Thriller "विश्वरूप" ( completed ) - Page 12 - SexBaba
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Thriller "विश्वरूप" ( completed )

भाई कहानी थ्रिलर से सम्बन्धित है जो भावनाओं के इर्द गिर्द बन रही है

कुछ घटनायें और संगठनायें स्वीकार्य नहीं हो पा रहे हैं पर मैं आशा करता हूँ कहानी की अंत तक आते आते शायद सबकी शिकायत दुर कर सकूँ

लड़ाई वास्तव में वैदेही की है जिसकी आँच में हर कोई झुलस रहा है

या फिर मैं समझाने में असमर्थ हूँ

धन्यवाद और आपके जूनियर को मेरे हृदय भरा प्यार

मित्र आप भी अपना खयाल रखें
 
👉एक सौ पच्चासवाँ अपडेट

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टीवी पर नभवाणी न्यूज चल रही है

सुप्रिया - आज अदालत में राज्य की बहु चर्चित अनुसूया हत्याकांड पर सुनवाई हुई... अब तक मीडिया में पुलिस ने जो तथ्य सामने रख कर वीर को हत्यारा बता रही थी... बहस के दौरान वीर के लिए बहस करने उतरे विश्व प्रताप ने आज पहली ही दिन में... ना सिर्फ पुलिस की छान-बीन पर अपने तथ्यों से सवाल उठाए हैं... बल्कि पुलिस की तफ्तीश और चार्जसीट को अधूरी साबित कर दिया... अब इस पर विस्तृत जानकारी के लिए... अपने सम्वाददाता अरुण से बात करते हैं... हाँ तो अरुण... आज अदालत में क्या क्या हुआ...

अरुण - जी सुप्रिया... आज जब बहस शुरु हुई तो पुलिस के द्वारा तैयार की गई चार्जशीट पर... सरकारी वकील अपनी दलीलों के द्वारा अदालत को कंविंस करने की पूरी कोशिश की.. के वीर सिंह ही अनुसूया की कातिल है... क्यूँकी उनके पास सबसे मुख्य और अहम आधार था... वीर सिंह की अपनी कंफेशन... जिसको पुलिस ने सच मान कर... पुलिस ने अपना चार्जशीट बनाया था... पर पुलिस और सरकारी वकील की... सारे तथ्य धरी की धरी रह गई... जब वीर के पक्ष में... विश्व प्रताप तहरीर करने उतरे...

सुप्रिया - अरुण... आपको एक मिनट के लिए रोकती हूँ... जहां तक हमें जानकारी थी... वीर सिंह अपने लिए कोई वकील नियुक्त नहीं किया था...

अरुण - जी सुप्रिया... इस बात को लेकर अदालत में थोड़ी देर के लिए बहस भी हुई... पर हमारी जुडिशरी सिस्टम में... बिना डिफेंस को सुने अदालत किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सकती... इसीलिए खुद जज साहब ने... वीर के लिए... विश्व को दलील पेश करने की इजाजत दे दी... जिसका नतीज़ा यह हुआ कि... अनुसूया हत्याकांड की गुत्थी और भी उलझ गई है... कारण स्पष्ट है... पुलिस अपनी छान-बीन ठीक से नहीं की... कुछ सबूत गायब हुए हैं... जो कि कातिल कोई और हो सकता है और वीर को इस कत्ल के जुर्म में फंसाया गया है... ऐसा प्रतीत होता है...

सुप्रिया - यह तो आपने बहुत बड़ी खबर बताई है... अनुसूया के कत्ल में यह बड़ा उलटफेर हुआ है... तो इस पर अदालत ने क्या कहा है...

अरुण - सुप्रिया... अदालत ने इस पर बहुत ही कड़ा रुख अख्तियार किया है... पुलिस को इस बार ठीक से छानबीन कर... सारे सबूत और गवाह... अगले सुनवाई पर पेश करने के लिए हुकुम दिया है... जो सबूत खोया हुआ है... इस पर मैं कहना चाहता हूँ... यह सबूत फॉरेंसिक वालों ने इकट्ठा किया था... जो पुलिस से खो गया है... जिसके कारण... इस हत्याकांड की... एक अहम कड़ी खो गई है... अदालत ने पुलिस को ना सिर्फ वह सबूत ढूंढने को कहा है... बल्कि उस सबूत के मालिक का भी पता लगाने के लिए कहा है... अब देखना यह है कि... अगली सुनवाई तक पुलिस की ओर से... क्या डेवलपमेंट होता है...

रुप टीवी को बंद कर देती है, पीछे मुड़ कर देखती है, दिवान ए खास में एक कोने में पिनाक नीचे फर्श पर बिछी दरी पर बैठा हुआ है l उसके पास सुषमा भी नीचे बैठी हुई है l रुप उन दोनों के पास चल कर आती है और उन दोनों के पास फर्श पर बैठ जाती है l पिनाक खोया खोया सा लग रहा था l पिनाक की आँखों की नीचे वाली पेशियाँ काले दिख रहे थे l बाल बिखरे हुए और चेहरे पर सफेद दाढ़ी बढ़ी हुई थीं l अब पिनाक बहुत कमजोर और उम्र दराज दिख रहा था l

सुषमा - (सिसकते हुए) चलो... कुछ तो अच्छी खबर मिली...

पिनाक - कास... कास के... मैं अदालत जा पाता.. खुद को कानून के हवाले कर पाता... और वीर को छुड़ा लेता...

रुप - तो आप... गए क्यूँ नहीं चाचा जी...

पिनाक - मैं एक बेबस और लाचार जिंदा लाश बन गया हूँ बेटी... राजा साहब की जिद और अहंकार की लक्ष्मण रेखा लाँघ नहीं पा रहा हूँ मैं... इसलिए मैं यहाँ तपस्या में बैठा हुआ हूँ बेटी... अपने पापों को उतार रहा हूँ... जाने को मैं जा सकता हूँ... इस महल की हद से आगे जा सकता हूँ... पर मैं कटक पहुँच ही नहीं पाता... यह मैं जानता हूँ...

रुप - यह आप कैसे कह सकते हैं... राजा साहब तो नजर बंद हैं ना...

पिनाक - तुम भी तो जा सकती थी... गई क्यूँ नहीं... क्या वीर तुम्हारा भाई नहीं है...

रुप - एक वचन ने बाँध रखा है मुझे... जो मैंने राजा साहब से की है... और चली भी जाती तो क्या कर पाती.. ना मेरी गवाही काम आती... ना मेरे पास कोई सबूत है...

पिनाक - हाँ सबूत... सबूत तो मेरे पास है... पर तुम... राजा साहब को कम कर ना आंको...

रुप - पर फिर भी... इस वक़्त शायद... वीर भैया को आपकी बहुत जरुरत थी...

पिनाक - हाँ... शायद... जानती हो बेटी... वीर के जन्म से लेकर अब तक... पता नहीं मुझे किस बात की खीज थी उससे... हमेशा जलील किया करता था... उसे कभी ढंग से बात भी नहीं किया करता था... मैंने... अपने बेटे से... अपने ही खून से... सिवाय नफरत के... कुछ और कमाया ही नहीं... और इस बार... मैंने तो हद पार कर दी...

रुप - (चुप रहती है)

पिनाक - उद्देश्य अनु को वीर की जिंदगी से दूर करने की थी... हत्या की कोई योजना ही नहीं थी... पर हत्या हो गई... मुझे उस वक़्त कोई दुख भी नहीं हुआ... बल्कि मेरे भीतर खुशी कई गुना बढ़ गई... मुझे लगा वीर को ठीक सजा मिली... मुझसे बगावत करने के लिए... मुझे मेरी ही नजरों में जलील करने की... इससे वीर का मेरे प्रति नफरत और भी बढ़ गया... मुझे सजा देने के लिए... उसने यही राह चुनी... (आवाज भर्रा जाती है) वह हमेशा कहता था... की वह मेरा खून है...पर मेरी नफरत मुझ पर इस कदर हावी रही के... मैं अपने ही खून से बदला लेने पर आ गया... तुम नहीं जानती बेटी... अनु और वीर के साथ हो रहे हर एक सितम की खबर... मैं उस वक़्त फोन पर ले रहा था... और मैं वीर से फोन पर सिर्फ बात नहीं कर रहा था... बल्कि मैं वीर के दिल पर चोट कर रहा था... अपनी कड़वी बातों से... उसके दिल पर ना सिर्फ घाव पर घाव दे रहा था... बल्कि उसे कुरेद रहा था... जैसे उसके दिल से खून तो बहे... मगर वह किसी को दिखे ना... मुझे लगा गरम खून है... या तो मेरे पीछे पीछे राजगड़ आएगा... या फिर पुलिस के पास जाएगा... पर उसने वह किया जो मैंने कभी सोचा भी नहीं था... उसने अनु की कत्ल का इल्ज़ाम अपने सिर लेकर... मुझे सजा दे दी... आज जब उसे... अपनी जगह सलाखों के पीछे पाया... तब मेरे दिल में मरे हुए ज़ज्बातों को... बेटे का प्यार का एहसास हुआ... मैं बाहर चला भी जाता... तो क्या होता... मैं जानता हूँ... राजा साहब के अंदर के शैतान को... वह अपनी जिद और अहं के लिए... किसी भी हद तक जा सकते हैं... मैं नहीं चाहता... उनके जिद से टकरा कर... वीर की जिंदगी को खतरे में डालूँ...

रुप - (चुप रहती है)

पिनाक - तुम घबराओ मत बेटी... वीर के लिए सोचने के लिए... उसका भला बुरा देखने के लिए विक्रम है... विक्रम ने हमेशा... वीर को भाई कम.. अपने बेटे की तरह देखा है.. विक्रम यहाँ लौट कर आयेगा बेटी... देखना तुम वह लौट कर आएगा... अपने साथ वीर को लेकर आएगा... और हम सबको इस खुनी महल से आजाद कर ले जाएगा...

पिनाक सिंह यह कहते भावुक हो जाता है l रुप देखती है पिनाक की आँख के कोने भीग गई थी l सुषमा की हालत भी पिनाक से कुछ अलग नहीं थी l रुप अपनी जगह से उठती है और कमरे से बाहर जाने लगती है l पिनाक उसे आवाज़ देता है

पिनाक - रुप.. (रुप पीछे मुड़ती है) क्या तुम्हें लगता है वीर कानून की गिरफ्त से छूट जाएगा...

रुप - आप... मुझसे यह सवाल क्यूँ कर रहे हैं चाचाजी...

पिनाक - बस... अपनी तसल्ली के लिए... आज मैं हर तरफ़ से.. हारा हुआ हूँ... हिम्मत नहीं है मुझमें... मुझे बस तसल्ली चाहिए... अगर वीर नहीं आएगा... तो उससे पहले मैं जान हार जाना चाहता हूँ...

सुषमा - (रोते हुए) अब बस भी कीजिए... मुझसे और बर्दास्त नहीं हो रहा है... आप चलिए... अपने कमरे में चलिए... मैं आपको लिए चलती हूँ...

रुप - चाचीजी ठीक कह रहे हैं... आपको अपने कमरे में चले जाना चाहिए... आप वीर भैया का इंतज़ार अपने कमरे में भी कर सकते हैं...

पिनाक - घबराओ मत... अब इस कमरे में... बाहर वाले तो दूर... खुद राजा साहब भी नहीं आयेंगे... और यहाँ मुझे इस कमरे ने... मेरे ही वचन ने बाँध रखा है... मैं खुद को छोटा राजा समझ रहा था... इस अहंकार में... ना जाने क्या क्या कर गया... पर कल ही मालूम हुआ... मैं किसी कुत्ते से ज्यादा नहीं हूँ... यहाँ किस्मत से लेकर ज़ज्बात तक... राजा साहब के हुकुम का गुलाम है... यह गुलामी की ज़ंजीर टूटेगी... मुझे यहाँ से मेरा वीर ही ले जाएगा... या... मेरी जान...

सुषमा - (रोते हुए) क्यूँ आप ऐसे पागलों की तरह बहकी बहकी... बातेँ कर रहे हैं...

पिनाक - पागल... नहीं सुषमा जी... मैं अभी पागल नहीं हुआ हूँ... बहकी बहकी बातेँ तो... नशेड़ी करते हैं... और मेरा तो नशा उतर चुका है... (एक पॉज) रुप...

रुप - जी... जी चाचाजी..

पिनाक - क्या वीर छूट पाएगा...

रुप - यह... यह मैं कैसे कह सकती हूँ...

पिनाक - आखिर विश्व के बारे में... तुम से बेहतर कौन जानता है...

रुप - (एक गहरी साँस छोड़ते हुए) चाचाजी... वह एक वकील है... उसने वकालत... क्षेत्रपाल की हुकूमत और सल्तनत को मिटाने के लिए की थी...

पिनाक - जानता हूँ... मैं जानता हूँ... और मैं यह भी जानता हूँ.. विश्वा... वीर का इकलौता सच्चा और अच्छा दोस्त है...

रुप - पर उसका किस्मत देखिए... जिंदगी का पहला केस... अपने जिगरी दोस्त का लड़ रहा है... जो दोस्त खुद को अनु का कातिल बता कर... कानून के हवाले हो गया है... आपने तो देखा ना... सुना ना... वीर भैया वकील लेने से मना कर दिया है.. फिर भी प्रताप से जो बन पा रहा है... वह कर रहा है... आगे वही होगा जो किस्मत को मंजुर होगा...

पिनाक - (अपना सिर हिलाने लगता है जैसे वह रुप की बातों को समझने की कोशिश कर रहा है)

रुप - पर मैं यह भी जानती हूँ... विक्रम भैया... खाली हाथ तो आयेंगे नहीं...

पिनाक - जानता हूँ... विक्रम खाली हाथ आयेगा नहीं... कास किसी तरह से फोन लग पाता... तो विक्रम से... उस आदमी के बारे में बता देता... जिसकी मदत लेकर मैंने वीर की जिंदगी उजाड़ दी है... एक काम क्यूँ नहीं करती... बाहर जाने के लिए राजा साहब को मना है... तुझे नहीं...

रुप - नहीं चाचाजी... आप बेकार की भरम पाल रहे हैं... हम क्षेत्रपाल महल की औरतें हैं...

पिनाक - सॉरी बेटी... सॉरी..

रुप - चाचाजी... आपने अभी कहा ना... वीर भैया को विक्रम भैया हमेशा अपना भाई कम और बेटा ज्यादा माना है... और विश्वा वीर भैया का इकलौता सच्चा दोस्त है... तो उन दोनों पर यकीन रखिए... वह कातिल किसी भी बिल में छुपा हो... या तो बाहर निकल कर आयेगा... या फिर बाहर खींच कर लाया जाएगा...

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नभ वाणी का प्राइम टाइम न्यूज ब्रॉडकास्ट चल रहा है l सुप्रिया दिन भर की ख़बरों को संक्षिप्त में बता कर अनु की हत्या पर हुए अदालती कारवाई पर बताते हुए कहती है l

सुप्रिया - आज अदालत में जो हुआ... और पुलिस की जिस तरह की लापरवाही सामने आई... इस वज़ह से केस उलझ गया है... अब इस पर हम कोई राय रखना नहीं चाहते हैं... पर अनुसूया दास... यह नाम कोई भुलाने वाली नाम नहीं है... दर्शकों आपको याद होगा... आज से लगभग ढाई महीने पहले... इसी लड़की का ××× हस्पताल के सामने अपहरण हुआ था... उसे ढूँढ कर वापस लाने के लिए... तब वाव की अध्यक्षा तथा जानीमानी वकील श्रीमती प्रतिभा सेनापति... अपनी संस्था के महिला कार्यकर्ताओं के सहित कमिश्नरेट के समक्ष गण धरना प्रदर्शन किए थे... अनु वापस आ गई थी... फिर अनु के जीवन में नाटकीय मोड़ भी आया... इसलिए आइए उस विषय पर विस्तृत चर्चा करने के लिए हमारे साथ हैं... स्वयं प्रतिभा सेनापति जी... प्रतिभा जी नमस्ते... हमारे आज की प्राइम टाइम में स्वागत है आपका...

प्रतिभा - जी नमस्ते और धन्यवाद...

सुप्रिया - प्रतिभा जी... एक हत्या... जो पूरे राज्य में.. चर्चा का विषय बना हुआ है... क्यूँकी कभी उसी लड़की के लिए... पूरे भुवनेश्वर का सिस्टम को जाम करवाया था आपने...

प्रतिभा - जी...

सुप्रिया - तो अब जब उसी लड़की अनु की हत्या हो गई है... इस पर... एक नारी होने के नाते और... वाव की अध्यक्षा होने के नाते... आपकी क्या प्रतिक्रिया रहेगी...

प्रतिभा - मैं आपकी प्रश्न का आशय समझ गई हूँ... मैं विश्व को हत्यारा नहीं मनाती हूँ...

सुप्रिया - वज़ह...

प्रतिभा - देखिए सुप्रिया जी... अनु की किडनैपिंग की खबर... और मिलने की खबर... आप ही की चैनल पर पहले आई थी... हमारी पूरी तंत्र और सिस्टम जिस सूंढी साही में आज भी घुस नहीं पा रही है... उसी सूंढी साही में... अपनी जान की परवाह किए वगैर... वीर घुसा था... और अनु को छुड़ा कर लाया था... और उसी शाम को... उसने ज़माने से लड़ कर... अनु को अपनाया था... इसलिए मैं तो मान ही नहीं सकती... की यह खून वीर से हुआ है...

सुप्रिया - तो फिर वीर सिंह क्यूँ यह इल्ज़ाम अपने सिर ले रहे हैं...

प्रतिभा - इस बात का जबाव.. पुलिस को ढूंढना पड़ेगा... पर मैं इतना जरुर कह सकती हूँ... यह एक सडयंत्र है... कहीं ना कहीं मुझे लगता है... इस हत्या के पीछे... वे लोग सामिल हैं... जो लोग अनु के किडनैपिंग में सामिल थे...

सुप्रिया - यह बहुत ही बोल्ड स्टेटमेंट है... क्या यह एडवोकेट प्रतिभा बोल रही हैं...

प्रतिभा - हाँ... यह मैं अपनी वकालत की अनुभव पर बोल रही हूँ...

ओंकार चेट्टी टीवी बंद कर देता है, और कमरे में नजर दौड़ाता है l रॉय अपना प्लेट खाली कर रहा था l केके चेट्टी की ओर हैरान हो कर देख रहा था l कमरे में एक शख्स अपना पैर फैला कर बैठा हुआ था l छत की ओर देखते हुए कुछ सोच रहा था l चेट्टी उसे सोचता देख पूछता है

चेट्टी - अब क्या सोचने लगे...

@ - यही की यह बुढ़िया बहुत शातिर चाल चल रही है... न्यूज चैनल में बैठ कर... वीर की इमेज बिल्ड ऑप कर रही है...

केके - हाँ... यही तो वह बुढ़िया थी... जिसके वज़ह से... अनु की किडनैपिंग फैल हो गई थी... जैसे ही अदालत से नई तारीख का ऐलान हुआ... तभी से देख रहा हूँ... यही न्यूज चैनल वाले... कभी वीर की कॉलेज जाकर स्टूडेंट्स से.. तो कभी माली साही की बस्ती में रह रहे बस्ती वालों से... हर किसी से वीर और अनु के बारे में पूछ पूछ कर... वीर की पॉजिटिव इमेज बनाने की मुहिम में लगे हुए हैं...

चेट्टी - वह सब छोड़ो... (उस शख्स से) तुम तो कह रहे थे... वीर पहली ही सुनवाई में निपट जाएगा....

@ - हाँ... मुझे लगा तो यही था... वीर जिस तरह से टूट कर... अनु के कत्ल का इल्ज़ाम अपने सिर ले लिया था... और अपने लिए ना सिर्फ वकील लेने से मना कर रहा था... बल्कि अपने भाई से मिलने से भी इंकार कर दिया था... तब मुझे लगा... एक ही सुनवाई में सारा का सारा मामला ख़त्म हो जाएगा... पर... पर ऐसा सोचने वाला मैं अकेला तो नहीं था... इन तीन दिनों की डेवलपमेंट देख कर आप सबको भी तो यही लगा था...

चेट्टी - हाँ... लगा तो था.. मगर ना जाने यह विश्वा नाम का सांप कहाँ से कुंडली मार कर मेरी खुशियों पर आकर बैठ गया है... वीर के इल्ज़ाम अपने सिर लेने के बाद...उसने... वकील लेने से मना भी कर दिया था... पर ऐन मौके पर... यह शाला विश्वा ना जाने कहाँ से टपक पड़ा...

रॉय - कहाँ से क्या... राजगड़ से... जैसे ही उसे पता चला होगा... वीर के बारे में... राजगड़ से कटक टपक पड़ा... देखा नहीं विक्रम की आने में देरी हुई.. पर विश्वा सुबह ही आ गया था..

चेट्टी - अगर विश्वा का कुछ ना किया गया... तो.. (उस शख्स से) कुछ सोचो... क्यूँकी सिस्टम में एक धड़ा ऐसा भी है... जो विश्वा के फेवर में हैं... उसके मदत को आगे भी आ सकते हैं...

@ - ह्म्म्म्म... यही तो मैं भी सोच रहा हूँ... विश्वा का क्या किया जाए...

केके - ओ भई ओ... विश्वा के चक्कर में... विक्रम को ना भूलो... वैसे भी... (चेट्टी से) आपका तो खास वास्ता रहा है उससे...

चेट्टी - अबे चुप... साले (शख्स से) कुछ सोचा तुमने...

@ - हाँ सोच लिया...

चेट्टी - क्या... सोच लिया...

@ - अब पुलिस की जाँच को हम दिशा देंगे...

चेट्टी - जैसे...

@ - पुलिस को... अपनी आगे की तफ्तीश के दौरान... एक चश्मदीद गवाह मिलेगा... वह भरी अदालत में बयान देगा... वीर को अनु का कत्ल करते हुए... अपनी आँखों से देखा है...

केके - अरे वाह... क्या बात है... कितना घटिया प्लान है...

चेट्टी - अबे केके के बच्चे... क्या बोला तुने...

केके - वही जो सुना आपने... आपको क्या लगता है... कोई चश्मदीद गवाह सामने आयेगा... तो विश्वा उसे बिना क्रॉस एक्जामिन कर छोड़ देगा... अरे उसने तो... वीर की इकबालिया बयान की धज्जियाँ उड़ा दी... पब्लिक प्रोसिक्यूटर की दलीलों की बखिया उधेड़ कर रख दिया... फिर वह चश्मदीद गवाह... विश्वा के सामने कितना देर टिकेगा... भरभरा के टूट जाएगा... जैसे रेतीले टीले ढह जाते हैं...

@ - अगर ऐसी नौबत ही ना आए तो...

चेट्टी - क्या मतलब है तुम्हारा...

@ - चश्मदीद गवाह टूटेगा तब ना... जब विश्वा क्रॉस एक्जामिन के लिए अदालत पहुँचेगा...

केके - ओए... पागल हो गए हो क्या... विश्व दिमाग या जुबान से ही तेज नहीं है... हाथ पैर चलाने में भी बहुत तेज है... खबर तो मिली होगी ना... कैसे अकेले ही... राजा के लाव लश्कर को... चुटकियों में मसल के रख दिया... और उस पर... वह अकेला भी नहीं होगा... उसके साथ विक्रम भी होगा...

रॉय - अरे कहाँ... विक्रम भुवनेश्वर में रहता है... और विश्व कटक में...

चेट्टी - तो...

@ - विक्रम का इलाज हो जाएगा...

केके - कैसे...

@ - वह आप लोग मुझ पर छोड़ दीजिए... आपको बस यह करना होगा... के अगले सुनवाई के दिन... विश्वा अदालत ना पहुँचे... उसके लिए जुगाड़ लगाना होगा... ताकत से नहीं... दिमाग से...

चेट्टी - तुम बात को सस्पेंस बना कर क्यूँ ख़तम कर रहे हो... कुछ ऐसा बताओ के... हमारा दिमाग के साथ साथ जोश भी दौड़ने लगे...

@ - ठीक है फिर सुनिए... कल पुलिस के पास एक लेटर पहुँचेगी... लिखने वाला अपनी जान का हवाला देकर नाम ना बताने की शर्त पर... पुलिस को अपनी गवाही देगा... प्रोटेक्शन ऑफ़ वीटनेस ऐक्ट के तहत... उसे पुलिस सुरक्षा का पूरा आश्वासन देगी... इसलिए वह पहले पुलिस को बयान देगा... फिर सीधे अदालत में...

चेट्टी - ओ अब समझा... विश्वा को इसलिए रोकना होगा... ताकि वह... उस गवाह का क्रॉस एक्जाम ना कर पाए...

@ - हाँ...

केके - उस गवाही के बाद... कोर्ट और एक डेट दे दे तो...

@ - देगी... जरुर देगी... पर उस डेट के अंदर बहुत कुछ हो सकता है... हो सकता है... वीर दुख और ग्लानि के कारण... जेल में आत्महत्या कर ले...

चेट्टी - कैसे... जब कि न्यूज चैनल वाले... उसकी इमेज बनाने में लगे हुए हैं...

@ - बनाने दीजिये उन्हें... जो बनाना है... हम तो डैमेज करने के लिए हैं...

चेट्टी - ठीक है... मगर अभी तक तुमने बताया नहीं... के तुम विक्रम से कैसे निपटोगे...

@ - थोड़ा धीरज धरीए... कल नहीं तो परसों... या फिर नर्सों... एक ऐसा राजनीतिक कांड होगा... जिसमें विक्रम तो निपटेगा ही.. वीर की इमेज पर दाग भी लगेगा... एक प्यादा... विक्रम के मैदान में घुस कर... शाह और वजीर को मात देगा...

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अगले दिन

धारपड़ा जेल की मुलाकात वाली कमरे में विश्व बदहवास सा एक सिरे से दूसरे सिरे तक टहल रहा था l कमरे में एक बड़ी सी टेबल लगा हुआ था l विक्रम एक कोने में बैठा टेबल पर हल्का सा पंच मारे जा रहा था l थोड़ी देर बाद कमरे का दरवाजा खुलता है l दो पुलिस वाले वीर को लेकर कमरे के अंदर आते हैं l वीर के हाथों में हथकड़ी थी l वीर को यूँ हथकड़ी में देख कर विश्व और विक्रम दोनों स्तब्ध हो जाते हैं l एक पुलिस वाला विश्व के सामने आता है, विश्व उसे प्री एपॉइंटमेंट लेटर के साथ कोर्ट ऑर्डर की कॉपी देता है l पुलिस वाला कॉपी लेने के बाद दूसरे पुलिस वाले को इशारा करता है l वह पुलिस वाला वीर के हथकड़ी खोल देता है और फिर टेबल की दूसरे कोने पर बिठा कर टेबल पर लगी एक हूक में हथकड़ी फंसा देता है l

पुलिस - (विश्व से) वकील साहब... आपके पास सिर्फ आधा घंटा है...

विश्व - काफी है...

दोनों पुलिस वाले कमरे के बाहर चले जाते हैं l उनके जाते ही विक्रम अपनी जगह से उठ कर कुर्सी को वीर के पास डालता है और वीर की हाथ पकड़ लेता है l वीर के चेहरे पर दाढ़ी बढ़ी हुई थी l बाल बिखरे हुए थे l

विक्रम - यह... क्या हालत बना ली है तुमने मेरे भाई...

वीर - तुम कैसे हो भैया..

विक्रम - तुम्हे इस हालत में देख कर... मैं कैसा हो सकता हूँ...

वीर - भैया... कोई इस कोशिश में है... की मेरी तकदीर लिखे... मैं इस कोशिश में था... की मैं अपना तकदीर खुद लिखूँ... पर सच्चाइ यही है कि... हम सब तकदीर के हाथों में खिलौने हैं... बस अपने अपने घमंड में जिए जा रहे हैं... उस घमंड का टकराव ही है... के मैं यहाँ तकदीर के हाथों पटका गया हूँ...

विश्व - तुमने अनु की कत्ल का इल्ज़ाम... अपने सिर क्यूँ लिया...

वीर, विश्व की ओर देखता है l विश्व देखता है वीर का चेहरा और आँखे भाव शून्य दिख रहे हैं l अनु की मौत का दर्द तक वीर के चेहरे पर दिख नहीं रहा था l

विश्व - वीर... मैंने तुमसे कुछ पूछा है...

वीर - जब बाप ही बेटे को... उसके बहु के कत्ल की जुर्म में फंसाने की साजिश करे... तो बेटा होने के हिसाब से... बाप की ख्वाहिश पूरा करना... बनता था... सो मैंने किया...

विक्रम - तुम चाचाजी को गलत समझ रहे हो...

वीर - चाचाजी... यह छोटे राजा जी... चाचाजी कब बन गए...

विक्रम - जब उन्हें यह मालुम हुआ... के उनकी कि हुई अपराध के लिए... तुमने खुद को सजा के लिए कानून के हवाले कर दिया... (विक्रम राजगड़ में हुए पिनाक सिंह से हुआ हर हादसे को बारीकी से कहता है)

वीर - (सब सुनने के बाद) बहुत देर कर दी... छोटे राजा जी ने... बहुत देर कर दी... अब सब खत्म हो गया है...

विश्व - क्या खत्म हो गया है वीर... क्या खत्म हो गया है... क्या तुम नहीं चाहोगे... तुम्हारी अनु को जिसने मारा है... तुम उससे बदला लो...

वीर - इसीलिए तो तुमसे मिलने आया हूँ...

विश्व - तो तुमने पुलिस को यह सुईसाइडल स्टेटमेंट क्यूँ दी... (वीर इस बार विश्व की आँखों में देखता है) वीर... जो भी तुम्हें जानते हैं... वे लोग बेझिझक कह सकते हैं... सुरज पश्चिम से निकल सकता है... पर वीर अनु को... कभी नहीं..

वीर - मैं मजबूर था...

विक्रम - कैसी मजबूरी...

वीर उस दिन हुए जब घर लौट रहा था, उसके साथ उस दौरान जो भी हुआ सब एक एक कर कहने लगा l विक्रम और विश्व सुन रहे थे l अनु की हत्या के बात कहने के बाद वीर कुछ सेकेंड के लिए चुप हो जाता है l थोड़ी देर चुप रहने के बाद वीर फिर से कहना चालू करता है l

वीर - मैं.. अनु को उस हालत में देख कर... सच कहूँ तो मर गया था... मैं उसे बचाना चाहता था... इसलिए उसे मैंने कहा भी... चोट बड़ी नहीं है... डॉक्टर के पास जाने से... चोट ठीक हो जाएगी... पर जानते हो प्रताप... अनु मुझे कितना जानती थी... उसने तुरंत जवाब दिया... झूठे... (आवाज़ भर्रा जाती है और आँखे बहने लगते हैं) जो उसके मुहँ से मैं सुनना चाहता था... अपनी शर्म ओ हया के चलते कभी नहीं कहती थी... उसके अंतिम शब्द वही थे... आई लव यू... (वीर और कह नहीं पाता, फुट फुट कर रोने लगता है, विक्रम उसका सिर लेकर अपने सीने से लगा लेता है l माहौल बहुत ही ग़मगीन था, क्यूँकी तीनों के आँखों में आँसू थे, उसी हालत में वीर विश्व से कहता है) अब तुम्हीं बताओ प्रताप... उसके बाद कौन जीना चाहेगा.. मैं हमेशा सोचता था... जिस दिन अनु आई लव यू कहेगी... वह दिन मेरी जिंदगी का सबसे खूबसूरत और खुशियों भरा पल हो... चाहे आखिरी ही क्यूँ ना हो... पर... (फिर से रोने लगता है)

विश्व - (खुद को सम्हालते हुए) फिर भी यार... अनु की कातिलों से तुमने बदला लेने की सोचा नहीं कैसे...

वीर - (थोड़ा संभलने के बाद) अनु के दम तोड़ते ही गुस्से में... 100 par डायल किया... और अनु की मर्डर की बात कह कर अड्रेस दे दिया... उसके बाद... मोबाइल को वहीँ फेंक कर अनु से लिपट कर रो रहा था... मुझे कोई होश ही नहीं था... जब पुलिस आकर मुझे झकझोरते हुए पूछा... तो मैं सबसे पहले उस आदमी पर नजर डाली... जिसे सबसे पहले गोली मारी थी... पर उसकी लाश वहाँ नहीं था... मुझे समझते देर नहीं लगी के मुझे फंसाने के लिए ही यह चालें चली गई थीं... यह तो इत्तेफाक था... के मेरे हाथ खंजर पर नहीं पहुँचा था... वर्ना मैं आज पक्का गिल्टी होता...

विक्रम - चाचाजी की बातों से तो कहीं लगा ही नहीं के वह तुम्हें फंसाना चाहते थे... फिर यह रिवॉल्वर... और गोली...

विश्व - इसका मतलब यह हुआ कि... कोई तीसरा एंगल भी है... (वीर से) याद है वीर... तुम्हें हमेशा एक अननोन कॉल आता था... क्या वह कॉल उसका हो सकता है...

वीर - (थोड़ी सोच में पड़ जाता है, फिर अचानक उसकी आँखों में एक चमक आ जाती है) हाँ.. हाँ... हाँ प्रताप हाँ... वह कॉल... उसी शख्स का हो सकता है.. मैं उस वक़्त इतने टेंशन में था कि... गौर नहीं कर पाया... पर अब लगता है कि वह कॉल... उसीने किया था...

विश्व - यानी... वह छोटे राजाजी की आसपास रहता था.. या शायद उनके साथ रहता था... राजा साहब की गुस्से और नफरत की आड़ में रह कर... तुमसे अपना बदला ले रहा था...

विक्रम - पर मर्डर तो खंजर से हुई... फिर उसने गन क्यों वीर को पहुँचाया...

वीर - पता नहीं... शायद मुझे फंसाना चाहता था... या फिर पुलिस को कंफ्यूज करना चाहता था...

विक्रम और विश्व - क्या...

वीर - हाँ... गन मिलने के बाद जब मैं तीसरी मंजिल पर पहुँचा... तो पहला वाला मुझ पर हमला कर दिया... मैंने अपने आपको बचाने के बाद.. उस पर फायर कर दिया... वह तड़पते हुए गिरा... मैं समझा वह मर गया... फिर मैंने अपना निशाना... दूसरे पर टिकाया... वह दूसरा... अनु की मुहँ को दबोच रखा था... मैंने उस पर गोली चलाई... गोली उसके कान के पास से गुजर कर पिलर पर लगी... तभी वह अनु को लेकर फिर पिलर के पीछे हो लिया... और कुछ ही सेकेंड बाद... वह उस फ्लोर की मुहाने की ओर भागने लगा... मैं उसके पीछे पीछे भगा... जैसे ही उसने कुदी मारी.. मैं पीछे से गोली चला दी... पर उसे गोली लगी नहीं... वह ताजा जमा किए हुए रेत की ढेर पर गिरा.. बस... उसके बाद मैं अनु की तरफ़ मुड़ गया था... (वीर चुप हो जाता है, सब सुनने के बाद विक्रम वीर से पूछता है)

विक्रम - तुम्हें उनकी सूरतें तो याद होगी ना...

वीर - है भी... नहीं भी...

विक्रम - कैसे... कैसे याद नहीं है तुम्हें..

वीर - क्यूँकी उनके चेहरे पर... दाढ़ी मूँछ सब नकली था... वह देखते ही पता चल गया था...

विक्रम - ओह... (विश्व की तरफ देखते हुए) अब... अब हम क्या करें...

विश्व - पता नहीं... उस हादसे को चार दिन गुजर चुके हैं... पुलिस ने भले ही एरिया सीज कर दिया है... फॉरेंसिक डिपार्टमेंट ने सारे सबूत भी इकट्ठा कर चुके हैं.. हमें वहां से उम्मीद करना बेकार है...

विक्रम - क्या वह लोग प्रोफेशनल हैं..

विश्व - नहीं... प्रोफेशनल तो हरगिज नहीं... पर चालाक जरुर हैं...

विक्रम - चालाक...

विश्व - हाँ... चालाक... पूरी बात सुनने के बाद... मैं यह पक्का कह सकता हूँ... वीर ने जो अंदाजा लगाया वह सही है... वीर ने भले ही अपनी बात पूरी नहीं की... पर बात को मैं पूरी तरह से समझ गया...

विक्रम - मतलब कत्ल की गुत्थी को तुम समझ गए...

विश्व - हाँ... वे लोग चाहते थे कि यह खून वीर के हाथों से हो... इसलिए वीर तक रिवॉल्वर पहुँचाया... पर वीर ने जैसे ही पहला फायर किया... तब वह जो अनु को दबोच रखा था... अनु को सामने कर दिया था... ताकि दूसरा फायर अनु को लगे... पर दूसरा फायर पिलर पर लगी... वह जो अनु को दबोच रखा था.. वह थोड़ा डर गया... पर अपना काम कर गया... उसने अनु की पीठ पर खंजर मारा... और वहाँ से कूद कर चला गया...

विक्रम - हाँ यहाँ तक तो मैं समझ गया... गुत्थी क्या है...

विश्व - अगर वह प्रोफेशनल होते... तो मर्डर के और भी तरीके हो सकते थे... पर कातिल ने पीठ पर खंजर मारा है... यानी कातिल जो भी है.. उसे अनु भी जानती थी... और यकीनन वीर भी उसे जानता होगा...

वीर - (हैरान हो कर) क्या...

विश्व - हाँ... कोई ग़द्दार है... जो या तो अपना बन कर रह रहा था.. या अभी भी रह रहा है... इसलिए उसने वार पीठ पर किया...

विक्रम - कोई अपना बन कर रह रहा था... कौन हो सकता है..

वीर और विक्रम सोच में पड़ जाते हैं l पर कोई नतीजे पर नहीं पहुँच पाते l तभी कमरे का दरवाजा खुलता है l पुलिस वाला अंदर आता है और कहता है l

पुलिस - टाइम हो गया...

विश्व - ठीक है..

विक्रम - इतनी जल्दी...

पुलिस - जी..

विक्रम - सिर्फ़ दो मिनट और... प्लीज...

पुलिस - ठीक है... (कह कर बाहर चला जाता है)

विक्रम - अब हम उन हरामियों को कैसे ढूंढेंगे...

विश्व - (वीर से) हम कल नहीं तो परसों आयेंगे... इस बीच हमें जो करना है या ढूँढना है... हम वह करेंगे...

विक्रम - वही तो क्या...

विश्व - खोया हुआ वह ब्रैसलेट... और उसके मालिक को...

तभी कमरे का दरवाजा फिर से खुलता है, कमरे के भीतर पुलिस वाला आता है, हूक से वीर की हथकड़ी को अलग करता है और अपने साथ अंदर ले जाने लगता है l दरवाजे के पास पहुँच कर वीर रुकता है और विक्रम से कहता है l

वीर - भैया...

विक्रम - हाँ वीर...

वीर - ESS में मेरे सीईओ बनने के बाद... जो भी कुछ ऑफिशियल या ननऑफिशियल... जो भी हुआ है... अगली बार आते वक़्त डिटेल्स लाइयेगा..

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दो दिन बीत गए हैं, शाम का वक़्त है l इन दो दिनों में द हैल में हालात में बड़ी तब्दीली आई हुई है l ज्यादातर गार्ड्स या तो छुट्टी पर हैं या फिर ड्यूटी पर नहीं आ रहे हैं l शुभ्रा ड्रॉइंग हॉल में परेशान सी बैठी हुई है l उसके कानों में गाड़ी की अंदर आने की आवाज सुनाई देती है l वह तेजी से बाहर की ओर जाती है l बाहर विक्रम की कार आकर रुकती है l विक्रम थका हरा मायूस सा गाड़ी से उतरता है l गेट की ओर देखता है l एक दम शुना शुना सा लग रहा था l कोई नहीं था वहाँ पर l यह तो गनीमत है कि गेट रिमोट कंट्रोल से चलती है, वर्ना गेट खोलने और बंद करने के लिए उसे गाड़ी से खुद उतरना पड़ता l वह एक गहरी साँस छोड़ते हुए शुभ्रा के साथ अंदर आता है l अंदर अब नौकर भी नहीं थे l विक्रम धप से सोफ़े पर बैठ जाता है l शुभ्रा भागते हुए जाती है और विक्रम के लिए पानी लाती है l विक्रम पानी की ग्लास हाथ में लेता है और शुभ्रा की ओर देखते हुए कहता है

विक्रम - शुब्बु... आई एम सॉरी...

शुभ्रा - (विक्रम के पास बैठ कर) किस बात की सॉरी...

विक्रम - (आँखों में पानी आ जाती है) मैंने कहा था.. तुमको रानी की तरह रखूँगा...

शुभ्रा - रानी की तरह ही तो हूँ... यह नौकर चाकर मेरी स्टेटस नहीं बना सकते... आप हो संग तो मेरे लिए हर जगह राजमहल है...

विक्रम - समझ में नहीं आ रहा... यह ESS के गार्ड और नौकर... आ क्यूँ नहीं रहे हैं..

शुभ्रा - जैसे आप और प्रताप लगे हुए हैं... वीर की इमेज बनाने के लिए... उसी तरह... कुछ लोग वीर की इमेज बर्बाद करने में तुले हुए हैं...

विक्रम - हाँ... देख रहा हूँ... दो दिन से... कुछ लोग अनु के लिए... कैंडिल मार्च निकाल रहे हैं... वीर के लिए फांसी की सजा माँग रहे हैं... अब उनकी तादात बहुत बढ़ गई है... वीर के खिलाफ कोई है... जो लोगों के दिलों में गुस्सा भर रहा है...

शुभ्रा - हमने जो हथकंडा अपनाया... वही अब आपके विरोधी अपना रहे हैं... हम अदालत पर इम्प्रेशन डालने के लिए... वीर की इमेज बनाने की कोशिश की... और आपके विरोधी... अपने लिए जमीन बना रहे हैं... आखिर राजनीति बड़ी कुत्ती चीज़ है...

विक्रम - सही कहा तुमने... एक बार वीर छूट जाए बस... तुम देखना... हमारे विरोध में यह राजनीति की रोटी सेंकने वालों की वह गत बनाऊँगा... के...

और कुछ नहीं कह पाता, जुबान बंद हो जाता है l शुभ्रा देखती है विक्रम का चेहरा सख्त हो गया है, पर पीड़ा झलक रही थी l शुभ्रा बातों को घुमाने की प्रयास करती है l

शुभ्रा - ओह देखिए ना.. मैं कैसी ऊलजलूल बातेँ कह कर आपका मुड़ खराब कर दिया... हमारे हाथ पैर सलामत है...हमें नौकरों की और गार्ड्स की क्या जरूरत... हाँ घर थोड़ा बड़ा है... पर कोई नहीं... वैसे भी थोड़ी मोटी हो गई हूँ... अब साफ सफाई में इतनी मेहनत करुँगी की... एकदम दुबली हो जाऊँगी... देखियेगा...

विक्रम - (होठों पर एक हल्की सी मुस्कान आ जाती है) जानती हैं शुब्बु... इस सहर में हमारा सिक्का चलता था... रास्ते में चलती हमारी गाड़ी तक... पहचान ली जाती थी... आज आलम देखो... सब ना सिर्फ साथ छोड़ रहे हैं... बल्कि... हमारे खिलाफ... अब मोर्चाबंदी कर रहे हैं... लामबंद हो रहे हैं..

शुभ्रा - तो होने दीजिए ना... वह कहते हैं ना.. हर कुत्ते का दिन आता है... तो हम इस बात से तसल्ली कर लेते हैं ना... की आज उन लोगों का दिन है...

विक्रम - (सीधा हो कर बैठ जाता है) तो जब हमारा दिन हुआ करता था... तो उस नाते हम क्या थे...

शुभ्रा - (अपनी दोनों हाथों से विक्रम की मूँछों पर ताव देकर) आप तो शेर हो... शेर... कुत्तों का तो दिन होता है.. और शेरों का दौर होता है... वैसे भी... शेर अगर फंदे में या पिंजरे में कहीं फ़ंसा हुआ हो... तो शेर की बेबसी पर... कुत्ते ही हल्ला मचाते हैं..

विक्रम - बाप रे... आज मेरी शुभ्रा कैसी बातेँ कर रही है...

शुभ्रा - वही... जो सच है.. चलिए छोड़िए.. आज क्या हुआ... आप और प्रताप सुबह से गए थे...

विक्रम - (चेहरे की रौनक धीरे धीरे गायब होने लगती है) शुब्बु... (एक गहरी साँस छोड़ते हुए) जंग में... दुश्मन सामने हो तो बात अलग होता... पर इस लड़ाई में.. हम अंधेरे में हैं... और दुश्मन कौन है.. कहाँ से वार कर रहा है... मालूम नहीं पड़ रहा...

शुभ्रा - क्यूँ कुछ और ही हो गया है क्या...

विक्रम - हाँ जान... हाँ... पुलिस की वह टीम... जिनके जिम्मा था.. सबूत स्टोर से लेकर... अदालत में जमा देने की... वह दो पुलिस वाले गायब हैं...

शुभ्रा - क्या...

विक्रम - हाँ शुब्बु... वह लोग गायब हैं...

शुभ्रा - यह अच्छी खबर ना सही पर... हमारे केस में तो पॉजिटिव मोड़ हुई ना..

विक्रम - हाँ.. पॉजिटिव मोड़ तो है.. पर आज एक और खबर ने.. मुझे और विश्वा को चौंका दिया...

शुभ्रा - कैसी खबर विक्की...

विक्रम - आज हमें... मजिस्ट्रेट के पास दर्ज एक बयान की कॉपी मिली... जो कि खुद को चश्मदीद गवाह बता कर बयान दिया था..

शुभ्रा - क्या... कौन है वह... और क्या बयान दिया...

विक्रम - कौन है... क्या नाम है.. उस कॉपी में कुछ दर्ज नहीं है... बस बयान मजिस्ट्रेट के सामने दिया गया है... वह स्टैम्प पेपर हमें पुलिस ने दी... उसकी पहचान छुपाया गया है...

शुभ्रा - क्यूँ...

विक्रम - उसने अपनी पहचान छुपाये रखने के लिए पुलिस से लिखित आश्वासन माँगा था... इस शर्त पर अपनी गवाही सबूत के साथ देगा कहा था... जिसको मान कर... पुलिस ने उसकी आइडेंटिटी को छुपाया और मजिस्ट्रेट के सामने बयान दर्ज करवा लिया...

शुभ्रा - उसे किस बात का डर था...

विक्रम - उसके एप्लिकेशन में... क्षेत्रपाल परिवार से डर जाहिर की है... जाहिर सी बात है... उसकी आइडेंटिटी... हमसे और विश्व से छुपाया जाना कानून की मजबूरी है...

शुभ्रा - ओह... इसका मतलब... वीर ने अपनी गिरफ्तारी के वक़्त जो स्टेटमेंट दी थी... उसे उस अननोन गवाह से... बहाल किया जाएगा... ओ.. गॉड...

विक्रम - हाँ... अब अचानक ऐसा मोड़ आएगा... हमने सोचा नहीं था..

शुभ्रा - वह... प्रताप का क्या कहना है...

विक्रम - उसका स्टेटमेंट विश्व पढ़ रहा है.... कोई ना कोई लूप होल वह ढूंढ लेगा...

अब दोनों खामोश हो गए l दोनों ही अपनी अपनी ख़यालों में गुम हो गए थे l तभी उन्हें बाहर हल्का हल्का सो शोर सुनाई देने लगती है l दोनों का ध्यान उस शोर की तरफ जाता है l दोनों एक दूसरे की ओर सवालिया नजर से देखते हैं l क्यूंकि शोर धीरे धीरे हैल की तरफ बढ़ते हुए आ रहा था l विक्रम की भौहें सिकुड़ जाते हैं l वह अपनी जगह से उठाता है खिड़की के तरफ जाकर काँच से बाहर की नज़ारा देखने लगता है l बाहर भीड़ बहुत थी l कुछ गार्ड्स भी थे उन भीड़ के बीच l कुछ औरतों के हाथ में अनु की तस्वीर थी l कुछ लोगों के हाथों में प्लाकार्ड था, जिसमें लिखा हुआ था "गरीब मजलुम अनु को इंसाफ़ दो" "ऐयाश पैसे वालों को फांसी दो" इत्यादि आदि सब लिखा हुआ था l कुछ लोग बढ़ चढ़ कर नारेबाजी कर रहे थे l

"वीर को फांसी दो"

"क्षेत्रपाल को बाहर निकालो"

"विक्रम सिंह को जुते मारो"

विक्रम उन्हें गौर से देखता है l कुछ लोग उसीके पार्टी के कार्यकर्ता थे l विक्रम को एहसास होता है कि उसकी शर्ट को किसीकी मुट्ठी जकड़ रखा है l विक्रम मुड़ कर देखता है, शुभ्रा डरी सहमी विक्रम की शर्ट को अपनी मुट्ठी में भिंच रखा है l

विक्रम - (अपने दोनों हाथों में शुभ्रा का चेहरा लेकर) घबराना मत जान... मैं हूँ...

अचानक एक पत्थर उस काँच की खिड़की से टकराता है l खिड़की टूटती नहीं है पर कुछ क्रैक्स मकड़ियों के जालों सी पड़ जाती है l विक्रम शुभ्रा को लेकर पीछे हटता है l दो चार पत्थर फिर से खिड़कियों से टकराते हैं l उधर नारा बदल चुका था l

"विक्रम सिंह बाहर निकलो"

"गरीबों को ज़वाब दो"

"कानून को जवाब दो"

ऐसे में और एक पत्थर आकर उसी खिड़की से लगती है l इस बार खिड़की टूट जाती है l काँच के टुकड़े फर्श पर बिखर जाते हैं l विक्रम का चेहरा सख्त हो जाता है, जबड़ा भिंच जाता है l वह उसी कमरे की एक कबोर्ड से अपनी लाइसेंसी रिवॉल्वर निकालता है l उसे रिवॉल्वर के साथ देख कर शुभ्रा डर जाती है l वह विक्रम के सामने खड़ी हो जाती है l

शुभ्रा - नहीं विक्की नहीं... यह लोग समझते हैं.. इनके साथ अन्याय हुआ है... इन्हीं में से एक के साथ... वीर से अन्याय हुआ है... सदियों की इसी मानसिकता को... आप और मत भड़काईये... यह भीड़ है... आपकी एक हरकत इनकी अंदर की गुस्से को उकसा देगा... परिणाम बहुत खतरनाक होगा... प्लीज... वे लोग अभी गेट के बाहर.. डैमनस्ट्रैट कर रहे हैं... उसके बाद चले जाएंगे... वे लोग यही चाहते हैं कि आप यह गलती करें... प्लीज...

विक्रम रुक जाता है, और वही टूटी हुई खिड़की के पास जाने लगता है l शुभ्रा कमरे की लाइट को बुझा देती है और पुलिस को फोन लगाती है l पुलिस की फोन लगते ही बाहर हो रहे हालात के बारे में जानकारी देती है l फोन रख कर शुभ्रा भी विक्रम के बगल में आकर खड़ी होती है l दोनों देखते हैं लोगों का हुजूम बढ़ता ही जा रहा है l लोग अब नारा बाजी छोड़ कर सीधे विक्रम को गाली देने पर उतारु हो गए थे l विक्रम अंदर ही अंदर गुस्से में जल रहा था l जिसे शुभ्रा साफ महसुस कर पा रही थी l इसलिए शुभ्रा विक्रम की हाथ जोर से पकड़ रखा था l दोनों देखते हैं लोग अब गेट फांदने की कोशिश कर रहे हैं l विक्रम देखता है एक आदमी उन सबको पीछे से खिंच कर उतार रहा है l विक्रम उसे पहचानने की कोशिश करता है l फिर उसकी आँखे बड़ी हो जाती है l क्यूँकी जो आदमी लोगों को गेट चढ़ने से रोक रहा था, वह कोई और नहीं मृत्युंजय था l विक्रम देखता है सभी लोग जो गेट पर चढ़ रहे थे वह लोग उतर कर मृत्युंजय को घेर लिया था l कुछ देर बाद वही लोग गेट के पास आकर खड़े होते हैं, उनके साथ और भी लोग खड़े होते हैं l वे लोग मिलकर गेट को उखाड़ने के लिए ताकत लगा देते हैं l यह सब देख कर शुभ्रा और भी डरने लगती है l वह विक्रम की ओर देखती है l विक्रम अपनी जबड़े भिंचे हुए उस भीड़ को देखे जा रहा था l कुछ देर बाद वह लोहे की गेट कंक्रीट की दीवार से उखड़ कर गिर जाता है l लोग भागते हुए बंगले की ओर बढ़ने लगते हैं l विक्रम रिवॉल्वर हाथ में लेकर कमरे से बाहर निकल कर दरवाजे के सामने खड़ा हो जाता है l उसके पीछे पीछे शुभ्रा आकार खड़ी हो जाती है l लोगों की भीड़ जब सीढ़ी तक पहुँचती है विक्रम पहली सीढ़ी पर एक फायर करता है l गोली लगते ही सीढ़ी में एक छोटा सा छेद हो जाता है और थोड़ा सा धुआं उठता है l भीड़ वहीँ ठिठक जाता है l आगे खड़े लोग विक्रम की ओर देखते हैं l उन लोगों में एक शख्स मृत्युंजय भी था l शुभ्रा आकर फिर से विक्रम के पीछे सट कर खड़ी होती है l विक्रम की आँखे मृत्युंजय से मिलती है l दोनों एक दूसरे को घूर रहे थे l विक्रम मृत्युंजय को समझने की कोशिश करता है l भीड़ भी पूरी तरह खामोश थी l

मृत्युंजय - भाइयों और बहनों... देखो इस क्षेत्रपाल से... इन लोगों ने कभी किसी इंसान को.. अपने बराबर नहीं समझा.. नहीं माना.. मर्दों को हमेशा कीड़े मकौड़े ही समझा... कभी किसी रिश्ते का लिहाज नहीं किया... हर औरतों को अपना बिस्तर और खुद को उसका चादर समझा... इन्हीं की इसी सोच की बेदी पर... हमारी एक बहन... मेरी बहन... बलि चढ़ गई... क्या यह लोग माफी के लायक हैं... नहीं हैं... आप लोग जानते हैं... इस क्षेत्रपाल के बाप के नापाक कारनामें... कैसे गरीबों को लुटा है... कई पुश्तों से... यह भी उसी क्षेत्रपाल का सपौला है... मैं तो कहता हूँ... आओ इसे और इसकी यह नर्क... मिटा दो...

आगे की पंक्ति के कुछ लोग चिल्ला कर आगे बढ़ते हैं l तो विक्रम एक नजर शुभ्रा को देखता है, उसकी आँखों में झाँकता है, फिर अपना रिवॉल्वर को मृत्युंजय की ओर फेंक देता है l रिवॉल्वर मृत्युंजय की पैर के पास आकर गिरता है l मृत्युंजय के साथ साथ वे लोग रुक जाते हैं और रिवॉल्वर की ओर देखने लगते हैं l मृत्युंजय अपना सिर उठाता है, अपनी नजर लोगों की ओर घुमाता है और चिल्ला कर लोगों से कहता है l

मृत्युंजय - यह तुम लोगों को फंसा रहा है... इसकी चाल में मत आओ... मारो.. मिटा दो इसे.. (लोग फिर भी ना आगे बढ़ते हैं, ना ही कुछ हरकत करते हैं) अरे ना मुरादों... अगर उसे हाथ लगाने की हिम्मत नहीं है... तो उठाओ पत्थर... और मारो...

अब लोग आगे ना जाकर पत्थर उठा कर विक्रम की ओर फेंक मारने लगते हैं l विक्रम पलट कर भागते हुए शुभ्रा को कवर करते हुए सारे पत्थर अपने ऊपर लेने लगता है l शुभ्रा खौफ के मारे रोने लगती है और विक्रम को अंदर की ओर खिंचने लगती है, पर विक्रम अपनी जगह से हटता नहीं है और बुरी तरह से ज़ख्मी होने लगता है l तभी अचानक कुछ ड्रोन्स हैल के परिसर में उड़ते हुए आते हैं l फिर अचानक वह ड्रोन्स एक एक करके फटने लगते हैं l वहाँ पर सब धुआं धुआं हो जाता है l कुछ देर बाद लोगों की आँखे जलने लगती हैं l असल में उन ड्रोन्स के जरिए, वहाँ पर स्मोक बम और टियर बम ब्लास्ट हुआ था l सब लोग अपनी आँखे मल रहे होते हैं कि एक शख्स मुहँ पर मास्क लगाए विक्रम और शुभ्रा के पास पहुँचता है l विक्रम का सिर पर बहुत पत्थर लगे थे l उसका पूरा सिर खून से लाल दिख रहा था l उसकी हालत बेहोशी जैसी हो गई थी l वह शख्स विक्रम को एक स्मोक मास्क पहना देता है और शुभ्रा को पहनने के लिए एक मास्क देता है फिर अपनी बाहों में उठाता है और शुभ्रा को अपने साथ आने के लिए इशारा करता है l लोग जो खांस रहे थे उनके बीच से हुए थोड़ी दूर पर रखे एक गाड़ी में विक्रम को सुला देता है और शुभ्रा को गाड़ी में बैठने के लिए कहता है l शुभ्रा बैठ जाती है गाड़ी वह जगह को छोड़ आगे बढ़ जाती है l थोड़ी दूर जाने के बाद वह शख्स अपना मास्क उतरता है l वह कोई और नहीं विश्व था l

शुभ्रा - थैंक्यू प्रताप...

विश्व - सॉरी मैं लेट हो गया..

शुभ्रा - पर मैंने तो पुलिस को कॉल लगाया था... तुम्हें कैसे पता चला..

विश्व - थोड़ी देर पहले... मुझे सुप्रिया ने खबर की के... ESS ऑफिस में.. कुछ बदमाशों ने आगजनी की है... तो मुझे शक हुआ था... इसलिए मैंने... जोडार साहब से कहला कर इस भीड़ की मूवमेंट की खबर ले रहा था... और घर से निकल चुका था... पर फिर भी... थोड़ी देर हुई है...

विक्रम - (कराहते हुए) नहीं.. तुम सही टाइम पर आए हो... थैंक्स...

विश्व - यह सब कौन कर रहा है...

विक्रम - मृत्युंजय...

विश्व - ह्वाट...

विक्रम - हाँ... यह कभी कभी गायब हो जाता है... और कभी कभी सामने आ जाता है... पर जब भी आता है... कोई दुर्घटना अपने साथ लेकर आता है...

विश्व - यह मृत्युंजय... किसी मामूली कार्यकर्ता का बेटा है ना...

विक्रम - हाँ...

विश्व - लगता नहीं... एक मामूली सा आदमी... इतनी ऑर्गनाइजिंग के साथ यह सब कर रहा है...

विक्रम - जो सीट मैंने और वीर ने छोड़ी थी... अब पार्टी की तरफ से यह उसी सीट से लड़ रहा है... मतलब अपने लिए ग्राउंड बना रहा है...

विश्व - मतलब तुम यह कहना चाहते हो.. यह एक पोलिटिकल अटैक था...

विक्रम - मुझे तो फ़िलहाल अभी यही लगता है...

विश्व - नहीं... मुझे कुछ और लगता है... इतनी बड़ी मॉब को.. मोबिलाईज कर... किसीकी जान लेने पर आ गया था... और तुम कह रहे हो.. यह एक पोलिटिकल वेंडेटा है... नहीं इस अटैक के पीछे कुछ तो है... पुलिस का अब तक यहाँ ना पहुँचना... और किसी मीडिया का... इस मॉब का कवर ना करना... यह पोलिटिकल वेंडेटा नहीं... कुछ और है...

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ESS और द हैल पर हमला सारे स्टेट में तहलका मचा दिया था l राजगड़ में टीवी न्यूज के जरिए खबर सबको खबर लग चुकी थी l यह खबर क्षेत्रपाल महल में सबको परेशान कर रखा था l क्यूँकी हर एक न्यूज चैनल में कोई इसे क्षेत्रपाल दबदबा का सूर्यास्त कह कर ब्रीफ कर रहा था तो कोई विक्रम और शुभ्रा का बेघर होकर भुवनेश्वर से कटक जा कर सेनापति दंपति के यहाँ ठहरने पर अनुकंपा व्यक्त कर रहा था l क्षेत्रपाल महल के अंदर पिनाक दिवान ए खास के एक कोने में अपना समाधि लगा कर बैठा हुआ था l वहीँ सुषमा नागेंद्र के कमरे में खिड़की से बहती नदी में बहती पानी व उसके ऊपर नावों को देख रही थी l नागेंद्र बिस्तर पर दवाई के प्रभाव में सोया हुआ था l कमरे में रुप आती है और जाकर सुषमा के बगल में खड़ी होती है l सुषमा रुप की ओर वगैर देखे

सुषमा - विक्रम अब कैसा है...

रुप - ठीक हैं... और भाभी भी ठीक हैं...

सुषमा - उसके चोट कैसे हैं...

रुप - सिर पर बहुत चोटें आई थीं... मरहम पट्टी हो चुकी है... डॉक्टर ने दवाई लिख दिया है... और कुछ दिनों के लिए आराम करने के लिए कह दिया है...

सुषमा - घर से दूर... मेरे दोनों बेटे... खतरे में हैं... हे भगवान.. क्या दिन आ गया इस परिवार पर... (दोनों के दरमियाँ कुछ देर के लिए खामोशी पसर जाती है) तुम्हारे चाचाजी को मालूम हुआ...

रुप - पता नहीं चाची... उनकी हालत भी कहाँ ठीक है... उनसे बात करो तो ऊलजलूल बड़बड़ाने लगते हैं... इसलिए.. मैंने उन्हें कुछ भी बताया ही नहीं... वह तो बस वीर भैया के आने की राह देख रहे हैं...

सुषमा - रुप...

रुप - हाँ चाची...

सुषमा - सेबती से कहना... संभल कर रहे... कहीं बड़े राजा जी को मालूम हुआ तो...

रुप - जी चाची... वह पहले से ही सावधान है... वह महल में जब खुद को सुरक्षित पाती है... तभी वह मुझसे सारे ख़बरें शेयर करती है...

सुषमा - फिर भी... उसे संभल कर रहने के लिए कहना... (फिर थोड़ी देर के लिए चुप्पी छा जाती है) अनाम ने कुछ और कहा...

रुप - नहीं चाची... बस इतना ही खबर है कि... कल वीर भैया से मिलने जाने वाले हैं... चूँकि विक्रम भैया... आराम कर रहे हैं... इसलिए... अनाम अकेले जाएंगे...

सुषमा - (एक गहरी साँस छोड़ते हुए) एक बात बताऊँ रुप... इस परिवार ने जितना छीना है... आज वह सब सूद के साथ खो रहा है... यह परिवार सिर्फ नाम के रुतबे से बड़ा है... वह भी पुरखों की विरासत से मिली है... इसलिए क्षेत्रपाल के मर्द अपने कद से ऊपर किसीको नहीं मानते... पर जो कद आज अनाम ने अपना बनाया है... उसके आगे यह लोग कहीं नहीं ठहर सकते... वीर ने अपनी जिंदगी में दो बहुत क़ीमती चीज़ कमाया है... एक प्यार... सच्चा प्यार... और एक दोस्ती... सच्ची दोस्ती... एक को ज़माने ने छिन लिया... अब उसके इस हाल में... उसका साथ दोस्ती दे रही है... अनाम... जिसका परिवार... क्षेत्रपाल की अहंकार के नीचे रौंद डाला गया... आज वही... गर्दिश की तूफ़ानों से.. क्षेत्रपाल के घर की चरागों को बचाने के लिए... जद्दोजहद कर रहा है...

सुषमा मुड़ती है रुप की तरफ़ तो देखती है रुप की आँखों में आँसू बह रहे थे l सुषमा अपनी हाथ आगे करती है और रुप के आँसू पोछती है l

सुषमा - तुम रो क्यूँ रही हो रुप.. मत रो... तुमने तो जिंदगी में वह हासिल किया है... जो इस परिवार किसी भी औरत को नसीब नहीं हुई... एक सच्चा प्यार... जो हर रिश्ते को... अपनी जान की गहराई से निभा रहा है... इस परिवार में... राजा साहब के अहंकार से... किसीका अहंकार नहीं टकराया है... चाहे तेरे चाचाजी ने आवाज़ उठाई हो... पर वह उनकी बेबसी थी... विक्रम टकराने की कोशिश कर रहा है... पर वह उसकी मज़बूरी है... पर पहली बार... राजा साहब की अहंकार से... तेरा अहंकार टकराया है... और तेरे अहंकार के लिए... तेरा अनाम.. राजा साहब के अहंकार को चकनाचूर कर देगा... देखना...

रुप - मुझे... मुझे अब उस बात की चिंता नहीं है चाची माँ... जितने दिन भी भुवनेश्वर में रही... मैंने देखा था... लोगों में... क्षेत्रपाल नाम के खौफ को... आज वही सहर है... जब लोगों नें... भीड़ की शक़्ल में... विक्रम भैया और भाभी पर हमला कर दिया...

सुषमा - यही तो वह सच है... यह सच्चाई... जिंदगी में साहित्य बन जाता है... इतिहास में क्रांति बन जाती है... जुल्म और जुर्म की अपनी उम्र होती है... मजलुम जब खिलाफत में उतरेगा... तो वह तबाही ही लिखेगा...

रुप - आज आप कैसी बातेँ कर रही हैं चाची...

सुषमा - सब ख़त्म हो जाएगा... सब सही भी हो जाएगा... अगर क्षेत्रपाल अपनी नाक की आन को थोड़ी नीची कर दें... पर यह होगा नहीं... वक़्त करवट ले रहा है... इतिहास बनने को तैयार है... जिस दिन... डरे सहमे कुचले राजगड़ के गाँव वाले राजा साहब को पीठ दिखा कर लौट गए... उसी दिन... इस घर.. इस परिवार का वैभव उन्हीं के साथ लौट गया... अब वह दुबारा इस महल में लौट कर नहीं आने वाला...

रुप - आप ऐसी... निराश करने वाली बातेँ क्यूँ कर रही हैं...

सुषमा - आशा तो गाँव वालों का जाग चुका है... हमारे हिस्से तो निराशा ही आएगी...

नागेंद्र की नींद टूटती है l वह खांस कर अपने जागने का इशारा करता है l रुप और सुषमा दोनों नागेंद्र के बिस्तर तक आते हैं और दोनों उसके पैरों के पास पहुँचता खड़े होते हैं l

सुषमा - अब इन्हें देखो... इन्हें लगता है कि यह जी रहे हैं... जब कि वास्तव में.. यह हर दिन... हर घड़ी... हर पल मर रहे हैं... इंसानी फितरत है... अपनी जीने की चाहत में... मौत को खिंचे जा रहे हैं... कल जब इनकी मौत होगी... तो तुम देखना... चार कंधे इनको नसीब नहीं होंगे...

सुषमा के इतने कहने पर नागेंद्र का चेहरा तमतमा उठता है l मुहँ टेढ़ा हुआ था, फिर भी कुछ कहने की कोशिश करता, पर जीभ उसका साथ नहीं देता l गोँ गोँ की आवाज उसके हलक में घुट कर रह जाती है l

उसी महल के दूसरे भाग में, दीवान ए आम के कमरे के बाहर बाल्कनी से भैरव सिंह अपने महल को घेर रखे ओएसएपी बैटेलीयन को देख रहा था l उसके कानों में उसे अपनी तरफ आ रही कदमों की आहट सुनाई दे रही थी l जैसे ही कदमों की आहट थम जाती है तो भैरव सिंह पूछता है

भैरव सिंह - अब कौनसी मनहूस खबर लाए हो तुम प्रधान...

बल्लभ - युवराज जी के ऊपर जो हमला हुआ था... वह एक सोची समझी साजिश थी राजा साहब...

भैरव सिंह - खबर को ऐसे बता रहे हो... जैसे कोई तीर मार आए हो... यह हर कोई जानता है... के क्षेत्रपाल पर हमला करने के लिए... बहुत दिनों का प्लान होनी चाहिए... पर यह प्लान है किसीकी...

बल्लभ - पार्टी के कुछ कार्यकर्ता... ESS के कुछ कर्मचारी... और माली साही के कुछ लोग... इन तीन गुटों की तिकड़ी ने मिलकर हमला किया था...

भैरव सिंह - पार्टी के कुछ लोग... हूँ...

बल्लभ - वह तो ऐन मौके पर... विश्वा आकर बचा ले गया.. वर्ना... (चुप हो जाता है)

भैरव सिंह - मतलब खेल पार्टी के भीतर से हुआ है... यानी बिना होम मिनिस्टर के रजामंदी से... यह हुआ नहीं होगा...

बल्लभ - हाँ शायद... पर एक खबर और भी है...

भैरव सिंह - अच्छा.. वह क्या...

बल्लभ - ओंकार चेट्टी बहुत जल्द पार्टी में... एक प्रमुख पद संभालने वाले हैं...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... मतलब शेर की शिकार को... कुत्ते लामबंद हो रहे हैं... (बल्लभ चुप रहता है) हमारे खिलाफ़... उस पत्री की तहकीकात.. कहाँ तक पहुँची...

बल्लभ - उनकी तहकीकात वाला फाइल अब बहुत मोटी हो चुकी है... कभी भी... होम मिनिस्ट्री में जमा दे सकते हैं...

भैरव सिंह - तुम्हें क्या लगता है वकील... पत्री कब देगा...

बल्लभ - पता नहीं...

भैरव सिंह - हा हा हा हा... इतनी सी बात भी समझ नहीं पा रहे हो... जब तक वीर का केस कोर्ट में है... तब तक हमारे खिलाफ तफ्तीश चलती रहेगी... और तब तक हम इस कैद में रहेंगे... (बल्लभ कोई जवाब नहीं देता) प्रधान...

बल्लभ - जी... जी राजा साहब...

भैरव सिंह - तुम्हारा मन नहीं करता... पत्री की तहकीकात में साथ देने का...

बल्लभ - नहीं... हरगिज़ नहीं...

भैरव सिंह - क्यूँ... ऐसा क्यूँ वकील...

बल्लभ - राजा साहब... मैं आपका लीगल एडवायजर हूँ... जो लोग आपसे अभी लोहा ले रहे हैं... उनको आपनी आँखों के सामने आपके हाथ में जो पत्ते हैं.. वही दिख रहा है... वे लोग यह नहीं जानते हैं... की आपके आस्तीन में.. उससे कहीं ज्यादा पत्ते हैं... जब यह होम अरेस्ट हटेगा... तब बहुतों पर शामत भी आएगी... मैं जानता हूँ...

भैरव सिंह - प्रधान... हम तुम्हारी वफ़ादारी पर आज बहुत खुश हुए हैं... और हम इस बात का... तुम्हें भरपुर इनाम भी देंगे...

भैरव सिंह अब मुड़ कर बल्लभ की तरफ़ देखता है l उसे महसूस होता है कि बल्लभ कुछ पूछना चाहता है पर हिचकिचाहट ने उसे रोक रखा है l

भैरव सिंह - क्या पूछना चाहते हो प्रधान...

बल्लभ - राजा साहब... राजकुमार जी का केस आप मुझे उठाने के लिए कह सकते थे... पर... (चुप हो जाता है)

भैरव सिंह - प्रधान... तुम हमें जानते हो... हमारे हर फितरत से वाकिफ हो... फिर भी यह सवाल कर रहे हो...

बल्लभ - (अपना सिर झुका लेता है)

भैरव सिंह - वीर अपना राजकुमार का ओहदा खो चुका था... तो हमारे लिए बेहद गैर जरूरी हो गया... और जो हमारे लिए गैर जरूरी हो... हम उसकी कीमत नहीं लगाते...

बल्लभ - अगर कल को... वीर वापस आए तो...

भैरव सिंह - तो इस घर में कुछ गैर जरुरी समान हैं... उन्हें यहाँ से ले जाएगा...

बल्लभ - अभी तो... मेडिकल से सिर्फ एक नर्स आ रही है... अगर छोटी रानी जी चली गई... तो फिर बड़े राजा जी का खयाल कौन रखेगा...

भैरव सिंह - बड़े राजा जी को जिंदा रखा गया है... जानते हो क्यूँ... वह इसलिए... के हमने उन्हें जुबान दी है... के उस हरामजादे विश्वा का... कचूमर किया हुआ सिर दिखाएंगे... इसलिए... वह फिलहाल के लिए... मरने से रहे... हाँ अगर छोटी रानी भी वीर के साथ चली जाती हैं.. तो... बड़े राजा जी की देख रेख के लिए... राजकुमारी रहेंगी ना... क्यूँकी ना तो विश्वा कभी इस महल में आएगा... ना ही राजकुमारी कभी हमारी आँखों के सामने से... इस महल से जाएंगी...

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दो दिन बाद

धारपड़ा जेल में अपने कोठरी में बिस्तर पर बैठा वीर कुछ न्यूज पेपर्स को देख रहा था l उसका ध्यान तब टूटती है जब कोठरी की दरवाजा खुलने से आवाज आती है l वह अपनी नजर उठा कर देखता है तो समझ जाता है कि उससे मिलने शायद विश्व और विक्रम आए होंगे l वह अपना बिस्तर छोड़ कर खड़ा होता है l पुलिस उसे हथकड़ी लगा कर मिलने वाली कमरे में ले जाती है l कमरे में जब वीर आता है तो देखता है सिर्फ विश्व मुलाकात वाली कमरे में अकेला उसका इंतजार कर रहा था, विक्रम नहीं आया था l थोड़ी देर बाद वीर को पिछली बार की तरह पुलिस टेबल की हूक से हथकड़ी के साथ फंसा कर विश्व के साथ छोड़ कर चले जाते हैं l

वीर - भैया और भाभी कैसे हैं....

विश्व - अच्छे हैं... विक्रम को ज्यादा चोट लगी थी... मरहम पट्टी के बाद... अभी घर में रेस्ट ले रहा है...

वीर - घर... भीड़ ने तो... ऑफिस और घर को आग लगा कर तबाह कर दिया... तो अब वे किसके घर में रह रहे हैं...

विश्व - फ़िलहाल तो मेरे साथ... मेरा मतलब है कि... मेरे माँ बाप के साथ कटक में रह रहे हैं..

वीर - ह्म्म्म्म... उस भीड़ को... मट्टू लीड कर रहा था.. है ना...

विश्व - मट्टू...

वीर - हाँ मृत्युंजय... उसका निक नेम मट्टू है...

विश्व - हाँ... पर यह तुम्हें कैसे मालूम हुआ... हमने तो पुलिस या मीडिया को नहीं बताई...

वीर - (चुप रहता है)

विश्व - विक्रम कह रहा था... मृत्युंजय अब पार्टी का युवा चेहरा है... वह अपनी जमीन बना रहा था... तुम लोगों के खिलाफ लोगों की गुस्से और भावनाओं को भड़का कर...

वीर - (चुप रहता है)

विश्व - पर... अब मुझे लग रहा है कि... मृत्युंजय का वह कोई पोलिटिकल वेंडेटा नहीं था... बल्कि...

वीर - निजी था...

विश्व - निजी... पर क्यूँ...

वीर - बता दूँगा... उस ब्रैसलेट वाले की कोई खबर मिली...

विश्व - नहीं... उसके चक्कर में... दो पुलिस वाले अभी गायब हैं...

वीर - प्रताप...

विश्व - हूँ...

वीर - थैंक्स यार...

विश्व - किस बात के लिए...

वीर - भैया और भाभी को बचाने के लिए...

विश्व - वीर क्या कुछ ऐसा है... जो तुमने मुझे नहीं बताया है... बुरा मत मानना... यह खानदानी आपसी खुन्नस कम... कुछ और ही बात है... ऐसा मुझे लग रहा है...

वीर - जरुर... बताऊँगा.. क्यूँकी कल ही मुझे वह सब कुछ मालूम हुआ है... जिसे अब तुम्हारे साथ शेयर करूँगा...

विश्व - कल...

वीर - हाँ कल...

विश्व - कल मतलब... तुमसे कोई और भी मिलने आया था क्या...

वीर - हाँ... एक जबरदस्त सीख दिला कर गया...

विश्व - क्या मतलब...

वीर - जानते हो प्रताप... जब अनु मेरी जिंदगी में नहीं आई थी... तब मेरा दिमाग किसी शैतानी घोड़े की तरह दौड़ता था... पर जब अनु मेरी जिदंगी में आई... तो उसकी मासूमियत और अच्छाई का यह असर हुआ कि... मेरा दुनिया को देखने का नजरिया पूरी तरह से बदल गया था... मेरे अंदर इतनी बुराई थी... के इसलिए.. सबको अच्छाई की तराजू में.. अनु के प्यार की चश्मे से दुनिया को देखने लगा था... यही मेरी सबसे बड़ी गलती थी... मैं थोड़ा अच्छा बनने क्या चला... दुश्मनों की बुराई के चक्रव्यूह ने... मुझे अभिमन्यु कर दिया... पर घबराओ मत... अब मेरा शैतानी दिमाग जाग उठा है... अब वह सब पचताएंगे... जिन्होंने मेरे अंदर की शैतान को जगा दिया है...

वीर यह सब कुछ इस तरह से कह रहा था, विश्व उसे गौर से सुन रहा था l वीर कहते कहते एक अलग तरह की शख्सियत में तब्दील हो रहा था l विश्व उसके पास जाता है और उसके हाथ पर अपना हाथ रखता है l

विश्व - कल तुमसे मिलने कौन आया था वीर...

वीर विश्व की ओर देखता है

फ्लैशबैक :-

अपनी कोठरी में वीर अनु की तस्वीर को हाथ में लिए देखे जा रहा था l तभी उसके सेल के दरवाजे पर ठक ठक की आवाज आती है l वीर नजर उठा कर देखता है l पुलिस वाला उससे कहता है

पुलिस - वीर सिंह बाबु... आपसे कोई दो लोग मिलने आए हैं... (वीर को लगता है विक्रम और विश्व आए हैं)

वीर - हाँ... चलिए...

वीर के हाथ में हथकड़ी डाला जाता है l वीर उस पुलिस वाले के साथ मुलाकात वाले कमरे में आता है l उसकी हथकड़ी को टेबल पर लगी हूक में फंसा कर पुलिस वाला उसे कमरे में छोड़ कर चला जाता है l कमरे में रौशनी थोड़ी कम थी पर उसे उस अंधेरे में भी दो साये दीवार के पास खड़े दिखते हैं l उन दोनों सायों में से एक साया चलते हुए टेबल की दूसरी तरफ आता है l

वीर - मट्टू... तुम...

मृत्युंजय - हाँ वीर बाबु... मैं..

वीर - तुम मुझसे मिलने आए हो... मुझे लगा..

मृत्युंजय - हाँ.. वह लोग... मेरा मतलब है कि... आपके भाई और आपके दोस्त... एक खास काम में फंस गए हैं... इसलिए मुझे आना पड़ा...

वीर - फंस गए हैं... मतलब...

मृत्युंजय - दरअसल... एक चश्मदीद गवाह सामने आया है... जिसने आपको अनु की कत्ल करते देखा है...

वीर - ह्वाट... कौन.. कौन है वह...

मृत्युंजय - पुलिस ने उसका नाम... छुपा रखा है... पर उसका स्टेटमेंट... जो मैजिस्ट्रेट के सामने रिकॉर्ड हुआ है... उसकी कॉपी... विश्व प्रताप जी को दे दिया गया है... मैं भी उस स्टेटमेंट की कॉपी आपके पास लाया हूँ... यह देखिए...

कह कर मृत्युंजय वह कॉपी को वीर के हाथों में देखता है l उस कॉपी में मजिस्ट्रेट का स्टाम्प है पर उस गवाह का कहीं नाम नहीं था l वीर उस स्टेटमेंट को पढ़ने के बाद थोड़ी सोच में पड़ जाता है l

मृत्युंजय - क्या सोच रहे हैं... वीर साहब...

वीर - कुछ नहीं... यह स्टेटमेंट अपने आप में झूठा है... पर दिया किसने... कौन हो सकता है... यही सोच रहा था...

मृत्युंजय - बिल्कुल... आप जो सोच कर अभी परेशान हो रहे हैं... विक्रम साहब और विश्व साहब उतने ही परेशान हो रहे हैं... पर मैंने पता लगा लिया है.. वह गवाह कौन है...

वीर - क्या... तुमने पता लगा लिया है... वह गवाह कौन है...

मृत्युंजय - हाँ... वह ओंकारनाथ ईश्वरचंद्र चेट्टी का दूसरा बेटा है...

वीर - क्या चेट्टी का दूसरा बेटा...

मृत्युंजय - हाँ दूसरा बेटा... यही बात बताने के लिए... विक्रम साहब से मिलने गया था... पर... (चुप हो जाता है)

वीर - पर... पर क्या...

मृत्युंजय - एक्चुयली... मैं अकेले नहीं गया था... कुछ लोगों को साथ लेकर गया था... अपने ESS से कुछ लोग... और अनु जिस बस्ती में रहती थी... माली साही.. वहाँ से कुछ लोग... और पार्टी से जुड़े कुछ लोग... अरे हाँ.. आपसे तो कहना भूल ही गया... (शर्माते हुए) वह क्या है कि... मैं अब पार्टी का युवा नेतृत्व का चेहरा हूँ... मुझे कंग्राचुलेशन कीजिएगा...

वीर - ठीक है... अच्छी बात है... पर तुम इतने लोगों को लेकर भैया से मिलने क्यूँ गए थे...

मृत्युंजय - अपनी युवा शक्ति दिखाने के लिए... आखिर मुझे आने वाले इलेक्शन में वोट भी तो चाहिए...

वीर - तुम यह फालतू की बकवास क्यूँ कर रहे हो...

मृत्युंजय - बस... मुझे इसी बात का आपसे हमेशा शिकायत रही है... आप ना... सामने वाले की फिलिंग को कभी समझते ही नहीं...

वीर - (टेबल पर एक पंच मारते हुए) बस... क्या बात करने आए हो कहो... वर्ना दफा हो जाओ... तुम पुष्पा के भाई हो... और अनु तुमको अपना मुहँ बोला भाई मानती थी... इसलिए तुम्हारा लिहाज कर रहा हूँ... वर्ना...

मृत्युंजय - ओके ओके... आप गुस्सा मत कीजिए.. बताता हूँ ना सारी बातेँ... हम सब जब... आपके भाई के बनाए.. नर्क.. माने द हैल में पहुँचे... तो हमारे स्वागत के लिए... आपके भाई... रिवॉल्वर से स्वागत करने के लिए आगे आए... पर पता नहीं... इतनी भीड़ को देख कर क्या समझे... अपना रिवॉल्वर को फेंक दिया... पर हम जिस उद्देश्य से गए थे... हम थोड़े ना उस उद्देश को छोड़ सकते थे... इसलिए.. मेरे साथ गए सभी लोगों ने पत्थर उठा कर विक्रम की ओर मारने लगे...

वीर - (झटका खाते हुए) क्या...

मृत्युंजय - हाँ... साले को मार ही देते... पर तुम्हारा वह हरामी दोस्त... अपनी तैयारी कर आया... और हमारे बीच से विक्रम और उसकी बीवी को बचा कर ले गया...

वीर हैरानी और गुस्से भरी नजर से मृत्युंजय की ओर देख रहा था l क्यूँकी मृत्युंजय का लहजा अचानक से बदला था l उसकी बातों से एक शैतानी भाव झलक रहा था l

मृत्युंजय - तुझे यकीन नहीं हो रहा है ना... यह ले... (न्यूज पेपर वीर की ओर फेंकता है, वीर उन पेपर में देखता है, द हैल और विक्रम पर हुए जानलेवा हमले के बारे में) मैंने सोचा था.. तेरे उस हरामी भाई और उसकी बीवी के साथ दोनों को निपटा दूँगा... पर मैं फैल हो गया... मगर... इतना झक मारने के बाद भी... मीडिया वालों को... हमारे बारे में... कुछ नहीं पता... (वीर अपनी हलक से थूक बड़ी मुश्किल से निगलता है)

वीर - मट्टू... तुमसे क्या दुश्मनी है हमारी...

मृत्युंजय - (लहजा कड़क हो जाता है) क्या दुश्मनी है... भोषड़ी के... यह तु पूछ रहा है... कमीने... मैं बताऊँ... तुने मेरा क्या बिगाड़ा है... (वीर की नजरें झुक जाती हैं) ना.. तुम क्षेत्रपाल... शर्म के मारे सिर झुकाओ... ना...

वीर - (शांत लहजे में) तुम्हें.. मुझसे बदला लेना था... मेरे परिवार वालों को क्यूँ बीच में ला रहे हो..

मृत्युंजय - अबे मादरचोद... जबसे तुझसे मिला हूँ... तभी से... तुझ ही से तो बदला लिए जा रहा हूँ... और जो भी तुझसे जरा भी जुड़ा हुआ है... उसे तो दर्द होना ही चाहिए... (वीर उसे हैरान हो कर देखता है) चल तुझे पूरा कहानी बताता हूँ... जिस दिन मेरी माँ को नीचे सुला कर बड़ी सेवा कर रहा था... मेरे बाप ने देखा... तो तूने उसे... पंखे से लटका कर मार डाला... उसके बाद... तुम लोगों की जिंदगी में.. मैं... काल बन कर आया... पर तुम्हारे परिवार से बदला लेने के लिए... मुझे मेरे बाप ने उकसाया... मेरे नाजायज़... पर असली बाप ने... (वीर मृत्युंजय को हैरान हो कर देखने लगता है) हाँ... मेरे नाजायज़ पर असली बाप... मेरी माँ थी तो नीच... दुश्चरित्र... वह सिर्फ तेरे साथ नहीं... बहुतों के साथ सोई है... जिस दिन मैं... अपने बाप... यानी जिसकी हत्या तुने की थी... उसके लाश को श्मशान में जला कर लौट रहा था... उसी दिन एक बड़ी सी चमचमाती गाड़ी मेरे पास रुकी... उसके अंदर शख्स ने... मुझे अपने पास बिठाया... और एक हस्पताल ले गया... वहाँ पर उसने मेरी डीएनए जाँच करा कर रिपोर्ट मेरे हाथ में दी... मैं हैरान हो गया... मैं उस शख्स का बेटा था... जो मेरे सामने खड़ा था... मेरी हैरानगी दूर करते हुए उस शख्स ने कहा...

"चौकों मत.. तुम मेरे बेटे हो... नाजायज ही सही... पर हो तो मेरे ही खून... सुनो मेरे पास बहुत दौलत है... तुम उसके वारिस हो... आज वह सब तुम्हें दे देता हूँ... पर तुम्हें मेरे बदले का वारिस बनना होगा... तुम्हें क्षेत्रपालों से बदला लेना होगा...

वीर - (गुस्से में दांत पिसते हुए) कौन था वह आदमी...

मैं... (एक और साया उस अंधेरे से सामने आता है, वीर उसे देख कर हैरान हो जाता है) चौंक गए... हाँ... मैं ही हूँ... ओंकारनाथ ईश्वरचंद्र चेट्टी...

वीर - तुम... तुम हो... इस हरामी का बाप...

मृत्युंजय - ऐ... मुहँ संभाल कर...

वीर - तु.. अपनी माँ के पाप.. और यह तुम्हारा बाप...

मृत्युंजय - चु चु चु चु... यह हकीकत जानने के बाद बहुत दर्द हो रहा है ना तुझे... यह तो शुरुआत है... अब तो एक के बाद एक कई झटके लगेंगे तुझे... मुझे मेरे बाप से मुलाकात के बाद... इनके प्लान के मुताबिक... पहला वार... बारंग रिसॉर्ट में किया... जिसे तुम लोग... केके से छीन कर... भैरव सिंह को तोहफे में दिया था...हाँ... याद आया... इत्तेफाक से मेरी ड्यूटी वहीँ पर लगी थी... अपनी ही रिसॉर्ट को.. तुम लोगों के हवाले कर... किसी मेजबान की तरह... जब लोगों की आवभगत कर रहा था... तब मैं.. उसके दिल में... क्षेत्रपाल के विरुद्ध... नफरत के बीज डाल रहा था... जो धीरे धीरे... बड़ा ज़हरीला दरख्त बन गया.. उसके बाद... केके को साथ मिला कर... रॉय सेक्यूरिटी वालों के साथ मिलकर... तुम्हारे बाप पर हमलों को अंजाम देते रहे... हा हा हा हा... जो खौफ और विश्वास का सल्तनत खड़ा किया था तुम लोगों ने... हमने चोट मारनी शुरु कर दिया था... लोग तुम लोगों की निकम्मेपन पर बात करने लगे... उस पर सोने पे सुहागा... तुम्हारे बाप के साथ कील कांड... याद है... हा हा हा हा... उसे मैंने ही अंजाम दिया था... आखिर... ESS से जो था... अब प्लान का दूसरा पड़ाव... मैंने अपनी उस नीच गलीच माँ को मार दिया... (वीर फिर से चौंक कर मृत्युंजय को देखता है) हाँ... मैंने ही उसे मार दिया..

मैंने ऑफिस में गौर किया... किसी बात पर तुमने... विक्रम से ऊंची आवाज में बात की थी... विक्रम के केबिन से बाहर निकलने के बाद... मैंने उसके डस्टबीन में एक... इयर पॉड पाया... मैंने उसे उठा कर अपने पास रख लिया था... बाद में पता चला... के विक्रम ने... अनु और तुम्हारे बीच हो रही बातेँ सुन रहा था... अब जब इयर पॉड मेरे पास था... तो मैं भी तुम लोगों को सुनने लगा... और तुम्हारी घंटी बजाने लगा... अब प्लान का दूसरा पड़ाव... मैंने अपनी उस नीच गलीच माँ को मार दिया... (वीर फिर से चौंक कर मृत्युंजय को देखता है) हाँ... मैंने ही उसे मार दिया.. (कहते कहते उसका चेहरा वहशियाना दिखने लगता है) उसके मुहँ पर तकिया रख कर दबा कर मार डाला... हस्पताल ले गए... डॉक्टर को शक हो गया था... शाला पुलिस को खबर करने चला था... मैंने ही अनु को मनाया... तुम्हें फोन करने के लिए... तुम्हारे आते ही... मेरा काम बन गया... (वीर अब गहरी गहरी साँसे लेने लगता है, उसका चेहरा सख्त हो गया था) क्या दिन थे नहीं... क्षेत्रपाल के राजकुमार को देख कर... पुलिस की फटती थी... अब देखो वही पुलिस... कुत्ते की तरह तुमको घसीट रही है... आह... टाइम टाइम की बात है... अब प्लान का अगला पड़ाव... मेरी बहन का किडनैपिंग... हा हा हा... वह मैंने ही... केके के बेटे विनय के साथ मिल कर कराया था... तुमको उल्लू बनाया था... उसके बाद... मेरी बहन को मैंने... विनय के साथ भगा दिया... इस बीच मुझ पर... महांती को शक हो गया... मैंने उसे भी अपने रास्ते से हटा दिया... मेरी कोई टांग वांग नहीं टूटी थी... वह तो मेरे डैड ने डाक्टरों से मिलकर... हमने गेम खेला था... जब तुम और अनु... अपनी गाड़ी से... आर्कु में... पुष्पा और विनय को लाने गए थे... तब रातों रात... एक चार्टर प्लेन से... मैंने विशाखापट्टनम जाकर... अपनी ही हाथों से... पुष्पा और विनय को गोली मार दिया.. (वीर की मुट्ठीयाँ भिंच जाती हैं, दांत इस तरह से पीस रहा था कि कड़ कड़ की आवाज सुनाई दे रही थी)

वीर - विनय को क्यूँ मारा... वह तो पहले से ही... तुम्हारे प्लान में शरीक था...

मृत्युंजय - हाँ... बात तो सही है... पर डैड ने कहा... अगर राजनीति करनी है... तो अपने पे भरोसा करने वालों की मारना सीखो... वही मैंने किया... और मजे की बात जानते हो... वह शाला केके... अभी भी यही समझता है कि... तुमने ही उसके बेटे तो टपकाया है... हा हा हा हा... मैंने उसकी कत्ल वज़ह तुझे बना कर... तुझे तेरी ही आँखों में गिरा दिया... और फिर उसके बाद... तेरे आँखों के सामने से गायब हो गया... मैं माली साही में ही छुपा रहा... अनु की रोज रेकी करता रहा... अनु की दादी से वचन ले कर उन्हीं के आस-पास रहने लगा.... अरे हाँ... तुझे असली बात बताना तो भूल ही गया... एक दिन तेरा बाप.. राजगड़ से आया... मैं तब.. बारंग रिसॉर्ट में तैनात था... तो तेरे बाप की मती मारी गई थी के... उसने मुझे तुझ पर नजर रखने के लिए कहा... अब बिल्ली की किस्मत में... दूध का पतीला मिल जाए... तो क्या होगा... मैं रोज तेरे और अनु के बारे में... मिर्च मसाला लगा कर... उसके गुस्से को भड़काने लगा... एक दिन मेहंदी रंग लाई... तेरे बाप ने प्लान बनाई... अनु की किडनैपिंग के लिए... मैं भले ही तेरी नजर से गायब था... पर हमेशा तेरे बाप के पास.. तेरे बाप के साथ था... पर तुमने और विश्व ने अनु की किडनैपिंग को फैल कर दिया... यहाँ तक तो ठीक था... पर हस्पताल में तुमने या विश्व ने ऐसा कुछ कहा कि दादी को मुझ पर शक हो गया... उसकी बेवक़ूफ़ी देखो... मुझसे मिलकर अपना शक दूर करना चाहती थी... मैंने उसे हमेशा के लिए... दूर कर दिया... बिल्कुल वैसे ही... जैसे... अपनी माँ को मैंने मारा था... अब तु और अनु... एक हो गए थे... पर तेरे बाप की नींद हराम हो चुकी थी... उसका गुस्सा अब विश्व पर फूटने वाला था... तेरे बाप को मुझ पर बड़ा भरोसा होने लगा था... सेनापति दंपति को किडनैप करने की कोशिश की गई... पर कोई तीसरा आकर भाजी मार गया.... कोई ना... फ़िर प्लान बना... इस बार अनु को...

वीर - नीच.. हरामी.. कमिने...

मृत्युंजय - अरे सुन तो... यह देख... (एक सोने की ब्रैसलेट निकालता है) यही खो गई थी ना... मेरे पास है.. मतलब यह मेरा है...

वीर - इसका मतलब... पुलिस वालों से तूने हासिल की थी...

मृत्युंजय - हाँ की थी... पर वह शाला विश्व मेरे अनुमान से भी तेज निकला... सब सही चल रहा था... तुने जुर्म अपने सिर ले लिया था... पर फिर से वही विश्वा...

वीर - अनु को तुने क्यूँ मारा... वह तो तुझे अपना भाई मानती थी..

मृत्युंजय - अपने बदले के लिए... जब मैंने अपनी सगी बहन को मार डाला... तो अनु किस खेत की मूली है...

फ्लैशबैक समाप्त

विश्व - ह्वाट... इतना बड़ा धोका...

वीर - (चुप रहा)

विश्व - वीर मेरे दोस्त... अब पूरा खेल मैं समझ गया हूँ... तुम फिक्र मत करो.. वह मट्टू चाहे जो भी तिकड़म लगा ले... उसे कानून की फंदे में फंसा कर ही दम लूँगा...

पुलिस - (कमरे में आता है और कहता है) टाइम खत्म हुआ...

विश्व - (कागज देते हुए) अब तो साइन कर दे यार... कसम है.. उसे हर किए कि सजा दूँगा...

वीर - (मुस्करा कर) यह काग़ज़ उस दिन जज के सामने भी तो हो सकता है....

विश्व - क्यूँ अब क्या परेशानी है...

वीर - कोई परेशानी नहीं है... पर सुनवाई के दिन ही... कोर्ट में साइन करूँगा... (विश्व उसे घूरते हुए देखने लगता है) प्रताप मेरे दोस्त... बस यकीन रखो... अगली सुनवाई के दिन... सब ठीक हो जाएगा...

विश्व - तुम्हें कैसे पता...

वीर - (थोड़ा सीरियस हो कर) अनु के जाने के बाद... मैं खुद को अब... उस उपरवाले के करीब महसूस करने लगा हूँ... इसलिए मुझे एहसास हो गया है... सुनवाई के दिन... सब ठीक हो जाएगा...

विश्व - वीर... (एक पॉज लेकर) तुम चाहते क्या हो...

वीर - पुष्पा का बदला... अनु का इंसाफ़... मेरी मुक्ति...

विश्व कुछ समझ नहीं पाता, इतने में पुलिस वाला आता है और वीर की हथकड़ी को हूक से निकाल कर वापस ले जाने लगता है l वीर जाते जाते याद करने लगता है जिसे उसने विश्व से साझा नहीं किया था l उसे ओंकार चेट्टी ने कहा था अंत में कहा था

चेट्टी - सुन बे क्षेत्रपाल के सपोले... सुनवाई के दिन मेरे बेटे की गवाही के बाद.... तु एक अच्छे बच्चे की तरह अपना गुनाह कबूल कर लेना... उस दिन तुझे बचाने ना तो विश्वा आएगा... ना ही तेरा भाई... क्यूँकी मैं उन्हें पहुँचने ही नहीं दूँगा... फ़िर अदालत एक नई डेट देगी... पर वह डेट कभी नहीं आएगी... क्यूँकी उस डेट के अंदर... तुझे जैल मैं मरवा दूँगा... भीड़ के हाथों... तेरे भाई को मरवा दूँगा... और किसी चलती ट्रक के नीचे.. तेरे दोस्त को मरवा दूँगा... ताकि... क्षेत्रपाल परिवार बिना वारिस का हो जाए...

वीर का चेहरा सख्त हो जाता है l अचानक वह जाते जाते पीछे मुड़ता है l

वीर - प्रताप...

विश्व - हाँ... वीर...

वीर - एक वादा करोगे...

विश्व - हाँ बोलो...

वीर - मेरे भैया भाभी का खयाल रखना...
 
हाँ यह गेम है

किसीको बचाने के लिए मिडिया और लोगों को भावनाओं का सहारा लिया जाता है तो बिगाड़ने के लिए भी उसी तरह की भावनाओं को भड़काया जाता है

हाँ वीर को मालूम तो हो गया पर विक्रम अभीतक अनभिज्ञ है

हाँ, चेट्टी अपने ही गेम में था l वह हमेशा कह रहा था उसके बदले का कोई वारिस नहीं है l पर वह अलग ही लेवल का खेल खेल रहा था l

वीर कुछ ना कुछ तो करेगा ही, विश्व के लिए क्या और कितना स्कोप है यह भी देखना दिलचस्प रहेगा

हाँ आखिर विश्व का शाला है भाई l वर्ना अपनी नकचढ़ी के सामने कैसे जा पाता l

उसके कमीना आगे और भी देखने को मिलेगा l

हाँ अगले अंक में विश्व इसी बात को लेकर परेशान रहेगा

हाँ कर तो सकता है

अपनी अपनी कर्म है

वह कहते हैं ना

कर्मा द बीच
 
शुक्रिया avsji भाई

हाँ अगर मारना होता तो कब का मार चुका होता l यह जो मर्डर हुआ है यह मट्टू ने पिनाक के कंधे पर बंदूक रख कर बदला लिया है l

हाँ कोई शक नहीं है

प्रतिशोध है ही ऐसी चीज़, अगर वह मामूली कार्यकर्ता का बेटा होता तो कुछ नहीं कर पाता, पर वह चेट्टी का नाजायज औलाद है और उसका पूरा सपोर्ट भी मिला है, जाहिर है कि वह चेट्टी जैसा कमीना ही निकलेगा

फ़िलहाल तो कुछ होगा नहीं

हाँ यहाँ पर विक्रम की सोच चूक गई है l

वीर अभी टूटा हुआ है l विश्व से महत्त्वपूर्ण बात छुपा गया है l आगे चलकर यही एक दुर्घटना का कारण बनने वाला है l

हाँ भाई आखिर यह थ्रिलर जो है

शुक्रिया आभार थैंक्यू धन्यवाद

Happy Ugadi
 
धन्यवाद SANJU ( V. R. ) भाई

हाँ पूर्णतः सहमत

यह स्वाभाविक है l रुतबे दर इंसान जब अपनी अहं के शिखर पर होता है तब वह सिवाय अपने और अपने परिवार के सिवा किसी और की परवाह नहीं करता l ऐसे लोगों पर और उनके परिवार पर मुसीबत आता है तो तब भी वह लोग सिर्फ और सिर्फ अपने और अपने परिवार वालों की ही सोचते हैं l

बिल्कुल सत्य कहा आपने पर यही पिनाक अपने भाई के विरुद्ध विश्व के काम आयेगा

जब वह केवल और केवल कार्यकर्ता का बेटा था तब उसके मन में प्रतिशोध की भावना शुद्ध थी l पर ज्यों ही उसके जीवन में चेट्टी का आगमन होता है, उसका लक्ष पूरी तरह से बदल जाता है l अब जो मृत्युंजय है वह चेट्टी के कारण ही है l

हाँ वीर का अतीत पिनाक से कम नहीं था l पर उसे बदलने में अनु और रुप मुख्य कारण थे l

हाँ वीर अभी भी गलती कर रहा है l

पर कहते हैं ना इंसानी समाज की न्याय प्रक्रिया से भी ऊपर ईश्वरीय न्याय होता है l और आगे ईश्वरीय न्याय भी होगा l

जी यह दृश्य इसलिए जरूरी था कि सुषमा अब उबने लगी है l परंपरा के नाम पर उसकी बंदी आत्मा बाहर निकल कर चीखना चाहती है l

जहां तक मुझे मालूम है सीसीटीवी तो होता है पर कोई माइक नहीं होता जब वकील से या किसी रिश्तेदार से मुलाकात हो रही हो l कारण कैदी और उससे मिलने वालों की बात चित संपूर्ण निजी होती है l

धन्यवाद बंधु आपका बहुत बहुत धन्यवाद

आपको भी हिंदू नव वर्ष की हार्दिक अभिनंदन व शुभकामनाएं

మీకు మరియు మీ కుటుంబ సభ్యులకు ఉగాది శుభాకాంక్షలు
 
धन्यवाद Ajju Landwalia भाई आपका बहुत बहुत शुक्रिया

हाँ जब भी कोई किला ढहती है तो दरवाजा हमेशा अंदर से खुलती है

हाँ विश्व सही समय पर पहुँच गया

वर्ना मृत्युंजय विक्रम को मारने के लिए पूरा इंतजाम कर दिया था

हाँ क्या होगा यह अगले अपडेट में मालूम पड़ेगा

जी जरूर लिखना शुरू कर दिया है देखते हैं कब तक पोस्ट हो पाएगी

नव वर्ष की हार्दिक अभिनंदन व शुभकामनाएं

Happy Ugadi
 
मित्रों आपका साथ रहा इसलिए इस मुकाम तक सफर तय हुआ

आगे कहानी ज्यादा बची नहीं है

उम्मीद है और दस या पंद्रह अपडेट में कहानी अपनी मंजिल तक पहुँच जाएगी

कभी सोचा भी नहीं था के इतना बड़ा कहानी लिख पाऊँगा पर आप लोगों साथ व शुभकामनाएं मुझे यहाँ तक पहुँचने में मदत की है

आप सबको तह दिल से शुक्रिया व आभार
 
👉एक सौ इक्यावनवाँ अपडेट

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कटक

सेनापति दंपति का घर, ड्रॉइंग रुम के दीवार पर लगे एलइडी टीवी पर नभवाणी न्यूज में ओंकार चेट्टी का बाईट चल रहा था l

रिपोर्टर - अभी हमारे साथ हैं राज्य के दिग्गज राजनीतिज्ञ व पूर्व स्वास्थ मंत्री... श्री ओंकारनाथ ईश्वरचंद्र चेट्टी जी... सर नमस्कार...

चेट्टी - नमस्कार...

रिपोर्टर - सर... अब आप ही की पार्टी में आपकी पुनः वापसी हो गई है... इस सन्दर्भ में आपकी क्या प्रतिक्रिया है...

चेट्टी - हम पार्टी के प्रति सदेव समर्पित थे... हैं... और रहेंगे... आज पार्टी की आवश्यकता के अनुसार... हम अपनी भूमिका को स्वीकारा है... और इसे हम बड़ी शिद्दत से निभाएंगे...

रिपोर्टर - आपने कहा... आप पार्टी के प्रति सदेव समर्पित थे... पर अतीत में... आपकी और पार्टी प्रमुख के बीच अनबन हो गया था... पिछली बार टिकट ना दिए जाने पर... आपने पार्टी से इस्तीफा देकर... निर्दलीय उम्मीदवार के रुप में कटक सदर में खड़े हुए थे... इसी अनुशासन हीनता के कारण... आपको पार्टी से छह वर्ष तक निलंबित किया गया था...

चेट्टी - अब तो छह वर्ष पूरा नहीं हुआ है ना... और मेरा निलंबन रद्द हो गया है... हर किसी के जीवन में... ऐसा एक काल खंड होता है... वह एक परिक्षा की घड़ी थी... भई आसमान में सूर्य चंद्रमा को भी ग्रहण लगता है... वह समय मेरे लिए भी कुछ वैसा ही था... पर जो बीत गया... सो बीत गया... उस पर चर्चा करने से ना आपको कोई लाभ होगा... ना मुझे...

रिपोर्टर - लेकिन हमें जहां तक मालूम हुआ है... आपको इस बार टिकेट नहीं मिल रहा है...

चेट्टी - हाँ... यह बात आपकी सौ फीसदी सच है... अभी चूँकि वापसी हुई है... मैं फ़िलहाल पार्टी की सेवा में... स्वयं को समर्पित करना चाहता हूँ... अभी तो नए नए युवा आ रहे हैं... जैसे कि यह... (मृत्युंजय को सामने लाता है, मृत्युंजय कैमरा के सामने सबको नमस्कार करता है) पार्टी ने इस युवा... मृत्युंजय नायक को इस बार मौका देकर... आज की युवा पीढ़ी और उसकी नेतृत्व को सम्मान दिया है... मैं तो अब इस नए युवा जोश... युवा शक्ति के लिये प्रचार करूँगा... जन जन तक इन्हें और इनकी योग्यता पहुँचाउँगा...

रिपोर्टर - वाह क्या बात है... आप एक नए युवक को... निस्वार्थ भावना के साथ समर्थन कर रहे हैं... यह वाकई... सराहना की बात है... पर मृत्युंजय जी को.. जो दायित्व मिला है... कभी यह दायित्व... क्षेत्रपाल के दोनों भाइयों के पास था...

चेट्टी - हाँ... पर वे दोनों... राहु और केतु के समान थे इस पार्टी के लिए... अच्छा हुआ उन भाइयों से पार्टी को छुटकारा मिला... कितने आपराधिक चरित्र व प्रवृतियों के हैं... जरा सोचिए... यह क्षेत्रपाल परिवार...

रिपोर्टर - आज आप यह कैसी बात कर रहे हैं... वह तो आप ही थे... जिन्होंने एक दिन क्षेत्रपाल परिवार को... प्रत्यक्ष राजनीति में लाए थे...

चेट्टी - उस पाप का ही ग्रहण लगा था... जो अब तक मुझे मेरे पार्टी से दूर किए हुए था... अब वह ग्रहण छूट गया है... इसलिए मैं निश्चिंत हो कर निस्वार्थ भावना से... इस नौजवान को जिताने की हर संभव प्रयास करूँगा...

रिपोर्टर - अभी... जब वीर सिंह क्षेत्रपाल... हत्या के आरोप में कारागार में हैं... इस पर आप क्या कहना चाहेंगे...

चेट्टी - मैं बस इतना कहना चाहूँगा... जैसी करनी... वैसी भरनी... जैसी जिसकी कर्म...

रिपोर्टर - तो क्या आप कहना चाहते हैं... की वीर सिंह पर जो आरोप हैं... वह सच है...

चेट्टी - यह आप कैसी बात कर रहे हैं... आरोप वह.. जो दूसरे किसी पर लाद दें... वीर सिंह की स्वीकारोक्ति के बाद... उसे आरोप कैसे कह सकते हैं... मुझे तो अचम्भा हो रहा है... अदालत ने उसे सजा देने के बजाय... उसके लिए तहरीर करने की इजाजत... उस नए नवेले... वकील... वह भी एक सजायाफ्ता... क्यूँ दी...

रिपोर्टर - क्या आप क्षेत्रपाल परिवार से अपनी खीज... अपना पूर्वाग्रह प्रकट कर रहे हैं...

चेट्टी - कैसी खीज... कैसा पूर्वाग्रह...

रिपोर्टर - आपका भी बेटा कभी अभियुक्त था...

चेट्टी - सुनो रिपोर्टर... मर्यादा.. मर्यादा में बात करो... मेरा बेटा एक्युस्ड था... ना कि कंविक्टेड... यहाँ... वीर सिंह... कंफेशन कर चुका है... सेल्फ कंविक्टेड.. समझे...

रिपोर्टर - ठीक है आपकी बात पर गौर करें... तब भी.. विश्व प्रताप जो नए वकील हैं... उन्होंने तो... वीर सिंह की कंविक्शन को ना सिर्फ नकार दिया... बल्कि पुलिस की छानबीन पर ही प्रश्न उठा कर और केस को एक अलग डायरेक्शन में ले गए...

चेट्टी - हाँ... जो भी हुआ... वह सब थोड़ी देर की नौटंकी है... अरे अगर वह बेकसूर है... तो आप ही बताइए... उसके परिवार से कौन कौन उसके साथ खड़े हैं... यहाँ तक पिता भी... उसके साथ क्यूँ नहीं हैं... पर मैं... मैं अपने बेटे यश के साथ डट कर खड़ा था... सब चोंचले हैं... आप देखियेगा... अगले ही सुनवाई के दौरान... सब धरी की धरी रह जाएगी...

रिपोर्टर - आपने छोटे राजा जी के बारे में बात कहा... शायद वे भी.. अभी राजगड़ में... होम अरेस्ट में हों...

चेट्टी - हाऊस अरेस्ट.. राजा साहब उर्फ... भैरव सिंह क्षेत्रपाल का हुआ है... पिनाक सिंह क्षेत्रपाल का नहीं...

रिपोर्टर - ठीक है... आपकी बात को मान भी लें... तो जानीमानी एडवोकेट... प्रतिभा सेनापति जी... वीर सिंह को हत्यारा तो नहीं मानतीं... उन्होंने उसके अनेक कारण भी बताएं हैं...

चेट्टी - कौन.... वह प्रतिभा सेनापति... हूँह्ह.. नहीं मान रही... मेरा बेटा यश... उनके बेटे प्रत्युष का हत्यारा नहीं था... यह बात भी तो नहीं मान रही थीं... हाँ... यह बात और है.. अदालत में उनकी सारी दलीलें धराशाई हो गई थी...मेरा बेटा तब बाइज़्ज़त रिहा हुआ था... और उन महिला को मुहँ की खानी पड़ी थी... जिनके पास कुछ काम धंधा नहीं होता है... नेम और फेम पाने के लिए... इस तरह के इंटरव्यू टीवी पर दिए जाते हैं... वीर सिंह बेकसूर है... उसे फंसाया गया है.. सब उड़ी उड़ाई बातेँ हैं...

रिपोर्टर - बात अगर हम उड़ी उड़ाई बातों की करें... तो हाल ही में... क्षेत्रपाल मैंनशन... द हैल पर जो हमला हुआ था... उसमें मृत्युंजय जी का नाम उछल रहा है...

चेट्टी - आप रिपोर्टर हैं... बात की गहराई को समझिए... यह बात क्षेत्रपाल वालों की ओर से उड़ाई गई है... क्यूँकी यह नौजवान... उनको रिप्लेस कर... युवा नेता बना है... यह क्षेत्रपाल वालों की पोलिटिकल वेंडेटा है... इसलिए ऐसी बेमानी बेमतलब की ख़बरें उड़ाई जा रही हैं... अरे आप ही बताइए... उन पर हमला करने से... पार्टी को और इस युवक को क्या लाभ...

रिपोर्टर - लोगों के मन में... क्षेत्रपाल के विरुद्ध घृणा और द्वेष के लहर पर सवार होकर... चुनाव की वैतरणी पार किया जा सकता है...

चेट्टी - आप रिपोर्टिंग कर रहे हैं... या प्रोपेगैंडा...

रिपोर्टर - जी हमने उड़ी उड़ाई खबर की बात कर रहे थे...

चेट्टी - जी बहुत अच्छे... नमस्कार...

रिपोर्टर - सर...

चेट्टी - बस... बहुत हो गया... आप रिपोर्टर हैं.. रिपोर्टिंग कीजिए... किसी की एजेंडा मत चलाईए... नमस्कार...

सोफ़े पर बैठा विक्रम रिमोट की पावर बटन ऑफ कर टीवी बंद कर देता है l दांत पिसते हुए गहरी गहरी साँस लेने लगता है, पर उसे एहसास होता है किसीके उसके पीछे होने का, वह तुरंत अपनी जगह से उठ कर मुड़ कर देखता l प्रतिभा खड़ी थी l प्रतिभा को देख कर थोड़ा हड़बड़ा जाता है l

प्रतिभा - क्या हुआ.. तुम ऐसे रिएक्ट कर रहे हो... जैसे मैंने तुम्हारी कोई चोरी पकड़ ली...

विक्रम - वह... आ... आई एम सॉरी...

प्रतिभा - (सामने आकर सोफ़े पर बैठते हुए) कॉम ऑन... रिलेक्स... बी कम्फर्टेबल... फ़िलहाल तुम अब इस वक़्त इस घर के ही सदस्य हो...

विक्रम - (सामने वाली सोफ़े पर बैठ जाता है)

प्रतिभा - तुम जो बाईट देख रहे थे... मैं भी वही देख रही थी... वह चेट्टी मेरे बारे में जो भी खयाल बनाए... मुझे उससे क्या... और तुम उसके लिए सॉरी क्यूँ कह रहे हो...

विक्रम - (अपनी मुट्ठीयाँ भिंचते हुए) वह घटिया नीच किस्म का आदमी... किसी के लिए कोई भी ओपिनियन रखे... मुझे उससे कोई मतलब नहीं... (सिर झुका लेता है) पर आपके लिये जो ओपिनियन दे रहा है... (एक पॉज लेता है) उसकी वज़ह तो मैं ही हूँ... (अचानक नीचे प्रतिभा के पैरों के पास आकर) पर मैं सच कहता हूँ... उस दिन मुझे जरा सा भी अंदाजा नहीं था... के वह प्रत्युष को... (रुक जाता है)

प्रतिभा - विक्रम... मुझे तब कुछ भी मालूम नहीं था... और जब मालूम हुआ... तब तुमसे कोई शिकायत नहीं रही... क्यूँकी तब तक... प्रताप मेरी शुनी जीवन में आकर प्रत्युष की जगह भर चुका था... आज प्रताप मेरे लिए बहुत मायने रखता है... शायद उसका वज़ह तुम हो... तो मैं तुम्हें थैंक्यू क्यूँ ना कहूँ... थैंक्यू...

विक्रम - (आँख भीग जाती हैं) आप सच में... बहुत बड़ा दिल रखते हैं...

प्रतिभा - देखो विक्रम... प्रत्युष को खोने के बाद... और प्रताप का मेरे जीवन में आने के बाद... मेरी जिंदगी ने कितनी बड़ी करवट ली है... आज स्टेट में.. मेरा एक रुतबा है... और तुमने हमें उस रात बचा कर... अपना पश्चाताप पूरा कर चुके हो... सो डोंट बी गिल्टी... वैसे भी अपनी पत्नी के सामने... किसी और औरत के पाँव में गिरने से... पत्नी को बुरा लग सकता है...

विक्रम हैरान हो कर पीछे मुड़ कर देखता है l शुभ्रा खड़ी दोनों को देख रही थी l प्रतिभा की बात सुन कर शुभ्रा तुरंत जवाब देती है

शुभ्रा - यह क्या कह रहे हैं माँ जी... माँ के पाँव में तो जन्नत होती है... मुझे बुरा क्यूँ लगेगा...

प्रतिभा - हा हा हा... अरे मैं इसलिए ऐसा कहा... ताकि यह नीचे से उठे और सोफ़े पर बैठे...

विक्रम नीचे से उठता है और सामने वाली सोफ़े पर बैठ जाता है l शुभ्रा आगे आकर विक्रम के कंधे पर हाथ रख देती है l

प्रतिभा - कितनी अच्छी लग रही है तुम दोनों की जोड़ी... ऐसे ही साथ रहो.. खुश रहो...

विक्रम - एक बात पूछूं...

प्रतिभा - अरे इतना तकल्लुफ क्यूँ कर रहे हो.. कहा ना अभी यह तुम्हारा घर है... हाँ बड़ा तो नहीं है... पर तीन बेड रुम वाला तो है...

शुभ्रा - नहीं माँ जी... यह घर.. कम से कम... हमारे हैल से तो अच्छा है और... बहुत ही बड़ा...

प्रतिभा - लो अब तुम भी... अगर मक्खन मारना ही है... तो अपना घर समझ कर बैठ कर बात करो..

शुभ्रा - (आगे आकर बैठ जाती है) नहीं माँ जी... घर के बड़े हो जाने से... क्या होता है माँ जी... आपस के रिश्तों में फासले होते हमने देखा है... और घर में हो कर भी... सदस्य एक दूसरे को ना दिखे तो.. घर तो ऐसे होने ही चाहिए... ताकि लोग दिखें... रिश्तों में तंगी या फासला ना हो...

प्रतिभा - बाप रे... कितनी बड़ी बातेँ कर दी... तो यह घर तुम दोनों को पसंद तो आया ना...

शुभ्रा - क्यूँ शर्मिंदा कर रहे हैं माँ जी... आप इतना कुछ तो कर रही हैं...

प्रतिभा - अरे क्यूँ ना करूँ... आखिर मेरे रिश्तेदार जो हो...

विक्रम - क्या... रिश्तेदार...

प्रतिभा - हाँ.. यह घर... तुम्हारी बहन... नंदिनी की ससुराल जो है... (विक्रम शर्म के मारे अपना सिर झुका लेता है और शुभ्रा की हँसी छूट जाती है) अब तुम लोग मानों या ना मानों... तुम्हें ही विश्व का पैर धोना है.. और उसके हाथ में नंदिनी का हाथ देना है...

विक्रम - (बात बदलने के लिए) माँ जी... प्रताप नहीं दिख रहा है... और अंकल भी...

प्रतिभा - प्रताप.... ह्म्म्म्म... अभी वह जोब्रा वॅकर्स पार्क में होगा... और उसके डैड उसके इर्द गिर्द थोड़ी देर मंडराएंगे... फिर उसके साथ गप्पे मारेंगे... फिर रात को खाने के समय दोनों आयेंगे...

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साँझ ढल रही थी l सूरज का तेज मद्धिम पड़ चुकी थी l जोब्रा बैराज के तीन सुइस गेट खोले गए थे l पानी की तेज निष्कासन से वह जगह धुआं धुआं हो गया था जिसका लुफ्त कुछ जोड़े उठा रहे थे और जोब्रा वकर्स पार्क में बूढ़ों से लेकर जवान तक इवनींग वक कर रहे थे l कहीं कहीं कुछ बच्चे दौड़ भाग कर रहे थे l पर एक जगह पार्क की व्यू पॉइंट पर लोहे की बाड़े पर अपना भार डाले विश्व खड़ा था l पश्चिम में डूब रहे सूरज की ओर देख रहा था l उसका ध्यान टूटता है जब उसके आँखों के सामने बारीक से कटी हुई कुछ ककड़ी मिर्च और नमक के साथ आ जाती है l विश्व जब अपनी नजर घुमाता है तो देखता है तापस ककड़ी लेकर उसे दिखा रहा है l

तापस - लो खा लो... (बेमन से ककड़ी लेकर विश्व खाने लगता है) हूँ... अब बोलो क्या बात है...

विश्व - वीर ने वकालत नामा अभीतक साइन नहीं किया है...

तापस - हूँ तो क्या हुआ... वीर ने अपने लिए किसी और वक़ील को हायर भी नहीं किया होगा...

विश्व - नहीं.. वह किसी दूसरे वकील को हायर तो नहीं किया है..

तापस - तो फिर अदालत के आदेश के अनुसार... वीर की वकील तुम ही हो...

विश्व - हाँ... वह मैं समझता हूँ... पर परेशानी यह है कि... मेरा मुवक्किल... मेरा पूरा साथ नहीं दे रहा है...

तापस - ह्म्म्म्म... तुम्हें ऐसा क्यूँ लग रहा है...

विश्व - उसने... अपने खिलाफ कौन कौन है... किस किस तरह की साजिश का शिकार हुआ है... सब कुछ मुझे बताया था... पर फिर भी ना जाने क्यूँ... मुझे लग रहा है... वीर कहते कह्ते... मुझसे कुछ छुपा गया है...

तापस - ह्म्म्म्म... तो तुम्हें लगता है कि वीर ने तुमसे कुछ छुपाया है... अगर ऐसा है... तो तुमने विक्रम से... वह सब क्यूँ छुपाया... जो तुमसे वीर ने अकेले में कहा था...

विश्व - डैड... (एक गहरी साँस छोड़ते हुए) मैंने विक्रम से इसलिए छुपाया... क्यूँकी यही वीर की इच्छा थी... मंशा भी थी...

तापस - हूँ... तुम्हें अगर ऐसा लगता है... तो इस बारे में तुम्हें... अगर मेरी बात मानों तो... विक्रम से ही डिटेल में बात करनी चाहिए...

विश्व - नहीं.. नहीं कर सकता...

तापस - पर क्यूँ...

विश्व - जब भी बात वीर की होती है... मैंने महसूस किया है... विक्रम उसके लिए ओवर पोजेस्सीव हो जाता है... कहीं जोश जोश में... उससे कुछ इधर उधर.. हो गया तो... लेने के देने पड़ जाएं... क्यूँकी इससे पहले पहले भी... चेट्टी के घर में घुस कर... सबक सिखा चुका है...

तापस - हूँउंउं... तुम्हारा सोचना गलत नहीं है... विक्रम... अंदर ही अंदर बहुत गुस्से में भरा हुआ है... ऐसा लगता है... जैसे अंदर के गुस्से के लावा को उसने बांध रखा है... अगर यह बांध टूट गया... पता नहीं क्या क्या कर बैठेगा... क्यूँकी वीर के खिलाफ... साजिश बहुत गहरी है...

विश्व - हाँ डैड... वीर के खिलाफ साजिश की बहुत जबरदस्त बिसात बिछाया गया है... अगर इस वक़्त विक्रम ने कुछ भी किया... तो केस को वे लोग... पता नहीं किस ओर मोड़ देंगे हैं... उनकी आँख सिर्फ क्षेत्रपाल की बर्बादी ही नहीं देख रही है... बल्कि आनेवाली इलेक्शन को भी देख रही है.. इसलिए मैं चाहता हूँ... विक्रम को सारी बातेँ... धीरे-धीरे अदालत के कारवाई के साथ मालूम हो...

तापस - हाँ... यही ठीक रहेगा... मुझे पूरा यकीन है... तुम उस आई विटनेस को अच्छी तरह से टैकल कर लोगे...

विश्व - आपको यकीन है...

तापस - हंड्रेड पर्सेंट..

विश्व - पर वीर को क्यूँ नहीं...

तापस - ऐसा नहीं है... उसे भी यकीन है... तभी तो... उसने... मृत्युंजय की आइडेंटिटी को... तुम्हारे पास डिस्क्लोज किया...

विश्व - फिर भी मुझे ऐसा क्यूँ लग रहा है कि... वीर कुछ छुपा गया है... मुझे डर है... पता नहीं अदालत में वह अपना क्या स्टैंड रहेगा... क्या रवैय्या अपनाएगा... कहीं कोई बेवकूफ़ी ना कर जाए...

तापस - तुम्हें ऐसा क्यूँ लग रहा है...

विश्व - जो बात उन्होंने वीर के सामने आकर डिस्क्लोज किया है... उसके लिए उन्होंने यही टाइम क्यूँ चुना... अदालत में भी गवाही देते हुए आपनी आइडेंटिटी डिस्क्लोज कर सकते थे...

तापस - कहाँ क्या डिस्क्लोज किया है... तुम... वीर और मैं... हम तीनों उस चेट्टी और मट्टू के रिश्ते को जानते हैं... मीडिया या दुनिया... कौन जानता है... इस वक़्त वीर के सामने आकर खुलने का मतलब... एक ही वज़ह हो सकता है... या तो कंफिडेंट.. या फिर ओवर कंफिडेंट...

विश्व - कैसे...

तापस - अभी क्षेत्रपाल... हाऊस अरेस्ट है... कुछ नहीं कर सकता... और यहाँ... चेट्टी ने... भीड़ का अच्छा युटिलाईज किया... क्षेत्रपाल के भुवनेश्वर वाले सभी ऐसेट्स को बर्बाद कर दिया... यानी लोगों की गुस्सा और नफरत की लहर पर... क्षेत्रपाल की खिलाफ सवार होकर... अपना पोलिटिकल गोल भी सेट कर दिया... अब कुछ भी क्षेत्रपाल की तरफ से रिएक्शन हुआ... तो पब्लिकली क्षेत्रपाल... यानी वीर के खिलाफ सेंटीमेंट जाएगा.... तो वह आसानी से.. ना सिर्फ क्षेत्रपाल के खिलाफ केस को प्रभावित करेगा... बल्कि अपनी वोट बैंक भी मजबूत कर लेगा...

विश्व - हाँ आप बिल्कुल सही कह रहे हैं... इन सब के बारे में.. मैं सोच चुका हूँ...

तापस - तो इसका मतलब यह हुआ कि तुम... कुछ और लीड ढूंढ रहे हो...

विश्व - हाँ... उन दो पुलिस वालों को... जिन्होंने मृत्युंजय को... उसका ब्रैसलेट लौटा दिया था...

तापस - तुमने इस बारे में किसी से कोई बात की है...

विश्व - हाँ... मैंने... सुभाष सतपती जी से... पर्सनल रिक्वेस्ट की है...

तापस - बिल्कुल सही आदमी से रिक्वेस्ट करी है तुमने... पर

विश्व - डैड... अब आप कोई पर वर मत कहिये...

तापस - तुम्हारे लिए एक बुरी खबर है...

विश्व - क्या...

तापस - एक एबांडन अंडर कंस्ट्रक्शन एरिया में... कुछ मजदूर... सीमेंट कंक्रीट भरी हुई ड्रम में लगे मोटे सरिया के सहारे... पतले सरिया को मोड़ने का काम करते थे...

विश्व - (आँखे फाड़ कर मुहँ खोले तापस की ओर देखे जा रहा था)

तापस - जब एक सरिया को कुछ ज्यादा ही मोड़ दिया... तब ड्रम में धंसी हुई सरिया उखड़ आया... जिसमें खून लगा हुआ था... तो उन्होंने पुलिस को खबर करी... पुलिस ने उस साइट पर... दो ऐसे ड्रम ज़ब्त किए... बड़ी मुश्किल से कंक्रीट हटाने के बाद... मालूम हुआ कि... वह दो लाशें... उन दो पुलिस वालों की थी...

विश्व - ह्वाट... यह... य़ह आपको कब पता चला...

तापस - कुछ ही देर हुआ है... सतपती ने तुम्हें बताने के बजाय.. मुझे बताया...

विश्व - ओह... इसका मतलब यह हुआ कि..... वे लोग यह सबूत भी मिटा दिए...

तापस - यह सबूत भी मतलब...

विश्व - वीर को उन्होंने अपनी कॉन्टैक्ट का इस्तेमाल कर... झारपड़ा जैल में रखवाया... इसीलिये तो... जैल के रिकार्ड में... उनके वीर से हुई मुलाकात का कोई मेंशन नहीं है... मतलब रिकार्ड में... विजिट या फिर मीटिंग का कोई जिक्र नहीं है...

तापस - ह्म्म्म्म....

विश्व - अगली सुनवाई में... मुझे हर हाल में... वीर को सेंट्रल जैल को शिफ्ट करने की अर्जी दूँगा...

तापस - ह्म्म्म्म... शायद यह भी एक वज़ह हो... जिसके वज़ह से वीर ने तुमसे कुछ छुपाया हो...

विश्व - हाँ शायद... (एक पॉज) अच्छा डैड... किसकी कंस्ट्रक्शन साइट पर... यह दो लाशें मिली है...

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चेट्टी विला

कटक

एक गाड़ी तेजी से आकर पार्किंग करिडर में रुकती है l गाड़ी का पिछला डोर खुलता है l कमल कांत उर्फ केके उतरता है l जो बड़े गुस्से में दिख रहा था l वह तमतमाते हुए अंदर जाता है l अंदर होम बार में एक जगह ओंकार, मृत्युंजय और रॉय तीनों बैठे हुए थे l ग्लास में मृत्युंजय बर्फ डालने के बाद सोढ़ा उड़ेलता है l बोतल से बुलबुलें निकलते हुए चिर्र्र्र्र् को आवाज आती है l जैसे ही चेट्टी की नजर केके पर पड़ती है l

चेट्टी - आओ... केके आओ... महफ़िल में कमीने तीन थे... तुम आ गए हो... मज़ा आ जाएगा...

केके - चेट्टी साहब... यह मैं क्या सुन रहा हूँ...

मृत्युंजय - ओह यह... यह ग्लास में आइस क्यूब और सोढ़ा की आवाज थी... अब थोड़ा पानी डालने से... टेस्ट स्मृथ हो जाएगा...

केके - शट अप...

चेट्टी - क्या हुआ केके... तुम इतने तमतमाये हुए क्यूँ लग रहे हो... तुम्हारा काम तो हो गया ना... वीर अब सीधे फांसी पर लटकेगा...

केके - हाँ आपने मेरा काम कर दिया... पर अब मुझे फंसा क्यूँ रहे हैं...

चेट्टी - यह क्या बकवास कर रहे हो... फंसा तो वीर है... इसमें तुम कहां से आ गए...

केके - तो फिर मेरे कंस्ट्रक्शन साइट पर... दो पुलिस वालों की लाश कैसे मिली...

चेट्टी, मट्टू और रॉय - क्या...

केके - हाँ... पुलिस ने फोन किया था... मेरे नए कंस्ट्रक्शन साइट पर... सरिया मोड़ने वाली कंक्रीट के दो ड्रम में... दो लाशें मिली हैं... सुबह ही मिल गई थी... पर शिनाख्त... घंटे भर पहले हुई है...

मृत्युंजय - रिलैक्स केके साहब रिलैक्स... आपके साइट पर मिला है... इसका मतलब यह नहीं कि... पुलिस इसको आप से लिंक करेगी... और आप... आप उस टाइम ओड़िशा में थे भी नहीं...

चेट्टी - हाँ केके... रंगा और रॉय ने लगता है उन्हें वहीँ पर मार डाला... पर मुझे लगता है यह सिर्फ पुलिस को... कंफ्यूज करने के लिए होगा... बाकी... तुम पर कोई आँच नहीं आएगा...

केके - अगर ऐसा कुछ था भी... तो मुझे पहले से ही... बता देना चाहिए था...

रॉय - अचानक हो गया... ब्रैसलेट के बदले वह दोनों मुहँ कुछ ज्यादा ही फाड़ रहे थे... पुलिस वाले थे... ओवर कंफिडेंट थे... हम ने ब्रैसलेट लिया... और उन्हें रंगा वहीँ पर सुला भी दिया... बस आपके सीमेंट का क्वालिटी ख़राब निकला... कच्चा कच्चा ही रह गया... ड्रम में लाशें दबा कर कंक्रीट डालने को बोला था... रंगा ने किया भी वही था... पर देखो कंक्रीट निकल ही गया...

केके - रॉय... मादरचोद... तुझे मेरी ही साइट मिली थी...

रॉय - मुझे नहीं... उन पुलिस वालों को... एबांडन था... आधी रुकी हुई कंस्ट्रक्शन साइट था.. जगह बिल्कुल श्मशान लग रहा था... उन पुलिस वालों ने ही चुनी थी... बाकी उनका काम रंगा ने खूबी से कर दिया...

चेट्टी - बस बहुत हुआ... केके... क्या बच्चों जैसी हरकत कर रहे हो... हम मिले हुए हैं... इसलिए क्षेत्रपाल पश्त हैं... अभी अगर हम कुत्ते बिल्लियों की तरह आपस में लड़े... तो सोचो क्या होगा... क्या उसका पलटवार झेल पाओगे... इसलिए बैठ जाओ... आगे बहुत काम करने हैं...

केके - (बैठते हुए) माफ करना चेट्टी साहब.... आप काम तो करते हैं... पर पूरा नहीं कर पाते... या तो फैल हो जाती है... या फिर आधी अधूरी...

चेट्टी - तुम कहना क्या चाहते हो...

केके - आपने जैसे कहा... जितना कहा... जहां कहा... मैंने पैसे पूरे दिए... पर... आपके इस टोटके बाज मृत्युंजय ने... मॉब लेकर गया था... क्या हुआ... विक्रम तो बच गया ना...

मृत्युंजय - केके साहब... लगता है.. आपको बारंग रिसॉर्ट.. बहुत याद आ रहा है... आप कुछ बातेँ... मुझसे भी कर लीजिए... ताकि आपको पूरी बात मालूम हो सके...

केके - ठीक है... तू ही बता... अभी तक क्या किया है तूने... सिवाय मुझसे पैसे ऐंठने के..

मृत्युंजय अपनी जगह से उठता है और केके के सामने एक चेयर खिंच कर बैठ जाता है l

मृत्युंजय - मिस्टर... कमल कांत... आप चाहते क्या हैं... यहाँ पर हम चार लोग हैं.. मुझे और चेट्टी साहब को छोड़ दीजिए... आप और रॉय बाबु... मैंने ESS की बर्बादी तय कर दी... महांती को रास्ते से हटा कर... अपनी जान की बाजी लगा कर... रॉय बाबु का एक कंपटीटर हट गया... मैं जब टूटी टांग के साथ हास्पिटल में था... तब... ना सिर्फ मेरी बहन... बल्कि आपके बेटे का भी हत्या हुई... उसीके बदले के लिए... हमने अनु का किडनैप करवाया... फैल हुए... बुढ़िया दादी को मालूम हुआ... उसको भी बीच रास्ते से... मैंने हटा दिया... यह सब काम करने के लिए... मैं उस हरामी पिनाक सिंह के साथ... उसका कुत्ता बन कर आगे पीछे घूम कर दुम हिलाता रहा... उसकी खुशी रखने के लिए... सेनापति बूड्ढे और बुढ़िया को किडनैप करने की कोशिश की... फैल हुए... पर वह फैलुअर... पिनाक की थी ना कि हमारी... अब उसे... मैंने तिकड़म भीड़ा कर राजगड़ भेज दिया... उसके बाद... अनु को रंगा के साथ मिल कर हटा दिया... सोचा था... इंवेस्टीगेशन होगा... उसे डॉज कर... वीर को पहले घुमाएंगे फिर फंसायेंगे... पर वह भी नहीं हुआ... वीर ने जुर्म कबूल कर लिया... आप का यह वीर फंसाओ वाला काम करते करते... मेरा ब्रेसलेट छूट गया था... हासिल कर ली... फिर आपको किस बात पर कंप्लेंन है... आपके साइट पर लाश मिली है... उस साइट पर... बहुत दिनों से काम बंद था... वही जगह थी... बढ़िया जगह थी.. उन्हें ठिकाने लगाने के लिए... और यह सब तब हुआ... जब आप ओड़िशा में नहीं थे... अब पुलिस क्या कर लेगी बोलिए...

कमरे में सिर्फ और सिर्फ मृत्युंजय की आवाज़ ही गूंज रही थी l जिस अंदाज में मृत्युंजय अपनी बात केके से कह रहा था, केके डर गया था l

चेट्टी - बस मट्टू... कंट्रोल योर सेल्फ... तुम अब राजनीति में जाने वाले हो... थोड़ा ठंड रखो...

मृत्युंजय - (चेयर को पीछे ठेलते हुए चेट्टी के पास बैठ जाता है)

चेट्टी - और केके... जब हम इकट्ठे हुए... तो हमारा लक्ष्य एक ही था... क्षेत्रपाल की बर्बादी... हम सब एक ही नाव के सवारी हैं... इसलिए बेवजह गुस्सा कर... क्यूँ नाव में छेद कर रहे हो...

केके - आ... आई.. आई एम सॉरी...

केके - केके... हम सबका एक ही लक्ष है... बदला... जिसे हमें अपने जीते जी हासिल करनी है... ना मेरा कोई वारिस है... ना तुम्हारा कोई वारिस है... पर जो काम हमारे वारिसों को करना चाहिए... वह यह लड़का मृत्युंजय कर रहा है... जरा सोचो... पिनाक के बगल में रह कर... पिनाक के मन में जहर भर रहा था... और पिनाक की आड़ में रह कर... हमारा इंतकाम को अंजाम देने के लिए... क्षेत्रपाल के खिलाफ काम कर रहा था... जरा सोचो... अगर यह पकड़ा जाता तो...

केके - आई एम सॉरी मट्टू... रियली आई एम सॉरी...

मृत्युंजय - ईट्स ओके केके साहब...

चेट्टी - तो... अगले प्लान पर जाने से पहले... मैं एक बात कहना चाहता हूँ... निजी... पर तुम सबको बताना चाहता हूँ...

रॉय - कहिए...

केके - हाँ चेट्टी साहब... कहिये क्या कहना है...

चेट्टी - जैसे ही वीर कोर्ट में कंविंक्टेड हो जाएगा... उसके बाद... मैंने निश्चय किया है... (मृत्युंजय के कंधे पर हाथ रखकर) मट्टू... उर्फ मृत्युंजय को अपना नाम दूँगा...

केके और रॉय - ह्वाट...

चेट्टी - हाँ... इसे मैं अपना... दत्तक पुत्र बनाऊँगा... आखिर इसने मेरे प्रतिशोध को अंजाम तक पहुँचाया है... मेरा अब कोई आगे पीछे नहीं रहा... इसलिए मैंने जो भी अब तक कमाया है... वह सब मृत्युंजय के हवाले कर दूँगा...

कुछ देर के लिए कमरे में सन्नाटा पसर जाता है l केके का मुहँ खुला रह जाता है l वह कभी रॉय की ओर तो कभी चेट्टी की ओर देखने लगता है l

चेट्टी - जैसे कि मैंने कहा... यह मेरा निजी फैसला है... इससे हमारे प्लान पर कोई असर नहीं होना चाहिए... क्या कहते हो तुम लोग...

रॉय - जैसी आपकी मर्जी... इसमें.. हम क्या कर सकते हैं..

केके - बहुत अच्छा निर्णय लिया है आपने... मुबारक हो... मुबारक हो.. मट्टू..

मृत्युंजय - क्या आज के बाद.. मैं आपको अंकल कह सकता हूँ...

केके - ऑफ कोर्स...

चेट्टी - ठीक है.. ठीक है... यह चाचा भतीजा वाला रिश्ता बाद में निभाना... अब हम अगले प्लान पर चलें...

रॉय - जी बेशक...

चेट्टी - परसों... सुनवाई है... हमारा पहला लक्ष यह होना चाहिए... के विश्व और विक्रम अदालत ना पहुँचे...

केके - हाँ... बात तो ठीक है... पर अदालत में अगर विश्व नहीं दिखा जज का रिएक्शन क्या होगा...

चेट्टी - देखो... मेरा बेटा चश्मदीद गवाह बना है...

केके और रॉय - आपका बेटा...?

चेट्टी - अरे भाई... अभी तो कहा.. मैं मृत्युंजय को अपना दत्तक पुत्र बनाने वाला हूँ...

केके - ओह सॉरी सॉरी... मैं भूल गया था...

चेट्टी - जैसा कि मैंने कहा... मट्टू... चश्मदीद गवाह बना है... जाहिर सी बात है... विश्व इसे... क्रॉस एक्जामिन करेगा.... हमे वह परिस्थिति ही आने नहीं देना है... इसलिए... परसों.. उन्हें... लिंक रोड के ब्रिज पर...या फिर जिस रास्ते से जाएंगे... उस रास्ते पर... ट्राफिक में इस तरह से फंसायेंगे... की वह गाड़ी से बाहर ही निकल ना पाए...

रॉय - गाड़ी में सिर्फ दो ही तो लोग होंगे... विश्व और विक्रम... दोनों को उसी ट्रैफिक जाम के आड़ में... मरवा दें तो...

केके - सोने पे सुहागा... मैं तो कहता हूँ... अगर हम अपनी लॉजिस्टिक्स और मेन पावर लगा रहे हैं... तो लगे हाथ यह पुण्य का काम क्यों ना कर दिया जाए...

चेट्टी - बात तो पते की कि है तुमने... पर मुझे यह काम आसान नहीं लगता...

रॉय - क्यूँ...

चेट्टी - देखो... एक बार... विक्रम पर हमला हो चुका है... इस पर गॉसिपींग हो रही है... और यह मत भूलो... की विश्व के इर्द-गिर्द... जोडार ग्रुप के लोग भी होंगे... फंसाने तक तो किसी का ध्यान नहीं जाएगा... पर उससे आगे कुछ हुआ... तो वहीँ के वहीँ... जंग छिड़ जाएगी...

केके - पर... विक्रम को हम क्या ऐसे ही छोड़ दें...

चेट्टी - केके... उतावले बहुत हो रहे हो... सब्र करो... सब्र का फल मीठा होता है... अगर वह लोग कोर्ट नहीं पहुँच पाए... तो जाहिर है... कोर्ट और एक डेट देगी... हमें इसी बीच... ना सिर्फ विक्रम या विश्व को... बल्कि... बीरजा किंकर सामंत राय की बेटी... शुभ्रा सामंत राय... और सेनापति दंपति... सबको बारी बारी से... ऊपर पहुँचा देंगे...

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सुनवाई के दिन राजगड़ में

आकाश में बादल छाए हुए हैं

हल्की हल्की बूंदाबांदी हो रही थी l उधर अंतर्महल के मंदिर में

सुषमा पूजा घर में कुछ दीप जला कर पूजा में लीन बैठी हुई थी l उसके पीछे रुप आकर खड़ी होती है l सुषमा को रुप की उपस्थिति मालूम हो जाती है l

सुषमा - आओ रुप... क्या कोई खबर है...

रुप - नहीं चाची माँ... नहीं... चाचा जी... हड़ताल में हैं... या अभिमान में हैं समझ में नहीं आ रहा है... अब तो उनसे बात करने में भी... डर लग रहा है...

सुषमा - हाँ... बावले हो गए हैं... वीर के साथ जो हुआ... वह उनके दिल ओ दिमाग पर गहरा असर कर गया है... उन्हें उस हालत से... या तो विक्रम... या फिर वीर ही निकाल सकता है...

रुप - और राजा साहब... कहने को महल में हैं... पर घर वालों को... दिख नहीं रहे हैं... उनसे ताल्लुक रखने वाले... वकील और वह... लठैत... भीमा ही मिलने जा रहे हैं...

सुषमा - तुझे कैसे पता चला... हम लोगों का तो वहाँ जाना वर्जित है...

रुप - हाँ... हमारा वहाँ जाना वर्जित है... पर खबर लेने में कहाँ दिक्कत है...

सुषमा - (चुप रहती है)

रुप - अब देखो ना चाची माँ... टीवी भी नहीं आ रही है... बारिश से लगता है... डीटीएच में कोई ख़राबी आ गई है...

सुषमा - (एक दिए में थोड़ी तेल डालते हुए) रुप...

रुप - जी... चाची माँ...

सुषमा - मैं यह समझ गई... के तुम्हें सारी ख़बरें सेबती देती है... और मुझे आभास हो रहा है... उसने शायद... अनाम से कोई खबर तुझे दी है... जो तु बताने से हिचकिचा रही है...

रुप - (चुप रहती है)

सुषमा - घबरा मत.. बेझिझक कह दे... अब ख़बरों की प्रतीक्षा है... अच्छी या बुरी इससे कोई मतलब नहीं रहा... बोल तुझे क्या बोलना है...

रुप - (हिचकिचाते हुए) वह माँ... वीर भैया ने अभी तक... अनाम की वकालत नामा पर दस्तखत नहीं की है...

सुषमा - ह्म्म्म्म...

रुप - आज सुनवाई भी है... वैसे वीर भैया ने अनाम से कहा था... की अदालत के अंदर... जज के सामने वकालत नामा पर दस्तखत करेंगे...

सुषमा - हूँ... और...

रुप - आप... बात की गंभीरता को समझ रही हैं ना...

सुषमा - देखो बेटी... इस महल नुमा बंदी गृह में... हमें कौन सुनता है... इस घर के मर्द... अपनी मर्द होने की धौंस के चलते हमें बिल्कुल नहीं सुनते... सुनते हैं... तो इस मंदिर के भगवान... मर्दों से हम कुछ कह नहीं पाते... हाँ इस मंदिर में... भगवान से जो चाहे कह लेते हैं... शिकायत भी करते हैं और शिकवा भी कर लेते हैं... इसलिए मैं ज्यादातर वक़्त... इसी मंदिर में... इनसे (भगवान से) लड़ती रहती हूँ... शिकायतें करती रहती हूँ... और इतने में तसल्ली कर लेती हूँ... कम से कम... यह सुनते तो हैं...

एक चुप्पी दोनों के बीच कुछ समय के लिए छा जाती है l रुप देखती है सुषमा भले ही खुद को संभाल कर रखी है पर उसके आँखों के कोने में आँसू की बूंदे चमक रहे थे l

रुप - (पीड़ा भरी आवाज में) माँ... जज साहब ने यह भी कहा था... वीर भैया चाहे... अनाम के वकालत नामा पर दस्तखत करे या ना करें... अनाम ही... वीर भैया के लिए... तहरीर करेंगे...

सुषमा - (एक गहरी साँस लेते वक़्त वह थर्रा जाती है) अनाम अपना दोस्ती निभा रहा है... हूँह्ह... बेचारा... अपनी दोस्ती के इम्तिहान के भंवर में फंसा हुआ है... पर यहाँ इम्तिहान उस अकेले का नहीं है... सब का अपना अपना इम्तिहान है... तेरे चाचा के अंदर पिता जागा... जागा तो कब... जब बेटा पास नहीं है... उसके पास जा नहीं पा रहे हैं... उन्हें अपने बेटे की प्रतीक्षा है... मैं कभी किसीसे कुछ नहीं कह पाई... इसलिये.. मैं इनके (भगवान) सामने प्रण लेकर बैठी हूँ... वीर यहाँ आए... उधर.. विक्रम... अपने भाई को बचाने के लिए... हर संभव कोशिश कर रहा है... के वीर को यहाँ लाए... और अनाम... उसका कोशीश यह है... की वह हर हालत में... कानून के फंदे से... वीर को बचा कर लाए... पर...

रुप - पर..

सुषमा - (आवाज़ और चेहरा बहुत गंभीर हो जाती है) वीर मेरा बेटा है रुप... उसके नस नस से वाकिफ हूँ... उसका भी कोई प्रण होगा... जिसके वज़ह से उसने... अपने जिगरी दोस्त की वकालत नामा पर दस्तखत नहीं किया है...

रुप - कैसा प्रण...

सुषमा - यह मैं नहीं जानती... पर इतना जरूर कह सकती हूँ... उसने प्रण... अपनी अनु के लिए उठाया होगा... अगर अनु के लिए उसने कोई प्रण उठाया है... तो भगवान से इतना कहूँगी... हे भगवान... वीर की वह प्रण पूरा हो....

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सेनापति दंपति का घर

ड्रॉइंग रुम में विश्व एक कोने से दूसरे कोने तक चेहरे पर परेशानी लिए इधर उधर हो रहा है l कमरे में विक्रम और तापस बैठे उसे देख रहे हैं l प्रतिभा और शुभ्रा तैयार हो कर कमरे में आते हैं l विश्व उन्हें देखता है

विश्व - आप... क्या आप दोनों भी जाएंगी..

प्रतिभा - हाँ... मैं... (तापस को दिखाते हुए) इनकी तरह रिटायर्ड तो नहीं हूँ... और हम सब चले गए तो... (शुभ्रा को दिखाते हुए) यह बिचारी अकेली घर में क्या करेगी...

विश्व - नहीं माँ... ना डैड जा रहे हैं... ना ही आप... सिर्फ विक्रम और मैं ही जाएंगे...

प्रतिभा - क्या...

विश्व - प्लीज माँ... समझने की कोशिश करो... विक्रम पर जो हमला हुआ था... वह कोई जन आक्रोश या राजनीतिक हमला नहीं था... मुझे कुछ और लगता है... इसलिए प्लीज... आज तुम डैड और शुभ्रा जी घर पर रहेंगे... कोर्ट में सिर्फ मैं और विक्रम ही जायेंगे...

प्रतिभा - तु केस लड़ेगा... मैं ना देखूँ...

तापस - भाग्यवान... प्रताप ठीक कह रहा है... हमें इस केस की गंभीरता को समझना चाहिए...

प्रतिभा - मतलब हम तीनों रहेंगे...

तापस - हाँ...

प्रतिभा गुस्से में मुहँ फूला कर सोफ़े पर बैठ जाती है l विश्व उसके पैरों के नीचे घुटनों पर बैठ जाता है l प्रतिभा के दोनों हाथों को अपनी हाथ में लेकर

विश्व - माँ... अगली बार मैं कभी तुम्हें नहीं रोकुंगा... पर आज नहीं...

प्रतिभा - तुझे क्या लगता है... रास्ते पर हमला होगा...

विश्व - हाँ...

प्रतिभा - तो यहाँ भी तो हो सकता है...

हाँ हो सकता है... - अंदर आते हुए जोडार - इसलिए सुनवाई तक... यहाँ मैं और मेरे आदमी रुकेंगे... (जोडार के अंदर आते ही सब चौंक कर उसे देखते हैं)

प्रतिभा - जोडार साहब आप...

जोडार - जी मिसेज सेनापति... आज हम... मतलब मैं और मेरे आदमी... आपकी मेहमान नवाजी का लुफ्त उठाएंगे...

प्रतिभा - पर...

जोडार - इत्मीनान रखिए... पहले आपके प्रताप को... यहाँ से निश्चिंत हो कर जाने दीजिए... मैं आपको पूरी बात बता दूँगा...

विश्व - थैंक्स जोडार सर...

जोडार - आह... मुझसे यह फर्मालिटी मत करो यार.. अब तुम दोनों निकलो... पर हाँ... जो स्ट्रेटेजी तुमने बनाया है... तुम बस उस पर अमल करते जाओ...

विश्व - विक्रम चलो मेरे साथ...

विक्रम चुपचाप उठ खड़ा होता है और विश्व के साथ बाहर जाने लगता है l दोनों दरवाजे पर रुक जाते हैं और पीछे मुड़ कर सबको देखते हैं फिर बाहर निकल कर गाड़ी में बैठते हैं l बारीश हल्का हल्का हो रहा था l बैठने के बाद विश्व गाड़ी लेकर कॉलोनी से निकल जाता है l थोड़ी देर बाद विश्व गाड़ी को एक गैराज के अंदर ले जाता है l वहाँ पर पहले से ही कुछ लोग तैयार थे l विक्रम को इशारा करता है l दोनों उतर जाते हैं l गैराज में जो लोग थे वे आगे आते हैं l उनके हाथ में ड्रेस थे l

विश्व - (विक्रम से) अपने कपड़े उतार लो विक्रम... और इनके हाथ में जो कपड़े हैं वह पहन लो...

विक्रम कोई सवाल नहीं करता l विक्रम के साथ विश्व भी अपना कपड़े बदल लेता है l विश्व और विक्रम ने जो कपड़े उतारे थे उन्हें गैराज के दो लोग पहन लेते हैं और विश्व की गाड़ी लेकर बाहर चले जाते हैं l उनके जाने के बाद विश्व बाकी बचे लोगों की तरफ देखता है l वे लोग एक गाड़ी पर से कवर हटाते हैं l एक पुराना मारुति 800 गाड़ी थी l जिसकी सामने की काँच पर शायद कुछ लगा था जिसके वज़ह से काँच पर मकड़ जाल जैसे खरोंचे दिख रहे थे l विश्व उन आदमियों के तरफ देखता है l

एक आदमी - गाड़ी की कंडिशन बहुत ही टॉप है... काँच पर जो खरोंचे है... उसे हथोड़े से मार कर हमने बनाया है... आप अंदर से सब देख पाएंगे... पर बाहर से आपको कोई देख नहीं पाएगा...

विश्व - गुड...

विश्व, विक्रम को इशारा करता है l दोनों गाड़ी में बैठ जाते हैं l विश्व गाड़ी को गैराज से बाहर निकाल कर एक दूसरा रास्ता पकड़ लेता है l अब तक जो हो रहा था विक्रम चुपचाप सब देख रहा था l जैसे ही गाड़ी मेन रोड पर आ गया विक्रम सवाल करता है

विक्रम - तुम्हें लगता है... कोई हम पर हमला कर सकता है...

विश्व - विक्रम... तुम्हें क्या लगता है... उस दिन... तुम पर मॉब लिंच क्यूँ हुआ था...

विक्रम - जाहिर है... मुझे और शुभ्रा को मारने के लिए...

विश्व - और किसने किया था...

विक्रम - मृत्युंजय...

विश्व - तुम्हें क्या लगता है... मृत्युंजय इतना काबिल था के एक भीड़ लेकर... पहले तुम्हारा ऑफिस... फिर तुम्हारे घर पर हमला कर सकता था...

विक्रम - नहीं... पर इन कुछ दिनों में समझ गया हूँ... उसके पीछे... ओंकार चेट्टी और उसके नेट वर्क है...

विश्व - मतलब... तुमको अंदाजा है... के तुम्हारे और वीर के खिलाफ बहुत बड़ी और गहरी साज़िश हो रही है...

विक्रम - हाँ... (दोनों के बीच एक खामोशी पसर जाती है, कुछ देर बाद) मुझे बहुत दिनों से... मृत्युंजय पर शक था... पर चूँकि वीर ने उसे एपॉइंट किया था... मैं उसके खिलाफ... खुल कर कुछ करने से बचता था... पर महांती के मरने के बाद... मृत्युंजय बड़ी चालाकी से... ESS छोड़ कर चला गया... उसके बाद उसकी बहन का कत्ल हुआ... जिसके तहकीकात के पचड़े में वीर फंस गया था... उसके बाद... मृत्युंजय पूरी तरह से गायब हो गया... फिर एक दिन अचानक मेरे सामने आया... पार्टी के युवा मोर्चा का अध्यक्ष बन कर... (फिर एक पॉज) मुझसे यह गलती हो गई के... मैंने अपनी दिमाग और आँखे... मृत्युंजय की ओर बंद कर रखा... पर अब लगता है... कहीं ना कहीं... हमारी बर्बादी के पीछे मृत्युंजय या तो एक मोहरा है... या फिर एक कड़ी है...

विश्व - बहुत कुछ समझ लिए हो तुम... मुझे लगा था... के शायद तुम गुस्से में आकर...

विक्रम - प्रताप... तुममें एक बढ़िया स्किल है... के तुम सामने वाले को पढ़ सकते हो... समझ सकते हो... तुम्हारा अंदाजा गलत नहीं है... पर मैं खामोश हूँ... जानते हो क्यूँ... क्योंकि वीर मुझे बहुत अजीज है... मेरे दिल के बहुत ही करीब है... इसी ज़ज्बात ने.. मुझ पर लगाम लगाए रखा है... मैं हरगिज नहीं चाहता... के मेरी कोई भी हरकत... इस केस को खराब करे... पर इतना जरुर जान लो... मैं इन हराम खोरों को जिंदा नहीं छोड़ूंगा...

विश्व - आज हमें रोकने की कोशिश की जाएगी...

विक्रम - आज अगर हमें रोकने की कोशिश की गई... तो कोई शक नहीं रह जायेगा... अनु को किसने मारा होगा...

इतना कह कर विक्रम चुप हो जाता है l विश्व वैसे ही गाड़ी चलाए जा रहा था l हर ओर रास्ते में पानी ही पानी नजर आ रहा था l वीर बड़ी निश्चिंत हो कर गाड़ी चला रहा था l इतने में विक्रम की मोबाइल बजने लगती है l विक्रम देखता है एक अंजाना नंबर डिस्प्ले हो रहा था l विक्रम फोन उठाता है

विक्रम - हैलो...

कॉल - (एक लड़की की आवाज आती है) क्या आप विक्रम सिंह क्षेत्रपाल बोल रहे हैं...

विक्रम - जी... आप कौन...

कॉल - जी हम पुलिस कमिश्नरेट से... @#₹ बोल रहे हैं...

विक्रम - जी सुनिए... मैं अभी किसीसे कोई बात नहीं करना चाहता...

कॉल - देखिए... यह बहुत जरूरी फोन है... बाकी आपकी मर्जी...

विक्रम - किस विषय पर....

कॉल - आपके भाई के चश्मदीद गवाह पर... एक बात पता चला है...

विक्रम - ह्वाट...

कॉल - जी आज ग्यारह बजे... केस शुरु होने से पहले... हाई कोर्ट के... & %₹ में आपके हमारे ऑफिसर... अरविंद कुमार से बात करनी होगी...

विक्रम - एक मिनट... (विक्रम फोन को म्युट कर देता है, फिर विश्व से) एक कॉल है... कमिश्नरेट से... चश्मदीद गवाह के बारे में... शायद कोई इन्फॉर्मेशन है...

विश्व - कमिश्नरेट से... चश्मदीद गवाह के बारे में... गड़बड़ हो गई... फोन को तुरंत स्विच ऑफ करो...

विक्रम - क्या...

विश्व - जल्दी...

विक्रम फोन को जल्दी स्विच ऑफ कर देता है l विश्व गाड़ी को एक किनारे लगा देता है और हर तरफ नजर घुमा कर देखने लगता है, फिर विक्रम से कहता है l

विक्रम - तुम्हें क्यूँ लगा यह फ़ेक कॉल है...

विश्व - अगर... कमिश्नरेट से कोई फोन आना होता... तो मुझे आता.. तुम्हें नहीं... उनके पास तुम्हारा नंबर था... मेरा नहीं था... इसलिए... चश्मदीद गवाह के नाम पर तुम्हें कॉल किय...

विक्रम - ओह... उन दोनों का क्या हुआ होगा... जो तुम्हारी गाड़ी और हमारे कपड़े पहन कर गए थे...

विश्व - लगता है... हमारे आदमियों को उन्होंने पहचान लिया है... इसलिए... उन्होंने तुम्हें फोन किया... ताकि वे लोग हमारी लोकेशन ट्रेस कर ले...

विक्रम - ओह शीट... मुझसे यह बहुत बड़ी गलती हो गई...

विश्व - हाँ गलती तो हुई है... पर दिल पर मत लो... इमोशंस पर हमेशा हम कंट्रोल नहीं कर सकते... आज उनके लिए... करो या मरो वाली सिचुएशन है... उनके आदमी सहर के चप्पे चप्पे पर फैले होंगे...

विक्रम - इसका मतलब यह हुआ कि... मृत्युंजय ने बहुत बड़ी छलांग लगाई है... उसे चेट्टी एंड ग्रुप की बहुत अच्छा बैकअप और सपोर्ट मिला हुआ है... पर वह बदला किसका ले रहा है... अपना... या ओंकार का...

विश्व - शायद दोनों का... इसीलिए तो वह बदले के लिए... एकदम से जुनूनी बन गया है...

विक्रम - अब हम क्या करें... क्या हम सपोर्ट के लिए ट्राई करें...

विश्व - फ़िलहाल... धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं... हो सकता है... उन्होंने हमारी लोकेशन ट्रेस ना कर पाए हों... अगर ऐसी कोई सिचुएशन आई... तब जोडार साहब को खबर करेंगे...

विश्व गाड़ी को धीरे धीरे आगे बढ़ाने लगता है हर गली और जंक्शन पर नजरें घुमाते हुए बड़ी सतर्कता के साथ धीरे धीरे आगे बढ़ने लगता है l थोड़ी देर बाद उसके सामने एक मुर्गियों से भरा पोल्ट्री ट्रक ओवर टेक करते हुए ब्रेक लगाती है l विश्व भी गाड़ी का ब्रेक लगा देता है l तभी एक और ट्रक विश्व के गाड़ी के पीछे सटा कर रुकती है l विश्व गाड़ी की डोर खोलना चाह ही रहा था कि एक ऑटो उसके बगल में रुक जाता है l विक्रम के बगल वाली डोर के पास एक बाइक सवार रुक जाता है l

विश्व - विक्रम... अपनी सीट का हेड रेस्ट निकाल लो...

विश्व और विक्रम दोनों अपनी अपनी सीट के हेड रेस्ट निकाल लेते हैं l ऐसे में पीछे वाली ट्रक कार को धक्का देता है l विश्व हैंड ब्रेक लगा देता है l गाड़ी फिर भी घिसटते हुए आगे बढ़ने लगती है l इतने में विश्व और विक्रम अपनी सीट की लिवर खिंच लेते हैं l दोनों की सीट पीछे पीछे की ओर लुढ़क जाती है l दोनों अपनी अपनी हेड रेस्ट में लगे लोहे के रॉड से बगल वाली ग्लास पर मारने लगते हैं l एक दो मार से ही ग्लास टूट जाता है l दोनों पिछले सीट की विंडो से तेजी दिखा कर बाहर निकल जाते हैं l क्यूँ की तब तक पीछे वाला ट्रक उनकी गाड़ी को पोल्ट्री ट्रक के अंदर धक्का मार कर ठूँस चुकी थी l दोनों अब रास्ते में भागने लगते हैं l उनके पीछे अब कुछ लोग हॉकी स्टिक लेकर भागने लगते हैं l बारिश हो रही थी l रास्ते पर पानी लवालव था l थोड़ी देर बाद एक जंक्शन पर दोनों घेर लिए जाते हैं l

विक्रम - प्रताप... मैं इन्हें रोक लूँगा... तुम अदालत पहुँचने की कोशिश करो...

विश्व - नहीं... (विश्व मोबाइल ढूंढता है) ओह शीट...

विक्रम - क्या हुआ...

विश्व - मोबाइल तो गाड़ी में छूट गया...

विक्रम - ओह गॉड.. मेरी भी मोबाइल गाड़ी में रह गई.. एक काम करो... तुम मेरी बात मान लो... मैं इन सब को रोकता हूँ...

विश्व - कोई फायदा नहीं होगा... कुछ लोग तुम्हारे साथ एंगेज हो जाएंगे... और कुछ मेरे पीछे पड़ जाएंगे... (घड़ी देखता है) अभी केस शुरु होने में थोड़ा टाइम है... दोनों मिलकर जल्दी निपटने की कोशिश करते हैं...

विक्रम - अगर हम वक़्त पर पहुँच नहीं पाए तो...

विश्व - कुछ भी हो... आज फैसला नहीं होगा... कोर्ट और एक डेट देगी...

विक्रम - आज अगर हम नहीं पहुँच पाए... तो वीर की कसम है... यह मृत्युंजय और चेट्टी की वह हालत करूँगा के उनकी नस्लें तक उनको पहचान नहीं पाएगी...

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कोर्ट की परिसर में भीड़ उतनी दिखाई नहीं दे रही थी l मगर हर और छाता ही छाता दिखाई दे रहा था l लोग भले ही कम थे पर मीडिया वाले भरे हुए थे l बारिश लगातार हुए जा रही थी l वीर को लेकर एक पुलिस वाला कोर्ट रुम के बाहर कॉरिडोर में एक लकड़ी की बेंच पर बैठा अपनी बारी के प्रतीक्षा में था l वीर के चेहरे पर दाढ़ी बहुत बढ़ गई थी l बाल भी थोड़े बढ़ गए थे पर बिखरे हुए थे l वीर बेंच पर खोया खोया हुआ बैठा था l उसके साथ सिर्फ एक कांस्टेबल ही था l बाकी पुलिस वाले शायद किसी कार्य के लिए अंदर गए हुए थे l एक लड़का सत्रह अट्ठारह वर्ष का कॉरिडोर में घूम घूम कर पुलिस वालों को, वकीलों को, मुजरिमों को चाय की केतली हाथ में लिए चाय पीला रहा था l वह लड़का वीर के पास पुलिस वाले को चाय देता है l फ़िर वीर को चाय देता है, वीर मना कर देता है l

लड़का - ले लो साहब...

पुलिस - पी लो वीर साहब... यह हमारे खाते से है...

वीर - नहीं.. मैं चाय नहीं पी ता...

लड़का - साब... चाय बहुत गर्म है.. मैं आपको काग़ज़ में लपेट कर दे रहा हूँ... लीजिए..

कह कर काँच की ग्लास में चाय उड़ेल कर एक काग़ज़ लपेट देता है और वीर के मना करने के बावजूद उसके हाथ में थमा कर चला जाता है l वीर के हाथ में वह चाय की ग्लास थी और वह हक्का बक्का हो कर उस लड़के को जाते हुए देखता है l इतने में वह पुलिस वाला जो वीर की हथकड़ी पकड़े हुए था वह हथकड़ी का दूसरा सिरा को बेंच की हैंड रेस्ट पर बाँध देता है और वीर को बोल कर टॉयलेट चला जाता है l वीर चाय की ग्लास को बेंच पर रखता है l तो ग्लास से लिपटी हुई वह काग़ज़ निकल जाता l वीर की नजर उस काग़ज़ पर पड़ती है l वीर वह काग़ज़ उठा कर देखता है तो पाता है यह एक संदेश वीर के नाम था l

" कोई खुश फहमी मत पाल लेना... कोई नहीं आएगा आज तेरी पैरवी करने... हमारे आदमी तेरे भाई और तेरे दोस्त को रोक लिया है... वह अब आने से रहे... बड़ी होशियारी दिखा रहे थे... साले हम से छुप्पम छुपाई खेल रहे थे... हमने भी उन्हें दिखा दिया इस छुप्पम छुपाई खेल में... हम कितने माहिर हैं... तुम तो जानते ही हो... हम उन्हें मारने को तो मार भी दें... पर हम चाहते हैं कि तुम लोग जलालत झेलते हुए एक एक करके... इस दुनिया से जाओ... कमीने पन में हम तुम लोगों पर बीस हैं... समझे... छोटे... अब चूँकि तेरा वकील दोस्त आने से रहा... क्यूँ खाली पीली कोर्ट का टाइम खराब कर रहा है... अच्छा बच्चा बन... अदालत में... अपने इकबालिया बयान पर कायम रह... फिर भी तुझे अपनी खुजली मरवानी हो... तो टाइम पास के लिए... अपनी पैरवी खुद कर ले... पर ध्यान राखियो.. केस आज ही खत्म होना चाहिए... समझा, क्यूँकी आज कुछ भी हो जाए... ना तेरा भाई आएगा... ना तेरा दोस्त"

संदेश पढ़ने के बाद वीर उस चिट्ठी को मरोड़ कर फेंक देता है l उसका चेहरा सख्त हो जाता है आँखों में खुन उतर आता है l इतने में वह पुलिस वाला जो वीर को उस बेंच पर छोड़ गया था, वह लौट आता है और बेंच से दूसरा सिरा खोल देता है l इतने में हॉकर आवाज देता है

" वीर सिंह हाजिर हो"

पुलिस वाला वीर सिंह को कोर्ट रुम के अंदर ले जाता है l वीर अपने मुल्जिम वाले कटघरे में जाकर खड़ा होता है l अपनी नजर दर्शकों की दीर्घा पर घुमाता है l देखता है लोगों के बीच मृत्युंजय और ओंकार चेट्टी भी बैठे हुए हैं l दोनों वीर देख कर कुटिल मुस्कान मुस्करा रहे थे l

जज - अदालत की कारवाई शुरु की जाए... प्रोसिक्यूशन अपनी दलीलें पेश करें...

प्रोसिक्यूटर - (अपनी जगह से उठ कर) थैंक्यू माय लॉर्ड... माय लॉर्ड पिछली सुनवाई के दौरान... एक नए नए एडवोकेट... विश्व प्रताप महापात्र ने... कुछ बातेँ अदालत के सामने प्रस्तुत की थी... के मुल्जिम... अपना इकबालिया बयान के जरिए... आत्महत्या कर रहा है... और अपनी दलील से... यह भी साबित किया के... मौका ए वारदात में... मुल्जिम अकेला नहीं था... कोई और भी था... इसमे कोई शक नहीं... की पुलिस से थोड़ी चूक हुई थी.... इसलिए अदालत ने... तफ्तीश को बेहतरीन और दुरस्त करने के लिए.. जो आदेश जारी किया था... माय लॉर्ड... मुझे खुशी है कि... पुलिस ने अपना काम बेहतरीन ढंग से किया है... भले ही मुकम्मल ना हो... पर इतना जरूर है कि आज अदालत में यह मुल्जिम मुजरिम साबित हो जाएगा...

जज - (वीर सिंह से) अदालत मुल्जिम वीर सिंह से पूछती है... क्या आपने अपने लिए कोई वकील नियुक्त किया... (वीर सिंह अपना सिर ना में हिलाता है) ठीक है... अदालत में.. क्या विश्व प्रताप महापात्र उपस्थित हैं... (अदालत में शांति छा गई थी)

प्रोसिक्यूटर - आई एम सॉरी माय लॉर्ड... मुझे लगता है... पुलिस की इतनी तगड़ी तफ्तीश के बाद... विश्व प्रताप ने... मुल्जिम को बचाने का अपना विचार त्याग दिया होगा...

जज - ह्म्म्म्म... अदालत वीर सिंह से पूछना चाहती है... क्या आप अपने लिए कोई वकील नियुक्त करना चाहेंगे... इसके लिए आपको अदालत पूरा मौका देगी और अगली सुनवाई के लिए... एक और तारीख मुकर्रर करेगी... (वीर कुछ नहीं कहता) वीर सिंह... अदालत ने आपसे कुछ पूछा है...

वीर - (अपना चेहरा उपर उठाता है) जज साहब... क्या ऐसा कोई प्रावधान है... की मैं अपने लिए पैरवी कर सकूँ... सबूतों पर अपनी राय जाहिर कर सकूँ... और गवाहों से... सवाल जवाब कर सकूँ...

जज - हाँ... एडवोकेट ऐक्ट 1961 सेक्शन 32... इंडियन पीनल कोड... मुल्जिम को यह अधिकार देता है कि... वह खुद अपनी पैरवी कर सकता है... पर अदालत आपको यह सलाह देती है कि... आप अपने लिए वकील नियुक्त करें..

वीर - नहीं जज साहब... मैं आज माननीय अदालत से... मैं अपनी पैरवी करने की इजाजत चाहता हूँ... मुझे (हाथ जोड़ कर) इजाजत दीजिए...

कुछ देर के लिए कोर्ट रुम में एकदम से सन्नाटा पसर जाता है l जज, प्रोसिक्यूटर के साथ साथ मृत्युंजय और ओंकार चेट्टी भी हैरान होते हैं l बाकी जो लोग बचे थे वे सब खुसुर-पुसुर करने लगते हैं l जज अपना गैवेल लेकर टेबल पर पटकता है

जज - ऑर्डर ऑर्डर... अदालत मुल्जिम से पूछती है... क्या आप वाकई अपनी पैरवी करना चाहते हैं...

वीर - जी माय लॉर्ड... मैं अदालत से हाथ जोड़ कर प्रार्थना करता हूँ... कम से कम आज के लिए... मुझे इजाजत दिया जाए...

जज - अदालत आपको ताकीद करती है... हो सकता है... आज की कारवाई अंत में आपके खिलाफ जाए...

वीर - आज... इस अदालत में जो भी होगा... मुझे स्वीकार होगा...

जज - अदालत इस पर प्रोसिक्यूशन की राय जानना चाहती है...

प्रोसिक्यूटर - माय लॉर्ड... यह व्यक्ती... जब गिरफ्तार हुआ... तब अपना इकबालिया बयान दे चुका था... अब मेरे समझ में यह नहीं आ रहा... के यह किस बात के लिए... किस बात पर... अपना दलील देगा... इससे अदालत का क़ीमती वक़्त खराब होगा...

जज - अदालत आपसे इत्तेफाक नहीं रखती है मिस्टर प्रोसिक्यूटर... यह न्याय प्रक्रिया का एक रूप है... अगर आपके पास पुख्ता दलील व सबूत है... तो आपको इस बात से कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए...

प्रोसिक्यूटर - जी नहीं योर ऑनर.. हमारे पास अब पुख्ता सबूत के साथ साथ वज़ह भी है... मुझे कोई दिक्कत नहीं है...

जज - तो आज की अदालत शुरु की जाती है... (गैवेल को टेबल पर ठोकने के बाद) प्रोसिक्यूशन अपनी दलीलें पेश करे...

प्रोसिक्यूशन - माय लॉर्ड... पिछली सुनवाई और आज की सुनवाई के दौरान... पूरे पंद्रह दिन का समय मिला पुलिस को... इस बीच पुलिस को तीन अहम सूचनाएँ और सबूत हाथ लगे हैं... पहला - इस कत्ल का चश्मदीद गवाह... दूसरा - इस कत्ल की वज़ह... और तीसरा - उस ब्रेसलेट के मालिक के बारे में संक्षिप्त जानकारी... और आज मैं दावे के साथ कह सकता हूँ... इन तीन अहम जानकारी को अदालत में प्रस्तुत करने के उपरांत... यह केस दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा... लेकिन मैं... अपनी दलीलों को... निचे से ऊपर क्रमांक में ले जाना चाहता हूँ... मुझे इजाजत दीजिए...

जज - इजाजत है...

प्रोसिक्यूटर - थैंक्यू माय लॉर्ड... जैसा कि हमें पिछले सुनवाई के दौरान मालूम हुआ... की कत्ल के वक़्त... मक्तुल, मुल्जिम के अतिरिक्त कोई तीसरा भी मौजूद था... जैसे कि उस खोए हुए ब्रेसलेट का मालिक... मुझे यह अदालत को बताते हुए... बेहद दुख हो रहा है कि... उस ब्रेसलेट के मालिक का पता तो अभी तक नहीं चला... पर उस ब्रेसलेट को उसके मालिक को जिन पुलिस वालों ने वापस किया था... उन दो पुलिस वालों की हत्या हो गई है... एक एबानडॉन अंडर कंस्ट्रक्शन साइट पर... वैसे अभी भी पुलिस की तफ्तीश जारी है... उस व्यक्ती को... पुलिस अभी भी खोज रही है... पर जिनके वज़ह से वह सबूत खो गया था... वे लोग शायद अपनी लालच की भेंट चढ़ गए... या फिर उस ब्रेसलेट के मालिक की शातिर चाल का शिकार हो गए...

जज - इससे क्या साबित होता है मिस्टर प्रोसिक्यूटर...

प्रोसिक्यूटर - माय लॉर्ड... के वह जो दूसरा है... आई मीन... ब्रेसलेट का मालिक... उसका परिचय बेशक... मुल्जिम जानता होगा... जिसने अपनी पहचान छुपाने के लिए... सबूत हाथ लगने पर उन पुलिस वालों को मौत के घाट उतार दिया....

जज - ह्म्म्म्म... मुल्जिम वीर सिंह... इस पर आप का क्या कहना है...

वीर - जज साहब... प्रोसिक्यूटर साहब... एक मनगढंत बात कर रहे हैं... इनकी यह दलील... सच्चाई से दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं...

जज - ठीक है... प्रोसिक्यूशन अपनी दलीलों को आगे बढ़ाएँ...

प्रोसिक्यूटर - माय लॉर्ड... अब मैं अपनी दूसरी साक्ष पर आता हूँ...

यह कह कर अपनी फाइल से एक काग़ज़ निकालता है और उस काग़ज़ को रीडर को देता है l रीडर उस काग़ज़ को जज के हवाले कर देता है l जज उस काग़ज़ पर नज़र डालता है फिर वीर की तरफ देखता है l फ़िर प्रोसिक्यूटर की तरफ देख कर आगे बोलने के लिए कहता है

प्रोसिक्यूटर - माय लॉर्ड.. जैसा कि आप देख रहे हैं... यह ₹₹₹₹ कंपनी की इंश्योरेंस कॉपी है... मैं आज फिर से अपनी ही दलील को दोहराता हूँ... यह मुल्जिम... आदतन अपराधी है... इसने अपनी अमीरी के रुबाब... रुतबे की चकाचौंध दिखा कर... एक मासूम लड़की अनुसूया को... अपने प्यार की जाल में फंसाता है... जैसे ही वह लड़की उसके प्रेम जाल में फंसती है... यह शख्स... अनु के नाम पर दो सौ करोड़ रुपए की इंश्योरेंस पॉलिसी बनाता है... उसके बाद... अपने रास्ते से अनु को हटाने के लिए... पहले किडनैप करवाया... उसमें जब कामयाबी नहीं मिली... अंत में हत्या कर दिया... पर जब बचने की कोई गुंजाइश नहीं रही... तो पहले आत्म समर्पण का नाटक किया... और अब... अपने लिए पैरवी करने का ढोंग कर रहा है... मैं अपनी बात को पुष्टि करने के लिए... ₹₹₹₹ कंपनी की रीजनल मैनेजर को बुलाने की इजाजत चाहता हूँ...

जज - इजाजत है...

हॉकर के बुलाने पर ₹₹₹₹ इंश्योरेंस कंपनी की रीजनल मैनेजर गवाह के कटघरे में आता है और गीता पर हाथ रखकर शपथ लेकर सच बोलने की बात कहता है l

प्रोसिक्यूटर - (काग़ज़ दिखा कर) हाँ तो मैनेजर साहब... क्या यह आपकी कंपनी की इंश्योरेंस पॉलिसी है...

मैनेजर - (काग़ज़ पर अच्छे से नजर घुमाने के बाद) जी... यह हमारी ही कंपनी की पॉलिसी है...

प्रोसिक्यूटर - दो सौ करोड़... इतना बड़ा अमाउंट... क्या आपकी कंपनी... ऐसी पॉलिसी बनाती है...

मैनेजर - जी... बनाती है... पर सबके लिए नहीं... दरअसल... ESS के सभी इंप्लॉइज के इंश्योरेंस हमारी ही कंपनी बनाती है... पर इतनी बड़ी अमाउंट वाली पॉलिसी बनाने वालों की हम बैक ग्राउंड वेरीफाई करने के बाद ही... पॉलिसी को... रिकमेंड और ग्रांट करते हैं... और यह तो वीर सिंह क्षेत्रपाल जी की है....

प्रोसिक्यूटर - तो आपने इसकी वेरीफाई की होगी...

मैनेजर - जी पर्सनली तो नहीं पर... हम एजेंटों के जरिए वेरीफाई कराते हैं... पर इस पॉलिसी में... वीर सिंह जी की सिग्नेचर ही काफी था... इसलिए हमने कोई वेरीफाई नहीं की थी...

प्रोसिक्यूटर - इस पॉलिसी की खास बात क्या है...

मैनेजर - जी इस पॉलिसी की अमाउंट क्लेम करने के लिए... कम से कम.. छह महीने के लिए... मिनिमम इंस्टालमेंट बाँधना होता है...

प्रोसिक्यूटर - देट्स इट... माय लॉर्ड... यह पॉलिसी... अनुसूया की हत्या के.. ठीक छह महीने पहले बनाई गई थी... जैसे ही छह महीने का टाइम खत्म हुआ... मुल्जिम ने अनु को रास्ते से हटा दिया...

जज - वीर सिंह... क्या आप इस पर कुछ कहना चाहेंगे...

वीर - जी माय लॉर्ड... अगर आप इजाजत दें... तो मैं मैनेजर से कुछ पूछना चाहता हूँ...

जज - पूछिये... आपको इजाजत है...

वीर - थैंक्यू माय लॉर्ड... तो मैनेजर साहब... इस पर किस किसके सिग्नेचर हैं...

मैनेजर - (काग़ज़ देखता है) जी आपके और मिस अनुसूया जी के...

वीर - आपने सिग्नेचर वेरीफाई क्यों नहीं करवाये...

मैनेजर - जी जैसा कि मैंने कहा... ESS हमारा सबसे बड़ा कस्टमर है... और आप ESS के सीईओ थे... और आपके सिग्नेचर से हम सब अच्छी तरह से वाकिफ हैं... इसलिए नहीं किए...

वीर - यानी कल को कई भी.. किसी की फ़ेक सिग्नेचर बना कर कोई भी पॉलिसी बना दे... वह भी इतने बड़े एमाउंट की... आप वेरीफाई नहीं करेंगे... (मैनेजर चुप रहता है) खैर मेरा एक और सवाल... आपको ESS के जितने भी इंश्योरेंस हैं... उनके उनके इंस्टॉलमेंट कैसे मिलते थे...

मैनेजर - जी ऑनलाइन से... डायरेक्ट सैलरी से डिडक्ट होता है...

वीर - और इस पॉलिसी का इंस्टालमेंट...

मैनेजर - जी... कैश विंडो काउंटर पर... उसकी रसीद भी है...

वीर - जब यह ESS की सीईओ की पॉलिसी है... इसके इंस्टालमेंट लेने के लिए... आप ने इसे कैश विंडो काउंटर की इजाजत कैसे दी... (मैनेजर अब पूरी तरह से झेंप जाता है और चुप हो जाता है) जज साहब... यह पॉलिसी अपने आप में ही फ़ेक है... ESS की ऑफिस से जब ऐसी किसी दूसरी पॉलिसी बनी ही नहीं... तो मैनेजर ने इसकी वेरीफाई क्यूँ नहीं कारवाई... यह इसकी बड़ी गलती है... जब ESS से सभी पॉलिसी की इंस्टॉलमेंट ऑनलाइन पेमेंट होती है... तो इसी पॉलिसी के लिए... कैश विंडो काउंटर ही क्यूँ एक्सेप्ट किया गया...

प्रोसिक्यूटर - (वीर से) आप सवाल करने से अच्छा है... इस पर आप खुद रौशनी डालें...

वीर - क्यूँ... मैं क्यूँ सवाल नहीं कर सकता...

प्रोसिक्यूटर - क्यूँकी... यह सब... आउट ऑफ वे... इसलिए हो पाया... आपकी रुतबे और रौब के चलते... जज साहब... आम तौर पर पॉलिसी... एजेंट करते हैं... ना कि कोई ब्रांच मैनेजर...

वीर - फिर तो आपका गवाह प्रस्तुति ही गलत है प्रोसिक्यूटर साहब... आपको उस एजेंट को सामने लाना चाहिए था... ना कि मैनेजर को...

वीर की इस सवाल पर प्रोसिक्यूटर की बोलती बंद हो जाती है l उधर दर्शकों के दीर्घा में बैठे चेट्टी और मृत्युंजय का चेहरा उतर जाता है l वह मृत्युंजय से फुसफुसा कर कहता है

चेट्टी - बड़ा तोपची बन कर उसे संदेशा दे दिया... अपनी पैरवी करने के लिए... यह तो किसी वकील की तरह तहरीर कर रहा है...

मृत्युंजय - अब मुझे क्या मालूम था... यह सरकारी वकील इतना अनाड़ी निकलेगा.. यह दो टके का क्षेत्रपाल.. ऐसा दिमाग चलाएगा...

चेट्टी - अब जब तुझे गवाही के लिए बुलाया जाएगा... तब यह तुझसे भी सवाल करेगा...

मृत्युंजय - तो करने दीजिए ना... मैंने भी घाट घाट का पानी पिया है...

उधर जज सरकारी वकील को यूँ खामोश देख कर वीर से सवाल करता है l

जज - तो वीर सिंह... आप इस पॉलिसी पर क्या कहना चाहते हैं...

वीर - जज साहब... जैसा कि मैंने पहले ही कहा... यह पॉलिसी अपने आप में फ़ेक है... इसमे किसी तरह की कोई भी बैक ग्राउंड चेक नहीं किया गया... क्यूँकी अगर चेक किया गया होता... तो (एक पॉज लेता है) जज साहब.. मैं ESS का सीईओ था... उससे पहले... क्षेत्रपाल परिवार का वारिस... हमारे नेट वर्थ... और पैसों के बारे में... जिसे थोड़ी भी जानकारी होती... तो यह गलती हरगिज ना करता... पहली बात... जहां तक मैं इस पॉलिसी को समझ पा रहा हूँ... इसे करने के लिए... शादीशुदा होना चाहिए... इस शहर में जो भी मुझे जानते हैं... उन्हें अच्छी तरह से मालूम होगा... मेरी सादी... तीन महीने पहले ही हुआ था...

जज - (प्रोसिक्यूटर से) वीर सिंह की इस दलील पर... प्रोसिक्यूशन की क्या राय है...

प्रोसिक्यूटर - मैं यह अदालत पर छोड़ रहा हूँ... मैं कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता..

वीर - जज साहब... यह कोई टिप्पणी कर ही नहीं सकते... इस पॉलिसी में जो सिग्नेचर मेरे और अनुसूया के होने का दावा कर रहे हैं... मैं अदालत से दरख्वास्त करता हूँ... उन्हें फिर से वेरीफाई किया जाए...

जज - ठीक है... यह अदालत वीर सिंह की दलील को मानते हुए... प्रोसिक्यूशन की तरफ से... अदालत के सामने जिस पॉलिसी को रखा गया है... उसे वेरीफाई करने के लिए... अदालत पुलिस को आदेश देती है... क्या सरकारी वकील को इस पर कोई शिकायत है...

प्रोसिक्यूटर - जी... जी नहीं माय लॉर्ड...

जज - क्या आप अपने चश्मदीद गवाह को प्रस्तुत करना चाहेंगे...

प्रोसिक्यूटर - जी बेशक... मैं दरख्वास्त करूँगा... एक बार चश्मदीद गवाह को सुन लिया जाए... और मुल्जिम चाहें तो... गवाह से जिरह कर सकते हैं...

जज - ठीक है... (मैनेजर से) अब आप जाइए... अपने जगह पर बैट जाइए...

मैनेजर कटघरे से निकल कर दर्शकों के दीर्घा में अपनी जगह पर बैठ जाता है l हॉकर आवाज देता है

"सरकारी गवाह... मृत्युंजय नायक... हाजिर हो... "
 
शुक्रिया Battu भाई आपका बहुत बहुत शुक्रिया

शुक्रिया मेरे दोस्त ऐसी थ्रेड पर इमोशनल भाग आपको भाया यह मेरे लिए एक संतृप्ती की बात है l

हाँ विश्व और विक्रम के समय पर ना पहुँचने पर आगे की कार्रवाई के लिए खुद कमर कस ली

भाई कहानी में मैंने आम लोगों को नायक बनाया है l कोई सुपर विलेन नहीं है कोई सुपर हीरो भी नहीं है l तो जाहिर है कहीं ना कहीं कमजोर परिस्थिति सामने आ रही है l पर नायक वह है जो विपरीत परिस्थितियों से लड़ ले l

हाँ कहानी के प्रमुख पात्र विश्व और रुप ही हैं पर कहानी में सह नायक और प्रति नायक भी हैं l

आयेगा और जरूर आयेगा
 
हाँ प्रत्युष कि हत्या होगी यह बात उस वक़्त विक्रम को पता नहीं था

हाँ भाई यह एक दार्शनिक बात थी

हाँ विश्व के लिए यह एक बुरी खबर ही थी

कमिने पन की हद

वहीँ केके को भी तो नहीं मालूम के उसके बेटा का हत्यारा मट्टू ही है

भाई कहानी में विश्व भले ही नायक हैं पर जरूरी तो नहीं के वे हरदम अपने दुश्मनों पर भारी पडें l कभी कभी दुश्मन भी हीरो पर भारी पड़ते हैं l

जी बेशक अगला अपडेट शनिवार रात को या फिर रविवार सुबह तक आ जाएगा
 
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