Episode:45
हम चरों सीढ़ियां उतर कर निचे पोहंचे तोह देविका ने बुआ को अपने गले से लगा लिया..
वह मस्ती करते हुए बोली : माँ! आप राजा के साथ बिलकुल एक रानी के जैसे दिख रही थी.
अक्षरा : माँ है भी तोह हमसे बढ़कर सुंदर!
उर्वशी : हाँ! और माँ आज भी हॉट एंड स---
बुआ ने उर्वशी के मोह पर हाथ रख दिए.. हस्ते हुए बोली
बुआ : बस बस.. तुम तीनो कुछ ज़यादा hi शरारती नहीं होने लगी..
जहाँ रुपाली कड़ी कड़ी आरही तिरछी हो रही थी. वहीँ षिमुना बुआ और सबको देख क्र मज़े ले रही थी. ऐसा माहौल ज़रूर उसे अपने प्लेनेट पर भी देखने को नहीं मिला होगा..
परिधि तोह बस मुझे hi देखती रह गयी थी. नहीं जानती थी, मैं उसके मैं का हाल जान सकता हों. वह अपनी आँखों से अपने दिल के हाल को शो करवाए बिना बहुत कुछ सोचे जा रही थी..
दुःख वाला माहौल भी था.. पर सबके लिए नहीं.. कइयों के लिए तोह जैसे ज़िन्दगी के सबसे हसीं पलों की शुरुआत हो गई थी..
परिधि भी ऐसी hi एक लड़की थी.. जो अपने मेहबूब को देख कर मैं hi मैं में नाच रही थी.. पगली कहीं की...
ऐसा बोलना नहीं चाहिए मुझे. पर जो मेरे सामने होगा, वहीँ बया भी करूँगा.. परिधि के अंदर कुछ ऐसा hi चल रहा था..
मैंने कहीं और नज़र नहीं करि... बाकि सब खड़े हमें देख रहे थे. मई किसी को नहीं देख रहा था. तोह सब मुझे देख रहे थे.. ज़रूर जब मैं उन्हें देखता तोह वह सब नज़रें चुरा लेते..
यहाँ पर पायल दी, विक्रम चाचा, ऋचा और परची नहीं थे.. बाकि सब थे..
शिमि ने मुझे चुटकी भरी तोह मैंने उसकी आँखों में देखा.. उसने मुझे अपने दिमाग में आने का इशारा किआ.. मैं उनके दिमाग में गया " क्या बात है मेरी भुलझडी. क्यों बुलाया मुझे अपने दिमाग में.. बेकार किसम का दिमाग है तुम्हारा.. कुछ जान hi नहीं सकता मैं तो"
षिमुना : ेहेहेहे! ये तोह अच्छी बात है न.. दिमाग एक पर्सनल डायरी हुआ करता है. और किसी को भी पर्सनल डायरी पढ़ने की इजाज़त नहीं होती.
दक्ष : काम की बात करो. यहाँ मुझे एक्टिव रहना है.
षिमुना : कुछ खास नहीं. मैं तोह बस परिधि की बात करने वाली थी..
षिमुना शोखी से बोली तोह मैं उसके दिमाग से निकल आया. वह समझ गई और स्माइल करने लगी.. बेकार किसम की बातें भी करने लगी थी सबके बीच कड़ी.
रुपाली अभी भी मेरे साथ लगी कड़ी थी..
दक्ष : चलें सब डाइनिंग टेबल पर चलते हाँ...
देविका : भाई, एक सेल्फी हो जाए आपके साथ.
परिधि : सेल्फी की बच्ची मेरे पेट में चूहे दौड़ रहे हाँ. पता है कितनी भूक लगी है मुझे.. और भाई को भी.. है न भाई.
मुझसे पहले षिमुना बोल पड़ी : हाँ हाँ सही कहा तुमने.. बहुत भूका है ये.. आज तुम्हारे हाथ से खायेगा तोह इसकी भूक मिट जाएगी.. आखिर तुम इसकी जा----
मैंने षिमुना के चुटकी काट दी. वह चुप कर गयी. परिधि के चेहरे पर मुझे कुछ हैरत दिखी. "जा" वर्ड कर वह जणू समझी होगी. शिमि कैसे जणू के बारे में जान सकती है. ये सोच कर उसे लगने वाला झटका वह सहन कर गई होगी. जल्द hi मुझे परिधि के चेहरे पर सुकून दिखने लगा.
मैंने षिमुना को घुरा तोह वह दबी हसी हसने लगी.. सब मिलकर डाइनिंग टेबल की और बढ़ने लगे..
बाकि सब मुझे अभी भी देख रहे थे. मैं किसी को नहीं देख रहा था.. मैं एक टेबल पर जा के बैठने लगा. तोह राजा ठाकुर बोले..
राजा ठाकुर : दक्ष बीटा! अब से आप परिवार के सबसे बड़े हो. अब से आप उस चेयर पर बैठेंगे. जो मौजूदा राजा ठाकुर की हुआ करती है. कृपया अपनी चेयर पर पधारिये.
मैंने सर उठा कर राजा ठाकुर को देखा तोह वो जो पहले मुझे देख रहे थे.. अपनी नज़रें झुका गए.
जिस चेयर पर वह हमेशा बैठा करते थे.. जो चेयर परिवार के सबसे बड़े और महान सदस्य को दी जाती थी. वह उन्हों ने मुझे दान कर दी.
मेरे नज़र उठाते hi आत्मग्लानि में व्यस्त सभी नज़रें झुका गए थे. मुझे सबकी ऐसी नज़रें देख कर ख़ुशी नहीं मिली थी.. कोण बीटा ऐसा चाहेगा.. उसके बड़े उसके सामने नज़रें झुकाएं, नज़रें चुराएं.. बाद किस्मती से वह ऐसा पाप कर बैठे थे. जो उन्हें उनकी hi नज़रों में गिरा गया था... अपने hi एक अंश पर भरोसा नहीं कर पाए थे.
मैं ख़ामोशी से राजा ठाकुर वाली चेयर पर बेथ गया.. जो कहा था राजा ठाकुर ने वह सच hi कहा था. मैं लौटा था तोह सबसे बड़ा बनकर लौटा था. पर मैं सबसे बड़ा होते हुए भी सबसे बड़ा नहीं हो सकता था..
बीटा भगवन भी बन जाएगा तोह माँ बाप से बढ़कर नहीं बन सकता.. उनका जो स्थान है, उसकी बराबरी कोई बीटा कैसे कर सकता है.. मैं भी नहीं कर सकता था.
पर ये वाली बात अलग थी. एक रूल था, एक परपम्परा थी.. जिसे निभाया जा रहा था. राजा ठाकुर एक तोह अपनी पोजीशन खुद मुझे दे रहे थे. दूसरे वह मेरे साथ गलत करके या गलत होते हुए देख कर एक गलत फैसला कर बैठे थे. इसलिए अब वह इस ओहदे के लायक नहीं रहे थे..
दूसरे अब उनकी उम्र भी हो गई थी तोह सिंघासन आगे किसी को ट्रांफर करना था. अपनी जगा किसी और को सिंघासन सौंपना हटा. मेरे शिव कोई और राजा ठाकुर की चेयर पे बैठने लायक नहीं था.. कोई और सिंघासन के लायक नहीं था..
मुझे बैठना hi पड़ा.. मैं अपनी चेयर पर जा बैठा.. अपनी चेयर के साथ मैंने दो और चेयर रखवा दीं.. राइट साइड में षिमुना तोह लेफ्ट साइड में परिधि को बिठाया.. परिधि का चेहरा गुलाब के जैसे खिल उठा था.. मेरे बाज़ो को थम कर वह बैठी बड़ी खुश दिखाई दे रही थी..
ऐसा hi हाल षिमुना का भी tha.dono के साथ बुआ, कुणाल, अक्षरा, उर्वशी और देविका बैठी थी..
और....
रुपाली परिधि के साथ कड़ी हुई जैसे आर्डर का वेट कर रही थी. उसके चेहरे पर ग़ुस्से की इन्तहा मुझे दिख रही थी. जैसी इंसल्ट उसकी हो रही थी.. उसके कारण वह ग़ुस्से से काँप भी रही थे.. एक तोह वह नौकरानियों के जैसे घाघरा चोली में थी. वह भी घटिया किसम के.. मिनी ड्रेस.. ऐसा ड्रेस जो वह पहन के कभी किसी के सामने नहीं आई थी..
दूसरे वह अपने hi घर में, सबके सामने एक नौकर के जैसे हाथ बांध कर कड़ी थी.
बरसों इस हवेली पर राज किया था उसने.. आज उसी हवेली के नौकरों के बीच वह भी एक नौकर थी.
जहाँ कुछ मेरे लिए खुश थे.. कुछ मेरे लिए आत्मग्लानि में थे.. वहीँ वह सब रुपाली के लिए दिल में नफरत भी लिए हुए थे.. बस नहीं चल रहा था. रुपाली को चीयर पहाड़ डालें. आत्मग्लानि में पड़े सब रुपाली के चलते ऐसी सीटूशन को फेस कर रहे थे. कैसे रुपाली पर उन्हें ग़ुस्सा न आता..
दक्ष : परिधि मेरी जान.. चलो इस नयी नौकरानी को आर्डर दो..
परिधि हैरान होक : मैं.. भाई! मैं!
दक्ष ; हाँ तुम! क्या तुम इससे बदला नहीं लोगी.. इसी के कारण तोह तुम्हे मुझे और मुझे तुमसे दूर होना पड़ा.
परिधि : हाँ भाई! परिधि रुपाली को ग़ुस्से से देखती हुई बोली.. फिर जैसे hi उसकी नज़र में रुपाली का पूरा गेटउप आया तोह वह कुछ झिप भी गई. रुपाली की ड्रेसिंग hi ऐसी थी.. पास खड़े होक के देखने से तोह ज़यादा hi क्लियर नज़र आ रहा था..
षिमुना : इसकी ड्रेसिंग पर मत जाओ परिधि.. ये कैसी है, पता तोह है सबको. चलो आर्डर दो..
परिधि : नाम क्या है तुम्हारा.. परिधि ने रुपाली ने पूछा तोह हम सब है पड़े..
देविका : हाहाहा! सही है.. पहले इस नयी नौकरनी के नाम का तोह पता चले.
रुपाली जलने भुनने लगी.
परिधि : नौकरानी हो, इतना भी नहीं जानती. मालिकान कुछ पोछे तोह बिना देरी से फार फार बोलना पड़ता है.. वर्ण--
देविका चहकते हुए : वर्ण नौकरी से हाथ भी धोने पद सकते हाँ.
हाहाहा.. सब का एक मुश्तर्का क़हक़हा गूंजा..
सब से मुराद मैं, परिधि, षिमुना और बुआ परिवार.. बाकि सब तोह हमें हसरत से देख रहे थे.. करणवीर भी राजा ठाकुर के साथ बैठे हुए ख़ामोशी से सब देख रहे थे. वह मेरे बारे में सब hi तोह जानते थे.. वह भी तोह इस खेल का हिस्सा था. सब जानते थे.. रुपाली के खेल में उनकी भी तोह कोई गए शामिल रही होगी.. वह भी कुछ नहीं बोल पाए.. वह अपने साथ हुए विश्वासघात और मेरे लिए आत्मग्लानि में व्यस्त थे. मतलब दो दो कारण थे, जो उन्हें चैन से बैठने नहीं दे रहे थे..
जब जब मैं सबको नहीं देखता था, तब तब वह सब मुझे देखने लगते थे..
रुपाली अपने हाथ की उँगलियाँ मरोड़ते हुए : मेरा नाम रुपाली है.
परिधि तोह सच में मालिकान बनने पे उतर आई.
परिधि : कैसी नौकरानी है तू.. तुझे ये भी नहीं पता. अपनी मालिकान से कैसे बात करते हाँ. कैसे अपनी मालिकान को अपना परिचय करवाते हाँ.. फिर परिधि मुझसे बोली.. भाई मुझे लगता ये पहली बार किसी बड़ी हवेली में बड़े लोगों के बीच आई है. इसमें तोह बिलकुल भी समझ बूझ नहीं है..
दक्ष : तोह दो न इसे समझ बुझ.. बड़े काम की सबत होगी ये नौकरानी..
परिधि : सच!
दक्ष : मुछ!
परिधि : चल बोल.. कैसे अपनी मालिकों को अपना परिचय दिए जाता है..
रुपाली सबको बरी बरी देखने लगी. सब उसे hi देख रहे थे.. सबको उसके साथ ऐसा बार्टन बहुत भा रहा था. रुपाली के लिए अपनी इंसल्ट सहन करना आसान नहीं था. वह ग़ुस्से और बेबसी के एहसास से थार थार कंपनी लगी थी..
मैं परिधि से बोलै : लगा न इसके एक. ऐसे ये सुनेगी नहीं.
परिधि भी बहुत आगे की चीज निकली.. परिधि ने रुपाली के बम्ब पे एक रख के मारी.
रुपाली पहले तोह परिधि को ग़ुस्से से देखि, फिर सर झुका कर लम्बी लम्बी साँसे लेने लगी.. खुद पर काबू पाने लगी.. फिर वह बोली तोह उसकी आवाज़ में एक ठहराओ आ चूका था..
रुपाली : मालिकान मेरा नाम रुपाली है. दक्ष मालिक ने मुझे आज hi यहाँ काम पे रखा है. मेरा धरम, करम पुरे तन मन धन से आप सब की सेवा करना है..
परिधि : शाबाश. अब सही बोली तू..
बुआ : ऐसी hi रहेगी तोह तुझे खाने को भी अच्छा मिले लगेगा.. जितनी सेवा करेगी, मेवा भी उतना बढ़िया मिलेगा तुझे.
देविका : और मुझे अपने पैरों की केयर करने की बड़ी पुराणी आदत है. मेरे पास टाइम काम रहता है. मेरी पढाई बहुत हार्ड है. तुझे मेरे पैरों की मालिश भी करनी होगी.
अक्षरा : मैं क्या बोलों
उर्वशी : हाहाहा.. रुपाली तू हम दोनों बहनो के सरे काम किया करेगी. जो जो हमारा मैं करेगा.. अब हम कुछ दिन यहीं रहेंगी.
परिधि हसने लगी : आप सब भी..
बुआ : और नहीं तोह क्या.. इस कुत्तिया के कारण हम सब को भी तोह दक्ष बेटे से दूर होना पड़ा है. हमें भी हमारी नज़रों से शर्मिंदा होना पड़ा है.
मैं तोह बस रुपाली की आवाज़ के ठहराओ पर hi धयान लगाए हुए था.. साली कितनी बड़ी हरमन थी रुपाली.. कितनी जल्दी खुद पर काबू प् लेने में माहिर थी. उसकी आवाज़ में ज़हरीली नागिन के जैसी फुंकार मैंने साफ़ महसूस कर ली थी. जिसे कोई और महसूस नहीं कर पाया था. सब उसके नौकरानियों वाले अंदाज़ पर है पड़ी थी.
षिमुना मेरे कान में बोली : दक्ष! सच कहूं तोह रुपाली का अंदाज़ उसकी आवाज़ की गहन गरज और पत्थरीला अंदाज़ मेरी बैकबोन में सनसनाहट सी दौड़ा देता है. ऐसी खतरनाक औरत मैंने पहले कभी नहीं देखि. अभी हालात इसके काबू में नहीं हाँ तोह इसका ऐसा अंदाज़ है. अगर ये कभी हमारे चुंगल से निकल गई और हमारे वार से बचने से सफल रही तोह पावर हासिल करके हमारे लिए बड़ी खतरनाक सबत होगी.
मैं षिमुना को देखते हुए : कह तो तुम सही रही हो शिमि.. मैं भी इसपर पूरी पूरी निगाह बनाये हुए हों. कभी कभी तोह मैं करता है, इसे मार दूँ. पर मार दिए तोह मेरे अंदर की आग काम नहीं होगी. और भी बढ़ जाएगी. इसे ऐसे hi टार्चर करूँगा. सबकी नज़रों में इसे ज़लील ो खुवार करूँगा. जैसा इसने मेरे साथ किया था. एक रंडी बनकर इसने मेरे साथ खेला था.. असली रंडी क्या होती, इसका इसे पूरा पूरा एहसास कराऊंगा. इसके परिवार को इसके सामने मारूंगा. जिसके बल बोते पर इसने ये सब किया है.. तब hi मुझे चैन सुकून मिलेगा शिमि.. इस कुत्तिया के कारण मुझे क्या कुछ देखना पद गया. मेरा परिवार पर ाँ पोहंचा इस के कारण.
मैं एक लम्बी सांस लेके बोलै तोह षिमुना ने मेरे हाथ पर अपना हाथ रख दिए..
मेरे चेहरे पर बदले भाव देख कर सब के सर ज़रूर एक बार फिरसे झुक गए थे.. एक मर्द को एक ऐसा दर्द कभी नहीं मिलना चाहिए. जैसा मुझे मिला था. वह भी अपने hi परिवार के हथु..
मर्द चुटिया हो, घटिया हो तोह चलता है. पर मैंने अपनी पूरी लाइफ में प्यार के शिव कभी कुछ किया hi नहीं था... प्यार में ज़िन्दगी बितायी थी, या शेरोन के से अंदाज़ में.
उसी पल सबकी नज़रें उठ गयी.. पायल दी आ रही थी.. सब पायल दी को देखने लगे.
वह ऐसे hi नहीं आ रही थी..
अपने कमरे से निकलने से पहले मैं पायल दी के दिमाग में गया था. जो हवेली के hi एक कमरे में घुटनो पर बैठी गहरे सदमे में थे.
मैं उनके दिमाग में गया तोह मुझे उनके दिमाग में मायूसी की इन्तहा देखने को मिली थी.. मैं सही समय पर भी पोहंचा था पायल दी के दिमाग में..
कभी कभी हालत ऐसे हो जाया करते हाँ. इंसान को कोई राह सुझाई न दे तोह वह आखरी फैसला कर लेता है. यानि कह अपनी मौत का सामना करने का फैसला.
पायल दी मेरी नज़रों में आना की हिम्मत खुद में नहीं प् रही थी. वह तोह जैसे अब जीना hi नहीं चाहती थी.. कैसे वह आईने में खुद का सामना कर सकती थी. कैसे वह मेरी आँखों में देख सकती थी. कैसे वह ज़िन्दगी भर प्यार और विश्वास शब्द पर बात कर सकती थी..
नहीं कर सकती थी, वह खुद का या मेरा सामना.. नहीं कर सकती थी वह ऐसी कोई भी बात. ऐसा मामलों में हिम्मत जवाब दे जाया करती है.. पायल दी की हिम्मत भी जवाब दे गई थी.. मेरी माँ न बाकियों ने मेरे साथ उतना नहीं किआ था. जितना पायल दी ने किया था.. इसलिए उनके अंदर आत्मग्लानि सबसे कहीं बढ़कर थी..
ऐसी घुटन उनके अंदर बढ़ गई थी. जो साँसे छीन लिया करती है. उनके लिए सांस लेना मुश्किल होने लगा tha..jab सांस लेना hi मुश्किल हो जाये. अपणु की नज़रों में सुर्खुरू होना मुमकिन न रहे तोह फिर ज़िन्दगी को ख़तम करना hi आसान काम लगता है..
पायल दी भी इस स्टेज पर आ कर कुछ ऐसा hi सोचने लगी थी.. कुछ ऐसे hi फैसले पर पोहंच रही थी.
मैं ऐसा कैसे होने दे सकता था.
मैं पायल दी के दिमाग में था.. मैं दिमागों से खेलने वाला खिलाडी बन चूका था. मैं कुछ भी कर सकता था. किसी की भी सोच को पलट सकता था. पायल दी की सोच को भी मैंने पलट दिए..
पायल दी की अपनी सोच में मैंने अपनी सोच मिलायी.. और कुछ प्रश्न उठाये..
"मैं जी कर अब क्या करुँगी.. मेरा मर hi जाना अच्छा है.. कैसे मैंने अपने हीरे जैसे भाई के चरित्र पर शक किया. सालों तोह वह मुझसे लिपट कर सोता रहा है. बरसों hi तोह मैं उसकी पवित्रता की गवाह रही हों. कैसे मैंने यकीं कर लिया मेरा भाई ऐसा घिनोना काम कर सकता है.. सच में मुझ जैसी बहिन को मर hi जाना चाहिए... par..par..par..main मर गयी तोह फिर किसी भी जनम में दक्ष की बहिन कैसे बन पाऊँगी. इस जनम में अपने भाई पर शक किया. उसपे रेपिस्ट का आरोप लगाया. उसे मारा पीटा, उसपर थूका.. मैंने प्रायश्चित नहीं किया तोह फिर किसी भी जनम में मई दक्ष की बहिन नहीं बन पाऊँगी. नहीं.. मैं मरूंगी नहीं. मई हर जनम में दक्ष जैसे भाई की बहिन बनकर जनमा लुंगी. मैं कैसे भी करके दक्ष की बहिन बनूँगी हर जनम में. मैं इतनी भी कमज़ोर नहीं हों. मैं वह सब कुछ कर गुज़रूंगी, जिस के करने से मुझे इस जनम में अपने भाई से माफ़ी से मिलेगी. अपने भाई की नज़रों में फिरसे देखने लायक भी बनूँगी. और ऐसा अटूट विश्वास भी अपने अंदर लाऊँगी. फिर कभी कोई रुपाली कुत्तिया जैसी मुझे मेरे भाई से दूर नै कर सकेगी.. फिर तो भगवन भी दक्ष को किसी भी जनम में मेरा भाई बनने से नहीं रोक सकता. इतना प्यार दूंगी मैं अपने भाई से. इतना भरोसा करुँगी मैं अपने भाई पर.. भगवन भी मेरी हर इच्छा पूरी करने पर मजबूर हो जायेंगे..
इतना सब पायल दी के दिमाग में बोल के मैं खामोश हो गया. वह समझी ये उसकी अपनी hi सोच थी. फिर वह इसी एंगल से सोचने लगी.." नहीं.. नहीं बुज़दिल नहीं हों. मई अपनी जान नहीं दूंगी. मैं कायरो की तरह से मौत को गले नहीं लगाउंगी.. मेरी जान तोह मेरा भाई है. एक माँ के जैसा प्यार दिए है मैंने भाई को.. मैंने कभी अपने भाई के शिव किसी और को सोचा भी नहीं था.. कैसे मैं अपने भाई पे विश्वास को घटा सकती थी.. नहीं मैं अब सब सुधरूंगी. सब सही करुँगी. एक बार फिरसे सब मुझे और दक्ष को देख कर कहेंगे. भगवन हर किसी को दक्ष और पायल जैसे भाई बहिन दे.. ऐसा प्यार भी आज तक नहीं देखा होगा. ऐसा भरोसा भी आज तक नहीं देखा. ऐसा प्यार दूंगी मैं अपने भाई को.. इतना विश्वास करुँगी मैं अपने भाई पर. नहीं मैं जान देकर दुन्या भर की बहनो को बदनाम नहीं करुँगी..
पायल दी उठ कड़ी हुई.. अब उनके अंदर की सोच बदली हुई थी.. मायूसी उनके अंदर से जा चुकी थी.. जैसे वह किसी फैसले पर पोहंच चुकी थी. वह कमरे से बहार निकली और हवेली में टहल कर खुद को और भी रिलैक्स करने लगी. ताज़ा हवा अपने अंदर उतार कर वह अपनी विल पावर को बढ़ने लगी.. मुझे लेके जो उसने सोचा था. वह नामुमकिन हद तक मुश्किल था.. पर पायल दी कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार थी..
ऐसे में मैं दी के दिमाग से निकल आया था.. दर्द मिला था मुझे अपणु से. बेहिसाब दर्द मिला था... पायल दी से बहुत ज़यादा दर्द मिला था.
जिस जिस के आप ज़यादा करीब होते हाँ. उससे मिलने वाली चोट बढ़कर हुआ करती है. पायल दी और अलका की और से मिलने वाली चोट मेरे लिए बढ़कर थी.. दोनों ने मेरे साथ बहुत बढ़कर किया था..
माँ, पापा, और सब भी मेरे लिए ख़ास थे.. पर जो स्थान पायल दी और अलका का था.. वह किसी और का नहीं था...
दोनों ने hi मुझे दर्द देने में कोई कसार नहीं छोड़ी थी..
अब पायल दी डाइनिंग टेबल की और बढ़ती दिखी तोह सब उन्हें देखने लगे सिवाए मेरे..
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कोमल जिस कोठी में घुसी थी. वह कोठी देश के जाने मने बिजनेसमैन की थी. एक महान समाज सेवक की थी. उसका नाम जगन्नाथ था.. देश भर की नज़रों में वह एक समाज सेवक hi नहीं एक महान पुरुष भी था..
हज़ारों की मदद करि थी उनसे.. हज़ारों लड़कियों की शादी करवाई थी उसने.. हज़ारों की ज़िन्दगी बनाई थी उसने..
ऐसा सब जानते थे..
पर कोई ये नहीं जनता था. जिन हज़ारों की ज़िन्दगी उसने बनाई है. बाद में उन हज़ारों की ज़िन्दगियों में जो जो तूफ़ान आये हाँ. वह तूफ़ान जगन्नाथ के कारण आये हाँ.
जगन्नाथ जब भी कहीं जाता था तोह कुछ लोग मीडिया को इन्फॉर्म कर दिए करते थे. मीडिया फ़ौरन वहां पोहंच जाया करती थी. जगन्नाथ किसी की मदद करता तोह मीडिया की नज़रों में आ जाता. किसी घर पर कोई घटना घाटी तोह जगन्नाथ वहां भी नज़र आता तोह मीडिया उसे लाइव दिखने लगती थी..
जगन्नाथ भेद की खाल में छुपा हुआ एक भेड़िया hi नहीं एक दरिंदा भी था.. इज़्ज़तों के साथ खेलना उसका मन पसंद खेल था. नयी नयी लड़कियों के मज़े लेना उसकी हॉबी थी. जिन हज़ारों की उसने मदद करि थी.. उन हज़ारों घरों की सेंकडो लड़कियों को अपनी हवस का निशाना बना चूका था. हवस का निशाना बनाने के बाद बहार के मुल्कों में उनकी तस्करी भी किया करता था. ये जगन्नाथ का रियल बिज़नेस था. बहुत बड़ा नेटवर्क था उसका..
बड़े बड़े नमी गरमी लोग उसके नेटवर्क का हिस्सा था. जहाँ और जिस अंदाज़ में भी उसे पैसा मिलता था वह हासिल किया करता था.. पैसों के मामले में वह एक पागल कुत्ता था. पर अपने परिवार से प्यार भी करता था. अपने परिवार से ढके छुपे वह सब कर रहा था. समाज की नज़रों में और परिवार की नज़रों में वह एक देवता था..
कोमल के साथ भी उसका यही मटर था... कोमल की नज़रों में जगन्नाथ एक महान समाज सेवक था.. कोमल को रपो हासिल करना चाहते थे. पर वह असफल हो रहे थे.. जगन्नाथ को ये काम सौंपा गया तोह लाखों डॉलर का सौदा करने के बाद जगन्नाथ ने कोमल को रपो के हवाले करने का एग्रीमेंट सिग्न कर लिया..
कोमल को जगन्नाथ एक जगह मिला तोह उसे अपने फार्महाउस पर चाय के लिए बोल दिए.. कोमल की नज़रों में भी जगन्नाथ एक सच्चा और खरा इंसान था.. कोमल ने हाँ बोल दिए.. धोके से कोमल को चाय में बेहोशी की दवा मिला कर पीला दी.. यहाँ कोमल भी जगन्नाथ पर विश्वास करते हुए भूल कर बैठी..
वर्ण कोमल उस समय एक ऐसी शेरनी थी. जिसके नाम की दहशत देश भर में पहेली हुई थी.. कोमल को धोका देना या काबू में करना मुमकिन नहीं था. विश्वासघात के चलते कोमल शिकार हो गई थी.. रपो के चुंगल में जा फँसी थी..
कोमल कोठी के अंदर घुसी तोह उसने एक और फायर कर दिए. फायर हुआ तोह घर के अंदर की महिलाएं चीख पड़ी थी..
कोठी क अंदर 2-3 hi गॉर्डस थे. जिन्हे कोमल ने शूट कर दिए था.. सबकी नज़रों में जगन्नाथ एक समाज सेवक था. ज़यादा गार्ड्स रख कर नज़रों में नहीं आना चाहता था. उसके खास और गुंडे उसके खास अड्डे पर मौजूद रहते थे..
इस समय वह भी कोठी में मौजूद था.. वह हाथ में गन लिए एक पिलर की आध में होते हुए कोमल पर फायर करने लगा. कोमल को अब शूट कर पाना मुमकिन नहीं था. वह भी जगन्नाथ जैसों के लिए तोह बिलकुल भी मुमकिन नहीं था.
कोमल की नज़रें एक शेरनी की नज़रें थी. जगन्नाथ के फायर करने से पहले hi वह लुढ़क कर साइड हो गई. जगन्नाथ का फायर खली गया.. तोह कोमल ने जगन्नाथ के हाथ की और अपनी गन करते हुए फायर कर दिए. गोली जगन्नाथ के हाथ पर लगी. जगन्नाथ के हाथ में छेड़ हुआ तोह उसके हाथ से गन भी गिर पड़ी..
जगन्नाथ चीख पड़ा तोह घर की महिलाएं चीखती हुई भागती हुई वहीँ आ गई.
जगन्नाथ ने फ़ौरन hi अपना चोला बदला और पहले जो उसके चेहरे पर दरिंदगी भरे भाव थे. अब एक मासूम चेहरे में बदल गए थे.. कोमल जगन्नाथ को देख कर स्माइल करने लगी. चलती हुई आएगी बढ़ी..
जगन्नाथ के दो बेटे और 3 बेटियां थी. बीटा कोई भी इस समय कोठी पर नहीं था. बेटियां थी.
जगन्नाथ : कोण हो तुम..?? किस मकसद से आई हो तुम मेरे घर.
कोमल : जगन्नाथ उर्फ़... कोमल रुक कर जगन्नाथ को देखने लगी..
जगन्नाथ की पत्नी डरते हुए भी कोमल के आगे गिड़गिड़ाने लगी.
कोमल ने एक फायर जगन्नाथ के एक घुटने पर कर दिए.. वह चीखे तोह पत्नी, उसकी बेटियां चीख पड़ी. जगन्नाथ के चेहरे पर दर्द और हैरत दोनों के भाव आ गए..
जगन्नाथ की पत्नी कोमल के पैरों में गिर पड़ी..
"क्यों मार रही हो मेरे देवता सम्मान पति को.. मत मारो मेरे देवता सम्मान पति को"
ऐसी hi दुहाई तीनो लड़कियां भी देने लगी..
जगन्नाथ की पत्नी जगन्नाथ के जैसी नहीं था.. वर्ण कोमल चाहती तोह सबको शूट कर देती. कुछ ऐसी hi आग उसके अंदर दहकने लगी थी..
कोमल : आपके पति का नाम जगन्नाथ है ना. समाज की सेवा करते हाँ न ये. अभी दिखती हों मैं आपको आपके पति का असली chahra..ye जगन्नाथ है यहा.??
जगन्नाथ की पत्नी को अपने पैरों से अलग किया फिर जगन्नाथ से बोली : मैं बोलूं या तुम खुद मुझे अपना नाम बताओगे. मेरा तरीका कुछ हटके है. कोमल ने दूसरा फायर जगन्नाथ के दूसरे घुटने पर कर दिए.. जगन्नाथ बलि के जानवर के जैसे चीखने चिल्लाने लगा.. सब की सब दहशत में आई हुई थी.
जगन्नाथ दर और ग़ुस्से से कोमल को देखने लगा..
कोमल : मेरे पास टाइम होता तोह तेरा और इन आँखों का सुकून से इलाज करती.. अभी मुझे और भी बहुत से काम करने हाँ. तुझ जैसे और भी बहुत से कुत्ते हाँ मेरे देश में. जिनका विनाश करना है मुझे. कोमल ने जगन्नाथ के घुटने पर सर पर गन लगा दी...
इस बार जगन्नाथ कोमल की आँखों में देख कर दर गया..
जगन्नाथ : क्यों कर रही हो तुम ये सब.. ये देश के एक जाने मने समाज सेवक की कोठी है. यहाँ ऐसी दरिंदगी----
कोमल : हाहाहा.. समाज सेवक... hahaha..desh के जाने माने समाज सेवक की कोठी.. हाहाहा....
कोमल : बोल क्या नाम है तेरा.. बोल.. बोल kutte..tera असली नाम क्या है.. वर्ण तेरे सर के टुकड़े भी गिनने मुश्किल हो जायेंगे.. bollll..bollll.. बोलल...
कोमल की आवाज़ की गड़गड़ाहट पर जगन्नाथ जैसा दरिंदा भी दहल उठा.
जगन्नाथ कुछ ऐसा दहशत में आया.. वह थार थार कांपने लगा.. वह बोलने लगा..
mmm..mmm..main...jj..nath..hon.. haan..main..jj..nath..hon..
जगन्नाथ की बेटियां जो माँ के साथ कड़ी कोमल की दरिंदगी पर दर के मारे कैंप रही थी.. जगन्नाथ के लिए दुखी थी.. सुनकर जैसे सदमे में आ गई थी. अपने पिता को जज नाथ बोलते सुना तोह शॉक हो गई.
कोमल चीखती हुई : क्या देख रही हो.. ज़रूर तुमने भी जज नाथ का नाम सुना होगा. ज़रूर तुम्हारी किसी जान्ने वाली की इज़्ज़त के साथ भी खेला होगा जज नाथ.. ऐसा hi है न.. बोलो.. ऐसा hi है ना... booooollooooooo..aisa..hi..ha..na..
धीरे धीरे जगन्नाथ की पत्नी और बेटियों के चेहरे बदलने लगे. उनके चेहरे के भाव नफरत में बदलने लगे..
कोमल : देखा जगन्नाथ, ऐसा hi अंजाम हुआ करता है तुझ जैसो का.. अपनी hi पत्नी अपनी hi बेटियों की नज़रों में गिरना पद जाता है तुझ जैसो को..
जगन्नाथ ऐसे रूप में अपनी बेटियों के रूप में नहीं आना चाहता था. अपनी पत्नी को भी ऐसे मरते नहीं देखना चाहता था. उसका रूप उसके घर को hi बर्बाद करके रख देगा, उसने सोचा नहीं था.
जगन्नाथ : kk..kon हो तुम.. जगन्नाथ अपनी असलियत खोल कर भी कोमल से उसके बारे में जानने लगा..
कोमल : बाटूंगी.. तुझे तोह मई ज़रूर बताऊँगी.. पहले तू अपने सरे काले कारनामो की फाइल्स मुझे दे..
कोमल ने गन की नाल अभी भी जगन्नाथ के माथे पर लगा राखी थी.. कोमल फिर जगन्नाथ को सर के बालों से घसीटती हुई उसके बैडरूम में ले गयी. तिजोरी खुलवा कर उसके सरे काले कारनामे जो कह कई फाइल्स में बंद थे. वह अपने अंडर लिए.. फिर वहीँ जगन्नाथ के सर में गोली उतार दी.. जगन्नाथ को मारने से पहले उसके कान में अपना नाम बोल दिए था.. नाम सुनकर जगन्नाथ को झटका लगा था.. पर वह ज़यादा देर हैरान नहीं हो सका था.. उसे सोचने के लिए समय नहीं मिल सका.. एक गोली कोमल की गुणसे निकली और जगन्नाथ के सर में छेड़ कर गई थी..
जगन्नाथ की पत्नी और बेटियां भी वहीँ रूम में आ गई थी.. वह खली खली नज़रों से जगन्नाथ को देख रही थी..
कोमल : जितनी जल्दी हो सके यहाँ से निकल जाओ. वर्ण इसके काले कारनामे मैं सबके सामने लाने वाली हों. जिन जिन को इसने बर्बाद किया है. वह सब तुम सब को बर्बाद कर देंगे.. जाओ.. जितनी जल्दी हो सके निकल जाओ यहाँ से..
और हाँ एक काम कर सकूँ तोह कर देना.. जितना भी पैसे इस हरामी ने कमाया है. वह सब ज़रूरत मांडो में बाँट दो. वर्ण उपरवाले का क़हर तुम सब पर भी बरसेगा..
जगन्नाथ की पत्नी अपनी एक बेटी से : अपने भाइयो को कॉल करो. उनसे पोचो वो कहाँ हाँ.. दोनों को यहाँ मत आने देना.. हम भी वहीँ चलते हाँ.. अब हम यहाँ नहीं रह सकते.. हम सबकी ज़िन्दगी बर्बाद हो जाएगी.. तुम सबकी ज़िन्दगी बर्बाद हो जाएगी.
कोमल : अपने पति की अंतिम कार्य नहीं करेंगे आप.
जगन्नाथ की पत्नी जगन्नाथ के मोह पर थूकते हुए : मैं नहीं जानती थी, ये जज नाथ है.. मैं सोच भी नहीं सकती थी. मेरा पति ऐसा नीच इंसान हो सकता था..
कोमल : अच्छी बात है.. तुम सब ऐसी न होती तोह मैं तुममे से किसी को भी ज़िंदा नहीं छोटी.. अपने बच्चू के साथ दूर के किसी इलाके में जा के बस जाओ.. अपने बेटो को अच्छे करम सीखना.. वर्ण मैं उनको दूसरा सांस भी नहीं लेने दूंगी..
सब वहां से निकल पड़े.. कोमल भी वहां से जाते हुए वहां एक पैग़ाम लिख कर वहीँ छोड़ गयी थी..
जगन्नाथ एक समाज सेवक था.. देश में फेमस था.. उसकी कोठी पर फायरिंग हुई तोह पुलिस और मीडिया तुरत वहां पोहंच गयी.
कुछ देर में कोमल का छोड़ा पुलिस को मिला तोह मीडिया तक जा पोहंचा. उसी समय मीडिया पर कोमल के नोट को फ़्लैश न्यूज़ बना कर पेश किया जाने लगा.
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दिल्ली की hi एक कोठी के ड्राइंग रूम में कुछ फॅमिली मेंबर्स बैठे हुए टीवी पर जगन्नाथ बारे न्यूज़ देख रहे थे...
एक आदमी(55) एक महिला(54) एक लकड़ा(25) उसकी पत्नी(23) और एक लड़की (24) बैठे न्यूज़ देख रहे थे..
टीवी पर कोमल का पैग़ाम टेलीकास्ट हो रहा था. एक फीमेल एंकर दबंग अंदाज़ में कोमल की बात बार बार दोहरा रही थी..
"sherni....sherni लौट आई है.. देश को खोखला करने वालो.. सावधान हो जाओ.. शेरनी एक बार फिरसे शिकार करने के लिए मैदान में उतर आई है.. बरोसन पहले जो शेरनी मंज़र से हैट गई थी.. वह एक बार फिरसे दिखाई देने लगेगी.. मैं मेरे देश को खोखला करने वळून का वहीँ हाल करुँगी जो पहले करती आई थी."
आदमी वहीँ बैठा हुआ था.. वह ये सुनकर उठा और बड़बड़ने लगा.. उसकी पत्नी और सब उसके शब्द सुनकर शॉकेड हो गए..
आदमी बड़बड़ने लगा.. komal..komal मेरी बच्ची.. मेरी jaan...meri बेटी.. तुम लौट आई ho..mujhe यकीं था.. तुम एक दिन ज़रूर लौट कर आओगी.. सब कहते थे तुम अब नहीं रही हो. तुम कभी लौट कर नहीं आओगी. पर मेरा दिल कहता था.. तुम ज़रूर लौट कर आओगी.. और तुम लौट आई..
सब उस आदमी के शब्द सुनकर सब गिरते गिरते बचे.. शब्द सुनकर फिरसे टीवी को देखने लगे.. इस बार वह भी टीवी पर आ रहे कोमल के एक एक शब्द पर घोर कर रहे थे..
आदमी कोमल का बाप था. तोह महिला कोमल की माँ.. लकड़ा भाई, तोह लड़की कोमल की बहिन..
आदमी और लड़के को छोड़ कर सब ख़ुशी से रोने लगे.. तोह लड़के ने अपने पापा को अपने गले से लगा लिया.. दोनों बड़े जोश के साथ एक दूसरे को भेंचने lage..ek दूसरे को बधाई देने लगे..
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आज के लिए इतना Hi मित्रो! मिलते हाँ अगले Episode के साथ जल्द Hi..
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