Kya Govind yunhi tarasta rahe ga - Page 12 - SexBaba
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Kya Govind yunhi tarasta rahe ga

बीआरओ... दुख होता हे के एक रीडर जो के सिर्फ उस समय कमेंट करता हे जब उस को क्रिटिसिज़े करना होता हे... हर व्यक्ति की अपने विचार हो सकते हैं... और सब का सहमत होना भी ज़रूरी नहीं होता... मगर ये बोहत अजीब लगता हे के जब आप ने ज़बान खोली तो बुरा hi मुंह से निकला... कभी ाचा नहीं लिखा... और न hi रेगुलर लिखा... इस से पहले भी दो साहब ए थे स्टोरी पर और बस एक बारे सा रिव्यु दाल कर ग़ायब हो गए... भाई स्टोरी में जाने किन प्रोब्लेम्स में लिख रहा हु... और मेरी पता नहीं क्या पर्सनल प्रोब्लेम्स या कपुलसीओंस हो सकती हैं... फिर भी में कभी अपडेट देना मिस नहीं किया... मेरा हर अपडेट (1सत को चोर कर) 1300 - 2000 वर्ड्स पर हे... एक अपडेट के लिए सोचना और उस को पूरी स्टोरीके साथ जोरते हुए इमेजिन करना और इतने सारे वर्ड्स टाइप करना... ये कोई आसान काम नहीं हे.... 2 से 3 घंटे लगते हे एक अपडेट लिखने में...

धनवाद...
 
EPISODE – 78

अब हॉस्पिटल में सरल के पास डॉ. शीबा और गोविन्द थे… आशा, तेजस्वी और परीक्षा के जाने के बाद…

गोविन्द ये जान चूका था के डॉ. शीबा इस वक़्त पूरी तरह से गरम हे… एक तो काफी दिन से सेक्स न होने के कारन और कुछ आकर्षित थी सरल के दोहरे जिस्मानी रूप के कारन…

अगर अभी गोविन्द भी चला जाता सब के साथ तो डॉ. शीबा ये सोच के आयी थी के वो रिझाये गई सरल को…

उस के अनादर जिज्ञासा थी के इस पिरकार के मर्द के साथ सम्भोग केसा लगता हे… और वो प्रार्थना कर रही थी के गोविन्द जये यहाँ से…

मगर गोविन्द ने यहाँ रुक कर उस के प्लान को एक नया मोर देना था… क्यों के वो जनता था के दिमाग़ी रूप से अभी पूरा स्वीकार नहीं किया सरल ने परिवर्तन को और अभी तुरंत hi उस के साथ सेक्स उस को अधिक परेशानी दे गए…

गोविन्द… “सरल यार… तुम हॉस्पिटल से बहार आजाओ तो नयी शुगर मिल खरीदी हे वह मेरे भाई के साथ मिल कर काम करना… उस मिल को संभालना हे एक मालिक की तरह… तुम्हे एक साहस और सहानुभूति वाले मर्द के रूप में समाज में अपनी रचनात्मक भूमिका निभानी हे…”

सरल… “गोविन्द भाई… में बस आपकी तरह से बनना चाहता हु… बहादुर और दूसरो की सहायता करने वाला…”

उस के बाद सरल ने डॉ. शीबा को पूरी घटना बयान की के किस तरह से गोवंड ने ानिका की रक्षा की थी और दादा से लड़ाई की थी…

सरल की इस बात पर डॉ. शीबा ने देखा गोविन्द की ओर दिलचस्पी के साथ... के... लगता तो छोटी उम्र का हे... मगर इतनी बहादुरी…

बस यही तो मौका चाहिए था… गोविन्द को… वो डॉ. शीबा को अपनी ओर अधिक आकर्षित करने लगा…

और साथ साथ ये भी बोलै… के असल हीरो तो डॉ. शीबा हैं देखो कितनी छोटी उम्र में इतनी ख़ूबसूरत डॉक्टर…

अब तो डॉ. शीबा के मैं में उबाल उठने लगा… अपनी टैरिफ सुन कर… ये तो आम सी बात हे के औरत अपनी तारीफ़ सुन कर खुश होती हे… वो अब तिरछी नज़र से गोविन्द को देखने लगी थी…

फिर गोविन्द ने सरल को कहा के वो अब चलता हे और डॉ. शीबा को भी उठना पारा…

डॉ. शीबा जैसे hi आगे को हुई िव इन्फ़ोसिओं ड्रिप की स्पीड को स्लो करने के लिए तो गोविन्द ने होल से अपने आप को उस के पीछे सत्ता दिया…

गोविन्द का लुंड पहले से हार्ड था…

अब डॉ. शीबा थी बीएड के पास और उस के पीछे गोविन्द… सरल को कुछ नज़र नहीं आरहा था…

डॉ. शीबा ना वह से हटी ना उस ने कुछ कहा… कुछ दिएर वो यूँही अपने हाथो से ड्रिप के फ्लो कंट्रोलर को चीरती रही… और गोविन्द उस के पीछे अपने लुंड से उस के चूतरो को छेरता रहा…

सरल को ये सब नहीं दिख रहा था…

गोविन्द ने कुछ दिएर तक यही किया फिर वो जाना के शीबा अब पूरी तरह से गरम हे तो उस ने पीछे होते हुए अपने हाथ से उस के चूतरो के दरमियान दरार को मसल दिया…

डॉ. शीबा भी अब स्पीड स्लो पर सेट करके कमरे से बहार निकली… उस कर सर नीचे था… उस के पीछे गोविन्द भी निकला…

गोविन्द… “यार डॉक्टर… तुम से बात करनी हे…”

शीबा… अब भी शर्म से सर नीचे था… और जिस्म पूरा भट्टी बना देहक रह था… “हाँ बोलो…”

गोविन्द बोलै तो कुछ नहीं मगर उस का हाथ पाकर कर बग़ल वाले प्राइवेट कमरे में ले आया… वो कमरा खली था… गोविन्द ने कमरे में आते hi लॉक करके अंदर से शीबा को किश करने लगा… गले से लगा कर…

ये सब इतनी अचानक हुआ के शीबा कुछ कह पाती उस से पहले उस के होंटो से रास निकलने लगा जो के गोविन्द चूसने लगा… कुछ hi दिएर गुज़री थी के शीबा ने भी अपने हाथो से गोविन्द के सर और कमर को सहलाना शुरू कर दिया…

अब दोनों कोई एक लफ्ज़ भी न बोलते हुए बीएड की तरफ चले गए… और इतनी तेज़ी से अपने कपड़े उत्तर जेसे कभी ीन्हो ने कपड़े पहने hi नहीं थे…

गोविन्द ने उस के चुके चूसे और साथ hi उस की छूट पे हाथ फेरा तो वो पूरी गीली थी… उस ने अब ज़ोर ज़ोर से सिसकना शुरू कर दिया… ाः… मममम आए…. Aaahh…mmm

गोविन्द ने जान लिया था के वो पूरी तरह से गरम हे और अब दिएर करना ज़रूरी नहीं… गोविन्द ने उस की टैंगो खोलते हुए… लुंड उस की छूट पर सेट किया और बोलै… “दाल दूँ अंदर…”

शीबा की आँखें बंद थी… मगर उस ने हाँ में सर हिला दिया…

गोविन्द ने एक hi झटके में पूरा अंदर दाल दिया…

ोीी… मर गयी…. ोोोोीी…. Mammammmmaaa….ooioii…

ाः… ाः… हहह… मममम…. ोीी

गोविन्द अब कहा रुकने वाला था…. कोई 10 मिनट तक उस के ढके मरने के बाद… शीबा जहर गयी… और भरपूर तरीके से अपनी गांड उठा दी ऊपर…

गोवंड न रुका और उसी तरह से छोड़ता रहा…

अब शीबा भी कुछ उस का साथ देने लगी थी…

शीबा सिसकती हुई बोली… “क्या ऐसे hi हर लड़की को पाकर कर छोड़ लेते हो…”

गोविन्द… “नहीं मेरी जान… तुम बोहत सेक्सी हो… तुम्हारी खूबसूरती ने मुझे घायल करदिया… में रोक नहीं सका खुद को… अगर बुरा लगा हो तो माफ़ करना…”

शीबा… अब भी सिसक रही थी… “ोीी ममा… नहीं मुझे तो बोहत ाचा लगा… आज पहली बार किसी ने पाने हक़ से मुझे छोड़ा हे…”

और अब वो और उत्तेजित होती हुई जितना उस से हो परः था उतना नीचे से छूट से उस के लुंड को पकड़ने की कोशिश कर रही थी…

इसी घसीटा घसीटी में वो फिर से झरि… और इस बार उस के मुंह से चीख के साथ… “ोये बहनचोद क्या छोड़ता हे तू… मेरी माँ छोड़ दी तू ने आज… अब बस भोस्डिके… में थक गयी हु…”

गोविन्द ने लुंड बहार निकाल लिया और उस से पुछा कभी गांड में छुड़वाया हे… उस ने कहा हाँ…

अब गोविन्द उस को उल्टा करने लगा तो वो बोली यार बस अब ठंडी हो गयी हूँ अब और बाकि बाद में… मगर गोविन्द के कान बंद हो जाते हे जब लुंड खरा होता हे…

उस ने बोहत सारा थूक लगाया उस की गांड पर और कुछ रास उस की छूट का भी माला गांड पर…

शीबा समझ गयी के जान ऐसे नहीं छूटे गई… तो उस ने भी अपनी कमर को नीचे झुकाते हुए अपनी गांड पूरी ऊपर उठा दी… छेद कुछ और खुल गया… गोविन्द ने भी रेहम न किया और पूरा मुसाल एक hi झटके में दाल दिया…

वो फिर से गालिया देने लगी… अबे बहनचोद रंडी समझा हे क्या …. ऐसे गांड मरते हे…

मगर गोविन्द ने भी उस को पेलना शुरू किया और उस समय तक ना रुका जब तक उस की मलाई न निकल गयी…

कुछ दिएर यूँही एक दुसरे के ऊपर परे रहे…

फिर दोनों ने कपड़े पहने… अब शीबा खुश थी और गोविन्द से कहा अब कब मिलना हे… उस ने कहा जल्द…

और वह से निकल कर घर पोहंच गया और इतना थका हुआ था के बिना कपड़े चेंज किये सो गया…

सुबह सवेरे आँख खुल गयी अभी सूर्य पूरी तरह से निकला नहीं था… तो वो नाहा कर ट्रैकिंग सूट पहन लिया…. कॉलेज के लिए कपड़े कार में रख दिए और उसी वीरान जगा पर आया जहा वो रिया और शबाना को लाया था… वह काफी पेड़ थे… वह पर 5 पेड़ के एक झुण्ड को चुन कर धयान लगाया… उसी तरह से एक्सरसाइज की जैसा उस को बतया गया था… वो आसानी से कार गया…. एक्सरसाइज के बाद उस ने चेक किया सब से पहले सरल को के देखे किसी तबियत हे उस की…

सरल के दिमाग़ में पोहंचा तो एक ढूंढ सी मिली उस को… सरल के विचार नहीं थे उस के दिमाग़ में… वो बारे हैरान हुआ के ये क्या हे…. फिर से उस ने धेयान लगाया तो सुना कुछ जैसे एक शोर हे ट्रैन का शायद… जैसे सरल ट्रैन पर हे और कही जा रहा हे…

वो वापिस आया और परेशानी से सोचने लगा के ऐसा तो कभी नहीं हुआ… ये सरल के विचार क्यों ग़ायब हैं… ये धुंध किसी हे…

और उसी समय उस को ऐसा लगा जैसे उस के दिमाग़ में कोई आया हो… और एक चाशनी से भरी हुई मधुर आवाज़ उभरी उस के दिमाग़ में….

बालक…
 
दोस्तों "Episode - 78" पोस्ट कर दिया हे....

सरल या सरला के किरदार को लेकर दोस्तों के बोहत ज़यादा विचार थे... ये समझ लीजिये के इतने सारे उपदटेस देने के बाद राइटर कभी भी किसी अननेसेसरी करैक्टर को एम्फैसिज़े नहीं करे गए... ज़रूर कुछ ऐसा हे जिस का आने वाले स्टोरी के भाग पर कुछ महत्वपूर्ण इम्पैक्ट हे... आप अपना रिस्पांस ज़रोरो दीजिये मगर ऐसा भी ना हो के सारा सस्पेंस का मज़ा किरकिरा hi जये... वो स्टोरी कभी भी अछि नहीं हो सकती जिस में के फाटक के लिए इंटरेस्ट न बनाया जा सके या फिर फाटक बरी आसानी से किसी नए मोर को समझ ले.... एन्जॉय.... 🙏
 
दोस्तों एक और बात भी आप के सामने रखना चहु गए... के हर episode या अपडेट हर एक रीडर को ाचा लगे ये ज़रूरी नहीं... यहाँ पर भांति भांति के रीडर्स है... जिन का अपना एक अलग किस्म का इंटरेस्ट होता हे... किसी को फंतासी ज़यादा अपील करती हे.... किसी को इरोटिका hi चाहिए बस... किसी को 7 मसाले की चाट चाहिए.... किसी को 12 मसाले की चाट चाहिए.... किसी को बोहत सारा एक्शन चाहिए....

किसी दोस्त को ये पसंद नहीं के कोई और किरदार सेक्स करे हीरो के होते... मीन्स टोटली हरम बेस्ड स्टोरी... और कोई चाहता हे के दुसरे चरक्टेर्स भी इन्वॉल्व हों... मेरे लिए सरे दोस्त बोहत रेस्पेक्टेबले... और इस कहानी में सब के लिए कुछ न कुछ हे... में किसी एक रीडर एक लिए ये स्टोरी नहीं लिख रहा...

कभी 3 - 4 उपदटेस के अचे आ जाने के बाद एक आध अपडेट फीका भी होता हे जो के कहानी की डायरेक्शन को सेट कर रहा होता हे... तो प्लस मेरा सपोर्ट करिये... में आप को पूरा मनोरंजन से बहरपुर अडवेंचरउस अनुभव दूँ गए... इरोटिका के साथ साथ.... धनवाद
 
इंडेक्स इस आलरेडी तेरे.... क्लिक थे लिंक....

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इन्सेस्ट - क्या गोविन्द यूँही तरसता रहे गए…

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EPISODE – 79

और उसी समय गोविन्द को ऐसा लगा जैसे उस के दिमाग़ में कोई आया हो… और एक चाशनी से भरी हुई मधुर आवाज़ उभरी उस के दिमाग़ में….

“Balak…Saral की चिंता न कर… तुम ने जितनी सहायता करनी थी उस की कर्ली… अब वो हमारे पास हे…. और सुरक्षित हे… तुम बस सब की ऐसे hi सहायता करते रहो…”

और फिर उस का दिमाग़ फिर से हल्का फुल्का हो गया और उस को साफ़ लगा के वो आवाज़ जा चुकी हे… ये आवाज़ किसी महिला की थी…

एक बार फिर से गोविन्द को एक शदीद ज़ेहनी झटका लगा…

उस की ज़िन्दगी में ये दूसरी बार था… पहली बार जब साधु महाराज मिले थे… तो वो भी बस चाँद लम्हो में अपनी बात कह कर और गोविन्द को एक शक्ति दान कर के ग़ायब हो गए थे… और फिर आज एक औरत की आवाज़… साधु की आवाज़ में एक गहन गरज एक दबदबा था… और इस औरत की आवाज़ में चाशनी मिठास और मधुरता थी… ये आवाज़ दिल को लुभाने वाली आवाज़ थी…

सरल के विचार न जान पाना या फिर उस का कहीं ग़ायब हो जाना परेशान ज़रूर कर रहा था गोविन्द को मगर ये आवाज़…????

इस आवाज़ ने उस के दिल को जैसे जाकर लिया था…!!!!

उस ने कभी साधु महाराज के दिमाग़ में जाने की कोशिश नहीं की थी… मगर इस आवाज़ के पीछे जाने से खुद को रोक न सका…

वो जब पोहंचा उस आवाज़ के दिमाग़ में तो वहां उस को मिली ख़ामोशी… पवित्रता… उजाला… सकूट… शान्ति…. ठहराव…

खुद गोविन्द के दिल को एक सकूं सा मिलने लगा…

एक एक… गोविन्द के कान पर किसी के हाथ महसूस हुए और वो उस दिमाग़ से बहार आ गया… उस को ऐसा लगा जैसे उस दिमाग़ से किसी ने उस के कान पाकर का बहार निकल दिया हो…

गोविन्द ने घबरा कर आस पास देखा तो कोई नहीं था… अपने कान पे हाथ लगाया तो किसी और का हाथ भी नहीं थे… कण पर ऐसा लम्स कुछ दिएर के लिए महसूस ज़रूर हुआ था… जैसे किसी नरम हाथ की उँगलियाँ हों अउ सख्ती के साथ उस के कान पकड़े हों…

गोविन्द का दिमाग़ फिर से बोझल हो गया… फिर लगा के कोई आया हे…

और एक जलतरंग हंसी उभरी उस के दिमाग़ में एक पल के लिए…

और फिर उस का दिमाग़ हल्का फुल्का हो गया…

अब वो कुछ कुछ समझ प् रहा था… या यूँ कहें के उस के दिमाग़ में उस को कोई रहनामयी कर रहा था…

ये आवाज़ हो न हो किसी पुजारन महिला की हे जो के निर्वाण आध्यात्मिक के ऊंचे मक़ाम पर हे… वो कोई पवित्र हस्ती हे… जिस ने सरल को अपने पास खेंच लिया हे… अब सरल उस हस्ती के संरक्षण और शरण में हे…

गोविन्द को जब साधू महाराज शक्ति दे कर चले गए थे… उस समय से लेकर आज तक वो ये सोचता था के कभी फिर साधु बाबा आएं और उस को शक्ति के द्वारा आगे भी बताएं… आज तक उस ने शक्ति के बारे में खुद से अन्वेषण क्या था और अपनी शक्ति का दायरा बढ़ाया था…

और सरल को तो कोई महा शक्ति वाली महिला ने अपनी शरण में ले लिए था… गोविन्द को तो शक्ति देकर खुद से धरती की चुनौतियों का मुक़ाबला करने के लिए चोर दिया गया था…

गोविन्द ये नहीं जनता था के उस की शिकायत जाएज़ हे या नहीं…

अभी कॉलेज जाने के समय नहीं हुआ था… वो पोहंच गया रेलवे स्टेशन… वह इस समय बोहत काम लोग थे… स्टेशन मास्टर और टिकट बुकिंग क्लर्क और कुल्ली से पता चला के आखिरी ट्रैन 40 मिनट पहले निकली हे स्टेशन से और दौलत पुर से एक पुजारिओं का समूह चढ़ा हे और उन के साथ ब्लू कलर के सूट में एक जवान था… गोविन्द समझ गया के ब्लू कलर वाला जवान सरल hi था… क्यों के गोविन्द उस के लिए जो कपड़े लाया था उस में एक वाइट कलर का सूट था और दूसरा ब्लू कलर का… ट्रैन का आखिरी स्टॉप मथुरा था…

गोविन्द फिर पोहंचा हॉस्पिटल के वार्ड बॉय के दिमाग़ में… वहां से पता चला के बोहत सवेरे सरल ब्लू कलर का सूट पहन कर निकला… के पास वाले मंदिर जा रहा हे और जल्द वापिस आजाये गए… मगर अब तक लोटा नहीं…

अब गोविन्द के लिए पहेली के सभी टुकड़े अपनी अपनी जगा पर आकर उस की उलझन को दूर करदिये थे और वो समझ गया के सरल सुरक्षित हे… और पुजारिओं के साथ हे और शायद उस की मंज़िल मथुरा हे…

गोविन्द अब कॉलेज पोहंच गया…

क्लासेज अटेंड करने के बीच वो पापा, बापू, प्रकाश और डॉ. शीबा के दिमाग़ में जाता रहा…

पापा और बापू का प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन का काम आसानी से हो गया… प्रकाश एक एक गाँव में जाकर वहां के ज़मींदार से बात कर रहा था… ज़मींदारो के लिए ये सौदा बोहत ाचा था… अब तक किसी ने भी इंकार नहीं किया… 4 गाँव में समर सिंह ने पहले hi बात कर राखी थी… एक उस का अपना… एक मल्टी भाभी के पिता का और दुसरे दो दोस्त थे समर सिंह के…

डॉ. शीबा, सरल के ग़ायब होने से परेशां थी… उस ने आशा को इन्फोर्मा कर दिया था… द्क्प अपनी तौर पर जांच कर रही थी…

सेठ राजेंदर अब तक माफिया के पास बंदी हे… मैनेजर सुरक्षित हे… तब तक… जब तक… सेठ माफिया के पास बंदी हे… सेठ माफिया से यही कह रहा हे के उससे रिहा किया जये गए तो ही तो वो रुपया का व्यवस्था कर सके गए…

क्लासेज के ख़तम होने पर वो आशा के पास गया तो ये जाना के पुलिस की जांच के अनुसार सरल सुबह 6 बजे हॉस्पिटल से साधारण ब्लू कपड़ों में निकल कर पास वाले मंदिर पोहंचा और वह उस ने पूजा पात की… वहां उस की मुलाक़ात हुई पुजारिओं के एक ग्रुप से जो के कहीं से आये थे और मंदिर में कुछ दिएर आराम करने ठहरे थे… उन को वह से मथुरा जाना था… सरल उन पुजारिओं के ग्रुप के साथ hi निकल गया मंदिर से…

स्टेशन से पता चला के 7 बजे वाली ट्रैन पर सरल पुजारिओं के साथ रवाना हो गया… द्क्प ने मथुरा पुलिस से राब्ता करके उन को सरल को मथुरा स्टेशन पर रोकने का कह दिया था…

कॉलेज से निकलते hi उस ने फ्लावर्स परचेस किये और हॉस्पिटल पोहंच गया सरल से मिलने… क्यों के गोविन्द को तो पता हे hi नहीं था के सरल ग़ायब हे…

डॉ. शीबा उस से मिली तो वो बोहत परेशां थी… उस ने सरल के ग़ायब होने का बतया… गोविन्द ने भी अफ़सोस का इज़हार करते हुए शांत रहने का कहा… फिर फ्लावर्स उस को दे दिए… वॉक हश हुई और मिलने का पुछा… तो गोविन्द ने कहा के जल्द मिलें गए…

डॉ. शीबा ने उस को बताया के उस का छोटा भाई ग्रेजुएट हे मगर नौकरी नहीं हे… तो गोविन्द ने उस को कहा के अपने भाई को भेज दे प्रकाश भैया से मिल ले…

वहां से निकल कर घर आया तो पता चला के सुबह बापू और प्रकाश अपना सारा सामान ले गए थे और अगले रोज़ माँ और ेषणा भी वही चली जयें गई…

गोविन्द अपने बीएड पर आकर लेता फ्रेश होकर… तो उस के दिमाग़ में फिर से वही फिल्म चलने लगी… के कैसे उस को साधू महाराज मिले थे… शक्ति मिली और उस ने सब की सहायता की… अब उस ने सोचा के आगे अब क्या रह गया हे… जो उस ने करना हे… तो उससे ख्याल आया के अब तक न वो अपने ननिहाल के बारे में जनता हे न ददिहाल के बारे में… और उस ने ानिका की फॅमिली को भी खोजना हे… ानिका की फॅमिली का तो फिलहाल कोई क्लू नहीं था उस के पास… बस एक लॉकेट था… अब उस लॉकेट से कैसे पोहंचे उस की फॅमिली तक…

फिर उस ने सोचा पहले अपने ननिहाल और ददिहाल से मुलाक़ात हो जये तो फिर सोचा जये ानिका की फॅमिली के बारे में…

आज तक उस ने अपने बापू से ना hi पुछा था और ना कभी उन के दिमाग़ से विचार पढ़े थे उन के माता पिता और खंडन के बारे में…

वो अपने बापू के दिमाग़ में गया तो वो इस वक़्त कुछ कर्मचारिओं के साथ नए खरीदे गए मवेशिओं के सन्दर्भ से बात कर रहे थे…

गोविन्द हमेशा की तरह ख़ामोशी से बापू का दिमाग़ टटोलने लगा… और उस को शॉक लगा के…

बापू को ये याद hi नहीं के वो कोण थे… किस के bête हे… माता कोण हे…

अब ये क्या हे… गोविन्द ने सर पीट लिया…

बापू की यादाश्त चली गयी या कुछ और हुआ उन के साथ…???

गोविन्द कुछ और टटोला तो जाना के बापू को बस ये याद हे के वो जयपुर में थे और उन की पहली मुलाक़ात हुई थी रजनी (गोविन्द की माँ) से…

इतना तो गोविन्द समझ गया के ननिहाल जयपुर में हे…

तो ऐसा क्या हुआ के बापू को अपने परिवार के बारे में कुछ भी याद नहीं और ये लोग इतनी गहरीबी में ज़िन्दगी क्यों गुज़र रहे थे… ननिहाल से कोई राब्ता क्यों नहीं…

गोविन्द को लेते लेते नींद आ गयी… आँख उस वक़्त खुली जब दरवाज़ा बाहर से ज़ोर ज़ोर से पीटा जाने लगा… वो हार्बर कर उठा… दरवाज़ा खोला तो बहार ेषणा के साथ किरण भी थी…

किरण शहर आगयी थी और विक्रम बहार था गारी में इंतज़ार कर रहा था… और वो लेजाना चाहते थे गोविन्द को अपने साथ कुछ डेकोरेशन और फर्नीचर लेने नए घर के लिए…

किरण… “भैया आप तो मुझे भूल hi गए…”

ेषणा… “भूल गए…!!! ये तो ऐसे तोता चशम हैं के पूछो मत… तुम तो चलो गाँव में थी… ये तो मुझ से तक बात नहीं करते…”

गोविन्द… “एक तुम क्या काम नौटंकी थी के ये भी आगयी तुम्हारी जदीदार… ाचा चलो निकलो कमरे से बहार… में चेंज कर लून…”

किरण ने ये सुनते hi दरवाज़ा अंदर से लॉक करदिया…

किरण… अपनी कमर पर हाथ रख कर तन्न कर खरी हो गयी… “हम तो यही हैं… आप को हमारे सामने चेंज करना होगा…”

गोविन्द… “बरी बेशरम हो बही तुम दोनों… निकलो यहाँ से…” वो जैसे hi आगे बढ़ा… के किरण और ेषु को बहार निकले कमरे से…

किरण उस के गले से लग कर उस के होंटो पर अपने होंठ रख कर चूमने लगी… किरण के होंठ इतने रसीले और ताज़ा गुलाब की तरह नरम थे के गोविन्द भी रोक न सका… और ेषु पीछे से उस से लिपट गयी… और अपना एक हाथ पंत के ऊपर से लुंड पर रख दिया…
 
EPISODE – 80

गोविन्द के सीने पर किरण के नरम सीने का स्पर्श और पीठ पर ेषु की कोमलता से भरे अंगो का अहसास और सब से बढ़ कर ेषु का हाथ सरगर्मी दिखता लुंड के ऊपर… करीब था के वो होश खो बैठता… उस को ख्याल आया के विक्रम बहार कार में बैठा इंतज़ार कर रहा हे…

उस ने एक डैम से दोनों को झटके से दूर किया… दोनों के चेहरे पर ऐसे भाव थे… जेसे कोई भूंचाल आगया हो… दोनों हेरात से गोविन्द के चेहरे को ताकने लगी…

गोविन्द… “अरे मेरी माओ… कपड़े तो बदलने दो… विक्रम बहार कार में वेट कर रहा हे…”

अब दोनों के चेहरे पर शर्मिंदगी थी और दोनों सर झुकाते हुए पीछे हो गयी…

गोविन्द ने कपड़े निकले कैबिनेट से और बाथरूम में चला गया… दोनों को होश तब आया… जब बाथरूम अंदर से लॉक हुआ…

दोनों ने एक दुसरे को ऐसी नज़रो से देखा जैसे कह रही हों… “लौंडा हाथ कर गया….!!!”

गोविन्द कपड़े चेंज करके निकला तो सब विक्रम की कार में चले गए… बेड्स, टेबल्स, सोफस, चेयर्स वग़ैरा तो पहले hi परचेस किये जा चुके थे और पोहंच गए थे नए घरों पर… बस आज किरण और ेषणा ने कुछ डेकोरेशन, वाल पोर्ट्रेट्स और अपनी पर्सनल छोटी छोटी चीज़ें लीं… वो दोनों बोहत खुश थी..

वापसी में आइसक्रीम कहते हुए, विक्रम ने गोविन्द और ेषणा को ड्राप किया…

गोविन्द निकल गया अकादमी की ओर… आज रूटीन की एक्सरसाइज बस 15 मिनट की हुई और उस की कॉम्बैट ट्रेनिंग स्टार्ट हो गयी…

कॉम्बैट ट्रेनिंग म्मा (मिक्स्ड मार्टिकल आर्ट्स) पर आधारित थी… आखिरी आधे घंटे में गोविन्द को लाठी चलना सिखाया गया और उस के बाद अलग अलग प्रकार के बॉडी लॉक्स बताये गए…

वो ट्रेनिंग करके हटा तो उस ने देखा के दर्शकों की गैलरी में मुश्ताक़ पहलवान के साथ शबाना और ानिका भी थी…

वो उन से मिला… पहलवान ने उस की तारीफ़ की… के आज पहले दिन hi गोविन्द ने सब इंस्ट्रक्शंस को अचे से फॉलो किया हे… वह एक अच्छा छात्र है… बोहत जल्द सीख ले गए सारे लड़ाई के गुर्जर….

बातें करते करते पहलवान शबाना को लेकर एक इंस्ट्रक्टर से कुछ बात करने लगा तो गोविन्द ने ानिका का हाथ पाकर कर उस को एक साइड पर लेजा कर उस से बात करने लगा…

गोविन्द… “यार ानिका… तुम तो एक्सरसाइज सूट में बोहत अछि लग रही हो… एक डैम हॉट…” ानिका ने टाइटस और स्लीवलेस t-shirt पहनी हुई थी… उस का जिस्म पहले से hi भरा भरा था… उस पे खूब जांच रहा था ये टाइट सूट…

ानिका ने अपना हाथ चुराते हुए… शर्मीली नज़रों से और मुस्कराहट से… “सिर्फ दोस्त के हाथ ऐसे सब के सामने नहीं पकड़ते…”

गोविन्द मुस्कुराया के बरी गहरी बात केहड़ी ानिका ने…

गोविन्द… “मेरी कोयल तो कूकने लगी हे… बरी मीठी बातें करने लगी हो… आँखों में काजल अधिक तीखा लग रहा हे…”

ानिका शर्मा सी गयी… और थोड़ा बोहत जो उस को ग़ुस्सा था वो ख़तम हो गया… उस को गिला था के दो दिन हो गए थे मगर गोविन्द ने उस की कोई खबर hi नहीं ली… जैसे उस को अकादमी में दाल कर भूल गया हो…

ानिका के टाइट स्पोर्ट्स वेस्ट उस के सीने के उभारों के पूरे आकर दिखा रहा था… ानिका ने अपने दोनों बाज़ू सीने पर बाँध लिए…

गोविन्द ने नोटिस करलिया… “में तो बस तुम्हारी आँखों में देख रहा हु… नीचे देखना नहीं चाहता…”

अब तो ानिका की आँखे शर्म से अधिक झुक गयीं…

गोविन्द… “नज़रे तो ऊपर उठाओ… ये जो सितारे झिलमिला रहे थे इन की रौशनी मांड तो न करो…”

अब ानिका ने आँखें उठा कर भरपूर निगाह डाली गोविन्द पर… उस की आँखों में उम्मीद, चमक और ढेर सारा प्यार था…

वो बेखुद सी होती एक कदम आगे बरही गोविन्द की ओर…

पहलवान की आवाज़ आयी… “क्या ख्याल हे एक कप कॉफ़ी हो जये…??”

गोविन्द और ानिका ने खुद को संभाला… “हाँ बिलकुल… कॉफ़ी तो मस्त रहे गई…”

फिर चरों आगये पहलवान की ऑफिस और वही कॉफ़ी भी आगयी…

पहलवान… “यार गोविन्द ये तुम्हारे लिए परेशां थी… के तुम ने इस की कोई काहिर कहबर नहीं ली… तो ये दोनों भी अपनी आज की ट्रेनिंग कर चुकी थी तो में ने इन को यही बुला लिया… तुम मिल लिया करो इस से जब आते हो ट्रेनिंग करने अकादमी में…”

गोविन्द… “हाँ बस ज़रा बिजी था… नेक्स्ट वीक शुगर मिल की उद्घाटन पार्टी हे… आप लोगो ने ज़रूर आना हे…”

पहलवान… “हाँ ज़रूर ाएँ गए…”

कॉफ़ी पीते हुए बस गोविन्द और पहलवान बातें करते रहे… ानिका नज़रे जकहुकाये कफ पीती रही और शबाना बरी गहरी नज़रो से देखती रही गोविन्द को…

गोविन्द ने वह से विदा ली और रस्ते में चेक किया द्क्प से के ट्रैन मथुरा पोहंच गयी थी… मगर वह पुलिस को ट्रैन से कोई पुजारिओं का ग्रुप या फिर सरल ना मिले… गोविन्द कुछ इस तरह की अपेक्षा कर रहा था…

और ये पता चला के जिस गुंडे ने ानिका को बेचा था तेजस्वी बाई को वो 4 साल पहले एक जह्ग्रे में मारा गया हे…

और ये भी के उस ने जयपुर में वह की द्क्प को सेठ अमीर चाँद (गोविन्द के नाना) की जानकारी के लिए कह दिया हे…

माफिया ने डायरेक्ट कांटेक्ट कर लिया था… तेजा के साथ और डेरेक मुंबई से रवाना हो गया था दौलत पुर के लिए…

सेठ राजेंदर अब तक होटल के कमरे में बंदी बना हुआ था…

गोविन्द घर पोहंच कर फ्रेश हुआ तो उस का मैं कुछ उत्तेजित था… सुबह सरल के उन ग़ायब होजाने से, उस मधुर आवाज़ के गोविन्द को ज़यादा गंभीरता से न लेने पर, किरण और ेषु की चेर चार और फिर ानिका के साथ मुलाकात और उस का यूँ कामुक दिखना… गोविन्द आज कुछ एक्शन के लिए सोच रहा था… उस ने चेक किया तो आशा को पीरियड्स थे… अपनी किस्मत को कोसते हुए… वो खाने की टेबल पर आगया…

आज खाने की टेबल पर रत के खाने पर बापू और प्रकाश भाई की कमी सब ने महसूस की…

खाना खाने के बाद तो सीमा और ेषणा हमेशा की तरह सीमा के कमरे में चली गयी सोने के लिए…

पापा भी कुछ दिएर के बाद उठ कर अपने कमरे में चले गए…

माँ, माँ और गोविन्द hi रह गए वह पर… कुछ दिएर बातो के बाद… माँ ने माँ से कहा के “रजनी बहन आप अकेली कहाँ सोएं गई एनेक्सी में… आप आज रत गोविन्द के कमरे में सो जयें…”

माँ अपना नाईट सूट लेने एनेक्सी चली गयी… गोविन्द ने भी सोचा के चलो ाचा हे माँ से अपने ननिहाल के बारे में बात कर ले गए…

गोविन्द लोअर और वेस्ट पहन कर लेता hi था के माँ दरवाज़े पर नॉक कर के अंदर आगयी… और फिर माँ चेंज करने के लिए बाथरूम चली गयी…

गोविन्द के खयालो की तान उस वक़्त टूटी… जब माँ बाथरूम से बहार आयी… माँ ने बोहत hi ख़ूबसूरत निघ्त्य पहनी हुई थी… माँ गाँव में कभी इस तरह के कपड़े नहीं पहनती थी… अछि लग रही थी माँ…

गोविन्द… “माँ… बोहत अछि लग रही हो… ऐसे hi रहा करो… अचे कपड़े पहना करो… खुश रहा करो…”

माँ के चेहरे पर लजा की सुर्खी थी…

वो अपने bête के पास बीएड पर आ बैठी…

गोविन्द अपनी माँ की गॉड में सर रख कर लेट गया…

गोविन्द को अपनी माँ की गॉड में सर रख कर सकूं सा मिला… उस की साड़ी बेचैनी परेशानी कहातम हो गयी… ऐसा लगा जैसे उस के बिखरे हुए टुकड़ों को माँ की ममता ने समेत लिया हो… अधिक बिखरने से बचा लिया हो…

माँ भी प्यार से गोविन्द के सर में उंगलिया फेरने लगी…

गोविन्द… “माँ.. आप को माता पिता याद नहीं आते…???”

माँ जैसे ये परेशान सुनते hi कही खो सी गयी… शायद बचपन की गलियों में… या फिर माँ की ऊँगली पकड़े घूमती थी घर के आँगन में… या फिर पिता से लाड करती होगी…

गोविन्द बस ख़ामोशी से माँ के बोलने का इंतज़ार करने लगा… माँ के चेहरे पर मासूम से रंग भले लग रहे थे… मासूम यादों के साथ चेहरे पर भी मासूम से रंग बिखर जाते हैं…

माँ… सामने दीवार पर देखती हुई बोली… उस की आवाज़ में खवाब थे… “पिता जी बोहत प्यार करते थे… माता जी… बस हर वक़्त चिंतित रहती थी… ऐसे मत करो… वैसे मत करो… ऐसे मत बैठो… खता न खाओ… ठंडा न खाओ… पिता जी हर ज़िद्द पूरी करते थे… जाने कैसे होंगे…”

गोविन्द… “फिर… माँ… उन से मिले क्यों नहीं इतने समय से…”

माँ… “मिलते कैसे… शादी जो उन की मर्ज़ी से नहीं की… घर से निकल आये थे… तुम्हारे मां जी ने मदद की थी… घर से निकलने में…”

गोविन्द… “माँ तो फिर चलें जयपुर… सब से मिलने…”

माँ… “नहीं बीटा अभी नहीं… उद्घाटन पार्टी हो जाये… तुम्हारी डीडीओ के सुसराल से सम्बन्ध ठीक हो जये…”

माँ… “बीटा अतीत से सौगंध आती हे रिश्तों की मगर वर्त्तमान में रहते रिश्तो hi महत्वपूर्ण होते हे… पहले उन की देखभाल ज़रूरी होती हे… और मेरे लिए आज मेरे बचे मेरा पति महत्वपूर्ण हैं मेरे लिए… में अपने माता पिता और भैया के लिए बस प्रार्थना कर सकती हु…”

गोविन्द… “माँ… मां जी ने आप का और पिता जी का साथ क्यों दिया…”

माँ… “इस लिए बीटा… वो मुझ से बोहत प्यार करते थे… वो जानते थे के अगर मेरी शादी तुम्हारे पिता से न हुई तो शायद में खुश न रह पौन…”

फिर माँ ने गोविन्द की तरफ देखा… तेरा चेहरा सादृश्य हे भैया के चेहरे का… उन के जैसी hi दिखावट हे… बिलकुल उन के जैसी आँखें… माथा… मुस्कुराना… अपनी बात के लिए खरे हो जाना… डाट जाना ज़माने के आगे…

और फिर माँ ने बेखुदी में अपनी आँखें बंद करते हुए पहले गोविन्द का माथा चूमा फिर उस के लैब चूम लिए…
 
बलकुल बीआरओ दे सकता था.... में ने तो आज सुबह से रोमांचक सैटरडे के लिए पोस्ट किया था... मगर किसी का रिप्लाई नहीं आया तो समझा के कोई इंटरेस्टेड नहीं हे... तो अगला अपडेट फिर कल लिखूं गए... अभी एक फिल्म एन्जॉय कर रहा हूँ.... अगर दोस्त रेस्पोंद नहीं करें गए तो ठीक हे एक अपडेट का तो मेरा प्रॉमिस हे डेली का... वो में ने देदिया... थैंक ु सो मच... गुड नाईट... 🙏
 
EPISODE – 81

और फिर माँ ने बेखुदी में अपनी आँखें बंद करते हुए पहले गोविन्द का माथा चूमा फिर उस के लैब चूम लिए…

गोविन्द को पल भर के लिए ऐसा लगा के माँ के लबो से स्वादिष्ट रास टपका हो उस के लबों पर… उस ने आँखें बंद कर लीं… वो और रास का मज़ा लेना चाहता था…

मगर माँ अपना सर उठा कर फिर से बोलने लगी तो गोविन्द भी ख़ामोशी से सुनने लगा…

माँ… “तेरे मां जी, कृष्णा… लम्बा ऊंचे कद… मज़बूत शरीर… छोरा सीना… फेह्ले हुए कंधे… पतली कमर चीते जैसी… चमकदार आँखे… छोरा माथा… मुस्कराहट दिल मोह लेने वाली… बोहत बहादुर… निदार…”

माँ… “मुझे बचपन से अचे लगते थे…”

मा… “नारी जब बरी होती हे तो उस का पहला प्यार या तो उस के पिता श्री होते हे या फिर भाई… मेरा पहला प्यार तुम्हारे मां थे… में भी उन की आँख का तारा थी…”

माँ… “तुम्हारे नाना, सेठ अमीर चाँद, जयपुर के मिर्चो के बारे बोपारी थे… एक रात उन को चोर्ने स्टेशन पर भैया गए और वापसी में ज़ख़्मी बहिया के साथ आये तुम्हारे बापू, कैलाश नाथ, जिन्हों ने तुम्हारे मां की जान बचायी… बस मेरे भैया को बचने वाला मेरी जान बन गया… और यूँ मुझे प्यार हो गया तुम्हारे बापू से…”

गोविन्द को ाचा लग रहा था के उस की माँ… आज खुल कर अपने दिल की बात कर रही थी…

माँ… “तुम्हारे बापू, कैलाश नाथ का सब ने हवेली में स्वागत तो किया लेकिन… हर सदस्य उन को संदेह से देखता था… क्यों के जो भाई तुम्हारे बापू से पूछता के वो कहाँ से हैं…?? उन का खंडन कहाँ हे… तो वो बस ये कहते थे के उन को याद नहीं हे… ये बात कोई भी मैंने के लिए तैयार नहीं था…”

माँ… “तो जब तुम्हारे बापू ने मेरा हाथ माँगा तो उन को न सिर्फ इंकार किया गया बल्कि उन का काफी अपमान भी किया गया…”

माँ… “पिता जी शायद मान भी जाते मगर उन के बारे भाई… लालचंद… ने इंकार कर दिया…”

माँ… “मेरे दादा मूलचंद के दो bête थे… बारे bête का नाम लालचंद और छोटे का नाम अमीरचंद… दोनों बही की कार का एक्सीडेंट हो गया नैनीताल में… कार चला रहे थे मेरे पिता… तुम्हारे नाना… पिताजी को कुछ चोटें आयीं मगर वो ठीक हो गए… चाचा जी… लालचंद की रीढ़ की हड्डी की चोट की वजा से वो विकलांग हो कर व्हील चेयर के होकर रह गए… फिर कभी अपने पाऊँ पर खरे न हो सके… और उन का मन्ना था के हादसे उत्तरदायी मेरे पिता और उन के छोटे भाई थे… दादा के मौत के बाद सारा बीऑपर संभाला मेरे पिता ने मगर खंडन के बारे का रुतबा मिला चाचा जी को… हर फैसला उन की मर्ज़ी से होता था… वो मुझ से प्यार तो बोहत करते थे… उन की शादी न हो सकीय तो वो मुझे और कृष्णा को अपनी सनतान जैसा hi प्यार देते थे… मगर अपने छोटे भाई को हादसे का दोषी मानते हुए उन से कभी प्यार से बात नहीं की… और शायद ये hi कारन था के उन्हों ने मेरी शादी में विरोध किया… पिता जी भी मजबूर हो गए…”

माँ… “फिर कृष्णा भैया ने सुझाव दिया के में और तुम्हारे बापू वह से निकल जाएँ और शादी कर लें… और हमलोग निकल गए… और शादी कर ली…”

माँ कुछ दिएर के लिए खामोश हुई तो उसी समय दरवाज़े पर नॉक हुआ… में ने उठ कर दरवाज़ा खोला तो माँ थी और उन के हाथ में 3 कप चाय थी…

माँ… मुस्कुराते हुए… “में ने सोचा के में भी कुछ दिएर अपने bête और बहन के साथ चाय पी लू… इस लिए बना दी आप लोगो के लिए…”

माँ… “अरे वाह… चाय का तो मेरा दिल भी छह रहा था…”

चाय की छह तो गोविन्द को भी थी मगर इस समय माँ की बातें बोहत अछि लग रही थी… और उससे माँ का यूँ अतिक्रमण करना ाचा न लगा…

अब बीएड पर गोविन्द के एक तरफ माँ थी और दूसरी तरफ माँ… बीएड पर hi बैठे बैठे चाय पीने लगे…

माँ ने भी निघ्त्य पहनी हुई थी…

चाय ख़तम हुई तो माँ ने गोविन्द को कहा… “बीटा ये कप्स ट्रे के साथ बहार किचन में रख दो…”

गोविन्द किचन में कप्स और ट्रे रख कर वापिस आया तो माँ अब माँ के बराबर में लेती हुई थी और दोनों के ऊपर चादर थी… तो गोविन्द को माँ के साथ लेटना पारा…

माँ और माँ आपस में बाटे कर रही थी पार्टी के कपड़ों की… गोविन्द बोर हो रहा था के अचानक उस को अपनी तंग पर लुंड के पास हाथ महसूस हुआ… उस ने भी चादर डाली हुई थी… हाथ माँ का था… माँ ने कुछ दिएर के बाद लुंड को सहलाना शुरू कर दिया…

माँ ने बाटे करते करते करवट ले ली दूसरी ओर… और कुछ hi दिएर में सो गयी… उन के हलके खर्राटे सुनाई देने लगे…

अब माँ गोविन्द के कान में फुसपुसाई… “लाइट बंद कर दो…”

गोविन्द जैसे कोई रोबोट… उठा और लाइट बंद कर दी…

बीएड पर आकर लेता तो माँ उस के साथ सात गयी… और गोविन्द को तब पता चला के माँ तो अपनी निघ्त्य उतार चुकी हैं…

गोवंड एक डैम परेशान हो गया… “माँ… प्लस ख्याल करें… माँ इधर hi सोई हुई हैं…”

माँ ने गोविन्द को किश करना शुरू कर दिया था… होंठ हटते हुए कहा… “चिंता न करो… चाय में नींद की गोली थी…”

ये सुनते hi पहले तो गोविन्द का माथा घूमा… और सोचा… “अबे बहनचोद…”

लेकिन फिर जैसे उस को ये बोहत रोमांचक लगी के एक माँ वही सो रही हे और दूसरी माँ के साथ प्यार कर रहा हे…

बस फिर जैसे उस की उत्सुकता अधिक बढ़ गयी और उस का लुंड एक डैम तन्न गया…

माँ पूरी नंगी थी…

दोनों कुछ दिएर किश करते रहे… दोनों की सांसे गहरी हो रही थी…

माँ के तेज़ी से किये गए कारिये से पता चल रहा था के बस जीवन की यही आखिरी रात हे उन के पास…

उन्हों ने एक हाथ से गोविन्द का लोअर नीचे करना शुरू करदिया… गोविन्द ने अंडरवियर नहीं पहना हुआ था…

लुंड बहार निकला तो माँ ने फ़ौरन से अपने होंठ गोविन्द के होंटो से हटा कर सीधे अपने मुंह लगा दिया गोविन्द के लुंड पे… पहले ढेर सारा चूमा उस ने फिर एक डैम अपने मुंह में लेकर के चूसने लगी…

माँ की टंगे थी गोविन्द के मुंह के पास… तो उस ने अपने हाथो से पहले तो उन के चूतर और छूट के आस पास टैंगो को काफी सारा सहलाया… फिर एक ऊँगली दाल दी उन की छूट में…

आआह… एक सिसकी उभरी माँ के मुंह से…

और फिर से वो अपने काम में चालू हो गयी…

बोहत कामुक अंदाज़ में लुंड चूस रही थी…

गोविन्द फुसपुसाया… “माँ… पापा न उठ जाये…”

माँ… “छपपप छहपपप… उन को पहले hi नींद की गोली दे दी थी दूध में दाल कर…”

गोविन्द ने दूसरी ऊँगली भी दाल दी छूट के अंदर…

छूट पूरी गीली थी…

ाः… आआह…. ममम… छक्पपप… कछहपपप… आआह्ह्म्म्म…

उंगलिओ पर माँ अपनी छूट को फैलाने… घूमने लगी…

गोविन्द ने अब दाने पर भी अंगूठा लगा दिया… 2 उँगलियाँ छूट के अंदर बहार हो रही थी और अंगूठा दाने को सेहला रहा था…

छूट में से रास निकता जरा है था… सारा रास उंगलिओ से नीचे गिर कर गोविन्द के बाज़ू तक आ रहा था…

फिर माँ सीढ़ी हो गयी.. और उस के होंठ चूसने लगी… और उस के कपड़े उतरने लगी…

गोविन्द… “माँ प्लीज अभी nahi…Maa भी इधर hi हे… आज बस ऐसे hi करले ते हैं… फिर पूरा सम्भोग करें गए…”

माँ गहराई… “नहीं तुम पहले भी प्रॉमिस करके मुक्कर गए थे… बारे मक्कार हो तुम…”

गोविन्द ने अब चुप चाप अपने कपड़े उतर दिए…

माँ ने खुद उस के लुंड को पाकर कर छूट के ऊपर सेट किया और धरम से पूरा लुंड अंदर लेते हुए उस के ोप्पर अपने चूतर रख दिए…

नरम नम्रम चुत्रो ने ग़ज़ब का काम किया…

गोविन्द नीचे से लुंड को हिलने लगा…

इधर गोविन्द हिला रहा था… ऊपर और नीचे…

उधर माँ अपनी छूट रैगर रही थी लुंड पर गोल गोल दायरे की तरह…

दोनों अपने अपने करिये से बता रहे थे के बोहत अनुभवी खिलाड़ी हैं…

और फिर माँ झुक गयी गोविन्द के ऊपर और उस का मुंह पाकर कर अपने भरे भरे स्थानों पर लगा दिया…

गोविन्द ने पहले कोशिश की के पूरे चुके को मुंह में लेले मगर नाकाम होने के बाद… निप्पल को hi चूसने लगा…

निप्पल काफी मोठे और बारे थे…

सख्त और दमदार… किसी बरी चॉकलेट टॉपिंग की तरह…

लगत था के माँ को अच्छा लगा… उस के सिसकिया तेज़ हो गयी….

आह… आह… ऐसे hi चूसो बीटा… आह… aaah…mmm… ोीी… मां… ाः… ोीी… मम्मा…

गोवंड बरी बरी दोनों निप्पल को चूस रहा था और साथ साथ चूतर भी सेहला रहा था…

माँ ने गोविन्द को पीछे करते हुए अपने दोनों हाथ उस के सीने पर रख दिए और चूतर ज़ोर ज़ोर से उठा उठा कर लुंड पे मरने लगी… जैसे वो छोड़ रही हो गोविन्द को…

बीएड ाचा खासा हिल रहा था… माँ के खर्राटे जारी थे… गोविन्द के लिए ये बोहत रोमांचक था के एक माँ को छोड़ रहा हे और दूसरी बग़ल में हे…

5 मिनट भी जूनून न रह सका माँ का… और वो झरने लगी… झरते हुए भी उस के मुंह से घूऊ घ्ठुऊ की आवाज़ निकल रहे थी…

और वो ढेर हो गयी गोविन्द के सीने पर…
 
EPISODE – 82

फ्लैशबैक…

स्मरण…

1/3

कैलाश नाथ… ट्रैन में हे… उस को बस अपना नाम याद हे… कहाँ से आया हे… कहाँ जा रहा हे… इस ट्रैन में कब और कहा से बैठा ट्रैन में… कुछ याद नहीं हे… ये भी याद नहीं के यादाश्त कब से ग़ायब हे…

कैलसाह नाथ को प्यास लग रही हे…

ट्रैन स्लो हो रही हे…

रात का समय हे… शायद 8 बजे होंगे रात के… वाच नहीं हे इस के पास…

जेब खली हे… टिकट भी नहीं हे… कोई रुपया भी नहीं हे…

कैलाश नाथ ऊपरी बिरथ पर बैठा हे… ये ट्रैन की लोअर क्लास हे…

सामने वाली बिरथ पर एक बूढ़ा सो रहा हे…

नीचे सीट्स पर 2 फैमिलीज़ हैं…. “क्या इन से पानी मांगू… अगर इंकार कर दिया तो…”

ट्रैन स्लो हो रहे हे… किसी बारे शहर की रोश्नीयं चमक रही हैं… “स्टेशन पर उतर कर पानी पि लेता हु…”

ट्रैन रुक जाती हे… वो नीचे उतर कर ट्रैन से बहार आजाता हे… स्टेशन पर ज़यादा भीड़ नहीं हे… बोहत थोड़े लोग चढ़ने वाले और बोहत काम लोग उतरने वाले हैं…

वो सामने लगे नल से पानी पीटा हे… हाथों को जोड़ कर… वह गिलास नहीं हे…

अछि हवा चल रही हे… उस को अहसास होता हे के उस के कपड़े मैले हैं… बॉस आरही हे कपड़ों में से…

स्टेशन की बिल्डिंग पर बड़े लफ़्ज़ों में “जयपुर” लिखा हे… बिल्डिंग बोहत खूबसूरत हे…

वो सोचता हे के मुझे अगर कही नहीं जाना तो अब ट्रैन पर चढ़ने से क्या फ़ायदा… यहाँ शायद कुछ खाने को मिल जये… प्यास बुझने के बाद भूक भी जग गयी हे…

सामने एक दहला हे… वह से छोले बठूरे की खुशबू आरही हे… उस के अंदर भूक बढ़ रही हे… वो ठेह्ले वाले के पास चला जाता हे… ट्रैन अब चलने लगी हे… जिन लोगों ने उतरना था उतर गए… जिन लोगों ने ट्रैन पर चढ़ना था चढ़ गए…

कैलाश नाथ ठेह्ले वाले के पास खरा हे चुप चाप…

ठेह्ले वाला उस को धुत्कर्ता हुए… “चल बे भिकारी… हैट यहाँ से… कितनी बॉस मार रहिओ रे… शकल से hi नशेड़ी लागिओ रे…”

एक दयालु आदमी ठेह्ले वाले को रोकते हुए… “न झिरकीओ रे इससे… कोई दुखी और मुसीबत का मारिओ लग रहिओ हे… एक प्लेट छोले बठूरे इस को दे दियो… रुपया मुझ से ले लिओ…”

और यूँ कैलाश नाथ को एक प्लेट छोले बठूरे की मिल गयी… उस ने कृतज्ञता से भरी नज़रों से उस दयालु मनुष्य को देखा और पल भर में प्लेट साफ़ करदी… उस को ये भी याद नहीं था के आखिरी बार खाना कब खाया था…

कैलाश नाथ स्टेशन से बहार निकल आया… यूँही बिना किसी कारण और दिशा के एक तरफ चल पारा… आगे आवाज़ हे कुछ लोग शायद झगड़ रहे हैं… नहीं किसी को मार रहे हैं… देखा तो 3 लोग हैं उन के चेहरे ढके हैं कपड़ो से और वो एक जवान को मार रहे हैं… जवान खली हाथ हे… और उन का मुकाबला कर रहा हे… मगर उस के सर से खून निकल रहा हे…

फिर एक नकाब पॉश ने लाठी ज़ोर से घुमा कर फिर से उस के सर पर दे मारी… इस बार वो सेह न सका… नीचे गिर गया…

कैलाश नाथ आगे बढ़ा… “ठहरो… रुक जाओ… क्यों मर रहे हो इससे…”

“चल बे भोस्डिके अपना रास्ता नाप… नहीं तो तेरी भी चटनी बना दें गए…”

कैलाश नाथ से गाली न सुन्नी गयी… उस ने आगे बढ़ कर उस लाठी वाले की लाठी पाकर कर एक झटके में चीन ली…

वो शख्स अचंभे से उससे देखने लगा और देखते hi देखते कैलाश नाथ ने ऐसी लाठी घुमाई के वो तीनो गुंडे भाग के निकल लिए… ऐसा नहीं था के गुंडे अनारी थे… मगर कैलाश का लाठी चलने का तरीका विशेषज्ञ लड़ाकू का था… वो ना ठहर सके कैलाश के आगे…

कैलाश नाथ सोचने लगा के क्या उससे लाठी चलना आती हे…

उस ने देखा जवान की ओर… उस के सर से खून बह रहा था… कैलाश ने उससे सहारा दे कर खरा किया और उस जवान की पगड़ी को फर कर पट्टी बना कर उस के सर पर लप्पेट दी… “ये कोण थे… क्यों मरना चाहते थे तुम्हे…”

जवान… “में इन को नहीं जनता… में तो अपने पिता जी को स्टेशन चोर्ने आया था… वो रही मेरी ghoda-gaadee… क्या तुम उससे चला कर मुझे मेरे घर छोड़ सकते हो…??”

कैलाश नाथ… “हाह हाँ… क्यों नहीं… तुम्हारा नाम क्या हे…” जवान को ghoda-gaadee में सहारा से कर बिठाते हुए…

जवान… “कृष्णा…”

कृष्णा… “मैं तुम्हारा आभारी हूँ. तुम ने मेरी जान बचाई हे…”

कैलाश नाथ… अब घोड़े की रास सँभालते हुए… “कोई नहीं… ये तो मेरा फ़र्ज़ था… रास्ता बताओ… किस ओर चलना हे…”

कृष्णा ने उस को रास्ता समझते हुए… “तुम्हारा नाम क्या हे…”

कैलाश नाथ… “कैलाश नाथ… इस से ज़यादा में नहीं जनता के में कहाँ से आया हु और कहाँ जाना हे… मुझे बस अपना नाम याद हे… अपने बारे में कुछ और याद नहीं हे मुझे…”

कृष्णा ये सुन कर हैरान तो ज़रूर हुआ मगर उस ने ज़यादा जिरह न करते हुए… “चलो कोई नहीं… आज से तुम मेरे बैली हो…”

कृष्णा को इस जवान से हमदर्दी हो रही थे… इस की जान जो बचाई थी इस ने…

घर पोहंचे तो सब परेशां हो गए… डॉक्टर को हवेली में hi बुलवा लिया गया… मरहम पट्टी के बाद सब को होश आया के ये जवान कोण हे जो कृष्णा के साथ आया हे… कृष्णा ने बताया के यही तो वो जवान हे जिस ने जान बचायी हे इस की…

एक लड़की बढ़ती हे आगे… और हाथ जोड़ कर खड़ी हो जाती हे कैलाश नाथ के सामने… “आप ने हमारे ऊपर बोहत बारे उपकार किया हे… बहिया की जान बचायी हे…”

मगर कैलाश नाथ कब उस की बातें सुन रहा था… वो तो इस पूर्वी की तरह से महकती… सितारों सी चमकती… जहरनो सी लहराती लड़की के चेहरे के रंग देख रहा था… कई तितलिओं के हज़ारों रंग इस लड़की के चेहरे पर थे… किया कोई इतना ख़ूबसूरत हो सकता हे… वो लड़की भी इस जवान की आँखों को यूँ अपने चेहरे पर जमे देख कर शर्मा गयी.. जानती थी के वो इतनी सुन्दर हे के चलने वाले भी रुक जाते हे और रुकने वाले पत्थर के हो जाते हे… मगर इस जवान की तो जैसे ज़िन्दगी hi थम गयी थी… ये तो अपने hi होश खो कर बॉस कही गम सा हो गया था…

जाँसोज़ की हालत को

जाँसोज़ hi समझेगा

में शम्मा से कहता हूँ

परवाने से नहीं कहता

केवल एक पीड़ित… केवल कोई जो जनता है की अपनी खुद की आग में जलना कैसा होता है… अपने hi जूनून से भस्म हो जाता है… वही समझेगा की उसे कैसा लगता है... और इसी लिए वो खुद को शमा की लौ को सम्बोधित करता हे… पतंगे को नहीं… पतंगा क्या जाने जूनून के बारे में...

परम प्रेमी बनाने के लिए क्या करोगे…?? शमा की लौ बनाने के लिए क्या बलिदान करोगे…???

कृष्णा ने आकर उस के कंधे पर हाथ रखा… “मुनियम जी के साथ जाओ… ये तुम्हे तुम्हारा कमरा दिखा दें गए…”

इस तरह से कैलाश नाथ को मर्दाने में एक कमरा दे दिया गया जो मेहमानो के लिए था… वहीं कपड़े रखे थे जो उस ने नाहा कर पहन लिए…

अगले रोज़ उस की मुलाक़ात हुई सेठ लालचंद से… व्हीलचेयर पर बैठे सुरुचिपूर्ण शख्स ने उस का धन्यवाद तो किया मगर लहजे में अप्रसन्नता थी… एक संदेह था… कैलाश नाथ की कहानी से संतुष्ट नहीं लगे यादास्त खो जाने वाली बात से…

सेठ लालचंद ये ज़रूर समझ गए थे के कृष्णा पर क़ातिलाना हमला हुआ हे और अगर कैलाश न आता तो शायद वो गुंडे ख़तम कर चुके होते कृष्णा को… और चेहरे ढांपने का मकसद ये था के वो पहचान में न आजायें…

सेठ लालचंद ने मुनियम जी को बुला कर ग़ुस्सा किया… और कहा के आइंदा से कृष्णा अकेला कही नहीं जाये गए… परिवार की दुश्मनी तो थी नहीं मगर कोई तो था जो कृष्णा को ख़तम करना चाहता था…

फिर उन की मुलाक़ात हुई कृष्णा के पिता जी के चचेरे भाई… मनीष चाँद और उन के बेटे नीलेश चाँद से… ये लोग अचे न लगे… कैलसाह को … ना hi कैलाश से ज़यादा बात की उन लोगो ने… बस मुलाकात नमस्कार तक hi रही मुलाकात…

उस दिन के बाद से रजनी से मुलाक़ात न हुई…

रजनी अपने भाई की खिदमत में लगी हुई थी… अपनी जान से प्यारा था… उस को… पहली मोहबत थी… वो अक्सर अपने बही से लिपट जाती तो बोहत दिएर तक यूँही लिपटी रहती… कृष्णा को अपनी बहन से प्यार था… और वो भी खूब समझता था रजनी की भावनाओ को… मगर ये भी जनता था के कच्ची उम्र में ऐसे हो जाता हे…

जिस रात उस कृष्णा पर हमले हुआ था… सब के जाने के बाद… रजनी कृष्णा के कमरे में आगयी… और ढेर साड़ी बातें करते करते वही आँख लग गयी उस की…

माँ आकर उठाने लगी… “उठ रजनी… अपने कमरे में जा कर सो… घोड़ी हो गयी हे सोने का धनाग नहीं सीखा…”

रजनी नींद में… “माँ सोने दे न… में नहीं उठ रही… बस सोने दे…”

कृष्णा… “कोई नहीं माँ… सोने दे इससे… नींद न ख़राब कर इस की… मेरी बहना कितनी पायरी लग रही हे सोते हुए…”

माँ… बड़बड़ाते हुए… “तुम ने hi सर चढ़ा लिया हे इससे…” और रजनी को वही सोता चोर कर बहार चली गयी…

कृष्णा का तो वैसे भी डबल बीएड था… एक तरफ रजनी सोई हुई थी… दूसरी तरफ… वो लेट गया अलग तकिये पर… दोनों की चादर भी अलग थी…

कृष्णा को भी जल्द hi नींद आगयी थी… कुछ शायद डॉक्टर की दी हुई दवा का भी असर था… और कुछ छोटो के कारन कमज़ोरी भी हो गयी थी उससे…

जाने कब नींद में रजनी उस के पास आकर उस से लिपट गयी… रजनी का कोमल बदन… और कृष्णा का मज़बूत जिस्म…

दोनों के बदन के विन्यास अलग… मगर असर एक तरह का… दोनों के बदन दहकने लगे थे जवानी की आंच से…
 
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