Thriller "विश्वरूप" ( completed ) - Page 16 - SexBaba
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Thriller "विश्वरूप" ( completed )

👉एक सौ सत्तावनवाँ अपडेट

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तो... तुमने सेनापति सर और मैडम जी को.. भिजवा दिया...

यह सवाल था डैनी का विश्व से l पिछले दिनों की तरह वे दोनों नराज बैराज के जॉगर्स पार्क में रिवर व्यू पॉइंट पर बेंच पर बैठे हुए थे l हर दिन की तरह लोग जॉगिंग कर रहे थे l बच्चे अपने कोलाहल में व्यस्त थे l डैनी के सवाल के जवाब में विश्व कहता है

विश्व - हाँ.. यह जरूरी था... क्यूँकी मैं जानता हूँ... एक बार अगर राजगड़ में उलझ गया... तो यह केस ख़तम होने तक.... मैं निकल ही नहीं पाऊँगा...

डैनी - हाँ... यह तुमने अच्छा किया... क्यूँकी मुझे लग रहा है... भैरव सिंह अब पागल हो गया है...

विश्व - पागल...

डैनी - हाँ पागल... और थोड़ा अग्रेशन में भी लग रहा है... वैसे मुझे अभीतक यह समझ में नहीं आया... तुम्हें तो राजगड़ वापस चले जाना चाहिए था... तुम क्यूँ रुके हुए हो अब तक...

विश्व - वह इंस्पेक्टर दास बाबु का... कुछ काम रह गया है... उन्होंने ही कहा था... रुकने के लिए... ताकि मिलकर हम राजगड़ जाएं...

डैनी - जानते हो... भैरव सिंह भी राजगड़ नहीं गया है...

विश्व - हाँ... जानता हूँ... पता नहीं क्यूँ नहीं गया है अब तक...

डैनी - कुछ लोग जो पहले से अंडरग्राउंड हैं जिन्हें ढूंढ रहा है... और अदालत की इस पहल से... जो कुछ लोग अंडरग्राउंड होने की तैयारी में हैं... उनके लिए कुछ इंतजाम कर रहा है... शायद..

विश्व - क्या... आपका इशारा किसके तरफ है...

डैनी - पत्री... नरोत्तम पत्री... वह खुद को... अंडरग्राउंड करने की तैयारी में है...

विश्व - हाँ उन्होंने जो करना था कर लिया... अब बाजी मेरे और भैरव सिंह के बीच है...

डैनी - पर भैरव सिंह... कुछ भूलता नहीं है... वह इस बात का बदला लेगा जरूर...

विश्व - हाँ लेगा... पर इतनी जल्दी नहीं... क्यूँकी ना तो भैरव सिंह का पोजीशन इस वक़्त इतना मजबूत है... और ना ही... पत्री साहब कोई छोटे ओहदे वाले हैं.... पत्री साहब अपनी सरवाइवल का कुछ तो सोच रखा होगा...

डैनी - ह्म्म्म्म...

दोनों अचानक चुप हो जाते हैं l उन्हें महसूस होता है कि अभी पार्क में सिर्फ वे दोनों ही हैं l दोनों सतर्क हो जाते हैं और अपनी नजरें चारों तरफ घुमाते हैं l कुछ देर पहले जो लोग दिख रहे थे अचानक सब गायब हो गए थे l बच्चों का कोलाहल सुनाई देना तो दुर कोई आसपास दिख भी नहीं रहे थे l दोनों खड़े हो जाते हैं l धीरे धीरे कुछ लोग आकर उनसे कुछ दूरी बना कर उन्हें घेर कर खड़े हो जाते हैं l कुछ देर बाद रंगा चलते हुए सामने आता है l विश्व उसे देख कर भौंहे सिकुड़ लेता है l

रंगा - हा हा... चौंक गए...

डैनी - तुम्हारी हिम्मत की दाद देता हूँ... अपने जोकरों को लेकर हमें घेरने आए हो...

रंगा - ना ना ना... इतना हिम्मत तो मैं कभी कर ही नहीं सकता... वह भी डैनी भाई के सामने... पर मैं हूँ तो नमक हलाल ना.. अब मालिक का हुकुम है... तो मुलाकात तो बनता है ना...

डैनी - मालिक... कौन मालिक...

विश्व - भैरव सिंह...

वाह वाह... क्या बात है... (ताली बजाते हुए भैरव सिंह इनके तरफ़ चलते हुए आता है, विश्व देखता है उसके साथ बल्लभ प्रधान और केके आकर रंगा के पास रुक जाते हैं, पर भैरव सिंह उन दोनों के पास आकर खड़ा हो जाता है) बहुत अच्छा अनुमान लगाया... गुलामों को देखकर... बादशाह को पहचान लिया...

डैनी - ऐसे बादशाहों को... मैं रोज तास की गड्डी से निकाल कर टेबल पर पटकता रहता हूँ...

भैरव सिंह - पर अफसोस... मेरा झांट भी बाँका ना कर सके... ना तब... ना अब...

डैनी - बात औकात की होती है... जो पट्ठे से हो जाए... वहाँ उस्ताद क्यूँ कर क्या करेगा...

भैरव सिंह - वाकई... हाँ डैनी... तुमने अपने पट्ठे को... अच्छा ग्रूम किया है... उसने वह कर दिया... जिसकी हमने... (नफरती आवाज में) कभी दूर दूर तक सोचा भी नहीं था...

डैनी - लगता है यही सोच सोच कर... दिमाग को बहुत गरम कर रखा है... कोई नहीं... यहाँ सुबह सुबह नारियल पानी अच्छा मिलता है... पी लो.. वह भी मेरे खाते से... दिमाग ठंडा रहेगा... ताकि आगे की सोच सको...

भैरव सिंह - (लहजा थोड़ा कड़क करता है) यह नारियल पानी... अब हमें नहीं... तुम लोगों को जरूरत पड़ेगी... (विश्व से) तु... तुने अपनी सीमा लाँघ ली है... अब तेरे पास कोई लाइफ लाइन नहीं है... अब सजा के लिए तैयार रहना...

विश्व - तुने जो बोया था... आज वही काट रहा है... भैरव सिंह... वही काट रहा है... तेरी करनी... तेरे पास सूद के साथ लौट रहा है...

भैरव सिंह - (रौब के साथ) हम क्षेत्रपाल हैं.. राजगड़ ही नहीं... हर उस इलाके के... जो राजगड़ से किसी ना किसी वज़ह से ताल्लुक रखता हो... हम... (लहजे में थोड़ा दर्द) उन सबके भगवान हुआ करते थे कभी... यहाँ तक कि... सरकार तक... हमारी मर्जी से बनतीं थीं... लोगों की जिंदगी... मौत तक... हम तय करते थे... पर हमने तुझ पर जरा सी आँख क्या बंद कर ली... तुने हमारे ही चेहरे पर पंजा मार दिया...

विश्व - हाँ... वह भी ऐसा मारा... के खुदको खुदा समझने वाला... अब आईने में खुद का चेहरे देखने से घबरा रहा है...

भैरव सिंह - हाँ... ठीक कहा तुने... जिन कीड़े मकौड़ों को अपनी पांव तले हम रौंदा करते थे... वही आज हमारे मूँछ पर हमला कर दिया...

विश्व - तो अब यहाँ... इन बारातियों को लेकर... क्या करने आया है... मुझे धमकाने.. या मारने...

भैरव सिंह - तुझे इतनी आसानी से... मार दूँ... ना.. मैं यहाँ यह बताने आया हूँ... के अब की बार... तु राजगड़ आयेगा... तो नर्क किसे कहते हैं... वह देखेगा...

विश्व - अभी भी राजगड़ कौनसा स्वर्ग है...

भैरव सिंह - जो भी है... जैसा भी है... हम उसके भगवान हैं... और अब से... आज के बाद वही होगा... जो हम चाहेंगे... तेरे लिए खुला मैदान.. खुला आसमान होगा... जैसे ही अपने हाथ पैर हिलाने के लिए कोशिश करेगा... तुझे अपने हाथ पैर बंधे हुए महसूस होंगे... वादा रहा...

विश्व - वादा... तु है कौन... तेरी हस्ती क्या है...

भैरव सिंह - हम.. हम भैरव सिंह क्षेत्रपाल हैं... तु भूल कैसे गया...हैं... कैसे भूल गया... जब गाँव के लोग... चुड़ैल समझ कर, तेरी दीदी को नंगा कर दौड़ा रहते थे... पत्थरों से मार रहे थे... तब गाँव के लोग... पत्थर फेंकने इसलिए से रोक लिया था... क्यूँकी तु उनके सामने था... और तब तु क्षेत्रपाल महल का... दुम हिलाता कुत्ता हुआ करता था...

विश्व की जबड़े और मुट्ठीयाँ भिंच जाती हैं, आँखों में वह मंजर तैरने लगता है l गुस्से से नथुनें फूलने लगते हैं, तब डैनी उसके कंधे पर हाथ रख देता है l

डैनी - क्षेत्रपाल... ओह... सॉरी भैरव सिंह क्षेत्रपाल.. कितना बुरा दिन आ गया है तेरा... अपनी शेखी... दुम हिलाते कुत्ते के आगे बघार रहा है...

भैरव सिंह - (कुछ देर के लिए चुप हो जाता है) नहीं बे हरामी... उसे याद दिला रहा हूँ... कुत्ता... कुत्ता ही रहता है... कभी शेर नहीं बन जाता...

विश्व - बिल्कुल सही कहा तुमने... कुत्ता हमेशा खुद को अपनी गली में शेर समझता है... और अपनी गली से... ललकारता है...

डैनी - अरे हाँ... विश्व... यह तुम्हें राजगड़ में इसीलिए ललकार रहा है ना...

विश्व - हाँ... वह भी अपना झुंड लेकर आया है...

भैरव सिंह - कहावत है... दिया जब बुझने को होती है... तभी बहुत जोर से फड़फड़ाता है... जितना फड़फड़ाना है फड़फड़ा ले... पर जब तु बुझेगा... और बुझेगा ज़रूर... यह फड़फड़ाना भूल जाएगा... इसलिये यह अकड़... बचा कर रखना काम आएगा... क्यूँकी... हम तेरे तन... मन... और आत्मा में इतने ज़ख़्म भर देंगे... के साँस लेना भी भारी हो जाएगा... इसे कोरी धमकी मत समझ... वादा है... क्षेत्रपाल का वादा... ऐसा ही एक वादा तेरी बहन से भी कर आए थे...

विश्व - इतनी देर से... क्या यही बकैती करने... मेरे पास आया है... सिर्फ इतनी सी बात...

भैरव सिंह - नहीं सिर्फ इतनी सी बात नहीं है... हमने तेरी बहन से एक दिन वादा किया था... के चींटी जब तक हमें काटने की औकात पर ना आए... हम तब उसे मसलते भी नहीं है... क्यूँकी दुश्मनी करने के लिए भी औकात की जरूरत होती है... पर तु अपनी औकात से भी आगे बढ़ गया... तुझे क्या लगा... उस दिन हमने तुझ पर हाथ क्यूँ नहीं उठाया... दोस्ती दुश्मनी और रिश्तेदारी के लिए... हैसियत बराबर का होना जरूरी है... उस दिन अगर हम तुझे छु लेते... तो हम अपनी हैसियत से गिर गए होते... पर हमने ऐसा किया नहीं... तुझे चींटी समझने की भूल की थी... जबकि तु एक सांप निकला... तेरे साथ वही होगा... जो हर एक सांप के साथ किया जाता है... तेरा फन कुचल दिया जाएगा... वह भी राजगड़ के लोगों के सामने... तु उन गलियों में भागेगा... जिन गालियों में हम चल कर आए थे... तेरी और तेरी बहन की ऐसी हालत होगी... के आने वाली नस्लें... मिसालें देती रहेगी... ताकि आइंदा राजगड़ की मिट्टी में.. तेरी बहन.. या तेरी जैसी गंदगी कभी पैदा नहीं होंगी...

विश्व - बात बात में बहुत बोल गया... यह ख्वाब तेरे अधूरे हैं... जो कभी पुरे नहीं होंगे... खैर... मैं भी तुझसे वादा करता हूँ... तेरी हस्ती... तेरी बस्ती मिटा दूँगा... पर तुझे कभी भी हाथ नहीं लगाऊंगा... वादा... विश्व प्रताप महापात्र का वादा...

भैरव सिंह - वादा... तु मुझसे वादा कर रहा है... तेरी हस्ती.. औकात और हैसियत क्या है... डर तो अभी भी तु मुझसे रहा है... तभी तो... तेरे मुहँ बोले माँ बाप को कहीं भेज दिया है...

विश्व - हाँ भेज दिया... पागल कुत्ता कब काटने को आ जाए क्या पता... इसलिये...

भैरव सिंह - (नफरती मुस्कान के साथ) श्श्श्... मीलते हैं... बहुत जल्द...

कह कर भैरव सिंह मुड़ता है और हाथ के इशारे से सबको अपने साथ चलने के लिए कहता है l कुछ देर में पूरा पार्क खाली हो जाता है l इतनी खामोशी थी के पीछे बहती नदी की कल कल की आवाज़ सुनाई दे रही थी l

विश्व - डैनी भाई... क्या आपका भैरव सिंह से... पहले से कोई वास्ता है...

डैनी - हाँ...

विश्व - आपने पहले कभी बताया नहीं...

डैनी - तुम्हारी और मेरी कहानी में ज्यादा फर्क़ नहीं है...

डैनी अपनी कहानी कहता है, कैसे उसकी बहन को भैरव सिंह ने बर्बाद किया था l क्यूँ डैनी की बहन ने आत्महत्या कर ली थी l डैनी अपना बदला लेने के लिए निकला और कहां से कहां पहुँच गया l

विश्व - तो जैल में... आपने जो कहानी बताई थी... वह पूरी तरह झूठ था...

डैनी - हाँ... विश्वा... तुम्हारी कहानी और मेरी कहानी एक जैसी है... पर जो अलग है... वह यह है कि... तुम्हारी दीदी... मेरी बहन की तरह आत्महत्या नहीं की... ना ही तुम मेरी तरह लाचार बने... तुम दोनों लड़ना नहीं छोड़ा... मैंने भैरव सिंह से वादा किया था... उसके सामने एक ऐसा हथियार खड़ा करूँगा... जिसे वह इंसान भी ना समझता हो... इसलिए मैंने जो भी... बदला लेने के लिए कमाया था... वह सब तुम्हें दे दिया... और मुझे यह कहते हुए जरा भी झिझक नहीं है... तुम अपना बदला बिल्कुल सही तरीके से ले रहे हो... (विश्व की तरफ देख कर) तुम अपनी तैयारी करो... मैं तुमसे वादा करता हूँ... श्रीधर परीड़ा अगर मौत के जबड़े में भी होगा... तब भी... मैं उसे... मौत की जबड़े से खिंच कर तुम्हारे लिए ले आऊँगा...

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एक ट्रेन अपनी पटरी पर भागी जा रही थी l उस ट्रेन के एक फर्स्ट क्लास कंपार्टमेंट के केबिन में प्रतिभा सेनापति बैठी एक न्यूज पेपर पढ़ रही थी l तापस केबिन का दरवाजा खोल कर अंदर आता है और सामने वाली सीट पर बैठ जाता है l

तापस - क्या कर रही हो जान...

प्रतिभा - अकेले... यह लेनिन कहाँ गया...

तापस - ओहो... बताया तो था... उसे टोनी कहना.. उसने अपना आइडेंटिटी बदला हुआ है...

प्रतिभा - ठीक है... कहाँ है वह टोनी..

तापस - थोड़ा टहल रहा है...

प्रतिभा - प्रताप के साथ इसकी दोस्ती कब और कैसे हुई...

तापस - यह मैं कैसे कह सकता हूँ... जैल के अंदर भी एक दुनिया है... वहाँ पर सरवाइवल के अपने नियम होते हैं... वहाँ हर कोई अपना ग्रुप बना कर सर्वाइव करता है... और जरूरी नहीं कि हर बात... प्रताप हमसे शेयर करे...

प्रतिभा - फिर भी... उसने हमें भेज कर ठीक नहीं किया... आपने भी... उसका सपोर्ट किया...

तापस - जान... कभी कभी तुम जरूरत से ज्यादा इमोशनल हो जाती हो... अगर दिल से सोचोगी... तब तुम्हें समझ में आएगा... प्रताप तुम्हें और मुझे... मेरा मतलब है हम दोनों को... सबसे ज़्यादा भाव देता है...

प्रतिभा - कैसे... आप को तो उसके तरफ से बैटिंग करने का मौका चाहिए... अगर अपनी लड़ाई में हमें शामिल कर देता तो क्या बिगड़ जाता उसका...

तापस - उसने जब जब जो जो ठीक समझा... बेझिझक हमसे मदत ली... यह तुम भी जानती हो... देखा नहीं अनु के लिए... तुमसे कैसे पुरे शहर का... उठा पटक करवा दिया...

प्रतिभा - (असहाय सा, पेपर को मोड़ते हुए) अब मैं कैसे समझाऊँ...

तापस - आज पेपर में क्या समाचार आया है...

प्रतिभा उसके हाथ में पेपर थमा देती है l तापस पेपर लेकर उस हिस्से को पढ़ने लगता है, जिसमें विश्व और भैरव सिंह के केस की डिटेल लिखा हुआ था l

" राज्य में बहू चर्चित केस पर ओड़िशा हाइकोर्ट के द्वारा आगे की कार्रवाई की पृष्टभूमि प्रस्तुत कर दी गई है l सम्पूर्ण राज्य हैरान तब हो गई थी जब यह खबर आग की तरह फैल गई के राज्य की राजनीति और व्यवस्था में गहरा प्रभाव रखने वाले राजा भैरव सिंह को गृह बंदी कर लिया गया है l

राजा साहब के विरुद्ध उन्हीं के गाँव के लोगों ने समुह रुप से थाने में शिकायत दर्ज की थी l यह केस दरअसल राजगड़ मल्टीपर्पोज कोऑपरेटिव सोसाईटी से ताल्लुक रखता है l जिसमें लोगों ने यह आरोप लगाया है कि उनकी जमीन को अनाधिकृत रुप से बैंक में गिरवी रख कर पैसा उठाया गया था l जिस पर अडिशनल मजिस्ट्रेट श्री नरोत्तम पत्री के आधीन एक कमेटी गठित किया गया था l उनके रिपोर्ट के उपरांत राज्य सरकार और हाइकोर्ट के द्वारा स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन किया गया है जो केवल तीस दिन के भीतर इस केस की सुनवाई के साथ साथ कारवाई पूरी करेगी l इस केस में वादी के वकील श्री विश्व प्रताप महापात्र गवाहों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए हर दशवें दिन कोर्ट की स्थान बदलने का आग्रह किया जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया l

आज से ठीक आठवें दिन इस केस पर सुनवाई राजगड़ से आरंभ होगी l फिर देवगड़ फिर सोनपुर में ख़तम होगी l अब राज्य सरकार के साथ साथ राज्य के प्रत्येक नागरिक का ध्यान इसी केस पर ज़मी हुई है l"

तापस अखबार को रख देता है l और प्रतिभा की ओर देखता है l प्रतिभा अभी भी असहज लग रही थी l

तापस - जान... तुम्हारे मन में क्या है खुल कर बताओ...

प्रतिभा - लेनिन कह रहा था... जब तक केस ख़तम नहीं हो जाती... वह हमें हर दूसरे या तीसरे दिन... यूँ ही... रैल की सफर करता रहेगा...

तापस - तो क्या हुआ जान... हमें इस उम्र में तीर्थ करना चाहिए... वह टोनी करवा रहा है...

प्रतिभा - चालीस से पचास दिन... कहीं रुकना... और सफर करना... हमें लेकर प्रताप इतना ईन सिक्योर क्यूँ है...

तापस - तुम्हें तो खुश होना चाहिये...

प्रतिभा - हम भटक रहे हैं... वह पता नहीं किस हालत में है... ना वह हमें कुछ करने दे रहा है... ना ही... (चुप हो जाती है)

तापस - क्या तुम्हें अपने प्रताप पर भरोसा नहीं है...

प्रतिभा - है... बहुत है... यह कैसा सवाल हुआ...

तापस - देखो जान... प्रताप को सबसे पहले तुमने अपना बेटा माना... तुम्हें उसके काबिलियत का अंदाजा भी है... उसका हमारे लिए ईन सिक्योर होना जायज है... क्यूँकी वह भी हमें दिल से माता पिता मानता है... हमें सबसे ज्यादा मान और भाव दे रहा है... अपने दिल की तराजू में... एक पलड़े में अपने दोस्तों... अपनी दीदी... और अपना प्यार को रखा है... और दूसरे पलड़े में हमें रखा है... वह उनके बीच रहेगा... तो उनके लिए कुछ कर पाएगा... जरा याद करो... उस पर क्या गुजरी थी... जब रंगा के चंगुल से... विक्रम ने हमें बचा कर अपने घर ले गया था... ऐसा कुछ अगर फिर से हो जाता... तो हमारा प्रताप वहीँ हार जाता... इसलिये अपने दोस्त से कह कर उसने हमारी सुरक्षा की गारंटी ले ली...

प्रतिभा - पता नहीं... मन नहीं मान रहा है... तीस से चालीस दिन... और यह भैरव सिंह... अपने देखा ना... उसने कैसे... सिस्टम को अपनी तरफ कर रहा है... ना जाने कैसे कैसे चक्रव्यूह रहेंगे... हमारे प्रताप के खिलाफ...

तापस - हाँ देखा है... पर मुझे यकीन है... हमारा प्रताप... हर चक्रव्यूह को भेद लेगा... मैंने उसे जितना ज़ज किया है... मैं यकीन के साथ कह सकता हूँ... जब वह खेल को पूरी तरह से समझ जाता है... खेल का रुख अपने तरफ खिंच लेता है...

प्रतिभा - जानती हूँ... पर भैरव सिंह... वह क्या सच में... केस हार कर... सरेंडर करेगा...

तापस - नहीं... नहीं करेगा... इसीलिये तो... अपने आप को बाजी लगा कर... केस को अपने इलाके में ले कर गया है.. बस इतना जान लो... यह उसकी जिंदगी का आखिरी दाव है...

प्रतिभा - यही तो मेरी परेशानी का सबब है... अगर वह आखिरी दाव लगाया है... तो अहम को कायम रखने के लिए... पता नहीं किस हद तक जाएगा...

तापस - हाँ... वह यकीनन... हर हद लाँघ लेगा... क्यूँकी जब भी... किसीने... भैरव सिंह की आँखों में आँखे डाला है... भैरव सिंह उससे हरदम हारा ही है... भले ही हार की कीमत... उनकी बर्बादी से हासिल करने की कोशिश की है... पर हारा ज़रूर है...

प्रतिभा - (हैरानी से सवाल करती है) क्या भैरव सिंह हारा भी है...

तापस - इसमें हैरान होने वाली बात कहाँ है... पहले उमाकांत सर... उन्होंने चेताया था... सरपंच विश्व से गद्दारी... भैरव सिंह की सल्तनत में सेंध लगाएगी... उसके लिए... भले ही उमाकांत सर ने जान दे दी... पर हुआ तो वही ना... फिर... वैदेही ने भैरव सिंह के आँखों में आँखे डाल कर... उसे ललकारा... आज अंजाम देखो... भैरव सिंह के खिलाफ़ ना सिर्फ केस दर्ज हुआ... बल्कि.. अदालत में मुज़रिम वाली कठघरे में खड़ा भी हुआ... फिर... वीर ने अपने प्यार के लिए ललकारा... क्या भैरव सिंह जीत पाया... भले ही... वीर और अनु मारे गए हों... और फिर... हमारे प्रताप... क्या गत बना दी उसने भैरव सिंह की... जिस सिस्टम को... अपने पैरों की जुती समझता था... उसी सिस्टम के आगे गिड़गिड़ाने पर मजबूर कर दिया... हाँ... उसके लिए... प्रताप ने कीमत भी चुकाई है... और फिर अब... तुम्हारी बहु ने... अपने प्यार के लिए... भैरव सिंह को ललकारा है... क्या तुम्हें लगता है... भैरव सिंह जीत पाएगा... इसलिए निश्चित रहो... हमारा प्रताप... बहु को अपने साथ लेकर ही आएगा...

भैरव सिंह को यह सच्चाई अच्छी तरह से मालूम है... क्यूँकी अब गाँव के लोगों ने भी उससे आँख में आँख डाल कर उसकी क्षेत्रपाल होने को चैलेंज दिया है... यह उसकी बर्दास्त के बाहर है... इसलिए वह प्रताप को... झुकाने के लिए... हराने के लिए... किसी भी हद तक जाएगा... यह पहले से अज्युम कर... प्रताप ने... हमें लेनिन उर्फ टोनी के साथ... अंडरग्राउंड करवा दिया... यानी राजा के नहले वाली सोच पर... प्रताप ने अपनी दहले वाली चाल चल दी... इस जंग में... यह भैरव सिंह की पहली हार है...

प्रतिभा - ह्म्म्म्म... पर इतने दिन... हम भगौड़ों की तरह.... जैसे हम कोई क्रिमिनल हों...

तापस - ना... मुझे नहीं लगता इतने दिन लगेंगे... पहले दस दिन में ही सब कुछ तय हो जाएगा...रही क्रिमिनल होने की बात... तो मेरी जान... तुम क्रिमिनल लॉयर की माँ हो... जहां क्राइम हो... वहाँ हमारे प्रताप का दिमाग बहुत शार्प हो जाता है... वह कई साल क्रिमिनलों के बीच रहा है... उन्हें पढ़ा है... इसलिए... वह राजा भैरव सिंह के चालों को भी पढ़ लेगा... और बहुत जल्द मात देगा...

प्रतिभा - क्या... आपको ऐसा क्यूँ लगता है...

तापस - वह इसलिए मेरी जान... मुझे पक्का यकीन है... प्रताप कोई ना कोई... प्लान बी पर या तो सोच रहा होगा... या फिर काम कर रहा होगा...

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सुभाष सतपती, एसीपी एसआईटी अपने चेंबर में चहल कदमी कर रहा है l ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उसे किसीकी प्रतीक्षा हो l कुछ देर बाद उसके टेबल पर इंटर कॉम घन घना जाता है l स्पीकर ऑन कर पूछता है

सतपती - येस..

ऑपरेटर - सर... आपसे मिलने... इंस्पेक्टर दाशरथी दास और उनके साथ एडवोकेट विश्व प्रताप महापात्र आए हैं...

सतपती - सेंड देम... और हाँ... दिस मीटिंग इस वेरी इम्पोर्टांट... सो... डोंट डिस्टर्ब अस...

इंटर कॉम ऑफ कर देता है, थोड़ी देर बाद दरवाजा खुलता है दास के साथ विश्व अंदर आता है l दोनों को बैठने के लिए इशारा करता है l विश्व से पूछता है

सतपती - क्या बात है विश्व... इस क्लॉज डोर मीटिंग के लिए क्यूँ कहा... वह भी मेरे ऑफिस में...

विश्व - बताता हूँ... वैसे आपको तो... अब तक.. रुप फाउंडेशन की फाइल मिल चुकी होगी..

सतपती - हाँ... पर इस पर इतनी बैचैनी किस बात की...

विश्व - होगी ही... वज़ह आप बेहतर जानते हैं... अगर कानून अपना काम कर रहा होता... तो विश्व को विश्वा ना बनना पड़ता... और केस की रि-हीयरीं और रि-इंवेस्टीगेशन ना हो रहा होता...

सतपती - प्लीज विश्व... तुम मेरे ऑफिस में... मेरे ही चेंबर में... कानून को गाली मत दो.. मैं जानता हूँ... तुम्हारे साथ बहुत गलत हुआ है... और वज़ह को समझता हूँ... पर यार... तुम और मैं आज की दौर में... कानून का ही चेहरा हैं...

विश्व - हाँ... तभी तो... मैंने कानून को अपने हाथ में नहीं लिया है अब तक... चूंकि मुझे आप पर... कानून पर और खुद पर भरोसा है...

सतपती - ओके... मैं तुम्हारा खीज और नाराजगी का सम्मान करता हूँ... बोलो तुम उस केस की फाइल मिलने की बात क्यूँ की...

विश्व - पता नहीं क्यूँ... इन कुछ दिनों में... मेरा सिक्स्थ सेंस मुझे अलर्ट कर रहा है...

सतपती - ह्वाट... तुम्हारा छटी इंद्रिय.. तुम्हें क्या कह रहा है...

विश्व - यही... के इस केस के ताल्लुक कोई गवाह है... जो इस केस की दिशा और दशा बदल सकता है...

सतपती - देखो विश्व... मैंने फाइल तो हासिल कर ली है... पर अभी तक पढ़ा नहीं है... इसलिए... मैं इस पर कोई कमेंट... फ़िलहाल नहीं कर सकता...

विश्व - पर मैंने तो पढ़ा है... मैंने इस केस की हर पहलू को जाना है... और मैं खुद इस केस का शिकार रहा हूँ...

दास - (विश्व के हाथ पर अपना हाथ रख कर) ओके ओके विश्वा... रिलेक्स...

विश्व - ओह... सॉरी...

सतपती - इट्स ओके... बोलते रहो...

विश्व - सतपती बाबु... मैं यह कहना चाहता हूँ... के कोई ना कोई इस केस के ताल्लुक गवाह है... जो इस केस में अहम भूमिका अदा कर सकता है...

सतपती - हाँ... मैं जानता हूँ... तुम श्रीधर परीड़ा की बात कर रहे हो...

विश्व - नहीं वह नहीं... कोई है... छुपा हुआ है... आठ साल से...

सतपती - आठ साल से... मतलब तुम भी अंधेरे में हो... कह रहे हो... कोई तो है... मगर कौन है... नहीं जानते... पर बता सकते हो... वह कौन है... और तुम्हें ऐसा क्यूँ लगा के कोई हो सकता है...

विश्व - क्यूँकी जिस तरह से... श्रीधर परीड़ा खुद को गायब कर दिया है... मुझे लगता है... उस वक़्त भी कुछ ऐसा हुआ था... और जो गायब हुए हैं... अगर हम... उनकी खोज करें... तो शायद...

सतपती - ठीक है... यह भी एक एंगल है...

विश्व - यह भी नहीं... बस यही एक एंगल है... क्यूँकी बाकी जो भी गवाह बन सकते थे... उन्हें भैरव सिंह ने... पागल सर्टिफाय कर दिया है...

यह सुन कर सतपती कुछ देर के लिए सोच में पड़ जाता है l कुछ देर सोचने के बाद दास से पूछता है l

सतपती - तुम्हें इस पर क्या कहना है दास...

दास - सच कहूँ तो... मैं श्योर नहीं हूँ... क्यूँकी मुझे अपनी तहकीकात में यह मालूम हुआ कि... जिन्हें भैरव सिंह गैर जरूरत समझता था... उन्हें वह अपने आखेट बाग के... लकड़बग्घों को और मगरमच्छों का निवाला बना देता था...

सतपती - हाँ... मैंने भी कुछ ऐसा ही सुना है... विश्वा... मैं सजेस्ट करूँगा... तुम फ़िलहाल... राजगड़ मल्टीपर्पोज को-ऑपरेटिव सोसाईटी वाले केस पर ध्यान दो... क्यूँकी ना तुम्हारे पास ज्यादा वक़्त है... ना मेरे पास... मुझे रुप फाउंडेशन की केस पर डिटेल समझने दो... अगर मुझे कोई लीड मिलती है... देन... आई प्रॉमिस... मैं उसे हर हाल में... सामने लाऊँगा... (विश्व अपना सिर सहमती से हिलाता है) ओके और कोई हेल्प...

विश्व - हाँ... छोटा सा... पर...

सतपती - डोंट बी शाय... बेझिझक कह सकते हो... (तभी इंटरकॉम बजने लगती है l क्रैडल उठा कर) येस...

ऑपरेटर - सर... मिस सुप्रिया आई हैं... मैंने उन्हें आपकी मीटिंग के बारे में कहा तो वह कह रही हैं... की वह भी इसी मीटिंग के लिए आई हैं...

सतपती - क्या... (विश्व और दास की ओर देखते हुए) ओके सेंड हर... और हाँ.. चार कप... कॉफी भी भेज देना... (क्रैडल इंटरकॉम पर रखते हुए, विश्व से) सुप्रिया को तुमने खबर की थी...

विश्व - ना.. नहीं... पर काम उन्हीं से था...

सतपती - तो उसे कैसे पता चला मीटिंग के बारे में...

दरवाजा खुलता है, सुप्रिया अपने ऑफिस फिट आउट में अंदर आती है l

सुप्रिया - हैलो एवरीवन... (सभी हाय कहते हैं) मैं डिस्टर्ब तो नहीं कर रही...

सतपती - ऑपरेटर तो कह रहा था... तुम इसी मीटिंग के लिए आई हो...

सुप्रिया - हाँ...

सतपती - पर यह लोग मना कर रहे हैं...

सुप्रिया - क्या... झूठ बोल रहे हैं यह...

सतपती - विश्वा... यहाँ क्या हो रहा है...

विश्वा - देखो... मैं नहीं जानता यहाँ क्या हो रहा है... पर मैं आपके पास आया ही था... मिस सुप्रिया जी के वास्ते...

सतपती - ह्वाट...

विश्व - हाँ.. मैंने सुबह से इन्हें बहुत कॉल किए... पर यह व्यस्त थीं... इसलिए उनको मेसेज भेजे थे... पर यह तो सीधे यहाँ आ गई...

सतपती - ओके... क्या बात करना चाहते थे... इनके बारे में... आई मीन... इनके बारे में.. मुझसे क्यूँ...

विश्व - ओह कॉम ऑन... हम सभी जानते हैं... आप दोनों के बीच क्या चल रहा है...

सतपती - (बिदक कर) क्या चल रहा...

विश्व - देखा दास बाबु... हम कबसे हैं... पर कॉफी तब आ रही है... जब... खैर... मैं तो बस आपसे... एक फेवर चाह रहा था...

सतपती - (झेंप कर नजरें चुराकर) ओके... क्या चाह रहे थे...

विश्व - यही के... सुप्रिया जी हर रोज की सुनवाई और कारवाई पर... स्पेशल बुलेटिन लाइव करें... वह भी राजगड़ में रह कर... (सतपती कुछ नहीं कह पाता, अगल बगल देखने लगता है) सतपती बाबु... विश्वास रखिए... उन्हें कुछ भी नहीं होगा...

सतपती - अब समझा... यह ड्रामा तुम तीनों की मिलीभगत है.. (विश्व से) तुमने इनसे पूछा होगा... राजगड़ जाने के लिए... और जाहिर है... इन्होंने मेरा नाम लिया होगा... के मैं इनके राजगड़ जाने के खिलाफ हूँ...

तभी दरवाजा खोल कर एक अटेंडेंट कॉफी ट्रॉली लेकर आती है और सबको कॉफी सर्व कर चली जाती है l सभी हाथ में कॉफी लेकर सतपती की ओर देखने लगते हैं l

सतपती - ओके... मुझे मंजूर है...

सुप्रिया खुशी से इएह इऐह कर विश्व से हाथ मिलाती है, सतपती यह देख कर मुस्करा देता है l

×_____×_____×_____×_____×_____×_____×

राजगड़ की सरहद पर गाड़ियों का काफिला रुकता है l सबसे पहले वाली गाड़ी से भैरव सिंह उतरता है l दोनों हाथों को जेब में डाल कर गाँव की तरफ देखता है l उसके पीछे पीछे सभी गाड़ी से उतर कर भैरव सिंह के पीछे खड़े हो जाते हैं l सभी गाँव की ओर देखते हैं तो कुछ लोग ढोल नगाड़े लेकर भैरव सिंह के पास आकर रुकते हैं l उन लोगों के साथ भीमा अपने गुर्गों के साथ लेकर एक घोड़ा बग्गि लाया था l भीमा बग्गि से उतर कर भैरव सिंह के सामने आकर झुककर सलाम करता है l इन सबके भीड़ को चीर कर भैरव सिंह के सामने बल्लभ आता है और भैरव सिंह का अभिवादन करता है l

बल्लभ - राजा साहब... स्वागत है... आपने जैसा कहा था... वैसी ही व्यवस्था कर दी गयी है...

भैरव सिंह - हाँ... वह तो दिख रहा है... महल की क्या समाचार है...

बल्लभ - राजकुमारी तो जानती हैं... और उन्होंने सभी जनाना दासियों से कह दिया है... फूलों और दियों से आपका स्वागत करने के लिए...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... (कुछ देर का पॉज) भीमा...

भीमा - जी हुकुम...

भैरव सिंह - हम और यह साहब... (केके को दिखाते हुए) बग्गी में जाएंगे... और बग्गि तुम चलाओगे...

भीमा - जी हुकुम...

भैरव सिंह - और प्रधान...

बल्लभ - जी राजा साहब...

भैरव सिंह - कल ही तुम आ गए थे... उम्मीद है... सारी तैयारी कर चुके होगे...

बल्लभ - जी राजा साहब...

भैरव सिंह किनारे हो जाता है और पीछे की हाथ दिखा कर उनसे कहने के लिए इशारा करता है l बल्लभ देखता है पीछे रंगा और रॉय तकरीबन पचास साठ लोगों के साथ खड़े थे l बल्लभ उन्हें कहता है

बल्लभ - राजा साहब.. बग्गी से गाँव के भीतर से गुजरेंगे... और महल में जाएंगे... आप लोगों की रहने की पूरी व्यवस्था रंग महल में कर दी गई है... इसलिये अब आप लोग... राजा साहब के हुकुम के बाद... मेरे साथ रंग महल चलेंगे...

भैरव सिंह सिर सहमति से हिलाते हुए जाने को कहता है l बिना कोई देरी किए बल्लभ भैरव सिंह की गाड़ी में बैठ जाता है और निकल जाता है l उसके पीछे पीछे सारी गाड़ियों का काफिला एक एक करके चली जाती है l उन सबके जाने के बाद भीमा झुक कर बग्गि की ओर रास्ता दिखाता है l भैरव सिंह के साथ केके जाकर बग्गी में बैठ जाता है l भीमा घोड़े हांकते हुए बग्गि को चलाता है l बग्गी के सामने पारंपरिक ढोल नगाड़े के साथ साथ भेरी बजाते हुए लोग चलने लगते हैं l

भैरव सिंह - (भीमा से) पहले जाना कहाँ है... जानते हो ना...

भीमा - जी हुकुम... नगाड़े वालों को बोल दिया है... वे सब बारी बारी कर उन्हीं जगह पर रुकेंगे...

ढोल नगाड़े पूरी जोश के साथ बज रहे थे l साथ साथ भेरी और तुरी भी बज रहे थे l बग्गि पर भैरव सिंह पूरे रबाब और राजसी ठाठ के साथ पैर पर पैर मोड़ कर बैठा हुआ था l बगल में केके बड़ी ही शालीनता से बैठा हुआ था l बग्गि गाँव के भीतर से गुज़रती है लोग राजा के चेहरे पर घमंड भरी मुस्कान देख कर डर के मारे अपना सिर झुका कर रास्ते की किनारे खड़े हो जाते थे l लोगों के डरे और झुके हुए सिर भैरव सिंह के चेहरे की रौनक को बढ़ाती जा रही थी l भैरव सिंह का यह यात्रा राजगड़ मॉडल पोलिस स्टेशन के सामने रुकती है l थाने में इंस्पेक्टर दास नहीं था पर दूसरा प्रभारी भागते हुए बाहर आता है उसके साथ कुछ हवलदार और कुछ कांस्टेबल बाहर आकर अपना सिर झुका कर खड़े हो जाते हैं l भैरव सिंह बग्गि से उतरता है और सीडियां चढ़ते हुए उनके सामने खड़ा हो जाता है l ना चाहते हुए भी डर के मारे सभी पुलिस वाले भैरव सिंह को सैल्यूट ठोकते हैं l भैरव सिंह की मुस्कराहट और भी गहरी हो जाती है l

भैरव सिंह - कहाँ है तुम्हारा वह सरकारी दास...

प्रभारी - (अपना सिर उठा कर) जी वह... आज शाम तक ड्यूटी जॉइन करेंगे...

भीमा - ऐ... जानता है.. किससे बात कर रहा है... राजा साहब... सिर झुका कर ज़वाब दे...

प्रभारी - (सिर झुका कर) जी... दास सर... आज शाम तक जॉइन करेंगे...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... तुम लोगों को सरकारी आदेश मिल चुका होगा...

प्रभारी - (सवालिया) जी... (जवाबी) जी...

भैरव सिंह - क्या दिन आ गए हैं... हमें अपनी ही राज में... अपनी ही क्षेत्र के थाने में केस ख़तम होने तक... रोज उपस्थिति दर्ज कराने आना होगा... खैर... अपना रजिस्टर लाओ... और हमारी दस्तखत ले लो...

एक कांस्टेबल भागते हुए अंदर जाता है और एक रजिस्टर लेकर आता है l भैरव सिंह दस्तखत कर जाने के लिए मुड़ता है l तभी भीमा उन पुलिस वालों से कहता है

भीमा - आज जो हुआ... यह केस खत्म होने तक दोहराया जाएगा... यह केस तो महीने भर में ख़तम हो ही जायेगी... उसके बाद... सालों... तुम सब राजमहल में आकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराओगे... याद रखना... वर्ना... (उंगली दिखा कर अपनी जीभ को दांतों तले दबा कर धमकी देते हुए निकल जाता है)

भीमा के बग्गि में बैठते ही ढोल नगाड़े फिर से बजने लगते हैं l पुलिस वालों का सिर अभी भी झुका हुआ था l जब तक उनके कानों में ढोल नगाड़ों की आवाज़ गायब नहीं हो गई तब तक सिर झुकाए खड़े रहे l भैरव सिंह की यह यात्रा गाँव की गलियों से गुजर रही थी l धीरे धीरे लोग अब रास्ते के दोनों किनारे जमा हो कर अपना सिर झुकाए खड़े हो रहे थे l भैरव सिंह का यह शोभा यात्रा विश्व के पुराने घर के बाहर आकर रुकती है l विक्रम, शुभ्रा, पिनाक और सुषमा चारों ढोल नगाड़ों की आवाज़ सुन कर पहले से ही बाहर आ गए थे l घर के ठीक सामने बग्गि रुकते ही भैरव सिंह पहले रुकता है और केके को नीचे उतरने के लिए बड़ी इज़्ज़त के साथ इशारा करता है l केके उतर कर भैरव सिंह के साथ खड़ा होता है l यह सब देख कर विक्रम बहुत ही हैरान हो रहा था l भैरव सिंह उन चारों के सामने केके को साथ लेकर खड़ा होता है l

भैरव सिंह - लगता है... भीख में मिले झोपड़ी में रहने वाले... सामने राजा भैरव सिंह को देख कर खुश नहीं हुए...

विक्रम - यह झोपड़ी... भीख में नहीं... अनुराग से मिला है... वह भी एक देवी से... पर जो राजा इस झोपड़े के सामने खड़ा है.. वह किसी और की दौलत के ज़मानत पर खड़ा है...

भैरव सिंह - ओ... जुबान तीखी और धार धार हो गई है... लगता है... रंग महल का रंग उतर गया.... और दरिद्रता का रंग बहुत चढ़ गया है...

पिनाक - हाँ... हम रंक हैं... पर आजाद हैं... आज हमारी साँसें... हमारी जिंदगी पर... किसी राजा के ख्वाहिशों की बंदिश नहीं है...

विक्रम - ऐसी क्या बात हो गई है राजा साहब... चार रंको के दरवाजे पर... एक राजा को लाकर खड़ा कर दिया...

भैरव सिंह - वह क्या है कि... आज से ठीक सातवें दिन... हम पर जो केस दर्ज की गई है... उस पर स्पेशल कोर्ट की कारवाई शुरु हो रही है...

विक्रम - हाँ... यह सब हम जानते हैं...

भैरव सिंह - हाँ जानते होगे... वह क्या है कि... क्षेत्रपाल खानदान में... कुछ दिनों से... सही नहीं हो रहा था... इसलिए हमने सोचा... क्यूँ ना एक उत्सव हो... जिसमें अपने... गैर... दोस्त तो कोई रहे नहीं... तो दुश्मन ही सही... सबको शामिल किया जाए...

विक्रम - उत्सव... कैसा उत्सव...

भैरव सिंह - खानदान में जब मातम ही मातम छाई हुई हो.. उस नेगेटिविटी को दूर कर... जिंदगी में पॉजिटिविटी में बदलने के लिए... एक उत्सव मनाना ज़रूरी होता है... इसलिए... हमने महल में एक उत्सव मनाने की ठानी है... जिसमें... गाँव के बच्चे बच्चे से लेकर... गैर और दुश्मन तक सभी निमंत्रित रहेंगे...

पिनाक - विक्रम ने पूछा था.. कैसा उत्सव...

भैरव सिंह - रंक हो... रंक की तरह रहो... राजा से सवाल नहीं किया जाता... यह संस्कार चढ़े नहीं है अब तक... तो उस उत्सव में खाना पीना सब होगा... अपने परिवार के साथ आना जरूर...

इतना कह कर केके की ओर देखता है l केके उसके हाथ में एक सफेद मगर क़ीमती सोने की कारीगरी से सजा एक लिफाफा थमा देता है l भैरव सिंह उस लिफाफे को विक्रम के हाथ में दे देता है और वहाँ से मुड़ कर बग्गि की ओर जाता है l केके भी उसके साथ जाकर बग्गि में बैठ जाता है l फिर से वही दृश्य, ढोल नगाड़े तुरी भेरी बजने लगते हैं उनके पीछे भैरव सिंह की बग्गि निकल जाती है l

उनके जाने के बाद विक्रम से उस क़ीमती ईंविटेशन कार्ड को पिनाक छीन कर फाड़ने को होता ही है कि शुभ्रा उसे रोकती है

शुभ्रा - एक मिनट के लिए रुक जाइए चाचाजी... (पिनाक रुक जाता है)

पिनाक - तुम नहीं जानती बेटी... यह भाई साहब... हमारे कटे पर मिर्च रगड़ने आए थे... उत्सव... कैसा उत्सव... अपने बाहर आने की खुशी को... लोगों का दुःस्वप्न बनाने के लिए... (फिर फाड़ने को होता है)

सुषमा - बहु ठीक कह रही है... कम से कम... देख तो लीजिए... आखिर... आज से पहले महल में.. जब भी कोई उत्सव हुआ... कभी भी... उसके लिए ईंविटेशन कार्ड बना ही नहीं था... फिर अचानक... अब कार्ड की क्यूँ जरूरत पड़ी...

पिनाक कुछ कह नहीं पाता l उसके हाथ रुक जाते हैं l विक्रम उसके हाथ से कार्ड लेकर खोलता है, जैसे ही अंदर लिखे पन्नों पर नजर जाती है, उसे चक्कर आने लगते हैं कार्ड उसके हाथों से फिसल जाता है l उसकी ऐसी हालत देख कर शुभ्रा उस कार्ड को उठाकर देखती है तो उसकी आँखे डर और हैरानी के मारे फैल जाती हैं l

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अब की बार भैरव सिंह का यह यात्रा xxxx चौक पर पहुँच चुका था l जहाँ पर वैदेही की दुकान थी l भैरव सिंह को उस अवतार में देख कर वैदेही की दुकान से लोग तितर-बितर होकर गायब होने लगे थे और कुछ ही दूर जा कर चौराहे के मोड़ पर सिर झुका कर खड़े हो जाते हैं l चौराहे के बीचों-बीच भीमा बग्गि को रोक देता है l भैरव सिंह दुकान के दरवाजे पर खड़ी वैदेही को बड़े गुरूर और घमंड के साथ देखता है l वैदेही के चेहरे पर हैरानी देख कर भैरव सिंह की मुस्कान बहुत ही गहरी हो जाती है l भैरव सिंह केके के हाथ से वही ईंविटेशन वाला एक और लिफाफा लेकर उतरता है, पर इसबार वह केके को बग्गि पर बैठने के लिए कह देता है l केके भी चुपचाप बग्गि में बैठा रहता है l बड़े ताव में चलते हुए वैदेही के सामने आ कर खड़ा हो जाता है, क्यूंकि वैदेही तब तक दुकान से बाहर आ चुकी थी l दोनों एक दूसरे की आँखों में झाँक रहे थे l जहाँ भैरव सिंह के आँखों में कुटिलता साफ दिख रहा था वहीँ वैदेही के मन में लाखों असमंजस से भरे सवाल उठ रहे थे l

भैरव सिंह - कैसी है...

वैदेही - तुझसे मतलब...

भैरव सिंह - कैसी बात कर रही है.. मतलब तो रहेगा ना... अखिर दुनिया में.. दो ही तो लोग हैं.. जो भैरव सिंह को... नाम से बुलाने की हिम्मत रखते हैं... एक तू.. और दूसरा तेरा भाई... कहाँ है... वह मेरा कुत्ता... आया नहीं अभी तक...

वैदेही - उसकी छोड़... वह तेरी तरह ढोल नगाड़े पीटते हुए नहीं आएगा... वह जब भी आयेगा...मौसम से लेकर हवाएँ... मिट्टी तक बोल उठेंगे... तु बता... यहाँ मुहँ मारने आया है... या अपनी मुहँ सुजाने...

भैरव सिंह - ना मुहँ मारने... ना अपनी मुहँ सुजाने... बस बहुत दिन हो गए... कोई उत्सव या अनुष्ठान नहीं हुए इस गाँव में... तभी तो... रौनक नहीं है इस गाँव में... आज से ठीक छटवें दिन... महल में... दावत है... तू आना... अपने भाई को भी लाना... यह रही उस दावात के लिए निमंत्रण पत्र... ले.. लेले... (वैदेही के हाथ में लिफाफा थमा देता है) वह कहते हैं ना... शुभ कार्य का निमंत्रण... सबसे पहले गैरों को... फिर दुश्मनों को देनी चाहिए... ताकि कोई अमंगल घटित ना हो...

वैदेही - ओ मतलब.. तूने स्वीकार कर लिया... अखिर इस मिट्टी में कोई तो है... जो तेरे बराबर खड़े हो कर... तुझसे दुश्मनी करने के लायक है...

भैरव सिंह - हाँ... मान लेने में कोई बुराई तो नहीं... कौनसा रिश्तेदार बन जाओगे... देख ले... कार्ड में क्या है देख ले... क्षेत्रपाल महल की खुशियाँ... कहीं वैदेही और विश्व के लिए मातम का पैगाम तो नहीं... देख ले...

वैदेही भैरव सिंह को गौर से देखती है l उसके चेहरे पर कुटिलता और मक्कारी साफ झलक रही थी l कुछ सोचते हुए कार्ड खोल कर देखती है l कार्ड को देखते ही उसकी आँखें हैरानी के मारे फैल जाती हैं l फिर वह मुस्कराने लगती है धीरे धीरे उसकी वह मुस्कराहट गहरी होते हुए हँसी में बदल जाती है l

भैरव सिंह - लगा ना झटका... मैं जानता था... क्षेत्रपाल महल में खुशियाँ... तुम भाई बहन का दिमाग हिला देगी... पागल हो जाओगे तुम दोनों...

वैदेही - (अपनी हँसी को रोक कर) एक कहावत पढ़ा था... आज उसे सच होते हुए देख रही हूँ... विनाश काले विपरित बुद्धि...

भैरव सिंह - विनाश मेरी नहीं... तुम बहन भाई की होगी... हर उस शख्स की होगी... जो तुम्हारे साथ में खड़े हैं... और यह... जस्ट शुरुआत है...

वैदेही - जानता है... गाँव के लोगों में एक दहशत थी... के तु वह माई का लाल है... जिसने अदालत को... बाहर लेकर आ गया... अब तक बाजी तेरे हाथ में थी... पर अफ़सोस... सातवें दिन से... लोग तुझसे डरना छोड़ देंगे... अभी जो सिर झुकाए फिर रहे हैं... वह तेरे पीठ पीछे नहीं... तेरे मुहँ पर ताने मारते हुए बातेँ करेंगे...

भैरव सिंह - मुझे पता था... तेरी जलेगी... सुलगेगी... अब देख कितनी जोर से धुआं मार रही है... जब तेरी ऐसी हालत है... तो तेरे भाई का क्या होगा...

वैदेही - कुछ नहीं होगा... बल्कि खून का आँसू बहाना किसे कहते हैं... उस दिन तुझे मालूम होगा...

भैरव सिंह - हाँ वह दिन देखने के लिए... तुम बहन भाई को आना पड़ेगा...

वैदेही - जरूर... भैरव सिंह... जरूर... चिंता मत कर... कोई आए ना आए... हम जरूर आयेंगे... क्यूँकी उस दिन एक राजा को जोकर बनते सब देखेंगे...

भैरव सिंह - मैंने अपने लाव लश्कर बदल दिए हैं... गाँव के वही नालायक.. नाकारे लोगों को बदल दिया है... अब मेरे लश्कर में... खूंखार और दरिंदगी भरे लोगों की भरमार है... तेरा भाई कोई भी गुस्ताखी करेगा... तो जान से जाएगा... जहान से भी जाएगा...

वैदेही - चल मैं तेरी चुनौती स्वीकार करती हूँ... और यह वादा करती हूँ... उस दिन तेरे महल में... तेरा मुहँ काला होगा... जा उसकी तैयारी कर...

भैरव सिंह - आज मुझे वाकई बहुत खुशी महसुस हो रही है... तेरे अंदर की छटपटाहट मैं महसूस कर पा रहा हूँ... ठीक है... मैं जा रहा हूँ... तैयारी करने... दावत दे रहा हूँ... खास तुम बहन भाई के लिये... तुम लोग भी अपनी तैयारी कर आना...

इतना कह कर भैरव सिंह अपने चेहरे पर वही कुटिल मुस्कान लेकर वहाँ से चाला जाता है l उसके वहाँ से जाते हुए वैदेही देखती रहती है l भैरव सिंह के चले जाने के बाद टीलु और गौरी आकर वैदेही के पास खड़े होते हैं l

टीलु - वह क्यूँ आया था दीदी... (वैदेही उसके हाथ में वह ईंविटेशन कार्ड देती है, टीलु जब कार्ड खोल कर देखता है और पढ़ने के बाद चौंकता है) यह... यह क्या है... राजा यह क्या कर रहा है...

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अब बग्गि महल के परिसर में आती है l बग्गि से भैरव सिंह केके के साथ उतरता है l सीढियों पर फुल बिछे हुए थे ऊपर से दासियाँ इन दोनों के ऊपर फूल बरसा रहे थे l बाहर बग्गि को लेकर भीमा अस्तबल की ओर चला जाता है l भैरव सिंह और केके दोनों चलते हुए दिवान ए खास में पहुँचते हैं l वहाँ पहले से ही बल्लभ इनका इंतजार कर रहा था l भैरव सिंह जाकर अपनी कुर्सी पर बैठ जाता है l इशारा पाने के बाद केके और बल्लभ भी आमने सामने वाली सोफ़े पर बैठ जाते हैं l भैरव सिंह ताली बजाता है, एक नौकरानी भागते हुए आती है और सिर झुका कर खड़ी हो जाती है l

भैरव सिंह - जाओ... राज कुमारी को कहो.. हमने उन्हें दिवान ए खास में याद किया...

नौकरानी - जी... हुकुम...

कह कर नौकरानी उल्टे पाँव लौट जाती है, यह सब देख कर केके के चेहरे और आँखों में एक चमक उभर रही थी l कुछ देर के बाद कमरे में रुप आती है l

रुप - आपने बुलाया...

भैरव सिंह - हाँ... प्रधान ने... आपको खबर भिजवाया था... हम आ रहे हैं...

रुप - जी... पर मुझे लगता है... आपकी स्वागत में कोई कमी नहीं रही होगी...

भैरव सिंह - यह स्वागत हम अपने लिए नहीं... इनके लिए करवाया था... इसलिए वहाँ आपको होना चाहिए था...

रुप - कमाल है... क्षेत्रपाल महल की औरतें या लड़कियाँ.. कबसे गैरों के सामने जाने लगीं..

भैरव सिंह - अब से यह गैर नहीं हैं... यह क्षेत्रपाल महल के होने वाले नए सदस्य हैं... हमने आपका विवाह इनसे निश्चय कर दिया है... आज से पाँच दिन बाद... इसी महल में... आपका विवाह इनसे होने जा रही है...

यह बातेँ सुन कर रुप चौंकती है l भैरव सिंह के हर एक शब्द उसके कानों में तेजाब की तरह गिर रहे थे l रुप की जबड़े भिंच जाती हैं l

रुप - मुझे नहीं पता था... कभी दसपल्ला राज घराने में भेज रिश्ता तय करने वाले... रास्ते में किसी को उठा कर... मेरे माथे पर थोप रहे हैं...

भैरव सिंह - क्यूँकी औकात और हैसियत दोनों आप खोए हैं... खोए नहीं बल्कि गिरे हैं... इसलिए... आप जिसकी बराबर हुईं... हम उन्हीं के साथ आपका विवाह सुनिश्चित कर दिया... वैसे भी... यह अपने क्षेत्र के किंग हैं... भुवनेश्वर में यह कंस्ट्रक्शन किंग की पहचान से जाने जाते हैं... (रुप कुछ और कहना चाहती थी के भैरव सिंह उसे टोक कर) बस... और कोई बहस नहीं... यह आज से महल में रहेंगे... छोटे राजा जी के कमरे में... और इस वक़्त आप इन्हें... उनके कमरे में ले जाइए... और नौकरियों से इनकी सेवा के लिए कह दीजिए... (केके से) देखा केके... हमने तुमसे जो वादा किया था... वह पूरा कर रहे हैं... आपको आपके कमरे तक... रुप नंदिनी पहुँचा देगी... बीच रास्ते में आप एक दुसरे से पहचान बना लीजिए...

केके - (कुर्सी से उठ कर) शुक्रिया राजा साहब... वाकई... आप अपने जुबान के पक्के हैं और वचन के धनी हैं... (रुप की तरफ देखता है)

रुप - आइए... आपको आपका कमरा दिखा देती हूँ...

रुप के पीछे पीछे केके कमरे से निकल जाता है l उनके जाते ही बल्लभ भैरव सिंह से पूछता है

बल्लभ - गुस्ताखी माफ राजा साहब... पर क्या आप सही कर रहे हैं...

भैरव - हाँ... प्रधान... हम जो कर रहे हैं... क्यूँ कर रहे हैं... यह तुम अच्छी तरह से जानते हो...

उधर रुप के साथ चलने की कोशिश करते हुए केके रुप से बात करने की कोशिश करता है l

केके - हाय.. माय सेल्फ कमल कांत... उर्फ केके...

रुप - ह्म्म्म्म...

केके - थोड़ा धीरे चलें... मैं जानता हूँ... तुम बहुत अपसेट हो...

रुप - (थोड़ी स्लो हो जाती है) फर्स्ट... डोंट एवर डेयर टू कॉल मी तुम... और दूसरी बात... यह समझने की गलती मत करना की मैं अपसेट हूँ...

केके - मतलब आपको इस रिश्ते से कोई शिकायत नहीं है...

रुप - किस बात की शिकायत... जो होने वाला ही नहीं है... मुझे तो तुम्हारी बेवकूफ़ी कर तरस आ रही है... तुमने कैसे हाँ कर दिया...

केके - जब सामने से रिश्ता आ रहा हो... तो मैं मना करने वाला कौन होता हूँ...

रुप - अच्छा... जब एक जवान लड़की से शादी की प्रस्ताव मिला... तुमने सोचा नहीं.. किसलिए यह प्रस्ताव दिया गया होगा...

केके - सोचना नहीं पड़ा... क्यूँकी मैं पूरा सीचुएशन समझ सकता था... आपका जरूर कोई लफड़ा रहा होगा... जो कि राजा साहब को ना पसंद होगा... आपको समझाया गया होगा... नहीं मानी होगीं आप... इसलिये शायद... आपको सजा देने के लिए.. राजा साहब ने यह फैसला किया होगा...

रुप - और तुमने मौका हाथ में पाकर लपक लिया...

केके - हाँ क्यूँ नहीं... राजा साहब के दिए सजा.. मेरे लिए तो मजा है ना...

रुप - ओए... इतना उड़ मत... महल में जितना दिन शांति में गुजार सकता है गुजार ले... क्यूँकी शादी के दिन के बाद... तु किसीको मुहँ दिखाने के लायक नहीं रहेगा...

केके - इतना कॉन्फिडेंस... वैसे आपने जिस लहजे में बात की... मैं बिल्कुल भी बुरा नहीं मानूँगा... कहावत है... औरत या तो तीखी होनी चाहिए... या फिर नमकीन... हे हे हे...

रुप - (रुक जाती है) यह रही... तुम्हारा कमरा... (रुप जाने को होती है)

केके - मै जानता हूँ... आप बहुत अपसेट हैं... पर आई सजेस्ट... मन को समझा लीजिए और खुद को तैयार कर लीजिए...

रुप - (अपनी भौंहे सिकुड़ कर उसे हैरानी भरे नजरों से देखती है)

केके - वाकई आपकी खूबसूरती बेइंतहा है.... कभी सोचा भी नहीं था... जिंदगी एक ऐसे मोड़ पर... इतना क़ीमती तोहफा देगा...

रुप उसकी बातेँ सुन कर हँसने लगती है l इतना हँसती है कि उसकी आँखे भीग जाती हैं l रुप को इस तरह हँसते हुए देख कर केके हैरान हो कर उसे देखता है l रुप अपनी हँसी को मुश्किल से रोकती है और फिर कहती है

रुप - अरे बेवक़ूफ़... मैं अब तक... तुझ पर तरस खा रही थी... राजा साहब... मुझे मेरी गुस्ताखी का सजा देने के लिए... क्यूँकी मैंने उससे मुहब्बत की... जिसने राजा साहब को... इस परिस्थिति में लाकर खड़ा कर दिया... उसीका गुस्सा उतारने के लिए... मुझे तुझसे बांध रहे हैं... मतलब वह बंदा कुछ तो खास होगा... जिसे चिढ़ाने के लिए... मेरी शादी का स्वाँग रच रहे हैं... (थोड़ी सीरियस हो कर) सुन ढक्कन... मुझे तेरे बारे में सबकुछ पता है... कभी मेरे भाई के पैरों पर लिपट कर रहने वाले... तेरे बेटे के साथ क्या हुआ... और तु अब तक क्या कर रहा था... सब जानती हूँ... राजा साहब ने कोई झूठ नहीं बोला है... वह दिल से तेरे हाथों में मुझे सौंपने का निर्णय लिया होगा... पर क्या है कि... मेरा जिसके साथ लफड़ा है ना... वह मेरी शादी तुझसे तो क्या... किसी और बड़े घराने में भी... नहीं होने देगा... वह जो शिशुपाल का उदाहरण देते हैं ना... अगली बार तेरे उदाहरण देंगे...

केके - कौन है वह... जिसे चिढ़ाने के लिए... राजा साहब यह शादी करवा रहे हैं...

रुप - (बड़े गर्व के साथ) अभी कहा ना... यह वही बंदा है... जिसने राजा साहब को सलाखें और कटघरा दिखा दिया... और तुझे लगता है... वह मेरी शादी तुझसे होने देगा... उसका नाम विश्व प्रताप महापात्र है...
 
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अर्ध रात्री

आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे, क्षेत्रपाल महल के अंतर्महल की छत पर एक जोड़ा एक दूसरे के बाहों में खोए हुए थे l यह युगल कोई और नहीं हैं बल्कि हमारे कहानी के नायक व नायिका विश्वरुप ही हैं l रात शांत, हर क्षण शांत, हर फ़िजा शांत, जैसे वह आतुर हों इनके वार्तालाप सुनने के लिए l ऐसे ही बाहों में रहते हुए रुप ख़ामोशी को तोड़ती है और विश्व से कहती है l

रुप - जानते हो... मेरा दिल आज तुम्हें पुकार रहा था... और तुम आ गए...

विश्व - पर... मैंने आपको खबर भी नहीं की थी... बस छत पर आ गया था... आपको कैसे पता चला... के मैं आपको मिलने आया हूँ...

रुप - इट्स अ गर्ल थिंग... फिर भी बता देती हूँ... मेरे धड़कनों.. मेरे एहसासों... मेरे रोम रोम से पूछ कर देखो... जब भी तुम आस पास होते हो... मेरे रूह को... तुम्हारे होने का एहसास... अपने आप हो जाता है...

विश्व - क्या... आपको डर लग रहा है...

रुप - (अपना चेहरा अलग करते हुए) भला वह क्यूँ...

विश्व - राजा साहब ने... आते ही आपको जोरदार झटका जो दिया...

रुप - (विश्व के सीने से चिपक कर) वैसे कोशिश उनकी बहुत अच्छी थी... पर मैं जानती हूँ... उनकी कोशिश बेकार जाने वाली है...

विश्व - अच्छा... वह कैसे...

रुप - वह ऐसे की मैं जानती हूँ... के तुम यह शादी कभी होने ही नहीं दोगे...

विश्व - इतना भरोसा...

रुप - कोई शक़... (एक पॉज) अनाम... मेरा प्यार... मेरा विश्वास है... मेरे विश्वास का आधार... एक तुम हो... और एक भगवान... मैं जान हार सकती हूँ... पर विश्वास कभी नहीं...

विश्व कोई जवाब नहीं देता, बस दोनों की जकड़ बढ़ जाती है l थोड़ी देर बाद दोनों एक दूसरे से अलग होते हैं और पिछली बार की तरह छत पर बनी चबूतरे पर बैठ जाते हैं l आज आसमान में चाँद नहीं था फिर भी दोनों आसमान की ओर देखे जा रहे थे l विश्व एक सवाल छेड़ देता है

विश्व - आप अगर डरी नहीं थीं... तो मुझे ढूंढ क्यूँ रही थी...

रुप - (विश्व की तरफ घूम कर उसका चेहरा दोनों हाथों से पकड़ कर अपने तरफ करती है और पूछती है) मेरे आँखों में झाँक कर देखो... क्या तुम्हें डर दिख रहा है...

विश्व - नहीं.... नहीं दिख रहा है... पर फिर भी...

रुप - ( विश्व की चेहरे को छोड़ कर आसमान को ओर देखने लगती है) मैं बस.. अपनी प्यार को ... अपनी चाहत को.. उसकी गहराई को परख रही थी... कहीं मेरा प्यार... कोई तुक्का तो नहीं... पर आज तुम्हें छत पर पा कर... मुझे अपने प्यार पर यकीन हो गया है... के मेरा प्यार.. मेरी चाहत में कहीं भी कोई मिलावट नहीं है... झूठ नहीं है... (रुप की यह बात विश्व एक टक सुने जा रहा था, रुप विश्व की तरफ देख कर पूछती है) ऐसे क्या देख रहे हो...

विश्व - (मुस्करा कर) बस आपको देख रहा हूँ...

रुप - पर आसमान में चाँद नहीं है... फिर मेरे चेहरे पर क्या है... अंधेरे में तुम्हें पता कैसे चल रहा है...

विश्व - आसमान में चाँद से मुझे क्या लेना देना... मेरा चाँद तो मेरे आँखों के सामने है... मेरे इस चाँद के चाँदनी के आगे.. भला उस चाँद का क्या मुकाबला...

रुप - ओ हो... आज तो बड़े शेरों शायरी के मुड़ में हो...

विश्व - इसका दोष भी आप पर जाता है... आप हो ही इतनी सुंदर... बड़े बड़े गँवार भी शायर बन जाएंगे... इस बेपनाह हुस्न को देख कर...

रुप - बस बस... (अपने दोनों हाथों को विश्व के कंधे पर रख कर हाथ पर अपना ठुड्डी रख कर) इतना तारीफ ना कीजिए... अभी जाग रही हूँ... जागी ही रहने दीजिए... इतना तारीफ करोगे... तो सपना समझ कर नींद की आगोश में ना खो जाऊँ... (अचानक अलग होती है) एक बात पूछूँ...

विश्व - जी पूछिये...

रुप - राजा साहब तो महल में होंगे ना... फिर तुम कैसे अंदर आ गए...

विश्व - बस... आ गया...

रुप - अरे... ऐसे कैसे... याद है... जब मैंने तुम्हें आने के लिए कहा था... तब तुम... बिजली गुल कर अंदर घुसे थे...

विश्व - हाँ... तब मैं चाहता था... की राजा साहब को मालूम हो... के कोई अंदर आया था... इसलिए तो सुबह सुबह... मैंने छोटे राजा जी से... सलाम नमस्ते की थी...

रुप - पर अब...

विश्व - आप भूल रही हो... मैं इस महल के हर चप्पे-चप्पे से वाकिफ हूँ...

विश्व - सच्ची...

विश्व - ह्म्म्म्म... नहीं थोड़ी सी झूठ बोला है...

रुप - थोड़ा सी झूठ... मतलब कितना...

विश्व - राजा साहब कुछ देर पहले... रंग महल की ओर गये हैं... मैं मौका देख कर... घुस गया... और उनके आने से पहले... मुझे चले जाना होगा...

रुप - ह्म्म्म्म... मतलब तुम्हें भी डर लगता है...

विश्व - क्यूँ नहीं... मैं डर रहा था.. आपके लिए

रुप - क्यूँ...

विश्व - (चबूतरे से उठ कर छत के किनारे तक जाता है)

रुप - अनाम... तुमने बताया नहीं....

विश्व - (रुप की ओर मुड़ता है) मुझे जब खबर लगी... के राजा साहब ने... आपकी शादी तय कर दी... हाँ मैं डर गया था... (एक गहरी साँस लेकर) मुझे... वीर और अनु याद आ गए...

विश्व इतना कह कर रुक जाता है l रुप चबूतरे से उठ कर भाग कर जाती है और विश्व के सीने से लग जाती है l विश्व भी अनु को सीने में कस लेता है l

विश्व - वीर जब भी याद आता है... मुझे बहुत दर्द दे जाता है... मेरा वज़ूद... मेरी शख्सियत को कठघरे में खड़ा कर देता है... और एक सवाल हरदम झिंझोड़ता रहता है... क्यूँ आखिर क्यूँ... मैं पांच मिनट पहले नहीं पहुँचा...

रुप - (अपना सिर ऊपर उठा कर विश्व को देखते हुए) कहीं तुम मुझे ले चलने के लिए तो नहीं आए हो...

विश्व - जो आप कहेंगी वही होगा...

रुप - मैं किसी मज़बूरी या खौफ के चलते... अभी जाना नहीं चाहती... तुम बस यह शादी रुकवा दो... जिस दिन जाऊँगी... राजा साहब को बेबस देखते हुए जाऊँगी... उन्होंने हर किसी की बेबसी का फायदा उठाया है... मैं अपनी बिदाई पर.. उन्हें बेबस और लाचार देखना चाहती हूँ... वही पल... असल में बदला होगा... उनके हर एक सितम का...

विश्व - (मुस्कराते हुए) चलो... मेरा यह डर भी आपने ख़तम कर दिया...

रुप - उफ्फ्फ... कभी तो मुझे तुम कहो...

विश्व - नहीं... यह मुझसे नहीं होगा... आप राजकुमारी हो... मैं आपका गुलाम...

रुप - (बिदक कर) छोड़ो मुझे... (अलग हो जाती है) बड़े आए गुलाम...

विश्व - क्या हुआ...

रुप - वह साला कमीना... पहली मुलाकात में ही... मुझे तुम बोल रहा था...

विश्व - राज कुमारी जी... आप कबसे गाली देने लगी...

रुप - शुक्र मनाओ तुम्हें नहीं दी... बेवक़ूफ़.. हूँह्ह्... पूछा नहीं कौन था वह...

विश्व - इसमें पूछने वाली क्या बात है... मैं जानता हूँ... मेरी नकचढ़ी ने... उसको अच्छे से निचोड़ दिया होगा..

रुप हँस देती है, विश्व की तरफ जाती है l विश्व की हाथों को लेकर अपनी कमर पर रखती है l विश्व के गले में हाथ डालकर रुप विश्व के पैरों पर खड़ी हो जाती है और एड़ी उठा कर विश्व के चेहरे के सामने अपना चेहरा लाती है l विश्व की धड़कन बढ़ जाती है, रुप आगे बढ़ कर विश्व की नाक हल्के से काट लेती है l

विश्व - आह... आप हमेशा मेरी नाक के पीछे क्यूँ पड़े रहते हो...

रुप - (विश्व के नाक पर अपनी नाक रगड़ते हुए) मुझे.. अच्छा लगता है...

विश्व - (कांपते लहजे से) मुझे लगता है... अभी मुझे जाना चाहिए...

रुप - चले जाना,.. जरा ठहरो...

यह मंज़र देख कर जाना...

किसीका दम निकलता है...

विश्व - पता नहीं मुझे... पर मैं ज्यादा देर रुका... तो मेरा दम निकल जाएगा...

रुप - यु...

रुप अपना होंठ विश्व की होंठ पर रख देती है l दोनों के होठों के गुत्थम गुत्था शुरु हो जाता है l विश्व की हाथ रुप की कमर से उठ कर रुप के सिर को पकड़ लेता है और अपने में समेटने की कोशिश करता है l फिर उसका हाथ फिसलते फिसलते फिर कमर तक आ जाते हैं पर कमर पर रुक जाते हैं l कमर पर विश्व के हाथ मुट्ठी बाँध लेता है l रुप अलग होती है और विश्व के पैरों से उतरती है l दोनों हांफ रहे थे, जहां विश्व के चेहरे पर एक शॉक था वहीँ रुप के चेहरे पर एक शरारती मुस्कान था l

रुप - बहुत डरते हो... बेवक़ूफ़ तो हो ही.. अब डरपोक भी हो...

विश्व - हिरण... शेरनी से क्यूँ नहीं डरेगा...

रुप - पर यहाँ तो शेरनी खुद हिरण के हाथों शिकार होना चाहती है... पर हिरण है कि... हाथ पैर सब... अपाहिज हो जाता है...

विश्व रुप की हाथ को पकड़ कर खिंचता है l दोनों की नजरें मिलती हैं l रुप की माथे पर उड़ती लटों को हटाता है और रुप के चेहरे को दोनों हाथों से पकड़ कर कहता है l

विश्व - प्यार में बहुत गर्मी होती है... कभी कभी संभलना मुश्किल हो जाता है... प्यार में.. जब जब जो जो होना है... उसे तब तब होने देते हैं ना... जब समाज... संस्कार और भगवान का आशिर्वाद होगा... तब हमारे हिस्से की चार दीवारी और बंद दरवाजा होगा... उस दिन शायद आपको मुझसे कोई शिकायत नहीं होगी...

रुप - ओह... अनाम... (रुप विश्व के सीने से लग जाती है) तुम कितने अच्छे हो... आई लव यु...

विश्व - आई लव यु ठु.. (तभी दूर से एक सियार के भौंकने की आवाज आती है) लगता है... राजा साहब... रंग महल से निकल गए हैं... कुछ ही मिनट में पहुँच जायेंगे... (विश्व रुप की माथे पर एक किस करता है) राजकुमारी जी... आप वही करते जाइयेगा... जैसा आपको राजा साहब कहते जाएं... बाकी आप मुझ पर या अपने आप पर भरोसा मत खोइयेगा...

रुप - जैसी आपकी ख्वाहिश मेरे गुलाम...

दोनों हँसने लगते हैं l फिर विश्व इशारे से रुप को जाने के लिए कहता है l रुप जाने के लिए पलटती है और कुछ कदम चलने के बाद मुड़ती है पर तब तक विश्व गायब हो चुका होता है l रुप का मुहँ हैरानी के मारे खुल जाती है l

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अगले दिन

दिन के दस बजते बजते भीड़ छट चुकी थी l गौरी अपना गल्ला बंद कर अंदर जाने लगती है l वैदेही भी सारे बर्तनों को समेट कर धोने के लिए जमा करती है l इतने में दुकान पर सुषमा और शुभ्रा आते हैं l वैदेही उनके तरफ देखती है और महसुस करती है जैसे वह कुछ बात करना चाहते तो हैं पर हिचकिचाते रहे हैं l

वैदेही - आप अंदर आइए... आइए ना... (सुषमा और शुभ्रा एक दुसरे की ओर देखते हैं फिर अंदर आते हैं) बैठिए... (दोनों झिझकते हुए बैठते हैं)

वैदेही पानी की ग्लास लाकर उन्हें देती है l फिर एक कुर्सी खिंच कर उनके पास बैठ जाती है l

वैदेही - बड़े भाग्य का दिन है आज... मेरे घर... छोटी रानी और युवराणी आई हुई हैं... कहिये... क्या सेवा कर सकती हूँ..

शुभ्रा - ऐसे ना कहिये... महीनों पहले आप ऐसे कहतीं तो उस बात की कोई मायने होती... पर आज यह बात कोई मायने नहीं रखती... ना छोटी माँ आज रानी हैं... ना ही... मैं कोई युवराणी... वैसे भी... हम आज फरियादी बन कर आए हैं...

वैदेही - अरे बापरे... इतनी बड़ी बात... आप लोग मेरे सपने हैं... भला अपनों के यहाँ कोई फ़रियाद लेकर आता है... हक् से आता है.. हक जताता है... बस हुकुम कीजिए... जो बस में होगा... जरुर करूँगी...

तभी टीलु कुछ सामान हाथ में लेकर अंदर आता है l इन दोनों को देख कर थोड़ा स्तब्ध हो जाता है l फिर वैदेही की ओर देखता है l

वैदेही - आज हमारे यहाँ मेहमान आए हैं... इसलिये... दोपहर को दुकान बंद रहेगी... और आज... (शुभ्रा की ओर इशारा करते हुए) इन्हींकी मर्जी का खाना बनेगा...

शुभ्रा - नहीं नहीं...

वैदेही - अरे कैसे नहीं... मेरी माँ कहा करती थी... गर्भवती स्त्री का किसी के द्वार आना सबसे शुभ होता है... और उन्हें उनकी इच्छानुसार खाना खिलाने से... सौ जन्म का पुण्य मिलता है... इसलिए... बेझिझक बताइए... आज यहाँ आपकी ही मन पसंद का भोजन बनेगा...

शुभ्रा - वैदेही जी... हम किसी और काम से आए हैं...

वैदेही - वह भी सुन लुंगी... पर पहले मुझे आपका सेवा तो करने दीजिए...

सुषमा - वैदेही... हम यहाँ बहुत टेंशन में हैं... तुम जानती भी हो क्या हुआ है...

वैदेही - ओह... माफ कर दीजिए... मुझे लगा नहीं था कि किसी गम्भीर विषय पर बात करने के लिए आप यहाँ आए हैं...

सुषमा - बात बहुत ही गम्भीर है... और हम चाहते हैं कि... तुम हमें कोई राह दिखाओ...

वैदेही - ठीक है... मुझसे जो बन पड़ेगा... वह मैं जरुर करूंगी...

शुभ्रा - हाँ आप ही कर सकती हो... क्यूँकी... गाँव में सब कहते हैं... की आपकी इस चौखट से... ना तो कोई खाली हाथ लौटा है... ना ही कोई खाली पेट...

वैदेही - आप बात तो शुरु कीजिए... जब से आए हैं... मेरी बड़ाई किए जा रहे हैं...

टीलु - सच ही तो कहा है उन्होंने... दीदी... तुम्हारे दर से... कभी कोई जरूरत मंद ना खाली पेट लौटा है... ना खाली हाथ...

वैदेही - तु यहाँ से जा... वर्ना तु जरूर आज भूखा रहेगा...

टीलु झट से अंदर की ओर चला जाता है l उसे जाते हुए तीनों देख रहे थे l उसके जाने के बाद सुषमा वैदेही से कहना शुरु करती है l

सुषमा - देखो वैदेही... तुम्हारा यह मुहँ बोला भाई... झूठ नहीं कहा है... मैं तुम्हें बेटी नहीं कह सकती... क्यूँकी इससे... उस रिश्ते पर तोहमत लगेगी... मैं जानती हूँ... क्षेत्रपाल परिवार ने तुम्हारे साथ क्या किया है... पर तुम स्वयं सिद्धा हो... तुम देवी हो... इसलिए आज हम दोनों सास बहु... तुम्हारे दर पर आए हैं... हमारी बेटी... रुप नंदिनी के लिए... (वैदेही थोड़ी गम्भीर हो जाती है) वह पाँच साल की थी... जब उसकी माँ इस दुनिया से चली गई... मैंने अपने सीने से लगा कर बड़ा किया... मुझे अपने बच्चों से ज्यादा अजीज है... पता नहीं... तुम भाई बहन को पता है भी या नहीं... अगर पता है... तो तुम लोग गम्भीर क्यूँ नहीं हो... राजा साहब ने... नंदिनी की शादी एक अधेड़ से तय कर दी है.... मैं और मेरी बहु... यहाँ उसकी सुरक्षा मांगने आए हैं... (हाथ जोड़ देती है)

वैदेही - अरे अरे... यह आप क्या कर रही हैं...

शुभ्रा - वक़्त की विडंबना है... कभी क्षेत्रपालों को गुरुर हुआ करता था... के उनके हाथ कभी आकाश की ओर नहीं देखती... पर आज हम तुम्हारे सामने हाथ फैलाए आए हैं...

वैदेही - राजा भैरव सिंह... कल आपके पास से सीधे मेरे पास आए थे...

इतना कह कर वैदेही अपनी टेबल की ड्रॉयर खोल कर वही इंवीटेशन कार्ड निकाल कर सुषमा को दिखाती है l शुभा और सुषमा दोनों हैरान हो जाते हैं और वैदेही की ओर देखने लगते हैं l

वैदेही - जब भैरव सिंह... गिरफ्तार हो कर जा रहा था... यहाँ मुझसे मिलने आया था और चुनौती दे कर गया था... मुझे और विशु की हालत खस्ता कर देगा... और कटक छोड़ कर राजगड़ आने से पहले... विशु को भी... चेतावनी देकर आया था... के उसके तन मन और आत्मा को ज़ख्मी कर देगा...

सुषमा - मतलब तुम सब जानती हो...

वैदेही - हाँ... जानती हूँ... और यह भी जानती हूँ... यह शादी नहीं होगी...

शुभ्रा - यह आप कैसे कह सकते हैं... राजा साहब ने... अपनी नई फौज बनाई है... बाहर से लोग आए हैं...

वैदेही - फिर भी... यह शादी नहीं होगी...

सुषमा - मैं तुम्हारी आत्मविश्वास की कद्र करती हूँ... पर अति आत्मविश्वास और आत्मविश्वास के बीच बहुत ही महिम दीवार होती है...

वैदेही - यह मेरा विश्वास है... बल्कि यह मेरा ही नहीं... आपकी नंदिनी का भी यही विचार है...

सुषमा और शुभ्रा - क्या...

वैदेही - हाँ...

सुषमा - ठीक है... यह उसका विचार हो सकता है... पर... राजा साहब... अपने अहं के आगे... किसीको कुछ नहीं समझते...

सुषमा - जब किसी का अंत करीब आती है.... तो उसका बुद्धि और विवेक खो जाती है... राजा भैरव सिंह के साथ भी ऐसा ही हुआ है... वह इस विषय में... विश्व को दिली और दिमागी तौर से कमजोर करने के लिए... ऐसा कदम उठाया है... पर जब दो प्रेमी... इससे परेशान नहीं हैं... तो हम क्यूँ हों...

शुभ्रा - क्या कहा तुमने... विश्व और रुप परेशान नहीं हैं...

वैदेही - (मुस्कराती है) रात को ही... विशु... नंदिनी से मिलकर आया है... इसलिए... आप भी निश्चिंत हो जाइए... यह शादी नहीं होगी...

शुभ्रा - भगवान करे... आपकी बात सही हो... पर कल से... विक्रम जी बहुत परेशान थे... उनसे रहा नहीं गया... तो अभी कुछ देर पहले महल की ओर गए हैं...

वैदेही - तो ठीक है ना... आप उनसे सारी जानकारी प्राप्त कर सकतीं हैं... (दोनों कशमकश के साथ अपना सिर झुका लेते हैं) वह सब जाने दीजिए... शुभ्रा जी... दिल को तसल्ली दीजिए... और जो भी आपका मन पसंद हो कहिए... आपको खिलाए बिना जाने नहीं दूंगी... ह्म्म्म्म

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केके पिनाक के कमरे में कुर्सी पर बैठा हुआ था l केके का पैर एक नौकर दबा रहा था l केके कमरे की चारों ओर नजर घुमा रहा था l नौकर देखता है केके किसी गहरे सोच में खोया हुआ है l कोई ऐसी बात थी जो उसे असहज कर रही थी l

नौकर - मालिक... क्या आपको हमारी सेवा अच्छी नहीं लगी...

केके - (सोच से बाहर आता है) नहीं नहीं...

नौकर - पर हम तो जी जान से आपकी सेवा कर रहे हैं...

केके - अरे नहीं... मेरा मतलब... तुम बहुत अच्छा काम कर रहे हो... हम बस कुछ और सोच रहे थे... वैसे क्या नाम है तुम्हारा...

नौकर - जी सत्यवान... पर सभी मुझे सत्तू कह कर बुलाते हैं...

केके - तो सत्तू...

सत्तू - जी... जी मालिक...

केके - तुम जानते हो... हम कौन हैं...

सत्तू - जी मालिक... आप इस परिवार के होने वाले... जामाता हैं... तभी तो... मुझे आपकी सेवा करने के लिए... जिम्मेदारी सौंपी गई है...

केके - ह्म्म्म्म... अब मेरा पैर छोडकर कुर्सी पर बैठ जाओ....

सत्तू - ना मालिक ना... हम महल के नौकर हैं... (कह कर फर्श पर पालथी मार कर बैठ जाता है) अब पूछिये...

केके - अच्छा सत्तू... क्या तुमने पूरा महल देखा हुआ है...

सत्तू - नहीं मालिक... यह पहली बार है... जब हम महल के इतने अंदर आए हैं... वर्ना... हमारी औकात बरामदे तक ही होती थी... फिर भी... आप पूछिये... क्या जानना चाहते हैं... जो मुझे मालूम होगा... मैं बता दूँगा...

केके - अच्छा... कितने कमरे हैं यहाँ...

सत्तू - वह तो नहीं पता... पर पंद्रह बीस कमरे होंगे... और जो भी हैं बड़े बड़े कमरे हैं...

केके - रहते कितने लोग हैं...

सत्तू - जनाना महल में... राजकुमारी जी रहती हैं... और एक बड़े से कमरे में... बड़े राजा जी रहते हैं... उनकी सेवा में भी बहुत लोग लगे हुए हैं...

केके - ह्म्म्म्म...

सत्तू - और कुछ...

केके - तुम...

सत्तू - हाँ हाँ पूछिये...

केके - य़ह तुम... विश्वा के बारे में क्या जानते हो...

सत्तू - ज्यादा कुछ नहीं मालिक... मुझे तो तीन साल हुए हैं... राजा साहब के महल में... पर इतना जानता हूँ... विश्वा इस महल का बहुत पुराना नौकर था... राजा साहब ने उसे सरपंच बनाया... पर यह उनसे गद्दारी पर आ गया... उसने कई कत्ल भी किए हैं... और जैल भी गया था... पर था साला पढ़ाकु... जैल में रहकर बड़ा वकील बन गया है... अब देखिए ना... उसकी एहसान फरामोशी... राजा साहब के खिलाफ अब केस लड़ रहा है...

केके - उसका और राजकुमारी का क्या रिश्ता है... कुछ जानते हो...

सत्तू - हाँ जानता हूँ ना... विश्वा... बचपन में... राजकुमारी जी को सात साल तक पढ़ाया है...

केके - ओ... मतलब पहचान.. बचपन वाला है...

सत्तू - जी मालिक...

केके - अच्छा सत्तू... राजकुमारी की शादी... किसी राज घराने में... या फिर... किसी बड़े घर में होनी चाहिए थी... है ना...

सत्तू - ऐसी बातेँ मुझसे मत पूछिये मालिक... बहुत छोटे लोग हैं... क्या बोलें... हम बस इतना जानते हैं... राजा साहब... हमारे भगवान हैं... उनकी बात और फैसला... यहाँ पर रहने और जीने वालों की जीने की फरमान होती है... राजा साहब ने अगर आपको पसंद किया है.. तो यह राजकुमारी और आपका भाग्य है...

केके - ह्म्म्म्म... वैसे... मेरे बारे में... तुम्हारे साथी कैसी बात कर रहे हैं...

सत्तू - राजा साहब के फैसले पर... हम कभी बात नहीं करते... बस उनके हुकुम बजाते हैं...

केके - अच्छा यह बताओ... राजा साहब ने कभी विश्वा को... उसकी गुस्ताखी की सजा देने का नहीं सोचा...

सत्तू - अब हम क्या कहें मालिक... विश्वा अब कोई आम विश्वा नहीं है... बवंडर है... हमने कई बार कोशिश की उसे मिटाने के लिए... पर हर बार वह हम पर भारी पड़ा... एक अकेला... बीस बीस को लपक लेता है... एक बार तो महल के बाहर ही... (सत्तू बताने लगता है कैसे गाँव वालों के जमीन और घरों के कागजात लेने वैदेही और विश्वा आए थे और कैसे कागजात लेकर गए थे)

केके - और राजा साहब खामोश हैं...

सत्तू - क्या करेंगे फिर... आखिर वह राजा हैं... किसी ऐरे गैरे को... राह चलते को... कैसे हाथ लगा सकते हैं... उनको हम पर भरोसा था... पर... हम ही खरे नहीं उतरे... इसीलिए तो अब... बाहर से लोगों को लाए हैं... अब अगर विश्वा कुछ भी हिमाकत करेगा... तो इसबार वह बच नहीं पाएगा... वैसे एक बात पूछूं मालिक...

केके - पूछो...

सत्तू - आप यह विश्वा के बारे में... इतना पूछताछ क्यूँ कर रहे हैं... क्या आप उसे पहले से जानते हैं...

केके - अरे नहीं... बस ऐसे ही सुना था... अच्छा... xxx चौक पर... एक औरत का दुकान है... उसका राजा साहब का... मतलब... कुछ...

सत्तू - वह औरत... वही तो विश्वा का बहन... वैदेही है...

केके - (चौंकता है) क्या...

सत्तू - क्यूँ... क्या हुआ मालिक...

केके - कुछ नहीं... (माथे पर चिंता की लकीर उभर आती है) राजा साहब... महल को लौटते वक़्त... उसके दुकान पर गए थे...

सत्तू - ज्यादा तो नहीं जानता पर... सुना है... कभी रंग महल में... राजा साहब के ऐस गाह की रौनक हुआ करती थी... और वही एक औरत है... पूरे राजगड़ में... जो राजा साहब से सिर उठा कर आँखों में आँखे डाल कर बात करती है...

तभी कमरे के बाहर दस्तक होती है, दोनों की नजरें दरवाजे की तरफ जाती है l एक नौकर खड़ा था l

केके - हाँ क्या हुआ...

नौकर - राजा साहब आपको... दीवान ए आम में आने के लिए कहा है...

केके - ठीक है... तुम चलो... (सत्तू से) तुम मुझे वहाँ ले चलो...

सत्तू - ठीक है मालिक....

दोनों कमरे से निकल कर दीवान ए आम की ओर जाने लगते हैं l जाते वक़्त केके अपनी नजरें चारो ओर दौड़ा रहा था l कुछ देर बाद दोनों दीवान ए आम में पहुँच जाते हैं l दोनों देखते हैं सिंहासन पर भैरव सिंह बैठा हुआ था और उसके सामने विक्रम खड़ा था l केके को देख कर भैरव सिंह केके से कहता है

भैरव सिंह - आओ केके आओ... महल में कोई शिकायत तो नहीं...

केके - जी नहीं राजा साहब...

भैरव सिंह - (विक्रम से) तो... विक्रम सिंह... बताने की कष्ट करेंगे... महल में जबरदस्ती घुसने की कोशिश क्यूँ कर रहे थे...

विक्रम - मैं यहाँ अपनी बहन से मिलने आया था...

भैरव सिंह - क्यूँ... क्यूँ आए हो... तुमने तो सभी रिश्ते नाते तोड़ कर महल से चल दिए थे...

विक्रम - मैं... महल से क्षेत्रपाल छोड़ गया था... तब भी... अपनी बहन को ले जाना चाहता था... शुक्र मनाईये... वह अपने दादा की सेवा करने के लिए रुक गई... वर्ना...

भैरव सिंह - वर्ना... हाँ हाँ... वर्ना... शायद तुम भूल रहे हो... वह तुम्हारे साथ जाती ही नहीं...

विक्रम - आप उसकी अच्छाइ.. और मासूमियत का... नाजायज फायदा उठा रहे हैं...

भैरव सिंह - नाजायज... फायदा... जो... जिसकी... जितनी काबिल है... हम उसकी उतनी... वही किस्मत लिख रहे हैं... नंदिनी के किस्मत में वही मिल रहा है... जो उसने हमसे खोया है... और इस महल के बाहर कमाया है... हम तो बस मोहर लगा रहे हैं...

विक्रम - (केके की ओर दिखा कर) यह... इसको नंदिनी की किस्मत में थोप रहे हैं... यह हरामी गटर का सुअर... मेरी जुती चाटने वाला...

भैरव सिंह - केके...

केके - जी राजा साहब...

भैरव सिंह - आओ... हमारे बगल में बैठो...

केके जा कर भैरव सिंह के पास वाले एक कुर्सी पर बैठ जाता है l विक्रम की आँखें गुस्से से अंगारों की तरह दहकने लगती हैं l विक्रम को मुट्ठीयाँ भिंच जाती हैं l विक्रम का यह रुप देख कर केके की हलक सुख जाता है l

भैरव सिंह - अब केके की जुतें.. इस घर के नौकर साफ करते हैं...

विक्रम - मुझे यह समझ में नहीं आ रहा... आप ऐसा क्यूँ कर रहे हैं... अपनी कद से ऊपर उठने के बजाय... गिरते जा रहे हैं...

भैरव सिंह - कद किसका क्या है... कितना है... यह फैसला भी हम ही करते हैं...

विश्व - मैं आपसे कोई बहस करना नहीं चाहता... आप नंदिनी को बुलाईये... मैं उसकी मर्जी जानना चाहता हूँ...

भैरव सिंह - वही तो हम पूछ रहे हैं... किस हक से... जब आप महल से हर रिश्ते नाते तोड़ कर जा चुके हैं...

विक्रम - महल में एक रिश्ता अभी जिंदा है... मैं उसके वास्ते आया हूँ... उसकी मर्जी... और खैरियत पूछने आया हूँ....

भैरव सिंह - अगर मर्जी नहीं हुई तो...

विक्रम - तो... दुनिया इधर से उधर क्यूँ ना हो जाए... यह शादी कोई नहीं करा सकता... इस महल का... भगवान भी नहीं...

भैरव सिंह - ओ हो... खून के सामने खून खड़ा है... और खून को ललकार रहा है..

विक्रम - यही दस्तूर है... इतिहास उठाकर देख लीजिए... बात जब आन पर आ जाती है... खून को खून ही ललकारता है... और खून को खून ही हटाता है...

भैरव सिंह - बच्चे कैसे पैदा किया जाता है... यह बच्चे कभी बाप को नहीं सिखाते...

विक्रम - रजवाड़ों का खूनी इतिहास उठा कर देख लीजिए... बाप ने कभी औलादों को नहीं हटाया...

भैरव सिंह - तो खून में इतनी गर्मी आ गई... के बाप को हटाने की सोच रहे हो...

विक्रम - तब तक तो नहीं... जब तक... नंदिनी मेरी बहन है... और मुझे उससे बात करनी है...

भैरव सिंह - (कुछ देर की चुप्पी, तनाव भरा माहौल था, फिर भैरव सिंह मुस्कराते हुए) ठीक है... आज हम भी देखेंगे... हमारी लिखी किस्मत और... तुम्हारी बगावत की टक्कर होती है या नहीं... (सत्तू से) जाओ बड़े राजा जी के कमरे तक खबर पहुँचा दो... राजकुमारी जी को हमने अभी यहाँ याद किया है...

सत्तू भागते हुए चला जाता है l बाहर एक नौकरानी को नागेंद्र के कमरे जाकर रुप को बुलाने के लिए कहता है l कुछ देर के बाद रुप अंदर आती है और अंदर की नज़ारा देखती है l भैरव सिंह और केके दोनों कमरे के बीचोबीच कुर्सी पर बैठे हुए हैं और उनके आगे विक्रम खड़ा हुआ है l रुप को देख कर विक्रम आपनी बाहें फैला देता है रुप दौड़ कर उसके गले लग जाती है l थोड़ी देर बाद विक्रम उसे अलग कर उसके चेहरे को गौर से देखता है l रुप के चेहरे पर ना कोई ग़म ना कोई शिकन था l यह देख कर विक्रम को थोड़ी हैरानी होती है l

विक्रम - कैसी है मेरी गुड़िया...

रुप - बहुत अच्छी हूँ भैया... पर एक दुख तो रहेगा ना... जिस वक़्त भाभी के पास ननद को होना चाहिए... तब मैं नहीं हूँ...

विक्रम - अब भी कोई देर नहीं हुई है... चल मैं ले चलता हूँ...

रुप - क्या करूँ भैया... एक रिश्ते ने मुझे इस महल से बाँध रखा है... वर्ना चली ही जाती...

विक्रम - नंदिनी... मेरी बहन... (केके की ओर दिखा कर) तु इस आदमी के बारे जानती है...

रुप - हाँ भैया... यह वही है ना... जो सालों साल... तुम्हारे जुते चाटता था... (यह बात सुनते ही केके का चेहरा कड़वा हो जाता है)

विक्रम - यह अभी इस महल में... राजा साहब के बगल में क्यूँ है जानती हो ना..

रुप - हाँ भैया... श्मशान जाने की उम्र में... कटक से इतना दूर... अपनी फजिहत करवाने आया है...

भैरव सिंह - (गुर्राता है) नंदिनी...

विक्रम - (भैरव सिंह की ओर हाथ दिखा कर आगे कुछ बोलने से रोक देता है और रुप से) तुझे यह शादी मंजूर नहीं है ना...

रुप - भैया... शादी हो तब ना... जब यह शादी होनी ही नहीं है... फिर मैं उसकी चिंता क्यूँ करूँ...

विक्रम - तुझसे ज़बरदस्ती भी करवा सकते हैं...

रुप - ज़बरदस्ती तब करेंगे ना... जब मैं मना करूंगी...

विक्रम - मैं समझा नहीं गुड़िया...

रुप - भैया... आप ज़रूर आना... भाभी... चाची माँ और चाचाजी को लेकर... वह तमाशा... राजगड़ के साथ साथ... आप भी देखना...

विक्रम - बस बहना बस... मैं बस तेरी खैर ख़बर और मर्जी जानने आया था... तेरा यह विश्वास देख कर... मैं सब समझ गया...

रुप - देखा भैया... बातों ही बातों में भूल गई... भाभी.. चाची माँ और चाचाजी कैसे हैं...

विक्रम - तेरे लिए फिक्र मंद थे... अब मेरी फिक्र मीट गई... समझ उनकी भी मीट गई... अच्छा... अब अंदर जा...

रुप फिर से अपने भाई के गले लगती है और फिर वहाँ से निकल जाती है l विक्रम अब एक मुस्कराहट के साथ भैरव सिंह के तरफ देखता है l

भैरव सिंह - हो गई तसल्ली...

विक्रम - जी... हो गई... अब मुझे... आपकी फिक्र हो रही है...

भैरव सिंह - तुम्हें लगता है... यह शादी कोई रोक सकता है...

विक्रम - मेरी बहन की आत्मविश्वास बोल रहा है... और मुझे यह साफ एहसास हो रहा है... नंदिनी की आत्मविश्वास की आँच को आप भी महसूस कर रहे हैं...

भैरव सिंह - हम उस दिन किसी को भी... अपनी जगह से हिलने तक नहीं देंगे.... ना हवा.. ना पानी... ना खून को...

विक्रम - आप उसी पर कायम रहिएगा... जोर नंदिनी पर मत आजमा बैठिएगा... क्यूँकी चाची माँ ने कहा था... पहली बार... आप ही के अहंकार से... आप ही का खून का अहंकार टकराया है...

भैरव सिंह - और हमारे अहंकार से टकराने वाले हर वज़ूद को नकार देते हैं... हमसे कोई जीत नहीं सकता... चाहे वह हमारा खून ही क्यूँ ना हो... इसलिए हमारी फिक्र मत करो

विक्रम - आपके खून के साथ किसी और का जुनून भी टकराएगा... इसीलिए मुझे फिक्र हो रहा था... (कह कर विक्रम पलट कर जाने लगता है फिर अचानक रुक कर मुड़ता है) मुझसे नंदिनी चहकते हुए मिली... शादी के दिन भी मुझे वैसी ही मिलनी चाहिए... वर्ना... रजवाड़ी इतिहास... फिर से अपने आप को दोहराएगा....

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शादी को एक दिन रह गया है

उसके पूर्व संध्या के समय विश्व नदी के तट पर बने सीढ़ियों पर बैठा डूबते सूरज की देख रहा था l कोई उसके पीछे से सीढ़ियां उतरता हुआ महसूस होता है l विश्व नजर घुमा कर देखता है पिनाक सीढ़ियों से उतर कर आ रहा था l विश्व खड़ा हो जाता है l

पिनाक - यह अच्छी निशानी है... यह नदी का किनारा... ढलता हुआ शाम... डूबता हुआ सुरज... किसी को भी... खोने को मजबूर कर सकता है... पर फिर भी तुम चौकन्ना थे... मैं दबे पाँव आ रहा था... तुम सतर्क हो गए...

विश्व - (कुछ नहीं कहता चुप रहता है)

पिनाक - बैठो... मैं भी तुम्हारे साथ... कुछ देर बैठने के लिए आया हूँ... (सीढ़ियों पर बैठ जाता है, विश्व भी उसे बैठा देख कर बगल में बैठ जाता है) ज्यादातर डूबते सूरज को वही लोग देखते हैं... जिन्हें अंधेरे में कुछ खोने का डर हो...

विश्व - हाँ आपकी बात सच है... पर सुबह की तरह शाम भी एक सच है... अगर उजाले के बाद... अंधेरा आना तय है... तो राह के लिए भटकने से पहले... रौशनी का इंतजाम कर लेना चाहिए... मैं यहाँ... रौशनी ढूंढ रहा हूँ...

कुछ देर के लिए दोनों के बीच एक चुप्पी सी छा जाती है l कुछ देर बाद विश्व पिनाक से कहता है l

विश्व - आज आपको यहाँ देख कर अच्छा लगा...

पिनाक - हाँ... मुर्दों की तरह... मुर्दों के बीच जिए जा रहा था... जब जीने की ख्वाहिश जागी... तब सब कुछ लूट चुका था... जिंदा लाश बन कर रह गया हूँ...

विश्व - आपने कहा... आप मुझसे बात करने आए हैं...

पिनाक - हाँ... इससे पहले हम जब भी मिले... आपस में... रंजिश भरे दिल में मिले... अब रंजिश की जगह तो नहीं है... पर...

विश्व - पर...

पिनाक - पर एक मासूम सी जान है... जो एक राक्षस के पिंजरे में कैद है...

विश्व - आप... राजकुमारी जी की बात कर रहे हैं...

पिनाक - हाँ... मैं नंदिनी की बात कर रहा हूँ...

विश्व - (एक गहरा साँस छोड़ते हुए) आपको... क्या लगता है...

पिनाक - मैं अब क्या कहूँ... मुझे परेशान देख कर... विक्रम ने ही तुम्हारे पास यहाँ आने के लिए कहा था... क्यूँकी उसे मालूम था... तुम मुझे यहाँ मिलोगे...

विश्व - आपको... राजकुमारी जी की चिंता परेशानी में डाल रखा है...

पिनाक - हाँ... मेरी पत्नी... बहु और विक्रम तक... आश्वस्त हैं... पर मैं नहीं हो पा रहा था... इसलिए विक्रम ने मुझे तुम्हारे पास भेज दिया...

विश्व - पर आपने अभी तक... राजकुमारी जी को लेकर... कोई भी सवाल नहीं किया है...

पिनाक - विश्व... वीर को... खोने के बाद... मैं खुद को एक लुटा पीटा भिकारी समझ रहा था... पर ज्यूं ही... राजा साहब ने... शादी का कार्ड दिया... तब मुझे एहसास हुआ... मेरे पास और भी कुछ क़ीमती है... जो राजा साहब की जिद की बेदी पर बलि चढ़ने जा रही है...

विश्व - आप मुझसे क्या चाहते हैं...

पिनाक - वादा... सिर्फ एक वादा...

विश्व - कैसा... वादा...

पिनाक - विश्व रुप की एका... विश्व और रुप दो शब्द या दो प्राण नहीं होने चाहिए... जब भी नाम लिया जाए... विश्वरुप ही सुनाई दे... दिखाई दे... बस यही वादा चाहता हूँ... मेरे बेटे की आत्मा को शांति मिलेगी... क्यूँकी वह तुम दोनों के बारे जानता था... और तुम दोनों को एक होते देखना चाहता था...

विश्व - आप ही ने कहा... आपके परिवार वाले आश्वस्त हैं... क्या आपको संदेह है...

पिनाक - नहीं... पर... मैं राजा साहब के जिद को जानता हूँ... और अब ऐसा लग रहा है... जैसे तुम्हें हराने के लिए... वह किसी भी हद तक जा सकते हैं...

विश्व - ह्म्म्म्म... शादी कल शाम को है... इतने दिनों में... महल में... क्या कुछ हुआ है...

पिनाक - तुमसे कुछ छुपा तो नहीं होगा... यशपुर से कुछ औरतें बुलाई गई हैं... जो नंदिनी की शृंगार करेंगी... आज घर पर... नंदिनी की खास परिचारिका सेबती आई थी... कल नंदिनी अपने पास अपनी भाभी और चाची माँ को चाहती है... इसलिए वे कल सुबह ही महल चली जाएंगी... कमल कांत सिर्फ एक दिन ही महल में रहा... फिर उसे राजा साहब ने रंग महल भेज दिया... एक अंधी सफेद घोड़ी को लाई गई है... जिसके ऊपर वह बेशरम... बेग़ैरत... कमल कांत... रंग महल से निकल कर राजगड़ परिक्रमा करेगा... अब की बार... राजा साहब ने... बाहर से लोग बुलवाए हैं... हर एक पर नजरें जमाए हुए हैं... मुझे तो लगता है... वे तुम पर भी... नजरें गड़ाए होंगे...

विश्व - क्यूँ...

पिनाक - यह कैसा सवाल हुआ... तुम पर उनकी इसलिए नजर होगी... ताकि तुमसे कोई हरकत हो... तो पलटवार कर सकें...

विश्व - अगर मैं कोई हरकत ही ना करूँ तो...

पिनाक - (भौंहे सिकुड़ कर हैरानी भरे नजर से देखता है) तुम अगर कुछ नहीं करोगे... तो राजा साहब अपने मकसद में कामयाब हो जाएंगे... नंदिनी की जिंदगी बर्बाद हो जाएगी...

विश्व - यह शादी... राजा साहब की मकसद नहीं है... बल्कि एक छिपा हुआ मकसद है... जिसके लिए... उन्होंने यह शादी तय की है...

पिनाक - क्या... कौनसी छुपी हुई मकसद...

विश्व - असल में... राजा साहब... यह शादी ही नहीं चाहते... और यह भी अच्छी तरह से जानते हैं... यह शादी नहीं होगी...

पिनाक - (झटका खाते हुए) यह तुम किस बिनाह पर कह सकते हो...

विश्व - (मुस्कराता है) राजा साहब का पहला मकसद है... मुझे इस केस से हटाना... या भटकाना... यह तभी हो सकता है... जब मेरी कोई कमजोर नस उनके हाथ हो...

पिनाक - तो क्या नंदिनी तुम्हारी कमजोरी नहीं है...

विश्व - नहीं... वह मेरी ताकत हैं... मेरी जान... मेरी आत्मा हैं... मेरी कमजोरी... मेरे मुहँ बोले माता पिता हैं... यह शादी की बात इसलिए फैलाई गई है... किसी तरह यह खबर मेरे माता पिता को मिल जाए... मेरी माँ... इमोशनली जितनी मजबूत है... उतनी ही कमजोर भी है... यह बात... राजा साहब अच्छी तरह से जानते हैं... मेरी माँ तक अगर राजकुमारी जी की शादी की खबर पहुँच जाए... तो मेरी माँ हाय तौबा कर बाहर आ जाती... आज के दिन... राजा साहब को सरकारी तंत्र भी मदत दे रही है... ऐसे में... मेरी माँ को कब्जे में लेना... उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं होगी...

पिनाक - तुम्हें ऐसा क्यूँ लगता है... नंदिनी की शादी की खबर... प्रतिभा जी को नहीं मिलेगी...

विश्व - क्यूँकी... माँ और डैड... दोनों को... मैंने ही अंडरग्राउंड करवाया है... उन तक कौनसी खबर जाएगी... यह मैं ही तय करता हूँ...

पिनाक - (कुछ सोच में पड़ जाता है) तुम यह कैसे कह सकते हो... राजा साहब को यह शादी... मंजूर नहीं...

विश्व - पुरे स्टेट में... राजा साहब कोई मामूली व्यक्ती नहीं हैं... पर वह केवल दो ही ईंवीटेशन कार्ड प्रिंट कर लाए थे... एक मेरे और दीदी के नाम... दूसरा आपके नाम... बाकी राजगड़ से बाहर... यहाँ तक यशपुर भी नहीं... कहीं भी... किसीको भी... ना खबर किया गया है... ना ही बुलाया गया है... राजगड़ में भी लोगों को... घूम घूम कर... मुहँ जुबानी निमंत्रण दिया गया है... इससे यही साबित हो रहा है... यह शादी... राजा सहाब को मंजूर नहीं है...

पिनाक - चलो मान लिया... तुमने राजा साहब की वह छुपी हुई मकसद को नाकाम कर दिया... पर शादी... शादी कैसे नहीं होगी... राजा साहब तुम्हें तोड़ने के लिए... किसी भी हद तक जा सकते हैं... मतलब शादी... उसी केके से करवा सकते हैं...

विश्व - राजा साहब का यह मकसद भी पूरा नहीं होगी... बस यकीन रखिए...

सुरज पूरी तरह से डूब चुका था l उजाला कम हो गया था अंधेरा धीरे धीरे आने लगा था, पश्चिमी आसमान के कुछ हिस्सा अभी भी लाल दिख रहा था l तभी दोनों के कानों में विक्रम की आवाज़ सुनाई पड़ती है l

"चाचाजी"

दोनों आवाज की दिशा में मुड़ते हैं l विक्रम को देख कर पिनाक अपनी जगह से उठता है, विक्रम हाथ बढ़ा कर पिनाक का हाथ थाम लेता है l पिनाक सीढ़ियों से चढ़ते हुए जाने लगता है l पीछे पीछे विश्व भी जाने लगता है l कुछ दूर जाने के बाद पिनाक रुक जाता है और मुड़ कर विश्व से पूछता है l

पिनाक - विश्व... तुम्हें जब इस घाट पर ढलते सूरज की देखते हुए पाया... तो लगा कि तुम नंदिनी के लिए परेशान हो... पर तुम्हारे बातों से जाना... तुम नंदिनी के लिए परेशान हो ही नहीं... पर सच्चाई यही है... के तुम किसी बात को लेकर... परेशान हो... मैं अपनी शंका मिटाने आया था... मीट गया... तुम अंधेरे उजाले की बात कर रहे थे... क्या मैं तुम्हारी कोई मदत कर सकता हूँ... (विश्व क्या कहे समझ नहीं पाता, उसे यूँ असमंजस देख कर विक्रम कहता है)

विक्रम - हाँ विश्व... वैसे हम जानते हैं... तुम बहुत काबिल हो... फिर भी... कोई मदत चाहो तो पूछ सकते हो... क्यूँकी वीर ने ऐलान किया था... जब तुम और क्षेत्रपाल आमने सामने होंगे... वह तुम्हारे कंधे से कंधा मिलाकर लड़ेगा... अब वह हमारे बीच रहा नहीं... पर उसकी यह ख्वाहिश मिटनी नहीं चाहिए...

पिनाक - हाँ विश्वा... हम जो भी कह रहे हैं.. जो भी कर रहे हैं... सभी वीर के वास्ते...

विश्व अभी भी असमंजस में था l उससे कुछ पूछा नहीं जाता l विश्व की यह स्थिति देख कर दोनों चाचा भतीजा लौटने के लिए मुड़ते हैं के विश्व उन्हें पूछता है l

विश्व - वह बात... केस के सिलसिले पर ही है.... पर...

पिनाक - पूछो... क्या जानना चाहते हो...

विश्व - रुप फाउंडेशन के केस में... दो आरोपी कत्ल कर दिए गए... और दो आरोपी गायब हो गए... क्या ऐसा हो सकता है... के कोई आरोपी खुद को... गायब कर लिया हो...

विक्रम - मैं सोच रहा था... किसी मामले में... फिजीकल कुछ हेल्प एक्सटेंड कर सकूं... पर माफ करना... इस पर मेरी कोई आइडिया नहीं है... क्यूँकी राजा साहब हमें कभी भी... उनके किसी भी मामले में... सामिल नहीं करते थे...

पिनाक - अब समझा... तुम्हारे अंधेरे और उजाले की पहेली... देखो विश्व... इस केस की विशेषता यह है कि... तुम शायद इस केस में... राजा साहब की संलिप्तता सिद्ध कर सको... पर... फिर भी... राजा साहब बच जाएंगे...

विश्व - जी... मैं भी तब से यही सोच रहा हूँ... कोई ऐसा गवाह जो मेरे हाथ लग जाये... जिसके गवाही पर... राजा साहब के हर एक करनी को अंजाम तक पहुँचा सकूँ...

पिनाक - देखो विश्वा... सूरज डूबता है... पर फिर भी अंधेरे में.. हमें रौशनी की दरकार होती है... तब... कमरे में दिया जलाया जाता है... रौशनी के लिए... पर इतना याद रखना... अंधेरा पूरी तरह से छटती नहीं है.... दिन की काली करतूत को... दिए के तले वाली अंधेरे में छुपाया जाता है... तुम्हें बस दिए को ढूंढना है... अगर ढूंढ लिया... तो वह तला भी मिल जाएगा और... तले में छुपे काली करतूत...

विश्व - मैं पूरी बात समझा नहीं...

पिनाक - जैसे कि मैंने पहले भी कहा था... तुम संलिप्तता साबित कर सकते हो... पर पूरी तरह दोषी करार नहीं दे सकते... तुम ज्यादा से ज्यादा... केस में राजा साहब को घेर सकते हो... जिससे राजा साहब साफ बचके निकल जाएंगे... राजा साहब को दोषी साबित करने के लिए... तुम्हारे दोनों केस में... मॉनी ट्रेल को साबित करना होगा... उस ट्रेल का छोर और अंत राजा साहब हैं यह साबित करना होगा... यहाँ राजा साहब का अंधेरे का दिआ... कोई और नहीं... एडवोकेट बल्लभ प्रधान है... जो अपने तले... राजा साहब की हर एक काली करतूत को छुपाये रखा है...

विश्व - जानता हूँ... पर कोई ऐसी जानकारी... जो एडवोकेट प्रधान को... घुटने पर ला सके...

विक्रम - देखो विश्व... प्रधान का ठिकाना... या तो राजगड़ या यशपुर... या फिर कटक या भुवनेश्वर... बाकी जो भी तुम्हें शक है... उसे एस्टाब्लीश करने के लिए... तुम्हें अपने कॉन्टैक्ट ईस्तेमाल करने होंगे...

विश्व - (चेहरे पर एक मुस्कान उभर आती है) वाह क्या बात कही... मुझे एक उम्मीद दिला दिया आपने... थैंक्यू...

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अब शाम ढल चुकी थी l अंधेरा पूरी तरह से पसर चुकी थी l रंग महल के सामने एक सफेद घोड़ी को भीमा और उसके गुर्गे सजा रहे थे l जो भी लोग रंग महल में थे वे सब कल होने वाली शादी की खुशी में दारु पी रहे थे l वहीँ रंग महल के एक कमरे में केके गहरी सोच में खोया हुआ एक कुर्सी पर बैठा हुआ था l दरवाजे पर जब दस्तक होती है तो वह कहता है

केके - अंदर आ जाओ...

दरवाजा खुलता है सत्तू के साथ रॉय और रंगा आते हैं l तीनों अंदर आकर देखते हैं केके थोड़ा घबराया और परेशान सा दिख रहा था l

रॉय - क्या बात है... केके साहब... आज तो बहुत खुशी का रात है... फिर तो यह रंग महल आपका... सारी प्रॉपर्टी में आधा हिस्सा आपका... मुझे तो लगा था... आप मन ही मन यही गा रहे होंगे... यही रात अंतिम यही रात भारी... पर आप घबराए हुए क्यूँ लग रहे हैं...

रंगा - हाँ... मैं तो सोच रहा था... आपके चेहरे पर लड्डू फुट रहे होंगे... पर आप घबराए हुए दिख रहे हैं...

रॉय - हाँ... जब कि कायदे से... कल की सोच कर... दुल्हन को घबराना चाहिए... हा हा हा हा... (रॉय के साथ रंगा भी हँसने लगता है)

गुस्से से तमतमाते हुए केके कुर्सी से उठ खड़ा होता है l और दोनों पर चिल्लाता है l

केके - शॉट अप... (दोनों चुप हो जाते हैं)

रॉय - केके साहब... कल शादी है... हमें राजा साहब ने हुकुम दिया है... आपको दूल्हे की तरह सजा कर... रंग महल से... क्षेत्रपाल महल तक... घोड़ी के ऊपर बिठा कर... जुलूस के साथ ले जाने के लिए... हमें लगा था... आपकी इच्छा पूरी हो रही है... इसलिए... आप बहुत खुश होंगे पर...

रंगा - केके साहब... कल से आप राजा साहब के... जमाई बनने जा रहे हैं... फिर घबराहट किस बात की...

केके - (दोनों की तरफ देखता है फिर) रंगा... एक बात बता... तेरी... सच में... किसको देख कर फटी थी...

रंगा - आपसे मतलब...

केके - डर लग रहा है ना...

रंगा - ठीक है... विश्वा... पर इस शादी से... उसका क्या वास्ता...

केके - तुझे क्या लगता है... एक अधेड़... हम उम्र से... राजा साहब... क्यूँ अपनी बेटी को व्याहना चाहते हैं...

रंगा - मेरे को क्या पता...

रॉय - एक मिनट.. एक मिनट... कहीं आप यह तो नहीं कहना चाहते... के विश्वा और राजकुमारी...

केके - हाँ...

रंगा - यह कैसे हो सकता है... मैं नहीं मानता... विश्वा... सात साल तक... जैल में रहा... बमुश्किल सात आठ महीने हुए हैं... बाहर आए... उसकी और राजकुमारी...

केके - पर यह सच है... खुद राजकुमारी ने मुझे कहा था... और यह... जवानी वाला इश्क नहीं है... बचपन वाला लफड़ा है...

रंगा और रॉय - क्या...

केके - हाँ... इस.. (सत्तू की ओर दिखा कर) पूछो इससे...

सत्तू - (घबरा कर) मैं... मैं... कुछ नहीं जानता...

केके - क्या नहीं जानता बे... तूने ही तो कहा था... विश्व... राजकुमारी को.. बचपन से पढ़ाता था...

सत्तू - हाँ... यह तो हर कोई जानता है... पर आप जो कह रहे हैं... यह कोई नहीं जानता...

रॉय - चलो ठीक है... एक पल के लिए हम मान लेते हैं... के राजा साहब... अपनी खुन्नस निकालने के लिए... अपनी बेटी की शादी.. आपसे करा रहे हैं... तो आपको इससे प्रॉब्लम क्या है...

केके - रॉय... इन कुछ महीनों में... हमने जो भी कुछ हारा है... जरा याद करो... उसके पीछे कहीं ना कहीं... विश्वा है... या तो सीधे तौर पर... या फिर... और रंगा... याद है... जब विश्वा तेरे सामने... अचानक आ गया... तेरी क्या हालत हो गई थी...

इतना कह कर केके चुप हो जाता है l रॉय और रंगा भी कुछ देर के लिए कोई बात नहीं कहते l फिर कुछ देर बाद रंगा कहता है l

रंगा - चलो मान लेता हूँ... पर है तो यह राजा साहब का इलाक़ा... और उन्होंने अपनी लश्कर में जबरदस्त बढ़ोतरी की है... मुझे नहीं लगता... विश्वा कुछ करने के लायक होगा...

रॉय - हाँ... मेरा भी यही खयाल है...

केके - मैं भी यही सोच रहा था... पर... जिस दिन विक्रम अपनी बहन से मिलने महल आया था... उस दिन... मैंने राजकुमारी के आँखों में... बातों में... एक जबरदस्त... आत्मविश्वास देखा था... उन्होंने खुल्लमखुल्ला राजा साहब के सामने ऐलान कर दिया... यह शादी होगी ही नहीं...

केके - मतलब वह... विश्वा के साथ... भागने की चक्कर में है...

सत्तू - ना मुमकिन... आज सुबह तक तो राजकुमारी जी महल में ही हैं... और कल से उनके शृंगार के लिए... कुछ औरतों को यशपुर से बुलाया गया है.... और लगातार राजा साहब के निगरानी में हैं...

रॉय - देखा... आप खामख्वाह परेशान हो... चलिए मैं मान लिया... विश्वा से खुन्नस उतारने के लिए... राजा साहब आपसे... राजकुमारी को व्याह दे रहे हैं... तो यह उनकी नाक और मूँछ की आन की बात हो गई ना... अपनी नाक और मूँछ की आँच बचाने के लिए... कुछ भी कर सकते हैं... अगर यह विश्वा से बदला लेने की बात है... तो इस मिशन में... हमें शिद्दत के साथ... शामिल होनी चाहिए... हम सबका बदला एक साथ पुरा होगा... कोई नहीं केके साहब... राजा साहब ने वह एग्रीमेंट यूँ ही नहीं कि है... मत भूलिए... इस शादी के बाद... यह रंग महल आपका हो जाएगा... राजा साहब के सारे फैक्ट्रियों और प्रॉपर्टी में... बराबर का हिस्सा हो जाएगा...

रंगा - हाँ केके साहब... आप बस तैयार हो जाइए... सारे गाँव वाले होंगे सामने शादी होने वाली है... विश्वा को भीतर से तोड़ने के लिए... अबकी बार... मैं खुद को बाजी लगा दूँगा... यह मेरा वादा है...

रॉय और रंगा के ढांढस बाँध ने के बाद केके को थोड़ी हिम्मत मिलती है l अब वह तैयार होने के लिए बाथरूम के अंदर जाता है l
 
भाई मेरी कोशिश भी यही है कहानी को जितनी जल्दी हो सके उतनी ही जल्दी समाप्त कर दूँ पर भाग्य मेरा साथ नहीं दे रहा है

बेटी को विशाखापट्टनम के सेवन हिल्स हॉस्पिटल में हेमाटोलोजीस्ट को दिखाया है

शरीर में खुन की कमी पाई गई है अब वह बहुत हद तक ठीक है इसलिए समय निकाल कर अगली कड़ी लिख दिया है l

रात दस बजे तक पोस्ट कर दूँगा
 
हाँ लगभग केके का जीवन लीला समाप्त होने वाला है

विश्वा को एक लिंक मिलने वाला है डैनी के जरिए

उसके बाद बल्लभ को ट्रैप में विश्वा लेगा

जाहिर है उसके बाद खून खराबा शुरु हो जाएगा

धन्यवाद

टेंश काल में कुछ हल्की फुल्की मोमेंट

सही कहा आपने मनी ट्रेल साबित करना मुमकिन नहीं होगा क्यूँकी यह प्रवर्तन निदेशालय का काम है l पर कोई कमजोर कड़ी हाथ लगे तो उसे अदालत के सामने प्रस्तुत किया जा सकता है l

भाई विशाखापट्टनम के सेवन हिल्स हस्पताल को रेफर किया गया l वहाँ हेमाटोलोजीस्ट ने चेक करा l खून में B12 और फोलीक एसिड की कमी पाई गई है l उपचार चल रही है l अब खतरे से बाहर है l आप की शुभकामनाओं के लिए तह दिल से आभार
 
हा हा हा

शुक्रिया मेरे भाई आपका बहुत बहुत शुक्रिया

हाँ क्यूँकी वैदेही को परिणाम पता है

हाँ वह बेफिक्र हो गया

पर आगे आपको मालुम पड़ेगा

शादी में क्या कांड किया है विक्रम ने

हाँ सही रास्ता दिखाया है

अब विश्व पूरी तरह से बल्लभ पर फोकस करेगा

केके की बहुत दुर्गति होने वाली है

उसका अंजाम निश्चित होने वाली है

शुक्रिया और आभार
 
जाहिर सी बात है

भैरव सिंह जितना बड़ा कमीना है उतना ही काईंया भी है l सबसे बड़ी बात वह एक सैडिस्ट भी है

हाँ केके की जीवन लीला बहुत जल्द समाप्त होने वाला है l

याद किजिए डैनी अपना अतीत कलकत्ता में भैरव सिंह से कह चुका था l उसी अतीत को संक्षेप में विश्व को कह दिया

बल्लभ एक एडवोकेट है

जब तक उसकी कोई कमजोरी विश्व के हाथ नहीं लगेगा तब तक बल्लभ को विश्व अपने पाले में नहीं ला सकता

शुक्रिया मेरे दोस्त मेरे भाई मेरे सखा

कुछ दिनों से थोड़ा परेशान चल रहा था l अब ठीक है l तो पुनः वापस आ गया हूँ
 
👉एक सौ उनसठवाँ अपडेट

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रात के करीब साढ़े दस या ग्यारह बज रहे होंगे l एक गाड़ी क्षेत्रपाल महल के सामने आकर रुकती है l गाड़ी से रंगा और रॉय उतरते हैं, भीमा उन्हें अपने साथ सीढ़ियों से ले जाता है l दोनों भीमा के साथ होते हुए महल के भीतर एक खास कमरे में पहुँचते हैं l उस कमरे में एक दीवार पर काँच के अलमारी में एक तलवार रखा हुआ था जिसकी मूठ नहीं थी l भैरव सिंह उस तलवार को देखे जा रहा था l उस कमरे में भैरव सिंह के साथ पहले से ही बल्लभ प्रधान मौजूद था l इन दोनों के आते ही भैरव सिंह मुड़ता है, भीमा उसके सामने झुकता है l

भैरव सिंह - अब तुम जाओ... हमारी मीटिंग खत्म होते ही तुम्हें बुला लेंगे...

भीमा - जी हुकुम... (भीमा उल्टे पाँव उस कमरे से बाहर चला जाता है)

भैरव सिंह - (भीमा के चले जाते ही) आओ... हम सब बैठकर बातेँ करते हैं... (कह कर एक गोल टेबल के पास जाता है जहाँ चार कुर्सियाँ पड़ी थी) (टेबल के पास पहुँच कर देखता है तीनों वैसे ही अपनी जगह पर खड़े हैं) क्या हुआ... आओ...

रॉय - राजा साहब... हम कैसे आपके बराबर बैठ सकते हैं...

भैरव सिंह - यह ना तो कोई दरवार है... ना ही कोई मैख़ाना... ना ही भोजन हेतु मेज पर बैठने को कह रहे हैं... फ़िलहाल आप हमारे पंचरत्नों में से हैं... यह हमारा रणनीतिक कक्ष है... यहाँ आप लोग हमारे बराबर बैठकर रणनीति तय कर सकते हैं... साझा कर सकते हैं... (बल्लभ से) प्रधान... तुम तो वाकिफ हो...

बल्लभ अपना सिर हिला कर टेबल के पास आता है और भैरव सिंह के पास खड़ा हो जाता है l जिसे देख कर रंगा और रॉय भी आकर टेबल के पास खड़े होते हैं l तीनों देखते हैं टेबल पर क्षेत्रपाल महल का एक नक्शा रखा हुआ था l

भैरव सिंह - सीट डाउन जेंटलमेन... (पहले प्रधान बैठ जाता है उसके बाद रंगा और रॉय बैठ जाते हैं) (एक गहरी साँस लेकर छोड़ने के बाद रॉय से) तो रॉय... रंग महल में सब ठीक है... केके... कैसा है...

रॉय - जी वह बहुत अच्छे हैं...

भैरव सिंह - सच बोलो रॉय... सच बोलो... क्यूँकी एक झूठ हमें नहीं... बल्कि हम सब को हरा सकता है... केके कैसा है...

रॉय - सॉरी राजा साहब... केके थोड़ा डरा हुआ है...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... वज़ह...

रॉय - (कुछ देर के लिए पॉज लेता है, फिर) वह... राजा साहब... यह आपके परिवार का निजी मामला है... इसलिए...

भैरव सिंह अपनी जगह से उठता है l उसके उठते ही सारे उठ खड़े होते हैं l भैरव सिंह कमरे के एक किताबों की अलमारी के पास जाता है और अलमारी के भीतर एक कि पैड पर कुछ नंबर पंच करता है l अलमारी एक आवाज के साथ सरक जाती है l ज्यूं ज्यूं अलमारी सरकती जाती है पीछे नोटों के गड्डियों का पहाड़ नजर आने लगती है l जिसे देख कर रंगा और रॉय की आँखे और मुहँ खुल जाती हैं l भैरव सिंह मुड़ता है और उनसे कहता है

भैरव सिंह - यह हमारी दौलत के सागर की... एक छोटी सी गागर है... यह सब तुम्हारा हो सकता है... बस यह समझो... इस वक़्त हम लोग एक टीम हैं... और हम तुम लोगों के कॅप्टन... अगर हमारी जीत हुई... तो तुम लोग सोच भी नहीं सकते.. कितने आमिर हो जाओगे... (कह कर की पैड पर कुछ नंबर पंच करता है, जिससे वह किताब की अलमारी फिर से सरकते हुए वापस आ जाती है और नोटों के वह दृश्य गायब हो जाती है) तो अब बोलो... केके की कैसी हालत है... (कह कर अपनी जगह पर बैठ जाता है, वे तीनों भी बैठ जाते हैं)

रंगा - राजा साहब... जैसा कि रॉय बाबु ने कहा... यह आपके परिवार की अंदरुनी बात है.... पर सच यह है कि... केके साहब बहुत डरे हुए हैं...

भैरव सिंह - समझ सकते हैं... उसने वज़ह तो बताई होगी...

रॉय - जी... गुस्ताखी माफ हो तो...

भैरव सिंह - हाँ बताओ... उसने क्या बताया...

रॉय - वह.. वह... (आगे बोल नहीं पाता)

रंगा - कुछ गलत बोल जाएं तो माफ़ कर दीजिएगा राजा साहब... केके बाबु का कहना था कि... विश्वा और राजकुमारी जी का... (चुप हो जाता है)

भैरव सिंह - क्या सिर्फ यही वज़ह है... या केके ने कुछ और भी कहा है...

रंगा - राजा साहब... खुद राजकुमारी जी ने केके साहब से कहा था... लोग शिशुपाल की नहीं... अब की बार केके बाबु का मिशाल देंगे...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म...

रॉय - गुस्ताखी माफ राजा साहब... विश्वा ने जिस भी काम को उठाया है... उसे पूरा किया है... और अब... यह तो उसका निजी मामला है... तो.... (चुप हो जाता है)

भैरव सिंह - तुम दोनों को इसीलिए तो इतनी रात को बुलाया है... शिशुपाल प्रकरण में... जानते हो... क्या कांड हुआ था... (रॉय और रंगा दोनों चुप रहते हैं)

बल्लभ - रुक्मिणी हरण हुआ था...

रॉय - और केके बाबु कह रहे थे... राजकुमारी जी... आपके सामने भी... यह जाहिर किया के... उनकी शादी केके बाबु से नहीं होने वाली....

अब कमरे में सन्नाटा पसर जाता है l भैरव सिंह अपना सिर हिलाता है और उठ खड़ा होता है पर उन तीनों को बैठे रहने के लिए इशारा करता है l भैरव सिंह चलते हुए उस मूठ विहीन तलवार के सामने खड़ा होता है और तलवार की ओर देखने लगता है l धीरे धीरे उसका जबड़ा सख्त हो जाता है l फिर से इन तीनों की तरफ़ मुड़ता है l

भैरव सिंह - जेंटलमेन... हाँ यह सच है... राजकुमारी का दिल एक नमक हराम कुत्ते पर आ गया है... अब चूँकि वह अपनी ओहदे से नीचे आ गईं हैं... इसलिए हमने उनकी औकात को ध्यान में रखकर शादी तय कर दी... हमने कभी नहीं सोचा था... की चंद महीनों में... राजकुमारी इस हद तक गिर सकती हैं... खैर जो हो गया... सो हो गया... हमने राजकुमारी के जरिए... यह संदेश दे रहे हैं... जो भी हमसे जुड़े हुए हैं... उनको... के हमसे गुस्ताखी.... चाहे वह हमारा खून ही क्यूँ ना हो... हम हरगिज नहीं बक्सेंगे... हम सब जो इस कमरे में हैं... विश्वा से या तो प्रत्यक्ष... या फिर अप्रत्यक्ष रूप से... मात खाए हुए हैं... केके भी... इसलिए यह शादी होना... अब जरूरी है... (भैरव सिंह अब टेबल के पास आता है और अपनी जगह पर बैठ जाता है) कोई शक नहीं... विश्वा यह शादी रोकेगा... हम से यह गलती हुई है... की हमने कभी विश्वा के बारे में सोचा नहीं था... पर अब हम सोचने के लिए मजबूर हैं... यूँ समझ लो.. यह शादी एक आजमाइश है... विश्वा को परखने के लिए... समझने के लिए... अगर हम कामयाब रहे... तो हम आगे की खेल में... विश्वा को मात दे सकेंगे...

रंगा - और अगर... हार गए... तो...

भैरव सिंह - तो... आने वाले दिनों में... इस कमरे में... तुम लोगों की जगह... कोई और होंगे...

यह बात सुनते ही रंगा और रॉय एक दूसरे की ओर देखने लगते हैं l फिर दोनों भैरव सिंह की ओर देखते हैं l

रंगा - हम समझ गए... राजा साहब... कल शादी की कामयाबी के लिए... हम अपनी जान लड़ा देंगे...

भैरव सिंह - अगर हार भी जाओ तो मायूस मत होना... क्यूँकी यह क्षेत्रपाल की नाक की लड़ाई है... हाँ बस इतना होगा... के लड़ाई खत्म होने तक... तुम हमारे दोयम दर्जे के सैनिक बन कर रह जाओगे...

रॉय - मतलब... आप हमारी जगह... किसी और संस्थान से... मदत ले सकते हैं...

भैरव सिंह - तुम अब अपनी सीमा लांघ रहे हो...

रॉय - माफी चाहता हूँ.... राजा साहब... माफी चाहता हूँ... मेरा कहने का मतलब था... जैसे कि प्रधान बाबु ने कहा था... मैंने सभी जिलों से... आपके ही लोगों को भर्ती कराया है... आज हम छह सौ की आर्मी हैं... वह भी हथियारों से लैस...

भैरव सिंह - तो...

रॉय - (चुप रहता है)

रंगा - मैं कुछ बोलूँ... (भैरव सिंह उसके तरफ देखता है) राजा साहब... अगर आप कल की शादी में... बड़े मिनिस्टर और ऑफिसरों को बुलाते... तो वे अपनी सिक्योरिटी के साथ आते... इतनी सिक्युरिटी देख कर... विश्वा की फट जाती... और वह कुछ नहीं कर पाता...

बल्लभ - उनके साथ आए सिक्योरिटी उनके लिए होती... ना कि महल के लिए... और रंगा तुम अपनी औकात से ऊपर उठकर बात करो... मत भूलो... कुछ ही महीने पहले... एक वक़्त ऐसा भी था... सारे नेता और बड़े लोग... ESS की सर्विस लिया करते थे... अगर उन बड़े लोगों के होते... शादी ना हो पाती तो... (रंगा अपना मुहँ नीचे कर लेता है)

भैरव सिंह - रॉय... हमने तुम्हें अपनी चिंता बताई है... तुमने सिक्योरिटी एजंसी चलाई है... यूँ समझ लो... कल की शादी... तुम्हारे संस्था के लिए एक चैलेंज है... इसलिए... तुम अपना दिमाग लगाओ... और कल की शादी को मुकम्मल करो...

रॉय - जी राजा साहब...

भैरव सिंह - प्रधान... बाकी तुम समझाओ... फिर देखते हैं... इसकी सोच और काबिलियत...

बल्लभ - रॉय... जैसे कि तुम देख रहे हो... यह महल की नक्शा है... मंडप यहाँ बनाया गया है... थोड़ी ऊंची जगह पर... क्यूँकी नीचे गाँव वाले बैठ कर देखेंगे... अब तक... हम कामयाब रहे हैं... क्यूँकी विश्वा ने... कोई गुस्ताखी अब तक नहीं की है... पर हो सकता है... कल की आपाधापी के चलते... विश्वा को मौका मिल जाए... कुछ करने के लिए...

रॉय नक्शा को गौर से देखता है l फिर सोचने लगता है l कुछ तय करने के बाद रॉय अपना प्लान बताता है l

रॉय - राजा साहब... जैसा कि राजकुमारी जी का कहना है कि... विश्वा... केके को शिशुपाल बनाने वाला है... तो राजकुमारी जी की सुरक्षा और निगरानी... हमारी प्राथमिकता होगी... पर ऐसा भी हो सकता है कि... विश्वा बारात को रोकने की कोशिश करे...

बल्लभ - नहीं... नहीं करेगा...

रॉय - क्या मतलब...

बल्लभ - हमने पहले से ही... केके के लिए... बारात की एस्कॉट के लिए... पुलिस की व्यवस्था कर दी है... अगर कुछ गड़बड़ हुई... तो सारी जिम्मेदारी पुलिस के सिर होगी... और जब तक... शादी खत्म नहीं हो जाती... मंडप को पुलिस घेरे रहेगी... तुम सिर्फ यह बताओ... विश्वा को कैसे रोकोगे...

रॉय - तब तो कल शादी होकर ही रहेगी... हमारे सारे बंदों की नजर विश्वा पर टिकी होगी... पर क्या रस्म अदायगी के लिए... राजकुमारी जी की तरफ़ से... कोई होंगे... शायद राजकुमार और... रानी साहिबा... राजकुमारी जी के साथ नहीं होंगे...

बल्लभ - उसकी व्यवस्था हो चुकी है... उनकी जगह... कोई और होंगे... पर राजकुमारी जी के करीबी होंगे... जो कल सुबह तक... राजगड़ पहुँच जाएंगे...

रॉय - तो फिर प्लान सुनिए...

कह कर रॉय अपना प्लान बताने लगता है l सभी ध्यान से रॉय को सुनते हैं l प्लान समझाने के बाद बल्लभ उन्हें विदा करता है l उसके बाद वह भैरव सिंह के पास लौट कर आता है l

भैरव सिंह - तुम्हें क्या लगता है प्रधान...

बल्लभ - मैं... कुछ नहीं कह सकता... ( पॉज) एक बात पूछूं...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म...

बल्लभ - आप चाहते क्या हैं... आपने राजकुमारी जी को दाव पर लगा दिया है...

भैरव सिंह - बेटी हमारी है... तकलीफ तुम्हें हो रही है...

बल्लभ - अनिकेत ने गलती करी थी... आपने उसे सजा दी... पर यहाँ....

भैरव सिंह - यहाँ राजकुमारी ने अपराध किया है... ना सिर्फ हमारी आँखों में आँखे डाल कर बात की है... बल्कि हमें चैलेंज दी है... इस घर से जब जाएंगी... गुरुर के साथ... हमारी आँखों में आँखे डालते हुए जायेंगी...

बल्लभ - क्या वाकई आप इस शादी के लिए सीरियस हैं... (भैरव सिंह बल्लभ की ओर देखता है) गुस्ताखी माफ राजा साहब... जैसे कि रंगा कह रहा था... (एक पॉज) आप राजा साहब हैं... बड़े घराने... पॉलिटिशियन आपको बुला कर अपना कद बढ़ाते हैं... वहीँ आपके घर में शादी है... किसी को भी... आपने बुलाया नहीं है...

भैरव सिंह - हम अकेले में बेइज्जत होना पसंद करेंगे... पर सबके सामने नहीं... शादी की कामयाबी पर... हम अभी भी संदेह में हैं...

बल्लभ - क्या...

भैरव सिंह - हाँ... प्रधान... हमने एक दाव लगाया था... पर विश्वा उसमें फंसा नहीं... पर उस दाव से हम पीछे हट भी नहीं सकते... हम केस की सुनवाई से पहले विश्वा को ज़ख़्म देना चाहते हैं... हम उसे हारते हुए देखना चाहते हैं... अगर शादी हो गई... तो उसकी हार होगी...

बल्लभ - अगर नहीं हुई... तो यह आपकी हार होगी...

भैरव सिंह - नहीं यह हार नहीं होगी... पर हाँ जीत भी नहीं होगी...

बल्लभ - मैं समझा नहीं...

भैरव सिंह - जब तुमने कहा था कि... अपनी औलाद की ग़म भुला कर... केके नई शादी रचाने जा रहा है... हमने रूप नंदिनी को उसके आगे कर दिया... बदले में... हमारी बूते जो भी दौलत कमाया था.. उसे अदालत में ज़मा करवा लिया... वह हमारी दौलत थी... अब अगर शादी हो जाती है... तो राजकुमारी की किस्मत... नहीं होती है... तो केके की किस्मत...

बल्लभ - मतलब आप तय मान कर चल रहे हैं... यह शादी नहीं होगी...

भैरव सिंह - हम कोई जिल्लत अपने सिर नहीं लेना चाहते... विश्वा की सोच और करनी को आखिरी बार परखने के लिए... अपनी तरफ से सबसे बड़ा दाव आजमा रहे हैं... अगर विश्वा यह शादी रुकवाने में कामयाब हो जाता है... तो समझ लो जंग का मैदान... और उसका दायरा ना सिर्फ अलग हो जाएगा... बल्कि बहुत बढ़ जाएगा...

बल्लभ - इतने आदमियों को... राजगड़ में लाने के बाद भी... क्या आप इसी लिए... उन मशीनरीस से कॉन्टैक्ट किया है...

भैरव सिंह - हाँ... क्यूँकी तादात... ताकत की भरपाई करता है... तब... जब हर दरवाजा बंद होगा... हमें अलग सा खेल खेलना होगा... अलग सा दाव लगाना होगा... (बल्लभ थोड़ा कन्फ्यूज सा लगता है) प्रधान...

बल्लभ - जी... जी राजा साहब...

भैरव सिंह - तुम फ़िलहाल इस वक़्त... हमारे हमदर्द.. हमारे हम राज हो... इसलिए एक बात याद रखो... हम सिर्फ अपना ही सोचते हैं... खुद से बड़ा तो हम अपने बाप को भी नहीं मानते हैं... अपने लिए... हम किसी भी हद तक जा जा सकते हैं...

बल्लभ - जी... जी राजा साहब...

भैरव सिंह - वह क्या है कि... अब हम अपनी मुहँ से क्या कहे... हमने हम से बड़ा कमीना देखा नहीं... यह जान कर यह मत सोच लेना... के हमसे भी कोई कमीना पंती कर सकता है... क्या समझे...

बल्लभ - जी राजा साहब...

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अगले दिन विश्व अपनी बिस्तर पर आँखे मूँदे लेटा हुआ है l फोन की घंटी बजती है विश्व आँखे मूँदे हुए ही मुस्कराते हुए फोन को कान से लगाता है l

विश्व - हैलो...

रुप - मुम्म्म्म्म... आ...

विश्व - वाव... आज इतनी मीठी सुबह...

रुप - घबराओ मत... बहुत जल्द रोज... तुम्हें ऐसी ही... मीठी मीठी गुड मॉर्निंग मिलेगी...

विश्व - काश... जल्द ही वह दिन आये...

रुप - आयेगा आयेगा... बस सब्र करो... क्यूँकी सब्र का फल मीठा ही होता है...

विश्व - ह्म्म्म्म... हूँ हू हू... ही ही ही.. (हँसने लगता है)

रुप - ऐ... इसमें हँसने वाली क्या बात है...

विश्व - कुछ नहीं... बस... आप ने तो नहा लिया होगा... सब्र का साफ सूतरी फल के बारे में सोच रहा था...

रुप - ओ हो... बेवकूफ कहीं के... यह एक कहावत है...

विश्व - अच्छा... बड़ी प्यारी कहावत है...

रुप - क्या... (चौंकती है) छी... कितना गंदे सोचते हो...

विश्व - गंदा कहाँ... मैं तो साफ सूतरी फल के बारे में सोच रहा हूँ...

रुप - यु... मेरे सामने जब होते हो... फटती है तुम्हारी...

विश्व - आप भी कमाल करती हो... जब हाथों को शराफत में बाँध देता हूँ... तो डरपोक कहती हो...

रुप - हाँ तो... सामने जब होती हूँ... सब मैं ही तो करती हूँ...

विश्व - ठीक है... अगली बार... मैं कुछ करता हूँ...

रुप - ना... अगली बार.. मैं कोई मौका नहीं देने वाली...

विश्व - फिर तो सब्र का फल खट्टा हो जाएगा...

रुप - वह मैं नहीं जानती... मीठे फल के लिए... तुम्हें कुछ जतन करने होंगे...

विश्व - अजी हुकुम कीजिए... आपका गुलाम... आपके कदमों में बिछ जाएगा...

रुप - ठीक है... तो मुझसे व्याह कर लो...

विश्व - क्या...

रुप - क्यूँ... तुमने क्या सोचा... बिन जतन के फल चख लोगे...

विश्व - शादी तो करनी है... पर...

रुप - ठीक है... तुम्हारा यह पर... तुम अपने पास रखो... जानते हो ना... महुरत शाम को है...

विश्व - अच्छी तरह से जानता हूँ... भई हम खास मेहमान हैं आज के शाम की...

रुप - तुम्हारी नकचढ़ी को आज तुम्हारा इन्तेज़ार रहेगा...

रुप फोन काट देती है और शर्मा कर अपना चेहरा घुटनों के बीच छुपा लेती है l फिर उठती है और दीवार पर लगी आईने के सामने खड़ी होती है l अपनी ही अक्स को देख कर फिर से शर्माने लगती है l और अपने आपको संभालते हुए अपनी ही अक्स से कहती है

रुप - नंदिनी... कितनी बेशरम हो गई है... (कह कर अपना चेहरा अपनी हथेलियों में छुपा लेती है)

तभी दरवाजे पर दस्तक होती है l रुप को हैरानी होती है l इतनी सुबह कौन हो सकता है l रुप भागते हुए मोबाइल के पास जाती है और उसे म्यूट कर अपने कपड़ों में छुपा देती है l फिर दरवाजे के पास जाती है और दरवाजा खोलती है l सामने सेबती खड़ी थी पर वह अकेली नहीं थी उसके साथ छटी गैंग को देख कर रुप बहुत हैरान हो जाती है l

××××××××

बाथरूम से केके तैयार हो कर जब बाहर आता है, तो देखता है नाई और धोबी दोनों वैसे ही दरवाजे के बाहर खड़े हैं l सत्तू उनसे बातेँ कर रहा था l

केके - क्या हुआ सत्तू... यह लोग यहाँ खड़े क्यूँ हैं...

सत्तू - जमाई साहब... यह लोग आपसे बक्सिस की उम्मीद लगाए हुए हैं... आख़िर इन दोनों ने आपकी सेवा की है... हल्दी वगैरह लगाए हैं...

केके - क्या... हल्दी जनाना लगाती हैं...

सत्तू - पर आपके घर से कोई जनाना आई भी तो नहीं हैं...

केके - ठीक है... (अपना पर्स निकाल कर पाँच सौ के दो नोट उन्हें थमा देता है) इन्हें यहाँ से जाने के लिए कहो...

वह नाई और धोबी बेमन से पैसे लेते हैं l उन्हें सत्तू बाहर तक छोड़ आता है l सत्तू देखता है केके के चेहरे पर शादी की कोई खुशी झलक नहीं रही है l केके अंदर चला जाता है, उसके पीछे पीछे सत्तू भी कमरे के अंदर आता है l केके सेल्फ से एक व्हिस्की का बोतल निकाल कर ग्लास में पेग बना कर पीने लगता है l

सत्तू - एक बात पूछूं जमाई बाबु...

केके - पूछो...

सत्तू - क्या आप इस शादी से खुश नहीं हैं...

केके - खुशी... मुझे यकीन ही नहीं हुआ... जब राजा साहब ने... सामने से मुझे दामाद बनने की ऑफर की... ना सिर्फ ऑफर... बल्कि बाकायदा स्टैम्प पेपर में लिख कर दी... के शादी के तुरंत बाद... रंग महल मेरे नाम ही जाएगा... और केस के निपटारे के बाद... सारी प्रॉपर्टी में आधा हिस्सा हो जाएगा... पर मैं इस खुशी के लिए शादी को तैयार नहीं हुआ था... बल्कि सात सालों से... राजकुमार विक्रम जो जलालात मेरे साथ की... उसका बदला... मेरी किस्मत मुझे दे रहा था... इस खुशी के साथ मैं तैयार हुआ था... (पेग खाली करता है) ऐसा कोई दिन नहीं... जब मैंने उसके पैरों पर गिर कर गिड़गिड़ाया नहीं था... मुझे लगा... कुदरत ने मौका बनाया है... (एक पॉज लेकर और एक पेग बनाता है) वह कहते हैं ना... एक रस्म होता है... घोड़ी से उतरने के बाद... साला जीजा का पैर धोता है.. फिर जुता पहनाता है... मैं बस उस एक पल की खुशी के लिए... शादी को तैयार हो गया... पर साला विक्रम... मुझे मारने की धमकी दे गया... वह भी राजा साहब के सामने...

सत्तू - आपको कुछ नहीं होगा... भले ही राजकुमार राजा साहब के खिलाफ हैं... पर यह मत भूलिए... आप इस वक़्त राजा साहब के हिफाजत में हैं... और जो आप चाहते हैं... वह आज ना भी हो... पर शायद कल को मुमकिन हो...

केके - (हँसता है) हे हे हे... तुम... वाक़ई समझदार हो... हाँ शादी होने के बाद... यह मुमकिन होगा... जरुर होगा... (पेग खाली कर देता है)

सत्तू - आपको तो चिंता इस बात की होनी चाहिए... आप राजकुमारी जी को कैसे मनाएंगे...

केके - हाँ... यह बात तो है... कमीनी के तेवर बड़े हैं... बाप के सामने... बड़े यकीन के साथ... इत्मीनान के साथ कह रही थी... यह शादी नहीं होगी...

सत्तू - क्या आपको भी लगता है...

केके - ना... नहीं... बिल्कुल नहीं... पर जब... फ्रेम में विश्वा... यह नाम गूँजता है... तब मेरा यकीन डोल जाता है...

सत्तू - (चुप रहता है)

केके - तुम नहीं जानते सत्तू... मेरा सबकुछ ठीक चल रहा था... पर जैसे ही... विश्वा नाम का राहु... मेरी कुंडली में आया... तब से मेरा धंधा... बैठ गया... विक्रम ने ऐन मैके पर साथ छोड़ दिया... इसलिए... मैंने उस हरामी कुत्ते ओंकार चेट्टी से हाथ मिला बैठा... बदले में... बड़ी कीमत चुकाई... (केके फिरसे अपना पेग बनाने लगता है)

सत्तू - आज आपकी शादी है... इतना भी मत पीजीये... के मंडप पर संभल भी ना पाएं...

केके - शादी शाम को है... तब तक नशा उतर जाएगा...

सत्तू - हाँ यह बात आपने सही कहा... शाम तक... सारा नशा उतर जाएगा...

केके - सारा नशा... क्या मतलब है तुम्हारा...

सत्तू - आप बहक रहे हैं... जुबान साथ नहीं दे रहा है... आप विश्वा के बारे में कह रहे थे...

केके - अरे हाँ... पता नहीं... उस सजायाफ्ता के साथ... राजकुमारी... कैसे... यह बड़े घर के जो बेटियाँ होती हैं ना... उन पर नजर रखनी चाहिए... वह कहते हैं ना... नजर हटी... खैरात बटी...

सत्तू - माफ कीजिए जमाई बाबु... अगर नजर रखे होते... तो आज आप यहाँ नहीं होते... कोई राजकुमार होता...

केके - ही ही ही... बड़ा हरामी निकला... साला.. सच भी बोला... वह भी कितना कड़वा... खैर मुझे उसकी टेंशन नहीं है... मुझे अभी भी शक है... साला यह शादी होगी भी या नहीं...

सत्तू - आप भूल रहे हैं जमाई बाबु... यह शादी अब राजा साहब की नाक का सवाल है...

केके - अबे ख़ाक नाक की सवाल है... नाक की सवाल होती... तो पुरे स्टेट के... बड़े बड़े नामचीन हस्तियां यहाँ होती... मैंने जब इस बारे में पूछा था.. तो राजा साहब ने कहा था... के पहले शादी हो जाए... रिसेप्शन पर बुलाते हैं... जानते हो... राजा साहब ने ऐसा क्यूँ कहा... वह इसलिए सत्तू... राजा साहब को भी यकीन नहीं है... के यह शादी होगी...

सत्तू - (चुप रहता है)

केके - चुप क्यूँ हो गया बे... अब नहीं पूछेगा... हा हा... विश्वा पर... राजकुमारी की ही नहीं... विक्रम को भी भरोसा है... विश्वा... जिसने प्रोफेशन के चलते... हम सबको इतना डैमेज किया है... वह अपनी पर्सनल के लिए... क्या कुछ नहीं करेगा...

सत्तू - अगर आप इतने ही आश्वस्त हैं... तो इस शादी से भाग कर... खुद को जलील होने से बचा क्यूँ नहीं लेते...

केके - वैसे आइडिया बहुत अच्छा है... पर क्या है कि... मेरे अंदर का जानवर... मुझे उकसा रहा है... अगर यह शादी हो गई... तो राजकुमारी जैसी खूबसूरत लड़की... दौलत... और सबसे अहम... विश्वा और विक्रम से... अपना खीज निकाल सकता हूँ... और...

सत्तू - और...

केके - ही ही ही ही... कली चाहे खिली हो... या कमसिन हो... मसलने में... और रौंदने में बड़ा मजा आता है... ही ही ही...

तभी दरवाजे पर दस्तक होती है l दोनों उस तरफ मुड़ते हैं l एक नौकर झुके हुए सिर के साथ अंदर आता है l

केके - क्या है...

नौकर - मालिक... दरोगा जी आए हैं...

केके - (भौंहे सिकुड़ कर) दरोगा... (सत्तू से) तुम जाकर देखो... क्या माजरा है... मैं थोड़ा खुदको तब तक दुरुस्त कर लेता हूँ....

सत्तू बाहर चला जाता है l केके व्हिस्की का बोतल और ग्लास अंदर रख देता है और अपने बदन पर फ्रैगनेंस स्प्रे कर देता है l थोड़ी देर के बाद सत्तू इंस्पेक्टर दास के साथ अंदर आता है l

केके - कहिये... इंस्पेक्टर साहब... कहिये कैसे आना हुआ...

दास - हमें... एसपी ऑफिस से ऑर्डर मिला है... आज आपके बारात में... हम पुलिस वाले शामिल होंगे... और जब तक शादी नहीं हो जाती... तब तक आपके साथ रहेंगे... (सत्तू से) वैसे... कौन कौन लोग बारात में शामिल हो रहे हैं...

सत्तू - जी हम.. भीमा उस्ताद के कारिंदे...

दास - और बाकी... जो गाँव से बाहर आए थे...

सत्तू - जो वह सब महल की पहरेदारी के लिए गए हुए हैं...

दास - हूँ.. ह्म्म्म्म... (केके से) तो केके साहब... अब आपका क्या खयाल है...

केके - मुस्कराते हुए... यह शादी अब तो होकर ही रहेगी...

×××××××××××××××××

रुप की कमरे में रुप और उसकी छटी गैंग थीं l रुप ने सेबती और दूसरे नौकरानियों को विदा कर सबके लिये नाश्ता लाने के लिए बोल दिया था l रुप के सारे दोस्त पहले से ही महल देख कर हैरान व चकित थीं l अब रुप की कमरे को घूम घूम कर देख रहीं थीं l

दीप्ति - (रुप के पास आकर बैठती है) वाव नंदिनी... महल तो महल... तुम्हारा कमरा भी क्या खूब है...

बनानी - हाँ यार... हमने कभी सोचा भी नहीं था... कोई राज महल को... सच्ची में... इतनी करीब से देखेंगे... और.. (रुप की बेड पर उछल कर बैठते हुए) किसी राजकुमारी की कमरे में... ऐसे बैठेंगे...

सब आकर रुप को घेर कर बैठ जाते हैं l रुप अब तक इन्हें देख कर शॉक में थी l सबको अपने पास देख कर पूछती है l

रुप - पहले यह बताओ... तुम लोग यहाँ कैसे...

तब्बसुम - यह तुम शॉक के वज़ह से पूछ रही हो... या हमें इस मौके पर नहीं देखना चाहती थी... इसलिये पूछ रहे हो...

रुप - क्या मतलब...

भास्वती - हाँ हाँ... दोस्तों में खिटपिट होती रहती है... पर ऐसी भी क्या नाराजगी यार... तुम शादी करने जा रही हो... और हमें खबर भी नहीं...

इतिश्री - और नहीं तो... वह तो भला हो... राजा साहब जी का... हमारे घर में आकर पर्सनली बुलाए थे... और यहाँ आने के लिए... गाड़ी भी भिजवाया था...

रुप - ह्व़ाट...

सब - हाँ...

रुप - राजा साहब... तुम लोगों के घर गए थे...

सब - हाँ...

रुप - कब...

बनानी - वह... करीब हफ्ते भर पहले...

दीप्ति - क्यूँ... तुम नहीं चाहती थी... के हम यहाँ आए...

रुप सबके चेहरे को गौर से देखती है l फिर एक गहरी साँस छोड़ते हुए पूछती है

रुप - मेरी शादी किससे तय हुई है... जानती भी हो...

सब - हाँ... तुम्हारे अनाम से...

भास्वती - आई मिन... एडवोकेट विश्व प्रताप महापात्र से...

रुप - (फिर से शॉक लगती है) ह्व़ाट... यह तुम क्या कह रही हो...

दीप्ति - ह्व़ाट डु यु मीन... क्या कह रही हो मतलब.... हमें तो राजा साहब ने यही कहा था...

रुप - क्या... यह तुम लोगों को... राजा साहब ने कहा था...

सब - हाँ....

रुप - और क्या कहा था...

दीप्ति - यही... के इस शादी से... तुम्हारी छोटी माँ... और भाई चाचा कोई खुश नहीं है... इसलिए... पारिवारिक रस्म सभी तुम्हारी सहेलियाँ और दोस्त निभाएंगे...

रुप - अच्छा... तो ऐसा कहा राजा साहब ने... तो तुम लोग अपने अपने फॅमिली के साथ क्यूँ नहीं आए...

बनानी - राजा साहब ने कहा कि... शादी कुछ चुनिंदा लोगों के सामने होगी... रिसेप्शन के दिन... सभी आयेंगे... तब हमारी फॅमिली आएँगे... रिसेप्शन अटेंड कर... हमें वापस ले जायेंगे...

रुप - ओ... तो राजा साहब ने... ऐसा कहा है तुम लोगों को...

भास्वती - देख यार... तु अब गुस्सा कर या कुछ और... हम तुझे आज अपने हाथों से सजाएँगे... और मंडप पर बिठाएंगे... और...

सभी - जीजाजी से... खूब सारा पैसा ऐंठेंगे...

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विश्व तैयार हो कर वैदेही के दुकान पर आता है l देखता है कुछ लोग दुकान के बाहर खड़े हुए हैं l विश्व पास जाकर देखता है लोग वैदेही से कुछ पूछ रहे थे l

लोग - अच्छा वैदेही... क्या हम राज महल जाएं...

वैदेही - हाँ चाचा... क्यूँ नहीं... सभी गाँव वालों को निमंत्रण मिला है... और यह तो चार साल बाद... बुलावा आया है... क्यूँ ना जाओ...

हरिआ - पर... वैदेही दीदी... अब राजा के साथ हमारा जिस तरह का रिश्ता है... क्या हमारा वहाँ जाना ठीक रहेगा...

वैदेही - देखो हरिआ... भैरव सिंह ने... मातम करने के लिए नहीं बुलाया है... जश्न में बुलाया है... और यह शायद महल का... आखिरी जश्न है... क्यूँकी इसके बाद... वहाँ मातम तो होगा... पर जश्न कभी नहीं मनेगा... इसलिए बेखौफ हो कर जाओ... मस्त हो कर जाओ... हम लोग थोड़ी देर बाद निकल रहे हैं... चाहो तो... हमारे साथ जा सकते हो...

लोग - नहीं... हमे खास हिदायत है... बारात जब गुजरेगी... उसके पीछे पीछे... बाराती में शामिल हो कर महल पहुँचना है...

वैदेही - यह तो और भी अच्छी बात है... अच्छा अब तुम लोग जाओ...

सभी लोग मुड़ कर वापस चले जाते हैं l उनके जाने के बाद वैदेही विश्व को देखती है l विश्व सफेद रंग के पैंट शर्ट में बहुत ही खूब सूरत दिख रहा था l

वैदेही - आह... कितना सुंदर दिख रहा है मेरा भाई... (नजर उतारने लगती है, फिर एक काला टीका विश्व के गाल पर लगा देती है)

विश्व - यह क्या है दीदी...

वैदेही - आज तुझ पर दुनिया भर की बुरी नजरें होंगी... किसीकी नजर ना लगे... (तभी बबलु आता है)

बबलु - मौसी..

वैदेही - अरे... आ गया... (वैदेही बबलु के गाल पर भी काला टीका लगाती है)

विश्व देखता है बबलु बिल्कुल विश्व के जैसे कपड़े पहना हुआ था l वह बबलु से पूछता है

विश्व - तेरे पास... बिल्कुल मेरे जैसे कपड़े...

बबलु - मौसी ने मेरे लिए खरीदा है... (यह सुन कर विश्व वैदेही की ओर देखता है)

वैदेही - हाँ हाँ... यह जरूरी है... इसलिए खरीद लिया... वैसे... वह चार बंदर कहाँ हैं...

विश्व - आ जाएंगे...

वैदेही - तो चलें...

तीनों महल की ओर जाने लगते हैं l चलते चलते महल के पास पहुँचते हैं l बाहर उन्हें विक्रम, पिनाक, सुषमा और शुभ्रा मिलते हैं l सभी मिलकर जब गेट पर पहुँचते हैं तो पाते हैं भैरव सिंह भीमा, उसके गुर्गे, रंगा, रॉय और बल्लभ के साथ खड़ा था l भैरव सिंह उन्हें गेट के पास ही रोकता है l

भैरव सिंह - विक्रम सिंह... आज तुम्हारे बहन की विवाह है... वर अभी पहुँचने वाले हैं... रस्म के अनुसार... (चुटकी बजाता है, भीमा एक रेशमी कपड़े से ढका हुआ थाली लेकर आता है) (भैरव सिंह थाली पर उस कपड़े को हटाता है, उस पर जुते थे) जीजा घोड़ी से उतरने के बाद... साला उसे जुता पहनता है...

विक्रम - जो कुत्ता मेरा जुता चाटता था... उसे मैं जुता... अपने हाथों से पहनाऊँ... यह आपने सोच भी कैसे लिया... हाँ... जुते मारने के लिए कहेंगे... तो सारे गिले शिकवे भुला कर मार सकता हूँ...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... सुषमा जी... वर... घोड़ी से उतरने के बाद... उसका तिलक सासु करतीं हैं...

सुषमा - मैं यहाँ इसलिए आई हूँ... यह शादी होनी ही नहीं है... उसकी गवाह बनने... अभी भी वक़्त है... राजा साहब... यह शादी टाल दीजिए...

भैरव सिंह - कोई नहीं... हमें इस बात का अंदाजा था... हमने उसका काट भी ढूंढ लिया है... (पीछे मुड़ कर) उन्हें लेकर आओ...

शनिया भाग कर जाता है और जब वापस आता है साथ में रॉकी और बनानी आते हैं l उन्हें देख कर विश्व और विक्रम दोनों हैरान होते हैं l

भैरव सिंह - (विश्व से) तुम्हें हैरानी हो रही है... या परेशानी हो रही है...

विश्व - ना मैं हैरान हूँ... ना मैं परेशान हूँ... क्यूँकी तुम्हें.... मैं नस नस से पहचानता हूँ... तुम ऐसा ही कुछ करोगे... इसका मुझे अंदाजा था...

भैरव सिंह - तब तो तुम्हें इस बात का अंदाजा हो ही गया होगा... आज तुम सबका घमंड और विश्वास दोनों को... हम मिट्टी में मिला देंगे...

विश्व - फ़िलहाल घमंड और विश्वास... तुम्हारा मिट्टी पलित हुआ लग रहा है... है ना... (भैरव सिंह का जबड़ा भिंच जाता है) हर उस शख्स को यहाँ पर ले आए... जो किसी ना किसी तरह से... राजकुमारी जी से जुड़ा हुआ था... पर मेरी माँ और डैड को यहाँ नहीं ला पाए...

भैरव सिंह - हाँ... वह हमारे आदमियों की नाकामयाबी है... क्या टाइमिंग है... जोडार अपने घर की रिनोवेशन करा रहा है... और सेनापति के घर में... भाड़े पर रह रहा है.. पर कोई नहीं... अंदर जाओ... तुम सबके लिए खास मंच तैयार किया गया है... वहाँ से... रुप को केके के साथ व्याहते देखो... भीमा

भीमा - जी हुकुम...

भैरव सिंह - इन सबको... बाइज़्ज़त लेजाओ... और बिठा दो...

भीमा - जी हुकुम...

भीमा रास्ता बनाते हुए आगे आगे जाता है और मंडप से कुछ दूर पर बने एक स्टेज पर लगे कुछ कुर्सियों पर बैठने के लिए कहता है l सभी पहले एक दूसरे को देखते हैं फिर जाकर बैठ जाते हैं l

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बैठने के बाद विश्व और विक्रम शादी की जगह को नजर घुमा कर देखने लगते हैं l तीन मंच बने हुए थे l एक छोटा सा मंच जिस पर एक सिंहासन नुमा कुर्सी था l दूसरा मंच शादी के लिए और तीसरे मंच पर यह लोग बैठे हुए थे l दुल्हन का कमरा बेदी से कुछ दूर पर शामियाने से बनाया गया था l पर दूल्हे का कमरा बेदी के आसपास कहीं नहीं दिख रहा था l शायद महल के अंदर किसी कमरे को दूल्हे के लिए बनाया गया होगा l कुछ देर बाद कानों में ढोल नगाड़ों की आवाज़ सुनाई देती है l मतलब दूल्हा का आगमन हो गया था l वे देखते हैं केके दूल्हे के रुप में भैरव सिंह, एक पंडित और इंस्पेक्टर दास के साथ अंदर आता है l उनके पीछे पीछे लोग आकर जमीन पर अपनी अपनी जगह बना कर बैठ जाते हैं l पंडित पहले केके को एक तलवार देता है और बेदी के चारों तरफ़ बने धागे की घेरे को काटने के लिए कहता है l केके तलवार से वह धागे वाला घेरा को काट देता है l उसके बाद केके मंडप का प्रदक्षिणा करता है l प्रदक्षिणा के बाद केके को अंदर ले जाया जाता है l केके के अंदर चले जाने के बाद सारी पुलिस मंडली विश्व के बैठे मंच के पास खड़े हो जाते हैं l

पंडित मंडप पर बैठ कर मंत्र पढ़ने लगता है l विश्व और विक्रम हैरान होते हैं दुल्हन की माता पिता के रस्म अदायगी के लिए मंडप पर रॉकी और बनानी को लाया जाता है l कुछ विधि पूर्ण होने पर कन्या को बेदी पर लाने के लिए पंडित कहता है l दुल्हन के लिए बनी शामियाने से रुप अपनी सहेलियों के साथ निकलती है l सफेद वस्त्रों में रुप बेहद सुंदर दिख रही थी, चंदन कुमकुम माथे पर, बालों के जुड़े में चमेली के फुल उसकी सुंदरता को चार चांद लगा रहे थे, या यूं कहें कि चमक रही थी, चेहरे पर शृंगार के वज़ह से दमक रही थी l रुप के हाथों में एक नारियल थी वह मुस्कराते हुए बेदी तक आ रही थी l रुप की सुंदरता को देख कर विश्व का मुहँ खुला रह जाता है l वह रुप की उस सौंदर्य में खो सा जाता है l

वैदेही - (धीरे से पूछती है) बहुत सुंदर है ना...

विश्व - हाँ... बिल्कुल स्वर्ग की अप्सरा... (अचानक होश में आता है) क्या... हाँ.. क्या पुछा तुमने...

वैदेही - पूछा नहीं कहा...

विश्व - हाँ... क. क्य.. क्या कहा..

वैदेही - बहुत कीड़े उड़ रहे हैं... मुहँ बंद कर ले...

विश्व - ओ.. अच्छा... हाँ हाँ..

वैदेही उसकी हालत देख कर हँस देती है l विश्व सकपका जाता है और चोरी चोरी नजरों से शादी की बेदी पर बैठी रुप की ओर देखता है l रुप भी मुस्कुराते हुए विश्व की ओर देखती है और भौंहे नचा कर अपनी शृंगार के बारे में इशारे से पूछती है l विश्व तो घायल था वह जवाब में आह भरी नजर से देखता है l विश्व प्रतिक्रिया देख कर रुप हँस देती है l जहां विश्व रुप की रुप में खोया हुआ था, वहीँ भैरव सिंह और वैदेही की नजर आपस में टकराती है l भैरव सिंह का चेहरा सख्त था पर घमंड से चूर था वैदेही से नजर मिलते ही भैरव सिंह अपनी मूंछों पर ताव देता है l वैदेही अपना चेहरा घुमा लेता है l

कुछ देर बाद एक रस्म पूरा हो जाता है l पंडित अगले रस्म के दुल्हन को नए वस्त्रों में आने के लिए कहता है और अपने कमरे में जाने के लिए कहता है l जैसे ही रुप अपने सहेलियों के साथ शामियाने के भीतर जाती है l शामियाने को रंगा के साथ कुछ लोग घेर लेते हैं l थोड़ी देर बाद सत्तू और रॉय के साथ केके मंडप में आता है l जिसे देख कर विक्रम, पिनाक, सुषमा और शुभ्रा के चेहरे पर गुस्सा छा जाता है l पर वैदेही और विश्व के चेहरे पर कोई भाव नहीं आता l पंडित पूजा विधि संपन्न करने के बाद केके को विवाह वस्त्रों में आने के लिए कहता है l अब तक पूरे हुए रस्मों के बाद अब केके के चेहरे पर अति उत्साही भाव नजर आ रहे थे l बड़े गर्व के साथ वह सत्तू और रंगा के साथ महल में दूल्हे के लिए नियत की गई कमरे के भीतर जाता है l उधर पंडित के बुलाने पर रुप की सहेलियाँ रुप को लेकर बाहर आती हैं l रुप इस बार लाल वस्त्रों में आई हुई थी l लाल रंग के दुल्हन की लिबास में देख कर विश्व की हालत और भी ख़राब हो जाती है l इस बार रुप के चेहरे पर हल्की सी टेंशन झलकने लगी थी l वह सवालिया नजर से विश्व और वैदेही की ओर देखती है l विश्व तो अपनी अप्सरा के सौंदर्य में खो गया था l पर वैदेही एक इत्मीनान भरा इशारा पलकें झपका कर करती है l जिसे भैरव सिंह देख लेता है l वह अपनी सिंहासन से उतर कर मंडप तक आ जाता है l मंडप में रुप के साथ उसकी छटी गैंग की सहेलियाँ और रॉकी बैठे हुए थे l इस बार की रस्म पूरा होते ही पंडित दूल्हे को बेदी पर लाने के लिए कहता है l

पहले पाँच मिनट, फिर दस मिनट बीत जाता है, पर केके नहीं आता l उधर सत्तू तेजी से आता है और भीमा के कान में कुछ कहता है l सत्तू से सुनने के बाद भीमा के चेहरे का रंग उड़ जाता है l वह कांपते हुए भैरव सिंह के पास जाता है और उसका अनुमती लेकर भैरव सिंह के कान में कुछ कहता है l सुनने के बाद भैरव सिंह भी हैरान होता है और विश्व की ओर देखता है l फिर तेजी से महल के अंदर जाता है l

एक टेंशन भरा माहौल था l पंडित हैरान हो कर दूल्हे की आने की राह देख रहा था l इधर लोग आपस में खुसुर-पुसुर करने लगे थे l कुछ देर पहले रुप के चेहरे पर जो परेशानी उभर कर आई थी l अचानक उसके चेहरे पर खुशी उभरने लगी थी l विश्व जिस मंच पर बैठा था इंस्पेक्टर दास भी वहीँ पर खड़ा था, अचानक उसका फोन बजने लगता है l दास फोन पर देखता है रॉय का कॉल था l फोन उठाता है जैसे ही वह फोन पर कुछ सुनता है, अचानक उसके मुहँ से निकल जाता है

दास - क्या... दूल्हा गायब है...

यह एक धमाका था l सब लोग जो बैठे हुए थे सभी एक झटके के साथ खड़े हो जाते हैं l सबसे ज्यादा हैरानी बेदी के पास खड़े बल्लभ को होता है l उसका मुहँ खुल जाता है l पर कुछ देर पहले रुप के चेहरे पर जो थोड़ी सी परेशानी झलक उठी थी, एकदम से गायब हो जाती है और एक दमकती हुई मुस्कान के साथ विश्व की ओर देखती है l विश्व उसे आँख मार देता जिसकी प्रत्युत्तर में रुप शर्मा के चेहरा झुका लेती है l थोड़ी देर के बाद भैरव सिंह, रॉय, भीमा और सत्तू तेजी से मंडप की ओर आते हैं l इंस्पेक्टर दास से रॉय कहता है

रॉय - इंस्पेक्टर साहब... (विश्व को दिखा कर) गिरफ्तार कर लीजिए इस आदमी को...

दास - क्यूँ... क्या करदिया इस आदमी ने...

रॉय - इसने... (रुक जाता है)

दास - हाँ हाँ इसने...

भैरव सिंह- (इंस्पेक्टर दास के पास जाता है) इंस्पेक्टर... जो कमरा... दूल्हे बाबु को नियत किया गया था... उस कमरे में... अभी वह उपलब्ध नहीं हैं... क्या उन्हें ढूंढने के लिए कुछ करेंगे...

दास - अच्छा... तो यह बात है... चलिए... पहले... उसी कमरे से तहकीकात शुरु करते हैं...

भैरव सिंह - हाँ जब तक... तहकीकात पूरी हो ना जाए... तब तक... आप इन्हें... (विश्व और विक्रम वाली मंच दिखाते हुए) यहीं पर रोके रखें...

इंस्पेक्टर दास, अपने सिपाहियों से विश्व, विक्रम पिनाक और तीनों औरतों को कहीं जाने ना देने के लिए कह कर भैरव सिंह, रंगा, रॉय, बल्लभ, सत्तू और भीमा को साथ लेकर उस कमरे के अंदर आता है जिस कमरे से केके गायब हो गया था l दास कमरे को अच्छी तरह से मुआयना करता है l उसकी नजर बाल्कनी पर जाता है l वह देखता है एक कपड़ा बाल्कनी के रेलिंग से बंधा हुआ है और नीचे की ओर गिरा हुआ है l

दास - इस बंधी हुई चादर को देख कर लगता है... आपका जामाता... यहाँ से उतर कर भागे हैं...

भैरव सिंह - हो नहीं सकता...

दास - ऐसा क्यूँ...

रॉय - इस महल को... मेरे आदमी... हर पाँच फुट की दूरी बना कर घेरे हुए हैं... यह मुमकिन ही नहीं है... कोई इस महल से निकल कर गया हो...

दास - हूँम्म्म्... तो हो सकता है... महल के अंदर ही कहीं छुपा हो...

भैरव सिंह - अपनी शादी में कौन छुपता है दास बाबु...

दास - हो सकता है... कमल कांत को... यह शादी मंजुर ही ना हो... ज़बरदस्ती कारवाई जा रहा हो...

भैरव सिंह - (चीखता है) दास...

दास - ऊँ हूँ... इंस्पेक्टर दास... पहले आप अपने महल के अंदर... अच्छी तरह से तलाशी लीजिए... फिर देखेंगे...

कमरे में दास, बल्लभ और भैरव सिंह को छोड़ कर सभी महल के अंदर केके को ढूंढने निकल जाते हैं l दास अभी भी कमरे में अपनी नजर दौड़ा रहा था l कुछ देर बाद

दास - राजा साहब... क्या मैं इस कमरे का बाथरूम... यूज कर सकता हूँ...

भैरव सिंह अपना सिर हाँ में हिलाता है l दास बाथरुम के अंदर जाता है l थोड़ी देर बाद फ्लश की आवाज़ सुनाई देती है l कुछ देर बाद अपना हाथ साफ करते हुए दास अंदर आता है l कुछ ही देर में सारे लोग अंदर आते हैं और केके कहीं भी नहीं दिखा ऐसा कहते हैं l

भैरव सिंह - इंस्पेक्टर बाबु... यह क्लियर कट किडनैपिंग है... आप केस दर्ज कीजिए...

दास - आपको किस पर शक है...

रॉय - हाँ है... विश्व प्रताप पर...

दास - कैसी बात कर रहे हैं रॉय बाबु... विश्व के पास मैं और मेरी पुरी पुलिस फोर्स खड़ी थी... (रॉय चुप हो जाता है) राजा साहब... आपका क्या कहना है... (भैरव सिंह चुप रहता है) (बल्लभ से) प्रधान बाबु... क्या आप कुछ कहना चाहेंगे...

बल्लभ - आप... आप... केके साहब का... गुमशुदगी का रिपोर्ट दर्ज कर दीजिए...

रॉय - ह्व़ाट...

दास - लगता है... आप लोग एक मत नहीं हैं... कोई नहीं... मुझे क्या रिपोर्ट दर्ज करनी है... और किस बात पर तहकीकात करना है... यह डिसाइड करने के बाद मुझे खबर कर दीजिए... फिलहाल... मैं बाहर हूँ...

दास इतना कह कर चला जाता है l कमरे में मौजूद सभी बल्लभ की ओर सवालिया नजर से देखने लगते हैं l

बल्लभ - राजा साहब... आप जरा ध्यान दीजिए... अगर किडनैप है भी... तब भी... हम वज़ह को एस्टाब्लीश नहीं कर सकते... महल के अंदर... यह कांड हुआ है... हमारी सारी की सारी तैयारी... धरी की धरी रह गई...

सत्तू - हुकुम... गुस्ताखी माफ...

भैरव सिंह - क्या बात है...

सत्तू - हुकुम... मुझे तो लगता है... केके बाबु... विश्वा से डर कर भाग गए हैं...

रॉय - क्या बकते हो...

सत्तू - बक नहीं रहा हूँ... शादी को लेकर... केके बाबु कल रात से डरे हुए थे... और आज सुबह... हिम्मत जुटाने के लिए... दारू भी बहुत पी रखी थी...

रंगा - मुझे ऐसा नहीं लगता... राजा साहब... विश्वा बहुत बड़ा गेम कर दिया... हम सब राजकुमारी जी की सुरक्षा के लिए... तैयारी कर रखे थे... इसलिए... उसने बड़े आराम से.. केके साहब पर हाथ साफ कर दिया...

बल्लभ - जो भी हो... हम सीधे विश्व पर उंगली नहीं उठा सकते... वह गाँव के लोग और पुलिस के बीच में... शुरु से ही था... वह अपनी जगह से हिला तक नहीं... हम इल्जाम तो लगा सकते हैं... पर यह मत भूलो... वह एक वकील भी है... हमारी ही.. शिकायत को... हमारे खिलाफ इस्तेमाल कर सकता है... (कमरे में सभी चुपचाप खड़े थे) अब हम सबको... मंडप पर चलना चाहिए....

सभी बल्लभ की बात पर सहमत होते हैं l भैरव सिंह के साथ सभी मंडप पर पहुँचते हैं l वहाँ पहुँच कर देखते हैं बेदी पर रुप अकेली बैठी हुई है l विश्व, वैदेही, विक्रम और उसके परिवार वाले मंच से उतर कर पुलिस वालों से बात कर रहे थे l पर गाँव वाले और पंडित कोई भी दिख नहीं रहा था l

भैरव सिंह - यह क्या है... कहाँ गए सारे लोग...

विक्रम - मैंने ही सबको विदा कर दिया... जितना तमाशा देखना था... देख चुके थे... अब जो हुआ या आगे होगा... वह आपके लिए... ना ठीक था न होगा... इसलिए मैंने पंडित के साथ साथ... नंदिनी के सभी दोस्तों को.... और गाँव वाले सबको विदा कर दिया...

भैरव सिंह - क्या कहा...

विक्रम - जी... आपने यह शादी तय कर.. अपनी खूब जलालत करा ली है... कहीं और ज्यादा हो जाती... तो लोग... आप पर ही फब्तीयाँ कसते...

भैरव सिंह - (विक्रम को अनसुना कर विश्व के पास जाता है) बहुत बड़ा चाल चल दिया तुमने... हमने सोचा भी नहीं था... (विश्वा कुछ नहीं कहता बस मुस्करा देता है, भैरव सिंह को गुस्सा आता है वह विश्व के तरफ़ बढ़ने लगता है तो वैदेही सामने आ जाती है)

वैदेही - बस भैरव सिंह बस... तुमने जिस लिए बुलाया था... और हम जिस लिए आए थे... सब पूरा हो गया... बस एक आखिरी बात याद रखना... मर्द की मूँछ और कुत्ते की दुम को कभी सीधी या नीची नहीं होनी चाहिए... कुत्ते की दुम अगर सीधा हो जाए तो वह कुत्ता नहीं रह जाता... और मर्द की मूँछ नीची हो जाए... तो वह मर्द नहीं रह जाता...
 
शुक्रिया अग्रवाल जी

कहानी मूलतः वैदेही की है

मैंने इसमें बहुत से चरित्रों जोड़ दिए और वैदेही की कहानी को छोटा और सीमित कर दिया है

चूँकि बहुत से चरित्र जुड़ गए तो उनके चरित्रों के साथ न्याय करते करते कहानी बहुत लंबी हो गई

बहुत कुछ अब कांट छाँट कर रहा हूँ पर यह भी ध्यान रख रहा हूँ हर एक चरित्र अपना सटीक योगदान दे

फिर से धन्यवाद और आभार
 
रोनीत भाई आपकी कमेंट से ना तो दुखी हुआ हूँ ना ही अभिमान किया हूँ l आप जैसे पाठकों के कारण ही मैं कहानी को यहाँ तक पहुँचा पाया हूँ l वर्ना आप तो जानते हैं इस फोरम के लिए मेरी यह कहानी उपयुक्त नहीं है l फिर भी आप लोगों का प्यार और विश्लेषण मेरे भीतर ऊर्जा संचार कर देता है कि कहानी को आगे बढ़ा पाऊँ l

इस अंक को भी पढ़ें और विश्लेषण सहित अपना प्रतिक्रिया दें
 
हाँ भैरव यही चाहता था पर जिस तरह से शादी रुक जाने की ख्वाहिश थी वैसे नहीं रुकी l भैरव सिंह अब जंग का मैदान और दायरा बढ़ाने वाला है l

हाँ भैरव सिंह वह फजीहत नहीं चाहता था l जैसा कि वैदेही ने आगाह भी किया था, यह शादी जिस तरह से रुकेगी गाँव वालों के मन से रही सही डर निकल जाएगा l

हाँ जंग का यही उसूल है l अपनी कमजोरी पर हावी हो जाओ या छुपा जाओ l

जी जरूर

अगले अंक में इस बात का खुलासा हो जाएगा

भाई बिटिया का अचानक हीमोग्लोबिन कम हो गया l 6.7 पर आ गया था l हस्पताल में चेकिंग के बाद B12 और फोलीक एसिड की कमी के कारण हुआ है l पर डॉक्टरों ने यह भी संदेह व्यक्त किया है कि हो सकता है को वैक्सीन के साइड इफेक्ट के कारण यह हुआ हो l फिलहाल प्रतिदिन दवा ले रही है इसी शुक्र वार को फिर से हीमोग्लोबिन की चेक किया जाएगा l
 
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