Thriller "विश्वरूप" ( completed ) - Page 15 - SexBaba
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Thriller "विश्वरूप" ( completed )

SANJU ( V. R. ) भाई मैं आपकी पीड़ा को समझता हूँ l केवल आप ही नहीं मेरे हर एक पाठक को वीर और अनु से खासा लगाव हो गया था l पर यह कहानी है इसके हर आयाम में मैंने सारे रंग भरने की कोशिश की है l आप जैसे प्रतिक्रिया शील विश्लेषक मेरा ना सिर्फ मार्ग दर्शन की है बल्कि लिखने में मेरा मार्ग प्रशस्त भी किया है l जैसा कि मैंने पहले भी उल्लेख किया है यह कहानी मैंने खेल खेल में शुरु किया था l केवल विश्व और भैरव सिंह ही मेरे जेहन में थे l कहानी में धीरे धीरे पात्र जुड़ते चले गए और कहानी इस मोड़ तक पहुँच गया है l आप को शायद विश्वास ना हो पर सच्चाइ यह है कि इसमें वैदेही का चरित्र था ही नहीं l पर कहानी के धारा में उसका चरित्र आया, वीर और विक्रम थे ही नहीं, पर कहानी के धारा में वह भी आए l कहानी इसलिए काफ़ी लंबी हो गई l मैंने कोशिश यही की है के चाहे कुछ भी हो जाए कहानी का मूल भावना से ना भटके l अब आपके पीड़ा भरे मन को शांत करने के लिए इतना ज़रूर कहूँगा के एक सुंदर प्रेम कहानी लिखूँगा, अवश्य लिखूँगा l इसलिए चलिए इस कहानी को अंजाम तक पहुँचा देते हैं l

साभार के साथ आभार व्यक्त कर रहा हूँ

धन्यवाद
 
मैं आपको प्रतिक्रिया पर कोई टिप्पणी करना नहीं चाहता l दिल दुखा है उस दर्द से मैं अवगत हूँ आहत भी हूँ पर क्या करूँ तीर निकल चुका है l कहानी अपनी अंतिम पड़ाव की ओर अग्रसर है l वैदेही निःसंदेह मुख्य पात्र है पर अन्न परोसने के चक्कर में खिचड़ी बन गई अब समेट रहा हूँ l कहानी का अंत पसंद आएगा ऐसी आशा व्यक्त कर रहा हूँ l
 
मित्रों

मिथुन संक्रांति को ओडिशा में रज पर्व कहा जाता है l कल ही घर से सारे मेहमान गए हैं l मैं कल से ही कहानी का अंश लिखने में व्यस्त था l

जिनके उत्सुकता का उत्तर ना दे पा रहा हूँ उनसे क्षमा चाहता हूँ l

आज रात दस बजे तक कहानी का अगला भाग प्रस्तुत कर दूँगा

आप के प्रेम व शुभकामनाओं के लिए तह दिल से आभार
 
👉एक सौ चौवनवाँ अपडेट

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सूरज ढल रहा था l रौशनी मद्धिम पड़ चुकी थी l अँधेरा धीरे धीरे बढ़ता जा रहा था l कनाल के सीढ़ियों पर विश्व उस ढलते सूरज को देख रहा था l उसके पास एक सीढ़ी के ऊपर कोई आकर बैठता है l विश्व मुड़कर देखता है, वह विक्रम था l विश्व वापस ढलते सूरज की ओर देखने लगता है l

विक्रम - तुम यहाँ क्या कर रहे हो...

विश्व - क्षितिज पर ढलते सूरज को... समझने की कोशिश कर रहा हूँ...

विक्रम - सूरज कोई संदेश दे रहा है क्या...

विश्व - पता नहीं...

विक्रम - (एक सीढ़ी उतर जाता है और विश्व के बराबर बैठ जाता है)

विश्व - कैसी गई तुम्हारी रात...

विक्रम - पता नहीं...

विश्व - क्यूँ... हाँ... उस घर में एसी नहीं है... शायद मच्छर भी होंगे... आदत जो नहीं होगी...

विक्रम - हाँ बात तो... सच है.. पर...

विश्व - पर...

विक्रम - (एक पॉज लेकर) वह घर तुम्हारा है ना... वैदेही जी कह रहीं थीं.. तुम्हारा जन्म उसी घर में हुआ था...

विश्व - हाँ हुआ होगा... दीदी ने कहा था... मुझे जन्म देकर मेरी माँ चल बसी थी... मेरे लिए मेरी दीदी ही मेरी माँ है और मेरे पिता भी... उसीने मुझे बोलना दिखाया... देखना सिखाया... चलना सिखाया और भागना भी... वह मेरे लिए देवी है...

विक्रम - वाकई वह देवी हैं... सिर्फ तुम्हारे लिए ही नहीं... गाँव वालों के लिए भी...

विश्व - हाँ... वह देवी है... वह कभी किसी में कभी फर्क़ नहीं की है... आज भी उन गाँव वालों के लिए ही डटी हुई है... जिन्होंने उसके बदकिस्मती की आवाज पर कोई जवाब तक नहीं दिया... जिन्होंने राजा के आदमियों के कहने पर... डायन समझ कर पत्थरों से मारा... उन सबको मेरे दीदी ने माफ कर दिया... वह बहुत मजबुत है... इतना कुछ होने के बावजूद... ना यह गाँव छोड़ा.. ना गाँव वालों को...

विक्रम - मैंने घर छोड़ दिया... गाँव छोड़ने की सोच रहा था... पर असमंजस में था... अपने साथ उन चार जिंदगियों को लेकर कहाँ जाता... मैं उस पसोपेश में था कि... तुम्हारी दीदी ने मुझे उस पसोपेश से बाहर निकाल दिया... और देखो ना... आज अपने अन्नपूर्णा भंडार से खाना भी भेज दिया...

विश्व - (कोई जवाब नहीं देता)

विक्रम - विश्व... मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है... तुम मुझसे कई गुना बेहतर हो... हर लिहाज से... फिर भी मैं तुम्हारे सामने अपने गुरुर पर कायम था... झूठा ही सही... तुमसे जीता भी और तुम्हारी माता जी से तुम्हारे लिए... हाथ जुड़वा कर अनुरोध भी करवाया... अपनी झूठी अहं को खुश करने के लिए... जानते हो... एक गुरूर हमें विरासत में मिली थी... क्षेत्रपाल के हाथ कभी आसमान नहीं देखती... किसी से मांगते नहीं... या तो छिनते हैं... या फिर दे देते हैं... शायद दीदी को यह मालुम था... इसलिए मेरी अहं की लाज रखते हुए... मेरे हाथों को फैलाने नहीं दीया... मुझे आसरा दे दी...

विश्व - दीदी है ही ऐसी... उसके दर से कोई कभी भी... खाली हाथ नहीं लौटता है...

विक्रम - इसीलिये तो मेरे मुहँ से बरबस निकल गया... के वह अन्नपूर्णा हैं...

कुछ देर के लिए दोनों चुप हो जाते हैं l सूरज लगभग डूबने को था l अंधेरा धीरे धीरे अपने सबाब पर छा रहा था l

विक्रम - सूरज शायद कुछ सेकेंड के बाद दिखे ना... क्या तुम्हें कोई संदेश मिला...

विश्व - नहीं... अभी तक नहीं... या फिर मेरी समझ में नहीं आया...

विक्रम - क्या तुम इसलिए परेशान हो... रुप मेरे साथ नहीं आई...

विश्व - नहीं... मैं जानता हूँ... वह क्यूँ नहीं आई... और मैं उनके लिए निश्चिंत हूँ...

विक्रम - (थोड़ा चिढ़ कर) ऐसा क्यूँ... विश्व... ऐसा क्यूँ... वह क्षेत्रपाल महल है... और वहाँ पर भैरव सिंह क्षेत्रपाल रह रहे हैं... तुमसे जितने के लिए... किसी भी हद तक जा सकते हैं... देखा नहीं... कटक में क्या हुआ... हमने वीर को खो दिया...

विश्व - (शांत पर खोए खोए लहजे में) हाँ... वीर को खो दिया... तुमने क्या खोया... मैं नहीं जानता विक्रम... पर मैंने जो खोया है... वह मैं बयान नहीं कर सकता... पहली बार... मुझे लगा... के... (विश्व आगे कुछ कह नहीं पाता)

विक्रम - मैं... मैं समझ सकता हूँ...

विश्व - नहीं... तुम नहीं समझ सकते... राजा भैरव सिंह ने... ना सिर्फ मुझे संदेशा दिया है... बल्कि तुम्हें भी संदेश दिया है...

विक्रम - मुझे...

विश्व - हाँ... तुम्हें... वीर को जो सजा अनु की आड़ में मिली है... उसका वज़ह वीर की बगावत है... और इसी में तुम्हारे लिए भी पैगाम है..

विक्रम - (हैरानी के मारे आँखे बड़ी हो जाती हैं) क्या...

विश्व - हाँ... अब तुमने भी बगावत कर दी है...

विक्रम - मैं हैरान नहीं होऊंगा... अगर राजा साहब ऐसा कई कदम उठाते हैं तो... जिन्होंने मेरी माँ को अपने रास्ते से हटा दिया हो... उनके लिए मेरी क्या कीमत...

विश्व - इसीलिए दीदी ने तुम्हें अपनी आँखों के सामने रखा है...

विक्रम - क्या... मतलब वैदेही जी को पहले से ही अंदेशा है...

विश्व - हाँ... (विश्व विक्रम की ओर मुड़ कर) वैसे तुम मुझे यहाँ ढूंढते हुए क्यूँ आए हो...

विक्रम - मुझे रुप की चिंता है... मैंने बुलाया था... पर वह नहीं मानी... उसे शायद तुम्हारा इंतजार है... तुम जाकर उसे क्यूँ नहीं ले आते...

विश्व - पहली बात... तुम जो इतनी आसानी से महल से निकल आए... उसकी वज़ह... राजा की मज़बूरी है... वर्ना तुम भी जानते हो... तुम्हारा महल से निकल आना कितना मुश्किल होता.... और रही राजकुमारी जी की बात... तो राजकुमारी जी ने... राजा साहब की अहंकार को छेड़ा है... मैं राजकुमारी जी को तभी जाकर लाऊंगा... जब भैरव सिंह का अहं... चरम पर होगी... भरम में होगी...

विक्रम - राजा साहब का अहंकार जब चरम पर होगी... तो तुम कहना क्या चाह रहे हो... राजा साहब की गिरफ्तारी नहीं होगी...

विश्व - सात साल जैल में गुजार कर आया हूँ... कानून का हर दाव पेच देख कर सीख कर आया हूँ... मैं किसके साथ उलझ रहा हूँ मैं जानता हूँ... वह ज्यादा देर तक... सलाखों के पीछे नहीं रहेगा... किसी ना किसी बहाने से बाहर आएगा... तब उसके घर के बाहर कोई कानूनी पहरा भी नहीं होगा... तब... तब जाकर मैं... राजकुमारी जी को ले आऊंगा...

विक्रम - तुम जानते भी हो तुम क्या कह रहे हो... तब तुम महल में दाखिल भी नहीं हो पाओगे... अगर ताकत की आजमाइश करोगे... तब भी नहीं जा पाओगे...

विश्व - विक्रम... मैंने तुमसे ज्यादा महल में अपने दिन गुजारे हैं.... मैं महल के हर कोने से... चप्पे-चप्पे से वाकिफ हूँ... मैं अगर अभी राजकुमारी को ले आया... तो राजकुमारी जी का अहं हार जाएगा... और वह मैं कभी होने नहीं दूँगा...

विक्रम - (यह सब सुन कर स्तब्ध हो जाता है) चाची माँ ने सच कहा था... राजा साहब जी के अहं से... किसी एक का अहं टकराया है... और वह रुप है... तुम... तुम वाकई... रुप के लिए ही बने हो... पर... तुम्हें नहीं लगता... तुम रुप को लेकर कुछ ज्यादा ही ओवर कंफिडेंट हो...

विश्व - नहीं... अब जब पूरा महल खाली है... ऐसे में बड़े राजा जी की देखभाल के लिए कोई अपना होना चाहिए... क्यूँकी कल नहीं तो परसों... राजा साहब को... अदालत में पेश होना ही होगा... तब तक... राजकुमारी जी पर कोई आँच नहीं आएगा...

विक्रम - ओह... तुम बहुत दूर की सोच रहे हो...

विश्व - नहीं... मैं पास की ही सोच रहा हूँ... अगर दूर की सोच पाया होता... तो अनु और वीर दोनों... (रुक जाता है)

विक्रम - (एक गहरी साँस लेकर) बात अगर हम वीर की छोड़ दें... तो तुम बहुत खुश किस्मत रहे हो... (विश्व, विक्रम की ओर देखता है) हाँ विश्वा... तुम्हारे जिंदगी में... हर रिश्ते की भरपाई हुई है... माँ बाप खो दिए... माँ बाप मिल भी गए... अच्छे मार्गदर्शक मिले... दोस्त मिले... पर मेरे पास सब थे... पास ही थे... पर सब एहसास ज़ज्बात मुर्दा था... रुप के आने के बाद... हर एक रिश्ता जी उठा...

विश्व - कुछ हद तक तुम सही हो... मैंने कभी अपनी किस्मत से कुछ चाहा नहीं... जो भी मिला... दोनों हाथों से बटोर लिया... माँ बाप का चेहरा याद नहीं है... क्यूँकी उनके जगह मैंने हमेशा दीदी को पाया है... बाकी जो भी रिश्ते है... सब के सब उपहार हैं... पर अब किसीको भी खोने से डर रहा हूँ...

विक्रम - क्या अब जो मिल रहा है... वह मेरे लिए उपहार है... क्या मुझे अपनी इस हालत का.... कद्र करना चाहिए... क्या मेरा वर्तमान... मेरा भविष्य है...

जवाब में विश्व चुप रहता है l फिर से दोनों के बीच खामोशी छा जाती है l विक्रम कुछ सोच कर उठ कर जाने लगता है l विश्व उसे पीछे से आवाज देता है

विश्व - विक्रम... (विक्रम रुक जाता है) अभी जो हालात हैं.. वह तुम्हारा वर्तमान है... शायद इसी में तुम्हारा भविष्य हो... जिसे तुम्हें अपने हाथों से संवारना है... मेरी दीदी गलत हो नहीं सकती...

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कमरे में वैदेही रात के खाने की तैयारी कर रही थी l गौरी कुछ चिंतित अवस्था में कमरे में आती है और एक कोने में जाकर कुर्सी पर बैठ जाती है l उसका सिर झुका हुआ था पर लग रहा था किसी गहरी सोच में खोयी हुई है l उसकी यह हालत देख कर वैदेही पूछती है l

वैदेही - क्या हुआ काकी... क्या हो गया... बड़ी गहरी सोच में डूबी हुई हो...

गौरी अपना सिर उठा कर वैदेही की ओर देखती है और हल्की सी मुस्कान चेहरे पर लाने की कोशिश करती है, पर उसका चेहरा उसका साथ नहीं दे रहा था l वैदेही अपना काम छोड़ कर उसके पास आती है l

वैदेही - क्या हुआ काकी... तुम किस बात पर परेशान हो...

गौरी - नहीं... नहीं तो...

वैदेही - देखो काकी... कुछ तो हुआ है... तुम कभी झूठ बोल पाई हो भला... हाँ तुम अगर बताना ना चाहो तो...

गौरी - नहीं... मैं तुम से कोई भी बात छुपाना नहीं चाहती... पर कैसे कहूँ... यह मैं समझ नहीं पा रही हूँ...

वैदेही - क्या बात बहुत गंभीर है...

गौरी - हाँ...

वैदेही - क्या मुझसे... या विशु से जुड़ी हुई है...

गौरी - हाँ भी और नहीं भी...

वैदेही - ओ हो काकी... बात की जलेबी मत बनाओ... सीधा सीधा कहो... बात क्या है...

गौरी - वह... आज महल में... एक तांत्रिक आया है...

वैदेही - तो... राजा तंतर मंतर कर बचने की कोशिश करेगा क्या...

गौरी - आज से सोलह सत्रह साल पहले... ऐसे ही एक तांत्रिक महल में आया था...

वैदेही - (चुप रहती है)

गौरी - उसके बाद... तेरी खोज शुरु हुई थी... (वैदेही की भौंहे सिकुड़ जाती हैं) हाँ... वैदेही... लगता है... कोई रश्म दोहराया जाएगा... गाँव में किसी ना किसी को उठाया जाएगा....

वैदेही - क्या बकवास कर रही हो काकी... राजा अभी नजर बंद है... ऐसे में...

गौरी - अगर राजा ने उसे बुलाया है... तो यकीनन... उसने आगे क्या करना है... कब करना है... सब सोच रखा होगा...

वैदेही - यह कैसा या कौनसा रश्म होगा काकी... जिसके लिए उसे किसी लड़की की जरूरत होगी... मेरे बाद तो वह रास्ता बंद हो गया था ना...

गौरी - यही तो मैं समझ नहीं पा रही हूँ... मुझे लगा था... तेरे साथ... तेरे बाद यह रश्म सब ख़तम हो गया था.... पर उस तांत्रिक का इस वक़्त यहाँ होना... मुझे आनेवाली किसी खतरे की आहट सुनाई दे रही है... बीच बीच में लड़कियाँ उठा ली जाती थी... या बाहर से उठाई गई लड़कियाँ लाई जा रही थी... पर वह सब भी... बहुत दिनों से बंद था.... अब तांत्रिक का यहाँ पर होने से... कहीं वह सब दोबारा शुरु ना हो जाए...

वैदेही - घबराओ मत काकी... राजा ने इस बार ऐसा कुछ किया तो... लोग पलटवार करेंगे...

गौरी - तेरे कहने का मतलब क्या है... राजा अगर गाँव में से किसीको उठा ले जाएगा... तो... तूने राजा के बेटे को कहीं इसी बात की ज़मानत की तरह रोका है...

वैदेही - नहीं काकी... तुमने ऐसा सोच कैसे लिया... विक्रम को उस वक़्त एक आश और आसरा की जरूरत थी... देने के लिए मेरे पास एक आसरा था... सो मैंने दे दी...

गौरी - मुझसे भूल हो गई तुझे समझने में... पर मुझे लगता है... कभी ना कभी... एक बहुत बड़ा हादसा होने वाला है... कहीं वह काली इतिहास खुद को दोहरा ना दे... पता नहीं इस बार... किस के घर की... लौ बुझ जाएगी...

वैदेही - नहीं काकी... ऐसा कुछ नहीं होगा... तब गाँव वाले मजबूर थे... डरते थे... पर अब अगर राजा ने ऐसी कोई जुर्रत की... तो गाँव वाले उसे सटीक जवाब देंगे... वैसे भी... अब राजा वह शेर है... जिसके मुहँ में ना दांत है... ना पंजे में नाखुन...

गौरी - फिर भी... वह है तो शैतान... अपनी शैतानी से बाज कैसे आएगा...

वैदेही - काकी... विशु कह रहा था... एक दो दिन में... राजा की गिरफ्तारी होने वाली है... उसके बाद तो जैल में सड़ेगा...

गौरी - फिर भी... डरना तो चाहिए... यह कानूनी खेल में... बड़े बड़े मछली छूट जाते हैं... जब कि छोटी मछलियाँ फंस जाते हैं...

वैदेही - ओह ओ काकी... तुम घबराओ मत... मैं और विशु... राजा भैरव के हर वार के लिए तैयार हैं... कम से कम... मेरे होते हुए... इस गाँव में वह इतिहास तो कोई नहीं दोहरा सकता...

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नागेंद्र बिस्तर पर लेता हुआ है l उसका स्वस्थ्य दिन व दिन गिरता जा रहा है l सुषमा नहीं है इसलिए नागेंद्र का खयाल रुप रख रही है l अपनी कुछ नौकरानियों के साथ l इस वक़्त रुप सेबती के साथ मिलकर नागेंद्र को खिलाने के बाद मुहँ और चेहरा साफ कर रही थी l एक और नौकरानी अंदर आती है l

नौकरानी - राजकुमारी जी... राजा साहब ने एक संदेश भेजा है...

रुप - कैसी संदेश...

नौकरानी - राजा साहब अभी इसी कमरे में आना चाहते हैं... उनके साथ एक बाबा हैं... वे बड़े राजा जी को देखने आये हैं और कुछ बातेँ करना चाहते हैं... आपको इसी वक़्त अंतर्महल जाने के लिए कहा है...

रुप - (कुछ सोचने लगती है) ठीक है...

वह सेबती को अपने साथ लेकर वहाँ से चली जाती है l उनके जाते ही भैरव सिंह एक तांत्रिक के साथ प्रवेश करता है l तांत्रिक को देखते ही नागेंद्र के आँखों में चमक आ जाती है l

तांत्रिक - कैसे हो राजा... ओ... बड़े राजा...

अपने टेढ़े थोबड़े को हिला कर पास पड़े कुर्सी पर बैठने के लिए इशारा करता है l तांत्रिक मुस्कराते हुए बैठ जाता है l नागेंद्र भैरव सिंह को इशारे से कुछ पूछता है, पर जवाब तांत्रिक देता है l

तांत्रिक - कुछ दिन पहले ही मुझे खबर भिजवाई थी... तब शायद छोटे राजकुमार जैल में थे... पर हम कुछ कारणों के चलते आ नहीं पाए... सब जानकर दुख हुआ... हाँ देर तो हो गई है... पर इतनी भी नहीं हुई के हम सब ठीक ना कर सकें...

यह सुन कर नागेंद्र हँसने लगता है l उसका चेहरा और भी भद्दा नजर आ रहा था l जब लार बहने लगती है तो भैरव सिंह पास पड़े एक ग़मछा को उठा कर नागेंद्र के तरफ बढ़ा देता है l नागेंद्र बड़ी मुश्किल से ग़मछा थामता है और अपना मुहँ पोंछने लगता है l तांत्रिक यह सब देख कर हँसते हुए कहता है l

तांत्रिक - हा हा हा... चलो अच्छा है... आप दोनों में अहंकार जश का तस है... अच्छी बात है... (भैरव से) तो राजा साहब... कहिये... क्यूँ याद किया और क्या चाहते हैं...

भैरव सिंह - एक अभिशाप से मुक्ति... बड़े राजा जी की हालत तो देख ही रहे हैं... छोटे छोड़ कर राजकुमार जी के साथ चले गए हैं... क्षेत्रपाल का रौब... रुतबा सब... ख़तम हो गया है... उसे वापस हासिल करना है... बरसों पहले.... ऐसी ही हालत थी... एक रस्म अदायगी हुई... फिर हम और ताकतवर बन कर उभरें... अब फिर से वही ताकत और हैसियत हासिल करनी है... पर कैसे... क्या उसी रस्म को दोहराना है... या कुछ और करना है...

तांत्रिक - राजा साहब... जब आपका विरासत संभालने के लिये... आपका वारिस ही छोड़ चला गया हो... फिर किसके लिए आप अपनी विरासत को समेटना चाहते हैं...

तांत्रिक - किसी रंडी को क्षेत्रपाल पर हावी होते... देख नहीं सकते... बड़े राजा जी से एक वादा किया है... वह अभी अधूरा है... उसे छोड़ नहीं सकते...

तांत्रिक - शाबाश.... आप सच में एक जुनूनी शख्स हैं... पर जब वारिस ही नहीं साथ में... फिर किस बात पर मोह...

भैरव - हमें... मसलने में... कुचलने में... रौंदने में जो सुकून मिलता है... हम उसे छोड़ नहीं सकते... जो गलतियां हुईं हमसे... उन्हें भुलाना चाहते हैं... फिर से नया इतिहास लिखना... बनाना चाहते हैं...

तांत्रिक - हा हा हा हा... शाबाश... राजा... आप एक शैतान हो... जो इंसानी खाल में बस कर भगवान के कुर्सी पर बैठना चाहता है... शाबाश...

भैरव सिंह - हाँ इसके लिए जो भी मंत्र का जाप हो करें... अपनी मंत्र सिद्धि से... हमारे रिष्ट खंडन करें...

तांत्रिक - इस बार तुम गलत हो राजा... हमें मंत्रों पर सिद्धि प्राप्त नहीं है... तंत्रों पर सिद्धि प्राप्त है... मंत्र सात्विक वालों के लिए होती है... हम तांत्रिक हैं... तामसिक सिद्धियों के लिए तंत्र साधना करते हैं... हमारी वृत्ति... प्रवृत्ति... आचरण... और संलिप्ती... पूर्णतः तामसिक होती है...

भैरव सिंह - तो वही सही... पर कीजिए कुछ... जैसा आपने सोलह साल पहले करवाया था...

तांत्रिक - वह बहुत ही वीभत्स था... पर सुना है... वह लड़की रंग महल से भाग गई थी... और उससे कोई बच्चा भी नहीं हुआ था...

भैरव सिंह - हाँ... अगर उससे कोई बच्चा हुआ होता... तो आपकी आवश्यकता यहां नहीं होती... हमें कल तक शायद गिरफ्तार कर लिया जाए... इसलिए रास्ता बताएं...

तांत्रिक - हाँ... यह बात भी सही कही... ठीक है... मेरे लिए एक दरी बिछा दो...

भैरव सिंह कमरे की एक बेल बजाता है l थोड़ी देर बाद भीमा भागते हुए आता है l भैरव सिंह उसे कमरे के बीचों-बीच फर्श पर एक दरी बिछाने के लिए कहता है l भीमा एक दरी बिछा देता है और एक कोने में जाकर खड़ा हो जाता है l तांत्रिक अपने थैले से एक कला कपड़ा निकाल कर दरी पर बिछा देता है l उस पर सफेद पाउडर से एक शैतानी यंत्र की चित्र बनाता है l उस पर कुछ कौड़ी शंख निकाल कर फेंकता है l कुछ गणना करने के बाद l

तांत्रिक - राजा... दो रास्ते हैं... तुम अपनी गरिमा वापस पा सकते हो... पर

भैरव सिंह - पर क्या...

तांत्रिक - तुमने अपने वारिसों को अपने जैसा नहीं बनाया... यही तुम्हारी सबसे बड़ी भूल है... पर एक मौका है... मेरी गणना बता रही है... तुम्हारे वंश में... एक उत्तराधिकारी आ रहा है... उसका जन्म अगर इसी महल में हो... तो उसका भाग्य तुम्हारे जीवन में... तुम्हारे सभी गरिमाओं को वापस ला सकता है... फिर तुम्हें उसकी परवरिश इसी महल के मध्य करना होगा... यह एक आसान तरीका है... और एक मुश्किल तरीका भी है... पर दोनों तरीकों के लिए... तुम्हें बाहर आना होगा... और इसी महल में रहकर हर एक कार्य को अंजाम देना होगा.... (भैरव सिंह कुछ सोच में पड़ जाता है) क्या सोचने लगे राजा...

भैरव सिंह - हो सकता है... हमारी गिरफ्तारी पर ज़मानत ना मिले... तो क्या जैल के भीतर से कुछ संभव हो सकता है...

तांत्रिक - नहीं राजा... तुम्हें इसी महल में आना होगा... तुम कैसे इस महल में वापस आओगे... यह तुम पर निर्भर है...

भैरव सिंह - ठीक है... दूसरा रास्ता...

तांत्रिक - क्यूँ... पहले तरीके में क्या असुविधा है...

भैरव सिंह - हम छह माह तक प्रतीक्षा नहीं कर सकते...

तांत्रिक - दूसरा तरीका वही है... जो सोलह वर्ष पूर्व बड़े राजा ने... रंग महल में किया था...

भैरव सिंह - उसकी कोई वज़ह...

तांत्रिक - हाँ... तुमको... एक राक्षसी विवाह करना होगा...

भैरव सिंह - यह राक्षसी विवाह क्या है...

तांत्रिक - विवाह अनेकों प्रकार के होते हैं... देव विवाह... मानव विवाह... गंधर्व विवाह और आसुरीक या राक्षसी विवाह... देव विवाह में दो समाज... दो प्रांत.. दो क्षेत्र में शांति व सौहार्द स्थापित करता है... मानव विवाह... दो परिवारों को जोड़ता है... गंधर्व विवाह... दो प्राणों को जोड़ता है... पर इन सबके विपरित राक्षसी विवाह होता है... इसमें पहले बलात्कार और अनिच्छा जोर जबरदस्ती विवाह किया जाता है.... पर...

भैरव सिंह - पर क्या...

तांत्रिक - वह लड़की तुम्हारे रंग महल में नहीं है... ना ही उससे कोई संतान है...

भैरव सिंह - तो क्या हुआ... बलात्कार तो किसी से भी हो सकता है...

तांत्रिक - नहीं राजा.. तुम्हारे परिवार में... सिर्फ और सिर्फ पाईकराय परिवार की औरतों के साथ ऐसा क्यूँ होता था... ताकि यह रस्म... सदेव जिंदा रह सके...

भैरव सिंह - इसका मतलब मुझे वह लड़की ढूंढनी होगी... जिसकी माँ के साथ...

तांत्रिक - हाँ राजा... अब तुम सही समझे... (तांत्रिक अब अपना सामान समेटने लगता है, फिर उसके बाद उठता है) ध्यान रहे... यह सब करने के लिए... तुम्हें इसी महल में आना होगा... तुम कुटिल हो... आ सकते हो.... जब किसी लड़की को उठा लाओ तो खबर करना... मैं तुरंत आ जाऊँगा...

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उदय भाग रहा था, यशपुर के गालियों में वह भाग रहा था l उसके पीछे विश्व के चार दोस्त लगे हुए थे l उदय भागते भागते एक घर के बागीचे में घुस जाता है और उस बागीचे के बीचों-बीच एक पत्थर था जिसके ऊपर हांफते हुए बैठ जाता है और अपनी साँसे दुरुस्त करने लगता है l सीलु मिलु जिलु और टीलु भी उसे घेरते हुए हांफ रहे थे l वे लोग भी घास पर बैठ कर अपनी साँसे दुरुस्त करने लगते हैं l सीलु अपना फोन निकाल कर विश्व को फोन पर इन्फॉर्म कर देता है l थोड़ी देर बाद विश्व वहाँ पर पहुँच जाता है l तब तक पाँचों अपना साँस दुरुस्त कर चुके थे l विश्व देखता है उदय बगीचे के बीचों-बीच एक पत्थर पर बैठा हुआ है और उसे चारों तरफ घेर कर उसके दोस्त बैठे हुए थे l

सीलु - भाई बहुत दौड़ाया है... इस कमबख्त ने...

टीलु - पर जब से बैठा हुआ है... बिल्कुल टुबक कर बैठा हुआ है...

विश्व - (उदय से) किसके पास हमें यहाँ लेकर आए हो... कौन है तुम्हारे पीछे.... किसके कहने पर तुम हमें यहाँ तक लेकर आए हो...

उदय - कमाल है... भगा मुझे रहे हो... और बोल रहे हो... मैं तुम लोगों को यहाँ लेकर आया हूँ...

विश्व - देख उदय... ज्यादा स्मार्ट मत बन... मेरा दिमाग फिरा हुआ है... इससे पहले कि कोई उल्टा सीधा करूँ... मेरे सवालों का ठीक ठीक जवाब दे...

उदय - देखो विश्व भाई... माना दिमाग तुम्हारा खूब चलता है... पर मैंने तुम्हें कहीं पर भी फंसाया नहीं... उल्टा मदद ही की है...

विश्व - मैंने तुझे अभी अभी कहा... मेरी खोपड़ी गरम मत कर... सीधी तरीके से बता... तू किसके लिए काम कर रहा है... और जब भाग गया था... वापस किस लिए आया है...

यह सारी बातें तुम मुझसे जान लो... (एक आवाज एक कोने से आती है, विश्व और उसके सारे दोस्त उस आवाज़ की तरफ घूम कर देखते हैं l शूट बूट में एक आदमी खड़ा था) विश्व... उर्फ विश्वा भाई... स्वागत है... आओ कमरे के अंदर चलते हैं... और गिले शिकवे दूर करते हैं...

विश्व उस आदमी को पहचानने की कोशिश कर रहा था l इतने में उदय अपनी जगह से उठ खड़ा होता है और विश्व के करीब आकर कहता है

उदय - यह महोदय नरोत्तम पत्री हैं... इन्हीं की अंतर्गत वह केस है... जिसे इंस्पेक्टर दाशरथी दास एफआईआर नोट कर गृह मंत्रालय और कोर्ट में पेश किया था...

सभी पत्री की पीछे चलते हुए एक कमरे में आते हैं l पत्री सबको बैठने के लिए कहता है l सबके बैठने के बाद पत्री विश्व से पूछता है l

पत्री - हाँ तो विश्व... मेरा नाम और पहचान बताने की अब कोई जरूरत नहीं होगी... फिर भी तुम्हें बताये देता हूँ... मेरा नाम नरोत्तम पत्री है... मैं उस समय यशपुर में आया था... जब तुम जैल में हुआ करते थे... तभी से मैंने भैरव सिंह की टोह लेनी शुरु कर दी थी... तुम जिस केस में घिरे हुए थे... यकीन मानों... उसकी हर गवाह को... भैरव सिंह न्युट्र्लाइज कर चुका है... और वह जिस तरह का काईंया है... तुम समझ सकते हो... तुम्हारा आरटीआई और पीआईएल सिर्फ सुनवाई में ही रह जाता... नतीजे पर कभी नहीं पहुँचता...

विश्व - हाँ समझ सकता हूँ... पर इस में उदय की क्या भूमिका है... वह किसके तरफ है...

पत्री - उदय... वह सबके साथ है... पर वह... रिटायर्ड जैल सुपरिटेंडेंट तापस सेनापति जी तरफ है...

विश्व - क्या... (चौंकता है)

उदय - हाँ... तुम्हें लगता था कि मुझे... रोणा ने तुम्हारे पीछे लगाया था... पर असल में मैं रोणा के नाक के नीचे रह कर... तुम्हारी खैरियत की खबर... सेनापति सर जी को दिया करता था...

विश्व - डैड ने इस बारे में... मुझे कभी भी... कुछ भी नहीं कहा...

पत्री - उन्हें तुम्हारा बहुत खयाल है... या यूँ कहो... तुम्हारे भीतर... प्रतिभा जी की जान बसती है... और तापस जी की... प्रतिभा जी के भीतर... अपनी जान को बचाने के लिए... उन्होंने ही... अपने तरीके से... तुम्हारे लिए... यह सब किया है...

सीलु - वाव... सेनापति जी तो छुपे रूस्तम निकले...

पत्री - हाँ विश्व... तुम्हारे सगे पिता तो नहीं हैं... पर अपनी जीवन की पूरी अनुभूति और कोशिश झोंक दी... हवाओं के रुख को तुम्हारे तरफ मोड़ने के लिए...

विश्व - वह सब ठीक है... मुझे यह बताइए... इस मुलाकात के पीछे... आपका क्या प्लान है... और यह मुलाकात... इस टेंपोररी शेड में क्यूँ कर रहे हैं...

पत्री - वाव... तुमने अच्छा गेस किया... यह एक एक्सटेंशन नुमा कमरा... जिसके अंदर हम बैठे हुए हैं... कल ही बनाया गया है... और तुम लोगों के जाते ही... तोड़ दिया जाएगा...

विश्व - वज़ह...

पत्री - हम सब अभी भी... अंडर सर्विलांस में हैं... भैरव सिंह नजर बंद बेशक है... पर उसके वफादार अभी भी... कुत्तों की तरह सूंघते हुए... हमारी हरकतों के बारे में जानने के लिए... घूम रहे होंगे...

विश्व - वह सब आप ऑन ऑफिशियल लोगों की बात कर रहे हैं... मुझे यह भी एहसास है... सिस्टम में... भैरव सिंह के चट्टे बट्टे हैं...

पत्री - हाँ इसीलिए तुमको यहाँ बुलाया है... इस केस के बाबत...

विश्व - जी कहिये...

पत्री - मैंने हर एक गाँव वालों की गवाही ली... और उसके बाद उनसे तुम्हारे नाम की वकालत नामा में दस्तखत भी ले लिए...

विश्व - क्या...

पत्री - हाँ... अब इस केस को... गाँव वालों की तरफ़ से तुम लड़ने जा रहे हो...

विश्व - क्या... मैं गाँव वालों का केस लड़ुंगा... और मुझे मालूम नहीं है...

पत्री - ना... अब तुम मुझे हैरान कर रहे हो... मुझे लगता है... तुम्हें कमिश्नरेट में... सुभाष सतपती कह चुका है...

विश्व - मतलब... भैरव सिंह के खिलाफ इतना बड़ा नेक्सस बना है...

पत्री - और इस नेक्सस में... चाहे अनचाहे तुम भी अब शामिल हो...

विश्व - (कुछ देर चुप रहता है) भैरव सिंह गिरफ्तार कब होगा...

पत्री - कल... कल ही होगा...

विश्व - (एक गहरी साँस छोड़ते हुए) पत्री साहब... यह केस जिस तरह से बाहर आई है... इसके लिए जिस तरह की सबूत और गवाह चाहिए... मैंने उस पर कोई एक्सरसाइज नहीं की है...

पत्री - कोई मसला नहीं है... अभी कुछ खास गवाहों से मिलवा देता हूँ.... (पीछे मुड़ कर आवाज देता है) आ जाओ अंदर सब... (कुछ लोग अंदर आते हैं, उनमें से एक आदमी को देख कर विश्व चौंकता है और अपनी जगह से उठ खड़ा होता है, पत्री उसीके तरफ इशारा करते हुए) इन्हें तुम जानते तो नहीं हो... पर इनसे तुम्हारी मुलाकात हुई ज़रूर है... (विश्व को वह आदमी हैलो कहता है)

विश्व - हाँ... शायद बस में... आप ही थे... जो मुझे इस केस की डिटेल्स की लीड दे रहे थे...

आदमी - हाँ उस बस में... मैं ही आपका को - ट्रैवलर था... पर वह हमारी दूसरी मुलाकात थी... (कह कर अपना हाथ आगे करता है)

विश्व - (उससे हाथ मिलाता है) तो पहली मुलाकात... कब हुई थी...

आदमी - जिस दिन आप यशपुर में पहली बार बस से उतरे थे... एक मील की पत्थर पर... किसी ने यश पुर को... यम पुर लिखा था..... आप उसे मिटा कर यश पुर लिखे थे...

विश्व - हाँ हाँ... अब याद आया...

आदमी - उस दिन के बाद... मैंने पत्री सर जी से बात की... तब उन्होंने मुझे इंतजार करने के लिए कहा था... तुमने जैस ही पीआईएल दाखिल की.. उसके बाद मैंने... अखबार के जरिए... पहेली भेज कर... लीड देने की ठानी...

विश्व - आप सीधे सीधे मुलाकात करने की कोशिश क्यूँ नहीं की...

आदमी - मैंने मौत को बहुत ही करीब से देखा है... तुम शायद यकीन करो... मैं... नभवाणी न्यूज चैनल के.. रिपोर्टर प्रवीण रथ और उसकी बीवी के हत्या का चश्मदीद गवाह हूँ... (विश्व और उसके दोस्तों के मुहँ हैरानी के मारे खुल जाते हैं) हाँ विश्व बाबु... मैं ही हूँ... प्रवीण रथ की हत्या का चश्मदीद गवाह.... और अब की बार जो... आर्थिक कांड हुआ है... उसका भी मैं प्रामाणिक गवाह हूँ...

विश्व - मतलब... आप अब तक छुप कर थे... सामने अब क्यूँ आए हैं...

आदमी - अगर भैरव सिंह नजर बंद ना होता... तो हम लोग भी अभी न्युट्र्लाइज हो चुके होते... जिस तरह रुप फाउंडेशन केस में हुआ था...

विश्व - ओह... फिर भी... उसके आदमी आप लोगों को ढूंढ रहे होंगे...

आदमी - हाँ... हमने भी वही तरीका अपनाया... जो आपके केस में... श्रीधर परीड़ा ने किया... होली के बाद हम... अंडरग्राउंड हो गए...

पत्री - तो विश्व... यकीन मानों... इनकी गवाही... तुम्हें तुम्हारी मंजिल तक पहुँचा सकती है...

विश्व - (आदमी से) क्या मैं आपका नाम जान सकता हूँ...

आदमी - मेरा नाम सुधांशु मिश्रा है... मैं रेवेन्यू इंस्पेक्टर हूँ...

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पुलिस की वैन के साथ साथ कुछ जीप आकर क्षेत्रपाल महल के परिसर में रुकती हैं l एक गाड़ी से पत्री और कुछ लोग हाथों में फाइल लिए उतरते हैं l पुलिस की जीप से दास अपने सिपाहियों के साथ उतरता है l सब एक साथ महल के अंदर जाते हैं l महल के दीवान ए आम में बीचों-बीच एक सिंहासन पर भैरव सिंह बड़े रौब के साथ बैठा हुआ था l सभी आकर सिंहासन के सामने खड़े हो जाते हैं l भैरव सिंह अपना बायाँ पैर मोड़ कर दाहिने पैर पर रखता है l

भैरव सिंह - (पत्री से) कहिए... यश पुर के... पूर्व तहसीलदार... कैसे आना हुआ...

पत्री - हमने अदालत से वारंट निकलवा ली है... आज... अभी आपको हमारे साथ जाना होगा... कल आपकी... अदालत में पेशगी होगी...

भैरव सिंह - हा हा हा हा... तो.. मौका मिलते ही... तुमने अपना बदला ले लिया...

पत्री - यह कोई निजी मामला नहीं है... और बदला.. निजी मामला होता है... हम सरकारी मुलाजिम हैं... हमारी ईमानदारी... बेइमानों पर भारी पड़ती है...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... यह पल हमें याद रहेगा...

पत्री - जी जरूर... सिर्फ आपको नहीं... हम उस इंसान को याद रहेगा... जिन्हें भगवान पर भरोसा होगा...

भैरव सिंह अपनी सिंहासन से उठता है और पत्री के सामने आता है आपने दोनों हाथ आगे बढ़ा देता है l दास हथकड़ी निकालता है तो पत्री उसे इशारे से हथकड़ी डालने के लिए कहता है l जैसे ही दास हथकड़ी डाल देता है, पत्री देखता है भैरव सिंह के चेहरे की पेशियां थर्राने लगते हैं l आँखों में खुन उतर आता है, अंगारों की तरह दहकने लगते हैं l

भैरव सिंह - भीमा... (भीमा भागते हुए आता है)

भीमा - हुकुम...

भैरव सिंह - बस हफ्ते दस दिन की बात है... तब तक... अपने सारे पट्ठों से वहीँ पर पहरेदारी करना... जहां पर यह पुलिस वाले कर रहे थे...

भीमा - जी हुकुम...

भैरव सिंह - और ध्यान रहे... तुम लोगों से सिर्फ... सेबती ही बात करेगी... डॉक्टरों और नर्सों को छोड़ कोई भी... महल के अंदर ना जा पाए...

भीमा - जी हुकुम...

भैरव सिंह - पत्री बाबु चलें...

पत्री - (दास से) चलो इन्हें गाड़ी में बिठा कर ले जाओ...

भैरव सिंह - पत्री बाबु... एक अनुरोध है....

पत्री - (हैरान हो कर) अनुरोध...

भैरव सिंह - हाँ पत्री बाबु.... (अपना हाथ दिखाते हुए) शेर जब जंजीरों से जकड़ा हुआ हो... अनुरोध ही कर सकता है...

पत्री - जी कहिये....

भैरव सिंह - इंस्पेक्टर दास से कहिये... हमें महल से गाड़ी से नहीं... पैदल ही लेकर चले...

पत्री - यह आप क्या कह रहे हैं...

भैरव सिंह - हाँ पत्री बाबु... हम उन बस्तियों से आज पैदल ही गुजरना चाहते हैं... जिन पर कभी... हुकूमत किया करते थे...

पत्री और दास एक दूसरे को हैरान हो कर देखते हैं l

पत्री - यह आप क्या कह रहे हैं राजा साहब... आप इस हालत में... लोगों के बीच में जाएंगे...

भैरव सिंह - हाँ पत्री बाबु... हम इन्हीं हथकड़ीयों जकड़े हुए... लोगों के बीच से होते हुए.... जाना चाहते हैं...

पत्री - नहीं... हम ऐसा नहीं कर सकते....

भैरव सिंह - देखो पत्री बाबु... हम अपनी मर्जी से... आपका सहयोग करना चाहते हैं... अगर आप हमारी अनुरोध को दर किनार करेंगे... तो आपको बहुत मुश्किल होगा... हमें यहाँ से ले जाते हुए....

पत्री - कुछ भी हो... हम आपको पैदल नहीं ले जा सकते...

तभी एक सिपाही दौड़ते हुए अंदर आता है l दास के कान पर कुछ कहता है l सुनने के बाद दास चौंकता है फिर वह आगे बढ़ कर पत्री के कानों में कुछ कहता है l पत्री भी चौंकता है और हैरानी के मारे भैरव सिंह की ओर देखने लगता है l

भैरव सिंह - पत्री साहब क्या हुआ... आपके गाडियों के टायरों में हवा नहीं है... (पत्री आँखे फाड़ कर भैरव सिंह को देखे जा रहा था) हैरान मत हो... इतनी सेक्योरिटी के बाद भी... टायरों में हवा क्यूँ नहीं है... यह राजगड़ है... और हम क्षेत्रपाल हैं... कुछ हमारे पीठ पीछे हो गया... उस पर इतरा कर... हमें गिरफतार करने आए हो... गिरफ्तारी हमने अपनी मर्जी से दी है... तो जाएंगे भी अपनी मर्जी से... यहाँ हमारी हुकूमत थी... है... और रहेगी...

दास - (पत्री से) सर... यह आदमी अगर अपनी ही बैजती करवाने पर तुला हुआ है... हम क्यूँ परेशान हों... हमें अदालत में इसे पेश करने के लिए हुकुम है... वही करते हैं ना... अगर अल्टरनेट अरेंजमेंट के लिए जाएंगे... वक़्त बर्बाद होगा...

पत्री - ठीक है राजा साहब... जैसी आपकी मर्जी... (सब से) चलो फिर...

सभी महल से निकलते हैं l भैरव सिंह हथकड़ी में महल की सीढ़ियों से उतरने लगता है l साथ में पत्री और कुछ अधिकारी और पुलिस वाले भी चलने लगते हैं l काफिला ऐसा लग रहा था जैसे भैरव सिंह आगे आगे सीना तान कर चल रहा था और सरकारी मुलाजिम व अधिकारी उसके पीछे उसे फॉलो करते हुए जा रहे थे l भैरव सिंह को ऐसे जाते हुए गाँव वाले देख रहे थे, ज्यादातर लोग भैरव सिंह की रौबदार चाल से डर कर छुप रहे थे पर छुप छुप कर देख रहे थे l काफिला मुख्य चौक पर पहुँचाता है l वहाँ पर भी हालत वैसी ही हो जाती है l लोग भैरव सिंह को देख कर दूर जाने लगते हैं पर छुप छुप कर देखने लगते हैं l वैदेही अपनी दुकान से बाहर आती है l वहाँ तक पहुँचने के बाद भैरव सिंह ठिठक जाता है और पत्री की ओर देख कर कहता है

भैरव सिंह - पत्री बाबु... मुझे यहाँ किसी से बात करनी है...

पत्री - किससे...

भैरव सिंह - वैदेही से... सिर्फ पाँच मिनट...

पत्री - ठीक है...

भैरव सिंह आगे बढ़ता है, वैदेही उसे देख कर अपने हाथ कुहनियों में फंसा कर उसके सामने खड़ी हो जाती है l

भैरव सिंह - बहुत खुस होगी आज तु...

वैदेही - हाँ... पर यह खुशी अधूरी है...

भैरव सिंह - तेरा भाई दिख नहीं रहा है....

वैदेही - क्यूँ यह बैजती कम लग रही है क्या...

भैरव सिंह - जानती है... मैं पैदल क्यूँ आया हूँ...

वैदेही - ताकि लोग समझे... के कानून के आगे... ना कोई राजा होता है... ना कोई खास...

भैरव सिंह - नहीं... शेर हमेशा शेर ही होता है... उसका आतंक हमेशा बरकरार रहता है... चाहे खुला हो... यह यूँ जंजीरों में... जरा नजर उठा कर देख... तुझे कोई नहीं दिखेगा... यह जिस छोटी सी जीत पर तुम लोग इतरा रहे हो... वह एक बुलबुला है... बहुत जल्द फूटने वाला है...

वैदेही - नियति तुझे बाँध कर... उन्हीं रास्तों पर चला रही है... जिन रास्तों पर कभी धूल उड़ाते गुजर रहा था... पर नियत नहीं बदली है तेरी... अकड़ और हेकड़ी... वही का वही है...

भैरव सिंह - हा हा हा हा... यह तु जिसे नियति कह रही है... उसे अभी अभी मैंने अपनी हाथों से लिखी है.... तुझसे जितनी भी वादा किया था... इसी चौक पर... वह सारे निभाए हैं मैंने... तूने जितने भी बद्दुआ दिए थे... उनमें से पाँच पूरे हो चुके हैं... और दो को पूरा होने नहीं दूँगा... वादा है मेरा... मैं वापस आऊँगा... और जो तकदीर राजगड़ की थी... जिसे क्षेत्रपाल सैकड़ों सालों पहले लिखे थे... वह मैं फिर से दोहराऊंगा...

वैदेही - अभी से इतना गुमान मत पाल भैरव सिंह... बस इतना याद रख... जब तक तु दायरे में रहेगा... तब तक तु और तेरी सल्तनत महफूज रहेगी... तु दायरा लांघेगा... तो तेरी सल्तनत मिट्टी की ढेर में तब्दील हो जाएगी...

भैरव सिंह - हाँ... यह हुई ना बात... तु जब जब मुझे कुरेदती है... मेरे अंदर का शैतान जाग जाता है... अब तु... तेरा भाई... यह पूरा राजगड़.... मेरी शैतानी देखेगा...
 
थैंक्स लियोन भाई

हाँ वह आएगा और ज़रूर आएगा

अब लड़ाई की शैली बदल जाएगी

वैदेही विश्व को बताये या ना बताये यह वह कांड है जिसे भैरव सिंह ने जान बुझ कर किया है l इसका कारण आपको अगले भाग में मालूम हो जाएगा

हाँ पर यहाँ तांत्रिक का उतना ही रोल था l तांत्रिक की बताये हुए बातों पर भैरव सिंह अमल नहीं कर पाएगा l या यूँ कहूँ के कामयाब नहीं हो पाएगा

लड़की का पता मिल जाएगा, पर जैसे कि मैंने कहा वह कामयाब नहीं हो पाएगा

दूसरा रास्ता ही अपनाने के लिए भैरव सिंह ने तांत्रिक को बुलाया था l

उसका भी वज़ह है

अब कानूनी लड़ाई के साथ साथ

हाथ पैर की भी लड़ाई होगी

कुछ जानें और भी जाएंगे

और अंत में भैरव सिंह अपने अंजाम को पहुँच जाएगा
 
👉एक सौ पचपनवाँ अपडेट

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नागेंद्र का मन बहुत दुखी था, वैसे गिरफ्तारी से पहले उसे भैरव सिंह ने अपनी जाने की बात कह दी थी, पर महल के अंदर पुलिस का पहली बार आना और किसी क्षेत्रपाल को गिरफ्तार कर ले जाना नागेंद्र को अंदर से तोड़ रहा था l रुप बड़ी मशक्कत के साथ नागेंद्र को खाना खिलाने के बाद नागेंद्र को सुला देती है l फोन पर डॉक्टर और उनकी टीम को सारी बातेँ बता कर सुबह आने के लिए कहती है l उसके बाद सेबती को अपने घर जाने के लिए कहती है और सुबह जल्दी आने के लिए हिदायत देती है l सेबती के जाने के बाद रुप फिर से नागेंद्र को देखने के लिए वापस मुड़ती है l देखती है नागेंद्र की आँखें पत्थरा गई है l रुप डर जाती है अपना हाथ नागेंद्र के हाथ पर रख देती है l हाथों की गर्मी महसूस होते ही राहत की साँस लेती है l नागेंद्र के हाथ को हिला कर

रुप - दादाजी... दादाजी.. (नागेंद्र मुर्झाई चेहरे से हैरानगी भरे नजरों से रुप की ओर देखता है, रुप उसके बगल में बैठ जाती है) मैं जानती हूँ... आप अंदर से बिखरा हुआ महसूस कर रहे हैं... पर सच यह भी है... की... आपकी दिल में कोई पछतावा नहीं है... (चेहरे को सख्त करने की नाकाम कोशिश करता है) हाँ दादाजी... आज पहली बार... आपको दादाजी बुला रही हूँ... जानती हूँ... आपकी लाचारी... मेरा कोई विरोध नहीं कर सकती... हाँ अगर राजा साहब होते... तो मैं कभी भी... आपको दादाजी नहीं कह पाती... पर शायद... ऊपर वाले ने मुझे यह मौका दिया है... मेरी तरफ से... इस रिश्ते को आखिरी बार निभाने के लिए.... (नागेंद्र के जबड़े भिंच जाती हैं) इस उम्र तक आते आते... जिस्म... जुबान और दिमाग साथ छोड़ने लगता है... लोग पहचान भी नहीं पाते... पर आपके मामले में... आपका जिस्म और जुबान साथ छोड़ चुका है... बस आपका दिमाग आपके लाचार जिस्म और जुबान को खिंचे जा रहा है... आपको प्रतीक्षा है... जिसने आपको ज़ख़्म दिया है... उसे घुटने पर देखने की... पर वह है कि... आपको दिए ज़ख्मों पर... मिर्च पर मिर्च रगड़ता जा रहा है... (नागेंद्र भड़क जाता है और गुँगुँ की आवाज निकलने लगता है, रुप नागेंद्र के हाथ पर अपना हाथ रख देती है ) हाँ दादाजी... मैं आपकी तकलीफ को समझ पा रही हूँ... (नागेंद्र अपना हाथ हिला कर , रुप की हाथ को हटाने की कोशिश करता है, रुप समझ कर अपना हाथ हटा देती है) आपके भीतर नफ़रत अभी भी कितना भरा हुआ है... (नागेंद्र अपना सिर हिला कर रुप को चले जाने के लिए इशारा करता है) हाँ चली जाऊँगी... पर क्या है कि... आपकी हलक में अटकी जान मुझे इस घर में रोक रखा है... और जानते हैं... वह जिसे आप इस कदर नफरत कर रहे हैं... उसे भी आपकी फिक्र है... वर्ना वह मुझे कब का आप सबकी नजरों के सामने... इस घर से ले जाता... (रुप उठ खड़ी होती है) आप वाकई बहुत तकलीफ में हैं दादाजी... इस उम्र में... इन हालात में... लोग भगवान से मुक्ति माँगते हैं... पर आप... खैर... हो सके तो कभी भगवान को याद कर अपने लिए मुक्ति माँग लीजिए... क्यूँ के आप जीते-जी नर्क ही देख रहे हैं... भोग रहे हैं... मैं आपके लिए ईश्वर से दया माँगुंगी...

इतना कह कर रुप नागेंद्र के कमरे से निकल कर अंतर्महल में अपनी कमरे में आती है l कमरे में आते ही दरवाजे को बंद कर खिड़की की ओर देखते हुए पीठ टिकाए खड़ी रहती है l अचानक उसे एहसास होता है कि कमरे में कोई और भी है l उसकी धड़कने बढ़ने लगती हैं फिर अपनी आँखे मूँद कर गहरी साँस लेती है, उसके होंठों पर एक मुस्कान उभर आती है l

रुप - अनाम...

वार्डरोब के पीछे से निकल कर विश्व उसके सामने खड़ा हो जाता है l रुप भागती हुई विश्व के गले लग जाती है l विश्व भी उसे अपनी बाहों में भर लेता है l कुछ देर यूँ ही एक दूसरे से लिपटे रहने के बाद दोनों एक दूसरे से अलग होते हैं l

रुप - तुम... इस वक़्त...

विश्व - क्यूँ... मेरा यहाँ आना... आपको अच्छा नहीं लगा...

रुप - (विश्व के सीने पर मुक्का मारते हुए) बहुत अच्छा लगा... पर.. मैंने सोचा था कि तुम... इस वक़्त कटक गए होगे..

विश्व - हाँ... जाना तो है... पर... जाने से पहले... एक बार आपसे मिलना चाहता था... बात करना चाहता था...

रुप - तो चलो... आज छत पर जाते हैं... टीम टीमाते आसमान के नीचे... थोड़ा बैठते हैं...

विश्व - छत पर... किसीने देख लिया तो...

रुप - देख लिया तो... हा हा हा... तुम भी ना... (एक गहरी साँस छोड़ कर) कितना बड़ा महल है... पर आज सिर्फ दो जन हैं... एक मैं...

विश्व - और एक बड़े राजा जी... पर जो लोग पहरेदारी में हैं... वे अगर हमें देख लिया तो...

रुप - ओ हो... डर लग रहा है... ह्म्म्म्म... अनाम वे लोग जो पहरेदारी कर रहे हैं... वह क्षेत्रपाल नहीं हैं... नौकर हैं... बुरे भले ही हैं... पर फिर भी... अपनी मर्यादा नहीं लाँघते... यहाँ राजगड़ में सिर्फ क्षेत्रपाल ही मर्यादा में नहीं रहते... राजा साहब ने उन्हें हिदायत दी है... अंतर्महल की ओर वे लोग कभी नहीं आयेंगे...

रुप उसके बाद विश्व की हाथ पकड़ कर खिंचते हुए छत की ओर ले जाती है l छत पर बैठने के लिए एक छोटा सा चबूतरा बना हुआ था जिस पर रुप विश्व को लेकर बैठ जाती है और आसमान की ओर देखने लगती है l विश्व रुप की चेहरे की ओर निहारे जा रहा था l

रुप - अब इतना भी मत देखो... मुझे शर्म आने लगेगी तो अपना चेहरा छुपा लूँगी...

विश्व - (झेंप जाता है और दूसरी ओर देखने लगता है) सॉरी...

रुप - (खिलखिला कर हँस देती है, विश्व के दोनों हाथों को लेकर अपने चेहरे पर रख देती है) बेवक़ूफ़... मैं तो मज़ाक कर रही थी... तुम्हारा निहारना मुझे बहुत अच्छा लगता है... एक तुम ही तो हो... जब मुझे देखते हो... तो मुझे अपने खूबसूरत होने का एहसास होता है... और जानते हो... यह एहसास मुझे अंदर ही अंदर कितना प्यारा लगता है... उफ... मैं शब्दों में बयान ही नहीं कर सकती... तुम जब मुझे प्यार से देखते हो... मुझे एहसास होता है... के तुम्हारी हूँ... तुम्हारी ही हूँ... (विश्व भावुक हो कर रुप को अपनी ओर खिंच कर सीने से लगा लेता है) ऐ... क्या हुआ... ऐसा लगता है... तुम्हारे मन में कोई गिल्ट है... (अलग हो कर) कहो... क्या बात है...

विश्व - दो बातों का गिल्ट है... एक आप पर पहली बार किसीने हाथ छोड़ा... दुसरी... मैं वीर और अनु के प्यार को बचा नहीं पाया...

रुप - (विश्व की हाथ को लेकर अपने गाल पर रख कर गाल को रगड़ने लगती है) किसीने नहीं... राजा साहब ने... मैं चाहूँ या ना चाहूँ... वे मेरे बायोलॉजिकल पिता हैं... पहली और आखिरी बार... उन्होंने मुझ पर हाथ उठा कर... अपना हक निभाया... और रही वीर भैया और अनु भाभी की... तो वे दोनों सच्चे प्रेमी हैं... वे फिर से आयेंगे.. देख लेना... अपने अधूरे प्यार की परवान चढ़ाने... फिर से आयेंगे...

विश्व - इतना यकीन है...

रुप - हाँ... है... उन पर भी और प्यार पर भी है... प्यार की ताकत क्या होती है... मैं जानती हूँ... समझती हूँ...

विश्व इसबार अपने दोनों हाथों से रुप का चेहरा थाम लेता है और आगे बढ़ कर उसकी माथे पर चुम्मी लेता है l रुप विश्व की दोनों हाथों पर अपना हाथ रख लेती है और विश्व की हाथों को हटाने नहीं देती l

रुप - क्या ...यही दो बातेँ करने के लिए तुम यहाँ आए थे...

विश्व - नहीं... बातेँ तो बहुत है... पर आपको देख कर भूल गया हूँ...

रुप - झूठे कहीं के...

विश्व - सच...

रुप - चलो मान लेती हूँ...

विश्व - एक बात कहूँ...

रुप - हूँ हूँ...

विश्व - आप बहुत खूबसूरत हो..

रुप - हम्म्म... अच्छा... पर यह तो मैं जानती हूँ...

विश्व - (इस बार रुप को अपने पास खिंचता है और अपनी आँखों से रुप की आँखों में झाँकता है) आई लव यू...

रुप - आई लव यू ठु... अनाम... आज तुम इतने इमोशनल क्यूँ हो...

विश्व - पता नहीं... या फिर... शायद इसलिए कि मैं... कल राजा साहब के खिलाफ... कोर्ट में पैरवी करूँगा...

रुप - यही तो तुम्हारा लक्ष था ना...

विश्व - हाँ था... पर पता नहीं क्यूँ... मुझे लगा... एक बार आपसे बात कर ली जाए...

रुप - अनाम... (विश्व के सीने से लग कर) मैं हर हाल में... हर मोड़ पर... तुम्हारे साथ थी... हूँ... और रहूँगी...

विश्व - आपको बुरा नहीं लगेगा...

रुप - हरगिज नहीं... वह मेरा क्या... किसीका भी पिता बनने लायक नहीं है... पता नहीं मेरे पुरखों ने कौन-से पाप किए... पर यह जो राजा साहब है.. यह मेरी माँ का कातिल है... मेरे भाई वीर और अनु भाभी का कातिल है... जब यह आदमी अपनी ही खून को नहीं बक्सा हो.... वह किसी और को क्या बक्सा होगा... तुम जब भी उसके आँखों में देखो... तो वैदेही दीदी को याद करना... फिर उस पर तोहमत लगाना... उसे सजा दिलाने की कोशिश करना...

विश्व - पर मुझे लगता है... राजा साहब... ज्यादा दिन तक सलाखों के पीछे रहेंगे नहीं...

रुप - तब भी तुम वही करना... जो माँ से वादा किया है... राजा सहाब की हर राह में... कानून की कीलें बिछा देना...

कुछ देर के लिए दोनों के बीच चुप्पी छा जाती है l दोनों एक दूसरे के बाहों में ऐसे ही खोए हुए थे l फिर विश्व रुप को अलग करता है l

विश्व - अब मुझे चलना होगा...

रुप - हूँ...

रुप उठती है और विश्व की हाथ पकड़ कर छत से उतरती है और अपने कमरे में आती है l विश्व खिड़की की ओर जाता है और पीछे मुड़ कर देखता है l रुप फिर से उसके गले लग जाती है l

विश्व - मैं जाऊँ...

रुप - (अलग हो कर) जानते हो.. मैं तुम्हें छत पर क्यूँ लेकर गई थी... (विश्व सिर हिला कर ना कहता है) एक तमन्ना थी... तुम्हारे साथ इसी महल के छत पर... बैठ कर आसमान को निहारूं... आज वह तमन्ना भी पूरी हो गई... क्यूँ की मैं जानती हूँ.. इस महल में... ऐसी रात... ऐसी साथ... दुबारा फिर कभी नहीं नहीं आएगी...

विश्व - हम बहुत जल्द अपनी दुनिया बरसाएंगे... जहां ऐसी रात और ऐसी साथ... हरदम अपना ही होगा... वैसे एक बात पूछूं...

रुप - हूँ हूँ... पूछो...

विश्व - आप जब भी मेरे सीने से लगती हो... बड़ी जोर से लगती हो...

रुप - वह इसलिए के तुम्हारा जो धड़कन है... इसमें मुझे सिर्फ और सिर्फ मेरा नाम सुनाई देता है... और मत भूलो... तुम्हारे जिस्म के खुशबु में... एक नशा सा है... जो सिर्फ और सिर्फ मेरे लिए है...

विश्व - आज आपको हो क्या गया है...

रुप - अब मुझसे... इस महल में रहा नहीं जाता...

विश्व - तो ठीक है... अगली बार जब आऊंगा... अपने साथ आपको ले जाऊँगा...

रुप - जाना तो है... पर...

विश्व - पर क्या...

रुप - आई विश... बड़े राजा जी चले जाएं... तब इस महल के ... मेरा हर रिश्ते से आजादी मिल जाएगी...

विश्व - यानी... जब तक... वह... बड़ा राजा मरेगा नहीं.. तब तक...

रुप - मैंने कहा ना... आई विश... भगवान से मै राज प्रार्थना करती हूँ... उन्हें ले जाने के लिए...

विश्व - आप सच्चे मन से प्रार्थना कर रही हैं... तो बड़े राजा को... इस नर्क से बहुत जल्द मुक्ति मिल जाएगी...

रुप - ह्म्म्म्म...

विश्व - अच्छा... अब मैं चलूँ...

रुप - ह्म्म्म्म...

विश्व - चलूँ...

रुप - बाय..

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अगले दिन सुबह, विश्व का अपना पुराना घर जिसमें अब विक्रम, शुभ्रा, पिनाक और सुषमा रह रहे हैं l इन कुछ दिनों में पिनाक बीमार रहने लगा है l वह एक कमरे में बिस्तर पकड़ लिया है l सुषमा भी मुर्झा सी गई है वह बिस्तर के पास बैठ कर पिनाक की सेवा में लगी हुई है l विक्रम घर के अंदर इधर उधर हो रहा था, उसको कुछ समझ में नहीं आ रहा था, क्यूँकी वैदेही किसी ना किसी के हाथ में बराबर खाना भिजवा रही थी l पर चूँकि करने के लिए कोई काम नहीं था, ऊपर से उसे दुनिया जहां की खबर हो नहीं रही थी, भैरव सिंह को गिरफतार कर शायद कटक भेज दिया गया था, पर उसे सब ख़बरें या तो टीलु से या फिर वैदेही से पता चल रहा था, इसलिए विक्रम अपने आप पर खीज रहा था l शुभ्रा यह सब देख रही थी पर वह भी लाचार थी l विक्रम चिढ़ते हुए कमरे से निकल कर बाहर बरामदे पर बैठ जाता है l पीछे पीछे शुभ्रा भी आती है और बगल में बैठ जाती है l

शुभ्रा - (विक्रम के कंधे पर हाथ रखकर) मैं समझ सकती हूँ... आप खाली बैठना नहीं चाहते... कुछ करना चाह रहे हैं... पर क्या करें... समझ नहीं पा रहे हैं... हैं ना...

विक्रम - हाँ शुब्बु... मैंने कहा था... तुमको रानी की तरह रखूँगा... पर... (जबड़े सख्त हो जाते हैं और मुट्ठीयाँ भींच लेता है) तुम लोगों की हालत... देखी नहीं जा रही है...

शुभ्रा - मैं ठीक हुँ... आपके साथ हूँ... आप मेरे पास हो... मुझे कुछ नहीं चाहिए...

विक्रम - तुम बहुत अच्छी हो... तुम कैसे मेरी किस्मत में आ गई... सिवाय दुख के... क्या हासिल हुआ तुम्हें...

शुभ्रा - मुझे आप हासिल हुए... क्या यह कम है...

विक्रम - जानती हो... मैं कुछ समझ नहीं पा रहा... कुछ करना चाह रहा हूँ... मगर क्या करूँ... यह मेरी लाचारी है... या बेबसी है... जिंदगी के कौनसी मोड़ पर आ खड़ा हूँ... सामने कोई राह... दिख ही नहीं रही है...

शुभ्रा - एक बात पूछूं...

विक्रम - हाँ पूछो...

शुभ्रा - आप... प्रताप से मिलने गए थे...

विक्रम - हाँ... गया था... सोचा था... उसे कह कर राजगड़ से निकल कर... कहीं दूर चला जाऊँगा... पर.. कह नहीं पाया... उल्टा... उसने मुझे और भी कंफ्यूज कर दिया...

शुभ्रा - कंफ्यूज मतलब...

विक्रम - उसने कहा... मेरा वर्तमान और भविष्य शायद... राजगड़ से ही जुड़ा हुआ है...

इतने में एक छोटा लड़का भागते हुए आता है और इन दोनों के पास आकर खड़ा होता है l वह झुक कर अपने हाथों को घुटनों पर रख कर हांफ रहा था l

शुभ्रा - क्या हुआ... तुम कहाँ से भागते हुए आए... कोई पीछा कर रहा है तुम्हारा...

लड़का - (अपनी साँसों को दुरुस्त करते हुए) नहीं.. नहीं... एक... बड़ी सी गाड़ी आई है... उसमें... एक बुढ़ा और एक बुढ़ी बैठे हुए हैं... आपके बारे में पूछ रहे थे...

विक्रम और शुभ्रा हैरान होते हैं l दोनों याद करने लगते हैं के कौन हो सकता है जो राजगड़ में उन्हें ढूंढते हुए आए हैं l

शुभ्रा - (लड़के से) तो उन्हें यहाँ ले आना चाहिए था ना...

लड़का - मेरे सारे दोस्त... उन्हें रास्ता बताते हुए... यहाँ ला रहे हैं... मैं तो बस आपको खबर करने आ गया...

इतना कह कर लड़का वापस भाग गया l कुछ दूर गली के मोड़ पर एक गाड़ी दिखती है l जिसके आगे और पीछे कुछ बच्चे भाग रहे हैं l थोड़ी देर बाद वह गाड़ी इनके सामने आकर रुकती है l ड्राइवर उतर कर पहले विक्रम और शुभ्रा को सैल्यूट करता है l उसके देखा देखी वह सारे बच्चे भी विक्रम और शुभ्रा को सैल्यूट करते हैं l ड्राइवर गाड़ी का दरवाजा जैसे खोलता है, एक अधेड़ आदमी उतरता है l शुभ्रा और विक्रम उसे देख कर हैरान हो जाते हैं l वह शख्स और कोई नहीं था, वह शुभ्रा के पिता बिरजा किंकर सामंतराय थे l उनके पीछे पीछे शुभ्रा की माँ भी उतरती है l शुभ्रा उन्हें देख कर दोनों के गले लग जाती है l तीनों के आँखे बहने लगती हैं l जब शुभ्रा दोनों से अलग होती है विक्रम जाकर दोनों के पैर बारी बारी से छू कर वापस अपनी जगह पर खड़ा हो जाता है l अब चारों के बीच चुप्पी थी, बात शुरु करने के लिए शायद चारों को हिचक हो रही थी l अंत में बिरजा किंकर बात शुरु करता है l

बिरजा - तो कैसे हो...

शुभ्रा - अच्छी हूँ...

माँ - दिख रहा है... क्या हालत बना रखी है तूने... और अकेली जान भी तो नहीं है तु...

शुभ्रा - माँ.. पेट भर खाना और इनके साथ... और क्या चाहिए...

विक्रम - वैसे... आप लोग इस समय...

माँ - वह एक रिवाज है... हमारे यहाँ... बेटी की पहली संतान का जन्म मैके में होती है... इसलिये हम शुभ्रा को लेने आए हैं....

शुभ्रा - पर वह सब तो... गोद भराई के बाद होती है ना...

माँ - हाँ होती है... पर अगर तु किसी महल में होती तो... पर तु यहाँ...

शुभ्रा - सच बताना माँ... अगर मैं महल में होती... तो क्या आप लोग आते... (बिरजा और शुभ्रा की माँ चुप रहते हैं) आप इस वक़्त इसलिए आए हैं... क्यूँकी महल से रिश्ता इन्होंने तोड़ दिया... जब तक महल से रिश्ता था... आप लोग पारादीप छोड़ कर भुवनेश्वर तक नहीं आए... यहाँ तक... जब भुवनेश्वर में... हम पर जान लेवा हमला हुआ... तब भी... आप नहीं आए... आप भुवनेश्वर लांघ कर राजगड़ आए हैं... क्यूँकी यह सब जानते हैं... हमें महल से निकाल दिया गया है...

माँ - नहीं... ऐसी बात नहीं है... (बिरजा से) क्यूँ जी... (बिरजा कोई जवाब नहीं दे पाता)

शुभ्रा - देखा माँ... जवाब सूझ नहीं रहा है ना... आपको मुझसे हमदर्दी है... क्यूँकी मैं आपकी कोखजायी हूँ... पर यह भी सच है... आपने इन्हें स्वीकार नहीं किया... अब भी... आप रस्म अदायगी के बहाने मुझे ले जाने आए हैं...

माँ - नहीं नहीं.. तुम... हमें... गलत समझ रही हो बेटी...

शुभ्रा - नहीं माँ... जो भी हूँ... जैसी भी हूँ... तुम्हारी ही बेटी हूँ...

बिरजा का चेहरा सख्त हो जाती है, नजरें मिला नहीं पाता अपनों बेटी और दामाद से l और शुभ्रा की माँ लाजवाब हो गई थी l

शुभ्रा - आप लोग सुबह सुबह आए हैं... मतलब रात को जरुर यशपुर में रुके होंगे... अगर इतनी ही चिंता थी... तो कल शाम को... आप लोग यहाँ होते...

बिरजा - तुम हमारे प्यार को गाली मत दो बेटी... हम तुम लोगों के सामने आने से कतरा रहे थे... अपराध कहो या पाप... हाँ हुआ है हमसे... हम...सब कुछ सुनने... जानने के बावजूद... भुवनेश्वर नहीं गए... यही अपराध बोध हमें... तुम्हारे सामने लाने में देरी कर दी...

शुभ्रा - हाँ पापा... मैं मानतीं हूँ... पर मैं भी माफी चाहती हूँ... मैं आप लोगों के साथ... इन्हें इस हालत में छोड़ कर नहीं जा सकती...

माँ - यह तुमने कैसे सोच लिया... हम सिर्फ तुम्हें लेने आए हैं... हम दामाद जी, छोटे राजा और रानी जी को भी ले जाने आए हैं...

विक्रम - आपका बहुत बहुत शुक्रिया सासु माँ... पर मैं यहाँ से अभी जा नहीं सकता...

माँ - क्यूँ दामाद जी...

विक्रम - राजगड़ को शायद... मुझसे कुछ चाहिए... कुछ तो बाकी है... जो मुझे रोक रखा है... वर्ना... कब का छोड़ कर चला गया होता...

बिरजा - कुछ पाने की आश में हो लगता है...

विक्रम - नहीं ससुर जी... नहीं... मैंने कहा... राजगड़ का मुझ पर कुछ कर्ज है शायद... जब तक चुकता नहीं हो जाता... मैं यहाँ से जा नहीं सकता....

बिरजा - (शुभ्रा से) तुम्हारा क्या कहना है....

शुभ्रा - पापा... अभी तो इम्तिहान शुरु हुआ है... मैं बीच रास्ते में कैसे साथ छोड़ दूँ... यह चाहे कहीं भी रहें... जिस हाल में रहें... मैं हर कदम पर इनके साथ खड़ी मिलूंगी...

बिरजा किंकर अंदर से छटपटा जाता है l बड़ी मुश्किल से अपनी अहं को छोड़ कर विक्रम के आगे हाथ जोड़ कर कहने लगता है

बिरजा - मुझसे भूल हो गई... माफ कर दीजिए... दामाद जी... आपकी और मेरी बेटी की तकलीफ देखा नहीं जा रहा है मुझसे...

विक्रम - आप हाथ जोड़ कर मुझे पाप का भागी ना बनायें... मैं शुभ्रा जी को ना तो जाने से रोकुंगा... ना ही रुकने के लिए मिन्नत... मैं उनकी हर इच्छा का सम्मान करूँगा... (बिरजा हाथ जोड़े शुभ्रा की ओर देखता है)

शुभ्रा - पापा... इन कुछ महीनों में... अगर हालात कुछ सुधरे... तो सातवें महीने में... मेरी गोद भराई रस्म के लिए आप ज़रूर आइए... तब अगर जाना मुमकिन हुआ... तो मैं जरुर जाऊँगी... पर अब नहीं... हरगिज नहीं...

बिरजा और शुभ्रा की माँ के आँखों में आंसुओं की धारा छूटने लगी थी l क्यूँकी जो जवाब शुभ्रा ने दी थी वह उन्हें कहीं ना कहीं ग्लानि का बोध करा रहा था l इससे आगे वह कुछ ना कह सके l आँखों में आँसू लिए गाड़ी में बैठने के लिए मुड़ते हैं l

विक्रम - यह क्या... आप तो जाने लगें... घर के अंदर आइए... कम से कम पानी तो पी कर जाइए...

बिरजा - नहीं युवराज... नहीं... हमारे यहाँ एक रस्म यह भी है... जब तक नाती या नातिन का चेहरा ना देख लें... तब तक... हम बेटी के घर का पानी पीना तो दूर... चौखट के भीतर भी नहीं जाते... ईश्वर ने चाहा तो हम फिर आयेंगे.. अपनी बेटी को साथ लेकर जाएंगे...

फिर सामंत राय दंपति गाड़ी में बैठ कर वापस चले जाते हैं l उन्हें आपनी आँखों से गायब होने तक शुभ्रा और विक्रम वहीँ पर खड़े रहे फिर जब अंदर जाने लगते हैं सामने सुषमा खड़ी थी l दोनों सुषमा को देख कर ठिठक जाते हैं l

सुषमा - मुझे तुम पर फक्र बचों... (शुभ्रा से) और मेरी आशीर्वाद है... दूधो नहाओ पुतों फलो

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"दीदी... बड़ी भूख लगी है... खाने के लिए कुछ दे दो..." कहते हुए टीलु वैदेही की दुकान में आता है और एक जगह बैठ जाता है l

गौरी - आ गया नासपीटा... चूल्हा गरम हो ना हो... पेट इसका ठंडा रहना चाहिए... तेरे सारे दोस्त कटक चले गए... तु क्यूँ पीछे सड़ने के लिए रह गया...

टीलु - क्यूँ बुढ़िया... तुझे जलन हो रही है... (गौरी के पास एक बेंत की लकड़ी थी उसे उठा कर टीलु पर फेंक मारती है, टीलु उसे पकड़ लेता है) ना ना... मैंने पूरी भाजी खाने को माँगा है... यह नहीं...

गौरी - तुझे इससे खिलाना चाहिए...

टीलु - दीदी के हाथ से... कुछ भी खा लूँगा... ही.. (दांत दिखा कर हँसने लगता है)

गौरी - बस बस... वैदेही देदे इसे... दांत दिखाते इस बंदर का चेहरा देखा नहीं जा रहा है...

टीलु - मेरे तो फिर भी दांत है... तेरे तो वह भी नहीं है... ही ही ही...

गौरी - (अपनी जगह से उठती हुए) रुक आज तुझे... अपनी हाथ से खिलाती हूँ... (पर उठती नहीं)

इतने में वैदेही थाली में पूरी तरकारी लेकर टीलु के सामने परोस देती है l टीलु देखता है आज वैदेही बड़ी गुमसुम सी और खोई खोई सी है l वैदेही थाली परोस कर जब जाने लगती है टीलु टोक देता है

टीलु - दीदी...

वैदेही - (मुड़ कर) क्या कुछ और चाहिए...

टीलु - नहीं दीदी... पर आज तुम्हें हो क्या गया है... क्या विशु भाई पास नहीं है... इसलिए...

वैदेही - नहीं ऐसी बात नहीं है...

टीलु - मैं समझ गया... कल राजा भैरव सिंह... जरुर तुमको धमका कर गया होगा...

वैदेही - नहीं... वह बात भी नहीं है... तुम खाना खा लो...

टीलु, गौरी की तरफ सवालिया नजर से देखता है, गौरी अपनी नजर फ़ेर लेती है और दूसरी तरफ देखने लगती है l टीलु पूरी तोड़ कर पहला निवाला खाता है और वैदेही से कहता है

टीलु - ओ... यह क्या दीदी... आज खाने में नमक ज्यादा हो गया है...

वैदेही - क्या... (चौंकती है) (टीलु की थाली से एक निवाला खा कर) कहाँ... ठीक ही तो है... झूठ क्यूँ बोला..

टीलु - तुम भी तो सच नहीं बोल रही... क्या राजा साहब ने तुमको धमकाया... तुम्हें किस बात की परेशानी है...

गौरी - हाँ बेटी... कहीं सच में तु... राजा की धमकी से डर तो नहीं गई...

वैदेही - नहीं... डर उन्हें लगता है... जिन्हें कुछ खोने का हो... अब राजा... क्या छिन लेगा जो मैं डरुंगी....

टीलु - फिर... कहीं तुम यह तो नहीं सोच लिया... विशु भाई केस हार सकता है...

वैदेही - नहीं... विशु हारेगा ही नहीं...

टीलु - (खाने की थाली को किनारे करते हुए) तो फिर...

वैदेही - खाने का अनादर नहीं करते... खा ले...

टीलु - जब अन्नपूर्णा ही उदास हो... तो खाना पचेगा ही नहीं...

गौरी - हाँ वैदेही... दिल पर बोझ मत बढ़ा... बोल दे...

वैदेही - (एक गहरी साँस छोड़ते हुए) ठीक है... यह बात मैंने विशु से भी साझा नहीं की है... पर तुमको बता रही हूँ... जब लोगों के अंदर की ज़ज्बात को मैंने भड़काया था... तो पहली बार ऐसा हुआ था... के लोग महल में घुसे... अपनी हक की आवाज उठाई... और राजा को पीठ कर वापस लौटे...

टीलु - हाँ... हम सभी उस घटना के गवाह हैं...

वैदेही - मुझे लगा था... पीढ़ी दर पीढ़ी... कुचले हुए आक्रोश को मैंने भड़का कर आंदोलन के रुप में ढाल दिया... पर कल राजा ने उसे गलत साबित कर दिया...

टीलु - कैसे....

वैदेही - कल बेशक राजा के हाथों में हथकड़ी थी... वह पैदल गाँव के रास्तों से गुजरा... पर मैंने वह देखा... जो राजा वास्तव में मुझे दिखाना चाह रहा था... (टीलु और गौरी ध्यान से सुन रहे थे) कल अगर गाँव वाले... उसकी गिरफ्तारी को तमाशा की तरह देखे होते... तो राजा कल ही मर गया होता... पर ऐसा नहीं हुआ... लोग डर के मारे घरों में दुबक गए... किसी में भी हिम्मत नहीं थी... राजा के आँखों में देखे... सच कहती हूँ... अगर एक छोटा बच्चा भी कल राजा के आँखों में आँखे डाल कर देख लिया होता... राजा वहीँ मर चुका होता... लेकिन कल राजा को... लोगों की कायरता ने... फिर से जिंदा कर दिया... काकी... याद है... परसों किसी तांत्रिक की बात कर रही थी...

गौरी - हाँ... हाँ...

वैदेही - वह तांत्रिक क्या करेगा... मैं नहीं जानती... पर राजा उस तांत्रिक को बुला कर लोगों के मन में... एक खौफ जगा दिया... लोगों को लग रहा है... कहीं उनकी घर की बेटी को... राजा उठा ना ले...

गौरी - मुझे तो पहले से ही यही लग रहा था... पर तुम्हीं ने कहा था... के गाँव वाले पलट वार करेंगे....

टीलु - दीदी... तुम ना खामख्वाह परेशान हो रही हो... अब उस पर केस चलेगा... मजिस्ट्रेट इंक्वायरी हुई है... विशु भाई केस लड़ रहा है... ऐसे कैसे राजा अपना कारनामा दोहरा देगा...

वैदेही - तुम... राजा को हल्के में मत लो... और मैं भी यह यकीन के साथ कह सकती हूँ... विशु के मन में भी यही संशय होगा... राजा ने जरुर कुछ बड़ा प्लान किया है... वह लौटेगा... जरुर लौटेगा...

टीलु - नहीं दीदी... चांस ही नहीं है... वह तभी आ सकता है... जब उसे ज़मानत मिलेगा... मजिस्ट्रेट इंक्वायरी में... जो दोषी करार दिए जाते हैं... उन्हें आसानी से... ज़मानत नहीं मिलती...

वैदेही - मैं इतना कानून नहीं जानती... पर... वह राजा है... दशकों से... वह और उसके पुरखे... इस इलाके में ही नहीं... पूरे स्टेट में राज किया है... जरुर कोई ना कोई तिकड़म भिड़ायेगा...

टीलु - तो आने दो बाहर... हम देख लेंगे उसको...

वैदेही - वह जब आएगा... एक अलग ताकत के साथ लौटेगा... वह इस राजगड़ के नाम की नदी का इकलौता मगरमछ है... हाती में चाहे कितना भी ताकत क्यूँ ना हो... पानी के अंदर... मगरमच्छ के जबड़े में... लाचार हो जाता है...

टीलु - दीदी तुम डरी हुई हो... या परेशान हो...

वैदेही - दोनों... डर मुझे गाँव वालों के लिए है... परेशानी इसलिए... की विशु की सारी मेहनत बेकार चली जाएगी...

टीलु - तो तुमने विशु भाई को पूरी बात बताई क्यूँ नहीं.... उसे बताना पड़ेगा...

वैदेही - नहीं... उसे पूरी तरह से... केस पर ध्यान देने दो... बाकी राजा अगर गाँव अंदर कुछ करने की कोशिश करी... तो मैं रोकुंगी...

गैरी - पर हमें पता कैसे चलेगा... वह किसको उठाएगा...

टीलु - क्या आपको लगता है... राजा वाकई यह सब करेगा...

वैदेही - पता नहीं... पर डर तो बना रहेगा ना...

गौरी - मान लो... अगर तुम्हारा डर... सही निकला तब...

इस सवाल पर वैदेही का चेहरा सख्त हो जाता है, दांत भींच जाती हैं l टीलु का मुहँ खुला रह जाता है l

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कोर्ट के अंदर नरोत्तम पत्री के साथ विश्व बैठा हुआ है l दर्शकों के दीर्घा में सेनापति दंपति और जोडार बैठे हुए हैं l कुछ देर बाद हॉकर ऊँची आवाज़ में जजों की आने की सूचना देता है l लोग सारे खड़े हो जाते हैं l एक के बाद एक तीन ज़ज आकर अपना आसान पर बैठ जाते हैं l मुख्य ज़ज गैवल उठा कर टेबल पर पटकते हुए

ज़ज - ऑर्डर ऑर्डर... आज की कारवाई शुरु की जाती है... (कोर्ट रुम में खामोशी पसर जाती है, ज़ज एक फाइल पलट कर कुछ देखता है और पत्री से) हाँ तो... नरोत्तम जी... आपकी छानबीन और रिपोर्ट के बारे में जानकारी दीजिए...

पत्री - (अपनी जगह से उठ खड़े होकर) येस माय लॉर्ड... (कुछ फाइलें हाथों में लेकर) माय लॉर्ड... यह केस... मनरेगा की आड़ में... बैंक फ्रॉड... लैंड स्कैम से जुड़ा हुआ है... जैसे ही होम मिनिस्ट्री से हमें ऑर्डर मिला... हमने अपनी टीम बना कर इस पर तहकीकात शुरु कर दिया... और महीने भर से उपर लग गया हमें... अंत में यह रिपोर्ट बना कर एक कॉपी होम मिनिस्ट्री में सबमिट कर दिया है... और एक पर सुनवाई और कारवाई के लिए... यह रहा... (कह कर एक फाइल को रीडर को सौंपता है, रीडर वह फाइल लेकर ज़ज् को देता है, ज़ज् वह फाइल लेकर कुछ पन्ने देखता है)

ज़ज - ह्म्म्म्म... मुल्जिम को पेश किया जाये...

हॉकर हाजिरी के लिए आवाज़ देता है - मुल्जिम... राजा साहब... भैरव सिंह क्षेत्रपाल जी... हाजिर हो...

पुलिस के कुछ सिपाही और दास भैरव सिंह को लेकर अंदर आते हैं l भैरव सिंह मुल्जिम वाली कठघरे में आकर खड़ा होता है l भैरव सिंह के कठघरे में आते ही कोर्ट रुम के अंदर मरघट जैसी खामोशी पसर जाती है l एक शांत और ठंडक भरी निगाह दौड़ता है, अंदर बैठे सभी लोगों के बदन में सरसरी सी दौड़ जाती है l

ज़ज - मुल्जिम राजा भैरव सिंह... आप पर कुछ आरोप लगे हैं... क्या आप उन आरोपों से अवगत हैं...

भैरव सिंह - जी...

ज़ज - क्या आप मानते हैं... इस मजिस्ट्रेट इंक्वायरी में... आप पर आरोप सिद्ध हुए हैं...

भैरव सिंह - जी नहीं...

ज़ज - क्या आप मजिस्ट्रेट इंक्वायरी को एकतरफ़ा बता रहे हैं...

भैरव सिंह - जी... क्यूँकी इस इंक्वायरी में... माननीय एक्जीक्यूटिव मैजिस्ट्रेट जी... उर्फ तहसीलदार जी ने... सिर्फ गाँव वालों की रिपोर्ट पर अपना विचार को रिपोर्ट बना कर पेश किया है... उन्होंने मुझसे कोई पूछताछ नहीं की है....

ज़ज - पत्री महोदय... इस पर आप क्या कहेंगे...

पत्री - मुझे रिपोर्ट की सच्चाई परखने के लिए जिम्मेदारी दी गई थी... जिसकी रिपोर्ट बना कर मैंने आपके सामने प्रस्तुत कर दी... माय लॉर्ड... आगे का काम अदालत करेगी...

ज़ज - आपके छानबीन में... आपने किन्हें वादी बनाया... किन्हें गवाह बनाया और किन्हें... प्रतिवादी बनाया...

पत्री - (एक और फाइल निकाल कर पन्ने देखते हुए) माय लॉर्ड... इस फ्रॉड केस में... वादी यशपुर, राजगड़, चारांगुल, माणीआ आदि पच्चीस गाँव के सभी लोग हैं... जैसे कि मुल्जिम के कठघरे में मौजूद राजा भैरव सिंह प्रतिवादी हैं... और गवाह हैं... (भैरव सिंह की ओर देखते हुए) रेवन्यू इंस्पेक्टर सुधांशु मिश्रा, बैंक मैनेजर अजय महाराणा, यशपुर सब रजिस्ट्रार ऑफिस के रजिस्ट्रार बिरंची सेठी... प्रमुख हैं... और इन्हें सरकारी गवाह बनाया गया है...

ज़ज - पर यहाँ वादी की तरफ से... कोई सरकारी वकील नहीं हैं...

पत्री - जी माय लॉर्ड... सभी गाँव वालों ने... उन्हीं के गाँव के... विश्व प्रताप महापात्र पर विश्वास किया है... और उन्होंने अपनी वकालत नामा में... विश्व प्रताप महापात्र को चुना है....

ज़ज - ह्म्म्म्म ठीक है... तो प्रतिवादी राजा भैरव सिंह जी... आपने लिए क्या कोई वकील नियुक्त किया है आपने...

भैरव सिंह - जी नहीं योर ऑनर... हम अपनी पैरवी खुद करेंगे....

ज़ज - क्या... आप अपनी पैरवी खुद करेंगे....

भैरव सिंह - जी योर ऑनर...

ज़ज - विश्व प्रताप... इस पर आपकी राय क्या है...

विश्व - (अपनी जगह से उठ कर, भैरव सिंह की ओर देखते हुए) मुझे... कोई ऐतराज नहीं है योर ऑनर....

ज़ज - ठीक है... आपकी यह प्रस्ताव स्वीकारी जाती है....

भैरव सिंह - ज़ज साहब... यह केस हमारे खिलाफ चल रहा है... जैसे कि... एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने कहा... इसमें वादी हज़ारों के तादात में हैं... तो जाहिर है कि हमें... खुदको निर्दोष प्रमाण करने के लिए... उन्हें और... जिन्हें सरकारी गवाह बनाए गए हैं... उन्हें क्रॉस एक्जामीन करना पड़ेगा...

ज़ज - हाँ ऐसा होगा.... पर आप कहना क्या चाहते हैं...

भैरव सिंह - ज़ज साहब... क्षेत्रपाल परिवार बिखर चुका है... टूट चुका है... अब महल में... हम तीन लोग ही रह रहे हैं... हमारा बेटा.. बहु... छोटे राजा... छोटी रानी... कोई नहीं हैं... बड़े राजा बिस्तर पर अपनी आखिरी साँस गिन रहे हैं... यहाँ तक कोई डॉक्टर या मेडिकल स्टाफ तक... मिन्नतों के बाद भी... महल नहीं आ रहे हैं... हम चाहते हैं कि... नहीं नहीं सॉरी... दरख्वास्त करते हैं... हमारी केस को... विशेष केस की मान्यता दी जाए... उसे यशपुर या फिर... उसके आसपास किसी कोर्ट में स्थानांतरित किया जाए... इससे गाँव की लोगों को परेशानी नहीं होगी... और हमें अपने पिता के अंतिम समय पर सेवा करने का अवसर मिल जाएगा...

ज़ज - आप इस वक़्त... एक मुल्जिम हैं...

भैरव सिंह - जानते हैं... हम जब से यह केस दर्ज हुआ... तब से कल तक अपने महल में... गृह बंदी थे... हमें वैसे ही बंदी बना कर केस पर सुनवाई और कारवाई की जा सकती है... सिर्फ तब तक... जब तक हमारे पिताजी जिवित हैं... अगर इस बीच उनको मृत्यु आती है... तब कोर्ट चाहे तो केस को यहाँ... कटक में स्थानांतरित किया जा सकता है... हम कोई विरोध नहीं करेंगे...

तीनों ज़ज आपस में बातेँ करने लगते हैं l भैरव सिंह की दलीलें सुन कर विश्व के माथे पर बल पड़ गया था l कोर्ट रुम में मौजूद सभी लोग भी आपस में खुसुर-पुसुर करने लगते हैं l जज़ आपस में बातेँ करने के बाद

ज़ज - ऑर्डर ऑर्डर... (कोर्ट रुम से शांति छा जाती है) अभी अदालत में प्रस्तावित कारवाई को... एक घंटे के लिए स्थगित किया जाता है... एक घंटे बाद... अदालत वादी के वकील से... उनके विचार जानने की इच्छा रखती है... तब तक के लिए... स्थगन...

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हाइकोर्ट के बार असोसिएशन के प्रतिभा के चैम्बर में सभी बैठे हुए हैं l सब के सब गहरे चिंतन में खोए हुए हैं l

प्रतिभा - राजा... यह क्या कर रहा है...

तापस - अपने दिमाग के घोड़े दौड़ा रहा है...

प्रतिभा - ज़ज साहब को तुरंत मना कर देना चाहिए...

सुभाष सतपती - हाँ मना तो करना ही चाहिए...

दास - लगता है... राजगड़ में और भी कुछ कांड बाकी रह गए हैं... जिन्हें बड़ी तसल्ली से करना चाहता है...

प्रतिभा - अरे हाँ... इसने अभी दो दिन पहले... किसी तांत्रिक वांत्रिक को बुलाया था ना... (विश्व से) प्रताप... (विश्व आँखे मूँद कर गहरी सोच में खोया हुआ था, प्रतिभा की बुलाने पर चौंकते हुए अपनी सोच से बाहर आता है)

विश्व - हाँ... हाँ माँ...

प्रतिभा - किस सोच में खोया हुआ था...

तापस - पक्का वही सोच रहा होगा... जिस पर हम वाद विवाद कर रहे हैं...

प्रतिभा - एसक्युज मी... हम वाद विवाद नहीं कर रहे हैं... हम डिस्कशन कर रहे हैं...

तापस - अरे भाग्यवान शुद्ध भाषा में इसे... वाद विवाद ही कहते हैं...

प्रतिभा - हो गया... (तापस चुप हो जाता है) प्रताप... तुम क्या सोच रहे थे... और जब कारवाई शुरु होगी... तुम.. क्या प्रेजेंट करोगे...

विश्व - पता नहीं माँ...

प्रतिभा - ह्वाट...

प्रतिभा विश्व को कुछ देर तक गौर से देखती है l फिर अपनी जगह से उठ कर विश्व के पास आती है उसके कंधे पर हाथ रखकर कहती है

प्रतिभा - तुम्हें इसी दिन की तो प्रतीक्षा थी... अब जब आमने सामने फैसला होना है... तुम कहाँ खो जा रहे हो...

विश्व - (प्रतिभा के हाथ पर अपना हाथ रखकर) माँ... इतने दिनों गाँव में रहा... लोगों के बीच रहा... ताकि भैरव सिंह के खिलाफ... लोगों के दिल से डर मिटा सकूँ... और लोगों को... उसके खिलाफ एकजुट कर सकूँ... पत्री सर हो या दास सर... हर किसी ने... मेरा साथ दिया है... पर अब लोगों के मन में... डर दुबारा से घर करने लगा है...

दास - वही तो... इसी डर को कायम रखने के लिए... भैरव सिंह केस की सुनवाई को राजगड़ ले जाना चाहता है... विश्वा... मैं तो कहता हूँ... तुम इस बात का पुरजोर विरोध करो...

विश्व - अदालत के ऊपर में नहीं हूँ... और यह केस कोई लोवर कोर्ट में नहीं चल रहा... हाइकोर्ट में है...

प्रतिभा - कहीं लोगों का डर की वज़ह... वह तांत्रिक वाला कांड तो नहीं...

विश्व - बदकिस्मती से हाँ...

सब - ह्वाट...

पत्री - यह तो ननसेंस है... भला वह तांत्रिक राजा का क्या उद्धार कर लेगा... मेरा राजा से कई बार आमना सामना हुआ है... अच्छी तरह से जानता हूँ.. वह नास्तिक है...

प्रतिभा - तो फिर... वह यह ड्रामा क्यूँ कर रहा है..

विश्व - (अपनी जगह से उठ खड़ा होता है) यह एक साईकोलॉजिकल वॉर फैर है...

सब - मतलब...

विश्व - यह सब प्राचीन काल से चला आ रहा है... जिसे आज की ज़माने में... इंफॉर्मेशन वॉर फैर कहा जाता है... पहले अगर किसी रियासत पर हमला करना हो... तो अपने जासूसों के जरिए... दुश्मन रियासत के... छावनी और लोगों में... एक डर का मैसेज फैला देते थे... जैसे फलाना राजा के पास शैतानी ताकत है... इंसानी मांस खाता है... औरतों को उठा लेता है... वगैरह वगैरह... (सब चुप चाप सुन रहे थे) क्षेत्रपाल परिवार... शुरु से ही.. इसी दिमागी खेल को खेलता रहा है... इसके लिए... ऐसे रस्म या परंपराओं का सहारा लेते रहे... और यह कई दशकों तक कारगर भी रहे... कुछ राजा होते हैं... जो खुद को ईश्वर की प्रतिनिधि कहते हैं... जैसे पूरी राजा... जगन्नाथ के प्रतिनिधि कहलाते हैं... इसलिए लोग उनकी इज़्ज़त करते हैं... लोग उन पर किंवदंतियां गढ़ते हैं... उनके लिए... लोग आज भी मरने मारने के लिए तैयार रहते हैं... और कुछ राजा होते हैं... इन्हीं क्षेत्रपाल की तरह... जो खुद को... शैतान के प्रतीक बना कर लोगों में मन में बस जाते हैं... ऐसे राजाओं के लिए... लोग दंतकथायें बनाते हैं... जिसे लोग पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाते हैं... (सब अभी भी खामोशी से विश्व को सुने जा रहे थे) भैरव सिंह क्षेत्रपाल... एक जिवंत दंतकथा है... उसने तांत्रिक को क्या बुलाया... लोगों के मन में... फिर से दहशत बस गया है... उसने इस बात को कंफर्म भी कर लिया... गिरफ्तारी के बाद... राजगड़ के गली चौराहों से पैदल चल कर...

सब के सब चुप्पी साधे विश्व को सुने जा रहे थे l विश्व इतना कह कर खामोश हो गया, पर उसकी बातेँ इस कदर असर कर गई थी के कमरे में मरघट की चुप्पी पसर कर गई थी l

प्रतिभा - ठीक है.. लोग डर गए... पर इससे... सिस्टम को क्या... अदालत को क्या...

विश्व - माँ... मैंने अभी कहा ना... वह एक जिवंत दंतकथा है... और यह बात... राजगड़ के लोगों पर नहीं... सिस्टम पर भी लागू होती है... यही तो वज़ह है... के इसी डर की आड़ में... दशकों तक... स्टेट पालिटिक्स में दखल और प्रभाव रख पाए हैं...

प्रतिभा - मतलब... वह हर हाल में... रस्म को दोहराएगा...

विश्व - हाँ...

पत्री - पर होम मिनिस्ट्री... क्या इसकी इजाजत देगा... मुझे नहीं लगता...

दास - तब तो तुम्हें... हर हाल में... उसे रोकना होगा...

विश्व - जैसे जैसे... मुझे जीत मिलती गई... मेरा हौसला बढ़ता ही गया... मुझे लगा... राजा हार ही जाएगा... पर अब मुझे एहसास हो रहा है... यह लड़ाई... सिर्फ भैरव सिंह के खिलाफ ही नहीं... बल्कि पूरे के पूरे सिस्टम के खिलाफ है... और हम सब इसी सिस्टम के छोटे हिस्से मात्र हैं...

प्रतिभा - तो तुम क्या करोगे...

विश्व - हर कोशिश करूंगा... उसे यहीं रोकने के लिए...

दास - अगर उसे कानून से इजाजत मिल गई तो...

विश्व - तो उसे जो करना है... वह करेगा... मुझे जो करना है... मैं करूंगा

तभी सीलु अंदर आता है और सबसे कहता है - अब थोड़ी ही देर में... सुनवाई शुरु होगी... जज साहब आ गए हैं...

सभी उठ कर जाने लगते हैं l सुभाष बाहर तापस को ना पा कर अंदर आता है l अंदर तापस गहरी सोच में खोया हुआ था l

सुभाष - सर... आप अभी भी यहाँ... क्या सोच रहे हैं...

तापस - याद है सतपती मैंने कहा था... शतरंज की सोलह घर वाली चाल...

सुभाष - हाँ...

तापस - वह अब शायद शुरू हो चुका है... और प्रताप को... इसका आभास हो गया है...

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"ऑर्डर ऑर्डर" गैवल को टेबल पर मारते हुए ज़ज सबको चुप कराता है l

ज़ज - अदालत की कारवाई फिर से शुरु की जाती है... जैसे कि... प्रतिवादी राजा भैरव सिंह ने... केस के ताल्लुक जो अदालती कार्यवाही की माँग रखी है... उस पर विस्तृत चर्चा के लिए... हमने सॉलिसिटर जनरल मिस्टर & ₹#& को आव्हान किया है... (एक व्यक्ति कोर्ट के रुम में आता है और वकीलों के लिए निर्धारित स्थान पर आकर खड़ा होता है, जज के इशारा होते ही बैठ जाता है) तो.. वादी पक्ष के वकील... मिस्टर विश्व प्रताप... पहले दौर में... राजा भैरव सिंह ने जो प्रस्ताव दिया है... उस पर आप क्या विचार रखते हैं...

विश्व - माय लॉर्ड... क्या एक मुल्जिम... जिसके विरुद्ध... एक्जिक्युटीव मजिस्ट्रेट इंक्वायरी के बाद... लगभग दोषी करार दिया गया हो... अदालती क्रॉस एक्जामिन के लिए... बाहर अदालत बैठाई जा सकती है....

जज - इसका उत्तर हम... सॉलिसिटर जनरल जी से चाहेंगे...

SG - (अपनी जगह से उठकर) जी माय लॉर्ड... ऐसे केसेस में... फर्स्ट ट्रैक स्पेशल बेंच का गठन करने के लिए... कानून में प्रावधान है...

जज - ठीक है... तो विश्व प्रताप... अब आपका क्या प्रस्ताव है...

विश्व - माय लॉर्ड... यह केस... बहुत बड़ी आर्थिक घोटाले का है... जिसमें ना केवल बैंक का पैसा.. बल्कि लोगों की जमीन... उनके अधिकार का मनरेगा राशि... और सबसे अहम... सरकारी राशि का... ना केवल दुरुपयोग हुआ है... बल्कि लूट भी लिया गया है... इंक्वायरी रिपोर्ट के मुताबिक... यह घोटाला... तकरीबन तीन हजार करोड़ रुपये का है... ऐसे में... अगर मुल्जिम... बीस प्रतिशत की राशि जमा दें... वह भी अपने स्तावर और अस्तावर संपति से नहीं... बल्कि किसी आत्मीय या स्वजन की संपति से... तब यह अदालत... ऐसी किसी फर्स्ट ट्रैक बेंच का गठन करें...

इतना कहने के बाद विश्व एक नजर भैरव सिंह पर डालता है l पर भैरव सिंह के चेहरे पर उसे जरा सा भी शिकन तक नजर नहीं आता है l

जज - तो राजा साहब... आपने वादी पक्ष के वकील को सुना... आपकी उनके प्रस्ताव पर अपना विचार रख सकते हैं...

भैरव सिंह - हमें... एडवोकेट विश्व प्रताप जी का प्रस्ताव स्वीकर है...

यह एक धमाका था, जो ना सिर्फ सारे जजों को बल्कि विश्व के साथ कोर्ट रुम में हर किसी को हैरान कर जाता है l

जज - क्या सच में कोई है... जो आपके लिए... छह सौ करोड़ रुपए की राशि... कोर्ट में जमा कर सकता है...

भैरव सिंह - जी जज साहब...

जज - पर आपने पिछले सेशन में कहा था कि... आपका पूरा परिवार बिखर चुका है... कोई नहीं है आपके साथ... और हाँ यह याद रहे... जो दौलत आपके पास है... जब तक केस कोर्ट में चल रहा है... तब तक... उसे आप खर्च नहीं कर सकते...

भैरव सिंह - हम... वादी पक्ष के वकील और अदालत के मन में जो चल रहा है... हम समझ चुके हैं... आप इत्मीनान रखिए... वह राशि जमा कर दी जाएगी...

जज - कौन हैं... जो इतनी बड़ी राशि जमा करेंगे...

"मैं योर ऑनर मैं" कहते हुए एक शख्स दर्शकों के दीर्घा में से उठ खड़ा होता है l उसे देखते ही विश्व और बाकी सारे लोग हैरानी से उसे देखने लगते हैं l

जज - आप जो भी कोई हैं... कृपया इस कठघरे में आकर अपना बयान दर्ज कराएं...

वह शख्स खाली वाली कठघरे में में आता है और जज को कहने लगता है

आदमी - माय लॉर्ड... मेरा नाम कमल कांत महानायक है... मुझे लोग केके के नाम से भी जानते हैं...

जज - आपका... राजा साहब से क्या रिश्ता है...

केके - जैसा किसी खास व्यक्तित्व वाले के प्रति... उसके चाहने वाले का होता है... मैं राजा साहब बहुत प्रभावित हूँ... उनके प्रति अनुराग का भाव रखता हूँ... इसलिए मैं... वह तय राशि कोर्ट में जमा दे सकता हूँ...

केके के कह लेने के उपरांत, कोर्ट रुम में कुछ देर के लिए सन्नाटा छा जाती है l तीनों जज आपस में कुछ बात करने लगते हैं फिर जज अपना फैसला सुनाते हैं l

जज - ठीक है... कमल कांत महानायक जी को... एक हफ्ता का समय दिया जाता है... पूरे छह सौ करोड़ रुपये अदालत में जमा करने के लिए... और जैसे कि सॉलिसिटर जनरल ने सुझाव दिया है... हम सर्कार को... तीन जजों की पैनल बना कर... एक स्पेशल फर्स्ट ट्रैक... हाई कोर्ट बेंच बना कर... इस केस में... आगे की सुनवाई और उस पर कारवाई करने के लिए... आदेश पारित करते हैं... नाउ दी कोर्ट इज एडजॉर्न...
 
हाँ इसकी वजह यह है कि

राजा अपनी खौफ को गवाही के माध्यम से पुनः स्थापित करना चाहता है

इसका कारण आपको अगले कड़ी में मालूम हो जाएगा l फास्ट ट्रैक कोर्ट की राजा ने क्यूँ मांग की और कौन उसके मददगार हैं

हाँ नागेंद्र की मौत होने वाली है

वह घटना भैरव सिंह का भविष्य तय कर देगा

❤️😍❤️

जी बिल्कुल

हाँ बड़े घर में इगो बहुत पाले जाते हैं

शुक्रिया मेरे दोस्त मेरे भाई

बस कहानी को पूर्ण विराम तक पहुँचाने का समय निकट आ गया है

अगस्त माह समाप्त होते होते कहानी भी समाप्त हो जाएगा

कांट छाँट जारी है

अब निरंतर अन्तराल में कहानी आती रहेगी
 
वह अपना अंतिम दिन गिन रहा है

अपने किए पाप भोग रहा है और बहुत जल्द मुक्त होने वाला है

हाँ युद्ध का अंतिम पड़ाव निकट है

अपनी प्रेमिका से मिलना तो बनता है

नहीं नागेंद्र को विश्वा नहीं मारेगा पर वह मरेगा जरूर

हाँ दोनों की नोक झोंक होती रहेगी

क्या करें

समाज में क्रांति इतनी आसानी से नहीं आती

और भी कुर्बानियाँ बाकी है

भैरव सिंह अपना अंतिम दाव चल दिया है

विश्वा को समझ में भी आ गया है

फिर भी विश्वा वार तभी कर पाएगा जब भैरव सिंह का वार होगा
 
👉एक सौ छप्पनवाँ अपडेट

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कटक शहर

महानदी के किनारे

नराज के बैराज के पास जॉगर्स पार्क में लोग जॉगिंग और वॉकींग कर रहे हैं l बैराज के कुछ सुइस गेट खुले हुए हैं l पानी की तेज बहाव नीचे की पथरीली चट्टानों से टकरा कर आसपास पानी की धुन्ध जैसा माहौल बना रही थी l सुबह की ताजी किरणों से उस धुएँ वालीं वातावरण में इंद्रधनुष की बन रहा था l जॉगिंग करने आए कुछ बच्चे उन इंद्रधनुषों को देख कर लुफ्त उठा रहे थे l वहीँ उस पार्क के रिवर व्यू पॉइंट के एक बेंच पर विश्व किन्ही ख़यालों में खोया हुआ था l पार्क में बच्चों का शोरगुल या भीड़ कुछ भी विश्व का ध्यान खिंचने में नाकाम था l पर तभी उसके कानों को एक आवाज सुनाई देती है l

"किन ख़यालों में खोए हुए हो हीरो"

यह आवाज कानों में पड़ते ही विश्व का ध्यान उस आवाज की तरफ जाती है l एक शख्स ट्रैक शूट में था, जिसके हाथ में एक स्टिक, आँखों पर एक काली गॉगल और सिर पर एक गोल्फ कैप था l उस शख्स को देखते ही विश्व के चेहरे पर रौनक के साथ साथ मुस्कराहट उभर आती है l विश्व अपनी जगह से खड़ा हो जाता है

विश्व - ड... डैनी भाई... आ... आप...

डैनी - हाँ मैं... और कैसे हो हीरो... क्या हाल चाल है...

विश्व जाता है और डैनी के गले लग जाता है l डैनी भी उसे गले लगा लेता है l कुछ देर बाद दोनों अलग होते हैं और बेंच के पास आकर बैठ जाते हैं l

विश्व - ह्वाट अ सरप्राइज... डैनी भाई आप... यहाँ... इस वक़्त... कैसे... आई मीन.. कब आए...

डैनी - कुछ ही दिन हुए हैं... न्यूज से... पता कर रहा था... अदालत में... तुम्हें लड़ते हुए देखना चाहता था... इसलिए रहा नहीं गया... बस आ गया...

विश्व - ओ... मतलब... आप कितने दिनों से यहाँ हैं...

डैनी - सच कहूँ तो मुझे... बहुत पहले आ जाना चाहिए था... मुझे जब यह जानकारी हाथ लगी के... राजा का भतीजा तुम्हारा दोस्त था... तब वाकई मुझे जल्द आ जाना चाहिए था... शायद मैं तुम्हारे काम आ सकता था... पर अफसोस... मैं जब खबर लेकर आया... तब तक तुम यहाँ से जा चुके थे... इसबार तुम्हें कोई तकलीफ ना हो... इसलिए तभी से... सब पर नजर जमाए रखा था...

विश्व - उसके लिए शुक्रिया डैनी भाई... पर... केस अब...

डैनी - हाँ... कल मैं कोर्ट में ही था... सब कुछ देखा सुना भी... अब शायद केस... राजगड़ या फिर... उसके आसपास के इलाके में... ट्रांसफर कर दिया जाएगा...

विश्व - हाँ... मुझे अंदाजा नहीं था... भैरव सिंह... इतना बड़ा दाव खेल लेगा... और सॉलिसिटर जनरल ने जिस तरह से... दलील दी... उससे लगता है... केस राजगड़ या फिर यशपुर ट्रांसफ़र हो जाएगा...

डैनी - राजगड़ या यशपुर केस शिफ्ट हो जाने से... क्या केस पर कोई असर पड़ेगा...

विश्व - हाँ... बहुत ही गहरा असर पड़ेगा... इससे राजा का हस्ती आम नहीं रह जाएगा... वह खास बन जाएगा... लोगों के मन में यह बस जाएगा... राजा भैरव सिंह अदालत नहीं गया... बल्कि वह अदालत को... अपने इलाके में खिंच लाया...

डैनी - ह्म्म्म्म... मतलब... जो लोग अबतक... उसके खिलाफ गवाही दे चुके हैं... वे अब शायद मुकर भी जाएं...

विश्व - हाँ...

डैनी - और तुम इतनी सी बात को लेकर... परेशान हो...

विश्व - बात सिर्फ इतनी सी नहीं है... जब मेरी दोस्ती नभ वाणी की जर्नलिस्ट सुप्रिया से हुई... तब मुझे इशारे से बताया था... के सरकार में बहुत से लोग ऐसे हैं... जो भैरव सिंह से छुटकारा पाना चाहते हैं... मुझे उसकी बातों की गहराई का पता तब चला... जब राजा के खिलाफ केस दर्ज होते ही... भैरव सिंह... होम अरेस्ट हुआ... इतनी तेजी से ताबड़तोड़ कारवाई देख कर लगा था... के सरकार वाकई में... भैरव सिंह से छुटकारा पाना चाहती है... पर कल जिस तरह से... कोर्ट में... प्रोसिडींग हुआ... (विश्व खामोश हो जाता है)

डैनी - वैसे... तुम गलत नहीं हो... भैरव सिंह... अपने इलाके में.. बहुत बड़ा रुतबा रखता है... जिसके दम पर... स्टेट में... सरकारें बनतीं और गिरती भी रही है...

विश्व - अगर इतना ही खौफ पालते थे... तो हमारी कंधों का सहारा लेकर... राजा से क्यूँ टकराने की कोशिश की...

डैनी - कोई किसीसे टकराया नहीं है... होम मिनिस्टर... तुम्हारे आड़ में... राजा को... अपनी पावर का एहसास कराया...

विश्व - और अब...

डैनी - दोनों मिल गए हैं...

विश्व - यह आप किस वीना पर कह सकते हैं...

डैनी अपनी आस्तीन से एक लिफाफा निकालता है l उनमें से कुछ फोटोग्राफ्स निकाल कर विश्व के हाथों में देता है l विश्व उन फोटो में देखता है, बल्लभ होम मिनिस्टर के साथ बैठ कर बात कर रहा है l

विश्व - यह फोटोस... आप के पास...

डैनी - मैंने कहा ना... मैंने अपनी नजरें ज़माए रखा था... और बात अगत कटक भुवनेश्वर की है... तो मैं कहीं पर भी पहुँच सकता हूँ...

विश्व - होम मिनिस्टर को बल्लभ ने आसानी से मना भी लिया...

डैनी - मानने के सिवा... होम मिनिस्टर के पास कोई चारा भी तो नहीं था...

विश्व - क्यूँ...

डैनी - राजा के पास... ज्यादातर पोलिटिशीयन... ब्यूरोक्रेटस... नौकरशाह के... काली कुंडलियाँ है... इसलिए... और मान लो होम मिनिस्टर राजी भी ना होता... तब भी... तुम्हारा राह आसान नहीं होने वाला था...

विश्व - क्यूँ...

डैनी - भैरव सिंह जितने भी आड़े टेढ़े रास्ते अपना कर पैसे कमाए हैं... उनको बराबर ना सही... पर सिस्टम में... रहने वाले... और सिस्टम को चलाने वाले भेड़ियों में बांटा जरूर है... उन भेड़ियों के मुहँ में... खून लग चुका है... तुम उसे बंद करने पर आ गए हो.. इसलिये वे लामबंद हो गए हैं... ताकि उन्हें खून बराबर मिलते रहे...

विश्व - यह लोग ऐसा कैसे कर सकते हैं... इनका ईमान धर्म कुछ नहीं है... समाज के लिए... कोई जिम्मेवारी नहीं बनती इनकी...

डैनी - नहीं... नहीं बनती कोई जिम्मेवारी... यह एक करप्ट नेक्सस है... इसका कोई इलाज नहीं है... यह सिस्टम को रन करने वाले... इसका शील्ड बन कर हिफाजत कर रहे हैं... तुम इस पर डेंट लगाने की कोशिश कर रहे हो...

विश्व - (मुस्कराते हुए) जब पहली बार... मैं राजा को मारने के लिए... महल में घुसा था.. तब.. मुझे उसके पाले हुए कुत्तों ने दबोच कर... जमीन पर मुहँ के गिरा रखा था... तब एक ऊँचाई पर खड़े होकर... भैरव सिंह ने कहा था... के वह जिस ऊँचाई पर खड़ा है... उसे देखने की कोशिश करूँगा... तो मेरी रीढ़ की हड्डी टुट जायेगी... वह उसका विश्वरूप था... (फोटोग्राफ देखते हुए) अब समझ में आ रहा है... मैं उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता...

डैनी - मैं जिस विश्व को जानता हूँ... वह कभी हार नहीं मानता था... तुम तो अभी से मायूस हो गए...

विश्व - अगर लड़ाई मेरी अपनी होती... तो अंगद की तरह डट जाता... पर यह लड़ाई मेरी नहीं... गाँव वालों की है... क्या न्याय हो पाएगा...

डैनी - विश्व... दशकों नहीं सदियों से... दबे कुचले लुटे पीटे लोगों का आक्रोश हो तुम... उनके भीतर दहकते प्रतिशोध का बारूद हो तुम... तुम अपने पर विश्वास मत खो देना... मैं जानता हूँ... मानता भी हूँ... इस लड़ाई को तुम ही जीतोगे...

विश्व - (बेंच से उठ कर सामने रेलिंग पर हाथ रखकर खड़ा हो जाता है) कैसे... कैसे... (डैनी की तरफ मुड़ कर) मैंने रुप फाउंडेशन पर... पीआईएल फाइल की थी... जिस पर नई एसआईटी भी बनी... पर कोई प्रोग्रेस नहीं...

डैनी - तो तुम इसबार... रिट पिटीशन दायर करो... और दोनों केस को क्लब करने की कोशिश करो...

विश्व - उससे क्या होगा... एक प्रमुख गवाह... पता नहीं गायब है... या फिर अंडरग्राउंड है...

डैनी - कौन...

विश्व - पूर्व एसआईटी के प्रमुख... श्रीधर परीड़ा...

डैनी - तुम तैयारी तो करो... हो सकता है... परीड़ा... इसी मौके का इंतजार में हो...

विश्व - मौका... (हँसने लगता है) मैंने भैरव सिंह की प्लान का काउंटर बनाया... तो पता नहीं केके... जो भैरव सिंह से कुछ ही महीने पहले दुश्मनी कर रहा था... कल अदालत में... भैरव सिंह के लिए... अपनी दौलत को ज़मानत देने के लिए पहले से ही तैयार था....

डैनी - ऐसा इसलिए हुआ.... क्यूँकी... कल अदालत में जो भी हुआ... उसके लिए... बल्लभ पहले से ही प्लॉट तैयार कर रखा था...

विश्व - क्या... यहाँ भी बल्लभ...

डैनी इसबार फिर अपनी आस्तीन से लिफाफा निकाल कर कुछ और फोटोस निकाल कर विश्व के हाथ में दे देता है l विश्व देखता है उन फोटोस में बल्लभ, भैरव सिंह और केके दिख रहे थे l भैरव सिंह एक जुडिशल स्टाम्प पेपर में दस्तखत कर केके को दे रहा था l और अंतिम फोटो में केके और भैरव सिंह हाथ मिला रहे थे l

विश्व - यह... यह कब हुआ...

डैनी - परसों... भैरव सिंह जिस जुडिशल कस्टडी में लाया गया था... उसी रात को... बल्लभ केके को लेकर भैरव सिंह से मिलवाने ले गया था... और इसकी अरेंजमेंट... ऑन ऑफिशियली होम मिनिस्टर ने कराया था...

विश्व - (खीज जाता है) अगर सिस्टम और क्रिमिनल के बीच गठजोड़ हो गया है... तो हम क्या कर सकते हैं... और इन फोटोस में साफ दिख रहा है... इनके बीच कोई... डील हुई है...

डैनी - हाँ... कोई डील तो हुई है... पर क्या हुई है... आई एम सॉरी... मैं नहीं जानता....

विश्व वापस आकर बेंच पर बैठ जाता है l डैनी उसके कंधे पर हाथ रख सकता है l थोड़ी देर के बाद

विश्व - मुझसे यह एक गलती कैसे हो गई... मुझे बल्लभ पर नजर बनाए रखना था..

डैनी - तब भी तुम कुछ नहीं कर पाते... हाँ तुम्हारे पास इंफॉर्मेशन तो होता... पर उससे तुम्हें या तुम्हारे केस को कोई फायदा नहीं होता...

विश्व - कुछ समझ में नहीं आ रहा... मैं कैसे इस केस की पैरवी करूँ...

डैनी - वैसे ही... जैसे एक ईमानदार और समर्पित वकील अपनी केस के लिए पैरवी करता है...

विश्व - डैनी भाई... क्या आप मुझे... इस केस में कोई मदत कर सकते हैं...

डैनी - मैं कटक आया ही इसलिए था... पर सच कहूँ तो... राजगड़ या यशपुर में... मैं लाचार हो जाऊँगा... मैं भैरव सिंह के इलाके में... कोई मदत नहीं कर सकता... पर विश्व... यह मत भूलो... वह इलाक़ा तुम्हारा भी है... तुमने... राजा के ही इलाके में... इंस्पेक्टर रोणा को ठिकाने लगाया था...

विश्व - यह आप कैसे जानते हैं...

डैनी - मुझे इस सवाल की उम्मीद नहीं थी...

विश्व - ओह... सॉरी...

डैनी - कोई बात नहीं... हाँ मैं फिजीकली तो कोई मदत कर नहीं पाऊँगा... पर किसी भी तरह की लॉजिस्टिक मदत जब भी चाहोगे... तुम्हारे लिए अवेलेवल करवा दूँगा...

विश्व - थैंक्स...

डैनी - (उठते हुए) अब मुझे जाना होगा...

विश्व - थोड़ी देर रुक जाते.. डैड आते ही होंगे...

डैनी - (मुस्कराते हुए) हाँ आते ही होंगे... पर चिढ़े हुए... गुस्से में...

विश्व - वह क्यूँ...

डैनी - मेरे बंदे उन्हें रोके रखा था... इसलिए... (इतना कह कर वह फोटो वाली लिफाफा विश्व को दे देता है) इसके अंदर मेरा कार्ड भी है... तुम जब चाहे मुझसे कॉन्टैक्ट कर सकते हो...

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दुकान में ग्राहक कम हैं l टीलु एक पेपर हाथ में लेकर गौरी के सामने पढ़ रहा था l गौरी उसकी हरकत से चिढ़ रही थी और मन ही मन टीलु को गरिया रही थी l टीलु भी कुछ ना कुछ ऐसा करता था जिससे गौरी खीज कर दो चार गालियाँ बक देती है l

गौरी - बेशरम... निखाट्टु... नालायक... जब देखो... मुहँ उठा कर चला आता है... पेट भर ठूंसता रहता है... और (टीलु डकार लेता है) अजगर की तरह डकार लेता रहता है...

टीलु - देखा... बिना खाए भी मैं डकार ले सकता हूँ... (फिर डकार लेता है)

गौरी - नाशपीटे... कीड़े पड़े तेरे ऊपर... मुझे चिढ़ाता है...

टीलु - क्यूँ तेरे पास कौनसा काम रहता है... जब देखो मुहँ फुलाए बैठी रहती है... अरे शूकर मना.. मेरी वज़ह से तेरे मकड़ी जाली वाली चेहरे पर... रौनक तो आती है...

गौरी - नामुराद... मेरा चेहरा तुझे मकड़ी की जाली जैसी लगती है...

टीलु - और नहीं तो... जरा गौर से देख... झुर्रियाँ इतनी है कि... मकड़ी भी सोच रहा होगा... कौन जाला बनाए... वह तो मुझे गली देते ही... तेरे चेहरे के पेशियों की कसरत होती है... जिसके वज़ह से... तु बुढ़ीआ से... कभी कभी गुड़िया लगती है...

गौरी - मेरा मज़ाक उड़ा रहा है... देखना तुझे... खुजली वाले कुत्ते गालियों में दौड़ा दौड़ा कर काटेंगे...

टीलु - कुत्ते काटे या ना काटे... इस बात की तुझे बड़ी खुजली है बुढ़ीया...

गौरी - बस बहुत हो गया... अगर फिर कुछ मुहँ से निकाला... तो ऐसी जगह मारूंगी.. के ना तुझसे बैठा जाएगा... ना खड़ा हो पाएगा...

टीलु - अच्छा यह बात है... चल फिर एक एक राउंड हो जाए...

टीलु पेपर रख कर अपनी जगह से उठता है और अपना पिछवाड़ा गौरी को दिखा कर हिलाने लगता है l गौरी अपनी डंडा उठा कर टीलु के पिछवाड़े पर बरसाने लगती है l

टीलु - आह.. हाय हाय... वाह... क्या बात है... और जोर से... आह... (गौरी चिढ़ कर और जोर से मारने लगती है थोड़ी देर के बाद) बस बस... रुक जा बुढ़ीया... थक गई होगी... जम के साँस ले.. तब तक मैं खाना खा लेता हूँ...

गौरी - (अपनी डंडा फेंक कर) जा मुए.. जा मर... अगर फिर भी तेरा भूख ना मिटे... तो सीधे चूल्हे पर जा बैठ...

टीलु - ठीक है... बैठ जाऊँगा... पर भूना हुआ टीलु को तु खाएगी क्या...

इनकी यह नोक झोंक जब से वैदेही देख रही थी वह तब से वह पेट पकड़ कर हँसे जा रही थी l जब हँसते हँसते उसके आँखों में पानी आ गई तब टीलु उसके पास पहुँचता है l वैदेही अपनी हँसी को दबाने की कोशिश करते हुए टीलु पूरी सब्जी थाली में परोस कर दे देती है l टीलु थाली लेकर गौरी के पास बैठ कर मुहँ से चपड़ चपड़ की आवाज़ निकाल कर खाने लगता है l गौरी उसे खा जाने वाली नजर से घूरती है l यह देख कर वैदेही और जोर से हँसने लगती है l तभी एक शख्स दुकान पर आता है l

शख्स - दीदी...

वैदेही - (मुड़कर उसे देखती है) हाँ...

शख्स - आपने शायद पहचाना नहीं... मैं बिल्लू... विशु का दोस्त...

वैदेही - हाँ हाँ... हाँ... पहचाना... बिल्लू... बिल्वधर... कहो क्या हुआ... बड़े सालों बाद आए...

बिल्लू - वह... मेरी बेटी मल्लि...

वैदेही - क्या मल्लिका... तुम्हारी बेटी है...

बिल्लू - हाँ... अपने दोस्तों के साथ.. अक्सर... विशु के वहाँ... या आपके यहाँ आती थी...

वैदेही - हाँ... क्या हुआ उसे... कहाँ है वह...

बिल्लू - वह... बात दरअसल यह है कि... (रुक जाता है)

वैदेही - क्या हुआ उसे...

बिल्लू - पता नहीं...

वैदेही - मतलब...

बिल्लू - (झिझकते हुए) वह... आपको बुला रही है... सिर्फ आपसे बात करना चाहती है...

वैदेही - (कुछ सोचने लगती है, फिर) हाँ चलो... (गौरी से) काकी... मैं मल्लिका के घर जा रही हूँ... दुकान का खयाल रखना...

इतना कह कर वैदेही बिल्लू के साथ चली जाती है l गौरी अपनी जगह से उठती है और दुकान के दरवाजे के पास जाती है l वैदेही और बिल्लू को जाते हुए देखती है l जब दोनों उसकी आँखों से ओझल हो जाते हैं तब वह मुड़ कर टीलु की ओर देखती है l टीलु अपना खाना ख़तम कर हाथ मुहँ धो आता है और गौरी के सामने खड़े होकर बड़े जोर से डकार मारता है l

गौरी - पेट भर गया...

टीलु - क्यूँ नजर नहीं मार पाई क्या...

गौरी - (अपने दोनों हाथों से टीलु को मारने लगती है) कमबख्त... तेरी दीदी को कोई बुला कर कहीं ले गया है... तेरी हलक से खाना कैसे उतरा... नामुराद...

टीलु - (नाखुन से दांत के बीच खाना साफ करते हुए बड़ी ढीठ के साथ मार खा रहा था, जब चिढ़ कर गौरी रुक जाती है) थक गई...

गौरी - मुझसे बात मत कर...

टीलु - ठीक है... मैं सो रहा हूँ... दीदी आए तो जगा देना...

टीलु यह कह कर बेंच पर लंबा हो जाता है l गौरी मन ही मन टीलु को गरियाते हुए अपनी जगह पर बैठ जाती है और बार बार वैदेही के आने की राह देख रही होती है l जब कुछ समय बीत जाता है तब गौरी जाकर बेंच पर सोए टीलु को धक्का देती है l टीलु हड़बड़ा कर उठ जाता है l अपनी चारों और नजर घुमाता है l

टीलु - दीदी कहाँ है..

गौरी - वही तुझसे पूछ रही हूँ... कहाँ है तेरी दीदी... खा खा कर... अजगर की तरह लेटा हुआ है... तेरी दीदी अभी तक नहीं आई... क्यूँ नहीं आई... कोई खबर है तुझे...

टीलु - (घड़ी देखता है) क्या बुढ़ीया... पंद्रह मिनट ही तो हुए हैं...

गौरी - मुझे कुछ नहीं पता... मुझे ले चल... उस मल्लिका के घर...

टीलु - (मुहँ बना कर) ठीक है बुढ़ीया.. चल...

गौरी झट से दुकान बंद कर ताला डालती है l फिर दोनों मल्लिका के घर की ओर जाने लगते है l टीलु के कदम जहां मुश्किल से उठ पाता वहीँ गौरी भागते हुए जाती है l कुछ देर बाद दो गली के बाद एक घर के पास पहुँचते हैं l एक घर के बाहर वैदेही कुछ औरतों के साथ खड़ी कुछ बातेँ कर रही थी और बिल्लू को कुछ हिदायत दे रही थी l यह सब देख कर टीलु अपनी आँखे बड़ी कर मुहँ बना कर गौरी को देखता है l गौरी भी सकपका कर नजरें चुरा लेती है l इन्हें देखने के बाद वैदेही इनके साथ लौटने लगती है l बीच रास्ते में गौरी पूछती है

गौरी - यह बिल्लू को.. तु पहले से ही जानती थी क्या... कभी देखा नहीं उसको...

वैदेही - हाँ... वह विशु के बचपन का दोस्त है... वह... आठ साल के बाद... हमें ढूंढते हुए आया था...

टीलु - क्या... आठ साल बाद... यही तीसरी गली में रहते हुए...

गौरी - वैसे... मल्लिका को हुआ क्या था...

वैदेही - कुछ नहीं काकी... मल्लिका अब बच्ची नहीं रही... सुबह बाथरूम गई थी... जहां वह रजस्वला हो गई... इसलिए उसने अपने बाप के हाथ... मुझे बुलवाया था...

गौरी - क्यूँ... उसकी माँ नहीं थी क्या...

वैदेही - नहीं... आज से आठ साल पहले... उसकी माँ ललिता... उसने आत्महत्या कर ली थी...

गौरी - आत्महत्या... पर क्यूँ...

वैदेही - उसीकी आत्महत्या ने तो विशु को बदल कर रख दिया... आज विशु भैरव सिंह के खिलाफ.. लाली के आत्महत्या के कारण ही तो हो गया था...

टीलु - लाली की आत्महत्या से विश्वा भाई का क्या नाता...

वैदेही बताने लगती है विश्व के सरपंच बनने के बाद कैसे एक दिन बाहर फिल्म चलाया गया था l उसी रात लाली को राजा ने उठा लिया था और उसका बलात्कार किया था l लोक लाज के चलते शर्म के मारे लाली ने आत्महत्या कर दी थी l राजा खुद खड़े हो कर इंस्पेक्टर रोणा से रिपोर्ट लिखवाया था कि बिल्लू ना मर्द था l अपनी शरीर की दाह ना बुझा पाने की वजह से लाली ने आत्महत्या की थी l विडंबना यह थी के वैदेही की लाश के पास बैठ कर चार साल की छोटी बच्ची मल्लिका रो रही थी l रिपोर्ट पर दस्तखत दो लोगों ने किया था l पहला बिल्लू और दूसरा विश्व l यही वह घटना थी जिसने विश्व के भीतर विद्रोह को जन्म दे दिया था और उसका परिणाम में आज उनकी हालत ऐसी है l

टीलु - राजा भैरव सिंह ने.. सच ही तो कहा था... बिल्लू ने अपनी नपुंसकता पर खुद ही दस्तखत कर मोहर लगाई थी... पर जो भी हुआ अच्छा हुआ... उस घटना ने... राजगड़ की धरती पर... एक मर्द को जन्म दिया...

ऐसे बात करते हुए तीनों दुकान पर पहुँच जाते हैं l गौरी से चाबी लेकर टीलु दुकान खोलता है तीनों अंदर आते हैं l वैदेही देखती है गौरी अंदर से डरी हुई लग रही थी l किसी सोच में खोई हुई थी l

वैदेही - क्या हुआ काकी... तुम ऐसे सहम क्यूँ गई... मैंने ऐसा क्या कह दिया...

गौरी - यह ठीक नहीं हुआ बेटी... यह ठीक नहीं हुआ...

वैदेही - क्या ठीक नहीं हुआ...

गौरी - मल्लिका का रजस्वला इस समय होना... ठीक नहीं हुआ...

वैदेही - बारह साल की हो गई है... मैं भी इसी उम्र में रजस्वला हुई थी...

गौरी - तु समझ नहीं रही है... राजा को इसी जैसी लड़की की तलाश है... क्षेत्रपाल जो राक्षसी रश्म करते हैं... यही तो है... अपनी ही बलात्कार की हुई औरत की बेटी के साथ भी बलात्कार करते हैं... तु देखना... जैसे ही राजा को खबर लगेगी... मल्लिका को उठवा लेगा...

यह सुन कर वैदेही भी शुन पड़ जाती है उसका मुहँ खुला रह जाती है l एक अनजानी सी भय उसके चेहरे पर उभरने लगती है l

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गुनगुनाते हुए अपने बाथरुम से केके निकल कर बेडरुम में आता है l उसके बदन पर बाथरोब था l टावल से सिर के बाल पोछते हुए वार्डरोब खोलता है l एक शूट निकाल कर बेसुरे आवाज में गाना गाने लगता है

"आएगी वह आएगी दौड़ी चली आएगी...

सुनके वह मेरी आवाज़ आएगी"

शूट पहनने के बाद जब अपने शूट पर फैगनेंस डाल रहा होता है l उसके कानों में ताली सुनाई देती है l केके उस आवाज के तरफ मुड़ता है l कमरे में ताली बजाते हुए रॉय अंदर आता है l रॉय को अपने कमरे में देख कर केके हैरान हो जाता है l

केके - तुम... यहाँ

रॉय - हाँ मैं... यहाँ..

केके - क्यूँ आए हो यहाँ पर... (चिल्ला कर) तुम्हें अंदर आने किसने दिया...

रॉय - रिलैक्स... मैं यहाँ आया नहीं हूँ... भेजा गया हूँ...

केके - किसने भेजा है तुम्हें... तुम तो सब कुछ छोड़ छाड़ कर जाने वाले थे ना..

रॉय - बताता हूँ... बताता हूँ... इतनी जल्दी भी क्या है...

केके - जल्दी क्या है... एक तो बिना इजाजत के घर में घुस आये हो... बल्कि बेडरुम में घुस आये हो... तुम्हें किसी ने रोका नहीं...

रॉय - नहीं रोका किसीने... क्यूँकी इससे पहले भी... यहाँ आना जाना रहा है मेरा... और तुमने भी तो... मुझे रोकने के लिए किसी से कहा भी नहीं है...

केके - हाँ यह गलती मेरे तरफ से हुई है... अभी सुधार देता हूँ... नाउ गेट ऑउट...

रॉय - ना.. मैं यहाँ गेट ऑउट होने नहीं आया हूँ.. कहा ना... मैं यहाँ आया ही नहीं हूँ.. बल्कि भेजा गया हूँ...

केके - (थोड़ा नरम पड़ते हुए) किसने भेजा है...

रॉय - बताता हूँ... बताता हूँ... पहले मुझे कुछ सवालों का जवाब... तुमसे लेने दो...

केके - हाऊ डैर यु... यह आप से तुम पर कब आ गए...

रॉय - जब तक तुम्हारा खाता था... तुम्हारा ही बजाता था... और तब तुम्हें... आप कहता था... अब जब तुम्हारा नहीं खा रहा... तो तुझे आप क्यों कहूँ बे...

केके - ओ... आ गया अपनी कुतियापा पर... भोषड़ी के चल निकल...

रॉय - अबे सुन बे... साले... तुझे पहले भी बता चुका हूँ... मैं अब जिसका खा रहा हूँ.. उसीका बजा रहा हूँ... उसीने मुझे भेजा है...

केके - किसने भेजा है...

रॉय - बताता हूँ... तुझे तेरी दौलत के गागर से... दो छींटे माँगा था... तुने दी नहीं... पर ऐसा क्या हो गया... अपनी पूरी की पूरी गागर... राजा भैरव सिंह के लिए... अदालत में जमा दे दिया...

केके - तुझसे मतलब... मैं तुझे क्यूँ बताऊँ...

रॉय - हाँ... तेरी दौलत है... तेरी मर्जी है... जब खाने वाला कोई है ही नहीं... तो राजा ही खा जाए... क्या फर्क़ पड़ता है... मैं बस यही सोच रहा था... जिस दौलत के लिए... तु शादी बनाने वाला था... वायग्रा खा कर.. अपना वारिस पैदा करने वाला था... उसी दौलत को... राजा भैरव सिंह के कहने पर... अदालत में जमा कर दिया...

केके - जब तु कह ही रहा है... दौलत मेरी.. मर्जी मेरी... तो भोषड़ी के तेरी सुलग क्यूँ रही है... अब सीधी तरह से बता... तु यहाँ आया किसलिए है... तुझे भेजा किसने है...

रॉय - हाँ बताना तो पड़ेगा... तो सुन... जिस ESS के आने के बाद... मेरी रॉय ग्रुप सिक्युरिटी सर्विस... कुछ ही सेक्टर में लिमिट हो गई थी... आज वही ESS का मैं सीईओ हूँ... (कह कर सोफ़े पर बैठ जाता है)

केके - क्या... तु अब... ESS का सीईओ है...

रॉय - हाँ...

केके - ओ... अब समझा...

रॉय - कुछ नहीं समझे... इसे कहते हैं किस्मत... समझा... किस्मत...

केके - अच्छा... (उसके सामने वाली सोफ़े पर बैठते हुए) यह हुआ कैसे...

रॉय - तुने दुत्कार कर जो टीप.. दारु और चखना खाने के लिए... दिए थे... उसे लेकर मैं.. सिल्वर सिटी बार में उड़ा रहा था... तभी मेरे पास... राजा भैरव सिंह के वकील... बल्लभ प्रधान आया था... मेरे... और तेरे बारे में पूछने लगा... फिर उसने मुझे... ESS के सीईओ बनने का ऑफर दिया... मैंने एक्सेप्ट भी कर लिया...

रॉय - मतलब... जिस ESS ऑफिस में... मक्खी भी नहीं उड़ रहे हैं... उसका जिम्मा तुझे दे दिया गया...

रॉय - क्यूँ तुझे जलन हो रहा है... कोई नहीं... तुझे नौकरी चाहिए तो बोल... पियोन की नौकरी दे सकता हूँ...

केके - औकात में रह कुत्ते... तुझे ESS की हड्डी फेंक कर और क्या काम ले रहे हैं...

रॉय - ESS की हड्डी नहीं... सीईओ की गद्दी... और एक लिस्ट... जिन्हें मुझे ESS के लिए रिक्रूट करना है...

केके - और

रॉय - मैंने प्रधान को बताया... कैसे तुने अपनी मतलब निकाल कर... मुझे दूध में से मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दिया... फिर जब उसने फिर से तेरे बारे में पूछा तो मैंने बताया... के तु एकदम से सठीया गया है... तुझे बेटे को खोने का कोई ग़म नहीं है... पर अब कैसे.. फिर से शादी करने के लिए मरा जा रहा है... एक बार दिल को झटका लग चुका है... फिर भी बुढ़ापे में दिल लगाने के लिए मरा जा रहा है...

केके - ह्म्म्म्म फिर...

रॉय - फिर क्या... तुने मुझे किनारा किया... मैं तुझसे बदला लेना चाहता था... और किस्मत ने भी क्या खूब साथ दिया... तेरी दौलत पर... राजा साहब ने अपने लिए जमा ले ली...

केके - ओ... मतलब तु ही वह सुअर है... जिसने मेरे नाम पर गंध फैलाने की कोशिश की... ह्म्म्म्म...

रॉय - हाँ की... तो... और मजे की बात देख... कहीं तु भाग ना जाए... शायद इसलिए... पर कोई ना... जब राजा साहब.. बाहर आ जाएंगे... मैं तुझे अपना ऑफर दोहरा दूँगा... आकर मेरे चैंबर के बाहर पियोन की नौकरी कर लेना..

केके - हा हा हा हा हा...

केके ऐसे हँसने लगता है जैसे रॉय ने कोई जोक मारा हो l हँसते हँसते हुए अपनी जगह से उठता है और वार्डरोब के पास जाता है l वार्डरोब खोल कर कुछ जुडिशल पेपर निकालता है और फिर आकर सोफ़े पर बैठ जाता है l

रॉय - जानता था... जब सच्चाइ मालुम पड़ेगी... तुझ पर पागलपन का दौरा पड़ेगा... पता था..

केके - (हँसते हुए) अब मेरी बारी... हाँ मेरी बारी... यह ले... (कह कर यह नोट की बंडल रॉय की ओर फेंकता है, रॉय नोट की बंडल पकड़ लेता है)

रॉय - यह किसलिए...

केके - क्या कहा था तुने... पिछली बार... दारु के साथ... सिर्फ चखना खाया था... जा... आज किसी मखना के साथ... रात गुलजार कर जा...

रॉय - क्या तु सच में पागल हो गया है...

केके - मेरे बारे में तुने जो भी जानकारी दी... उसे लेकर... प्रधान... मेरे पास आया... और मुझे लेकर राजा साहब के पास लेकर गया... जहां राजा साहब ने... मुझे यह ऑफर की...

इतना कह कर केके रॉय को हाथ में वह जुडिशल पेपर दे देता है l रॉय थोड़ी हैरानगी के साथ पेपर हाथ में लेता है और पढ़ने लगता है l थोड़ी देर बाद उसके माथे पर पसीना उभरने लगता है l वह जो बड़ी ठाठ से सोफ़े पर बैठा हुआ था स्प्रिंग की तरह उछल कर खड़ा हो जाता है l

रॉय - (हकलाते हुए) क... क के के... साहब... माफ़ कर दीजिए...

केके - कुछ देर पहले क्या कह रहा था... मुझे तु पियोन बनाएगा...

रॉय - चमड़े का जुबान है... फिसल गया... दिल पर मत लो साहब...

केके - अब समझा... तु अब मेरे पास... क्या करने आया है...

रॉय - जी जी... अच्छी तरह से... मैं तो आपका गुलाम हूँ... बस हुकुम कीजिए...

केके - बैठो...

रॉय - जी...

केके - बैठ...

रॉय - जी जी.. (बैठ जाता है)

केके - औकात के हिसाब से टीप दिया जाता है... समझा...

रॉय - जी... जी केके साहब...

केके - और क्या बातेँ हुईं... प्रधान के साथ...

रॉय - वह... मुझसे... रंगा का पता पूछ रहे थे... मैंने उन्हें बता भी दिया...

केके - ह्म्म्म्म... गुड... मतलब बहुत जल्द रंगा भी हमारे खेमे में होगा...

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सेनापति का घर

ड्रॉइंग रुम में सेनापति दंपति, सुभाष सतपती, इंस्पेक्टर दास, जोडार, विश्व और उसके तीन दोस्त बैठे हुए हैं l विश्व अपनी कुहनियों के भार घुटनों पर डाल कर दोनों हाथों में अपना चेहरा लेकर आँखे मूँदे बैठा हुआ था l

प्रतिभा - क्या बात है प्रताप... सभी आ गए हैं... या कोई और भी आने वाला है...

विश्व - (अपनी आँखे खोलता है) हाँ माँ... इस वक़्त हमारे महफिल में... एक शख्स की कि कमी है... उसे आ जाने दीजिए...

जोडार - तुम बहुत टेंशन में लग रहे हो... क्या कोई खतरे की बात है...

सतपती - हाँ विश्व... क्या बात है... हमें यहाँ आए पंद्रह मिनट हो चुके हैं...

प्रतिभा - वही तो... इतने लोग हैं यहाँ पर... पर कमरे में सन्नाटा पसरा हुआ है... और तुम किन्ही विचारों में खोए हुए हो...

विश्व - ठीक है... जब तक मेरा वह आदमी नहीं आ जाता... जिसके मन में... जो भी शंका है... पूछ लीजिए...

मीलु - भाई... जाना कब है... (सभी उसे घूर कर देखने लगते हैं, वह अपना चेहरा सीलु के पीछे छिपाने लगता है)

विश्व - चलिए छोड़िए... बातों का सिलसिला मैं ही शुरु करता हूँ... (सतपती से) सतपती जी... अब आप ही बताइए... रुप फाउंडेशन की तहकीकात की कोई डेवलपमेंट...

सतपती - नहीं... अब तक कुछ भी नहीं...

विश्व - क्यूँ...

सतपती - क्यूँ... क्या मतलब क्यूँ... अदालत की ऑर्डर मिलने के बाद... एक नई एसआईटी बनाई गई...

विश्व - जिसका इनचार्ज आपको बनाया गया... वह भी एसीपी की प्रोमोशन दे कर...

सतपती - तुम कहना क्या चाहते हो...

विश्व - यही की आपने जो बताया है... वह सब पुरानी बासी खबर है... नया कुछ भी नहीं... सरकार ने... एसआईटी बना कर पल्ला झाड़ लिया है... आपकी टीम को... कोई एसओपी नहीं दी गई है... राइट... (सतपती अपना सिर सहमती से हिलाता है)

दास - विश्वा इस बात से तुम क्या समझाना चाहते हो... क्या तुम्हें होम मिनिस्ट्री की कारवाई पर शक़ कर रहे हो...

विश्व - हाँ... शक नहीं... बल्कि मैं यह कह रहा हूँ... के सरकार अब... मेरे हर ऐक्ट पर रोड़े डालने वाली है...

सतपती - तुम इतनी जल्दी निष्कर्ष पर कैसे पहुँच गए... अभी तक तुम्हें जितनी भी... प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुप से सहायता मिली है... ईफ आई एम नॉट रॉंग... वह सब सरकार ने... तुम्हारे लिए एक्सटेंड किया था...

दास - हाँ इस पर मैं अग्रि करता हूँ... तुमने देखा नहीं... सिर्फ चौबीस घंटे में ही कैसे राजा को होम अरेस्ट किया गया...

प्रतिभा - एक मिनट... अगर प्रताप ने बात छेड़ी है... तो पक्का... बिना सोर्स या सबूत के तो नहीं कह रहा होगा...

प्रतिभा के इस बात का बहुत प्रभाव पड़ता है l सब के सब चुप हो जाते हैं और विश्व की ओर देखने लगते हैं l विश्व अपनी जगह से उठता है, ड्रॉइंग रुम के एक टेबल के पास जाता है और ड्रॉयर खोल कर एक लिफाफा निकलता है l लिफाफे से कुछ फोटोग्राफ्स निकाल कर सबके सामने टी पोय पर रख देता है l सभी एक दो फोटो हाथ में लेकर देखने लगते हैं l

सतपती - इन फोटोस का मतलब...

दास - यह... भैरव सिंह का लीगल एडवाइजर बल्लभ प्रधान है ना...

सतपती - (फोटोस को गौर से देखता है) यह.... होम मिनिस्टर जी का ऑफिस है... (एक पॉज लेने के बाद) फिर भी... इन फोटोस का मतलब...

विश्व - इन फोटोस में ही... छुपा है... क्यूँ अदालत में... भैरव सिंह ने वह चाल चला था... स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट की फॉर्मेशन और ट्रांसफर होने वाली है... जिसकी क्लियरेंस... होम मिनिस्ट्री से अगली सुनवाई में मिलने वाली है...

तापस - एक मिनट... तुम्हें यह फोटोग्राफ्स कैसे मिले...

विश्व - इसे... एक मेरे शुभचिंतक ने उपलब्ध करवाये हैं...

तापस - ऐसा कौनसा शुभचिंतक है तुम्हारा...

विश्व - वही... जिसके बंदों ने... कल... जॉगिंग में आपको रोके रखा था...

तापस - (बिदक कर) वह लोग... कमबख्त जाहिल लोग...

फिर अचानक चौंकता है विश्व की और देख कर भौंहे सिकुड़ कर इशारे से सवाल पूछता है “क्या वही है " विश्व भी जबड़े भिंच कर सिर हल्का सा हिला कर कहता है " हाँ वही है "

सतपती - इससे... रुप फाउंडेशन की केस का क्या संबंध है...

प्रतिभा - ओ कॉम ऑन सतपती... तुम अपनी पोस्ट और पोजिशन की डिग्निटी मेंटन करो... प्रताप के इतना खुलासे के बाद... यह पूछना.. के रुप फाउंडेशन से क्या संबंध है... (सतपती अपना सिर झुका लेता है)

दास - (तापस से) आपने सही कहा था सर... भैरव सिंह ने... शतरंज की सोलह घर की चाल चल दी...

प्रतिभा - क्या... (तापस से) इस बात का आपको पहले से अंदेशा था... और यह सोलह घर की चाल का मतलब...

विश्व - माँ... जब ओपोनेंट मजबूत हो... और अपनी पोजीशन खराब हो... तो शतरंज में एक देशी चाल है... जिससे मैच ड्रॉ कराया जाता है...

दास - इसका मतलब यह हुआ... की हम दोनों तरफ़ से पिसेंगे...

सीलु - यह तो बहुत बुरा हुआ... पीसने की लिस्ट में... अब दास बाबु और पत्री बाबु भी आ गए...

सतपती - इतनी जल्दी कुछ नहीं होता... कानून अंधा जरूर होता है... पर कमजोर नहीं... विश्वा... तुम्हें अगर इतना आभास हो गया था... तो काउंटर में... तुमने तो कुछ किया होगा...

विश्वा - हाँ... मैंने एक रिट पिटीशन फाइल की है... इमर्जेंसी के बेसिस पर... उम्मीद है... सातवें दिन... उसकी भी हियरिंग होगी...

तभी कलिंग बेल बजती है l सीलु जाकर दरवाजा खोलता है l दरवाजे पर लेनिन खड़ा था l सीलु के साथ लेनिन अंदर आता है l

प्रतिभा - यह... यह यहाँ क्यूँ आया है... (विश्व से) क्या यही तुम्हारा वह आदमी है...

विश्व - हाँ माँ यही है... (लेनिन से) कोई खबर लाए हो...

लेनिन - हाँ... दो दिन पहले... राजा का वकील.. बड़बिल आया था... रंगा का खोज खबर ले रहा था... फिर रंगा को लेकर... यहाँ आ गया है... मैं उन्हीं लोगों के पीछे पीछे आया हूँ...

विश्व - क्या उन्हें तुम पर किसी तरह का कोई शक हुआ है...

लेनिन - नहीं... सब क्लीन है...

प्रतिभा - तुमने बताया नहीं.. यह यहाँ किस लिए आया है...

विश्व - माँ तुम और डैड... जब तक यह केस ख़तम नहीं हो जाता... तब तक... लेनिन के साथ... लेनिन के पास रुकोगे... दुनिया जहां से बेख़बर...

जोडार - यह क्या कह रहे हो विश्वा... क्या तुम्हें मुझ पर... या मेरे सेक्यूरिटी पर भरोसा नहीं है...

विश्व - ऐसी बात नहीं है जोडार साहब... मैंने कहीं पर भी... आप पर भरोसा खोया नहीं है... पर भैरव सिंह... अब जो भी करने जा रहा है... उसका हर एक कदम... हर एक प्रयास... मेरे खिलाफ होगा...

सतपती - तुम बेकार में... उसे ओवर हाइफ कर रहे हो... ऐसा कुछ नहीं होगा...

विश्व - नहीं सतपती जी... भैरव सिंह को अपनी गलती का एहसास हो गया है... मुझे अंडर एस्टीमेट कर के... मैंने ही उसके मूँछों पर... बेइज्जती का पंजा मारा है... अब वह अपनी हार गलती को सुधारना चाहता है... इसीलिए तो... जो भी मेरे खिलाफ है... उसे अपनी खेमें में सामिल कर रहा है...

जोडार - फिर भी... वह यहाँ क्या कर पाएगा... अब तो उसका बेटा उसके साथ नहीं हैं...

विश्व - इसीलिए तो... वह अब सबकुछ कर पाएगा...

प्रतिभा - मैं कहीं नहीं जाऊँगी...

विश्व - माँ प्लीज... तुम और डैड अगर लेनिन के पास रहोगे... मैं निश्चिंत हो कर... भैरव सिंह का मुकाबला कर सकता हूँ...

प्रतिभा - नहीं नहीं... हरगिज नहीं...

तापस - भाग्यवान... प्रताप ठीक कह रहा है... यह लड़ाई उसकी है.. और हमें उसका साथ देना चाहिए...

प्रतिभा - आप भी... आप इस तरह बुजदिली क्यूँ दिखा रहे हैं... हम मुकाबला करेंगे... अगर आपको कहीं जाना है... तो जाइए... मैं कहीं भी नहीं जाने वाली...

तापस - (चिल्ला कर) भाग्यवान... हमें... इस लड़ाई में... प्रताप की ताकत बनना है... उसकी कमजोरी नहीं.. तुम भी जानती हो... हम राजगड़ नहीं जा सकते... प्रताप का ध्यान और लड़ाई दोनों... राजगड़ रहेगा... तो वह कुछ कर पाएगा... अगर हम यहाँ रहे... तो लड़ाई का दूसरा छोर यहीं पर खुल जाएगा... जरा समझो...

प्रतिभा गुस्से से तमतमाते हुए अंदर चली जाती है l विश्व बड़ी बेबसी के साथ तापस की ओर देखता है और इशारे से प्रतिभा को समझाने को कहता है l तापस भी इशारे से दिलासा देते हुए अंदर चला जाता है l

दास - एक बात समझ में नहीं आई... केके कल तक चेट्टी के खेमे में रह कर भैरव सिंह से दुश्मनी कर रहा था... फिर अचानक उसके खेमें में पहुँचा कब... क्या भैरव सिंह ने उसे माफ़ कर दिया...

विश्व - यह रही आपका जवाब... (कह कर जुडिशल कस्टडी में हुई मुलाकात की फोटोस टेबल पर रखता है)

विश्व - (सतपती से) क्या अब भी आपको शक है... इस पोलिटिकल और क्रिमिनल एलायंस पर... गौर से देख लीजिए... जुडिशल कस्टडी में... इनका भरत मिलाप... यह किसकी सहयता से संभव हो सकता है... आप खुद ही तय कर लीजिए...

सतपती - (एक गहरी साँस छोड़ते हुए) ह्म्म्म्म... इसका मतलब... कुछ बड़ा होने वाला है...

विश्व - हाँ... वह अब हर उस शख्स से बदला लेगा... जो उसके बैड बुक में लिस्टेड हैं... अपनी खोई हुई रुतबा और प्रतिष्ठा को दोबारा हासिल करने के लिए... अपने पुरखों की वही दहशत को दोहराएगा... और इसके लिए... वह सरकार और सरकारी मदत लेगा...

थोड़ी देर बाद प्रतिभा और तापस दोनों बाहर आते हैं l सबकी नजरें उन दोनों की तरफ चली जाती है l प्रतिभा के आँखे भीगी हुई थीं और वह आगे थी पीछे तापस था वह विश्व को अंगूठा दिखा कर इशारे से कहता है "काम हो गया" l विश्व खुश हो कर प्रतिभा के गले लग जाता है l

प्रतिभा - बस बस... मक्खन मारने की जरूरत नहीं है... मैंने तेरी बात मान कर... तेरे इस लेनिन के साथ जा रही हूँ... पर तु भी मुझसे वादा कर... जितना जल्दी हो सके... इस झंझट को ख़त्म कर... मेरी बहु के साथ आएगा...

विश्व - वादा... पहले भी जो वादा किया था... उसे बरकरार रखता हूँ... मैं किसी कानून का उलंघन नहीं करूंगा... और बहुत जल्द तुम्हारी बहु के साथ... लौटुंगा... हमेशा के लिए...

प्रतिभा - (अलग हो कर आँसू पोछते हुए) ठीक है... मैं और तेरे डैड... चले जाएंगे...

विश्व - चले जाएंगे नहीं... जितनी जल्दी हो सके... उतनी ही जल्दी... जाओ अपना सामान बाँध लो...

तापस - अरे बर्खुर्दार... तुम्हारी माँ सामान ही तो बँधने अंदर गई थी... और सामान कब की बँध भी चुकी है...

विश्व - क्या.. सच...

प्रतिभा - (तापस से) हो गया...

तापस मुहँ बना कर चुप हो जाता है l सभी तापस की हालत देख कर हँस देते हैं l

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सातवें दिन

अदालत के बाहर न्यूज लाइव प्रसारण में सुप्रिया अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर रही थी l

ओड़िशा में जिस केस ने तहलका मचा रखा है उस पर कारवाई की अगली पड़ाव जानने के लिए हर कोई बेचैन थे l पहला सेशन खत्म हो चुका है l पहली सेशन में सबसे पहले जानेमाने कंस्ट्रक्शन किंग कमल कांत ने छह सौ करोड़ रुपए की जमा रसीद अदालत में पेश की l इसका अर्थ यह हुआ प्रतिवादी वकील विश्व प्रताप महापात्र ने स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट के एवज में जो मांग रखी थी वह पूरा हो गया था l उसके बाद ज़ज साहब ने सालिसिटर जेनरल के द्वारा दी हुई दलील पर गृह मंत्रालय को तलब किया, और सूत्र बताते हैं गृह मंत्रालय अपनी रिपोर्ट दूसरे सेशन में देने के लिए समय माँगा था l अब चूँकि दूसरा सेशन में कोर्ट की कारवाई बस थोड़ी देर में शुरु होने वाली है तब तक हम आपसे विराम लेते हैं

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अदालत के अंदर तीनों ज़ज अपनी जगह पर आकर खड़े होते हैं l सारे लोग दीर्घा में खड़े थे, जजों के बैठने के बाद लोग भी अपनी अपनी जगह पर बैठ जाते हैं l आज अदालत खचाखच भरी हुई है l ज़ज गैवेल उठा कर तीन बार टेबल पर पटक कर "ऑर्डर ऑर्डर" कहते हैं l

ज़ज - आज की कारवाई शुरु की जाए...

तब रीडर उठ कर एक बंद लिफाफा ज़ज के हाथ में देता है l ज़ज लिफाफे में काग़ज़ निकाल कर पढ़ते हैं और फिर

ज़ज - विश्व प्रताप... जैसे कि आपने मांग रखी थी... राजा साहब के तरफ से... छह सौ करोड़ जमा कर दी गयी है... सॉलिसिटर जेनरल ने जो प्रस्ताव दिया था स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट के लिए.... उसे गृह मंत्रालय ने स्वीकर कर लिया है... आप चाहें तो उसकी कॉपी देख सकते हैं...

ज़ज रीडर को रिपोर्ट विश्व को देखने के लिए बढ़ा देता है l विश्व रिपोर्ट देख कर रीडर को लौटा देता है l तभी एक जुडिशल डेसपैच से एक हरे रंग की लिफाफा आता है l रीडर उसे लेकर ज़ज को दे देता है l ज़ज उसके भीतर से काग़ज़ निकाल कर पढ़ने के बाद

ज़ज - मिस्टर विश्व प्रताप...

विश्व - आपने क्या कोई रिट पिटीशन फाइल की थी...

विश्व - जी माय लॉर्ड...

ज़ज - ठीक है... (भैरव सिंह से) राजा भैरव सिंह... आपके जानकारी के लिए... अदालत आप को संज्ञान देती है... रुप फाउंडेशन केस की... समानांतर तहकीकात और अदालती सुनवाई के लिए... विश्व प्रताप ने... जो रिट पिटीशन दायर किया था... अदालत के साथ साथ... गृह मंत्रालय ने उसकी इजाजत दे दी है... इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है...

भैरव सिंह - ज़ज साहब... हमें इस रिट पिटीशन के बारे में संज्ञान है... अच्छा है... सभी केस का निपटारा एक साथ हो जाएगा... उस सुनवाई के लिए... कोर्ट जो भी उचित समझे... हमें स्वीकार होगा...

ज़ज - ठीक है... तो अदालत... राजगड़ मल्टिपर्पोज कोऑपरेटिव सोसायटी के लिए... राजा भैरव सिंह के द्वारा प्रस्तावित स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट को मंजूरी देती है... चूंकि इस पर एक्जिक्युटीव मजिस्ट्रेट श्री नरोत्तम पत्री... लगभग सभी की बयान दर्ज कर रिपोर्ट दाखिल कर चुके हैं... इसलिए इस केस की सुनवाई के लिए... अदालत तीस दिन की सीमा तय करती है... और रुप फाउंडेशन पर बनी एसआईटी को आदेश देती है... कोऑपरेटिव सोसाईटी की केस की छानबीन इसी दौरान की जाए... और जैसे ही कोऑपरेटिव सोसाईटी की सुनवाई ख़तम हो जाए... उसी फास्ट ट्रैक कोर्ट में... रुप फाउंडेशन की केस पर भी सुनवाई पूरी की जाए... उसके लिए... अदालत अतिरिक्त दस दिन की सीमा निर्धारित कर रही है... (कह कर ज़ज अपनी रेकार्ड पर आदेश लिख रहा था, अदालत की दीर्घा में बैठे लोग आपस में खुसुर-पुसुर करने लगते हैं l रिपोर्ट लिखने के बाद) ऑर्डर ऑर्डर.... (लोग चुप हो जाते हैं, ज़ज विश्व से पूछता है) विश्व प्रताप... आप अगर स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट को लेकर कुछ और प्रस्ताव देना चाहें तो दे सकते हैं...

विश्व - थैंक्यू माय लॉर्ड... अब तक अदालत ने... न्याय के लिए जो भी मार्ग दर्शन दिया है... मैं उसके लिए आभारी हूँ... पर मेरी बिनती है कि... पहले दस दिन... यशपुर में सुनवाई की जाए... फिर अगले दस दिन की सुनवाई... सोनपुर में की जाए... और अंतिम दस दिन देवगड़ में की जाए...

ज़ज - और... रुप फाउंडेशन की सुनवाई... उसके बारे में आपकी कोई प्रस्ताव...

विश्व - जी... उस केस की सुनवाई... राजगड़ में ही की जाए

ज़ज - (भैरव सिंह से) राजा साहब... क्या आपको को... मंजूर है...

भैरव सिंह - जी ज़ज साहब... हमें मंजूर है...

कुछ देर तीनों ज़ज आपस में बात करते हैं l उसके बाद प्रमुख ज़ज अपनी रेकार्ड में कुछ लिखते हैं फिर गैवेल को टेबल पर पटक कर ऑर्डर ऑर्डर कहते हैं l

ज़ज - तो दोनों पक्षों की मंजूरी के बाद... यह अदालत स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट की गठन की मंजूरी देती है.... अदालत एक तीन जजों की बेंच का गठन कर रही है... यह स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट... आज से ठीक दस दिनों बार कार्यकारी होगा.. जैसे कि प्रतिवादी वकील ने प्रस्ताव दिया है... उसको अदालत मंजुर करते हुए... पहले दस दिन... यशपुर में... दूसरे दस दिन... सोनपुर में... और तीसरे दस दिन देवगड़ में... सुनवाई की जाएगी... और अंतिम दस दिन... राजगड़ में... रुप फाउंडेशन केस पर सुनवाई के लिए... बशर्ते एसआईटी द्वारा... तहकीकात पूरा की गया हो...
 
जी बिल्कुल विश्व वही चाहता था

हाँ भैरव सिंह से एक गलती हुआ है जिससे खुद भैरव सिंह भी अनअवगत है l

हाँ असली मोड़ मल्लिका के के एपिसोड पर ही होगी

हाँ अब विश्वा भी अपना चाल चलेगा

यह आपको अगले अंक में मालूम हो जाएगा

अब कुछ हद तक उनकी भी भूमिका रहेगी

शुक्रिया SANJU ( V. R. ) भाई आपके इस बहुमूल्य प्रतिक्रया के लिए

आज मुझे पोस्ट करना था पर थोड़ा फिनिशिंग टच बाकी रह गया है

कल रात दस बजे तक पोस्ट कर दूँगा
 
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