Kya Govind yunhi tarasta rahe ga - Page 13 - SexBaba
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Kya Govind yunhi tarasta rahe ga

बीआरओ... प्लस अंडरस्टैंड करें कहानी का हर अपडेट आप को ाचा लगे ये ज़रूरी नहीं... में हाथ जोड़ कर माफ़ी चाहता हूँ के आप को बुरा लगा... मगर कहानी के ओवरआल इम्पैक्ट के लिए बोहत ज़रूरी हे... सरल या सरला का episode आया था तब भी कुछ दोस्त जल्दी में लगे .... लेकिन खुद को मेरी जगा रख कर सोचें गए तो शायद मेरी बात आप को ठीक लगी... बाकि आप का प्यार और सपोर्ट मुझे हमेशा मिला हे... और आप भी उन चनद दोस्तों में हैं जिन के लिए ये कहानी लिख रहा हु... उम्मीद हे आप मेरी बात समझें गए... 🙏
 
में आप की फीलिंग्स समझता हूँ.... दोस्त मगर ये भी समझिये के कहानी में कुछ मोड़ होते हे कुछ ट्विस्ट होते हैं... जो ज़रूरी होते हैं... रजनी ने जितनी बातें कही वो सब सरसरी थी... असल झगड़ा उन के परिवार का क्या हे... वो तभी समझ में आएगा जब थोड़ा सा उस के बारे में लिखा जाये... कभी कभी कहानी को रोमांचक बनाने के लिए थोड़ा बोहत डिले भी करना होता हे... बाकि इतना में ज़रूर कर सकता हूँ के आप ने जैसे हुकुम दिया हे के आज hi ख़तम कार्डो फ्लैशबैक तो में अगला भाग भी लिखने बेथ जाता हु और आज hi इस को पूरा करके उठूं गए चाहे रत के 1 बजे या 2 बजे... 🙏
 
EPISODE – 83

FLASHBACK…continues

स्मरण… जारी हे…

2/3

जाने कब नींद में रजनी उस के पास आकर उस से लिपट गयी… रजनी का कोमल बदन… और कृष्णा का मज़बूत जिस्म…

दोनों के बदन के विन्यास अलग… मगर असर एक तरह का… दोनों के बदन दहकने लगे थे जवानी की आंच से…

दोनों नींद में थे या नहीं… मगर जवानी का नशा ज़रूर था… एक सरूर था जो बढ़ता जा रहा था…

नींद में या मदहोशी में एक बदन दुसरे बदन की सुरसुराहट सुन रहे थे… बहन भाई नहीं… दो बदन थे जो आपस में बात कर रहे थे… शब्द आज या कल के नहीं थे …. किसी प्राचीन बोली के शब्द थे… जिस्म खूब पहचानते थे इन शब्दों को…

कृष्णा को शायद कुछ ठीक न लगा… उस की मर्यादा जग गयी… राजपूत खून शोर सा करने लगा… प्रतिरोध किया बदन की दहकती आंच, इच्छा और ललचा के खिलाफ और रोक लिया सही समय पर खुद को और इस शोर मचती, उठती, इठलाती जवानी को…

कृष्णा ने बहन के होंटो को एक बोसा देकर उस के माथे को चूमा और बारे प्यार से अपने और उस के कपड़े ठीक करदिये… उस ने रजनी को भी संभाला और खुद को भी… मर्यादा को फतह मिली… उस ने बारे प्यार से… दुलार से… दिव्य प्रेम से… अपनी बहन को अपने पास सुलाते हुए सो गया…

अगले दिन कृष्णा ने सोच लिया था के रजनी बरी हो गयी हे और इस के शादी अब जल्द हो जनि चाहिए… नीलेश का साला ृतिं के घरवाले ृतिं के लिए बात दाल चुके थे… और कृष्णा सोच रहा था के कोई मुनासिब मौका देख कर पिता जी से बात करे गए…

दिन गुज़रते गए… सेठ अमीर चाँद भी वापिस आगये थे… अजीब तो उन को भी लगा कैलाश की यादाश्त का सुन कर मगर आभारी थे उस की सहायता के…. अपने बेटे की जान बच जाने पर…

इधर मनीष चाँद और उस के बेटे नीलेश चाँद… सेठ लाल चाँद को बार बार यही पाठ पढ़ा रहे थे के… हो ना हो ये चाल इस कैलसाह नाथ की हे… पहले खुद हमला करवाया कृष्णा पर और खुद बचाया उस को और अब कहानी सुनाता हे के यादाश्त चली गयी हे… ये ज़रूर यहाँ कोई मकसद लेकर आया हे… इस को निकल बहार करो…

शायद वो अमीर चाँद पर दबाव बना कर कैलाश को निकाल बहार करते… अगर एक और न घटना घाट जाती…

साल में एक बार मुकाबला होता था और फ्रीस्टाइल प्रतियोगिता या लड़ाई का संस्करण जिस में प्रतियोगियों द्वारा नियोजित चाल या तकनीकों पर कुछ प्रतिबन्ध नहीं हैं. यह लड़ाई दो खिलाड़ियों के बीच नंगे हाथों से शुरू होती और फिर लड़ाई जारी रहते हुए लेथ बाज़ी तक जाती… और दर्शकों में से किसी को भी 2 दो तक को इजाज़त थी के अपने खिलाड़ी की मदद करने की अनुमति दी जाती और वो भी भाग ले सकते थे…

आज तक जितनी भी लड़ाई हुई थी… उन में विजयी कृष्णा hi रहा था… नीलेश और ृतिं भी अचे लेथ बाज़ थे…

पंडाल सज गया… कुछ नए खिलाड़ी मैदान में आये… और कुछ लड़ाई भी आगे चली… महिलाये मैदान के आस पास बने घरो की छतो से देख रही थी… हर तरफ एक शोर था… जोश था… मर्द दर्शक पिण्डल के गिर्द कुछ कुर्सिओं पर और कुछ बेंचो पर बैठे थे… बाकि सरे ज़मीन पर hi बिछी चटाई पर बैठे थे…

और अब बारी आयी आखिरी फाइट की… कृष्णा उतरा मैदान में…

उस के मुकाबले में उतरा नीलेश… दोनों ने खली हाथो से खूब जैम कर मुकाबला किया… एक बार कृष्णा के नैक लॉक से नीलेश बरी मुश्किल से निकला… और उस का चेहरा पूरा सुर्ख था ग़ुस्से से…. उस ने अपनी लेथ मांग ली…. उस के लेथ उठाते hi… कृष्णा ने भी अपनी लेथ उठा ली…

पहले दोनों खिलाड़ी एक दुसरे के सामने लेथ घूमते रहे और सररर सररर की आवाज़ गूँज रही थी…

पहले वार किया… नीलेश ने… कृष्णा ने बरी तेज़ी से न सिर्फ वार रोका बल्कि जवाबी वार में नीलेश की कमर पर हलकी थपकी दे दी लाठी से…. साफ़ पता चला के कृष्णा बस उस के साथ खेल रहा हे… उस को दर्द या तकलीफ नहीं देना चाहता… पूरा तैयार था कृष्णा…

कैलाश भी मौजूद था दरशको में… उस ने भी दाद दी…

नीलेश फिर संभाला… दो कदम पीछे हटा… फिर लाठी घूमते हुए कृष्णा के सर की तरफ लाठी मरते हुए एक डैम से रुख बदला लाठी का और निशाना बना दिया कृष्णा की कमर का…. कृष्णा न समझ सका था उस की चाल और लाठी की ज़राब काफी ज़ोरदार थी… साफ़ पता चला के नीलेश उस को तकलीफ देना चाहता हे…

दर्शको ने तालिया तो बजायी मगर ज़यादा नहीं… उन को भी दोनों के वार में अंतर नज़र आचुका था…

नीलेश के वार के बाद लड़ाई कुछ तनाव वाले चरण में जा चुकी थी… अब कृष्णा ने भी कोई छूट न देते हुए भरपूर अंदाज़ में वार करने शुरू कर दिए…

कुछ दिएर में उस की सहायता के लिए ृतिं मैदान में उतरा… उस के मैदान में उतारते hi एक खिलाड़ी कृष्णा की सहायता के लिए उतरा… अब चार लेथ बाज़ 2 की जोड़ी में युद्ध कर रहे थे…

कैलाश की तेज़ नज़रे ये देख कर हैरान हुई के कृष्णा का साथी कृष्णा की सहायता न करते हुए जैसे उस को hi आँख बचा कर लाठी मर देता था…

ृतिं की ओर से एक तेज़ वार से कृष्णा के सर पर चोट लगी… कृष्णा कुछ दिएर के लिए चकराया… मगर खुद को गिरने से बचा लिया….

कैलाश को ये लड़ाई अजीब लग रही थी जैसे के 3 खिलाड़ी लार रहे हो कृष्णा के खिलाफ…

अब साफ़ लग रहा था के बस कृष्णा हारने वाला हे… उस के पक्ष में na’are लगते दर्शक खामोश हो रहे थे… रजनी चाट पर से अपनी सहेलिओ के साथ बैठी मायूस हो कर खामोश हो गयी थी… उस की आँखें नाम थी…

और फिर एक और लेथ बाज़ नीलेश और ृतिं के नाम का na’ara मरते हुए मैदान में उतरा… घोषणा करते हुए के वो साथी हे नीलेश और ृतिं का…

एक और लेथ बाज़ भी उतरने लगा कृष्णा की साइड से… मगर कैलाश ने उस से लेथ ले ली और ज़ोरदार na’ara मारा कृष्णा की साइड का…

कैलाश का ये घोषित करना के वो उतर रहा हे कृष्णा के पक्ष में…. एक बार फिर से कृष्णा के दर्शको के लिए आशा फिर से जग गयी थी…

रजनी भी अपनी सहेलिओ के साथ फिर से जाग उठी और वो भी अपने भाई के लिए na’are मरने लगी…

पहले तो कैलाश ने लाठी को दाएं… बाएं और फिर ज़ोरदार चक्कर दिया गोल गोल… उस के प्रतियोगी चार चार फ़ीट दूर हैट गए… लड़ने से पहले hi कैलाश ने बता दिया के हसह सम्भालो असल योद्धा आगया हे मैदान में…

उस के लेथ घूमने से जो सररर सररर की आवाज़ निकली थी वो ऐसी थी जैसे के बोहत सारे सिंह घुरए हों….

अब 2 की जोड़ी में 3 योद्धा थे आमने सामने… इस गठन में के कैलाश था बीच में उस के एक तरफ कृष्णा और दूसरी तरफ पहले वाला साथी…

सामने ृतिं बीच में और नीलेश एक तरफ और उन का तीसरा साथी दूसरी तरफ….

ृतिं बढ़ा आगे हमले के लिए कैलाश पर… और नीलेश कृष्णा पर… कैलाश की नज़र न सिर्फ सामने बल्कि अपने बग़ल वाले साथी पर भी थी…

ृतिं के वार को संभाला कैलाश ने और वो देख चुक्का था के उस के साथी ने सामने वाले पर वार की बजाय कैलाश की ओर लाठी घुमाई… कैलाश के ज़ेहन में पहले से ये बात थी… उस ने ृतिं के वार को रोकते हुए एक कलाबाज़ी खा कर दूसरी ओर जाते हुए एक ज़ोरदार वार किया नीलेश की कमर पर… नीलेश दोहरा हो गया…

सारे पंडाल में हहहाकर मच गयी… काया वार किया था जवान ने… एक वार रोका… कलाबाज़ी खाई और दुसरे के पीछे पोहचते hi उस की कमर पर लाठी बजा दी…

कैलाश न रुका… लगता था के वो प्रतियोगियों को दूसरा मौका नहीं देता था…

बस पहले तो उस ने ढेर किया नीलेश और ृतिं के साथी को… फिर एक बार फिर से नीलेश की कमर पर उसी जगा लाठी बजायी…. नीलेश भी ज़मीन पर धुल चाटने लगा…

उस ने देखा के कृष्णा पर उन का hi साथी वार करने लगा हे तो उस ने लोट लगाई ज़मीन पर और एक गहतरी की तरह से रोल करते हुए उस ग़द्दार साथी की टंगे उठा दीं… उस की चीख ने पूरे पंडाल को दहला दिया…

घदारों के लिए कोई रेहम नहीं….

अब उस ने कृष्णा को साइड में होने का इशारा करते हुए ृतिं को आवाज़ दी…. “आजा ोये…”
 
EPISODE – 84

FLASHBACK…continues

स्मरण… जारी हे…

3/3

मगर उसी वक़्त रेफरी ने घोषित किया के लड़ाई कृष्णा और उस की टीम ने जीत ली हे…

और फिर नकड़ों की आवाज़ थी हर ओर…

डैम… डैम… डैम… डैम… दमा… दमा… डाम्मा…

कृष्णा ने गले से लगा लिया कैलाश को… और रजनी का तो मनो जैसे दिल घायल कर दिया था इस जवान की बहादुरी और फुर्ती ने… उस के भाई को बचाया था…

एक लाठी तक नहीं पडी थी उस के शरीर पर… और प्रतियोगी धूल चाट रहे थे…

सेठ अमीर चाँद और सेठ लाल चाँद ने भी खुल कर सराहा… कैलाश को…

नीलेश और ृतिं की आँखों में कीना और बैर था…

रात को बारे खाना हुआ चौपाल में और सम्मानित अतिथि थे कृष्णा और कैलाश…

वो रात को दिएर से लोटे वापिस हवेली…

रजनी… उन का इंतज़ार कर रही थी…

कृष्णा हवेली में अंदर चला गया… और कैलसाह मर्दाने में अपने कमरे में…

नीलेश भी उसी हवेली में रहता था… उस का अलग कमरा था… इस समय वो और ृतिं दारू की बोतल खोल चुके थे और दोनों के दिल और दिमाग़ में बेइज़्ज़ती और हार की गूँज थी… दोनों बोहत ग़ुस्से में थे… दोनों बोहत जल्द जल्द पेग बना कर पी रहे थे…

कैलाश को आज फिर नींद नहीं आ रही थी…

वो छत पर आगया… और अपने बारे में सोचने लगा के क्या पह्छां हे उस की और इतना विशेषज्ञ लड़का कैसे बना हे… उसी समय रजनी भी अपने दिल के हाथो मजबूर हो कर निकली अपने कमरे से… बढ़ने लगी कैलाश के कमरे की ओर… कैलसाह का कमरा खली देख कर हवेली की पिछले हिस्से से होती हुई अपने कमरे की ओर जाने लगी… ृतिं मदहोश दारू के नशे में निकला बहार… रजनी को देखा तो उस के पीछे चल पारा… और तारीकी देख कर उस को पाकर लिया… वो चुर्राने की कोशिश करने लगी और कुछ शोर भी हुआ…

रात का समय… ख़ामोशी… हलकी सी आवाज़ भी गूंजी पूरी हवेली में… कैलाश तक आवाज़ पोहंची… उस ने चाट से नीचे झाँका… तो देखा के कोई मर्द ज़बरदस्ती पकड़े हुए हे एक महिला को… वो छत से hi नीचे जाते पाइप पर से उतरने लगा…

कृष्णा को भी अपने कमरे में आवाज़ आयी वो भी बहार निकल कर पिछली तरफ को हो लिया…

कैलसाह पहले पोहंचा… उस ने ृतिं को पाकर कर दो तीन मुक्के दे मारे… रजनी वहीं बैठी रोने लगी…

कृष्णा भी पोहंच गया…

ृतिं पहले से hi नशे में था… कैलाश के मुक्को ने उस ज़मीन की मट्टी चाटने पर मजबूर कर दिया…

रजनी को कैलाश ने उठाया और उस के कपड़े ठीक किये… उस के सर पर चुन्नरी दाल hi रहा था के कृष्णा भी आगया वही पर…

उस ने रजनी को अपने सीने से लगा कर चुप करवाया… और धन्यवाद कहा कैलाश को… नीचे गिरे हुए ृतिं को उस ने भी दो ठुद्देद मारे…

रजनी का प्यार अब अधिक बढ़ गया कैलाश के लिए… कृष्णा ने भी समझ लिया के ृतिं ठीक चरित्र का नही हे और रजनी के लिए मुनासिब वर नहीं हे… उस की निगाह अब धुंध रही थी के कोण हो सकता हे रजनी के लिए लड़का जो उस की हिफ़ज़ज़त भी करे और उस को खुश भी रखे…

रजनी को अब ये पता चल गया था के कैलाश कभी कभी छत पर जाता हे… एक दिन जब उस ने देखा के वो छत पर हे तो चुपके से वो भी ऊपर आगयी…

कैलाश जो के अपने आप में कहीं गुम्म था… पायल की चम् चम् से उस ने देखा तो उस के सामने देवदूत सौंदर्य थी… नज़रे झुकाये…

कैलाश ने सोचा के ये मेरे सामने आगयी हे फिर नज़रें क्यों नहीं उठती…. उस को अपने मैं से जवाब मिला…

इससे तुम्हारा ख्याल हे…

कैलाश ने सोचा मेरा क्या ख्याल….???

जवाब मिला…. अगर इस ने भरपूर नज़र दाल दी तुम पर…

तो जल जाओ गए….

ख़ाक हो जाओ गए….

कैलाश ने भी सोचा के ाचा हे …

न उठाये नज़र…. न देखे मेरी तरफ…

कैलाश ने डरते डरते आवाज़ दी… “रजनी…”

रजनी ने नज़र न उठायी बस हंस दी…

कैलाश को ऐसा लगा जेसे उस का दिल धरकना बंद कर देगा…

कैलाश बोलै… “कोई छत पर न आजाये…”

रजनी… फिर से हंस दी… “डरते हो… मैदान में तो बरी बहादुरी दिखा रहे थे…”

कैलाश… “बस तुम्हारी इज़्ज़त की कहतीर डरता हूँ…”

रजनी… अब कुछ दिएर खामोश रही और फिर बोली… “पिता जी से बात करो गए मेरे लिए…”

कैलाश… “हाँ ज़रूर करूँ गए…”

वो दोनों नहीं जानते थे के उन की बातें कोई और भी सुन रहा हे… जो के रजनी को छत पर आते देख कर ऊपर आगया था…

अब वो आगे आ गया… उस को देख कर रजनी और कैलाश दोनों दर गए…

वो कृष्णा था…

कृष्णा… “घबराओ मत… मगर यूँ रात के इस समय मिलना ठीक नहीं… कल बात करूँ गए में पिता जी… वो मान जाएँ गए… और अब आइंदा नहीं मिलना इस तरह…”

रजनी ख़ामोशी से नीचे चली गयी…

कैलाश ने भी सर नीचे कर लिया था…

कृष्णा… “कैलाश तुम एक बहादुर जवान हो… अचे चरित्र के हो… मगर ये ठीक नहीं हे… में ये भी जनता हु के रजनी छत पर खुद आयी हे… कल मेरे साथ पिता जी के पास चलना… तुम्हारी और रजनी की शादी की बात करें गए…”

उस के बाद कृष्णा भी ख़ामोशी से छत से नीचे उतर गया…

अगले रोज़ जैसे hi कृष्णा ने कैलाश के साथ मिल कर बात की तो सेठ अमीर चाँद तो खामोश हो गए… मगर सेठ लाल चाँद ने फैसला दे दिया के आज शाम तक कैलाश हवेली चोर दे…

कृष्णा अपने चाचा जी से विरोध नहीं कर सकता था…

उस ने बहार आकर… कैलाश को कहा के वो अपना सामान बांध ले… कैलाश ने कहा के कोनसा सामान… वो बस कपड़ों में आया था… ऐसे hi जये गए… मगर कृष्णा ने उस को कहा के वो अपना सामान लेजाकर तालाब के पीछे जो जगा हे वह इंतज़ार करे…

कैलाश वह पोहंचा और उस को एक घंटा इंतज़ार करना पारा…

कृष्णा वह एक अपने दोस्त के साथ आया… “कैलाश ये दोस्त हे मेरा इस का नाम भूषण हे… इस के घर पर रात तक रुको… में रात को रजनी को लेकर आऊं गए… भूषण तुम दोनों को एक बैल गारी पर ले जये गए… पास वाले गाँव… वहां तुम्हारे और रजनी के फेरे हो जयें गए… कुछ दिन तुम दोनों को वही रहना होगा… इस के मकान पर गाँव में… यहाँ हालत ठीक होते hi में खुद तुम दोनों को वापिस हवेली ले आऊं गए… और ये कुछ रुपया रख लो काम ए गए… रत को तैयार रहना…”

फिर कृष्णा ने रजनी को समझा कर वह से निकला… और वो भी अपने कपड़ो के साथ रत को कृष्णा के साथ निकल आयी…

तालाब के पीछे वीराने में कैलाश…. कृष्णा और भूषण एक बैल गारी पर थे… कृष्णा ने रजनी को वह छोरा और खुद वापिस लौट गया हवेली की तरफ…

बैल गारी कोई 1 घंटा चलती रही… गाँव बस थोड़ी hi दूर था…

के अचानक एक वीराने में 4 घोड़े पर सवार नक़ाब पॉश सामने आगये… ये डाकू थे…

उन्हों ने बैल गारी रोकने का कहा… कृष्णा ने देख लिया था के बस एक डाकू के पास बन्दुक हे और बाकि के पास लाठी हैं… उस ने चुपके से रजनी को नीचे डाब जाने का कहते हुए भूषण से कहा के बन्दुक का ख्याल करो बाकि से में निमत लून गए…

दोनों बैल गारी से नीचे उतरे…

डाकू… जिस के पास बन्दुक थी… उस ने पुछा… कोई और हे गारी में… भूषण बोलै… “नहीं…”

डाकू… “क्या सामान हे गारी में…”

कैलाश… “गहने हे सोने के…”

ये सुनते hi डाकू जिस के हाथ में बन्दुक थी घोड़े से निचे उतर आया उत्सुकता और लालच के मारे…

यही तो कैलाश चाहता था…

उस ने आँख का इशारा किया भूषण की ओर…

भूषण ने आगे जाते डाकू के आगे ज़रा सी तंग कर दी… वो अड़ंगा खा कर गिर पारा… बन्दुक हाथ से निकल गयी…

भूषण ने उस की गर्दन जाकर ली…

इधर कैलाश दुसरे दखु जिन के पास लाठी थी उन के लिए काफी था… कुछ hi दिएर में फिर से वो लोग बैल गारी पर बैठे जा रहे थे भूषण के गाँव… अब रजनी खुद से बारे प्यार से कैलाश का बाज़ू थम कर बेथ गयी… उस को गर्व होने लगा के उस के भाई ने ठीक फैसला किया…

भूषण ने अगले रोज़ उन के फेरे करवा दिए… दोनों बोहत खुश थे…

3 दिन के बाद… भूषण आया जयपुर… इनफार्मेशन लेने के लिए… पता चला के कृष्णा ग़ायब हे… किसी को उस का पता नहीं हे… रजनी के जाने की खबर से उस की माता का हार्ट अटैक से देहांत हो गया… और ये भी पता चला के नीलेश और ृतिं ने टीम्स बना कर पास वाले जीतनेय गाँव और शहर हैं वह धुंध रहे हैं रजनी और कैलाश को…

भूषण ने ये साड़ी बातें न बताई और उन को बस ये बताया के कुछ समय के लिए उन को जाना होगा कहीं दूर…

और यूँ कैलाश रजनी को लेकर वह से लोकल बस पे बेथ कर एक शहर से दुसरे शहर और यूँ दौलत पुर आ गए…

दौलत पुर में कुछ समय बिताया और वह जानपहचान हुई सेठ गिरधारी से… मगर काम न बन सका शहर में तो फिर गाँव में छोटा सा घर खरीद कर ठाकुर की हवेली में काम शुरू किया…

कुछ समय के बाद जयपुर गया मगर वह पता चला के कृष्णा काफी समय से ग़ायब हे… उस का कोई अट्टा पत्ता नहीं हे…

फिर कुछ रुपया आया तो सेठ गिरधारी के साथ काम किया… उस ने धोका दिया और कैलाश ने अपनी दोनों बेटिओ की शादी उस के बेटो से कर के अपनी जान चुराई….
 
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प्रिय मित्रों.....!!!!!

आधिकारिक कार्यों के दबाव के कारण, मैंने कहानी से कुछ दिनों की छुट्टी ली हे. में अभी भी उन कार्यों में फंसा हुआ हूँ, हालांकि, मैं कुछ समय निकालूँगा और जल्द से जल्द एक अपडेट पोस्ट करने का प्रयास करूंगा. जैसा की आप लोगों को पता ही होगा की दिसंबर का महीना jaise-jaise नजदीक आता है, जॉब से जुड़े दबाव बढ़ाते जाते हे.

दोस्त अपडेट की डिमांड कर रहे हैं और ma’am जी को विशेष रूप से रेपोंसे न देना मेरे ओर से असभ्य (रौदे) होता...

यह भी सच है की कहानी में ट्विस्ट के लिए अनुपयुक्त प्रतिक्रिया ने भी ऑफिस से मिलने वाले स्ट्रेस को बढ़ाया. फ़ीर्स्तल्य, यह मंडे था और हमेशा की तरह एक व्यस्त दिन था; फिर मैं लगभग 5.00 पं बजे शाम को अपार्टमेंट में आया और सेकन्ड्ली, मुझे तीन अपडेट (वर्ड्स काउंट: 5000) लिखने और समाप्त करने के लिए जोत दिया गया और मैं इसे 12.50 ऍम तक पूरा करने में सक्षम था. ऐसा नहीं है की मुझे मजबूर किया गया, लेकिन चूंकि में सम्मानित पाठक, , से इतना प्यार करता हूँ की मैं उनका दिल नहीं तोड़ सकता था.

3 उपदटेस को समाप्त करने के बाद, में खुद भी वर्णित घटनाओं के गुणात्मक पहलू की सराहना नहीं कर सका. ककई मौकों पर, मैं बस तेज़ी से लिखता गया और अनदेखा कर दिया या घटनाओं के भावनात्मक पक्ष पर जोर देना भूल गया.

अब बात करते हे की फ्लैशबैक की ज़रुरत क्यों पडी?

रजनी, गोविन्द को अपने maata-pita और भाई के बारे में बता रही थी; फ़ीर्स्तल्य, रजनी के अपने भाई से प्यार का एक प्रभावशाली सम्बन्ध बनाने का मेरा इरादा था जिस से उस के बेटे की ओर रूचि पैदा हुई; सेकन्ड्ली, में आने वाले फ्लैशबैक के लिए पाठकों को तैयार कर रहा था, क्योंकि पहले सरल के बारे में थोड़ा ट्विस्ट अच्छी तरह से नहीं लिया गया था और मुझे आश्चर्यजनक और बचकानी प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ा था.

एक बात तो मैं स्पष्ट रूप से समझ गया हूँ की पाठकों को रोमांचकारी ट्विस्ट पढ़ने की अधिक आदत नहीं है और वो केवल अधिक से अधिक कामुक मुठभेड़ों को पढ़ना चाहते हैं. हाँ, यह एक वयस्क मंच है और जहां भी आवश्यक हुआ मैंने यौन चित्रण प्रस्तुत किया है और दो या तीन बार मुझे याद दिलाया गया की सेक्स लगातार बढ़ रहा है. इस लिए में ने इसे कट किया और शार्ट किया.

अनाचार या यहां तक की रक्त संबंधों के बाहर यौन संबंधों पर मेरे विचार इस बात से सम्बंधित हैं की हमारे देश में हर महिला अपनी टाँगें खुले नहीं बैठी और वो hi वो जब भी या कहीं भी या किसी के साथ भी सेक्स कर सकती हैं. वास्तव में हमारे समाज में महिलाऐं बहुत सम्मानित प्राणी हैं, वो बहुत विनम्र और मजबूत चरित्र रखती हैं. परिवार के लिए धीरज, शील और बलिदान हमारी संस्कृति की आधारशिला है और मुझे अपनी संस्कृति पर गर्व है और इस बात पर गर्व है की हमारे समाज में महिलाऐं अपने रिश्तेदारों, पति और maata-pita के लिए अपनी शारीरिक जरूरतों का त्याग करने के लिए हमेशा तैयार रहती हैं.

बल्कि मैं चाहूंगा की मेरे लेखन कौशल गायब हो जाएं और नष्ट हो जाएं, अगर मुझे अपने देश की महिलाओं के निम्न चरित्र और वेश्याओं की फेक तस्वीर पेश करनी पड़े.

शमा करें मैं भटक गया था !!!

फ्लैशबैक ने आपका ध्यान कृष्णा और कैलाश के पात्रों और इस दिलचस्प तथ्य की ओर आकर्षित किया की कैसे कैलाश एक विशेषज्ञ और पेशेवर योद्धा है. फ्लैशबैक में मेरा इरादा पाठकों को यह संकेत देना था के कैलाश और उनके परिवार के लिए युद्ध कौशल नया नहीं है और इस का उनके अतीत से कुछ सम्बन्ध है. अब में एक रहस्य से पर्दा उठा रहा हूँ (में ने कहानी के आख़िरी हिस्सों तक इससे ज़ाहिर नहीं करना था) के कैलाश और गोविन्द एक योद्धा परिवार से हैं और उनके खून में लड़ाई और कॉम्बैट रची बसी हुई हे.

मेरे दिल में मेरे सम्माननीय मित्र के खिलाफ कुछ भी नहीं हे और मैं अब भी उनका सम्मान करता हूँ और उनसे प्यार करता हूँ. वह हमेशा मेरे साथ खड़े रहे हे और मैं उनसे आगे भी यही उम्मीद करता हूँ.

बाकी में उन पाठकों के बारे में कुछ नहीं कहना चाहता जिनके होंठों को सील कर दिया गया हे और हाथ बंधे हुए हैं और प्रशंसा के लिए एक या दो शब्द लिखने के लिए पर्याप्त रूप से अपांग हैं.

धन्यवाद..... 🙏
 
EPISODE – 85

पोस्ट्लुड़े तो थे फ्लैशबैक!!

“समय सब कुछ बनाता है और समय सब कुछ नष्ट कर देता है. समय सभी प्राणियों को भस्म कर देता है और समय फिर से उस आग को बुझा देता है.

“टाइम क्रेटस आल थिंग्स एंड टाइम डेस्ट्रोइस थम आल. टाइम बर्न्स आल क्रीचर्स एंड टाइम अगेन एक्सटीन्गुइशिस तहत फायर.”


यह जो टाइम ट्रेवल हमें कई साल पीछे ले गया… इस में हमें समय ने एक नयी कथा सुनाई…

कथा थी…

रजनी की…

कृष्णा की….

उन के परिवार की… उन के परिवार के अंदर जनम लेने वाली और हवेली के सत्ता गलियारों में बढ़ रही साज़िशों की दास्ताँ का बीज जो के समय दाल चूका था…

और एक वीर की कथा… जो नहीं जनता था के वो कौन हे… कहा से आया हे… उस का नसीबा लिखा था… उस को जुड़ना था रजनी से… वो एक योद्धा हे… कब से… जनम जनम से… शायद युद्ध उस के लहू में रची हे बस्सी हे… कैलाश की कथा… या फिर कोई प्राचीन कथा…

समय ले गया हमें उस पार…

जब रजनी अभी एक काली थी… उस के गुलाब जेस्सी पंखुड़ी वाले लैब रास से भरे थे… जब उस का मैं खींचता था अपने भाई की ओर… उस का भाई जो उस के लिए छप्पर चयन था…

अउ रफिर रजनी का मेल हुआ एक वीर से एक यौद्धा से… दोनों के भाग के जुड़ने से किस को क्या मिला किस ने क्या खोया … ये अभी समय हमें बताये गए….

क्या हमें समय एक और जलयात्रा पे ले जये गए….???

_______________

प्रेजेंट

बीएड ाचा खासा हिल रहा था… माँ के खर्राटे जारी थे… गोविन्द के लिए ये बोहत रोमांचक था के एक माँ को छोड़ रहा हे और दूसरी बग़ल में हे…

5 मिनट भी जूनून न रह सका माँ का… और वो झरने लगी… झरते हुए भी उस के मुंह से घूऊ घ्ठुऊ की आवाज़ निकल रहे थी…

और वो ढेर हो गयी गोविन्द के सीने पर…

माँ के चुके डाब गए थे… गोविन्द के सीने पर….

गोविन्द को बोहत ाचा लगा था… माँ का जिस्म बोहत गुदाज़ और भरा हुआ था… छूट पर गोश्त था… होंठ भी उभरे हुए थे छूट के… जब लुंड रैगर खता था तो बारे मज़ा आता था… गोविन्द को…

माँ कुछ दिएर लेती रही ऐसे hi… गोविन्द का लुंड अब भी सख्त था और छूट के अंदर था… छूट से निकलते पानी को गोविन्द फील कर रहा था लुंड पर…

गोविन्द ने अपने लुंड को ज़रा हरकत दी… तो माँ की सिसकी निकल गयी…. “ाः… बीटा…”

माँ ने सर उठा कर देखा गोविन्द के आँखों में… “थैंक ु बीटा… बोहत मज़ा आया… आज कितने समय के बाद खुल कर पानी निकला हे छूट ने…” अब माँ खुल कर बात कर रही थी…

माँ उस को किश करने लगी… दोनों कुछ दिएर ऐसे hi किश करते रहे…

फिर गोविन्द ने पुछा… “माँ… लुंड चूसो गई…”

माँ ने कोई जवाब नहीं दिया और उठ कर लुंड के ओर चली गयी…

माँ… ने हाथ में पकड़ते हुए… “गीला हे ये…”

माँ… “छी गन्दा लग रहा हे… कैसे चूसूं…”

गोविन्द हँसते हुए बोलै… “माँ… आप की hi छूट का पानी हे… चूस लो कुछ नहीं होता… ये मज़ा भी लेलो…”

अब माँ कुछ न बोली और ख़ामोशी से लुंड पर मुंह रक् कर उस पर होंठ फेरने लगी… शायद सौगंध ले रही थी लुंड की…

लुंड पर बस्सी थी… लुंड की अपनी और छूट की मादक और रोमांचक सौगंध…

माँ चूसने लगी लुंड को….

और कुछ दिएर के बाद तो बिलकुल एक एक्सपर्ट की तरह से चूस रही थी… लेकिन कुछ दिएर के बाद जैसे थक गयी… और बोली… “तुम इंसान हो के घोड़े… पानी क्यों नहीं निकल रह तुम्हारा… मेरा तो मुंह थक गया हे…”

गोविन्द… “तो फिर ठीक हे… आप ने गांड में लिया हे लुंड कभी…”

माँ… “ये क्या कह रहे हो बेशरम… गांड में कोण लेता हे लुंड…??”

गोविन्द… “माँ… गांड में लेकर देखो मज़ा ए गए बोहत…”

माँ को मज़े का सुन कर उत्सुकता तो हो रही थी मगर दर भी था…

माँ… “देख लो बीटा दर्द न करना ज़यादा…”

गोविन्द… “माँ… जाओ बाथरूम से टेल लेकर आओ…”

माँ कुछ दिएर तो सोचती रही फिर उठी और चूतर हिलती हुई… बाथरूम चली गयी… भरी नितम्ब बारे ग़ज़ब के थे… हिलते तो ऐसे लगता जैसे साडी दुनिया इन के साथ साथ दोल रही हो…

गोविन्द माँ के आने तक बीएड से उठ गया था… उस ने माँ को सोफे के बाज़ू पर झुकने का कहा… पहले तो खुद से छठा माँ के सूराख को… मादक सौगंध थी…

गोविन्द ने सूंघते हुए… “मममममममहहह” किया तो माँ समझ गयी… के गोविन्द सूंघ रहा हे… वो बोली…. “बेशरम… गंदे…. चल दाल जल्दी… दिएर क्यों कर रहा हे अब…”

गोविन्द ने कोई जवाब न दिया और… एक ऊँगली से सहलाया… सूराख को और ऊँगली डालने लगा तो ऊँगली अंदर न गयी… मगर सिसकी ली माँ ने…

माँ सिहार उठी…. “ोीीी…. क्या करता हे रे…. लुंड दाल न अंदर…”

गोविन्द को बारे मज़ा आरहा था… माँ का खुल के यूँ छूट लुंड बोलना… सारा दिन साड़ी लपेटे और शरीफ बनने हुए औरत इस समय शारीरिक ज़रूरतों के ओर एक घुलम बानी हुई थी…

गोविन्द ने भी अब दिएर न की… एक आज्ञाकारी bête का फ़र्ज़ निभाते हुए बोहत सारा टेल माला माँ के दोनों शूटरों पर और फिर बीच में सूराख पर… इस बार एक ऊँगली आसानी से अंदर चली गयी…

“ोीी….. ममममम…. Hi बीटा….. मेरी जान लेके रहे गए रे तू…”

गोविन्द… “माँ… आप तो मेरी जान हो…”

अब माँ ने पलट के देखा गोविन्द की ओर… माँ का आधा शरीर सोफे पर था… और पेट था सोफे के बाज़ू पर… जी के कारन गांड पूरी ऊपर उठ चुकी थी…

माँ ने पलट कर देखा…. गोविन्द की ओर… “बीटा अगर अपनी जान समझते तो इतना इंतज़ार न करवाते… आज भी मुझे सब को गोली देनी पड़ी नींद की… क्यों… इस लिए के तुम मुझे गोली दे रहे थे मीठी… आशा की…”

गोविन्द अब शर्मिंदा सा होने लगा… उस ने अपनी शर्मिंदगी मिटने के लिए जल्दी से अपना टेल लगा लुंड माँ के छेद पर लगा दिया के माँ अधिक ज़लील न करे…

बारे प्रेम से… लुंड को छेद पर दबाने लगा… “ओह्ह्ह्ह… मममम…” माँ ने सर नीचे झुका लिया…

लुंड की टोपी थोड़ी सी मोती थी बाकि लुंड से… फिर भी ज़रा ज़ोर से दबाने से कुछ अंदर चली गयी…

“ोीी…. मा…. गोविन्द बीटा…. ोीी…” माँ आनंद और दर्द का दोहरा मज़ा ले रही थी…

गोविन्द थोड़ी दिएर के लिए रुका और फिर से अंदर दबाने लगा… लुंड आधा अंदर चला गया तो माँ ने खा… “hi बीटा जी…. मौज हो गयी आज तो… ोीी…. मा… आज तो ऐसा लग रहा जैसे फिर से सुहाग रात हो गयी… ोीी….”

गोविन्द को माँ की बातों से बड़ा मज़ा ायः था… सारा दिन बस हांजी … ना जी बोलने वाली इस कामुक ओर से बातें करती होगी…

उस ने उत्सुकता में पूरा hi अंदर पेल दिया…

माँ ने बस … “ोीी …. बीटा जी…. मार दिया… ोीी…. माआ…”

अब गोविन्द बोहत होल से बहार निकलता लुंड को और फिर ज़ोर से अंदर कर देता एक hi झटके में…

फिर उस ने देखा तो जब वो ज़ोर से अंदर करता हे तो माँ के चूतर कामुक तरीके से हिलते हैं….

उस ने थप्पड़ मरने शुरू कर दिए…

शूटरों पर…

“ोीी….. मा… बीटा जी…. माँ को मरते हो…. स्वर्ग में जाओ गए…. ोीी …. मा…”

गोविन्द… “में स्वर्ग में जॉन न जॉन… मेरा लुंड तो जैसे स्वर्ग में hi हे…”

अब माँ हंस पड़ी इस बात पर…. “ोीीी… बीटा जी…. पूरे मादरचोद हो तुम… लाला जी ने भी ऐसा बीटा ढूँढा हे जो बारे मादरचोद हे….””

गोविन्द अब ज़ोर ज़ोर से शूटरों पर थप्पड़ मर रहा था… माँ मना नहीं कर रही थी… उस को भी मज़ा आरहा था… बस सिसकियाँ ले रही थी… ाः… आआह…. ाः…

माँ के चूतर पूरे लाल थे अब… उंगलियां चाप गयी थीं उन के शूटरों पर…

लुंड पर गृप बढ़ने लगी थे छेद की… ऐसा लग रहा था जैसे माँ के अंदर कुछ उबाल आरहा था…

गोविन्द माँ को छेड़ने के लिए रुक गया… तो माँ खुद से अपनी गांड को आगे पीछे करने लगी…

कुछ दिएर के बाद माँ की गांड को आगे पीछे करने की गति बढ़ गयी…

और साथ साथ… अजीब सी आवाज़ें…. “oooiii….maaa…. घूऊ… oiii…ghuuu…”

अब माँ अपने मोठे और भरी नितम्ब आगे पीछे करती हुई… ऐसी फुर्ती और तेज़्ज़ी के गोविन्द भी हैरान रह गया… माँ के छेद में लुंड अंदर जाता… बहार निकलता… और माँ के मुंह से निकलती अजीब सी आवाज़ें…

गोडिन को भी मज़ा आने लगा…

इधर माँ ने अपने छेद को पूरी ताक़त से सख्त किया लुंड पर… छूट के लैब फरफराये… और रास निकलने लगा… छूट से… माँ फिर से झरने लगी…

माँ के छेद ने जैसे hi जकरा लुंड को…. बस लुंड को भी अपनी मंज़िल का रास्ता मिला और मलाई निकल्कने लगी… गांड मलाई से भर गयी….

माँ गिर पद गयी सोफे पर ौंधे मुंह… उलटी पुलटि…. मगर जीवन सुलझ गया उस का… फिर से जवानी की बहार थी… पुरवाई थी… या पश्चिम से चलती हवा थी…

सकूं था… बदन का शोर थम सा गया था…
 
बीआरओ.... आप ने जितना भी लिखा... मेरे ये भी बोहत अनमोल मोती हैं...

वैसे भी मेरी स्टोरी को रिव्यु करना ज़यादा आसान काम नहीं हे... काफी दोस्त तो बस एक आध अपडेट को hi रिव्यु करके चोरः देते हैं... दोस्तों के अनुमान से हैट कर कहानी हे...

बाकि जहाँ तक ma'am जी की बात हे... शी इस थे बेस्ट इन टाउन!!! वो उन गिफ्टेड लेडी में से एक हे जो किंग मेकर होती हैं... जब चाहें जिस को चाहें ऊपर ले जाएँ... शी इस थे मोस्ट रेस्पेक्टेबले हेरे!!! लोट ऑफ़ श्रद्धांजलि तो हेर!!!
 
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