीं आने देती थी…

लाला जी सेक्स न होने की वजा से परेशां थे तो उन के मैनेजर ने उन को लत लगा दी थी कोठे की… लाला जी एक कोठे पर जाने लगे और 7-8 साल वो उस कोठे पर जाते रहे… उन का सम्बन्ध हो गया था तेजस्वी बाई से जो खुद उस वक़्त एक तवायफ और अब नायिका हैं कोठे की… तेजस्वी बाई उन से खूब माल लूट रही थी… तेजस्वी बाई ने झूट बोलै लाला जी से के उन के नाजायज़ सम्बन्ध के कारन एक बची पैदा हुई हे… और वो अब 5 साल की थी…

हकीकत मैं उन दिनों शहर के एक और सेठ “सय्यानी सेठ” भी कोठे पर आते थे और उन के साथ भी तेजस्वी बाई के सम्बन्ध थे… उस 5 साल की लड़की का नाम हे “परीक्षा”.

तेजस्वी बाई ने काफी समय पहले एक बची खरीदी थी जो अब 18 साल की हो चुकी थी… उस का नाम “ानिका” हे… ानिका को तेजस्वी बाई ने पला और बारे किया और उस की ट्रेनिंग पूरी तरह से एक तवायफ की तरह से की… ानिका ने रक़्स, मुजरा, और गणना गण सीखा… और साथ साथ उस को ये भी सिखाया गया के कैसे एक मर्द को रिझाते हैं… अब 18 साल की होने के बाद उस की “नाथ” उतरनी हे… कोठे की रिवायत के अनुसार “नाथ” कुंवारी लड़की की इस तरह से उतारते हे के उससे बेचा जाता हे एक बरी क़ीमत पर और खरीदने वाले की मर्ज़ी हे के वो शादी करे या फिर बिना शादी के नाजायज़ सम्बन्ध रखते हुए उस को एक कीप या मिस्ट्रेस (स्वामिनी) की तरह से रखे…

खरीदने वाले मर्द की मर्ज़ी हे शादी के बाद या फिर बिना शादी के 4-5 साल या ज़यादा समय के बाद उस को चोर दे और वो लड़की फिर से कोठे पर आ बैठती हे और बस एक तवायफ की तरह से रक़्स या मुजरा स्टार्ट कर के उस गन्दगी वाली दलदल में पूरी तरह से धंस जाती हे…

अब आते हैं आज के अपडेट की तरफ…

तेजस्वी बाई, सरला और ानिका सब ये समझते हे के ये नौजवान जो देखने में किसी अमीर बाप की औलाद हे और वो सौदा करने और खरीदने आया हे ानिका को…

अब तक गोविन्द ने भी तेजस्वी बाई को नहीं बताया था के वो लाला जी का बीटा हे…

ानिका एक तो इतने साल कोठे पर गुज़ारने के बाद वो ज़ेहनी तौर पर तैयार थी के हर तवायफ की तरह से उस को भी इस रिवायत का सामना करना परे गए और वो भी बिकके गई और फिर साड़ी उम्र उस को रक़्स करना हे और मर्दो की जिस्मानी खाव्हिश को पूरा करना हे… वो न चाहती तो भी उस के पास कोई और चॉइस नहीं थी… ानिका अब तक बोहत परेशन थी के उस को जाने कोण खरीदे गए… अब तक 4 सेठ आ चुके थे जो के 50 साल के ऊपर के थे… और एक घुंडा… नामू दादा थे उन के सामने… बस मोल - भाव हो रहा था… कोई भी सेठ या फिर नामू दादा 3 लाख से ऊपर देने के लिए तैयार नहीं था… तेजस्वी बाई की मांग 5 लाख थी… जब भी कोई खरीदार आता था तो ानिका को उस के सामने ज़र्क़ बारक़ लिबास में गहनों के साथ एक दुल्हन बना कर पेश किया जाता था…

ानिका आज इतना ज़रूर सोच रही थी के ये एक रूपवान युवा हे और उस से भी बढ़ कर उस ने आज इस के लिए अपनी जान भी डाव पर लगा दी थी तो वो एक खिंचाव महसूस कर रही थी इस नौजवान की ओर…

इस कोठे पर उस ने जीतनेय भी सबक़ सीखे थे उन में से प्यार मोहब्बत को कोई भी सबक़ नहीं था… उससे किसी ने नहीं बतया था के वो लड़की हे और किसी नौजवान का खवाब उससे देखने हैं… उससे बस उसी का होकर रहना हे… उस के बचे की माँ बनना हे…

मगर वो एक लड़की तो थी ना… उस के अंदर की औरत भी जाग रही थी… के बस यही नौजवान उससे खरीद कर ले जये और साडी उम्र बस अपना बना कर रखे…

जो मेरा है मैं किसी और को क्यों दूँ ...!!!

मैं अपनी मोहब्बत में बच्चों की तरह हूँ...!!


ानिका का दिल भी धारक रहा था… आज पहली बार उस को पता चला था के उत्तेजित होना कहते किस्से हैं… सरला ने उससे बता दिया था के वही नौजवान जिस ने उससे बचाया था दादा से वो उससे खरीदने आया हे… और वो बस यही दुआएं करती जा रही थी के काश ये नौजवान तेजस्वी बाई की बताई रक़म अदा कर दे… मोल टोल ना करे… अगर इस के अपने बस में होता तो बस ये नौजवान एक इशारा करे तो ये साडी दुनिया चोर कर उस के साथ चल परे… अब बस साडी दुनिया बेगानी लग रही थी… कोई अपना लग रहा था तो बस ये नौजवान…

बस इतनी सी तमन्ना है

तेरे रंग में hi रंग जॉन....

रहूं मैं ज़रा मुझ में

तेरी हो के hi रह जाऊं

किसी से न कहाँ है जो

तुम्ही से बात वह कह दूँ

सभी देते हैं दिल अक्सर

मैं तुझको जान भी दे दूँ

यह है सुकून यह है जूनून

यह है टशन इ इश्क़ है

बस इतनी सी तमना है

तेरे रंग में hi रंग जॉन

रहूं मैं ज़रा मुझ में

तेरी हो के hi रह जाऊं....

मुझसे न दूर जा

इल्तजा है मेरी

मुझ पे हक़ है तेरा

ये जान है तेरी

अब मेरा सब तेरा

ख्वाशीष है बस तेरी

किसी से न कहाँ हैं जो

तुम्ही से बात वह कह दूँ

सभी देते है दिल अक्सर

मैं तुझ को जान भी दे दूँ

इधर कमरे में गोविन्द भी मुन्तज़िर हे… ानिका के आने से पहले उस की पाज़ेब की झंकार की जहां जहां गोविन्द के कानो में सुनाई दे रही थी… उस की धरकने भी बेतरतीब थी… और फिर वो दाखिल हुई कमरे में…

कमरा जैसे रोशन सा होगया…

कुरता शलवार में और उस के ऊपर एक बारे सा दुपट्टा उस के जिस्म को ढांपे हुए था… मगर उस का चेहरा ऐसा था के देखने वाले की नज़र कही और क्यों जाती…

उस की निगाह नीचे थी…

उस के चेहरे पर न कोई मेक उप था न कोई ज़ेवर…

Anika.jpg


मगर फिर भी उस के चमकती त्वचा, संकीर्ण चहरे का आकार, गुलाबी भरे भरे रास टपकते होंठ, आँखें बारी, काली, अंदर आँखों के थोड़ी बड़ी दूरी, गहरी संकरी भौहें अधिक, लम्बी और गहरी पलकें, उच्च गाल की हड्डियां, संकरी नाक, और नाक में एक बरी सी नाथ…

लम्बा ऊंचा क़द… नितम्ब और सीने के उभार अच्छी तरह से संतुलित, और कमर भी परिभाषित, नितम्ब स्वाभाविक रूप से गोल, शरीर पूरे अनुपात में, कंधे थोड़े गोल हैं जो के सुडौल नितम्बों के साथ पूरी तरह से संरेखित, और पेअर ऊपरी शरीर के अनुपात में…

है अक्स तेरा मयसर जिस सिम्त भी देखों

किआ हर कोई तुम सा है, या सारा जहाँ तुम हो..!

गोविन्द भी नज़र भर कर उस की ओर नहीं देख रहा था… तेजस्वी बाई की बरी नज़र थी… वो हैरान थी के ये नौजवान ानिका की ओर देख भी नहीं रहा…

एक अद्भुत अनुभव था गोविन्द और ानिका दोनों के दिल में…

दोनों एक दुसरे से काफी दूर थे… कमरे में… मगर दिल दोनों के इतने नज़दीक थे के एक दुसरे की धारकानो को सुन प् रहे थे… उन के होंठ खामोश थे… आँखे नीचे…

उन की ख़ामोशी बात कर रही थी…

सरला ने कमरे आकर जैसे कमरे का सकूट तोर दिया…

सरला… “बाई जी… हल्दी और पट्टी ले आयी हूँ… पट्टी कर दूँ…”

तेजस्वी बाई… “नहीं तुम रहने दो… ानिका तुम पट्टी कार्डो…”

ये सुनते hi ानिका जहाँ खुश हुई वही उस को आज पहली बार शर्म और लजा का अनुभव हो रहा था… उस के हाथ कंपनी लगे थे…

गोविन्द तो जान चुक्का था… तेजस्वी बाई दिल में सोच चुकी थी के ये नौजवान अगर काम मोल भी देगा तो वो सौदा कर दे गई ानिका का… और दूसरी तरफ ानिका के लिए ये बारे मुश्किल था के जिस को वो अपने दिल का मालिक मान चुकी थी उस के इतने क़रीब जाये… सब के सामने…

गोविन्द ने सब की मुश्किल आसान करते हुए और तेजस्वी के मैं को अधिक नरम करने के लिए कहा…

गोविन्द… “माँ… अगर बुरा न मनो तो अपने हाथो से कार्डो पट्टी…”

तेजस्वी बाई का दिल ख़ुशी से झूम उठा और वही ानिका का मुंह खुल गया हेरात से के ये नौजवान बाई को माँ कह रहा हे…

गोविन्द अपनी शर्ट के बटन खोलने लगा…

और तेजस्वी बाई ने फ़ौरन से हल्दी की कटोरी उठा ली हाथ में… खुश थी बोहत…

गोविन्द ने शर्ट के बटन खोलने के बाद सिर्फ उसी तरफ का बाज़ू नंगा किया जहा कट था…

ानिका झुकी झुकी नज़र से देख चुकी थी के इस नौजवान का जिस्म कितना मज़बूत और सुन्दर हे… और वो ये भी समझ रही थे के उस के अंदर एक शर्मीला मर्द हे और वो अपने जिस्म की नुमाइश नहीं करता…

तेजस्वी बाई गोविन्द को हल्दी लगते हुए फूँक भी रही थी… उस के कट पर…

पट्टी होने के बाद… तेजस्वी बाई ने गरम दूध भी उठा कर खुद दिया…

गोविन्द वही तेजस्वी बाई के पास बेथ गया… बाई ने सरला और ानिका को भी बैठने को कहा… वो दोनों उन के सामने वाले सोफे पर बेथ गयी….

गोविन्द ने दूध पि लिया तो ऐसा ज़ाहिर किया जेसे उससे कुछ कमज़ोरी से हो रही हे…

तेजस्वी बाई ने कहा… “बीटा अगर चाहो तो मेरे कमरे में कुछ दिएर के लिए आराम कर लो…”

गोविन्द… “नहीं माँ… बस ज़रा सी कमज़ोरी हे… ठीक हो जॉन गए थोड़ी दिएर में… अगर इजाज़त हो तो कुछ दिएर आप की गॉड में सर रख कर लेत जॉन…”

तेजस्वी बाई ने बरी ख़ुशी से उस का सर थमते हुए अपनी गॉड में रख लिया… गोविन्द ने अपनी आँखे बंद कर्ली…

ानिका और सरला के लिए तो जैसे कोई दारमा सा था… ऐसा कहाँ होता हे के एक तवायफ एक नौजवान को एक एक बीटा बना ले और फिर उस के साथ सगी माँ वाली मोहब्बत भी दिखाए…

अब ानिका ने देखा तो नौजवान की आँखे बंद हैं तो इस ने एक भरपूर नज़र डाली उस के चेहरे पर… और बारे प्यार आया उस के शांत मरदाना चेहरे पर…

तेजस्वी बाई ने देखा के गोविन्द की आँखे बंद हे तो बरी शफ़क़त से उस के माथे पर बोसा दिया…

कुछ दिएर यूँही लेते रहने के बाद गोविन्द सीधा होकर बेथ गया…

अब तेजस्वी बाई ने सोचा के कुछ बात को आगे बढ़ाये…

और बोलने लगी… “तुम ने आज मुझे माँ का दर्जा देकर जो मेरा मान सामान किया हे… तो मुझे तुम से ये बात कहते हुए बोहत मुश्किल पेश आ रही हे के में अपनी बेटी का सौदा करूँ और मोल टोल करूँ… जो तुम दो गए वो मुझे क़बूल होगा… मगर में तुम्हारे सुभाव देख कर… तुम्हारे संस्कार देख कर ये भी नहीं कह सकती के तुम इन चक्रो में पारो… मगर में भी अब बूढ़ी हो रही हु… और मेरे लिए यही माल बुढ़ापे का सहारा हे…”

अब गोविन्द ये सोच चूका था के वो लाला जी के बेटे होने की बात अभी नहीं करे गए…

गोविन्द… “एक तो आज के बाद से आप ये फ़िक्र चोर दो के आप का बुढ़ापे में कोई ख्याल नहीं रखे गए… आज से मेरी ज़िम्मेदारी हे के में ने आप को माँ बोलै हे और में ये रिश्ता निभाऊं गए… और आप बताई इन का कितना मोल चाहिए आप को… में कोई मोल टोल नहीं करूँ गए…”

ानिका का दिल तेज़ी से धारक रहा था… उस की दुआ में शिद्दत आती जा रही थी… उस ने सोच लिया था के बस इसी के साथ जाना हे…

इसी का होकर रहना हे…

सरला के लिए ये बातें बरी अजीब थीं… लेकिन वो भी यही दुआ कर रही थी के बाई ये सौदा मंज़ूर कर लें…

तेजस्वी बाई… के लिए जैसे कुछ और कहने के लिए बचा नहीं था…. उस की गर्दन भी नीचे हो गयी थी… “5 लाख मांगे थे… में ने दूसरो से… तुम जीतनेय भी देदो…”

गोविन्द… ने अपने पास से 5 लाख निकल कर देते हुए kaha…“aap इस से ज़यादा भी मांगती तो में देता… बस अब एक कप छाए पिलवा दें…”

तेजस्वी बाई ने सारे रुप्पे उठा कर अपने बैग में रखते हुए सरला को कहा के छाए बना दे…

मगर अब पुर एतमाद और दमकते चहरे के साथ ानिका उठी और बोली… “छाए में बनाऊं गई…”

और सरला को साथ लेकर कमरे से बहार चली गयी…

तेजस्वी गोविन्द के चेहरे को ग़ौर से देखती हुई… “बीटा… एक बात कहु मैं ने भी दुनिया देखि हे… मेरे फैसले से ानिका बोहत खुश हुई हे… इस को तनहा मत चूर्ण… इस का दिल मत तोरणा… आज तक मेने किसी को नहीं बताया… आज तुम्हे बता रही हु…. ानिका मेरी बेटी नहीं हे… ये बोहत छोटी थी के कोई इससे बेच गया था मेरे पास… मगर में ने माँ बन कर पला और अपनी बेटी और इस में मेने कोई फ़र्क़ नहीं किया कभी… मेरी बेटी 5 साल की हे… परीक्षा नाम हे उस का… मेरे और सय्यानी सेठ के सम्बंद की निशानी हे… सय्यानी सेठ अचे आदमी थे… मगर 4 महीने पहले हार्ट अटैक से उन की डेथ हो गयी हे… अब मेरे पास परीक्षा रह जाये गई… और में दुआ करती हु के ानिका के क़दम वापिस न उठे इस या किसी और कोठे की ओर….”

गोविन्द… “बस तो परीक्षा आज से मेरी बहन हे… और में अपनी बहन को भी कैसे रहने दूँ गए इस कोठे पर… और फिर ये भी बात हे के अपनी माँ को भी कैसे रहने दू यहाँ… बस आप अपना पूरा सामान समेत लीजिये गए… मैं कल आप सब को साथ ले जॉन गए… सरला भी हमरे साथ जये गई…”

ये सुनते hi…. तेजस्वी बाई रोने लगी…

गोविन्द ने उस को अपने गले से लगा लिया मगर वो रोटी रही…

उस के आंसू थे के बहे जा रहे थे… हर बहते आंसू के साथ ज़िन्दगी की तल्खियां भी काम हो रही थी… दिल के ग़ुबार धूल रहे थे… जैसे एक रोशन सुबह हो रही थी….

एक तवायफ को एक माँ बन कर ऐसा लग रहा था के जेसे आज hi उस ने जनम लिया हो…

तेजस्वी बाई ने कुछ दिएर के लिए रोना बंद किया और बोली… “कल किस वक़्त आओगे बीटा… भूल तो नहीं जाओगे अपना वादा…”

गोविन्द… “नहीं माँ… ऐसा कैसे हो सकता हे… में कल 2 बजे तक आऊं गए…”

तेजस्वी बाई… “ठीक हे बीटा हम अपना सामान पैक कर लें गए और में ानिका को भी तैयार कर लूँ गई… और अभी तुम रात का खाना भी खा कर जाओ गए… वैसे भी अब यहाँ मुजरा नहीं होगा…”

गोविन्द… “माँ में छाए पि कर रुखसत लूँ गए… में ने आप लोगो के रहने का इंतज़ाम भी करना हे…”

छाए आ चुकी थी…

सरला ने छाए की त्र उठायी हुई थी… उस के पीछे ानिका थी… चेहरे पर अब एतमाद के साथ शर्म और लाज के रंग भीकरें हुए थे…

छाए के कप खुद उठा कर दी ानिका ने पहले तेजस्वी बाई को और बाद में गोविन्द को…

छाए देने के बाद वो जाने लगी तो तेजस्वी बाई ने कहा… “ानिका बीटा तुम भी हमारे साथ बेथ कर छाए पी लो…”

ानिका ने मुस्कुरा कर देखा और फिर शर्म से नज़रे नीचे करते हुए अपनी गर्दन से इंकार करते हुए चली गयी कमरे से बहार…

तेजस्वी बाई… हंसने लगी… “शर्मा गयी हे ानिका…”

सरला भी बहार निकल गयी कमरे से उस के साथ…

छाए ख़तम हुई तो गोविन्द उठा और विदा कहते हुए जाने लगा तो तेजस्वी बाई बोली… “बीटा तुम ने अपना नाम भी नहीं बताया और न ये बताया के किस संसकृ माँ बाप के बेटे हो जिन्हों ने तुम्हे इतना संस्कारी और आज्ञाकारी बनाया हे…”

गोविन्द… जो अब उठ के खरा हुआ था जाने के लिए तैयार… वो बोलै… “मेरा नाम गोविन्द हे और मेरे पिता का नाम लाला जीवट राम हे…”

गोविन्द ने देखा के तेजस्वी बाई के चेहरे के रंग बदल गए थे….
 
EPISODE – 71

छाए ख़तम हुई तो गोविन्द उठा और विदा कहते हुए जाने लगा तो तेजस्वी बाई बोली… “बीटा तुम ने अपना नाम भी नहीं बताया और न ये बताया के किस संसकृ माँ बाप के बेटे हो जिन्हों ने तुम्हे इतना संस्कारी और आज्ञाकारी बनाया हे…”

गोविन्द… जो अब उठ के खरा हुआ था जाने के लिए तैयार… बोलै… “मेरा नाम गोविन्द हे और मेरे पिता का नाम लाला जीवट राम हे…”

गोविन्द ने देखा के तेजस्वी बाई के चेहरे के रंग बदल गए थे….

उस के चेहरे पर जो ख़ुशी के भाव थे उस की जगा दोष, शर्मिंदगी और मायूसी ने ले ली… वो उठ खरी हुई और गर्दन नीचे झुकाये… कहने लगी…

तेजस्वी बाई… “बीटा… में तुम्हे कुछ और बातें भी बताना ज़रूरी समजह्ती हूँ… वो ये के मेरे लाला जी के साथ भी सम्बन्ध रहे… और में ने उन से काफी माल भी लूटा हे… और में समझती हूँ के में ने ज़यादती की उन के साथ… वो भी बारे माननीय और दयालु मनुष्य हैं और अब कुछ समय से उन्हों ने कोठे पर आना चोर दिया हे और मेरा उन से कोई गिल्ला भी नहीं हे… में भी अब पुरानी ज़िन्दगी के तौर तरीक़ो और शिष्टाचार को चूर्ण चाहती हु… बस मेरी तुम से इल्तिजा हे के मुझे या ानिका को उन से दूर कही ऐसी जगा रखो जहा उन से मुलाक़ात न हो क्यों के में उन से नज़रे नहीं मिला पौन गई…”

Ta'aruf रोग बन जाये तो उसको भूलना बेहतर,

Ta'aluq बोझ बन जाये तो इसको तोरणा ाचा..


वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन,

उसे एक खूबसूरत मोरर दे कर चूर्ण ाचा !!


गोविन्द को भी उन की ये बात ठीक लगी… और वो भी यही तो चाहता था… फिर से उन को तसली देते हुए वह से निकल आया…

गलियां रोशन और आबाद होने लगी थी… हर तरफ एक चहल पहल नज़र आने लगी थी और अब गुज़रते समय के साथ रात भी जवान होने लगी थी इन गलियों में…

गोविन्द ने यूँही चलते हुए चेक किया नामू दादा को तो उस के ज़ेहन में गोविन्द के प्रति कोई ग़ुस्सा नहीं था मगर वो आज रात जाने वाला था बाई के कोठे पर अपने कुछ गुंडे ले कर और उस का प्लान था के वह दंगा फसाद करे गए… गोविन्द ने उस के दिमाग़ को शांत करते हुए अगली रात के लिए तैयार कर लिया… इस लिए के गोविन्द ने दोपहर को hi वह से सब को निकल लेना था….

वो अपनी कार तक आकर अकादमी की ओर चल पारा…. अकादमी में उस ने अपनी कार में रखे बैग में से सूट निकल कर चेंज किया तो इंस्ट्रक्टर ने आज उससे कुछ लाइट एक्सरसाइजेज के बाद स्विमिंग के लिए बोलै… मुश्ताक़ पहलवान भी वही मौजूद था…

गोविन्द ने बताया के वो स्विमिंग नहीं कर सकता क्यों के उस को बाज़ू प् कट हे तो वो एक दो दिन इससे ज़यादा पानी से बचाना चाहता हे…

मुश्ताक़ पहलवान ने उससे कुछ रनिंग और दूसरी एक्सरसाइजेज के लिए कह कर कहा के जब ट्रेनिंग सेशन ख़तम हो जये तो उस की ऑफिस में ाज्ये…

ट्रेनिंग के बाद गोविन्द उस की ऑफिस में गया…

पहलवान कुछ कंप्यूटर पर काम कर रहा था… उस को बैठने के लिए बोलते हुए अपना रुख किया गोविन्द की तरफ… और बोलै… “गोविन्द में जब पहली बार तुम से मिला था तो तभी में ने तुम में कुछ अलग और कुछ खास नोट किया था… मुझे नहीं पता तुम में ऐसा किया हे… वो अगर तुम बटन चाहो तो तुम्हारी मर्ज़ी हे… एक और बात ये के… इंस्ट्रक्टर्स की रिपोर्ट मेरे पास आगयी हे जिस के अनुसार तुम्हारे अंदर कुछ खूबियां हे जैसा के अविश्वसनीय गति, धैर्य, आत्मविश्वास, फोकस, आत्म अनुशासन… और ये सब खूबिया एक नए सीखने वाले फाइटर के लिए बोहत ज़रूरी होती हे… और तुम इसी तरह अपनी खूबियों का उपयोग करते रहे… तो तुम बोहत जल्दी ट्रेनिंग कम्पलीट कर लोगे… पहले तो ये बताओ के तुम्हे चोट कैसे लगी… फिर उस के बाद में तुम से एक और बात पूछना चहु गए…”

गोविन्द ने जवाब में उससे बताया… “मेरे पिता एक कोठे पर जाया करते थे और उन को वह से ब्लैकमेल किया जाने लगा था… तो में वह नायिका को समझने गया था के रस्ते में एक गुंडे से लड़ाई हो गयी और में ने एक लड़की की इज़्ज़त बचाई और उस लड़की का सौदा हो रहा था और उस को बेचा जा रहा था तो में ने उस लड़की को खरीद लिया हे और चाहता हूँ के वो लड़की इस तरह समाज में रुस्वा न हो और अपनी ज़िन्दगी गुज़ारे एक आम लड़की की तरह इज़्ज़त से… और दुसरे ये के वो लड़की बचपन में भी अपहरण हो कर बिक चुकी हे तो में उस के घर वालों को भी ढूंढ़ना चाहता हु… इस बीच मेरे पास ऐसी जगा भी नहीं जहा उस लड़की को रखा जा सके… तो मुझे ये पता चला था के आप की अकादमी में हॉस्टल में छात्र ट्रेनी रहते हे… वो यहाँ अगर हॉस्टल में रहे तो एक तो ये के वो सेफ रहे गई और दुसरे ये के वो आत्मरक्षा भी सीख जये गई… और वो नायिका भी अपना धंदा चूर्ण चाहती हे… उस के लिए भी कुछ सोचना हे…”

पहलवान… “मुझे ख़ुशी हुई ये सुन कर के तुम मज़बूत चरित्र और साहस रखने वाले युवा हो… यहाँ हॉस्टल में तो मेल ट्रेनी हे… मगर लड़की की समस्या हल हो सकती हे… मेरी सिर्फ एक hi बहन हे… न माँ हे न बाप… मेरी बहन भी ग्रीन बेल्ट तक करते की ट्रेनिंग ले चुकी हे… तो वो लड़की उस के साथ हमारे घर में रह कर ट्रेनिंग भी ले सकती हे…”

गोविन्द… “आप का बोहत शुक्रिया के आप ने मेरी इतनी बरी समस्या हल कर दी… और में ये भी चहु गए के आप मेरी मदद भी करे उस लड़की की फॅमिली को खोजने में… में कल उस लड़की को अपने साथ ले आऊं गए…”

पहलवान… “ये सब ठीक हे… हो जये गए… और में जितनी तुम्हारी सहयोग कर सका ज़रूर करूँ गए… मगर में तुम से एक बात और भी करना चाहता हु जिस के कारन में ने तुम्हे यहाँ बुलाया था… मेरे एक इंस्ट्रक्टर ने ये नोट किया हे के तुम्हारी आँखों में ज़यादा दिएर तक देख पाना मुश्किल हो जाता हे ऐसा क्यों हे… तुम अगर न बटन चाहो तो न बताओ और हो सकता हे तुम्हारे अंदर कुछ ऐसी शक्ति हो जिस के बारे में तुम्हे खुद पता न हो तो में तुम्हे कुछ एक्सरसाइजेज और टेक्निक्स बता सकता हु जिन से तुम्हारी शक्ति अधिक बढ़ जये गई… लेकिन हमें इस के लिए अलग से बैठना परे गए हफ्ते में दो बार… और ये टेक्निक्स वैसे भी एक फाइटर को हेल्प करती हैं…”

अब गोविन्द की समस्या ानिका के हवाले से तो हल हो चुकी थी फिर उस ने कॉल किया आशा को वो अपनी रेजिडेंस पर आचुकी थी… और उस को बताया के वो उस के पास आरहा हे कुछ ज़रूरी काम हे…

गोविन्द आशा के रेजिडेंस पोहंच गया… आशा मुस्कुरा कर उस से मिली…

गोविन्द ने आशा को सारा क़िस्सा सुनाया जो के वो पहलवान को सुना चुक्का था…

गोविन्द… “आशा… अगर तुम्हे मंज़ूर हो तो में चाहता हूँ के तुम तेजस्वी बाई, परीक्षा और सरला को अपने साथ रखो… परीक्षा को अछि एजुकेशन मिले और बाई के लिए परिवर्तन आसान हो जये… और तुम्हे भी कंपनी मिल जये गई… और साथ साथ तवायफ या वैशिया के लिए पुनर्वास ट्रस्ट संघटन भी बनाये और तुम या बाई उस में अपना किरदार ऐडा करो… फंडिंग में खुद करूँ गए…”

आशा… “तुम्हारी सोच तो बोहत अछि हे… और में पूरी सहायता करू गई… और मेरे पास तो वैसे भी 3 बैडरूम खली हे… तो कोई प्रॉब्लम नहीं हे… जब चाहो उन को ले आओ… लेकिन ये बात समझ लो के जब मेरी पोस्टिंग चेंज होगी तो फिर उन को मेरे साथ साथ जाना परे गए…”

गोविन्द… “हम्म्म… ठीक हे… और अपने कुक को कह दो के कल दोपहर का खाना बना ले… में उन को कल 3 बजे तक यहाँ चोर दूँ गए… और ानिका को अकादमी चोरुन गए वो वह पर ट्रेनिंग ले गई… और तुम्हे मेरी मदद करनी होगी उस की फॅमिली को ढूंढ़ने में…”

आशा… “में तुम्हारी मदद करूँ गई…” और फिर कुछ दिएर खामोश रहने के बाद… “तुम पसंद करते हो ानिका को…” अब आँखें नीचे कर लीं थी आशा ने…

गोविन्द… “इधर देखो… मेरी तरफ…”

आशा ने उस की ओर नज़रे ुताःई… नज़रो में एक शिकायत थी…

फिर गोविन्द उस की आँखों में देखते हुए बोलै… “आशा… में तुम से झूट नहीं बोलों गए… वो अछि लड़की हे… मगर जब तक उस की फॅमिली का पता नहीं चल जाता के वो कोण हे… में उस के बारे में न hi ाचा सोच सकता हु न बुरा… में ने उस की मदद इस लिए नहीं की थी के उस के साथ सम्बन्ध बनाऊ गए… मुझे ये आशा हे के तुम हर समस्या में मेरी मदद करोगी न के शक… मेरी ताक़त बनो… मेरा साथ दो…”

अब आशा कुछ रिलैक्स हुई… “सॉरी गोविन्द में कुछ जज़्बाती हो गयी थी… में तुम्हारे साथ हु… में ने वैसे भी शादी नहीं करनी तो में तुम्हे क्यों रोकूं… बस मुझ से कभी झूट मत बोलना… में तुम से प्यार करती हु और करती राहु गई… मुझे इस से फ़र्क़ नहीं परता के तुम किसी और से अगर कोई रिश्ता बनाना चाहो…”

आशा कुछ दिएर चुप रहने के बाद एक डैम तीखी आवाज़ में बोली… “तुम 18 साल के… मुझे पता लिया… सब कुछ भी कर लिया मेरे साथ… रघु को पकड़ने में पुलिस की सहायता की… लाला जी की बेटी को भी बचा लिया… उन के bête बन गए… फिर उस के बाद अपने बाप को सीधा करदिया… उस को तवायफ के चुंगल से भी चुर्रा लिया… ान तवायफ की बेटी को भी खरीद लिया… तवायफ को मजबूर करदिया लाइफ ट्रांसफॉर्मेशन के लिए… काफी घटनापूर्ण जीवन गुज़ारा हे थोड़े समय में तुम ने… तुम हो क्या चीज़…”

गोविन्द… आँख मरते हुए… “यार चीज़ें तुम साड़ी देख hi चुकी हो…”

आशा के चेहरे पर शर्मीली मुस्कुराहट उभरी… वो गोविन्द की बात का मतलब समझ चुकी थी…

गोविन्द… “यार द्क्प मैडम ये इन्वेस्टीगेशन चोरो… चीज़ें तुम साड़ी देख hi चुकी हो… चलो अब जल्दी से खाना खिलाओ… बोहत भूक लगी हे…”

खाना खाने के बाद… गोविन्द ने उस से पुछा… “क्या कोई चांस हे बैडरूम में चलें…???”

आशा शर्मायी फिर हंसने लगी… “स्टुपिड हो बारे… ऐसे hi तंग करते हो… पता भी हे तुम्हे के कुक और दुसरे मुलाज़िम हे यहाँ…”

गोविन्द… “ाचा यार एक बार किश तो करने दो…”

आशा मुस्कुराते हुए… “ाचा तुम मेरी स्टडी में चलो… में आती हु…”

गोविन्द के स्टडी में आने के कुछ दिएर के बाद आशा भी आगयी और आते hi उस के गले लग गयी… कुछ दिएर किश करने के बाद… उस के गले में बांहे डालते हुए बोली…

आशा… “यहाँ तुम्हरी बाई और सरला आगयी तो ये किश भी नहीं मिले गई…”

गोविन्द ने एक बार फिर उस के होंठ चूमते हुए कहा… “बचा… मनुष्य को मिल hi जाता है जो उसके भाग्य में लिखा होता है; जल्द या दिएर...”

आशा उस को दूर धकेलते हुए और हँसते हुए… “बारे ड्रामा हो तुम…”

गोविन्द उस को आँख मरता हुआ वह से निकल कर घर आगया…

अगले रोज़ कॉलेज अटेंड करके जल्द निकल आया और ेषणा और किरण की एडमिशन स्कूल में करवा दी… वहां से चला गया विक्रम के पास और उस से कार और एक मोटरसाइकिल का पुछा… बापू और प्रकाश के लिए… वो अर्रंगे कर चुक्का था… उस को पेमेंट करके बताया के अगले रोज़ प्रकाश भैया आएं गए और कार और मोटरसाइकिल उन के नाम करवा दे और डिलीवरी भी उन को देदे… उस को बताया के किरण और ेषणा की एडमिशन स्कूल में हो गयी हे… अब जल्द से जल्द घर को रेनोवेट कवाओ और माँ और किरण को शहर ले आओ…

और फिर उस से एक छोटी कार और साथ में 2 कर्मचारी का कहा और उन को लेकर चला आया तेजस्वी बाई के कोठे पर…

वो लोग पैकिंग करके उस का वेट कर रहे थे… 5 सुईटकासेस थे उन के…

ानिका का सूटकेस गोविन्द ने अपनी कार में रखवा दिया और बाक़ी सब सुईटकासेस उस ने दूसरी छोटी कार में रखवा दिए… दूसरी कार के ड्राइवर को उस ने द्क्प की रेजिडेंस में जाने का कहते हुए इन सब को अपनी कार में बिठा कर ले आया… तेजस्वी बाई को अपने साथ अगली सीट पर बिठाया…

गोविन्द पहले hi मंद कण्ट्रोल करते हुए तेजस्वी बाई से ये मालूम कर चुक्का था के ानिका को बचपन में जब बेचा गया था तो उस के गले में एक लॉकेट था और वो लॉकेट बाई ने संभल कर रखा हुआ था… तेजस्वी बाई ने पैकिंग करते समय वो लॉकेट एक अलग लिफाफे में दाल कर गोविन्द को दे दिया था…

परीक्षा बोहत पायरी लगी गोविन्द को… परीक्षा को उस ने यही कहा के वो उससे भैया कह कर बुलाये गई… ानिका पिछली सीट पर बैठी दुपट्टा से चेहरा ढके हुए थी… साफ़ लग रहा था के वो शर्मा रही हे…

कार चलते हुए गोविन्द ने बैक मिरर से देखा के वो उससे देख रही हे… और नज़र मिलते hi उस ने अपनी आँखे झुका ली…

द्क्प अपनी रेजिडेंस पर आचुकी थी… उस ने सब का स्वागत किया… और सब का सामान भी उतरवा कर उन के कमरों में सेट कर दिया…

आशा ने खुद से परीक्षा का सारा सामान अपने कमरे में सेट कर दिया था…

एक कमरा तेजस्वी बाई के लिए था और दूसरा कमरा दिया गया सरला को…

तेजस्वी बाई और सरला पहले थोड़ी चिंतक नज़र आयी मगर फिर उन को भी ाचा लगा वह पर…

कुक और दुसरे मुलाज़िमों को यही बताया के द्क्प की बुआ हैं और उन के बचे हैं…

ानिका को देख कर आशा भी बोहत खुश हुई… और उस से अछि तरह से बात की..

सब ने लंच ीखते किया… ानिका इस बीच चुप थी…

लंच के बाद, गोविन्द ने तेजस्वी बाई से इजाज़त मांगी जाने के लिए…

तेजस्वी बाई… “बीटा ख्याल रखना ानिका का… और तुम बेटी… गोविन्द की हर बात मन्ना…”

आशा ख़ामोशी से सब देख और सुन रही थी… उस के चेहरे पर किसी किस्म के कोई भाव नहीं थे… मगर अंदर से वो ऐसा महसूस कर रही थी जैसे उस की मिलकियत में कोई भाग्यदार आ गयी हो…

गोविन्द बहार निकला तो ानिका भी ख़ामोशी से उस के पीछे निकल आयी… ये पहली बार था के आशा बहार नहीं आयी थी गोविन्द को चोर्ने…
 
बीआरओ अत्ति सुन्दर... रिव्यु.... दिल से लिखा आप ने....

बीआरओ में इतने म्हणत बस आप दोस्तों के लिए hi कर रहा हूँ.... उस वक़्त भी कर रहा था जब कोई पूछता न था... और आज तो दोस्त इतनी मोहब्बत दे रहे हैं....

डोंट वोर्री मेरी म्हणत में कम्मी नहीं होगी.... हाँ ये हो सकता हे के किसी अपडेट में ज़यादा कैपेसिटी न हो तो अननेसेसरी भी किसी अपडेट को स्टफ उप नहीं करूँ गए.... !!!! 🙏
 
EPISODE – 72

गोविन्द बहार निकला तो ानिका भी ख़ामोशी से उस के पीछे निकल आयी… ये पहली बार था के आशा बहार नहीं आयी थी गोविन्द को चोर्ने…

कहते हे ज़िन्दगी समय के हर पल के साथ बदलती हे… कभी हम उस परिवर्तन को महसूस करते हैं और कभी हम उस को अनदेखा कर देते हे…

आशा का ख्याल था के तेजस्वी बाई ने जो फैसला लिया हे वो उस की ज़िन्दगी के लिए एक बोहत बारे परिवर्तन हे… मगर इस समय वो ये सोच रही थी के ानिका का गोविन्द की ज़िन्दगी में आना एक बारे परिवर्तन का आग़ाज़ हो सकता हे… वो अपने खयालो से बहार आयी जब तेजस्वी बाई ने कहा के वो कुछ दिएर आराम करे गई… सरला भी उस के जाते hi अपने कमरे में चली गयी…

अब आशा का धयान गया सरला की ओर… इस बेचारी की क्या ज़िन्दगी हे…

पता नहीं इस बेचारी ने किसी ज़िन्दगी गुज़री हे… कैसे कैसे सितमं हुए होंगे इस के बदन पर… आशा अपने बारे में सोचने लगी के में एक औरत हु और मेरी एक पहचान हे एक महिला की जिसे समाज के द्वारा दिए गए भूमिका को स्वीकार भी किया जाता हे… महिला अपनी भूमिका निभाहते हुए अपने hi दुसरे रुख या रूप से जुरति हे जिस को पुरुष कहते हे और फिर माँ बनती हे… मगर हिजड़ा का क्या जिसे कोई चक्का या फिर इसी तरह के दुसरे अपमान जनक शब्दों से पुकारा जाता हे…. पता नहीं ये समाज इन को इन का मक़ाम कब दे गए…

मर्द और औरत की तरह से समाज इस जीती जागती तख़लीक़ "हिजड़ा" को क़बूल न करते हुए बस इस के नामकमल वजूद के कारन इस को धुत्कार देता हे…

फिर उस को ख्याल आया परीक्षा का… देखा तो वो बैडरूम में अपने कुछ टॉयज के बैग को चेक कर रही हे… आशा अब वाशरूम में आगयी चेंज करने के लिए… फिर से सोचने लगी गोविन्द के बारे में… और खुद hi सवाल करने लगी और खुद hi जवाब देने लगी….

आशा की सोच… “मेने तो सोच लिया हे के में शादी नहीं करूँ गई… फिर मुझे बुरा क्यों लग रहा हे… और में ने भी तो गोविन्द को यही कहा था… वो मुझ से उम्र में भी छोटा हे… में उससे शादी के लिए कह भी तो नहीं सकती… वो भी मुझे प्यार तो करता हे… लेकिन हम ने कोई कमिटमेंट भी तो नहीं की थी आपस में…”

अपनी शर्ट उतारी और अपने जिस्म को ग़ौर से देखने लगी… आईने में…

आशा की सोच… “मेरा जिस्म भी काम खूबसूरत नहीं हे… मेरी आँखें… मेरे होंठ… मेरे चेहरा ानिका से काम ख़ूबसूरत तो नहीं…”

आशा की सोच… “मगर ये भी तो सच हे के गोविन्द ने मुझ से छुपाया नहीं… वर्ण वो चाहता तो सिर्फ ानिका को खरीद कर उस को कही रख लेता कीप… मुझे भी कैसे पता चलता फिर… लेकिन उस ने तेजस्वी और उस की बेटी को और साथ में सरला को भी उस दलदल से बहार निकला और परिवर्तन के लिए मदद की… गोविन्द अपनी बात का मान रखे गए… उस ने कहा हे के वो ानिका की फॅमिली को ढूंढें गए… तो वो ज़रूर ढूंढें गए और में भी उस की सहायता करूँ गई…”

आशा की सोच… “शायद उस की फॅमिली मिलने के बाद वो भी गोविन्द को एक्सेप्ट न करे… लेकिन मेने अगर शादी नहीं करनी तो मुझे इस बात से फ़र्क़ क्यों परता हे के वो ानिका के साथ अफेयर चलए गए या फिर किसी लड़की से शादी करे…”

अब उस का दिमाग़ घूमने लगा था तो वो फ़ौरन वाशरूम से कपड़े चेंज करके बहार आगयी…

बहार आते hi उस की नज़र पारी… परीक्षा पर जो एक लूडो बोर्ड सामने रखे हुए खेल रही थी… उस के मासूम चेहरे पर संतोष और उत्साह और ख़ुशी के भाव थे…

ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो

भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी

मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन

वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी

ज़यादा कुछ नहीं बदलता, उम्र के साथ, बस बचपन की ज़िद समझौतों में बदल जाती हे…

अब आशा सोचने लगी के केसा होता हे ये बचपन… जीवन का एक चरण… जिस में कोई फ़िक्र, कोई घूम नहीं होता… बस बचा अपने मैं की करता हे… और अपने मैं की सुनता हे… मुझे भी बचा बनते हुए बस अपने मैं की सुन्ना चाहिए… और उससे ऐसा लगा जेसे वो अब शांत हो गयी हो…

और आगे बढ़ कर परीक्षा को अपनी बांहो में लेकर बोलने लगी… “साथ खेलें…” परीक्षा भी खुश हो गयी और उस ने दुबारा से लूडो बोर्ड को सेट कर दिया…

अब आशा ने बस इतना सोचा… “गोविन्द… तुम्हारा धनव्वाद के तुम ने मेरी तन्हाई दूर कर दी…” और दोनों लूडो खेलने लगी…

अब कुछ ज़िकर गोविन्द और ानिका का…

आशा के घर से निकलते हुए उन को 3.30 पं हो चुके थे… और 4 से 5 बजे तक मैनेजर ने तेजा के बन्दे का वेट करना था लॉबी में… अब अगर वो ानिका को ले जाता हे अकादमी तो वह पर पहलवान के साथ बात चीत करने के कारन वो मैनेजर को चेक नहीं कर पये गए… दुसरे ये के वो कुछ बातें ानिका के साथ भी करना चाहता था… इस लिए वो ानिका को साथ लेते हुए एक कफ कैफ़े में आ बैठा और दो कॉफ़ी का आर्डर दे दिया…

अभी कुछ वक़्त था… 4 बजने में…

ानिका का चेहरा नीचे… आँखे झुकी हुई… वो नर्वस थी… पहली बार यूँ गोविन्द के सामने… इस तरह से बैठी… गाल लाल थे शर्म से… उस ने हलके गुलाबी रंग का साटन का एम्ब्रॉइडरेड कुरता और पजामा पहना हुआ था… सुन्दर लग रही थी वो…

गोविन्द… “ानिका…”

ानिका चुप रही… न बोली कुछ… बस अपने हाथ अपनी गॉड में रख कर उंगलिया मरोर रही थी…

गोविन्द… “टूट जयें गई….”

उस ने हार्ट से अपनी आँखे ऊपर उठाते हुए… गोविन्द की ओर देखा और बोली… “जी…” होंठ काँप रहे थे उस के…

गोविन्द मुस्कुराते हुए… “आप की उँगलियाँ टूट जयें गई… इतनी ज़ोर से मरोर रही हैं आप उँगलियों को…”

ानिका ने सहरमिली मुस्कराहट से अपने हाथ चोर दिए और दोनों हाथ टेबल पर रख कर दूसरी ओर देखने लगी…

गोविन्द पहले hi अपनी ालमिरह से लाला के मैनेजर की सेफ से निकले गहनों में से कुछ ले आया था… और इस वक़्त उस के पास एक छोटे शॉपिंग बैग में थे… उस ने उन में से एक रिंग वाला बॉक्स निकला… और आहिस्ता से ानिका का लेफ्ट हैंड जो टेबल पर था उस को थम लिया…

ानिका की आँखे और नीचे हो गयी और वो ये भी न कह पायी के ये क्या कर रहे हो ये ओपन स्पेस हे… उस ने बोलना चाहा मगर उस को ऐसा लगा जैसे आवाज़ उस के गले में फँस गयी हे…

गोविन्द ने दुसरे हाथ में पकरि हुई रिंग को उस की ऊँगली के पास लेट हुए… बोलै… “ानिका… इजाज़त हे… पहना दूँ…”

ानिका ने सर ऊपर उठा कर पहले अपने हाथ को देखा जो के गोविन्द के सख्त मरदाना हाथ में था, फिर रिंग को देखा… डायमंड रिंग… एक छोटा सा हीरा जगमगा रहा था… फिर देखा गोविन्द की ओर और गार्डन फ़ौरन नीचे करते हुए हाँ में सर हिला दिया…

गोविन्द ने बोहत प्रेम से उस का हाथ कामुक तरीके से सहलाते हुए अंगूठी ऊँगली में दाल कर हाथ को यूँही थामे रखा…

ानिका का दिल तेज़ी से धरकने लगा… उस का दिल छह रहा था के वो भी गोविन्द का हाथ ज़ोर से थाम ले… और उस को महसूस करे… मगर हिम्मत कहाँ से लाती… ये सब करने के लिए…
 
येह बीआरओ... तेरे वास् टाइम व्हेन नोबडी गावे देय अटेंशन तो थे स्टोरी एंड ी थिंक एच स्टोरी है तो जो थ्रू थिस फ़्रस्ट्रेटिंग फेज... आईटी वास् okay फॉर में बूत व्हाट बोथेरेद में वास् तहत ी वास् रेगुलरली उप्दतिंग थे स्टोरी एंड तेरे वेरे गीगान्टिक नंबर ऑफ़ व्यूज एंड विजिट्स तो थे स्टोरी बूत no ओने टूक थे पैन तो सिम्पली व्रिठे ओने और तवो वर्ड्स ऑफ़ थे अप्प्रेसिअशन.... अन्य्वयस... ी थिंक हार्ड पहसे इस ओवर एंड ी ऍम नाउ थोरोगःली ग्रेटफुल फॉर थे पट्रोनागे....
 
EPISODE – 73

गोविन्द चेक कर रहा था… मैनेजर के दिमाग़ में… 4 बज चुके थे… कफ भी आ गयी थी…

गोविन्द ने ानिका का हाथ चोरते हुए उससे कफ पीने का कहा…

हाथ चोर्ने पर ानिका ने सुख का साँस लिया… ऐसा नहीं था के उससे ाचा नहीं लग रहा था… मगर ये पब्लिक प्लेस था इस लिए वो असुविधा जनक महसूस कर रही थी…

ानिका भी अब कुछ बेहतर फील कर रही थी…

उस ने धड़कते दिल के साथ पुछा… “आप का ज़ख़्म अब केसा हे…”

गोविन्द मुस्कुराया… “ठीक हे अब…”

गोविन्द… अब चढ़ते हुए… अपनी शर्ट के बटन पर हाथ रखते hue…“dikhaun शर्ट खोल के ज़ख़्म…”

ानिका… ने फ़ौरन से आँखे उठा कर उस की ओर देखते हुए परेशनी से हाथ आगे करते हुए इशारे से… “नहीं नहीं… ये क्या कर रहे हैं यहाँ par…public प्लेस हे ये…”

गोविन्द ने हाथ हटा लिया और हंसने लगा…

ानिका समझ गयी के उससे चढ़ रहा था गोविन्द… उस ने शर्म से अपनी आँखे नीचे कर ली और कफ पीना चोर दिया…

गोविन्द… “कफ तो पियो यार… अगर नहीं पियो गई तो शर्ट उतर दूँ गए अपनी…”

ानिका ने उस की शरारत समझते हुए मुस्कुरा कर फिर से कफ का कप उठा लिया…

मैनेजर को चेक किया तो तेजा का बाँदा आ चूका था… कोड वर्ड्स एक्सचेंज करने के बाद वो दोनों मैनेजर के कमरे में जा चुके थे…

गोविन्द ने ानिका को कहा के वो वाशरूम से हो कर आता हे…

वो जल्दी से वाशरूम में आज्ञा और देखा के वो बाँदा जिस का नाम डेरेक हे और वो बैग खोल रहा हे… मैनेजर उस के पास खरा हे…

एक बैग खुला… उस के अंदर नेव्स्पपेर्स हैं… डेरेक ने हैरान हो कर देखा मैनेजर की ओर… मैनेजर भी परेशन हो गया…

डेरेक ने दूसरा बैग भी खोल लिया जल्दी से… उस के अंदर भी नेव्स्पपेर्स… अब डेरेक ने अपने कोट के अंदर से कॉल्ट निकाल कर मैनेजर के सर पर रख कर कहा “कॅश किधर हे…”

अब गोविन्द ने मैनेजर के दिमाग़ को चेक किया तो वो खुद भ्रमित था… उस ने तो हवेली से बैग्स लेने के बाद से खोले भी नहीं थे… वो ये समझ रहा था के सेठ रेजेन्दर ने उससे शिकार बनाया हे… रघु की वजा से ज़मीन का काम बिगार्ने के कारन…

अब गोविन्द ने मैनेजर को प्रभाव करते हुए ये उस के दिमाग़ में डाला के उस को यहाँ से निकल जाना छाइये वर्ण ये लोग इससे मरे गए और हिंसा करे गए या फिर उस की हत्या कर दें गए…

इस लिए उस ने एक हाथ से डेरेक के कॉल्ट वाले हाथ पे हाथ मारा और दुसरे हाथ से डेरेक के मुंह पर मुक्का मारा…

मैनेजर फाइट में इतना एक्सपर्ट नहीं था… मगर उस की सपोर्ट कर रहा था गोविन्द…

डेरेक के हाथ से कॉल्ट गिरा तो उस ने भी जवाबी वार करते हुए मैनेजर के मुंह पर मुक्का मारा… मैनेजर सेह न पाया और बीएड पर जा गिरा… डेरेक उस के ऊपर लपका… जैसे hi वो पास आया… मैनेजर ने लेते hi अपनी दोनों टंगे उठा कर डेरेक के सीने पर दे मरे… ये डेरेक की बदक़िस्मती थी के वो पीछे जा टकराया… पीछे राखी वैनिटी तबकले से… और उस का दिमाग़ थोड़ा सा घूमा और कुछ गोविन्द ने भी उस के दिमाग़ को चक्र कर कुछ दिएर के लिए उस का उठना विलम्ब करते हुए… मैनेजर को उकसाया के वो कॉल्ट उठा ले… अब कॉल्ट मैनेजर के हाथ में था… और उस ने तान लिया डेरेक के ऊपर…

मैनेजर… “ख़बरदार… जहाँ हो वही परे रहो… उठना मत वर्ण फायर कर दूँ गए…”

डेरेक ने ऐसा hi किया… “मगर तुम ग़लत कर रहे हो… माफिया के रुप्पे तुम्हे हज़म नहीं होंगे… कुत्ते की मोट मरे जाओ गए… बेहतर हे के तुम अपने आप को सरेंडर कर दो…”

मैनेजर… “ताकि तुम लोग मेरी हत्या कर दो… या मेरे साथ हिंसक व्यवहार करो…”

डेरेक… “तुम्हे रुप्पे तो देने परेन गए…”

मैनेजर… “मुझे नहीं पता के रुप्पे कहाँ गए… ये बैग्स में ने सेठ की हवेली से लिए थे और जैसे के तैसे बंद hi हैं में ने तो खोले भी नहीं थे… तुम ने अभी खोले हैं… और मुझे लगता हे के सेठ ने खुद मेरे साथ धोका किया हे… इन बैग्स में तो पहले से hi कॅश नहीं था…”

डेरेक… “ठीक हे अगर ऐसी बात हे तो चलो डॉन के पास…”

मैनेजर… “मुझे बचा समझते हो… जिस की मेने बरसो खिदमत की उस सेठ ने मुझे धोका दिया और तुम लोग मुझे इन्साफ दो गए… मुझे बेवक़ूफ़ न बनाओ और उलटे हो जाओ…”

डेरेक… ने उस की बात मानते हुए अपने रुख दूसरी तरफ किया तो मैनेजर ने उस के सर पे ज़ोर से हैंड गृप वाला हिस्सा दे मारा…

अब गोविन्द वापिस आगया ानिका के पास… वो कुछ परेशां लग रही थी…

गोविन्द… “सॉरी यार वो वाशरूम से निकला तो एक दोस्त मिल गया था उस से कुछ दिएर बात कर रहा था…”

ानिका चुप रही… कुछ बोली नहीं…

डेरेक के बेहोश होने का बाद मैनेजर ने अपना ज़रूरी सामान समेटा और नीचे आ कर होटल से निकल कर एक जगा से दौलत पुर कॉल कर के अपनी फॅमिली को कहा के वो घर को लॉक करके अपने मइके चले जाएँ और खुद भी फ़ौरन ट्रैन स्टेशन पोहंच गया मुमबई से निकलने के लिए…

अब चलते है आशा की ओर….

आशा और परीक्षा को लूडो खेलते हुए हुए 1 घंटे से भी ऊपर का समय हो चूका था… मगर दोनों में से कोई भी नहीं थका था… दोनों बोहत खुश थी…

एक और नयी गेम स्टार्ट होने से पहले तेजस्वी और सरला भी आ गयीं वही पर… तो परीक्षा ने कहा के आप लोग भी खेलें… आशा ने भी उनको बुलाया तो फिर यूँ तये किया के आशा और परीक्षा पार्टनर बन गयीं और तेजस्वी और सरला उन के मुक़ाबिल पार्टनर बन गयीं…

बीएड पर… आशा की लेफ्ट साइड में तेजस्वी और राइट साइड पर सरला थी… था तो डबल बीएड मगर फिर भी इन चरों को काफी नज़दीक बैठना पारा…

स्टार्ट किया गेम परीक्षा ने और उस के बाद टर्न थी सरला की और उस के बाद आशा की और फिर तेजस्वी… होता ये था के परीक्षा डाइस रोल करने के बाद डाइस देती थी सरला को और सरला अपनी टर्न के बाद डाइस देती थी आशा को…

कुछ दिएर खेलने के बाद आशा को बोहत अजीब फील होने लगा… सरला के हाथ काफी खुरदुरे थे मर्दो की तरह.. पहले तो आशा ने नोटिस नहीं किया मगर फिर उस को कुछ उतेजिना होने लगी…

ऐसा नहीं था के सरला उस के हाथ को छू रही थी… मगर अनजाने में हाथ टच हो रहे थे एक दुसरे के साथ… और जब कुछ दिएर गुज़री तो आशा का घुटना चुने लगा सरला के घुटने के साथ… दूसरी तरफ उस का घुटना तेजस्वी से भी छू रहा था मगर सरला के जिस्म में, घुटने में सख्ती थी मर्दो की तरह… ये आशा को काफी उत्तेजित करना लगी…

आशा ने तिरछी नज़र से देखा सरला की तरफ तो एक तो उस की पूरी तवजा थी लूडो पर और दुसरे ये के उस के सीने के उभार भी अचे खासे थे… तो आशा ये सोचने लगी के फिर मुझे उनकंफर्टबले क्यों लग रहा हे… ये पूरी औरत की तरह hi हे और ये तो इतना समय से बाई लोगों के साथ हे… अगर ऐसी कोई अजीब बाटी होती तो ज़रूर उस का चर्चा होता… और फिर उस को फ़ौरन ख्याल आया के हिजड़ा तो 2 तरह के होते हे… एक वो जो मुकम्मल औरत न हो और दुसरे वो जो मुकम्मल मर्द न हो…. कुछ तो हे जिस कारन मुझे उतेजिना की फीलिंग आ रही हे…
 
EPISODE – 74

मैनेजर और डेरेक को निपटने के बाद गोविन्द आकर ानिका को सॉरी किया के एक फ्रेंड के कारन दिएर हो गयी…

गोविन्द… “कुछ और खाओ गई…”

ानिका ने गार्डन ना में हिला दी… बोली कुछ नहीं…

“ानिका तुम बोहत ख़ूबसूरत हो…” गोविन्द ने मुस्कुराते हुए उस की तरफ देखा… ानिका ने भी अब अपनी नज़रे उठा कर देखा गोविन्द को… उस की आँखों में प्यार था… पलकें लरज़ रही थी उस की…

अब ानिका ने आँखे नीचे नहीं की…

गोविन्द… “तुम अब तक चुप बैठी हो… कुछ कहो न… में भी तुम्हारी मीठी मीठी आवाज़ सुन्ना चाहता हु…”

कुछ दिएर ानिका न बोली और फिर उस ने आँखे नीचे करते हुए… हलकी आवाज़ में बोली… “आप बोहत अचे हैं…”

गोविन्द… “ये तुम्हे कैसे पता चला के में ाचा हु…??”

ानिका फिर कुछ दिएर के ठहराव के बाद बोली… “आप ने मेरी खातिर अपनी जान खतरे में डाली… दादा से लड़ाई की… और बाई माँ, परीक्षा और सरला के लिए इज़्ज़त से रहने की जगा दी और उन को कोठे से निकाल लिया…”

गोविन्द… “मुझे ख़ुशी हुई के तुम ने सरल और आसान शब्दों में सच्ची बात कह दी… के में इस लिए ाचा लगता हु के में ने तुम सब की सहायता की…”

गोविन्द… “ानिका… किसी की मदद से प्रेरित हो कर किसी को पसंद करना प्यार नहीं होता… आज तुम मेरे साथ इस लिए हो क्यों के में ने तुम्हारा मोल ऐडा करते हुए तेजस्वी माँ से तुम्हे खरीदा हे और में अब तुम्हारे साथ जो भी रिश्ता बनाऊ गए वो रिश्ता प्यार का उल्फत का रिश्ता नहीं होगा… वो होगा मेरे द्वारा की गयी सहायता के प्रभाव में बना हुआ रिश्ता…”

ानिका दिल में सोच रही थी के में इससे कैसे बताऊँ के में इससे अपने मैं का देवता मान चुकी हु… और ये रिश्ता जोड़ने में मेरी पूरी मर्ज़ी शामिल हे…

गोविन्द… “ानिका… तुम ने आज तक जितनी ज़िन्दगी गुज़री हे वो एक बंदी और क़ैद की ज़िन्दगी थी… तुम ने कभी अपनी मर्ज़ी से कोई फैसला नहीं लिया…”

गोविन्द… “हर व्यक्ति की तरह तुम्हारा भी हक़ हे के शिक्षा हासिल करो और अपने अताम विश्वास को भी बढ़ाओ… और फिर उन सब के बाद भी अगर तुम्हारा दिल माने तो हम ये रिश्ता जोर लें गए…”

ानिका अपने आप से कह रही थी के “गोविन्द जी… खेल लो जितना खेलना हे… लेलो जो इम्तेहान लेना हे… में तो बस आप की हो गयी… जब मैं करे स्वीकार कर लेना… में इंतज़ार करूँ गई…”

गोविन्द ने उस को उस की फॅमिली को खोजने के हवाले से अभी कुछ नहीं बताया था…

गोविन्द… “और तब तक हम अचे दोस्त रहें गए… क्या तुम मेरी दोस्ती स्वीकार करती हो…??”

गोविन्द ने अपना हाथ आगे बढ़ाया तो ानिका ने उस का हाथ थमते हुए इस बार कोई शर्म न की और होल से उस का हाथ दबा दिया…

गोविन्द ने मुस्कुरा कर उस को बाक़ी के गहने भी दिए जिन में हाथो के दो सोने कड़े… और एक सोने का सेट… जिस में नेकलेस… इयररिंग्स… एक ब्रेसलेट शामिल थे…

ानिका ने अब एतमाद के साथ थैंक ु कहा… गोविन्द ने फिर उस को चलने का कहा… और उस को स्पोर्ट्स और ट्रैक सूट और जोग्गेर्स और कुछ दुसरे कपड़े दिलाने के लिए मॉल में ले गया…

मॉल में पहले तो ानिका झिझिक रही थी और उस के साथ साथ चलने में कुछ शर्मा रही थी… फिर गोविन्द के बार बार समझने पर वो कुछ खुल के अपनी पसंद के बारे में बताने लगी…

कपड़ों और शूज के साथ गोविन्द ने उस को पेर्फुमेस और मेकअप और इमीटेशन जेवेलरी भी लेकर दिया… शॉपिंग के बाद दोनों पोहंच गए… अकादमी… गोविन्द ानिका के साथ सीधे पहलवान के ऑफिस पोहंचा और वह दोनों का परिचय कराया… पहलवान कुछ दिएर उन के साथ वही बातें करने के बाद उन को घर ले आया… पहलवान पहले hi अपनी बेहेन शबाना को बता चूका था के एक दोस्त की रिलेटिव उन के पास उनके घर पर रहे गई…

लेकिन जब शबाना ने गोविन्द को देखा तो उस को बारे झटका लगा… मगर उस ने खुद को संभल लिया… वह पर उस का भाई जो मौजूद था…

शबाना के बैडरूम के बग़ल वाले बैडरूम में ानिका का सूटकेस और बाक़ी चीज़ें रख दी गयी…

फिर शबाना ने छाए वग़ैरा लाउन्ज में रखवाई तो सब वहां बेथ गए… गोविन्द ये बता चूका था ानिका को के सब के सामने ज़यादा शर्माने से लोग बातें बनाते हैं… इस लिए वो एतमाद से बैठी थी वह…

पहलवान ने बताया के रोज़ इवनिंग में शबाना और ानिका की ट्रेनिंग होगी और दिन में एक टुटर ए गई ानिका को पढ़ाने के लिए…

गोविन्द और शबाना की आपस में कोई बात चीत न हुई… कोई मौक़ा hi न मिला… खैर… गोविन्द पहले hi ानिका को कुछ पैसे दे चूका था के ज़रुरत पर्ने पर वो खर्च कर सके…

गोविन्द वह से निकल कर सीधे घर आया… और सब के साथ रत का खाना खा कर प्रकाश को अगले रोज़ विक्रम से राब्ता कर के कार और मोटरसाइकिल की डिलीवरी लेने का कहा… पुराण गोदाम और ऑफिस तो पूरा रिपेयर हो चूका था… प्लाट पर बस अब एक दो दिन का काम बचा था… उस के बाद प्रकाश ने सब गाँव से अनाज वग़ैरा ीखते करना था…

डेरेक के होश में आने पर वो पोहंच चूका था अपने अड्डे पर और अब तक तेजा सामने नहीं आया था… मैनेजर मेहफ़ूज़ था और दौलत पुर जाने के बजाये अपने सुसराल की ओर जा रहा था ट्रैन पर… अभी ये मामला सेठ राजेंदर तक नहीं पोहंचा था…

लाला जी के मैनेजर के साथ एक ऑनेस्ट और हार्डवर्किंग नौजवान लगाया गया था वो काफी काम सीख चूका था…

गोविन्द ने ेषणा को भी बता दिया के उस का और किरण का एडमिशन स्कूल में हो गया हे और किरण लोग के लिए घर का इंतज़ाम भी हो गया हे वो 2 दिन तक शहर आ जाएँ गए… वो बोहत खुश थी…

अगले रोज़ गोविन्द तो उठ कर कॉलेज के लिए निकल गया…

अशी की ओर चलते हैं…

आशा को नींद ठीक से नहीं आयी थी… और कारन था सरला की उपस्थिति से आशा का उत्तेजित होना… पहले तो उस ने सोचा के गोविन्द से बात करे मगर काफी सोचने के बाद अगले रोज़ अपनी गयनेकोलॉजिस्ट के पास सरला को भेजने का फैसला करते हुए सो गयी… परीक्षा उस के साथ hi सोई थी…

उस ने नाश्ते वग़ैरा के बाद तेजस्वी बाई को बताया के वो अपने साथ परीक्षा को लेजा रही हे ऑफिस और वह से उस को लेकर जये गई स्कूल एडमिशन के लिए… और फिर परीक्षा रोज़ाना स्कूल जाया करे गई…

और ये भी बताया के वो आज अपॉइंटमेंट लेले गई अपनी गयनेकोलॉजिस्ट का जो के सरला के टेस्ट्स और चेक उप कर ले गई टेक कोई ट्रीटमेंट चाहिए हो तो वो मिल जये इस को…

सरला को ड्राइवर लेने आया 11.00 बजे और साथ लेकर पोहंच गया गयनेकोलॉजिस्ट के पास…. ड्राइवर ने सरला को बताया के वो बहार हे कार में पार्किंग में और सरला क्लिनिक के अंदर चली गयी…

डॉ. शीबा 38 साल की बोहत ख़ूबसूरत ुनमर्रिएद महिला हे… अपने काम में काफी एक्सपर्ट हे… आशा भी अपने फ्रेमलेस के कोई भी इश्यूज हो तो उसी से कंसल्ट करती हे…

सरला काफी परेशां थी ये उस के लिए पहली बार था किसी गयनेकोलॉजिस्ट के पास आना…

क्लीनिंक में पहले तो उस का डाटा वग़ैरा लिया गया… हाइट, वेट, ब्लड प्रेशर, टेम्परेचर और साथ नार्मल ब्लड टेस्ट्स के लिए सैंपल वग़ैरा लिया गया… उस के बाद उस को एग्जामिनेशन रूम में ले जाया गया…. वहां पर उस को चेंज करने के लिए कहा गया और एक बारे सा गाउन पहनाया गया… और वो लेट गयी एग्जामिनेशन टेबल पर…

उस के एग्जामिनेशन के दो पार्ट्स थे… पहला तो ये के फिजिकली एक्सामिने करना था डॉ. शीबा ने अपनी असिस्टेंट के साथ और उस के बाद जो ेरोगेनोस ज़ोन्स को स्टिमुलते करते हुए ये चेक करना था के बॉडी नार्मल फंक्शनिंग में कितना रेस्पोंद करती हे…

गाउन के पीछे डोरी थे… वो असिस्टेंट ने खोल कर पहले उस के चेस्ट को नंग ाकिया… डॉ. शीबा ने नोट किया के उस के ब्रेअस्ट्स 34ा साइज के थे… सॉफ्ट… कोई लम्प नहीं था… आकर गोल था… और निप्पल भी ठीक था… टच करने से सरला ने आँखे बंद कर ली और निप्पल सख्त हो गए… सरला को शर्म आरही थी…

डॉ. शीबा के लिए तो ये रोज़ का काम था…

टाइम नोट किया गया के कितने दिएर में उस के निप्पल चुने की वजा से सख्त हुए…

और साथ साथ जब उस के कान और गार्डन पर टच या करेस करने पर रेपोंसे नोट किया गया…

उस के बाद गाउन और नीचे हो कर नैवेल तक एक्सामिने किया… सब नार्मल था…

नैवेल से नीचे का हिस्सा सामने आया तो डॉ. शीब और उस की असिस्टेंट दोनों hi चौंक गयी…

नीचे वागिना की जगा एक semi-hard पेनिस था…

थोड़े से बाल थे आस पास… लगता था के पिछले वीक साफ़ किये थे…

ये डॉ. शीबा की मेडिकल प्रैक्टिस का दूसरा केस था… पहला केस उन्हों ने ट्रीट किया था विएना – ऑस्ट्रिया में जहाँ वो उस वक़्त गिनीकोलोग्य में स्पेशलाइजेशन कर रही थी… इस तरह के केस को मेडिकल की ज़बान में “जेंडर बाइनरी” कहा जाता हे…

उस ने अपने आप को संभालते हुए साथ hi असिस्टेंट को इशारे से कण्ट्रोल में रहने के लिए कहा… मगर असिस्टेंट को कुछ झिझिक हो रही थी… उस की स्तिथि को समझते हुए डॉक्टर ने उस को ज़ोर न दिया… डॉ. शीबा जानती थी के ये बोहत ज़रूरी हे इस लिए उस ने खुद सरला के लुंड को अपने हाथ में लेकर सहलाना स्टार्ट कर दिया…
 
EPISODE – 75

डॉ. शीबा के लिए सरला का केस एक इम्तेहान से काम नहीं था… उस का सीना तो महिला की तरह उभरा हुआ था मगर नीचे वागिना की जगा पुरुष की तरह से पेनिस था… अब देखना ये था डॉ. शीबा ने के ये पेनिस कितना कार्यात्मक… और उस की असिस्टेंट झिझिक रही थी… इस लिए डॉ. शीबा खुद सरला के लुंड को अपने हाथ में लेकर सहलाने लगी… कुछ दिएर के बाद उस ने लुब्रीकेंट लगाया और अपने ग्लव्स उतार दिए और डायरेक्ट उस के लुंड को टच करने लगी… और अपनी असिस्टेंट को कहा के नोट करे… के ये बिलकुल एक पुरसुह की तरह से hi हे…

डॉ. शीबा ुनमर्रिएद ज़रूर थी… मगर उस के कुछ सम्बन्ध रहे थे… जिस कारन वो जानती थी के मर्द का लुंड केसा होता हे और किस तरह से उससे हार्ड कर सकते हैं… ग्लव्स उतरने के कारन और लुब्रीकेंट लगाने से लुंड जल्दी से हार्ड होने लगा… जब पुअर हार्ड हो गया तो पहले उस ने मेज़रमेंट टेप से मैसूर किया वो 5 इंच लम्बा था और उस की गिरथ चौड़ाई 2 इंच थी… जो के एवरेज पुरुष के हिसाब से ठीक थी… बस उस की हार्डनेस पूरी से ज़रा काम थी… लेकिन इतनी हार्डनेस थी के किसी वागिना में दाखिल हो कर उससे संतुष्ट कर सकता था…

डॉ. शीबा ने उस से सवाल किया के काया कभी उस ने सेक्स किया हे या फिर मुठिए हे… तो सरला ने इंकार किया…

डॉ. शीबा अब उस को मुठिए रही थी… काफी दिएर के बाद उस में से वीर्य सीमेन निकला… उस का सैंपल डॉ. शीबा ने ले लिए… और मात्रा और थ्रो वीर्य के निकलने का नोट किया… टाइमिंग भी ठीक थी…

उस के बाद डॉ. शीबा ने उस को पूरा स्पंज करके क्लीन किया और फिर सीमेन सैंपल लेबोरेटरी भिजवा दिया जांच के लिए…

उस ने नोट किया जब वीर्य निकला तो सरला की आँखों में आंसू आगये थे…

उल्टा कर के फिर बैक और हिप्स चेक की… बैक पे और हिप्स पे हिंसा के पुराने निशान थे… और साथ ये भी नोट किया के गांड का सूराख खुला जिस का मतलब था के उस की गांड में छोड़ा गया हे… कई बार…

फिर उस ने उस को अल्ट्रासाउंड और कट सैन के लिए भिजवा दिया और साथ में साइकेट्रिस्ट से अपॉइंटमेंट भी ले ली….

और उस ने आशा को भी कॉल करके बता दिया के 1-2 दिन हॉस्पिटल में एडमिट करें गए… फिर कोई फाइनल बात बता सकते हैं…

उसी समय hi गोविन्द की क्लासेज कहातम हुई थी तो उस ने जेसे hi आशा को चेक किया तो उससे इस सरला के बारे में जानकारी मिली… तो उस कॉलेज से hi फ़ोन किया आशा को… तो आशा ने उससे बताया के परीक्षा का स्कूल में एडमिशन हो गया हे और साथ hi बतया के सरला को जांच करने के बाद गयनेकोलॉजिस्ट ने बताया हे के सरला के अंदर एक महिला की तुलना में पुरसुह के गुण और अंग ज़याद एक्टिव हैं… और उस को हॉस्पिटल में रखा जये गए 2 दिन फिर फाइनल रिपोर्ट मिले गई…

गोविन्द ने उस को अप्प्रेसियते किया के उस ने ाचा काम किया… उस के बाद चेक किया डेरेक को वो तेजा को सारा माजरा बता रहा था… ये भी बताया के मैनेजर ग़ायब हे…. तेजा ने कहा के मैनेजर को तलाश करना सेठ का काम हे हमारा नहीं… रुप्पे देने हैं सेठ ने और वो कहीं से भी कर के दे… अगर देगा तो उस का काम होगा नहीं तो अपने धंदे बोहत हैं…

इस सब की जानकारी होन्ग कोंग माफिया को हो गयी थी… और सेठ को फिलहाल होटल के कमरे में hi बंदी बना दिया गया था… और उस को कहा गया था के 20 करोड़ का इंतज़ाम करे…

अब गोविन्द ने चेक किया शबाना को… वो और रिया दोनों साथ थी यूनिवर्सिटी में… क्लास अटेंड कर रही थी…

गोविन्द भी यूनिवर्सिटी पोहंच गया… क्लास अब तक चल रही थी… गोविन्द ने शबाना के दिल में वाशरूम जाने का ख्याल लाया… उस ने रिया को बताया के वो जा रही हे वाशरूम… रिया ने उस को कहा के ठहर जाओ… क्लास ख़त्म होने वाली.. तो उस ने इमरजेंसी का बोल कर निकल आयी… कुछ आगे चलते hi गोविन्द था… गोविन्द ने उस को पुकारा… वो गोविन्द को देख कर पहले हैरान हुई फिर उससे नारजगी से बात करने लगी…

शबाना… “आ गया मेरा ख्याल…”

गोविन्द… “शबाना टाइम वास्ते ने करो में यूनिवर्सिटी के बहार तुम्हारा वेट कर रहा हूँ तुम बाद में झगड़ा कर लेना… अभी अपने ड्राइवर को कहो के तुम रिया के साथ आओ गई और उस के बाद रिया को कहो के तुम जल्दी घर जा रही नेक्स्ट क्लास अटेंड नहीं करो गई…”

शबाना ने ऐसा hi किया… वो बहार आकर गोविन्द की कार में बेथ गयी… और गोविन्द ने कार मोर ली एक आइसक्रीम पारलर की तरफ…

वह पोहंच कर भी शबाना ज़यादा बात चीत नहीं कर रही थी… नाराज़ थी…

गोविन्द… “शबाना देखो नाराज़गी चोरो… तुम खुद बताओ के कही जगा थी क्या मिलने के लिए…??”

शबाना… “वैसे कही बहार तो मिल सकते थे… जैसे आज मिले हैं…”

गोविन्द… “तो यार मुझे खुद बताओ के बाद में पता चला के तुम पहलवान की बहन हो और वो मेरा दोस्त हे… तो में कैसे उस की hi बहन के साथ ये सब कर लेता…”

शबाना… “तो उस को क्या तुम ने बताना था या में ने… और दोस्तों की बहनो की क्या भावना नहीं होती… ाखि मेरा भी दिल हे… मुझे अगर कोई पसंद आजाये तो में क्या करूँ… जब तुम्हे पसंद किया था तो क्या जानती थी के तुम भाई के दोस्त हो…”

आइस क्रीम भी आगई थी…

गोविन्द… “चलो ग़ुस्सा चोरो आइस क्रीम खाओ… फिर कही बहार चलते हे…”

अब शबाना के चेहरे पर कुछ स्माइल थी…

शबाना… “हरजाई हो बारे… रिया को भी काली से फूल बना दिया और फिर उस दिन के बाद उस से मिले भी नहीं…”

शबाना… “और आज दो राज़दार साहिलिओ को झूट बोलने पर भी उकसा दिया… अगर अब उस को में बता दूँ के तुम मुझे चुप कर मिले थे…”

गोविन्द… “बता दो मेरी जान… अब में भला मासूम पुरुष सुन्दर नारिओ से तो नहीं लार सकता…”

शबाना खुल के हंसने लगी… “तुम बातो में ऐसे दिल को मोह लेते हो के दिल तुम से नाराज़ भी नहीं रह सकता… हरजाई हो… भँवरे हो पूरे… कभी इस दाल… कभी उस दाल…”

गोविन्द… “जादूगर तो तुम हो… तुम्हे नाराज़ देखा तो दिल तरप गया… इसी लिए तो तुम से मिलने चला आया…”

शबाना… “झूठे….”

शबाना… “और वो लड़की कोण हे तुम्हारी…. जिस को हमारे घर छोरा हे…”

गोविन्द… “वो… उस का नाम तो ानिका हे ना…”

शबाना… चिढ़ते हुए… “बोहत शुक्रिया तुम्हारा… नाम मुझे पता हे… ड्रामे बाज़…”

शबाना… “में तो तुम्हारा समबन्ध पूछ रही हु…. बची हुई हे या उस का भी दिल घायल कर दिया हे अपनी चिकनी चुपड़ी बातों से…”

गोविन्द… “यार वो बस मेरी एक कजिन हे रिश्ते में और उस का कोई हे नहीं तो इस लिए वो तुम्हारे घर पर हे…”

शबाना… “कजिन हे तो फिर अपने घर पर क्यों नहीं रखते…”

गोविन्द… “यार कुछ फॅमिली इश्यूज हैं… अब चोरो उस बेचारी को…”

शबाना…. “एक बेचारी वो… और दुसरे बेचारे तुम… 2 hi तो पूरे संसार में बेचारे हो…”

शबाना… “कल वो ट्रेनिंग करे गई मेरे साथ तो ऐसी किक्स मरुँ गई उस के बट पर के लाल कर दूँ गई…”

गोविन्द… “यार कुछ भी कर लो मगर फिर भी उस के हिप्स तुम्हारे जेसे सेक्सी और आकर्षक नहीं हो सकते…”

जैसे शबाना अब साड़ी बाटे भूल कर शर्म से नीचे देखने लगी…

गोविन्द हंसने लगा उस की हालत देखकर…

शबाना की एक खास बात थी के उस का जिस्म छोरा था… काफी हेअल्थी भी थी… क़द भी ाचा खासा था… चेहरा भी पायरा था.. मगर सब से आकर्षक बात थी इतनी छोटी उमर में उस के बारे बारे चुके… और बरी गांड…

आइस क्रीम भी ख़तम हो चुकी थी… गोविन्द उस को लेकर उसी वीरान जगा पर आगया… रस्ते भर वो गोविन्द के बाज़ू से चिपकी रही…

वहां साइड पर कार पार्क करके… दोनों ने किश स्टार्ट की… कुछ दिएर के बाद शबाना अपना हाथ पंत के ऊपर से hi उस के लुंड पर फेरने लगी…

शबाना ने कहा के पिछले सीट पर चलें…

दोनों कार की पिछले सीट पर आ गए… अब गोवंड ने उस को कहा के ये जगा अंदर डालने के लिए ठीक नहीं क्यों के शबाना भी वर्जिन थी..

शबाना सीट पर नीचे लेती थी और गोविन्द उस के ऊपर आगया…

गोवंड ने कमीज ऊपर उठाते हुए उस के चुके नंगे किये और गोल गोल गोर चुके देख कर मस्ती से चूसने लगा…

शबाना अपनी आँखे बंद कर के आनंद लेने लगी… उस के मुंह से बस सिसकिया निकल रही थी…

क्कुह दिएर के बाद उस ने अपना हाथ फिर पंत के ऊपर से लुंड पर रख कर ज़ोर से मसलने लगी…

गोवंड भी फ़ौरन अपनी ज़िप खोल कर 69 में आगया और उस की शलवार निचे करते हुए उस की छूट पाए ज़बान पेहरें लगा…

शबाना भी उस का लुंड बारे मज़े से चूसने लगी…

शबाना की छूट का दाना भी खासा बारे और बहार को निकला हुआ था…

कुछ दिएर में hi शबाना तड़पने लगी…

उस की सिसकिया बढ़ने लगी… और फिर वो भी चार्म सीमा पर पोहंच कर झरने लगी… उस ने झरते समय ज़ोर ज़ोर से लुंड चूसना और काटना शुरू कर दिया…

गोविन्द भी रोक न सका अपने आप को और इस बार ख़ुशी से शबाना साड़ी मलाई जातक गयी…

कपड़े ठीक कर के गोविन्द ने इस वाडे पर उस को छोरा के फिर जल्द मिलें गए…

गोविन्द घर आकर फ्रेश होगया नाहा कर…

सरला के पास होस्पाइटल में….

कट स्कैन और अल्ट्रासाउंड ने डॉ. शीबा के अनुमान को सच साबित किया… सरला के पेट में अंदर सारे अंग पुरुष के थे और अंदर कोई उतेरुस या फिर ओवरीज़ नहीं थी…

साइकेट्रिस्ट भी आगया था और इस समय… सरला के साथ डॉ. शीबा और साइकेट्रिस्ट बात कर रहे थे…

प्स्य्किएट्रिस्ट… “तुम्हारे सारे जिस्म की जांच के बाद ये कन्फर्म हो गया हे के तुम्हारे सारे अंग एक पुरुष के हैं और वो काम भी ठीक कर रहे हैं मगर तुम ने अपना ढंग रेहन सहन एक महिला का किया हुआ हे… और जिस्म के रूप सरूप और ज़िन्दगी के ढंग में अंतर होने के कारन तुम्हे आगे चल कर अधिक तकलीफ होगी… तुम्हे अपनी ज़िन्दगी उसी ढंग से गुज़ारना होगी जिस रूप आकर में तुम्हारे अंग हैं… तुम्हे एक महिला की सोच चोर कर एक पुरुष की तरह के ढंग से जीना होगा… और कोई मुश्किल नहीं के आगे चल कर तुम शादी करो और तुम्हारे बचे भी हों…”

सरला… की आँखों में आंसू थे…

आज तक ज़माने ने उस से जो व्यवहार किया था और जिस ढंग से जीने पर मजबूर किया था अब आगे की ज़िन्दगी उस को अलग ढंग से जीनी थी…

साइकेट्रिस्ट… “इस बात को हो सकता हे अभी तुम्हारा ज़ेहन क़बूल न करे मगर तुम चाहो तो ये मुमकिन हे… तुम्हे कपड़े और बोलने चलने के अंदाज़ को तब्दील करना होगा…”

सरला के आंसू अब आँखे no रोक सके और वो बिना आवाज़ किये रोने लगा… आंसू टपकने लगे थे…
 
EPISODE – 76

साइकेट्रिस्ट के समझने पर पहले तो सरला को यक़ीन न आया… फिर जब उससे उन शब्दों की गहरायी का अंदाज़ा हुआ तो वो अपने आप को रोक न सका… रोने से…

इस समाज में जहाँ सरे क़ानून और क़ैदे पुरुष बनाते हैं और वह एक महिला को भी पूरी आज़ादी मयसर नहीं… वहां उस जेसे नामकमल वजूद के साथ जो वेह्शत दरिंदगी का व्यवहार किया गया… उस का सोच कर भी उस को घिन आने लगी… और उस के ज़ख़्म फिर से ताज़ा होने लगे…

और फिर ये ख्याल के वो भी मर्द की तरह से जिए गए आगे की ज़िंगदगी… वो रो पारा… उससे नहीं पता था के वो ख़ुशी से रो रहा हे या फिर इस लिए के वो भी इस ज़ालिम और वेह्शी समाज के ठेकेदार मर्दो में शामिल होइ जये गए…

उससे पता hi न चला कितनी दिएर तक वो डॉक्टर अपनी बात करता रहा…

साइकेट्रिस्ट और डॉ. शीबा अब दुसरे कमरे में आ चुके थे…

साइकेट्रिस्ट… “पेशेंट की दिमाग़ी स्तिथि इस वक़्त शेडेड दबाव में हे… उस के लिए ये सब स्वीकार कर पाना इतना आसान नहीं हे… समय लगे गए… और आप तुरनत इस केस की डिटेल्स मुंबई हॉस्पिटल भिजवा दीजिये… और वह से जो भी सलाह ए उस पर अमल करना ज़रूरी हे… दुर्भाग्य से इस पेशेंट के पास कोई फॅमिली मेंबर या कोई दोस्त ऐसा नहीं खास तौर से महिला दोस्त या फिर कोई और महिला जो इस से बात करे… ये साडी ज़िन्दगी महिलाओ के बीच रहा हे और पुरुष के प्रति इस के विचार भी इस पर हिंसक व्यवहार पे आधारित हे और शायद ठीक भी हो… आप की भूमिका इस पूरे केस में महत्वपूर्ण हे… इस लिए अगर आप कुछ इस से बात कर सके तो फायदा होगा… बाक़ी जो में ने मिडकिन्स और इंजेक्शन प्रेस्क्रिबे किये हे वो अगर ज़रुरत हो दे सकते हे…”

डॉ. शीबा ने प्स्य्किएट्रिस्ट को इस बात पे सहमत होने का इशारा देते हुए हाँ तो कह दया मगर अंदर से वो जानती थी वो खुद कितने तीव्र मानसिक दबाव से गुज़र रही हे… जब से उस ने सरला की पीठ और हिप्स पर लगे ज़ख़्म के निशाँ और फिर उस के सीने पर उभार महिला की तरह होने और लुंड को चुआं जैसे उसे 2 अलग तरह की धुविद्या में दाल रखा था… एक तरफ एक मानव के साथ इस तरह अमानवीय हिंसक सलूक के निशान से उस का मैं बायकाल था हमदर्दी की भावना थी… जाने ये ज़ाहिरी ज़ख्मो ने उस की रूह को कितना चलनी किया होगा… और दुसरे ये के उस के अंग महिला और पुरुष दोनों जैसे होना भी आकर्षित करते हुए डॉ. शीबा की अंदर जेसे कोई डब्बी हुई गांठदार भावना को उत्तेजित करते हुए पूरी तरह से जागृत कर दिया था…

और अंदर hi अंदर उस का मैं फिर से उस चुआं के अनुबह्व के तरसने लगा था… उससे खौफ आने लगा था के वो अकेली उस के पास जये… और अब उस को अहसास हुआ था के आशा बिलकुल ठीक कह रही थी… जेसे हर साधारण मानव के अंदर कही दबी हुई असामान्यता होती हे और वो किसी खास घटना के कारन उत्प्रेरक करती हे और फिर समय एक डैम अपना प्रदर्शन बदल देता हे… जानी मानी दुनिया भी अजनबी सी लगने लगती हे…

फिर उस ने आप को कण्ट्रोल में करते हुए… वापिस आगयी सरला के पास जो अब तक रो रहा था और उस ने अपना चेहरा छुपाया हुआ था हाथों में…

डॉ. शीबा उस के पास आते हुए उस के कंधे पर नरमी से हाथ फेरा और कहा “अपने आप को मज़बूत करो… तुम ने जिस तरह से अपनी साड़ी ज़िन्दगी… तकलीफो को हँसते हँसते सहा हे… और अब तो सब ठीक होने जा रहा हे… अब तो तुम खुद मर्द हो और अब कोई तुम्हे तकली नहे दे सकता…”

सरला… अपनी सिसकिया रोकते हुए… मगर हाथ नहीं हटाए अपने चेहरे से… “यही बात तो मेरी धुविद्या को भरहटी हे के में भी अब एक मर्द हु जो तकलीफ का कारन बनते हे समाज में…”

डॉ. शीबा… ने अब उस के चेहरे से हाथ हटते हुए और हाथ को अपने हाथ में नरमी से ले लिए… “सारे मर्द तो बुरे नहीं होते… तुम्हारी ज़िन्दगी में भी कोई तो ऐसा मर्द भी आया होगा जिस ने महिलाओं को इज़्ज़त दी हो… उस की तरह से बनाना…”

अब सरला को ख्याल आया के गोविन्द भी तो एक मर्द हे… तो क्यों ना उस जैसा मर्द बना जये जिस ने बाई परीक्षा ानिका और खुद उस को इज़्ज़त दी…. अब उस को कुछ बेहतर लगने लगा था…

उस ने भी डॉ. शीबा के हाथ को थाम लिया…

डॉ. शीबा को उस खुरदरे मरदाना हाथ का स्पर्श बोहत ाचा लगा… और वो अब उत्तेजित हो रही थी… उस के अपने बदन पर चिऊंटिया रेंग रही थी… अगर सिर्फ सरला का हाथ उस ने पकड़ा हुआ होता तो फ़ौरन चोर देती… मगर सरला ने भी उस का हाथ थमा हुआ तो उस की हिम्मत न हुई के अपना हाथ उस से चुराए…

डॉ. शीबा ये सोचने लगी… के मेरे हाथ का स्पर्श सरला को केसा लग रहा होगा… क्या उस भी उतेजिना हो रही होगी…

ये सोचते सोचते उससे शर्म आने लगी… उस के गालों की त्वचा जैसे गरम होने लगी…

वो तो भला हो उस की असिस्टेंट का जिस ने बहार से नॉक किया… सरला को गोविन्द की निर्देश पर प्राइवेट रूम दिया गया था… दरवाज़े पे नॉक होने के कारन उस ने अपना हाथ चुराया और हाथ चुराते हुए एक और क़यामत का अनुभव हुआ के उस का हाथ नीचे होते होते सरला के नरम नरम सीने के उभारो को छू गया और डॉ. शीबा के जिस्म में फिर से गांठदार (किंकी) भावना जागृत हुई…

अंदर उस की असिस्टेंट ने आकर ब्लड प्रेशर टेम्परेचर चेक किया और फिर डॉ. शीबा उस के साथ hi कमरे से बहार चली गयी…

गोविन्द के घर पे चलते हे…

गोविन्द शबाना के साथ हुई कामुक मुलाक़ात के बाद घर आकर फ्रेश हुआ और चेंज करके इन्दुस्ट्रीए एरिया में डील करने वाले प्रॉपर्टी दलेर के पास पोहंच कर लाला जी के नाम से स्पिकेस प्रोसेसिंग फैक्ट्री जिस में पैकिंग भी होती हो उस को खरीदने के लिए एग्रीमेंट किया… और साथ साथ प्रकाश के नाम से एक शुगर मिल परचेस करने का भी एग्रीमेंट किया…

डाक्यूमेंट्स ले कर अपनी कार में रख दिए और वही पब्लिक कॉल सेण्टर से फ़ोन लगा कर द्क्प को कहा के तैयार रहे… उस के ऑफिस पोहंच कर उस को और परीक्षा और फिर द्क्प की रेजिडेंस से तेजस्वी को साथ लिया और उन सब को ढेर साड़ी शॉपिंग करवाई… परीक्षा के लिए टॉयज और बुक्स लीं… तेजस्वी और परीक्षा बोहत खुश थी…

गोविन्द को यह अहसास हो रहा था के इंसान अगर खुद खुश हो तो ज़िन्दगी अपनी अछि लगती हे और अगर दूसरों को ख़ुशी दे सके तो ज़िन्दगी न सिर्फ बेहतरीन बल्कि सार्थक लगने लगती हे…

शॉपिंग के बाद जब सब लोग आइस क्रीम खाने आये तो परीक्षा ने वह बरी अजीब बात कह दी… “भैया मुझे आप के साथ रहना हे…”

गोविन्द… “क्यों आप को आशा दी अछि नहीं लगी…”

परीक्षा… “क्यों नहीं लगी … बोहत ाची लगी… दी तो मेरी सब से ाची दोस्त हैं… मगर आप भी हमारे साथ रहो ना… में आप दोनों के साथ रहना चाहती हूँ…”

इस बात पर सब हंस दिए…

आशा ने बरी गहरी नज़र से गोविन्द की ओर देखा…

गोविन्द ने मुस्कुरा कर कहा… “मेरी प्यारी बहना हम सब साथ तो हैं…”

तेजस्वी ने कहा… “बीटा कभी ानिका से भी मुलाक़ात करवाओ ना…”

गोविन्द… “माँ… आप आशा के साथ जब चाहें उन की अकादमी में hi उन का घर वह जा कर मिल लें…”

आशा… सोचने लगी… “कितना डैम और ऐटिटूड हे इस बन्दे में… एक मेहबूबा को दूसरी से मिलने का कह रहा हे… बारे कमीना हे…”

और फिर उन को आशा की रेजिडेंस पर छोरा… सामान उतारते समय… उस वक़्त तेजस्वी और परीक्षा कमरे में जा चुकी थी… आशा ने गोविन्द को बैठने के लिए कहा…

आशा… “जणू खाना खा के जाना…”

गोविन्द… “मेरी जान… कुछ घर बापू लोगो से बात करनी हे बिज़नेस वग़ैरा की… इस लिए जाना होगा…”

आशा… “मेरे लिए ना सही… परीक्षा के लिए रुक जाओ…”

गोविन्द को ऐसा लगा जैसे कोई पत्नी अपने पति को कह रही हो के मेरे लिए नहीं तो अपने बचे के लिए रुक जाओ…
 
EPISODE – 77

आशा… “मेरे लिए ना सही… परीक्षा के लिए रुक जाओ…”

गोविन्द को ऐसा लगा जैसे कोई पत्नी अपने पति को कह रही के मेरे लिए नहीं तो अपने बचे के लिए रुक जाओ…

कुछ दिएर के लिए गोविन्द को ये अनुभव उस की रूह को अंदर तक छू गया… वो दोनों लाउन्ज में थे…

और वो रोक न सका खुद को… जल्दी से आशा के होंटो को चूमते हुए… ये कहते हुए बहार निकल गया… “तुम ने मेरे दिल को उदास कर दिया हे… हम जल्द मिलें गए…”

आशा को उस का यूँ होंटो पर अचानक से चूमना बोहत रोमांचक लगा और कुछ दिएर पहले की उदासी एक पल में दूर हो गयी… और वो मुस्कुराती परीक्षा के पास कमरे में चली गयी…

गोविन्द वहां से सीधे अकादमी पोहंचा…

रूटीन एक्सरसाइजेज के बाद उस को आज कहा गया के उस को बुलाया हे मुश्ताक़ पहलवान ने…

वो उस की ऑफिस पोहंचा तो… उस ने वेलकम करते हुए… कहा के आज से में तुम्हे जो सबक दूँ गए उस की भी प्रैक्टिस करनी हे घर पे…

तो पहला लेसन हे अटेंशन और फोकस….

1सत एक्सरसाइज:

कोई भी जगा जहाँ 5 या 10 पेड़ हों उन को ज़ेहन में अछि तरह से बिठाना हे फिर उसी जगा पर कुछ दिएर उन को तकते रहना हे और फिर आँखे बंद और खोले फिर से देखना हे… जब ये समझ लो के उन पेड़ों को अपने घर पर बैठे कल्पना कर सकते हो तो वह से निकल कर घर चले जाओ…

फिर किसी भी समय पर जब ज़ेहन थका हुआ न हो… किसी शांत जगा पर बेथ कर आँखें बंद कर के उन पेड़ों को याद करना हे… और कल्पना करनी हे के तुम उन पेड़ों के सामने बैठे हो और वो पेड़ तुम्हे नज़र आ रहे हैं…

पहले ये कल्पना करनी हे के सब पेड़ नज़र आ रहे हैं… उस के बाद सिर्फ एक पेड़ उन में से नज़र आरहा हे और बाकि सब ग़ायब… फिर दूसरा पेड़ के बारे में कल्पना करनी हे… इसी तरह से एक समय में एक पेड़ देखना हे बाक़ी ग़ायब…

ये एक वीक करनी हे एक्सरसाइज दिन में एक बार… एक घंटे के लिए…

2ंद एक्सरसाइज:

नेक्स्ट वीक से एक बारे सा वाइट पेपर लेना हे और उस के ऊपर सेण्टर में बस एक ब्लैक डॉट बनाना हे… फिर उस डॉट को फोकस करते हुए ये कल्पना करनी हे के वो डॉट पूरे पेपर पर फेल गया हे… और उस के बाद उस प्रोसेस को रिवर्स करते हुए उस बारे से इमेज को वापिस उस डॉट पर लेकर आओ…. ये एक्सरसाइज खुली आँखों और आँखे बंद कर के रिपीट करनी हे…

ये एक्सरसाइज भी एक वीक तक करनी हे… उस के बाद हम अगली एक्सरसाइजेज पर बात करें गए…

ये एक्सरसाइज तुम्हारे इमेजरी सेंस को बढ़ाये गई और अटेन्शनल फोकस को स्ट्रांग करे गई…

(कृपया ध्यान दें की ये वास्तविक इमेजरी बढ़ाने वाले व्यायाम हैं और किसी पेशेवर की देखरेख के बिना अभ्यास नहीं करना चाहिए.

प्लीज नोट थी अरे रियल इमेजरी एन्हान्सिंग एक्सरसाइजेज एंड ओने शुड नॉट प्रैक्टिस विथाउट सुपेर्विसिओं ऑफ़ ा प्रोफेशनल.)

उस के बाद गोविन्द वही पर शावर लेकर घर आज्ञा…

सब ने खाना ीखते खाया… खाने के बाद प्रकाश भैया से चर्चा हुआ के कल से उन्हों ने निकलना हे अनाज परचेस करने के लिए… और स्पिकेस के लिए… और साथ में ये भी कहा के अब उन को गणना भी खरीदना हे…

फिर पापा को उन की विज्यन्ति स्पिकेस प्रोसेसिंग एंड पैकिंग फैक्ट्री के पेपर्स दिए जो के उन को सिग्न करने थे और अगले रोज़ रजिस्टर करवानी थी अपने नाम पे… पापा अपनी माँ के नाम से नए बिज़नेस की प्रारम्भ का सुन कर… भवाक हो गए… उस ने पापा को ये भी बताया के ये मसाले “विज्यन्ति मसाला”के नाम से मार्किट में सेल्ल होंगे… आप फैक्ट्री विजिट करें और काम को स्टार्ट करें गए मसाले आने के बाद…

इस बात से न सिर्फ पापा की आँखों में आंसू थे… सीमा और माँ भी रोने लगी… सीमा भी अपनी दादी से काफी अटैच्ड थी…

विक्रम से बात करने का सोचा के उस के सेल्लिंग स्किल्स अचे हे… तो वो खुद मसाला की मार्केटिंग को देख लेगा अगर एग्री किया तो…

उस के बाद प्रकाश बही को बताया के उन के नाम से शुगर मिल खरीदी हे… और बापू कल जयें गए रजिस्ट्रेशन के लिए… ड्राफ्ट अथॉरिटी लेटर प्रकाश से सिग्न करवाके बापू को दिया और गणना भी उसी मिल के लिए परचेस करना था… प्रकाश को जाना था शहर के करीब जो गाँव थे… ेषु ने प्रस्ताव दिया के शुगर मिल का नाम “रजनी शुगर मिल” होना चाहिए… इस पे सब ने एग्री किया… अब सब बोहत खुश थे…

इस के बाद ये भी चर्चा हुआ के प्लाट पर घर भी कम्पलीट हो गया हे और वह शिफ्ट होना हे… माँ, बापू, ेषणा और प्रकाश ने… इस बात पे सब जहाँ खुश हुए पापा, माँ और सीमा कुछ रंजीदा हुए… मगर ये ज़रूरी था क्यों के सेठ गिरधारी लाल के सामने बापू और प्रकाश को इंडिपेंडेंट और सक्सेसफुल बिजनेसमैन के तौर पर सामने आना था…

गोविन्द अपनी बहनो के सुसार पर दबाव दाल कर उस को शर्मिंदा नहीं करना चाहता था…

माँ के बोहत कहने पर ये माँ मान गयी के वो और ेषु एक दिन और रुकें गईं उन के साथ और अभी सिर्फ बापू और प्रकाश शिफ्ट होंगे…

ये फैसला किया गया के अगले हफ्ते शुगर मिल की एक उध्गाटन पार्टी राखी जये गई जिस में सेठ गिरधारी लाल और उन की फॅमिली और शहर के रईस लोगो को इन्विते किया जये गए… और इस तरह से दोनों फैमिलीज़ के बीच पर्दा भी हैट जये गए…

गोविन्द ने फॅमिली मीटिंग से फ़ारिग़ हो कर चेक किया सरला को… वो काफी दिएर से नहीं गया था उस के पास… देखा तो परेशान हुआ उस को पीड़ित देख कर और अफ़सोस भी हुआ के पहले क्यों नहीं गया उस के दिमाग़ में… फ़ौरन कॉल किया आशा को के सब लोग तैयार रहे हॉस्पिटल चलना हे सरला के पास…

अपने वार्डरॉब से 2 जोड़े कपड़ो के लिए सरला के लिए और एक चप्पल भी… बाकि हॉस्पिटल से निकले गए तो उस के लिए शॉपिंग करलें गए…

आशा, तेजस्वी, परीक्षा को पिक करके हॉस्पिटल पोहंचा… रास्ते में से केक ले लिया था…

सरला उन को देख कर खुश हुआ… खास कर तेजस्वी को…

कमरे में डॉ. शीबा भी उन के साथ थी…

वही सब ने मिल कर डीडे किया अब से इस का नाम सरल कुमार होगा…

गोविन्द… “यार सरल… तुम खुशनसीब हो के तुम्हे एक चांस मिला हे लाइफ में और तुम्हारी पहचान मुकम्मल हो गयी हे अब तुम समाज में सर उठा कर जी सकते हो… अब ये भी तुम पर निर्भर करता हे के तुम समाज को वो सब लौटाओ जो तुम्हे समाज ने दिया हे या सब कुछ भुला कर एक नयी ज़िन्दगी का रास्ता चुनो… और अपने अचे व्यवहार से इस समाज में अगर तुम्हारे सामने कोई सरला ए तो वो तुम से सुख और ख़ुशी पाए न के दुःख…”

उस के बाद सरल को कहा गया के अपने नए जनम पर केक कटे… केक काटने पर सब से पहले डॉ. शीबा को केक खिलाया गया… क्यों के उसी की एफर्ट से ये सब मुमकिन हो सका था…

डॉ. शीबा कुछ परेशां लगी तो गोविन्द उस के दिमाग़ में गया तो वह उस का माजरा देख कर शॉक हुआ और सोचा के बात करे गए डॉ. शीबा से अकेले में…

इस के बाद परीक्षा और आशा ने राखी बंदी सरल के हाथ पर और उस को ये बताया गया के वो अकेला नहीं हे उस का एक परिवार हे… तेजस्वी ने उस को अपना बीटा घोषित किया…

अब गोविन्द ने आशा को कहा के वो अपने ड्राइवर को बुलवाले और उन के साथ चले जयें रेजिडेंस वापिस… वो कुछ दिएर बैठे गए सरल के पास… आशा समझ गयी के सरल को इमोशनल सपोर्ट की ज़रुरत हे… तो उस ने हॉस्पिटल से फ़ोन किया अपनी रेजिडेंस ड्राइवर के लिए… और वो लोग चले गए ड्राइवर के साथ…

अब हॉस्पिटल में सरल के पास डॉ. शीबा और गोविन्द थे…
 
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