Thriller "विश्वरूप" ( completed ) - Page 10 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

Thriller "विश्वरूप" ( completed )

शुक्रिया मेरे दोस्त आपका बहुत बहुत शुक्रिया

पहली बात रोणा ने जिस तरह रुप पर अपना हमला बोला था और पकड़ में आ गया था l इससे राजा भैरव सिंह को विश्व के बारे में अंदाजा हो गया था l इसलिए जब लैपटॉप में वैदेही तो दिखी पर विश्व नहीं दिखा उसे संदेह हुआ l क्यूंकि उसे मालुम था महल में पहरेदारी कम होगी और सारे पहरेदार गाँव वालों के साथ होंगे l क्यूंकि पहले एक हादसा हो चुका था जब विश्व महल में दाखिल हो कर नागेंद्र के कमरे में घुस गया था l

भाई इतना तो आपने पढ़ लिया होगा कि रुप ने अट्ठन्नी के जरिए खिड़की की रेलिंग खोल चुकी थी l कारण बचपन में एक बार विश्व के साथ बाहर गई थी l बाकी विश्व ने पहले ही प्लान किया हुआ था l कैसे नींद में ले गया था यह आपको अगले कड़ी में मालुम होगा l

हा हा हा

भाई थ्रिलर कहानी में इतना कुछ तो होना ही चाहिए

शुक्रिया फिरसे आभार दिल से
 
शुक्रिया लियोन भाई आपका बहुत बहुत शुक्रिया

हाँ यही घटना आगे चल कर गाँव वालों में रोष और आक्रोश पैदा करने वाले हैं

ताकि विश्व को समय और मौका दोनों मिल जाएं रुप को घर से बाहर निकलने के लिए

भैरव अपनी क्रोध और अहं के चलते बल्लभ को समझ नहीं पा रहा है l जब कि बल्लभ को इसके पीछे उदय का मंशा दिख रहा है l पर भैरव सिंह के आगे उस समय चुप रहना बल्लभ की मजबूरी थी

लियोन भाई यह वही आदमी है जो पिनाक के इर्द-गिर्द रहता है और पिनाक को भड़काता रहता है वीर और अनु के खिलाफ l यह आगे चलकर कर मालुम हो जाएगा l

बस यहीं तक क्यूंकि अब उनके जीवन में तूफान का आना बाकी है

हाँ विश्व ने वादा जो किया था कि रुप की पहली किस को वह यादगार बना देगा l

भाई स्पयलर दे ही देता हूँ

लैपटॉप में भैरव सिंह को एक शख्स नहीं दिखा जो सुबह बच्चों के साथ नगर परिक्रमा किया था और होलिका दहन के समय सभी बच्चे और वैदेही तक दिखी पर विश्व नहीं दिखा l इसलिए
 
शुक्रिया मेरे दोस्त आपका बहुत बहुत शुक्रिया

हाँ यही घटना आगे चलकर गाँव वालो के भीतर रोष और आक्रोश भरने वाला है

हाँ यह बिल्कुल सही कहा आपने

फिलहाल के लिए चेट्टी कामयाब हो गया है

पर उसका अंजाम भी उसके सोच के खिलाफ ही होगा

भाई चरित्र बहुत हैं और लड़ाई भी जबरदस्त रहेगी l विश्व अब तक आपने टीम के दम पर कामयाब रहा है आगे भी रहेगा पर जरूरी नहीं कि हर बार विश्व भारी ही पड़ेगा l विश्व से भी चूक होगी तब विश्व भी अपना कीमत चुकाएगा

भाई यह एक सस्पेंस है

बहुत जल्द क्रैक होने वाला है

क्यूंकि उसका सामने आने से कई खुलासे और धमाके होने वाले हैं

शुक्रिया शुक्रिया और शुक्रिया
 
शुक्रिया avsji भाई पर हिंदी लेखन आपकी हमेशा बढ़िया रहा है l मैं इस कहानी को मार्च तक ख़तम कर देना चाहता हूँ l एक विश्राम लेना चाहता हूँ ताकि आपकी कहानी श्राप पढ़ सकूँ l आशा है मार्च तक खत्म कर दूँगा

धन्यबाद फिर से

यह थोड़ा स्वल्प कालीन सस्पेंस है अगली कड़ी में आपको मालुम हो जाएगा

हाँ यह भी आपको अगले अंक में मालुम हो जाएगा

यह दुर्घटना बल्लभ के दिल को चीर कर रख दिया है जिसका फायदा विश्व लेगा l यह कोई बड़ी बात नहीं होनी चाहिए l

हाँ यश कोई धर्मराज नहीं था पर चेट्टी का पुत्र मोह नैचुरल है l बदले की भावना स्वभाविक है

धन्यबाद मेरे भाई आपका बहुत बहुत शुक्रिया

बस बढ़िया हूँ

आप कैसे हैं और जूनियर कैसा है

ईश्वर की कृपा आप पर सदेव बनी रहे
 
👉एक सौ सैंतालीसवां अपडेट

----------------------------------------

मेगा अपडेट

------------


मोबाइल पर रिंग बजने लगती है l विश्व अपनी आँखे बंद कर लेटा हुआ था l उसके होठों पर मुस्कान आ जाती है l वैसे ही आँखे बंद रख कर मोबाइल को कान से लगाता है l

विश्व - हैलो... जी..

रुप - जाग गए...

विश्व - जी... आपकी मेहरबानी...

रुप - यु... सुबह सुबह छेड़ रहे हो...

विश्व - अजी कहाँ... मैं तो सपनों में मस्त था... आपकी ख़यालों में खोया हुआ था... बस आपने हमें बाहर लाकर त्रस्त कर दिया...

रुप - अच्छा जी... तो सुबह सुबह सपने देख रहे थे...

विश्व - हाँ... वह कहते हैं ना... सुबह सुबह का सपना हमेशा सच होता है..

रुप - ओ.. हो... हमें तो मालुम ही नहीं था... वैसे क्या सपना देख रहे थे... जनाब आप...

विश्व - ही ही ही... वह.. मुझे... छी... शर्म आ रही है...

रुप - शर्म आ रही है... यु... स्क्रौंड्रल...

विश्व - हा हा हा...

रुप - देखना... कभी सच नहीं होगा...

विश्व - ओ सितमग़र जरा होश आओ... इश्क की मंजिल ही मिलन है... इससे ना मुकर जाओ...

रुप - गो टु हैल...

विश्व - आय हाय... क्या सितम है...

रुप - शॉट ऑप...

विश्व - ठीक है... मैं शॉट ऑप हो ही लेता हूँ... पर सच सच बताइए... आपको कौन से सपने आते हैं...

रुप - (शर्म से) उम्म्म्... मैं नहीं बताऊंगी...

विश्व - अब यह मेरे समझ से परे है... यह शर्म है या कुछ और...

रुप - जो भी समझना है समझ लो...

रुप शर्मा कर फोन को बेड पर पटक देती है और अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा छुपा लेती है l फिर बड़ी मुश्किल से अपने अंदर की हँसी और ख़ुशी को दबाते हुए फोन पलट कर देखती है l कॉल कट नहीं हुआ था l फोन उठा कर कान से लगाती है

रुप - हैलो... अनाम...

विश्व - जी...

रुप - देखो... तुम ऐसी बातेँ मत करो... प्लीज... हम किसी और टॉपिक पर बात करें...

विश्व - जी जरुर... जरुर करेंगे... पर आप अपने महबूब से... दिल की जज्बातों पर कैसे पर्दा किए रहेंगे...

रुप - प्लीज...

विश्व - वह खयाल... जो मुझे महका रही है... क्या मेरा महबूब... भी महक रही है...

रुप - हाँ... आपकी महबूब भी महक रही है...

विश्व - तो जज़्बातों को लफ्ज़ दीजिए... और मुझे महकते रहने दीजिए...

रुप - प्लीज...

विश्व - कहिये ना...

रुप - (एक पॉज) ठीक है सुनो फिर... (अपनी ही ख़यालों में खोती हुई) दो दिन हो गए... उस पूनम की रात को... पर अभी भी... मेरे बदन पर उन मजबूत बाहों की जकड़ सुकून दे रही है... मेरे कानों में... तुम्हारे धड़कते दिल की... आवाज़ मुझे तसल्ली दे रही है... तुम्हारी साँसों की गर्मी मेरे साँसों को अभी भी गर्म कर रखा है... जो मेरे नसों में खुन को तेजी से दौड़ा रही है... तुमने मुझे चूमा कहाँ था.. तुम खुद को मेरे होंठो पर घुल गए थे... जो अभी तक मुझको पिघला रही है... (एक पॉज लेकर साँसों को नॉर्मल कर) प्लीज अनाम... मुझसे बर्दास्त ना होगा...

विश्व - जैसी आपकी हुकुम... चलिए टॉपिक चेंज करते हैं...

रुप - (थोड़ी झिझक के साथ) वह... बात... दरअसल... मतलब...

विश्व - आप मुझसे कुछ पूछने के लिए... झिझक रही हैं या... शर्मा रही हैं...

रुप - (बिदक कर) कोई भी नहीं... (फिर झिझक कर) या फिर शायद... दोनों...

विश्व - आप जानती हैं... मैं आपसे कुछ भी झूठ नहीं बोलूंगा... पूछिये... बिंदास पूछिये...

रुप - असल में.. मैं बात उस रात की कर रही हूँ...

विश्व - उस रात की... किस रात की...

रुप - परसों रात की... जब हम दोनों...

विश्व - (छेड़ते हुए) ओ हो...तो बात उस रात की है... आप तो फिर उस टॉपिक पर आ रहे हैं... दो दिन बीत गए... और क्या खास पूछा जाना बाकी है...

रुप - देखो... बड़ी मुश्किल से तो मौका मिलता है... तुमसे बातें करने के लिए... और तुम हो कि...

विश्व - क्या करूँ... मैं तो अभी भी उस रात के सुरूर में हूँ...

रुप - अनाम प्लीज...

विश्व - ओके ओके... पूछिये... क्या पूछना चाहती हैं...

रुप - उस रात पहली बार... (सीरियस हो कर) गाँव में होलिका दहन हुआ... लगभग महल से सारे मर्द बाहर थे... कुछ एक को छोड़ कर... क्या इन सबके पीछे तुम थे...

विश्व - नहीं... हाँ...

रुप - मतलब...

विश्व - कुछ मेरे हिसाब से हो रहा था... और कुछ अपने आप हो रहा था...

रुप - ओ... एक बात तो मुझे समझ में आ चुकी है... राजा साहब को... हम दोनों के बारे में... अच्छी खासी अंदेशा हो चुका है...

विश्व - बधाई हो... अब तो आपके परिवार में सबको पता चल गया है...

रुप - शॉट ऑप... मुझे बात ख़तम करने दो पहले...

विश्व - ओके...

रुप - मुझे एक बेहतरीन यादगार देने के लिए... तुमने यह सब किया... पर... तुम ने मुझे... बेहोश कर के... कैसे महल से बाहर ले गए...

विश्व - कहा तो था... क्लोरोफर्म से...

रुप - मुझे बेवक़ूफ़ समझ रखा है... जैसे कि तुम्हें मालुम था... की तुम्हारा इंतजार करते करते मैं सो जाऊँगी...

विश्व - ह्म्म्म्म... आप चालक हो... और आगे चलकर एक वकील की पत्नी बनने जा रहे हो... इसलिए वकील की तरह सोचने लगी हो...

रुप - हाँ ऐसा ही कुछ... अब बोलो उस रात कैसी मुझे बाहर ले गए थे...

विश्व - आपके पास किसीका भी फटकना लगभग ना मुमकिन है... इसीलिए तो... सेबती से कह कर शाम की नाश्ते में... थोड़ी नींद की दवा मिला दिया था... ताकि इंतजार में सोई आँखे जब खुले तो मंजिल पर ही खुले... जो एक सपना सा लगे... और पुरा होने पर उसकी अलग सी खुशी...

रुप - क्या सेबती... उसे तो...

विश्व - अरे शांत...

रुप - तुम सेबती को कैसे राजी किया...

विश्व - यह राज की बात है... फिर कभी बताऊँगा...

रुप - ह्म्म्म्म... पर घर से बाहर जाने की थ्रिल मैं महसूस करना चाहती थी..

विश्व - जब खतरा न हो... वहाँ थ्रिल कहाँ महसुस होती है... जब खतरा सामने था... तब अंदर पहुँचने की थ्रिल तो महसुस की ना आपने...

रुप - हाँ की तो है... जब हम किस में खोए हुए थे... तभी तुम्हारे पास एक कॉल आया... मतलब... राजा साहब का यशपुर जाना.. तुम्हारे ही प्लान का हिस्सा था... उन पर तुम्हारे किसी दोस्त का नजर था... यह बात भी समझ में आ गई... पर वह सीधे राजगड़ आए तो मेरे कमरे में... ऐसा क्यूँ... मतलब उन्हें मुझ पर शक़... कब और कैसे... क्यूँकी उस रात के बाद... राजा साहब... अब तक रंग महल नहीं गए... वह तब से... क्षेत्रपाल महल में हैं...

विश्व - बात बहुत लंबी है... फिर भी... शॉर्ट कर्ट में बताता हूँ... इंस्पेक्टर रोणा के कांड के बाद... वह अच्छी तरह से... हमारे बीच पनप रही रिश्ते को भांप चुके हैं... जैसा कि उन्होंने कहा... उनकी राजनीतिक मज़बूरी है... इसलिए वह आप पर... हार्श नहीं हो पा रहे हैं... पर आप पर नजर तो रखेंगे ना... होलिका दहन की सीधा प्रसारण देख रहे थे... जिस में उन्हें सारे गाँव वाले दिख रहे थे... पर घंटे भर से उपर चले सीधा प्रसारण में... उनकी नजर सिर्फ मुझे ही तलाश रही थी... क्यूँकी गाँव में त्यौहार मनाना मैंने ही शुरु किया था.... पर जब घंटे भर बाद भी... उन्हें मैं नहीं दिखा... तब उनको समझ में आ गया... के महल में कोई पहरेदारी के लिए नहीं है... तो जैसे बड़े राजा जी के साथ जो कांड हुआ था... तब मैं महल के अंदर से बाहर जा रहा था... उन्हें अंदेशा था... शायद इस बार भी कुछ ऐसा हुआ हो... पर....

रुप - उनका अंदेशा सही था... पर... अपनी अंदेशा पर यकीन नहीं था... शायद...

विश्व - हाँ... ऐसा भी कह सकते हैं...

रुप - उस दिन... तुम मुझे छोड़ कर चले जा सकते थे...

विश्व - हाँ... पर मुझे मेरे प्यार को.. सलामत भी तो देखना था... अगर बात हद से आगे जाती... तो मजबूरन मुझे सामने आना पड़ता.. पर ऐसा कुछ हुआ नहीं...

रुप - इतना खयाल रखते हो मुझे... फिर गाँव क्यूँ बुलाया...

विश्व - ताकि... मैं आपकी तरफ से बेफिक्र रहूँ...

रुप - हूँह्ह्... तो हमारी अगली मुलाकात कब होगी...

विश्व - पता नहीं... पर... हो सकता है... हमारी अगली मुलाकात... बहुत जल्द हो... (रुप कोई जवाब नहीं देती, पर विश्व को एहसास होता है कि रुप मुस्करा रही है) वैसे... किसी और टॉपिक पर बात करें...

रुप - हाँ हाँ... करो ना...

विश्व - आप सुबह सुबह मुझे उठा कर हर दिन तरोताजा कर देती हैं... पर आप बासी रह जाती हैं... है ना...

रुप - (बिदक जाती है) ह्वाट डु यु मीन... तुम्हें क्या लगता है... मैं तुम्हारी तरह बेड पर पड़ी रहती... हूँह्ह... जानते हो... मैं तुम्हें रोज बासी गुड मॉर्निंग कहने के लिए नहीं जागती... तुम्हें ताज़ी गुड मॉर्निंग कहने के लिए... सुबह जल्दी उठ कर... नहाती हूँ... फिर जाकर तुम्हें फोन करती हूँ... समझे...

विश्व - ह्वाट... आई मीन... वाव... आप सुबह सुबह नहाती हैं... फिर मुझे ताजगी भरा गुड मॉर्निंग देती हैं....

रुप - वैसे... यह वाव किस खुशी में...

विश्व - (चहकते हुए) अरे यार... आप सुबह सुबह नहाती जो हैं...

रुप - ऐ... तुम कुछ उल्टा सीधा इमेजिन करने तो नहीं लगे...

विश्व - ना ना... मैं तो सीधा सीधा ही इमेजिन करने लगा हूँ...

रुप - छी...

कह कर फोन काट देती है l विश्व मुस्कराते हुए अपना फोन देखता है l तभी उसके कानों में टीलु की खी खी हँसी सुनाई देती है l विश्व सीधा हो कर बैठ जाता है l

टीलु - (अंदर आते हुए) सॉरी भाई सॉरी... पर कसम से... मैंने कुछ भी नहीं सुना...

विश्व - ठीक है... पहले यह बताओ... तुम इस वक़्त...

टीलु - वह एक खबर है...

विश्व - क्या...

टीलु - आज सुबह तड़के... पुलिस के कुछ लोग... होलिका दहन वाली जगह को घेर लिया है...(एक पॉज) लगता है कुछ तो होने वाला है...

×_____×_____×_____×_____×_____×_____×

आदर्श थाना

राजगड़

वैदेही, लक्ष्मी सहित कुछ औरतों के साथ आकर थाने की बरामदे तक पहुँचती है l वैदेही थाने की सीढ़ियां चढ़ते हुए पीछे मुड़ कर देखती है l उसके साथ जो औरतें आयी हुईं थीं, सभी नीचे ही रुक गई थीं l

वैदेही - क्या हुआ... रुक क्यूँ गई तुम लोग...

लक्ष्मी - वह वैदेही दीदी... हम लोग कभी थाने में पहले नहीं आए हैं... थोड़ा अज़ीब लग रहा है...

वैदेही - वाह.. जरुरत तुम लोगों की है... मर्द तुम्हारे अंदर गए हैं... तुम लोग... मुझे यहाँ तक लेकर आए हो... ताकि उनकी खैरियत खबर ले सको... अब बाहर ही रुक गई हो...

एक दुसरी औरत - वैदेही दीदी... हम क्या करें... डरे हुए हैं हम... तुम बस थानेदार जी से बात कर... मामला को समझो... फिर जो बन पड़ेगा... हम लोग करेंगे...

वैदेही - ठीक है... तुम लोग कम से कम... मेरे साथ तो आओ... ताकि... थानेदार जी से बात कर सकूँ...

सारी औरतें पहले एक दुसरे को देखते हैं फिर वे लोग एक एक करके सीढ़ी चाहिए कर वैदेही के पास आकर खड़ी होती हैं l वैदेही उन्हें लेकर थाने के अंदर आती है l सभी देखते हैं एक कोने में लगभग बीस बाइस आदमी नीचे तलवे टीका कर बैठे हुए हैं l तभी उनके कानों में एक आवाज पड़ती है l

- ऐ... कौन हो तुम लोग... (एक कांस्टेबल था) इतने सारे... क्या करने आए हो...

वैदेही - हम सब.. थानेदार जी से मिलने आए हैं...

कांस्टेबल - थानेदार जी... दो तीन गाँव वालों से.. अपने कमरे में पूछताछ कर रहे हैं...

वैदेही - हम इसी सिलसिले में.. थानेदार जी से बात करना चाहते हैं...

कांस्टेबल - ठीक है... पहले उनकी पूछताछ तो पुरी हो जाने दो...

तभी अंदर से इंस्पेक्टर दास की आवाज़ सुनाई देती है - कौन है... प्रभात... क्या शोर शराबा है...

प्रभात - कुछ औरतें आई हैं... लगता है... इन गाँव वालों की बीवियां हैं...

यह सुन कर अपने कमरे से बाहर निकलता है इंस्पेक्टर दास l दास बाहर आकर वैदेही को देख कर चौंकता है पर फिर संभल भी जाता है l

दास - आप...

वैदेही - जी... मैं... वैदेही महापात्र...

दास - जी कहिये... मैं क्या सेवा कर सकता हूँ...

वैदेही - आज सुबह आपकी चौकी से कुछ पुलिस वाले... होलिका दहन जगह को घेर कर वहाँ की राख ज़ब्त कर किया... फिर उसके बाद कुछ लोगों को उठा कर थाने ले आई है...

दास - गलत... गलत कह रही हैं आप... उठा कर नहीं... बा इज़्ज़त... बुला कर थाने लाई है...

वैदेही - पर क्यूँ... क्या जुर्म किया है... इन लोगों ने...

दास कुछ कहने के बजाय एक फीकी हँसी हँसता है l फिर एक गहरी साँस लेता है और वैदेही की ओर देख कर कहता है

दास - मर्डर... हत्या किया है इन लोगों ने...

"क्या" ना सिर्फ वैदेही बल्कि सारे औरतों के गले से एक साथ यही निकलता है l

वैदेही - हत्या... यह... यह क्या कह रहे हैं... किस की... किस की हत्या...

दास - राजगड़ के इस आदर्श थाने के पूर्व प्रभारी... माननीय श्री अनिकेत रोणा जी की...

वैदेही - क्या... यह क्या कह रहे हैं... रोणा का हत्या हुआ है... मेरा मतलब... इंस्पेक्टर रोणा का हत्या... यह.. यह किस आधार पर कह रहे हैं... और होलिका दहन से इसका क्या वास्ता...

दास - वास्ता है... देवी जी... वास्ता है... होलिका दहन में जिस पुतले को जलाया गया था... दर असल... वह कोई पुतला नहीं था.... वह इंस्पेक्टर रोणा थे...

सभी औरतें - नहीं... यह झूठ है...

वैदेही - इंस्पेक्टर साहब... आप जो कह रहे हैं... इस बात का कोई सबूत है...

दास - ना... फ़िलहाल तो नहीं... इसलिए तो... इन गाँव वालों से... बड़े प्यार से पूछताछ कर रहे हैं... वर्ना... तुड़ाई कर पूछ सकते थे...

वैदेही - इंस्पेक्टर साहब... पूछताछ के लिए... शक का भी आधार होना चाहिए... इतना कानून तो हम जानते हैं...

दास - आधार है ना... अभी इन लोगों को गिरफ्तार नहीं किया है देवी जी... बस पूछताछ कर रहा हूँ...

वैदेही - इंस्पेक्टर साहब... क्या आप पूरी बात बतायेंगे... (दास थोड़ी नजर टेढ़ी कर वैदेही को देखता है) वर्ना... मुझे अपने भाई को बुलानी पड़ेगी... वह वकील है...

दास - जानता हूँ... बहुत ही अच्छी तरह से जानता हूँ... विश्व प्रताप महापात्र... हाल ही में... उन्हें बार काउंसिल की लाइसेंस मिली है... पेपर में उनकी तस्वीर देखा है मैंने... गाँव में अब तक हुए उनके कारनामों से भी... वाकिफ हूँ... पर उन्हें बुलाने की कोई जरूरत नहीं है... मैं आपको सबकुछ बताये देता हूँ... बात दरअसल यह है देवी जी... के आज से दो दिन पहले... पूर्णिमा के रात को होलिका दहन हुआ... उसके अगले दिन होली भी खेली गई... कल रात को... एक पियक्कड़... वह... वह... क्या नाम है प्रभात उसका...

प्रभात - जी वह... सत्तू...

दास - हाँ... सत्तू... सत्तू... दारु के नशे में... कनाल के पास... मेरे एक कांस्टेबल से टकरा गया था... और नशे में धुत सत्तू... कांस्टेबल को धमकी दे रहा था... की जैसे गाँव वालों ने रोणा को होलिका बना कर जला दिया... वैसे ही कांस्टेबल को जला डालेगा... (यह सुनते ही वैदेही की आँखे हैरानी से फैल जाती है) इसलिए उसे हमने अपने हिरासत में ले कर पूछताछ की... नशा उतरते ही... वह अपनी बात से मुकर गया... पर क्या करें... मैं तो सरकारी काम से राजगड़ आया था... वह भी इंस्पेक्टर रोणा की खोज खबर लेने...

वैदेही - जितना मुझे पता है... कानून किसी नशेड़ी की बात की गवाही को नहीं मानता...

दास - इसीलिए तो... सत्तू पर कोई कारवाई नहीं कर पाया... पर तहकीकात तो करनी पड़ेगी... आख़िर इंस्पेक्टर रोणा... इतने दिनों से लापता जो हैं... इसीलिये पूछताछ के लिए ही इन्हें उठाया है...

वैदेही - वैसे ही आप किसी को उठा कर ले नहीं जा सकते... इस पर आपके खिलाफ भी शिकायत की जा सकती है...

दास - हाँ की तो जा सकती है... पर होगा कुछ भी नहीं... क्यूंकि... मेरे पास इनके खिलाफ... तहकीकात की पुख्ता वज़ह है...

वैदेही - क्या वज़ह है...

दास - प्रभात...

प्रभात - जी... सर..

दास - अंदर जो बंदर हैं... जिनके कान अभी हमने मरोड़ा है... उन्हें बाहर लेके आओ...

प्रभात - जी सर...

प्रभात अंदर दास के कमरे में जाता है और हरिया, सामदु जीवन आदि लोगों को बाहर लाता है l उनके बाहर आते ही दास वैदेही से कहता है

दास - देवी जी... हमारे हाथ एक वीडियो लगा है... जिसमें... (हरिया, सामदु और जीवन की ओर हाथ दिखा कर) यह लोग... इंस्पेक्टर रोणा जी को गाली देते हुए... होलिका मंच में आग लगा रहे हैं... प्रभात वह वीडियो चलाओ...

प्रभात एक पेन ड्राईव लेता है और थाने की दीवार पर लगे एक टीवी में लगा देता है l फिर टीवी का रिमोट लेकर दास के हाथ में दे देता है l दास मीडिया फाइल में जा कर वह वीडियो चलाता है l वैदेही के साथ साथ थाने में मौजूद सभी लोग वह वीडियो देखने लगते हैं l उस विडिओ में साफ दिख रहा था l सत्तू हरिया और उसके अगल बगल के लोगों को शराब पीने के लिए बोतल दे रहा है l शराब पी लेने के बाद हरिया और दुसरे लोग उद्दंडता से नाच रहे हैं और होलिका के पुतले को देखते हुए रोणा को गाली बक रहे हैं और फिर नाचते हुए मंच के पास जमा किए हुए लकड़ियों में आग लगा रहे हैं l वीडियो के खत्म होते ही वैदेही दास से सवाल करती है

वैदेही - इससे कुछ भी साबित नहीं हो रहा है... इसे आधार बना कर... आप कैसे इन लोगों को पूछताछ के लिए उठा सकते हैं...

दास - हाँ... इससे साबित कुछ भी नहीं हो रहा है... पर... आज सुबह ही हमने दहन वाली जगह को अपने कब्जे में ले लिया है... वहाँ की राख को... कलेक्ट कर... फॉरेंसिक टेस्ट के लिए भेजने वाले हैं... अगर... रिपोर्ट में... वह पुष्टि हुई... जिसकी मुझे अंदेशा है... तो यकीन मानिये देवी जी... इन सबकी खैर नहीं... (पूछताछ के लिए बुलाए गए सभी मर्दों से) अभी तुम सब जा सकते हो... शुक्र करो... आज इन्हीं के कारण... इनको और इनकी बातों को इज़्ज़त देते हुए... तुम लोगों को जाने दे रहा हूँ... वर्ना... तुम लोगों के खिलाफ... अपनी संदेह के चलते... न्यायिक हिरासत में भेज सकता था...

×_____×_____×_____×_____×_____×_____×

क्षेत्रपाल महल

बैठक घर में अपनी सिंहासन नुमा कुर्सी पर भैरव सिंह बैठा हुआ है l वह अपनी आँखे बंद कर किन्हीं ख़यालों में शायद खोया हुआ है l उस कमरे में एक कोने में भीमा शनिया भूरा आदि खड़े हुए हैं l तभी एक नौकर कमरे आकर सिर झुका कर खड़ा होता है l

नौकर - हुकुम...

भैरव सिंह - (वैसे ही आँखे मूँदे हुए) ह्म्म्म्म...

नौकर - वकील साहब... आना चाहते हैं...

भैरव सिंह - (वैसे ही आँखे मूँदे) बुलाओ उसे...

नौकर उल्टे पाँव भागते हुए बाहर चला जाता है और थोड़ी ही देर बाद कमरे में बल्लभ अंदर आता है l बल्लभ देखता है भैरव सिंह अपनी आँखे मूँदे शायद किसी गहरी सोच में खोया हुआ है l वह चुपचाप खड़े रहता है l

भैरव सिंह - (वैसे ही) वकील... जो कहने आए हो... उसे कहो...

बल्लभ - वह... आज सुबह पुलिस होलिका दहन वाली जगह को अपने कब्जे में ले लिया है... और गाँव से कुछ लोगों को उठा कर थाने ले गई थी...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... और...

बल्लभ - गाँव वालों के लिए... वैदेही गई थी... पुलिस वालों से बात करने... और पुलिस वालों ने भी... वैदेही की बात रखते हुए... सबको गाँव ना छोड़ने की वार्निंग देकर छोड दिया है....

भैरव सिंह - (अपनी आँखे खोलता है) क्यूँ... तुमने सबूत तो बराबर पहुँचाया था ना...

बल्लभ - जी... पहुँचाया था... और जहां तक खबर है... पुलिस थाने में... वह वीडियो दिखाया भी गया है... पर पुलिस ने कोई गिरफ्तारी नहीं की है... (चेहरे बिना किसी भाव लिए बल्लभ की ओर देख रहा था भैरव सिंह) होलिका दहन की राख को ज़ब्त कर फॉरेंसिक टेस्ट के लिए भेज दिया गया है.... जब तक रिपोर्ट नहीं आती... तब तक कोई गिरफ्तारी नहीं होगी.... ऐसा दाशरथी दास कह रहा था...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म...

इसके आगे बल्लभ और कुछ नहीं कहता है l कमरे में थोड़ी देर के लिए सन्नाटा पसर जाता है l भैरव सिंह बल्लभ की ओर देखता है l बल्लभ जैसे कुछ पूछना चाह रहा था l

भैरव सिंह - एकांत... (सब कमरे से जाने लगते हैं) वकील तुम नहीं... (बल्लभ रुक जाता है, सबके जाने के बाद) वकील... तुम्हारे मन में बहुत से सवाल हैं... पूछो... जो पूछना चाहते हो...

बल्लभ - राजा साहब... मैं बहुत ही असमंजस हो गया हूँ...

भैरव सिंह - वज़ह...

बल्लभ - आप मेरी किसी भी बात को अन्यथा ना लें... (भैरव सिंह खामोश रहता है) आप ने अतीत में जब भी... अपने दुश्मनों को सजा दी है... तो उन्हें भूगोल से गायब कर दिया है... के कोई... किसी भी प्रकार का निशान ढूँढ ही ना पाए... इसलिए ज्यादातर शत्रुओं को... इस प्रांत में.. आप आखेट गृह में... लकड़बग्घों से और.. मगरमच्छों से मरवा देते थे... ना मांस... ना हड्डी... कुछ भी मिलने की संभावना नहीं रहती थी... पर... आज... होलिका की राख को... दाशरथी दास ने... सीज कर फॉरेंसिक टेस्ट के लिए भेज दिया है... इससे सबूत पैदा होने की खतरा पैदा हो रहा है.... रोणा जो भी था... जैसा भी था... पर ग़द्दार नहीं था... उसे गलती हुई भी थी तो अनजाने में हुई थी.... जिस तरह की सजा दी... (एक पॉज) आपने मुझे सोचने के लिए रखा है... यह आप उदय की बातों में आकर मुझे किनारा कर दिया... ऐसा क्यूँ...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... बात तो तुमने पते की कि है... (अपनी कुर्सी से उठ कर) चलो तुमसे कुछ बातेँ किया जाए... पहली बात... इतना याद रखो... रोणा को उसकी गद्दारी के लिए नहीं... हरामि पन की सजा मिली है... जो उसने हमारे साथ जानबूझकर की थी... (बल्लभ की आँखे हैरानी के मारे फैल जाती हैं) हाँ वकील... उसने हमारे साथ हरामि पन किया था... राजकुमारी के बारे में... वह हमसे हरदम झूठ ही बोल रहा था... जो हमारी ट्रैक से हट कर अपने ट्रैक पर चलने लग जाये... वह हमारे किसी काम का नहीं है... समझे... (बल्लभ का सिर झुक जाता है) हमें शक ही नहीं यकीन है... राजकुमारी और वह हराम का जना विश्व के बीच कुछ ना कुछ है... पर हम वह जहर पिए हुए खामोश हैं... क्यूँकी... जो तुम्हें नहीं दिख रहा है... वह हमें साफ दिख रहा है... हमारी पकड़... स्टेट की पालिटिक्स से ढीली पड़ रहा है... इसलिए... हमें अब दसपल्ला राज घराने के रिश्ते की ढाल चाहिए... और इसीलिए... राजकुमारी अभीतक जिवित हैं... (एक पॉज) जब दाशरथी ड्यूटी लेने आया था... तब उसने अपने तरीके से... हमारा वफादार बनने का दावा कर रहा था... तो समझ लो... यह केस उसकी आजमाइश है... अगर पानी उल्टी दिशा में बहने लगेगी... तो हम भी वही करेंगे... जो आज तक करते हुए आए हैं...

बल्लभ - जी...

भैरव सिंह - हमारी ताकत... अभी भी वही है वकील... हमारा युवराज... तुम अच्छे तरह से जानते हो... ज्यादातर पॉलिटिशियन और ब्यूरोक्रेट्स के... काले कर्मों की चिट्ठा हैं हमारे पास... इसलिए... हम फिलहाल... इंस्पेक्टर दास को आजमा रहे हैं... क्यूँकी उसे राजगड़ आने के लिए... नरोत्तम पत्री ने मनाया था... याद है ना पत्री...

बल्लभ - जी राजासाहब... राधेश्याम पत्री का बेटा... वही राधेश्याम पत्री... जिसे आपने उसीके ऑफिस के पियोन के हाथों... उसके जुते से पिटवाया था...

भैरव सिंह - हाँ... हमारे नव रत्नों में एक रत्न कम है... हमारे सिपाह सालार में से एक कम है... यह दास उसमें फिट बैठेगा या नहीं... यही देखना चाह रहे थे...

बल्लभ - जी अब पुरी तरह से समझ गया... पर फिर भी... यह आजमाइश... खतरनाक हो सकता है....

भैरव सिंह - इसी दिन के लिए तो तुम्हें पाला है वकील... हमारे हर जायज नाजायज़ काम को... लीगल बनाओगे... (कुछ देरी की खामोशी) और कोई सवाल...

बल्लभ - ना तो इतनी हैसियत रखते हैं... ना ही इतनी औकात पालते हैं... के आपसे हम कोई सवाल करें...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... इसी बात पर हमेशा कायम रहो...

बल्लभ - जी राजा साहब... और एक बात... अगर आपकी इजाजत हो तो...

भैरव सिंह - हाँ पूछ लो...

बल्लभ - जब आया था... तब आप किसी गहरी सोच में खोए हुए थे...

भैरव सिंह - (अपनी कुर्सी पर वापस बैठ कर बड़े रौब से दाहिने पैर को मोड़ पर बाएँ पैर पर रखते हुए) हमारे सारे आदमी नाकाम और नाकारे साबित हो चुके हैं... हम चिंतित इसलिए थे... के क्या विश्व को मिटाने के लिए... हमें हमारी अहं से नीचे उतरना पड़ेगा... (यह सुन कर बल्लभ का मुहँ खुला का खुला रह जाता है) हाँ वकील... तुम्हें शायद मालुम हो... हमने रोणा को जिम्मा दिया था... विश्व को खत्म करने के लिए... पर वह अपने हरामि पन के चलते... अपने काम को अंजाम नहीं दीआ... गाँव जो भी हमारे पट्ठे हैं... विश्व के सामने मिट्टी के पुतले हैं... इसलिए क्या हमें विश्व के लिए.. अपनी अहं की सीढियों से नीचे उतरना पड़ेगा... या कोई दुसरा इंतजाम करना पड़ेगा... और... (बल्लभ अपनी भौहें सिकुड़ लेता है) और वह उदय... दो दिनों से गायब है... यह एक्सीडेंटंल है... या इंटेंशनल है... अगर एक्सीडेंटंल है... तो क्या वह श्रीधर परीड़ा की तरह गायब हो गया है... या फिर अगर इंटेंशनल है... तो उसकी हिम्मत के पीछे कौन है...

बल्लभ - हो सकता है... दोनों वजहों के लिए विश्व हो...

भैरव सिंह - हो सकता है... अगर विश्व ही है... तो... (एक पॉज) तो वह अपनी औकात से उपर की सीढ़ी तक चढ़ गया है...

अब कमरे में दोनों ही खामोश थे l कमरे में मरघट सी खामोशी बन गई थी l इतने में कमरे में एक घंटी बजती है l दोनों का ध्यान टूटता है l भैरव सिंह घंटी का ज़वाब घंटी बजाकर देता है l भीमा दौड़ कर आता है और सिर झुका कर खड़ा हो जाता है l

भैरव सिंह - क्या बात है भीमा...

भीमा - हुकुम... आपके सामने... बैंक मैनेजर और पोस्ट ऑफिस के मास्टर पेश होना चाहते हैं...

भैरव सिंह अपनी भौहें सिकुड़ कर अपनी आँखे बंद कर लेता है फिर कुछ देर बाद एक गहरी साँस छोड़ते हुए अपना सिर हाँ में हिलाता है और कहता है

भैरव सिंह - जाओ... बुलाकर लाओ....

उल्टे पाँव पीछे लौटते हुए भीमा बाहर चला जाता है फिर दोनों ऑफिसरों को साथ लेकर वापस आता है l तीनों भैरव सिंह के आगे सिर झुकाए खड़े हो जाते हैं l

भैरव सिंह - क्या बात है... तुम दोनों घबराए हुए से लग रहे हो...

बैंक मैनेजर - (बड़ी मुश्किल से आवाज निकलती है) वह रा.. राजा साहब... पहली बार ऐसा हो रहा है... के... (चुप हो जाता है)

भैरव सिंह - बेफिक्र हो कर कहो...

बैंक मैनेजर - वह सिस्टम से... बीस लोगों के नाम कट गया है... इसलिए सिस्टम जनरेटेड़ मैसेज्स और हार्ड कॉपी लेटर्स... सीधे हेडक्वार्टर से उन्हें इस महीने मिला है...

बल्लभ - हेडक्वार्टर से... यह... यह कैसे हो सकता है... (पोस्ट मास्टर से) क्या उन्हें चिट्ठी डेलिवर हो गया है...

पोस्ट मास्टर - (डरते हुए) जी... जी... प्रधान बाबु... हमें तो अंदाजा ही नहीं था... जब बीएम साहब ने... हमें डेलिवरी चेक करने के लिए कहा... तो पाया कल ही उन्हें... वह बैंक के लेटर डेलिवर हो चुके हैं...

भैरव सिंह का चेहरा सख्त हो जाता है l उसके चेहरे पर यह परिवर्तन देख कर बैंक मैनेजर और पोस्ट मास्टर की फटने लगती है l

बल्लभ - (बैंक मैनेजर से) तुम्हें कैसे और कब मालुम हुआ...

बैंक मैनेजर - आज ही... जब हम वेरिफिकेशन कर रहे थे... तो लिस्ट में बीस लोगों का नाम में सिस्टम में पहले से ही डेलिवर्ड दिखा रहा था... इंक्वायरी की तो पता चला... रीसेंटली वही बीस लोग... केवाईसी फाइल किया था... जिसमें नया मोबाइल नंबर और नया एड्रेस डाला गया था...

बल्लभ - व्हाट...

इतने में भीमा फिर अंदर आता है l सभी का ध्यान भीमा की तरफ जाता है l भैरव सिंह उसकी ओर सवालिया नजर से देखता है l

भीमा - हुकुम... रजिस्ट्रार ऑफिस से... रजिस्ट्रार साहब आए हैं....

×_____×_____×_____×_____×_____×_____×

विश्व और टीलु मजे में खाना खाए जा रहे थे l वैदेही का चेहरा सख्त था l जबड़े भींचे हुए थे और दोनों को घूरे जा रही थी l विश्व को एहसास होता है कि उसकी दीदी उसे किसी वज़ह से घूरे जा रही है l इसलिए अपना खाना रोक कर विश्व सवालिया नजर से नजर उठा कर देखता है l

विश्व - क्या बात है दीदी...

वैदेही - (कोई जवाब नहीं देती)

विश्व - दीदी मैं जानता हूँ... तुम किसी ख़यालों मैं न खोई हुई नहीं हो... तुम्हारी नजरों से ऐसा लग रहा है... जैसे किसी बात पर... तुम मुझे दोषी मान रही हो...

वैदेही - कुछ बातेँ हैं... जो आज कल तु मुझसे छुपा रहा है...

विश्व - जैसे कि....

वैदेही - आज सुबह सुबह क्या हुआ... जानता तो होगा ना... पुलिस आई थी... होलिका दहन वाली जगह... सील करी... सारे राख कब्जे में ले कर... फॉरेंसिक टेस्ट के लिए भेजा है...

विश्व - हाँ... खबर है... और...

वैदेही - पुलिस ने... ज्यादातर लोगों को पूछताछ के लिए... थाने उठा ले गई थी...

विश्व - हूँ... और...

वैदेही गुस्से में विश्व को घूरने लगती है l विश्व के चेहरे पर कोई शिकन तक नजर नहीं आ रहा था l

वैदेही - क्या इन सबके पीछे तेरा हाथ है...

विश्व - नहीं... मेरा कोई हाथ नहीं है...

वैदेही - झूठ मत बोल... तेरी उस रोणा से दुश्मनी में... गाँव वाले पीस जाएंगे...

विश्व - यह... गाँव वालों की करनी है...

वैदेही - मत भूल... तुने मासी से वादा किया था... कोई खुन खराबा नहीं करेगा...

विश्व अपना खाना रोक कर उठता है और हाथ धोने लगता है l टीलु अपना खाना रोक कर दोनों को देखने लगता है l विश्व वैदेही के सामने आता है और पूछता है

विश्व - दीदी... जो मन में है... वह साफ साफ कहो...

वैदेही - पुलिस को शक है कि... वह राख... इंस्पेक्टर रोणा की है... बेशक भैरव सिंह ने वह दहन वाली जगह बना कर त्योहार मनाने के लिए कहा था... पर मेरा मन कह रहा है... कहीं ना कहीं... इसमें तेरा भी हाथ है... मुझे पूरी सच्चाई जाननी है...

विश्व - दीदी... रोणा को... उसकी किए कि सजा मिली है... जिसकी हलाली किया करता था... उसी से हरामी पन भी करने लगा था... मैंने... बस उसे भैरव सिंह के हवाले कर दिया...

वैदेही - रोणा था ही बड़ा कमीना... पर ऐसा क्या कमीना पन दिखाया के तुने... उसे भैरव सिंह के हाथों मरवा दिया...

विश्व - मेरी ऐसी कोई मंशा नहीं थी दीदी... मैंने उसे... चेतावनी भी दी थी... वह अगर अपना दायरा लांघेगा... मैं उसे उसकी मौत से मिलन करवा दूँगा... वह अपना दायरा लाँघता गया... और मैंने उसे... उसकी अंजाम तक पहुँचने की... मदत बस की...

वैदेही - कितना बदल गया है तु... यह कैसी भाषा बोलने लगा है... तु उसे कानूनन सजा दिलवा सकता था...

विश्व - वह उसकी हकदार नहीं था... श्रीनु.. भूल गई... कैसे उस मासूम बच्चे को... मगरमच्छ के मुहँ में फेंक दिया था... सच मानो दीदी... उसके लिए मैंने भी... वही मौत सोचा था... पर पता नहीं क्या हुआ... उदय ने क्या कहा... भैरव सिंह ने उसे होलिका की मौत दी... जब उसे मौत मिली भी... तो मुझे कोई अफ़सोस नहीं हुआ...

वैदेही - एक बात बता... उसने ऐसा क्या किया था... जो तुने उसके लिए मौत चुनी...

विश्व वैदेही से रुप के साथ किए गए रोणा की हर एक करतूत को बताने लगा l सारी बातेँ सुन कर वैदेही एक गहरी साँस छोड़ती है l

वैदेही - पर उसकी मौत भी... गाँव वालों पर आफत लेकर आई है... हत्या के जुर्म में फंसने वाले हैं...

विश्व - अगर गाँव वाले फंसेंगे... तो भैरव सिंह भी फंसेगा... अगर भैरव सिंह बचेगा... तो गाँव वाले भी बच जायेंगे...

वैदेही - ऐसा तु किस आधार पर कह रहा है...

विश्व - कुछ बातेँ... वक़्त पर छोड़ दो... दीदी... (विश्व देखता है, वैदेही कुछ परेशान भी लग रही है) क्या बात है दीदी... मेरे सारी बातेँ कहने के बावज़ूद.... तुम अभी भी... परेशान लग रही हो...

वैदेही कुछ कहती नहीं है, बस कुछ काग़ज़ निकाल कर विश्व की ओर बढ़ा देती है l विश्व उन कागजातों को गौर से देखता है l कागजात देखने के बाद विश्व के चेहरे पर एक रौनक सी आ जाती है l विश्व के चेहरे पर आए बदलाव वैदेही की नजरों से छुप नहीं पाती l

वैदेही - ऐसा क्या दिखा... जो तु इतना खुश हो गया...

विश्व - दीदी... जानती हो यह क्या है... यह भैरव सिंह की बर्बादी का... फरमान है...

वैदेही - यह हरिया, सामदु... सब लोगों का... बैंक से लोन रिलेशन लेटर है... समय पर इंट्रेस्ट चुकाने पर... धन्यबाद पत्र है...

विश्व - हाँ...

वैदेही - पर... हरिया ने कभी कोई लोन लिया ही नहीं है... उसका कोई खेती वाली जमीन भी नहीं है... ऊपर से घर... जमीन तो जमीन घर भी मोडगेज है.. उस लोन पर भी ब्याज दे रहा है...

तब तक टीलु खाना खत्म कर आ चुका था l वह बीच में ही बोल पड़ता है

टीलु - दीदी... दीदी... इसके आगे की कहानी मैं बताता हूँ...

टीलु एक एक कर के कैसे क्षेत्रपाल परिवार गाँव वालों के जमीनों पर कब्जा किए हुए हैं और राजगड़ मल्टीपर्पोज कोऑपरेटिव सोसाईटी के नाम पर लोन उठा कर गाँव वालों के घरों को मड़गेज करवा दिया सब बताता है l वैदेही सब सुन कर हैरान रह जाती है l

वैदेही - इतना तो जानती थी... क्षेत्रपाल कमिने होते हैं... पर इतने नीच और लीचड़ भी होते हैं... पर लोन तो बहुत दिनों पहले उठाया गया होगा... तो अब कैसे कुछ हो लोगों को बैंक से रिलेशन लेटर आया...

टीलु - दीदी... इसके पीछे भाई का दिमाग और हम सबके हरकत है... हमने उस आदमी को टार्गेट किया... जो किसी ना किसी वज़ह से... या तो आपसे... या फिर भाई से बातचीत करता हो... ऐसे लोगों को... हम शर्त वाली कोई भी गेम हार जाते थे... और हार के बदले उन्हें... एक मोबाइल फोन सिम के साथ दे देते थे... बदले में... उनसे.. बैंक के केवाईसी फॉर्म भरवा लेते थे... जैसे ही.. हेड ऑफिस में डिपॉजिट हुआ... इनके एड्रेस पर इन लोगों को... बैंक के लोन रिलेशन लेटर मिल गया... ताकि यह लोग जानें... इनके साथ क्या क्या होता रहा है और... हो रहा है अब तक...

विश्व - हाँ दीदी... चूंकि लक्ष्मी दीदी... तुमसे बातेँ करती रहती हैं... तुम ही सभी औरतों को... इस हकीकत के बारे में बता सकती हो...

वैदेही - तुझे क्या लगता है... इससे गाँव वालों के अंदर का विद्रोह जागेगा...

विश्व - दीदी... एक तुम ही तो हो... जो इन गाँव वालों को... मुझसे ज्यादा समझती हो.. इसीलिए शायद... तुम्हारी आवाज इनके दिलों पर विद्रोह की ज्वाला भड़का सके...

वैदेही चुप रहती है l विश्व देखता है दुकान के बाहर धीरे धीरे गाँव के औरतों का ताँता लगने लगता है l विश्व उन्हें हैरानी के साथ देखता है l उन औरतों के साथ कुछ मर्द भी आए थे l

वैदेही - मैंने ही इन लोगों को बुलाया था... क्यूँकी तु इसी वक़्त यहाँ आता रहता है... इसीलिये तु इन्हें बैंक लोन रिलेशन बाबत कोई कानूनी सलाह दे सके...

विश्व - ओ... समझ गया... पर बेहतर होगा... जो बातेँ हमने तुम्हें बताया है... वह सारी बातेँ... अपने तरीके से... तुम इन लोगों तक पहुँचाओ...

वैदेही - विशु... यह मुझसे नहीं होगा...

विश्व - यह... तुमसे ही होगा... दीदी... यह लड़ाई तुम्हारी या मेरी नहीं है... यह हमारी है... पर हम में कौन कौन हैं... तुम मैं... अब इन गाँव वालों को भी शामिल होना होगा...

वैदेही - पर यह सब साबित करने के लिए... मेरे पास कोई सबूत नहीं है..

टीलु - यह लो दीदी...

टीलु एक थैले से बहुत से काग़ज़ों के बंडल निकाल कर वैदेही के हाथों में देता है l वैदेही उसे सवालिया नजर से देखती है l

विश्व - यह एकुंबरेंश सर्टिफिकेट है... जिससे यह साबित होता है कि... पीढ़ी दर पीढ़ी... जिस जमीन पर... अपने खून को पसीना बना कर बहा कर... जमीन से अनाज उपजा रहे हैं... वह जमीन राजा की नहीं... इनकी खुद की है... जाओ दीदी... आज गाँव की मिट्टी से हमारा रिश्ता न सिर्फ बचाना है... बल्कि साबित भी करना है...

बड़े मनाने के बाद वैदेही अपनी दुकान के बाहर जाती है l वह पीछे मुड़ कर देखती है विश्व और टीलु के आंखो में और भाव में विश्वास छलक रही है l वह अपने मन को दृढ़ कर लक्ष्मी की ओर देखती है l

लक्ष्मी - कुछ पता चला...

वैदेही - हाँ... बैंक ने जो... संबंध पत्र दिया है... वह सब सच है...

लक्ष्मी - पर हमने बैंक से कोई उधार नहीं लिया है... और वह जमीन... वह जमीन तो... राजा साहब की है...

सारे गाँव वाले लक्ष्मी की बातों का समर्थन करते हैं l थोड़ी खुसुर-पुसुर भी करने लगते हैं l लक्ष्मी चिल्ला कर सबको शांत करती है l सब चुप हो जाते हैं l

लक्ष्मी - दीदी... आप जो कह रहे हो... हम उस पर कैसे यकीन करें...

वैदेही - (चलते हुए भीड़ के बीच आती है) एक बात बताओ... तुम लोग जिस जमीन पर... मेहनत कर... अनाज उपजाते हो... वह क्यूँ करते हो...

एक मर्द - यह तो... हम पीढ़ी दर पीढ़ी करते आ रहे हैं... राजा साहब की जमीन जोत कर साल में कुछ बोरी फसल रखते हैं... बाकी राजा साहब ले लेते हैं...

वैदेही - क्यूँ...

मर्द - क्यूँ क्या... इसे भाग चाष कहते हैं... अपनी मेहनत के बदले... थोड़ा अनाज ले लेते हैं... बाकी राजा साहब को दे देते हैं...

वैदेही - जब कि जमीन तुम्हारी है... तुम्हारे ही जमीन को तुमसे अपना बता कर... पीढ़ी दर पीढ़ी... तुम लोगों से मेहनत करवा कर.. तुम्हीं लोगों का हक़ को अपनी तिजोरी में भर रहा है... जब ज़रूरत पड़ती है... तुम्हीं लोगों की जमीन को गिरवी रख कर... राजा लोन ले लेता है... उस लोन की सूद को... तुम्हीं लोगों से भरवाता है... सरकारी कामों को... खेत से जोड़ कर... मनरेगा पैसों को... पहले तुम लोगों के अकाउंट में डलवा कर... इसीएस के जरिए... तुम लोगों के अकाउंट से अपनी लोन की सूद भरवाता है... यह कई दशकों से चल रहा है... तुम लोग पीढ़ी दर पीढ़ी... उसकी किए को भरते जा रहे हो... उसी तरह... जब हस्पताल नहीं बना... तो तुम लोगों को अच्छी जिंदगी का सपना दिखा कर... राजगड़ मल्टीपर्पोज कोआपरेटिव सोसाइटी के लिए लोन उठा कर... तुम्हीं लोगों के घरों को... तुम लोगों के हाथों गिरवी रखवा दिया... तुम लोग आज भी... उसीके पैसों की सूद भरे जा रहे हो...

दुसरा मर्द - यह झूठ बोल रही है... राजा साहब के खिलाफ हमें भड़का रही है... राजा साहब के पास... क्या पैसों की कमी है... जो ऐसे छोटे काम करेंगे...

हरिया - हाँ सच कहा तुमने... क्या सबूत है आखिर...

लक्ष्मी - हाँ दीदी... क्या सबूत है...

वैदेही - पहला सबूत... बैंक ने तुम्हें... लोन रिलेशन लेटर दी है... दुसरा सबूत... यह रहा... (उसके हाथों में, कुछ लोगों के एकुंबरेंश सर्टिफिकेट था दिखा कर एक एक को देती है) इतने पढ़े लिखे तो हो ही तुम लोग... अगर नहीं पढ़ पा रहे हो... तो अपने बच्चों से पढ़वा कर देखो...

सभी लोग अपने अपने नाम की एकुंबरेंश सर्टिफिकेट देखने लगते हैं l कुछ देर के लिए सबके बीच सन्नाटा छा जाती है l

वैदेही - उम्र तजुर्बा देती है... पर साथ साथ व्यवहारिक ज्ञान भी होना चाहिए... आज का दिन और पुरी रात... तुम लोगों के पास है... पीढ़ी दर पीढ़ी... जो अन्याय होता रहा है... उसे तुम लोग अपनी अगली पीढ़ी को दोगे या... राजा से जवाब मांगोगे... (लोग कोई जवाब नहीं देते, वैदेही वापस लौटने लगती है)

लक्ष्मी - दीदी.... (वैदेही रुक जाती है) किसकी इतनी हिम्मत है जो राजा साहब से जवाब मांगे...

वैदेही - (मूड कर) पहले... क्षेत्रपाल महल की चौखट तक पहुँचने की हिम्मत कर सको तो करो... पूछने का काम मैं करूंगी...

हरिया - (एक थप्पड़ लक्ष्मी को मारता है) बस बहुत हो गया... (गाँव वालों से) ऐ.. चलो रे सब अपने अपने घर....

वैदेही - हाँ हाँ जाओ... जाओ अपने घर... सोचो रात भर... और तय करो... कल का सूरज... तुम्हारे पुरुषार्थ लेकर उगेगा... या तुम लोगों की कायरता का अंधकार को लेकर... जाओ..

वैदेही की आवाज़ धीमी होती जा रही थी, सभी मर्द अपने अपने औरतों को लेकर वहां से चले जा रहे थे l

×_____×_____×_____×_____×_____×_____×

अगली सुबह

भैरव सिंह अस्तव्यस्त सा अपने बैठक में बैठा हुआ था l उसके आसपास भीमा और कुछ गुर्गे अपनी जगह खड़े भैरव सिंह को देख रहे थे l ऐसा पहली बार हो रहा था कि भैरव सिंह परेशान सा दिख रहा था l असल में उसे इस वक़्त बल्लभ का इंतजार था l क्यूंकि पिछले कुछ दिनों में जो भी कुछ हो रहा है वह सब उसके नियंत्रण के बाहर थी l यह सरासर उसके रसूख के खिलाफत थी l एक साथ बैंक वाले, रजिस्ट्रार ऑफिस वाले, पोस्ट ऑफिस वाले आकर जो भी खबर करी थी वह एक बड़े षडयंत्र की ओर इशारा कर रहे थे l सबसे ज्यादा हैरानी और परेशानी उसे यह थी के उसके फैलाये हुए खबरियों ने इस बारे में उसे कोई जानकारी दी नहीं थी l इसलिए बीते कल से उसने बल्लभ से सारी बातों का सच्चाइ ढूँढ निकालने के लिए कहा था l उसे एहसास हो रहा है, कोई ना कोई रण भूमि तैयार हो रहा है l खीज मन में बस यह थी के विश्व को आंकने में उससे बड़ी गलती हो गई थी l विश्व को सजा होने के बाद बीच चौराहे पर वैदेही को जिस तरह से बेइज्जत किया था और वैदेही का उसे दिया हुआ श्राप एक एक कर सच हो रहा था l यह बात उसे याद आते ही उसका मन बेचैन हो रहा था l तभी सत्तू भागते हुए कमरे में आकर सिर झुका कर खड़ा हो जाता है l सब की नजरें उस पर टिक जाती हैं l

भैरव सिंह - क्या वकील आ गया...

सत्तू - जी नहीं हुकुम... वकील बाबु तो नहीं आए पर...

भैरव सिंह - पर... पर क्या...

सत्तू - कुछ गाँव वाले आए हैं... शायद बीस या पच्चीस...

भैरव सिंह - (जबड़े सख्त हो जाती हैं) कौन.. कौन..

सत्तू - जी... लगभग वही लोग हैं... जिनकी लिस्ट कल पोस्ट मास्टर जी ने दी थी...

भैरव सिंह की भौहें तन जाते हैं l मुट्ठीयाँ भींच जाती हैं l चेहरा सख्त और गुस्से से दहकने लगता है l

भैरव सिंह - इन कीड़े मैकॉड़ो में इतनी हिम्मत आ गई... क्षेत्रपाल महल तक पहुँच गए...

सत्तू - यह लोग पहुँचे नहीं है हुकुम... लाए गए हैं...

भीमा - सत्तू... यह क्या बकवास कर रहा है... बात को घुमा फिरा रहा है... जो भी बोलना है सीधे सीधे बोल...

सत्तू - वह... बात दरअसल यह है कि... मुझे लगता है...

बोलते बोलते सत्तू रुक जाता है क्यूंकि, भैरव सिंह के दाँतों से कड़ कड़ की आवाज़ उस सन्नाटे को चीरती हुई सत्तू के कानों में पहुँच रही थी l सत्तू डर के मारे भैरव सिंह के सामने घुटनों पर बैठ जाता है l

भैरव सिंह - आज कल सभी अपने दिमाग चलाने लगे हैं... बोल तुझे क्या लग रहा है...

सत्तू - माफी हुकुम माफी...

भैरव सिंह - पहले अपनी बात पूरी कर... तु क्या समझ रहा था.. वे लाए गए हैं...

सत्तू - हुकुम... वह लोग...

इससे पहले कि सत्तू कुछ आगे कह पाता पुरा का पुरा महल एक जनाना आवाज से गुंज उठता है l

"भैरव सिंह"

यह आवाज भले ही वहाँ पर मौजूद लोगों के कानों में पड़ी पर भैरव सिंह की छाती चिर डाला था l क्यूंकि यह आवाज वैदेही की थी l भले ही वैदेही उसे कभी कभी नाम से बुलाती थी पर ऊँची आवाज में या गाँव वालों के सामने कभी बुलाया नहीं था l भैरव सिंह कमरे से बाहर निकल कर द्वार बरामदे के मचान पर आकर खड़ा हो जाता है l देखता है बीस से तीस गाँव वाले महल के परिसर में हैं और कुछ गाँव वाले परिसर के बाहर खड़े हुए हैं l शायद हिम्मत जुटा नहीं पा रहे हैं l और जो लोग अंदर हैं उनके सामने वैदेही खड़ी हुई है l भैरव सिंह एक चुटकी मारता है l कुछ चाकर भागते हुए जाते हैं और अंदर से सिंहासन नुमा कुर्सी को उठा कर लाते हैं और मचान पर डाल देते हैं l बड़े रौबदार तरीके से भैरव सिंह घूमता है और सिंहासन पर मूँछ पर ताव देते हुए पैर मोड़ कर बैठता l भैरव सिंह भीमा को इशारा करता है,

भीमा - क्या है... क्या परेशानी है...

सभी मर्द चुप रहते हैं, वैदेही उन्हें पीछे मुड़ कर देखती है l सारे के सारे असमंजस में खड़े थे l सबको खामोश देख कर भैरव सिंह के होंठो पर एक छोटी सी मुस्कान उभर कर गायब हो जाती है l

भीमा - जब कोई परेशानी नहीं है... तो महल की शांति खराब करने क्यूँ आए हो...

वैदेही - तु होता कौन है... यह कहने या पूछने वाला...

भीमा - गुस्ताख औरत... हम राजा साहब के नमक ख्वार हैं... तुने अभी अभी जो गुस्ताखी की है... तुझे उसकी सजा मिलेगी...

वैदेही - बात जब तेरे राजा साहब से होनी है... तु बीच में क्यूँ भौंक रहा है...

भीमा - (चिल्ला कर) ऐ.. वैदेही...

वैदेही -(चिल्ला कर) चुप... क्षेत्रपाल के कुत्ते चुप...

वैदेही की ऐसी ज़वाब से वहाँ पर जबरदस्त सन्नाटा छा जाता है l भीमा या उसे गुर्गे ही नहीं बल्कि जो गाँव वाले वैदेही के पीछे खड़े थे उनका भी मुहँ खुला रह जाता है l

भीमा - क्या बोली हरामजादी...

वैदेही - वही... जो तुने अभी सुना क्षेत्रपाल के कुत्ते... जब मालिक से मेहमान मुखातिब हो... तो कुत्तों काम होता है दुम हिलाना... ना कि बीच में घुस कर भौंकना...

वैदेही की हिम्मत देख कर उसके साथ आए गाँव वाले भौचक्का रह जाते हैं l ऐसा ही हालत भीमा और उसके साथियों का भी था l भीमा आगे कुछ कहने को होता है कि चुटकी मार कर भैरव सिंह उसे रोक देता है l

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... हाँ तो गाँव वालो... अपने राजा के पास आए हो... क्या तकलीफ हुआ है... जिसकी निजात के लिए आए हो...

सभी मर्द अभी भी चुप थे, उनकी चुप्पी जहां वैदेही को चुभ रही थी वहीं भैरव सिंह के चेहरे पर मुस्कान को गहरी कर रही थी l चुटकी मार कर भैरव सिंह भीमा को पास बुला कर एक आदमी की ओर इशारा करते हुए उसका नाम पूछता है l भीमा उसे बताता है कि वह हरिया है l

भैरव सिंह - तो... तुम हो हरिया... बोलो हरिया... यहाँ किसलिए आना हुआ... (भैरव सिंह के सवाल के बाद पुरे वातावरण में सन्नाटा पसर जाता है, वैदेही का चेहरा सख्त हो जाता है, अपनी आँखे बंद कर मुट्ठीयाँ कस लेती है, वैदेही की ऐसी हालत देख कर भैरव सिंह के चेहरे पर मुस्कान और भी गहरी हो जाती है) कहो... कहो हरिया कहो... मत भूलो... तुम अपने राजा के पास आए हो... उसके दरबार में आए हो... (फिर कुछ पल का खामोशी, भैरव सिंह अपनी जगह से उठने को होता है कि)

हरिया - हुकुम... (भैरव सिंह बैठ जाता है)(अपना चेहरा उठाता है) मालिक... पुरखों से... हमें एक बात बताई... रटाई गई... के आप हमारे भगवान हैं... इसी बात को रट कर... हमने हर घड़ी... हर पल... आपकी कही हर बात पर... अपनी पुरुषार्थ की बलि चढ़ाते रहे... पर इन बीते दो दिनों में कुछ ऐसा हुआ कि... आज हम अपने भगवान से... हमारी भाग्य की लेखा जोखा पूछने आए हैं...

हरिया रुक जाता है, फिर अपना दाहिना मुट्ठी ऊपर उठा कर दिखाता है l सामने से भैरव सिंह और सभी देखते हैं l हरिया का मुट्ठी खून से सना हुआ था l

हरिया - पर राजा साहब... मेरी हिम्मत कभी थी ही नहीं... के आपसे मैं कोई सवाल करूँ... पर कल रात मेरी पत्नी ने... मेरे हाथ में कुछ चूड़ियाँ रख दी... जो आज मेरी मुट्टी में कस गए हैं... मेरे भीतर के... कापुरुष को... खुन के जरिए बाहर निकाल रहे हैं... ऐसी हालत सिर्फ मेरी नहीं है... यहाँ पर आए... सभी लोगों की मुट्ठीयों को देखिए... आज सबका लहू ज़वाब मांग रहा है... अपने भगवान से...

हरिया फिर रुक जाता है l इस बार ठंडी हवाएं सुँ सुँ आवाज करती हुई बह रही थी l जिसे लोग साफ सुन पा रहे थे l

भैरव सिंह - बहुत खूब... तो आज तुम लोगों का लहू... तुम लोगों के मुहँ में... जुबान भी दे गया है... ह्म्म्म्म... और...

हरिया - क्या आपको मालुम था... रोणा उस होलिका की पुतले के अंदर था....

भैरव सिंह - (कोई जवाब नहीं देता)

हरिया - क्या हमारे घर... हमारे जमीनें... बैंक के पास गिरवी है...

भैरव सिंह - और कुछ... (अब कोई जवाब नहीं आता) ठीक है... अब जाओ... अपने अपने काम पर लग जाओ...

कह कर अपनी कुर्सी से उठता है और वापस मुड़ कर जाने को होता है कि वैदेही की आवाज़ सुन कर रुक जाता है l

वैदेही - भैरव सिंह... (भैरव अपने कमर पर हाथ रखकर ताव से खड़ा होता है) नाम में सिंह... फिर दुम दबाकर भाग क्यूँ रहे हो...

भैरव सिंह - (अपनी कुर्सी पर बैठ कर) हमने... तुम लोगों को सुना... यही काफी है... तुम सब गटर की जिंदगी जीने वाले.. कीड़े-मकोड़े... यहाँ आकर.. बहुत गंध फैला दिए... अब चलो निकलो यहाँ से... वर्ना.. क्षेत्रपाल का पंजा ऐसा पड़ेगा... के कोई यहाँ से अपने पैरों पर से वापस नहीं जा पाएगा... (भीमा से) इन लोगों के निकलते ही... यह जगह अच्छी तरह से साफ कर देना...

भीमा - जी हुकुम...

वैदेही - भाग मत भैरव सिंह... वर्ना लोग... तुझ पर कहानियां बना कर अपने बच्चों को सुनायेंगे... के कैसे... एक क्षेत्रपाल पीठ दिखा कर भाग गया...

भैरव सिंह - बस... बहुत हुआ... बस... अपनी जुबान पर लगाम दो...

वैदेही - पहले हरिया के सवालों का जवाब दो...

भैरव सिंह - क्यूँ रे हरिया.. अपने साथ इतने मर्द लाया है... पर आगे एक औरत को कर दिया है... और बता रहा है... तेरा पुरुषार्थ जाग रहा है...

वैदेही - तेरी क्यूँ फट रही है इस औरत से... बड़ा मर्द बन रहा है... मर्द बनने की धौंस दे रहा है... हाँ मैं औरत हूँ... पर मत भूल... मर्द अपने आप पैदा नहीं होता... उसे जन्म भी एक औरत ही देती है...

भैरव सिंह - साली... रंगमहल की रंडी... कितने साल रंग महल में तु... कितनों के साथ लेटी... कोई पैदा हुआ भी तुझ से...

वैदेही - हाँ होते... अगर.. तेरे साथ साथ... सभी अगर मर्द होते...

भैरव सिंह - कमीनी... तु वही चुड़ैल है ना... जिसे इन्हीं गाँव वालों ने कभी पत्थर फेंक मारा था... आज उन्हीं का काफिला लेकर आई है...

वैदेही - आ गया ना औकात पर... यह काफिला... हौसलों का है... जो फैसला करने आए हैं... अपने हिस्से की जमीन ही नहीं... आसमान भी लेने आए हैं..

भैरव सिंह - उड़ान भरने के लिए हौसला बुलंद होना चाहिए... गटर में रेंगने वालो... औकात से बाहर मत उड़ो...

वैदेही - ऊँची ऊँची बातेँ फेंक मत भैरव सिंह... पहले हरिया के पूछे सवालों का जवाब दे...

हरिया - हाँ राजा साहब हाँ... आज हम इरादा करके आए हैं... आज अपने सारे सवालों का जवाब हम लेकर जाएंगे...

भैरव सिंह - हरिया... तु सवाल नहीं कर रहा है... हमें ललकार रहा है... क्षेत्रपाल से सवाल हो या ललकार... दोनों के लिए... इरादे और गर्दन दोनों मजबुत होनी चाहिए...

वैदेही - पीढी दर पीढ़ी... क्षेत्रपाल के आधीन... आज तक जिया ही कौन हैं... तु एक राक्षस है... यह सबको पता है... पर तु एक कायर भी है... आज तु सबको... बता भी रहा है... जता भी रहा है...

भैरव सिंह - वैदेही...

वैदेही - हाँ राजा हाँ... कब से तेरे दरवाजे पर सवाल लिए आए हैं... तुझसे जवाब भी नहीं बन पा रहा है...

भैरव सिंह - (अपनी कुर्सी से उठ कर) तो तुम सब हरामियो को हमारा ज़वाब चाहिए... ह्म्म्म्म... भीमा..

भीमा - जी हुकुम...

भैरव सिंह - जाओ.. (चाबी निकाल कर देते हुए) कोष गृह के तीसरे अलमारी के उपर वाले स्टाक से... काग़ज़ के बंडल लाना...

भीमा चाबी लेकर तुरंत भाग जाता है और कुछ ही देर बाद सभी कागजात लेकर वापस आता है l भैरव सिंह भीमा के हाथों से कागजात लेकर, मचान के किनारे पहुँचता है l

भैरव सिंह - हाँ... हमारे साथ रोणा ने गद्दारी करी... उसके लिए हमने सजा मुकर्रर किया... और उस सजा में तुम लोगों को शामिल किया... तुम लोगों को सजा देना बनता था... क्यूँकी... तुम लोग त्योहार मना कर... हमारे पुरखों की लिखी लकीर को मिटाने की कोशिश की... और रही घर और जमीनों की बात... तो हाँ... (दाहिने हाथ की बंडल दिखा कर) यह तुम लोगों की ज़मीनों की कागजात... (बाएँ हाथ की बंडल दिखा कर) यह रही तुम लोगों के घरों की कागजात... (कह कर सारे कागजात मचान के फर्श पर डाल देता है) बहुत गुस्ताखी कर ली है तुम लोगों ने... अब आओ... जिसकी हिम्मत है.. वह यह कागजात यहाँ से ले जाए... (सबको सांप सूँघ जाता है, कोई अपनी जगह से हिल भी नहीं पाता) तुम लोगों के पास... तुम लोगों के औकात से बढ़ कर जो था... हमने उसे अपने पास रख कर... तुम लोगों को... तुम्हारे औकात के अनुसार रख दिया... अब या तो हिम्मत कर अपना कागजात लेलो... या फिर दफा हो जाओ यहाँ से... ताकि तुम लोग जो गंध फैलाया है... उसे साफ किया जा सके...

सारे गाँव वाले अपनी जगह पर बुत बने खड़े रहते हैं l उनसे ना आगे जाना हो पा रहा था, ना ही पीछे लौटना l पर वह लोग हैरान तब होते हैं जब आसमान में बिजली कौंधती है, कान चिर देने वाली बादल की गड़गड़ाहट ने जैसे एक रास्ता बना दिया हो l उसी रास्ते से हो कर वैदेही अपनी जगह से आगे बढ़ कर सीढियों की तरफ बढ़ती है l वैदेही को आगे बढ़ता देख भीमा और उसके गुर्गे सीढियों से उतरने लगते हैं कि अचानक उनके कदम ठिठक जाते हैं l भैरव सिंह और भीमा हैरान हो कर वैदेही के तरफ देखते हैं l वैदेही के बगल में ही ना जाने कहाँ से आकर विश्व उसके साथ कदम बढ़ रहा था l विश्व को देखते ही सभी के सभी डर के मारे ठिठक जाते हैं l उनको ठिठका देख भीमा भागते हुए सीढियों से उतर ने लगता है l जैसे ही वह करीब पहुँचता है भीमा विश्व और वैदेही पर छलांग लगा देता है l विश्व आगे बढ़ कर भीमा को हवा में ही पकड़ कर उठा लेता है और सीढियों के नीचे फेंक देता है l नीचे गिरने के बाद भीमा चिल्लाता है

भीमा - अबे... हरामीयों.. रोको इन्हें... आज राजा साहब का नमक का कर्ज उतारना है... मारो... एक साथ टुट पड़ो...

भीमा की आह्वान सुन कर शनिया, सौरा, भूरा जितने भी थे सब के सब टुट पड़ते हैं l भैरव सिंह देखता है विश्व कभी तर्जनी उंगली मोड़ कर तो कभी मध्यमा उंगली को मोड़ कर... कभी सीधी उंगली से तो कभी मुट्ठी से अलग बना कर बॉडी के खास जगहों पर वार कर रहा है l किसी को एक या किसी को दो या फिर किसी को तीन वार कर आगे बढ़ रहा है l जिन पर वह वार कर रहा है, मार खाने के बाद वहीँ पर बुत बन कर जम गए हैं l कुछ देर बाद दोनों भाई बहन भैरव सिंह के सामने खड़े थे l भैरव सिंह अपने आदमियों की ओर देखता है, विश्व ने जिन्हें मार कर आगे बढ़ा था, वह सब अपनी जगह पर दर्द भरे चेहरे लेकर बुत बने वैसे ही खड़े थे l फिर अचानक एक एक कर सभी किसी कटे हुए पेड़ की तरह गिर जाते हैं l यह देख कर गाँव वाले भी हैरान हो जाते हैं l भैरव सिंह अपने सामने इन्हें देख कर मुट्ठी बाँध लेता है और अपना हाथ उठाने को होता है कि

वैदेही - ना भैरव सिंह ना... आज तेरा दिन नहीं है... इसलिए कोई बेवकूफी मत करना... यह मेरा भाई... तेरह साल का था... कुछ भी नहीं था... तभी तेरे एक आदमी का हाथ... कुल्हाड़ी से काट दिया था... आज यह... बहुत कुछ है... और तुने नमूना भी देख लिया है... जिन लोगों के सामने तु शेर बना हुआ है... यह तुझे मार मार कर उन्हीं के सामने कुत्ता बना देगा.... अगर तेरे इरादे और गर्दन में मज़बूती है... तो मुझ पर हाथ छोड़कर दिखा...

भैरव सिंह स्तब्ध हो जाता है l उसका हाथ जहां का तहां रह जाता है l क्यूंकि वैदेही ने उसे यह बात बहुत ही धीरे कही थी l भैरव सिंह विश्व की आँखों में देखता है l विश्व की आँखे उसे अंगारों सी जलती हुई प्रतीत होती है l इतने में वैदेही भैरव सिंह को पीछे छोड़कर आगे बढ़ती है और सीधे जा कर सिंहासन पर बैठ जाती है l यह देख कर भैरव सिंह और गाँव वाले सभी की आँखे हैरानी से फैल जाते हैं l

वैदेही - इसी तख्त पर बैठ कर तु हमारी मुकद्दर का फैसला किया करता था... हमारी तक़दीरें लिखा करता था... तेरा वक़्त ख़तम हो गया क्षेत्रपाल... देख वक़्त का पहिया कैसे करवट बदली है... आज तु कहाँ है... और हम कहाँ है... (वैदेही अपनी नजरें घुमाती है, एक कोने में उसे सत्तू छुपा बैठा दिख जाता है) ऐ... सत्तू...

सत्तू - जजजजज.. जी... जी.. दीदी जी... जी...

वैदेही - वह जो कागजात राजा ने फर्श पर फेंके हैं... उन्हें बटोर कर मेरे हवाले करो...

सत्तू - जी..

सत्तू भागते हुए जाता है और सारे कागजात बटोर कर भागते हुए वैदेही के हाथों में दे देता है l वैदेही सारे कागजात लेने के बाद सिंहासन से उठती है

वैदेही - भैरव सिंह... तुझको मुबारक यह तख्त ओ ताज... आज मैं.. हमारी हक ले जा रही हूँ... इसके बाद की अंजाम के लिए तैयार रहना...

कह कर वैदेही अपने भाई विश्व का साथ मचान छोडकर सीढ़ियों से उतरती है और लोगों के बीच से होते हुए बाहर जाने लगती है l जितने भी लोग थे वहाँ पर सभी के सभी वैदेही के साथ वापस जाने लगते हैं l भैरव सिंह देखता है आज पहली बार कोई भी गाँव वाला उल्टे पाँव नहीं लौटा था l सारे के सारे महल के तरफ पीठ कर जा रहे थे l भैरव सिंह नीचे फर्श पर बैठ जाता है l तभी जोर जोर से बारिश होने लगती है l

×_____×_____×_____×_____×_____×_____×

छाता बंद करते हुए प्रतिभा अंदर आती है l तापस अंदर ड्रॉइंग रुम में सोफ़े पर बैठा अकेले ही शतरंज खेल रहा था l अंदर आते ही प्रतिभा तापस से कहती है

प्रतिभा - जानते हो... आज तो ग़ज़ब हो गया...

तापस - (वैसे ही खेलते हुए, प्रतिभा की ओर बिना देखे) ऐसा क्या हो गया भाग्यवान... आसमान टुट पड़ा... या जमीन फट गया...

प्रतिभा - (बिदक कर) पहले वह खेल बंद कर इस तरफ देखिए...

तापस - (प्रतिभा की ओर देखते हुए) ठीक तो दिख रही हो... क्या ग़ज़ब हो गया... (थोड़ा हँसते हुए) कहीं तुम्हें देख कर कोई डर तो नहीं गया...

प्रतिभा - हो गया...

तापस - (सकपका ने की ऐक्टिंग करते हुए) लगता है... बहुत गरम हो...

प्रतिभा - देखो... मैं बिल्कुल मज़ाक के मुड़ में नहीं हूँ...

तापस - ओके ओके... लगता है... कोई खास जानकारी लाई हो... ठीक है बताओ... क्या खबर है...

प्रतिभा - (अपना फाइल और वैनिटी बैग पटक कर) जाओ... मैं नहीं बताती...

तापस - (गाते हुए) देखो रूठा ना करो... बात नजरों की सुनो...

प्रतिभा - (गाते हुए) हम ना बोलेंगे कभी... तुम सताया ना करो...

तापस - अरे जान... गुस्सा थूक भी दो... अब हम तुमसे शरारत ना करें... तो किससे करें.. अब इस छोटी सी आशियाने में... तुम्हारे और मेरे सिवा है ही कौन...

प्रतिभा - ठीक है.. ठीक है... कहूँगी... पहले यह बताओ... आज काल... यह नया रोग क्या लगा रखा है..

तापस - कैसा रोग...

प्रतिभा - यह शतरंज अकेले खेलने की आदत...

तापस - क्या करूँ जान... अब बर्खुर्दार भी नहीं है... तुम समाज सेवा और अदालत में बिजी रहती हो... तो मेरा भी तो टाइम पास बनता है... तो चेस खेल लेता हूँ...

प्रतिभा - अकेले...

तापस - अकेले खेल लेता हूँ... तो क्या हुआ... इस खेल में... दिमाग लगाना पड़ता है...

प्रतिभा - अकेले अकेले... ऐसा क्या दिमाग खपा रहे हो...

तापस - यह देखो... (शतरंज की गोटीयाँ दिखाते हुए) यह है... शाह... यह वजीर... हाती... ऊँट.. घोड़े... यह हरावल... अब शाह को घेरना है... तो कैसे घेरना है... उसके वजीर... हाती घोड़े सबको कैसे छकाना है... छकाना है तो कैसे छकाना है...

प्रतिभा - अरे बाप रे... इतना सोचते सोचते थक जाते होगे ना...

तापस - अरे जान थक तो बहुत जाता हूँ... पर जब तुम्हारा चेहरा देखता हूँ... तरोताजा हो जाता हूँ...

प्रतिभा - शॉट ऑप... सब समझती हूँ... बहाने बना रहे हो... अगर घर में बोर लग रहा है... तो नौकरी क्यूँ छोड़ी...

तापस - बस... माँ ने कहा घर छोड़ दो... मेरी (प्रतिभा की ठुड्डी पर हाथ रखकर) पारो ने कहा शराब छोड दो... तो मेरे दिल ने कहा नौकरी छोड़ दो... अरे जान हम से ना घर छूटेगा... ना पारो छूटेगी... इसलिए नौकरी छोड़ दी...

प्रतिभा - बस बस.. आप यह ड्रामा बंद करो अब...

तापस - चलो बंद कर दी... अब बोलो... क्या कहना चाहती थी...

प्रतिभा - आज जानते हो... क्या हुआ...

तापस - अरे भाग्यवान... कुछ बताना चाह रही हो या कुछ पूछना...

प्रतिभा - ओ हो... मैं तुम्हें कुछ बताना ही चाहती हूँ...

तापस - जाहिर है... जो मैं नहीं जानता...

प्रतिभा - अच्छा ठीक है सुनो... जैसा कि यहीं पर प्लान हुआ था... की कैसे... बैंक में केवाईसी करवा कर गाँव वालों के सामने... भैरव सिंह की सच्चाई लाया जाए..

तापस - हाँ तो.. तो क्या प्लान फैल हो गया...

प्रतिभा - अरे नहीं... प्लान कामयाब भी रहा और लोग भैरव सिंह पर भड़के भी...

तापस - अच्छा... मतलब शाह को घेर लिया गया...

प्रतिभा - फिर आप यह चेस वाली बात कह रहे हैं...

तापस - अरे नहीं बस मुहँ से निकल गया... चलो राजगड़ में एक काम अच्छा हुआ...

प्रतिभा - हाँ... जो बरसों से कभी नहीं हुआ... वह भी हो गया...

तापस - ऐसा क्या हो गया...

प्रतिभा - भैरव सिंह के खिलाफ... राजगड़ थाने में... सारे गाँव वालों ने मिलकर... केस दर्ज कर दिया है...

तापस - अरे वाह... यह तो वाकई ग़ज़ब हो गया... पर तुम्हारे घबराहट के पीछे का वज़ह क्या है...

प्रतिभा - घबराऊँ नहीं तो क्या करूँ... अब यह भाई बहन सीधे सीधे.. राजा भैरव सिंह के साथ टकराव में आ गए हैं...

तापस - हूँ...

प्रतिभा - क्या हूँ... क्या आपको प्रताप और वैदेही की चिंता नहीं हो रही है...

तापस - (थोड़ा सीरियस हो कर) देखो जान... ऐसा एक दिन आएगा यह तुम भी जानती थी... मैं भी जानता था... आगे शायद और भी ख़राब दिन आ सकते हैं...

प्रतिभा - ख़राब दिन...

तापस - हाँ... अब जब युद्ध आमने सामने की हो गई है... तो राजा भैरव सिंह पलटवार करेगा ही... पर तुम ज्यादा चिंता मत करो... हमारा प्रताप इस काबिल है... की भैरव सिंह को मुहँ तोड़ जवाब दे सकता है...

प्रतिभा - हाँ दे सकता है... पर अभी से मैं घबराने लगी हूँ... भैरव सिंह का पलटवार कैसा होगा... किस तरह का होगा...

तापस - ज्यादा मत सोचो... तुम अच्छी तरह से जानती हो... प्रताप कितना काबिलियत रखता है... एक अकेला कितनों पर भारी पड़ सकता है... यह तुमने ओरायन मॉल में देख चुकी हो... दिमाग से कितना तेज है... तुम जानती हो... कितने केसेस तुमने उसकी मदत से सॉल्व किए हैं... वह हर परिस्थितियों से जुझ सकता है... देखा नहीं.. उसने कैसे अनु को ढूँढ निकाला था...

प्रतिभा - जानती हूँ... पर माँ हूँ... डर तो लगेगा ही... जब भी ऐसी खबर सुनती हूँ... डर लगता है... तुम्हें क्या... जब देखो चेस खेलते रहते हो...

तापस - हाँ... टोंट मारो... मारते जाओ...

प्रतिभा - मैंने कहाँ तुम्हें टोंट मारा...

तापस - तुम तक खबर पहुँचती है... क्यूंकि तुम तक खबर कोई पहुँचा रहा है... कभी तुमसे वैदेही फोन पर बात करती है... तो कभी लाट साहब तुमसे बात करता है... आज तो तुमसे यह दोनों कुछ भी कहा नहीं होगा... पर खबर तुम तक जरूर लाट साहब के बंदर टीलु ने पहुँचाया होगा...

प्रतिभा - हाँ बात तो आपने बिल्कुल सही कहा... आपको कैसे मालुम हुआ... के आज का खबर मुझे टीलु ने बताया होगा...

तापस - बच्चे कुछ बातेँ माँ से छुपा जाते हैं... कहीं माँ को तकलीफ ना हो जाए... पर खबर तो पहुँचनी ही थी तुम तक... क्यूँकी मुझे पता है... तुम रोज जितना प्रताप या वैदेही से बात नहीं करती... उतना तुम टीलु से बात करती हो...

प्रतिभा - ओह... आपको बुरा लग रहा है... की प्रताप आप को बहुत कम फोन करता है...

तापस - नहीं... बाप और बेटे का रिश्ता कुछ ऐसा ही होता है... मुझे उसकी खबर रहती है... और उसे हमारी... इतना काफी है...

प्रतिभा तापस के पास जाती है और उसके गले लग जाती है l

×_____×_____×_____×_____×_____×_____×

शाम हो रही थी, और बारिश थम चुकी थी, पर आसमान में अभी भी बादल छाए हुए थे l ऐसे समय में गाँव में पुलिस की जीप आगे आगे भागी जा रही है l उसके पीछे पुलिस प्लाटुन से भरे तीन बड़े ट्रक जा रहे थे l गाँव में ऐसा पहली बार हो रहा था कि पुलिस बल से भरा तीन तीन ट्रक राज महल की ओर जा रहे थे l दास की जीप महल के परिसर में घुसती है, उसके पीछे पीछे महल के परिसर में तीनों ट्रक भी घुसते हैं l रेन कोट पहने दास अपनी जीप से उतर कर देखता है, बरामदे वाली मचान के फर्श पर भैरव सिंह बैठा हुआ था l वह पूरी तरह से भिगा हुआ था l उसके सारे लोग भीमा सहित नीचे खड़े हुए थे और वे लोग भी भीगे हुए थे l उन भीगे हुए लोगों के बीच वकील बल्लभ प्रधान भी खड़ा था l पुलिस बल को इतनी तादात में आते देख उस भीड़ से निकल कर बल्लभ दास के सामने आता है l

बल्लभ - यह क्या है दास बाबु...

दास - माफ कीजियेगा वकील बाबु... मुझे ऊपर से आदेश मिले हैं... यह सब राजा साहब के सुरक्षा के लिए तैनात किए जाएंगे...

बल्लभ - क्या... राजा साहब जी की सुरक्षा के लिए... आपका दिमाग तो सही है ना...

दास - कहा ना... मुझे ऊपर से आदेश मिला है...

बल्लभ - ऊपर से मतलब... कहाँ से...

दास - यह देखिए... (कह कर एक सरकारी ऑर्डर की कॉपी दिखाता है) यह ऑर्डर... होम मिनिस्ट्री से... आया है... और यह प्लाटुन लोकल नहीं है... ओड़िशा स्पेशल आर्म्ड पुलिस बल की है... थर्ड बैटेलियन... देवगड़ से आए हैं... मैं बस हुकुम बज़ा रहा हूँ...

बल्लभ - यह... अचानक... राजगड़ में...

दास - वकील बाबु... आप बुरा ना मानें... तो क्या मैं राजा साहब से दो चार गुफ़्तगू कर लूँ...

बल्लभ - दास बाबु... मुझे डर है... शायद यह समय सही नहीं होगा... राजा साहब आपकी किसी भी बात का ज़वाब ना दें... आपको शायद नहीं पता होगा कि...

दास - पता है...

बल्लभ - (हैरान हो कर) क्या...

दास - पता है... यहाँ क्या हुआ... सब पता है... पर उसके बाद से लेकर अब तक क्या हुआ... ना आपको पता है... ना राजा साहब को पता है... इसलिए उनकी जानकारी के लिए.... उनसे गुफ़्तगू करना होगा...

बल्लभ - एक काम कीजिए... मुझे सब बता दीजिए... मैं बाद में... राजा साहब से बोल दूँगा...

दास - मिस्टर बल्लभ प्रधान... राजा साहब जो कहने आया हूँ... वह उन्हीं से कहूँगा ही... हाँ आप उनसे गुफ़्तगू में शामिल हो सकते हैं... क्यूँकी आगे उन्हें आपकी बहुत जरूरत पड़ने वाली है...

कह कर दास आगे बढ़ता है l उसके पीछे पीछे बल्लभ भी चलता है l दास चलकर भैरव सिंह के आगे खड़ा होता है पर बल्लभ भैरव सिंह के पीछे खड़ा होता है l

दास - राजा साहब... आप से कुछ बात करनी है... (भैरव सिंह का चेहरा सख्त था, ऐसा लग रहा था जैसे अंदर ही अंदर गुस्से से भभक रहा हो) हमेशा आप मुझे बैठने के लिए... कुर्सी ऑफर किया करते थे... पर आई एम सॉरी... आज आप ऑफर करने के लायक नहीं रहे...

भैरव सिंह - (दांत पिसते हुए, नजर उठा कर इंस्पेक्टर दास की ओर देखता है)

दास - हम जमीन से जुड़े हुए लोग हैं... आप आसमान में बसने वाले... आज पहली बार जमीन पर आए हैं... इसलिए मैं आज आपके सामने जमीन पर बैठ सकता हूँ... (कह कर भैरव सिंह के सामने दास आलथी पालथी मार कर बैठ जाता है) हाँ... अब ठीक है... तो राजा साहब... यह तो मानना पड़ेगा कि... कई दशकों से जो कभी किसीने सोचा तक नहीं था... आज वह हो गया... बहुतों के हाथ के चमड़े दर्द से लाल हो गए... क्यूँकी जिसने भी सुना... उसने अपनी चिकोटी काट काट कर हालत खराब कर लिया...

भैरव सिंह - (भौहें चढ़ा कर दास की ओर देखता है)

दास - (अपनी रेन शूट के कुछ बटन खोल कर एक मोटी फाइल निकाल कर भैरव सिंह के सामने रख देता है)

बल्लभ - यह क्या है इंस्पेक्टर...

दास - राजा साहब के खिलाफ... सारे गाँव वालों ने एफआईआर दर्ज किया है... ठगी.. लुट... धोखाधड़ी... आदि के तोहमत लगा कर....

बल्लभ - क्या... गाँव वालों ने...

दास - हाँ... मैं भी... मैं भी बिल्कुल आपकी तरह चौंक गया... पर जब सारे गाँव वालों ने... एक ही इशू पर... राजा साहब के खिलाफ एफआईआर दर्ज की... तो मैं मजबूर होकर... हेड ऑफिस से कॉन्टेक्ट कर... सजेशन माँगा... अब राजा साहब इतने बड़े व्यक्तित्व हैं... उन्हें कौन गिरफ्तार कर सकता है... इसलिए हेड ऑफिस वालों ने... होम मिनिस्ट्री से कॉन्टेक्ट किया... तो उन्होंने कुछ ऑर्डर के साथ... स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसिजर तय कर... पुरे डेलिगेशन ऑफ़ पावर के साथ मुझे कारवाई करने के लिए कहा...

बल्लभ - कैसी कारवाई....

दास - राजा साहब... फिलहाल आपकी कोई न्यायिक गिरफ्तारी नहीं हो रही है... पर..

बल्लभ - पर क्या... इंस्पेक्टर...

दास - पर... आज सुबह आपके महल के प्रांगण में जो भी कुछ हुआ... इससे आपकी जान को खतरा समझ कर... यह तीन प्लाटुन आपकी और आपके घर की निगरानी के साथ साथ सुरक्षा भी करेंगे...

बल्लभ - साफ साफ क्यूँ नहीं कहते... तुम हाउस अरेस्ट कर रहे हो...

दास - अरे... आप तो समझ गए... हाँ बिल्कुल... राजा साहब अब इस महल में... हाउस अरेस्ट रहेंगे... जब तक दुसरा आदेश हमें प्राप्त नहीं हो जाता....

यह सुनते ही भैरव सिंह की मुट्ठीयाँ कसने लगती हैं l उसके आँखों के नीचे की पेशियाँ और कांपने लगती हैं l वह खड़ा हो जाता है l उसके साथ साथ दास भी खड़ा हो जाता है l भैरव सिंह की यह हालत देख कर भीमा सीढ़ियां चढ़ते हुए दास के पास पहुँच जाता है l

भीमा - ऐ इंस्पेक्टर... (दास एक थप्पड़ मार देता है) ऐ... (जब अपना हाथ उठा कर दास की गिरेबां पकड़ने की कोशिश करता है, तब तक दास अपना रिवाल्वर निकाल कर भीमा के मुहँ में ठूँस देता है)

दास - सुन बे अपने मालिक के वफादार कुत्ते... तुझे किसीने सिखाया नहीं... जब मालिक के साथ कोई बड़ा आदमी बतीया रहा हो... तो कुत्तों काम होता है दुम हिलाना... ना कि भौंकना... (भैरव सिंह से) राजा साहब... आज सुबह जो हुआ... उसे आप ना दोहराएं तो आपके लिए अच्छा... हमारे लिए अच्छा... (कह कर भीमा को एक धक्का देता है) राजा साहब... जैसा कि मैंने आपसे कहा... आप... इस महल में हाउस अरेस्ट रहेंगे... आपकी सारी टेलीफ़ोन लाइन काट दी गई है... और यहाँ मोबाइल जैमर भी लगा दिया जाएगा... आपकी जानकारी के लिए बता दूँ... आप पर जो इल्ज़ाम लगे हैं... उसकी तफ्तीश तहसीलदार श्री नरोत्तम पत्री करेंगे.... जब तक वह होम मिनिस्ट्री को... इस बाबत रिपोर्ट नहीं सौंप देते... तब तक आप हाउस अरेस्ट ही रहेंगे... इस दौरान... आप बाहर नहीं जा सकते हैं... हाँ कोई अगर आपसे मिलना चाहे... तो उन्हें हमारी टीम से इजाज़त लेनी होगी... चाहे वह आपके परिवार वाले हों... या फिर आपके वकील... और हाँ... आपके जितने भी नौकर चाकर हैं... सिर्फ जरुरत के कुछ लोगों को छोड़ कर... बाकी सभी वर्जित रहेंगे....

बल्लभ - यह कैसा आदेश है... राजा साहब किसी को फोन भी नहीं कर सकते...

दास - मैंने भी यही पूछा था... तो पत्री साहब ने कहा... राजा साहब की जो जो पहुँच है... रुतबा है... वह केस को प्रभावित कर सकते हैं... इसलिए... जब तक केस की तफ्तीश पुरी नहीं हो जाती... महल के फोन लाइन भी बंद ही रहेंगी.... (प्लाटुन की ओर मुड़ कर) ट्रूप अटेंशन... टेक योर पोजीशन...

सारे प्लाटुन ट्रक से उतर कर पोजीशन ले लेते हैं l वह लोग इतनी तेजी से अपनी पोजिशन ले रहे थे कि बल्लभ और भीमा हैरान हो कर देख रहे थे l

बल्लभ - यह लोग... इस तरह से... पोजीशन ले रहे हैं... जैसे उन्हें पहले ही आइडिया हो...

दास - हाँ आने से पहले... महल की मैप जो मैं जानता था... उसे अच्छी तरह से समझा दिया था... इसलिए इन लोगों को... कोई परेशानी नहीं हो रही है...

बल्लभ - मुझे कुछ जानना है...

दास - हाँ हाँ पूछिये... आई एम हीयर तो टेल ऑल एबाउट...

बल्लभ - तुम असल में कौन हो... विश्व के साथ तुम्हारा क्या नाता है... इतना बड़ा खेल विश्व नहीं खेल सकता... इन सबके पीछे असल में है कौन...

दास - (मुस्कराता है) वाह क्या बात है... हाँ... यह खेल विश्व का ही है... पर... इस खेल में अकेला वह खिलाड़ी नहीं है... कुछ सामने हैं... और कुछ पीछे...
 
शुक्रिया मेरे दोस्त आपका बहुत बहुत

बिल्कुल सही कहा आपने

राजा अभी तक अपने अहं के चलते आँखे मूँद कर चल रहा था

इसलिये ठोकर लगना स्वाभाविक था पर इतनी आसानी से पहली ही झटके में विश्व को इतनी बड़ी कामयाबी कैसे मिली यह अगले अंक में मालूम होगा

हाँ अभी राजा का पलटवार होगा

वह पलटवार राजा का एक भयंकर अंत निश्चित करेगा
 
👉एक सौ अड़तालीसवाँ अपडेट

---------------------------------------


आज की सबसे बड़ी खबर, अविश्वसनीय, पर सच, राजगड़ में राजा भैरव सिंह क्षेत्रपाल अपने ही महल में गृह बंदी बनाए गए हैं, और वज़ह बड़े चौकाने वाले हैं l राजगड़ मल्टीपल कोआपरेटिव सोसाइटी के लोन फोर्जरी में राजगड़ पंचायत के लगभग सभी गाँव वालों ने राजा साहब के विरुद्ध थाने में शिकायत दर्ज कराए थे l चूँकि राजा साहब कोई मामूली अथवा आम व्यक्तित्व नहीं हैं और पुरे राज्य में और सरकार व सरकारी तंत्र में राजा साहब बहुत प्रभाव रखते हैं, इसलिये इस मामले में गृह मंत्रालय को तुरंत हस्ताक्षेप करना पड़ा l किसी गलत फ़हमी के चलते कहीं राजा साहब गाँव वालों के आक्रोश का शिकार ना हो जाएं इसलिए गृह मंत्रालय लोगों के गुस्से को ध्यान रखते हुए राजा साहब को गृह बंदी बनाए रखने के लिए पुलिस को आदेश जारी कर दिया है l हमारी सूत्रों के द्वारा उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर हमें यह मालुम पड़ा कि तकरीबन तीन बैटेलीयन ओएसएपी बल के जवानों के द्वारा क्षेत्रपाल महल की सुरक्षा प्रदान किया जा रहा है l यह वाक़ई बेहद चौंकाने वाली खबर है कि राजा साहब जैसे व्यक्तित्व पर उन्हीं के गाँव वालों ने धोखाधड़ी का आरोप लगाया है l इस बात को गम्भीरता से लेते हुए गाँव वालों के आरोपों की जाँच के लिए राजगड़ के ही पूर्व तहसीलदार श्री नरोत्तम पत्री के अधीनस्थ एक कमेटी बनाया गया है और उन्हीं के तत्वावधान में इस केस की जांच किया जा रहा है l श्री पत्री जी के द्वारा जाँच के तथ्य गृह मंत्रालय में दे दिए जाने के बाद ही मामले को अदालती कार्यवाही की अनुमति दी जाएगी

नभ वाणी में यह समाचार प्रसारण हो रही थी l सोफ़े पर बैठ कर वीर टीवी देख रहा था l रिमोट लेकर टीवी को बंद कर देता है l वह अपने मोबाइल से सबसे पहले राजगड़ को फोन मिलाता है पर फोन लगता नहीं l थक हार कर अपने भाई विक्रम को फोन मिलाता है l उसे हैरानी होती है, विक्रम के फोन भी नहीं लगती है l बार बार कोशिश करने के बाद भी जब फोन नहीं लगता, तो चिढ़ कर फोन को सोफ़े पर पटक देता है l उसके फोन पटकते ही उसे महसूस होता है कि अनु जो उसके पास आ रही थी वह दो कदम पीछे हट जाती है l वीर मुड़ कर देखता है l अनु उसे हैरान हो कर देख रही थी l

वीर - क्या बात है अनु... डर क्यूँ गई... तुम मेरे पास आ रही थी ना... (अनु सिर हिला कर हाँ कहती है) तो.. आओ ना...

वीर अपनी बाहें खोल देता है l अनु का चेहरा खिल जाता है l अनु भागते हुए वीर के सीने से लग जाती है l वीर उसके चेहरे को उठा कर पूछता है

वीर - क्या बात है... मेरी जान को मुझसे डर लगा... (अपना सिर ना में हिलाती है) फिर... जब मेरे पास आ रही थी... तो मुझे चिढ़ा हुआ देख कर पीछे क्यूँ हट गई...

अनु - वह... मुझे लगा...

वीर - हाँ हाँ... बोल.. क्या लगा तुझे...

अनु - यही के शायद... यह वक़्त... मेरा मतलब है कि... इस वक़्त आप अकेले रहेंगे तो शांत रहेंगे...

वीर - अरे पगली... तु अगर मेरे आँखों के सामने है.. तो हर पल मेरे लिए गुलजार है... (अनु की नाक को खिंचते हुए) समझी...

अनु - (बड़ी मासूमियत के साथ सिर हिला कर हाँ कहती है) हूँ...

वीर -(उसके कमर पर बाहों का घेरा बना कर उठा लेता है, अनु का चेहरा वीर के चेहरे के सामने थी) तो अब कभी मुझसे ऐसी दूरी बनाएगी...

अनु - (सिर हिला कर ना कहती है)

वीर की एक हाथ कमर से हट कर उपर आती है और अनु के सिर के पीछे ठहर जाती है l

वीर - तो हो गई ना तुमसे गलती...

अनु - (शर्मा कर सिर हिला कर हाँ कहती है)

वीर - तो जुर्माने के तौर पर... एक मीठी चुम्मी ले लेने दे...

अनु - नहीं नहीं...

आगे कुछ और कह नहीं पाती l अनु के होठों के अपने होठों की गिरफ्त में ले चुका था l एक छोटी और गहरी चुंबन के बाद वीर अनु को हैरान हो कर देखता है l

वीर - मुझे तो मीठी चुम्मी लेनी थी... यह चुम्मी इतनी खट्टी क्यूँ लग रही है...

अनु - (शर्मा के नजरे नीचे कर लेती है) वह... मैं ना... अभी अभी इमली खाया था...

वीर - क्यूँ... अरे खाना होता तो कुछ मीठा खा लेती... इमली खा कर मेरा मुहँ भी खट्टा कर दिया... (बड़ी मासूमियत के साथ अपना चेहरा नीचे कर लेती है) अच्छा बोल... क्या कहने आई थी...

अनु - वह... मुझे खट्टा खाने को मन कर रहा है... तो थोड़े कच्चे कैरी ले आइए ना...

वीर - क्या... तुझे खट्टा खाने को मन कर रहा है...

अनु - जी...

वीर - क्यूँ...

अनु का चेहरा शर्म से लाल हो जाता है l अनु जोर से वीर के गले से लग जाती है l अनु अपना चेहरा वीर के कंधे पर पीछे की ओर ले जाती है l वीर के कानों में फुसफुसा कर कहती है l

अनु - हम बहुत जल्द... दो से... तीन होने वाले हैं... (कह कर अनु वीर को और जोर से कस लेती है)

वीर - क्या... (अनु को अपने से अलग करने की कोशिश करता है पर अनु शर्म के मारे पुरी ताकत से वीर को पकड़े रखी थी) अनु... ऐ..

अनु - (शर्म से) अभी अभी तुमने क्या कहा...

अनु - (अपनी आँखे बंद कर) बहुत जल्द हमारे आँगन में आपका अपना मेहमान आने वाला है...

वीर - (खुशी और शॉक के मारे) क्या... अनु... (अनु को अपनी बाहों में लेकर घूमने लगता है, फिर अचानक रुक कर) सॉरी सॉरी...

कह कर अनु को उतार कर सोफ़े पर बिठा देता है, अनु की बाहों को अलग करता है, अनु सोफ़े पर एक कुशन उठा कर अपना चेहरा ढक लेती है l वीर उसके सामने घुटनों पर बैठ कर चेहरे से कुशन हटाता है तो अनु अपना चेहरा अपने दोनों हाथों से ढक लेती है l वीर अनु की हाथों को अलग करता है l अनु के चेहरे को खुशी और उत्साह के साथ देखने लगता है l अनु का चेहरा शर्म के मारे भले ही लाल हो गया था पर खुशी के मारे चेहरा दमक भी रहा था l

वीर - वाव अनु... क्या यह सच है...

अनु - (अपना सिर हिला कर हाँ कहती है)

वीर - कितना महीना चल रहा है...

अनु - दू... दूसरा... ख़तम होकर आज से तीसरा...

वीर - ह्वाट... और मुझे तु अभी बता रही है... वाव अनु अब तो तुझे सच मुच चूमने को मन कर रहा है... (कह कर वीर अनु की एक लंबी चुंबन लेता है) आह... कितना मीठा चुम्मा है...

अनु - (वीर के सीने पर हल्का सा मुक्का मारती है) झुठे... अभी तो कह रहे थे... चुम्मी खट्टी थी...

वीर - मैं बेवक़ूफ़ था... गधा था... तेरे मुहँ से कुछ भी खट्टा हो सकता है भला... (गाल खिंचते हुए) तु जानती है... तु रोज रोज कितनी मीठी हो गई है... इन गालों को चूमने से ज्यादा चबाने मन कर रहा है... (कह कर अनु के गालों को हल्के से चबाते हुए गिला कर देता है, अनु कोई विरोध नहीं करती, वीर अनु से अलग हो कर उसके सामने झुकते हुए कहता है) तो मेरे इस पैराडाईज की रानी... आज से आपका काम करना बंद... आज से आप सिर्फ इस सोफ़े पर बैठेंगी... और कभी बेड पर... आप नीचे चलने की जहमत भी ना उठाएँ... आज से आपका हर काम आपका यह गुलाम करेगा... आप बस हुकुम करेंगी... समझी...

अनु - (अपनी भौंहे उठा कर) सारे काम...

वीर - जी रानी साहिबा... लगभग सारे काम... मतलब सारे काम... यहाँ तक कि... (शरारतपूर्ण लहजे में) आपको नहलाने का काम भी...

अनु - (कुशन उठा कर वीर की ओर फेंकती है, वीर कुशन को कैच कर लेता है)

वीर - सच... एक बार हुकुम करके तो देखो...

अनु - छी..

वीर - (घुटनों के बल रेंगते हुए अनु के करीब आता है, अनु के दोनों हाथों को अपने हाथों में ले कर) अनु... थैंक्यू... मुझे जिंदगी का मतलब ही नहीं पता था... सच कहूँ तो मैं एक पत्थर था... जिसे तूने अपने प्यार से आकार दिया... के मुझे मेरा अक्स और शख्सियत हासिल हुआ... (अनु के हाथों को चूम कर) आई लव यु अनु...

अनु - (आँखें छलक पड़ती हैं, वह वीर के गले लग जाती है)

वीर - (अनु को अलग करते हुए) ना.. हमने ग़म की उस दुनिया को छोड़... अपनी अलग दुनिया बसाया है... यहाँ चाहे खुशी की सही... पर आंसुओं के लिए कोई जगह नहीं... (वीर अनु के दोनों हाथों को अपने गालों पर लेकर) अनु... आज मेरा मन कर रहा है कि आज की शाम सिर्फ हम दोनों के नाम हो...

अनु - जी...

वीर - फ़िर हम यह खुश खबर सबको बतायेंगे...

अनु - (झिझकते हुए) सब... खुश तो होंगे ना...

वीर - जिनका जुड़ाव हम से है... लगाव हमसे है... वे लोग जरुर खुश होंगे... तुम फिक्र ना करो... देखना भैया... भाभी... रुप... मेरा दोस्त प्रताप... और सबसे ज्यादा खुश मेरी माँ होगी... तु तो जानती है... उन्होंने तुझे आशीर्वाद भी दिया है...

अनु - जी...

वीर - तो एक काम करता हूँ... (चहकते हुए, एक बच्चे की तरह ) अभी ऑफिस जाता हूँ... एक लंबी छुट्टी ले लूँगा... बहुत सारी मिठाइयाँ खरीदुंगा... पहले ऑफिस में... फिर यहाँ आस पड़ोस में... जम कर मिठाई बाँटुंगा.... (अनु वीर की यह हालत देख कर बहुत खुश होती है) और हाँ... तुम आज शाम को तैयार रहना... आज की शाम... हम दोनों के नाम... तुम वह वाला ड्रेस पहनना...

अनु - (हैरान हो कर पूछती है) कौनसी...

वीर - अरे वही... जब हम दोनों पहली बार... मॉल को गए थे... जो ड्रेस मैंने पहली बार तुम्हें दिया था...

अनु - अच्छा... वह ड्रेस...

वीर - हाँ वह वाला ड्रेस... जिसे पहने के बाद... तुमने मुझ पर अपने हुस्न की बिजलियाँ गिराई थी...

अनु - धत... झुठे...

वीर - अरे सच कह रहा हूँ... तुम उस ड्रेस में कयामत लगती थी यार... बिल्कुल एक हंसीनी की तरह.. उड़ते हुए आई मेरे दिल में.. मेरे जीवन में बस गई...

अनु - (शर्माते हुए) ठीक है... मैं पहन लुंगी पर आप भी मेरी दी हुई वह ड्रेस पहनियेगा...

वीर - कौन सा ड्रेस... (अनु मुहँ बनाती है) अच्छा वह ड्रेस... उसके लिए मुझे... भैया भाभी के यहाँ जाना पड़ेगा... वह ड्रेस वहीँ रह गया है...

अनु - तो जाइए ना... आप मुझे उसी ड्रेस में बाहर ले जाइए... प्लीज....

वीर - अरे मेरी जान को प्लीज नहीं कहना चाहिए... हुकुम करो मेरी रानी...

अनु - (मुस्करा देती है) ठीक है.. तो यह हमारा हुकुम है... आप आज मुझे उसी ड्रेस में बाहर ले जाएंगे...

वीर - जैसी आपकी हुकुम मेरी रानी साहिबा...

अनु खिलखिला कर हँस देती है l वीर भी उसके साथ हँसने लगता है l थोड़ी देर हँस लेने के बाद अनु वीर से कहती है l

अनु - अगर आप भैया और भाभी के यहाँ जायेंगे... तो उन्हें सच तो बताना पड़ेगा...

वीर - हाँ तो बता दूँगा ना... वैसे भी... मैं सुबह से भैया से बात करना चाह रहा था... फोन पर मिल नहीं रहे हैं.... पता नहीं घर पर हैं भी या नहीं...

×_____×_____×_____×_____×_____×_____×

राजगड़

अंतर्महल में सुषमा के कमरे में रुप सुषमा के साथ बैठी हुई है l सुषमा और रुप दोनों के चेहरे उतरे हुए हैं l क्यूंकि बीते कल से ना रुप किसी को कॉन्टैक्ट कर पा रही है ना ही सुषमा l

रुप - माँ.. क्या भैया भाभी सबको खबर होगी...

सुषमा - हाँ मुझे लगता है उन्हें खबर होगी... मैं वीर की बात तो नहीं कह सकती पर मुझे यकीन है... विक्रम जरुर राजगड़ के लिए निकल गया होगा...

रुप - पता नहीं क्यूँ... मुझे ऐसा क्यूँ लग रहा है... हमारे परिवार के साथ कुछ अच्छे होने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं...

सुषमा - जो बोया है... उसे काटना तो पड़ेगा ही... समय बड़ा बलवान होता है बेटी... इसलिए सबको समय के साथ चलना चाहिए... जो समय का सम्मान करता है... समय भी उसकी सम्मान रक्षा करता है... जो समय की कदर नहीं करता... समय भी उसे उसके हाल में छोड़ देता है... आज समय हमें छोड़ रहा है...

रुप - कभी सोचा नहीं था... अपनी ही महल में... राजा साहब और हम कैद हो जाएंगे... इतने बेबस हो जाएंगे...

सुषमा - हम इस महल में आज़ाद थे ही कब... और हमारे बस में था ही क्या... हालात तो सिर्फ राजा साहब का बदला है...

रुप - इसका नतीज़ा क्या होगा माँ...

सुषमा - घातक... बहुत ही घातक... पहले अहंकार से क्षेत्रपाल के मर्द अंधे थे... अब अहंकार टूटा है... अपमान और गुस्सा... आँख और विवेक पर पर्दा डाल देता है... वही हुआ भी... अपनी अहंकार के टूटने से... राजा साहब ने रात को खुद पर कोड़े बरसाए... और अभी उनका गुस्सा शांत नहीं हुआ है... पता नहीं... किस पर उतरेगा....

दोनों चौंकते हैं, क्यूंकि उनकी कानों में दुर कोई दरवाजा टूटने की आवाज़ सुनाई देती है l दोनों घबरा कर खड़े हो जाते हैं और कमरे से बाहर निकलने वाले होते हैं कि बाहर से सेबती भागते हुए आती है l

सेबती - राजकुमारी जी... राजा साहब बड़े गुस्से में लग रहे हैं... वह बाहर से आए और आपके कमरे के दरवाजे पर जोर से लात मारे...

यह सुन कर दोनों को हैरत होती है, पर एक अनजानी डर से रुप की हलक सूखने लगती है l कुछ ही देर बाद सुषमा के कमरे में भैरव सिंह आता है l रुप देखती है उसके आँखें अंगारों की तरह दहक रहे थे l भैरव सिंह रुप को देखते ही तेजी से उसके पास आता है और एक झन्नाटेदार थप्पड़ मार देता है l रुप दो घेरा घूमती हुई जाकर फर्श पर गिरती है l

सुषमा - (खौफ से) राजा साहब... यह क्या कर रहे हैं...

भैरव सिंह - श्श्श्श्श्....

रुप की सिर चकरा रही थी, संभलने की कोशिश कर ही रही थी के भैरव सिंह उसके बालों को पकड़ कर खिंचते हुए अंतर्महल की सत्कार प्रकोष्ठ में लाता है l रुप चिल्ला नहीं रही थी पर पीछे पीछे दिल में दहशत लिए सुषमा भागी जा रही थी l प्रकोष्ठ में रुप खुद को संभाल कर खड़ी होती है l सुषमा देखती है रुप की गाल पर थप्पड़ का निशान बैठ गया था और होठों से खून बह रही थी l

सुषमा - (गिड़गिड़ाते हुए) क्यूँ.. क्यूँ राजा साहब क्यूँ... इसकी क्या कसूर है...

भैरव सिंह - (गुस्सा और घृणा के लहजे में) हमें... खानदान में लड़की मंजुर नहीं थी... पर यह बदजात पैदा हुई... हमने पढ़ने के लिए इसे भुवनेश्वर भेजा था... पर यह वहाँ गुलछर्रे उड़ा कर... रंग रलियाँ मना कर आई है...

सुषमा - यह आप कैसी बात कर रहे हैं...

भैरव सिंह - हाँ हम सही कह रहे हैं... अब यह बदजात व्याह कर... दसपल्ला राज घराने में नहीं जा रही है.... इसलिए अब हमें इसकी कोई जरुरत नहीं है...

रुप - हमारा व्याह नहीं होगा... इसलिए आप ख़फ़ा हैं... या दसपल्ला घराने में व्याह नहीं होगा... इसलिए ख़फ़ा हैं...

भैरव सिंह - (चिल्ला कर) बदजात...

रुप - हमें आपकी करनी के वज़ह से दसपल्ला घराना किनारा कर दिया... या हमारी करनी के वज़ह से...

भैरव सिंह - बड़े राजा जी ने सही कहा था... तुम पर भुवनेश्वर की आवो हवा सिर चढ़कर बोल रही है... अपने बड़ों से जुबान लड़ा रही है...

रुप - आप सच तो बोलिए... आपकी करनी... आपकी बदनामी... यह रिश्ता नहीं होने दिया... तो उसका खीज आप मुझ पर उतार रहे हैं...

भैरव सिंह - तु मेरी ही औलाद है... या मेरी गैर हाजिरी में... तेरी माँ ने कहीं गुल खिलाए थे... या कहीं मुहँ मारे थे... जिसका परिणाम बनकर मेरे सामने... मुझसे जुबान लड़ा रही है...

रुप - खबरदार... (गुर्राते हुए) ख़बरदार मेरी माँ के खिलाफ कुछ भी कहा तो... गुल खिलाने... मुहँ मारने के लिए... आपके पुरखों ने राजगड़ में... रंग महल बनाए रखे थे... जहां औरतों का जाना वर्जित था...

भैरव सिंह - (एक थप्पड़ मारता है, पर इसबार रुप नहीं गिरती) मुझे... खबरदार कह रही है...

कह कर दीवार पर लगे एक चाबुक को खिंच कर निकालता है l चाबुक रुप के सामने लहरा रही थी पर रुप के आँखों में खौफ नहीं था l जैसे ही भैरव सिंह मारने के लिए चाबुक उठाता है रुप अपनी जबड़े भिंच लेती है और आँखे मूँद लेती है l चाबुक हवा को चीरती हुई रुप की और आती है l सुषमा खौफ से चिल्लाती है l अचानक उसकी चीख आधे में ही रुक जाती है l रुप आपनी आँखे खोलती है तो देखती है चाबुक की सिरा जो रुप से टकराने वाला था उसे बीच में ही विक्रम ने पकड़ लिया है l

भैरव सिंह - युवराज... आप...

विक्रम - जी...

भैरव सिंह - पहली बार ऐसा हो रहा है... आप हमारे रास्ते पर आड़े आ रहे हैं...

विक्रम - अपने ही घर की दिये कि रौशनी पर चाबुक चलाना... क्षेत्रपाल के रास्ता कब और कैसे बन गया...

भैरव सिंह - यह दिये कि रौशनी नहीं है... यह वह चिंगारी है... जो घरो में आग लगा देती है...

विक्रम - ऐसी कौनसी आग लग गई... जिसकी जिम्मेदार रुप नंदिनी है....

भैरव सिंह - (गुर्राते हुए) युवराज.... आप अपनी लकीर लांघ रहे हैं... छोड़ दीजिए हमारा चाबुक....

विक्रम - नहीं... तब तक नहीं... जब तक हमें एक सवाल का ज़वाब नहीं मिल जाता...

भैरव सिंह - कौन सा सवाल...

विक्रम - अभी अभी चाबुक चलाने से पहले... आपने जिस औरत पर कीचड़ उछाला था... इत्तेफाक से वह मेरी भी माँ थीं... रुप के बारे में आपने अपना खयाल जाहिर कर दी... तो फिर आपका मेरे बारे में क्या खयाल है...

भैरव सिंह कुछ कहता नहीं है l चाबुक नीचे फेंक कर कमरे से बाहर निकल जाता है l उसके जाने के बाद विक्रम रुप की ओर देखता है l रुप आकर विक्रम के गले लग जाती है l

रुप - थैंक्यू भईया...

विक्रम - (दिलासा देते हुए) मैं आ गया हूँ... अब तुम्हें कुछ नहीं होगा...

सुषमा - सही समय पर आ गए तुम विक्रम... वर्ना कुछ ना कुछ तो अनर्थ होने ही वाला था...

विक्रम - कोई बात नहीं छोटी माँ... मैं अपने साथ रुप को ले जाऊँगा...

सुषमा - हाँ विक्रम... इसे अपने साथ जरुर ले जाओ...

रुप - (विक्रम से अलग हो कर) नहीं भैया... मैं अब यहाँ से नहीं जा रही...

विक्रम - क्यूँ...

रुप - बस.. मैं नहीं जा रही...

विक्रम - राजा साहब से नाराज हो... या... गुस्सा...

रुप - दोनों नहीं...

विक्रम - मतलब..

रुप - भैया... मुझे इस बात का दुख नहीं है... की राजा साहब ने मुझ पर हाथ उठाया... हाँ बहुत खुश होती अगर वह एक बाप बन कर हाथ उठाते... मैं चुप चाप हर इल्ज़ाम और जुल्म सह लेती... खुशी से मर भी जाती... पर वह राजा साहब ही रहे... भैया... हम में और गाँव वालों में आज भी कोई फर्क़ ही नहीं है... अगर फर्क़ है तो बस इतना... के वह लोग खुले जैल में रहते हैं... और हम अंतर्महल में... बाकी औकात हम सबकी एक ही है...

सुषमा - यह क्या कह रही है रुप...

रुप - छोटी माँ प्लीज... भैया... ऐसी कोई जीत नहीं है... जिस पर क्षेत्रपाल फक्र कर सके... पर अब कि बार.. हार ऐसी हुई है... जिस पर मातम मना रहे हैं... बात वहाँ तक ठीक भी थी... पर हार की खीज उतारने के लिए... अपने ही घर की औरतों पर चाबुक चला रहे हैं...

विक्रम - मैं समझ सकता हूँ रुप... पर यह कोई बात नहीं हुई... के तुम मेरे साथ भुवनेश्वर ना जाओ...

रुप - नहीं बात यह भी नहीं है... (मुस्कराते हुए) बात दरअसल यह है कि... होली पूर्णिमा की रात को मैंने राजा साहब से वादा किया है... इस बार जब घर से जाऊँगी तो सिर उठा कर... सीना तान कर... उनके आँखों के सामने जाऊँगी... और वह समय अभी आया नहीं है...

सुषमा - यह लड़की पागल हो गई है... विक्रम तुम जानते हो... यह ऐसा क्यूँ कह रही है...

विक्रम - छोटी माँ... आप इसे अपने कमरे में ले जाइए...

सुषमा - विक्रम...

विक्रम - हाँ माँ... आप रुप को अपने कमरे में ले जाइए... मैं राजा साहब के पास जा कर आता हूँ...

सुषमा - मैं यह कहना चाहती थी..

विक्रम - मैं जानता हूँ... समझता हूँ... आप फिलहाल रुप को यहाँ से ले जाइए...

×_____×_____×_____×_____×_____×_____×

शुभ्रा - अरे वीर... तुम... ह्वट अ प्लिजंट सरप्राइज़...

द हैल के ड्रॉइंग रुम में वीर बैठा हुआ था l नौकरों से खबर मिलने के बाद शुभ्रा वीर से मिलने आती है l

वीर - (खड़े हो कर) नमस्ते भाभी...

शुभ्रा - ओ हो.. नमस्ते... यह मैनर्स... लगता है सोहबत का असर है... अनु ने अच्छा सीखा दिया है तुमको....

वीर - नहीं ऐसी बात नहीं है... पर हाँ... ऐसा कहने में कोई बुराई नहीं है... आख़िर आप रिश्ते में और ओहदे में बड़ी तो हैं...

शुभ्रा - (बैठते हुए) बाप रे... क्या बात करने लगे हो... ओके ओके... पहले बैठ तो जाओ... अखिर यह तुम्हारा ही तो घर है...

वीर - (बैठ जाता है)

शुभ्रा - बोलो वीर... तुम्हें इतने दिनों बाद हमारी याद कैसे आई... आई तो आई... पर अकेले... अनु को साथ नहीं लाए...

वीर - मैं भुला ही कब था भाभी... आपने हर कदम पर मेरा साथ दिया... नई राह दिखाई... नई जिंदगी दी...

शुभ्रा - बस बस... तुम यहाँ ताना मत मारो...

वीर - मेरी इज़्ज़त अफजाई को... आप ताना मत कहिये भाभी...

शुभ्रा - तुम हमारे अपने हो... तुम इज़्ज़त अफजाई नहीं कर रहे थे... बल्कि मेरा एहसान गिना रहे थे... अपनों के एहसान गिनाओगे... जो कि तुम्हारा हक भले ही हो... तो वह ताना ही होता है...

वीर - सॉरी भाभी... मैं आपका मन दुखाना नहीं चाहता था...

शुभ्रा - ओह मैं भी तुमको... गिल्टी फिल नहीं कराना चाहती... डोंट माइंड...

वीर - नहीं भाभी... इतना हक तो बनता है आपका...

शुभ्रा - ठीक है... यह बताओ आना कैसे हुआ...

वीर - वह भाभी... सुबह से राजगड़ को फोन लगा रहा हूँ... भैया को भी फोन... लगा रहा हूँ... किसी का भी नहीं लग रहा है...

शुभ्रा - ओह... तुम ने शायद न्यूज देखी होगी...

वीर - हाँ...

शुभ्रा - कल शाम से यह प्रॉब्लम है... विक्की ने कल रात को कोशिश की थी... जब फोन नहीं लगा तो देर रात को ही राजगड़ के लिए निकल गए थे...

वीर - वहाँ पहुँच कर वापस फोन नहीं की...

शुभ्रा - नहीं... नहीं की उन्होंने...

वीर - ओह... (चुप हो जाता है)

शुभ्रा - उन्होंने कहा था... शायद फोन लाइन काट दी गई होगी... या जाम कर दिया गया होगा... जो भी हो आज शाम तक मुझे सारी जानकारी दे देंगे...

वीर - (दबी आवाज में) वह... भाभी... आप साथ नहीं गई...

शुभ्रा - वीर... तुम जानते हो... मैं तभी राजगड़ जाती हूँ.. जब राजा साहब से बुलावा आता है... मेरी हैसियत क्या है उस घर में... तुम जानते हो...

कुछ देर के लिए दोनों के बीच एक चुप्पी सी छा जाती है l इस बात का एहसास होते ही शुभ्रा वीर से कहती है l

शुभ्रा - ओह ओ.. मैं भी ना कैसी बातेँ लेकर बैठ गई यहाँ... खाने के लिए तो दुर... पानी तक नहीं पुछा...

वीर - नहीं भाभी... आप परेशान ना होइए... मैं घर से खाकर ही आया हूँ...

शुभ्रा - क्यूँ... अनु की हाथों का खाना बहुत अच्छा लग रहा है... अपनी भाभी हाथ से बना खाना नहीं खाओगे...

वीर - नहीं भाभी ऐसी बात नहीं है...

शुभ्रा - हाँ हाँ तुम तो ऐसे ही कहोगे... आखिर तुम पैराडाइज में रह रहे हो... यह तो हैल है न...

वीर - (शिकायत भरे लहजे में) भाभी... आप तो मेरी टांग खिंचने लगी हो...

शुभ्रा - (खिलखिला कर हँसते हुए) अभी तो तुमने कहा... इतना तो हक बनता है तुम पर मेरा...

वीर - जी भाभी... (चुप हो जाता है)

शुभ्रा - वीर...

वीर - जी... जी भाभी..

शुभ्रा - तुम किसी खास काम के लिए आए हो... हिचकिचा रहे हो.. साफ साफ कहो... क्या बात है...

वीर - वह भाभी... मैं दरअसल... अपने कमरे से एक ड्रेस लेने आया हूँ...

शुभ्रा - हाँ तो इसके लिए इतना हिचकिचा क्यूँ रहे हो... यह अभी भी तुम्हारा ही घर है... तुम्हें निकाला ही कौन था... तुम्हीं अपनी जिद से दुर चले गए...

वीर - जी भाभी...

शुभ्रा - वैसे एक ही ड्रेस लेने आए हो या सारा का सारा सामान...

वीर - नहीं नहीं भाभी... सिर्फ वह खास ड्रेस ही... जिसे अनु ने मुझे गिफ्ट किया था...

शुभ्रा - ओ... अच्छा... ऊँ हुँ... अनु ने गिफ्ट किया था... (वीर शर्मा जाता है) (शुभ्रा फिर से खिलखिला कर हँस देती है) ठीक है ठीक... जाओ अपने कमरे से लेलो... तुम्हारा कमरा बिल्कुल वैसे ही है... जैसे तुम छोडकर गए थे...

वीर उठता है तो शुभ्रा भी उठती है l वीर अपने कमरे की ओर बढ़ने लगता है साथ में शुभ्रा भी जाने लगती है l वीर कमरे में पहुँच कर अपना वार्डरोब खोलता है l वही ड्रेस निकालता है l शुभ्रा देखती है वीर के आँखों में एक बच्चे के जितनी मासूमियत से भरा खुशी झलक रही थी l

शुभ्रा - आज क्या कुछ खास दिन है...

वीर - जी भाभी...

शुभ्रा - ह्म्म्म्म... मैं गैस कर बताऊँ... (वीर उसे सवालिया नजर से देखता है) लगता है... आज शाम तुम दोनों की कोई रोमांटिक डेट वाला प्रोग्राम है....

वीर - (शर्माता है) है तो...

शुभ्रा - वैसे किस बात की... (वीर हैरान हो कर देखता है) हाँ ना बताना चाहो तो मत बताना...

वीर - आप ऐसे ना कहिये भाभी... मेरी जिंदगी पर आप और भैया का जितना हक बनता है... उतना हक तो मेरे जन्म देने वाले माता-पिता का भी नहीं बनता...

शुभ्रा - (इमोशनल हो जाती है) बस वीर... इतना कह दिया... काफी है...

वीर - सच कह रहा हूँ भाभी...

शुभ्रा - अच्छा ठीक है जाओ... आज का शाम तुम... अनु के नाम कर दो...

वीर - आप पूछोगे नहीं...

शुभ्रा - ठीक है बताओ फिर...

वीर - वह भाभी... आप... आप ना बड़ी माँ बनने वालीं हैं...

शुभ्रा - क्या... ओह माय गॉड... इतनी बड़ी बात... अब कह रहे हो...

वीर - सॉरी भाभी... एक्चुयली मैं यह बात सबको कल कहना चाहता था... आज बस अनु के साथ यह खुशी बाँटना चाहता था...

शुभ्रा - ह्म्म्म्म... ठीक है... मैं समझ गई... यह पल... कितना अनमोल है.. तुम दोनों के लिए मैं समझ गई... जाओ आज की शाम सिर्फ और सिर्फ तुम दोनों के नाम हो...

वीर - थैंक्यू भाभी... मैं अब थोड़ा ऑफिस जाऊँगा... पुरे एक साल की छुट्टी लूँगा...

शुभ्रा - क्या... एक साल...

वीर - मतलब... मेरा ही कॉन्ट्रैक्ट है... अपनी जगह किसी को हायर कर लूँगा... पुरे एक साल तक... अनु के कदम जमीन पर ना पड़े.. बिल्कुल ऐसा ख्याल रखूँगा...

यह बात वीर जिस मासूमियत से कही थी शुभ्रा के मन को बहुत प्रभावित करता है l

शुभ्रा - हाँ वीर मैं जानती हूँ... तुम अनु का बहुत खयाल रखोगे... देखो कल तुम्हें हर हालत में अनु को यहाँ लाना है... नहीं नहीं... मैं जाऊँगी... कल अनु से मिलने... ठीक है...

वीर - जी भाभी...

×_____×_____×_____×_____×_____×_____×

बारंग रिसॉर्ट

अपने कमरे में एक आर्म चेयर पर पिनाक अधलेटा पड़ा हुआ है l पास के टेबल पर शराब की कुछ खाली बोतलें और ग्लास लुढ़की पडी थी l कमरे में अंधेरा पसर रहा था l अचानक कोई पर्दे हटा देता है l जिसके वज़ह से तेज रौशनी पिनाक के आँखों पर पड़ती है l तिलमिला कर वह उठ जाता है l

पिनाक - आह... यह पर्दे क्यूँ हटाए...

#@# - छोटे राजा जी... सुबह कब की हो गई है...

पिनाक - तो... तो मैं क्या करूँ... (अपना हाथ में सूखे ज़ख़्म को देख कर) जब अपनी ही चिराग से घर में रौशनी ना हो तो... दिन क्या रात क्या... बंद कर दो यह पर्दे...

#@# - नहीं... आज नहीं... आई मिन अभी नहीं...

पिनाक - क्यूँ... क्यूँ नहीं...

#@# - आप अपने ग़म में डूबे रहते हैं... ना ऑफिस जा रहे हैं... ना कहीं और... जब कि दुनिया में बहुत कुछ हो रहा है... हो रहा है क्या... बल्कि हो गया है...

पिनाक - क्यूँ... क्या हो गया... किसकी अम्मा चुद गई... जिसका खयाल मुझे करना चाहिए...

वह शख्स चुप रहता है l पिनाक टेबल पर नजर दौड़ाता है l एक बोतल में कुछ शराब बची थी उसे ग्लास में उड़ेल देता है l शराब की ग्लास को होठों से लगाने वाला ही था कि वह शख्स पिनाक के ग्लास वाला हाथ पकड़ लेता है l

पिनाक - (गुस्से में) हाऊ डैर यु... तुमने मेरा हाथ पकड़ा...

#@# - पहले आप जान लीजिए क्या हुआ है अब तक... फिर यह कमरा और यह शराब आपके ही हैं... चाहे तो ग़म में पी सकते हैं... या फिर खुशी में झूम कर...

पिनाक - (एक आशा भरी चमक चेहरे पर उभर जाती है) क्या खबर है...

#@# - एक नहीं दो खबरें हैं... एक अच्छी... और एक बुरी... कौनसा पहले सुनना चाहेंगे आप...

पिनाक - (एक गहरी साँस छोड़ते हुए) तो फिर बुरी वाली ही पहले सुनाओ... क्यूँकी पहले खुशी मनाने के बाद... मातम मनाना नहीं चाहते...

#@# - ठीक है...

इतना कह कर वह शख्स टीवी के पास जाता है और टीवी ऑन कर देता है l टीवी पर राजगड़ में हुए घटनाक्रम को मिर्च मसाला लगा कर सभी न्यूज चैनल वाले प्रस्तुत कर रहे थे l न्यूज में भैरव सिंह के साथ हुए सरकारी करतूत को सुनते ही पिनाक के होश उड़ जाते हैं l वह अपनी कुर्सी से हैरानी के मारे उठ खड़ा होता है l आँखे फाड़ कर न्यूज को सुनते हुए टीवी के पास जाता है फिर पिनाक उस शख्स की ओर मुड़ कर पूछता है l

पिनाक - यह... यह क्या है... यह सब कैसे हो गया... ऐसा करने की हिम्मत... सर्कार में या कानून में आई कहाँ से... कैसे...

#@# - यह तो मैं भी नहीं जानता... पर जो भी हुआ है... कल शाम को ही यह सब हुआ है... यह खबर आपको रात को बताई जा सकती थी... पर आप तो.. (चुप हो जाता है)

पिनाक - (अपनी बालों को नोचने लगता है) आह... यह मुझसे क्या हो गया... जिस वक़्त मुझे राजा साहब के बगल में खड़ा होना चाहिए... मैं उस वक़्त यहाँ...

#@# - आप ही ने तो कसम खाई थी... जब तक जीत ना जाएं... तब तक राजगड़ ना जाने की...

पिनाक - (थोड़ी ऊंची आवाज़ में) हाँ.. हाँ... जानता हूँ... पर... यह सब छोड़ो... पहले यह बताओ... इन सबके पीछे... किसकी साजिश है... क्षेत्रपालों के खिलाफ किसकी साजिश है...

#@# - मैंने खबर लेने की कोशिश की है... और मुझे जो पता चला है... इन सबके पीछे वही है... जिसने सुंढी साही में घुस कर अनु को बचाया था...

पिनाक - विश्व...

#@# - जी...

पिनाक - वह हराम का पिल्ला... उसकी इतनी पहुँच कैसे हो गई... (एक पॉज) मुझे राजगड़ जाना पड़ेगा...

#@# - जैसी आपकी मर्जी... आप ही ने कसम खाई थी... जब तक राजकुमार और अनु को अलग ना कर दें... तब तक राजगड़ नहीं जाएंगे...

पिनाक - सुबह सुबह महसूस खबर के साथ मेरा पूरा दिन खराब कर... मुझे मेरी ही कसम याद दिला रहे हो..

#@# - हाँ वह इसलिए... के आप जब राजा साहब के सामने खड़े हों... तब एक जीते हुए बाजीगर की तरह उनके सामने पेश हों... ना कि एक हारे हुए क्षेत्रपाल की तरह...

पिनाक - इस मनहूस खबर के बाद... कोई अच्छी ख़बर की बात भी कह रहे थे...

#@# - जी...

पिनाक - वह अच्छी ख़बर क्या है...

#@# - अच्छी खबर यह है कि... आज पूरा मौका है... राजकुमार से अनु को हमेशा हमेशा के लिए अलग करने का...

पिनाक - (आँखों में एक जबरदस्त चमक आ जाती है) कैसा मौका...

#@# - जैसे कि आपने ख़बर देखा... राजगड़ में क्या हुआ... उसे देख कर... कल रात से ही... युवराज राजगड़ के लिए निकल चुके हैं...

पिनाक - तो क्या हुआ... उसकी सेक्यूरिटी तो वैसे का वैसे होगा...

#@# - (एक कुटील मुस्कान के साथ) छोटे राजा जी... आप लोग रजवाड़े हैं... युद्ध कला आपसे बेहतर कौन जानता होगा...

पिनाक - पहेलियाँ ना बुझाओ... बात को समझाओ...

#@# - जंग तभी हारी जाती है जब जंग के मैदान में... सेना नायक दिखे ही ना... तब सेना तितर-बितर हो जाती है... अब चूँकि युवराज भुवनेश्वर में नहीं हैं... हम उस जगह की सेक्यूरिटी को बिखर सकते हैं...

पिनाक - वीर भी तो हो सकता है...

#@# - मैं इतना बेवक़ूफ़ थोड़े हूँ... आज राजकुमार सुबह सुबह हैल गए थे... उसके बाद अपनी ऑफिस में गए हैं... आते आते शाम हो जाएगी...

पिनाक - हाँ फिर भी... उस अपार्टमेंट में... चौदह फॅमिली रहते हैं...

#@# - सब काम काजी लोग हैं... आधे से ज्यादा वाइफ और हज्बंड नौकरी पेशा हैं... बाकी जितने हैं... उन्हें हम बाहर से ही लॉक कर देंगे... ताकि कोई चश्मदीद गवाह नहीं होगा... हम आसानी से अपना काम कर निकल जाएंगे...

पिनाक - (बहुत खुश हो कर अपने सूखे हुए ज़ख़्म की देख कर) जब खून कोई ज़ख़्म देता है... तो बड़ा दर्द देता है... पर वह भूल गया है... के मैं उसका बाप हूँ... मेरे दिए ज़ख़्म का मरहम भी मुझ ही से होगा... (शख्स की देखते हुए) जाओ... तैयारी करो... बेटे ने दर्द दिखाया है... अब बाप बतायेगा.... दर्द क्या होता है...

×_____×_____×_____×_____×_____×_____×

अपने कमरे में फर्ग्यूसन की तलवार के सामने खड़े हो कर उस तलवार को देखते हुए भैरव सिंह शराब की चुस्की ले रहा था l पीछे विक्रम आकर खड़ा होता है l सामने लगी काँच की शो केस में विक्रम का अक्स देख कर भैरव सिंह पूछता है

भैरव सिंह - क्या हुआ... राजकुमार...

विक्रम - आप इस वक़्त... इस टुटे हुए तलवार के सामने...

भैरव सिंह - इस तलवार की अपनी एक गाथा है... इतिहास है... जानते हो... यशपुर रियासत को... फर्ग्यूसन की मध्यस्थता से... ब्रिटिशों से... पावर ट्रांसफ़र हुआ था... यह तलवार उसकी गवाह है... निशानी है...

विक्रम - अभी आप इस तलवार को इतनी गौर से क्यूँ देख रहे हैं... जैसे कोई शिकायत कर रहे हैं...

भैरव सिंह - (विक्रम की ओर मुड़ता है) इसी तलवार ने... हम क्षेत्रपाल को... इस इलाके में भगवान बना दिया था...

विक्रम - तो अब...

भैरव सिंह - अभी भी हम यशपुर और इसके आसपास इलाक़ों के भगवान हैं... (अपनी शराब ख़तम कर सोफ़े पर बैठता है) हम बस इतना देखने आये थे... कहीं इस तलवार पर... जंग तो नहीं लग गया...

विक्रम - तो क्या देखा आपने...

भैरव सिंह - यही के अब जो हालात हैं... मुश्किल भरा ज़रूर है... पर थोड़ी देर के लिए है... वैसे.... आप यहाँ क्यूँ आए... कैसे आए...

विक्रम - खबर देखी टीवी पर... फोन करने की कोशिश की... जब फोन नहीं लगा तो अंदाजा हो गया था.... आगे आपका क्या हुकुम होगा... यह जानने के लिए आया हूँ...

भैरव सिंह - हूँ...

विक्रम - तो हुकुम क्या है...

भैरव सिंह - अभी... कुछ बातेँ अंधेरे में है... वकील को भेजा है... उसे आने दीजिए... (कुछ देर की चुप्पी)

विक्रम - कुछ पूछना था...

भैरव सिंह - क्या...

विक्रम - आपने... रुप पर चाबुक क्यूँ चलाई...

भैरव सिंह - (विक्रम को घूर कर देखता है) आप... हम से... फिर से सवाल कर रहे हैं...

विक्रम - हाँ... यह मेरा हक बनता है....

भैरव सिंह - हक... हक तब बनता है... जिस पर हमारी स्वीकृति है...

विक्रम - रुप बहन है मेरी...

भैरव सिंह - आप.. हम से... मैं पर आ गए हैं...

विक्रम - आप हम कह सकते हैं... क्यूँकी आप अपना ही नहीं... अपनों का दूसरों का... फैसला कर सकते हैं... जब मैं खुद का भी फैसला नहीं कर सकता... तो यह हम की रौब क्यूँ और किसलिए...

भैरव सिंह - खुद को हम कहना कोई बकलॉली नहीं है... यह राजसी पहचान है...

विक्रम - क्या यह पहचान कल काम आया...

भैरव सिंह - आप चाहते क्या हैं युवराज...

विक्रम - आप ने रुप पर चाबुक क्यूँ चलाई...

भैरव सिंह - (गुस्से में खड़े होकर) युवराज.... आप हमसे सवाल कर रहे हैं... मत भूलिए... आप राजा क्षेत्रपाल से मुखातिब हैं...

विक्रम - कल को आपकी जगह मैं भी आ सकता हूँ... जैसे बड़े राजा जी के जगह पर आप आए थे...

भैरव सिंह - हाँ हम तब आए थे... जब हमने खानदान को वारिस दी थी... आपके विवाह को तीन साल हो गये हैं... और आपसे वारिस... अभी तक इस खानदान को मिला नहीं है...

विक्रम - आपने कभी शुभ्रा जी स्वीकारा भी तो नहीं...

भैरव सिंह - ओ... तो इस बात का बदला लिया जा रहा है...

विक्रम - नहीं... अपनों से कैसा बदला... खैर हमारी बात... मुद्दे से भटक रहा है... आपने रुप पर चाबुक क्यूँ चलाई...

भैरव सिंह - (तिलमिला कर) क्यूँकी... अब उसकी शादी... दसपल्ला के सिंह देव परिवार में नहीं होगी... तो अब वह हमारी किसी काम की नहीं रही...

विक्रम - काम की नहीं तो गोली मार देते... यूँ चाबुक क्यूँ चलाई...

भैरव सिंह - अभी तो नजर बंद हैं... अगर नहीं होते तो ज़रूर कुछ ना कुछ कर देते...

विक्रम - शादी वहाँ नहीं होगी... यह आपको कब पता चली...

भैरव सिंह - (गुस्से में तिलमिला कर) पुरे स्टेट में जो धाक थी... वह मिट्टी पलित हो गई... जो कानून इस चौखट पर एड़ियाँ रगड़ती थी... इस महल की ओर जो आँखे नहीं उठती थी... पीठ कर उल्टे पाँव नहीं जाती थी... एक ही झटके में... सब कुछ तबाह हो गया....

विक्रम - इन सबका जिम्मेदार कौन है राजा साहब...

भैरव सिंह - (चुप रहता है)

विक्रम - इन सब में... रुप कहाँ से आ गई...

भैरव सिंह - कैसे नहीं... वह हमसे दुश्मनी करने वाले के साथ... रंग रलियाँ मना रही थी... पता नहीं शायद मुहँ भी काला कर लिया हो...

विक्रम - यानी आपको मालुम नहीं है... फ़िर भी गुस्सा रुप पर उतारा...

भैरव सिंह - मत भूलो... हमने खुद को भी सजा दी है...

विक्रम - हाँ सुना मैंने... कल ही शाम को... आपने खुद पर कोड़े बरसाये...

भैरव सिंह - वह इसलिए के गलती जिससे भी हो... उसे सजा मिलनी ही चाहए... इसलिए हमने रुप नंदिनी पर चाबुक से सजा देना चाहा... पर आप बीच में आ गए... वह हमारे दुश्मन से... आह... हम अपने मुहँ से कह भी नहीं सकते...

विक्रम - दुश्मन...

भैरव सिंह - हाँ दुश्मन... कभी हमारे टुकड़ों में पलने वाला कुत्ता... हमें काटने पर तूल गया है... और यह बदजात... उसी से... छी...

विक्रम - जहां तक मुझे याद है.. आप ही कहा करते थे... रिश्तेदारी... दोस्ती या दुश्मनी... हमेशा बराबर वालों से रखी जाती है... या निभाई जाती है...

भैरव सिंह - (गुर्राते हुए) विश्वा हमारे बराबर कभी नहीं हो सकता...

विक्रम - मगर आपने उसे अभी दुश्मन कहा... इसका मतलब यह हुआ कि... उसने आपनी लकीर आपसे बड़ी कर दिया है... यूँ कहूँ तो... उसने अपना कद शायद ऊँचा कर लिया है...

भैरव सिंह - वह... एक वकालत की डिग्री क्या हासिल कर ली... हमारी बराबरी करेगा... युवराज... अपना जेहन दुरुस्त करो... वह हमारे बराबर कभी नहीं हो सकता...

विक्रम - तो फिर उसे दुश्मन मानने की वज़ह...

भैरव सिंह - वह... वह तो हमारे मुहँ से यूहीं बर्बस निकल गया... (एक गहरी साँस छोडकर) रोणा सही कह रहा था... मरवा देना चाहिए था उस हरामजादे को... लगा.. क्या कर पाएगा... ज्यादा से ज्यादा... एक छोटा सा घाव ही दे पाएगा... पर... पर हमारा अंदाजा गलत हो गया... वह घाव पर घाव देता गया... अब वह सारे घाव नासूर बन गया है...

विक्रम - ह्म्म्म्म... जो सदियों से कभी नहीं हुआ... वह आपके हिस्से आया... क्या इस बात की खीज को आपने रुप पर दिखाया...

भैरव सिंह - (एक पॉज) विश्वा ने हमसे दुश्मनी के चलते... उसके और हमारे बीच में... रुप को ले आया... कायर...

विक्रम - गलत... गलत कह रहे हैं... विश्वा और रुप के सबंध पर आप की कहा मान भी लिया जाए... तो भी... विश्वा अपनी लड़ाई में कभी रुप की आड़ नहीं लिया... वह सीधे मुहँ टकराया है आपसे... पर आज उसकी दुश्मनी आप पर इतनी भारी पड़ी.. के रुप को आप बीच में घसीट लाए...

भैरव सिंह - (अपना दांत पीसने लगता है)

विक्रम - इसका मतलब यह हुआ कि... उसने आपकी नीचे की जमीन खिंच ली है... जिसके वज़ह से आप को अर्श से फर्श पर ले आया... वह हमारे बराबर नहीं आया... उसने आपको खिंच कर अपने बराबर ला खड़ा कर दिया... (भैरव सिंह के जबड़े भिंच जाते हैं, मुट्ठीयाँ कस जाते हैं) यकीन नहीं होता... एक सजायाफ्ता... मामुली सी वकालत डिग्री लेकर कर... एक अकेला... ऐसा प्लॉट बनाया के क्षेत्रपाल... अभी चारो खानों चित हैं...

भैरव सिंह - (गुर्राते हुए) वह अकेला नहीं है... इस लड़ाई में चेहरा सिर्फ विश्वा का है... पर नैपथ में... खिलाड़ी और भी हैं...

विक्रम - (हैरानी से) क्या...

भैरव सिंह कुछ नहीं कहता l विक्रम देखता है भैरव सिंह गुस्से में दांत पीस रहा था l उसके कान के नीचे वाली पेशियाँ फुल रहे थे l इतने में कमरे के बाहर भीमा अंदर आने की इजाजत माँगता है l

भीमा - हुकुम... (भैरव सिंह अंदर आने के लिए इशारा करता है) वह वकील बाबु आए हैं... (भैरव सिंह इशारे से अंदर लाने के लिए कहता है)

थोड़ी देर बाद बल्लभ प्रधान कमरे में आता है और अपना सिर झुका कर खड़ा रहता है l भैरव सिंह अपनी कुर्सी पर बैठ जाता है l

भैरव सिंह - बैठो...

बल्लभ - नहीं राजा साहब मैं ऐसे ही ठीक हुँ....

भैरव सिंह - तो... क्या पता किया तुमने वकील...

बल्लभ - (अपनी गले का खरास ठीक करता है) राजा साहब... आप हमेशा... एक तकिया कलाम कहा करते थे... आपने किसी से दोस्ती की नहीं और दुश्मनी किसीसे छोड़ी नहीं...

भैरव सिंह - हूँ...

बल्लभ - आपसे दुश्मनी की दायरा भी... आप तय करते थे... जो दायरा लांघ जाता था... उसे आप ख़तम करदिया करते थे...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... तुम कहना क्या चाहते हो प्रधान...

बल्लभ - यही के बहुत से दुश्मन जो खुद को आपके बनाए दायरे में कैद रखा... आज वह धीरे धीरे लामबंद हो रहे हैं... विश्वा के वज़ह से... विश्वा के लिए...

विक्रम - तुम यहाँ कब से पहेलियाँ बुझा रहे हो... बात को घुमाने के बजाय सीधे सीधे कहो... और पूरा करो...

बल्लभ - यह कहानी पाँच साल पहले शुरु होती है... आपको याद होगा... भुवनेश्वर सेंट्रल जैल में एक हमला हुआ था...

विक्रम - हाँ... याद है...

बल्लभ - उस हमले में... यश अपने ड्रग्स पैडलर्स को बचाने के लिए.... हमारी लॉजिस्टिक्स की मदत ली थी... पर वह हमला नाकामयाब रहा था...

भैरव सिंह - यह सब जानते हैं... आगे बढ़ो...

बल्लभ - उस हमले में सभी हमलावर मारे गए थे... पुलिस की ओर से कोई कैजुअलटी नहीं हुई थी... पर उस रात एक कैदी घायल हुआ था... विश्वा...

भैरव सिंह - (चौंक कर) उस रात.. विश्वा घायल हुआ था...

बल्लभ - हाँ... इस बात को विश्वा के अनुरोध पर पुलिस की तरफ से छुपाया गया था... बदले में कुछ पुलिस वालों को गैलेंट्री अवॉर्ड मिला था... (कुछ पल की चुप्पी के बाद) उनमें से दो... विश्वा के मदत के लिए सीधे मैदान में उतरे हैं... पहला एएसपी सुभाष सतपती... जिसे विश्वा के पीआईएल दाखिल के बाद... एसआईटी का चीफ बनाया गया है... (भैरव सिंह की आँखे फैल जाती हैं) और दूसरा है दासरथी दास... जो अभी राजगड़ थाने का प्रभारी है...

विक्रम - ह्वाट... यह कैसे हो सकता है... विश्वा इन्हें अपनी मदत के लिए सामिल नहीं कर सकता... इसके पीछे कोई स्ट्रॉन्ग पोलिटिकल बैकअप होगा... पर उस हमले से... इन लोगों का विश्वा से क्या संबंध...

बल्लभ - है... क्यूँकी सच्चाई यही है कि... जैल पर हुए उस हमले को... विश्वा ने अकेले ही नाकाम किया था... और तत्कालीन जैल सुपरिटेंडेंट तापस सेनापति जी को बचाते हुए... घायल हुआ था...

विक्रम - तो इससे क्या साबित होता है...

बल्लभ - विश्वा ने जो किया... उससे बहुतों को प्रमोशन मिला... उनमे... सुभाष बाबु और दास बाबु... विश्वा के एहसानमंद हो गए... और सबसे खास बात... प्रतिभा सेनापति जो अपने मरहुम बेटे प्रत्युष की मौत से पागल सी हो गयी थीं... विश्वा को अपना बेटा मान लिया... यानी उस दिन के बाद... विश्वा सेनापति दंपति के मुहँ बोला बेटा हो गया... (भैरव सिंह से) राजा साहब... यह बात आप ही ने हमें कहा था... याद है...

भैरव सिंह - तो इस तरह से... विश्वा को माँ बाप मिल गए..

बल्लभ - जी राजा साहब...

विक्रम - पर विश्वा के हर मामले से... यह सतपती और दास जुड़े कैसे...

बल्लभ - जैल पर उस हमले की न्यायिक जाँच को... राजा साहब ने अपने कॉन्टैक्ट के जरिए रुकवा दिया था... पर तापस सेनापति अंदर ही अंदर उस हमले की तहकीकात कर रहा था... उसे कुछ लीड मिले जो ESS और क्षेत्रपाल की इंवॉल्वमेंट का शक हुआ... उसे यह भी समझ आ गया... के क्यूँ इनवेस्टिगेशन रोक दी गई थी... अब विश्वा उनकी जिंदगी का हिस्सा बन चुका था... और वह यह भी समझने लगे थे... की विश्वा हर हाल में... राजा साहब के खिलाफ कुछ ना कुछ करेगा... इसलिए उन्होंने अपनी नौकरी से विआरएस ले ली... ताकि आगे चलकर विश्वा पर कोई खतरा ना आए... पहले ही अपने बेटे को खो चुके थे... अब दूसरी बार खो नहीं सकते थे...

भैरव सिंह - एक रिटायर्ड सरकारी नौकर की इतनी हैसियत... के वह यह सब प्लॉट बना सके...

बल्लभ - नहीं... पर हाँ...

विक्रम - यह कैसा ज़वाब हुआ...

बल्लभ - सिस्टम के हर कोने में... हर हिस्से में... करप्ट लोग होते हैं... पर कुछ ना कुछ ईमानदार लोग भी होते हैं... और कुछ सिस्टम के सताये हुए लोग भी होते हैं... (बल्लभ रुक कर दोनों की प्रतिक्रिया देखने लगता है, दोनों अपनी अपनी भौंहे सिकुड़ कर बल्लभ की ओर देख रहे थे) तापस सेनापति.. उन्हीं ईमानदार और सिस्टम के सताये हुए लोगों से... अपना कॉन्टैक्ट बढ़ाया... वह हर उस आदमी से कॉन्टैक्ट किया.. जो किसी ना किसी तरह से राजा साहब से खार खाए हुए था... एक दिन उसे खबर मिली के... राजगड़ में होम मिनिस्टर का अपमान हुआ है... वह उनसे भी कॉन्टैक्ट किया... होम मिनिस्टर से मिलकर... तापस सेनापति अपना नेट वर्क बिछाया... जिसका परिणाम आज यह है...

भैरव सिंह - (गुस्से से गुर्राते हुए) होम मिनिस्टर... नहीं बचेगा अब... युवराज...

विक्रम - जी राजा साहब...

भैरव सिंह - आप बाहर जाते ही... होम मिनिस्टर से बात करो और उसे चेताओ... उसकी पाप की गठरी हमारे पास बड़ी हिफाज़त में है... मीडिया को देने में हम जरा भी गुरेज नहीं करेंगे...

विक्रम - जी... जरुर... मैं होम मिनिस्टर से बात करूँगा...

बल्लभ - अब शायद... कोई फायदा ना हो...

भैरव सिंह - क्या मतलब है तुम्हारा...

बल्लभ - राजा साहब... जब सैलाब पर बस ना चले... तो बुद्धिमानी यही है कि... बहाव के साथ बहा जाए... जब तक किनारा ना मिल जाए...

भैरव सिंह - क्या बक रहे हो...

बल्लभ - मेरी पूरी बात सुनिए राजा साहब... आपने भुवनेश्वर में और राजगड़ और यशपुर जिन्हें भी जासूसी करने के लिए भेज रखा था... तापस सेनापति उन्हें पहचान कर अपने ट्रैप में ले लिया था... और आपके पास वही ख़बरें पहुँच रही थी... जो तापस सेनापति चाहता था... (भैरव सिंह की आँखे और मुहँ हैरानी के मारे बड़े हो जाते हैं) जी राजा साहब... उदय... जिसे हम रोणा का आदमी समझ रहे थे... वह असल में... तापस सेनापति का आदमी था... हाँ... राजा साहब वह सेनापति का आदमी था... जो रोणा को बेवक़ूफ़ बना कर रोणा के साथ रहा... फ़िर रोणा को फंसा कर आपके पास लाया.. और आपसे वह करवाया... (चुप हो जाता है)

भैरव सिंह - चुप क्यूँ हो गए... अपनी बात को पुरी करो...

बल्लभ - उसने उस रात अपनी शर्ट पर... पेन कैमरा लगा रखा था.. जिसमें आप रोणा के खिलाफ अपने आदमियों को हुकुम दे रहे थे और मरवाने का प्लान कह रहे थे... उदय ने सब शूट कर दास को दे दिया था...

भैरव सिंह - ओह... तो इसलिए... रोणा की होली दहन की वीडियो देने पर भी... दास ने गाँव वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की...

बल्लभ - हाँ... बल्कि आपकी दी हुई वीडियो को उसने हथियार बना कर... गाँव वालों को ब्लैक मैल किया... आपके खिलाफ धोखाधड़ी का केश करने के लिए कहा... जो विश्वा चाहता था... बदले में... उनके खिलाफ सारे केस माफ करने का वादा किया... इसीलिए तो आसानी से... लोगों ने आपके खिलाफ केस दर्ज कर दिया...

बल्लभ के दिए यह इन्फॉर्मेशन किसी बम की तरह भैरव सिंह के जेहन पर विस्फोट कर रहा था l उसकी मनोदशा देख कर विक्रम बल्लभ से सवाल करता है l

विक्रम - वह तो ठीक है... केस सुबह दो पहर तक हो गया था... पर शाम तक... इतनी बड़ी फोर्स... इतनी तगड़ी एक्शन...

बल्लभ - तहसीलदार नरोत्तम पत्री... असल में इस केस की प्लानिंग... महीनों पहले हो चुकी थी... तापस के कहने पर... होम मिनिस्टर ने... लोगों की केस दर्ज करते ही... पत्री को जुडिशरी इंक्वायरी के लिए एपइंट किया गया... सालों से पत्री मौका ढूँढ रहा था... जैसे ही केस हाथ में आई... उसने तुरंत ही फोर्स भेज कर कारवाई कर दी... (विक्रम और भैरव सिंह दोनों चुप हो जाते हैं, पर बल्लभ कहना चालू रखता है) हम अगर... होम मिनिस्टर के पुराने पाप खोलेंगे... तो राजा साहब का वह वीडियो जिसे उदय ने रेकार्ड किया था... मीडिया तक पहुँच जाएंगी... और अब तक तो... होम मिनिस्टर ने... उस विडिओ की फॉरेंसिक रिपोर्ट भी हासिल कर ली होगी... हम अगर उसके केस को बाहर लाएंगे... तो हमारा वह विडियो वायरल होगा... हम अगर झुठलाने की कोशिश करेंगे तो जाहिर है... उसका भी वीडियो झूठा होगा...

भैरव सिंह - क्या चाल चली है... उस रिटायर्ड सेनापति ने...

बल्लभ - हाँ... हमारा सबका ध्यान... सिर्फ विश्वा पर था... जबकि कोई और भी था... जो पर्दे के पीछे... हमारे खिलाफ मुकम्मल तैयारी कर रहा था...

विक्रम - पर क्यूँ... हमारी सीधी दुश्मनी तो नहीं थी उससे...

बल्लभ - अपने बेटे को बचाने के लिए... मुहँ बोला बेटा ही सही... पर लगाव तो बहुत गहरा है... बाप है आखिर...

विक्रम - क्या विश्वा... जानता है...

बल्लभ - नहीं... विश्वा को भनक तक नहीं है... विश्वा को यह भी नहीं मालुम की... उसके बार काउंसिल लाइसेंस के पीछे तापस सेनापति की कोशिश है... तापस सेनापति ने ही उन्हीं तीन जजों को कंविंस किया... तब जाकर उन्होंने... विश्वा के लिए सिफारिश की थी...

एक सन्नाटा था कमरे में l भैरव सिंह अपनी सोच में खोया हुआ था l विक्रम अपनी सोच में l चुप्पी तोड़ते हुए l

भैरव सिंह - वह मेरे नेट वर्क को कैसे ट्रेस किया प्रधान... कैसे मैनीपुलेट कर पाया...

बल्लभ - वह... शुरुआती दिनों में... मालकान गिरी में नक्सलियों से भीड़ा है... उनकी नेटवर्क की धज्जियाँ उड़ा कर... कई नक्सली मिशन को नाकाम किया था... इसीलिए तो उसे सुपरिटेंडेंट का प्रमोशन मिला था...

विक्रम - कमाल की बात है... विश्वा सोच रहा है वह अपनी लड़ाई लड़ रहा है... जब कि उसे भनक तक नहीं... क्या यह यकीन करने लायक है...

बल्लभ - हाँ... है... क्यूंकि इस क्विक एक्शन पर विश्वा खुद हैरान है... राजा साहब के खिलाफ कई शतरंजें बिछ चुकी हैं... विश्वा अपनी चाल तो चल रहा है... पर उसीके शतरंज के बिसात पर... तापस सेनापति भी दोहरी चाल चल रहा है... इसलिए हम सभी मात खा गए... तापस ना सिर्फ हम पर नजर रखे हुए था... बल्कि... विश्वा पर भी नजर जमाये हुए था... बिल्कुल एक जागृत पिता की तरह...

भैरव सिंह - ठीक है... अभी पूरी बात समझ में आ गई... पर एक ही दिन में... इतनी बारीक बातेँ... तुम्हें पता कैसे चली...

बल्लभ - इंस्पेक्टर दास ने बताया... कल जिस तरह से उसने हँसते हुए बात कही थी.. इसलिए मैंने सीधे उससे बात करना सही समझा...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... अब बात पुरी तरह से समझ में आ गई... ह्म्म्म्म.. (अपनी कुर्सी से खड़ा होता है) जानते हो प्रधान... जहाज़ में जब पानी घुसता है... तब सबसे पहले... जहाज छोडकर चूहे भागते हैं... यह और बात है... जहाज अभी डुबा भी नहीं है... और किनारा दुर भी नहीं है... इसपर तुम क्या कहना चाहोगे इस पर...

बल्लभ - (एक गहरी साँस लेकर छोड़ता है) राजा साहब... मैं आपका लीगल एडवाइजर हूँ... और मैं जहाज के कॅप्टन को छोड़ कर भागूंगा नहीं...

×_____×_____×_____×_____×_____×_____×

पुरे मस्ती के मुड़ में वीर गाड़ी अपनी गाड़ी चला रहा था l ऑफिस में ही अपने कपड़े बदल लिए थे l यह वही ड्रेस था जिसे खरीदने के लिए अनु रुप से लड़ गई थी l यह बात तब रुप ने ही खुद वीर को बताई थी जब रुप की अनु से पहली बार वीर ने परिचय कारवाई थी l वह बात याद कर वीर मुस्करा रहा था और बड़े प्यार से अपने पहने ड्रेस पर हाथ फ़ेर रहा था l उसे वह पल भी याद आ रहा था जब पहली बार अनु को डेट पर ले गया था l ब्यूटी पार्लर की सीढियों से उतरते हुए अनु उसे उस वक़्त किसी परी से कम नहीं लग रही थी एक हंसीनी की तरह नीचे उतर नहीं रही थी बल्कि उस दिन वह वीर के दिल में उतर गई थी l पहली बार उसने महसुस किया था कि एक लड़की ने उसके दिल के तारों को छेड़ दिया था l इस खूबसूरत एहसास से उसे उसके दोस्त प्रताप ने पहचान कराया था l मन ही मन वीर को धन्यवाद देने लगता है l ऐसे ही ख़यालों में खोया हुआ वीर अपने पैराडाइज की ओर बढ़े जा रहा था l फोन की रिंग बजने से वीर अपनी ख़यालों की दुनिया से बाहर आता है l गाड़ी की ब्लू टूथ ऑन करता है l

वीर - हैलो...

@ - कैसे हो राजकुमार...

वीर - कौन...

@ - क्यूँ राजकुमार... उस दो कौड़ी की लड़की ने... ऐसा कौनसा रंग चढ़ा दिया के अपने बाप की आवाज को... पहचान नहीं पा रहे हो...

वीर - ओह... आप...

पिनाक - हाँ हम... हम पिनाक सिंह क्षेत्रपाल बोल रहे हैं...

वीर - कहिये... किस लिए फोन किया आपने...

पिनाक - हमें रह रह कर वह रात याद आ रही थी... जिस रात को आपने... काँच के टुकड़े से... हमारा खुन बहाया था... आपको याद है...

वीर - (चुप रहता है)

पिनाक - वह ज़ख़्म सुख चुका है... पर टीस अभी भी... मेरे दिल में चुभ रही है...

वीर - आपने मुझे फोन क्यूँ किया...

पिनाक - आपको खबर मिल चुकी होगी... राजगड़ में क्या हुआ है...

वीर - हाँ... जानता हूँ... वैसे भी... मेरा अब राजगड़ से कोई लेना-देना नहीं है...

पिनाक - हाँ... तुम्हारा अब तो तुम्हारा सब लेना-देना... तुम्हारा उस रखैल के साथ है...

वीर - खबरदार... जुबान संभालकर बात कीजिए... वह मेरी व्याहता है... मेरी माँ की वह बहु है...

पिनाक - तुम्हारी माँ क्षेत्रपाल की बहू है... पर वह लड़की... क्षेत्रपाल घर की कुछ भी नहीं है... उसकी जिदंगी की अचिवमेंट क्या है... सिवाय तेरी रखैल बनने की...

वीर - (चिल्लाते हुए) पिनाक सिंह अपनी जुबान पर लगाम दो..

पिनाक - अरे वाह... हा हा हा हा हा.... आ गया ना अपनी औकात पर...

वीर - (फोन काट देता है)

वीर गाड़ी में ब्रेक लगाता है l अपने गुस्से को काबु करता है l मोबाइल निकाल कर अनु को डायल करता है l

अनु - हैलो...

वीर - (थोड़े घबराहट में) हाँ अनु... तु ठीक है ना...

अनु - जी मैं ठीक हुँ... आप कब तक आ जायेंगे...

वीर - (एक इत्मिनान की साँस लेकर) बस मेरी जान... मैं आ रहा हूँ...

अनु - राज कुमार....(अचानक कॉल ऑफ हो जाता है)

वीर - अनु... अनु... हैलो...

वीर अनु के नंबर पर डायल करता है l उसे ऑपरेटर वॉयस से फोन स्विच ऑफ की खबर मिलती है l वीर हैरान हो जाता है l अभी अभी तो अनु को फोन किया था फिर स्विच ऑफ l वीर अब गाड़ी को दौड़ाने लगता है l कुछ ही देर में गाड़ी पैराडाइज की पार्किंग एरिया में पहुँच जाती है l तभी उसका फोन फिर से बजने लगता है l वीर देखता है, डिस्प्ले में छोटे राजाजी दिख रहा था l घबराते हुए कांपते हुए हाथ से फोन उठाता है l

पिनाक - तुम बहुत बत्तमीज हो गए हो... बाप की बात काटा नहीं करते... और तमीज से पेश आना चाहिए...

वीर - आप कहाँ हैं...

पिनाक - अरे... अभी अभी तो हम ने तुम्हें बताया... हम राजगड़ जा रहे हैं... पर...

वीर - पर...

पिनाक - पर... तुमने हाथ भले ही ज़ख्मी कर दिया... उसकी मरहम कर जा रहे हैं...

वीर - (चुप रह कर सुन रहा था)

पिनाक - हम ने सारी व्यवस्था कर दी है... तुझसे तेरी रखैल को हमेशा के लिए अलग करने के लिए... (वीर की आँखे दहशत के मारे फैल जाती है)

वीर - नहीं...

वीर फोन काट देता है और भागते हुए लिफ्ट तक जाता है l देखता है लिफ्ट पर कोई लिफ्ट मैन नहीं बैठा हुआ है, और लिफ्ट पर ऑउट ऑफ ऑर्डर का बोर्ड टंगा हुआ है l वह सीढ़ियों से भागते हुए ऊपर जाने लगता है l जैसे ही अपने पेंट हाऊस में पहुँचता है तो देखता है कमरे के अंदर सामान बिखरा पड़ा हुआ है l उसे अनु की मोबाइल फर्श पर पड़ा दिखता है l मोबाइल उठा कर देखता है l डिस्प्ले टूटा हुआ था l वह चिल्लाने लगता है

वीर - अनु... अनु...

कोई जवाब नहीं मिलता उसे l वीर भागते हुए हर कमरा तलाशने लगता है l पर अनु उसे कहीं नहीं दिखती l उसके माथे पर पसीना उभरने लगते हैं l वीर का फोन फिर से बजने लगता है l वीर फोन की स्क्रीन पर देखता है छोटे राजाजी का नाम डिस्प्ले हो रहा था l

वीर - आपने अनु के साथ क्या किया...

पिनाक - गलत... हम उस दो कौड़ी की लड़की को छू कर अपना ओहदा छोटा नहीं कर सकते... हमने यह काम... अपने एक आदमी के सुपुर्द कर दिया है...

वीर - (चिल्लाते हुए) मेरी अनु कहाँ है...

पिनाक - उफ़... चिल्लाओ मत... अपना गला खराब करने से अच्छा है... अनु को बचाने के लिए हाथ पैर चलाओ...

वीर - कहाँ है मेरी अनु... बोलो मुझे...

पिनाक - अरे... जब पहले किडनैप किया था... तुमने ढूंढ लिया था... इसलिए अब चैलेंज के साथ... तुम्हारे आँख के नीचे से उठा कर ले गए... तुमको पता भी नहीं चला...

वीर - क्या...

पिनाक - हाँ... लिफ्ट में ऑउट ऑफ़ ऑर्डर की बोर्ड देख कर समझ बैठे की लिफ्ट खराब हो गई है... चेक करना था...

वीर यह सुन कर भागता है l तो देखता है लिफ्ट नीचे जा चुकी थी l वह सीढियों से नीचे भागता है l जब तक वह पार्किंग एरिया में पहुँचता है तब तक एक गाड़ी अपार्टमेंट से निकल जाता है l वीर अपनी गाड़ी के पास भाग कर आता है तो देखता है गाड़ी की सभी टायरों में हवा नहीं है l वीर बाहर की ओर भागता है l उस गाड़ी के पीछे भागने लगता है l उसे पीछे की काँच से अनु के मुहँ पर पट्टी लगी हुई दिखता है l वह गुस्से से और भी तेजी से भागने लगता है, पर वह थकने लगता है l उसकी दौड़ धीमी होने लगता है l धीरे धीरे उसके आँखों के सामने गाड़ी ओझल होने को होता है कि उसे विपरीत दिशा से आते हुए एक बाइक वाला दिखता है l वीर उस बाइक वाले के ऊपर छलांग लगा देता है, जिसके कारण वह बाइक वाले के साथ गिर जाता है l फिर वह बाइक को उठा कर कार के पीछे फॉलो करने लगता है l कुछ देर के बाद उसे वह कार एक नई बन रही बिल्डिंग के पास दिखता है l वीर बाइक रोक कर हर तरफ नजर दौड़ाने लगता है l वह बदहवास इधर उधर दौड़ने लगता है l उसे अनु या कोई और कहीं भी नहीं दिखते l वीर की रुलाई फुट पड़ती है l रोते रोते घुटनों पर आ जाता है l उसकी मोबाइल फिर से बजने लगता है l वह इस बार मोबाइल बिना देखे उठाता है l क्यूँकी उसे पता था कि वह फोन उसके बाप ने किया है

वीर - (भर्राई आवाज़ में) मेरी अनु को छोड़ दीजिए प्लीज...

@ - छोड़ नहीं.. बचाने का मौका दीजिए बोल...

वीर - (एक अंजानी आवाज सुन कर चौंकता है) कौन कौन हो तुम...

@ - तुम्हारा शुभ चिंतक...

वीर - मेरी अनु कहाँ है..

@ - मेरे पास ही है... और इसी बिल्डिंग में ही है...

वीर - (गिड़गिड़ाते हुए) देखो... तुम्हें जो चाहिए... मैं सब दूँगा... तुम अनु को छोड़ दो प्लीज..

@ - छोड़ दूँगा... इसे अपने साथ लेकर कहाँ जाऊँगा... क्या करूँगा... पर मैंने काम उठाया है... तेरे बाप से मुझे मोटा सुपारी दी है... अब तेरे बाप के सामने मै तेरी तरह नाकारा तो नहीं बन सकता ना...

वीर - (गुस्से में) मेरे बाप ने तुम्हें कितना दिया है... बोलो... मैं उसका दुगुना दूँगा.. तीन गुना दूँगा... बोलो... मेरी अनु को छोड़ दो...

@ - ह्म्म्म्म... वैसे सौदा बुरा नहीं है... बाप मारने के लिए पैसा दे चुका है... बेटा छोड़ने के एवज में पैसा देगा...

वीर - (एक आश भरी उम्मीद से) हाँ हाँ... मैं दूँगा तुम्हें पैसा.. मुहँ मांगी पैसा... बोलो कितना चाहिए...

@ - चलो फिर... मैं पैसे ले लूँगा... तुम एक काम करो... अपनी दाहिनी तरफ घूमों.. (वीर घूमता है) वहाँ पर.. एक फायर एस्टींग्वीशर रखा होगा... उसके पास जाओ.... (वीर वैसा ही करता है, फायर एस्टींग्वीशर के पास पहुँचता है) उसके पीछे गन रखी है... लेलो... (वीर एस्टींग्वीशर के पीछे टटोलकर गन ले लेता है) अब तुम्हारे पास एक गन है... गन यानी रीवॉल्वर... उसके अंदर बुलेट चेक कर लो... (वीर चेक करता है उसमें छह बुलेट थे) गुड... अब इस बिल्डिंग के तीसरे माले पर जाओ... दो लोग... तुम्हारे अनु को दबोच रखे हैं... जाओ.. तुम्हें बचाने का मौका दे दिया... जब बचा लो... तो मैं तुमसे पैसे लेने खुद आ जाऊँगा...

वीर - (गन को कस कर पकड़ लेता है) तुम जो भी हो... थैंक्यू...

फोन कट चुका था l वीर रीवॉल्वर हाथ में लेकर धीरे धीरे तीसरे माले की ओर बढ़ता है l तीसरे माले पर पहुँच कर छुप कर चारों ओर अपनी नजर घुमाता है l हर तरफ़ सन्नाटा ही सन्नाटा था l अपनी कान लगा कर सुनने की कोशिश करता है l उसके कानों में रूंधे हुए गले से दबी हुई आवाज़ सुनाई देता है l वह उस ओर नजर डालता है l उसे लगता है एक पिलर के पीछे कुछ है l वह उस ओर धीरे धीरे बढ़ने लगता है कि तभी एक आदमी एक रॉड से वीर पर हमला कर देता है l वीर उससे बचते हुए उस पर गोली चला देता है l गोली उस आदमी के सीने में लगती है l गोली की आवाज से पिलर के पीछे एक और आदमी अनु की मुहँ को दबाये बाहर निकलता है l अपने साथी को छटपटाते देख वह आदमी अनु को छोड़ कर उस ओर भागने लगता है कहाँ कोई दीवार बना ही नहीं था l वीर भी उसके पीछे भागने लगता है

वीर - रुक हरामजादे रुक... नहीं तो गोली मार दूँगा...

वीर एक गोली चलाता है वह आदमी फर्श पर छलांग लगाते हुए बचता है l फिर से खड़े हो कर भागने लगता है l वीर फिर एक गोली चलाता है l वह आदमी इस बार नीचे कुद जाता है l वीर जब तक उस सिरे पर पहुँचता है l वह आदमी नीचे रेत पर से उठ कर भाग जाता है l वीर उस पर निशाना लगाने की कोशिश करता है कि उसके कानों में अनु की आवाज सुनाई देती है l

अनु - राजकुमार जी...

वीर रुक जाता है, और उस पिलर की तरफ मुड़ता है l अनु उसे दिखाई नहीं दे रही थी l वीर घबरा जाता है l वह चिल्लाता है

वीर - अनु...

एक जनाना हाथ पिलर की ओट से पिलर को पकड़ते हुए दिखता है l फिर अनु का चेहरा सामने पिलर की ओट से निकालता है l अनु को देखते ही वीर खुश हो जाता है l अनु की आँखे नम थीं और लाल भी दिख रही थी l वीर रीवॉल्वर को किनारे फेंक कर अपनी बाहें फैला देता है l वीर को बाहें फैलाता देख अनु के चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान खिल जाती है l वह पुरी तरह से पिलर की ओट से बाहर आती है, वीर देखता है अनु उन्हीं कपड़ों में थी जो उसने पहली बार अनु के लिए खरीदा था l अनु वीर की ओर भागने की कोशिश करती है l पर दो कदम पर मुहँ के बल गिरती है l अनु के गिरते ही वीर देखता है अनु की पीठ पर एक खंजर घुसा हुआ था, पीठ खून से सना हुआ था l यह मंज़र देख वीर के दिलोदिमाग पर जैसे बिजली सी गिरती है l उसके मनोभाव को प्रकृति भी समझ चुकी थी, इसलिए आसमान में भी बिजलियाँ कड़क रही थीं l वीर के मुहँ से चीख निकल जाती है l

वीर - अनु... (भागते हुए अनु के पास पहुँचता है l नीचे बैठ कर अनु को पलट कर गोद में लेता है, रोते हुए) अनु... ऐ अनु... (अनु की आँखे बंद थीं, अनु को झंझोड़ कर) ऐ अनु... अपनी आँखे खोल... (अनु अपनी आँखे खोलती है) हाँ... हाँ अनु.. देख कुछ नहीं हुआ है तुझे... छोटा सा चोट है... तु घबरा मत... मैं हूँ ना... तुझे अभी डॉक्टर के पास ले जाऊँगा... बस छोटी सी मरहम पट्टी होगी... बस

अनु - (कराहते हुए दर्द भरी आवाज में) झूठे...

वीर और कोई दिलासा नहीं दे पाता, वह फुट फुट कर रोने लगता है और अपने माथे पर हाथ मारने लगता है l अनु की आँखे बंद हो रही थी l

वीर - अनु... प्लीज मुझे छोड़ कर मत जा.. देख... मुझे देख... मैंने तेरे लिए सबको छोड़ दिया... तु मुझे छोड़ कर कैसे जा सकती है... प्लीज अनु प्लीज... तेरे सिवा दुनिया में कोई नहीं है मेरा... प्लीज मेरे खातिर हिम्मत कर... मैं तुझे डॉक्टर के पास ले जाऊँगा... तु बच जायेगी...

अनु अपनी मुट्ठी में वीर के ड्रेस की कलर को पकड़ कर वीर के करीब जाने लगती है l वीर भी अनु को अपनी बाहों में ले लेता है l वीर का हाथ फिसल कर अनु की पीठ में घुसे खंजर पर जैसे ही लगता है, वीर और भी टुट जाता है अनु को अपने बाहों में जोर से कस लेता है और रोने लगता है l अनु की गाल अब वीर के कंधे पर थी और हाथ वीर के बालों पर l अनु वीर के बालों को झटका देते हैं झंझोड़ती है l वीर का रोना अचानक थम जाता है l

अनु - (धीमी आवाज में) आई लव यु...

यह सुनते ही वीर की आँखे फैल जाती हैं l वीर महसूस करता है, अनु की पकड़ ढीली पड़ चुकी थी l वीर अनु को अपने से अलग कर अनु को देखता है l अनु की साँसे थम चुकी थी और आँखे भी बंद हो चुकी थी पर अनु का चेहरा दमक रही थी एक संतुष्टि और संतृप्ती के साथ l वीर फिर से सुबकने लगता है कि उसका फोन बजने लगता है l वीर फोन निकाल कर देखता है l स्क्रीन पर छोटे राजाजी दिख रहा था l वीर के चेहरे का भाव बदल जाता है l एकदम से कठोर हो जाता है l फोन उठाता है

वीर - हैलो...

पिनाक - तो तुम्हारी छमीया परलोक सिधार गई... तुमने मुझे छोटा घाव पर जबरदस्त दर्द दिया था... उसी दर्द का इलाज था... तेरी रखैल की मौत... तुम बेटे हो... और हम तुम्हारे बाप हैं... समझे... और उससे भी अधिक... हम क्षेत्रपाल हैं... अब बात को समझो... हम राजगड़ जा रहे हैं... महल में आ जाओ... और फिर से क्षेत्रपाल बन जाओ... तुम्हारा इंतजार रहेगा...

फोन कट जाता है l वीर का चेहरा और भी सख्त ही गया था l अनु की लाश को गले से लगा लेता है और कहता है l

वीर - अनु... मुझे तेरी कसम है.. आज जिन लोगों ने हमारी खुशियाँ और दुनिया उजाड़ी है... वे सारे लोग खुन के आँसू रोयेंगे... कुत्ते की मौत मरेंगे... मेरा वादा है तुझसे...
 
धन्यवाद मित्र

हाँ खुशियों से आरंभ होकर पीड़ा से गुजर रहा है यह मोड़

पर यह होना ही था

मैं इसका औचित्य नहीं ठहरा रहा पर यह कहानी का एक विशेष मोड़ है


हाँ पिनाक की दुनिया अब उजड़ने वाली है पर उसका तरीका थोड़ा अलग होगा l अब हर वह दुश्मन जो पर्दे के पीछे हैं सब के सब सामने आयेंगे l वीर अपना बदला लेगा

हाँ यह बात आपने बिल्कुल सही कही, फ़िलहाल वीर केवल और केवल अपने बाप पिनाक के बारे हो सोच रहा है

हाँ अब राजा के सामने भेद खुल चुका है l राजा को अब मालुम हो गया है कि कौन उसके पीठ के पीछे उसके खिलाफ षडयंत्र में लिप्त थे l वह अपनी मौके की ताक में होगा, जिस दिन मिलेगा अपनी पुरी ताकत से वार करेगा

पिनाक अपनी करनी का बहुत बड़ा कीमत चुकाएगा जाहिर है राजा अब अकेला पड़ने वाला है

शुक्रिया मेरे दोस्त आपका बहुत बहुत शुक्रिया

शायद पहली बार आपने इतना लंबा विश्लेषण लिखा है l फिर से धन्यवाद
 
अब होनी को कौन टाल सकता है

वीर कोई महापुरुष तो नहीं था हाँ उसमें बदलाव आए थे पर उसके वर्तमान पर उसके अतीत हावी हो गई जिसकी कीमत उसने अनु को खो कर चुकाई है l

अरे भाई ऐसा क्यूँ

आप कुछ पाठकों में से एक हैं जो मेरे प्रस्तुत किए अंकों की समीक्षा और विश्लेषण सटीकता से करते हैं l

भाई अगर सब अच्छा ही हो रहा होता तो समाज में ऑनर किलिंग जैसी मानसिकता ना होती l कई प्रेम कहानियाँ, कितने प्रेमी इसी मानसिकता के भेंट चढ़ गए हैं l यह भी समाज का एक अस्वीकार्य वास्तविकता है l

हाँ यह तो है अब भैरव सिंह को पता चल गया है l कौन कौन उसके खिलाफ है l आगे वह उसी प्रकार से वार करेगा यह निश्चित है

हाँ भैरव सिंह को जो हार नसीब हुई वह उसकी कभी सोच भी नहीं सकता था l अब हालात यह है कि वह बाहर नहीं निकल पा रहा है l इसी खीज के चलते वह अपना हार की खीज को रुप पर उतारा l अब रुप को हिम्मत तो दिखानी ही थी, आखिर कर कहानी की प्रमुख व प्रधान नायिका जो है

धन्यवाद बंधु आपका बहुत धन्यवाद

कुछ दिन हुए हम लोग सरकारी काम में व्यस्त थे

इलेक्शन ड्यूटी पर किसे भेजना है किसे नहीं इस बाबत डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के साथ हम लोग मैनेजमेंट की तरफ से प्रतिनिधित्व कर रहे थे l इसलिए मैं रेगुलर आ नहीं पा रहा था l
 
SANJU ( V. R. ) भाई अभी कहानी में जो हुआ है निःसंदेह बहुत से पाठकों के हृदय को घात पहुँचाया है l पर यह समाज का एक अप्रिय स्वीकार्य वास्तविकता है l जिसे हम ऑनर किलिंग कहते हैं l आप मानें या ना मानें आज भी समाज के कुछ हिस्सों में यह जड़ों की गहराई तक यह विष प्रभाव में ग्रसित है l

कहानी में यह मोड़ अति आवश्यक थी l पहले भी मैंने कई मित्रों को संक्षेप में सांकेतिक भाषा में कहा भी था l इस युद्ध में वीर अपने हिस्से की कुर्बानी देगा l खैर मैं इतना वादा जरुर करता हूँ l यह कहानी अनु की आगमन पर ही खत्म होगी l कैसे होगी यह आप मुझपर छोड़ दीजिए यह सुखद अंत मैं अवश्य दूँगा l

हा हा हा हा

कहानी अपनी अंत की ओर बढ़ रहा है

इस अपडेट ने भले ही कई दिलों को तोड़ा है पर अंत सुखद होगा यह मेरा वादा है

अब कहानी का यह हिस्सा कोर्ट रुम में जाने वाली है जहां वह अज्ञात आदमी पर सस्पेंस खुलेगा l वीर अपना प्रतिशोध भी लेगा l

बाकी अनु की सरप्राइज मिलेगी

यह निश्चित है
 
Back
Top