Samraat ..The Tales of Debauchery, Hate & Revenge - Page 17 - SexBaba
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Samraat ..The Tales of Debauchery, Hate & Revenge

ऐसे hi तोह नहीं बरसों को सबके साथ खेल रही....

ये बात तो है.. विलन पार्टी है. स्ट्रांग तो होगी hi.

हाँ ये तोह सच में इंटरेस्टिंग पहलु होगा.. टेलिपाथी वस मैजिक.. हीरो वस दाएं

देखते हाँ कोमल कहाँ गई है. जिस कोठी में घुसी है. वहां के लोगों का वो क्या हल करती है..'

आग में जल रही है कोमल.. उसके साथ, उसके देश के साथ बुरा करने वळून को तो वो नहीं छोड़ेगी.. ♥️♥️
 




Episode:45


हम चरों सीढ़ियां उतर कर निचे पोहंचे तोह देविका ने बुआ को अपने गले से लगा लिया..

वह मस्ती करते हुए बोली : माँ! आप राजा के साथ बिलकुल एक रानी के जैसे दिख रही थी.

अक्षरा : माँ है भी तोह हमसे बढ़कर सुंदर!

उर्वशी : हाँ! और माँ आज भी हॉट एंड स---

बुआ ने उर्वशी के मोह पर हाथ रख दिए.. हस्ते हुए बोली

बुआ : बस बस.. तुम तीनो कुछ ज़यादा hi शरारती नहीं होने लगी..

जहाँ रुपाली कड़ी कड़ी आरही तिरछी हो रही थी. वहीँ षिमुना बुआ और सबको देख क्र मज़े ले रही थी. ऐसा माहौल ज़रूर उसे अपने प्लेनेट पर भी देखने को नहीं मिला होगा..

परिधि तोह बस मुझे hi देखती रह गयी थी. नहीं जानती थी, मैं उसके मैं का हाल जान सकता हों. वह अपनी आँखों से अपने दिल के हाल को शो करवाए बिना बहुत कुछ सोचे जा रही थी..

दुःख वाला माहौल भी था.. पर सबके लिए नहीं.. कइयों के लिए तोह जैसे ज़िन्दगी के सबसे हसीं पलों की शुरुआत हो गई थी..

परिधि भी ऐसी hi एक लड़की थी.. जो अपने मेहबूब को देख कर मैं hi मैं में नाच रही थी.. पगली कहीं की...

ऐसा बोलना नहीं चाहिए मुझे. पर जो मेरे सामने होगा, वहीँ बया भी करूँगा.. परिधि के अंदर कुछ ऐसा hi चल रहा था..

मैंने कहीं और नज़र नहीं करि... बाकि सब खड़े हमें देख रहे थे. मई किसी को नहीं देख रहा था. तोह सब मुझे देख रहे थे.. ज़रूर जब मैं उन्हें देखता तोह वह सब नज़रें चुरा लेते..

यहाँ पर पायल दी, विक्रम चाचा, ऋचा और परची नहीं थे.. बाकि सब थे..

शिमि ने मुझे चुटकी भरी तोह मैंने उसकी आँखों में देखा.. उसने मुझे अपने दिमाग में आने का इशारा किआ.. मैं उनके दिमाग में गया " क्या बात है मेरी भुलझडी. क्यों बुलाया मुझे अपने दिमाग में.. बेकार किसम का दिमाग है तुम्हारा.. कुछ जान hi नहीं सकता मैं तो"

षिमुना : ेहेहेहे! ये तोह अच्छी बात है न.. दिमाग एक पर्सनल डायरी हुआ करता है. और किसी को भी पर्सनल डायरी पढ़ने की इजाज़त नहीं होती.

दक्ष : काम की बात करो. यहाँ मुझे एक्टिव रहना है.

षिमुना : कुछ खास नहीं. मैं तोह बस परिधि की बात करने वाली थी..

षिमुना शोखी से बोली तोह मैं उसके दिमाग से निकल आया. वह समझ गई और स्माइल करने लगी.. बेकार किसम की बातें भी करने लगी थी सबके बीच कड़ी.

रुपाली अभी भी मेरे साथ लगी कड़ी थी..

दक्ष : चलें सब डाइनिंग टेबल पर चलते हाँ...

देविका : भाई, एक सेल्फी हो जाए आपके साथ.

परिधि : सेल्फी की बच्ची मेरे पेट में चूहे दौड़ रहे हाँ. पता है कितनी भूक लगी है मुझे.. और भाई को भी.. है न भाई.

मुझसे पहले षिमुना बोल पड़ी : हाँ हाँ सही कहा तुमने.. बहुत भूका है ये.. आज तुम्हारे हाथ से खायेगा तोह इसकी भूक मिट जाएगी.. आखिर तुम इसकी जा----

मैंने षिमुना के चुटकी काट दी. वह चुप कर गयी. परिधि के चेहरे पर मुझे कुछ हैरत दिखी. "जा" वर्ड कर वह जणू समझी होगी. शिमि कैसे जणू के बारे में जान सकती है. ये सोच कर उसे लगने वाला झटका वह सहन कर गई होगी. जल्द hi मुझे परिधि के चेहरे पर सुकून दिखने लगा.

मैंने षिमुना को घुरा तोह वह दबी हसी हसने लगी.. सब मिलकर डाइनिंग टेबल की और बढ़ने लगे..

बाकि सब मुझे अभी भी देख रहे थे. मैं किसी को नहीं देख रहा था.. मैं एक टेबल पर जा के बैठने लगा. तोह राजा ठाकुर बोले..

राजा ठाकुर : दक्ष बीटा! अब से आप परिवार के सबसे बड़े हो. अब से आप उस चेयर पर बैठेंगे. जो मौजूदा राजा ठाकुर की हुआ करती है. कृपया अपनी चेयर पर पधारिये.

मैंने सर उठा कर राजा ठाकुर को देखा तोह वो जो पहले मुझे देख रहे थे.. अपनी नज़रें झुका गए.

जिस चेयर पर वह हमेशा बैठा करते थे.. जो चेयर परिवार के सबसे बड़े और महान सदस्य को दी जाती थी. वह उन्हों ने मुझे दान कर दी.

मेरे नज़र उठाते hi आत्मग्लानि में व्यस्त सभी नज़रें झुका गए थे. मुझे सबकी ऐसी नज़रें देख कर ख़ुशी नहीं मिली थी.. कोण बीटा ऐसा चाहेगा.. उसके बड़े उसके सामने नज़रें झुकाएं, नज़रें चुराएं.. बाद किस्मती से वह ऐसा पाप कर बैठे थे. जो उन्हें उनकी hi नज़रों में गिरा गया था... अपने hi एक अंश पर भरोसा नहीं कर पाए थे.

मैं ख़ामोशी से राजा ठाकुर वाली चेयर पर बेथ गया.. जो कहा था राजा ठाकुर ने वह सच hi कहा था. मैं लौटा था तोह सबसे बड़ा बनकर लौटा था. पर मैं सबसे बड़ा होते हुए भी सबसे बड़ा नहीं हो सकता था..

बीटा भगवन भी बन जाएगा तोह माँ बाप से बढ़कर नहीं बन सकता.. उनका जो स्थान है, उसकी बराबरी कोई बीटा कैसे कर सकता है.. मैं भी नहीं कर सकता था.

पर ये वाली बात अलग थी. एक रूल था, एक परपम्परा थी.. जिसे निभाया जा रहा था. राजा ठाकुर एक तोह अपनी पोजीशन खुद मुझे दे रहे थे. दूसरे वह मेरे साथ गलत करके या गलत होते हुए देख कर एक गलत फैसला कर बैठे थे. इसलिए अब वह इस ओहदे के लायक नहीं रहे थे..

दूसरे अब उनकी उम्र भी हो गई थी तोह सिंघासन आगे किसी को ट्रांफर करना था. अपनी जगा किसी और को सिंघासन सौंपना हटा. मेरे शिव कोई और राजा ठाकुर की चेयर पे बैठने लायक नहीं था.. कोई और सिंघासन के लायक नहीं था..

मुझे बैठना hi पड़ा.. मैं अपनी चेयर पर जा बैठा.. अपनी चेयर के साथ मैंने दो और चेयर रखवा दीं.. राइट साइड में षिमुना तोह लेफ्ट साइड में परिधि को बिठाया.. परिधि का चेहरा गुलाब के जैसे खिल उठा था.. मेरे बाज़ो को थम कर वह बैठी बड़ी खुश दिखाई दे रही थी..

ऐसा hi हाल षिमुना का भी tha.dono के साथ बुआ, कुणाल, अक्षरा, उर्वशी और देविका बैठी थी..

और....

रुपाली परिधि के साथ कड़ी हुई जैसे आर्डर का वेट कर रही थी. उसके चेहरे पर ग़ुस्से की इन्तहा मुझे दिख रही थी. जैसी इंसल्ट उसकी हो रही थी.. उसके कारण वह ग़ुस्से से काँप भी रही थे.. एक तोह वह नौकरानियों के जैसे घाघरा चोली में थी. वह भी घटिया किसम के.. मिनी ड्रेस.. ऐसा ड्रेस जो वह पहन के कभी किसी के सामने नहीं आई थी..

दूसरे वह अपने hi घर में, सबके सामने एक नौकर के जैसे हाथ बांध कर कड़ी थी.

बरसों इस हवेली पर राज किया था उसने.. आज उसी हवेली के नौकरों के बीच वह भी एक नौकर थी.

जहाँ कुछ मेरे लिए खुश थे.. कुछ मेरे लिए आत्मग्लानि में थे.. वहीँ वह सब रुपाली के लिए दिल में नफरत भी लिए हुए थे.. बस नहीं चल रहा था. रुपाली को चीयर पहाड़ डालें. आत्मग्लानि में पड़े सब रुपाली के चलते ऐसी सीटूशन को फेस कर रहे थे. कैसे रुपाली पर उन्हें ग़ुस्सा न आता..

दक्ष : परिधि मेरी जान.. चलो इस नयी नौकरानी को आर्डर दो..

परिधि हैरान होक : मैं.. भाई! मैं!

दक्ष ; हाँ तुम! क्या तुम इससे बदला नहीं लोगी.. इसी के कारण तोह तुम्हे मुझे और मुझे तुमसे दूर होना पड़ा.

परिधि : हाँ भाई! परिधि रुपाली को ग़ुस्से से देखती हुई बोली.. फिर जैसे hi उसकी नज़र में रुपाली का पूरा गेटउप आया तोह वह कुछ झिप भी गई. रुपाली की ड्रेसिंग hi ऐसी थी.. पास खड़े होक के देखने से तोह ज़यादा hi क्लियर नज़र आ रहा था..

षिमुना : इसकी ड्रेसिंग पर मत जाओ परिधि.. ये कैसी है, पता तोह है सबको. चलो आर्डर दो..

परिधि : नाम क्या है तुम्हारा.. परिधि ने रुपाली ने पूछा तोह हम सब है पड़े..

देविका : हाहाहा! सही है.. पहले इस नयी नौकरनी के नाम का तोह पता चले.

रुपाली जलने भुनने लगी.

परिधि : नौकरानी हो, इतना भी नहीं जानती. मालिकान कुछ पोछे तोह बिना देरी से फार फार बोलना पड़ता है.. वर्ण--

देविका चहकते हुए : वर्ण नौकरी से हाथ भी धोने पद सकते हाँ.

हाहाहा.. सब का एक मुश्तर्का क़हक़हा गूंजा..

सब से मुराद मैं, परिधि, षिमुना और बुआ परिवार.. बाकि सब तोह हमें हसरत से देख रहे थे.. करणवीर भी राजा ठाकुर के साथ बैठे हुए ख़ामोशी से सब देख रहे थे. वह मेरे बारे में सब hi तोह जानते थे.. वह भी तोह इस खेल का हिस्सा था. सब जानते थे.. रुपाली के खेल में उनकी भी तोह कोई गए शामिल रही होगी.. वह भी कुछ नहीं बोल पाए.. वह अपने साथ हुए विश्वासघात और मेरे लिए आत्मग्लानि में व्यस्त थे. मतलब दो दो कारण थे, जो उन्हें चैन से बैठने नहीं दे रहे थे..

जब जब मैं सबको नहीं देखता था, तब तब वह सब मुझे देखने लगते थे..

रुपाली अपने हाथ की उँगलियाँ मरोड़ते हुए : मेरा नाम रुपाली है.

परिधि तोह सच में मालिकान बनने पे उतर आई.

परिधि : कैसी नौकरानी है तू.. तुझे ये भी नहीं पता. अपनी मालिकान से कैसे बात करते हाँ. कैसे अपनी मालिकान को अपना परिचय करवाते हाँ.. फिर परिधि मुझसे बोली.. भाई मुझे लगता ये पहली बार किसी बड़ी हवेली में बड़े लोगों के बीच आई है. इसमें तोह बिलकुल भी समझ बूझ नहीं है..

दक्ष : तोह दो न इसे समझ बुझ.. बड़े काम की सबत होगी ये नौकरानी..

परिधि : सच!

दक्ष : मुछ!

परिधि : चल बोल.. कैसे अपनी मालिकों को अपना परिचय दिए जाता है..

रुपाली सबको बरी बरी देखने लगी. सब उसे hi देख रहे थे.. सबको उसके साथ ऐसा बार्टन बहुत भा रहा था. रुपाली के लिए अपनी इंसल्ट सहन करना आसान नहीं था. वह ग़ुस्से और बेबसी के एहसास से थार थार कंपनी लगी थी..

मैं परिधि से बोलै : लगा न इसके एक. ऐसे ये सुनेगी नहीं.

परिधि भी बहुत आगे की चीज निकली.. परिधि ने रुपाली के बम्ब पे एक रख के मारी.

रुपाली पहले तोह परिधि को ग़ुस्से से देखि, फिर सर झुका कर लम्बी लम्बी साँसे लेने लगी.. खुद पर काबू पाने लगी.. फिर वह बोली तोह उसकी आवाज़ में एक ठहराओ आ चूका था..

रुपाली : मालिकान मेरा नाम रुपाली है. दक्ष मालिक ने मुझे आज hi यहाँ काम पे रखा है. मेरा धरम, करम पुरे तन मन धन से आप सब की सेवा करना है..

परिधि : शाबाश. अब सही बोली तू..

बुआ : ऐसी hi रहेगी तोह तुझे खाने को भी अच्छा मिले लगेगा.. जितनी सेवा करेगी, मेवा भी उतना बढ़िया मिलेगा तुझे.

देविका : और मुझे अपने पैरों की केयर करने की बड़ी पुराणी आदत है. मेरे पास टाइम काम रहता है. मेरी पढाई बहुत हार्ड है. तुझे मेरे पैरों की मालिश भी करनी होगी.

अक्षरा : मैं क्या बोलों

उर्वशी : हाहाहा.. रुपाली तू हम दोनों बहनो के सरे काम किया करेगी. जो जो हमारा मैं करेगा.. अब हम कुछ दिन यहीं रहेंगी.

परिधि हसने लगी : आप सब भी..

बुआ : और नहीं तोह क्या.. इस कुत्तिया के कारण हम सब को भी तोह दक्ष बेटे से दूर होना पड़ा है. हमें भी हमारी नज़रों से शर्मिंदा होना पड़ा है.

मैं तोह बस रुपाली की आवाज़ के ठहराओ पर hi धयान लगाए हुए था.. साली कितनी बड़ी हरमन थी रुपाली.. कितनी जल्दी खुद पर काबू प् लेने में माहिर थी. उसकी आवाज़ में ज़हरीली नागिन के जैसी फुंकार मैंने साफ़ महसूस कर ली थी. जिसे कोई और महसूस नहीं कर पाया था. सब उसके नौकरानियों वाले अंदाज़ पर है पड़ी थी.

षिमुना मेरे कान में बोली : दक्ष! सच कहूं तोह रुपाली का अंदाज़ उसकी आवाज़ की गहन गरज और पत्थरीला अंदाज़ मेरी बैकबोन में सनसनाहट सी दौड़ा देता है. ऐसी खतरनाक औरत मैंने पहले कभी नहीं देखि. अभी हालात इसके काबू में नहीं हाँ तोह इसका ऐसा अंदाज़ है. अगर ये कभी हमारे चुंगल से निकल गई और हमारे वार से बचने से सफल रही तोह पावर हासिल करके हमारे लिए बड़ी खतरनाक सबत होगी.

मैं षिमुना को देखते हुए : कह तो तुम सही रही हो शिमि.. मैं भी इसपर पूरी पूरी निगाह बनाये हुए हों. कभी कभी तोह मैं करता है, इसे मार दूँ. पर मार दिए तोह मेरे अंदर की आग काम नहीं होगी. और भी बढ़ जाएगी. इसे ऐसे hi टार्चर करूँगा. सबकी नज़रों में इसे ज़लील ो खुवार करूँगा. जैसा इसने मेरे साथ किया था. एक रंडी बनकर इसने मेरे साथ खेला था.. असली रंडी क्या होती, इसका इसे पूरा पूरा एहसास कराऊंगा. इसके परिवार को इसके सामने मारूंगा. जिसके बल बोते पर इसने ये सब किया है.. तब hi मुझे चैन सुकून मिलेगा शिमि.. इस कुत्तिया के कारण मुझे क्या कुछ देखना पद गया. मेरा परिवार पर ाँ पोहंचा इस के कारण.

मैं एक लम्बी सांस लेके बोलै तोह षिमुना ने मेरे हाथ पर अपना हाथ रख दिए..

मेरे चेहरे पर बदले भाव देख कर सब के सर ज़रूर एक बार फिरसे झुक गए थे.. एक मर्द को एक ऐसा दर्द कभी नहीं मिलना चाहिए. जैसा मुझे मिला था. वह भी अपने hi परिवार के हथु..

मर्द चुटिया हो, घटिया हो तोह चलता है. पर मैंने अपनी पूरी लाइफ में प्यार के शिव कभी कुछ किया hi नहीं था... प्यार में ज़िन्दगी बितायी थी, या शेरोन के से अंदाज़ में.

उसी पल सबकी नज़रें उठ गयी.. पायल दी आ रही थी.. सब पायल दी को देखने लगे.

वह ऐसे hi नहीं आ रही थी..

अपने कमरे से निकलने से पहले मैं पायल दी के दिमाग में गया था. जो हवेली के hi एक कमरे में घुटनो पर बैठी गहरे सदमे में थे.

मैं उनके दिमाग में गया तोह मुझे उनके दिमाग में मायूसी की इन्तहा देखने को मिली थी.. मैं सही समय पर भी पोहंचा था पायल दी के दिमाग में..

कभी कभी हालत ऐसे हो जाया करते हाँ. इंसान को कोई राह सुझाई न दे तोह वह आखरी फैसला कर लेता है. यानि कह अपनी मौत का सामना करने का फैसला.

पायल दी मेरी नज़रों में आना की हिम्मत खुद में नहीं प् रही थी. वह तोह जैसे अब जीना hi नहीं चाहती थी.. कैसे वह आईने में खुद का सामना कर सकती थी. कैसे वह मेरी आँखों में देख सकती थी. कैसे वह ज़िन्दगी भर प्यार और विश्वास शब्द पर बात कर सकती थी..

नहीं कर सकती थी, वह खुद का या मेरा सामना.. नहीं कर सकती थी वह ऐसी कोई भी बात. ऐसा मामलों में हिम्मत जवाब दे जाया करती है.. पायल दी की हिम्मत भी जवाब दे गई थी.. मेरी माँ न बाकियों ने मेरे साथ उतना नहीं किआ था. जितना पायल दी ने किया था.. इसलिए उनके अंदर आत्मग्लानि सबसे कहीं बढ़कर थी..

ऐसी घुटन उनके अंदर बढ़ गई थी. जो साँसे छीन लिया करती है. उनके लिए सांस लेना मुश्किल होने लगा tha..jab सांस लेना hi मुश्किल हो जाये. अपणु की नज़रों में सुर्खुरू होना मुमकिन न रहे तोह फिर ज़िन्दगी को ख़तम करना hi आसान काम लगता है..

पायल दी भी इस स्टेज पर आ कर कुछ ऐसा hi सोचने लगी थी.. कुछ ऐसे hi फैसले पर पोहंच रही थी.

मैं ऐसा कैसे होने दे सकता था.

मैं पायल दी के दिमाग में था.. मैं दिमागों से खेलने वाला खिलाडी बन चूका था. मैं कुछ भी कर सकता था. किसी की भी सोच को पलट सकता था. पायल दी की सोच को भी मैंने पलट दिए..

पायल दी की अपनी सोच में मैंने अपनी सोच मिलायी.. और कुछ प्रश्न उठाये..

"मैं जी कर अब क्या करुँगी.. मेरा मर hi जाना अच्छा है.. कैसे मैंने अपने हीरे जैसे भाई के चरित्र पर शक किया. सालों तोह वह मुझसे लिपट कर सोता रहा है. बरसों hi तोह मैं उसकी पवित्रता की गवाह रही हों. कैसे मैंने यकीं कर लिया मेरा भाई ऐसा घिनोना काम कर सकता है.. सच में मुझ जैसी बहिन को मर hi जाना चाहिए... par..par..par..main मर गयी तोह फिर किसी भी जनम में दक्ष की बहिन कैसे बन पाऊँगी. इस जनम में अपने भाई पर शक किया. उसपे रेपिस्ट का आरोप लगाया. उसे मारा पीटा, उसपर थूका.. मैंने प्रायश्चित नहीं किया तोह फिर किसी भी जनम में मई दक्ष की बहिन नहीं बन पाऊँगी. नहीं.. मैं मरूंगी नहीं. मई हर जनम में दक्ष जैसे भाई की बहिन बनकर जनमा लुंगी. मैं कैसे भी करके दक्ष की बहिन बनूँगी हर जनम में. मैं इतनी भी कमज़ोर नहीं हों. मैं वह सब कुछ कर गुज़रूंगी, जिस के करने से मुझे इस जनम में अपने भाई से माफ़ी से मिलेगी. अपने भाई की नज़रों में फिरसे देखने लायक भी बनूँगी. और ऐसा अटूट विश्वास भी अपने अंदर लाऊँगी. फिर कभी कोई रुपाली कुत्तिया जैसी मुझे मेरे भाई से दूर नै कर सकेगी.. फिर तो भगवन भी दक्ष को किसी भी जनम में मेरा भाई बनने से नहीं रोक सकता. इतना प्यार दूंगी मैं अपने भाई से. इतना भरोसा करुँगी मैं अपने भाई पर.. भगवन भी मेरी हर इच्छा पूरी करने पर मजबूर हो जायेंगे..

इतना सब पायल दी के दिमाग में बोल के मैं खामोश हो गया. वह समझी ये उसकी अपनी hi सोच थी. फिर वह इसी एंगल से सोचने लगी.." नहीं.. नहीं बुज़दिल नहीं हों. मई अपनी जान नहीं दूंगी. मैं कायरो की तरह से मौत को गले नहीं लगाउंगी.. मेरी जान तोह मेरा भाई है. एक माँ के जैसा प्यार दिए है मैंने भाई को.. मैंने कभी अपने भाई के शिव किसी और को सोचा भी नहीं था.. कैसे मैं अपने भाई पे विश्वास को घटा सकती थी.. नहीं मैं अब सब सुधरूंगी. सब सही करुँगी. एक बार फिरसे सब मुझे और दक्ष को देख कर कहेंगे. भगवन हर किसी को दक्ष और पायल जैसे भाई बहिन दे.. ऐसा प्यार भी आज तक नहीं देखा होगा. ऐसा भरोसा भी आज तक नहीं देखा. ऐसा प्यार दूंगी मैं अपने भाई को.. इतना विश्वास करुँगी मैं अपने भाई पर. नहीं मैं जान देकर दुन्या भर की बहनो को बदनाम नहीं करुँगी..

पायल दी उठ कड़ी हुई.. अब उनके अंदर की सोच बदली हुई थी.. मायूसी उनके अंदर से जा चुकी थी.. जैसे वह किसी फैसले पर पोहंच चुकी थी. वह कमरे से बहार निकली और हवेली में टहल कर खुद को और भी रिलैक्स करने लगी. ताज़ा हवा अपने अंदर उतार कर वह अपनी विल पावर को बढ़ने लगी.. मुझे लेके जो उसने सोचा था. वह नामुमकिन हद तक मुश्किल था.. पर पायल दी कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार थी..

ऐसे में मैं दी के दिमाग से निकल आया था.. दर्द मिला था मुझे अपणु से. बेहिसाब दर्द मिला था... पायल दी से बहुत ज़यादा दर्द मिला था.

जिस जिस के आप ज़यादा करीब होते हाँ. उससे मिलने वाली चोट बढ़कर हुआ करती है. पायल दी और अलका की और से मिलने वाली चोट मेरे लिए बढ़कर थी.. दोनों ने मेरे साथ बहुत बढ़कर किया था..

माँ, पापा, और सब भी मेरे लिए ख़ास थे.. पर जो स्थान पायल दी और अलका का था.. वह किसी और का नहीं था...

दोनों ने hi मुझे दर्द देने में कोई कसार नहीं छोड़ी थी..

अब पायल दी डाइनिंग टेबल की और बढ़ती दिखी तोह सब उन्हें देखने लगे सिवाए मेरे..



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कोमल जिस कोठी में घुसी थी. वह कोठी देश के जाने मने बिजनेसमैन की थी. एक महान समाज सेवक की थी. उसका नाम जगन्नाथ था.. देश भर की नज़रों में वह एक समाज सेवक hi नहीं एक महान पुरुष भी था..

हज़ारों की मदद करि थी उनसे.. हज़ारों लड़कियों की शादी करवाई थी उसने.. हज़ारों की ज़िन्दगी बनाई थी उसने..

ऐसा सब जानते थे..

पर कोई ये नहीं जनता था. जिन हज़ारों की ज़िन्दगी उसने बनाई है. बाद में उन हज़ारों की ज़िन्दगियों में जो जो तूफ़ान आये हाँ. वह तूफ़ान जगन्नाथ के कारण आये हाँ.

जगन्नाथ जब भी कहीं जाता था तोह कुछ लोग मीडिया को इन्फॉर्म कर दिए करते थे. मीडिया फ़ौरन वहां पोहंच जाया करती थी. जगन्नाथ किसी की मदद करता तोह मीडिया की नज़रों में आ जाता. किसी घर पर कोई घटना घाटी तोह जगन्नाथ वहां भी नज़र आता तोह मीडिया उसे लाइव दिखने लगती थी..

जगन्नाथ भेद की खाल में छुपा हुआ एक भेड़िया hi नहीं एक दरिंदा भी था.. इज़्ज़तों के साथ खेलना उसका मन पसंद खेल था. नयी नयी लड़कियों के मज़े लेना उसकी हॉबी थी. जिन हज़ारों की उसने मदद करि थी.. उन हज़ारों घरों की सेंकडो लड़कियों को अपनी हवस का निशाना बना चूका था. हवस का निशाना बनाने के बाद बहार के मुल्कों में उनकी तस्करी भी किया करता था. ये जगन्नाथ का रियल बिज़नेस था. बहुत बड़ा नेटवर्क था उसका..

बड़े बड़े नमी गरमी लोग उसके नेटवर्क का हिस्सा था. जहाँ और जिस अंदाज़ में भी उसे पैसा मिलता था वह हासिल किया करता था.. पैसों के मामले में वह एक पागल कुत्ता था. पर अपने परिवार से प्यार भी करता था. अपने परिवार से ढके छुपे वह सब कर रहा था. समाज की नज़रों में और परिवार की नज़रों में वह एक देवता था..

कोमल के साथ भी उसका यही मटर था... कोमल की नज़रों में जगन्नाथ एक महान समाज सेवक था.. कोमल को रपो हासिल करना चाहते थे. पर वह असफल हो रहे थे.. जगन्नाथ को ये काम सौंपा गया तोह लाखों डॉलर का सौदा करने के बाद जगन्नाथ ने कोमल को रपो के हवाले करने का एग्रीमेंट सिग्न कर लिया..

कोमल को जगन्नाथ एक जगह मिला तोह उसे अपने फार्महाउस पर चाय के लिए बोल दिए.. कोमल की नज़रों में भी जगन्नाथ एक सच्चा और खरा इंसान था.. कोमल ने हाँ बोल दिए.. धोके से कोमल को चाय में बेहोशी की दवा मिला कर पीला दी.. यहाँ कोमल भी जगन्नाथ पर विश्वास करते हुए भूल कर बैठी..

वर्ण कोमल उस समय एक ऐसी शेरनी थी. जिसके नाम की दहशत देश भर में पहेली हुई थी.. कोमल को धोका देना या काबू में करना मुमकिन नहीं था. विश्वासघात के चलते कोमल शिकार हो गई थी.. रपो के चुंगल में जा फँसी थी..

कोमल कोठी के अंदर घुसी तोह उसने एक और फायर कर दिए. फायर हुआ तोह घर के अंदर की महिलाएं चीख पड़ी थी..

कोठी क अंदर 2-3 hi गॉर्डस थे. जिन्हे कोमल ने शूट कर दिए था.. सबकी नज़रों में जगन्नाथ एक समाज सेवक था. ज़यादा गार्ड्स रख कर नज़रों में नहीं आना चाहता था. उसके खास और गुंडे उसके खास अड्डे पर मौजूद रहते थे..

इस समय वह भी कोठी में मौजूद था.. वह हाथ में गन लिए एक पिलर की आध में होते हुए कोमल पर फायर करने लगा. कोमल को अब शूट कर पाना मुमकिन नहीं था. वह भी जगन्नाथ जैसों के लिए तोह बिलकुल भी मुमकिन नहीं था.

कोमल की नज़रें एक शेरनी की नज़रें थी. जगन्नाथ के फायर करने से पहले hi वह लुढ़क कर साइड हो गई. जगन्नाथ का फायर खली गया.. तोह कोमल ने जगन्नाथ के हाथ की और अपनी गन करते हुए फायर कर दिए. गोली जगन्नाथ के हाथ पर लगी. जगन्नाथ के हाथ में छेड़ हुआ तोह उसके हाथ से गन भी गिर पड़ी..

जगन्नाथ चीख पड़ा तोह घर की महिलाएं चीखती हुई भागती हुई वहीँ आ गई.

जगन्नाथ ने फ़ौरन hi अपना चोला बदला और पहले जो उसके चेहरे पर दरिंदगी भरे भाव थे. अब एक मासूम चेहरे में बदल गए थे.. कोमल जगन्नाथ को देख कर स्माइल करने लगी. चलती हुई आएगी बढ़ी..

जगन्नाथ के दो बेटे और 3 बेटियां थी. बीटा कोई भी इस समय कोठी पर नहीं था. बेटियां थी.

जगन्नाथ : कोण हो तुम..?? किस मकसद से आई हो तुम मेरे घर.

कोमल : जगन्नाथ उर्फ़... कोमल रुक कर जगन्नाथ को देखने लगी..

जगन्नाथ की पत्नी डरते हुए भी कोमल के आगे गिड़गिड़ाने लगी.

कोमल ने एक फायर जगन्नाथ के एक घुटने पर कर दिए.. वह चीखे तोह पत्नी, उसकी बेटियां चीख पड़ी. जगन्नाथ के चेहरे पर दर्द और हैरत दोनों के भाव आ गए..

जगन्नाथ की पत्नी कोमल के पैरों में गिर पड़ी..

"क्यों मार रही हो मेरे देवता सम्मान पति को.. मत मारो मेरे देवता सम्मान पति को"

ऐसी hi दुहाई तीनो लड़कियां भी देने लगी..

जगन्नाथ की पत्नी जगन्नाथ के जैसी नहीं था.. वर्ण कोमल चाहती तोह सबको शूट कर देती. कुछ ऐसी hi आग उसके अंदर दहकने लगी थी..

कोमल : आपके पति का नाम जगन्नाथ है ना. समाज की सेवा करते हाँ न ये. अभी दिखती हों मैं आपको आपके पति का असली chahra..ye जगन्नाथ है यहा.??

जगन्नाथ की पत्नी को अपने पैरों से अलग किया फिर जगन्नाथ से बोली : मैं बोलूं या तुम खुद मुझे अपना नाम बताओगे. मेरा तरीका कुछ हटके है. कोमल ने दूसरा फायर जगन्नाथ के दूसरे घुटने पर कर दिए.. जगन्नाथ बलि के जानवर के जैसे चीखने चिल्लाने लगा.. सब की सब दहशत में आई हुई थी.

जगन्नाथ दर और ग़ुस्से से कोमल को देखने लगा..

कोमल : मेरे पास टाइम होता तोह तेरा और इन आँखों का सुकून से इलाज करती.. अभी मुझे और भी बहुत से काम करने हाँ. तुझ जैसे और भी बहुत से कुत्ते हाँ मेरे देश में. जिनका विनाश करना है मुझे. कोमल ने जगन्नाथ के घुटने पर सर पर गन लगा दी...

इस बार जगन्नाथ कोमल की आँखों में देख कर दर गया..

जगन्नाथ : क्यों कर रही हो तुम ये सब.. ये देश के एक जाने मने समाज सेवक की कोठी है. यहाँ ऐसी दरिंदगी----

कोमल : हाहाहा.. समाज सेवक... hahaha..desh के जाने माने समाज सेवक की कोठी.. हाहाहा....

कोमल : बोल क्या नाम है तेरा.. बोल.. बोल kutte..tera असली नाम क्या है.. वर्ण तेरे सर के टुकड़े भी गिनने मुश्किल हो जायेंगे.. bollll..bollll.. बोलल...

कोमल की आवाज़ की गड़गड़ाहट पर जगन्नाथ जैसा दरिंदा भी दहल उठा.

जगन्नाथ कुछ ऐसा दहशत में आया.. वह थार थार कांपने लगा.. वह बोलने लगा..

mmm..mmm..main...jj..nath..hon.. haan..main..jj..nath..hon..

जगन्नाथ की बेटियां जो माँ के साथ कड़ी कोमल की दरिंदगी पर दर के मारे कैंप रही थी.. जगन्नाथ के लिए दुखी थी.. सुनकर जैसे सदमे में आ गई थी. अपने पिता को जज नाथ बोलते सुना तोह शॉक हो गई.

कोमल चीखती हुई : क्या देख रही हो.. ज़रूर तुमने भी जज नाथ का नाम सुना होगा. ज़रूर तुम्हारी किसी जान्ने वाली की इज़्ज़त के साथ भी खेला होगा जज नाथ.. ऐसा hi है न.. बोलो.. ऐसा hi है ना... booooollooooooo..aisa..hi..ha..na..

धीरे धीरे जगन्नाथ की पत्नी और बेटियों के चेहरे बदलने लगे. उनके चेहरे के भाव नफरत में बदलने लगे..

कोमल : देखा जगन्नाथ, ऐसा hi अंजाम हुआ करता है तुझ जैसो का.. अपनी hi पत्नी अपनी hi बेटियों की नज़रों में गिरना पद जाता है तुझ जैसो को..

जगन्नाथ ऐसे रूप में अपनी बेटियों के रूप में नहीं आना चाहता था. अपनी पत्नी को भी ऐसे मरते नहीं देखना चाहता था. उसका रूप उसके घर को hi बर्बाद करके रख देगा, उसने सोचा नहीं था.

जगन्नाथ : kk..kon हो तुम.. जगन्नाथ अपनी असलियत खोल कर भी कोमल से उसके बारे में जानने लगा..

कोमल : बाटूंगी.. तुझे तोह मई ज़रूर बताऊँगी.. पहले तू अपने सरे काले कारनामो की फाइल्स मुझे दे..

कोमल ने गन की नाल अभी भी जगन्नाथ के माथे पर लगा राखी थी.. कोमल फिर जगन्नाथ को सर के बालों से घसीटती हुई उसके बैडरूम में ले गयी. तिजोरी खुलवा कर उसके सरे काले कारनामे जो कह कई फाइल्स में बंद थे. वह अपने अंडर लिए.. फिर वहीँ जगन्नाथ के सर में गोली उतार दी.. जगन्नाथ को मारने से पहले उसके कान में अपना नाम बोल दिए था.. नाम सुनकर जगन्नाथ को झटका लगा था.. पर वह ज़यादा देर हैरान नहीं हो सका था.. उसे सोचने के लिए समय नहीं मिल सका.. एक गोली कोमल की गुणसे निकली और जगन्नाथ के सर में छेड़ कर गई थी..

जगन्नाथ की पत्नी और बेटियां भी वहीँ रूम में आ गई थी.. वह खली खली नज़रों से जगन्नाथ को देख रही थी..

कोमल : जितनी जल्दी हो सके यहाँ से निकल जाओ. वर्ण इसके काले कारनामे मैं सबके सामने लाने वाली हों. जिन जिन को इसने बर्बाद किया है. वह सब तुम सब को बर्बाद कर देंगे.. जाओ.. जितनी जल्दी हो सके निकल जाओ यहाँ से..

और हाँ एक काम कर सकूँ तोह कर देना.. जितना भी पैसे इस हरामी ने कमाया है. वह सब ज़रूरत मांडो में बाँट दो. वर्ण उपरवाले का क़हर तुम सब पर भी बरसेगा..

जगन्नाथ की पत्नी अपनी एक बेटी से : अपने भाइयो को कॉल करो. उनसे पोचो वो कहाँ हाँ.. दोनों को यहाँ मत आने देना.. हम भी वहीँ चलते हाँ.. अब हम यहाँ नहीं रह सकते.. हम सबकी ज़िन्दगी बर्बाद हो जाएगी.. तुम सबकी ज़िन्दगी बर्बाद हो जाएगी.

कोमल : अपने पति की अंतिम कार्य नहीं करेंगे आप.

जगन्नाथ की पत्नी जगन्नाथ के मोह पर थूकते हुए : मैं नहीं जानती थी, ये जज नाथ है.. मैं सोच भी नहीं सकती थी. मेरा पति ऐसा नीच इंसान हो सकता था..

कोमल : अच्छी बात है.. तुम सब ऐसी न होती तोह मैं तुममे से किसी को भी ज़िंदा नहीं छोटी.. अपने बच्चू के साथ दूर के किसी इलाके में जा के बस जाओ.. अपने बेटो को अच्छे करम सीखना.. वर्ण मैं उनको दूसरा सांस भी नहीं लेने दूंगी..

सब वहां से निकल पड़े.. कोमल भी वहां से जाते हुए वहां एक पैग़ाम लिख कर वहीँ छोड़ गयी थी..

जगन्नाथ एक समाज सेवक था.. देश में फेमस था.. उसकी कोठी पर फायरिंग हुई तोह पुलिस और मीडिया तुरत वहां पोहंच गयी.

कुछ देर में कोमल का छोड़ा पुलिस को मिला तोह मीडिया तक जा पोहंचा. उसी समय मीडिया पर कोमल के नोट को फ़्लैश न्यूज़ बना कर पेश किया जाने लगा.



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दिल्ली की hi एक कोठी के ड्राइंग रूम में कुछ फॅमिली मेंबर्स बैठे हुए टीवी पर जगन्नाथ बारे न्यूज़ देख रहे थे...

एक आदमी(55) एक महिला(54) एक लकड़ा(25) उसकी पत्नी(23) और एक लड़की (24) बैठे न्यूज़ देख रहे थे..

टीवी पर कोमल का पैग़ाम टेलीकास्ट हो रहा था. एक फीमेल एंकर दबंग अंदाज़ में कोमल की बात बार बार दोहरा रही थी..

"sherni....sherni लौट आई है.. देश को खोखला करने वालो.. सावधान हो जाओ.. शेरनी एक बार फिरसे शिकार करने के लिए मैदान में उतर आई है.. बरोसन पहले जो शेरनी मंज़र से हैट गई थी.. वह एक बार फिरसे दिखाई देने लगेगी.. मैं मेरे देश को खोखला करने वळून का वहीँ हाल करुँगी जो पहले करती आई थी."

आदमी वहीँ बैठा हुआ था.. वह ये सुनकर उठा और बड़बड़ने लगा.. उसकी पत्नी और सब उसके शब्द सुनकर शॉकेड हो गए..

आदमी बड़बड़ने लगा.. komal..komal मेरी बच्ची.. मेरी jaan...meri बेटी.. तुम लौट आई ho..mujhe यकीं था.. तुम एक दिन ज़रूर लौट कर आओगी.. सब कहते थे तुम अब नहीं रही हो. तुम कभी लौट कर नहीं आओगी. पर मेरा दिल कहता था.. तुम ज़रूर लौट कर आओगी.. और तुम लौट आई..

सब उस आदमी के शब्द सुनकर सब गिरते गिरते बचे.. शब्द सुनकर फिरसे टीवी को देखने लगे.. इस बार वह भी टीवी पर आ रहे कोमल के एक एक शब्द पर घोर कर रहे थे..

आदमी कोमल का बाप था. तोह महिला कोमल की माँ.. लकड़ा भाई, तोह लड़की कोमल की बहिन..

आदमी और लड़के को छोड़ कर सब ख़ुशी से रोने लगे.. तोह लड़के ने अपने पापा को अपने गले से लगा लिया.. दोनों बड़े जोश के साथ एक दूसरे को भेंचने lage..ek दूसरे को बधाई देने लगे..


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आज के लिए इतना Hi मित्रो! मिलते हाँ अगले Episode के साथ जल्द Hi..


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ऐसा तो होना hi था.

देखते हाँ समय क्या कुछ ले कर आता है.. जाने समय के साथ किसकी चाल पहले कमयत हो

पायल को गलत फैसले करने से रोकना दक्ष का धरम करम बनता है.

रुपाली के साथ बुरा तो अब होता hi रहेगा.. जब तक वह डीके के चुंगल में है


देखते हाँ समय कोमल को उसके अपणु तक कब पोहंचता है...

थैंक्स ा लोट भाई..
 
यकीं था कोमल के डैड को. कोमल इस अलाइव... विश्वास पर तो दुन्या तिकी है

:thank_you:

ये बात तो सही है. रुपाली खतरा बन सकती है. देखते हाँ हालत क्या कुछ नया ले कर आते हाँ... फ़ौरन सजा दे दी तो चैन नहीं मिलेगा.. देर की तोह कुछ भी हो सकता है

आत्मगलनि है hi इतनी... कैसे सहन कर सकता है कोई भला.. वह जो प्यार करने वळून में सबसे बढ़कर हों, उनसे कोई ऐसा पाप हो तोह सहन शक्ति तोह बिलकुल तो बिल्कल भी नहीं रहती..

अब दक्ष सम्राट बना है तोह धरती और जाने कहाँ कहाँ का सम्राट बनेगा..

बहुत बहुत शुक्रिया भाई... लव यू
 
गलतियों और कोताहियों से hi जनम लेती है नयी नयी कहानियां...

देखते हाँ समय ने अपनी चक्कर में क्या कुछ छपा कर रखा है


मर कर प्रिस्किट नहीं हुआ करता... ज़िंदा रह कर अपनी की गई गलती को सुधारा जाता है.. पायल भी अब वही करेगी.. दक्ष कईसे अपनी बेहेन को कुछ होने दे सकता है

कोमल के बारे में जाना उसके परिवार ने.. कोमल ने दिए संदेस अपने परिवार को.. वह लौट आई है.. एक बार फिरसे वह टूट पड़ी है देश के दुश्मनो पर.

थैंक्स ा लोट भाई...
 
हिम्मत वाला स्टोरी को ऐसे hi टाइटल नहीं दिए था मैंने.. कुछ नेचर भी ऐसी hi है मेरी... घबराता मैं नहीं..

थकना और उक्ताना इंसानी फितरत है भाई.. टाइम न मिले तो एक स्टोरी हो या कई स्टोरीज.. उपदटेस आना मुश्किल हो जाया करता है.. अगर टाइम मिले तोह एक साथ कई उपदटेस भी लिखी जा सकती है.. सम्राट की अपडेट दो दिन पहले hi लिख चूका था.. पर कुछ रीज़न की बिना पर एडिटिंग के लिए टाइम नई निकल पाया.. और न hi हिम्मतवाला part लिख पाया..

स्पीड स्लो होने का एक hi मतलब बनता है. स्टोरी पर वर्किंग जारी है.. साथ बने रहे, में भी जल्दी आप का साथ नहीं छोड़ने वाला..

एक बात याद रखें.. 8300 थ्रेड्स ष्प पे रन हाँ.. अंडर 1000 hi कम्पलीट हो सके हाँ... वहीँ मेने अगर अपनी कुछ स्ट्रोइस को पेंडिंग छोड़ा है तोह कुछ तो कम्पलीट भी करि है.. आयने वाले समय में शायद में ष्प का वह इकलौता राइटर होंगे.. जिसकी कम्पलीट स्टोरीज की लिस्ट सबसे ज़यादा होगी...

जैसे यहाँ पर कुछ वरिटेरस ने रिकॉर्ड बना दिए हाँ.. वहीँ एक रिकॉर्ड मेरा ये भी बन चूका है.. जितने वर्ड्स मेने ष्प को लिख कर पोस्ट कर दिए हाँ... जितनी उपदटेस मेने ष्प को लिख कर पोस्ट कर दी ha..itni कोई भी पोस्ट नहीं कर सका..

आगे भी देखना भाई.. में कम्पलीट स्टोरीज का भी एक रिकॉर्ड ज़रूर बना जाऊँगा.....
 
Episode:46






वाया 3रद पर्सन.....




पायल दिंनिंग रूम में पोहंची तोह सब उसे देखने लगे.. पहले जो सब पायल की हालत देख कर पायल को बहुत टूटा हुआ समझ रहे थे. वही अब पायल को नार्मल प् कर बड़े हैरान हुए. कितनी जल्दी पायल ने खुद पर काबू बना लिया था..

सब दक्ष की हक़ीक़त जान कर टूट गए थे. आत्मग्लानि में तो व्यस्त हो गए थे. किसी को हौसले देने लायक नहीं रहे थे.

पायल की बदतर हालत देख कर भी कोई कुछ नहीं कर पाया था. जब कोई खुद के लिए कुछ नहीं कर सकता था तोह पायल सिंह के लिए कोई कैसे कुछ कर सकता था. सब भी तोह पायल सिंह जैसे दर्द की लपेट में थे. आत्मग्लानि की लपेट में थे.. खुद को सँभालते या पायल सिंह.. हौसला तोह कैसे सभी के अंदर ख़तम हो कर रह गया था. अपनी hi नज़रों में गिर गए थे. कैसे दूसरों की नज़रों में देखते हुए उसे हिम्मत दे सकते थे.

अब पायल सब को फेस एक्सप्रेशंस द्वारा किसी हद तक नार्मल दिखाई दे रही थी. वर्ण तोह पायल के अंदर अब भी भयंकर तूफानी झक्कड़ आये हुए थे. दक्ष को फिरसे अपना भाई बनाने के लिए, दक्ष की बहिन बनने के लिए उसे ऐसी स्ट्रगल करनी थी. जो शायद हिमालिया के पर्बतों को भी सर करने से मुश्किल होने वाली थी.

पायल सिंह प्रायश्चित hi नहीं करना चाहती थी. पायल सिंह जितनी मोहब्बत अपने भाई से किया करती थी. जितनी मोहब्बत उसका भाई उससे दिया करता था.. उससे कहीं बढ़कर अब करना चाहती थी. पहले से कहीं बढ़कर विश्वास बनाना चाहती थी. दक्ष से माफ़ी मांग कर, दक्ष के दिल में अपने लिए वही मोहब्बत फिरस लानी थी.

सब नामुमकिन हद तक मुश्किल था. पर मुश्किल तोह कुछ भी हो सकता है. पर नामुमकिन कुछ भी नहीं.. जहाँ प्यार hi प्यार हो, वहां हार मुमकिन नहीं रहती. एक विश्वास की कमी थी. उसमे बेहतरी लानी थी.

पायल एक चेयर पे बैठी, बिना किसी से बात किये भोजन करने लगी.. पायल भोजन करते हुए दक्ष को देख रही थी. दक्ष परिधि, शिमि, बुआ और बुआ परिवार के साथ बातों में लगा हुआ था. वह किसी और पर धयान नहीं दिए हुए थे..

पायल फिर परिवार के दूसरों को देखने लगी. किसी के हाथ में निवाला तोह किसी के हाथ में चमच. वह भोजन किये बिना दक्ष को हसरत और ग्लानि से देख रहे थे.

दक्ष भोजन करते हुए सबसे बातों में लगा हुआ था. दक्ष को देख नहीं लगता था, कोई ग़म, कोई दर्द उसके अंदर हो..

कितना बदल गया था दक्ष.. कितना सहन शक्ति आ गई दक्ष के अंदर...

पायल सोचने लगी. दक्ष ऐसा तोह कभी नहीं था. इतनी सहन शक्ति कैसे उसके अंदर आ गई. कैसे अपने दर्द को पिए सब से है है कर बातें कर रहा है. पायल परिधि को देख कर खुद पर अफ़सोस करने लगी. पायल को परिधि पर गर्व भी होने लगा. कैसे वह उससे छोटी होकर, विश्वास में उससे आगे बढ़ गयी थी. भले hi परिधि उसने सब लाइव नहीं देखा था. फिर भी अपने भाई पर उसने अपना विश्वास टूटने नहीं दिए था. देख भी लेती तोह भी शायद अपना विश्वास बनाये रखती.

पायल सिंह को परिधि पर गर्व होने लगा. आज परिधि उसे खुद से कहीं बड़ी दिखाई दे रही थी. पायल सिंह बेमानन से भोजन करने में लगी रही. वह रेगुलर दक्ष को hi देखे जा रही थी.

फिर उसकी नज़र रुपाली पर पड़ी.. रुपाली पर नज़र पड़ते hi पायल सिंह के अंदर जैसे नफरत का ज्वालामुखी दहकने लगा.. ऐसी नफरत उसके अंदर जनम लेने लगी. पायल का मैं हुआ, वह उठे और रुपाली के पास जा कर उसके टुकड़े टुकड़े करदे.. उस कुत्तिया के कारण कैसा समय देखना पद गया था उसे. अपने hi भाई की नज़रों में गिरना पद गया था.

फिर पायल की नज़र रुपाली की ड्रेसिंग पर गयी.. तोह पायल रुपाली को निचे से ऊपर तक देखने लगी.. टेबल के ऊपर से भी रुपाली का फटा हुआ घाघरा दिखाई दे रहा था. पायल फिर रुपाली के चुके देखने लगी. रुपाली के चमक रहा जिस्म देखने लगी.

पायल रुपाली को ऐसे देख कर नजरें झुका गयी. उसे बड़ी शर्म भी आने लगी रुपाली को ऐसे देख कर. परिवार में, परिवार के बड़ों के सामने एक महिला कैसे ऐसे कपड़ो में आ सकती थी.

पायल फिरसे सबको देखने लगी...

सब रुपाली को न देख कर दक्ष को देख रहे थे.

पायल भी भोजन करते हुए रुपाली को न देख कर दक्ष को देखने लगी..

भोजन ख़तम हुआ तोह दक्ष परिधि और शिमि के साथ उठ खड़ा हुआ. रुपाली को फिरसे दक्ष ने एक बाज़ो की लपेट में ले लिया था. दक्ष ने एक नज़र सबको देखा.. जो पल भर में hi अपनी नज़रें फेर गए थे.. कैसे दक्ष की आँखों में देख सकते थे.

बुआ और सब भी दक्ष के साथ उठ कड़ी हुई.. सब बहार जाने लगी..

पायल का दिल हुआ वह भी उनके पीछे जाये. पर वह ऐसा नहीं कर सकीय.. हिम्मत आ ज़रूर रही थी उसके अंदर. पर इतनी भी नहीं आई थी.. एकदुम्म से hi वह उठ कर दक्ष के पास जा पोहंचे. उसका हाथ थाम कर बोले.. भाई मुझे माफ़ कर दो..

माफ़ी के लिए, सबब कुछ पहले जैसा करने के लिए कई आग के दरियो में से गुज़ारना बाकि था अभी..

वह उठी और अपने कमरे में जाने लगी.. कमरे में पोहंच कर वह अपनी कमज़ोर पद रही हिम्मत को बढ़ने लगी.. कैसे भी करके वह दक्ष को अपने लिए मॉम ज़रूर करेगी.. ऐसी हिम्मत वह अपने अंदर ला रही थी.



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हवेली से बहार निकले तोह देविका ने रुपाली के बम्ब के एक जड़ दी.

देविका : भाई इसे साइड करो न. मुझे भी आपके साथ चलना है.. कितने गंदे कपडे भी पहन रखे हाँ इसने. देख कर hi शर्म आती है मुझे तोह.

परिधि : हेहेहे! और मुझे भी.

अक्षरा : मुझे तोह जैसे कभी आई hi नहीं.?

उर्वशी : मुझे तोह ये इस कपड़ो में बहुत हॉट लग रही है. ऐसे दिख रही है. जैसे किसी जंगल में बसी एक बस्ती की रहने वाली जंगली लेडी.

बुआ : हेहेहे!

दक्ष : अब तोह आप सब को इसे ऐसे hi देखने का आदि बनना पड़ेगा... रुपाली को और भी खुदसे जोड़ कर मैंने किश कर दी.. रुपाली पहले hi आग में जल रही थी. सबके सामने पहले hi बहुत सस्ती हो गयी थी. अब मेरे किश करने से वह सहन नहीं कर पाई और मुझे ग़ुस्से से देखने लगी. आग तो जैसे उसकी आँखों में बस कर रह गई थी.

बुआ : कुछ तोह शर्म करो दक्ष! मेरी बेटियां मेरे साथ हाँ.

दक्ष : तोह आप अंदर चली जाएँ सबको ले के. अब तोह मैं ऐसे hi रहने वाला हों.

बुआ : मैं नहीं जाने वाली. तेरा क्या पता. तू किसी भी समय फिर हवेली छोड़ कर चला जाए.

परिधि : जी नहीं.. बुआ जनि अब भाई कहीं नहीं जायेंगे. अब भाई हमेशा यहीं हमारे पास hi रहेंगे.

दक्ष : कोण जाने, किसकी अगली मंज़िल क्या हो.

साद : क्या मतलब.?

दक्ष : कुछ नहीं. ऐसे hi कह रहा है. आने वाले समय के बारे में भी तोह कोई कुछ नहीं जनता.. जाने कब क्या हो जाये. किस किस को कहाँ कहाँ जाना पद जाए. किसकी ज़िन्दगी में कैसे हालत आने वाले हो.. कैसे कोई जान सकता है.

शिमि ने मुझे एक चुटकी काटी.. मैं उसके दिमाग में गया तोह वह मुझसे बोली.

षिमुना : इन सब से खुद को छुपा के रखोगे क्या.

दक्ष : बता के भी क्या हासिल होने वाला है. षिमुना चुप कर गई.

कुछ देर और हवेली के टहलने के बाद हम सब अपने अपने कमरों में जा पोहंचे.. परिधि मेरे साथ मेरे कमरे में आना चाहती थी. पर मैंने उसे कल के लिए बोल दिए.

अपने रूम में पोहंचे तोह रुपाली एक साइड कड़ी होकर मुझे ग़ुस्से से देखने लगी.

अब तोह उसकी आदत हो गई थी, मुझे ऐसे देखने की.. उसे फिरसे ट्रांस में ले आया मैं. रुपाली फिरसे घुलम बन गयी.. फिरसे उसके एक्सप्रेशन बदल गए.. फिरसे वह मेरी सेवा के लिए त्यार हो गयी.

षिमुना : दसख! अब क्या इरादा है.

मैंने षिमुना को अपनी बहन में कस लिया.. उसके खूबसूरत चेहरे के पास हुआ तोह षिमुना की साँसे कुछ भरी होने लगी. वह मीठी नज़रों से मुझे देखने लगी.

दक्ष : प्यार का इरादा तोह बिलकुल भी नहीं है.

षिमुना की आँखों में नकली ग़ुस्सा आने लगा.

षिमुना : बिना प्यार के मुझे छूने की सोचा भी मत करो तुम समझे.. छोडो मुझे.

दक्ष : नहीं छोडूंगा.. क्या कर लोगी तुम.

षिमुना लम्बी सांस लेकर : यही तोह अफ़सोस है. कुछ कर नहीं सकती मैं तुम्हारा.. वर्ण तुझे बताती मैं. निमुनिका की परिवत्र शहज़ादी को बिना प्रेम के छूने वाले का अंजाम क्या होता है.

दक्ष : हाहाहा.. पवित्र शहज़ादी.. हाहाहा. कुछ ज़यादा hi हवा में नहीं उड़ने लगी हो तुम.

षिमुना शोखी से : अरे उड़ने की बात क्या करते हो तुम ठकुररररर. मुझे तोह उड़ने की पुराणी आदत है ठाकुर्रर्र..

दक्ष : हाहाहा.. साली तोह पृथ्वी पर आ कर नौटंकी ज़यादा करने लगी है.

षिमुना : हेहेहे! एक जोकर से मिली हों तोह नौटंकी तोह करनी hi पड़ेगी.

दक्ष : मैं जोकर हों.?

षिमुना : और नहीं तोह क्या. तुम जोकर hi तोह हो..

मैंने षिमुना को अपनी बहन में कैसा और बीएड पर ले गया.. बीएड पर षिमुना को लिटा कर खुद उसके ऊपर आ गया.

दक्ष : जोकर की अब जोकरगिरि भी देखो.

षिमुना ने अपनी दोनों बहन मेरे गिर्द कास दीं. और स्माइल से बोलने लगी.

षिमुना : दिखाओ न फिर मुझे अपनी जोकरगिरि.

दसख : दिखाओं.

षिमुना : haan...haan..dikhao.

दक्ष : पक्का.

षिमुना : pakka..bole तो सॉलिड..

मई हस्ता हुआ षिमुना पर झुका और उसे किश करने लगा.. जैसे hi मेरे होंठ षिमुना के होंटो पर लगे.. षिमुना ने मेरे गिर्द लिपटी अपनी बहन कसनी शुरू कर दीं.

आअह्हह्ह्ह्ह... साली इतनी प्वॉयरफुल्ल पकड़.. मेरी हड्डियां तोड़ने का इरादा है क्या.

षिमुना : हेहेहे! अब पता चला. मुझे मेरी मर्ज़ी के बिना छूने वाले का मैं क्या हाल करती हों. जोकरगिरि अब किसी और के सामने दिखाना.. मैं अब पवित्र नारी hi नहीं, एक कीमती चीज भी बन गयी हों. मुझे यौन किसी के सामने तुम ऐसे ट्रीट नहीं कर सकते तुम.. फूल हों मैं तो मुझे फूल समझ के प्यार करो.

षिमुना एक आंख से रुपाली को देखते हुए बोली..

दक्ष : तुम तो अपने प्लेनेट के अनेको के सामने चुद जाया करती थी. अब क्या हुआ. पता नहीं वहां तुमने कभी कपडे भी पहने होंगे कह नहीं..

षिमुना ने अपनी कसावट कुछ और भी बढ़ा दी. मेरी हड्डियां कद्द कद्द करने लगी. मैं इंसान था. जितनी भी जड़ीबूटियां खा लेता. षिमुना जितनी ताक़त मेरे अंदर नहीं आ सकती थी. अब तो साली पवित्र भी हो गयी थी. मैं दाल दाल पर मंडळाने वाला भंवरा बन कर रह गया था.. कैसे षिमुना की ताक़त के आगे ठहर सकता था.

दर्द के कारण मेरा चेहरा लाल पड़ने लगा..

दक्ष : साली अपने ठकुर्र्र के साथ ऐसा करती है.

षिमुना : हर पत्नी को ऐसा करना पड़ता है. जब जब एक पत्नी का पति बेशरम बनता है. एक पत्नी कभी भी अपने पति को मर्यादा लांघने नहीं देती.

मुझे षिमुना पर ग़ुस्सा नहीं आया. षिमुना को इस कदर बदला देख कर मुझे तोह ख़ुशी मिल रही थी. वर्ण षिमुना जैसी खुली सोच वाली लकड़ी की ज़रूरत मुझे बहुत थी.

रुपाली को वहां से जाने का बोल दिए मैंने..

रुपाली गई तोह मैं षिमुना को किश करने लगा.

षिमुना : लगता है, तुम अपनी एक अध् पसली ज़रूर तुड़वाना चाहते हो.

दक्ष : कामिनी अब तोह रुपाली भी चली गई है.

षिमुना नॉटी स्माइल के साथ : दूर तोह खुला हुआ है न.

दक्ष : अब दूर बंद करने की क्या ज़रूरत है भला.

षिमुना : ज़रूरत है. चलो पहले दूर बंद कर आओ.

दक्ष : दूर बंद करना मेरा काम नहीं है. जा के खुद hi बंद कर आओ.

मैं ढीला पड़ता हुआ बोलै.. तोह षिमुना ने भी अपनी पकड़ ढीली कर दी.'

मैं बीएड पर लेता तोह षिमुना मेरे सीने पर हाथ रखते हुए बोली..

षिमुना : कितने बेशरम हो तुम अब भी. जब रासलीला का खेल खेला जाने वाला हो.

एक मेरे जैसी शर्म वाली पत्नी दूर बंद नहीं कर सकती है. लाज शर्म से वह मर hi न कए कहीं..

दक्ष : अब तुम कुछ ज़यादा hi हवा में उड़ने लगी हो. और किसने कहा मेरा कोई ऐसा वैसा मूड है..

मैं षिमुना को छेड़ते हुए बोलै तोह षिमुना मुझे घूर कर देखने लगी.

षिमुना : क्या मतलब है तुम्हारा.?

दक्ष : मई तोह ऐसे hi तुम्हे छेड़ने के लिए तुमपर चढ़ दौड़ा था. वर्ण तोह मुझे अभी बहुत से काम करने हाँ.

षिमुना मेरे सीने पर मुक्के मारते हुए : काम तोह कभी ख़तम hi नहीं होने वाले. और जो होने जा रहा था. वह भी तोह एक ज़रूरी काम hi है न. उसके बिना तोह कोई भी काम धंदा न करे.

दक्ष : हाँ पर इस काम से भी ज़यादा ज़रूरी काम और भी हाँ.

मैं भी अब षिमुना को जलने के मूड में आ गया था.. बड़ी पवित्र बानी फिरती थी.

षिमुना ख़ामशी से उठी और दूर लॉक कर आई..

वह मुझे घर कर देखने लगी. मैं उसे एक स्माइल देकर ऑंखें बंद कर गया.

मुझे सच में काम पर hi जाना था. पं सर की बात न्यूज़ द्वारा मैंने जान ली थी. अब मुझे उस देवधर को देखना था. कैसे कैसे दुश्मनो से मेरा पला पड़ने लगा था. मैं जान कर हैरान होता जा रहा था.

पं के मंद से देवधर क सिक्योरिटी चीफ का नंबर मैं बहुत पहले hi ले चूका था. उसी समय गाडी में बैठे बैठे hi मैं कहीं से वह नंबर डायल करवा कर सिक्योरिटी चीफ के ब्रेन तक मैं अपनी पोहंच बना चूका था.

वह बहुत ज़यादा परेशां था. देवधर को सोचते हुए अपनी मौत को सोच रहा था. मैंने उसे बाद में देखने का सोच लिए था. अभी हवेली जा रहा था. तोह हवेली वाला मटर भी स्पेशल तवज्जु के हामिल था. मुझे एक्टिव रहना था.

अब फ्री हुआ तोह मैं सिक्योरिटी चीफ के दिमाग में जा घुसा..

उसके दिमाग में जाने से पहले मैंने एक बार फिरसे षिमुना को देखा था.. जो मुझे अब ग़ुस्से से देखने लगी थी. वह चाहती थी, कुछ रंगीन लम्हे गुज़ारे जाएँ. पर मैं जैसे उसे भाव hi नहीं दे रहा था. षिमुना मुझे उसपर धयान न देते देख कर जल भूल कर कबाब होने लगी थी. आग उगलती आँखों से मुझे देखने लगी.

जैसे hi मैं सिक्योरिटी चीफ के दिमाग में घुसा.. मेरे मोह से ोुघ्घ की आवाज़ निकल गयी. मैं ऑंखें खोल कर उठ बैठा..

षिमुना ने मेरे पेट पर मुक्का मार दिए था..

मैं दर्द से कराहता हुआ षिमुना को देखने लगा

षिमुना ग़ुस्से से : नाटक में तुम इतना भी बढ़ जाओगे, मेने सोचा भी नहीं था..

मैंने षिमुना को अपनी बहन में भरा और फिरसे बीएड पर लेट गया.

दक्ष : आह्हः मेरी भुलझडी.. तू कितनी बड़ी वाली कामिनी हो गई है. ज़रा भी लाज शर्म नहीं रही तुझमे. शर्म वाली बनती है और बेशर्मो वाले काम के लिए भी तू उतावली हो रही है.

षिमुना : क्या मतलब.? बेशर्मो वाला काम. प्यार करती हों मैं तोसे. तुम सम्राट हो, मैं सम्राट की होने वाली मल्लिका.. एक बार पहले भी हमारे बीच ऐसा सब हो चूका है. साडी हदें भी हम पार कर चुके हाँ. अब तो मुझे परमिट भी मिल चूका है. इतस ा बेसिक नीड दक्ष. तुम्हे ज़रूरत नहीं है, ऐसा बोल सकते हो तुम. पर मुझे बेशरम बोलोगे तोह जान ले लुंगी मैं तुम्हारी समझे..

दक्ष : हाहाहा! गुंडई कहीं की.. अब हिन्दू नारी बानी है तू.. तेरे जैसी hi होती है एक असली हिन्दू नारी. हक़ न मिले तोह छीनना भी जानती हाँ.. ठकुरर में हों और----

षिमुना : मैं भी तोह एक ठकुराइन हों. असली वाली.. समझे.. चल कर ले थोड़ा प्यार नहीं ते मर जावेंगे दोनों...

षिमुना एकदुम्म से फिरसे नॉटी मूड में आते हुए..

दक्ष : तेरा हर एक रंग मुझे घायल कर देगा शिमि डार्लिंग.. पर अभी मुझे सेकरतीय चीफ के दिमाग में जाना है. एक ज़रूरी काम है, पहले वह कर लूँ.

षिमुना हैरान होक : कोण सिक्योरिटी चीफ? पहले तुमने मुझे उसके बारे में नहीं बताया.

दक्ष : कैसे बताता.. अभी रस्ते में मिलते हुए जाना है उसके बारे में. पं वाली न्यूज़ नहीं सुनी तुमने क्या..

षिमुना : ोोू वह! हाँ! सुनी थी. ये वहीँ मटर है क्या.?

दक्ष : हाँ वही है मेरी जंगली बिल्ली.

षिमुना : तोह ीनता नाटक करने की क्या ज़रूरत थी. पहले बोल देते.. चल जा, उसे और सबको सबक़ सीखा कर जल्दी वापिस लौट..

षिमुना मुझे एक किश करके मेरे सीने पर सर रख कर लेट गयी.. मैं षिमुना के सर के बालों में उँगलियाँ फेरते हुए एक बार फिरसे सेकिरुतय चीफ के दिमाग में जा घुसा.

वह अभी भी चिंतित बैठा हुआ था. कल की रत गुज़री, फिर दिन गुज़रा.. पर वह इतना दहशत में आया हुआ था. अभी तक खाना भी नहीं खा सका था. बस पानी hi बार बार पिए जा रहा था.

मैं उसकी हालत पर उसके दिमाग में हसने लगा..

""kk..kon ha..kon है"" सिक्योरिटी चीफ उछाल पड़ा और इधर उधर देखने लगा..

दक्ष : हाहाहा.. दर गया क्या..?? किस से दर रहा है तू देवधर से.? मैं तुझे ज़िंदा छोडूंगा तोह देवधर के हथुन मरेगा न तू..

अब उसकी जान निकलने वाली हो गयी थी.. उसे कोई दिखाई नहीं दिया तोह वह दहशत में आ गया.. डरा हुआ इंसान जल्दी दहशत में आ जाता है. वह भी पल भर में hi बेपनाह दहशत में आ गया.

सम्राट... HAHAHA..SAMRAT.. आया है तेरे पास.. तू क्या इधर उधर देख रहा है...

सम्राट शब्द सुनते hi साले का मूट निकलने लगा.. उसने सच में hi मूतने शुरू कर दिए. उसके कपडे गीले होने लगे. तोह मुझे उसके दिमाग में रहते हुए hi उसके मूट की स्मेल फील होने लगी.. हाहाहा

सिक्योरिटी चीफ अपने रूम में था. मैंने उसे कण्ट्रोल में लेके कण्ट्रोल रूम में कॉल करवाई.. उसके दिमाग को झटका दिए तोह वह निचे गिर कर अपने सर को थाम कर तड़पने लगा.. उसकी चीखें सुनकर कई दौड़ पड़े थे..

पर तब तक सिक्योरिटी चीफ अपनी सांस रोक कर खुद को ख़तम कर चूका था. फिर क्या था. मैंने बरी बरी देवधर के महल के गार्ड्स के दिमाग में जाने लगा.. चरों और फायरिंग hi फायरिंग होने लगा.. धमाके hi धमाके होने लगा..

सिक्योरिटी चीफ के दिमाग से मैंने ज़रूरी इन्फो प्राप्त कर ली थी.. जिस एरिया में लड़कियां थी.. उस एरिया को सेफ रखते हुए बाकि का एरिया डिस्ट्रॉय करने लगा..

देखते hi देखते वहां तबाही फेल गयी.. देवधर की एम्पायर देखते hi देख मिटटी का ढेर बनने लगी.. सालों से बनाया हुआ एम्पायर पल भर में hi तबाह होकर रह गया था.

कुछ hi मिंटो में वहां उल्लू बोलने लगे the...ek को छोड़ कर मैंने वहां सबको मार दिया था.

पं के दिमाग में गया..

दक्ष : पं सर! कैसे हाँ आप.

पं : kk..kon.. पं सर भी नहीं समझ सके..

सम्राट!

पं : मैं कैसे यकीं करूँ, तुम सच में मेरे दिमाग में हो..

मैं हसने लगा.. पं सर जहाँ बैठे थे. मैंने उन्हें वहां से उठा कर दूसरी जगह बिठा दिए. ऐसा करते हुए मैंने पं सर को ग़ायब दिमाग बना दिए था. जगा बदलते समय वह मेरे कण्ट्रोल में थे.. वह जान नहीं पाए.. मैंने उनकी जगा बदल दी है.

दक्ष : अब आया यकीं आप को सर!

पं सर अपनी बदली जगा देख कर खड़े हो गए थे.

पं : ुंबलीवबले.. सुना था.. पर यकीं करना मुश्किल था..

दक्ष : बातें फिर कभी आपके साथ होंगी सर!.. अभी आप अपनी फाॅर्स को देवधर पैलेस भेजें.. वहां सब तबाह हो चूका है.. वहां कुछ और भी लड़कियां हाँ. उन्हें रिकवर कर लें..

इतना बोल कर मैं पं के दिमाग से निकला और देवधर पैलेस में एक गार्ड के दिमाग में जा घुसा.. मैंने उसे नहीं मारा था..

देवधर महल के किस एरिया में था.. ये सिक्योरिटी चीफ के दिमाग से मुझे पता चल गया था.. उस गार्ड को अपने कण्ट्रोल में लिए मैं वहां जा पोहंचा..

कुछ मिनट्स लग गए थे देवधर तक पोहचने में..

मैं गार्ड के दिमाग में रहते हुए वहां पोहंचा.. देवधर को देखा...

देवधर एक बड़े हाल में अल्टी पलटी मारे बैठा हुआ था.. चरों और एक रेखा खेंच कर एक सर्किल बनाया हुआ था उसने.. अजीब सा सामान उस सर्किल के अंदर मौजूद था. ऐसा सामान मैंने पहले कभी नहीं देखा था. कुछ फैसले पर एक पत्थर की सिल्ल थी.. वहीँ एक शैतानी मूर्ती भी राखी थी.. साथ hi एक बड़ा सा कड़छा पड़ा था. उससे बलि दी जाती थी...

बड़ी भयानक मूर्ती थी उस शैतान की.. उस शैतानी मूर्ती की आँखों में देख कर लगता था. जैसे वह ज़िंदा हो. गार्ड के दिमाग में रेहरे हुए hi मुझे अपने दिमाग में सनसनी सी महसूस होने लगी. ऐसा भयंकर दृश्य मैंने पहले कभी नहीं देखा था.

मरीन जीने मैं दक्ष ठाकुर भी ऐसा दृषु देख कर लाज उठा था..

बड़ा भयंकर सन था....

वह गार्ड भी ज़रूर होश में होता तोह वहीँ गिर जाता.. पर वह मेरे कण्ट्रोल में था. खुद में नहीं था. ऐसे भयंकर दृश्य देख कर किसी का भी दिल धड़कना भूल सकता था..

देवधर नजाने किस भाषा में क्या कुछ पढ़ रहा था. मुझे वह भाषा संस्कृत नहीं लगी. कुछ कुछ शब्द मिक्स लगे मुझे. पर मैं उसका मतलब नहीं समझ सका..

देवधर खुनी आँखों से गॉर्ड को देख रहा था. मतलब मुझे देख रहा था.. उसके होंठ रेगुलर हिल रहे थे.. चाप उसने बंद नहीं किया था.

महल में हुई तबाही बारे वह ज़रूर सब जान गया होगा.. धमाके थे hi इतने भयंकर.. पर वह कुछ नहीं कर सकता था.. वह रुक भी नहीं सकता था. रुकता तोह जो चाप कर रहा था. उसपर hi उलट पद जाता.. ऐसा सुन रखा था मैंने. पूरी दुन्या घूम चूका था.. ऐसी बातें मैं बहुत अच्छे से जनता था. चाप अधूरा रह जाने की सूरत में चाप करने वाला कभी बच नहीं सकता.. कुछ न कुछ उसका नुकसान ज़रूर होता है. वह पागल हो जाया करता है या फिर मर जाया करता है.

मैं देवधर को देखने लगा तोह बहुत टाइम निकल गया. दृश्य था hi ऐसा.. मैं भी

मेरी तंत्र तब टूटी, जब कई हेलिकोप्तेर्स की आवाज़ सुनाई दी.. उसी समय मुझे देवधर की खुनी आँखों में चिंता भी दिखी.. पर उसने अपना चाप बंद नहीं किया था.

देवधर की आवाज़ मैं सुन चूका था.. मैं उसके दिमाग में जा सकता था. पर अभी मैं उसने दिमाग में नहीं गया.. जाता तोह गार्ड के दिमाग से निकलना पड़ता.. देवधर मेरे बारे में कुछ जान जाता.. ऐसा मैंने अस ा सेफ्टी किया था.

गार्ड के हाथ की एक47 देवधर की और सीढ़ी करि और ट्रिगर दबा दिए.. पर ये क्या कोई भी गोली देवधर को छू भी नहीं सकीय थी.. सब गोलियां उस सर्किल से टकरा कर वापिस पलटी और गार्ड के सीने में घुसती चली गयी. बेचारा गार्ड न चीख सका, न hi दूसरा सांस ले सका..

गार्ड के मरने के बाद मैंने सोचा, एक बार देवधर के दिमाग में खमोशी से घुस कर देखा तोह जाये.. मुझे देवधर के दिमाग में जगा मिलती भी है या नहीं..

इस फैसले पर पोहंच कर मैं देवधर की आवाज़ और स्वर को याद करते हुए देवधर के दिमाग में जा पोहंचा..

देवधर मेरे बारे में जान नहीं पाया.. देवधर जैसे बलवान काली शक्तियों वाले को मेरे आने का पता नहीं चला.. ये जान कर मैं बड़ा हैरान हुआ..

सख्त हैरत की बात थी..

मैं देवधर के दिमाग की गहराईयों में उतरने लगा.. देवधर अभी भी अपने चाप में लगा हुआ था. पर मैं उसके दिमाग की गहराईयों में उतरा उसके बारे में जान रहा था.

देवधरे कोण था.. कहाँ से आया था. सब जान कर मुझे देवधर पर बड़ा ग़ुस्सा आया. देवधर पर तरस भी आने लगा..

कितना महान बन सकता था देवधर अगर बुरे रस्ते को चूसे न करता तो. गुरु जी को न छोड़ता तोह.. देवधर के दिमाग से मुझे गुरु जी और आशाराम का पता चला. जो मैं पहले नहीं जनता था..

अब जाना तोह मुझे यकीं होने लगा.. नियति ये सारा खेल क्यों मेरे साथ खेल रही थी..

देवधर को मार कर, मैं एक बड़े पापी को ख़तम करके, जहाँ अनेको के साथ भला करने जा रहा था.. वही आशाराम को भी बचने का सौभाग्य मुझे प्राप्त होने जा रहा था.. सोच कर hi मुझे असीम शांति प्राप्त होने लगी.. मुझे ऐसा लगा, जैसे मेरे अंदर से भी कुछ धुलने लगा हो..

देवधर के दिमाग में रहते हुए hi मुझे भागते क़दमों की आवाज़ें सुनाई दे रही थी.. देवधर मेरे बारे में जान जाता तोह शायद अपनी सुरक्षा के लिए कुछ कर जाता.

पर मैं उसे ऐसा कोई मौका नहीं देना चाहता था.. उसका हवसी, शराबी और शैतानी दिमाग मुझे मेरी मर्ज़ी करने से रोक नहीं सकता था. अगर मैं ख़ामोशी से उसपर पूरा पूरा कण्ट्रोल बना लोन तो..

माइनर ऐसा hi किया.. देवधर वहां आर्मी को देख कर घुसे में आने लगा.. उसने अपना चाप अधूरा नहीं छोड़ा था.. छोड़ता तोह उसके साथ कुछ गलत हो सकता था. और नहीं छोड़ता तोह कोई उसे उस मंडल से बहार नहीं निकल सकता था.....

मैंने देर नहीं करि और देवधर पर पूरा कण्ट्रोल बना लिया.. वह चाप करना भूल गया.. मैंने उसकी सांस रोक दी...

देखते hi देखते वह बैठा बैठा ऐंठने लगा.. वहीँ लेट कर तड़पने लगा.. अपने गले को थाम कर अपनी रुक चुकी सांस को बहाल करने की कोशिश करने लगा.. वह अब दहशत में आया तोह अपनी सांस बहाल करने के लिए कुछ और मंतर पढ़ने लगा.. पर उसका चाप अधूरा रह जाने से उसकी दिमागी हालत डेस्टोरी होने लगी थी. उसका चाप भी उसपर उल्टा पड़ने लगा था.

आने वळून ने देवधर को सर्किल के अंदर तड़प तड़प कर मरते हुए देखा.. तोह सब स्टेटस बनकर देवधर को देखते रह गए..

कितने बड़े काली शक्तियों वाले को मैंने पल भर में hi मार डाला था..

कुछ देर में देवधर के गंदे शरीर से उसकी आत्मा निकल गयी.. जैसे hi गंदे शरीर से आत्मा निकली.. देवधर का शरीर काला पड़ने लगा.. देखते hi देखते उसमे से धुवां उठने लगा..

मैं अब एक शोर मचा रहे आर्मी वाले के दिमाग में घुसा देवधर के नष्ट हो रहे शरीर को देख रहा था.

देवधर का ऐसा हाल देख कर मैं भी बड़ा हैरान हुआ था. मैं सोच भी नहीं सकता था. देवधर की ऐसी भी हालत हो सकती है.. काली शक्तियां पाने के लिए क्या कुछ करना पद जाता है.. अब अंदाज़ा हो रहा था मुझे..

कुछ hi मिंटो में देवधर के शरीर के जगा एक राख का ढेर पड़ा हुआ था.....



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लखनऊ शहर की एक कोठी के एक कमरे में मौजूद अवंतिका जो दिखने में किसी 20 वर्षी लड़की जैसी थी.. बूत उसकी आगे 60+ थी.. वह भी काली शक्तियों के चलते अभी तक सदा बहार थी..

उसपर कभी बुढ़ापा आया hi नहीं था..

उधर देखधर मारा तोह उसे पता चल गया..

वह चीख पड़ी.. उसकी चीख इस कदर बुलंद थी... पूरी कोठी के अंदर के नौकर चाकर थार थार कांपने लगे..

"किसकी इतनी हिम्मत मेरे चेले को मारे.. किस की इतनी हिम्मत मेरे चेले को मार कर मेरे बरसों पुराने मकसद का सत्यानास करे.. मरेगा वह.. बहुत बुरी मौत मरेगा.. जला कर भसम कर दूंगी मैं उसे. भसम कर दूंगी मैं उसके सरे परिवार को.. आग लगा दूंगी मैं चरों और.. आग लगा दूंगी.."

जितनी सुंदर वह थी.. अब उतनी बदसूरत वह दिखाई दे रही थी. गोरा मुखर उतना hi भयंकर दिखाई दे रहा था.. ऐसे रूप में देख कर किसी की भी आत्मा उसके शरीर से भाग निकले..


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आज के लिए इतना Hi मित्रो! मिलते हाँ अगले Episode के साथ जल्द Hi..


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Episode:47


अवनितका देवधर की गुरु थी.. अवंतिका ने जितना कुछ बी सीखा था. सब अवंतिका से सीखा था. आश्रम पर कब्ज़ा करना, गुरु जी को हराना देवधर का नहीं अवंतिका का सपना था. देवधर के विचार अवंतिका के विचार थे.

काली शक्तियों के मामले में अवंतिका देश भर में अपना लोहा मनवा चुकी थी. उसे सस्ती शोहरत की आदत नहीं थी. देश भर के लोगों के ज़ुबान पे उसका नाम हो, ऐसी कोई इच्छा अवंतिका के मैं में नहीं थी.

हाँ काली शक्तियां प्राप्त करने वळून में अपना नाम सबसे ऊपर रखने के लिए वह बहुत कुछ कर जाया करती थी. कोई ऐसा था, जो अवंतिका को न जनता हो. अवंतिका के नाम का डंका काली दुन्या में चरों और था.

शकुंतला की गुरु जादूगरनी भी अवंतिका का नाम जानती थी. उससे डर्टी थी. पर कभी अवंतिका को देखा नहीं था. अवंतिका सूरत बदल बदल कर सबके सामने जाया करती थी.

एक बार अवंतिका मिस्र गयी थी.. वहां एक अहराम में घुस कर एक मम्मी की आत्मा को काली शक्तियों के ज़रिये अपने वश में कर लिया था अवंतिका ने..

एक खोपड़ी के अंदर उस मम्मी की आत्मा को कैद कर लिया था.. अब भी वह mummy'aatma उसकी कैद में थी..

अवंतिका ने अपना सामन अलमारी से निकला और फर्श पर सेट करने लगी. अपने सामान में से वही खोपड़ी निकली और

अवंतिका मोह में hi मोह में कुछ बड़बड़ाने लगी.. अपने सामान में से मौजूद एक मिनी बॉक्स के अंदर से मिटटी रंग का पाउडर उस खोपड़ी पर फेंकने लगा..

"रघून... रघून हाज़िर हो जा.. मेरे घुलम हाज़िर हो जा... मम्मियों के सरकाड रघून हाज़िर हो जा.. हाज़िर हो जा.. हाज़िर हो जा....

उसी पल खोपड़ी की आँखों के गधे कॉर्फूल होने लगे. खोपड़ी के अंदर रौशनी गरिदर्श करने लगी. देखने से ऐसा लगा रहा था जैसे वह ऑंखें ज़िंदा हो रही हों.. 10 सेक् तक ये सन चलता रहा..

फिर वह रंग बिरंगी रौशनी उस खोपड़ी से बहार निकल पर हवा में एक जगा ठहर गयी.. रंग बिरंगी रौशनी एक चेहरे के आकर में आ गया.

"कुयं बुलाया है मुझे"

ऐसी आवाज़ उस रंग से निकली.. जो अगर कोई होशमंद इंसान सुन ले तोह उसकी रगों में दौड़ रहा खून पल भर में hi सूख जाये..

पर अवंतिका तोह खून की सेंकडो होलियां खेल कर इस स्थान तक पोहंची थी. उसे दर क्या लगता.. दर तोह उससे डरता था.

अवंतिका : तुझे बताना पड़ेगा मुझे खबीस आत्मा..

अवंतिका बेपन्ह ग़ुस्से से दहाड़ते हुए बोली

रघून अवंतिका को देख कर ज़ोर ज़ोर से हसने लगा. है है है है.. हे हे हे हे.. हो हो हो हो... हु हु हु हु . उसके हसने की आवाज़ भी ऐसी आवाज़ थी.. जैसे जंगली दरिंदे है रहे हो. बड़ी अजीब आवाज़ थी रघून की..

अवंतिका : है ले है ले... तू भी मुझपर है ले..... अवंतिका ने ब्राउन रंग का पाउडर एक बॉक्स से निकला और उस आत्मा पर फ़ेंक दिए.. रघून की आत्मा जो कोर्स की सूरत में हवा में तिकी कड़ी थी..

जैसे hi पाउडर उसपर पड़ा.. रघून की आत्मा हलक़ पहाड़ कर चीखने छिलने लगी.

"दया कर मुझपर.. बख्श दे मुझे.. निजात दे दे मुझे इस पीड़ा से.. ye..ye..ye..aahhhhh मररररर gaya...aaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh"

अवंतिका : तू सब जानते हुए भी मुझपर है रहा है.. तुझे मेरा मज़ाक उड़ने की जुर्रत कैसे हुई मूर्ख आत्मा.. मेरे सामने बड़े बड़े बलवान जादूगर घुटने तक देते हाँ और तू मुझपर हस्ता है..

"मुझसे गलती हुई malikan..jaldi से नीले रंग का पाउडर मुझपर दाल... आह्ह्ह्ह ये दर्द मुझसे सहन नहीं होता.."

अवंतिका : फिरसे कभी हसेगा मुझपर..

"मालिकान फिरसे कभी ऐसी गलती नहीं होगी"

अवंतिका ने नीला रंग अपनी हथेली पर रखा. उसपर कुछ पढ़ कर आत्मा की और फूंक मार दी.. नीला पोडवेर उस आत्मा पर पड़ा तोह जैसे उसे चैन आने लगा.. जले पर जैसे किसी ने ठंडा पानी फ़ेंक दिए हो. ऐसा सुकून रघून की आत्मा को प्राप्त होने लगा था..

अवंतिका : अब बता.. क्या जनता है तू देवधर के बारे में..

रघून की आत्मा एक दीवार की और मुड़ी.. उसी पल दीवार पर देवधर का सारा दृश्य नज़र आने लगा.. जो जो वहां देवधर के साथ हुआ था.. वह सब दिखाई देने लगा.

"मेरी मालिकान.. देवधर के दिमाग को सम्राट ने अपने कण्ट्रोल में ले लिया था.. यही एक कारण है देवधर की मौत का."

अवंतिका ग़ुस्से से उठ कड़ी हुई..... SAMRAT..SAMRAT तूने मेरे मामले में मदाखलत करके खुद के लिए बहुत बुरे समय का चुनाव कर लिया है. अब तू नहीं बचेगा..

फिर वह रघून से बोली.. कहाँ मिलेगा मुझे ये सम्राट..

रघून अपने सरे जोड़ तोड़ लगाने लगा.. पर उसके हाथ कुछ नहीं आया.

अवंतिका भी सब देख रही थी...

"लगता है तेरा फिरसे इलाज करना पड़ेगा मुझे"

रघून गिड़गिड़ाने लगा..." जितना मेरे बस में था.. उतना मेने बता दिए.. सम्राट कोण है. ये मैं नहीं बता सकता.. सम्राट एक काल्पनिक नाम है.. जब तक असल नाम का पता न चले.. उसकी आवाज़ न सुनाई दे.. मैं उसके बारे में कुछु नहीं कह सकता.. अब तक सम्राट बांके वह जहाँ जहाँ भी बोलै है.. अपनी आवाज़ में नहीं बोलै.. एक बार बी वह अपनी आवाज़ में बोलै होता तोह मैं जान जाता"

अवंतिका भी सब समझती थी.. वह बोली : चल फिरसे घुस जा अपनी खोपड़ी में..

रघून की आत्मा जैसे hi खोपड़ी में घुसने को हुई.. वह बोल पड़ी..

"लगता है, मेरी मुक्ति का समय आ गया है. जल्द hi मुझे तेरे चुंगल से मुक्ति मिलने वाली है."

इतना बोल कर वह दम दबा कर खोपड़ी के अंदर घुस गया.. वह जनता था. अभी अवंतिका उसका कुछ नहीं करेगी..

अवंतिका को रघून के शब्द सुनकर बड़ा ग़ुस्सा आया. पर तब तक रघून की आत्मा खोपड़ी के अंदर प्रवेश कर चुकी थी...

अवंतिका : सम्राट तू क्या हैसियत रखता है मेरे सामने. मैं हों अवंतिका.. तू सम्राट है तोह मैं भी महारानी हों.. जादूनगरी की महारानी.. कब तक मेरी नजरों से ओझल रहेगा तू..

कब तक.....

अवंतिका जो कुछ जानती थी. जितने मंतर जानती थी.. उन सभी मन्त्रों का उपयोग करने लगी. पर सम्राट के बारे में उसे कुछ भी ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ..



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मैं देवधर के पास से षिमुना के पास लौटा तोह पाया षिमुना मेरी आँखों में देख रही थी..

षिमुना : क्या रहा. निपटा आये सारा काम.

दक्ष : अभी बहुत देर लगने वाली है मेरी जान.

षिमुना का आज बड़ा मैं था मेरे साथ "झींगा लाला हु हु करने का" पर मेरा जवाब सुनकर उसके फेस पर मायूसी के बदल छ गए.

षिमुना को छेड़ना का अपना hi एक मज़ा था.

पर मुझे षिमुना का ऐसा फेस बिलकुल भी पसंद नहीं आया.. षिमुना को कंधे से पकड़ कर मैंने ऊपर किया और उसके होंटो को अपने होंटो में भर लिया.

रसीले होंटो का रास मेरे मोह में घुला तोह मेरे अंदर तक फ्रेशनेस उतर गयी.. षिमुना की आँखों की चमक भी बढ़ गयी. वह कुछ खुश तोह कुछ हैरान दिखाई दी. उसकी आँखों में प्रश्न भी tha"sara काम निताये बिना hi मेरे होंटो का रास पीने लगे"

मुझे बातें करने के लिए होंटो की ज़रूरत नहीं थी.. मैं षिमुना की आँखों में देखता हुआ, उसके होंटो का रास पीटा हुआ उसके दिमाग में जा घुसा..

अब मैं कुछ भी बोल सकता था.. मैं षिमुना के दिमाग में घुस के बोलै तोह मुझे मेरी आवाज़ में कुछ नशा सा फील हुआ.

दक्ष : तेरे जैसी हॉट एंड सेक्सी लड़की पास हो तोह काम किसे याद रहता है.

षिमुना पूरी तहह से सीधा होक मेरे ऊपर लेट गयी. मेरी बात पर वह खिल उठी. मेरे लुंड पर अपनी छूट को पूरी तरह से एडजस्ट करने के बाद उसने मेरे चेहरे को थाम लिया कर मुझे किश करने लगी. मेरी आँखों में देखती हुई अपने दिमाग में बोली.

"झूठा.. नाटक करता है मेरे साथ.. उम्म्म्म मुझे तंग भी करता ha..badmash..

मेरे हाथ षिमुना के कंधे से सरकते हुए उसके बटक्स पर जा पोहंचे.. मैंने षिमुना के दिलकश शेप वाले पहाड़ों को मसल दिए..

षिमुना की किश में प्यार बढ़ने लगा..

"बदमाश तो मैं हों hi.. तुम भी किसी गुंडई से काम नहीं हो"

षिमुना ने होंटो को अलग किया और मेरे एक गाल को अपने दांतो में भर लिया.

दक्ष : साली जंगली बिल्ली..

षिमुना मेरे गाल पर निशान बना कर ऊपर हुई और खिलखिला कर हसने लगी.

षिमुना : न मैं बिल्ली हों और न hi साली.. समझे.. मैं तोह प्रिंसेस हों..

दक्ष : प्रिंसेस बड़े खुले विचारों वाली होती है.

षिमुना : तो मैं भी तोह हों न खुले विचारों वाली.

दक्ष : नहीं तुम अब बदल गई हो.

षिमुना : बदल गई होती तोह ऐसे खुल के इतना सब नहीं करती..

मेरे हथु की गुस्ताखियां षिमुना की गांड की दरार में जारी थी. षिमुना कुछ मदहोश होने लगी थी. बड़ी गर्म लड़की थी षिमुना.. अब तो मैं भी एक गर्म मर्द था.

दोनों के जिस्म बेपनाह हीट छोड़ने लगे थे.

दक्ष : इतनी खुली न होती तोह मेरे साथ भी न होती.. चल अब तेरे विचारों की तरह तेरे वो भी खुले कर देता हों..

मैं हस्ते हुए बोलै तोह षिमुना समझने के बाद मेरे सीने पर मुक्के मारने लगी

ऐसे hi किश करते हुए हम एक दूसरे के साथ मस्ती मज़ाक, छेड़ छड़ करते हुए एक दूसरे को बेलिबास करने लगे.

पिछले 6 साल मैंने मौका मिलने पर खूब सेक्स किया था. तोह षिमुना भी अपने प्लेनेट की सेक्सी प्रिंसेस थी. खुल के सेक्स करने की आदि थी. दोनों के लिए खुद को संभल पाना बहुत मुश्किल होने लगा था..

लास्ट टाइम का हुआ सेक्स फर्स्ट सेक्स था. हम दोनों ने खुल कर एन्जॉय नहीं किया था. अब करने जा रहे थे. षिमुना कुछ शर्म वाली बन गई थी.

तोह मैं आग का बन चूका था.. मेरे अंदर की आग सैंकड़ों गुना बढ़ चुकी थी. मेरा लुंड तोह जैसे नारी के स्पर्श में आते hi मूड में आने लगा था..

बुआ, परिधि, देविका, अक्षरा और उर्वशी के गले लगते समय भी मेरे लुंड में हलचल ज़रूर मची थी. में योग में आगे न बढ़ चूका होता तोह ज़रूर अपने लुंड पर अपना कण्ट्रोल भूल चूका होता.. वह सब से मिलते समय सबको ज़रूर चुभता..

ऐसा hi मैं बन गया था.. मैं ऐसा बनना नहीं चाहता था. पर मुझे जो मिशन मिला था. उसमे मुझे पावर और कैपेबिलिटीज की बड़ी ज़रूरत थी.. बहुत से पॉवरफुल दशमो से मुझे टकराना था.

मुझे जल्द से जल्द प्वॉयरफुल्ल बनाने के लिए नजाने क्या कुछ खाना पड़ा था.. जिसने मेरे अंदर के सिस्टम को बदल कर रख दिए था.

मेरी ट्रैंनिंग भी पूरी नहीं हो पायी थी. जिसके चलते सेक्स के मामले में मैं खुद पर पूरा कण्ट्रोल नहीं बना सका था. जितना मैं अब खुद पर काबू बनाये हुए था.. ये भी मेरी हिम्मत hi थी.. वर्ण इतना मुझसे नहीं हो प् रहा था.

नारी शरीर मेरे स्पर्श में आते hi मेरे अंदर हज़ारों वोल्टेज करंट दौड़ने लगता था. सुरूर की इन्तहा मेरे अंदर उतरने लगती थी. ऐसे hi तोह नहीं मैं बुआ के साथ मस्ती करने लगा था.

मस्ती मेरे अंदर से फूट पड़ने के लिए 24 हरष बेककर रहने लगी थी.

दुःख था.....

अपणु के किये व्यव्हार पर बड़ा दुःख था. पर उसकी शिद्दत जैसे न होने के बराबर रह गयी थी. ऐसा कुछ मेरे अंदर का सिस्टम बदल कर रह गया था..

रुपाली और उसके परिवार के लिए, देश और समाज दुश्मनो के लिए ज़रूर मेरे अंदर नफरत और दरिंदगी वाले विचार थे... वहां मैं खुद को कण्ट्रोल में भी नहीं करता था. इसलिए मेरा वैसा रूप सामने आता था..

षिमुना और मैं जी भर कर किश कर चुके थे. अब षिमुना बीएड पर लेती लम्बी लम्बी साँसे ले रही थी.. उसके पत्थर जैसे ठोस बूब्स तन कर खड़े थे.. सच में षिमुना का एक एक अंग इस दुन्या की हसीं तरीन लड़कियों से कहीं बढ़कर था..

षिमुना को नुदे देख कर, उसके साथ मस्ती करके मैं खुद से बेखुद होने लगा था. मेरा लुंड झटके पर झटके मार रहा था..

षिमुना आँखों में बेपनाह चमक लिए मुझे देख रही थी..

मैं झुका और षिमुना के एक सख्त चुके को मोह में भर कर चूसने लगा.. इस तन्हाई थी तोह षिमुना भी पुराणी षिमुना बन गई थी. फुल बेशरम बन गई थी. ऐसे समय में शर्म को बीच में आने hi नहीं देना चाहिए.. वर्ण मज़ा जाता रहता है. और षिमुना तोह कामदेवी थी. ऐसे मामलों में मुझसे कहीं बढ़कर एक्सपर्ट थी. अधूरा मज़ा वह नहीं ले सकती थी..

जैसे hi उसका एक चुका मेरे मोह में आया.. षिमुना सिसक पड़ी.. षिमुना उछाल पड़ी. मेरे झुकने से मेरा लुंड उसकी छूट पर टिका हुआ था.. उसका दबाओ उसकी छूट पर बढ़ने लगा..

षिमुना : आठ दक्ष.. आज पहली बार ये तुम्हारे मोह में आया है. चूस डालो दक्ष.. उम्म्म्म ufffffffffff दक्ष.. पि जाओ.. खली कर दो... उम्मम्मम

षिमुना आग में जल रही थी.. उसके मीठा निप्पल मुझे हनी के जैसा लगने लगा था. दूसरा हाथ षिमुना के दूसरे चुके पर गया तोह षिमुना फिरसे सिसक पड़ी..

मैं षिमुना के दोनों चुचु के साथ एक सम्मान मज़े करने लगा.. बरी बरी दोनों को चूसने लगा.. इतने मीठे चुके मेरे नसीब में इससे पहले कभी नहीं आये थे..

षिमुना कभी मेरे साथ को अपने चुचु पर दबती तोह कभी अपनी गांड उठा कर अपनी छूट को मेरे लुंड पर रगड़ने लगती..

षिमुना बिना पानी के मछली के जैसे तड़पने लगी..

षिमुना की छूट बेपनाह हीट छोड़ कर मेरे लुंड की बेचैनी को भी बहुत ज़यादा बढ़ा रही थी.

देर तक मैं षिमुना के दोनों चुचु का रास चुस्त रहा.. षिमुना और अपने लुंड की बेकरारी को देखते हुए मैंने षिमुना के चुचु को chhoda...mann नहीं कर रहा था. फिर भी छोड़ना पड़ा.

षिमुना की आँखों में देखा तोह. षिमुना की ऑंखें पूरी लाल हो चुकी थी. ये भी बड़ी बात थी, अब तक षिमुना झड़ी नहीं थी.. जितना दबा दबा के मैंने षिमुना के चुके निचोड़े थे.. कोई और होती तोह अब तक झाड़ चुकी होती..

षिमुना बड़े प्यार से मुझे देख रही थी. बेचैनी भी बहुत थी उसकी आँखों में. पर वह मुझे जल्दी करने को नहीं बोल रही थी..

वह सुकून से सरे मरहले सर होते हुए देखना चाहती थी..

मैं निचे हुआ और षिमुना की छूट पर आ गया..

षिमुना की छूट को आज मैंने सही से देखा था. शेप में तोह वह शामे एअर्थ की छूट जैसी थी. बस उसके लिप्स छोटे थे.. छेड़ भी छोटा था..

छूट लिप्स पर हाथ रखा तोह वह मुझे फड़फड़ाते हुए लगे.. मैं षिमुना को देख कर उसकी छूट पर झुका और मोह लगा दिए..

एक लम्बी सांस ली और षिमुना की छूट के स्मेल अपने अंदर उतरने लगा.. षिमुना तोह सिहर उठी और मैं.. मैं और भी मदहोश होने लगा..

सेक्स के समय छूट की स्मेल दुन्या के सरे पेर्फुमेस की खुशबु से बढ़कर हो जाया करती है.. मेरे लिए भी षिमुना की छूट की स्मेल वर्ल्ड बेस्ट खुशबु में बदल कर रह गयी थी. उसका टास्ते..

टास्ते की तोह क्या hi कहने.. मैं बेसब्रो के जैसे षिमुना की छूट को मोह में भर गया.. भुकु की तरह षिमुना की छूट को चूसने लगा..

षिमुना के हाथ मेरे सर पर आये और मेरे मेरे सर को अपनी छूट कर दबाने लगे.

अब शायद षिमुना के लिए अपनी के पानी को रोक पाना मुमकिन न रहता.. कितनी देर वह अपनी छूट के रास को छूट सीमा पर रोके हुए थी..

"mmm..main पागल हो जाऊँगी दक्ष.. meeeeeeeeeeeeeeeeeeesssiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiii

aaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh meeeeeeeeeeeeeeeeeeeeesssssssiiiiiiii

(याद हो तोह निमंस माता पिता को मीसा मीसी बोलते हाँ..) आह्ह्ह्ह मीसी उफ्फ्फफ्फ्फ़ मीसी देखो आपकी प्रिंसेस कितने मज़े में है.. meeeeeeeeeeesssssiiiiiiiiiiiiiiiii उफ्फ्फफ्फ्फ़

ऐसा मज़ा वहां मुझे कभी प्राप्त नहीं हुआ meeeeeeeessiiiiiiiiiiiiiii

मैं षिमुना के मोह से निमुनिका वर्ड्स सुनकर स्माइल नहीं कर सका. मैं तोह मज़े से उसकी छूट चूस रहा था..

फिर जीब की नोक को षिमुना की छूट के छेड़ में घुसा कर चूसने लगा.. तोह वही हुआ.. जैसा मैंने सोचा था.. षिमुना आधी उठा कर मेरे सर को अपनी छूट पर दबाये अपनी छूट का सारा पानी भल भल मेरे मोह में छोड़ने लगी..

फ़ौरन hi वह पीछे को गिरी और लम्बी लम्बी साँसे लेने लगी.. मेरे तोह मज़े hi हो गए थे.. षिमुना की छूट का इतना स्वादिष्ट और ढेरों पानी मुझे पीने को मिल रहा था.. मैं वह सारा पानी मज़े से पीने लगा.. मेरा पूरा मोह षिमुना के चुतरस से लथड़ गया..

मई सीधा हुआ तोह षिमुना भी अपनी साँसे बहाल कर चुकी थी.. मुझे बेपनाह ख़ुशी से देखते हुए मुझे पकड़ कर बीएड पर गिराया और मेरे ऊपर आ कर मुझे किश करने लगी. मेरे होंटो पर लगा अपनी hi छूट का पानी चाटने लगी..

उसे परवा नहीं थी अपनी hi छूट के रास को चाटने में. वह तोह अपनी बेपनाह ख़ुशी ज़ाहिर कर रही थी.. चुतरस के साथ साथ मेरे होंटो का रास भी तोह उसे मिल रहा था.. मेरे लुंड को मेरे पेट से लगाए वह मुझे किश करने लगी..

कुछ देर तक अपनी ख़ुशी को बया करने के बाद षिमुना ने अपना सर उठा और मेरे दोनों गलों पर किश करते हुए अपनी छूट का रास मेरे गलों पर लगाने लगी..

षिमुना : ी लव यू दक्ष.. ी लव you...muah..muah..

बस कर पगली.. बावली हुई है क्या..

षिमुना : हाँ.. आज मैं बावली हो गई हों.. ऐसा मज़ा मुझे लाइफ में कभी नहीं मिला.

दक्ष : बहुत समय बाद मज़ा मिले तोह ऐसे hi विचार आने लगते हाँ.

षिमुना : नहीं न.. ऐसा नहीं है.. सच में मुझे ऐसा मज़ा कभी नहीं मिला. तुम भी तोह मुझे पहले कभी नहीं मिले थे.. तुम मेरे दिल के, मेरे जिस्म ो जान के सम्राट हो न.. ऐसा मज़ा कैसे कहीं और मिल सकता था. पहले दिल के खेल से भी तोह मैं अनजान थी न.

दक्ष : शिमि दिल की बातें मेरे साथ मत किया करो तुम समझी.. दिल वाली बातों से अब मेरा कोई वास्ता नहीं रहा..

षिमुना खुश थी.. मेरी बात में ग़ुस्से में नहीं आयी..

षिमुना : पर मेरा तोह वास्ता है न दिल वाली बातों से.. तुम्हारा अभी नहीं है तोह कभी तोह बनेगा.. ऐसा मुझे विश्वास है.

दक्ष : जब ऐसा समय आएगा तोह देखि जाएगी.. चल अब चूस मेरे लुंड को.. मुझे भी खुश कर.. और मेरे लुंड को भी.

षिमुना मुझे एक और किश करते हुए निचे हुई और मेरे लुंड को थाम कर चाटने चूसने लगी.. इस मामले में तोह षिमुना मास्टर थी.. बड़ी एक्सपर्टनेस से वह मेरे लुंड को चाटने चूसने लगी..

कुछ देर में वह बीएड पर साइड लेट गई.

दक्ष : क्यों.? आज खुद से लेने का मैं नहीं है.

षिमुना मेरे सीने पर हल्का मुक्का मरते हुए

षिमुना : नहीं.. वैसे मुझसे सारा नहीं लिया जायेगा. मुझे दर्द भी ज़यादा होगा. मुझसे सहन भी नहीं होगा और मुझे पूरा मज़ा भी नहीं मिलेगा.. तुम करो न सब अपनी मर्ज़ी से.. तुम दो न मुझे सारा मज़ा.. तुम घुसाओ न आज सारा मेरे अंदर.. मुझे भी तोह पूरा मज़ा चाहिए दक्ष..

दक्ष : हाहाहा.. तेरी चीखों से हवेली के डरो दीवार गूँज उठेंगे.

षिमुना : गूंजने दो. परवा नहीं है.

दक्ष : ऐ साली.. अब कहाँ गई तेरी लाज शर्म.. तेरी चीखें सबकी सुनाई देने लगेंगी.

षिमुना : तुम जानवर थोड़ी न हो. मुझे पता है, तुम मुझे दर्द डोज तोह प्यार भी डोज.. कुछ मज़ा डोज तोह कुछ धीरे धीरे करके hi डोज.. मैं इतनी भी कमज़ोर नहीं हों. जो चीख चीख पर सबको बताती फिरंगी..

मैं उठ बैठा : चल फिर घोड़ी बन जा.. ऐसे तुझे आसानी रहेगी..

षिमुना उसी पल घोड़ी बन गई.. पीछे से उसकी छूट दिखी.. उफ्फफ्फ्फ्फफ्फ्फ़ क्याआ शेप थी साली की छूट की.. ऐसी छूट मैंने पहले नहीं देखि थी. इस दुन्या की थी hi नहीं तोह कैसे दिखती मुझे.. uffffffffffff मैं झुका और षिमुना की छूट के साथ एक बार फिरसे मोह लगा लिया.. षिमुना मुद कर देखने लगी. एक हाथ पीछे ला कर मेरे गाल पर फेरने लगी.. षिमुना बड़ी मस्त लड़की थी.

हर एंगल में पूरा पूरा साथ देने वाली लड़की थी.

षिमुना की छूट छत्ते हुए मैं ऊपर हुआ और षिमुना की मिनी गांड पर मोह लगा दिए..

षिमुना बिदक कर आगे हो गई. उसकी गांड मेरे मोह से हैट गई.. षिमुना मेरी आँखों में देखने लगी. मैं उसे देख कर हसने लगा

दक्ष : हाहाहा.. क्या हुआ भुलझडी.. यौन बिदक क्यों गयी..

षिमुना जैसे मेरी आँखों में उतर कर मेरे मैं की बात जानना चाहती थी.

षिमुना : तुमने वहां क्यों छठा

दक्ष : वहां कहाँ.. जो चीज चाटने की है. उसे छठा hi जाता है न..

षिमुना : दक्ष! वहां का तुम सोचना भी मत.. सच कहती हों, वहां मई--

दक्ष : ोोू अछ्हा! हाहाहा.. तुझे क्या लगा मैं तेरी गांड चाट कर उसे नरम करने जा रहा था. छूट में न घुसा कर तेरी गांड में लुंड घुसाने वाला था.. हाहाहा.. बड़ी बुज़दिल है तू तो षिमुना.. मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं है. मुझे वहां अच्छा लगा तोह मैं अपनी जीब वहां लगा दी. तेरी मर्ज़ी के बिना तोह मैं नहीं डालूंगा न..

षिमुना : पक्का न....... षिमुना मेरी आँखों की गहराई में उतारते हुए बोली

दक्ष : साली इतने समय से तू मेरे साथ है. फिर भी तुझे "पक्का" बोलना पड़ेगा. तू कोनसी काम है.. मुझे ज़बरदस्ती करने भी तोह नहीं दे सकती..

मैं अपनी पीठ पर मसलते हुए बोलै.. कुछ देर पहले जब षिमुना ने मेरी हडियों को कड़कड़ाया था.

षिमुना ये देख कर हसने लगी. फिर खुद से वह घोड़ी बानी और गांड हिला मुझे देखते हुए बोली..

षिमुना : चाट ले.. जितना मैं करे चाट ले मेरी गांड को.. चाटने से तुझे मैं कभी नहीं रोकूंगी.. खाने का मैं है तोह खा भी जा.. पर वहां लुंड डालने की कभी सोचना भी मत..

षिमुना हस्ते हुए बोली तोह मई भी हसने लगा..

षिमुना की गांड और छूट को जी भर के चाटने के बाद मैंने अपने लुंड को थाम कर षिमुना की छूट पर रगड़ना शुरू कर दिए.. लुंड का सुपड षिमुना की छूट को पूरा hi छुपा गया था.. एंटी मिनी छूट थी उसकी..

कुछ देर रगड़ने का मज़े लेने के बाद मैंने अपने लुंड को षिमुना की छूट के छेड़ पर सेट किया.. षिमुना भी समझ गई. और खुद को बीएड पर एडजस्ट करने लगी.

अब देर करने का मैं नहीं था.. षिमुना की कमर को पकड़ कर मैंने हल्का सा धक्का मारा तोह मेरा लुंड षिमुना की छूट को खोलता हुआ अंदर प्रवेश करने लगा

"aaaaaaaaaahhhhhh मरररररर गाइइइइइइइ meeeeeeeeessiiiiiiiiiiii... दक्ष दर्द हो रहा है."

दक्ष : टेंशन न लो. धीरे धीरे आदत पद जाएगी.. धीरे धीरे तेरी छूट भी खुली होती चली जाएगी.. एक समय पर मुझे ऐसा भी लगने लगेगा.. जैसा मैंने तेरी छूट में लुंड डाला hi नहीं है. इतनी खुली हो जाएगी एक दिन.

मैं अब मस्ती के मूड में आया तोह षिमुना भी हसने लगी.

धीरे धीरे हलके हलके धक्के मार मैं अपना लुंड षिमुना की मिनी और टाइट छूट में उतरने लगा.. षिमुना को ऐसा दर्द हो रहा था. जैसे षिमुना फर्स्ट टाइम कोई लुंड ले रही हो.. उसके प्लेनेट के लुंड एअर्थ के लुंड के हिसाब से नहीं थी. न hi षिमुना की छूट हमारे हाँ के लुंड के हिसाब से..

आधा लुंड घुसा तोह षिमुना की मट्टी hi मरी गई थी. इतना तोह वह पहले भी ले चुकी थी.. कुछ और भी मैं पहले उसकी छूट में उतार चूका था. आज सारा डालना था..

ऐसा लगा रहता तोह पूरी रत निकल जाती.. कुछ देर आधे लुंड से छोड़ने के बाद षिमुआं की छूट को अंदर से पानी पानी किया.. फिर कसके उसकी कमर को पकड़ा कर एक करारा धक्का मार दिए..

लुंड hi पूरा का पूरा अंदर उतरा.. आकाश पहाड़ देने वाली चीख भी षिमुना के मोह से जारी हो गयी..

किसी ने सुनी भी होगी तोह मुझे कोई परवा नहीं होने वाली थी.. किसी को बुरा लगे तोह भी मुझे कोई ग़र्ज़ नहीं थी.. मैं किसी के दिमाग में नहीं गया. ये जान्ने की कोशिश नहीं करि. किस किसने षिमुना की चीख सुनी होगी..

षिमुना रोने लगी थी. उसकी छूट पहात गई थी. उसकी छूट से खून निकलने लगा था. जाने कितनी बार चूड़ी थी षिमुना अपने प्लेनेट पर.. फिर भी उसकी छूट से खून निकलने लगा था.

षिमुना : ज़ालिम इंसान.. कहा भी था.. इतना दर्द मत देना मुझे..

दक्ष : इतना तोह तेरे नसीब में था शिमि डार्लिंग.. असली सील टूटी है न.

षिमुना रट हुए भी हैरान हुई "ओह्ह haan"fir जैसे उसे याद आया.. तोह अपने होंठ भींच गई..

कुछ देर रुक कर उसके लटक रहे बूब्स को मसल कर उसे सुकून देने लगा..

कुछ देर में षिमुना नार्मल हुई तोह मैं उसे धीरे धीरे छोड़ने लगा.. धीरे धीरे षिमुना का दर्द काम होने लगा. वह भी मज़े से छोड़ने लगी.. मैं षिमुना की चमकदार और चिकनी गांड पर हाथ फेरते हुए षिमुना को छोड़ने लगा.. मेरे हाथ फिसल फिसल रहे थे षिमुना के बदन से.. ऐसे hi चिकने बदन की मालिक थी षिमुना.. लिखे ा फिश

अब हम दोनों hi मज़े में हो गए थे. हम दोनों hi मज़े से चुदाई का खेल खेलने लगे..

षिमुना खुश हो गई थी. पूरा लुंड लेकर.. इतना बड़ा और मोटा लुंड उसने कभी नहीं लिया था. आज लिया तोह असली मज़े का भी उसे पता चलने लगा..

धीरे धीरे मेरी स्पीड बढ़ने लगी... पूरा पूरा लुंड षिमुना की छूट के अंदर बहार हो रहा था..

कमरे में मैं को मस्त कर देने वाली आवाज़ें गूंजने लगी थी.



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पायल सिंह अपने बीएड पर लेती हुई खुद को अंदर से स्ट्रांग बना रही थी. वह किसी भी हाल में अपने भाई को फिरसे अपना भाई बना लेना चाहती थी.. जो पाप उससे हुआ था.. उसका प्रायश्चित करना चाहती थी. अपनी अपने भाई के लिए मोहब्बत को दुन्या भर की मोहब्बतों से बढ़कर बना लेना चाहती थी. एक आइडियल बहिन बनकर जीना चाहती थी..

पर कुछ भी आसान नहीं था.. सोचना आसान था पर करना एक तरह से असंभव.

वह कभी उठ बैठती तोह कमरे में टहलने लगती.. उसने भी किसी से कोई बात नहीं करि थी.

ऐसे hi कभी कभी सोचती हुई, अपने भाई के अपने अंदर फिरसे जागती हुई मोहब्बत के चलते वह दूर के पास जाती. उसका मैं होता. वह अपने भाई के पास जा कर अभी से स्ट्रगल शुरू कर दे.. उसे अपनी मोहब्बत का एहसास कराये..

पर दूर के पास जा कर वह थम जाती.. वह बड़ी दुविधा में फँसी हुई थी. उसकी सोचें किसी एक जगा पर भी नहीं ठहर रही थी. कभी कभी वह ऐसा सोच जाती. एक hi बार में अपने भाई के पैरों में गिर कर उससे माफ़ी मांग ले.. पर वह ऐसा नहीं कर प् रही थी..

एक बार उसने दूर खोल कर फिरसे बंद कर दिए था.. एक बार वह दूर खोल कर बहार कॉरिडोर में भी चली गई थी. फिर वापिस लौट आई थी..

एक बार वह दक्ष के रूम के दूर के पास जा के वापिस लौट आई थी..

ऐसा करते उसे बहुत समय बीत चूका था..

एक बार फिरसे वह दक्ष के रूम के दूर के पास कड़ी thi..woh खुद को रोक भी नहीं प् रही थी. उसका हाथ उठा.. वह दूर को नॉक करने hi जा रही थी.

अंदर से दक्ष और षिमुना की आवाज़ें सुनाई देने लगी.. बड़ी धीमी आवाज़ थी..

पायल सिंह न चाहते हुए भी दूर के साथ कान लगा कर अंदर की आवाज़ें सुनने लगी. जैसे hi उसे समझ आया.. अंदर क्या सन चल रहा है. उसकी कनपटियों पर पसीने की बूंदें इकठी होने लगी. उसकी सांस भरी होने लगी. उसके जिस्म में चियूंटियाँ रेंगने लगी..

वह तोह कुछ और सोच कर आई थी. उसके खवाब ो ख्याल में भी नहीं था. उसका भाई आते hi एक अनजान लड़की के साथ रूप में बंद होक सेक्स कर रहा होगा..

पायल कई विचारों में व्यस्त होने लगी. जहाँ वह पहली बार अपने अंदर अलग तरह की बेचैनी महसूस करने लगी.. वहीँ उसे दक्ष पर ग़ुस्सा भी आने लगा..

वह वही कड़ी अभी सोच hi रही थी.. षिमुना की दिल दहला देने वाली चीख सुनकर पायल काँप उठी.. उसका भाई इतना बड़ा दरिंदा भी हो सकता है. उसने सोचा नहीं था.

जैसी चीख सुनी थी. कैयो को सुनाई दी होगी.. पायल सिंह पुरे कॉरिडोर में देखने लगी. किसी ने दूर खोल कर तोह नहीं देखा बहार..

पर कोई दूर ओपन नहीं हुआ..

पायल कुछ पल और वहां कड़ी षिमुना की चीखें, कराहें सुनती रही.. वह फिर उलटे कदम वापिस अपने कमरे की और चल पड़ी.

कमरे में पोहंची. दूर लॉक किया.. बीएड पर गिर कर वह फिरसे विचारों में व्यस्त हो गई..

पायल सिंह फिरसे उलझने लगी. दक्ष ऐसा तोह नहीं था. कितना बदल गया था.. पायल सिंह जो पहले दक्ष को मानाने के लिए जाने क्या कुछ सोचे हुए थे.. प्रायश्चित के लिए कैसे कैसे प्लान बनाये बैठी थी.

दक्ष और षिमुना की चुदाई जान कर उसके विचारों में हलचल मचने लगी. कभी उसे दक्ष सही लगता तोह कभी गलत..

उसके अंदर बढ़ रही बेचैनी ने ज़रूर उसके विचार बुरे नहीं बनाये थे.. इस मामले में पायल सिंह अच्छी लड़की थी. वर्ण घर में चुदाई बारे जान कर रहा नहीं जाता.. पायल भी अपने अंदर की बढ़ी बढ़ी सनसनी पार्स धयान हटाए दक्ष को अब अलग अंदाज़ से सोचने लगी..



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पायल के जैसा हाल रोहिणी सिंह का भी था. एक माँ थी वह. पायल से ज़यादा नहीं तोह पायल से काम भी वह नहीं तड़प रही थी. रोहिणी सिंह निचे वाले फ्लोर पर रहती थी.. वह भी कई बार पाने कमरे से निकल पर बहार टहलने लगी थी. कई बार सीढ़ियों पर चढ़ कर वापिस लौट गयी थी..

उसकी भी हिम्मत नहीं हो रही थी दक्ष के पास जाने की.. जब षिमुना की चीख गूंजी तोह रोहिणी सिंह स्टैर्स पर थी. वह पायल को भी देख रही थी, जो दक्ष वाले रूम के दूर पर कड़ी हुई थी..

बहुत देर से वह पायल को देख रही थी. पायल को भी अपनी जैसे कश्मकश में व्यस्त देख कर वह भी तड़प उठी थी. उसकी तड़प पायल को देख कर और भी बढ़ गई थी..

पायल का दूर को जान लगा कर सुन्ना, फिर षिमुना की चीख.. रोहिणी सिंह एक माँ होक ऐसा सब नहीं देख सुन सकती थी..

बड़ी मुश्किल से वह खुद को संभाले हुए थी.. वापिस लौटती तोह क़दमों की आवाज़ पायल के कानो तक पोहंच सकती थी. जब तक पायल वहां कड़ी रही. रोहिणी सिंह भी वहीँ कड़ी रही..

उसके अंदर कुछ था तोह बस दर्द. दक्ष कैसा बन गया था.. ये सोच कर उसके दिल में दर्द होने लगा था.. कोई भी माँ अपने बेटे को इस हद तक नहीं देख सुन सकती थी.

फिर वह भी उलटे क़दमों वापिस लौट गयी.. अपने कमरे में बीएड पर लेट कर वह छत को ताकने लगी. उसकी गीली आँखों में फिरसे आंसू बहाने शुरू कर दिए...

दूसरी और मोह किये अर्जुन सिंह, जो जाग रहे थे.. नींद उनकी आँखों से भी कोसो दूर थी.. पलट कर रोहिणी सिंह को कुछ भी नहीं बोले सके... कहाँ से लेट इतनी हिम्मत.. कैसे देते रोहिणी को दिलासा..



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षिमुना की चीख ऊपर के फ्लोर पर रह रहे सभी ने सुन ली थी.. ऊपर के फ्लोर में बुआ और उसका परिवार था..

विक्रम सिंह, परची भी उसी फ्लोर पर थे.. पर वह अपनी टेंशन में व्यस्त थे.. रुपाली ज़रूर षिमुना की चीख सुनकर खुश हुई थी. अभी घुलम थी.. तोह मालिक की हर ख़ुशी में खुश थी.

देविका और परिधि एक hi बीएड पर लेती हुई बातों में लगी हुई थी.. जब षिमुना की चीख सुनी तोह..

देविका हसने लगी.. परिधि का गाल लाल होने लगे थे.. उसे दक्ष के साथ देखे सभी खवाब पल भर में याद आ गए थे..



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अलका सबमरीन के एक केबिन रूम में एक मिनी बीएड पे सो रही थी.. अलका बड़ी मीठी नींद सो रही थी. उसके होंटो पर बड़ी प्यारी मुस्कान थी..

जाने क्यों उसके होंटो पर मुस्कान थी.....

पर धीरे धीरे उसके होंटो की मुस्कान जाने लगी.. उसके फेस भाव बदलने लगे.. माथे पर अनगिनत लकीरें सी बनने लगीं

नींद में hi उसे दक्ष और षिमुना के बीच का वार्तालाब सुनाई देने लगा.. जिसे सुनकर अलका फाटक से अपनी ऑंखें खोल देना चाहती थी..

पर जैसे वह किसी ट्रांस में थी. अपनी मर्ज़ी से वह अपनी ऑंखें भी नहीं खोल प् रही थी.. अलका की नस नस में दक्ष की आवाज़ रची हुई थी. दक्ष की तन्हाइयो में किसी और को पा कर अलका के अंदर आग भड़कने लगी. कैसे वह ऐसा सब सहन कर सकती थी.

जहाँ उसे दक्ष par,kismat पर बहुत ज़यादा ग़ुस्सा आने लगा.. वहीँ उसे लाइफ में पहली बार जलन भी फील होने लगी. आज तक जलन वाला मटर उसके साथ कभी नहीं हुआ था.. आज हो रहा था.

दक्ष किसी और के साथ रंग रैलियों में बिजी है.. ये जान कर अलका के अंदर ग़ुस्सा भरने लगा..

फिर धीरे धीरे अलका को एक दृश्य दिखाई देने लगा.. जिसे देख कर अलका चीखने चिल्लाने लगी..

उसी पल माला के कुछ डेन भी चमकने लगे.. उन दानो से कुछ रेज़ निकली और अलका केबिन रूम को साउंड प्रूफ बनाने लगी..

अलका नींद में hi चीखने चिल्लाने लगी थी..

"ी हेट यू दक्ष.. ी हेट यू.... धोका किया है तुमने मेरे साथ.. प्यार मुझसे और सम्भोग किसी और से.."

अलका वह सारा दृश्य देख कर चीखती चिल्लाती रही. अब अलका को शिमि और दक्ष का व्यू बहुत क्लेअर्ल्य दिखाई दे रहा था..

हवेली वाला रूम तोह अलका को सही से दिखाई नहीं दे रहा था. पर बीएड और बीएड पर रासलीला में मगन दक्ष और षिमुना दोनों क्लेअर्ल्य अलका को दिखाई दे रहे थे..

जब तक दोनों का मिलान चलता रहा था.. अलका वह दृश्य देखने पर मजबूर थी..

जैसे hi दक्ष और षिमुना शांत हुए.. उनका खेल ख़तम हुआ.. अलका की नींद भी टूट गयी.. अलका एक झटके में उठी और केबिन के अंदर कड़ी होकर चीखने चिल्लाने लगी. जो सामान उसे दिखा.. वह उठा उठा कर पटखनी लगी..

फिर अलका घुटनो पर आई और दोनों हथु से सर थाम कर रोने लगी..

"दक्ष बहुत दर्द दिए है तुमने मुझे.. क्या कमी रह गयी थी मेरे प्यार में. जो तुम मुझे छोड़ कर, मेरे प्यार को छोड़ कर हवसी बन बैठे.. क्या शरीर की आग मिटने के लिए मेरा शरीर काफी नहीं था तुम्हारे लिए.. बोलो दक्ष बोलो.. पहले उस बूढी खूसट के साथ मोह कला किया तुमने और अब.. अब इस कलमुही के साथ मोह कला कर रहे हो.. नफरत है मुझे तुमसे दक्ष.. बेपनाह नफरत.. पहले जो कभी मैं तुम्हे सोच लिया करती थी. अब नहीं सोचूंगी. अब तोह मेरी नफरत के काबिल भी नहीं रहे तुम.. समझे तुम. अपनी नफरत के लायक भी नहीं समझती मैं तुम्हे..."

अलका कुछ देर में फिरसे उस केबिन बिस्टेर पर लेट गयी.. जैसे hi अलका ने ऑंखें बंद करि. उसी पल फिरसे अलका को दक्ष का दृश्य दिखाई देने लगा.. अलका दक्ष को देखना भी नहीं चाहती थी.. पर वह अपनी ऑंखें खोल नहीं प् रही थी..

अलका को दिखाई देने लगे दक्ष के पिछले 6 साल.. दक्ष की 6 साला मरीन लाइफ.. कैसे कैसे खतरों में कूद गया था दक्ष.. ये देख कर अलका के दिल में दक्ष के लिए सोइ मोहब्बत फिरसे जागने लगी. दक्ष को खतरे में देख कर उसका दिल चीरने लगा था.. दक्ष ने कैसे खतरनाक लाइफ जी है. ये जान कर अलका को बड़े दर्द से गुज़ारना पड़ा..

फिर उसे नज़र आने लगा. कैसे दक्ष ने पिछले 6 सालों में रंगीन लाइफ जी है. कैसे शराब और शबाब में गम दिखाई दे रहा था. जितनी भी लड़कियां दक्ष की लाइफ में आई थी. जितनी भी लड़कियों के साथ दक्ष ने रंगीन लम्हे गुज़ारे थे. वह सब अलका को दिखाई देने लगे..

कुछ ऐसे मोमेंट्स भी अलका को दिखाई दिए.. जिससे आगे का जान्ने की उत्सुकता उसके अंदर बढ़ने लगी. पर आगे का वह न दिखाई दे कर कुछ और hi दिखाई देने लगता तह..

सभी दृश्य देख कर अलका ने जाना. दक्ष ने कैसी लाइफ जी है. खतरों से और रंगीनियों से भरपूर..

कुछ जगा उसे कुछ समझ नहीं आई थी..

पर अलका वहां के बारे में न सोच कर दक्ष की रंगीनियो को सोचने लगी थी..

अलका को षिमुना के आने तक का सब दिखाई दिया.. उससे आगे का कुछ भी नहीं..

फिरसे अलका की ऑंखें खुली.. अलका केबिन रूम की छत को तकते हुए..

"मैंने भी तोह आज तक किसी को अपने शरीर को छूने भी नहीं दिए दक्ष.. एक बार मुझे सतीश ने पीछे से हुग करने की कोशिश करि थी तोह मैंने उसका गाल लाल कर दिए था. क्यों दक्ष.. मुझे छोड़ कर तुमने क्यों किसी और को छू लिया.. नफरत का रिश्ता है हमारे बीच में तोह प्यार का रिश्ता भी तोह था न.. मेरा तोह तुम्हारे शिव इस दुन्या में कोई था न आज है.. तुम नहीं थे तोह ये दुन्या भी मेरे लिए कशिश खो बैठी थी दक्ष.. मेरी साँसे तोह चल रही थी. पर बिना तेरे नाम के चलने वाली सांसों का भी क्या काम मेरे शरीर में.. धोका दिए है तुमने मुझे दक्ष.. पहले की दी चोट काम थी क्या.. जो तुमने कइयों से साथ सम्बन्ध बना कर मेरे दिल को छलनी छलनी कर दिए.."



अलका आंसू बहाने लगी..

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आज के लिए इतना Hi मित्रो! मिलते हाँ अगले Episode के साथ जल्द Hi..


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थैंक्स भाई...

हम्म ऐसे तो नहीं चलेगा.. कुछ तोह ज़रूर होगा आगे..

अपनी काली शक्ति को बढ़ने क लिए वह ऐसा कर रहा था. उसके पीछे अवंतिका है, ये सामने आया है.. अब देखते हाँ देवधर को लेके वह क्या करने जा रही थी...

देवधर का पापी दिमाग दक्ष को रोक नहीं पाया.. दक्ष को मौका मिला तोह देवधर का अंत कर दिए..

देखते हाँ दक्ष ने क्या कुछ जाना है देवधर के दिमाग से..

ये भी आगे चल के पता चलेगा

बहुत बोहत शुक्रिया भाई.... साथ बने रहे
 
थैंक्स भाई..

कोशिश तोह करेगी hi पायल. पर इतना भी आसान नहीं है

सेक्स के बिना तोह कोई भी नहीं रह सकता :लाफिंग:

हाहाहा देवधर कुछ जल्दी hi मर गया.. शिकंजे के जकड़ा डीके के कब्ज़े में आए गया था.. वर्ण उसे मार पाना आसान नहीं रहता..

देवधर काली शक्तियों में आगे था तोह डीके तपेलाथ्य में...
 
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