SAB KUCH JAYAZ HAI... - Page 6 - SexBaba
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SAB KUCH JAYAZ HAI...

थैंक्स फॉर योर लवली कमेंट...

भय ये हुयी न बात. आपको जो लगा अपने बोल दिया. मुझे अच्छा लगा. मैं हर रीडर्स से यही कहता हु की जो भी लगता है अपडेट के बारे में ज़रूर कमेंट करो.

यारा आपको फ्लैशबैक बोरिंग लगता है. मैं समझ सकता हु मगर क्या करू भय इसे फिनिश तो करना hi पड़ेगा न. वैसे फ्लैशबैक अब ज़्यादा नहीं बचा है. मैं शार्ट करके hi इसे फि िश कर रहा हु....

नेक्स्ट अपडेट पोस्टेड ों पेज no. 89....

रीड & एन्जॉय....
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 23


"भाई दीदी की नाराज़गी दूर करके hi वापस आना. दीदी को इस तरह दुखी देख कर हमें बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता है. इस लिए तुम ऐसा कुछ करना की उनका सारा दुःख दूर हो जाये." पूजा ने कहा तो मैं उसकी तरफ देखने लगा. मुझे समझ न आया की उसके ऐसा कहने का क्या मतलब है.

जैसे hi 11:30 बजे तो मैं प्रिय पूजा के कमरे से बाहर आ गया और नीचे दीदी के कमरे की तरफ चल पड़ा. मेरा दिल ये सोच कर ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा था की मैं दीदी से किस तरह बात कर पाउगा.? क्या दीदी मुझसे बात करना चाहेंगी या वो मुझे अपने कमरे से चले जाने को कह देंगी.

अब आगे पढ़िए....

प्रेजेंट स्टार्ट....


अचानक मेरे मोबाइल की रिंग टोन बजी तो मैं अपने पास्ट की यादो से बाहर आ गया. मैं एकदम से हैरान सा हुआ फिर मैंने महसूस किया की ट्रैन किसी स्टेशन पर कड़ी है. ऊपर वाले बिरथ पर लेता हुआ था मैं. मैंने जल्दी से पेंट की पॉकेट से अपना मोबाइल निकाल कर देखा तो उसमे किसी अननोन नंबर से कॉल आ रही थी. उस अननोन नंबर की कॉल को देख कर पहले तो मुझे समझ न आया फिर एकदम से मेरे मन में ख़याल आया की कही ये कॉल कुसुम दीदी की तो नहीं है.?

रात का एक बज रहा था उस वक्त. इतनी रात को किसी लोकल आदमी का कॉल तो पॉसिबल नहीं था तो शायद ये कॉल कुसुम दीदी की hi हो. ये सोच कर मेरा दिल ज़ोरो से धड़कने लगा. मैंने कॉल को पिक कर के मोबाइल को कान से लगा कर धीरे से hello किया.

मेरे hello करने पर एकदम से मेरे कानो में किसी के बुरी तरह रो पड़ने की आवाज़ सुनाई दी. मैं उस रोटी हुयी आवाज़ से hi पहचान गया की ये मेरी कुसुम दीदी हैं. उनको इस तरह रोटा सुन कर मैं एकदम से तड़प उठा मगर मुझे समझ न आया की मैं उन्हें कैसे शांत करू.? मुझे जैसा समझ आया वैसे hi मैंने दीदी को शांत करने की कोशिश की. कुछ देर बाद आखिर जब दीदी शांत हो गयी तो सबसे पहले उन्होंने मुझसे यही पूछा की मैं घर आ रहा हु या नहीं. उनके पूछने पर मैंने उन्हें बताया की मैं आ रहा हु और इस वक्त ट्रैन में hi हु.

मैंने दीदी को बताया की मैं कल दो बजे तक घर पहुंच जाउगा. मेरी ये बात सुन कर दीदी बहुत खुश हुयी. मैंने उनसे सबके बारे में पूछा तो उन्होंने बस यही कहा की मैं खुद hi आ कर देख लू. फिर मैंने उनसे पूछा की उन्होंने फेसबुक पर इतना लेट रिप्लाई क्यों दिया था तो उन्होंने बताया की उनके पास टच स्क्रीन फ़ोन नहीं है और न hi उन्होंने फेसबुक में खुद कोई ईद बनायीं थी. वो तो पूजा ने बनाया था. उसे कही से पता चला था की फेसबुक से भी मेरा पता लगाया जा सकता है. पूजा ने मेरे नाम से hi फेसबुक में ईद बनायीं क्यों की उसे लगता था की तुम मेरा नाम देख कर ज़रूर जल्दी बात करने की कोशिश करोगे और वही हुआ भी.

कुसुम दीदी से मैंने बहुत देर तक बाते की और सबके बारे में पूछा. ये भी पूछा की गांव में अब कैसा माहौल है. दीदी ने मुझे सब कुछ बताया. उन्होंने बताया की आज कल घर के हालात बहुत खराब हैं और वो सब बहुत दुखी हैं. माँ का तो बुरा हाल है. दिन रात बस अपने बेटे की hi यादो में खोयी रहती हैं. पिता जी की हालत ऐसी हो गयी है की वो बिस्तर से उठ hi नहीं सकते.

मुझे दीदी ने मैसेज में शार्ट में hi सब कुछ बताया था. मगर अब फ़ोन पर उन्होंने मुझे सब कुछ साफ़ साफ़ बता दिया था. उन्होंने बताया की मेरे घर से जाने के बाद जैसे घर की हर ख़ुशी चली गयी थी. माँ पिता जी के बीच अक्सर कहा सुनी होने लगी थी. गांव का माहौल भी हमारे लिए बहुत ख़राब हो चूका था.

मैं दीदी की बाते सुन कर बहुत दुखी हुआ. इसके पहले जहा मैं ये सोचा करता था की अब कभी अपने घर वालो के पास नहीं जाउगा और न hi उनसे बात करुगा, वही अब मैं इस बात से अपने आप पर गुस्सा हो रहा था की इतना पत्थर दिल कैसे हो गया था मैं.? माता पिता कभी अपनी औलाद का बुरा नहीं चाहते और न hi उनके साथ कभी बुरा करते हैं. वो जो भी करते हैं अपनी औलाद की भलाई के लिए hi करते हैं.

काफी देर तक मैंने दीदी से बात की. फिर जब नेटवर्क काटने लगा तो मैंने दीदी से कहा की कल जब घर आ जाउगा तब बात होगी. दीदी से बात करने के बाद मैं बहुत देर तक अपने माता पिता और बहनो के बारे में सोचता रहा. दीदी ने मुझे सब कुछ बता दिया था. गांव के हालात ठीक नहीं थे और न hi मेरे घर वालो के. अब हर चीज़ की जिम्मेदारी मुझ पर hi थी.

साडी बातो को jaan'ne समझने के बाद अब मुझे समझ आ गया था की गांव पहुंचने के बाद मुझे क्या क्या करना ज़रूरी होगा. सबसे बड़ी बात ये थी की गांव के माहौल के हिसाब से मुझे बहुत hi सम्हाल कर रहना होगा क्यों की बीते हुए कल में ऐसा कुछ हो चूका था की मेरे लिए गांव पहुंचते hi खतरा भी पैदा हो जाना था.

बीते हुए कल का ख़याल आया तो मैं एक बार फिर से अपने पास्ट के बारे में सोचने लगा. कुछ दिनों से पास्ट की बाते कुछ ज़्यादा hi याद आ रही थी मुझे और मैं उन यादो में खो जाता था. कुसुम दीदी की बातो के बारे में सोचते सोचते hi मैं एक बार फिर से अपने अतीत में डूबता चला गया.

(भाई log....main जनता हु की आप लोग इस फ्लैशबैक से बोर हो रहे हो मगर टेंशन मत लो. मैं इस फ्लैशबैक को हीरो के गांव पहुंचते hi ख़तम कर दुगा. उसके बाद स्टोरी सिर्फ प्रेजेंट में hi चलेगी.)

फ्लैशबैक स्टार्ट....


मैं कुसुम दीदी के कमरे के बाहर खड़ा था. कमरे का दरवाजा बंद था और मुझमे उस दरवाजे को खटखटाने की हिम्मत नहीं हो रही थी. मेरा दिल ज़ोरो से धड़क रहा था. मेरे दिल और दिमाग में तरह तरह की बाते चल रही थी. मगर अब मैं यहाँ से वापस नहीं जाना चाहता था. मैं आज दीदी से सब कुछ जान लेना चाहता था.

बहुत हिम्मत जूता कर मैंने दरवाजे को हलके से खटखटाया. कुछ देर रुकने के बाद मैंने फिर से दरवाजा खटखटाया तो इस बार मुझे ज़्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ा. थोड़ी hi देर में दरवाजा खुला और मेरे सामने कुसुम दीदी रात वाले कपडे पहने कड़ी दिखी. दरवाजे के पास मुझे खड़े देख कर दीदी एकदम से हैरान भी हुयी और थोड़ा घबरा भी गयी.

मुझे देख कर दीदी शॉक तो हुयी मगर मुझसे कहा कुछ नहीं. मैं बिना कुछ बोले दरवाजे से अंदर की तरफ आ गया. मेरे इस तरह अंदर आने से दीदी परेशां और बेचैन सी नज़र आने लगी. उधर कमरे में आते hi मैं कमरे में राखी एक लकड़ी की कुर्सी पर बैठ गया. दीदी मेरी तरफ कुछ देर देखती रही फिर जाने क्या सोच कर उन्होंने दरवाजा बंद किया और चल कर मेरे पास आयी फिर बोली.

"तुम यहाँ क्यों आये हो.?" दीदी ने नाराज़गी से मुझसे कहा तो मैंने उनकी तरफ देखते हुए कहा.

"पहले आप शांति से बीएड पर बैठ जाइये दीदी." मैंने ऐसा कहा तो दीदी ने कहा.

"तुम जाओ यहाँ se...agar तुम मुझसे किसी बारे में बात करने आये हो तो मैं तुम्हे पहले hi बता देती हु की मुझे किसी बारे में कोई भी बात नहीं करना तुमसे." दीदी ने शख्त अंदाज़ से ये कहा तो पता नहीं क्यों उनकी इस बात से मेरे दिल को बहुत दुःख हुआ. मेरी आँखों में आँशु आ गए. मैंने उनकी तरफ देखते हुए दुखी हो के कहा.

"मुझे ज़हर दे कर मार दीजिये दीदी मगर इस तरह टिल टिल कर मत मारिये. आपको पता नहीं है की आपकी इस बेरुखी से मैं इतने दिनों कैसे पल पल मर रहा हु. ऐसे मत मारिये didi....mujhe ज़हर दे दी दीजिये. भरोसा कीजिये मैं ख़ुशी ख़ुशी आपके दिए उस ज़हर से मर जाउगा." मैंने ऐसा कहा तो दीदी ने खींच के मुझे थप्पड़ मार दिया और फिर बिलख बिलख कर रोने लगी.

"ऐसा मत बोल vicky...aisi अशुभ बाते मत बोल. तुझे ज़हर दे कर मैं क्या जी पाओगी.? ारी पगले मैं भी तो वही ज़हर खा लगी और तेरे साथ hi मर जाओगी. जब तू hi नहीं रहेगा तो मैं किस के लिए जियुगी.?" दीदी ने रट हुए ये कहा और वही नीचे कुर्सी के पास बैठ कर रोने लगी.

उनको रोटा देख मैं कुर्सी से उठा. फिर झुक कर उन्हें उठाया और बीएड पर उन्हें बैठा दिया. वो सिसक सिसक कर रो रही थी. उनकी आँखों से आँशु बाह कर उनके गालो को गीला कर रहे थे. उन्हें इस हालत में देख कर मेरा दिल तड़प गया. मैंने खींच कर उन्हें अपने सीने से लगा लिया.

"इतना तो मुझे भी पता है दीदी की आप मुझसे नाराज़ हो कर या मुझसे दूर हो कर एक पल को भी खुश नहीं रह प् रही होंगी. मुझे ये भी पता है की आपकी नाराज़गी दिल से नहीं हो सकती. वो तो बस दिखावा hai...magar हाँ मैं ये नहीं जनता की ये दिखावे की नाराज़गी क्यों है.? आखिर ऐसा क्या हो गया है की आपने अचानक hi जैसे मुझसे हर रिश्ता hi तोड़ लिया है.?" मैंने ये सब कहा तो दीदी ने मुझसे अलग हो कर कहा.

"मुझसे कुछ मत पूछ vicky...main तुझे कुछ भी नहीं बता पाओगी. साडी ज़िन्दगी बस दुःख और बेबसी में hi गज़रना है मुझे. मेरी किस्मत hi ऐसी है मेरे भाई की मुझे कभी कोई ख़ुशी नहीं मिल सकती. तू बेकार में hi मेरे लिए इतना परेशां रहता है. मुझे मेरे हाल पर छोड़ दे तू." दीदी ने ये कहा तो मैंने कहा.

"नहीं छोड़ सकता दीदी और ये मेरे बस में भी नहीं है. क्यों की मैं आपको किसी भी हाल में दुखी नहीं देख सकता. मैं आपको खुश रखने के लिए दुनिया का कोई भी काम कर सकता हु." मैंने दीदी का हाथ पकड़ कर ये कहा तो दीदी की आखो से आँशु बहने लगे.

"तू मेरे सामने ऐसी बाते मत कर विक्की और जा यहाँ से. मुझसे दूर हो जा मेरे भाई. मेरे दिल में हमेशा तेरे लिए वही प्यार रहेगा जो अब तक था मगर मैं तेरे करीब नहीं रहना चाहती अब. मुझे किसी बात के लिए मजबूर मत कर. तुझे मेरी कसम hai...tu मुझसे इस बारे में कोई भी बात नहीं पूछेगा और न hi मुझसे बात करेगा. मेरी तुझसे बस एक hi विनती है की मुझे कभी गलत मत समझना." कुसुम दीदी ने रट हुए ये सब कहा और अपनी कसम दी तो मैं देखता रह गया उन्हें.

मैं तो फैसला करके hi आया था की दीदी से सब कुछ पूछुंगा मगर यहाँ तो दीदी ने मुझे अपनी कसम दे कर कुछ भी न पूछने का कह दिया था. मैं एकदम से पत्थर सा बन गया था. मुझे कुछ समझ न आया की क्या करू अब.? मैं दीदी की तरफ दुखी हो के देखे जा रहा था और दीदी नीचे की तरफ सर झुकाये सिसक रही थी.

"ये अपने अच्छा नहीं किया didi...mujhe अपने से दूर जाने का कह दिया अपने. क्या एक बार भी ये नहीं सोचा की आपसे दूर चले जाने से मैं सुकून से जी भी पाउगा या नहीं.?" मैंने दुखी हो के ये कहा तो दीदी ने चेहरा उठा कर मेरे चेहरे को दोनों हाथो में ले के रट हुए कहा.

"मैं भी तो नहीं जी पाओगी मेरे भाई मगर मेरी बिवसता है की मुझे ऐसा करना पद रहा है. तू मेरी उस बिवसता को नहीं समझ सकता विक्की और मैं तुझे समझा भी नहीं सकती. एक बात aur...main तुझे अपने उस हुकुम से भी आज़ाद करती हु जिस हुकुम में मैंने तुझे रचना से मतलब न रखने के लिए कहा था. मुझे लगता है वो वैसी नहीं है जैसा मैं सोच रही थी. इस लिए तू उससे दोस्ती बनाये रख. बस इतना ख़याल रखना की उसके बाप को ये न लगे की तू उसकी बेटी के साथ कुछ ऐसा वैसा कर रहा है. अब तू जा यहाँ से." दीदी ने ये सब कहा और बीएड की तरफ मुद कर कड़ी हो गयी.

मैं चाहता तो उनकी किसी भी बात को न मानता मगर मैंने ऐसा आज तक नहीं किया था तो अब कैसे कर देता. मेरा दिल बुरी तरह रो रहा था. दीदी के पलट जाने से मैं कुछ न बोलै और वापस दरवाजे की तरफ चलते हुए कमरे से बाहर आ गया. बाहर आ कर मैंने इधर उधर देखा और फिर सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया. इधर मेरे जाने की आहात से दीदी मुड़ी और दौड़ कर दरवाजे की तरफ आयी मगर फिर दरवाजे की चौखट पर hi उनके कदम रुक गए. आँखों से बहते हुए आंशुओ के साथ वो मुझे जाते हुए देखती रही और जब मैं ऊपर अपने कमरे की तरफ बढ़ गया तो उन्होंने वापस कमरे में आ कर दरवाजा बंद कर लिया और फिर बीएड में आ कर गिर पड़ी. पूरा कमरा उनकी सिसकारियों से गूजने लगा.

इधर मेरे दिल और दिमाग में तूफ़ान सा मचा हुआ था. मैं प्रिय पूजा के कमरे की तरफ नहीं गया बल्कि अपने कमरे में आ कर बीएड पर लेट गया. मेरी आँखों के सामने दीदी का रोटा हुआ चेहरा घूम रहा था और कानो में उनकी बाते गूँज रही थी. मुझे नहीं पता की कब तक मैं ऐसे hi पड़ा रहा और फिर वैसे hi सो गया. अपने कमरे में मेरी दोनों जुड़वाँ बहने भी सो गयी थी. दोनों मेरा इंतज़ार करते करते hi सो गयी थी.

सुबह मेरी आँख 4 बजे hi खुली. मैं हर दिन की तरह hi जाग गया था मगर आज जागने के बाद जैसे hi मुझे पिछली रात का सब कुछ याद आया तो मेरा दिल और दिमाग बोझिल सा हो गया. मेरा बीएड से उठने का दिल नहीं किया मगर मैं फिर भी उठा और फ्रेश होने के लिए नीचे चला गया. वापस आते वक्त मेरी नज़र रसोई की तरफ गयी तो देखा रसोई की लाइट जल रही थी. मैं समझ गया दीदी रसोई में हैं और चाय बना रही हैं.

मैं चुप चाप अपने कमरे में आ गया. बीएड पर पड़ा मैं दीदी के hi बारे में सोच सोच के दुखी हो रहा था. इतना तो मैं भी अब समझ गया था की दीदी ने मुझे अपनी कसम दे कर क्यों कुछ भी पूछने से मन कर दिया था. प्रिय पूजा का शक सही था. दीदी मुझसे प्रेमी प्रेमिका वाला hi प्यार करती थी. उन्हें अहसास था की हमारे बीच ये रिश्ता गलत है और अगर किसी को पता चल गया तो क़यामत आ जाएगी. इसी लिए वो मुझसे अपने उस रिश्ते को उजागर नहीं करना चाहती थी. अपने घर की इज्जत और मान मर्यादा का ख़याल रखते हुए उन्होंने ऐसा कदम उठाया था. उन्हें अपने लिए पल पल दुःख में तड़पना मंजूर था मगर इसकी वजह से माता पिता को जीते जी मारना मंजूर नहीं था.

सुबह जब सब कोई जाग गया और नास्ता करने का टाइम हुआ तो मैं भी कमरे से नीचे आ गया. नास्ता करते वक्त पिता जी ने मुझसे कहा की नास्ता करने के बाद मैं सरपंच काका के घर चला जाओ. क्यों की कल से मुझे काम काज सम्हालना था तो उसके बारे में कुछ बात चीत कर लेना ज़रूरी था. मैंने देखा की प्रिय पूजा मुझे गुस्से वाली नज़रो से देख रही थी. मैं समझ गया की ये दोनों मुझे इस लिए गुस्से से देख रही हैं क्यों की रात मैं इनके कमरे में नहीं गया था.

नास्ता करने के बाद मैं कमरे में आया और थोड़ी देर आराम करने के बाद सरपंच काका के घर की तरफ चल दिया. सुबह मुझे दीदी नज़र नहीं आयी thi..balke वो रसोई में hi थी.

सरपंच काका के घर पंहुचा तो सरपंच काका घर पर hi मिले मुझे. दोनों बाप बेटे नास्ता कर रहे थे. मुझे देख कर सरपंच ने मुझे भी नास्ता करने के लिए कहा तो मैंने ये कह कर मन कर दिया की मैं घर से नास्ता करके आया हु. मेरी बात सुन कर सरपंच ने कहा की मैं बैठक में बैठ कर उनके आने का इंतज़ार करू तो मैं बैठक में आ गया.

मैं दुआ कर रहा था की रचना से मेरी मुलाकात न हो मगर मेरी दुआ कबूल न हुयी और रचना बैठक में आ hi गयी. उसे देख कर मुझे बड़ा अजीब सा फील होने लगा. जबकि वो एकटक मुझे hi देख रही थी.

"अगर तुम्हे मुझसे दोस्ती नहीं करना है तो ठीक है मगर मेरे एक सवाल का सच सच जवाब दे दो. उसके बाद मैं कभी तुम्हारे सामने नहीं ाउगि." रचना ने ये कहा तो मैंने सर उठा कर उसकी तरफ देखा और फिर बड़ी हिम्मत से कहा.

"कौन से सवाल का जवाब.?" मैंने पूछा तो रचना ने कहा.

"ऐसा मैंने क्या गुनाह कर दिया था जिसकी वजह से तुम मुझसे अब बात नहीं करना चाहते.? अगर मुझसे कोई गलती हुयी है तो तुम मुझे मेरी गलती बता सकते थे या मुझे मेरी गलती की सजा भी दे सकते थे. मगर ये क्या बात हुयी की तुमने अचानक बोलना hi बंद कर दिया. न मेरा फ़ोन कॉल उठाया और न hi मेरे किसी मैसेज का जवाब दिया. आखिर क्या वजह हो गयी है विक्की..? मैं ये jan'na चाहती हु." रचना ने ये सब कहा तो मैं सोच में पद गया.

मुझे समझ में न आया की मैं रचना के सवाल का क्या जवाब दू.? मैं उसे क्या बताता की मेरी दीदी ने उससे मतलब न रखने का हुकुम दे दिया था. इसी लिए मैं उससे अब मतलब नहीं रख रहा था. मुझे चुप देख कर रचना ने फिर से पूछा तो मैंने कहा.

"ऐसी कोई बात नहीं है. वो मैं उस दिन शहर में तुम्हारे साथ देखे हुए उस मंज़र की वजह से बात नहीं कर रहा था. मुझे बहुत अजीब लग रहा था. इस लिए मुझे लगा की अगर मैं तुमसे बात करुगा तो कही तुम्हे ये न लगे मैं तुमसे उस बारे में कुछ कहुगा." मैंने ये सब कहा तो रचना ने कुछ देर मुझे देखा फिर बोली.

"वैसे मुझे लगता तो नहीं की तुम उस वजह से मुझसे बात नहीं कर रहे थे या मेरा फ़ोन नहीं उठा रहे थे मगर चलो मान लेती हु. खेर अब क्या इरादा hai...kya अब भी तुम मुझसे बात नहीं करोगे.? विक्की तुम्हे अंदाज़ा नहीं है की मैं हमारी दोस्ती से कितना खुश थी मगर जब तुमने मुझसे बात करना hi बंद कर दिया तो मुझे बहुत दुःख हुआ. मैं हर वक्त सोचती रहती थी की आखिर मैंने ऐसी क्या गलती की होगी जिसकी वजह से तुम मुझसे बात नहीं कर रहे हो.?" रचना ने ये सब बड़ी मासूमियत से कहा तो मैं उसे देखता रह गया.

"हाँ मैं समझ सकता हु." मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"अब अगर तुमने मेरा फ़ोन नहीं उठाया या मेरे मैसेज का जवाब नहीं दिया तो देख लेना फिर. मैं सीधा तुम्हारे घर hi आ जाओगी." रचना ने इतराते हुए कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"अच्छा ठीक hai...ab तुम जाओ अंदर. कही ऐसा न हो की सरपंच काका हमें एक दूसरे से बाते करते हुए देख ले." मैंने ये कहा तो रचना ने हैरानी से मुझे देखा फिर बोली.

"देख लेंगे तो क्या हो जायेगा.? हम कौन सा कुछ गलत कर रहे hain...baat hi तो कर रहे हैं.?" रचना ने कहा तो मैं कुछ न बोलै.

"अच्छा suno...tumhe पता है आज कौन सा दिन है.?" रचना ने पूछा तो मैंने न में सर हिला दिया.

"उफ्फ्फ तुमको न कुछ याद नहीं रहता. ारी भुलक्कड़ इंसान आज संडे है. क्या हम दोनों शहर चल सकते हैं आज.?" रचना ने ये कहा तो मैं हैरान रह गया. मेरी आँखों के सामने उस दिन का वो मंज़र घूम गया. मेरा दिल ज़ोर से धड़का.

"नहीं मैं आज कही नहीं जा सकता. मुझे सरपंच काका से ज़रूरी बाते करनी है." मैंने ये कहा तो रचना ने मुँह फुला कर कहा.

"हाँ तो मैं कौन सा ये कह रही हु की अभी चले. तुम पहले पिता जी से बाते कर लो उसके बाद चलेंगे न. मैं माँ को बता देती हु की मैं शहर जा रही हु. अभी मुझे बस भी मिल जाएगी शहर जाने के लिए. तुम पिता जी से बात करके सीधा शहर आ जाना." रचना ने ये कहा तो मुझे समझ न आया की अब मैं उसे क्या बोलू.?

"टेंशन मत लो विक्की. आज हम उस जगह नहीं मिलेंगे बल्कि किसी ऐसी जगह पर मिलेंगे जहा वो सब न होता हो ठीक है न.?" रचना ने ये कहा तो मैंने उसकी तरफ देखा और फिर कहा.

"लेकिन शहर जाने की ज़रूरत hi क्या है.? हम अभी एक दूसरे से मिल तो लिए hi हैं न." मैंने ये कहा तो रचना ने फिर से मुँह फुला लिया और फिर बोली.

"मैं कुछ नहीं जानती विक्की. तुमको आज शहर चलना है तो चलना है बस. मैं अभी माँ को बता कर शहर जाने के लिए तैयार होती हु. तुम भी पिता जी से बात करने के बाद पीछे पीछे आ जाना. और हाँ अगर तुम नहीं आये तो देख लेना. मैं कभी बात नहीं करुँगी तुमसे." रचना ने बात न करने की ऐसी धमकी दी जैसे मैं उससे बात करने के लिए मारा hi जा रहा था.

रचना अंदर चली गयी तो मैं उसकी बातो के बारे में सोचने लगा. अजीब लड़की थी एक बार जो बोल दिया उसे करना hi पड़ेगा. मैं परेशां सा हो गया. मुझे उससे मिलने मिलाने में अजीब सा फील होता था.

कुछ देर में सरपंच काका आये तो हम दोनों के बीच बहुत सरे मुद्दों पर बातचीत हुयी. वो मुझे कई साडी बातो के बारे में समझा बुझा रहे थे. इस बीच मैंने ये भी देखा की रचना एकदम से सज धज कर अंदर से बाहर निकली और एक बार मेरी तरफ देख कर मुस्कुरायी फिर घर से बाहर चली गयी थी. उसके जाने के बाद मैं समझ गया की अब मुझे उसके कहने पर शहर जाना hi पड़ेगा.

सरपंच काका के घर से मैं करीब आधा घंटे बाद निकला. रचना को गए हुए काफी टाइम हो गया था. वैसे अभी वो शहर नहीं पहुंची होगी क्यों की बस कई जगहों पर रुकते हुए जाती थी. मैं सरपंच काका के घर से सीधा अपने घर आया और सीधा अपने कमरे में आ कर शहर जाने के लिए अच्छे से तैयार होने लगा.

मैं तैयार हो कर कमरे से बाहर निकला hi था की मेरी दोनों जुड़वाँ बहने सामने से आती हुयी दिखी. मुझे देख कर दोनों ने पूछा की मैं कहा जा रहा हु तो मैंने उन्हें यही बताया की ज़रूरी काम से शहर जा रहा हु. मेरी बात सुन कर दोनों के चेहरे लटक गए. वो मुझसे कल रात के बारे में पूछने आयी थी की क्या बात हुयी थी मेरी दीदी से.? मैंने दोनों से कहा की रात में बताउगा और फिर नीचे आ गया.

पिता जी खेतो की तरफ जा चुके थे तो मैंने माँ को बता कर अपनी मोटर सिक्ले निकाली और उस पर बैठ कर शहर के लिए चल दिया. जब मैं माँ को बता रहा था की मैं ज़रूरी काम से शहर जा रहा हु तभी दीदी अपने कमरे से निकल कर आँगन की तरफ आयी थी. मुझे देखते hi वो रुक गयी थी. मैंने उन्हें देख तो लिया था मगर मैं चुप चाप बाहर आ गया था.

सरे रास्ते मैं रचना के बारे में सोचता रहा. मैं सोचता रहा की आज रचना मुझसे क्या बाते करेगी और किस जगह पर मिलेगी.? यही सब सोचते सोचते मैं शहर पहुंच गया. शहर पहुंच कर मैंने रचना को फ़ोन लगाया और उसे बताया की मैं शहर पहुंच गया हु तो उसने मुझे उस तरफ आने को कहा जिस तरफ शहर के बाहर से एक बड़ी सी नहर गयी थी और उस नहर के किनारे पुराने समय के राजा रजवाड़ो की गाढ़ी बानी थी.

रचना के बताने पर मैं उस तरफ चल पड़ा. मैं सोच रहा था की रचना को शहर के आस पास की काफी जानकारी है. मतलब वो यहाँ की हर जगह से परिचित है मगर कैसे परिचित है वो.? इस सवाल के बारे में सोचते हुए मैं कुछ टाइम में उस तरफ पहुंच गया जहा पर रचना ने मुझे आने को कहा था.

बड़ी सी नहर के किनारे उचाई पर बानी हुयी थी ये गाढ़ी. किसी राजा रजवाड़े की थी जो अब खस्ता हालत में थी. गाढ़ी की दीवारे कही कही से टूटी हुयी थी मगर ध्यान से देखने पर पता चलता था की अपने वक्त में ये बहुत hi खूबसूरत रही थी. यहाँ पर लोग आते जाते रहते थे. इस लिए आस पास की ज़मीन साफ़ थी और गाढ़ी के अंदर भी कोई झाड़ झंखाड़ नहीं था. दिन में यहाँ पर आने में कोई प्रॉब्लम नहीं थी मगर रात में यहाँ आना किसी के लिए भी मुमकिन नहीं था. रात में ये गाढ़ी वीरान सी नज़र आने लगती थी. गाढ़ी के पीछे नीचे की तरफ से एक बड़ी सी नहर थी जिसमे साफ़ पानी बाह रहा था. गाढ़ी से 2कम की दूरी पर शहर दिख रहा था.

मैं जब गाढ़ी के पास पंहुचा तो मैंने एक जगह मोटर सिक्ले को कड़ी कर के इधर उधर देखा तो मेरी नज़र गाढ़ी के लेफ्ट साइड पर बानी पत्थर की सीढ़ियों की तरफ गयी. ये सीढिया घूमते हुए पीछे की तरफ नीचे नहर के किनारे तक बानी हुयी थी. नहर के पास जहा सीढ़ी ख़तम होती थी उस जगह पर लम्बा चौड़ा पक्का पात बना हुआ था और नहर के किनारे पर भी सीढिया बानी हुयी थी. सीढ़ियों से नीचे उतर कर लोग सीढ़ियों पर hi बैठ कर नहर के बहते हुए पानी का नज़ारा करते थे. कुछ लोग गर्मियों में यहाँ नहाते भी थे.

रचना नहर के किनारे सीढ़ियों के पास hi ऊपर कड़ी थी. दिन के वक्त यहाँ कोई न कोई होता hi था इस लिए दर लगने वाली कोई बात hi नहीं होती थी. मैं सीढ़ियों से उतारते हुए कुछ hi देर में रचना के पास पहुंच गया. रचना ने आज पिंक कलर का सलवार कुरता पहना हुआ था जिसमे वो काफी खूबसूरत लग रही थी. आज भी उसने अपने बाल खुले रखे थे जो हलकी हवा से उड़ रहे थे.

रचना के पास पहुंच कर मैं भी उसके बगल से खड़ा हो गया और इधर उधर देखने लगा तो रचना ने कहा.

"क्या hua...aaj मेरी तारीफ करने का इरादा नहीं है क्या.?" रचना ने मुस्कुराते हुए कहा तो मैंने उसकी तरफ देखा और मुस्कुराते हुए बोलै.

"मुझे तारीफ करना आता hi नहीं तो क्या तारीफ करू.? बस यही कह सकता हु की अच्छी लग रही हो." मैंने ये कहा तो रचना ने मुझे घूरते हुए कहा.

"सिर्फ अच्छी लग रही हु.?" रचना ने पूछा तो मैंने हाँ में सर हिलाया तो उसने कहा.

"रहने दो tum...tumse यही उम्मीद थी मुझे. मैं hi पागल थी जो इतना सज धज कर आयी थी यहाँ. मुझे लगा था की जब तुम मुझे देखोगे तो मेरी खूब तारीफ करोगे. मगर..." रचना ने नाराज़गी दिखते हुए ये कहा तो मैंने कहा.

"हाँ तो मैंने कब कहा था की तुम इतना सज धज कर आओ.?" मैंने उसे छेड़ते हुए कहा तो उसने झटके से मेरी तरफ देखा फिर बोली.

"क्या मतलब है तुम्हारा.? क्या मैं गंदे कपडे पहन के यहाँ आ जाती.? तुम न मुझसे बात न करो अब." रचना ने कहा और मेरी तरफ पीठ कर लिया उसने.

मैं समझ गया की वो मुझसे नाराज़ होने का दिखावा कर रही है और चाह रही है की मैं उसे मनाओ. मगर मैं ये कैसे कर सकता था.? मुझे तो ये अजीब hi लग रहा था.

"अच्छा तुम hi बताओ मुझे की किस तरह तारीफ की जाती है. जैसा तुम कहोगी वैसी hi तारीफ कर दुगा तुम्हारी." मैंने कहा तो रचना ने मेरी तरफ पलट के कहा.

"तारीफ किसी के बताने से नहीं की जाती बुद्धूराम. वो तो बस एक अहसास है. किसी को देख कर जो दिल में आये उसे मुख से बोल देना होता है बस." रचना ने ये कहा तो मैंने देखा की उसके चेहरे पर एकदम से सुर्खी आ गयी थी.

"ओह्ह ऐसा क्या. मगर मेरे दिल में तो कुछ भी ऐसा वैसा नहीं आया. शायद इसी लिए मैंने वैसी तारीफ की थी तुम्हारी." मैंने सोचने का नाटक करते हुए ये कहा तो रचना ने मुझे हैरानी से देखा मगर फिर से नाराज़गी दिखते हुए बोली.

"जाओ मुझे तुमसे कोई बात hi नहीं करना अब. एक मासूम सी लड़की का दिल तोड़ कर तुमने अच्छा नहीं किया." रचना ने ये कहा तो मैं मुस्कुरा उठा. मैं जनता था की वो ये सब इस लिए कर रही है ताकि मैं उसे मनाओ. मगर मेरे मन ये ख़याल आया की ऐसा क्यों चाह रही होगी वो.?

मुझे समझ में न आया की मैं रचना को मानाने वाला काम कैसे करू.? मुझे बहुत अजीब लग रहा था. उधर रचना ने फिर से मेरी तरफ पीठ कर लिया था. मैंने बहुत सोच विचार करके फैसला किया की उसे मानना तो पड़ेगा hi चाहे जैसे मानना पड़े. ये सोच कर मैं उसके करीब पंहुचा और अपना राइट हैंड धीरे से उसके लेफ्ट कंधे पर रखा तो मैंने महसूस किया की रचना के जिसम में अचानक hi कम्पन हुआ था. उसने अपने कंधे से मुझे हाथ हटाने को नहीं कहा बल्कि चुप चाप कड़ी रही.

"ारी मैं तो मज़ाक कर रहा था रचना. तुम तो आज सच में बहुत खूबसूरत लग रही हो. हाँ ये सच है की मुझे तारीफ करना नहीं आता. अगर मैं कोई शायर होता तो शायद वैसी तारीफ करता तुम्हारी जिससे तुम्हे ख़ुशी मिलती." मैंने ये सब कहा तो रचना ने मेरी तरफ पलट कर देखा.

"तारीफ न कर पाने की एक वजह ये भी है विक्की की तुम अभी भी झिझकते हो. जबकि मुझे तुमसे बात करने में कोई झिझक नहीं महसूस होती. हम दोस्त हैं तो फिर हमारे बीच किस बात की झिझक.? अपने अंदर से झिझक निकाल दो दोस्त और जो भी मन में आये उसे बोल दिया करो. मुझे पता है की तुम ऐसा कुछ भी नहीं कहोगे मुझे जिससे मुझे बुरा लगे या मेरी इज्जत पर कोई बात आये." रचना ने मेरी आँखों में देखते हुए ये सब कहा तो मैं देखता रह गया उसे.

रचना के बारे में इतना तो मैं समझ चूका था की वो एक बेबाक लड़की है. मगर इतनी बेबाक है ये अब जाना था मैंने. मुझे उसकी बातो से काफी राहत सी हुयी थी. मेरे अंदर से जैसे सच में झिझक जा रही थी.

"तुम्हारी बाते सच हैं मगर शायद ये मेरी फितरत hi है जिसकी वजह से मेरे अंदर की ये झिझक नहीं जाती. मगर तुम्हारी इन बातो से अब मुझे भी महसूस हो रहा है की मेरे अंदर अब उतनी झिझक नहीं है जितनी इसके पहले थी." मैंने ये कहा तो रचना खिलखिला कर हसने लगी फिर बोली.

"अरे तो उसे अंदर क्यों बचा के रखा है विक्की.? उसे भी निकाल दो na...kya उसका अचार रखना है तुमने.?" रचना ने कहा तो मैं इधर उधर देखने लगा. मुझे अपने आप पर गुस्सा आया की एक लड़की मुझे ये सब बोल रही थी और मैं एक मर्द होते हुए भी इतना झिझक रहा था. मैंने फैसला किया की अब किसी भी बात के लिए रचना के सामने नहीं झिझकूगा.

"छोडो जाने दो vicky...aao हम दोनों नहर के पानी में अपने अपने पेअर दाल कर सीढ़ी में बैठते हैं." रचना ने ये कहा तो मैंने हाँ में सर हिलाया और उसके साथ hi सीढ़ी पर बैठ गया.

रचना ने अपने पैरो से सैंडिल निकला और अपने दोनों पैरो को नहर के पानी में दाल दिया. उसने अपने दोनों हाथो से सलवार को अपने पैरो से थोड़ा ऊपर कर लिया जिससे पानी में उसकी सलवार गीली न हो. रचना ने घुटने के नीचे तक सलवार को उठाया था. मैंने देखा की पैरो से ऊपर जहा तक रचना ने सलवार उठा लिया था वह तक उसकी दूध सी गोरी टांगो का हिस्सा दिखने लगा था. पानी में डूबे उसके वाइट और सॉफ्ट पेअर बहुत hi सुन्दर लग रहे थे.

मैंने नज़र हटा कर अपने जूते और जुराब उतरे और फिर मैं भी रचना की तरह पानी में अपने पैरो को दाल कर बैठ गया. मैंने अपने जींस के पेंट को घुटनो तक ऊपर कर लिया था. हम दोनों के सामने नहर का पानी बाह रहा था और हम दोनों उस पानी में अपने अपने पैरो को डाले इधर से उधर कर रहे थे. नहर का पानी काफी ठंडा और शीतल था.

"ये जगह उस वाली जगह से अच्छी है न विक्की.?" रचना ने मेरी तरफ एक बार देखने के बाद ये कहा तो मैंने नहर के पानी की तरफ देखते हुए hi हाँ कहा तो उसने कहा.

"तुम उस दिन सच कह रहे थे की प्रेमी जोड़ो को वैसी जगह पर वो सब नहीं करना चाहिए." रचना ने इस बार थोड़ा धीमी आवाज़ में कहा तो मैंने उसकी तरफ देखा. उसका चेहरा नहर के पानी की तरफ था और चेहरे पर फिर से सुर्खी दिखाई देने लगी थी.

"छोडो उस बात को और कोई दूसरी बात करो." मुझे लगा रचना कही उस दिन के बारे में बात न करने लग जाये इस लिए मैंने टॉपिक चेंज करने का सोच के ऐसा कहा तो रचना ने मेरी तरफ देखा.

"Hmmm....ek बात पुछु विक्की.?" रचना ने धीरे से नहर के पानी की तरफ देखते हुए hi कहा तो मैंने कहा हाँ पूछो तो उसने कहा.

"जो लोग प्यार करते hain..to क्या प्यार में वो सब करना ज़रूरी होता है जो उस दिन वो लोग कर रहे थे.?" रचना ने ये कहा तो मैं हैरान रह गया. मेरा दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा रचना की ये बात सुन कर. मुझे उम्मीद नहीं थी की रचना मुझसे ये बात पूछेगी और अब जब उसने ये पूछा तो मैं कुछ बोल न सका.

"बताओ न vicky...kya वो सब करना ज़रूरी होता है.?" मुझे चुप देख कर रचना ने फिर से पूछा तो मैंने कहा.

"ये तुम क्या फालतू की बात पूछ रही हो रचना.? तुम ऐसी कोई बात पूछ भी कैसे सकती हो मुझसे.?" मैंने उसकी तरफ देखते हुए ये कहा तो रचना ने कहा.

"क्यों नहीं पूछ सकती विक्की.? तुम मेरे दोस्त हो. अगर मुझे कोई बात पता नहीं होगी तो क्या मैं अपने दोस्त से नहीं पूछ सकती.?" रचना ने मेरी तरफ देखते हुए ये कहा तो मैंने कहा.

"दोस्त के साथ साथ तुम एक लड़की भी हो रचना और मैं एक लड़का. ऐसी बाते दोस्त की मर्यादा के खिलाफ हैं." मैंने कहा तो रचना ने कहा.

"ये सब पुराने खयालातों वाली बाते हैं विक्की. आज के युग में लड़का लड़की आपस में किसी भी बारे में खुल कर बाते कर सकते हैं. वैसे भी मैंने कौन सी ऐसी बात तुमसे पूछी है जिसका तुम मुझे जवाब hi नहीं दे सकते.?" रचना ने कहा तो मैं फिर से हैरान रह गया.

"मुझे नहीं पता की क्या ज़रूरी होता है और क्या नहीं. मैंने कौन सा इस सब में पीएचडी किया है.?" मैंने कहा तो रचना है पड़ी.

"हाँ तुमने बताया तो था उस दिन की तुम्हारी ज़िन्दगी में कभी कोई ऐसी लड़की आयी hi नहीं जिससे तुम्हारा प्यार वाला चक्कर हुआ होता और जब ऐसा चक्कर hi नहीं हुआ तो ये सब कहा से पता चलता तुम्हे.?" रचना ने मुस्कुराते हुए ये सब कहा तो मुझे बड़ा अजीब लगा. मैंने दूसरी तरफ चेहरा घुमा लिया था.

"अच्छा छोडो ये बताओ की अगर कोई खूबसूरत लड़की तुमसे कहे की वो तुमसे प्यार करती है तो तुम क्या करोगे.?" रचना ने मुझसे ये पूछा तो मैंने उससे कहा.

"ये सब तुम क्या बाते कर रही हो यार.? कोई दूसरी बात करो न. मुझे ये सब पसंद नहीं है." मैंने कहा तो रचना ने कहा.

"तुम भी न हद करते हो विक्की. हम दोनों दोस्त हैं तो हमें एक दूसरे से खुल कर क्या हसी मज़ाक भी नहीं करना चाहिए.?" रचना ने बुरा सा मुँह बनाते हुए ये कहा तो मैंने कहा.

"अच्छा ठीक है करो जो तुम्हे करना हो." मैंने ये कहा तो रचना ने मुस्कुराते हुए कहा.

"तो बताओ फिर जो मैंने पूछा था." रचना ने कहा तो मैंने इस बार मुस्कुराते हुए कहा.

"अगर कोई लड़की मुझसे ऐसा कहेगी तो मैं उसकी डंडे से पिटाई करके भगा दुगा." मैंने ये कहा तो रचना ने हैरानी से मुझे देखा फिर बोली.

"हे भगवन ये क्या बोल रहे हो तुम.? ऐसा क्यों करोगे तुम उस बेचारी के साथ.?" रचना ने कहा तो मैंने कहा.

"मेरी मर्ज़ी मैं कुछ भी करू." मैंने ये कहा तो रचना मुझे अजीब तरह से देखती रह गयी.

मेरे और रचना के बीच इसी तरह की बाते होती रही. आज भी रचना अपने मोबाइल पर सेल्फी ले रही thi..aaj मैंने उसे अपनी पिछ लेने से मन नहीं किया. जब वो हम दोनों की सेल्फी लेती तो वो मेरे से चिपक जाती थी और तरह तरह पोज़ बना रही थी. रचना मेरे साथ ऐसे चिपक जाती थी जैसे उससे इससे कोई फर्क hi नहीं पड़ता था. जबकि मैं बहुत अजीब फील करता था.

उस दिन हमारी दूसरी मुलाकात में एक चेंज ये हुआ की मैं उससे काफी ज़्यादा खुल गया था. अब मुझे उससे कोई भी बात करने में झिझक नहीं होती थी. रचना उस दिन बहुत खुश लग रही थी और मेरे साथ हसी मज़ाक करती रही थी. मुझे भी अब उसके साथ अच्छा लगने लगा था. मैंने महसूस किया था की रचना का नेचर वैसा नहीं था जैसा मैं इसके पहले सोच और समझ रहा था. क्यों की मुझे ऐसा कुछ भी उससे महसूस नहीं हुआ जिसकी वजह से मैं ये सोचता की उसके मन में कोई बदले वाली बात है.

शाम होने से पहले तक हम दोनों उस जगह तक रहे. इतने सरे टाइम के बाद अब मैं काफी ज़्यादा इजी फील करने लगा था उसके साथ. अब मैं भी उससे मज़ाक कर लेता था जिसका वो पूरी मस्ती के साथ जवाब देती थी. उस दिन जब हम वापस चले तो रचना ने खुद hi मुझसे कहा की वो मेरे साथ hi मोटर सिक्ले पर चलेगी. मैं उसकी इस बात से हैरान तो हुआ मगर फिर राज़ी हो गया था.

हम दोनों एक साथ गांव की तरफ चल दिए थे. शुरू शुरू में रचना मेरे पीछे थोड़ा दूर हो के बैठी थी. मगर जब रस्ते में भी हम दोनों के बीच हसी मज़ाक से भरी बाते चलती रही तो वो मेरे करीब आ गयी थी. उस वक्त तो मैं हैरान hi हो गया जब एक जगह उसने मुझसे मोटर सिक्ले रोकने को कहा और जब मैंने मोटर सिक्ले रोका तो वो उतर कर मोटर सिक्ले में दोनों तरफ टांगो को झूला कर बैठ गयी थी.

जब मैंने उससे इस तरह बैठने की वजह पूछी तो उसने है के यही कहा की उसका बड़ा दिल करता था मोटर सिक्ले में इस तरह दोनों तरफ पैरो को झूला कर बैठने का इस लिए वो बैठ गयी थी. रास्ते में जहा जहा मैं ब्रेक मारता तो पीछे बैठी रचना खिसक कर मेरी पीठ से लग जाती जिससे उसकी छतियो के ठोस उभार मेरी पीठ के थोड़ा नीचे चुभने लगते थे. शुरू शुरू में तो उसे जैसे hi इसका पता चलता वो झट से पीछे खिसक जाती मगर धीरे धीरे उसने पीछे खिसकना छोड़ दिया था और एक टाइम तो ऐसा आया की वो पीछे से मुझसे चिपक hi गयी थी.

मुझे मेरी पीठ के थोड़ा नीचे उसकी ठोस चूचियों की चुभन और सॉफ्टनेस का अहसास होता और अजीब सी गुदगुदी भी होती. सरे रास्ते हम दोनों मस्ती मज़ाक करते हुए आये और गांव के करीब पहुंच गए. गांव के बस स्टैंड पर मैंने रचना के कहने पर उसे मोटर सिक्ले से उतार दिया और फिर मैं अपने घर की तरफ चला गया. आज का दिन मेरे लिए सबसे अलग लग रहा था.

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 24

फ्लैशबैक रनिंग....


जब मैंने उससे इस तरह बैठने की वजह पूछी तो उसने है के यही कहा की उसका बड़ा दिल करता था मोटर सिक्ले में इस तरह दोनों तरफ पैरो को झूला कर बैठने का इस लिए वो बैठ गयी थी. रास्ते में जहा जहा मैं ब्रेक मारता तो पीछे बैठी रचना खिसक कर मेरी पीठ से लग जाती जिससे उसकी छतियो के ठोस उभार मेरी पीठ के थोड़ा नीचे चुभने लगते थे. शुरू शुरू में तो उसे जैसे hi इसका पता चलता वो झट से पीछे खिसक जाती मगर धीरे धीरे उसने पीछे खिसकना छोड़ दिया था और एक टाइम तो ऐसा आया की वो पीछे से मुझसे चिपक hi गयी थी.

मुझे मेरी पीठ के थोड़ा नीचे उसकी ठोस चूचियों की चुभन और सॉफ्टनेस का अहसास होता और अजीब सी गुदगुदी भी होती. सरे रास्ते हम दोनों मस्ती मज़ाक करते हुए आये और गांव के करीब पहुंच गए. गांव के बस स्टैंड पर मैंने रचना के कहने पर उसे मोटर सिक्ले से उतार दिया और फिर मैं अपने घर की तरफ चला गया. आज का दिन मेरे लिए सबसे अलग लग रहा था.

अब आगे पढ़िए....


घर पहुंच कर मैं फ्रेश हुआ और अपने कमरे में चला गया. बीएड पर लेट कर मैं आज सरे दिन की घटनाओ के बारे में सोचने लगा. रचना के साथ बिताया हुआ हर लम्हा मेरी आँखों के सामने किसी फिल्म की तरह दिख रहा था. मुझे खुद महसूस हो रहा था की आज रचना के साथ वक्त गुज़ारने से मुझे ख़ुशी महसूस हो रही थी.

रचना का बेबाक अंदाज़ और उसका हर बात को बेझिझक कह देना मुझे शुरू शुरू में भले hi हैरान किया था मगर अब अच्छा लग रहा था. आज मैंने उसके साथ बड़ा hi अच्छा वक्त बिताया था और सबसे बड़ी बात ये की मेरे अंदर की झिझक चली गयी थी. आज मैंने भी रचना की तरह मस्ती की थी. रचना मेरे साथ मेरी मोटर सिक्ले में बैठ कर गांव तक आयी थी. वो मेरे से चिपक कर बैठी थी जिससे उसकी ठोस चूचियों की चुभन का मुझे साफ़ साफ़ अहसास हो रहा था.

मैं सोचने लगा की क्या ये बात रचना को महसूस नहीं हुयी होगी की उसकी छतिया मेरी पीठ पर धसी हुयी थी जिससे मैं उसके बारे में क्या क्या सोचने लगा होगा.? लड़किया इस मामले में बहुत तेज़ दिमाग रखती हैं. मतलब ज़रूर उसे भी महसूस हुआ होगा मगर सवाल ये था की वो सब कुछ महसूस करने के बाद भी मुझसे चिपकी क्यों थी.? क्या वो जान बुझ कर ऐसा कर रही thi...lagta तो ऐसा hi hai...magar क्यों.? शायद वो मुझे अपना सबसे अच्छा दोस्त मानती थी और उसे मेरे साथ कुछ भी करने में कोई झिझक नहीं होती थी. उसे पता था की मैं उसके बारे में गलत नहीं सोचुगा. इसी लिए वो मुझसे ऐसे चिपकी हुयी थी.

मुझे अपनी पीठ के थोड़ा नीचे अभी भी ऐसा महसूस हो रहा था जैसे रचना की वो चूचिया चुभी हुयी हो. ये महसूस करते hi मेरे अंदर अजीब सी झुरझुरी होने लगी जो मुझे सुखद अहसास करा रही थी. मैं इस सुखद अहसास में डूब जाना चाहता था.

अभी मैं इस अहसास में डूबने की सोच hi रहा था की तभी मेरे मोबाइल पर मैसेज टोन बजी. मैंने मोबाइल को वाइब्रेशन से हटा दिया था और रिंग टोन वगैरा का वलयमे काम कर रखा था. मैं बीएड से उठा और दिवार पर टंगे अपने पेंट की पॉकेट से मोबाइल निकाल कर वापस बीएड पर आ कर लेट गया.

मैंने मोबाइल को खोल कर देखा तो रचना का मैसेज आया था अभी. ये देख कर मेरे होठो पर मुस्कान आ गयी. मैंने जल्दी से मैसेज को ओपन किया तो देखा उसमे रचना ने मैसेज में लिखा tha...AAJ मैं बहुत खुश महसूस कर रही हु दोस्त. थैंक यू.

उसका ये मैसेज पढ़ कर मैं मुस्कुरा उठा और फिर मैंने भी उसे मैसेज लिख कर bheja...ACHHA आज क्यों खुश महसूस कर रही हो तुम. ऐसा क्या हो गया है आज.?

मेरे मैसेज भेजने के बाद जल्दी hi रचना का रिप्लाई आया. उसने लिखा tha...YE तो मुझे भी पता नहीं है विक्की. बस ऐसा लग रहा है जैसे कुछ मिल गया हो मुझे और मैं फिर से अपने दोस्त के साथ उसी जगह पर चले जाना चाहती हु.

रचना का ये रिप्लाई पढ़ कर मैं फिर से मुस्कुरा उठा. मैंने महसूस किया की मेरा दिल भी यही चाह रहा था. मैंने मैसेज लिखा और सेंड किया. पर हम तो अभी अभी वही से आये हैं. फिर ऐसा क्यों कह रही हो तुम.?

मेरे इस सवाल का रचना ने जवाब भेजा. वो तो मैं भी नहीं जानती विक्की. अच्छा तुम बताओ की क्या तुम्हे भी ऐसा नहीं लग रहा की हम फिर से उसी जगह पर चले जाये.?

मैं रचना के इस मैसेज को पढ़ने के बाद सोचने लगा. लग तो मुझे भी ऐसा hi रहा था की मैं और रचना फिर से एक साथ मोटर सिक्ले पर उसी जगह पर चले जाये. मगर जाने क्यों ये बात खुल कर रचना से कहने में मुझे झिझक सी महसूस हुयी. तभी रचना का फिर से मैसेज आया. क्या हुआ VICKY...JAWAAB दो NA...KYA तुम्हे भी ऐसा नहीं लगता.?

मैंने उसके इस सवाल का जवाब भेजा. हाँ लगता तो है मगर क्या कर सकते हैं.? मेरे इस मैसेज के बाद जल्दी hi रचना का मैसेज आया. क्या कर सकते हैं का क्या मतलब है दोस्त. सिंपल सी बात है की हम फिर से उसी जगह पर जा सकते हैं.

मैं रचना के उस मैसेज को पढ़ कर फिर से सोचने लगा की क्या बोलू उसे. फिर मैंने उसे मैसेज टाइप किया क्या ऐसे बार बार मिलना ठीक होगा.? अगर किसी को हमारे बारे में पता चल गया तो हंगामा हो जायेगा. इस लिए अच्छा यही होगा की हम ये मिलने मिलाने वाला काम न HI करे तो अच्छा है. कॉल पर या मैसेज पर बात तो हो HI जाती है हमारी.

मेरे इस मैसेज का रिप्लाई भी जल्दी hi दिया रचना ने. तुम बहुत सोचते हो विक्की. किसी को कुछ पता नहीं चलेगा. अच्छा सुनो दो दिन बाद रुपेश भैया का जनम दिन है. तुम तो आओगे HI उनके जनम दिन पर मगर मैं ये चाहती हु की तुम मेरे साथ कल शहर चलो. मुझे अपने लिए कपडे लेना है वह और मैं चाहती हु की मैं अपने दोस्त की पसंद के कपडे खरीदू और उन्हें रुपेश भैया के जनम दिन पर पह्नु.

रचना के इस मैसेज को पढ़ कर मैं हैरान हुआ. मुझे समझ न आया की रचना मेरी पसंद के कपडे क्यों पहनना चाहती है. मैंने उसे मैसेज भेजा. ारी अभी तो हम दोनों शहर से आये हैं. अगर तुम्हे कपडे भी लेना था तो लिया क्यों नहीं आज.? अब कल फिर से शहर जाने का क्या मतलब है.? और तुम मेरी पसंद के कपडे क्यों पहनना चाहती हो.?

मेरे मैसेज का रिप्लाई आया. मैंने आज कपडे इस लिए नहीं लिए क्यों की कल फिर से शहर जाने का मुझे बहाना चाहिए था. इस लिए कल फिर से मैं शहर जाओगी और तुम भी चलोगे. और मैं तुम्हारी पसंद के कपडे इस लिए पहनना चाहती हु क्यों की मैं चाहती हु की इस बार मैं अपने दोस्त की पसंद के कपडे पह्नु.

मैंने कुछ देर और रचना से मैसेज में बाते की उसके बाद मैं कमरे से निकल कर गांव की तरफ चला गया. रात में खाना कहते वक्त पिता जी ने मुझसे पूछा की मैं सरपंच काका से मिला था या नहीं. पिता जी को मैंने सरपंच काका के साथ की हुयी सभी बातो को बताया. उसके बाद मैं अपने कमरे में आ गया.

रात में मैं बीएड पर लेता हुआ था और मुझे नींद नहीं आ रही थी. मैं रचना के बारे में सोच रहा था. उसने फिर से शहर जाने के लिए कह दिया था मुझसे. मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैं घर में रोज़ रोज़ क्या बहाना करके शहर जाउगा.? मुझे दीदी की भी फ़िक्र थी. कल के बाद मेरी उनसे कोई बात नहीं हुयी थी और न hi वो मेरे सामने आयी थी.

कुछ देर बाद मेरे कमरे का दरवाजा खटखटाया गया तो मैंने उठ कर दरवाजा खोला. बाहर प्रिय पूजा कड़ी थी. दरवाजा खुलते hi वो दोनों अंदर आ गयी और जा कर बीएड पर बैठ गयी. मैं दोनों को देख कर समझ गया की ये दोनों मुझसे दीदी के साथ हुयी बातो के बारे में सब कुछ jan'ne आयी हैं. दरवाजा बंद करके मैं भी बीएड पर आ कर बैठ गया.

प्रिय पूजा के पूछने पर मैंने दोनों को कल रात की साडी बाते बता दी. साडी बाते jan'ne के बाद दोनों के चेहरे की चमक बुझ गयी. दोनों को यकीन नहीं हो रहा था की दीदी ऐसा करेगी. कुछ देर तक दोनों सोचते विचारते बैठी रही. फिर पूजा ने कहा.

"अब क्या होगा भाई.? मेरा मतलब है की क्या अब दीदी ऐसे hi रहेगी.?" पूजा ने पूछा तो मैंने कहा.

"मुझे खुद भी नहीं पता की अब क्या होगा. दीदी की अगर यही मर्ज़ी है तो यही सही. मैं उनके कहे को ताल नहीं सकता." मैंने ये कहा तो प्रिय ने कहा.

"हाँ ये तो है. अच्छा ये बताओ भाई की अगर दीदी ये कहती की वो तुमसे प्यार करती हैं तो तुम क्या जवाब देते उन्हें.? क्या तुम भी यही कहते की तुम भी उन्हें प्यार करते हो.?" प्रिय ने ये सब कहा तो मैंने उसकी तरफ देखते हुए कहा.

"मेरे मन में उनके लिए पहले भी ऐसी कोई बात नहीं थी और आज भी नहीं है. मैं उन्हें बहुत प्यार करता हु मगर एक भाई की हैसियत से. मैं ये किसी कीमत पर नहीं चाहता की मेरी मासूम सी बहन को एक पल के लिए भी किसी बात का दुःख हो. अगर उनके दिल में ये है की वो मुझसे बहन की हैसियत से नहीं बल्कि एक प्रेमिका वाली हैसियत से प्यार करती हैं तो ये मेरे लिए एक्सेप्ट करना आसान नहीं होगा." मैंने ये सब कहा तो पूजा ने कहा.

"भाई अब इस बात में कोई शक नहीं रहा की दीदी तुमसे प्रेमिका वाली हैसियत से hi प्यार करती हैं. यही वजह है की जब से उन्हें इस बात का अहसास हुआ तभी से उन्होंने तुमसे दूरिया बना ली हैं. वो नहीं चाहती की तुम्हारे करीब रहने से वो प्यार में बहक जाये जिससे कुछ ऐसा हो जाये जिसका पता चलते hi माँ पिता जी जीते जी मर जाये." पूजा ने ये कहा तो मैंने उसकी तरफ देखा. यही बात मेरे मन में भी थी. मुझे भी इस बात का अहसास हो चूका था.

"एक बात aur...unhe भी इस बात का अहसास होगा की तुम भी उनसे प्यार करते हो. जबकि तुम कहते हो की तुम्हारे अंदर ऐसी कोई बात है hi नहीं. तो क्या ये दीदी की ग़लतफ़हमी है या फिर तुम हमसे झूठ बोल रहे हो की तुम दीदी से वो वाला प्यार नहीं करते.?" प्रिय ने ये कहा तो मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखा.

"अब भाई के कहने से भी क्या होगा प्रिय. दीदी ने तो उस बात को hi ख़तम कर दिया है. हए क्या क्या सपने सजा लिए थे मैंने." पूजा ने मुस्कुराते हुए ये कहा तो मैंने उसकी तरफ देखा.

"क्या मतलब है तेरा.?" मैंने ये पूछा तो पूजा और प्रिय दोनों hi हसने लगी. फिर प्रिय ने कहा.

"ये तो कुछ भी बोलती है भाई. तुम ज़्यादा मत सोचो इस बारे में." प्रिय ने कहा तो मैं कुछ न बोलै.

मैं बीएड से उठा और फिर उसमे चढ़ कर अच्छे से लेट गया. मुझे let'te देख वो दोनों भी मेरे अगल बगल लेट गयी. मैंने दोनों की तरफ देखा तो दोनों मुस्कुराने लगी.

"ऐसे मत देखो भाई. हम दोनों आज भी तुम्हारे कमरे में hi सोयेगे. अब दीदी तो यहाँ आएगी नहीं तो हम सोच रहे हैं की क्यों न हम दोनों hi यहाँ सोने लगे. आखिर तुम्हारा भी अकेलापन दूर हो जायेगा." पूजा ने मुस्कुराते हुए ऐसा कहा तो मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखा.

"भाई अगर तुम्हे हमारे यहाँ सोने से कोई दिक्कत हो तो बता दो. हम दोनों चले जायेगे इस कमरे से." प्रिय ने मासूम सी शकल बना के ये कहा तो मैंने कहा.

"अब जब तुम दोनों ने सोच hi लिया है तो ठीक है यही सोया करना मगर घोड़े बेच कर नहीं. सुबह चार बजे तुम दोनों अपने कमरे में वापस चली जाओगी." मैंने ये कहा तो दोनों के चेहरों पर चमक आ गयी.

हम तीनो ने थोड़ी देर इधर उधर बाते की उसके बाद वो दोनों मुझसे चिपक कर सो गयी. दोनों के कोमल जिसम मुझे महसूस हो रहे थे. दोनों की छतियो के उभार भी मुझे महसूस हो रहे थे. इनके पहले दीदी भी मेरे साथ बीएड पर सोती थी मगर वो कभी भी मुझसे ऐसे चिपक कर नहीं सोती थी. मगर प्रिय पूजा तो किसी छोटी सी बच्चियों की तरह मुझसे चिपकी हुयी थी. जिन्हे ये अहसास hi नहीं था की वो दोनों मेरी बहनो के साथ साथ एक जवान लड़किया भी हैं.

मैं दोनों के बीच लेता काफी देर तक कुछ न कुछ सोचता hi रहा. उसके बाद मुझे पता hi नहीं चला की कब मेरी आँख लग गयी. हर दिन की तरह सुबह चार बजे hi मेरी आँखे खुली तो देखा मेरी दोनों जुड़वाँ बहने वैसे hi मुझसे चिपकी सो रही हैं. दोनों गहरी नींद में थी. दोनों के चेहरों में संसार भर की मासूमियत थी. मैं दोनों को ध्यान से कुछ देर तक देखता रहा फिर मैंने उन्हें जगाया.

दोनों hi थोड़े प्रयास के बाद जाग hi गयी. जब उन्हें अहसास हुआ की वो दोनों मेरे कमरे में हैं तो मुझे देख कर मुस्कुराने लगी. मुझे देखने के बाद दोनों ने एक दूसरे को देखा और फिर दोनों ने गजब कर दिया. दोनों उठी और फिर दोनों एक साथ hi मेरे चेहरे पर झुकी और दोनों तरफ के मेरे गालो पर चूम लिया.

"गुड मॉर्निंग भाई." दोनों ने एक साथ hi मुस्कुराते हुए ये कहा तो मैं हैरान रह गया. मुझे मुँह फाड़े देख दोनों हसने लगी. फिर पूजा बोली.

"ऐसे मुँह मत फाड़ो भाई. मक्खी घुस जाएगी मुँह में. और हाँ अब से ये आदत दाल लो क्यों की अब से हर सुबह ऐसे hi गुड मॉर्निंग होगी." पूजा ने ये कहा तो प्रिय ने कहा.

"लेकिन बदले में तुम्हे भी ऐसे hi हमें गुड मॉर्निंग करना होगा. आखिर दुनिया की सबसे सुन्दर और मासूम दीदी की हम भी सबसे सुन्दर और मासूम बहने हैं तुम्हारी." प्रिय ने ये कहा तो इस बार मैं झेंप सा गया.

"आखिर तुम दोनों के मन में क्या खुराफात चल रही है ये तो बताओ.?" मैंने मुस्कुराते हुए ये पूछा तो दोनों ने एक दूसरे की तरफ देखा और फिर पूजा बोली.

"भाई खुराफात कुछ भी नहीं है. वैसे भी हमें खुराफात करने की क्या ज़रूरत है.? हमें जो चाहिए होगा वो तो हमें बहुत आसानी से hi मिल जाना है." पूजा ने मुस्कुराते हुए ये कहा तो मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखते हुए कहा.

"ये तुम क्या कह रही हो.?" मैंने पूछा तो दोनों फिर से हसने लगी. फिर दोनों बीएड से उठी और मुझे अपने हाथ के इशारे से bye bye कहते हुए कमरे से बाहर चली गयी.

दोनों के जाने के बाद मैं उसी हालत में लेता उनकी बातो के बारे में सोचता रहा. मुझे ऐसा लग रहा था जैसे ये दोनों कोई गड़बड़ करने वाली थी मगर क्या..?

कुछ देर बाद मैं उठा और नीचे फ्रेश होने के लिए चला गया. फ्रेश हो के वापस अपने कमरे में आ गया. मैंने मोबाइल खोल कर देखा तो उसमे रचना का मैसेज आया हुआ था. ये मैसेज दो मिनट पहले आया था. मैं हैरान हुआ की रचना भी इतनी सुबह जाग चुकी है.

मैंने रचना का मैसेज पढ़ा. मैसेज में उसने पहले एक गुड मॉर्निंग शायरी लिखा था उसके बाद ये लिखा था की आज दोपहर को एक बजे शहर चलना है. मैं ये पढ़ कर परेशां सा हो गया. रचना किसी दिन मुझे फांसी लगवा देगी.

नास्ता करते वक्त पिता जी से बाते हुयी. माँ पिता जी ने मुझे आशीर्वाद दिया और कुछ अच्छी बातो की सीख दे कर विदा किया. आज से मुझे सचिव का काम देखना और करना स्टार्ट करना था. मेरी दोनों जुड़वाँ बहनो ने भी मुझे विश किया. इसके बाद मैं अपने घर से सीधा सरपंच काका के घर चला गया.

सरपंच काका अपने घर पर hi थे. बाकी का सब काम उन्होंने खुद hi करवा दिया था. मेरा काम अब इतना hi था की जो लोग भी मेरे पास किसी काम को करवाने आएंगे वो मैं करुगा. थोड़ी देर सरपंच काका से इसी बारे में बाते हुयी उसके बाद उन्होंने बताया की कल रुपेश का जनम दिन है इस लिए उसके जनम दिन पर मैं यहाँ ज़रूर रहुगा. उन्होंने मेरे पिता जी को भी इन्विते करने के लिए बताया. ये पहली बार था जब ब्राह्मण समाज का सरपंच ख़ास मौके पर मेरे पिता जी को भी बुला रहा था. मुझे इस बात से बहुत ख़ुशी हो रही थी.

सरपंच काका ने कहा था की वो खुद मेरे घर जायेगे और पिता जी को आने के लिए इन्विते करेंगे. उसके बाद सरपंच काका ने मुझे शहर जाने के लिए कहा. शहर में मुझे कार्यालय जाना था. वह पर कुछ ज़रूरी काम था जो मेरे लिए hi था. शहर जाने की बात से मुझे याद आया की रचना ने मुझे शहर चलने के लिए कहा था और मैं इस बात से परेशां था की घर में क्या बहाना बनाऊगा. मगर सरपंच काका ने मेरी ये परेशानी ख़तम कर दी थी.

सरपंच काका के घर से मैं अपने घर आ गया. पिता जी खेत जा चुके थे इस लिए मैंने मोटर सिक्ले उठायी और सीधा खेत की तरफ चल दिया. खेत पहुंच कर मैंने पिता जी से बताया की सरपंच काका ने मुझे शहर जाने के लिए कहा है जहा मुझे कार्यालय में कोई ज़रूरी काम है. मेरी बात से पिता जी ने कहा की ठीक है मैं चला जाओ. मैंने पिता जी को ये भी बताया की सरपंच काका मुझे रुपेश के जनम दिन पर रहने का और खाने पिने का न्योता दिया है और ये भी की वो हमारे घर आ कर उन्हें भी निमंत्रण देने वाले हैं. मेरी इस बात से पिता जी के चेहरे पर ख़ुशी के भाव आ गए. उन्होंने मुझे शहर जाने को कहा और फिर वो कामो में लग गए.

दोपहर एक बजे रचना का मुझे मैसेज आया. उसने मुझे बताया की वो गांव से बस में चढ़ चुकी है और शहर आ रही है. मैं उसके पहले hi शहर आ गया था. क्यों की मुझे शहर में कार्यालय जाना था. कार्यालय में मुझे काफी टाइम लग गया. मुझे कुछ ज़रूरी चीज़े दी गयी और सबसे बड़ी बात ये की उन चीज़ो में मुझे एक बड़ा सा श्रीं टच मोबाइल दिया गया. जिसमे नेट भी चलता था. मैं अपनी इस नौकरी से खुश भी था और थोड़ा असहज भी क्यों की मैंने इसके पहले ऐसा कोई काम नहीं किया था. मगर पिछले कुछ दिनों में सरपंच काका ने मुझे बहुत कुछ समझाया बुझाया था और बाकी का काम यहाँ कार्यालय में बताया गया मुझे. कार्यालय में मुझे ये भी कहा गया की मुझे एक लैपटॉप भी लेना पड़ेगा.

मैंने पिता जी को फ़ोन करके बताया तो पिता जी ने कहा की जिस जिस चीज़ की ज़रूरत हो वो ले लो. पिता जी ने मुझे अपना एटीएम कार्ड दे दिया था. शायद उन्हें पता था की मुझे पैसो की ज़रूरत पड़ेगी. खेर दो घंटे के बाद मैं कार्यालय से बाहर निकला. कार्यालय से बाहर आया hi था की तभी मेरा मोबाइल बजा. मैंने मोबाइल निकाल कर देखा तो रचना का कॉल था. उसने मुझे बताया की वो बस स्टैंड से बाहर उस जगह पर कड़ी है जहा से उस गाढ़ी की तरफ को रास्ता जाता है. रचना के बताने पर मैं उस तरफ hi बढ़ चला.

कुछ देर में मैं उस जगह पर आ गया जहा पर रचना कड़ी थी. मुझे देखते hi रचना मुस्कुरायी और फिर मेरे पीछे मोटर सिक्ले पर दोनों तरफ पेअर करके बैठ गयी. उसके बैठते hi मैंने मोटर सिक्ले को आगे बढ़ा दिया. तभी मैं शॉक रह गया जब पीछे से रचना ने अपने दोनों हाथ मेरे अगल बगल से निकाल कर मेरे पेट पर कास लिया. उसके ऐसा करते hi मैं एकदम से घबरा गया और मेरी मोटर सिक्ले इधर उधर होने लगी. मैंने जल्दी से सम्हालते हुए मोटर सिक्ले को किनारे पर कड़ी कर दिया.

मैंने मोटर सिक्ले कड़ी किया तो रचना ज़ोर ज़ोर खिलखिला कर हसने लगी मैंने पलट हैरानी से उसकी तरफ देखा तो वो मुझे देख कर और ज़ोर ज़ोर से हसने लगी. मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था की रचना क्यों है रही थी.

"तुम इतना घबरा क्यों गए दोस्त.? मैंने तो बस गिरने से बचने के लिए तुम्हे पकड़ा hi तो था. फिर तुमने अचानक मोटर सिक्ले क्यों कड़ी कर दी.? कही तुम ये सोच कर तो नहीं घबरा गए की मैं कुछ गलत करने वाली थी.?" रचना ने हसी को रोकते हुए ये सब कहा तो मैंने कहा.

"ये क्या हरकत थी रचना.? दोस्ती का भी कोई हिसाब किताब होता है. मगर ये क्या था.?" मैंने थोड़ी नाराज़गी से कहा तो रचना ने कहा.

"तुम भी न हद करते हो विक्की. तुम हर बात पर मुझ पे शक करने लगते हो. क्या अभी भी तुम्हे यही लगता है की मैंने तुम्हे फ़साने के लिए तुमसे दोस्ती की है.?" रचना ने ये कहा तो मैं कुछ बोल न सका.

"मुझे भी पता है विक्की की अगर कोई लड़का लड़की आपस में दोस्त होते हैं तो उनके बीच कुछ दायरे भी होते हैं. मैंने तो ऐसा इस लिए किया था क्यों की आज मैं बहुत खुश thi...wo भी सिर्फ तुम्हारे लिए. तुम आज से सचिव बन गए और काम में भी लग गए. हमारे गांव में तुम पहले ऐसे लड़के हो जो इतना पढ़ा लिखा है और जिसे उसकी पढ़ाई की वजह से ये नौकरी मिल गयी है. मैं इसी बात से खुश थी विक्की की मेरा दोस्त सबसे आगे है और तुम मेरे बारे में गलत सोच बैठे. क्या इतना भी भरोसा नहीं है मुझ पर.?" रचना ने बड़ी मासूमियत से ये सब कहा तो मुझे अपने आप में बड़ी शर्म और ग्लानि महसूस हुयी.

मुझे कुछ समझ न आया की मैं रचना की बातो के बाद उससे क्या कहु. मुझे सच में यही लगा था की रचना ने उस वक्त गलत इरादे से वो हरकत की थी. मगर रचना के अनुसार वो सब तो उसने मेरे प्रति ख़ुशी की वजह से किया था. मैंने देखा की रचना का चेहरा एकदम से मुरझा गया था और उस पर दुःख की छाया भी आ गयी थी. मुझे अपने आप पर बहुत गुस्सा आया.

"मुझे माफ़ कर दो रचना. मैं सच में तुम्हे गलत समझ बैठा था. एक तुम हो जो मुझे सबसे अच्छा समझती हो और एक मैं हु की तुम्हे गलत समझ के सबसे बुरा भी बन गया. मैं तुम्हारी दोस्ती के लायक नहीं हु रचना. सच hi तो कहा तुमने की मुझे तुम पर भरोसा नहीं हुआ. दोस्ती तो प्यार और भरोसे पर hi कायम रहती है अगर वही नहीं तो दोस्ती करने का कोई मतलब नहीं है." मैंने उदास हो के ये कहा तो रचना ने मेरी बात का कोई जवाब नहीं दिया. जब उसने कुछ न कहा तो मुझे और भी ज़्यादा ग्लानि हुयी.

"मुझे माफ़ कर दो रचना. मैं मानता हु की मैंने तुम्हे गलत समझ लिया था मगर ये भी सच है की मुझे इस बात का पता hi नहीं था की तुमने वो सब किस बात पर किया था. अब जब तुमने बताया तो मुझे भी इस बात पर ख़ुशी हो रही है की तुम मेरे लिए इतना अच्छा सोचती हो. मुझ पर भरोसा करो dost...aaj इसी बात से मुझे तुम पर पूरा भरोसा हो गया है. मैं तुमसे वडा करता हु की अब से मैं तुम पर कभी शक नहीं करुगा और अब से हम दोनों पक्के वाले दोस्त बन गए हैं. प्ल्ज़ रचना इसको आखिरी गलती समझ कर मुझे माफ़ कर दो. अब से ऐसा कभी नहीं होगा." मैंने रचना के सामने आ कर ये सब कहा तो रचना ने आँशु भरी आँखों से मेरी तरफ देखा तो मैं हिल सा गया.

रचना की झील सी गहरी आँखों में आँशु थे. पता नहीं क्यों मगर मुझे ऐसा लगा जैसे मैंने कितना बड़ा गुनाह कर दिया था उसे रुला कर. उधर मेरी बातो पर रचना के होठो पर हलकी सी मुस्कान उभरी. उसकी आँखों में आँशु अभी भी तैर रहे थे जो उसकी आँखों से बाहर आने के लिए आतुर थे.

मैंने आगे बढ़ कर अपने हाथो से उसकी आँखों के आंशुओ को पोंछा और फिर मुस्कुरा कर रचना से कहा.

"ये आँशु मेरी सबसे सुन्दर और मासूम सी दोस्त की आँखों में ज़रा भी ाचे नहीं लगते. अगर तुम चाहो तो मेरी गलती के लिए मुझे सजा दे सकती हो. सजा देने का तुम्हे पूरा हक़ है दोस्त." मैंने इस बार गंभीरता से कहा तो रचना मेरी आँखों में बड़े ध्यान से देखने लगी. कुछ पल देखने के बाद उसके चेहरे पर फिर से पहले वाला नूर आ गया और वो मुझसे लिपट गयी.

रचना मुझसे यु सरे आम लिपट जाएगी इसकी मैंने उम्मीद नहीं की थी. मैं हैरान तो हुआ मगर उसे कहा कुछ नहीं. मैं सड़क के दोनों तरफ देखने लगा था. इस तरफ अभी कोई आ जा नहीं रहा था वर्ण मेरे लिए बहुत अजीब सिचुएशन हो जाती.

"ारी मैडम ऐसा कही और कर लेना यार. इस तरफ कोई आ गया और तुम्हे मुझसे इस तरह लिपटे देख लिया तो क्या सोचेगा.?" मैंने ऐसा कहा तो रचना ने उसी हालत में कहा.

"किसी और के सोचने की मुझे कोई फ़िक्र नहीं है विक्की. मुझे बस इस बात की फ़िक्र है की मेरा अच्छा वाला दोस्त इस बात पर क्या सोचता है." रचना ने ये कहा तो मैं हैरान हुआ फिर एकदम से शरारत से बोलै.

"मुझे क्या है लिपटी रहो तुम जब तक तुम्हारा दिल करे. वैसे एक बात कहना चाहता हु तुमसे.?" मैंने मुस्कुराते हुए कहा तो रचना ने उसी हालत में कहा.

"हाँ तो कहो na...ek क्या हज़ार बात कहो मुझसे. रोका किसने है तुम्हे.?" रचना ने कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"नहीं हज़ार nahi...bas एक hi बात कहुगा. मगर सोच रहा हु की कही तुम नाराज़ हो कर मुझ पर हमला न कर दो." मैंने ऐसा कहा तो रचना कुछ देर चुप रही. शायद सोचने लगी थी की मैं ऐसी कौन सी बात कहुगा जिससे वो नाराज़ हो जाएगी और मुझ पर हमला कर देगी.?

"नहीं vicky...main तुमसे कभी नाराज़ नहीं हो सकती और न hi तुम पर हमला कर सकती हु. इस लिए तुम बेझिझक हो के कहो जो भी बात कहना हो तुम्हे." रचना ने मुझसे लिपटे हुए ये कहा तो मैंने कहा.

"ठीक है fir...yaad रखना ये बात. तो मैं ये कहना चाहता था की तुम मुझसे लिपटी हुयी हो मगर मुझे कोई ऐसी चीज़ चुभ रही है जो बहुत सॉफ्ट भी है और ठोस भी." मैंने धड़कते दिल से ऐसा कहा तो रचना पहले तो कुछ न बोली फिर एकदम से मुझसे अलग हुयी और मेरी तरफ देखते हुए मुझ पर घुसे बरसाने लगी.

"क्या कहा tumne...ruko तुम्हे बताती हु मैं. बहुत फालतू की बाते बोलते हो तुम." रचना ये बोलते हुए मुझे मरे जा रही थी और मैं मुस्कुराते हुए उसकी मार खा रहा था. वो मुझे मार ज़रूर रही थी मगर हलके हाथो से. कुछ देर बाद उसने मारना बंद कर दिया और मेरी तरफ देखते हुए मासूम सी शकल बना कर बोली.

"बहुत गंदे हो तुम. जाओ मुझे तुमसे कोई बात नहीं करना." रचना ने ये कहा और दूसरी तरफ पलट गयी तो मैं मुस्कुरा उठा.

"चलो मान लिया की मैं गन्दा हु मगर तुमने भी तो अपना वडा तोडा है." मैंने ये कहा तो रचना एकदम से मेरी तरफ पलटी और बोली.

"मैंने कौन सा वडा तोडा है.?" रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"अच्छा जी अब अपना वडा भी भुला दिया तुमने. वह जी wah...yaad करो मैंने तुमसे इसके पहले क्या कहा था और फिर तुमने वडा करते हुए क्या कहा था.?

मेरे ऐसा कहने पर रचना सोचने लगी. कुछ पल सोचने के बाद शायद उसे याद आ गया तो उसने हैरानी से मुझे देखा फिर बोली.

"हाँ तो मुझे क्या पता था की तुम ऐसी गन्दी बात के लिए मुझसे वडा ले रहे हो. Huh...gande कही के. वैसे तो बड़ा शरीफ बनते हो तुम और बाते इतनी गन्दी करते हो." रचना ने नीचे सर झुका कर कहा तो मैं है पड़ा.

"अब चलो चलते हैं यहाँ से. क्या साड़ी मुलाकात यही पर करनी है.?" मैंने ये कहा तो रचना ने मुस्कुराते हुए कहा.

"क्या pata..tumhara कोई भरोसा थोड़ी न है." रचना ने कहा तो मैं मुस्कुरा उठा.

उसके बाद मैं मोटर सिक्ले पर बैठा और स्टार्ट किया उसे. मोटर सिक्ले के स्टार्ट होते hi रचना पीछे बैठ गयी. उसके बैठते hi मैंने मोटर सिक्ले को आगे बढ़ा दिया. रास्ते में मैंने महसूस किया की रचना इस बार मुझसे थोड़ा फासले पर बैठी थी. मैं समझ गया की वो मेरी उस बात को सोच कर बैठी थी जब उसने मेरे पेट पर अपने हाथ कास लिए थे और मैंने मोटर सिक्ले कड़ी करके उससे वो सब कहा था.

"क्या hua...tum मुझसे इतना दूर क्यों बैठी हो दोस्त.? यार ठीक से बैठो na..kahi गिर जाओगी तो पन्गा हो जाना है." मैंने ऐसा कहा तो रचना ने कहा.

"न जी मैं यही पर ठीक हु. और हाँ मैं कोई पहली बार मोटर सिक्ले पर नहीं बैठी हु जो गिर जाओगी. मेरे भैया के पास भी मोटर सिक्ले है जिसमे मैं जाने कितनी बार बैठी हु." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"ठीक hai...magar पहले तो तुम मेरे से चिपक के बैठी थी न फिर अब क्यों ऐसे बैठी हो.?" मैंने मुस्कुराते हुए ये कहा तो रचना ने कहा.

"ऐसे न बैठु तो क्या करू.? कुछ लोग गलत सोच बैठते हैं मेरे उस तरह बैठने से." रचना ने साफ़ साफ़ तना मारा था. जिसे सुन कर मैं मुस्कुरा उठा फिर बोलै.

"अरे अब ऐसे लोगो को माफ़ भी कर दो दोस्त. कितना शर्मिंदा करोगी उसे.? उसने कहा तो है की ऐसा अब दुबारा नहीं होगा." मैंने ये कहा तो रचना मेरे करीब खिसक आयी और मुझसे सच में चिपक गयी फिर बोली.

"लो बैठ गयी फिर से मगर खबरदार विक्की तुम फिर से वैसा कुछ मत सोच लेना मेरे बारे में. तुम नहीं समझ सकते की उस वक्त मुझे कितना बुरा लगा था तुम्हारी उन बातो से." रचना ने ये कहा तो मैंने गंभीरता से कहा.

"अब दुबारा ऐसा कभी नहीं बोलूगा रचना और भरोसा करो अब मेरे मन में तुम्हारे लिए कोई शक नहीं है. बल्कि मुझे ख़ुशी हो रही है की तुम मेरी दोस्त हो. अगर तुम मुझे सबसे अच्छा समझती हो तो मैं भी अब से तुम्हे सबसे अच्छा समझने लगा हु." मैंने ऐसा कहा तो रचना ने कहा.

"क्या सच कह रहे हो विक्की.?" रचना ने पूछा तो मैंने उसकी तरफ सर करके कहा.

"क्या कोई शक है तुम्हे.?" मैंने ये कहा तो रचना बोल पड़ी.

"नहीं विक्की. मुझे कोई शक नहीं है. मुझे महसूस हो रहा है की तुम सच कह रहे हो." रचना ने कहा तो मैं मुस्कुरा उठा.

"विक्की... क्या मैं फिर से वैसे hi तुम्हे पेट से पकड़ सकती हु.?" थोड़ी देर बाद रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"इसमें पूछने की क्या ज़रूरत है. तुम्हे जो अच्छा लगे तुम करो." मैंने ये कहा तो रचना ने जल्दी से मेरे अगल बगल से अपने हाथ दाल कर फिर से वैसे hi मेरे पेट पर अपने हाथो को कास लिया जैसे इसके पहले कास के बैठ गयी थी.

रचना के दोनों हाथ मेरे पेट पर कैसे हुए थे और पीछे उसका जिसम मेरी पीठ से किसी जोंक की तरह चिपका हुआ था. उसके ठोस और सॉफ्ट सॉफ्ट बूब्स मेरी पीठ के थोड़ा नीचे बुरी तरफ धसे हुए फील हो रहे थे. मैं उसके बूब्स को साफ़ महसूस कर रहा था और मुझे इससे अच्छा भी लग रहा था.

"एक बात बताओ vicky...us वक्त तुमने वो गन्दी बात क्या सोच कर कही थी मुझसे.?" रचना ने मुझसे ये पूछा तो मैं कुछ बोल न सका. जब मैं कुछ न बोलै तो उसने कहा.

"बताओ न विक्की. ऐसा क्यों कहा था तुमने मुझसे.?" रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"मैंने तो बस तुम्हे हँसाने के लिए वैसा कहा था. अगर तुम्हे मेरी उस बात से बुरा लगा है तो मैं तुमसे माफ़ी मांगता हु." मैंने ऐसा कहा तो रचना मुझसे और ज़ोर से चिपक गयी फिर बोली.

"नहीं vicky...mujhe तुम्हारी उस बात से बिलकुल भी बुरा नहीं लगा मगर उस वक्त थोड़ा अजीब सा ज़रूर लगा था. पहले तो मैं समझ hi नहीं पायी थी की तुमने किसके बारे में वैसा कहा था फिर जब मुझे समझ आया तो मैं बहुत ज़्यादा शर्मा गयी थी. मुझे भरोसा नहीं हो रहा था की तुम ऐसा भी बोल सकते हो." रचना ने ये सब कहा तो मैंने कहा.

"मैं ऐसा किसी से भी नहीं बोल सकता था रचना. मैं तो बस तुमसे सीख रहा हु. जैसे तुम मुझसे कोई भी बात बेझिझक होक बोल लेती हो वैसे hi मैं भी कोशिश कर रहा हु की कोई भी बात बेझिझक होक बोल सकू. मैंने तुमसे उस बात को कहा मगर ये मैं hi जनता था की उस बात को कहने में मुझे कितनी हिम्मत जुटानी पड़ी थी. मैं ये भी जनता था की जो मैं तुमसे कहने वाला था वो गलत भी था और मुझे वो बात तुमसे नहीं कहनी चाहिए थी. मगर फिर कहा भी तो ये सोच कर की तुम तो मेरी दोस्त हो और दोस्त से ये सब मज़ाक में कहा भी जा सकता है." मैंने ये सब कहा तो रचना ने कहा.

"अच्छा तो तुम ये सब बेझिझक बोलने के लिए सीख रहे हो मुझसे.?" रचना ने कहा तो मैंने कहा.

"हाँ यही सच है." मैंने कहा तो रचना ने कहा.

"इसका मतलब तुम मुझे अपना गुरु भी मान रहे हो.?" रचना ने हस्ते हुए कहा तो मैंने भी हस्ते हुए कहा.

"हाँ गुरु जी." मैंने ये कहा तो रचना ज़ोर ज़ोर से हसने लगी. ऐसे hi बाते करते हुए हम दोनों गाढ़ी पहुंच गए. मोटर सिक्ले को एक जगह कड़ी करके मैं रचना के साथ फिर से नहर के पात पर बानी सीढ़ियों के पास आ गया. हम दोनों सीढ़ियों पर वैसे hi पानी में अपने अपने पेअर दाल कर बैठ गए जैसे कल बैठे थे.

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
भाई लोग....

फ्लैशबैक अब जल्द hi ख़तम होगा. लास्ट फ्लैशबैक अपडेट no. 26 तक hi है. उसके बाद हीरो गांव पहुंच जायेगा और स्टोरी प्रेजेंट में चलेगी....

भाई लोग मैं आपको पहले hi बता दू की स्टोरी में इसके बाद भी थोड़ा सा फ्लैशबैक है मगर वो थोड़ा सा hi है. सो जिन रीडर्स को फ्लैशबैक से प्रॉब्लम थी वो भी मेरी इस स्टोरी पर आये और अपने कमैंट्स दे.

यारा आप सब की हेल्प और सुग्गेस्टियन्स मेरे लिए इम्पोर्टेन्ट हैं. सो प्ल्ज़ अपना प्यार और सहयोद बनाये रखना....

Mr.Pandit....
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 25

फ्लैशबैक रनिंग....


"अच्छा तो तुम ये सब बेझिझक बोलने के लिए सीख रहे हो मुझसे.?" रचना ने कहा तो मैंने कहा.

"हाँ यही सच है." मैंने कहा तो रचना ने कहा.

"इसका मतलब तुम मुझे अपना गुरु भी मान रहे हो.?" रचना ने हस्ते हुए कहा तो मैंने भी हस्ते हुए कहा.

"हाँ गुरु जी." मैंने ये कहा तो रचना ज़ोर ज़ोर से हसने लगी. ऐसे hi बाते करते हुए हम दोनों गाढ़ी पहुंच गए. मोटर सिक्ले को एक जगह कड़ी करके मैं रचना के साथ फिर से नहर के पात पर बानी सीढ़ियों के पास आ गया. हम दोनों सीढ़ियों पर वैसे hi पानी में अपने अपने पेअर दाल कर बैठ गए जैसे कल बैठे थे.

अब आगे पढ़िए....


हम दोनों नहर के पानी में पेअर डेल बैठे थे. रचना मेरी तरफ बड़े ध्यान से देखे जा रही थी. एकदम से मुझे इस बात का अहसास हुआ तो मैंने उसकी तरफ देखा तो वो जल्दी से नहर के पानी की तरफ देखने लगी. मुझे बड़ा अजीब सा लगा की रचना अगर मुझे देख hi रही थी तो जब मैंने उसकी तरफ देखा तो उसने अपना चेहरा नहर के पानी की तरफ जल्दी से क्यों कर लिया था.? मैं उसकी तरफ ख़ामोशी से कुछ देर तक देखता रहा. उसके चेहरे पर जाने क्या सोच कर सुर्खी छ गयी थी.

"क्या hua...tum एकदम से चुप क्यों हो गयी रचना.?" मैंने पूछा तो उसने कहा.

"मैं सोच रही थी की कुछ दिनों में हमारी दोस्ती कितनी गहरी हो गयी है." रचना ने कहा तो मैंने कहा.

"हाँ तो इसमें क्या है. ये तो अच्छी बात है न. इसमें सोचने वाली कौन सी बात है.?" मैंने ये कहा तो रचना ने मेरी तरफ देखा और फिर बोली.

"अच्छी बात तो है hi विक्की. मगर सोचने वाली बात है न की हम दोनों घर में बहाना बना कर एक दूसरे से मिलने यहाँ आते हैं. अभी कल hi तो हम इसी जगह पर मिले थे और आज फिर से मिलने इसी जगह पर आ गए." रचना ने मुस्कुराते हुए ये कहा तो मैंने कहा.

"हाँ ये तो है मगर ये सब तुम्हारी वजह से hi तो हुआ है. मैं तो तुमसे कह भी रहा था की कल हम मिल चुके हैं तो इतना जल्दी फिर से मिलना ठीक नहीं होगा. मगर तुम hi नहीं मानी जिसका नतीजा ये हुआ की आज हम फिर से यहाँ हैं." मैंने ये कहा तो रचना खिलखिला कर हसने लगी.

"हाँ तो क्या हो गया विक्की.? तुम भी तो यही चाहते थे न की हम फिर से इसी जगह पर मिले. सारा इलज़ाम मुझ पर hi क्यों थोप रहे हो.?" रचना ने मुस्कुराते हुए ये कहा तो मैं भी मुस्कुरा उठा.

"अच्छा एक बताओ vicky...tumhe कैसी लड़की पसंद है और कैसी लड़की से शादी करना चाहोगे तुम.?" रचना ने मेरी तरफ ध्यान से देखते हुए पूछा तो मैंने कहा.

"तुम ये सब क्यों पूछ रही हो.?" मैंने भी उसे ध्यान से देखा तो उसने मुस्कुराते हुए कहा.

"बस ऐसे hi. मैं सोच रही हु की अपने दोस्त के लिए दुनिया की सबसे सुन्दर लड़की धुधु और फिर उससे उसकी शादी करू." रचना ने मुस्कुराते हुए ये कहा तो मैंने कहा.

"इसकी कोई ज़रूरत नहीं है. क्यों की मैं अपनी पसंद की लड़की से नहीं बल्कि पिता जी की पसंद की हुयी लड़की से शादी करुगा." मैंने ये कहा तो रचना ने हैरानी से मुझे देखा फिर बोली.

"तुम भी न कमाल करते हो यार. आज के युग में ऐसा कौन करता है.? मैंने सुना है की शहरो में लड़का लड़की अपनी पसंद से शादी करते हैं. फिर तुम क्यों नहीं.?" रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"मुझे शहर के लड़के लड़कियों से क्या मतलब.? मैं अपने माता पिता की पसंद से मतलब रखता हु. आखिर वो भी तो अपने बेटे के बारे में कुछ सोचे हुए होंगे. अब अगर मैं उनके खिलाफ जा के किसी लड़की से शादी कर लू तो उनके अरमानो का क्या.?" मैंने ये सब कहा तो रचना मुझे देखती रह गयी.

"फिर भी तुमने भी कुछ सोचा होगा. तुम्हारे अंदर भी तो कोई ख्वाहिश होगी. तुमने भी तो किसी ऐसी लड़की के बारे में सोचा होगा जिसमे तुम्हारी बीवी ban'ne की खूबी हो." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"मैं ये सब कभी नहीं सोचता. क्यों की सोचने को तो हम बहुत कुछ सोच लेते हैं मगर जब हमारी सोच वाली चीज़ नहीं होती तो दिमाग बहुत खराब होता है. इस लिए बेटर यही है की किसी बारे में सोचो hi नहीं." मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"हाँ ये भी सही कह रहे हो तुम. अच्छा छोडो इस बात को और अब तुम मुझसे पूछो की मैं कैसे लड़के से शादी करना चाहती हु.?" रचना ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"ठीक है बताओ तुम कैसे लड़के से शादी करना चाहोगी.?" मैंने कहा तो रचना मुस्कुरायी और फिर बोली.

"और तो ज़्यादा मुझे पता नहीं मगर हाँ मुझे तुम्हारे जैसे लड़के से hi शादी करना है." रचना ने ये कहा तो मैं हैरान रह गया.

"ये क्या कह रही हो तुम.?" मैंने हैरानी से उसे देखते हुए पूछा तो उसने हस्ते हुए कहा.

"क्यों दर गए क्या तुम.? हेहेहे चिंता मत karo...main तुमसे शादी नहीं करुँगी. तुम तो मेरे अच्छे वाले दोस्त हो यार. मगर हाँ मुझे ऐसे hi लड़के से शादी करनी है जिसमे तुम्हारे जैसी खुबिया हो." रचना ने कहा तो मैंने कहा.

"फिर तो तुम्हे ऐसा लड़का मिलने वाला नहीं है दोस्त. क्यों की ऐसा लड़का भगवन ने एक hi बनाया था जो की मैं हु. इस लिए अगर मेरे जैसे लड़के से शादी करने की इच्छा है तुम्हारी तो समझो बिना शादी के hi रहना पड़ेगा तुम्हे." मैंने मुस्कुराते हुए ये कहा तो रचना मुस्कुरायी फिर बोली.

"ज़्यादा न ऊधो तुम. मुझे पता है की दुनिया में तुमसे भी अच्छे लड़के होंगे. और अगर न भी होंगे तो मुझे फ़िक्र करने की कोई ज़रूरत नहीं है. क्यों की तब मैं अपने दोस्त को बोलूगी की चल बीटा तू hi ये क़ुरबानी दे दे मेरे लिए." रचना ये कहने के बाद ज़ोर ज़ोर से हसने लगी तो मैंने कहा.

"वाह क्या बात है. अपने hi दोस्त को बलि का बकरा बना डौगी तुम.? कैसी दोस्त हो यार.?" मैंने मासूम सी शकल बना के ये कहा तो रचना ने हस्ते हुए कहा.

"ाररी मैं मज़ाक कर रही थी विक्की. मैं तो ऐसा सोच भी नहीं सकती. मगर हाँ ये सच है की तुम्हारे जैसे लड़के से hi शादी करने की मेरी इच्छा है. अगर तुम मेरे दोस्त न होते तो मैं तुमसे शादी कर लेती. और अगर तुम मुझसे शादी करने के लिए राज़ी न होते तो ज़बरदस्ती तुमसे शादी कर लेती." रचना ने मुस्कुराते हुए ये सब कहा तो मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखते हुए कहा.

"ये तो अत्त्याचार है यार. अपनी ख़ुशी के लिए दूसरे की खुशियों का खून करना क्या अच्छी बात है.?" मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"सब कुछ जायज़ है दोस्त. खेर छोडो जाने दो. मुझे लगता है कही तुम ये न समझने लग जाओ की मैं तुम पर लट्टू हो गयी हु." रचना ने मुस्कुराते हुए ऐसा कहा तो मैंने कहा.

"नहीं यार मैं ये सब नहीं सोचता." मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"अब रहने दो तुम. ज़्यादा शरीफ न बनो. आज तुम्हारी शराफत भी देखि है मैंने." रचना ने ये कहा तो मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखते हुए कहा.

"क्या मतलब है तुम्हारा.?" मैंने ये कहा तो रचना पहले हसी फिर बोली.

"उस वक्त जब मैं तुम्हारे सीने से लिपटी हुयी थी तब तुमने मुझसे क्या बोलै था याद है या भूल गए.?" रचना ने ये कहा तो मुझे एकदम से वो बात याद आ गयी और फिर मैं कुछ बोल न सका. मैं दूसरी तरफ देखने लगा तो रचना ने कहा.

"अब ऐसे मुँह मत लटकाओ तुम. मुझे पता है तुमने वो सब गलत इरादे से नहीं बोलै था. मगर क्या मज़ाक में भी कोई किसी लड़की से सीधे वैसा बोल देता है.?" रचना मुझे छेड़ रही थी ये अब मैं अब समझ गया था. इस लिए अब मैंने भी उसके जैसे मूड में आने का सोच लिया और बोलै.

"अच्छा बताओ मैंने क्या बोलै था उस वक्त.?" मैंने ये कहा तो रचना हड़बड़ा गयी और हैरानी से मुझे देखने लगी.

"क्या हुआ अब बताओ भी की क्या बोलै था मैंने उस वक्त.? और हाँ ये भी बताना की किसके बारे में बोलै था मैंने वैसा.?" मैंने मुस्कुराते हुए ये सब कहा तो रचना की आँखे हैरानी से फ़ैल गयी और फिर बोली.

"मुझे क्या पता तुमने क्या बोलै था और किसके बारे में बोलै था.?" रचना ने इधर उधर देखते हुए ये कहा तो मैंने कहा.

"तो फिर ये कैसे कह दिया की मैंने उस वक्त क्या बोलै था तुम्हे.?" मैंने ये कहा तो रचना कुछ बोल न पायी. उसके चेहरे पर शर्म की सुर्खी छ गयी और उसके होठ कांपने लगे.

"अच्छा चलो मैं hi बताता हु की मैंने क्या बोलै था उस वक्त और किसके बारे में बोलै था.? हाँ तो मैंने उस वक्त ये बोलै था की मेरे..." मैं अभी बोल hi रहा था की तभी रचना ने मेरे मुँह पे अपनी हथेली रख दी.

"चुप करो तुम. ये क्या बोलने जा रहे थे विक्की. कुछ तो शर्म करो." रचना ने कांपते होठो से ये कहा तो मैं उसकी तरफ ध्यान से देखने लगा.

रचना का हाथ अभी भी मेरे मुँह पर था. उसकी कोमल हथेली मेरे होठो पर छू रही थी. उसके चेहरे पर लाज और शर्म छायी हुयी थी. इस वक्त वो बहुत hi प्यारी लग रही थी मुझे. मैं उसके चेहरे की सुंदरता में खोने लगा था मगर मैंने जल्दी hi अपने आप को सम्हाल लिया और अपने हाथ से उसके उस हाथ को पकड़ कर हटाया फिर बोलै.

"क्या हुआ अब.? तुम तो खुद hi मुझे इस बात को ले कर छेड़ रही थी न और जब मैंने शुरू किया तो मेरा मुँह hi बंद कर दिया तुमने. वाह जी वाह ये कहा का इन्साफ है यार.?" मैंने मुस्कुराते हुए ये कहा तो रचना बुरी तरफ शर्मा गयी फिर बोली.

"मुझे क्या पता था की तुम इस तरह एकदम से खुल कर उस बात को बोलने लगोगे." रचना ने नज़रे झुकाये हुए ये कहा तो मैंने कहा.

"तुम तो बेकार में दर गयी दोस्त. मैं वैसा कुछ बोलता hi नहीं. मैं तो बस तुम्हे छेड़ रहा था जैसे तुम छेड़ रही thi."maine ये कहा तो रचना ने मेरी तरफ देखा फिर कहा.

"तुम सच में बिगड़ते जा रहे हो विक्की." रचना ने मुस्कुराते हुए ये कहा तो मैंने कहा.

"अच्छा ji...main किस बात पर बिगड़ता जा रहा हु ये भी बताओ अब." मैंने पूछा तो रचना ने कहा.

"मुझे नहीं पता." रचना ने नज़रे झुका कर शरमाते हुए ये कहा तो मैंने भी मुस्कुराते हुए कहा.

"जब तुम्हे पता hi नहीं है तो फिर क्यों कह रही हो मुझे.?" मैंने कहा तो रचना ने मुस्कुराते हुए मेरी तरफ देखा फिर बोली.

"अब छोडो भी. एक hi बात के पीछे क्यों पद गए हो तुम.?" रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"मैं कहा पीछे पद गया हु.? बात तो तुमने hi शुरू की थी और अब तुम खुद hi नहीं बता रही की मैं किस बात पर बिगड़ता जा रहा हु.?" मैंने ये कहा तो रचना मेरी तरफ एकटक देखती रही फिर बोली.

"क्या तुम सच में सुन्ना चाहते हो विक्की.?" रचना ने मेरी तरफ देखते हुए hi काम्पटी आवाज़ में ये कहा तो मैंने कहा.

"हाँ अगर तुम्हारा दिल करे तो." मैंने धड़कते दिल से ये कहा तो रचना ने हैरानी से मुझे देखा फिर बोली.

"ये तुम क्या कह रहे हो विक्की. मैं नहीं कह पाओगी वो बात. मुझे तो सोच के hi बहुत शर्म आ रही है." रचना ने नज़रे झुका के ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए उसके कंधो पर हाथ रखा फिर बोलै.

"ारी मैं तो मज़ाक कर रहा था दोस्त. तुम सोच भी कैसे सकती हो की मैं तुम्हे किसी बात के लिए मजबूर करुगा.? तुम मेरी सच में बहुत अच्छी दोस्त हो. अब चलो ये सब बाते दिमाग से निकालो और बढ़िया सी स्माइल दिखाओ अपनी." मैंने ये कहा तो रचना ने मेरी तरफ देखा. कुछ देर देखने के बाद वो एकदम से मुझसे लिपट गयी. उसके lipat'te hi मैं हैरान हुआ फिर मुस्कुरा उठा.

"अच्छा suno....aaj कार्यालय में मुझे टच स्क्रीन वाला मोबाइल मिला है और इतना hi नहीं वह पर मुझसे कहा गया है की मैं एक लैपटॉप भी ले लू." मैंने ये कहा तो रचना ने मुझसे अलग हो के ख़ुशी से कहा.

"क्या सच कह रहे हो तुम.? और ये लैपटॉप क्या होता है.?" रचना ने कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"लैपटॉप एक कंप्यूटर होता है मगर ये ऐसा कंप्यूटर होता है जिसे हम जहा चाहे ले जा सकते हैं. अभी हम जब यहाँ से चलेंगे तो हम पहले मार्किट जायेगे. वह पर मैं लैपटॉप खरीदुंगा. उसके बाद hi हम घर चलेंगे." मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"ठीक है विक्की और हाँ मुझे भी तो कपडे लेने हैं. वो भी तुम्हारी पसंद के. तुम चलोगे न मेरे साथ.?" रचना ने ये कहा तो मैंने मुस्कुरा के कहा.

"बिलकुल चलुगा यार और अपनी पसंद के तुम्हारे लिए कपडे भी खरीदुंगा अपनी तरफ से." मैंने ये कहा तो रचना ने हैरानी से मुझे देखा फिर बोली.

"अपनी तरफ से क्यों.?" रचना ने पूछा तो मैंने कहा.

"बस ऐसे hi. जैसे तुम्हारी इच्छा है की तुम मेरी पसंद के कपडे खरीदो वैसे hi मेरी भी इच्छा है की मैं अपनी पसंद के खुद तुम्हारे लिए कपडे खरीदू. इसे तुम अपने लिए अपने दोस्त का तोहफा भी समझ सकती हो." मैंने मुस्कुराते हुए ये कहा तो रचना ख़ुशी से झूम उठी.

"ओह्ह विक्की तुम खुद मेरे लिए कपडे खरीदोगे और मुझे गिफ्ट करोगे. मैं बता नहीं सकती की तुम्हारी इस बात से मैं कितना खुश हो गयी हु. इस ख़ुशी में तुम मुझसे कुछ भी मांग सकते हो." रचना ने ख़ुशी से ये सब कहा तो मैंने कहा.

"अच्छा ji...aur अगर मैंने कुछ ऐसा वैसा तुमसे मांग लिया तो क्या तुम दे पाओगी.?" मैंने रचना की आँखों में ध्यान से देखते हुए मुस्कुरा कर ये कहा तो रचना ने कहा.

"हाँ क्यों nahi...mera दोस्त जो भी मागेगा मैं उसे ख़ुशी से दे दूगी." रचना ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"सोच लो fir...main कुछ भी मांग सकता हु तुमसे. बाद में देने से इंकार मत करना." मैंने ये कहा तो रचना ने मुस्कुराते हुए कहा.

"मणि शंकर की बेटी हु दोस्त. तुम्हारे कुछ भी मांगने पर इंकार नहीं करुँगी. अगर भरोसा न हो तो मांग कर देख लो." रचना ने इतने कॉन्फिडेंस से ये कहा तो मैं सोच में पद गया. क्या रचना सच में मेरे मांगने पर कुछ भी दे सकती है.?

"चलो जाने do...tumne कह दिया तो मैंने मान लिया." मैंने ये कहा तो रचना ने हैरानी से मुझे देखा फिर बोली.

"ारी ये क्या बात हुयी विक्की.? तुम मांगो na...bejhijhak मांगो दोस्त. मुझे भी ख़ुशी होगी की मेरे दोस्त ने मुझसे जो मांगा उसे मैंने ख़ुशी से दिया. इस लिए मांगो विक्की." रचना ने मेरी तरफ देखते हुए ये कहा तो मैंने कहा.

"अच्छा अगर तुम मेरी जगह होती तो मुझसे क्या मांगती.?" मैंने रचना की आँखों में देखते हुए ये कहा तो रचना ने मुस्कुराते हुए कहा.

"अगर मैं तुम्हारी जगह होती और जो मांगती तो तुम उसे दे नहीं पाते. ये मैं अच्छी तरह जानती हु." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"अच्छा ऐसा क्या मांगती तुम मुझसे जो मैं दे hi नहीं पता.?" मैंने ये पूछा तो रचना ने कुछ देर तक मेरी तरफ देखा फिर मुस्कुराते हुए बोली.

"क्या सच में बता दू.?" रचना ने मुस्कुराते हुए कहा तो मैंने कहा.

"हाँ बताओ na...isme पूछने वाली कौन सी बात है.?" मैंने कहा तो रचना ने कहा.

"Wo...wo..main तुमसे ये मांगती की मुझे तुम्हारे होठो पर किश करना है." रचना ने काम्पटी आवाज़ में ये कहा तो मैं बुरी तरह हैरान रह गया.

"Kyaaa....ye क्या कह रही हो तुम.?" मैंने हैरानी से ये कहा तो रचना ने कहा.

"देखा मैंने कहा था न की तुम मेरे मांगने पर वो मुझे नहीं दे पते." रचना ने मुस्कुराते हुए कहा.

"ारी मगर तुम भला ये क्यों मांगती यार.? ये तो गलत है न.? हम दोनों दोस्त हैं और हमारे बीच में ऐसा कैसे हो जायेगा.?" मैंने हैरानी से ये कहा तो रचना खिलखिला कर हसने लगी.

"ये तुमसे किसने कह दिया विक्की की दोस्तों के बीच ऐसा नहीं हो सकता.? अगर एक दोस्त अपने दोस्त से किसी चीज़ को मांगता है तो क्या उसके दोस्त को अपने दोस्त की वो मांग पूरी नहीं करनी चाहिए.?" रचना ने ये कहा तो मुझे समझ न आया की मैं उसे क्या जवाब दू.

"तुमने पूछा की यही क्यों मांगूगी तो इसका जवाब ये है की मैं भी ये देखना चाहुगी की ऐसा करने से कैसा महसूस होता है.? उस दिन जब हम लोग संकटमोचन मंदिर गए थे तो वह पर देख था न की वो प्रेमी जोड़ा कैसे एक दूसरे के होठो को किश कर रहे था." रचना ने ये सब कहा तो मैंने हैरानी से उसे देखते हुए कहा.

"हे bhagwan...tum भी हद करती हो रचना. ारी वो लोग प्रेमी जोड़े थे. जबकि हम दोनों बस दोस्त हैं. हमारे बीच ऐसा करना दोस्ती की मर्यादा के खिलाफ है." मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"हाँ मुझे पता है मगर एक बार ऐसा करने में क्या हो जायेगा. बस महसूस hi तो करना है की ऐसा करने से कैसा लगता है.?" रचना ने ये कहा तो मैं उसकी तरफ देखता रह गया. मुझे सच में समझ नहीं आ रहा था की मैं उससे क्या कहु.?

वैसे एक बात मैं भी महसूस कर रहा था की मुझे रचना के गुलाबी होठ बहुत प्यारे लग रहे थे और मेरे मन में ये इच्छा कई बार हुयी थी की मैं उसके होठो को चूम लू. मगर मैं रचना से ये कैसे कह सकता था और अब जब रचना खुद hi ऐसा करने की बात कह रही थी तो मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैं उसे इसके लिए हाँ कहु या नहीं. मैं सोचने लगा था की अगर मैं इसके लिए हाँ करुगा तो रचना मेरे बारे में क्या सोचेगी.?

"छोडो अगर तुम्हे ये गलत लगता है तो जाने दो विक्की. अब हमें यहाँ से चलना चाहिए. अभी हमें मार्किट में भी वक्त लगेगा." रचना ने ये कहा तो मैं एकदम से हड़बड़ा गया. मैंने उसकी तरफ देखते हुए कहा.

"ठीक है अगर तुम ऐसा सिर्फ महसूस करने के लिए करना चाहती हो ठीक है. मगर हम सिर्फ एक बार hi ऐसा करेंगे." मैंने ये कहा तो रचना ने मुस्कुराते हुए कहा.

"हाय haye...lagta है मेरे दोस्त का भी मन करने लगा है ऐसा करने का." रचना ने ये कहा तो मैं बुरी तरह झेंप गया.

"अब शर्मा क्यों रहे हो विक्की.? शर्माना तो मुझे चाहिए. क्यों की मैं एक लड़की हु. वैसे मुझे शर्म तो आ hi रही है ये सोच कर की हम दोनों एक दूसरे के होठो को चूमेगी." रचना ने ये कहा तो मैंने उसकी तरफ देखा. सच में उसका चेहरा लाज से सुर्ख पद गया था.

"मेरा दिल तो ये सोच कर hi ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा है यार. अब चलो करो जो करना है. हमें फिर यहाँ से जाना भी है न.?" मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"मैं कैसे करू विक्की.? मुझे तो पता hi नहीं है की ये कैसे करते हैं और मुझमे ऐसा करने की हिम्मत भी नहीं है. तुम hi करो na...main बस अपनी आँखे बंद कर लूँगी और फिर महसूस करुँगी की वैसा करने से कैसा लगता है.?" रचना ने ये कहा तो मैंने हैरानी से उसे देखते हुए कहा.

"ारी तो मुझे कौन सा ये सब करना आता है यार.? मैंने इसके पहले ऐसा कभी नहीं किया. दूसरी बात तुम तो जानती hi हो की मैं कितना झिझकता हु किसी भी बात के लिए. इस लिए तुम hi करो. मैं तो बस अपनी आँखे बंद कर लूँगा." मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"हे bhagwan....main ये कैसे कर पाओगी विक्की.? मेरे से ये नहीं hoga..tum करो न." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"फिर रहने दो yaar...agar हम दोनों से ये नहीं हो सकता तो फिर जाने दो." मैंने ये कहा तो रचना हड़बड़ा गयी. मेरी तरफ हैरानी से देखते हुए बोली.

"नहीं vicky...karo न. बस एक बार hi तो करना है." रचना ने कहा तो मैंने कहा.

"मुझे समझ में नहीं आ रहा की मैं कैसे करू.?" मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"वैसे hi करो जैसे उस दिन वो प्रेमी जोड़ा कर रहा था." रचना ने ये कहा तो मैंने उन दिन के बारे में याद किया फिर मैंने एकदम से शरारत से कहा.

"उस दिन तो वो लोग और भी कुछ कर रहे थे न.?" मैंने ये कहा तो रचना बुरी तरह शर्मा गयी फिर नज़रे झुका कर बोली.

"नहीं न vicky...aur कुछ मत करना. बस इतना hi करना है." रचना ने कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"अच्छा ठीक है. चलो फिर करते हैं." मैंने ये कहा तो रचना ने नज़र उठा कर मेरी तरफ देखा. उसके चेहरे पर घबराहट दिखने लगी.

"Hmmm...main अपनी आँखे बंद कर लेती हु." रचना ने काम्पटी आवाज़ में धीरे से ये कहा और फिर उसने अपनी आँखे बंद कर ली.

मैं देख रहा था की उसके चेहरे पर लाज और शर्म की सुर्खी छायी हुयी थी और घबराहट भी. उसके लाल सुर्ख होठ कांप रहे थे. उसकी आँखे बंद थी. इस वक्त मैं उसकी सुंदरता में खोता जा रहा था. उसके होठ मुझे आकर्षित कर रहे थे. अपनी तरफ बुला रहे थे और फिर मैं उनके बुलाने पर उनकी तरफ झुकता चला गया.

रचना के होठो के करीब झुक कर मैंने बहुत hi हलके से उसके होठो पर अपने होठो को रखा. मेरी आँखे अपने आप hi बंद हो गयी थी. उधर जैसे hi मेरे होठो पर रचना के कोमल और रसीले होठो का िस्पर्श हुआ तो हम दोनों के hi जिसम को जैसे बिजली का झटका लगा. हम दोनों के hi जिसम कांप कर रह गए. रचना चुप चाप आँखे बंद किये बैठी थी. पता नहीं मुझे क्या हुआ की मैंने अपने दोनों हाथो से रचना के सर को पकड़ा और फिर मैंने उसके रसीले होठो को अपने होठो के बीच दबा लिया. मेरे ऐसा करते hi रचना बुरी तरह कांपने लगी. मगर उसने मुझे रोकने की कोई भी कोशिश नहीं की.

रचना के रसीले और मीठे मीठे होठो को मैंने अपने होठो में दबा कर उन पर अपनी जीभ फिराई तो मुझे मेरे पुरे जिसम में एक अजीब सी झुरझुरी हुयी और एक मीठे से अहसास का सुखद अनुभव हुआ. मेरा दिल किया की मैं रचना के होठो को अपने मुँह में भर कर उन्हें ज़ोर ज़ोर से चूसो. मगर मैंने जल्द hi अपने दिल की इस इच्छा को दबा दिया और फिर रचना के होठो को अपने होठो से आज़ाद करके उससे अलग हो गया.

अलग होते hi मुझे ऐसा लगा जैसे मैं किसी और hi दुनिया से बाहर आ गया हु. मैंने रचना की तरफ देखा तो वो अभी भी आँखे बंद किये वैसे hi बैठी हुयी थी. मैं समझ गया की वो अभी भी किसी दूसरी दुनिया में खोयी हुयी है. उसे शायद इस बात का अहसास hi नहीं हुआ की मैंने उसके होठो को अपने होठो से आज़ाद कर दिया है और उससे दूर हो गया हु. उसका चेहरा लाल सुर्ख पद गया था और उसकी साँसे बढ़ी हुयी थी.

मैं रचना की इस हालत को देख कर मुस्कुराया और फिर उसे कंधे से पकड़ कर हिलाते हुए पुकारा. मेरे पुकारने पर hi उसे होश आया. उसने अपनी आँखे खोल कर मुझे देखा और फिर एकदम से शर्मा गयी. उसका सर नीचे की तरफ झुक गया. उसके कांपते होठो पर मुस्कान बिखरी हुयी थी. शर्म तो मुझे भी आ रही थी मगर इतनी नहीं जितनी रचना को आ रही थी.

"तो कैसा लगा तुम्हे.?" मैंने मुस्कुराते हुए रचना से ये पूछा तो वो कुछ न बोली और न hi उसने सर उठाया. मैं समझ गया की वो अभी भी शर्मा रही है और मुझसे नज़रे मिलाने की उसमे हिम्मत नहीं हो रही.

"क्या हुआ यार.? अब बताओ भी की कैसा लगा तुम्हे ये सब कर के.?" मैंने ज़ोर दे कर ये कहा तो उसने धीरे से मेरी तरफ देखा और फिर कांपते होठो से मुस्कुराते हुए कहा.

"पता नहीं." रचना ने ये कहा तो मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखा और फिर बोलै.

"पता नहीं...? ये क्या बोल रही हो तुम.?" मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"हाँ तो क्या बोलू मैं.?" रचना ने शरमाते हुए ये कहा और फिर से नीचे देखने लगी तो मैंने कहा.

"अगर तुम्हे पता नहीं है की कैसा लगा तो चलो फिर से करते हैं. आखिर पता तो चलना hi चाहिए तुम्हे की ऐसा करने से कैसा लगता है. तुम्ही तो कह रही थी न ये.?" मैंने मुस्कुराते हुए ये कहा तो रचना ने जल्दी से मेरी तरफ देखा और फिर मुस्कुराते हुए बोली.

"कोई ज़रूरत नहीं है फिर से करने ki..aur अब चलो यहाँ से." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"ये गलत बात है यार. तुम बताती क्यों नहीं की कैसा लगा तुम्हे.?" मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"अच्छा तो तुम्ही बताओ की तुम्हे कैसा लगा.?" रचना ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"मैं इसके बारे में क्या बताओ दोस्त. कसम से ऐसा अद्भुत अहसास इसके पहले कभी नहीं हुआ था. उस वक्त ऐसा लग रहा था जैसे मैं किसी दूसरी दुनिया में पहुंच गया हु. जहा पर सब कुछ बहुत सुन्दर था और बहुत मीठा भी. मुझे बहुत ानदण्ड सा महसूस हो रहा था." मैंने ये सब कहा तो रचना ने मुस्कुराते हुए कहा.

"अच्छा ji....aur क्या लग रहा था.?" रचना ने पूछा तो मैंने फिर से मुस्कुराते हुए कहा.

"और तुम्हारे होठ मुझे रसगुल्ले से भी ज़्यादा मीठे लग रहे थे. दिल कर रहा था की खा जाओ." मैंने ये कहा तो रचना बुरी तरह शर्मा गयी और बोली.

"Dhatt...ye क्या बोल रहे हो तुम.?" रचना ने शर्मा के ये कहा तो मैंने कहा.

"क्या तुम्हे भी ऐसा hi लग रहा था.?" मैंने मुस्कुराते हुए ये पूछा तो रचना ने मेरी तरफ देखा फिर हाँ में सर हिला दिया.

"तो अब तुम्हे ये भी समझ में आ गया होगा की उस दिन वो प्रेमी जोड़े ऐसा क्यों कर रहे थे और ऐसा करने से उन्हें कैसा लग रहा होगा.?" मैंने ये सब कहा तो रचना फिर से शर्मा गयी फिर धीरे से बोली.

"हाँ मगर वो लड़का तो कुछ और भी कर रहा था उस दिन." रचना ने ये कहा तो मैं हैरान रह गया इस बार. मेरी आँखों के सामने उस दिन का वो मंज़र आ गया जिसमे वो लड़का उस लड़की के बूब दबा रहा था. रचना ने उसी के बारे में कहा था अभी.

"अच्छा वो..? वो तो गलत कर रहा था. अब छोडो इन बातो को और चलो यहाँ से. अभी हमें मार्किट में सामान भी खरीदना है." मैंने सीढ़ी से उठते हुए ये कहा तो मेरे साथ साथ रचना भी उठ गयी.

उसके चेहरे पर अभी भी शर्म दिख रही थी. हम दोनों वह से चलते हुए ऊपर गाढ़ी के सामने आये जहा पर मेरी मोटर सिक्ले कड़ी थी. मैंने मोटर सिक्ले में बैठ कर उसे स्टार्ट किया तो रचना मेरे पीछे बैठ गयी. उसके बैठते hi मैंने मोटर सिक्ले को आगे बढ़ा दिया. रचना ने मुझे कंधे से पकड़ा हुआ था और उसका जिसम मेरी पीठ से छू रहा था. उसकी चूचिया साफ़ साफ़ मुझे महसूस हो रही थी.

गाढ़ी से चलने के बाद हम सरे रास्ते चुप hi रहे. हम दोनों को समझ hi नहीं आया था की क्या बाते करे. कुछ टाइम बाद हम मार्किट आ गए. मैंने एक मॉल के सामने मोटर सिक्ले रोकी तो रचना नीचे उतर गयी. उसके बाद हम दोनों मॉल के अंदर आ गए.

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
भाई लोग....

स्टोरी के अपडेट पर अपने इम्पोर्टेन्ट कमैंट्स ज़रूर करो. कमैंट्स करने में कुछ नहीं जायेगा किसी का. बाद में बोलने लगते हो की मैं ऐसा करता हु या वैसा करता हु....

भाई लोग आज का अपडेट फ्लैशबैक का लास्ट अपडेट होगा. मैं अपनी तरफ से फुल कोशिश कर रहा हु की स्टोरी सबको अच्छी लगे. आप लोग कोई सुग्गेस्टिव नहीं देते. यारा सुग्गेस्टिव की तो बात छोड़िये आप तो ढंग से कमेंट hi नहीं करते. मगर चलो कोई न....

नेक्स्ट अपडेट कुछ देर में पोस्ट करता हु मैं....
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 26

लास्ट फ्लैशबैक....


उसके चेहरे पर अभी भी शर्म दिख रही थी. हम दोनों वह से चलते हुए ऊपर गाढ़ी के सामने आये जहा पर मेरी मोटर सिक्ले कड़ी थी. मैंने मोटर सिक्ले में बैठ कर उसे स्टार्ट किया तो रचना मेरे पीछे बैठ गयी. उसके बैठते hi मैंने मोटर सिक्ले को आगे बढ़ा दिया. रचना ने मुझे कंधे से पकड़ा हुआ था और उसका जिसम मेरी पीठ से छू रहा था. उसकी चूचिया साफ़ साफ़ मुझे महसूस हो रही थी.

गाढ़ी से चलने के बाद हम सरे रास्ते चुप hi रहे. हम दोनों को समझ hi नहीं आया था की क्या बाते करे. कुछ टाइम बाद हम मार्किट आ गए. मैंने एक मॉल के सामने मोटर सिक्ले रोकी तो रचना नीचे उतर गयी. उसके बाद हम दोनों मॉल के अंदर आ गए.

अब आगे पढ़िए....


मॉल में मैंने रचना के लिए अपनी पसंद के कपडे खरीदे. वैसे तो मैंने इसके पहले कभी किसी लड़की के लिए कपडे नहीं ख़रीदे थे मगर आज जब मैंने रचना के लिए कपडे पसंद किये वो उसे वो कपडे बहुत पसंद आये. रचना मेरे हाथ से अपने लिए कपडे ले कर बहुत खुश थी. मुझे अपने लिए नहीं लेना था इस लिए रचना को कपडे खरीदने के बाद हम दोनों मॉल से बाहर आ गए. आते वक्त मुझे ऐसा लगा जैसे रचना कुछ सोच रही थी.

जब हम दोनों मॉल से बाहर आ गए तब भी मैंने देखा की रचना कुछ सोच रही है. मुझे ये देख कर अजीब लगा तो मैंने उससे पूछ hi लिया की वो किस सोच में डूबी हुयी है. मेरे पूछने पर उसने कहा की कुछ नहीं. मगर मुझे उसकी बात पर यकीन नहीं हुआ. इस लिए मैंने उससे ज़ोर दे कर पूछा तो उसने हिचकिचाते हुए बताया की उसे कुछ ऐसे कपडे भी लेना है जो लड़किया कपड़ो के अंदर पहनती हैं. उसकी इस बात से मैं समझ गया की वो ब्रा पैंटी की बात कर रही है शायद. मगर मुझसे वो साफ़ साफ़ नहीं कह सकती थी.

मैंने उसकी बात को समझते हुए कहा की ठीक है तुम ले लो मैं बाहर hi उसका इंतज़ार करता हु. मेरे कहने पर वो वापस मॉल के अंदर उसी दुकान पर चली गयी. कुछ टाइम बाद जब वो वापस आयी तो उसके हाथ में सिर्फ वही थैला था जिस थैले में मैंने उसे अपने से ख़रीदे हुए कपडे दिए थे. जब वो मेरे पास आ गयी तो मैंने उससे पूछा की जो तुमने लेना था वो नहीं लिया क्या तो उसने मुस्कुराते हुए बताया की उसने ले लिया है और वो चीज़े इसी थैले में हैं.

उसके बाद हम दोनों वह से चले तो मैंने सीधा ऐसी दूकान पर आ कर मोटर सिक्ले रोकी जहा पर मुझे अपने लिए एक लैपटॉप खरीदना था. दुकान के अंदर आ कर मैंने डैल का एक अच्छा सा लैपटॉप ख़रीदा. इस दुकान पर मुझे काफी टाइम लगा. दुकान वाला लैपटॉप में पता नहीं क्या कर रहा था. उसके बाद मैं और रचना वह से बाहर आ गए. रचना ने जब अपनी आँखों से लैपटॉप देखा तो वो खुश हो गयी थी.

सामान लेने के बाद मैंने सोचा की किसी अच्छे से होटल में जा कर मुझे रचना को कुछ खिलाना पिलाना चाहिए तो मैं सीधा एक होटल में आ गया. होटल देख कर रचना मुझसे कहने लगी की हम होटल किस लिए आये हैं तो मैंने उसे बताया की भूख लगी है. इस लिए कुछ खा पि लेते हैं उसके बाद गांव चलेंगे.

होटल में हम दोनों ने थोड़ा बहुत खाया पिया और उसके बाद गांव की तरफ चल दिए. इस बार सामान साथ में था तो रचना मुझसे चिपक नहीं प् रही थी. एक थैले में रचना के कपडे थे और एक बैग में मेरा लैपटॉप था. लैपटॉप वाले बैग को रचना ने अपनी पीठ पर टांग लिया था और कपड़ो के थैले को हाथ में पकड़ा हुआ था.

शहर से जब हम काफी आगे निकल आये तो एक जगह रचना ने मुझे मोटर सिक्ले रोकने को कहा तो मैंने रोक दिया. मुझे समझ न आया की रचना ने मोटर सिक्ले क्यों रुकवाई है. मोटर सिक्ले के रुकते hi रचना नीचे उतर गयी और फिर मुझसे बोली की मैं उसका थैला मोटर सिक्ले के हैंडिल में टांग लू या उसे कही पर बाढ़ दू. कपड़ो का थैला ज़्यादा बड़ा और वजनी नहीं था इस लिए मैंने उसे मोटर सिक्ले के हैंडिल में hi टांग लिया. अब रचना के हाथ खाली हो गए थे तो वो ख़ुशी ख़ुशी पीछे बैठ गयी.

रचना के बैठते hi मैंने मोटर सिक्ले को आगे बढ़ा दिया. इस बार रचना मुझसे चिपक के बैठ गयी. तब मुझे समझ आया की क्यों उसने मोटर सिक्ले को रुकवाया था. हम दोनों सारे रास्ते हसी मज़ाक करते हुए आये थे. हमारी बाते ज़्यादातर इसी बात पर हो रही थी जो हमने एक दूसरे के होठो को चूमा था.

जब हम गांव के बस स्टैंड पहुंचे तो देखा की शहर से जो बस गांव आती थी वो आ चुकी थी और उसमे से यात्री बाहर उतर रहे थे. मैंने मोटर सिक्ले को स्टैंड से कुछ पहले hi रोक दिया. तो रचना उतर गयी. जाते वक्त वो बहुत खुश दिख रही थी और कल रुपेश के जनम दिन पर आने का कह कर चली गयी. उसने मेरा लैपटॉप वाला बैग मुझे दे दिया था जिसे मैंने अपनी पीठ पर टांग लिया था.

उसके बाद मैं सीधा घर आ गया. घर आ कर मैंने मोटर सिक्ले को अंदर बैठक के पास कड़ी किया और अंदर आ गया. अंदर माँ बैठी कोई काम कर रही थी. उनके साथ कुसुम दीदी भी थी. मुझे देखते hi माँ ने मुझसे सारा हाल चाल पूछा फिर जा के आराम करने को कहा तो मैं अपने कमरे में आ गया.

रात में जब खाना पीना करने का वक्त हुआ तो पूजा मेरे कमरे में मुझे बुलाने आयी तो मैं उठ कर नीचे की तरफ चल दिया. आँगन में मैंने हाथ मुँह धोया और अंदर उस जगह आ गया जहा पर हम सब बैठ कर खाना कहते थे. खाना कहते वक्त पिता जी ने मुझसे मेरे सामान के बारे में पूछा तो मैंने उन्हें बता दिया और पेंट की पॉकेट से उनका एटीएम कार्ड निकल कर उन्हें दे दिया. पिता जी ने मुझे बताया की सरपंच काका आज शाम को घर आये थे और उन्होंने उन्हें कल अपने बेटे रुपेश के जनम दिन पर आने का न्योता भी दिया है. मैंने देखा की पिता जी के चेहरे पर इस वक्त ख़ुशी दिख रही थी.

खाना पीना करने के बाद मैं अपने कमरे में आ गया और थोड़ी देर आराम करने के बाद मैंने लैपटॉप वाला बैग खोला. जब मैं शहर में रह कर पढ़ाई करता था तो पिता जी ने मेरे कहने पर कंप्यूटर का कोर्स भी करवाया था. आज कंप्यूटर की पढ़ाई मेरे काम आ गयी थी. मैंने ख़ुशी ख़ुशी लैपटॉप को खोला और उसमे मौजूद फंक्शन्स को देखने समझने लगा. कार्यालय से आज मुझे कुछ चीज़े भी मिली थी. दो दिन बाद मुझे फिर से शहर बुलाया गया था.

मैं काफी देर लैपटॉप में खोया रहा और कुछ न कुछ उसमे काम भी करता रहा. मुझे जो मोबाइल मिला था उसको भी मैं देख रहा था. उसमे कुछ ज़रूरी चीज़े पहले से फीड की हुयी थी. इन सब कामो में मुझे पता hi नहीं चला की कितना वक्त गुज़र गया. पता तो तब चला जब मेरे कमरे का दरवाजा खटखटाया किसी ने.

मैंने दरवाजा खोला तो देखा की मेरी दोनों जुड़वाँ बहने होठो पर मुस्कान सजाये कड़ी थी. दरवाजा खुलते hi दोनों कमरे में आ गयी और सीधा बीएड पर चढ़ कर बैठ गयी. बीएड पर रखे लैपटॉप को अजीब तरह से देखने लगी थी. मैंने दरवाजा बंद किया और बीएड पर आ गया. दोनों मुझसे लैपटॉप के बारे में पूछने लगी. फिर जब उन दोनों ने स्क्रीन टच मोबाइल देखा तो दोनों हैरानी से मुझे देखने लगी.

"भाई ये सब क्या है.? हम दोनों तो एक hi मोबाइल वो भी बटन वाला चला रही हैं और tum...wah भाई वह. तुम्हारे तो मज़े हो गए भाई. अब कल हम भी पिता जी से कहेगे की हमारे साथ इतना बड़ा अन्याय क्यों.?" पूजा ने बुरा सा मुँह बनाते हुए ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"ारी पागल ये मोबाइल तो मुझे शहर में मेरे शाहब ने दिया है न की मैंने इसे ख़रीदा है. हाँ ये लैपटॉप ज़रूर ख़रीदा है मैंने. क्यों की मुझे काम में इसकी ज़रूरत है. मैंने पिता जी को बताया तो उन्होंने बोल दिया की ले लो तो ले लिया." मैंने ये सब कहा तो वो दोनों मुझे अजीब तरह से देखती रही. फिर पूजा ने मेरे उस नए मोबाइल को उठा कर कहा.

"कुछ भी कहो bhai...ab तो ये मोबाइल मेरा hi रहेगा चाहे कुछ भी हो जाये." पूजा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"ठीक है तुम hi ले लो मगर जब मुझे इसकी ज़रूरत होगी तब मैं क्या करुगा.? इसमें मेरे शाहब लोगो के फ़ोन आएंगे तब मैं क्या करुगा.?" मैंने ये कहा तो प्रिय ने कहा.

"हाँ ये तो ठीक कहा तुमने. मगर हमारा क्या भाई.? हमें भी ऐसा मोबाइल चाहिए." प्रिय ने ये कहा तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा.

"फ़िक्र मत करो. अब तो मेरी नौकरी लग गयी है न. इस लिए जब मुझे पैसा मिलेगा तब मैं खुद तुम्हारे लिए एक ऐसा hi मोबाइल खरीद कर दे दुगा. अब खुश.?" मैंने ये कहा तो दोनों के चेहरों पर ख़ुशी के भाव आ गए.

दोनों बहुत ज़्यादा खुश हो गयी थी. शायद यही वजह थी की ख़ुशी के मरे दोनों मुझसे लिपट गयी थी. मैं उनकी इस ख़ुशी को समझ सकता था मगर जब दोनों मुझसे कास के लिपट गयी तो मुझे एकदम से कुछ महसूस हुआ. मेरी दोनों बाजुओं में उन दोनों के सीने के उभार दबे हुए महसूस हुए. मुझे ये बहुत अजीब लगा. मेरे जिसम में झुरझुरी होने लगी. वो दोनों मेरी बहने थी और आज कल मेरे मन में रचना की वजह से उलटे सीधे ख़याल आने लगे थे. इस लिए मैंने जल्दी से उन्हें अलग किया और बोलै.

"अब चलो सो जाओ. रात ज़्यादा हो गयी है. मैं भी आज बहुत थक गया हु. इस लिए अब मैं सिर्फ सोना चाहता हु." मैंने ये कहा तो दोनों ने हाँ में सर हिलाया और बीएड पर लेट गयी.

उन दोनों के लेटने के बाद मैंने लैपटॉप को शटडाउन किया और फिर उसे बैग में दाल कर कमरे में रखे एक छोटे से स्टूल में रख दिया. मैं अभी तक दिन वाले कपड़ो में hi था. इस लिए उन्हें उतर कर मैंने एक लोअर पहन लिया. उसके बाद दोनों के बीच में आ कर लेट गया और अपनी आँखे बंद कर ली.

मेरी बंद आँखों में आज का सारा मंज़र दिखने लगा. आज का दिन पिछले हर दिन से बहुत ज़्यादा अलग था. आज वो हुआ था जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी. बातो hi बातो में मैंने और रचना ने एक दूसरे के होठो को चूमा था. होठो के चूमने वाला वो मंज़र सामने आते hi मेरे जिसम में हलचल सी होने लगी. मेरी बंद आँखों में जैसे कोई फिल्म चल रही थी वो भी फुल हद में. वो रचना का बात बात पर बुरी तरह शर्मा जाना. उसके सुन्दर चेहरे पर शर्म से भरी हुयी लाली. उसके रसीले होठो का कांपना. सब कुछ दिख रहा था मुझे और सबसे बड़ी बात जो मुझे आसमान में उड़ाए लिए जा रही थी वो ये थी जब मैंने और रचना ने एक दूसरे के होठो को छू लिया था.

मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे एकदम से मेरे होठो पर रचना के होठ आ गए हो. मुझे याद आया की कैसे मैंने रचना के उन रसीले होठो को अपने होठो में दबा लिया था और कैसे रचना उस वक्त एकदम से कांपने लगी थी. उस वक्त उसके होठो का स्वाद मुझे बहुत ज़्यादा मीठा लगा था.

आँखे बंद किये मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं आसमान में उदा जा रहा हु. मेरा दिल कर रहा था की एक बार फिर से रचना मेरे सामने आ जाये और मैं उसके उन रसीले होठो को इस बार जी भर के चूमू और उन्हें चूसो. रचना के रसीले होठो की पूरी शराब पि जाओ और मुझ पर उसके होठो की शराब का नशा चढ़ जाये.

तभी मुझे किसी बात का आभास हुआ तो मैंने जल्दी से अपनी आँखे खोल दी. आँखे खोली तो मैंने देखा की मेरी दोनों बहने मेरे चेहरे के पास झुकी हुयी हैं. ये देख कर मैं एकदम से हैरान रह गया. उधर जैसे hi मेरी आँखे खुली तो दोनों ने अपना अपना चेहरा ऊपर उठा लिया.

"क्या हुआ तुम दोनों ये क्या देख रही थी इस तरह.? तुम दोनों सोई नहीं अभी तक.?" मैंने ये पूछा तो दोनों ने पहले एक दूसरे को देखा फिर प्रिय बोली.

"भाई अभी तुम किस बात पर इतना मुस्कुरा रहे the...aur अजीब सी आवाज़ भी मुँह से निकाल रहे थे. हम दोनों अभी जाग hi रही थी और जब हमें अजीब सी आवाज़ सुनाई दी तो हमने आँखे खोल कर तुम्हारी तरफ देखा तो हैरान हो गए. भाई सच सच बताओ न क्या बात है.?" प्रिय ने ये सब कहा तो मैं बुरी तरह बौखला गया.

"नहीं to...aisi तो कोई बात hi नहीं है." मैंने ये कहा तो पूजा ने कहा.

"झूठ मत बोलो भाई. ज़रूर कोई बात है जो तुम छुपा रहे हो. कही तुम कोई सपना तो नहीं देख रहे थे.? अगर ऐसा है तो हमें भी बताओ न भाई अपने सपने के बारे में." पूजा ने ये कहा तो मैं कुछ न बोल सका. भला मैं उन्हें क्या बताता की मैं बंद आँखों के अंदर क्या देख रहा था और किस वजह से मुझसे अनजाने में ये सब हो गया था.?

"बताओ न भाई चुप क्यों हो.?" पूजा ने फिर कहा तो मैंने कहा.

"ारी यार ऐसी कोई बात नहीं है. मुझे खुद कुछ पता नहीं की मैं सोते वक्त क्या कर रहा था. चलो अब सो जाओ और मुझे भी सोने दो." मैंने ये कहा और अपनी आँखे बंद कर ली.

मेरे ऐसा कहने पर दोनों ने पहले बुरा सा मुँह बनाया फिर दोनों लेट गयी. मैं आँखे बंद किये सोचने लगा की ये सब क्या हो गया था.? मुझे खुद पर हसी भी आ रही थी मगर मैंने अपनी हसी को दबा लिया. मैंने महसूस किया की दोनों मुझसे अलग हो के लेती हुयी थी. इसके पहले दोनों hi मुझसे चिपकी हुयी थी. इसकी वजह शायद ये थी की उनके पूछने पर मैंने कुछ नहीं बताया था और मेरे न बताने से वो दोनों मुझसे नाराज़ हो गयी थी. मैं इस बात से मन hi मन मुस्कुराया और फिर सोने की कोशिश करने लगा.

अभी मैं सोने की कोशिश hi कर रहा था की तभी मेरे मोबाइल पर मैसेज टोन सुनाई दी मुझे. मैसेज टोन को सुन कर मेरे मन में बस एक hi बात आयी की ये मैसेज ज़रूर hi रचना का होगा. मगर अब मेरे पास प्रॉब्लम ये थी की मैं मोबाइल को देख नहीं सकता था. क्यों की मेरी दोनों बहने अभी भी जाग रही होंगी ये मैं जनता था.

काफी देर तक मैं यु hi आँख बंद किये लेता रहा. फिर जब मैंने महसूस किया दोनों सो गयी हैं तो मैं धीरे से उठा और बीएड से नीचे उतर कर दिवार पर टंगे पेंट की पॉकेट से मोबाइल निकाल कर वापस बीएड पर आ कर धीरे से hi लेट गया.

मैंने मोबाइल को खोल कर देखा तो मेरा अंदाज़ा सही निकला. मैसेज रचना का hi था. मैंने मैसेज को ओपन करके देखा तो उसमे रचना ने लिखा था की सो गए क्या दोस्त. मैंने उसके मैसेज को पढ़ कर रिप्लाई किया की अभी नहीं.

मैंने जल्दी से मैसेज टोन को बिलकुल hi बंद कर दिया था. जिससे कोई आवाज़ न हो. तभी रचना का मैसेज फिर आया की क्यों नींद नहीं आ रही क्या. मैंने उसका ये मैसेज पढ़ा तो मुस्कुरा उठा. फिर मैंने जवाब में लिखा कैसे आएगी यार. मैं जैसे HI आँखे बंद करता हु तो वही सब दिखने लगता है जो आज हमारे बीच हुआ है.

मेरे इस मसाज का जवाब कुछ देर बाद आया. रचना ने लिखा था की अच्छा जी वैसे क्या दिखने लगता है तुम्हे. रचना के इस मैसेज को पाह कर मैं फिर मुस्कुराया. मैं समझ गया की रचना को ये बाते अच्छी लग रही थी और वो जान बूझ कर मुझसे ये सब पूछ रही थी.

मैंने उसके जवाब में लिखा कुछ मत पूछो यार. मैं बता नहीं सकता. मेरे इस मैसेज के जवाब में रचना का जल्दी hi मैसेज आया. उसने लिखा क्यों नहीं बता सकते.? मैं उसके इस मैसेज को पढ़ कर मुस्कुराया और लिखा. तुमको सब पता तो है फिर क्या बताना.?

मेरे इस मैसेज के बाद रचना का रिप्लाई आया हाँ तो क्या हुआ. तुम फिर से बता दो न. रचना के इस मैसेज को पढ़ कर मैंने लिखा क्या क्या बता दू.? मेरे इस मैसेज के बाद रचना ने रिप्लाई में लिखा जो जो तुम्हारी आखो में बार बार दीखता हो.

रचना मुझसे खुल कर जानना चाहती थी की मेरी बंद आँखों में बार बार क्या क्या दिख रहा था. उसके पूछने पर मैंने लिखा तुम्हारे रसगुल्ले जैसे मीठे होठो का स्वाद मुझे अभी भी अपने होठो पर महसूस हो रहा है.

मैंने खुल के ये मैसेज भेजा तो इस बार थोड़ी देर में रचना का मैसेज आया. उसने लिखा था हाय विक्की ये तुम क्या बोल रहे हो. ऐसा मत बोलो मुझे बहुत शर्म आ रही है. रचना के इस मैसेज को पढ़ कर मैं मुस्कुरा उठा फिर मैंने लिखा ारी अब क्यों शर्मा रही हो यार. इस वक्त तो मैं तुम्हारे पास भी नहीं हु.

मेरे इस मैसेज के बाद रचना ने रिप्लाई किया हाँ तो क्या हुआ मुझे तब भी शर्म आ रही है. उसके इस मैसेज के बाद मैंने लिखा चलो CHHODO...AUR अब सो जाओ. रात बहुत हो गयी है. मेरे इस मैसेज के बाद रचना का जवाब आया की कैसे सो जाओ विक्की. मेरा भी वही हाल है जो तुम्हारा है. मैं भी जब आँखे बंद करती हु तो वही सब दिखने लगता है. हाय विक्की ऐसा क्यों हो रहा है.

मैं रचना के इस मैसेज को पढ़ कर मुस्कुरा उठा. मुझे उससे इस तरह बात करने में बड़ा मज़ा आ रहा था और मैं चाहता था की हम दोनों इसी तरह बाते करते रहे. मैंने रचना के इस मैसेज के जवाब में लिखा मुझे क्या पता की ऐसा क्यों हो रहा है. मगर जो भी हो रहा है वो अच्छा लग रहा है. मेरा तो दिल कर रहा है की मैं फिर से उन रसगुल्लों का स्वाद चाखू. उफ्फ्फ कितने मीठे थे वो.

मैंने ये मैसेज भेजा तो रचना का थोड़ी देर बाद जवाब आया ये तुम क्या कह रहे हो विक्की. मत बोलो न ऐसा. मुझे सच में बहुत शर्म आ रही है. मैं तो यही सोच सोच के हैरान हु की उस वक्त मैंने वो सब कैसे कर लिया था.

रचना के इस मैसेज पर मैं फिर मुस्कुराया और लिखा चलो अब ज़्यादा मत सोचो और सो जाओ. मेरे इस मैसेज पर रचना ने थोड़ी देर में रिप्लाई किया क्या सच में तुम फिर से वही सब करना चाहते हो विक्की. रचना के इस मैसेज को पढ़ कर मैंने लिखा दिल तो कर रहा है यार मगर ये सही नहीं होगा.

मेरे इस मैसेज पर रचना का जवाब आया क्यों सही नहीं होगा विक्की. मैंने रचना के इस मैसेज को पढ़ा तो मुझे समझ न आया की उसे क्या जवाब दू. मुझे लगने लगा था की हमारी बाते दोस्ती वाले रिश्ते से बाहर जा रही हैं. कही ऐसा न हो की इन बातो का असर ऐसा हो जाये की हम कुछ गलत करने लग जाये.

मैंने यही सब सोचते हुए मैसेज में लिखा क्यों की हम दोनों दोस्त हैं रचना और ये सब फिर से करना गलत HI होगा. चलो अब सो जाओ गुड नाईट. मैंने ये मैसेज भेजा तो इस बार फिर थोड़ी देर में रचना का जवाब आया. उसने लिखा था हाँ तुम सही कह रहे हो विक्की. अच्छा कल तुम मेरे घर कब तक आओगे? याद है न कल रुपेश भैया का जनम दिन है.?

रचना के इस मैसेज को पढ़ कर मैंने बताया की मुझे याद है और मैं दोपहर तक आ जाउगा. उसके बाद हमने एक दूसरे को गुड नाईट किया. मैं काफी देर तक हमारे बीच हुयी बातो के बारे में सोचता रहा. उसके बाद मैंने अपने मोबाइल से हमारे सरे मेस्सगेस को डिलीट किया फिर आराम से लेट कर आँखे बंद कर ली. पता नहीं कब मुझे नींद आ गयी.

सुबह चार बजे मेरी नींद खुल गयी तो मैंने अपनी दोनों जुड़वाँ बहनो को जगाया. दोनों जब जाग कर उठी तो दोनों एक दूसरे को देख कर पहले मुस्कुरायी फिर एकदम से दोनों ने एक साथ मेरे दोनों गालो पर चूम लिया. उसके बाद मुझे गुड मॉर्निंग बोलै और ये भी कहा की अब मैं भी उन दोनों को ऐसे hi गालो पर चूम कर गुड मॉर्निंग बोलू. उनकी इस बात पर मैं मुस्कुराया और फिर दोनों के गालो को चूम कर उन्हें गुड मॉर्निंग बोलै.

दोनों ख़ुशी ख़ुशी मेरे कमरे से चली गयी. उनके जाने के कुछ देर बाद मैं भी नीचे बाथरूम की तरफ चला गया और फिर फ्रेश होने के बाद मैं वापस अपने कमरे में आ गया. बीएड के सिरहाने पर रखे मोबाइल पर मेरी नज़र पड़ी तो मैंने उसे उठाया और उसकी स्क्रीन जला कर देखा तो उसमे एक मैसेज पड़ा था. मैंने मोबाइल का लॉक खोल कर उस मैसेज को ओपन किया तो पता चला की रचना ने मुझे पांच मिनट पहले गुड मॉर्निंग मैसेज भेजा था.

मैं इस वक्त रचना का मैसेज देख हैरान रह गया. इस वक्त 4:40 का वक्त था और रचना इतनी सुबह जाग गयी थी. मैं कुछ देर तक रचना के बारे में सोचता रहा और फिर मैंने भी रिप्लाई में उसे गुड मॉर्निंग लिख के भेज दिया.

सुबह नास्ता करने के बाद मैंने कमरे से अपना मोबाइल और लैपटॉप लिया और गांव की तरफ मोटर सिक्ले से निकल गया. माँ और पिता जी ने बताया था की गांव के कुछ लोग मुझसे मिलने के लिए आये थे. उन्हें मुझसे अपना कोई काम करवाना था. जो जो लोग मेरे घर आये थे मैं उनके घर गया और उनके जो ज़रूरी कागजातों वाले काम थे उन्हें किया. इस काम में मुझे काफी टाइम लग गया. तभी मेरे मोबाइल पर रुपेश का कॉल आया. वो मुझे ढूंढ रहा था. मैंने उसे बताया की मैं गांव के लोगो का काम कर रहा हु. उसने बोलै की दोपहर से पहले उसके घर आ जाओ.

दोपहर को मैं सरपंच काका के घर पंहुचा तो देखा की काफी रंगा रंग था वह. गांव का सभी ब्राह्मण समाज जमा हुआ था वह. मेरे पिता जी भी थे जो सबके बीच बैठे बाते कर रहे थे. ये देख कर मुझे बहुत ख़ुशी हुयी. आखिर इसी बहाने सही ब्राह्मण समाज के बीच आज मेरे पिता जी भी थे वर्ण इसके पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था. ख़ास मौको पर कभी ये ब्राह्मण समाज हमारे घर वालो को नहीं बुलाता था.

पूजा वगैरा होने के बाद हम सबने एक साथ बैठ कर खाना खाया और फिर सब अपने अपने घरो को चल दिए. मेरे पास रुपेश आया और बोलै की यार आज उसका जनम दिन है तो कुछ तो ख़ास होना hi चाहिए. मैंने पूछा क्या तो उसने कहा की आज उसने मेरे लिए दूसरे गांव की एक मस्त लड़की को बुलाया है और रुपेश चाहता है वो और मैं दोनों उस लड़की के साथ मज़ा करे. रुपेश की ये बात सुन कर मैंने साफ़ इंकार कर दिया तो वो मुझसे नाराज़ हो गया. मैंने उसे समझाया की भाई मैं ये सब नहीं करता उसे करना है तो करे.

मेरे मन कर देने पर रुपेश चला गया. मैं जब से रुपेश के घर आया था तब से अब तक में रचना मुझे कई बार दिखी थी और उसने मुझे ऊपर की तरफ आने का इशारा भी किया था मगर इतने सरे लोगो के सामने मैं वह जाने से दर रहा था. मैं डरता था की कही कोई पन्गा न हो जाये. जब मैं न गया तो रचना का कॉल आया मुझे. मैंने उसका कॉल उठाया तो उसने साफ़ साफ़ कहा की अगर मैं उसके बुलाने पर उसके पास नहीं गया तो वो मुझसे कभी बात नहीं करेगी.

रचना की इस बात से मैं बेबस सा हो गया. मैंने आस पास सबकी तरफ देखा. कुछ लोग तो खा पि कर जा चुके थे मगर अभी भी काफी सरे थे यहाँ. सरपंच मणि शंकर का घर बहुत बड़ा था. मकान पक्का hi था जो दो मंजिल का था. ऊपर की मंजिल पर जाने के लिए अंदर से hi सीढिया थी. मैं किसी तरह सबकी नज़रो से खुद को बचता हुआ ऊपर पंहुचा और रचना के कमरे में आ गया जहा वो मेरे आने का वेट कर रही थी.

मैं जैसे hi कमरे में आया तो रचना ने जल्दी से दरवाजा बंद किया और फिर दौड़ कर आयी और मेरे सीने से कास के लिपट गयी. मैं उसके इस तरह लिपट जाने से बुरी तरह हैरान भी हुआ और घबरा भी गया. मैंने जल्दी से रचना को खुद से अलग किया तो रचना ने पूछा की क्या हुआ तो मैंने कहा की ये तुम क्या कर रही हो. किसी ने अगर देख लिया तो बड़ा भरी हंगामा हो जायेगा. तो रचना ने कहा की कुछ नहीं होगा और फिर से वो मुझसे उसी तरह लिपट गयी.

रचना को ज़रा भी दर नहीं था मगर मेरी हालत खराब थी. इस वक्त कोई भी अगर देख ले तो यही समझे की मैं रचना के साथ उसके कमरे में किस लिए हु. मैं किसी को अपने बेगुनाह होने का सबूत नहीं दे पाउगा. यही सब बाते थी जो मुझे डरा रही थी और किसी और बारे में सोचने नहीं दे रही थी. जबकि मेरे सीने से लगी रचना की ठोस और कोमल चूचिया मुझे महसूस होनी चाहिए थी मगर मुझे ऐसा कुछ भी नहीं महसूस हो रहा था.

"ओह्ह विक्की तुम क्यों नहीं आ रहे थे मेरे पास.? मेरा कितना दिल कर रहा था तुम्हारे सीने से इस तरह लिपटने का. क्या तुम्हे मेरी ज़रा भी फ़िक्र नहीं है.?" रचना ने मुझसे लिपटे हुए ऐसा कहा तो मुझे कुछ समझ न आया की मैं क्या कहु.

"चुप क्यों हो विक्की.? बताओ न क्या तुम्हे मेरी ज़रा भी फ़िक्र नहीं है. तुम्हे सोचना चाहिए था न अपनी इस दोस्त के बारे में.?" रचना ने ये कहा तो मैंने अपने आपको सम्हालते हुए कहा.

"रचना ये सब ठीक नहीं है. अगर किसी ने हमें इस कमरे में एक साथ इस तरह देख लिया तो क़यामत आ जाएगी. मैं तो यही सोच कर हैरान हु की तुम्हे इस सबके लिए ज़रा भी दर क्यों नहीं लगता.? तुम इतना निडर कैसे हो सकती हो.?" मैंने ये सब कहा तो रचना ने कहा.

"वो इस लिए क्यों की मेरे कमरे में जब तक मैं नहीं चाहुगी तब तक कोई नहीं आ सकता. मैंने सब इंतजाम किया हुआ है. अगर कोई इस तरफ आएगा तो मेरी सहेली मुझे मेरे मोबाइल पर मिस कॉल कर देगी." रचना ने ये कहा तो मैं हैरान रह गया. मतलब उसकी सहेली को ये पता है की इस वक्त हम दोनों इस कमरे में हैं. सबसे बड़ी बात ये की रचना ने मेरे बारे में अपनी सहेली को सब बता रखा है शायद. हे bhagwan..main तो ये सोच कर hi बुरी तरह घबराने लगा था. मेरे अंदर से कोई चीख चीख कर कह रहा था की विक्की यहाँ से जल्दी भाग जाओ.

"Vicky....mujhe फिर से वैसे hi किश करो न जैसे कल शहर में किया था." रचना ने मेरे सीने से लगे हुए hi ये कहा तो मैं बुरी तरह हैरान रह गया. मैंने एकदम से उसे अपने सीने से अलग किया और हैरानी से उसकी तरफ देखने लगा.

"ये तुम क्या कह रही हो रचना.? तुम होश में तो हो न.?" मैंने ये कहा तो रचना ने मुस्कुराते हुए कहा.

"किसी बात की फ़िक्र मत करो विक्की. मैं पूरी तरह होश में हु और होश में hi कह रही हु की मुझे फिर से वैसे hi किश करो." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"Nahi...ye गलत है रचना. ये दोस्ती के रिश्ते से ज़्यादा हो रहा है." मैंने ये कहा तो रचना ने जल्दी से कहा.

"सिर्फ एक बार विक्की. मैं इस बार अच्छे से महसूस करना चाहती हु उसके बारे में. क्या तुम मेरे लिए इतना नहीं कर सकते.? मैं खुद कह रही हु na....sirf एक बार विक्की उसके बाद मैं तुमसे कभी ऐसा करने को नहीं कहुगी." रचना ने रिक्वेस्ट करते हुए और मासूमियत से ये कहा तो मैं देखता रह गया उसे. मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैं क्या करू. मेरा दिल ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था. उधर रचना मुझे आशा भरी निगाहो से देख रही थी.

"ठीक hai...magar सिर्फ एक बार और ये आखिरी बार है. उसके बाद अगर तुमने मुझे ऐसा करने को कहा तो समझ लेना की मैं तुमसे दोस्ती का रिश्ता तोड़ दुगा." मैंने ये कहा तो रचना ने हाँ में सर हिला दिया.

मैंने रचना के होठो की तरफ देखा जो रसगुल्ले की तरह थे. उन्हें देखते hi मेरे दिल में उन्हें जल्दी से मुँह में भर लेने की चाह उठी. मैं उसके होठो को देख कर मानो होश खोने लगा और उनकी तरफ झुकने लगा. मैं जैसे hi रचना के होठो के पास झुका तो रचना ने अपनी आँखे बंद कर ली.

कुछ hi पालो में मैंने अपने होठ रचना के रसीले होठो पर रख दिया. हम दोनों का जिसम एक साथ कांप गया. मेरा दिल तो पूरी स्पीड से दौड़ रहा था. मैंने अपना मुँह खोला और रचना के निचले होठ को अपने होठो के बीच दबा लिया. रचना पीछे खिसकती हुयी दिवार से जा लगी जो बस थोड़ी सी hi पीछे थी.

मैंने जैसे hi रचना के निचले होठ को अपने होठो में दबाया तो मैंने महसूस किया की रचना ने भी मेरे ऊपर वाले होठ को अपने होठो में दबा लिया था. ये जान कर मैं हैरान तो हुआ मगर रुका नहीं. मैंने एकदम से उसके होठ को मुँह में भरा और फिर ज़ोर ज़ोर से चूमना चूसना शुरू कर दिया. मेरे ऐसा करने से रचना का जिसम थरथरा कर रह गया. उसकी गरम गरम साँसे भारी होने लगी. मैंने महसूस किया की जैसे मैं उसके होठो को चुम और चूस रहा था वैसे hi वो भी करने की कोशिश कर रही थी.

मुझे रचना के होठो का स्वाद बहुत hi मीठा लग रहा था. ऐसा लग रहा था जैसे मैं उन्हें ज़िन्दगी भर ऐसे hi चूमता चुस्त राहु. मैं मज़े में था और मुझे अब किसी बात का होश नहीं रह गया था. मुझे पता hi नहीं चला की मेरा राइट हैंड कब ऊपर आया और रचना की राइट वाली छाती पर जैम गया. मैंने अपने उस हाथ से रचना की उस ठोस और सॉफ्ट सी चुकी को पकड़ा और हलके से दबाया तो रचना के जिसम में ज़ोर का झटका लगा. उसका एक हाथ जल्दी से मेरे उस हाथ के ऊपर आया और फिर मेरे हाथ को चुकी पर और भी ज़्यादा दबाने लगा. मैं समझ गया की रचना चाहती है की मैं उसकी उस चुकी को ज़ोर ज़ोर से दबाओ.

मुझे किसी बात का अब होश नहीं रह गया था. इस लिए जैसे hi मुझे इस बात का अहसास हुआ तो मैंने रचना की उस चुकी को मुट्ठी में लिया और ज़ोर से मसल दिया. मेरे ऐसा करते hi रचना की सिसकी निकल गयी जो मेरे मुँह में hi मुझे महसूस हुयी. रचना की साँसे अब पहले से ज़्यादा तेज़ तेज़ चलने लगी थी और उसके जिसम में झटके से लग रहे थे. उसने मेरे हाथ के ऊपर से अपना हाथ हटाया और मेरे सर पर कास लिया.

मैं एक तरफ उसके रसीले होठो को मज़े से चूस रहा था और एक तरफ उसकी एक चुकी को ज़ोर ज़ोर से मसलने लगा था. मुझे दोनों चीज़ो में बहुत मज़ा आ रहा था. फिर मैंने अपने उस हाथ को रचना की दूसरी चुकी पर रखा और उसे भी ज़ोर ज़ोर से दबाने लगा. रचना की साँसे तेज़ थी और अब वो सिसकारियां भी ले रही थी. मैंने महसूस किया की रचना अब मेरे होठो को अच्छे से नहीं बल्कि ज़ोर ज़ोर से चूमने चाटने लगी थी और बुरी तरह पगलाई हुयी सी हरकत करने लगी थी.

अभी हम दोनों इस में डूबे hi थे की तभी रचना के मोबाइल पर रिंग बजी और फिर एकदम से जैसे सब कुछ रुक गया. रिंग तीन बार बजने के बाद बंद हो गयी थी मगर तीन बार के बजने से hi असर हो गया था उसका. हम दोनों को जैसे होश आया और हम दोनों एकदम से एक दूसरे से अलग हुए. रचना बुरी तरह हाफ रही थी और उसका चेहरा लाल सुर्ख पद गया था. आँखों में लाल डोरे तैरते हुए दिख रहे थे. हाफ तो मैं भी रहा था मगर मैंने जल्दी से अपने आपको सम्हाला और रचना की तरफ देखा. वो मुझसे नज़ारे नहीं मिला प् रही थी.

मैंने उससे बस इतना hi कहा की मैं जा रहा हु. उसने सर को हाँ में हिला कर जवाब दिया तो मैं चुप चाप कमरे से बाहर निकल गया. उसके बाद मैं रचना के घर में रुका hi नहीं बल्कि वह से सीधा अपने घर hi आ गया. मेरे अंदर तूफ़ान सा चल रहा था. मैं ये सोच सोच कर हैरान हुआ जा रहा था की मुझे आज क्या हो गया था. मैं रचना के होठो को बुरी तरह तो चूस hi रहा था मगर सबसे ज़्यादा हैरानी की बात ये थी मैं उसकी चूचियों को भी बुरी तरह मसल रहा था. मुझे अपने आप पर भरोसा नहीं हो रहा था की मैंने ऐसा किया था आज.

अपने कमरे में आ कर मैं सीधा बीएड पर लेट गया था. मेरी आँखों के सामने से आज का वो मंज़र जा hi नहीं रहा था. मैंने बहुत कोशिश की के मेरी आँखों के सामने से वो सब हैट जाये मगर ऐसा न हुआ. मुझे पता hi नहीं चला की मैं अपने कमरे में कब तक यु hi लेता कही खोया रहा. फिर मुझे ऐसा लगा जैसे कही शोर हो रहा हो. कोई तेज़ आवाज़ में कुछ कहे जा रहा था. मैं सोचो की दुनिया से बाहर आया तो मेरे कानो में वो शोर थोड़ा साफ़ साफ़ सुनाई दिया और फिर मैं एकदम से घबरा कर बीएड से उठ बैठा.

नीचे मेरे पिता जी ज़ोर ज़ोर से चिल्ला रहे थे और कुछ कह रहे थे. उनके इस तरह चिल्लाने से मेरे मन में बस एक hi बात आयी की आज मेरे और रचना के बीच जो कुछ भी हुआ है उसका पता चल गया है सबको और शायद इसी लिए पिता जी घर में इस तरह चिल्ला रहे थे. ये सोचते hi मेरी हालत खराब हो गयी. जिसका मुझे सबसे ज़्यादा दर था वही हुआ. तभी मेरे कमरे का दरवाजा झटके से खुला और पिता जी कमरे में आ गए. उनके हाथ में लाठी थी और चेहरे पर भयानक गुस्सा. ये देख कर तो मेरी हालात और भी खराब हो गयी. पिता जी के पीछे माँ थी और मेरी जुड़वाँ बहने. सबके चेहरों पर आतंक छाया हुआ था.

पिता जी ने कमरे में आते hi एकदम से मेरा हाथ पकड़ा और मुझे पूरी ताकत से खींच लिया. मैं उनके खींचने पर बीएड से नीचे आ गया. उसके बाद वो मुझे खींचते हुए कमरे से बाहर ले गए और फिर सीधा नीचे hi ले आये. मैं ये सोच कर बुरी तरह घबरा गया था की पिता जी को मेरे और रचना के बारे में सब पता चल गया है और अब वो ये सोच के मेरी खाल उधेड़ने वाले हैं की इस सबसे सरपंच मेरे साथ साथ मेरे पुरे परिवार की माँ बहन कर देगा. अभी जिस ब्राह्मण समाज ने आज मेरे पिता जी को सरपंच के बेटे के जनम दिन जैसे मौके पर खुद आ कर न्योता दिया था अब इस सबसे फिर हमारे घर में ब्राह्मण समाज पानी नहीं पियेगा.

पिता जी मुझे खींचते हुए नीचे ले आये. मेरी माँ और दोनों जुड़वाँ बहने दर के मरे कांप रही थी. माँ बार बार पिता जी से चीख चीख के पूछ रही थी क्या हुआ है आप बताते क्यों नहीं. मगर माँ के पूछने पर पिता जी कुछ नहीं बोल रहे थे. वो गुस्से से लाल पीले हुए पड़े थे. अंदर hi कही किसी कोने में छिपी कड़ी कुसुम दीदी ये सब देख रही थी. तभी पिता जी के हाथ में जो लाठी थी वो पूरी स्पीड से चली और मेरी पीठ पर ज़ोर से पड़ी. मुझे दिन में hi तारे दिख गए और भयानक दर्द की लहार पुरे जिसम में फ़ैल गयी. मैं दर्द के मरे ज़ोर से चीख पड़ा था. मगर पिता जी यही नहीं रुके बल्कि वो एक के बाद एक लाठी का प्रहार करते hi चले गए. मेरी दोनों बहने और खुद कुसुम दीदी ये मंज़र देख कर ज़ोर ज़ोर से रोने लगी. मेरी माँ तो जैसे पागल hi हो गयी. वो पिता जी पर झपट पड़ी मगर पिता जी ने उन्हें झटका दे दिया जिससे माँ लड़खड़ाते हुए पीछे दिवार से टकराई और गिर गयी. इसके बाद भी माँ जल्दी से उठी और पिता जी को पकड़ने की कोशिश करने लगी और ये बोलती जा रही थी की क्यों मार रहे हो मेरे बेटे ko...aakhir उसने ऐसा कौन सा गुनाह किया है. माँ के बार बार पूछने पर इस बार पिता जी ने दहाड़ते हुए कहा.

"तुम्हारे इस बेटे ने ऐसा गुनाह किया है जिसके बारे में सुनोगी तो पैरो के नीचे से ज़मीन खिसक जाएगी. ये शहर में सरपंच की बेटी को मोटर सिक्ले में लिए घूम रहा था. मेरे एक भरोसे के आदमी भगवत ने मुझे इसके बारे में आज बताया सब कुछ. कल और परसो दोनों दिन ये सरपंच की बेटी को लिए घूम रहा था. भगवत ने इसे शहर में देखा था. तुम्हारा ये बीटा शहर में सरे आम सरपंच की बेटी को अपने से छुपकाये खड़ा था." पिता जी कहते कहते रुक गए. गुस्से से वो बुरी तरह हाफ रहे थे. उधर पिता जी की ये बात सुन कर सच में माँ के पैरो के नीचे से ज़मीन खिसक गयी. इधर पिता जी की ये बात सुन कर मुझे साप सूंघ गया.

"हम समझते थे की हमारा बीटा गांव के सभी लड़को से अच्छा और संस्कारी है. मगर नहीं हम गलत समझते थे रेणुका. ये तो सरपंच की लड़की को hi लिए घूमता है. सोचो इसकी करतूत का पता आज अगर सरपंच को लग जाये तो क्या होगा.? वो इसके लिए हमें जीते जी मार देगा. अपने बेटे की मार को और पंचायत में हुयी अपनी हार को वो भुला नहीं होगा. बर्षो बाद ब्राह्मण समाज ने हमें अपने किसी कार्यक्रम में आने का न्योता दिया था मगर इसकी करतूत की वजह से अब वो भी नहीं होगा." पिता जी ने ये सब कहा तो माँ मेरे करीब आयी और मुझसे पूछने लगी की क्या ये सच है तो मैंने कोई जवाब न दिया.

मेरे जवाब न देने पर पिता जी का गुस्सा और बढ़ गया. उन्होंने एक लट्ठ और जमा दी मुझ पर. मैं दर्द से तड़प उठा. वो बुरी तरह चीख रहे थे.

"मैं सोच भी नहीं सकता था रेणुका की ये ऐसा काम करेगा. कल को अगर कोई उल्टा सीधा काम हो गया तो कही के नहीं रह जायेगे हम. सरे आम इसने सरपंच की लड़की को चुपके रखा था. रुपेश की सांगत में बिगड़ गया है ये. Nahi...nahi...ye अब इस घर में नहीं रह सकता. ये अगर यहाँ रहा तो ये अपने साथ साथ हम सबको ले डूबेगा. इस लिए इसके लिए अब इस घर में कोई जगह नहीं है. इसने मेरे विश्वास और मेरे संस्कारो का खून किया है." पिता जी की ये सब बाते सुन कर माँ बुरी तरह रोने लगी. वो पिता जी से हाथ जोड़ के कहने लगी अब ये दुबारा ऐसा कभी नहीं करेगा. मगर पिता जी न मने. उन्होंने मेरी तरफ देखते हुए कहा की निकल जाओ मेरे घर से. मुझे तुझ जैसे बेटे की कोई ज़रूरत नहीं है. मैं समझ लगा की मेरा कोई बीटा था hi नहीं.

पिता जी की बाते सुन कर मुझे धक्का सा लगा. मुझे लगा जैसे मेरी दुनिया hi उजाड़ गयी हो. मन की मैंने सरपंच की बेटी से ऐसा ताल्लुक रख के गुनाह किया था मगर इसके लिए मुझे घर से निकल जाने को कहने का सवाल नहीं था. मेरी माँ रिक्वेस्ट करती रह गयी मगर पिता जी मेरा हाथ पकड़ कर घर से बाहर की तरफ लाये और मुझे ज़ोर से धक्का दे दिया और कहा की कभी मुझे अपनी शकल मत दिखाना.

मैं इस सबसे बुरी तरह हताश हो गया था. मेरे अंदर आँधिया सी चल रही थी. मैं इस बात को जान कर खुश तो था की पिता जी को सिर्फ शहर वाली बात का hi पता चला है. मगर मैं ये नहीं समझ प् रहा था की सिर्फ इतनी सी बात के लिए पिता जी ने मुझे घर से बाहर के लिए धक्का क्यों दे दिया.? सबसे बड़ी बात ये थी की वो मेरी माँ के रोने धोने की और उनके रिक्वेस्ट की कोई परवाह hi नहीं कर रहे थे. ये सब देख कर मैं अंदर से बहुत दुखी हो गया था.

घर से बाहर धक्के देने के बाद पिता जी ने मुझसे कहा की अब दुबारा अपनी शकल मत दिखाना हमें. मैं अंदर से एकदम से टूट गया था. मुझे इस बात का दुःख हो रहा था की मुझे इतना प्यार करने वाले मेरे पिता जी इतनी सी बात के लिए मुझे ऐसा कह रहे थे और घर से निकल जाने का कह रहे थे. इतना hi नहीं बल्कि उन्हें अपनी शकल न दिखने को भी बोल रहे थे.

मुझे घर से बाहर कचरे की तरह फेंक देने से मुझे बहुत दुख. मैं ये मानता था की मैंने गलती की थी. मुझे सरपंच की बेटी से कोई ताल्लुक नहीं रखना चाहिए था मगर इसके लिए मैं उनकी बाकी हर सजा को कबूल कर सकता था मगर ये सजा तो बहुत बड़ी थी. मुझे घर से निकला जा रहा था और फिर अपनी शकल न दिखने की बात भज कही जा रही थी. ये कहा का इन्साफ था की अपनी जान से भी ज़्यादा प्यार करने वाले मेरे पिता जी मुझे सिर्फ इतने से गुनाह के लिए इतनी बड़ी सजा दे रहे थे.

घर से बाहर मैं कच्ची ज़मीन पर गिरा पड़ा था और पीछे मुद के अपने पिता जी की तरफ दर्द से रट हुए देख रहा था. दरवाजे की चौखट पर खड़े मेरे पिता जी गुस्से में उबाल रहे थे. उनके पीछे मेरी माँ मेरी बहने सब रो रही थी. मेरी माँ मेरे पास आने के लिए छटपटा रही थी मगर पिता जी ने उन्हें शख्ती से पकड़ा हुआ था. कुछ देर मेरी तरफ गुस्से से देखने के बाद पिता जी ने फिर से दहाड़ते हुए कहा दफा हो जा हमारी नज़रो से और फिर कभी इस घर में और इस गांव में कदम रखने की ज़ुर्रत मत करना.

इतना कहने के बाद पिता जी मुद कर चौखट से अंदर गए और एक झटके में दरवाजा बंद कर दिया. ज़मीन में गिरा पड़ा मैं दर्द से कराह रहा था. मेरे कपडे दो तीन जगह से फैट गए थे और कच्ची ज़मीन की धुल मिटटी लगने से गंदे हो गए थे. मेरे जिसम में बहुत तेज़ दर्द हो रहा था. मुझे लग रहा था की मैं अब क्या कर दालु. मैं बहुत देर तक वही पड़ा तमाम बातो के बारे में सोचता रहा. मुझे पिता जी से सिर्फ एक hi शिकायत थी की उन्होंने मेरे सिर्फ इतने से गुनाह के लिए इतनी बड़ी सजा क्यों दी थी.?

मेरे अंदर बहुत ज़्यादा गुस्सा भी भर चूका था. मैंने सोच लिया की अगर मेरे पिता जी यही चाहते हैं तो मैं भी अब कभी लौट के वापस इस घर में नहीं आउगा. मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मेरी दुनिया hi उजाड़ गयी हो. मैं उठा और अपने दर्द को बर्दास्त करते हुए वह से चल पड़ा.

मुझे नहीं पता की मैं किस तरफ जा रहा था. मेरे दिल और दिमाग में बहुत भयानक ख़याल आ रहे थे. सबसे ज़्यादा ये लग रहा था की मैं अपने आपको ख़तम कर लू. मुझे नहीं पता मैं कब तक पैदल चलता रहा. जब मेरे पेअर जवाब दे गए तो मैं एक जगह गिर पड़ा और बेहोश हो गया. जब मेरी आँखे खुली तो मुझे हर तरफ अँधेरा hi अँधेरा दिखाई दे रहा था. हर तरफ मौत जैसा सन्नाटा छाया हुआ था. मेरे बदन में अभी भी बहुत तेज़ दर्द का अहसास हो रहा था और कमजोरी का भी.

मुझे नहीं पता था की इस वक्त मैं कहा पर हु. मैं उठा और फिर से एक तरफ को अँधेरे में चलना शुरू कर दिया. मुझे रह रह कर अंदर से रुलाई आ रही थी मगर मैं अब रोना नहीं चाहता था. मैं हर दर्द को बर्दास्त करते हुए चलता hi रहा. जब मेरे में चलने की शक्ति न रही तो मैं एक जगह बैठ गया. फिर मुझे पता hi नहीं चला की कब मेरी आँखे बंद हो गयी. जब दुबारा आखे खुली तो मैंने देखा की अब हर तरफ दिन की तरह उजाला था. मतलब इसके पहले रात थी और अब दिन हो गया था.

मैंने आस पास देखा तो लेफ्ट साइड में दूर मुझे शहर दिखाई दिया तो मैं उसी तरफ उठ कर चल दिया. बहुत देर बाद मैं शहर पंहुचा. मेरे मन में अभी भी वही सब बाते चल रही थी और मेरे मन में आत्म हत्या करने के ख़याल आ रहे थे. मैं शहर में आया तो सीधा रेलवे स्टेशन की तरफ ये सोच कर चल पड़ा की वह पर चलती ट्रैन के सामने कूद कर आत्म हत्या कर लगा.

एक घंटे पैदल चलने के बाद मैं रेलवे स्टेशन पंहुचा. प्लेटफार्म में आ कर मैंने देखा की कोई ट्रैन कड़ी है जबकि मैं ये सोच रहा था की चलती ट्रैन के आगे कूद जाउगा मगर यहाँ तो स्टेशन पर ट्रैन कड़ी थी. मैं कुछ देर सोचता रहा और फिर ट्रैन के एक डिब्बे में यु hi चढ़ गया. मैंने महसूस किया की सब लोग मुझे अजीब तरह से देख रहे थे. जैसे मैं कोई पागल भिखारी हु. मेरी हालत लग भी ऐसी hi रही थी मगर मुझे किसी के कुछ भी सोचने से कोई फर्क नहीं पद रहा था. मैं एक जगह गया और चुप चाप बैठ गया. मुझ में अब इतनी शक्ति नहीं थी की मैं कही आ जा सकू.

बदन में फाटे हुए कपडे, नंगे पेअर मैं ट्रैन में बैठा था. कुछ देर बाद ट्रैन वह से चल पड़ी. मुझे नहीं पता था की ट्रैन किस तरफ जा रही थी. मैं बहुत थक गया था और मुझे अब भूख भी महसूस हो रही थी मगर मेरे पास खाने के लिए एक रूपया भी पैसा नहीं था.

ट्रैन का सफर बहुत लम्बा था. वैसे तो ट्रैन कई जगह रुकी थी मगर मैं ट्रैन से उतरा नहीं बल्कि अपनी जगह पर चुप चाप बैठा hi रहा. मैं अपनी hi दुनिया में खोया हुआ था. मुझे किसी से कोई मतलब नहीं था और फिर ऐसे hi बैठे हुए मुझे जाने कब नींद आ गयी. मेरी आँख शोर शराबे की वजह से खुली तो देखा ट्रैन के सब यात्री ट्रैन से उतर रहे थे. उन्हें मैं मूर्खो की तरह देखे जा रहा था फिर जैसे मेरे दिमाग ने काम किया और मुझे समझ आया की ट्रैन से मुझे भी उतर जाना चाहिए. शायद ये ट्रैन का आखिरी स्टॉप था. ये सोच कर मैंने उठने की कोशिश की तो पता चला की मैं उठ hi नहीं प् रहा हु. बड़ी मुश्किल से मैं उठा और ट्रैन से उतर कर सबके साथ स्टेशन से बाहर आ गया.

ये जगह मेरे लिए पूरी तरह से नयी थी. मुझे यहाँ के बारे में कुछ भी नहीं पता था. स्टेशन के बाहर आ कर मैंने एक बार पीछे पलट कर देखा तो स्टेशन का नाम हज़रात निजाम्मुद्दीन लिखा दिखा. मतलब मैं ट्रैन से दिल्ली आ गया था.

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 27

प्रेजेंट स्टार्ट....


ट्रैन का सफर बहुत लम्बा था. वैसे तो ट्रैन कई जगह रुकी थी मगर मैं ट्रैन से उतरा नहीं बल्कि अपनी जगह पर चुप चाप बैठा hi रहा. मैं अपनी hi दुनिया में खोया हुआ था. मुझे किसी से कोई मतलब नहीं था और फिर ऐसे hi बैठे हुए मुझे जाने कब नींद आ गयी. मेरी आँख शोर शराबे की वजह से खुली तो देखा ट्रैन के सब यात्री ट्रैन से उतर रहे थे. उन्हें मैं मूर्खो की तरह देखे जा रहा था फिर जैसे मेरे दिमाग ने काम किया और मुझे समझ आया की ट्रैन से मुझे भी उतर जाना चाहिए. शायद ये ट्रैन का आखिरी स्टॉप था. ये सोच कर मैंने उठने की कोशिश की तो पता चला की मैं उठ hi नहीं प् रहा हु. बड़ी मुश्किल से मैं उठा और ट्रैन से उतर कर सबके साथ स्टेशन से बाहर आ गया.

ये जगह मेरे लिए पूरी तरह से नयी थी. मुझे यहाँ के बारे में कुछ भी नहीं पता था. स्टेशन के बाहर आ कर मैंने एक बार पीछे पलट कर देखा तो स्टेशन का नाम हज़रात निजाम्मुद्दीन लिखा दिखा. मतलब मैं ट्रैन से दिल्ली आ गया था.

अब आगे पढ़िए....
ट्रैन एक झटके से रुकी तो मुझे भी झटका लगा और इसी झटके की वजह से मैं अपने अतीत से बाहर आ गया. मैंने इधर उधर देखा तो समझ में आया की ट्रैन किसी स्टेशन पर रुक गयी है और कुछ लोग ट्रैन से उतरने के लिए जा रहे थे. मैंने अपने राइट हैंड में बंधी घडी में टाइम देखा तो सुबह के सात बज चुके थे. मैं समझ गया की मेरी रात अतीत के खयालो में खोये हुए hi गुज़र गयी थी.

मुझे मेरे शहर पहुंचने में अभी टाइम था. ग्यारह बजे मेरे शहर इस ट्रैन के पहुंचने का टाइम है. सुबह हो hi गयी थी और स्टेशन में चाय और समोसे बेचने वालो की आवाज़े आ रही थी तो मैंने सोचा चाय पि लेता हु. तभी एक चाय वाला हमारे डिब्बे में ऊपर hi आया तो मैंने उससे चाय ली और उसके पैसे देने के बाद चाय पिने लगा. चाय कुछ ख़ास तो नहीं थी मगर काम चल गया था.

मेरे आस पास कौन कौन बैठा था या लेता हुआ था मुझे उनसे कोई मतलब नहीं था और अब तक मैंने उन में से किसी को ध्यान से देखा भी नहीं था. मैं ऊपर वाले बिरथ पर लेता हुआ था. रात भर जागने के बाद भी मेरी आँखों में नींद न नामो निशाँ न था. मैंने सोचा की ट्रैन चले तो मैं वाशरूम जाओ और वह पर फ्रेश हो लू. मैंने ऊपर से hi झाँक कर नीचे देखा तो नीचे की शीट पर जो सोये हुए थे वो अब उठ कर बैठे हुए थे और सामने वाली शीट पर बैठे कुछ लोगो से बाते कर रहे थे.

मैं उठा और नीचे उतर आया. नीचे आने के बाद मैंने सबसे पहले अपने सामान को चेक किया जो की सही सलामत hi शीट के नीचे रखा हुआ था. एक बड़ा वाला बैग मैंने ऊपर hi अपने पास रख लिया था. नीचे जो शीट थी उसमे अभी भी इतनी जगह थी की मैं आराम से बैठ सकता था.

ट्रैन फिर से चल पड़ी तो मैं उठ कर वाशरूम की तरफ बढ़ गया. वाशरूम से फ्रेश होने के बाद मैं वापस अपनी जगह पर आ कर बैठ गया. तब मैंने वह पर बैठे लोगो को ध्यान से देखा. मैं जिस शीट पर बैठा था उसमे तीन लोग और बैठे थे जिसमे से एक मर्द था एक औरत और एक लड़की थी जो की अभी बच्ची जैसी hi थी. जबकि सामने वाली शीट पर दो आदमी दो औरते बैठी हुयी थी.

धीरे धीरे वो लोग मुझसे भी बाते करने लगे. बातो बातो में hi पता चला की उनमे से जो सामने वाली शीट पर एक आदमी बैठा था उसे मेरे शहर में hi उतरना है. मैंने भी उसे अपने बारे में बताया की मुझे भी वही उतरना है. जब उसे ये पता चला तो उसने मेरे बारे में पूछा तो मैंने उसे अपने गांव और परिवार के बारे में बताया. फिर जब मैंने अपने पिता जी का नाम लिया तो वो चौंका.

उस आदमी का नाम रंजन श्रीवास्तव था और पेशे से वो पटवारी था. उसने बताया की वो मेरे पिता जी को अच्छी तरह पहचानता है. पहचानने की वजह थी ज़मीन. पिछले तीन साल से एक ज़मीन पर मशला चल रहा था. यु तो ज़मीन जिसके नाम पर थी वो अब दुनिया में हैं hi नहीं मगर उनके बाद उस ज़मीन पर हक़ महेश पांडेय के पिता जी का था और उनके बाद अब महेश जी का हक़ है. मगर ज़मीन के कागजातों के बारे में और खुद ज़मीन के बारे में पहले उन्हें पता hi नहीं था. वो ज़मीन लावारिश hi पड़ी हुयी थी जिस पर दूसरे गांव का सरपंच जिसका नाम मणि शंकर तिवारी है वो गैर क़ानूनी तरीके से कब्ज़ा करना चाहता था.

मैं उस आदमी की ये बाते सुन कर हैरान था. मुझे भी इस बारे में कुछ पता नहीं था और न hi दीदी ने फ़ोन पर बताया था. पटवारी ने साफ़ साफ़ कहा की उस ज़मीन पर हक़ मेरे पिता जी का hi है मगर पहले कागजात नहीं मिल रहे थे इस लिए मणि शंकर उस ज़मीन पर दवा ठोंक रहा था. अब जब ज़मीन के कागजात मिल गए और असली हकदार भी मिल गया तो मणि शंकर अपनी ताकत के बल पर उसे हथियाना चाहता है.

मणि शंकर ने साफ़ साफ़ धमकी दी है की अगर उस ज़मीन पर महेश जी ने अपने हक़ के अनुसार जोताई का काम किया तो वो उसके परिवार के साथ कुछ भी करवा सकता है. बस तब से वो ज़मीन ऐसे hi पड़ी है. अपने परिवार की भलाई को देखते हुए महेश जी कुछ कर नहीं सकते और अब हालात ये हैं की मणि शंकर खुद hi उस ज़मीन पर अपना हक़ जताते हुए फसल ऊगा रहा है.

मैं पटवारी की ये बाते सुन कर काफी देर तक सोचता रहा. उसके बाद मैंने उससे कहा की जैसे वो ज़मीन तो हमारी hi है तो हम उसे बेच तो सकते हैं न? मेरी इस बात से पटवारी ने कहा की बिलकुल बेच सकते हैं मगर मणि शंकर ऐसा होने नहीं देगा तो मैंने कहा वो मैं देख लगा. पटवारी ने मुझे ये भी बताया की मणि शंकर उसे इस बात के लिए मुँह मांगे पैसे दे रहा था की वो किसी तरह से उस ज़मीन को उसके नाम करवा दे मगर उसने ऐसा नहीं किया था अभी तक.

पटवारी ने मुझे इस बारे में बहुत सी बाते बतायी और मुझसे पूरा हेल्प करने का वडा भी किया. मैंने उससे उसका फ़ोन no लिया और उसे भी अपना दिया. ऐसे hi हमारे बीच बाते होती रही और जब ग्यारह बजे तो ट्रैन हमारे शहर के स्टेशन पर रुकी. ट्रैन के रुकते hi मैं अपने सामान को ले कर ट्रैन से उतरने के लिए चल पड़ा. वो पटवारी भी मेरे साथ hi था और उसकी बीवी भी. पटवारी मुझे बहुत hi भला आदमी लगा और उसकी बीवी भी. उसने मुझसे ये भी कहा था की महेश जी का एक लड़का था जो कुछ साल पहले कही चला गया था. उसके ऐसा कहने पर मैंने उसे बताया था की वो लड़का मैं hi हु.

ट्रैन से उतर कर मैं उसके साथ hi स्टेशन से बाहर आया. बाहर आ कर मैंने देखा की उसे लेने कार से कोई आया था तो वो मिया बीवी कार में बैठ गए. मैंने उन दोनों को हाथ जोड़ कर नमस्कार किया उसके बाद मैंने भी चलने का सोचा. मेरे दिमाग में ख़याल आया की मैं कोई कैब बुक कर लेता हु घर के लिए. बस से जाने में काफी वक्त लग जायेगा. ये सोच कर मैंने वही पर आस पास कैब के बारे में पूछा तो एक आदमी जल्द hi मिल गया मुझे. उसने गांव तक जाने के लिए एक हज़ार रेंट बताया तो मैंने कहा ठीक है चलो.

कैब में मैंने अपने दोनों बैग रखवाए और फिर कैब में बैठ कर गांव के लिए चल दिया. सारे रास्ते मैं अपने घर परिवार के बारे में सोचता रहा और उस पटवारी की बातो के बारे में भी. जैसे जैसे मैं अपने गांव के करीब पहुँचता जा रहा था वैसे वैसे मेरे दिल की धड़कने भी बढ़ती जा रही थी. आज पांच साल बाद मैं अपने गांव अपनी जन्म भूमि में वापस लौट कर आ रहा था. इन पांच सालो में शहर काफी बदल गया था और शायद गांव भी बदल गया होगा.

मेरे मन में बहुत सरे ख़याल आ रहे थे और बहुत साडी बाते भी. मैं सोच रहा था की कैसे होंगे मेरे माता पिता और कैसी होंगी मेरी बहने.? मेरा घर कैसा होगा और मेरे गांव की गालिया कैसी होंगी.? मेरा दिल कर रहा था की मैं एक पल में अपने घर पहुंच जाओ. अब एक पल भी बिताना मुझे भारी पद रहा था.

करीब एक घंटे लगे मुझे. बस से आता तो काफी टाइम लग जाता. कैब के ड्राइवर ने कैब को मेरे घर के सामने बड़े से लॉन में रोका. किसी वाहन की आवाज़ से कुछ hi पालो में घर का दरवाजा खुला और दरवाजे के बीचो बीच मेरी वो बहन कड़ी नज़र आयी जिसे मैं सबसे ज़्यादा प्यार करता था. मेरी कुसुम didi...meri रूह की raahat...mere दिल की धड़कन.

दरवाजे के बीच कड़ी वो हैरानी से कैब की तरफ देखे जे रही थी. फिर जब मैं कैब से बाहर निकला और उनकी नज़र मुझ पर पड़ी तो एकदम से उनकी आँखे छलक पड़ी. उनका खूबसूरत गोरा चेहरा दुःख और तकलीफ से भर गया. उनकी ये हालत देख कर तड़प तो मैं भी उठा मगर मैंने अपने आपको सम्हाला और कैब से अपने बैग निकाल कर कच्ची ज़मीन पर रखा. ये वही ज़मीन और ये वही जगह थी जहा पर आज से पांच साल पहले मैं गिरा पड़ा था. इस ज़मीन और इस जगह को देख कर मेरी आँखों के सामने पल भर के लिए वो मंज़र दिखा और फिर गायब हो गया.

बैग निकाल कर मैंने कैब वाले को उसके रेंट के पैसे दिए तो वो वह से चला गया और मैं दोनों बैग को एक एक हाथ से पकडे घर के दरवाजे की तरफ चल पड़ा. मैं जैसे hi दरवाजे के पास पंहुचा तो कुसुम दीदी मेरी तरफ झपट कर बढ़ने hi वाली थी की तभी पीछे से मेरी दोनों जुड़वाँ बहने दुआदते हुए आ गयी. उनकी आवाज़ सुन कर hi दीदी रुक गयी थी. शायद वो मुझे इतने सालो बाद देख कर मुझसे गले मिलना चाहती थी और अपनी पांच सालो की तड़प को बाहर निकाल देना चाहती थी मगर प्रिय पूजा के आते hi उन्होंने खुद को रोक लिया था. हाल तो मेरा भी वही tha...mera भी जी चाह रहा था की अपनी दीदी से लिपट जाओ मगर ये सही वक्त और सही जगह नहीं थी.

मुझे देखते hi प्रिय पूजा ख़ुशी के मरे रो पड़ी और दौड़ते हुए आयी और मुझसे लिपट गयी. दोनों बुरी तरह रो रही थी. मैंने बड़ी मुश्किल से उन्हें सम्हाला. बाहर की ये आवाज़े अंदर तक गयी थी शायद. यही वजह थी की कुछ hi पालो में मेरी माँ भागते हुए बाहर आयी और मुझे देखते hi दरवाजे पर जड़ सी हो के कड़ी रह गयी. मुरझाये हुए चेहरे पर जैसे बहार आ gayi...aur फिर एकदम से सूनी आँखों से आँशु छलक पड़े. वो एकदम से विक्की कह कर चीखी और झपट कर मेरे पास आयी और प्रिय पूजा को हटा कर मुझे अपने कलेजे से लगा लिया. माँ के कलेजे से लग कर मुझे असीम सुख और शान्ति महसूस हुयी. ऐसा लगा जैसे बर्षो की थकान और परेशानिया का थे एन्ड हो गया हो.

काफी देर तक माँ मुझे अपने कलेजे से लगाए रोटी रही और जाने क्या क्या कहती रही. मेरी आँखों से भी आँशु बाह रहे थे. हम किसी भी दुनिया में चले जाये और चाहे कितनी hi बड़ी दौलत को हासिल कर ले मगर इससे बड़ी दौलत तीनो लोको में नहीं मिल सकती थी. मेरी नज़र कुसुम दीदी पर पड़ी वो वही चौखट पर कड़ी मुझे देखे जा रही थी. उनकी आँखों में एक तड़प थी जिसे मैं महसूस कर रहा था.

थोड़ी देर बाद माँ मुझे अंदर ले आयी. मेरे हाथो में जो दो बैग थे उन्हें प्रिय पूजा khaseet'te हुए अंदर ले आ रही थी. अंदर आया तो देखा सब कुछ वैसा का वैसा hi था जैसे आज से पांच साल पहले था. मगर एक चीज़ में फर्क था और वो ये की घर की दीवारों का पैन पुराण हो गया था और जगह जगह से उखड़ा हुआ दिख रहा था. मैं समझ गया की यहाँ सालो से पैन नहीं हुआ है. शायद मेरे जाने के बाद किसी ने पेंट hi नहीं कराया था घर में. मैंने हर तरफ देखा मगर मुझे पिता जी नज़र नहीं आये तो मैंने माँ से उनके बारे में पूछा तो माँ ने नाम आँखों से अपने कमरे की तरफ इशारा किया.

मुझे दीदी ने बताया था की पिता जी बीमार रहते हैं और कमरे में hi पड़े रहते हैं. मैं पिता जी के कमरे की तरफ चल पड़ा तो मैंने महसूस किया की मेरे जिसम का रोया रोया एक अजीब से अहसास से खड़ा हो गया था. मेरे अंदर एक दर सा आ गया था. दिमाग में बहुत सी बाते चल रही थी.

कुछ देर में जब मैं पिता जी के कमरे में पंहुचा तो मैंने देखा पिता जी दूसरी तरफ करवट लिए पड़े थे. उन्हें देख कर मेरे कदम रुक गए. मुझमे हिम्मत नहीं हो रही थी की मैं उनके पास जाओ और उनसे बात करू. तभी मेरे कंधे पर किसी ने हाथ रखा तो मैंने मुद के देखा. मेरे पीछे माँ और मेरी बहने कड़ी थी. मैंने माँ को देखा तो माँ ने मुझे पिता जी के पास जाने का इशारा किया तो मैं आगे बढ़ चला.

पिता जी के पैरो के पास पहुंच कर मैं खड़ा हो गया और फिर मेरे घुटने मुड़े. मैंने अपने घुटनो पर बैठ कर अपने सर को पिता जी के पैरो पर रख दिया. मेरे सर के बोझ से hi शायद पिता जी को कुछ आभास हुआ तो उनमे हलचल हुयी. उन्होंने खुद को किसी तरह सीधा किया और अपने पैरो की तरफ देखा. मैंने अपने दोनों हाथो से उनके दोनों पैरो को पकड़ा हुआ था और अपने सर को उनके पैरो में रखा हुआ था. ये मेरे वही पिता जी हैं जो मुझे अपनी जान से ज़्यादा प्यार करते थे मगर कभी दिखते नहीं थे. उन्हें मुझ पर बहुत गर्व होता था. सरे गांव में वो सर उठा कर चलते थे. जब भी कोई मेरी तारीफे करता तो वो अंदर hi अंदर ख़ुशी से गदगद हो जाते थे.

पिता जी के पैरो में सर रखे मुझे लग रहा था की अब दुनिया यही पर रुक जाये और मैं यही पर फ़ना हो जाओ. मुझे अंदर से बहुत ज़्यादा रुलाई आ रही थी मगर मैंने अपने आपको मुश्किल से रोका हुआ था. तभी मेरे कानो में पिता जी की अजीब सी आवाज़ पड़ी.

उन्होंने मुझे मेरे नाम से पुकारा था. मैंने महसूस किया की वो उठने की कोशिश कर रहे हैं तो मैंने जल्दी से सर उठा कर उनकी तरफ देखा तो बुरी तरह हैरान रह गया. मेरी आँखे जिस इंसान को देख रही थी वो तो अब बहुत hi कमज़ोर दिख रहा था. उनका जिसम जो पहले हत्ता कट्टा हुआ करता था मगर अब वो बिलकुल कमज़ोर सा पद गया था. अपने जन्मदाता को इस हाल में देख कर मुझे बड़े ज़ोर का झटका लगा. तभी पिता जी ने मेरी तरफ देखा तो उनकी गड्ढो में धसी आँखों में पहले चमक आयी फिर एकदम से उनमे आँशु दिखने लगे.

वो पूरी ताकत लगा कर बीएड से उठ कर बैठ गए और फिर मेरी तरफ देखते हुए अपने दोनों हाथ फैला दिए. ये देख कर मैं बुरी तरह बिलख पड़ा और फिर झपट कर उनकी फैली हुयी बाहो में समां गया. पिता जी के सीने से जैसे hi मैं लगा तो उन्होंने मुझे अपनी कमज़ोर बाहो में बाँध लिया.

"मेरा बीटा वापस आ गया मेरे पास. तुझे एक बार देखने के लिए hi तो ज़िंदा था अभी तक वर्ण कब का इस दुनिया से जा चूका होता." पिता जी ने कमज़ोर आवाज़ में ये कहा तो मैं तड़प उठा और रट हुए बोलै.

"ऐसा मत कहिये पिता जी. आप कही नहीं जायेगे. हमेशा मेरे पास hi रहेंगे." मैंने ये कहा तो पिता जी ने मुझे अपने सीने से अलग किया और फिर मेरे चेहरे को अपने हाथो में ले कर कहा.

"इस दुनिया से तो एक दिन सबको जाना hi होता है बीटा. मेरा भी वक्त आ गया hai...main तो हर दिन भगवन से बस यही प्रार्थना करता था की एक बार मुझे मेरे बेटे से मिल लेने दे और उससे माफ़ी मांग लेने दे उसके बाद वो चाहे तो मुझे उसी वक्त ले जाये." पिता जी ने ये कहा तो मैंने रट हुए कहा.

"नहीं पिता ji...bhagwan आपको कही नहीं ले जायेगा. आप मेरे पास hi रहेंगे. मैं आपका बहुत अच्छे से इलाज़ कराऊंगा. आपको कुछ नहीं होगा." मैंने ये कहा तो पिता जी ने कहा.

"Pagle...rota क्यों है.? तू मेरे दिल का टुकड़ा है. मैंने ये कभी किसी से नहीं बताया की मैं तुझे कितना प्यार करता हु. कोई मेरा सीना चीयर के देखे तो उसमे सिर्फ तेरी hi मूरत दिखाई देगी. मैंने पांच साल पहले तुझे इस घर से निकाल कर तुझ पर अन्याय किया था. मगर बेटे वो अन्याय भी मैंने अपने दिल पर पत्थर रख कर किया था. अगर वैसा न करता तो वो मणि शंकर तुझे बर्बाद कर देता." पिता जी ने ये कहा तो मैं उनकी तरफ देखता रह गया. ये सवाल तो मेरे भी मन में उभरता था की सिर्फ इतनी सी बात पर पिता जी मुझे कैसे घर से निकाल सकते थे.?

"उस दिन जब तू घर आ गया था तब कुछ देर बाद मैं भी वह से सीधा खेतो की तरफ चला गया था. वही रास्ते में मुझे भगवत ने वो बात बतायी थी की तू मणि शंकर की बेटी को लिए शहर में घूम रहा था मगर ये बात ऐसी नहीं थी की मैं उसके लिए तुझे घर से निकाल देता. असली बात तो कुछ और hi थी मेरे बेटे. मैं भगवत की बाते सुन कर परेशां तो हुआ था और दर भी गया था की कही वो बात मणि शंकर को पता चली तो वो क्या करेगा. यही सोच कर मैं मणि शंकर के घर गया. सोचा था की उससे ये जानने की कोशिश करुगा की उसे तेरे और उसकी बेटी के बारे में कुछ पता है की नहीं मगर वो घर पर था hi नहीं. उसकी बीवी ने बताया की वो खेतो की तरफ गए हैं तो मैं उसके घर से सीधा उसके खेत की तरफ चला गया. जब मैं उसके खेत पर बने घर में पंहुचा तो मैंने वह पर कुछ लोगो की आवाज़े सुनी तो मैं एक जगह छुप कर उन सबकी बाते सुनने लगा. वह पर तीन चार आदमी थे जो है है कर बाते कर रहे थे और तेरे hi बारे में बाते कर रहे थे. उनकी बाते सुन कर hi मुझे पता चला की मणि शंकर ने तुझे सचिव बनाने पर ज़ोर क्यों दिया था और वो तुझे सचिव बनवा कर तेरे साथ क्या क्या करना चाहता था. उनकी बाते सुनते hi मेरे पैरो के नीचे से ज़मीन खिसक गयी थी. अच्छा हुआ था की मुझे वक्त रहते उनकी असलियत का पता चल गया था. मैं वह से चुप चाप घर के लिए चल पड़ा. सरे रास्ते मैं सोचता रहा की मैं अब क्या करू.? मैं अब किसी भी कीमत पर ये नहीं चाह सकता था की वो लोग तुझे बर्बाद कर दे. फिर मेरे मन में ये बात आयी की तुझे यहाँ से कही दूर भेज du..magar सवाल था की कहा भेज दू तुझे.? और अगर ऐसी जगह भेजता जहा के बारे में मुझे पता होता तो ऐसा भी हो सकता था की मणि शंकर मुझसे ज़बरदस्ती तेरा पता उगलवा लेता. तब मैंने फैसला किया की तुझे घर से निकाल देता हु. तुझे जहा जाना होगा तू खुद hi चला जायेगा. ये सोच कर मैंने वो सब किया था तेरे साथ. मुझे ये भी दर था की मेरे ऐसा करने से तू कही अपनी जान न दे दे. इस लिए तेरे जाने के बाद मैं तेरा पीछा भी करता रहा. दूसरे दिन जब मैंने देखा की तू ट्रैन में बैठ गया है तो मैं अपने दिल को पठार बना कर वापस घर आ गया." पिता जी ने ये सब मुझसे बताया तो मैं उनकी बाते सुन कर बुरी तरह हैरान रह गया था.

"मैं अपने जिगर के टुकड़े को कैसे उन दोस्तो के हाथो बर्बाद होने देता बीटा.? उस दिन मुझे जो सूझा मैंने कर दिया मगर बाद में ये सोच कर मेरा दिल जलता रहा की जिस हालत में मैंने तुझे निकला था उससे दुखी हो कर जाने तू क्या कर डाले और जाने किस रास्ते पर चल पड़े. मगर मुझे अपने भगवन पर भरोसा था की वो तुझे गलत रास्ते पर जाने से रोकेगा और आज तुझे इस हाल में देख कर मैं समझ गया हु की भगवन ने मेरे भरोसे की लाज राखी थी. अब तू आ गया है तो मुझे ऐसा लग रहा है जैसे अब मुझे कुछ भी पाने को बाकी नहीं रहा. मैंने जो कुछ भी तेरे साथ किया उसके लिए मुझे माफ़ कर दे मेरे बेटे." पिता जी ने आँशु भरी आँखों से देखते हुए ये कहा तो मैं फिर से उनके सीने से लिपट गया और रोने लगा. मैं बार बार उनसे यही बोलता रहा की उन्होंने वो सब करके मेरे साथ कोई गुनाह नहीं किया था. बल्कि उन्होंने तो मेरी भलाई के बारे में सोच कर hi ऐसा किया था.

काफी देर तक मैं पिता जी के सीने से लिप्त उनसे इस बारे में बोलता रहा. मुझे रोटा देख वो मुझे सम्हालते रहे. फिर उन्होंने मुझे अपने से अलग करके कहा.

"सोचा तो बहुत कुछ था बीटा मगर ज़िन्दगी hi नहीं बची अब. इस लिए मैं तुझसे बस यही कहना चाहता हु की मेरे बाद अब तू hi इस घर का मर्द है. तुझे अपनी माँ और अपनी बहनो का अच्छे से ख़याल रखना होगा." पिता जी ने बीएड पर फिर से लेट जाने के बाद मुझसे ये कहा तो मैंने नाम आँखों से उन्हें देखते हुए कहा.

"ये आप क्या कह रहे हैं पिता जी.?" मैंने ये कहा hi था की पिता जी ने मेरी बात kaat'te हुए कहा.

"भावनाओ में बहने का वक्त नहीं है मेरे बेटे. मेरी बात ध्यान से सुनो. मैंने सोचा था की इसी गांव में रह कर अपनी बेटियों का ब्याह करुगा और सबको दिखाऊगा भी मगर ऐसा न हो सका. मैंने भगवन से पूछा भी की उसने मेरी बेटियों के साथ इतना बड़ा अत्त्याचार क्यों किया मगर उसने मुझे कोई जवाब नहीं दिया. खेर छोड़ इस बात ko...main ये कह रहा हु की तू मेरे बाद इस गांव में मत रहना वर्ण ये ब्राह्मण समाज तुझे और तेरी माँ बहनो को चैन से जीने नहीं देगा. तू इन्हे अपने साथ ले जाना इस गांव से दूर और इनका अच्छे से ख़याल रखना. मैंने किसी तरह साडी ज़मीनो के कागजात तैयार करवा दिया है इस लिए तू यहाँ की सब ज़मीनो को और इस घर को बेच कर इस गांव से कही दूर चले जाना. यहाँ के लोग किसी का भला नहीं चाहते बीटा इसका सबसे बड़ा सबूत यही है तेरी बहने आज भी बिन ब्याही बैठी हुयी हैं. मैंने इनका ब्याह करने की हर कोशिश की मगर अपनी बेटियों का ब्याह नहीं कर पाया." पिता जी ने ये सब कहा तो मैं हैरान रह गया. मैं हैरान इस बात पर था की पिता जी मुझे घर ज़मीन बेच कर कही दूसरी जगह चले जाने को कह रहे थे.

पिता जी की इन सब बातो से माँ और बहने भी दुखी हो कर सिसकते हुए रो रही थी. मैं पिता जी से बार बार यही कह रहा था की वो ये सब बाते न करे. उन्हें कुछ नहीं होगा. मैं उनका अच्छे से इलाज़ कराऊंगा मगर पिता जी को जैसे सब पता था. वो जानते थे की अब उनकी ज़िन्दगी ख़तम होने वाली है. वो मेरे आने का इंतज़ार कर रहे थे.

मैं पिता जी के पास hi बीएड के किनारे बैठा था. पिता जी की आँखे मुझे hi देख रही थी. वो अपने एक हाथ से मेरा हाथ पकडे हुए थे. उन्हें इस हालत में देख कर मेरा कलेजा फटा जा रहा था. तभी पिता जी ने कहा.

"अपने आपको सम्हाल मेरे bete...main तेरे कंधो पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी रख के जा रहा हु. तेरी माँ और तेरी बहनो ने बहुत दुःख सहा hai...tu उन्हें हर सुख देना और ढेर सारा प्यार देना." पिता जी ये सब बोल रहे थे और हम सब उन्हें देख कर रो रहे थे. फिर उन्होंने माँ और मेरी बहनो की तरफ देखा और कहा.

"तुम सब तो जानती hi हो की ये पिछले पांच सालो से हमसे दूर रहा है. जाने किस हाल में था ye...iska ख़याल रखना तुम सब. अबसे यही तुम लोगो का करता धर्ता है. मेरे बेटे को कभी दुखी मत करना." पिता जी ने कहा तो माँ और बहने और भी ज़्यादा रोने लगी और बीएड के पास hi आ कर पिता जी के पास बैठ गयी.

"मुझसे वडा कर मेरे बेटे की तू इन सबका अच्छे से ख़याल रखेगा और इन्हे यहाँ से अपने साथ कही दूर ले जायेगा." पिता जी ने मेरी तरफ देखते हुए ये कहा तो मैं उनके सीने पर झुक गया और अपने सर को उनके सीने पर रख कर रोने लगा. पिता जी मेरे सर पर हाथ फेरने लगे और मुझसे फिर वडा करने को कहा तो मैंने रट हुए उनसे वडा किया.

मैंने ये ख्वाब में भी उम्मीद नहीं की थी एक दिन ऐसा भी आएगा. मेरे पिता जी को हार्ट की बिमारी थी. दो बार उन्हें हार्ट अटैक आ चूका था. मेरे जाने के बाद जैसे उनकी दुनिया hi उजाड़ गयी थी. अंदर hi अंदर वो घुट रहे थे जिसका नतीजा ये निकला की वो दिन प्रतिदिन कमज़ोर होते गए.

तभी मैंने महसूस किया की मेरे सर पर फिरता हुआ पिता जी का हाथ रुक गया है. मेरे कानो में मेरी बहनो की ज़ोरदार चीखे सुनाई दी और ज़ोर ज़ोर से रोने की आवाज़े तो मैंने पिता जी के सीने से सर उठा कर उनकी तरफ देखा तो देखता hi रह गया. पिता जी का सर एक तरफ को लुढ़क सा गया था. उनकी साँसे बंद हो चुकी थी. ये महसूस करते hi मेरी रूह कांप गयी और मैं उनसे लिपट कर बुरी तरह रोने लगा.

मेरे पिता जी इस दुनिया से जा चुके थे. भगवन ने उन्हें अपने पास बुला लिया था. कमरे में हम सब के रोने की आवाज़े बुलंद हो रही थी. हमारे रोने की आवाज़े बाहर तक पहुंची तो आस पास के घर वाले दौड़ते हुए हमारे घर के अंदर आये और कमरे के अंदर का नज़ारा देख कर सब के सब दरवाजे पर खड़े रह गए.

गांव के जिन लोगो से हमारे अच्छे रिलेशन थे वो लोग आगे बढे और हम सबको धीरज और सांत्वना देने लगे. सरे गांव में ये बात फ़ैल गयी की महेश पांडेय जी अब नहीं रहे. देखते hi देखते घर के सामने गांव के लोगो की भीड़ जमा हो गयी. गांव की औरतो ने मेरी माँ और बहनो को सम्हाला और मर्दो ने मुझे.

काफी वक्त लगा सब कुछ नार्मल होने में. गांव के जो लोग हमारे चाहने वाले थे. उनमे से कुछ बुजुर्ग लोग सामने आये और मुझे समझते हुए आगे की क्रिया करने के लिए कहा. मैंने दुखी मन से उनकी बात मानी और फिर सबके सहयोग से पिता जी की अंतिम क्रिया की तयारी शुरू हुयी.

शाम होने में काफी वक्त था जब हम सब मेरे खेत पहुंचे. हमारे जो खेत थे वही पर पिता जी का क्रिया कर्म करने के लिए ले आये थे. जब पिता जी को आग देने का नंबर आया तो मेरा कलेजा फैट पड़ा. आज मेरे सर से पिता का साया हैट गया था. मैंने बहुत दुखी मन से डाह संस्कार किया. मेरी माँ तो बार बार बेहोश हो जाती थी रट रट. मेरी बहनो का भी बुरा हाल था. गांव की औरते उन्हें सम्हालने में लगी थी.

शाम होने से पहले hi हम सब डाह संस्कार करके वह से घर आ गए थे. मुझे इस बात का ख़याल hi नहीं था की गांव का कौन कौन ब्यक्ति घर आया था. मेरे घर में मातम का माहौल था. रात तक गांव के कुछ मर्द और औरते मेरे घर में hi रही और हमें सम्हाले रही. बड़े बुजुर्गो के समझने का असर ये हुआ की अब मैं और मेरी माँ बहने रो नहीं रही थी.

ऐसे hi तरह दिन गुज़र गए और पिता जी की तेरवी भी हो गयी. अब तक हम सब नार्मल हो चुके थे. इस बीच दिल्ली से दक्षिणा का बहुतो बार कॉल आया था. मैंने उसे शुरू में hi बता दिया था की पिता जी अब नहीं रहे. उसने मुझे धीरज बढ़ाया और समझाया भी की मैं सबका अच्छे से ख़याल राखु.

तेरवी का कार्यक्रम मैंने बहुत अच्छे ढंग से किया था. सब कोई मेरी तारीफ कर रहा था. सबसे बड़ी बात ये थी की मणि शंकर और उसके घर वाले भी हमारे घर रोज़ाना आते रहे थे. मणि शंकर मुझसे बहुत अच्छे से hi मिला था. उसके मिलने से ऐसा लगा hi नहीं की उसने मुझे फ़साने का कितना बड़ा प्लान बनाया हुआ था पांच साल पहले.

सब कुछ हो जाने के बाद माँ ने एक दिन मुझसे कहा की अब हमें इस मनहूस गांव में नहीं रहना है. उन्होंने कहा की पिता जी ने जो कहा था वो करू. मैं माँ के कहने पर एक दिन मोटर सिक्ले से शहर गया. शहर में मैं उसी पटवारी से मिला और उसे सब कुछ बताया. पटवारी ये जान कर दुखी हुआ की मेरे पिता जी नहीं रहे. मैंने ज़मीने और घर बेचने की बात उससे की तो उसने कहा की वो इस बारे में पता करके बताएगा. उसने ये भी कहा की जिस ज़मीन पर मशला है उसे भी वो बेचवा देगा. मणि शंकर इसमें कुछ नहीं कर सकेगा क्यों की ज़मीन के कागजात मिल गए थे और वो मेरे पिता जी के पास hi थे. पटवारी ने पिता जी की बहुत हेल्प की थी उस ज़मीन के कागजात निकालने में और इस ज़मीन के कागजातों के बारे में मणि शंकर को कुछ पता नहीं था. वो यही समझ रहा था की ज़मीन लावारिश hi है और इसी लिए वो उसमे फसल ऊगा रहा था.

पटवारी ने मुझे एक आदमी का नंबर और पता दिया. उसने बताया की ज़मीन और घर वो अच्छे दामों में बेचवा देगा. पटवारी की बीवी ने खुद पटवारी से कहा की वो मेरे साथ जा कर उस आदमी से बात करे. बीवी की बात सुन कर पटवारी मेरे साथ चलने को तैयार हो गया. जब हम उस आदमी से मिले और उससे इस बारे में बात की तो उसने कहा की जल्द hi कोई खरीदार का पता करके बताएगा.

उस आदमी ने मुझसे दो दिन का वक्त लिया था. वह से मैं घर आ गया और माँ को सब कुछ बताया तो माँ ने कहा की ठीक है. माँ ने सब कुछ मुझ पर छोड़ दिया था. खेर दो दिन बाद मैं फिर से शहर गया और उस आदमी से मिला. पटवारी की बीवी इस बार मेरे साथ खुद गयी थी. वो मुझे अपने बेटे की तरह मानती थी.

डालर से मिले तो उसने हमें उस खरीदार से मिलवाया. खरीदार ने कहा की पहले वो ज़मीन देखेगा उसके बाद hi बताएगा की उसे क्या करना है. मैंने उसे बताया की मेरी साडी ज़मीन सिंचित ज़मीन है और मेरी ज़मीनो के पास से hi बड़ी नहर निकली है. मेरी ये बात सुन कर खरीदार खुश हो गया और फिर बिना ज़मीन देखे hi ज़मीनो का सौदा करने लगा.

मेरे पिता जी ने साडी ज़मीन मेरे नाम कर दी थी. साडी ज़मीन बीस एकड़ के आस पास थी. उस खरीदार ने साडी ज़मीन का पांच करोड़ रूपया बोलै तो मैंने पटवारी की बीवी की तरफ देखा. पटवारी की बीवी का नाम गायत्री देवी था. उसने उस खरीदार से कहा की ये तो बहुत काम है भाई साहब. बीस एकड़ सिंचित ज़मीन इतने काम दाम में हम नहीं दे सकते. शहर पास में hi पड़ता है और आज कल तो गांव की उस ज़मीन का भी दाम बढ़ चूका है.

उस दिन उस खरीदार से बात नहीं बानी तो गायत्री जी ने डालर से कोई दूसरा खरीदार ढूढ़ने को कहा और ये भी कहा की अगर ज़मीन देखने के बाद दाम तय करे तो ज़्यादा बेहतर होगा.

ज़मीनो को बेचने के लिए एक हप्ते तक भाग दौड़ करनी पड़ी मुझे. एक दिन माँ ने बताया की मणि शंकर मेरे बारे में पूछ रहा था और मुझे अपने घर बुलाया है. माँ ने मुझसे कहा की उसके घर जाने की कोई ज़रूरत नहीं है. उसने पिता जी को कई बार धमकी दी थी जान से मरने की. वो तो अच्छा था की पिता जी ने सीधा ऊपर hi उसकी फिर करवा दी थी. शहर का एक भला आदमी भी हमारे साथ था वर्ण मणि शंकर अब तक हमारे साथ कुछ भी कर डालता.

उधर दिल्ली से दक्षिणा भी मुझे फ़ोन करती और यहाँ के हालात के बारे में पूछती. मैंने उसे कह दिया था की मैं यहाँ का सब कुछ बेच कर hi अपनी माँ बहनो को ले कर दिल्ली आउगा. मगर वह मैं उसके साथ इन्हे नहीं रख सकता. इस लिए मैंने उससे कहा की वो एजेंट से बात करके अच्छा सा घर ढूंढ दे. दक्षिणा ने इसके लिए हाँ कहा और कहा की मैं जैसे hi सबको ले कर वह पहुँचूगा तो मुझे वह पर एक अच्छा सा घर मिल जायेगा.

दिल्ली से आये हुए आज मुझे बीस दिन हो गए थे. घर में सब नार्मल hi थे मगर इसके बाद भी एक सन्नाटा सा छाया रहता था. किसी के चेहरे पर कोई ख़ुशी नहीं दिखती थी. आखिर दिखे भी kaise...pita जी के न रहने से सब कोई खुद को अकेला hi महसूस कर रहा था. मेरा सारा दिन भाग दौड़ में hi काट रहा था.

एक दिन मैं शहर से आ रहा था तो गांव में hi रास्ते में सरपंच काका सामने से आते हुए मिल गए. मुझे उनके सामने रुकना hi पड़ा. मेरे रुकने पर उन्होंने पहले तो ऐसे hi मेरा हाल चाल पूछा और ये भी की मैं कहा था इतने सालो से. मैंने उन्हें झूठ बताया की मैं मुंबई में था. फिर उन्होंने पूछा की मैं यहाँ से सचिव की नौकरी छोड़ कर क्यों चला गया था तो मैंने बताया की पिता जी मेरा किसी बात पर झगड़ा हो गया था और उन्होंने मुझे बुरी तरह डाट दिया था इस लिए मैं घर छोड़ कर चला गया था.

मणि शंकर ने बताया की उसने भी मेरे घर वालो से मेरे बारे में बहुत पूछा था मगर सबने यही बताया था की पिता जी से मेरा किसी बात पर झगड़ा हुआ था और उन्होंने मुझे बहुत बुरा भला कहा था जिससे नाराज़ हो कर मैं घर छोड़ कर चला गया था.

कुछ देर इसी बारे में बात करने के बाद मणि शंकर ने मुझसे कहा की मेरे पिता जी ने उससे पैसे उधार लिए थे. पिता जी ने ये पैसे अपने इलाज के लिए उधार लिए थे उससे. मैं ये बात जान कर हैरान रह गया. क्यों की मुझे घर में किसी ने नहीं बताया इस बारे में. जब मैं पिता जी से मिला था तब उन्होंने भी नहीं इस बारे में मुझसे कुछ नहीं कहा था.

मैंने सरपंच काका से पूछा की कितना पैसा उधार लिया था मेरे पिता जी ने तो उसने बताया की यही कोई पांच लाख के आस पास. उसके पास सरे पैसो का हिसाब भी लिखा हुआ रखा है. मैं उधार पैसे की रकम सुन कर हैरान रह गया. क्या चाल बाज़ आदमी था ये. उसने सोचा होगा की इतने सालो बाद मैं आया हु तो बहुत पैसा लेके आया होगा. यही सोच के उसने ये तिकड़म लगाया था और मुझसे ये कहा की मेरे पिता जी ने अपने इलाज़ के लिए उससे अब तक पांच लाख रुपये धार लिए थे.

सरपंच जैसा कमीना इंसान ढूंढने पर भी न मिले. मैंने हिसाब देखने की बात कही तो उसने कहा की कल उसके घर आ जाओ और हिसाब देख लू. उसके जाने के बाद मैं भी घर आ गया. घर में मैंने माँ से भी इस बारे में बताया तो माँ ने गुस्से में सरपंच को गालिया देते हुए कहा की झूठ बोल रहा है वो कमीना. वो झूठ मूठ का मुझसे पैसे ऐंठना चाहता है. माँ ने मुझे साफ़ मन कर दिया की मैं उसे एक रूपया न दू.

दूसरे दिन दोपहर को मैं मणि शंकर के घर गया. मगर वो घर पर नहीं था. उसके घर में उसकी बीवी थी जो बाहर hi मुझे मिल गयी थी. उसने बताया की सरपंच काका और उसका बीटा रुपेश किसी काम से कही बाहर गए हुए हैं. सरपंच काका की बीवी अच्छी औरत थी. वो पहले भी मुझसे बहुत अच्छे से बात करती थी. इस वक्त भी वो मुझसे बड़े प्रेम से बात कर रही थी और मेरे पिता जी के न रहने पर शोक प्रगट कर रही थी. उसने मुझसे चाय नास्ता करने के लिए कहा तो मैंने मन कर दिया मगर वो न मानी. मजबूरन मुझे बैठक में बैठना hi पड़ा. मुझे बैठक में बैठा कर वो अंदर चली गयी.

बैठक में बैठा मैं रचना के बारे में सोच रहा था. मुझे नहीं पता था की अब रचना किस हाल में होगी. शायद उसकी शादी हो चुकी होगी. आज से पांच साल पहले मेरी उससे गहरी दोस्ती थी. मेरे मन में सवाल था की क्या हमारे बारे में गांव में किसी और को न पता चला होगा. अगर ऐसा होता तो इस वक्त रचना की माँ मुझसे इतने प्यार से बात न करती और न hi मुझसे चाय नास्ता करने का कहती. इसका मतलब ये हुआ की हमारे बारे में अब तक किसी को कुछ पता hi नहीं चला था. पिता जी से जिस भागवत काका ने बताया था उसे पिता जी मन कर दिया होगा की वो ये बात गांव में किसी से भी न बताये.

अभी मैं यही सब सोच रहा था की तभी मेरा ध्यान किसी के आने की आहात पर अंदर के दरवाहे की तरफ गया. कुछ hi देर में जो ब्यक्ति अंदर से बैठक में आया उसे देख कर मैं हैरान रह गया. ये तो रचना थी मगर ये तो बहुत बदल गयी थी. पहले कितनी सुन्दर लगती थी ये. जिसम का हर हिस्सा साचे में ढला हुआ होता था. मगर अब तो ये मोती हो गयी है. मैं आँखे फाड़े उसे देखे जा रहा था और वो मुझे. मुझे यकीन नहीं हो रहा था की ये वही रचना है जिसकी सुंदरता में मैं खो जाता था.

"रचना तुम.??" मैंने बड़ी हिम्मत करके उससे ये कहा तो वो अजीब तरह से मुस्कुरायी फिर बोली.

"शुक्र है की तुम मुझे पहचान तो गए. वैसे क्या मैं जान सकती हु की सब को भुला कर कहा चले गए थे तुम.?" रचना ने भारी आवाज़ में ये कहा तो मैंने उसकी तरफ ध्यान से देखा.

रचना का चेहरा पहले की तरह चमकदार तो नहीं रह गया था मगर सुंदरता वही थी. बस उसकी सुंदरता में फीकापन आ गया था. आँखों में आँशु तैरते दिखे तो मुझे हैरानी हुयी.

"ऐसे क्या देख रहे हो विक्की.? ओह्ह शायद ये सोच रहे होंगे की मैं आज कैसी लगने लगी हु है न.?" उसने मुझसे ये कहा तो मैं कुछ बोल न सका.

"मुझे समझ hi नहीं आया कभी की ये रोग कैसे लग गया मुझे. मैं तो बस तुम्हे अपना दोस्त hi समझती थी मगर पता नहीं कैसे दिल ने तुम्हे दोस्त से कुछ और hi बना लिया. हाँ vicky...ab जब तुम आ hi गए हो तो ये भी जान लो की तुम्हारी ये बर्षो पुराणी दोस्त तुमसे बहुत प्यार करती है. ये उसी प्यार का नतीजा है विक्की की तुम्हारे जाने के बाद मेरी ये हालत हो गयी. मैंने आज तक शादी नहीं की और न hi कभी करने की इच्छा है. मैंने तो खुद को तुम्हारी अमानत समझ लिया था. फिर कैसे तुम्हारी अमानत को किसी और का होने देती.?" रचना ने ये सब कहा तो मैं बुरी तरह हिल कर रह गया.

मैं ख्वाब में भी नहीं सोच सकता था की रचना ऐसा कर बैठेगी. मुझे हमेशा यही लगता था की रचना ने मुझसे अपने भाई की मार का बदला लेने के लिए hi दोस्ती की थी और यही सोच कर मैं अंदर hi अंदर डरा भी करता था और कभी उससे पूरी तरह खुल नहीं सका था. मगर आज रचना की हालत ने और उसकी बातो ने मुझे एक नयी हकीकत से मिला दिया था. रचना मुझसे प्यार करने लगी थी और फिर उसने खुद को मेरी अमानत बना लिया. मैं यकीन नहीं कर प् रहा था की ऐसा भी हो सकता है.

"मैं जानती हु की तुम मेरी बातो पर भरोसा नहीं कर प् रहे होंगे. मगर ये सच है vicky...jis दिन तुमने आखिरी बार मुझे अपनी आगोश में लिया था और वो सब किया था उसी दिन शायद मेरे अंदर के जज़्बात बदल गए थे. अच्छे तो तुम मुझे पहले से hi लगते the...magar प्यार इस लिए नहीं करना चाहती थी तुमसे क्यों की जानती थी की तुमसे मिलान नहीं हो सकेगा. मेरे पिता जी कभी भी मेरी शादी उस लड़के के घर में नहीं करेंगे जिसके घर का ये ब्राह्मण समाज पानी भी नहीं पिता. खेर chhodo....ab तो ये सब बात पुराणी हो गयी मगर पता नहीं क्यों इस दिल में मोहब्बत पहले से ज़्यादा हर दिन ताज़ी hi बानी रहती है. एक बात बताओ tumhe....maine अपनी इस मोहब्बत के बारे में आज तक किसी को नहीं बताया. मेरे घर वाले पूछ पूछ के हार गए मुझसे मगर मैंने कभी अपनी जुबां नहीं खोली और न hi ये बताया की क्यों मैं किसी से शादी नहीं करना चाहती.? अगर मेरी जुबां खुल जाती और मेरे घर वालो को पता चल जाता तो मुझे अच्छी तरह पता था मेरी हालत के लिए मेरे बाप भाई तुम्हारे घर वालो के लिए काल बन जाते. इसी लिए मैंने अपने दिल की बात अपनी परछाई तक नहीं बतायी." रचना ने ये सब कहा तो मैं और भी ज़्यादा हैरान रह गया. मेरा सर चकराने लगा था उसकी बाते सुन कर.

अभी मैं अपने आपको सम्हाल hi रहा था की तभी रचना की माँ अंदर से एक प्लेट में नमकीन बिस्कुट लिए आयी और मेरे सामने टेबल पर रख दिया. फिर मेरी तरफ देख कर मुस्कुराते हुए कहा.

"बीटा इसने तुम्हे परेशां तो नहीं किया न.? ये मेरी सबसे छोटी बेटी hai...shayad तुम पहचानते भी होंगे इसे. तब ये दुबली पतली हुआ करती थी मगर अब तो इसने अपना ख़याल रखना hi छोड़ दिया है. पता नहीं क्या सोचती रहती है रात दिन.? मेरे बच्चो में एक यही थी जो किसी के भी बारे में बुरा नहीं सोचती थी मगर जाने किसकी नज़र लग गयी मेरी इस बेटी को.?" रचना की माँ ने ये सब कहा तो मैं कुछ बोल न सका. जबकि उनकी बाते सुन कर रचना अंदर की तरफ चली गयी.

मेरे सामने टेबल पर प्लेट में नमकीन बिस्कुट रखा हुआ था मगर मेरे दिल और दिमाग में हलचल सी मची हुयी थी. कितना गलत सोचा करता था मैं रचना के बारे में. क्या रचना की इस हालत के लिए मैं जिम्मेदार था.? मैं अपने आप से सवाल कर रहा था मगर मुझे कोई जवाब नहीं मिल रहा था. रचना की बातो ने मुझे बहुत बड़ी दुविधा में दाल दिया था. उसने खुद को मेरी अमानत बना लिया था और मेरी वजह से उसने किसी से शादी करके अपना घर नहीं बसाया था. भगवन जाने आगे क्या होना लिखा था.

मैंने बड़ी मुश्किल से थोड़ा बहुत खाया और रचना की माँ से इजाज़त ले कर घर आ गया. अपने कमरे में बीएड पर पड़ा मैं रचना के बारे में सोचने लगा. क्या गुनाह किया था उस मासूम ने जो पिछले पांच सालो से मेरी चाहत की आस में खुद को तड़पा रही थी. क्या चाहती है वो मुझसे.? मैं तो अपनी माँ बहनो को ले कर यहाँ से दिल्ली चला जाउगा मगर उसका क्या होगा.???

मैं समझ नहीं प् रहा था की इस बारे में मुझे क्या करना चाहिए. अगर मैं रचना को यु hi छोड़ कर चला गया तो मैं जनता हु की वो साडी ज़िन्दगी यु hi मेरी चाहत में गुज़ार देगी. एक ऐसी चाहत में जो कभी उसे मिल hi नहीं sakti...main कभी उसका हो hi नहीं सकता. मुझे रचना के लिए ये सब सोच कर बहुत दुःख हुआ मगर मैं उसके लिए क्या कर सकता था.? उसने तो मुझसे कहा भी नहीं की मैं उसके लिए कुछ करू. शायद उसे अहसास था की अपने दिल से वो मेरे प्रति ये मोहब्बत नहीं मिटा सकती मगर खुद को पत्थर कर के उसने अपनी ख्वाहिशो का hi खून कर दिया था.

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
भाई लोग....

मैं आप सब के सामने एक सवाल रख रहा हु. उसका आप लोग सोच कर जवाब देना. ये समझो की मैं आपसे सुग्गेस्टिव चाहता हु....

यारा इस अपडेट को पढ़ कर आप सबको पता चल गया होगा की रचना का करैक्टर कैसा था. इस लिए मैं आप सब से ये जानना चाहता हु की रचना के लिए आप क्या चाहते हैं.? आप सब मुझे अपना सुग्गेस्टिव रीज़न के साथ ज़रूर देना भाई लोग. आप सबके सुग्गेस्टिव के बाद hi नेक्स्ट अपडेट लिखुगा....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....
 
भाई लोग....

यारा कुछ लोगो के सुग्गेस्टिव आये हैं. बाकी लोग का क्या सुग्गेस्टिव है इस बारे में. मैं आप सबके सुग्गेस्टियन्स के बेस पर hi इसके आगे कुछ सोच कर लिखुगा.

भाई लोग आगे क्या होगा ये तो मैं लिखुगा hi मगर मैं ये चाहता हु की मैं जो भी आगे लिखू उससे आप लोग संतुस्ट रहो. बाद में कोई रीडर ऊँगली न उठाये की ये क्या कर दिया पंडित ने....

सो भाई लोग अच्छे से सोच कर अपना सुग्गेस्टिव रीज़न के साथ मुझे दो. मुझे भी हेल्प मिलेगी आगे लिखने में....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....
 
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