Thriller "विश्वरूप" ( completed ) - Page 4 - SexBaba
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Thriller "विश्वरूप" ( completed )

भाई आपका यह लिख देना ही काफी है

वीर बचपन से ही विक्रम के करीब रहा है

दोस्त और छोटे भाई की तरह

जाहिर है कि वीर की चिंता है पर विक्रम की मज़बूरी यह है कि अभी वह एका एक भैरव सिंह के खिलाफ नहीं जा सकता

हाँ अब विक्रम केवल और केवल इस प्रयास में रहेगा कि कैसे भैरव सिंह उसे घर से और जीवन से दुत्कारते हुए निकल जाने के लिए कहेगा

धन्यवाद SANJU ( V. R. ) भाई यह प्रसंग भैरव सिंह को विश्व के बारे में फिर से अच्छे से सोचने के लिए मजबूर कर दिया है

अब कहानी थ्रिलर की है तो थोड़ा रोमांच पर रोकना आवश्यक था

पर्दा अगले अपडेट पर उठेगा

थैंक्स शुक्रिया आभार मेरे भाई बहुत बहुत शुक्रिया
 
भाई यों मित्रों

जैसा कि आप जानते हैं यह मेरा पहला कहानी है

एक मुल कहानी में अनायास ही कुछ चरित्रों को जोड़ कर रायता फैला दिया मैंने

अब यही जंजाल बन गया है

कहानी की गति और विश्वसनीयता को बनाए रखने के लिए हर चरित्र से न्याय करना आवश्यक है

कहानी को फिर भी जल्दी समेटने की कोशिश में हूँ

उसके अनुरुप घटनायें और संघटनायें सजाना पड़ रहा है l

आधा लिख लिया है और आधे की कोशिश चल रहा है

इसलिये अपडेट लाने में विलंब हो रहा है

पर जैसे भी हो कहानी की धारा और मर्यादा को बनाए रखना है कोशिश में हूँ इस रविवार तक अगले अपडेट को लाने की

विश्वास रखिए अगला अपडेट भी धमाके दार होगी

प्रतिक्षा के लिए बहुत बहुत शुक्रिया
 
शुक्रिया लियोन भाई बड़े दिनों बाद आए

खैर आपकी प्रतिक्रिया की आवश्यकता थी मिल भी गई शुक्रिया l विश्व अपने भीतर अंतर्द्वंद में फंसा हुआ है इसलिए वह पूरी बात घर की औरतों को बता नहीं पाया

हाँ अपने पुराने कर्मों की पश्चाताप हो रहा है पर उसके सजा से डर भी रहा है

हाँ अब विक्रम धीरे-धीरे वह सब करेगा जिसके कारण भैरव उसे धिक्कारने लगेगा और अपनी नजरों से दुर होने के लिए कहेगा l

हाँ भैरव के भी अपने गुप्तचर हैं

इसलिये गांव की खबर वह रखता है

अब आगे शामत भीमा और उसके पट्ठों पर आने वाला है

हाँ अब तक भैरव जो विश्व के प्रति सीरियस नहीं था अब वह होगा

यह राज आपको अगले अपडेट में मिल जाएगा

अगला अपडेट आज रात लाने की कोशिश कर रहा हूँ अगर सम्भव ना हुआ तो कल ही अपडेट आएगा
 
👉एक सौ बत्तीसवां अपडेट

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सारे सिक्युरिटी गार्ड्स अपने सिर झुकाए खड़े थे l सामने राजसी एटीट्यूड के साथ पैर पर पैर रख कर दोनों हैंड रेस्ट पर हाथ रख कर भैरव सिंह अपने ठुड्डी पर हाथ रखकर बैठा हुआ था l तभी कुछ देर बाद उस बैठक वाले कमरे में पिनाक अपना सिर पकड़ कर आता है और विक्रम भी अपने कमरे से निकल कर लगभग वैसी हालत में कमरे में आता है l

पिनाक - आह... मेरा सिर... बहुत भारी लग रहा है... शुभोदय राजा साहब...

विक्रम - शुभोदय राजा साहब...

भैरव सिंह - आपको कुछ नहीं लग रहा युवराज...

विक्रम - हाँ... सिर इतना भारी लग रहा है कि... आह... लगता है... देर रात सोने की वज़ह से.. ऐसा लग रहा है...

भैरव सिंह - (पिनाक से) और आपका...

पिनाक - लगता है... शराब कुछ ज्यादा हो गया था.. शायद हैंग ओवर का असर है...

भैरव सिंह - ताज्जुब की बात है ना.... जो हालत आप दोनों की है... बिल्कुल वैसी ही हालत... रात को.. इस घर की पहरेदारी करने वाले हर सिक्युरिटी स्टाफ्स की भी हुई है...

विक्रम - (चौंकता है) ह्वाट...

भैरव सिंह - हाँ... अब सवाल है... कैसे और कब...

विक्रम - अगर ऐसा है... तो यह कोई साजिश लग रहा है... तब सवाल और भी हैं... कौन और क्यूँ...

पिनाक - क्या... घर में इतना बड़ा कांड हो गया... चोरी या डकैती के लिए... (गार्ड्स से) कौन आया था यहाँ...

सभी गार्ड्स अपना सिर झुकाए चुपचाप वैसे ही खड़े रहते हैं जैसे पहले से ही थे, तभी उन सभी गार्ड्स के इनचार्ज वहाँ पहुँचता है l उसके हाथ में एक पेपर पैक में पैक्ड कुछ था l वह उस पैकेट को हाथ में लिए अपने साथियों के साथ भैरव सिंह के सामने सिर झुका कर खड़ा हो जाता है l

भैरव सिंह - कुछ पता चला...

इनचार्ज - जी राजा साहब... हमारा एक आदमी जो नाइट शिफ्ट में था... वह गायब है... सीसीटीवी भी काम इसलिए करना बंद कर दिया... क्यूँकी.. (कहते कहते वह पेपर वाला पैकेट खोलता है, जिसके अंदर एक इलेक्ट्रॉनिक गैजेट निकाल कर दिखाते हुए) यह गैजेट सीसीटीवी की एक ट्रांसमीटर के केबल में लगा हुआ था... जिसके वज़ह से... सारे सीसीटीवी की ट्रांसमिशन डिस्टर्ब हुई और सिस्टम मालफंकशन करने लगे....

पिनाक - यह क्या है...

इनचार्ज - एक तरह का जैमर... ट्रांसमिशन जाम कर देता है...

विक्रम - (हैरान होते हुए) जैमर... मतलब... कल किसने घुसने की कोशिश की या...

इनचार्ज - पता नहीं... पर सारे के सारे... गार्ड्स... किसी के द्वारा इनहैलड एनास्थेसिक गैस से... आई मिन... स्लीपिंग गैस से इन्फेक्टेड थे...

विक्रम - ह्वाट... हाउ इट इज पॉसिबल...

इनचार्ज - आई एम सॉरी... बट इट हैपंड...

भैरव सिंह - क्या ऐसी है तुमारी सिक्युरिटी... यह तुम्हारे सिक्युरिटी संस्था के दामन पर... एक बदनुमा दाग है...

इनचार्ज - आई एम... सॉरी अगैन... राजा साहब...

भैरव सिंह - गेट आउट ऑफ हीयर....

इनचार्ज - राजा साहब...

भैरव सिंह - गेट.. आउट...

इनचार्ज अपने साथियों को लेकर वहाँ से बाहर चला जाता है l उन सबके जाने के बाद कमरे में भैरव सिंह, पिनाक और विक्रम रह जाते हैं

भैरव सिंह - पहली बार ऐसा हुआ कि हम अपनी सिक्युरिटी के वगैर बाहर स्टेट में हैं... पता नहीं हमारे सिक्युरिटी होती तो... यह सब होता या नहीं...

विक्रम - इन सबकी हालत देख कर... लगता है... हम सभी इनहैलड एनास्थेसिक से इन्फेक्ट हुए हैं... पर... (भैरव सिंह को देख कर) आपको देख कर ऐसा नहीं लगता है कि आप... इन्फेक्ट हुए हैं...

भैरव सिंह विक्रम की ओर घूर कर देखने लगता है l विक्रम भी भैरव सिंह की ओर देख रहा था कुछ देर बाद अपनी नजरें झुका लेता है l

भैरव सिंह - कभी कभी गणित भूल हो जाती है... पर जिंदगी सबक सिखाने से नहीं चूकती... सुबह तड़के हमारी नींद में खलल डाल कर कोई गया है...

पिनाक - क्या... इतनी चाक बंदोबस्त को धता बता कर कौन आया था...

भैरव सिंह - (कुछ देर चुप रह कर) वही... जिससे मिलना हमारा कलकत्ता आने का प्राथमिक उद्देश्य था...

पिनाक - ओह... मतलब वह माफिया... डैनी..

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म.... (दोनों अभी भी खड़े हुए थे) आप दोनों... बैठ सकते हैं....

विक्रम और पिनाक दोनों पास पड़े सोफ़े पर बैठ जाते हैं l उनके बैठने के बाद पिनाक भैरव सिंह से पूछता है

पिनाक - तो यहाँ का काम सब ख़तम हो गया है... इसका मतलब अब हम भुवनेश्वर जा सकते हैं...

भैरव सिंह - नहीं... सारे काम तमाम नहीं हुए हैं... आपके हिस्से का काम अभी बाकी है... वह काम खत्म होगी... हम भुवनेश्वर को निकल जाएंगे...

विक्रम - छोटे राजा जी का कौन सा काम...

भैरव सिंह - (पहले विक्रम को देखता है, फिर पिनाक की ओर देख कर) छोटे राजा जी... क्या अभी तक आपने... युवराज को बताया नहीं...

पिनाक - वह... हाँ.. हाँ... कल ही सारी जानकारी... सारी बातें... युवराज को हमने बताये थे...

भैरव सिंह विक्रम की ओर सवालिया नजर से देखता है l विक्रम भी भैरव सिंह को घूर के देखने की कोशिश करता है पर कुछ देर बाद नजरें झुका लेता है l

भैरव सिंह - क्या बात है युवराज... राजकुमार के विषय में... आपकी मन में कुछ नकारात्मक लग रहा है... आपकी नजरों में असंतोष... नाराजगी साफ दिख रहा है...

विक्रम - (थोड़ा अटक कर, बात घूमते हुए ) यह... डैनी का क्या चक्कर है...

भैरव सिंह - यह आपकी मतलब कि बात नहीं है...

विक्रम - मुझे लगा... आपसे जुड़े हर खास बात... मुझसे ताल्लुक़ रखता होगा...

भैरव सिंह कुछ देर के लिए विक्रम की ओर देखते हुए सोचने लगता है फिर अपनी जगह से उठ खड़ा होता है l विक्रम और पिनाक भी उठ खड़े होते हैं l भैरव सिंह चलते हुए दीवार की ओर जाता है और इनके तरफ पीठ कर खड़ा होता है l फिर मुड़ कर विक्रम को देखते हुए

भैरव सिंह - राजवंशीयों की मूंछें हमेशा उपर की ओर तने होते हैं... (अपनी मूँछों के दोनों तरफ ताव दे कर) एक तरफ़ वंश के नाम का गौरव व अभिमान और दुसरी तरफ गरुर व अहंकार... जिसके दम पर बिना तोले भी कोई बोल बोल भी देने पर... उस बोल की वजन हाथी बराबर रहता है... अब तक की जिंदगी में अपनी नाक की आन के लिए जो कुछ भी किया... उसे पीछे मुड़ कर कभी नहीं देखा... पर (भैरव सिंह रुक जाता है)

विक्रम - पर...

भैरव सिंह - पर पहली बार... कोई वज़ह बना है... की हम... पीछे मुड़ कर देखने को मजबूर हो गए हैं... के सात साल पहले जो किया... उसे नजरअंदाज क्यूँ कर दिया था...

विक्रम - (एक पॉज लेने के बाद) विश्वा....

भैरव सिंह - हाँ... जिसका कद हमारे जुते से भी उपर नहीं था... वह डैनी को सीढ़ी बना कर... हमारे गिरेबां तक पहुँचने की जुगत में है...

विक्रम - इसका मतलब... सिर्फ हम ही बेहोश थे... आप होश में इसलिए रहे... डैनी आपसे मिलने आया था...

भैरव सिंह - हाँ...

पिनाक - तो विश्वा का क्या किया जाए...

भैरव सिंह - कुछ जरुरी बातेँ हमें कल मालुम हुई... अब देखना यह है कि... डैनी ने जितना उसके बारे में कहा... क्या वाकई वह उतना बड़ा छलांग लगा चुका है...

पिनाक - क्या मतलब...

भैरव सिंह - जुते मजबूत हों... तो राह में कील भी कंकर के बराबर होते हैं... अगर जुते कमजोर हों... तो कील जुते फाड़ कर तलवे को चुभेंगे.... अब सवाल है... इन सात सालों में... हमने कील को कंकर समझ कर अनदेखा किया... या हमारे जुते कमजोर पड़ गए...

पिनाक - अब वह क्या करेगा... ज्यादा से ज्यादा... रुप फाउंडेशन की केस को दोबारा उछालेगा...

भैरव सिंह - पर वह है किस काबिल... क्या जुते में छेद कर सकता है... जोडार ग्रुप के लिए निर्मल सामल का काम कैसे बिगाड़ेगा...

पिनाक - निर्मल सामल का प्रोजेक्ट को बिगाड़ने के लिए कुछ बचा ही नहीं है... प्रधान ने सब सेट कर दिया है... BDA से मंजुरी भी ले लिया है...

भैरव सिंह - छोटे राजा जी... यह रिश्ता बहुत जरूरी है... केके का हमसे टूटने के बाद... हमें अपनी रियल एस्टेट की धाक को निर्मल सामल के जरिए फिर से एस्टाब्लीश करना है...

पिनाक - जी... अगर प्रधान सही जा रहा है... तो कोई अड़चन नहीं होगी आगे...

भैरव सिंह - बात अड़चन की नहीं है... रिश्ते की है... और यह रिश्ता हाथ से छूटना नहीं चाहिए... क्यूंकि पश्चिम ओडिशा में.. निर्मल सामल उतना ही हैसियत रखता है... जितना केके भुवनेश्वर में...

कह कर बैठ जाता है और इशारे से पिनाक और विक्रम को बैठने के लिए कहता है l पिनाक तो बैठ जाता है पर विक्रम खड़े ही रहता है l

भैरव सिंह - क्या हुआ युवराज...

विक्रम - ज़मी जमाया अपना धंधा और सिक्का जारी रखने के लिए... आपको यह रिश्ता चाहए... पर राजकुमार के दिल रखने के लिए नहीं.... उनके खुशी के लिए नहीं...

भैरव सिंह - (चेहरा भाव हीन हो जाता है) दिल... वह क्या होता है...

विक्रम - आपको मेरे दिल की ज़ज्बात का खयाल रहा... पर राजकुमार का...

भैरव सिंह - युवराज जी... बी मैच्योर... मत भूलिए... आप क्षेत्रपाल हैं.... यह क्षेत्रपाल होना अभिशाप नहीं वरदान है.... जो आपको... आपकी पहचान को इस स्टेट में रुतबा दिलाता है... यह सियासत और हुकूमत... हमारी जागीर है... कल को हमारी जगह आपको लेनी है... सो प्लीज बी मैच्योर... आपके सामने एक बनी बनाई सल्तनत होगी... जिस पर आपको हुकूमत करनी है....

विक्रम - किस किमत पर... अपने ही भाई की दिल को ठेस पहुँचा कर... उसका दिल तोड़ कर... हमने भी दिल लगाया था... हो सकता है... अपने ज़माने में आपने भी लगाया होगा...

भैरव सिंह - नहीं... जहां आपने दिल लगाया... हमने वहाँ अपना दिमाग लगाया... जिस रिश्ते से क्षेत्रपाल परिवार की नाक ऊंची हो... हम वहाँ समझौता कर सकते हैं...

विक्रम - नाक...

भैरव सिंह - हाँ राज कुमार नाक... एक नाक ही तो है... जिसकी ऊँचाई मूँछ की तख्त पर समाज में रुतबा देता है... इसी लिए तो... कुदरत ने... दिल को नाक नीचे की माले में.. और दिमाग को नाक से उपर की माले में रखा है... आप भी अब दिल से नहीं दिमाग से काम लीजिए...

विक्रम - मैं राजकुमार जी के लिए...

भैरव सिंह - (विक्रम की बात को काट कर) आपने दिल लगाया... आपके दिल का काम ख़तम हो गया... राजकुमार ने दिल लगाया... उसका काम भी ख़तम समझिए... राजकुमार ने जहां दिल लगाया.. वहाँ... हमने दिमाग लगाया तो पाया... राजकुमार की दिल की सुनेंगे तो हमारी नाक नीची हो जाएगी...

विक्रम और कुछ नहीं कह पाता l वह छटपटा जाता है l उसकी छटपटाहट भैरव सिंह के आखों से छुपती नहीं है l

भैरव सिंह - हम जानते हैं... राजकुमार थोड़े समय के लिए... टुटेंगे बहकेंगे... उस वक़्त उन्हें आपको ही संभलना होगा... और मंगनी के लिए तैयार करना होगा...

विक्रम - कैसे...

भैरव सिंह - वैसे... जैसे... रंगमहल प्रवेश में राजकुमार जी ने आपको संभाला था...

विक्रम - मतलब कभी भी... अनु का...

पिनाक - कभी भी नहीं... आज शाम तक हमें शायद खबर मिल जाएगी....

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वीर के केबिन में अनु आती है l वीर की केबिन खाली था l अनु अपने काम में लग जाती है l वह अटेंडेंट से कहलवा कर सारे फ्लावर पोट में ताजे फुल लगवा देती है l केबिन में खुशबूदार जैस्मीन की फ्रैगनेंश छिड़क देती है और कॉफी मेकर के क्रॉसर पॉट में कॉफी बिन डाल कर मुस्कराते हुए टेबल के सामने वाली कुर्सी पर बैठ जाती है और वीर का इंतजार करने लगती है l थोड़ी देर बाद केबिन का दरवाज़ा खुलता है l अनु की नज़र उस तरफ जाती है l वीर अंदर आ चुका था l हर रोज की तरह अपनी बाहें फैला देता है l अनु भी कुर्सी से उठ कर दौड़ते हुए वीर के गले लग जाती है l वीर उसे अपने चेहरे के बराबर उपर उठा लेता है l अनु के पैर फर्श से सात आठ इंच उपर हो जाती है l कुछ देर बाद अनु वीर से कहती है

अनु - राजकुमार जी...

वीर - ह्म्म्म्म...

अनु - मुझे उतारिए ना...

वीर - क्यूँ... तुम्हें कोई परेशानी हो रही है...

अनु - नहीं... (अपना चेहरा वीर के चेहरे के सामने लाकर) पर आप मुझे कब तक ऐसे उठाए रहेंगे...

वीर - जिंदगी भर... मरते दम तक... (वीर अनु को जोर से भींच लेता है)

अनु - प्लीज राजकुमार जी.. मुझे उतारिए ना.. कोई देख लेगा... तो क्या सोचेगा...

वीर - यही की... मालिक ने जीने वाली मालकिन को गले से लगा रखा है...

अनु - देखिए ना... मैंने कॉफी क्रॉसर पॉट में... कॉफी बिन रख दी है...

वीर - तो...

अनु - आपके लिए कॉफी बनाना है....

वीर अनु को तुरंत छोड़ देता है और अपनी कुर्सी पर बैठ कर अपना मुहँ फ़ेर लेता है l अनु वीर की यह बात देख कर मुस्कराते हुए कॉफी मेकर के पास जाती है और कॉफी मेकर को चलाती है l कुछ देर बाद दो ग्लास में कॉफी बना कर एक वीर को देती है, पर वीर लेने के बजाय मुहँ फ़ेर लेता है और यह जताता है जैसे वह अनु से नाराज़ है l अनु हँस देती है और एक मुखड़ा गाने लगती है

अनु - आप रूठे रहो... मैं मनाती रहूँ...

इन अदाओं पर और प्यार आता है...

थोड़े शिकवे भी हो.... थोड़ी शिकायत भी हो

तो जीने में और मजा आता है...

वीर - ओ हो... तो आज कल गाना भी सीख रही हो...

अनु - (हँसते हुए) क्या करूँ... आज कल आप बात बात पर... झूठ मूठ रूठ जो रहे हैं...

वीर - (अचानक अनु की तरफ घुम कर) मैं झूठ मूठ रूठ रहा हूँ....

अनु - हाँ... आप का मुझ पर रूठना... एक दम झूठ है...

वीर - अच्छा तुम्हें क्यूँ लगता है कि मेरी नाराजगी झूठी है...

वीर - इन पाँच छह महीनों में... आपको अच्छी तरह से जान गई हूँ... चाहे कुछ भी हो... आप मुझसे कभी रूठ ही नहीं सकते...

वीर - (हल्का से मुस्कराते हुए, बगल से एक चेयर खिंच कर लाता है और उस पर अनु को बिठाते हुए) अनु... क्या करूँ... तुम मुझ पर कभी रूठती जो नहीं हो...

अनु - मैं आपसे क्यूँ रूठुँ...

वीर - अरे... रूठना चाहिए... जानती हो... हर प्रेम कहानी में.. प्रेमिका कभी ना कभी रूठती जरूर है... और उसे उसका प्रेमी मनाता है... रूठना तो प्रेमिका का अधिकार है..

अनु - वह सब कहानियाँ हैं... हमारा प्यार कहानी नहीं है... सच है... और मैं जितना आपके जानने लगी हूँ... उतना आप पर मेरा प्यार बढ़ता ही जा रहा है....

वीर - अच्छा... (कॉफी की ग्लास उठा कर सीप लेते हुए) ऐसे क्या क्या जान गई हो मेरे बारे में...

अनु - यही के... भले ही रोज... आपकी गाड़ी मुझे ऑफिस लेने और घर छोड़ने जाती है... पर फिर भी... आप उस गाड़ी की पीछे पीछे रोज आते हैं... मेरी खैरियत के खातिर... है ना...

वीर - (थोड़ी हैरानी जताते हुए) वहम है तुम्हारा... जब मैंने तुम्हारे लिए... ड्राइवर रखा हुआ है... तो भला मैं तुम्हारे पीछे क्यूँ आऊँ...

अनु - आप ना.. आज कल झूठ भी बोलने लगे हो... झूठे...

वीर - मैं झूठ बोल रहा हूँ... (अनु मुस्कराते हुए वीर की ओर देखती है) अच्छा... ठीक है... ठीक है.... वैसे... तुम्हें कब पता चला... के मैं तुम्हारे पीछे आ रहा हूँ... जब कि मेरी गाड़ी तुम्हें लाने और ले जाने के लिए रखा है...

अनु - कल शाम को... और अभी भी आते वक़्त आप.. गाड़ी के पीछे ही आ रहे थे... और यह भी मालूम है... की मेरे घर के पास कुछ लोग हैं... जिन्हें आपने लगाए हैं... मुझ पर नजर रखने के लिए...

वीर - (ग्लास को रख कर, थोड़ी सीरियस हो कर) मैं क्यूँ तुम्हारे पीछे... (एक पॉज लेकर) तुम जानती हो ना... क्यूँ...

अनु - (अपना सिर हिलाते हुए) ह्म्म्म्म... कोई शायद... मुझे नुकसान पहुँचाना चाहता है...

वीर - (अनु की हाथ से ग्लास लेकर टेबल पर रख देता है और उसकी दोनों हाथ पकड़ कर, उसके आँखों में झांकते हुए) अनु... मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगा...

अनु - मैं जानती हूँ... आप के होते हुए... मुझे कुछ नहीं होगा...

वीर - तुम्हें मुझ पर इतना भरोसा है... जब कि.. मेरा विश्वास हर एक दिन के साथ डोलता जा रहा है...

अनु - पर मेरा प्यार... मेरा विश्वास... हर एक दिन के साथ बढ़ता ही जा रहा है....

वीर अपनी जगह से खड़ा हो जाता है और अनु को अपने पास खिंच कर गले लगा लेता है l

अनु - आह... कभी कभी आप मुझे इतनी खुशी दे देते हैं कि... बर्दास्त करना... संभलना मुश्किल हो जाता है... सच कहूँ.... इतनी खुशी के साथ तो मर जाने को दिल करता है....

वीर अनु को अलग कर उसके मुहँ पर अपना हाथ रख देता है l

वीर - चुप.. यह क्या कह रही है.... मरने की बात कर रही है... यह भी नहीं सोच रही है... मैं तेरे वगैर जियुँगा कैसे...

अनु अपने मुहँ से वीर की हाथ निकाल कर चूमती है फिर उस हाथ को अपने गाल पर रखती है और वीर के आँखों में देखते हुए

अनु - कितना प्यार करते हैं मुझसे... मेरे साये तक को खरोंच नहीं सकता कोई... यह मैं जानती हूँ... कभी कभी मुझे अपनी किस्मत पर रस्क होता है... क्या मैं सच में जी रही हूँ... या सपना देख रही हूँ... कहाँ छोटे से खोली में रहने वाली.. कहाँ एक राजकुमार... कहाँ कहानी.. कहाँ हकीकत..

वीर - (दोनों हाथों में अनु की चेहरे को लेकर) कितनी बड़ी बड़ी बातेँ कर रही है... कहाँ से सीखा यह सब...

अनु - कहाँ से क्यूँ सीखुंगी... यह बातेँ मेरे दिल की है... आज मौका मिला तो कह दी...

वीर - (अनु की दोनों गालों को खिंचते हुए) ओह मेरी प्यारी अनु... तेरी यही सारी बातेँ सुनने के लिए ही तो... तुझसे शादी करना चाहता हूँ... सोने से पहले.. जागने के बाद तुझे अपने सामने देखना चाहता हूँ... तु मेरी जिंदगी का अटूट हिस्सा है... और तु अभी भी... सपना और हकीकत में उलझी हुई है...

अनु अपनी गाल से वीर के हाथों को हटाते हुए वीर की हाथों को पकड़ कर l

अनु - (थोड़ी उदासी भरी लहजे में) राजकुमार जी... माँ जी ने मुझे स्वीकारा... आपके भाई... भाभी... बहन ने भी मुझे स्वीकारा... हाँ मैं आपकी जिंदगी की हिस्सा हूँ.. पर... जिनके स्वीकारने पर... मैं आपके परिवार की हिस्सा बन पाती... उनकी स्वीकृति अभी तक नहीं मिली है ना...

वीर - मुझे भी तो उनकी मंजुरी लेनी है...

अनु - क्या... मुझे... स्वीकारेंगे...

वीर - उन्हें करना पड़ेगा... कौन नहीं जानता तेरे मेरे बारे में... हमारे ऑफिस के स्टाफ से लेकर हमारे परिवार तक सभी तो जानते हैं.. पर हाँ.. मैं अपने पिता और राजा साहब की सहमती लेना चाहता हूँ...

अनु - फिर...

वीर - फिर शादी... क्यूंकि... अब तकिए के साथ नहीं सो पा रहा हूँ....

अनु शर्मा कर अपना हाथ छुड़ा लेती है और अपने हाथों से चेहरा छुपा कर वीर की तरफ पीठ कर मुड़ जाती है l वीर पीछे से आकर उसके कमर पर अपना हाथ का घेरा बना कर कस लेता है l

वीर - अनु...

अनु - हूँ...

वीर - आई लव यू...

अनु - हूँ...

वीर - क्या हूँ... मुझे भी जवाब दो...

अनु - ऊँ... हूँ...

वीर - क्यूँ...

अनु - छोड़िए ना... म्म्म्म.. मुझे शर्म आती है...

वीर - आह... किस लड़की से पाला पड़ा है... सिर्फ शर्माती रहती है...

अनु - (खि खि कर हँस देती है)

वीर - अनु...

अनु - ह्म्म्म्म...

वीर - मैं ना... यह चाहता हूँ... के जब हमारा प्यार भरा संसार बस जाए... तुम ना रोज सुबह देर से उठना... मैं तुम्हारे लिए कॉफी बना कर जगाउँगा... तुम मुझ पर हुकूमत करना... मैं तुम्हारी गुलामी करूँगा...

अनु - (अपने चेहरे से हाथ हटा कर) झुठे...

वीर - देखो मैं झूठ नहीं सच कह रहा हूँ... तुम्हें... (दोनों बाहें फैलाते हुए) अपनी दुनिया का रानी बना कर रखूँगा... तुम राज करना.. और मैं तुम्हारी सेवा...

अनु - झूठे...

वीर - तुम फिर से मुझे झूठा कहा...

अनु - (शर्माते हुए) ह्म्म्म्म...

वीर - बोलो क्या झूठ बोला मैंने...

अनु - आपको कॉफी बनाना कहाँ आता है... (खिल खिला कर हँस देती है)

वीर - तो... मैं सीख लूँगा... देखना तुमसे भी अच्छा कॉफी बना कर तुम्हें पीलाउँगा...

अनु - अच्छा जी...

वीर - हाँ जी... जब तुमसे प्यार करना... केयर करना सीख लिया है.. तो कॉफी बनाना भी सीख लूँगा... देख लेना...

अनु - पर मैंने कब कहाँ सिखाया है...

वीर - तुम्हें देखते देखते सीख लिया है... यह भी देख देख कर सीख लूँगा...

अनु - (हँसते हुए) ठीक है... ठीक है... देखेंगे...

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गाड़ी चलती जा रही थी और रुप अभी भी फंसी हुई थी, कभी सीट बेल्ट को निकालने की कोशिश कर रही थी तो कभी पीछे की ओर लुढ़की सीट की लिवर को खिंच कर सीधा करने की कोशिश कर रही थी पर चिल्ला नहीं रही थी l अंत में थक हार कर चिल्ला कर कहती है

रुप - गाड़ी... रोको... (गाड़ी फिर भी नहीं रुकती, तो फिर से चिल्ला कर) अनाम गाड़ी रोको...

चर्र्र्र्र्र्र् आवाज़ करती हुई गाड़ी रुक जाती है l ड्राइविंग सीट से पीछे की ओर मुड़ कर विश्व रुप की ओर देख कर मुस्कराता है, रुप अपना मुहँ और आँखे सिकुड़ कर जोर जोर से साँस लेते हुए विश्व को खा जाने वाली नजर से देख रही थी l

विश्व - हे हे हे... (मस्का मारने वाली हँसी हँसते हुए) आपको कैसे मालुम हुआ... के आपको मैं किडनैप कर लिए जा रहा हूँ...

रुप - पहले मुझे सीधा कर बिठाओ....

विश्व - नहीं पहले आप यह बताओ... आपको कैसे मालुम हुआ... के किडनैपर मैं ही हूँ...

रुप - देखो... अगर तुमने मेरी सीट को सीधा नहीं किया तो...

विश्व - तो...

रुप - तो मैं तुम्हें कच्चा ही चबा जाऊँगी...

विश्व - इसका मतलब यह हुआ कि... अगर मैंने सीधा कर दिया... तो आप मुझे फ्राई कर खा जाएंगी...

रुप - आ आह... अनाम...

विश्व - अरे कर दूँगा सीधा... इतनी परफेक्ट प्लानिंग के साथ किडनैप किया... पर फिर भी... आपको पता चल गया... कैसे... प्लीज बताइए ना...

रुप - मुझे इस सीट से पहले आजाद करो...

वीर - ना ना... मेरी प्लान को कैसे बेनकाब किया पहले आप बताओ...

रुप - उह... अच्छा सुनो... भले ही कार की विंड स्क्रीन ट्रांसपरेंट है... फिर भी तुम्हारा अक्स हल्के से दिख रहा था... अब समझ में आया...

विश्व - ओह शीट... आपकी दिमाग के आगे तो मैं गच्चा खा गया...

रुप - ओह ओ... अब मेरी सीट को नॉर्मल करोगे भी...

विश्व - हाँ हाँ... अभी लीजिए...

विश्व पहले ड्राइविंग सीट से उतरता है फिर रुप की तरफ की डोर खोल कर सिर्फ सीट बेल्ट की लॉक को खोल देता है l रुप झट से उठ कर कार के बाहर आ कर विश्व को दबोचने के लिए लपकती है l विश्व को पहले से ही अंदाजा था, ऐसा ही कुछ होगा वह भागने लगता है l रुप उसके पीछे भागने लगती है l

रुप - मैं कहती हूँ रुको...

विश्व - नहीं...

रुप - देखो अगर नहीं रुके तो...

विश्व - हाँ नहीं रुका तो...

रुप रुक जाती है और मुहँ फुला कर एक बेंच पर बैठ जाती है, विश्व जब देखता है रुप बैठ गई है तो वह धीरे धीरे बड़ी सावधानी के साथ रुप के पास आता है l रुप का चेहरा गुस्से से लाल हो चुकी थी और तमतमा रही थी l

विश्व - हे हे हे... राजकुमारी जी...

रुप - तुमने ऐसा मज़ाक क्यूँ किया...

विश्व - मैं आपको सर प्राइज देने आया था... कल रात को आपने दिल से आवाज दी... हम सुबह आपके सेवा में हाजिर हो गए...

रुप - अच्छा तो यह सेवा है..

विश्व - सर प्राइज के लिए इतना हक तो बनता है...

रुप - यू...

कह कर इसबार झपट्टा मारती है l विश्व पीठ के बल गिरता है रुप उसके उपर गिरती है l अब सीन कुछ ऐसा बन जाता है विश्व नीचे गिरा है और रुप उसके उपर उसके कलर पकड़ कर झींझोडते हुए उसके सीने पर मारने लगती है l

विश्व - राज कुमारी जी... देखिए हम एक पार्क में हैं... लोग देखेंगे तो क्या सोचेंगे...

रुप मारते मारते रुक जाती है l देखती है वाक़ई एक पार्क था, उसे अपनी हालत का भी अंदाजा हो जाता है l वह चारों तरफ नजरें दौड़ाती है, कोई नहीं था आस-पास पर वह विश्व के उपर थी, शर्म से उसके गाल लाल हो जाते हैं और विश्व के उपर से उठ कर चुप चाप बेंच पर आकर बैठ जाती है l विश्व भी नीचे जमीन से उठता है और उसी बेंच पर रुप से थोड़ी दुर बैठता है l

विश्व - आई एम सॉरी...

रुप - (शर्माते हुए) ऐसे कौन करता है...

विश्व - अपनी राजकुमारी के लिए ऐसा सिर्फ अनाम करता है...

रुप - (मुस्कराने की कोशिश करते हुए) कब आए और... मुझसे सीधे बात क्यूँ नहीं की...

विश्व - लो कर लो बात... एक सुबह से फोन बंद आ रहा था... तो कैसे बात करता... इसलिए अपनी मुहँ बोली बहन के जरिए... आपको आपके घर से निकाला... मैं कल रात को... एक लॉरी वाले की मदत से कटक पहुँचा... माँ की गाड़ी लेकर बस आपसे मिलने आ गया...

रुप - क्या... माँ ने पूछा नहीं...

विश्व - पूछा ना... पर बात जब उनकी बहु की हो... तो झट से गाड़ी की चाबी मेरे हाथों में थमा दी...

रुप - तो फिर भाश्वती... उसकी गाड़ी...

विश्व - मैंने उसे कॉन्टैक्ट किया... मैंने उसकी गाड़ी की सीट में थोड़ी छेड़छाड़ की... वह आपको ले आयीं... उसके बाद माँ की गाड़ी उसके हवाले कर... मैंने उसकी गाड़ी ले ली...

रुप शर्मा जाती है, फिर अचानक अपना मुड़ बदल कर गुस्से वाली एक्सप्रेशन दे कर मुहँ मोड़ देती है l

विश्व - पल दो पल में यह मौसम क्यूँ बदल जाती है...

कभी बहार तो कभी पतझड़ आ जाती है...

आपकी दीदार ए हुस्न को रात जाग कर आए हैं...

एक मुस्कान भरी नजरों से देख तो लीजिए...

इस कातिल हुस्न के हाथों कत्ल होने आए हैं...

रुप - (मुस्करा देती है, विश्व की ओर देखती है)

विश्व - वाव...

रुप - (अपनी एक टांग पर टांग रखती है फिर एक हल्की सी अंगड़ाई लेते हुए अपनी आँखों में मादकता भरी नजर से देखते हैं अपनी पलकों को आधी बंद कर इठलाते हुए अपनी गर्दन हिला कर अपने पास आने आने को इशारा करती है)

विश्व - (रुप की इस अंगड़ाई भरी आमंत्रण देख कर पहले विश्व का मुहँ खुला रह जाता है फिर हलक से थूक गटकता है) रा... राज... कु.. कुमारी जी... आ.. आपको... घ.. घ.. घर छोड़ दूँ...

रुप - (मादक भरे आवाज में) क्यूँ...

विश्व - अब दिन खुल गया है... भीड़ भी बढ़ने वाली है...

रुप - (अब एक बड़ी सी अंगड़ाई लेते हुए, विश्व की ओर थोड़ी खिसक कर) तो...

विश्व - तततत तो...

रुप - ह्म्म्म्म (और थोड़ी खिसक कर) तो...

विश्व - तो... (अब आवाज बदली हुई थी, बिल्ली जैसी) गगगगग.. गलती... हो गई.... फिर... कभी... आआआआपको... ऐसे नहीं... (अपनी गर्दन मुश्किल से ना में हिलाते हुए) नहीं बुलाउंगा...

रुप - (विश्व से लगभग एक फुट की दूरी पर) डर लग रहा है...

विश्व - (वही बिल्ली वाली आवाज में) हाँ... नहीं... हाँ...

रुप - कत्ल होने से... इतना डर लग रहा है...

विश्व - नहीं... हाँ.. नहीं...

रुप फिर से गुस्सा दिखाते हुए बेंच के दुसरे सिरे पर खिसक कर चली जाती है तो विश्व अपनी साँसों को दुरुस्त करने लगता है l उसकी हालत ऐसी हो गई थी जैसे उसकी साँसे कब रुकी हुई थी l वह बड़ी बड़ी और गहरी साँस लेने लगता है l साँस थोड़ी दुरुस्त होने पर वह रुप की मुस्कराने की कोशिश करते हुए देखता है l

रुप - हुँह्ह्ह... फट्टु कहीं के...

विश्व - (थोड़ी ताव में आकर) ऐ... मैं कोई फट्टु वट्टु नहीं हूँ... याद नहीं... मैंने कैसे आपको प्रपोज किया था...

रुप - तो... उस बात को कितने दिन हो गए... और उस दिन तो फोन पर बड़े बड़े हांक रहे थे... आज मौका भी था दस्तूर भी था... (रुक जाती है)

विश्व - वह वह... जो भी हो... मैं.. मैं... फट्टु नहीं हूँ...

रुप - अच्छा नहीं हो...

विश्व - नहीं हूँ...

रुप - (विश्व की ओर थोड़ी खिसक जाती है) तो फिर मेरे गालों पर किस करो...

विश्व - क्या... (ऐसे रिएक्ट करता है जैसे उसके हाथों से तोते उड़ गए)

रुप - देखा... फट्टु...

विश्व - (थोड़े ताव में आकर) बस बहुत हुआ.. मैं अगर किस कर दूँ तो...

रुप - तो कर क्यूँ नहीं रहे हो...

विश्व - वह वह... ताकि... आपकी रुसवा ना हो...

रुप - ओ हैलो... वह मैं देख लुंगी... पहले यह साबित करो... तुम फट्टु नहीं हो...

विश्व - बस... (कह कर उठ जाता है) अब मैं साबित करके ही रहूँगा..

रुप - (अपनी मुहँ के पास उबासी लेते हुए चुटकी बजाती है) क्या तुम जितने शरारती हो... उतने फट्टु भी हो...

विश्व - इनॉफ...

कह कर विश्व रुप के बग़ल में दो फुट की दूरी पर बैठ जाता है l रुप मुस्कराते हुए अपना गाल विश्व की तरफ आगे करती है l विश्व पहले अपना नजर चारों तरफ घुमाता है फिर अपनी आँखे मूँद कर धीरे धीरे किस करने के लिए अपना होंठ बढ़ाता है l उसकी होंठ जितना आगे ले जा रहा था उतना ही अपनी आँखों को कसके बंद कर रहा था l आधा मिनट, फिर एक मिनट जाता है पर किस नहीं हो पा रहा था l रुप हैरान हो कर विश्व की ओर देखती है l करीब छह इंच की दूरी पर विश्व अपनी आँखे बंद कर किस करने की मुद्रा में रुका हुआ था l रुप अपना हाथ सिर पर मार कर बेंच के कोने तक सरक कर विश्व की ओर देखने लगती है l

बहुत कोशिश के बाद जब किस नहीं हो पाई तो पहले एक आँख खोल कर देखता है रुप मुहँ फुला कर विश्व को बेंच के सिरे पर बैठ कर देख रही थी l वह अपनी दुसरी आँख खोल कर अपनी हालत का जायजा लेता है l उसके दोनों हाथ उसके जांघों के बीच था और किस करने के मुद्रा में वह स्टैच्यु बना बैठा हुआ था l

विश्व - (खिसियाते हुए) ही ही ही...

रुप - सो मिस्टर बहादुर... वाह क्या बहादुरी दिखाई... छह इंच की दूरी भी तुमसे तय नहीं हो पाई...

विश्व - वह.. वह... इसलिए...

रुप - अच्छा... तो इसके लिए भी आपके पास... लॉजिक है...

विश्व - हाँ... वह इसलिए कि... प्यार में प्रेमी एक दूसरे की कमी को पूरा करते हैं... इसी में प्यार की पूर्णता है... मुझ में जो कमी है... वह आप पुरा करेंगी... आपके भीतर जो कमी है... वह मैं पुरा करूँगा...

रुप - (खीज कर, खड़ी हो जाती है) आआआह्ह्ह... मतलब... प्यार में... मुझे बेशरम होना पड़ेगा...

विश्व - (डर कर खड़ा हो जाता है) नहीं मेरा मतलब है...

रुप अब झपट्टा मारती है, विश्व के उपर पहले की तरह गिरती है l विश्व के बालों को पकड़ कर चेहरे को सीधा करती है और धीरे धीरे झुकती है, अंत में विश्व की नाक पर काटती है l

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बल्लभ प्रधान का घर

घर में कोई औरत नहीं है केवल कुछ नौकर हैं l वे सब बल्लभ के सामान पैक कर रहे थे l बल्लभ बाथरूम में फ्रेश हो रहा था l बाहर कमरे में एक कुर्सी पर रोणा बैठा हुआ था l ठुड्डी पर हाथ रख कर कुछ सोच में खोया हुआ सा लग रहा था l तभी उसकी मोबाइल पर मैसेज अलर्ट की ट्यून बजने से उसका ध्यान टूटता है l जेब से मोबाइल निकाल कर देखता है टोनी ने कुछ फोटो चाट मैसेज में भेजा था l रोणा की भवें सिकुड़ जाती हैं l वह टोनी के भेजे फोटों को डाउन लोड करने लगता है l जैसे जैसे फोटोस डाउन लोड होते जाते हैं उसके आँखे फड़फड़ाने लगते हैं और जबड़े सख्त होते जाते हैं, तुनक कर खड़ा हो जाता है l वह सारे फोटो देखने के बाद टोनी को फोन लगाता है l टोनी के फोन लिफ्ट करते ही

रोणा - यह सब क्या है...

टोनी - प्रेम के दो परिंदे हैं... चोंच लड़ा रहे हैं...

रोणा - मेरे जले पर नमक छिड़क रहा है तु...

टोनी - ना... ऐसी मेरी औकात या हिम्मत कहाँ...

रोणा - यह फोटोस कब की है...

टोनी - अभी कुछ देर पहले की... लाइव में था... इसलिए फोटो ले ली...

रोणा - विश्वा... अभी भुवनेश्वर में है...

टोनी - हाँ... इत्तेफाक से हाँ... आज वह गाड़ी... वह लड़की और उस लड़की के साथ विश्वा दिखा... इसलिए उनकी फोटो निकाल कर आपको भेज दिया...

रोणा - भोषड़ी के... मैंने लड़की की डिटेल निकाल कर भेजने को कहा था...

टोनी - आज पहली बार... गाड़ी और लड़की इकट्ठे दिखे हैं... पर कबाब में हड्डी... विश्वा भी है उसके साथ... आज का काम बस इतना ही...

रोणा - क्या मतलब इतना...

टोनी - लड़की के साथ विश्वा है... इसलिए मेरा काम आज के लिए इतना ही... अब आपके हिस्से का काम बचा है... वह निपटा कर मुझे फोन कीजिए...

रोणा - मेरे हिस्से कौनसा काम है...

टोनी - रोणा साहब... आपका यह काम उठाने से पहले मैंने कहा था... मैं विश्वा के हाथों... वह दुसरा नहीं बनना चाहता... इसलिए... जब आप मेरे लिए नई आइडेंटिटी की जुगाड़ कर लो... मुझे ख़बर कर दीजियेगा.... आपको डिटेल्स मिल जाएंगे...

रोणा - विश्वा से तेरी इतनी फटती है...

टोनी - मेरी तो सिर्फ फटती है... आपको तो एक नहीं तीन तीन बार फाड़ कर रख दी है... भुल गए...

रोणा - बे मादरचोद... अपनी औकात भुल रहा है...

टोनी - नहीं... अपनी हिफ़ाज़त की सोच रहा हूँ... यह आप भी जानते हो... विश्वा का नेट वर्क कितना तगड़ा है... मैं उसकी मौजूदगी में... उसके नेट में फंसना नहीं चाहता... खबर तो अब हर हाल में निकाल लूँगा ही... बस आप मेरे लिए... एक नई बंगाली आधार कार्ड... वोटर आईडी... जुगाड़ कर दीजिए.. मैं ओड़िशा छोड़ देना चाहता हूँ... विश्वा से दुर बहुत दुर चला जाना चाहता हूँ...

रोणा - ठीक है.... हफ्ते दस दिन में तैयार करवा दूँगा...

टोनी - और हाँ.... एक बात और...

रोणा - भौंक ले.. जो भी भौंकना है...

टोनी - बंगाल की कोई आदिवासी आइडेंटिटी चाहिए... और उसकी गिनती भारत की जन गणना की रजिस्टर में होनी चाहिए....

रोणा - ह्म्म्म्म... हो जाएगा.... आज से ठीक दस दिन के बाद... तुझे तेरे सामान मिल जाएंगे...

टोनी - तो मैं भी वादा करता हूँ... आपको दस दिन के बाद... इस लड़की की डिटेल्स मिल जाएगी...

फोन कट जाता है, रोणा अपनी नजरें घुमाता है तो कमरे में हाथ में टावल लिए बल्लभ खड़ा था l बल्लभ अपनी भवें सिकुड़ कर रोणा को देख रहा था l

रोणा - तु कब आया...

बल्लभ - जब तु फोन पर लगा हुआ था... (टावल को बेड के उपर फेंकते हुए) यह तु किसके साथ बकचोदी कर रहा था....

रोणा अपना मोबाइल बल्लभ के हाथ में देता है l बल्लभ सारे फोटोस देखने लगता l सारे फोटो देख लेने के बाद मोबाइल को वापस लौटाते हुए l

बल्लभ - ह्म्म्म्म... बड़े अच्छे फोटो निकाले हैं... टोनी ने...

रोणा - (बिदक कर) अब तु भी शुरु हो गया...

बल्लभ - नहीं कसम से... मैं पक्का कह सकता हूँ... यह सारे फोटो... डीएसएलआर कैमरा से लिया होगा...

रोणा - मेरी पहले से ही सुलगी हुई है... भोषड़ी के... तेल छिड़क रहा है...

बल्लभ - छिड़क नहीं रहा हूँ... तुझे अभी से आगाह कर रहा हूँ... जरा सोच यही फोटो... कल राजा साहब के हाथ लगे... तो क्या होगा... (रोणा चुप रहता है) तुने ही कहा है... की इस लड़की की... विश्व से कोई संबंध नहीं है...

रोणा - मैंने कहा ना... यह मामला पुरी तरह निजी है...

बल्लभ - यह लड़की जो तेरे दिमाग पर नाच रही है... तेरी मति भ्रष्ट हो गई है... अबे राजा साहब के दुश्मनों से कोई निजी खुन्नस नहीं पाल सकता...

रोणा - हाँ हाँ हाँ... (थोड़े ऊँचे आवाज़ में) जानता हूँ... पर इस लड़की को मैं अपनी पर्सनल रखैल बना कर रखना चाहता हूँ... समझा... (बल्लभ बिना कोई प्रतिक्रिया के चुपचाप उसे देख रहा था) (रोणा भी अपनी नजरें चुराते हुए) राजा साहब को आभास हुआ तो... वह लड़की अब तक रंग महल की भेंट चढ़ चुकी होती... (फिर अचानक लहजा बदल जाता है) मैं.. उसे एक बार सही... पर विश्व के सामने उसकी लेना चाहता हूँ... जितना घिन मुझे अपने आप से हो रही है... विश्वा भी खुद से उतना ही नफरत करेगा... अपनी बेबसी पर... रोएगा...

बल्लभ - उससे पहले... कहीं वैसा ही हालत तेरी ना हो जाए... (एक कुर्सी पर बैठ जाता है)

रोणा - कभी कभी एक बड़ी बाजी जीत ने के लिए... एक बड़ा दाव लगाना पड़ता है... सो मैंने लगा दिया है... जब जो होगा... तब देखा जाएगा... खैर... (दुसरे कुर्सी पर बैठते हुए) तु जिस वज़ह से आया था... वह तो पुरा हो गया है... क्या इसीलिए तु अब जा रहा है...

बल्लभ - हाँ मैं यहाँ खबर लेने आया था... ले लिया... पर अभी मैं कलकत्ता नहीं... भुवनेश्वर जा रहा हूँ... चल तु भी चल...

रोणा - क्यूँ कोई खास बात...

बल्लभ - हाँ... परसों राजकुमार जी की मंगनी है...

रोणा - (चौंकते हुए) क्या... इतनी जल्दी... वह भी बिना कोई शोर शराबे के...

बल्लभ - राजा साहब ने तय की है... चट मंगनी... पट शादी...

रोणा - जाहिर है... रिसेप्शन राजगड़ में होगी...

बल्लभ - हाँ इसलिये चल... भुवनेश्वर में थोड़ा फ्रेश हो जाएगा...

रोणा - नहीं तु जा... अब भुवनेश्वर नहीं... कुछ ऐसा करूँगा की विश्वा यहीं आकर अपना सिर फोड़ेगा..

बल्लभ - आआआआहहह... (चिढ़ जाता है) विश्वा तेरे सिर पर भूत बन कर छाया हुआ है... पर कोई ना... मैंने उसका इलाज ढूंढ लिया है... बस यह मंगनी हो जाने दे.... फिर देखना विश्वा का रोग कैसे छु मंतर होता है...

रोणा - (अपनी भवें सिकुड़ कर) क्यूँ ऐसा कौनसा तीर मारने वाला है...

इसबार बल्लभ थोड़ी उत्सुकता के साथ अपनी कुर्सी को खिंच कर रोणा के पास लाता है l

बल्लभ - विश्वा... इतना सब कैसे कर लेता है... कभी सोचा है... (रोणा सिर हिला कर ना कहता है) उसकी वज़ह है... जोडार ग्रुप्स ऑफ कंपनी का मालिक स्वपन जोडार...

रोणा - क्या...

बल्लभ - हाँ... स्वपन जोडार... कंस्ट्रक्शन फिल्ड में धीरे धीरे अपना सिक्का जमा रहा है... विश्वा उसका लीगल एडवाइजर है... और सबसे अहम बात.. उसकी अपनी सिक्युरिटी सर्विस भी है...

रोणा - (हैरानी भरे नजरों से बल्लभ की ओर देखने लगता है)

बल्लभ - हाँ हाँ हाँ... अब तु ठीक सोच रहा है... विश्वा अपनी लीगल एडवाइज के बदले... जोडार के सेक्यूरिटी एजेंसी की हेल्प ले रहा है... तभी तो वह हम पर इसीलिए भारी पड़ा...

रोणा - ओ... अच्छा... तो यह राज है... उसके नेट वर्क की... पर तु करना क्या चाहता है...

बल्लभ - (अपनी सीट पर आराम से टिक कर बैठते हुए) मैंने जोडार की बर्बादी की कागजात पर... BDA की अप्रूवल ले ली है... राजकुमार की मंगनी और शादी भी इसी बात से जुड़ी हुई है...

रोणा - (नासमझ की तरह) क्या... मैं कुछ भी नहीं समझा...

बल्लभ - बताता हूँ सुन... याद है... मैं हमेशा कहा करता था... जहां दिमाग लगे... वहां ताकत इस्तमाल नहीं करना चाहिए... विश्वा हर बार हम पर भारी पड़ा... वज़ह तलाशी तो जोडार का खेल समझ में आया... यानी अगर जोडार ख़तम तो विश्वा का तेवर ख़तम....

रोणा - अभी भी... मैं समझ नहीं पाया... राजकुमार की मंगनी और शादी से... जोडार कैसे ख़तम होगा...

बल्लभ - अबे भुतनी के... हमेशा की तरह उतावला क्यूँ हो रहा है... मेरी बातों को गौर से सुन... जोडार अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी वेंचर में अपना सबकुछ लगा दिया है... एक डुप्लेक्स हाउसिंग सोसाईटी की प्रोजेक्ट... हम उसकी इस प्रोजेक्ट को फैल कर रहे हैं... एवज में... राजकुमार की शादी करा रहे हैं...

रोणा - कैसे...

बल्लभ - उसी हाउसिंग प्रोजेक्ट के सामने वाली जमीन पर... जो कि ना तो सरकारी है.. ना ही निजी... उसी जमीन पर निर्मल सामल अपना एक डुप्लेक्स सोसाइटी का मेगा प्रोजेक्ट ला रहे हैं... वह भी जोडार ग्रुप्स के आधे दाम में...

रोणा - ओ... इस तरह से... जोडार ग्रुप के घर... अनसोल्ड रह जाएंगे... इससे कंपनी डूब जाएगी...

बल्लभ - और विश्वा का विष दांत भी गिर जाएंगे... वह ऐसा सांप बन कर रह जाएगा... जिसका फन तो होगा... पर दांत नहीं होगा... और ऐसे सांपों को कुचलने में तुझे बड़ा मजा आता है ना...

रोणा की आँखों में एक चमक दिखने लगता है l वह एक अंदरुनी खुशी के साथ चेयर से उठ खड़ा होता है l

रोणा - वाह वकील वाह... तेरे मुहँ में घी शक्कर... अगर सच में ऐसा हो गया... तो कसम से... तु जो बोलेगा.. मैं हार जाऊँगा...

बल्लभ - बैठ जा खाकी वाले बैठ जा... बोला तो था तुझे... और राजा साहब के सारे कारींदों को... पर किसीने मेरी बात नहीं सुनी... सबकी चूल मची थी...

रोणा - (बैठते हुए) सच कह रहा था तु... हर बात ताकत से नहीं सुलझाने चाहिए... दिमाग का भी कभी कभी इस्तमाल करनी चाहिए...

तभी एक नौकर आकर खबर करता है कि उसका सारा सामान पैक हो चुका है l बल्लभ उन्हें बाहर इंतजार करने के लिए कहता है l नौकर जाने के बाद

बल्लभ - वही मैं ना जाने कब से कह रहा था... के दिमाग वकील रखता है... इसलिए अब तुझे बोल रहा हूँ... चल मेरे साथ... अपना दिमाग रिफ्रेश करने...

रोणा - नहीं वकील नहीं... तु जिस काम के लिए जा रहा है... वह कर... साथ में मेरा एक काम कर देना...

बल्लभ - तेरा कौनसा काम...

रोणा - मैं अपने एक बंदे को खबर कर दूँगा... वह तुझे एक पार्सल देगा... मेरे लिए... तुझे वह पार्सल लाना है...

बल्लभ - पार्सल... क्या होगा उसमें...

रोणा - तकदीर...

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शाम का वक़्त था

xxxx मॉल की कॉफी डे शॉप के सामने लगे टेबल पर वीर बैठा अपने ख़यालों में खोया हुआ था l थोड़ी देर बाद उसके सामने दो कॉफी ग्लास कोई रख देता है l वीर ग्लास रखने वाले को नजर उठा कर देखता है l वह शख्स और कोई नहीं था उसका दोस्त प्रताप था l वीर बेहद खुशी के साथ अपनी जगह से उठता है और प्रताप के गले लग जाता है l विश्व भी उसे गले लगा लेता है l वीर बहुत ही भावुक हो जाता है l मॉल में सभी की नजर वहीँ पर ठहर जाता है l

वीर - (भावुकता में कहे जा रहा था) मेरे यार.. मेरे दोस्त... शुक्रिया... बहुत बहुत शुक्रिया...

विश्व - पहले बैठ जाते हैं... लोग अपने काम बंद कर हमें घुर रहे हैं...

यह सुन कर वीर विश्व से अलग होता है l दोनों अपनी अपनी जगह पर बैठ जाते हैं और अपनी अपनी कॉफी की ग्लास उठाकर चुस्कियां लेने लगते हैं l

वीर - थैंक्स यार... तुम आ गए... ऐसा लग रहा है... मैंने दुनिया जीत ली है...

विश्व - मेरा आने का प्रोग्राम तो था... पर दो तीन दिन बाद.... फोन पर तुमने जिस तरह से बात की... मुझे लगा तुम टूट से गए हो... तुम्हारी आवाज में दर्द बहुत था... इसलिए सब छोड़ कर आ गया...

वीर - हाँ यार.. किसी ने सच ही कहा है... a friend in need is a friend indeed...

विश्व - (कॉफी की सीप लेते हुए) वैसे... क्या need है तुम्हारी...

वीर - बताता हूँ... वैसे दोस्तों के लिए एक और कहावत भी बड़ी मशहूर है... (विश्व अपना भवें नचा कर सवाल इशारे से पूछता है) when Love leaves tears in eyes... Friendship brings chears in life...

विश्व - क्या हुआ... तुम प्यार और दोस्ती के बारे में क्यूँ कह रहे हो... अनु ने कुछ किया क्या...

वीर - नहीं नहीं यार... अनु है... तो जिंदगी है... जिंदगी में रंग है.. खुशी है... इससे पहले मैं जिंदा ही कहाँ था... (बात बदल देता है) वैसे तुम्हारी शेरनी की क्या खबर है....

विश्व - (सवाल से थोड़ा असमंजस हो जाता है) वह... वह ठीक ही है...

वीर - क्या मतलब...

विश्व - अरे यार... क्या कहूँ... शेरनी है... झपटती है... पंजा मारती है... (अपनी नाक सहलाते हुए) काटती भी है...

वीर - अच्छा... तुम उसे अपने उपर हावी होने देते हो...

विश्व - हाँ... क्यूँ नहीं... मैं दुनिया से जीतने की कुव्वत रखता हूँ... एक उसी के आगे हारने से अच्छा लगता है... दुनिया पर हुकुमत करने का जिगर रखता हूँ... पर उसीकी गुलामी मुझे खुशी देती है... पर बात मेरी करने तो नहीं बैठे हैं...

वीर - हाँ... बात तुम्हारी नहीं है... मेरी है..

विश्व - क्या बात अनु से ताल्लुक रखता है... (वीर अपना सिर हिला कर हाँ में उत्तर देता है) तो बोलो यार... तुम्हारे दिल में कौन सी टीस है... बोलो तो सही...

वीर - यार... यह प्यार व्यार क्या होता है... यह तुमने मुझे बताया है... इस एहसास में जीना भी क्या ग़ज़ब लगता है यार... जी करता है... खुद बिछ जाऊँ उसके राह में... हर नाज़ ओ अंदाज को उठा लूँ अपनी पलकों पे... अपनी हर आगाज़ उसके बाहों से शुरु हो... हर अंजाम उसके आगोश में हासिल करना चाह रहा हूँ... अपने प्यार की चमन में... फूलों का बहार देखना चाहता हूँ... पता नहीं क्या क्या करना चाहता हूँ... पर जो भी हो... अब अनु के नाम हर सुबह हर शाम कर देना चाहता हूँ...

कहते कहते वीर रुक जाता है, ज़वाब में विश्व कोई प्रतिक्रिया नहीं देता l थोड़ी देर के लिए दोनों के बीच में एक चुप्पी पसर जाती है l थोड़ी देर बाद चुप्पी तोड़ते हुए

वीर - कुछ समझे...

विश्व - ह्म्म्म्म... तुम अनु से शादी करना चाहते हो...

वीर - हाँ... पर...

विश्व - शायद बड़े राजी नहीं हो रहे हैं...

वीर - नहीं बात वह नहीं है... उन तक शायद बात पहुँची भी ना हो... मैंने सिर्फ माँ से... भैया और भाभी से... और बहन नंदिनी से कहा है... राजा साहब को बता कर... जल्द से जल्द शादी करना चाहता हूँ...

विश्व - तो राजा साहब से डरते हो क्या... या उनकी इंकार से...

वीर - नहीं... अपने प्यार के लिए... मैं किसी का भी सामना कर सकता हूँ...

विश्व - यार तुम साफ साफ कहो ना... तुम्हें मेरी मदत कहाँ पर चाहिए...

वीर - (एक पॉज लेता है) यार मैं अनु के लिए डर रहा हूँ... अनु का मुझसे छिन जाने का डर सता रहा है...

विश्व - पर तुम तो अभी कह रहे थे... अनु और तुम्हारे बीच सब ठीक है...

वीर - अनु और मेरे बीच कोई तीसरा आ रहा है... जो मुझसे अनु को छीन ने की कोशिश में है...

विश्व - मतलब कोई अनु को स्टॉक कर रहा है क्या...

वीर - अरे यार तुम बात को समझ नहीं रहे हो...

विश्व - तो समझाओ ना... तुम बात भी कहाँ ठीक से कह रहे हो...

वीर अपने शर्ट के एक दो बटन खोलता है l अपने हाथ के आस्तीन के भी बटन खोलता है l विश्व महसुस करता है वीर कहना बहुत कुछ चाह रहा है पर वह गहरी दुविधा में है, क्या कहे कैसे कहे l

विश्व - (वीर के हाथ में हाथ रखकर) वीर... मुझे दोस्त मान कर बुलाया है... तो विश्वास रखो... मुझसे जो बन पड़ेगा... मैं करूँगा...

वीर - (विश्व की हाथ पर अपना हाथ रखकर) मैं जानता हूँ प्रताप... पर मेरी प्रॉब्लम यह है कि... मैं तुम्हारे जैसे नहीं हूँ... तुम वह खुली किताब हो... जिसके पन्ने साफ हैं... पर मेरी जिंदगी की किताब के पन्ने गहरे स्याह हैं... फिर भी मैं आज तुम्हें सब कुछ बताऊँगा... बस मेरे दोस्त मुझे इस भंवर से निकाल देना...

विश्व - मैंने कहा ना... मुझसे जो भी... जितना भी बन पड़ेगा... मैं करूँगा...

वीर - तुम शायद जानते होगे... पाँच साढ़े पाँच महीने पहले छोटे राजा... यानी मेरे पिता जी पर एक स्नाइपर शॉट हमला हुआ था... जब वह पार्टी मीटिंग से लौट रहे थे...

वीर सारी बातेँ बताने लगता है, एक एक करके वह इन पाँच महीनों में जो भी कुछ झेला था सब बता देता है l सारी बातेँ बताने के बाद एक ग्लानि भाव से उसका सिर झुक जाता है l विश्व को एहसास होता है तो वीर को दिलासा देते हुए उसके हाथ पर हाथ रख देता है l

वीर - (वैसे ही अपना सिर झुकाए) यार यही मेरी कहानी है... जो बात मुझसे जुड़ी हुई थी मैंने सब बता दिया है... (एक छटपटाहट के साथ) यार मैं... अनु को किसी कीमत पर खो नहीं सकता... बात अगर मेरी जान की होती तो मैं सामना कर सकता था... पर मेरी अनु की है... मेरे कुकर्मों की कीमत... अनु नहीं चुका सकती... उस दुश्मन को बदला ही लेना है... तो सीधे मुझसे क्यूँ नहीं ले लेता...

कह कर विश्व की ओर देखता है l विश्व अपनी सोच में डूबा हुआ था l वीर विश्व की हाथ को हिला कर उसका ध्यान खिंचता है l

वीर - क्या सोच रहे थे...

विश्व - कुछ सवाल करता हूँ... जितना भी याद हो मुझसे कहना...

वीर - ठीक है... पूछो...

विश्व - तुम्हारे पिता... यानी छोटे राजा जी पर जो हमला हुआ था... वह बड़े बड़े न्यूज पेपर की हेड लाइन बनी थी... इस लिए मुझे मालुम है... पर यह सब की नींव उससे पहले ही पड़ी होगी... अच्छा इन छह महीनों में... तुम्हारे जिंदगी में... मतलब भुवनेश्वर में या तुम्हारे ऑफिस में कौन कौन आया है...

वीर - (सोचते हुए) इन छह महीनों में... नंदिनी... मृत्युंजय और अनु... इन तीनों के सिवा...

विश्व - ठीक है... इन तीनों को तुम अपने तरीके से विश्लेषण करो...

वीर - क्या बात कर रहे हो... नंदिनी बहन है मेरी... आज अगर मैं बदला हूँ... उसकी वज़ह से... और अनु को तो तुम जानते ही हो... तुमने देखा भी है उसे... और मृत्युंजय के बारे में... मैं... मैं उसका गुनहगार हूँ यार...

विश्व अपनी आँखे बंद कर फिर से सोचने लगता है, थोड़ी देर बाद अपनी आँखे खोल कर वीर की ओर देखता है

विश्व - कल किसीका पीछा किया था...

वीर - हाँ... मेरे जनम दिन में... मैं अनु को रिटर्न खुशी देना चाहता था... जो उसने मुझे अपनी जनम दिन पर दी थी... उस दिन पुरी कोणार्क मेराइन ड्राइव बीच में... जो दो लड़के अनु को छेड़े थे... उन्हीं में से एक मुझे पार्टी ऑफिस में दिख गया... तो मैं उसके पीछे भगा... यह उसी अनजान दुश्मन का आदमी था... उसके पुलिस हेड क्वार्टर सरेंडर के बाद... उस दुश्मन का फोन आया था...

विश्व - ह्म्म्म्म... (फिर सोचने लगता है)

वीर - (थोड़ी देर बाद) कुछ सोचा... कौन हो सकता है...

विश्व - ह्म्म्म्म... एक बात तो तुम्हारे मरहूम महांती बाबु ने सही कहा था... वगैर जांच और इंटरव्यू के जो तुम्हारे ESS में जॉइन किए थे... उन्हीं में कोई एक है...

वीर - हाँ... विक्रम भैया का भी यही मानना था...

विश्व - इस बात पर मैं... विक्रम से इत्तेफाक रखता हूँ...

वीर - तो क्या अनु...

विश्व - ना ना ना... अनु को तो महांती बाबु ने क्लियरेंस दे दिया था ना...

वीर - तो इसका मतलब... सबकी फाइल फिर से जांचनी होगी...

विश्व - शायद उसकी जरूरत ना पड़े..

वीर - कैसे...

विश्व - मुझे एक बार तुम मृत्युंजय से बात करा सकते हो...

वीर - (थोड़ा हैरान होता है) क्या तुम मृत्युंजय पर शक कर रहे हो...

विश्व - देखो वीर... मृत्युंजय के ESS जॉइन होने से पहले... और बाद में... जो भी उसके साथ हुआ... मुझे उस पर सिंपथी है... यहाँ तक कि उसके बहन के साथ जो हुआ... बहुत ही गलत हुआ... पर मैं अपनी शक दुर करने के लिए... उसके साथ एक बार बात करना चाहता हूँ...

वीर - पर वह तो हस्पताल से चला गया... अब कहाँ गया... हम में से कोई नहीं जानता... (थोड़ी देर चुप रह कर) पर तुम्हारा उस पर शक की वज़ह...

विश्व - देखो वीर... तुम्हारे परिवार के कई दुश्मन हो सकते हैं... पर जिस तरह से... तुम्हारे पिता या तुम पर यह सब कांड हुआ है... कोई बाहर से आकर नहीं कर सकता... कोई पास रह कर ही यह सब कर सकता है... यह सब देख कर मुझे मृत्युंजय पर शक तो हो रहा है... पर उसकी बहन की मौत.... मुझे कंफ्यूज भी कर रही है...

वीर - प्रताप... प्लीज... तुम मुझे डिटेल्स में समझाओगे...

विश्व - साढ़े पाँच महीने पहले... मृत्युंजय तुम्हारा रिकमेंडेशन पर ESS में जॉइन होता है... और यह सब कांड करने के लिए उसके पास वज़ह दिखती है...

वीर - (थोड़ा सीरियस हो जाता है) वह जो भी सब हुआ... एक अकेला कैसे कर सकता है...

विश्व - मैं कब कह रहा हूँ अकेला कर रहा था... मैं बस यह कह रहा हूँ... उसे मालुम था... तुम्हारी रिकमेंडेशन की क्या वाल्यू है... तुम्हारे राजनीतिक दुश्मन... व्यापारिक दुश्मन... और निजी तौर पर दुश्मनी रखने वालों के साथ मिलकर ऐसा किया हो सकता है... ऐसा मेरा अनुमान है... (वीर विश्व की बातों को गौर से सुन रहा था और चुप था) मृत्युंजय के पास वज़ह था... उसकी बाप की हत्या हुई थी... उसकी माँ की नाजायज सबंध... यह सब मृत्युंजय जैसा कॉलेज जाने वाला स्टूडेंट... ना जान पाया हो... मुझे नहीं लगता...

वीर - पर उसकी बहन की हत्या...

विश्व - इसी लिए तो... मैं मृत्युंजय से एक बार बात करना चाहता हूँ... उससे बात कर लेने के बाद... अगर वह बेकसूर निकला... तो हम दूसरों पर तहकीकात कर सकते हैं...

वीर - उसकी बहन की हत्या के बाद भी... तुम्हारी उस पर शक की वज़ह...

विश्व - उसका अनु के जरिए... अपनी पोस्टिंग करवाना... उसका हस्पताल से जिस तरह से गायब होना... यह कोई आम आदमी नहीं कर सकता... यही वज़ह है कि मुझे लिंक जोड़ने पर मजबूर कर देता है... मुझे लगता है... महांती को शायद उसकी भनक लग गई थी... इसलिए उसे अपने साथ लेकर तुम लोगों के पास शायद आ रहे थे... एक्सीडेंट हो गया... महांती बाबु मारे गए... पर मृत्युंजय बच जाता है... गाड़ी अंदर बैठ कर ही कोई आसानी से... फ्रेगनैंस बॉटल ए सी वेंट से बदल सकता है... और सोने पे सुहागा देखो... एक्सीडेंट के स्पॉट पर... उन लोगों को रेस्क्यू किया कौन... रॉय ग्रुप सिक्युरिटी के लोग... जो महांती बाबु के बिजनैस राइवल...

वीर यह सब सुन कर स्तब्ध हो जाता है, उसे बहुत जोर का शॉक लगा था l उसके मन में कहीं ना कहीं विश्व की बात बैठ जाता है l

विश्व - है... है वीर... देखो हो सकता है... वह इनोसेंट हो... यह मेरा अनुमान सिर्फ है... एक बार उससे बात करवा दो... फिर शायद हम कोई कंक्लुजन लें...

वीर - पर मैं उसे कहाँ ढूंढु... वह हस्पताल से ऐसे गायब हुआ कि... उसका फोन नंबर भी तभी से आउट ऑफ सर्विस आ रहा है..
 
शुक्रिया मेरे दोस्त Ajju Landwalia

पर इसबार मैं जल्दी अपडेट नहीं ला पाऊँगा

क्यूंकि हमारे यहाँ एनुअल ड्रामा कॉम्पिटिशन चल रहा है, स्क्रिप्टिंग से लेकर डायरेक्शन तक मेरे जिम्मे है

डिपार्टमेंट का इज्जत का सवाल है

छह तारीख से पहले लिखना संभव नहीं हो पाएगा
 
शुक्रिया लियोन भाई

हाँ अहंकार जो उसके अंदर कूट कूट के भरा है

अब यह भरम यह तिलिस्म वीर तोड़ने वाला है

हाँ वीर अनु के लिए पागल हो गया है

उसकी यही चाहत अब क्षेत्रपाल परिवार की नींव हिलाएगी

इस मामले में विश्व नीरा गधा ही रहेगा

हाँ अब रोणा टोनी के लिए नया आइडेंटिटी ढूँढेगा अपनी इच्छा पूरी करने के लिए

भाई वह वकील है

सारे कारनामें दिमाग की घोड़े दौड़ा कर ही करेगा ना

ना कलपीर्ट तक तो नहीं पहुंचेंगे पर अनु को वीर और विश्व मिलकर बचा लेंगे
 
कभी कभी परिस्थितियाँ ऐसी जटिल हो जाते हैं

हाँ अब विक्रम धीरे-धीरे भैरव सिंह की विरोध करने लगेगा

अनु पर खतरा है यह वीर जानता है पर वह यह नहीं जानता कि खतरा उसके परिवार से है

वह निरंतर उस अनजाने दुश्मन के बारे में सोच रहा है

विक्रम आगे क्या करेगा यह बाद में पता चलेगा

विडंबना है

पर कोई ना

वीर विश्व के साथ मिलकर अनु को बचा लेगा

और यही कारण होगा कि वीर क्षेत्रपाल परिवार से बगावत कर देगा

ओ तेरी

अगली बार लिखते समय ध्यान देना पड़ेगा

हाँ यार

मुझे भी यही लगता है

हाँ यह चोट विश्व की सोचने की काबिलियत से परिचित करवायेगी भैरव सिंह और बल्लभ प्रधान को

तकदीर

गौर करने वाली बात यह है कि रोणा सोच रहा है कि

उस पैकेट में टोनी, रोणा, विश्व और नंदिनी की तकदीर होगी

हा हा हा

बस यार अगली कड़ी में आपको सब पता चलेगा
 
👉एक सौ तेंतीसवां अपडेट

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अपनी कान से मोबाइल हटा कर पिनाक अपने सामने की मेज पर रख देता है l गंभीरता भरे उसके चेहरे पर धीरे धीरे एक मुस्कुराहट उभरती है जो सम्यक सम्यक गहरी हो जाती है l अपनी जगह से उठ कर कमरे से बाहर निकलता है और उस बंगले के लॉन के स्विमिंग पुल पर आता है, जहाँ भैरव सिंह अपना संध्या स्नान करते हुए तैर रहा था l पुल से कुछ दुर टु पीस बिकनी पहने कुछ अध नंगी लड़कियाँ बाथ रॉब और टावल लेकर खड़े थे l तैरते हुए भैरव सिंह पिनाक को आते देख लेता है l पिनाक के पुल के पास पहुँचते ही भैरव सिंह अपना तैरना रोक कर पुल से बाहर आ जाता है l उसके बाहर आते ही लड़कियाँ भागते हुए आती हैं और टावल से उसके बदन को साफ करने लगती हैं l भैरव सिंह एक लंगोट में दोनों हाथ फैलाए हुए खड़ा था, और लड़कियाँ उसके गिले बदन पर टावल चला रहीं थीं l बदन साफ हो जाने के बाद वह लड़कियाँ हट जाती हैं और दो लड़कियाँ भैरव सिंह को बाथ रॉब पहना देते हैं l जब यह सब हो रहा था, भैरव सिंह पिनाक को गौर से देखे जा रहा था l पिनाक के चेहरे से छलक रही खुशी का भैरव सिंह को आभास हो जाता है l



भैरव सिंह - (चुटकी बजा कर एक लड़की को) दो पेग बना कर लाओ....

वह लड़की भाग कर पास की फ्रिज से बोतल निकाल कर फौरन दो पेग बना कर लाती है, भैरव सिंह और पिनाक दोनों अपने अपने हाथ में पेग उठाते हैं l पिनाक उतावला हो रहा था चियर्स करने के लिए, पर भैरव सिंह अपना ग्लास आगे नहीं करता l पिनाक थोड़ा हैरान होता है और भैरव सिंह की ओर देखने लगता है l भैरव सिंह पास पड़े एक आर्म चेयर पर पैर के ऊपर पैर रख कर बैठ जाता है l पिनाक देखता है भैरव सिंह के आँखों में या चेहरे पर कोई भाव नहीं था एक दम भाव शून्य और सपाट l

पिनाक - वह राजा साहब...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म...

पिनाक - वह... काम हो गया है...

भैरव सिंह - आपकी खुशी और उतावला पन देख कर हम समझ गए.... पर काम हुआ कहाँ तक है...

पिनाक - हमने जिसको यह काम सौंपा था... उसके आदमियों ने... उस बदजात लड़की को उठा लिया गया है...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म...

पिनाक - बहुत जल्द उसे ठिकाने लगा दी जाएगी...

भैरव सिंह - हूँ.... वैसे यह काम किया किसने...

पिनाक - हमारा अपना कोई भी इंवॉल्व नहीं है इसमें...

भैरव सिंह - और...

पिनाक - बस... जिंदा रखा है... कल किसी तरह... देर शाम तक मंगनी हो जाए... उसे भी हम गायब करवा देंगे... जैसे हम पहले अपने रास्ते आने वालों के साथ करते आए हैं....

भैरव सिंह - हूँम्म्म्... राजकुमार की क्या खबर है...

पिनाक - पता नहीं.... पर उन पर नजर रखने के लिए... अपने आदमियों से कह दिया है....

भैरव सिंह - (अब उस आर्म चेयर पर पीठ टीका कर फैल कर बैठ जाता है) छोटे राजा जी... बात यहां तक पहुंचनी नहीं चाहिए थी.. हमारे आगाह करने से पहले... आपको चौकन्ना हो जाना चाहिए था... बात को वहीं निपटा देना चाहिए था...

पिनाक - (बगल में पड़े एक कुर्सी पर बैठते हुए) आप ठीक कह रहे हैं... हमें पहले खबर लग गई थी... हमारे ESS के एक मुलाजिम से.... हमने उसे हल्के में लिया था... हमें उसी दिन गौर कर लेना चाहिए था... पर हमने सोचा... वह राजकुमार हैं.... आदतन उस लड़की के साथ वही करेंगे... जो उन्होंने दुसरे ल़डकियों के साथ किया है... पर...

भैरव सिंह - पर...

पिनाक - यह बदबख्त लड़की... दुसरों से चालक निकली... राजकुमार को ही फंसा दिया... और बात आपके आगाह करने तक आ गई... पर कोई नहीं... सिर्फ कल शाम तक...

भैरव सिंह - यानी हमारे आगाह करने से पहले... आपको भनक थी...

पिनाक - (थोड़ा हिचकिचाते हुए) जी...

भैरव सिंह - हूँम्म्... (भैरव सिंह खड़ा हो जाता है)

पिनाक - (भी खड़े होकर) क्या हुआ राजा साहब...

भैरव सिंह - (आगे की ओर चलते हुए) जानते ही छोटे राजा जी... हम कभी खून खराबा नहीं चाहते... अशांति नहीं चाहते... पर.... (थोड़ा रुक कर) ना यह दुनिया हमें अच्छा बनने देती है... ना ही उनका भगवान....

पिनाक - राजा साहब... वह कहते हैं ना अंत भला तो सब भला...

भैरव सिंह - अब अंत नहीं हुआ है छोटे राजा जी... अब देखना यह है... राजकुमार क्या करेंगे... कैसी रहेगी उनकी प्रतिक्रिया...

पिनाक - हाँ... हम भी यही सोच रहे हैं... फ़िलहाल भुवनेश्वर में अकेले हैं...

भैरव सिंह - वैसे कल शाम की क्या तैयारी है.... और किसे किसे ख़बर किया गया है...

पिनाक - छोटी रानी... शायद भुवनेश्वर पहुँच गई होंगी... या... पहुँचने वाली होंगी... प्रधान भुवनेश्वर में पहुँच चुका है... निर्मल सामल xxxxx होटल में... मंगनी की तैयारी कर रखा है... बस गिने चुने लोग आयेंगे... हाँ... अभी तक हमने मीडिया वालों को खबर नहीं की है....

भैरव सिंह - और राजकुमार... उनके बारे में... आपने कुछ नहीं कहा...

पिनाक - (थोड़ी हैरानी भरे नजर से देखते हुए) मतलब... हम समझे नहीं...

भैरव सिंह - राजकुमार उस बदजात को ढूंढेंगे जरुर... वह भी अपनी पुरी ताकत लगा कर...

पिनाक - ओ... फिर भी... राजकुमार को हासिल कुछ नहीं होगा... ना ESS से... ना ही पुलिस से या फिर प्रशासन से... हमने पुलिस को और प्रशासन को सम्भालने के लिए... प्रधान से कह दिया है... और जहाँ तक हमें खबर है... वह भुवनेश्वर पहुँच कर अपने काम में लग चुका है...

भैरव सिंह - हूँम्म्म... प्रधान से कह दीजिएगा... राजकुमार के आँखों के सामने ना आयें... (एक पॉज के बाद) शायद... इस मामले में युवराज जी से मदत लें...

पिनाक - हाँ.. यह तो हो सकता है... पर... चूँकि इस मामले में... आपकी पुर्ण सहमति है... इसलिए युवराज... चाह कर भी... राजकुमार की कोई मदत नहीं कर सकते....

भैरव सिंह - तो कल के लिए... हमारी ओर से क्या तैयारी है...

पिनाक - कल सुबह हम अपनी लाव लश्कर के साथ... चार्टर्ड प्लेन से भुवनेश्वर पहुँचेंगे... इस रात भर में... राजकुमार की अक्ल ठिकाने आ जाएगी... उन्हें दिलासा देते हुए... मंगनी के लिए युवराज तैयार करेंगे... एक आश दिलाते हुए... की वह बदजात लड़की मिल जायेगी.... तब तक वह कोई पागलपन ना करें...

भैरव सिंह - (चेहरे पर हल्की मुस्कराहट उभर जाती है) उस लड़की को उठाने वालों को... बोल दीजिए... यह लड़की उनके लिए तोहफा है... मजे करें...

पिनाक - इसीलिए तो उठावाया है... क्यूँकी अगर मार देते... तो एक तरफ राजकुमार को संभालना मुश्किल हो जाता और दुसरी तरफ भुवनेश्वर में लाश ठिकाने लगाना मुश्किल हो जाता... मैंने उन्हें स्ट्रीक्ट इंस्ट्रक्ट किया है... इससे पहले शहर में... लड़की के लिए कोई मूवमेंट शुरु हो... लड़की को भुवनेश्वर से जितनी दुर हो सके ले जाने के लिए बोल दिया है... उसके बाद लड़की के साथ जो चाहे करलें....

इतना कह कर पिनाक भैरव सिंह की ओर देखता है l भैरव सिंह अपना ग्लास बढ़ाता है, पिनाक भी खुश हो कर अपना ग्लास आगे कर चियर्स करता है l



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xxxx हॉस्पिटल के परिसर में एक काली रंग की मर्सिडीज रुकती है l गाड़ी से दो नौजवान उतरते हैं, विश्व और वीर l वीर बदहवास आगे आगे भागता है और विश्व उसके पीछे l कुछ देर बाद वीर और विश्व दोनों एक केबिन में पहुँचते हैं l उस केबिन में एक बुढ़ी औरत बैठी हुई सुबक रही थी और कुछ गार्ड्स उसके आसपास पास खड़े थे l वीर सीधे उस बुढ़ी औरत के आगे घुटने के बल बैठ जाता है l

वीर - क्या हुआ दादी... क्या हुआ अनु को..

दादी - (रोते हुए) पता नहीं दामाद जी... मुझे अनु की मोबाइल से फोन आया... खुद को डॉक्टर बोल रहा था... और मुझे इसी हस्पताल को तुरंत आने के लिए कहा... मैंने कारण पुछा तो बोला... मेरी पोती का हादसा हो गया है... इसलिए मैं भागी भागी आई... पर यहाँ अनु थी ही नहीं... (गार्ड्स की ओर इशारा कर) यह लोग कह रहे हैं... मेरी अनु यहाँ आई ही नहीं... मैंने अनु को फोन लगाया... पर फोन उसका बंद आ रहा है... मेरे पास तुम्हारा नंबर नहीं था... इन गार्ड्स ने तुम्हारा नंबर लाकर दी... तो मैंने तुम्हें फोन कर बुलाया...

यह सुनते ही वीर को झटका लगता है l विश्व भी सकते में आ जाता है l दोनों कॉफी डे में बात कर रहे थे कि अनु की दादी की फोन आया था l रो रो कर अनु अनु और सिटी हॉस्पिटल कह रही थी l इसलिए दोनों सिटी हॉस्पिटल पहुँचे थे l वीर खड़ा हो जाता है और पहले अनु की नंबर पर फोन लगाता है, पर नंबर बंद आ रहा था l वीर अपने ESS ऑफिस की रिसेप्शन में फोन लगाता है और अनु के बारे में पूछताछ करने लगता है l इतने में विश्व गार्ड्स के यूनीफॉर्म पर ESS की लोगो देख कर उन्हें दादी के लिए एक ग्लास पानी लाने के लिए बोलता है l

विश्व - (दादी के पास झुक कर) दादी... घबराईये मत... आपकी अनु को कुछ नहीं होगा... आप देखना बहुत जल्द अनु आपके सामने होगी...

इतने में वीर अपनी ऑफिस से सारी ख़बरें जुटा लेता है और विश्व की ओर देखता है l इतने में गार्ड पानी की ग्लास ले आता है l विश्व उसके हाथ से पानी की ग्लास लेकर

विश्व - दादी आप थोड़ा पानी पी लीजिए...

कह कर विश्व वीर के पास आता है l वीर को आँखों के इशारे से पूछता है क्या हुआ l

वीर - दादी तो शाम को हस्पताल आई है... जबकि अनु... दोपहर को ही ऑफिस से निकल गई थी...

विश्व - व्हाट...

वीर - हाँ... अनु को ऑफिस में फोन आया था... के रुटीन मेडिसन लाने जाते वक़्त... रास्ते में दादी की एक्सीडेंट हो गया... और वह सिटी हॉस्पिटल में है...

यह सुन कर दादी अपनी जगह से उठ खड़ी हो जाती है l विश्व की भवें सिकुड़ जाती हैं l

दादी - क... क्या कह रहे हैं दामाद जी...

वीर - मैं समझने की कोशिश कर रहा हूँ दादी...

विश्व - लगता है... अनु का किडनैप हुआ है...

दादी - की नाप... मतलब...

विश्व - अपहरण...

दादी - अ.. अप.. हरण...

दादी रोते हुए बैठ जाती है l वीर की आँखे नम हो जाती है l बड़ी विवशता के साथ विश्व की ओर देखता है l विश्व गहरी सोच में डुबा हुआ था l वीर की फोन बज रहा था पर ना तो वीर, ना विश्व ना ही दादी की ध्यान उस फोन की ओर जा रहा था l एक गार्ड वीर को आवाज देता है

गार्ड - रा.. राजकुमार जी... (वीर नहीं सुनता) रा.. राजकुमार जी..

वीर - हँ... क्या... क्या हुआ...

गार्ड - वह आपका मोबाइल कब से बज रहा है... यह दुसरी बार बज रहा है...

गार्ड के चेताने पर वीर का ध्यान मोबाइल के तरफ जाता है l जैसे ही वह जेब से मोबाइल निकालता है मोबाइल पर रिंग बंद हो जाता है l वीर मोबाइल स्क्रीन पर मिस कॉल में अननोन नंबर लिखा देखता है l उसे देखते ही वीर की आँखे हैरानी से फैल जाती हैं l उसकी यह प्रतिक्रिया विश्व भी देख लेता है l अब मोबाइल फिरसे बजने लगती है l वीर कॉल लिफ्ट करते ही फोन बंद हो जाता है l वीर इसबार बहुत हैरान होता है l कुछ ही सेकेंड के बाद कमरे के दीवार पर लगा लैंडलाइन फोन बजने लगती है l कमरे में मौजूद सभी की नजरें उस बजती हुई फोन पर ठहर जाता है l एक गार्ड जा कर क्रैडल उठाता है

गार्ड - हैलो...

@ - फोन वीर को दो...

गार्ड - क्या...

@ - अबे... हराम के ढक्कन... फोन... उस वीर को दे...

गार्ड - (वीर की ओर देखते हुए) रा.. राजकुमार जी...

वीर - (झट से फोन लपक लेता है) हैलो...

@ - चु चु चु चु... वीर... यह क्या हो गया वीर...

वीर - कौन हो तुम... क्या चाहते हो...

@ - हा हा हा हा.... क्या बचकाना सवाल है... मैं जो चाहता था... वह मैंने कर दिया... मैंने तेरी अनु को उठा लिया...

वीर - (तड़प भरी आवाज़ में) कैसी है अनु... कहाँ है...

@ - आह... मज़ा आ गया... तेरी इस तड़प भरी आवाज सुन कर... दिल को बड़ा सुकून मिला...

वीर - (चिल्ला कर) मैं पूछता हूँ... कहाँ है अनु... (फोन पर वह शख्स हँसने लगता है) (वीर चेहरा और आवाज़ दोनों सख्त हो जाते हैं) मृत्युंजय... तु... मृत्युंजय ही है ना... (फोन पर उस शख्स की हँसी रुक जाती है) हाँ... तु मृत्युंजय ही है... (दादी मृत्युंजय की नाम सुन कर हैरान हो जाती है) चुप क्यूँ हो गया है... हराम जादे...

@ - (कुछ देर की चुप्पी बाद) सोच रहा था... हाँ कह दूँ... के मैं ही मृत्युंजय हूँ... तेरे से बचने के लिए इससे बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता... फिर सोचा... अपनी लोचा क्यूँ किसी बेचारे बेगुनाह पर थोप दूँ... ना मैं मृत्युंजय नहीं हूँ... पर जो भी हूँ... तुम क्षेत्रपालों से खार खाया हुआ हूँ... पर मजे की बात जानते हो... मैं क्षेत्रपालों के लिए ही काम करता हूँ...

वीर - क्या बकते हो...

@ - हाँ... राजकुमार... मैंने यह काम भी क्षेत्रपाल के लिए ही किया है...

वीर - क्या... क्या कहा तुने...

@ - वही... जो अभी सुना तुने...

वीर - (चिल्ला कर) किसने कहा था तुझे... क्या किया तुने मेरी अनु के साथ...

@ - किया तो कुछ नहीं... पर उसके साथ होगा बहुत कुछ...

वीर - कमीने...

@ - ना... भूतनी के ना... गाली नहीं... गनीमत सोच... मारा नहीं अब तक... वर्ना... मार चुका होता...

वीर - (थोड़ा नर्म पड़ते हुए) नहीं नहीं... उसे कुछ मत करना... तुम्हारी खुन्नस तो मेरे लिए है ना... तो कहो कहाँ आना है... मैं आ जाऊँगा... तुम अपनी खुन्नस मुझसे उतार लेना... अगर पैसा चाहिए तो बोलो... कितना रुपया चाहिए... मैं तुम्हें देने के लिए तैयार हूँ...

@ - अरे बाप रे... क्षेत्रपाल हो कर गिड़गिड़ा रहे हो...

वीर - प्लीज... अनु को छोड़ दो... (गिड़गिड़ाते हुए) प्लीज...

@ - वैसे छोटे क्षेत्रपाल... तुझे शुक्र मनाना चाहिए... जानता है... अनु के साथ जो भी कुछ होने वाला है... वह तेरी बहन के साथ भी हो सकता था....

वीर - (चिल्लाते हुए) हराम जादे...

@ - पर मैं तेरे दिल पर... आत्मा पर... तेरी मर्दानगी पर चोट पहुँचाना चाहता था... और इत्तेफाक देख... तेरे बाप ने ही मुझे अनु की सुपारी दी...

वीर - (स्तब्ध हो जाता है, उसकी आँखे फटी रह जाती है,) क.. क्या... कहा...

@ - हाँ प्यारे... तेरे बाप ने ही मुझे सुपारी दी... अनु को उठा लेने के लिए... जिसने क्षेत्रपाल घर की चौखट में घुसने की सोची... इससे पहले कि वह क्षेत्रपाल के घर की बिस्तर चढ़े... वह खुद अब बाजारु हरामियों की बिस्तर बन जाएगी... हाँ ऐसे में एक दो दिन बाद मर जाएगी... पर तु चिंता मत कर... उसकी आँखे... दिल... गुर्दे... फेफड़े... सब के सब बेच दी जाएगी...

फोन कट जाता है l वीर कुछ नहीं कह पाता l वह बेहद मज़बूरी और बेवसी के साथ अपना चेहरा मोड़ कर दादी और विश्व की ओर देखता है l दादी अभी भी उसे हैरानी के साथ देखे जा रही थी, वह धीरे धीरे वीर के पास जाती है l फोन पर हुई बातेँ किसीको भी सुनाई नहीं दी थी पर फिर भी विश्व, वीर की प्रतिक्रिया को समझने की कोशिश कर रहा था l

दादी - दामाद जी... क्या आपने...मृत्युंजय कहा...

वीर - (आवाज़ बड़ी मुश्किल से निकलती है) वह... मुझे लगा शायद मृत्युंजय कह रहा है...

दादी - (डरते हुए) क्या वह मृत्युंजय था...

वीर - नहीं जानता दादी... नहीं... जानता...

दादी की रुलाई फुट जाती है l वीर उसे संभालता है और दोबारा कुर्सी पर बिठा देता है, उसके हाथ पकड़ कर नीचे घुटनों पर बैठ कर,

वीर - दादी... अनु मेरी पत्नी है... याद है... उस दिन माँ ने उसे कंगन पहनाया था... और तुमने अपनी मर्जी से अनु को मेरे हवाले कर दिया था... दादी... अनु में मेरी जान बस रही है... अभी मैं जिंदा हूँ... मतलब अनु जिंदा है... उसे खरोंच तक नहीं आया है... और मैं तुमसे वादा करता हूँ... चौबीस घंटे के अंदर... हम दोनों तुम्हारे सामने होंगे... यह वादा है मेरा....

इतना कह कर वीर उठ खड़ा होता है और गार्ड्स को दादी की देखरेख करने को कह कर कमरे से बाहर जाता है l उसे बाहर जाता देख विश्व भी उसके पीछे पीछे बाहर आता है l विश्व देखता है वीर लिफ्ट में घुस गया है l विश्व भागते हुए जब तक पहुँचा लिफ्ट बंद हो कर ऊपर की ओर जाने लगती है l विश्व भी सीढियों से ऊपर के हर मंजिल पर पहुँच कर लिफ्ट देखता है l अंत में लिफ्ट छत पर पहुँचता है l लिफ्ट से वीर तेजी से निकल कर एक किनारे पहुँचता है l विश्व उसके पास भागते हुए जाता है l

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एक कमरे में अनु एक कुर्सी पर बंधी हुई बैठी है l उसके मुहँ पर टेप चिपकी हुई है l अनु की आँखे बंद थीं l धीरे धीरे उसकी आँखे खुलती है l वह अपनी चारों तरफ का जायजा लेने लगती है फिर वह ऊपर की ओर देखती है l उसके सिर पर एक केनोपी में बल्ब मिंज मिंजा रहा था l वह अपने साथ हुए हादसे को समझने की कोशिश कर रही थी l उसे याद आता है वीर को पार्टी ऑफिस से बुलावा आया था इसलिए वह चला गया था l xxxx हस्पताल से उसकी दादी की मोबाइल से उसे कॉल आया था कि उसकी दादी की हालत अचानक खराब हो गई है l वह ऑफिस से बाहर भागते हुए गई और वीर के ड्राइवर के साथ गाड़ी से हस्पताल पहुँची थी l हस्पताल के डॉक्टर ने कहा कि उसकी दादी आई थी अपनी रेगुलर मेडिसन लेने और घर चली गई है l डॉक्टर ने ऐसा कोई फोन नहीं किया था, वह समझी शायद किसीने उसके साथ मज़ाक किया होगा l वह वापस लौटी और पार्किंग के बाहर खड़े हो कर हाथ से इशारा कर गाड़ी को बुलाया l गाड़ी उसके पास रुकते ही गाड़ी की डोर खोल कर बैठ गई l तभी ड्राइविंग सीट से उसके चेहरे पर एक स्प्रे आकर टकराई थी l वह देखी ड्राइवर वह नहीं था, पर इससे ज्यादा उसे कुछ दिखा नहीं, उसकी आँखे धीरे धीरे बंद हो गई कि अब खुल रही हैं l अब उसे समझ में आ गया है, उसका अपहरण हुआ है l पर उसे अपहरण करने के लिए उसके पास है क्या, तब उसे समझ में आता है कि वीर ने उसे अपने ड्राइवर के साथ गाड़ी देकर भेजते हुए क्यूँ उसका पीछा करता था l

अनु ऐसे ही अपनी उधेड़बुन खोई हुई थी, तभी उस कमरे का दरवाज़ा खुलता है l एक मर्दाना साया सा उस कमरे में आता है थोड़ी दुरी पर खड़ा हो जाता है l जैसे ही वह अनु को होश में देखता है वह तुरंत कमरे से बाहर चला जाता है l उसके यूँ चले जाने से अनु थोड़ी हैरान होती है l कुछ देर बाद वह आदमी एक दुसरे आदमी के साथ अंदर आता है l वह दुसरा आदमी कमरे में एक और कुर्सी को खिंच कर अनु के सामने बैठ जाता है और अपना हाथ बढ़ा कर अनु के मुहँ से टेप निकाल देता है l टेप के निकलते ही अनु थोड़ी चीख उठती है l

आदमी - यह दर्द कुछ भी नहीं है लड़की... इसके बाद जो तेरे साथ होने वाला है... वही तेरी जिंदगी बनने वाली है... और मौत भी तुझे उसी से मिलने वाली है...

इतना कह कर वह आदमी एक भद्दी मुस्कान मुस्कराता है l पर बदले में अनु कोई प्रतिक्रया नहीं देती l इससे वह आदमी थोड़ा झल्ला जाता है l

आदमी - लगता है... तुझे मेरी बात समझ में नहीं आई... क्या सोचने लगी...

अनु - यही के.. तुम हो कौन... मैंने तुम्हें कभी नहीं देखा...

आदमी - हा हा हा... क्या ग़ज़ब लड़की है... तुझे क्या लगता है... तुझ पर खार खा कर... तुझे उठा लिया क्या... (अपना चेहरा अनु के करीब लाते हुए) तेरे आशिक को सबक सिखाने के लिए... मैंने तुझे उठाया है....

अनु - (अनु एक सपाट भाव से उसे देखने लगती है)

आदमी - डर गई ना....

अनु - (अपना सिर हिला कर ना कहती है)

आदमी - (थोड़ी हैरानी के साथ अपने बायीं आँख का भवां उठा कर) मैंने तुझे उठा लाया... तुझे क्या... दुनिया में किसी को भी मालुम नहीं है... अभी इस वक़्त तु कहाँ है... और तु कह रही है... तुझे डर नहीं लग रहा...

अनु - (फिर से अपना सिर हिला कर ना कहती है)

उस आदमी के बगल में खड़ा आदमी झुकता है और कहता है l

- बॉस... जैसा इसके बारे में सुना था... है बिल्कुल वैसी... ट्यूब लाइट...

आदमी - (अपनी कुर्सी छोड़ खड़े होकर) इसको समझ में आए या ना आए... मैं सिर्फ इसको... इसकी होने वाली बर्बादी की वज़ह... इसका आशिक है... यही बताने आया था...

कह कर मुड़ जाता है और वे दोनों कमरे से जाने लगते हैं l जैसे ही वे दोनों दरवाजे के पास पहुँचते हैं l

अनु - तुम लोगों ने बहुत बड़ी गलती कर दी है.... अपनी मौत के दरवाजे... तुमने खोल दी है...

दोनों रुक जाते हैं, वह आदमी वापस अनु के पास आकर बैठ जाता है l

आदमी - अच्छा... तुझे ऐसा लगता है... चल बोल... तुझे ऐसा क्यूँ लगता है...

अनु - मैं... क्षेत्रपाल परिवार की होने वाली बहु हूँ...

यह सुनते ही वह आदमी और उसके साथ वाला बंदा दोनों मिलकर हँसने लगते हैं l अनु थोड़ी हैरान होती है l

आदमी - लड़की... तुझे गायब करने के लिए सुपारी... तेरे होने वाला ससुर ने दिया है... (कह कर हँसने लगता है, फिर अपनी हँसी रोक कर) मुझे मौके की तलाश थी... क्षेत्रपाल बंधुओं से बदला लेने की... इत्तेफाक से... उसी खानदान से हमें... सुपारी मिली...

यह सुन कर अनु हैरान होती है l उसका सिर झुक जाता है l अनु की हालत देख कर वह कहता है

आदमी - कितनी खुश फ़हमी में थी ना... क्षेत्रपाल परिवार की बहु समझने लगी थी खुद को... तुझे देखने के बाद... मैं भी सोच में पड़ गया था... तु कोई बड़ी खूबसूरत तो है नहीं... गोरी चिट्टी है नहीं... फिर... (अपना चेहरा अनु के पास ले जा कर) जो लड़की मिले उसे चख कर छोड़ने वाला राजकुमार... तु कैसे सलामत रह गई...

अनु - राजकुमार मुझसे प्यार करते हैं...

आदमी - यही तो... राजकुमार तुझसे प्यार करता है... और तु उसीकी कीमत उतार रही है...

अनु - तुम लोग मेरे साथ क्या कर लोगे...

उस आदमी के साथ खड़ा आदमी

- बहुत जल्द बहुत कुछ करेंगे... इतना कुछ के तेरी बस साँसे चलती रहेगी...

अनु - कुछ नहीं कर पाओगे.... मुझे खरोंच भी आई... मेरे राजकुमार तुम लोगों को जिंदा नहीं छोड़ेंगे...

हा हा हा हा हा....

वह आदमी और उसके साथ वाला बंदा हँसने लगते हैं l हँसते हँसते वह आदमी अनु से कहता है

आदमी - वाह क्या लड़की है... इसे अपनी आशिक का इंतजार है... जब कि इसे उठवाया ही इसके आशिक का बाप है... (लहजा बदल कर) तेरे उसी ससुर की इशारे का इंतज़ार है... इशारा होते ही... (सिटी मार कर अपने हाथ को सांप के फन की तरह बना कर एक बार बाएं से दाएं तरफ ले जाता है) और जब तु... मरेगी... तब तुझे इस बात का पछतावा होगा... क्षेत्रपाल राजकुमार से... दिल क्यूँ लगाया...

अनु - वह दिन कभी नहीं आएगा... मुझसे एक गलती हो गई... मैंने दादी माँ को हस्पताल से फोन नहीं किया... पर एक बात है... इस बात का पछतावा तो तुम लोगों को जरूर होगा... के तुमने मुझे क्यूँ अगवा किया...

आदमी - (हैरान हो कर) बड़ी इत्मिनान है तुझे... इतना यकीन...

अनु - हाँ है तो...

आदमी - क्या इसलिए... के तेरे साथ अभी तक कुछ किया नहीं...

अनु - तुमने अभी अभी मुझे ट्यूबलाइट कहा ना... पर ट्यूबलाइट जब जलता है ना.. बहुत जबरदस्त जलता है...

आदमी - अच्छा... तुझे क्या समझ में आया बोल तो सही...

अनु - यही की मैं सही सलामत हूँ.... वर्ना तुम लोगों के पास मौका तो बहुत था... मुझे ख़तम करने या बर्बाद करने के लिए... पर तुम लोगों ने ऐसा कुछ किया नहीं... मतलब उस क्षेत्रपाल नाम की आँधी...

अनु की यकीन भरी बातों को सुन कर उस आदमी की आँखे फैल जाती है l उसकी यह प्रतिक्रिया देख कर अनु उसे कहती है

अनु - मैं अभी तक सलामत हूँ... मतलब मैं अभी भी... उनकी पहुँच और उनके दायरे में हूँ... वह क्या हैं... कैसे हैं... यह मुझसे बेहतर तुम जानते हो... मुझे उससे कोई मतलब नहीं है... मुझे बस इतना यकीन है... मेरे लिए... जमीन आसमान एक कर देंगे...

आदमी - बहुत यकीन है तुझे उस बदबख्त पर... अपनी यह हालत देखने के बाद भी...

अनु - हाँ... मैं उनकी सुकून हूँ... मैं उनकी जुनून हूँ... तुमने उनकी जुनून को छेड़ा है... तुम्हारा अंजाम... तुम्हें लगता है कि तुमने मेरा अंजाम सोच रखा है... पर सच यह है कि... तुमने तुम्हारा अंजाम तय कर लिया है... तुमने यह सोचा था... के मैं पछताऊँ... राजकुमार से प्यार किया इसलिए... वह दिन तो कभी नहीं आएगा... पर तुम जरूर पछताओगे... लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी...

आदमी अपनी कुर्सी से उठ कर चला जाता है उसके पीछे पीछे वह बंदा भी चला जाता है और कमरे का दरवाज़ा बंद हो जाता है l

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विश्व भागते हुए हस्पताल की छत पर पहुँचता है l अपनी नजर चारों तरफ घुमाता है l एक कोने पर दीवार पर वीर उसे खड़ा दिख जाता है l

वीर - (आसमान की ओर देखते हुए चिल्लाता है) या... आ.. आ...

विश्व थोड़ी देर के लिए स्तब्ध हो जाता है l फिर आवाज देते हुए वीर के पास दौड़ता है

विश्व - वीर... (वीर को नीचे खिंच लेता है) यह करने जा रहे थे वीर...

वीर - (एक टूटी हुई मुस्कान के साथ विश्व की ओर देखता है) नहीं यार... मैं... आत्म हत्या करने नहीं आया हूँ... मैं रोना चाहता था... चीखना चाहता था... चिल्लाना चाहता था... हस्पताल के अंदर बोर्ड पर लिखा था... साइलेंस प्लीज... इसलिए छत पर आकर चिल्ला रहा था...

विश्व - (वीर को झकझोरते हुए) यह कैसी बातेँ कर रहे हो... होश में आओ...

वीर - हाँ... आ गया हूँ... होश में... जानते हो प्रताप.... अभी नीचे दादी से क्या वादा कर आया हूँ... चौबीस घंटे के भीतर... मैं अनु को लेकर उसके सामने खड़ा होऊँगा...

विश्व - तो ढूँढ लेंगे ना यार....

वीर - नहीं... नहीं ढूँढ सकते...

विश्व - क्यूँ नहीं ढूँढ सकते... तुम राजकुमार हो... तुम क्षेत्रपाल हो... तुम्हारे एक इशारे पर... यह पुरा सिस्टम और एडमिनिस्ट्रेशन अपनी पुरी ताकत झोंक देगा अनु को ढूंढ़ने के लिए...

वीर - (हँसने लगता है) हा हा हा हा... कुछ देर पहले मुझे भी यह खुश फ़हमी था... (फिर अचानक चेहरे पर दर्द उभर आता है) पर... जब मालुम हुआ... यह किडनैप मेरे बाप ने कराया है... तब मुझे मेरी औकात और हस्ती मालुम हो गई...

विश्व - फोन पर कौन था... (वीर चुप रहता है) क्या मृत्युंजय...

वीर - पता नहीं... पर जो भी था.. इतना जरूर कहा कि वह... मेरा दुश्मन है... और उसे अनु को उठवा ने के लिए सुपारी... मेरे बाप ने दी है... (विश्व की तरफ देख कर) अगर यह सच है... तो यह सारा सिस्टम और एडमिनिस्ट्रेशन मुझे पुचकारेगी और दिलासा देगी... पर नतीज़ा वही निकलेगा जो मेरा बाप चाहेगा...

कुछ देरी के लिए दोनों के दरमियान खामोशी पसर जाती है l धीरे धीरे अंधरे के गर्त में डूब रहा शहर की कोलाहल सुनाई दे रही थी l तभी वीर की फोन बजने लगती है l वीर झट से फोन निकाल कर देखता है l स्क्रीन पर भाभी लिखा आ रहा था l वीर थोड़ा हैरान होता है और खुदको नॉर्मल करते हुए फिर फोन लिफ्ट करता है l

वीर - हैलो...

शुभ्रा - हैलो वीर... कहाँ हो...

वीर - क्या हुआ भाभी... आप ऐसे क्यूँ पूछ रही हैं... मैं इस वक़्त वहीँ हूँ... जहां मुझे होना चाहिए...

शुभ्रा - माँ जी आई हुई हैं.. क्या तुम जानते हो...

वीर - (चौंकता है) क्या... माँ आई हुई है...

शुभ्रा - एक मिनट... तुम माँ से बात कर लो...

सुषमा - हैलो वीर...

वीर - क्या बात है माँ... तुम थोड़ी घबराई हुई लग रही हो... क्या हुआ...

सुषमा - कुछ नहीं बेटे... लगता है... भगवान को यह मंजुर नहीं.. के मैं अनु की दादी के सामने अपना सिर उठा कर खड़ी हो पाऊँ...

वीर - (आँखे हैरानी से फैल जाते हैं) यह तुम... कैसी बातेँ कर रही हो माँ... क्या हो गया है...

सुषमा - जानते हो... मुझे यहाँ किस बावत बुलाया गया है... कल xxxx होटल में.. शाम साढ़े सात बजे... तेरा मंगनी है... सुना है... कोई इंडस्ट्रियलिस्ट है... निर्मल सामल... उसकी बेटी से...

वीर - (हैरानी भरे आवाज में) कल मेरा मंगनी है... और मुझे खबर तक नहीं...

सुषमा - मुझे भी आज पता चला है बेटे...

वीर - ठीक है माँ.. मैं कुछ करता हूँ...

वीर फोन काट देता है और कुछ सोचते हुए घुटने के जितने ऊँचे एक पिलर पर बैठ जाता है l विश्व अब तक वीर की बातेँ सुन रहा था और अब वीर की हालत पर गौर कर रहा था l

विश्व - क्या हुआ वीर....

वीर - (हँसने लगता है) हा हा हा...

विश्व - वीर... फिर क्या हुआ...

वीर - (विश्व की ओर देखते हुए) प्रताप... तुमने पुरे जीवन काल में... मेरे परिवार के बड़े जो तोप बने घूमते हैं... उनसे बड़ा कमीना और हरामी... कभी देखे नहीं होगे... जानते हो अनु को किडनैप क्यूँ किया गया है... ताकि उसकी आड़ में... मुझे ब्लैक मैल कर... किसी और से मेरी पहले मंगनी और फिर शादी करा सके... हा हा हा... कहाँ मैं सोच रहा था... अपने बड़ों की इजाजत लेकर... अनु से शादी करूँगा... और कहाँ मेरे बड़ों ने... मेरे और मेरे तकदीर के साथ क्या मज़ाक किया...

विश्व - इसका मतलब... तुम्हारे घर में बड़ो को... तुम्हारे और अनु के बारे में सब मालुम था...

वीर - हाँ... और मैं समझ रहा था... बड़ों को अपनी काम से फुर्सत नहीं है.. इसलिए अपनी दिल की बात बता कर... अनु से शादी कर लूँगा... (विश्व चुप रहता है, विश्व को चुप देख कर) हैरान मत हो प्रताप... जानवरों में भी कुछ नस्लें होते हैं... जो भूख लगने पर... अपनी ही बच्चों को मार कर खा जाते हैं... और यह क्षेत्रपाल परिवार... कोई इंसानी नस्ल नहीं...

विश्व यह सुन कर स्तब्ध हो जाता है l वीर अपना सिर ऐसे हिला रहा था जैसे उसे सब समझ में आ चुका था l

वीर - विक्रम भैया... जब कलकत्ता गए... मुझे हिदायत देते हुए गए थे... मैं समझ नहीं पाया था... इसलिए यह तो पक्का है... मुझे ना मेरी एजेंसी से... ना ही सरकारी शासन व प्रशासन से... कोई मदत नहीं मिलेगी....

तभी एक गार्ड इन दोनों के पास पहुँचता है l वीर को सैल्यूट करता है और

गार्ड - सर... नीचे पुलिस आई हुई है... वह कह रहे हैं... उनके हाथ कुछ लगा है... आपको जानना चाहिए...

वीर चौंक कर विश्व की ओर देखता है और फिर तेजी से नीचे लॉबी में पहुँचता है l उसके साथ साथ विश्व और वह गार्ड पहुँचते हैं l लॉबी में एक इंस्पेक्टर अपने कुछ पुलिस कर्मियों के साथ हस्पताल के स्टाफ़ और गार्ड्स से पूछताछ कर रहा था l वह इंस्पेक्टर जैसे ही वीर को देखता है पूछताछ रोक कर वीर के पास आता है l

इंस्पेक्टर - राजकुमार जी... हैलो... (वीर कोई जवाब नहीं देता, इंस्पेक्टर थोड़ा अकवर्ड फिल करता है) वह बात दरअसल यह है कि... आम तौर पर गुमशुदगी की कंप्लेंट चौबीस घंटे के पहले ली नहीं जाती... पर...

वीर - पर आप लोगों को... कंप्लेंट किसने करा...

इंस्पेक्टर - जी कुछ घंटे पहले... हॉस्पिटल की एडमिनिस्ट्रेशन ने फोन पर गुमशुदगी की जानकारी दी थी...

वीर - यह गुमशुदगी नहीं है...

इंस्पेक्टर - जी तहकीकात में मालुम हुआ... यह अपहरण है... (वीर चुप रहता है) और यह वाक्या सीसीटीवी से मालुम हुआ...

वीर - सीसीटीवी से...

इंस्पेक्टर - जी सर... सीसीटीवी में चलते हुए टाइम स्क्रॉल को देख कर... आइए देखिए...

लॉबी में एक सादे कपड़े में बैठे एक शख्स लैपटॉप लेकर बैठा था l इंस्पेक्टर वीर को लेकर उसके पास पहुँचता है l विश्व भी उसके पास आता है तो इंस्पेक्टर उसे रोकता है l

इंस्पेक्टर - आप कौन...

वीर - यह मेरे साथ है... मेरा दोस्त है....

इंस्पेक्टर - ओके...

वह आदमी लैपटॉप पर चार विंडो क्लिप विडिओ चलाता है l सभी देखते हैं l अनु हस्पताल से निकल कर पार्किंग के पास जाकर अपने हाथ से इशारा कर गाड़ी बुलाती है l गाड़ी उसके पास आते ही वह गाड़ी में बैठ जाती है l वीडियो के खत्म होते ही इंस्पेक्टर वीर से कहता है

इंस्पेक्टर - जैसा कि आप देख रहे हैं... मिस अनु जी... गाड़ी में पौने पाँच बजे गाड़ी में बैठ कर जा रही हैं.... मतलब... हमें जब इत्तला मिली... सिर्फ डेढ़ घंटे बीते थे...

विश्व - एसक्युज मी... इंस्पेक्टर... इफ यु डोंट माइंड... क्या यह क्लिप फिर से चला सकते हैं...

यह सुन कर इंस्पेक्टर विश्व की अजीब ढंग से देखने लगता है l विश्व वीर की ओर इशारा करता है l वीर विश्व की ओर देखता है फिर इंस्पेक्टर को क्लिप चलाने के लिए इशारा करता है l इंस्पेक्टर उस आदमी से क्लिप चलाने के लिए कहता है l विश्व इस बार गौर से तीन चार बार क्लिप चला कर वीडियो अलग अलग कर देखता है l

विश्व - वीर... अनु की किडनैपिंग साढ़े बारह बजे से एक बजे के भीतर हुआ है... यह सारे क्लिप्स मॉर्फड है...

इंस्पेक्टर - व्हाट... (इंस्पेक्टर वीडियो देखने लगता है, फिर विश्व से) तुम्हें कैसे पता चला... तुम हमारी इनवेस्टिगेशन को मिस गाईड कर रहे हो... (वीर से) यह कौन है राजकुमार जी...

वीर - यह वकील हैं...

इंस्पेक्टर थोड़ा नर्म पड़ता है l फिर से वीडियो क्लिप्स देखने लगता है l पर उसे कुछ समझ में नहीं आता l

इंस्पेक्टर - (विश्व से) सर आपको कैसे मालुम हुआ...

विश्व - क्यूंकि कुछ ही टाइम में यह क्लिप्स मर्फ किया गया है... इसलिए कुछ लाकुना रह गया है... यह देखिए... अनु की साये को देखिए... छोटी सी साया उसके पैरों के नीचे दिख रही है... जबकि टाइम स्क्रॉल में पौने पाँच दिखा रहा है... पौने पाँच बजे का साया बड़ा होना चाहिए... जैसे कि उसके आसपास के साये हैं...

इंस्पेक्टर - (क्लिप को देखने के बाद अपने स्टाफ से) लगता है हमसे कुछ छूट गया है... चलो फिर से शुरू करते हैं... पुरी बारीकी से और सावधानी से... कॉम ऑन... (वीर से) राजकुमार जी... हम तहकीकात करने के बाद आप से बात करेंगे...

इतना कह कर इंस्पेक्टर अपने सह कर्मियों को लेकर वहाँ से चला जाता है l उनके जाते ही

वीर - प्रताप... एक बात समझ में नहीं आया... मान लो एक बजे किडनैप हुआ... तो किडनैप को पाँच बजे दिखाने की कोशिश क्यूँ की...

विश्व - वह इसलिए... ताकि तहकीकात को भटका सकें... उन्हें अनु को दुर ले जाने के लिए... एक टाइम लैप चाहिए... और यह सब... कोई पहुँची हुई टीम ने की है...

वीर - (एक दम असहायसा होकर) जहां क्षेत्रपाल ईनवॉल्व हो... वहाँ... (और कुछ कह नहीं पाता)

विश्व - हम पता कर लेंगे...

वीर - कैसे...

विश्व अपना मोबाइल निकालता है और एक कॉल लगाता है l उधर से कॉल लिफ्ट होते ही विश्व स्पीकर पर डाल देता है l

# - हैलो भाई... कहिए कैसे याद किया...

विश्व उस शख्स को अनु के बारे में और पुलिस की कहीं तहकीकात के बारे में सारी बातेँ बताता है l फोन पर वह शख्स सब सुनने के बाद कुछ देर के लिए चुप हो जाता है l

विश्व - क्या हुआ...

# - भाई... यह कोई बड़ा वाला पंगा लगता है... जिन्होंने भी यह हरकत की है... छकाने के लिए... जलेबी बनाया है...

विश्व - मतलब...

# - इसका मतलब हुआ है... की सबको अपने बनाए पहेली में घुमा कर... सही मौका मिलने पर... अनु को भुवनेश्वर से बाहर ले जाएंगे....

विश्व - कौन सा ग्रुप किया है... कोई आइडिया है...

# - भाई... मेरे को पता करने के लिए... थोड़ा वक़्त चाहिए...

वीर - वक़्त ही नहीं है... तुम कह रहे हो कि.. अनु को भुवनेश्वर से बाहर ले जाने जा सकते हैं... या फिर... ले जा चुके हों...

# - नहीं... इतनी जल्दी... आसान नहीं है... पर हो सकता है... रात बारह बजे के बाद... किसी भी रास्ते ले जा सकते हैं...

वीर - क्या... तो उन्हें रोकें कैसे...

# - आप कुछ भी कर के अगर शहर की नाकाबंदी करवा सकें... तो सुबह तक मैं आपको खबर निकाल सकता हूँ...

वीर - (चुप हो जाता है)

विश्व - अच्छा... तुम अपने काम पर लग जाओ... हम अपना काम करेंगे...

# - ठीक है भाई...

फोन कट जाता है l विश्व अपना मोबाइल को जेब में वापस रख देता है l वीर बेवसी के साथ दीवार पर पीठ टीका कर खड़ा हो जाता है l

विश्व - क्या हुआ...

वीर - जानते हो... यहाँ पुलिस तहकीकात के बहाने... सेंडी लगाने आई थी... मतलब हमें भटकाने आई थी... इन सबके पीछे... मेरा बाप है... यानी मुझे ना शासन से... ना प्रशासन से... मुझे मदत मिलने से रहा... (कांपती आवाज में) मेरी अनु को... शायद ढूंढ नहीं पाऊँगा... कास के विक्रम भाई मेरे पास होते... इस शहर की नाकाबंदी मैं किससे कह कर कर पाऊँगा...

विश्व - (वीर के कंधे पर हाथ रखकर) आज इस शहर की नाकाबंदी... होगी... शासन भी करेगा... प्रशासन भी करेगा... जब तक अनु नहीं मिल जाती... ना शासन सोयेगा... ना प्रशासन सोयेगा...

वीर हैरान हो कर विश्व को देखने लगता है l विश्व एक मुस्कराहट के साथ वीर को देखते हुए अपना मोबाइल निकालता है और एक फोन लगाता है l

×_____×_____×_____×_____×_____×_____×

दरवाजे पर धक्का लगाते हुए पिनाक विक्रम के कमरे में घुसता है l विक्रम टीवी पर न्यूज देख रहा था, पीछे मुड़ कर देखता है पिनाक उसके पीछे चला आ रहा था l बड़ा खुश नजर आ रहा था l विक्रम टीवी को म्युट कर अपनी जगह से खड़ा होता है l

पिनाक - युवराज... कल आपका काम बहुत बढ़ गया है... इसलिए यह टीवी बंद कर दीजिए... और आराम कीजिए... हम सुबह सात साढ़े सात बजे... चार्टर्ड प्लेन से भुवनेश्वर जा रहे हैं...

विक्रम - कैसा काम छोटे राजा जी...

पिनाक - जो काम सौंपा था... वह काम हो गया है... राजकुमार की जिंदगी से... उस कांटे को हमेशा हमेशा के लिए बाहर निकाल दिया गया है...
 
मेरे दोस्तों

चूंकि ड्रामा प्रतियोगिता में व्यस्त था इसलिए पुरस्कार वितरण समारोह तक इस पेज से दूर रहा

हमने एक नाटक की कॉमेडी प्ले थी

विभागीय प्रतियोगिता में तृतीय पुरस्कार मिला

द्वितीय श्रेष्ट निर्देशक का पुरस्कार मिला

आप सब मित्रों की दुआयें असर कर गई

आपके दिए गए कमेंट्स का प्रतिउत्तर ना दे पाने का खेद है l

खैर एक सौ तेंतीसवां अंक प्रस्तुत कर दिया है कृपया पढ़े और अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करें
 
हाँ अब अघोषित विद्रोह का बिगुल बज चुका है

वीर अब भयंकर बगावत करेगा

अब सही मायनों में क्षेत्रपालों का पतन शुरू हो गया

विश्व का तेज दिमाग से पुरे शहर की नाकाबंदी होगी

विश्व और वीर की मित्रता और भी प्रगाढ़ होगी

आपको इस बंदे का परिचत अगले अंक में मिल जाएगा, पर इतना जरूर कहूँगा यह भी मोहरा होगा असल खिलाड़ी कोई और होगा

शुक्रिया SANJU ( V. R. ) भाई आपका बहुत बहुत शुक्रिया

एक समीक्षा मन को प्रफुल्लित कर देता है

धन्यवाद और आभार
 
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