Thriller "विश्वरूप" ( completed ) - Page 2 - SexBaba
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Thriller "विश्वरूप" ( completed )

मित्र मेरे भाई मुझे लगता है यहाँ हर लेखक को अपनी कहानी में SANJU ( V. R. ) भाई की समीक्षा की प्रतीक्षा रहती है

वैसे मुझे मेरे कहानी में Lib am भाई और Death Kiñg भाई की समीक्षा का भी प्रतीक्षा है

देखते हैं कब उनके दर्शन मिलते हैं
 
कहानी में मट्टू अपना किरदार जी रहा है

ना वह सकारात्मक है ना ही नकारात्मक

वह कितना विशेष है यह आगे चलकर पता चलेगा

यह सब सुनियोजित हत्याएँ थी

आगे चलकर धीरे धीरे हर पर्दे हटेंगे

हाँ यहाँ पर भी एक भीषण षडयंत्र हुआ है

यह मुलाकात होगी जरूर होगी

पर इसपर मैं कोई रिवील नहीं करना चाहता

अब समय आ गया है

वीर और क्षेत्रपाल का टकराव सामने आ जाएगा

और क्षेत्रपाल परिवार तितर-बितर होना शुरू होगा

टोनी की भी अपनी सीमाएं हैं

जैसा कि टोनी ने रोणा से कहा विश्व जिसे ट्रैप करना होता है उसकी तैयारी वह कर चुका होता है

इसके आगे कुछ ना कहूँगा

अंत में धन्यवाद और आभार
 
👉एक सौ सत्ताइसवां अपडेट

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अंधेरा छटा नहीं था विश्व पहुँच गया था l चूंकि उसने रात को ही खबर कर दी थी इसलिए रात को ही सीलु गाँव से निकल कर यशपुर चला गया था l विश्व पहुँचने के बाद उमाकांत सर जी का घर देख कर हैरान हो गया था l उसने जितना भी बदलाव किया था सीलु ने उसके ऊपर अपना दिमाग लगा कर और भी खूबसूरत बना दिया था l विश्व इस वक़्त इतना खुश था कि अगर सीलु सामने होता तो उसे गले से लगा लेता l

टीलु - क्या देख रहे हो भाई...

विश्व - पिछले जनम में तुम सब से मेरा भाई वाला ही नाता था..

टीलु - हाँ वह तो है... जरूर एक ही माँ के पेट से होंगे...

विश्व - हाँ...

टीलु - पर कोई ना... अब हम सब एक ही दीदी के भाई है... क्यूँ है कि नहीं...

विश्व - (मुस्कराते हुए) तुम सब बातों में माहिर हो...

टीलु - क्या... भाई... इसमें बात बनाने वाली बात कहाँ से आ गई...

विश्व - दीदी बमुश्किल से तुम्हें ही देखी है... उन तीनों से मिली भी नहीं है... और तुम...

टीलु - गलत... मैंने वक़्त निकाल कर सीलु को दीदी से मिलवा चुका हूँ..

विश्व - (चौंक कर) क्या...

टीलु - घबराने का नहीं... गाँव में सबकी नजरों से छुपाते हुए दीदी से मिलवाया...

विश्व - पर क्यूँ...

टीलु - क्यूंकि दीदी मिलना चाहती थी...

विश्व - ह्म्म्म्म... तब ठीक है...

टीलु - पर भाई तुमने पूछा नहीं... दीदी क्यूँ मिलना चाहती थी...

विश्व - नहीं...

टीलु - पर क्यूँ...

विश्व - दीदी सीलु से मिलना चाहती थी.. क्यूंकि कुछ दिनों के लिए ही सही... सीलु ने विशु की जगह ली थी... और वैसे भी... मेरी दीदी का दिल बहुत बड़ा है... और तुम सब उसके लिए उतना ही हो... जितना कि मैं... जब कोई भी मेरा नहीं था... तब तुम लोग मेरे साथ आए... वह भी बिना किसी लाग लपेट के...

टीलु - बस भाई बस... मुझे और सेंटी मत करो... कुछ देर बाद तुम्हारे नन्हें प्यारे प्यारे बंदर आयेंगे... उनको सम्भालो... दिलासा दो...

विश्व - ऐ... उन्हें बंदर क्यूँ कह रहे हो...

टीलु - (बिदक कर) और नहीं तो... वह सब इत्ते इत्ते से छछूंदर... मुझे चमगादड़ मामा कह रहे हैं... (टीलु जिस अंदाज से कहा विश्व जोर जोर से हँसने लगता है) हाँ हाँ हँस लो... तुम उसके मामा... और मैं उन सबका चमगादड़ मामा...

विश्व - (हँसी को दबाने की कोशिश करते हुए) अरे इसमें इतना बुरा मानने वाली बात कहाँ है...

टीलु - (मुहँ बना कर) तो इसमें खुशी से उछलने वाली बात भी कहाँ है...

विश्व - अच्छा यही बात तुमको अंग्रेज़ी में कही होती तो...

टीलु - अंग्रेजी में..

विश्व - हाँ बैट मेन अंकल... (कह कर विश्व हँसने लगता है) अब तो बुरा नहीं लगेगा ना...

विश्व के साथ साथ टीलु भी हँसने लगता है, तभी एक लड़का आ पहुँचता है l वह दोनों अपनी हँसी को रोक कर उस लड़के की ओर देखते हैं l वह लड़का खुशी के मारे अपनी आँखे बड़ी करते हुए उन्हें देख रहा होता है l विश्व को देखते ही वह लड़का पूछता है l

लड़का - अरे मामा तुम आ गए...

विश्व - मैं गया ही कब था... और तुम इतनी सुबह सुबह...

टीलु - इन बंदरों को नींद आती भी है या नहीं... यह पूछो...

लकड़ा - (अपना गाल फुला कर) हूँन्न्न्नन्...

विश्व एक बड़ा सा चॉकलेट निकाल कर लड़के के सामने लहराता है l लड़का चॉकलेट देख कर खुश हो जाता है और लेने के लिए हाथ बढ़ाता है तो विश्व चॉकलेट को अपने पीछे ले जाता है l लड़का मुहँ बनाता है l

विश्व - पहले यह बताओ... तुम्हारा नाम क्या है...

लड़का - अरुण...

विश्व - हाँ तो अरुण... इतनी सुबह सुबह...

अरुण - वह क्या है कि मामा... आज... (अपनी दो उंगली दिखा कर) लंदन से थोड़ा जल्दी बुलावा आ गया था... इसलिए...

टीलु - ऐ छछूंदर... संढास के लिए बाहर जाने को लंदन बोल रहा है...

अरुण - (टीलु को उंगली दिखा कर) ऐ चमगादड़ मामा... यह हमारा कोड वर्ड है... हम यहाँ नहर को... लंदन बोलते हैं...

टीलु - अबे तेरी तो... (विश्व उसे रोकता है)

विश्व - देखो अरुण... गलत बात... चमगादड़ नहीं...

अरुण - (मुहँ बना कर) सॉरी मामा...

विश्व - अच्छा यह बताओ... तुम इन्हें.. चमगादड़... क्यूँ कह रहे थे...

अरुण - यह हमें आप से मिलने ही नहीं दे रहे थे... जब देखो द्वार पर... लटके ही दिखे... इसलिए...

विश्व - ठीक है... पर चमगादड़ नहीं... हाँ उन्हें तुम सब... बैट मेन अंकल कह सकते हो...

अरुण - ठीक है... पर क्यों...

टीलु - (बड़े एटीट्यूड के साथ) इसलिए... क्यूंकि तुम्हारे इस बैट मेन अंकल... फोरैंन रिटर्न हैं...

अरुण - फोरैंन रिटर्न... मतलब लंदन से...

टीलु - हाँ... (फिर चिल्ला कर) नहीं... तुम्हारे वाली.. लंदन से नहीं... असली लंदन से...

अरुण - हाँ हाँ ठीक है... (विश्व से) अच्छा मामा... लाइब्रेरी बन गया...

विश्व - हाँ... बन गया...

अरुण - और हमारे लिए खिलौने भी लाए हो....

विश्व - हाँ हाँ लाया हूँ... तुम सब आज तैयार हो कर आना... और आज के बाद यहाँ जम कर उछलकूद करना... पढ़ना...

अरुण - (खुशी से उछलते हुए) अरे वाह... मैं अभी जाता हूँ अपने सारे दोस्तों से कहता हूँ...

विश्व - हाँ और यह भी... आज सब तुम सब दो पहर का खाना... अपने मामा के साथ खाओगे...

अरुण - ठीक है...

कह कर बिना पीछे मुड़े अरुण वहाँ से भाग जाता है l विश्व उसे जाते हुए देखता है l

टीलु - भाई... कोई लफड़ा तो नहीं होगा ना..

विश्व - कैसा लफड़ा...

टीलु - तुम जानते हो... यह गाँव वाले...

विश्व - टीलु... मेरे भाई... अगर यह बच्चे आकर इस श्रीनिवास लाइब्रेरी को जिंदा कर देंगे... तो समझ लो... इन मरे हुए गाँव वालों को भी जिंदा कर देंगे...

टीलु - वह कैसे...

विश्व - वह सब मैं बाद में बताऊँगा... पहले यह बताओ... उन न्यूज पेपर में... और क्या क्या मेसेज मिला है अब तक...

टीलु - अरे हाँ... एक मिनट... अभी लाया...

टीलु अंदर जाता है, कुछ न्यूज पेपर और हाथ में एक डायरी लेकर आता है l डायरी को विश्व के हाथ में देकर और न्यूज पेपर्स को विश्व के सामने रखते हुए

टीलु - यह लो... तुमने जैसा कहा था... मैंने बिल्कुल वैसा ही डीकोडिंग करते हुए... जो भी मेसेज बना.. मैंने इस डायरी में लिख दिया है... देखो...

विश्व डायरी में वह पन्ना देखता है जिसमें टीलु ने डीकोड कर वह संदेश इकट्ठा किया था l

"तुम अकेले नहीं हो, एक काफिला तैयार है, युद्ध जब अनिवार्य है, हमारा मिलना आवश्यक है"

"भ्रष्टाचार ही भ्रस्टाचार है, हर तंत्र सम्मिलित है, तुम अकेले क्या करोगे, चलो मिलकर बाजी जीते"

विश्व - सिर्फ दो संदेश... इतने दिनों में... सिर्फ दो संदेश...

टीलु - हाँ... एक दिन मैं यशपुर बहुत जल्दी चला गया था... उस दिन के बाद... और संदेशे मिले नहीं... (विश्व टीलु को घूर कर देखने लगता है) सच कहता हूँ भाई... मैं कोई जासूसी करने नहीं गया था... हाँ थोड़ी जल्दी जरूर गया था... और शायद उसी दिन से वह डर कर मेसेज देना बंद कर दिया... मुझे लगता है... यह राजा क्षेत्रपाल की कोई जाल था... पकड़े जाने के डर से... संदेशा नहीं दे रहा....

विश्व डायरी में लिखे मेसेज्स गौर से पढ़ने लगता है l फिर अपनी आँखे मूँद कर कुछ सोचने लगता है l

टीलु - क्या सोचने लगे भाई...

विश्व - मुझे लगता है... यह बंदा शायद यह जानने की कोशिश कर रहा है... मैं उसके संदेशे पढ़ रहा हूँ या नहीं...

टीलु - मतलब तुम्हें लगता है... इसके पीछे राजा साहब नहीं है...

विश्व - पता नहीं... पर मेरे अंदर की गट फिलिंग कह रही है... कोई बंदा... राजा साहब का सताया हुआ... जो मुझसे ज्यादा मुझको जानता है... मेरी मदत करना चाहता है...

टीलु - तो अब... क्या करने का प्लान है...

विश्व - सोचता हूँ...

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द हैल

डायनिंग टेबल पर चारों सदस्य बैठे हुए हैं l रुप वीर से नजरें चुरा रही थी और खुद को शुभ्रा के साथ बात चित में व्यस्त दिखा रही थी l विक्रम चुप चाप अपना नास्ता कर रहा था पर वीर खोया हुआ था l यह सब बातेँ शुभ्रा नोटिस कर लिया था l

शुभ्रा - क्या बात है वीर... किस सोच में खोए हुए हो...

वीर - (अपनी सोच से बाहर आते हुए) कुछ नहीं भाभी...

शुभ्रा - कुछ तो है... तुम थोड़े टेंशन में लग रहे हो... क्यूँ नंदिनी... तुम्हें क्या लगता है...

रुप - म.. म.. मुझे क्या लगता है... मुझे क्या लगेगा भाभी... वीर भैया ट.. ट.. ठीक ही लग रहे हैं...

शुभ्रा - हाँ हाँ ठीक है ठीक है... तुम ऐसे हकला क्यूँ रही हो..

रुप - कहाँ... कहाँ भाभी... मैं ठीक हुँ... वह मैं अपनी सब्जेक्ट याद कर रही थी... और अपने फ्यूचर के बारे में सोच रही थी...

विक्रम - कैसा सब्जेक्ट... कैसा फ्यूचर...

रुप - वह भैया... मैं सोच रही थी... के भाभी से कुछ टीप्स लूँ... गाइडेंस लूँ...

विक्रम - किस बात पर...

रुप - यही के... मैं समर वेकेशन में डॉक्टरी की एंट्रेंस की तैयारी करूँ...

विक्रम - क्या... पर क्यूँ... और दो साल बाद... वैसे भी.. तुम शादी करने वाली हो...

रुप - तो... तो क्या हुआ भैया.. मैं डॉक्टरी के बाद भी तो शादी कर सकती हूँ...

विक्रम - पागल हो गई हो... या बचपना दिखा रही हो... तुम अच्छी तरह से जानती हो... तुम यहाँ पढ़ाई के लिए आई हो... पर उसके पीछे की वज़ह और शर्तें भूलो मत... (रुप का चेहरा उतर जाता है)

शुभ्रा - ओ.. हो... मैंने कहाँ से शुरू किया था... और बात कहाँ पर आकर पहुँच गई... वीर... प्लीज तुम बताओ... क्या सोच रहे थे...

वीर - भाभी... मैं वह...

शुभ्रा - (हैरान हो कर छेड़ते हुए) वीर... तुम झिझक रहे हो...

वीर - हाँ.. वह मैं...

सब खाना खाते हुए रुक जाते हैं और सबकी नजर वीर पर रुक जाती है l वीर सब नजर घुमाने के बाद शुभ्रा को देखते हुए कहता है l

वीर - मैंने एक अहम फैसला किया है... आई मिन कर लिया है... अपने लिए... इस घर के लिए... हम सबके लिए... (रुक जाता है)

विक्रम - कैसा फैसला...

वीर - भैया... भाभी... नंदिनी... आप सब अनु को जानते हो... अनु आप सबको पसंद भी है...

विक्रम - साफ साफ कहो वीर...

वीर - मैं... मैंने अनु से जल्द से जल्द शादी करने का फैसला किया है...

यह सुन कर सब पहले शुन हो जाते हैं, उसके बाद

विक्रम - क्या...

शुभ्रा - वाव...

रुप - आह सच में..

विक्रम - होल्ड ऑन होल्ड ऑन.. यह तुमने फैसला किया है... आई मिन... जो कर लिया है... इसमें हमें कोई ऐतराज नहीं है... क्यूंकि हम जानते हैं... छोटी माँ का भी आशीर्वाद है... पर तुम भूल रहे हो... टीम बड़े... और हैं... बड़े राजा जी... राजा साहब और छोटे राजा जी... जिनकी मंजुरी बहुत जरूरी है...

वीर - नहीं भूला हूँ... मैं आप सबको अपनी बात बता देना चाहता था.... सो बता दिया...

विक्रम - ठीक है... पर अचानक ऑल ऑफ सडन... आई मिन तुम... कुछ दिन या महीने रुक भी सकते थे...

वीर - क्यूँ...

विक्रम - देखो... अभी हम सब किसी ना किसी वज़ह से डिस्टर्ब्ड हैं... ऐसे हालात में... तुम हमारे घर के बड़े... राजी भी होंगे... डाऊट है... (कुछ देर के लिए सभी चुप हो जाते हैं, फिर) वैसे भी... तुमने अचानक यह फैसला क्यों लिया...

वीर चुप रहता है l उसकी चुप्पी को शुभ्रा समझ जाती है l इतने में सबका खाना चूंकि ख़तम हो चुका था, इसलिये शुभ्रा रुप को इशारे से अपने साथ किचन की चलने के लिए कहती है l रुप और शुभ्रा दोनों किचन के अंदर चले जाते हैं l

विक्रम - तुमने बताया नहीं... क्यूँ...

वीर - भैया... मैं... खुद को... जब से सुधारने में लगा हुआ हूँ... तब से... हाँ तब से... कोई ना कोई मेरी कुंडली में उंगली कर रहा है... मेरे पिछली जिंदगी को... आज से छुड़ाने की कोशिश में हूँ... अपने अंदर की... पुराने वीर से छुटकारा पाने की कोशिश में हूँ... पर कोई है... जो मेरे अंदर के पुराने वीर को ललकारना चाहता है...

विक्रम - तो इससे तुम्हारी शादी का... क्या कनेक्शन है...

वीर - मैं... उस वीर को हमेशा हमेशा के लिए दफना देना चाहता हूँ... मैं दुनिया जहान से लड़ कर जब घर को लौट कर आऊँ... अनु का मुस्कराता हुआ चेहरा देख कर... मैं दुनिया जहान को भुला देना चाहता हूँ... ना किसी पर कोई गरज... ना किसी से कोई शिकायत... मैं दुनिया से थका हारा लौट कर आऊँ... उसके पहलु में... एक नई जिंदगी.. एक नई जीत को हासिल करूँ... बस इसलिए अनु से जल्द से जल्द शादी कर लेना चाहता हूँ...

इतना कह कर वीर चुप हो जाता है और विक्रम की ओर देखने लगता है l विक्रम भी उसकी बातेँ सुन मुहँ फाड़े देखे जा रहा था l

विक्रम - (उसी हैरानी के साथ) ओ... वीर... मैं हैरान हूँ... तुम दुनिया से इतनी जल्दी हारने लगे...

वीर - तभी तो जीत की चाहत में... अनु से जल्द शादी कर लेना चाहता हूँ... (विक्रम के हाथ को पकड़ लेता है) भैया... मैंने भले ही... तुम्हारे छोटे भाई का फर्ज ना उतार पाया... पर तुमने कभी भी इस बात पर मलाल नहीं की... पर आज एक छोटे भाई का हक माँग रहा हूँ... प्लीज... हमारे घर के बड़ो से मेरे लिए बात करोगे... प्लीज...

विक्रम - (वीर के हाथ पर अपना हाथ रख देता है) चल पागल... मैंने कभी भी... अपने मन में... तुम्हारे लिए कोई गाँठ नहीं बाँधा है... अगर बड़ों से बात करनी ही है... तो बस एक हफ्ता रुक जाओ...

वीर - (चौंक कर) एक हफ्ता...

विक्रम - हाँ.. एक हफ्ता...

वीर - यह अचानक एक हफ्ता... कहीं जाना है क्या...

विक्रम - हाँ कल राजा साहब ने फोन पर बताया कि हमारा ESS अभी तक अपने स्टेट में अनबीटेबल है... उसे अब आउट ऑफ स्टेट ले जाने का मौका आया है...

वीर - हाँ तो.. कौन सा स्टेट...

विक्रम - झारखंड... और बंगाल राँची में एक मीटिंग है... उसके बाद कलकत्ता... सेक्यूरिटी सर्विस में.. हमारा स्कोप कहाँ तक हो सकता है... वगैरह वगैरह...

वीर - पर तुम क्यूँ...

विक्रम - क्या बचकाना सवाल है... अगर महांती होता... तो मैं कहाँ जाता... अब चूँकि सब कुछ मैं देख रहा हूँ... इसलिए मुझे जाना होगा... हमें कॉन्ट्रैक्ट मिल जाएगा... क्यूंकि पार्टी राजा साहब के पहचान वाले हैं...

वीर चेहरे पर टेंशन लिए अपनी जगह से उठ खड़ा हो जाता है और कुछ सोच में पड़ जाता है l विक्रम उसकी हालत देख कर हैरान होता है l

विक्रम - तुम इतने टेंश क्यूँ हो गए....

वीर - मैंने अनु से दस दिन की मोहलत मांगी थी... उसमें से सात दिन तो जाया हो जाएंगे... और बाकी तीन दिन में क्या हो जाएगा...

विक्रम - इतनी जल्दी क्या है वीर... क्यूँ... तुम जल्दबाज़ी ऐसे दिखा रहे हो... जैसे.. अनु और तुम्हारे बीच रिश्ता हद से आगे बढ़ गया हो... (थोड़ा रुक कर) क्या तुम...

वीर - (एक बेज़ान सी मुस्कराहट के साथ) देखा भैया... मेरे अंदर तुम वही पुराने वीर को ढूँढ रहे हो... (फिर थोड़ी सीरियस हो कर) जब अपने ही मेरे बारे में ऐसी राय रखते हों... तो गैरों से क्या गिला रखना...

कह कर वीर वहाँ से निकल जाता है l वीर की कही बातेँ विक्रम के जेहन पर हथोड़े की तरह बरसने लगते हैं l वह वीर को आवाज देने की हिम्मत तक नहीं कर पाता l वह भी बुझे मन से बाहर की ओर चला जाता है l यह सब किचन से दोनों भाभी और देवरानी सुन रहे थे, उनका भी चेहरा बुझ जाता है l

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उदय टहलता हुआ रोणा के क्वार्टर के सामने पहुँचता है l उसे बाहर रोणा की पर्सनल जीप दिखता है तो वह बहुत खुश हो जाता है l वह भागते हुए जीप के पास पहुँचता है और अपने बालों को ठीक कर क्वार्टर के बाहर पहुँचता है और बंद दरवाज़े को हल्के से धक्का देता है l दरवाजा खुल जाता है l उदय धीरे धीरे अंदर जाने लगता है l देखता है बाथ रुम में रोणा के चेहरा सेविंग फ़ोम से पुता हुआ है और वह अपना दाढ़ी बना रहा है l आईने में रोणा उदय को देख लेता है l

रोणा - तु अंदर कैसे आया बे...

उदय - वह साहब दरवाजा खुला था...

रोणा - हाँ हाँ मालुम है... पुछ रहा हूँ सीधे अंदर कैसे आ गया...

उदय - साब जी... आपने ही तो कहा था... मुझे अंदर आने के लिए... कभी दरवाजा खटखटाना ना पड़े...

इतना सुनते ही वह अपना रेजर रख देता है और उदय के पास चलते हुए आता है l इससे पहले उदय कुछ समझ पाता तब तक उदय के गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ चुका था l तमाचा मारने के बाद रोणा वापस जाकर अपना दाढ़ी बनाने लगता है l उदय थप्पड़ खा कर सोचने लगा उससे क्या गलती हो गई l यही सोचते सोचते वह बाहर की ओर जाने लगता है l

रोणा - अब कहाँ जा रहा है...

उदय - वह बाहर जाकर दरवाजा खटखटाने...

रोणा - अबे भोषड़ी... जब आ गया है... जो रोने आया था... वह रो कर जा यहाँ से...

उदय अपना सिर खुजाने लगता है, तब तक रोणा अपना दाढ़ी बना कर चेहरा टावल से पोंछ रहा था l जब चेहरा पोंछ कर उदय के सामने आता है, तो उदय उसे देख कर चौंक जाता है l क्यूंकि रोणा ने अपना मूँछें निकाल लिया था l उदय उसे हैरानी भरे नजर से देख रहा होता है l

रोणा - ऐसे मुहँ फाड़े क्या देख रहा है...

उदय - आज आप बहुत बदले बदले लग रहे हैं... चेहरे से भी... और... (अपने गाल पर हाथ फेरने लगता है)

रोणा - पहली बात... तुझे मैंने एक काम भी दिया था... क्या याद है तुझे...

उदय - जी है ना... मैं रोज विश्वा पर नजर गड़ाए हुए था... इतने दिनों तक वह घर के बरामदे से बाहर नहीं आ रहा था... सिर्फ काम ही काम कर रहा था... आज सुबह ही वह काम ख़तम कर बाहर दिखा...

इतना सुनते ही रोणा का चेहरा सख्त हो जाता है और उसका हाथ उठ कर चल जाता है पर ठीक उदय के गाल तक आ कर रुक जाता है और अपनी जबड़े भींचते हुए उदय के गाल को थपथपाने लगता है, फिर अचानक अपनी मुट्ठी में उदय के गाल को भींच लेता है l उदय दर्द के मारे चीखने लगता है l

रोणा - श्श्श.. श्श्श.. चिल्ला क्यूँ रहा है...

उदय - आ ह... आह...

रोणा - तेरा गाल ही तो खिंच रहा हूँ... कौनसा तेरा गांड मार रहा हूँ... हाँय...

उदय - मुझे माफ कर दीजिये... साब...

रोणा - क्यूँ... क्या ग़लती किया तुने... हाँ... बोल बोल...

उदय - नहीं जानता... आह...

रोणा - तो सुन भोषड़ी के सुन... विश्वा... गायब था... तब से... जब से मैं यहाँ नहीं था... और आज सुबह ही तेरी अम्मा चोद कर आया है... मादरचोद... इसपर तु कांस्टेबल बनेगा... ह्म्म्म्म... कांस्टेबल...

उदय - आह... आ आ ह... माँ कसम साब जी... मैंने उसे दुर से ही देखा था... कैसे पता करता के वह विश्वा नहीं है... आप ही ने तो दूरी बना कर नजर रखने के लिए कहा था...

रोणा उसके गाल को छोड़ देता है l उदय अपने गाल को सहलाने लगता है l दर्द इतना था कि उसके आँखे नम हो गईं थीं l इतने में उसके दरवाजे पर दस्तक होता है l

रोणा - कौन है...

भीमा - (अंदर आते हुए) भीमा...

रोणा - ओ... कहो भीमा... सुबह सुबह... कैसे...

भीमा - (उदय पर नजर डालते हुए) दरोगा बाबु पिछले दो दिनों से राजा साहब आपको याद कर रहे हैं... इसलिए मैं यहाँ दो बार आकर लौट चुका हूँ... पर यह क्या... आपने अपनी मूंछें क्यूँ मुंडवा ली...

रोणा - (जबड़े भींच कर) वह क्या है कि भीमा... जब से सस्पेंड हो कर राजगड़ से बाहर आया... तबसे कोई मर्द वाला काम किया नहीं ना... ऊपर से जब से आया हूँ... रंग महल भी सुना और विरान है... इसलिए... अब तो मूंछें तब रखूँगा... जब कोई मर्द वाला काम कर लूँ...

भीमा - ओ... लगता है समस्या विकट है...

रोणा - वह मेरी समस्या है... तुम बोलो.. अभी क्या करना है...

भीमा - पता नहीं क्यूँ... दो दिन पहले.. सरपंच से मिलने के बाद.. राजा साहब आपको खोज रहे हैं... उपर से मैंने कई बार फोन लगाया आपको... पर आपने उठाया ही नहीं...

रोणा - हाँ... वह काम में... बहुत व्यस्त था... इतना की अपना ही होश नहीं था... चलो चलें... देखें राजा साहब को मेरी क्या जरूरत आ पड़ रहा है...

तीनों बाहर आते हैं भीमा और रोणा भीमा के लाए गाड़ी में बैठ कर चले जाते हैं l पीछे उदय वैसे ही अपने गाल सहलाते रह जाता है और मन ही मन बड़बड़ाने लगता है l

" साला कुत्ता कहीं का... लगता है विश्वा ने ही इसकी जमकर ली है... तभी साला दर्द छुपाने के लिए मूँछ कटवा कर फिर रहा है... कुत्ता कहीं का... जब तेरे जैसे ढीठ को विश्वा चकमा दे सकता है... भुर्ता बना सकता है... मैं विश्वा के आगे क्या हूँ बे.. अंडे से निकला हुआ चूजा... रुक साले रुक... एक दिन मैंने तेरी ना ली... तो मैं भी उदय नहीं... "

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दरवाज़ा खोलते ही सामने वीर को देख कर दादी चौंक जाती है l

दादी - अरे दामाद जी आप... इस वक़्त... अनु तो अभी ऑफिस के लिए निकलने वाली थी...

वीर - क्या मैं अंदर आ सकता हूँ...

दादी - ओ हो... मैं भी क्या बेवकूफ़ी कर रही हूँ... दामाद जी द्वार पर खड़े हैं... मैं द्वार पर ही खड़ा कर बात कर रही हूँ... आइए... अंदर आइए...

दादी दरवाजे से हटती है l वीर अंदर आकर एक चेयर पर बैठ जाता है l अनु भागते हुए हाथ में एक कॉफी की ग्लास लेकर वीर को देती है l पहले वीर हैरान हो कर अनु की ओर देखता है फिर मुस्कराते हुए कॉफी अनु के हाथ से लेकर चुस्की भरता है l

दादी - बड़ी खयाल रहती है तुझे राजकुमार की... कोई दुसरा आए तो ध्यान कभी नहीं देती...

अनु शर्मा कर वहाँ से अंदर की ओर भाग जाती है l वीर के होंठो पर मुस्कुराहट और भी गहरा जाता है l

दादी - दामाद जी... क्या आपका यहाँ आना पहले से तय था...

वीर - नहीं तो... क्यूँ क्या हुआ...

दादी - सच कह रही हूँ दामाद जी... रानी साहिबा आईं थीं... इस कमबख्त की हाथ माँगने... तब इसे मेहमान नवाजी समझाना पड़ा... पर आपकी बात और है... देखिए ना... आप को आए कितनी देर हुए... आपके लिए कॉफी तैयार कर दी उसने...

वीर - दादी... मेरा यहाँ आने का वज़ह भी यही है...

दादी - क्या मतलब...

वीर - मुझे अनु की आदत.. या यूँ कहूँ के... मुझे अनु की लत लग चुकी है... मेरा खयाल करने वाली... खयाल रखने वाली... अब सिर्फ ऑफिस में नहीं... बल्कि मुझे मेरे घर के आँगन में चाहिये...

दादी - ओ... (खुश हो कर) मतलब आप शादी की बात करने आए हैं...

वीर - हाँ... शादी की बात करने आया हूँ... आज सुबह ही अपने बड़े भैया... भाभी और छोटी बहन को बताया... माँ तो कब से तैयार बैठी है... इससे पहले कि मैं अपने घर के बुजुर्ग और मुख्य को अपना अभिप्राय बताऊँ... मैं आपसे शादी की इजाजत लेने आया हूँ...

दादी - दामाद जी... जब मैंने रानी साहिबा को पहले से ही बता चुकी हूँ... अनु आपकी है... जब आपको ठीक लगे... तब आप उसे मर्यादा के साथ डॉली में ले जाएं...

वीर - (अपनी जगह से उठ कर दादी की हाथ पकड़ लेता है) थैंक्यू दादी थैंक्यू... मतलब.. आपको कोई एतराज नहीं है ना...

दादी - मुझे क्यूँ कोई एतराज होने लगी... पर आपकी उतावलापन देख कर लगता है... जैसे शादी आपको कल ही करनी है..

वीर - कास के ऐसा हो पाता... वह क्या है कि... मेरे बड़े भाई यानी युवराज जी... मेरे पिताजी... यानी... छोटे राजा जी और हमारे क्षेत्रपाल परिवार के मुखिया... मिलकर किसी काम से बाहर हफ्ते दस दिन के लिए जा रहे हैं... जब वे लौटेंगे.. तब मैं उन लोगों से शादी की इजाजत ले लूँगा...

दादी - तो ठीक है...

वीर - पर...

दादी - पर क्या दामाद जी...

वीर - दादी.. मैं चाहता हूँ... अनु यह दस दिन घर पर रहे... मेरा मतलब है... वह ड्यूटी पर ना आकर... घर पर आराम करे...(अपनी जेब से एक क्रेडिट कार्ड निकाल कर दादी को देते हुए) और शादी की तैयारी वह अपनी तरफ से करे...

अनु - (कमरे से बाहर आकर दरवाजे के पास खड़ी हो जाती है) नहीं... ऐसा नहीं हो सकता...

दादी - ठीक ही कह रहे हैं दामाद जी... शादी के पहले मिलने जुलने का रिवाज नहीं होता...

अनु - वह मैं कुछ नहीं जानती... मुझसे रानी माँ ने वादा लिया था... चाहे कुछ भी हो जाए... शादी से पहले... कभी ऑफिस जाना बंद ना करूँ... वैसे भी कौनसा शादी का दिन तय हो गया है....

दादी - दामाद जी मैं रसोई में जाकर थोड़ा देखती हूँ... आप अपनी अनु को समझाने की कोशिश कीजिए... (कह कर दादी वहाँ से चली जाती है)

वीर - अनु... तुम समझ क्यूँ नहीं रही हो...

अनु - प्लीज... कुछ दिनों से हालात जैसे हो रहे हैं... मैं घर पर रहूँगी तो हमेशा चिंता में रहूँगी... आप सामने रहोगे... तो मुझे चिंता नहीं रहेगी... प्लीज...

वीर - देखो अनु... भैया के बाहर जाने से... पूरा काम का बोझ मुझ पर पड़ेगा... आने जाने से लेकर खाने पीने तक का कोई ठिकाना ना रहेगा...

अनु - (धीरे से) झूठे

वीर - सुनाई नहीं दिया... पर समझ गया... तुम मुझे झूठा कह रही हो... किसलिए

अनु - इसीलिए की आप झूठ कह रहे हैं...

वीर - नहीं अनु... सिर्फ ऑफिस ही नहीं... पार्टी का काम देखने इधर उधर जाना पड़ सकता है...

अनु - तभी तो... मैं... आपके साथ रहना चाहती हूँ.. कम से कम ऑफिस के वक़्त...

अनु के इसतरह से अनुरोध करने पर वीर अपना हथियार डालते हुए अनु से कहता है

वीर - ठीक है... अगर तुम्हारी यही इच्छा है तो.... पर मेरी भी एक शर्त है...

अनु - जी कहिए...

वीर - तुम्हें रोज मेरी गाड़ी से ऑफिस आना जाना करोगी... वह भी सिर्फ ऑफिस के वक़्त...

अनु - (खुशी के साथ शर्माते हुए) मतलब आप रोज मुझे ले जाने एयर छोड़ने आयेंगे..

वीर - नहीं...

अनु - (थोड़ी मायूस हो कर) तो..

वीर - सिर्फ आज ही... मैं तुम्हें ले जाऊँगा... पर कल से... मैं ड्राइवर का इंतजाम कर दूँगा... मेरी अपनी गाड़ी से वह तुम्हें रोज घर से ले जाएगा... ऑफिस आवर ख़तम होते ही वह छोड़ देगा... मैं इसी शर्त पर ही तुम्हें ऑफिस में आलाउ कर सकता हूँ...

अनु - (मायूसी के साथ, मुहँ फूला कर) ठीक... है...

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एक रोती हुई स्कुल जाती किशोरी लड़की की हाथ पकड़ कर वैदेही लक्ष्मी के घर पहुँचती है l घर में लक्ष्मी और हरिया के बीच किसी बात को लेकर कहा सुनी हो रही थी l जैसे ही वैदेही वहाँ पहुँची दोनों के दोनों चुप हो गए l

वैदेही - क्या बात है लक्ष्मी.. किस बात को लेकर तुम दोनों झगड़ रहे थे...

लक्ष्मी और हरिया दोनों एक दूसरे को देखते हैं फिर लक्ष्मी अपना सिर झुका लेती है l पर हरिया गुस्से भरे नज़र से वैदेही के साथ आई उस लड़की की ओर देखने लगता है l वह लड़की हरिया की नजर से बचने के लिए वैदेही के पीछे छुपने लगती है l

वैदेही - ऐ हरिया.. खबर दार जो मुन्नी पर गुस्सा किया या इसके साथ मार पीट की... मुझसे बुरा कोई ना होगा...

हरिया - तु क्यूँ हमेशा गाँव के हर घर के फटे में घुसने की ताक में रहती है...

वैदेही - तुम दारूबाज लंपटों से मैं बात तक करना पसंद नहीं करती.. पर इस गाँव के आँगन में पल रहे.. जी रहे हर इज़्ज़त को अपनी इज़्ज़त समझती हूँ... जब जब उन पर कोई आंच भी आई तो मैं उनके लिए उतरुंगी... आती रहूंगी...

हरिया - तेरी इज़्ज़त है ही क्या... जो मेरे घर की इज़्ज़त के लिए... आती रहेगी...

वैदेही - मेरी इज़्ज़त पर उंगली तब उठाना... जब तु खुद को मर्द कहलाने के लायक समझेगा.. तेरी मर्दानगी रोज शनिया और उसके कुत्तों के आगे... शराब की भट्टी में... एड़ी पर रेंगती रहती है... इसलिए तो... वह और उसके चट्टे बट्टे मौका ढूंढते रहते हैं... तेरे घर की इज़्ज़त और अमानत को तार तार करने के लिए...

हरिया - हूंह्ह्... तुझसे बात कर रहा हूँ देखो... मेरी ही गलती है...

इतना कह कर हरिया वहाँ से चला जाता है l उसके जाने के बाद लक्ष्मी सुबकते हुए बैठ जाती है l

वैदेही - लक्ष्मी... हरिया मुझसे कहेगा कुछ नहीं... पर तु बता... क्या हुआ है... और मुन्नी को तुने क्यूँ गाली दी... मारा भी...

लक्ष्मी - क्या कहूँ दीदी... आज सुबह शनिया सरपंच को लेकर आया था.. इन्होंने पता नहीं कितना कर्ज लिया है शनिया से... अब सब मिला कर पाँच लाख रुपये हो गए हैं...

वैदेही - (चौंकते हुए) क्या पाँच लाख रुपये...

लक्ष्मी - हाँ दीदी... हमने ठीक से कभी हजार रुपये भी नहीं देखें... पाँच लाख रुपये...

वैदेही - ऐसे कैसे पाँच लाख रुपये... शनिया ने कह दिया... और हरिया ने मान लिया...

लक्ष्मी - माने तो नहीं... मान ही नहीं पाए... पर..

वैदेही - पर क्या...

लक्ष्मी - पर हरिया के पास लिखा पढ़ी के कागजात थे... इन्होंने जितना दारु पीया था... सब सूद के साथ मिला कर... अब पाँच लाख रुपये हो गए हैं...

वैदेही - क्या... दारू पी पी कर पाँच लाख रुपये...

लक्ष्मी - सिर्फ इन्हीं के नहीं है दीदी... बल्लु.. सुकांत... नरेश... सब के सब... किसी के पाँच... किसी के सात...

वैदेही - यह लोग तो पैसे दे देते थे ना...

लक्ष्मी - हाँ फिर भी... कई सालों से पी पी कर इतना हो गया है....

वैदेही - ठीक है... बात मेरी समझ में आ गई... पर इसमें मुन्नी को क्यूँ कोस रही थी... हाथ भी उठाया तुमने आज इस पर... बड़ी हो रही है वह...

लक्ष्मी - मारु नहीं तो क्या करूँ... कर्मजली लड़की हो कर पैदा जो हुई है...

वैदेही - तो... लड़की हो कर पैदा हुई... तो इससे क्या पाप हो गया... अब तो राजा नहीं उठा जा रहा है...

लक्ष्मी - पर उसके पालतू भेड़िये तो ताक में हैं... जो मौका ढूंढ रहे हैं...

वैदेही - एक मिनट... कहीं इस पाँच लाख के बदले...

लक्ष्मी - हाँ दीदी हाँ... कर्ज को जल्दी चुकता करने के लिए... लड़की को घर बुला रहे हैं... और इस पर सरपंच भी उनका साथ दे रहा है...

वैदेही अपने दोनों हाथों से कान को ढकते हुए अपनी आँखे मिंज कर पास पड़े एक टुटे फूटे कुर्सी पर बैठ जाती है l थोड़ी देर बाद

वैदेही - सरपंच ऐसे कैसे उनका साथ दे सकता है... उन हरामीयों की बात को मनवाने के लिए... उनके साथ घर घर जा रहा है...

लक्ष्मी - वही तो... दीदी... यह सब जो कर्ज के जाल में उलझे हुए हैं... दो दिन बाद इस विषय में... पंचायत में निर्णय होने वाला है... सारे गाँव वालों के बीच...

वैदेही - ओ... अब समझी... गाँव वालों के सामने... इन कर्जदारों पर निर्णय नहीं होने वाला है... बल्कि हर घर की इज़्ज़त में सेंध लगाने की जुगत लगा रहे हैं...

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कुछ लोग तहसील ऑफिस से बाहर निकल कर रोड के उस पार मिलन टी स्टॉल पर जाते हैं l पर वहाँ पहुँचते ही देखते हैं मिलन अपना दुकान बंद कर रहा था l यह देख कर एक आदमी पूछता है

आदमी - क्या बात है मिलन... धंधे के टाइम पर दुकान क्यूँ बंद कर रहा है...

मिलन - आज थोड़ी गड़बड़ हो गई है...

दुसरा आदमी - गड़बड़... कैसी गड़बड़...

मिलन - सुबह सामान ठीक से चेक किया नहीं... इसलिए जितनी जरूरत थी... उससे कम सामान लाया था... और इत्तेफ़ाक से सुबह से ही भीड़ बहुत थी... जितना लाया था सब ख़तम हो गया...

आदमी - तो यहीँ कहीँ आसपास से मंगवा ले ना...

मिलन - सर जी... यहाँ सब दुध वाला चाय पीते हैं... और अभी दुध का पैकेट मिलने से रहा... पाउडर वाला चाय एक बार कोशिश की थी... बहुत गाली पड़े थे... उम्मीद है... आप समझ रहे हैं...

सारे लोग - ठीक है... आज तो तुझे माफ़ कर रहे हैं... पर कल से... शाम होने से पहले दुकान बंद किया तो... यहाँ से दुकान उखाड़ देंगे समझा...

मिलन - जी माई बाप...

वह लोग वापस जाने के बजाय वहीँ पड़े बेंच पर बैठ कर बातेँ करने लगते हैं l मिलन कुछ ही मिनट में अपना सारा सामान पैक कर चुका था l तभी एक ऑटो वहाँ पर आती है l मिलन उसे आवाज देता है l ऑटो रुक जाती है l उस ऑटो में पहले से ही दो सवार थे l मिलन अपना सामान पीछे लोड कर अंदर बैठ जाता है l ऑटो आगे बढ़ जाता है l थोड़ी देर बाद ऑटो यशपुर से निकल जाता है l यशपुर के बाहर एक सुनसान जगह पर ऑटो खराब हो जाता है l ऑटो ड्राइवर उतर जाता है और चारो तरफ नजर घुमाता है, वह ऑटो ड्राइवर और कोई नहीं था, वह शैलेंद्र उर्फ सीलु था l ऑटो में दो और लोग विश्व और जिलु थे l

सीलु - (विश्व से) भाई तुम ऑटो के अंदर ही बैठे रहो... (जिलु और मिलु से) तुम दोनों उतरो बे... ऑटो ठीक करने का सीन बनाना है...

जिलु और मिलु उतर कर ऑटो को एक तरफ उठा कर उसके नीचे एक डंडा लगा देते हैं l सीलु फटाफट स्टेफिनी निकाल कर टायर निकालने का ऐक्टिंग करने लगता है l

सीलु - भाई... इससे पहले के तुम कुछ पूछो.. मैं कुछ पूछूं...

विश्व - हाँ... पूछ लो...

सीलु - तुम्हारा बार काउंसिल वाला लाइसेंस कब आएगा...

विश्व - शायद दो या तीन दिन बाद... या फिर ज्यादा से ज्यादा एक हफ्ता...

जिलु - और जो तुमने आरटीआई में इंफॉर्मेशन माँगा था... उसका क्या हुआ...

विश्व - वह भी एक दो दिन में आ जायेगा.... क्यूँ तुम लोग इतने बेकरार क्यूँ हो...

सीलु - बुरा ना मानना भाई... पर मुझे नहीं लगता... पीआईएल दाखिल करने से... तुम्हें कोई फायदा होगा...

विश्व - ह्म्म्म्म... मतलब तुम लोगों ने बहुत कुछ छानबीन कर लिया है...

मिलु - हाँ लगभग...

विश्व - ह्म्म्म्म ठीक है... अब तुम लोग... मुझे बात को पुरी तरह से समझाओ...

सीलु - भाई... तुमने आरटीआई जैसे ही फाइल किया... इन्हीं पैंतीस चालीस दिनों में... जो भी कुछ हुआ है.. तुम्हारे उस रुप फाउंडेशन केस में कुछ भी मदत नहीं मिलने वाला है...

मिलु - पहली बात... तुम्हारे साथ जो भी... एक्वुस्ड थे... वह सारे के सारे मार दिए गए... ज्यादातर गवाह भी गायब कर दिए गए....

जिलु - और जिन लोगों को तुम गवाह बना सकते थे... मतलब... बैंक के तीन स्टाफ... रेवेन्यू ऑफिस के दो स्टाफ और तहसील ऑफिस के तीन पदाधिकारी... अपनी अपनी मेडिकल सर्टिफ़िकेट निकलवा कर... OSD... बन बैठे हैं...

मिलु - यह OSD मतलब...

विश्व - ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्युटी... वह कर्मचारी... जिन्हें नौकरी से निकालने के बजाय... उन्हें बिना किसी काम धाम के... मानवता के आधार पर नौकरी पर बनाए रखा जाता है....

जिलु - हाँ...

विश्व - और जाहिर सी बात है कि... वे सब... सिजोफेर्नीया की सर्टिफिकेट लाए होंगे...

सीलु - हाँ... बिल्कुल...

विश्व - मतलब... अब वह सारे लोग गवाह के तौर पर नाकारे हो चुके हैं...

तीनों अपना सिर हाँ में हिला कर चुप हो जाते हैं l विश्व अपनी आँखे बंद कर कुछ सोचते हुए हँसने लगता है l

सील - भाई... दुखी मत हो...

विश्व - मैं दुखी कहाँ हूँ... मैं तो हँस रहा हूँ...

मिलु - पर क्यों... क्या अब भी... तुम हाइकोर्ट में पीआईएल दाखिल करोगे...

विश्व - हाँ...

तीनों - (हैरान हो कर) क्या...

जिलु - पर उससे फायदा क्या होगा...

विश्व - देखो... मैंने जब आरटीआई दाख़िल किया था... मुझे तभी से ही अंदेशा था... ऐसा ही कुछ होगा... इस केस के ताल्लुक़ और तीन प्रमुख गवाह हैं... सी आई... अनिकेत रोणा... श्रीधर परीडा... और राजा भैरव सिंह...

सीलु - पर भाई तुम्हीं कहा करते थे... रोणा का इसमे उतना रोल नहीं है... जितना एसआईटी का चीफ श्रीधर परीडा का है...

विश्व - हाँ पर उन तीनों को गवाही के लिए कोर्ट लाना टेढ़ी खीर है...

मीलु - क्यूँ...

विश्व - केस फिर से खुलेगा... इस बीच सात साल गुजर चुके हैं... बहुत कुछ बदल चुका है... या बदल दिया गया है... इसलिए पहले मुझे पीआईएल फाइल तो करने दो... देखते हैं... क्या होता है...

जिलु - भाई... तुम बात को बहुत ही कैजुअल ले रहे हो...

विश्व - नहीं... गेम तो अभी शुरु होगा... जैसे ही मैंने आरटीआई फाइल की... उन्होंने गलतियाँ करनी शुरु कर दी... जब कि सच कहूँ तो मैं भी जानता हूँ... यह सात साल के पुराने केस में संभावना बहुत कम है...

तीनों - तो...

विश्व - देखो... करप्शन एक चस्का है... जो भी उसकी मलाई एक बार खाये... जब तक कोई खतरा ना हो... वह करता ही जाता है... मैं दावे के साथ कह सकता हूँ... उन्होंने करप्शन करना छोड़ा नहीं होगा... बल्कि नए तरीके से... मजे से कर रहे होंगे...

जिलु - तो उस पुराने केस का क्या होगा...

विश्व - पीआईएल तो फाइल होगा... वह लोग अपने ना पकड़े जाने पर और अब तक किए करतूत पर निश्चिंत होंगे... पर फिर भी उनका ध्यान पुराने केस पर जमायेंगे... पर हम असल में उनके नए करप्शन को खोज निकाल कर उसे पुराने केस में जोड़ेंगे... तब जाकर कुछ ना कुछ रिजल्ट हम को मिलेगा...

सीलु - हाँ भाई... तुम्हारे इस बात पर... मैं सौ फीसद सहमत हूँ... अभी इन पाँच छह महीनों में... सारे प्रमुख सरकारी कार्यालय में... पदाधिकारी बदले हैं... सब नए हैं... तो तुम्हारे कहे हिसाब से... करप्शन हो रहा है... हम जान भी रहे हैं... पर शायद नए तरीके से...

विश्व - ठीक है... तो अब बताओ... इन छह महीनों में क्या क्या हुआ है...

सीलु - भाई... इन छह महीनों में... यशपुर को स्मार्ट सिटी... और राजगड़ को स्मार्ट विलेज बनाने की अप्रूवल मिल गया है... पाँच साल पहले... राजगड़ से बाहर... निरोग हस्पताल बनाया जा रहा था... बहुत ही बड़ा हस्पताल... पर यश वर्धन की मौत के बाद... वह हस्पताल की बिल्डिंग विरान पड़ी थी... छह महीने पहले... उसे... राजगड़ मल्टी पर्पस कोऑपरेटिव ऑफिस में कन्वर्ट किया गया है...

मिलु - इन्हीं पाँच छह महीनों में... यशपुर और राजगड़ विकास के लिए... बहुत से प्रोजेक्ट अप्रूव्ड हुए हैं... वह भी... मनरेगा के तहत... पर...

विश्व - पर...

मिलु - इस बार... कोई मुर्दा नहीं है... पता नहीं पैसे कैसे गायब हो रहे हैं...

विश्व - ह्म्म्म्म... लगता है... इस बाबत हमें कोई लिंक मिलने वाला है...

तीनों - कैसे... कौन देगा...

विश्व - वही... जो मुझसे... पेपर से... कॉन्टेक्ट करना चाहता है... मुझे लगता है... इसी करप्शन पर वह कोई रौशनी डाल सकता है...

जिलु - पर टीलु कह रहा था... वह कुछ दिनों से कॉन्टेक्ट नहीं कर रहा है...

विश्व - हाँ... कर तो नहीं रहा है... अच्छा मैं यहाँ से उतर कर पैदल ही चला जाता हूँ... तुम लोग आधे घंटे बाद... अपने अपने ठिकाने पर पहुँच जाओ...

जिलु - रुको ना भाई... छोड़ देते हैं तुम्हें...

विश्व - नहीं... मैं नहीं चाहता कोई भी हमें... इकट्ठा देखे...

इतना कह कर विश्व ऑटो से उतर कर चल देता है l चलते चलते इनके कही बातों को याद करने लगता है l उसे अंदाजा था, भैरव सिंह अपनी नाक बचाने के लिए बहुत कुछ करेगा l पर जिन अधिकारियों को गवाही के लिए बुलाया जा सकता था, उन्होंने ही अपने तरफ से पागलपन का सर्टिफिकेट लेकर अपनी जान और आने वाले कानूनी पचड़े से खुद को बचा लिया l असल में भैरव सिंह के बाद सिर्फ एक ही गवाह बचता हैं l श्रीधर परीडा एसआईटी का चीफ जिसे शायद तोड़ा जा सकता है l पर कहीं भैरव सिंह इससे पहले श्रीधर परीडा को कुछ ना कर दे l और इन छह महीनों में जो भी कुछ हुआ है पुराने कडियों को जोड़ने के लिए बहुत अहम है l पर जोड़े तो जोड़े कैसे l भैरव सिंह अपने पुराने गलतियों से सबक लेकर अब जो भी कर रहा होगा फुल प्रूफ ही होगा l

ऐसे सोच सोच कर विश्व उसी पेपर वाले के दुकान पर आ पहुँचता है जहां से वह रोज उसके लिए टीलु पेपर लेकर जाता है l उसके कदम अपने आप दुकान के अंदर पहुँच जाते हैं l

दुकानदार - बोलिए साहब.. क्या चाहिए...

विश्व - (समझ नहीं पाता क्या कहे)

दुकानदार - सर यहाँ हर तरह के अखबार... किताबें मिलती हैं... बोलिए आपको कौनसा चाहिए...

विश्व - मैं... वह... असल में... मैं थोड़ा कंफ्यूज हूँ...

दुकानदार - जब मन भटके... कोई राह ना दिखे तो... यह किताब पढ़ना चाहिए... (दुकानदार एक किताब निकाल कर दिखाता है जिसके कवर पर लिखा था "शुभ संदेश")

विश्व - नहीं... मैं...

दुकानदार - अरे सहाब ले लीजिए... यह आपके लिए ही है... घर जाकर पढ़ लीजिए... अगर आपको पसंद ना आए.. तो कल लाकर लौटा दीजिएगा...

विश्व - नहीं... मैं ऐसे कैसे...

दुकानदार - अरे सहाब... मैंने कहा ना... यह किताब आपके लिए ही है... मेरी मानिये... जरा एकबार घर जाकर पढ़ लीजिए... पैसा तभी दीजिएगा जब अंदर का विषय पसंद आए... अगर पसंद ना आए... तो लाकर वापस लौटा दीजिए...

विश्व हिचकिचाते हुए किताब लेता है l तभी उसका फोन बजने लगता है l फोन निकाल कर देखता है l स्क्रीन पर दीदी डिस्प्ले हो रहा था l

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रंगमहल से अपने सरकारी क्वार्टर पर रोणा लौट आता है l सिगरेट की धुआं उड़ाते हुए अपने क्वार्टर के अंदर दाखिल होता है l ड्रॉइंग रूम में सोफ़े के पास पड़े टी पोय पर क्लाथ को हटाता है l उस टी पोय के बोर्ड पर विश्व का बड़ा सा मगर एक पुरानी फोटो लगी हुई थी l उस फोटो को देखते ही उसकी आँखों के नीचे की पेशियों में थर्राहट होने लगती हैं l वह आज महल में हुए व्याक्या को याद करने लगता है l

आओ रोणा आओ... पहले गायब होते थे... तो पता रहता था... तुम कहाँ पर हो... पर इस बार तुम ऐसे छुपे जैसे अमावस में चाँद... क्या बात है... (यह सवाल था भैरव सिंह का रोणा से)

रोणा भीमा के साथ रंगमहल के उपरी प्रकोष्ठ में आया था l यह भैरव सिंह का खास कमरा था जहां वह लोगों को बुला कर बैठक किया करता था l भैरव सिंह एक बड़े से सिंहासन नुमा कुर्सी पर बैठे रोणा का इस तरह से अभिवादन किया l रोणा के भीतर आते ही भैरव सिंह अपना हाथ उठा कर भीमा को इशारे से जाने को कहता है, भीमा अपना सिर झुका कर उल्टे पाँव लौट जाता है l भीमा के वहाँ से जाते ही

रोणा - ऐसा कुछ नहीं है राजा साहब... मैं भुवनेश्वर आपको बता कर ही गया था...

भैरव सिंह - हाँ... गए तो थे... (अचानक हैरान हो जाता है) एक मिनट... हम यह क्या देख रहे हैं... (लहजा सपाट व निरस हो जाता है) जो क्षेत्रपाल से जुड़े हों... वह लोग अपने मूंछें नहीं मुंडवाते... जानते हो ना...

रोणा - जी राजा साहब... पर इन दो महीनों में... मेरे साथ कुछ ऐसा हुआ है... जो मुझे मूंछें रखने लायक छोड़ा नहीं है...

भैरव सिंह - (अपनी भवें सिकुड़ कर रोणा की ओर देखता है) ह्म्म्म्म... चोट बहुत गहरी लगी है... दिल पर भी और दिमाग पर भी... देने वाला कौन है...

रोणा - (जबड़े सख्त हो जाते हैं, आँखों में खुन उतर आती है) व... वि... विश्वा..

भैरव सिंह - विश्वा... क्या किया उसने इसबार तुम्हारे साथ....

रोणा - (अपनी दांतों को पिसते हुए) पहली बार... उसने साबित कर दिया... मैं कितना लाचार हूँ... मैं कितना मजबूर हूँ... उसने मुझे एहसास दिलाया... के मैं एक बेचारा हूँ...

भैरव सिंह - पर तुम इसबार एक लड़की के पीछे गए थे ना.... क्या उस लड़की का... कोई संबंध है विश्वा से... जैसा कि तुम अनुमान लगा रहे थे...

रोणा - (कुछ सेकेंड के लिए चुप रहता है, फिर अपना सिर ना में हिलाते हुए) नहीं... नहीं राजा साहब... नहीं...

भैरव सिंह - पर तुमने जो अनुमान लगाया था...

रोणा - हाँ... कुछ अनुमान सही साबित हुए और कुछ गलत... प्रधान बाबु सही कह रहे थे... विश्वा जैसे सजायाफ्ता मुजरिम से... जो जैल से छूटे कुछ ही दिन हुए हों.. उससे कैसे कोई इज़्ज़त दार घर की लड़की दिल लगा सकती है... वह मेरा वहम था... जो इस बार दूर हो गया...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... इसका मतलब उस लड़की से... अब बदला नहीं लोगे...

रोणा - जी बेशक लूँगा... (अपने गाल पर हाथ फेरते हुए) अपने अपमान का बदला कैसे ना लूँ... उसे अपने नीचे लाए वगैर.. मेरी तड़प कम नहीं होगी...

भैरव सिंह - हम्म्म बहुत अच्छे... (एक कुटील मुस्कान लेकर) तो अनिकेत रोणा तुमने उस लड़की को... इस रंग महल के लिए कभी नहीं सोचा... हूँ..

रोणा - (कुछ सेकेंड के लिए स्तब्ध हो जाता है, फिर लड़खड़ाती हुई आवाज में ) सो.. सोचा... था... पर... राजा साहब... वह इतनी खूबसूरत है नहीं कि... इस रंग महल की रंगत बन सके... (नजरें झुका लेता है)

भैरव सिंह का चेहरा थोड़ा सख्त हो जाता है l वह तेज नजरों से रोणा को घूर रहा था l रोणा उसके नजरों का सामना नहीं कर पा रहा था l

रोणा - राजा साहब.. मैं आपका नमक हलाल हूँ... आप हुकुम करेंगे तो... मैं उसे इस रंग महल की रंगत बनाने के लिए... जरूर कुछ करूँगा...

भैरव सिंह - अच्छा... बड़ी जल्दी तैयार हो गए...

रोणा - वह... बात दरअसल यह है कि... उस लड़की से... मैं अपनी निजी खुन्नस निकालना चाहता था...

भैरव सिंह - (हँसने लगता है) हा हा हा हा हा... हम तो तुम्हें जांच रहे थे... बस तुम्हारी वफादारी देख रहे थे... तुम्हारे अंदर की जुनून को परख रहे थे... क्यूंकि तुम्हें बिना मूँछ के देख कर... हमें लगा तुम्हारी काबिलियत पर कहीं सीलन ना पड़ गया हो... जंक तो नहीं लग गया...

रोणा - तो बोलिए... क्या हुकुम है राजा साहब... अगर आप कहेंगे तो लड़की को उठवाकर इस रंग महल में आपके सेवा में पेश कर दूँगा...

भैरव सिंह - सबास... रोणा उस लड़की का विश्वा से जब कोई संबंध नहीं है... तो उस लड़की पर हमारा इरादा खत्म हो गया... क्यूंकि भैरव सिंह उन कलियों और फूलों को मसलता... रौंदता है... जिनकी कांटे भैरव सिंह को चुभते हैं... हम रंग महल में उसे अपने नीचे लाते हैं... जिसपर अपना नफरत उतारना हो... खैर यह बताओ... विश्वा ने तुम्हारे साथ ऐसा क्या किया... जो तुमने अपना मूंछें निकलवा दी...

यह सवाल रोणा को अंदर से छटपटा देता है l उसके जबड़े भींच जाते हैं आँखों के नीचे की मांस पेशियां फड़फड़ाने लगती हैं l आँखे नम हो कर तैरने लगती है l

रोणा - (दुख और पीड़ा से आवाज जैसे जम गया हो) राजा साहब... कुछ ऐसा किया है... जो मेरे मर्द होने की अहम को कुचल कर रख दिया है...

भैरव सिंह - ठीक है... हम समझ गए... कुछ ऐसा हुआ है... जो तुम बता नहीं सकते... और यह भी समझ गए... वह तुम पर इस कदर खुन्नस खाए हुआ है... के तुम्हारे पीछे पीछे भुवनेश्वर पहुँचकर... तुम्हारी बजा कर वापस आ गया है...

रोणा - (अपने हुए अपमान को याद कर आँखे बंद कर लेता है) राजा साहब... आपने मुझे बुलाया है... कोई हुकुम...

भैरव सिंह - हाँ रोणा हाँ... हम आज शाम को... भुवनेश्वर जा रहे हैं... छोटे राजा... युवराज और प्रधान के साथ हफ्ते दस दिन के लिए... कलकत्ता और राँची जा कर कुछ बिजनैस डील फाइनल करने हैं... तो यह कुछ दिन... राजगड़ पुरी तरह से तुम्हारे हवाले किए जा रहे हैं...

रोणा - (हैरानी से भैरव सिंह की ओर देखते हुए) मैं समझा नहीं

भैरव सिंह - अभी समझ जाओगे...

भैरव सिंह एक बेल बजाता है l कुछ देर बाद उस कमरे में भीमा के साथ सरपंच, शनिया, सत्तू आते हैं l

भैरव सिंह - रोणा कल से लेकर हमारे वापस आने तक... तुम मौका बनाओ... उस कमज़र्फ विश्वा से... तुम्हें कैसे बदला लेना है...

रोणा - मैं अभी भी समझा नहीं...

भैरव सिंह - (अपनी कुर्सी से उठ खड़ा होता है) कुछ दिन हुए हम कुछ अफवाह सुन रहे थे... इस बाबत हमने इस शनिया से बात की... तो उसने हमें जो बताया... हमें वह सब नागवार गुज़रा... शनिया ने कहा कि... रात के अंधेरे में... यह लोग तैयार नहीं थे... पर विश्वा अपनी पुरी तैयारी में था... इसलिए वह कांड हो गया... जो कभी होना नहीं चाहिए था... पर दोबारा विश्वा के पास ऐसा मौका नहीं आना चाहिए...

रोणा - तो इसमें सरपंच की क्या भूमिका है..

सरपंच - है दरोगा बाबु है... पंचायत ऑफिस में... हमने दो साल पहले एक चिट फंड शुरु किया था...

रोणा - चिट फंड...

शनिया - जी दरोगा जी... और जो लोग हमसे कुछ भी लेते थे... उसके एवज में... हम सब उसे चिट फंड में जोड़ कर दिखा देते थे... और उसके बदले उनसे... खाली कागजात पर अँगूठा या दस्तखत रख लेते थे...

रोणा - ओ...

सरपंच - हाँ... दरोगा बाबु... आज हम घर घर जा कर सबको कल की पंचायत के लिए नोटिस थमा दिया है... सबका फैसला हम पंचायत में करेंगे... या तो पैसा.. या फिर... हमारे घर पर उनका कोई काम करने आएगा... और तब तक काम करेगा... जब तक उनका कर्ज उतर ना जाए...

रोणा - तो इसमें विश्वा कहाँ आ गया... वह गाँव वालों के.. किसी के भी फटे में घुसेगा नहीं...

शनिया - वह नहीं घुसेगा... पर उसकी दीदी... वह तो घुसेगी.. और जब उसकी दीदी घुसेगी.. तो विश्वा भी घुसेगा...

रोणा - (शनिया से) याद है.. तुझे वकील बाबु ने क्या कहा था... जहां कानूनी पचड़े होंगे... तुझे उनसे पूछ कर यह करना चाहिए था...

शनिया - पर वकील बाबु हैं नहीं... और गाँव में हमारी वह इज़्ज़त रही नहीं... इसलिए हमने सरपंच जी से मशविरा किया... और राजा साहब से इजाजत ले रहे हैं...

रोणा - तुम अब तक यह नहीं समझ पाये... जहां कानून की दाव पेच होगी... वहाँ विश्वा भी अपना कानूनी दिमाग लगाएगा... और तुम लोगों को गलत साबित करेगा... तब हम क्या कर पाएंगे... क्यूंकि ... चिट फंड अगर सरकारी ज्ञांत में और मंजूरी में ना हो तो वह गैर कानूनी होती है... और इससे लोग तुम्हारे ही खिलाफ हो जाएंगे...

शनिया - राजगड़ में राजा साहब ही तो सरकार हैं... और यहाँ लोग राजा साहब के खिलाफ तो जाएंगे नहीं...

रोणा - पर तुम लोग राजा साहब नहीं हो... राजा साहब के कारिंदे हो... गाँव में लोग राजा साहब के वज़ह से लोग तुमसे डरते हैं...

सत्तू - यह हम जानते हैं... पर लोग वहाँ हमारे खिलाफ नहीं होंगे... बल्कि विश्वा के खिलाफ हो जाएंगे...

रोणा - क्या...

शनिया - जी दरोगा बाबु... जैसे ही विश्वा इन मामलों में घुसेगा... भीड़ में से हमारे ही आदमी लोगों को भड़काने का काम करेंगे...

रोणा - ह्म्म्म्म.. तो तुम लोगों ने बहुत सोच समझकर कर यह प्लान बनाया है...

सब - हाँ दरोगा जी...

रोणा - तो इसमें मेरी भूमिका क्या होगी...

भैरव सिंह - तुम बस हवाओं के रुख को पलटने मत देना रोणा... मौका ढूंढना... जब हाथ तुम्हारे मौका आयेगा... तब अपना खुन्नस जैसे चाहे वैसे निकाल लेना... पंचायत में मामला गरम होता जाएगा... हो सकता है तु तु मैं मैं होते होते वहाँ पर दंगा हो... और जहां दंगा होगा... कुछ लोग दंगे के शिकार हो जाएंगे... तब तुम्हें कुछ ना कुछ कारवाई करनी होगी... कारवाई में कुछ भी हो सकता है... उसे कानूनी जामा पहनाने की जिम्मा हमारा होगा... धारा 144 जारी होगी... तहसील ऑफिस से ऑर्डर हम दिलवा देंगे...

रोणा - (आंखे चमकने लगते हैं) वाह राजा साहब वाह... आपने तो कुएं को प्यासे तक पहुँचा दिया... मैं सब समझ गया राजा साहब... मैं सब समझ गया... गाँव में दंगा होगा... दंगे के चपेट में कुछ लोग आयेंगे ज़रूर... और दंगा होने से लेकर दंगे के बाद की रिपोर्ट मैं ऐसा बनाऊँगा की बड़े बड़े कानून के सूरमाओं के सिर चकराने लगेंगे

रोणा अपने यादों से बाहर आता है, दांतों को पिसते हुए अपनी सिगरेट का आखिरी कस भरता है l फिर उस सिगरेट को विश्व के तस्वीर पर मसल कर बुझाने लगता है l

रोणा - (विश्वा की तस्वीर से) सोच रहा है ना... मैंने राजा को क्यूँ नहीं बताया... की उस लड़की का तेरे साथ क्या रिश्ता है... वह इसलिए मादरचोद... तुझे एक कुर्सी पर बाँध कर... तेरे ही आँखों के सामने... तेरी छमीया का ना सिर्फ बजाऊंगा... बल्कि ऐसा फाड़ुंगा... ऐसा फाड़ुंगा... कोई डॉक्टर भी सी नहीं पाएगा... तुझसे राजा का लाख खुन्नस सही... पर मेरी खुन्नस के आगे राजा का खुन्नस जीरो है... उसका खुन्नस तेरे लिए उसके जुती में है... पर मेरा खुन्नस तेरे लिए मेरी नाक से भी उपर है.... इसीलिए तेरी छमीया को रंगमहल की रंगत बनाने से बचाया... क्यूंकि... उसे ताउम्र मेरी रखैल बनाऊँगा... दो दिन बाद होने वाले पंचायत में तेरे खातिर जो दंगे होंगे... वहाँ पर तेरे साथ कुछ भी हो... पर तुझे मैं मरने नहीं दूँगा... क्यूँ की तुझे मैं वह ज़ख़्म दूँगा... जो तेरी जेहन को... आत्मा तक को मरते दम तक गलाती रहेगी....
 
👉एक सौ सत्ताइसवां अपडेट

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अंधेरा छटा नहीं था विश्व पहुँच गया था l चूंकि उसने रात को ही खबर कर दी थी इसलिए रात को ही सीलु गाँव से निकल कर यशपुर चला गया था l विश्व पहुँचने के बाद उमाकांत सर जी का घर देख कर हैरान हो गया था l उसने जितना भी बदलाव किया था सीलु ने उसके ऊपर अपना दिमाग लगा कर और भी खूबसूरत बना दिया था l विश्व इस वक़्त इतना खुश था कि अगर सीलु सामने होता तो उसे गले से लगा लेता l

टीलु - क्या देख रहे हो भाई...

विश्व - पिछले जनम में तुम सब से मेरा भाई वाला ही नाता था..

टीलु - हाँ वह तो है... जरूर एक ही माँ के पेट से होंगे...

विश्व - हाँ...

टीलु - पर कोई ना... अब हम सब एक ही दीदी के भाई है... क्यूँ है कि नहीं...

विश्व - (मुस्कराते हुए) तुम सब बातों में माहिर हो...

टीलु - क्या... भाई... इसमें बात बनाने वाली बात कहाँ से आ गई...

विश्व - दीदी बमुश्किल से तुम्हें ही देखी है... उन तीनों से मिली भी नहीं है... और तुम...

टीलु - गलत... मैंने वक़्त निकाल कर सीलु को दीदी से मिलवा चुका हूँ..

विश्व - (चौंक कर) क्या...

टीलु - घबराने का नहीं... गाँव में सबकी नजरों से छुपाते हुए दीदी से मिलवाया...

विश्व - पर क्यूँ...

टीलु - क्यूंकि दीदी मिलना चाहती थी...

विश्व - ह्म्म्म्म... तब ठीक है...

टीलु - पर भाई तुमने पूछा नहीं... दीदी क्यूँ मिलना चाहती थी...

विश्व - नहीं...

टीलु - पर क्यूँ...

विश्व - दीदी सीलु से मिलना चाहती थी.. क्यूंकि कुछ दिनों के लिए ही सही... सीलु ने विशु की जगह ली थी... और वैसे भी... मेरी दीदी का दिल बहुत बड़ा है... और तुम सब उसके लिए उतना ही हो... जितना कि मैं... जब कोई भी मेरा नहीं था... तब तुम लोग मेरे साथ आए... वह भी बिना किसी लाग लपेट के...

टीलु - बस भाई बस... मुझे और सेंटी मत करो... कुछ देर बाद तुम्हारे नन्हें प्यारे प्यारे बंदर आयेंगे... उनको सम्भालो... दिलासा दो...

विश्व - ऐ... उन्हें बंदर क्यूँ कह रहे हो...

टीलु - (बिदक कर) और नहीं तो... वह सब इत्ते इत्ते से छछूंदर... मुझे चमगादड़ मामा कह रहे हैं... (टीलु जिस अंदाज से कहा विश्व जोर जोर से हँसने लगता है) हाँ हाँ हँस लो... तुम उसके मामा... और मैं उन सबका चमगादड़ मामा...

विश्व - (हँसी को दबाने की कोशिश करते हुए) अरे इसमें इतना बुरा मानने वाली बात कहाँ है...

टीलु - (मुहँ बना कर) तो इसमें खुशी से उछलने वाली बात भी कहाँ है...

विश्व - अच्छा यही बात तुमको अंग्रेज़ी में कही होती तो...

टीलु - अंग्रेजी में..

विश्व - हाँ बैट मेन अंकल... (कह कर विश्व हँसने लगता है) अब तो बुरा नहीं लगेगा ना...

विश्व के साथ साथ टीलु भी हँसने लगता है, तभी एक लड़का आ पहुँचता है l वह दोनों अपनी हँसी को रोक कर उस लड़के की ओर देखते हैं l वह लड़का खुशी के मारे अपनी आँखे बड़ी करते हुए उन्हें देख रहा होता है l विश्व को देखते ही वह लड़का पूछता है l

लड़का - अरे मामा तुम आ गए...

विश्व - मैं गया ही कब था... और तुम इतनी सुबह सुबह...

टीलु - इन बंदरों को नींद आती भी है या नहीं... यह पूछो...

लकड़ा - (अपना गाल फुला कर) हूँन्न्न्नन्...

विश्व एक बड़ा सा चॉकलेट निकाल कर लड़के के सामने लहराता है l लड़का चॉकलेट देख कर खुश हो जाता है और लेने के लिए हाथ बढ़ाता है तो विश्व चॉकलेट को अपने पीछे ले जाता है l लड़का मुहँ बनाता है l

विश्व - पहले यह बताओ... तुम्हारा नाम क्या है...

लड़का - अरुण...

विश्व - हाँ तो अरुण... इतनी सुबह सुबह...

अरुण - वह क्या है कि मामा... आज... (अपनी दो उंगली दिखा कर) लंदन से थोड़ा जल्दी बुलावा आ गया था... इसलिए...

टीलु - ऐ छछूंदर... संढास के लिए बाहर जाने को लंदन बोल रहा है...

अरुण - (टीलु को उंगली दिखा कर) ऐ चमगादड़ मामा... यह हमारा कोड वर्ड है... हम यहाँ नहर को... लंदन बोलते हैं...

टीलु - अबे तेरी तो... (विश्व उसे रोकता है)

विश्व - देखो अरुण... गलत बात... चमगादड़ नहीं...

अरुण - (मुहँ बना कर) सॉरी मामा...

विश्व - अच्छा यह बताओ... तुम इन्हें.. चमगादड़... क्यूँ कह रहे थे...

अरुण - यह हमें आप से मिलने ही नहीं दे रहे थे... जब देखो द्वार पर... लटके ही दिखे... इसलिए...

विश्व - ठीक है... पर चमगादड़ नहीं... हाँ उन्हें तुम सब... बैट मेन अंकल कह सकते हो...

अरुण - ठीक है... पर क्यों...

टीलु - (बड़े एटीट्यूड के साथ) इसलिए... क्यूंकि तुम्हारे इस बैट मेन अंकल... फोरैंन रिटर्न हैं...

अरुण - फोरैंन रिटर्न... मतलब लंदन से...

टीलु - हाँ... (फिर चिल्ला कर) नहीं... तुम्हारे वाली.. लंदन से नहीं... असली लंदन से...

अरुण - हाँ हाँ ठीक है... (विश्व से) अच्छा मामा... लाइब्रेरी बन गया...

विश्व - हाँ... बन गया...

अरुण - और हमारे लिए खिलौने भी लाए हो....

विश्व - हाँ हाँ लाया हूँ... तुम सब आज तैयार हो कर आना... और आज के बाद यहाँ जम कर उछलकूद करना... पढ़ना...

अरुण - (खुशी से उछलते हुए) अरे वाह... मैं अभी जाता हूँ अपने सारे दोस्तों से कहता हूँ...

विश्व - हाँ और यह भी... आज सब तुम सब दो पहर का खाना... अपने मामा के साथ खाओगे...

अरुण - ठीक है...

कह कर बिना पीछे मुड़े अरुण वहाँ से भाग जाता है l विश्व उसे जाते हुए देखता है l

टीलु - भाई... कोई लफड़ा तो नहीं होगा ना..

विश्व - कैसा लफड़ा...

टीलु - तुम जानते हो... यह गाँव वाले...

विश्व - टीलु... मेरे भाई... अगर यह बच्चे आकर इस श्रीनिवास लाइब्रेरी को जिंदा कर देंगे... तो समझ लो... इन मरे हुए गाँव वालों को भी जिंदा कर देंगे...

टीलु - वह कैसे...

विश्व - वह सब मैं बाद में बताऊँगा... पहले यह बताओ... उन न्यूज पेपर में... और क्या क्या मेसेज मिला है अब तक...

टीलु - अरे हाँ... एक मिनट... अभी लाया...

टीलु अंदर जाता है, कुछ न्यूज पेपर और हाथ में एक डायरी लेकर आता है l डायरी को विश्व के हाथ में देकर और न्यूज पेपर्स को विश्व के सामने रखते हुए

टीलु - यह लो... तुमने जैसा कहा था... मैंने बिल्कुल वैसा ही डीकोडिंग करते हुए... जो भी मेसेज बना.. मैंने इस डायरी में लिख दिया है... देखो...

विश्व डायरी में वह पन्ना देखता है जिसमें टीलु ने डीकोड कर वह संदेश इकट्ठा किया था l

"तुम अकेले नहीं हो, एक काफिला तैयार है, युद्ध जब अनिवार्य है, हमारा मिलना आवश्यक है"

"भ्रष्टाचार ही भ्रस्टाचार है, हर तंत्र सम्मिलित है, तुम अकेले क्या करोगे, चलो मिलकर बाजी जीते"

विश्व - सिर्फ दो संदेश... इतने दिनों में... सिर्फ दो संदेश...

टीलु - हाँ... एक दिन मैं यशपुर बहुत जल्दी चला गया था... उस दिन के बाद... और संदेशे मिले नहीं... (विश्व टीलु को घूर कर देखने लगता है) सच कहता हूँ भाई... मैं कोई जासूसी करने नहीं गया था... हाँ थोड़ी जल्दी जरूर गया था... और शायद उसी दिन से वह डर कर मेसेज देना बंद कर दिया... मुझे लगता है... यह राजा क्षेत्रपाल की कोई जाल था... पकड़े जाने के डर से... संदेशा नहीं दे रहा....

विश्व डायरी में लिखे मेसेज्स गौर से पढ़ने लगता है l फिर अपनी आँखे मूँद कर कुछ सोचने लगता है l

टीलु - क्या सोचने लगे भाई...

विश्व - मुझे लगता है... यह बंदा शायद यह जानने की कोशिश कर रहा है... मैं उसके संदेशे पढ़ रहा हूँ या नहीं...

टीलु - मतलब तुम्हें लगता है... इसके पीछे राजा साहब नहीं है...

विश्व - पता नहीं... पर मेरे अंदर की गट फिलिंग कह रही है... कोई बंदा... राजा साहब का सताया हुआ... जो मुझसे ज्यादा मुझको जानता है... मेरी मदत करना चाहता है...

टीलु - तो अब... क्या करने का प्लान है...

विश्व - सोचता हूँ...

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द हैल

डायनिंग टेबल पर चारों सदस्य बैठे हुए हैं l रुप वीर से नजरें चुरा रही थी और खुद को शुभ्रा के साथ बात चित में व्यस्त दिखा रही थी l विक्रम चुप चाप अपना नास्ता कर रहा था पर वीर खोया हुआ था l यह सब बातेँ शुभ्रा नोटिस कर लिया था l

शुभ्रा - क्या बात है वीर... किस सोच में खोए हुए हो...

वीर - (अपनी सोच से बाहर आते हुए) कुछ नहीं भाभी...

शुभ्रा - कुछ तो है... तुम थोड़े टेंशन में लग रहे हो... क्यूँ नंदिनी... तुम्हें क्या लगता है...

रुप - म.. म.. मुझे क्या लगता है... मुझे क्या लगेगा भाभी... वीर भैया ट.. ट.. ठीक ही लग रहे हैं...

शुभ्रा - हाँ हाँ ठीक है ठीक है... तुम ऐसे हकला क्यूँ रही हो..

रुप - कहाँ... कहाँ भाभी... मैं ठीक हुँ... वह मैं अपनी सब्जेक्ट याद कर रही थी... और अपने फ्यूचर के बारे में सोच रही थी...

विक्रम - कैसा सब्जेक्ट... कैसा फ्यूचर...

रुप - वह भैया... मैं सोच रही थी... के भाभी से कुछ टीप्स लूँ... गाइडेंस लूँ...

विक्रम - किस बात पर...

रुप - यही के... मैं समर वेकेशन में डॉक्टरी की एंट्रेंस की तैयारी करूँ...

विक्रम - क्या... पर क्यूँ... और दो साल बाद... वैसे भी.. तुम शादी करने वाली हो...

रुप - तो... तो क्या हुआ भैया.. मैं डॉक्टरी के बाद भी तो शादी कर सकती हूँ...

विक्रम - पागल हो गई हो... या बचपना दिखा रही हो... तुम अच्छी तरह से जानती हो... तुम यहाँ पढ़ाई के लिए आई हो... पर उसके पीछे की वज़ह और शर्तें भूलो मत... (रुप का चेहरा उतर जाता है)

शुभ्रा - ओ.. हो... मैंने कहाँ से शुरू किया था... और बात कहाँ पर आकर पहुँच गई... वीर... प्लीज तुम बताओ... क्या सोच रहे थे...

वीर - भाभी... मैं वह...

शुभ्रा - (हैरान हो कर छेड़ते हुए) वीर... तुम झिझक रहे हो...

वीर - हाँ.. वह मैं...

सब खाना खाते हुए रुक जाते हैं और सबकी नजर वीर पर रुक जाती है l वीर सब नजर घुमाने के बाद शुभ्रा को देखते हुए कहता है l

वीर - मैंने एक अहम फैसला किया है... आई मिन कर लिया है... अपने लिए... इस घर के लिए... हम सबके लिए... (रुक जाता है)

विक्रम - कैसा फैसला...

वीर - भैया... भाभी... नंदिनी... आप सब अनु को जानते हो... अनु आप सबको पसंद भी है...

विक्रम - साफ साफ कहो वीर...

वीर - मैं... मैंने अनु से जल्द से जल्द शादी करने का फैसला किया है...

यह सुन कर सब पहले शुन हो जाते हैं, उसके बाद

विक्रम - क्या...

शुभ्रा - वाव...

रुप - आह सच में..

विक्रम - होल्ड ऑन होल्ड ऑन.. यह तुमने फैसला किया है... आई मिन... जो कर लिया है... इसमें हमें कोई ऐतराज नहीं है... क्यूंकि हम जानते हैं... छोटी माँ का भी आशीर्वाद है... पर तुम भूल रहे हो... टीम बड़े... और हैं... बड़े राजा जी... राजा साहब और छोटे राजा जी... जिनकी मंजुरी बहुत जरूरी है...

वीर - नहीं भूला हूँ... मैं आप सबको अपनी बात बता देना चाहता था.... सो बता दिया...

विक्रम - ठीक है... पर अचानक ऑल ऑफ सडन... आई मिन तुम... कुछ दिन या महीने रुक भी सकते थे...

वीर - क्यूँ...

विक्रम - देखो... अभी हम सब किसी ना किसी वज़ह से डिस्टर्ब्ड हैं... ऐसे हालात में... तुम हमारे घर के बड़े... राजी भी होंगे... डाऊट है... (कुछ देर के लिए सभी चुप हो जाते हैं, फिर) वैसे भी... तुमने अचानक यह फैसला क्यों लिया...

वीर चुप रहता है l उसकी चुप्पी को शुभ्रा समझ जाती है l इतने में सबका खाना चूंकि ख़तम हो चुका था, इसलिये शुभ्रा रुप को इशारे से अपने साथ किचन की चलने के लिए कहती है l रुप और शुभ्रा दोनों किचन के अंदर चले जाते हैं l

विक्रम - तुमने बताया नहीं... क्यूँ...

वीर - भैया... मैं... खुद को... जब से सुधारने में लगा हुआ हूँ... तब से... हाँ तब से... कोई ना कोई मेरी कुंडली में उंगली कर रहा है... मेरे पिछली जिंदगी को... आज से छुड़ाने की कोशिश में हूँ... अपने अंदर की... पुराने वीर से छुटकारा पाने की कोशिश में हूँ... पर कोई है... जो मेरे अंदर के पुराने वीर को ललकारना चाहता है...

विक्रम - तो इससे तुम्हारी शादी का... क्या कनेक्शन है...

वीर - मैं... उस वीर को हमेशा हमेशा के लिए दफना देना चाहता हूँ... मैं दुनिया जहान से लड़ कर जब घर को लौट कर आऊँ... अनु का मुस्कराता हुआ चेहरा देख कर... मैं दुनिया जहान को भुला देना चाहता हूँ... ना किसी पर कोई गरज... ना किसी से कोई शिकायत... मैं दुनिया से थका हारा लौट कर आऊँ... उसके पहलु में... एक नई जिंदगी.. एक नई जीत को हासिल करूँ... बस इसलिए अनु से जल्द से जल्द शादी कर लेना चाहता हूँ...

इतना कह कर वीर चुप हो जाता है और विक्रम की ओर देखने लगता है l विक्रम भी उसकी बातेँ सुन मुहँ फाड़े देखे जा रहा था l

विक्रम - (उसी हैरानी के साथ) ओ... वीर... मैं हैरान हूँ... तुम दुनिया से इतनी जल्दी हारने लगे...

वीर - तभी तो जीत की चाहत में... अनु से जल्द शादी कर लेना चाहता हूँ... (विक्रम के हाथ को पकड़ लेता है) भैया... मैंने भले ही... तुम्हारे छोटे भाई का फर्ज ना उतार पाया... पर तुमने कभी भी इस बात पर मलाल नहीं की... पर आज एक छोटे भाई का हक माँग रहा हूँ... प्लीज... हमारे घर के बड़ो से मेरे लिए बात करोगे... प्लीज...

विक्रम - (वीर के हाथ पर अपना हाथ रख देता है) चल पागल... मैंने कभी भी... अपने मन में... तुम्हारे लिए कोई गाँठ नहीं बाँधा है... अगर बड़ों से बात करनी ही है... तो बस एक हफ्ता रुक जाओ...

वीर - (चौंक कर) एक हफ्ता...

विक्रम - हाँ.. एक हफ्ता...

वीर - यह अचानक एक हफ्ता... कहीं जाना है क्या...

विक्रम - हाँ कल राजा साहब ने फोन पर बताया कि हमारा ESS अभी तक अपने स्टेट में अनबीटेबल है... उसे अब आउट ऑफ स्टेट ले जाने का मौका आया है...

वीर - हाँ तो.. कौन सा स्टेट...

विक्रम - झारखंड... और बंगाल राँची में एक मीटिंग है... उसके बाद कलकत्ता... सेक्यूरिटी सर्विस में.. हमारा स्कोप कहाँ तक हो सकता है... वगैरह वगैरह...

वीर - पर तुम क्यूँ...

विक्रम - क्या बचकाना सवाल है... अगर महांती होता... तो मैं कहाँ जाता... अब चूँकि सब कुछ मैं देख रहा हूँ... इसलिए मुझे जाना होगा... हमें कॉन्ट्रैक्ट मिल जाएगा... क्यूंकि पार्टी राजा साहब के पहचान वाले हैं...

वीर चेहरे पर टेंशन लिए अपनी जगह से उठ खड़ा हो जाता है और कुछ सोच में पड़ जाता है l विक्रम उसकी हालत देख कर हैरान होता है l

विक्रम - तुम इतने टेंश क्यूँ हो गए....

वीर - मैंने अनु से दस दिन की मोहलत मांगी थी... उसमें से सात दिन तो जाया हो जाएंगे... और बाकी तीन दिन में क्या हो जाएगा...

विक्रम - इतनी जल्दी क्या है वीर... क्यूँ... तुम जल्दबाज़ी ऐसे दिखा रहे हो... जैसे.. अनु और तुम्हारे बीच रिश्ता हद से आगे बढ़ गया हो... (थोड़ा रुक कर) क्या तुम...

वीर - (एक बेज़ान सी मुस्कराहट के साथ) देखा भैया... मेरे अंदर तुम वही पुराने वीर को ढूँढ रहे हो... (फिर थोड़ी सीरियस हो कर) जब अपने ही मेरे बारे में ऐसी राय रखते हों... तो गैरों से क्या गिला रखना...

कह कर वीर वहाँ से निकल जाता है l वीर की कही बातेँ विक्रम के जेहन पर हथोड़े की तरह बरसने लगते हैं l वह वीर को आवाज देने की हिम्मत तक नहीं कर पाता l वह भी बुझे मन से बाहर की ओर चला जाता है l यह सब किचन से दोनों भाभी और देवरानी सुन रहे थे, उनका भी चेहरा बुझ जाता है l

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उदय टहलता हुआ रोणा के क्वार्टर के सामने पहुँचता है l उसे बाहर रोणा की पर्सनल जीप दिखता है तो वह बहुत खुश हो जाता है l वह भागते हुए जीप के पास पहुँचता है और अपने बालों को ठीक कर क्वार्टर के बाहर पहुँचता है और बंद दरवाज़े को हल्के से धक्का देता है l दरवाजा खुल जाता है l उदय धीरे धीरे अंदर जाने लगता है l देखता है बाथ रुम में रोणा के चेहरा सेविंग फ़ोम से पुता हुआ है और वह अपना दाढ़ी बना रहा है l आईने में रोणा उदय को देख लेता है l

रोणा - तु अंदर कैसे आया बे...

उदय - वह साहब दरवाजा खुला था...

रोणा - हाँ हाँ मालुम है... पुछ रहा हूँ सीधे अंदर कैसे आ गया...

उदय - साब जी... आपने ही तो कहा था... मुझे अंदर आने के लिए... कभी दरवाजा खटखटाना ना पड़े...

इतना सुनते ही वह अपना रेजर रख देता है और उदय के पास चलते हुए आता है l इससे पहले उदय कुछ समझ पाता तब तक उदय के गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ चुका था l तमाचा मारने के बाद रोणा वापस जाकर अपना दाढ़ी बनाने लगता है l उदय थप्पड़ खा कर सोचने लगा उससे क्या गलती हो गई l यही सोचते सोचते वह बाहर की ओर जाने लगता है l

रोणा - अब कहाँ जा रहा है...

उदय - वह बाहर जाकर दरवाजा खटखटाने...

रोणा - अबे भोषड़ी... जब आ गया है... जो रोने आया था... वह रो कर जा यहाँ से...

उदय अपना सिर खुजाने लगता है, तब तक रोणा अपना दाढ़ी बना कर चेहरा टावल से पोंछ रहा था l जब चेहरा पोंछ कर उदय के सामने आता है, तो उदय उसे देख कर चौंक जाता है l क्यूंकि रोणा ने अपना मूँछें निकाल लिया था l उदय उसे हैरानी भरे नजर से देख रहा होता है l

रोणा - ऐसे मुहँ फाड़े क्या देख रहा है...

उदय - आज आप बहुत बदले बदले लग रहे हैं... चेहरे से भी... और... (अपने गाल पर हाथ फेरने लगता है)

रोणा - पहली बात... तुझे मैंने एक काम भी दिया था... क्या याद है तुझे...

उदय - जी है ना... मैं रोज विश्वा पर नजर गड़ाए हुए था... इतने दिनों तक वह घर के बरामदे से बाहर नहीं आ रहा था... सिर्फ काम ही काम कर रहा था... आज सुबह ही वह काम ख़तम कर बाहर दिखा...

इतना सुनते ही रोणा का चेहरा सख्त हो जाता है और उसका हाथ उठ कर चल जाता है पर ठीक उदय के गाल तक आ कर रुक जाता है और अपनी जबड़े भींचते हुए उदय के गाल को थपथपाने लगता है, फिर अचानक अपनी मुट्ठी में उदय के गाल को भींच लेता है l उदय दर्द के मारे चीखने लगता है l

रोणा - श्श्श.. श्श्श.. चिल्ला क्यूँ रहा है...

उदय - आ ह... आह...

रोणा - तेरा गाल ही तो खिंच रहा हूँ... कौनसा तेरा गांड मार रहा हूँ... हाँय...

उदय - मुझे माफ कर दीजिये... साब...

रोणा - क्यूँ... क्या ग़लती किया तुने... हाँ... बोल बोल...

उदय - नहीं जानता... आह...

रोणा - तो सुन भोषड़ी के सुन... विश्वा... गायब था... तब से... जब से मैं यहाँ नहीं था... और आज सुबह ही तेरी अम्मा चोद कर आया है... मादरचोद... इसपर तु कांस्टेबल बनेगा... ह्म्म्म्म... कांस्टेबल...

उदय - आह... आ आ ह... माँ कसम साब जी... मैंने उसे दुर से ही देखा था... कैसे पता करता के वह विश्वा नहीं है... आप ही ने तो दूरी बना कर नजर रखने के लिए कहा था...

रोणा उसके गाल को छोड़ देता है l उदय अपने गाल को सहलाने लगता है l दर्द इतना था कि उसके आँखे नम हो गईं थीं l इतने में उसके दरवाजे पर दस्तक होता है l

रोणा - कौन है...

भीमा - (अंदर आते हुए) भीमा...

रोणा - ओ... कहो भीमा... सुबह सुबह... कैसे...

भीमा - (उदय पर नजर डालते हुए) दरोगा बाबु पिछले दो दिनों से राजा साहब आपको याद कर रहे हैं... इसलिए मैं यहाँ दो बार आकर लौट चुका हूँ... पर यह क्या... आपने अपनी मूंछें क्यूँ मुंडवा ली...

रोणा - (जबड़े भींच कर) वह क्या है कि भीमा... जब से सस्पेंड हो कर राजगड़ से बाहर आया... तबसे कोई मर्द वाला काम किया नहीं ना... ऊपर से जब से आया हूँ... रंग महल भी सुना और विरान है... इसलिए... अब तो मूंछें तब रखूँगा... जब कोई मर्द वाला काम कर लूँ...

भीमा - ओ... लगता है समस्या विकट है...

रोणा - वह मेरी समस्या है... तुम बोलो.. अभी क्या करना है...

भीमा - पता नहीं क्यूँ... दो दिन पहले.. सरपंच से मिलने के बाद.. राजा साहब आपको खोज रहे हैं... उपर से मैंने कई बार फोन लगाया आपको... पर आपने उठाया ही नहीं...

रोणा - हाँ... वह काम में... बहुत व्यस्त था... इतना की अपना ही होश नहीं था... चलो चलें... देखें राजा साहब को मेरी क्या जरूरत आ पड़ रहा है...

तीनों बाहर आते हैं भीमा और रोणा भीमा के लाए गाड़ी में बैठ कर चले जाते हैं l पीछे उदय वैसे ही अपने गाल सहलाते रह जाता है और मन ही मन बड़बड़ाने लगता है l

" साला कुत्ता कहीं का... लगता है विश्वा ने ही इसकी जमकर ली है... तभी साला दर्द छुपाने के लिए मूँछ कटवा कर फिर रहा है... कुत्ता कहीं का... जब तेरे जैसे ढीठ को विश्वा चकमा दे सकता है... भुर्ता बना सकता है... मैं विश्वा के आगे क्या हूँ बे.. अंडे से निकला हुआ चूजा... रुक साले रुक... एक दिन मैंने तेरी ना ली... तो मैं भी उदय नहीं... "

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दरवाज़ा खोलते ही सामने वीर को देख कर दादी चौंक जाती है l

दादी - अरे दामाद जी आप... इस वक़्त... अनु तो अभी ऑफिस के लिए निकलने वाली थी...

वीर - क्या मैं अंदर आ सकता हूँ...

दादी - ओ हो... मैं भी क्या बेवकूफ़ी कर रही हूँ... दामाद जी द्वार पर खड़े हैं... मैं द्वार पर ही खड़ा कर बात कर रही हूँ... आइए... अंदर आइए...

दादी दरवाजे से हटती है l वीर अंदर आकर एक चेयर पर बैठ जाता है l अनु भागते हुए हाथ में एक कॉफी की ग्लास लेकर वीर को देती है l पहले वीर हैरान हो कर अनु की ओर देखता है फिर मुस्कराते हुए कॉफी अनु के हाथ से लेकर चुस्की भरता है l

दादी - बड़ी खयाल रहती है तुझे राजकुमार की... कोई दुसरा आए तो ध्यान कभी नहीं देती...

अनु शर्मा कर वहाँ से अंदर की ओर भाग जाती है l वीर के होंठो पर मुस्कुराहट और भी गहरा जाता है l

दादी - दामाद जी... क्या आपका यहाँ आना पहले से तय था...

वीर - नहीं तो... क्यूँ क्या हुआ...

दादी - सच कह रही हूँ दामाद जी... रानी साहिबा आईं थीं... इस कमबख्त की हाथ माँगने... तब इसे मेहमान नवाजी समझाना पड़ा... पर आपकी बात और है... देखिए ना... आप को आए कितनी देर हुए... आपके लिए कॉफी तैयार कर दी उसने...

वीर - दादी... मेरा यहाँ आने का वज़ह भी यही है...

दादी - क्या मतलब...

वीर - मुझे अनु की आदत.. या यूँ कहूँ के... मुझे अनु की लत लग चुकी है... मेरा खयाल करने वाली... खयाल रखने वाली... अब सिर्फ ऑफिस में नहीं... बल्कि मुझे मेरे घर के आँगन में चाहिये...

दादी - ओ... (खुश हो कर) मतलब आप शादी की बात करने आए हैं...

वीर - हाँ... शादी की बात करने आया हूँ... आज सुबह ही अपने बड़े भैया... भाभी और छोटी बहन को बताया... माँ तो कब से तैयार बैठी है... इससे पहले कि मैं अपने घर के बुजुर्ग और मुख्य को अपना अभिप्राय बताऊँ... मैं आपसे शादी की इजाजत लेने आया हूँ...

दादी - दामाद जी... जब मैंने रानी साहिबा को पहले से ही बता चुकी हूँ... अनु आपकी है... जब आपको ठीक लगे... तब आप उसे मर्यादा के साथ डॉली में ले जाएं...

वीर - (अपनी जगह से उठ कर दादी की हाथ पकड़ लेता है) थैंक्यू दादी थैंक्यू... मतलब.. आपको कोई एतराज नहीं है ना...

दादी - मुझे क्यूँ कोई एतराज होने लगी... पर आपकी उतावलापन देख कर लगता है... जैसे शादी आपको कल ही करनी है..

वीर - कास के ऐसा हो पाता... वह क्या है कि... मेरे बड़े भाई यानी युवराज जी... मेरे पिताजी... यानी... छोटे राजा जी और हमारे क्षेत्रपाल परिवार के मुखिया... मिलकर किसी काम से बाहर हफ्ते दस दिन के लिए जा रहे हैं... जब वे लौटेंगे.. तब मैं उन लोगों से शादी की इजाजत ले लूँगा...

दादी - तो ठीक है...

वीर - पर...

दादी - पर क्या दामाद जी...

वीर - दादी.. मैं चाहता हूँ... अनु यह दस दिन घर पर रहे... मेरा मतलब है... वह ड्यूटी पर ना आकर... घर पर आराम करे...(अपनी जेब से एक क्रेडिट कार्ड निकाल कर दादी को देते हुए) और शादी की तैयारी वह अपनी तरफ से करे...

अनु - (कमरे से बाहर आकर दरवाजे के पास खड़ी हो जाती है) नहीं... ऐसा नहीं हो सकता...

दादी - ठीक ही कह रहे हैं दामाद जी... शादी के पहले मिलने जुलने का रिवाज नहीं होता...

अनु - वह मैं कुछ नहीं जानती... मुझसे रानी माँ ने वादा लिया था... चाहे कुछ भी हो जाए... शादी से पहले... कभी ऑफिस जाना बंद ना करूँ... वैसे भी कौनसा शादी का दिन तय हो गया है....

दादी - दामाद जी मैं रसोई में जाकर थोड़ा देखती हूँ... आप अपनी अनु को समझाने की कोशिश कीजिए... (कह कर दादी वहाँ से चली जाती है)

वीर - अनु... तुम समझ क्यूँ नहीं रही हो...

अनु - प्लीज... कुछ दिनों से हालात जैसे हो रहे हैं... मैं घर पर रहूँगी तो हमेशा चिंता में रहूँगी... आप सामने रहोगे... तो मुझे चिंता नहीं रहेगी... प्लीज...

वीर - देखो अनु... भैया के बाहर जाने से... पूरा काम का बोझ मुझ पर पड़ेगा... आने जाने से लेकर खाने पीने तक का कोई ठिकाना ना रहेगा...

अनु - (धीरे से) झूठे

वीर - सुनाई नहीं दिया... पर समझ गया... तुम मुझे झूठा कह रही हो... किसलिए

अनु - इसीलिए की आप झूठ कह रहे हैं...

वीर - नहीं अनु... सिर्फ ऑफिस ही नहीं... पार्टी का काम देखने इधर उधर जाना पड़ सकता है...

अनु - तभी तो... मैं... आपके साथ रहना चाहती हूँ.. कम से कम ऑफिस के वक़्त...

अनु के इसतरह से अनुरोध करने पर वीर अपना हथियार डालते हुए अनु से कहता है

वीर - ठीक है... अगर तुम्हारी यही इच्छा है तो.... पर मेरी भी एक शर्त है...

अनु - जी कहिए...

वीर - तुम्हें रोज मेरी गाड़ी से ऑफिस आना जाना करोगी... वह भी सिर्फ ऑफिस के वक़्त...

अनु - (खुशी के साथ शर्माते हुए) मतलब आप रोज मुझे ले जाने एयर छोड़ने आयेंगे..

वीर - नहीं...

अनु - (थोड़ी मायूस हो कर) तो..

वीर - सिर्फ आज ही... मैं तुम्हें ले जाऊँगा... पर कल से... मैं ड्राइवर का इंतजाम कर दूँगा... मेरी अपनी गाड़ी से वह तुम्हें रोज घर से ले जाएगा... ऑफिस आवर ख़तम होते ही वह छोड़ देगा... मैं इसी शर्त पर ही तुम्हें ऑफिस में आलाउ कर सकता हूँ...

अनु - (मायूसी के साथ, मुहँ फूला कर) ठीक... है...

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एक रोती हुई स्कुल जाती किशोरी लड़की की हाथ पकड़ कर वैदेही लक्ष्मी के घर पहुँचती है l घर में लक्ष्मी और हरिया के बीच किसी बात को लेकर कहा सुनी हो रही थी l जैसे ही वैदेही वहाँ पहुँची दोनों के दोनों चुप हो गए l

वैदेही - क्या बात है लक्ष्मी.. किस बात को लेकर तुम दोनों झगड़ रहे थे...

लक्ष्मी और हरिया दोनों एक दूसरे को देखते हैं फिर लक्ष्मी अपना सिर झुका लेती है l पर हरिया गुस्से भरे नज़र से वैदेही के साथ आई उस लड़की की ओर देखने लगता है l वह लड़की हरिया की नजर से बचने के लिए वैदेही के पीछे छुपने लगती है l

वैदेही - ऐ हरिया.. खबर दार जो मुन्नी पर गुस्सा किया या इसके साथ मार पीट की... मुझसे बुरा कोई ना होगा...

हरिया - तु क्यूँ हमेशा गाँव के हर घर के फटे में घुसने की ताक में रहती है...

वैदेही - तुम दारूबाज लंपटों से मैं बात तक करना पसंद नहीं करती.. पर इस गाँव के आँगन में पल रहे.. जी रहे हर इज़्ज़त को अपनी इज़्ज़त समझती हूँ... जब जब उन पर कोई आंच भी आई तो मैं उनके लिए उतरुंगी... आती रहूंगी...

हरिया - तेरी इज़्ज़त है ही क्या... जो मेरे घर की इज़्ज़त के लिए... आती रहेगी...

वैदेही - मेरी इज़्ज़त पर उंगली तब उठाना... जब तु खुद को मर्द कहलाने के लायक समझेगा.. तेरी मर्दानगी रोज शनिया और उसके कुत्तों के आगे... शराब की भट्टी में... एड़ी पर रेंगती रहती है... इसलिए तो... वह और उसके चट्टे बट्टे मौका ढूंढते रहते हैं... तेरे घर की इज़्ज़त और अमानत को तार तार करने के लिए...

हरिया - हूंह्ह्... तुझसे बात कर रहा हूँ देखो... मेरी ही गलती है...

इतना कह कर हरिया वहाँ से चला जाता है l उसके जाने के बाद लक्ष्मी सुबकते हुए बैठ जाती है l

वैदेही - लक्ष्मी... हरिया मुझसे कहेगा कुछ नहीं... पर तु बता... क्या हुआ है... और मुन्नी को तुने क्यूँ गाली दी... मारा भी...

लक्ष्मी - क्या कहूँ दीदी... आज सुबह शनिया सरपंच को लेकर आया था.. इन्होंने पता नहीं कितना कर्ज लिया है शनिया से... अब सब मिला कर पाँच लाख रुपये हो गए हैं...

वैदेही - (चौंकते हुए) क्या पाँच लाख रुपये...

लक्ष्मी - हाँ दीदी... हमने ठीक से कभी हजार रुपये भी नहीं देखें... पाँच लाख रुपये...

वैदेही - ऐसे कैसे पाँच लाख रुपये... शनिया ने कह दिया... और हरिया ने मान लिया...

लक्ष्मी - माने तो नहीं... मान ही नहीं पाए... पर..

वैदेही - पर क्या...

लक्ष्मी - पर हरिया के पास लिखा पढ़ी के कागजात थे... इन्होंने जितना दारु पीया था... सब सूद के साथ मिला कर... अब पाँच लाख रुपये हो गए हैं...

वैदेही - क्या... दारू पी पी कर पाँच लाख रुपये...

लक्ष्मी - सिर्फ इन्हीं के नहीं है दीदी... बल्लु.. सुकांत... नरेश... सब के सब... किसी के पाँच... किसी के सात...

वैदेही - यह लोग तो पैसे दे देते थे ना...

लक्ष्मी - हाँ फिर भी... कई सालों से पी पी कर इतना हो गया है....

वैदेही - ठीक है... बात मेरी समझ में आ गई... पर इसमें मुन्नी को क्यूँ कोस रही थी... हाथ भी उठाया तुमने आज इस पर... बड़ी हो रही है वह...

लक्ष्मी - मारु नहीं तो क्या करूँ... कर्मजली लड़की हो कर पैदा जो हुई है...

वैदेही - तो... लड़की हो कर पैदा हुई... तो इससे क्या पाप हो गया... अब तो राजा नहीं उठा जा रहा है...

लक्ष्मी - पर उसके पालतू भेड़िये तो ताक में हैं... जो मौका ढूंढ रहे हैं...

वैदेही - एक मिनट... कहीं इस पाँच लाख के बदले...

लक्ष्मी - हाँ दीदी हाँ... कर्ज को जल्दी चुकता करने के लिए... लड़की को घर बुला रहे हैं... और इस पर सरपंच भी उनका साथ दे रहा है...

वैदेही अपने दोनों हाथों से कान को ढकते हुए अपनी आँखे मिंज कर पास पड़े एक टुटे फूटे कुर्सी पर बैठ जाती है l थोड़ी देर बाद

वैदेही - सरपंच ऐसे कैसे उनका साथ दे सकता है... उन हरामीयों की बात को मनवाने के लिए... उनके साथ घर घर जा रहा है...

लक्ष्मी - वही तो... दीदी... यह सब जो कर्ज के जाल में उलझे हुए हैं... दो दिन बाद इस विषय में... पंचायत में निर्णय होने वाला है... सारे गाँव वालों के बीच...

वैदेही - ओ... अब समझी... गाँव वालों के सामने... इन कर्जदारों पर निर्णय नहीं होने वाला है... बल्कि हर घर की इज़्ज़त में सेंध लगाने की जुगत लगा रहे हैं...

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कुछ लोग तहसील ऑफिस से बाहर निकल कर रोड के उस पार मिलन टी स्टॉल पर जाते हैं l पर वहाँ पहुँचते ही देखते हैं मिलन अपना दुकान बंद कर रहा था l यह देख कर एक आदमी पूछता है

आदमी - क्या बात है मिलन... धंधे के टाइम पर दुकान क्यूँ बंद कर रहा है...

मिलन - आज थोड़ी गड़बड़ हो गई है...

दुसरा आदमी - गड़बड़... कैसी गड़बड़...

मिलन - सुबह सामान ठीक से चेक किया नहीं... इसलिए जितनी जरूरत थी... उससे कम सामान लाया था... और इत्तेफ़ाक से सुबह से ही भीड़ बहुत थी... जितना लाया था सब ख़तम हो गया...

आदमी - तो यहीँ कहीँ आसपास से मंगवा ले ना...

मिलन - सर जी... यहाँ सब दुध वाला चाय पीते हैं... और अभी दुध का पैकेट मिलने से रहा... पाउडर वाला चाय एक बार कोशिश की थी... बहुत गाली पड़े थे... उम्मीद है... आप समझ रहे हैं...

सारे लोग - ठीक है... आज तो तुझे माफ़ कर रहे हैं... पर कल से... शाम होने से पहले दुकान बंद किया तो... यहाँ से दुकान उखाड़ देंगे समझा...

मिलन - जी माई बाप...

वह लोग वापस जाने के बजाय वहीँ पड़े बेंच पर बैठ कर बातेँ करने लगते हैं l मिलन कुछ ही मिनट में अपना सारा सामान पैक कर चुका था l तभी एक ऑटो वहाँ पर आती है l मिलन उसे आवाज देता है l ऑटो रुक जाती है l उस ऑटो में पहले से ही दो सवार थे l मिलन अपना सामान पीछे लोड कर अंदर बैठ जाता है l ऑटो आगे बढ़ जाता है l थोड़ी देर बाद ऑटो यशपुर से निकल जाता है l यशपुर के बाहर एक सुनसान जगह पर ऑटो खराब हो जाता है l ऑटो ड्राइवर उतर जाता है और चारो तरफ नजर घुमाता है, वह ऑटो ड्राइवर और कोई नहीं था, वह शैलेंद्र उर्फ सीलु था l ऑटो में दो और लोग विश्व और जिलु थे l

सीलु - (विश्व से) भाई तुम ऑटो के अंदर ही बैठे रहो... (जिलु और मिलु से) तुम दोनों उतरो बे... ऑटो ठीक करने का सीन बनाना है...

जिलु और मिलु उतर कर ऑटो को एक तरफ उठा कर उसके नीचे एक डंडा लगा देते हैं l सीलु फटाफट स्टेफिनी निकाल कर टायर निकालने का ऐक्टिंग करने लगता है l

सीलु - भाई... इससे पहले के तुम कुछ पूछो.. मैं कुछ पूछूं...

विश्व - हाँ... पूछ लो...

सीलु - तुम्हारा बार काउंसिल वाला लाइसेंस कब आएगा...

विश्व - शायद दो या तीन दिन बाद... या फिर ज्यादा से ज्यादा एक हफ्ता...

जिलु - और जो तुमने आरटीआई में इंफॉर्मेशन माँगा था... उसका क्या हुआ...

विश्व - वह भी एक दो दिन में आ जायेगा.... क्यूँ तुम लोग इतने बेकरार क्यूँ हो...

सीलु - बुरा ना मानना भाई... पर मुझे नहीं लगता... पीआईएल दाखिल करने से... तुम्हें कोई फायदा होगा...

विश्व - ह्म्म्म्म... मतलब तुम लोगों ने बहुत कुछ छानबीन कर लिया है...

मिलु - हाँ लगभग...

विश्व - ह्म्म्म्म ठीक है... अब तुम लोग... मुझे बात को पुरी तरह से समझाओ...

सीलु - भाई... तुमने आरटीआई जैसे ही फाइल किया... इन्हीं पैंतीस चालीस दिनों में... जो भी कुछ हुआ है.. तुम्हारे उस रुप फाउंडेशन केस में कुछ भी मदत नहीं मिलने वाला है...

मिलु - पहली बात... तुम्हारे साथ जो भी... एक्वुस्ड थे... वह सारे के सारे मार दिए गए... ज्यादातर गवाह भी गायब कर दिए गए....

जिलु - और जिन लोगों को तुम गवाह बना सकते थे... मतलब... बैंक के तीन स्टाफ... रेवेन्यू ऑफिस के दो स्टाफ और तहसील ऑफिस के तीन पदाधिकारी... अपनी अपनी मेडिकल सर्टिफ़िकेट निकलवा कर... OSD... बन बैठे हैं...

मिलु - यह OSD मतलब...

विश्व - ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्युटी... वह कर्मचारी... जिन्हें नौकरी से निकालने के बजाय... उन्हें बिना किसी काम धाम के... मानवता के आधार पर नौकरी पर बनाए रखा जाता है....

जिलु - हाँ...

विश्व - और जाहिर सी बात है कि... वे सब... सिजोफेर्नीया की सर्टिफिकेट लाए होंगे...

सीलु - हाँ... बिल्कुल...

विश्व - मतलब... अब वह सारे लोग गवाह के तौर पर नाकारे हो चुके हैं...

तीनों अपना सिर हाँ में हिला कर चुप हो जाते हैं l विश्व अपनी आँखे बंद कर कुछ सोचते हुए हँसने लगता है l

सील - भाई... दुखी मत हो...

विश्व - मैं दुखी कहाँ हूँ... मैं तो हँस रहा हूँ...

मिलु - पर क्यों... क्या अब भी... तुम हाइकोर्ट में पीआईएल दाखिल करोगे...

विश्व - हाँ...

तीनों - (हैरान हो कर) क्या...

जिलु - पर उससे फायदा क्या होगा...

विश्व - देखो... मैंने जब आरटीआई दाख़िल किया था... मुझे तभी से ही अंदेशा था... ऐसा ही कुछ होगा... इस केस के ताल्लुक़ और तीन प्रमुख गवाह हैं... सी आई... अनिकेत रोणा... श्रीधर परीडा... और राजा भैरव सिंह...

सीलु - पर भाई तुम्हीं कहा करते थे... रोणा का इसमे उतना रोल नहीं है... जितना एसआईटी का चीफ श्रीधर परीडा का है...

विश्व - हाँ पर उन तीनों को गवाही के लिए कोर्ट लाना टेढ़ी खीर है...

मीलु - क्यूँ...

विश्व - केस फिर से खुलेगा... इस बीच सात साल गुजर चुके हैं... बहुत कुछ बदल चुका है... या बदल दिया गया है... इसलिए पहले मुझे पीआईएल फाइल तो करने दो... देखते हैं... क्या होता है...

जिलु - भाई... तुम बात को बहुत ही कैजुअल ले रहे हो...

विश्व - नहीं... गेम तो अभी शुरु होगा... जैसे ही मैंने आरटीआई फाइल की... उन्होंने गलतियाँ करनी शुरु कर दी... जब कि सच कहूँ तो मैं भी जानता हूँ... यह सात साल के पुराने केस में संभावना बहुत कम है...

तीनों - तो...

विश्व - देखो... करप्शन एक चस्का है... जो भी उसकी मलाई एक बार खाये... जब तक कोई खतरा ना हो... वह करता ही जाता है... मैं दावे के साथ कह सकता हूँ... उन्होंने करप्शन करना छोड़ा नहीं होगा... बल्कि नए तरीके से... मजे से कर रहे होंगे...

जिलु - तो उस पुराने केस का क्या होगा...

विश्व - पीआईएल तो फाइल होगा... वह लोग अपने ना पकड़े जाने पर और अब तक किए करतूत पर निश्चिंत होंगे... पर फिर भी उनका ध्यान पुराने केस पर जमायेंगे... पर हम असल में उनके नए करप्शन को खोज निकाल कर उसे पुराने केस में जोड़ेंगे... तब जाकर कुछ ना कुछ रिजल्ट हम को मिलेगा...

सीलु - हाँ भाई... तुम्हारे इस बात पर... मैं सौ फीसद सहमत हूँ... अभी इन पाँच छह महीनों में... सारे प्रमुख सरकारी कार्यालय में... पदाधिकारी बदले हैं... सब नए हैं... तो तुम्हारे कहे हिसाब से... करप्शन हो रहा है... हम जान भी रहे हैं... पर शायद नए तरीके से...

विश्व - ठीक है... तो अब बताओ... इन छह महीनों में क्या क्या हुआ है...

सीलु - भाई... इन छह महीनों में... यशपुर को स्मार्ट सिटी... और राजगड़ को स्मार्ट विलेज बनाने की अप्रूवल मिल गया है... पाँच साल पहले... राजगड़ से बाहर... निरोग हस्पताल बनाया जा रहा था... बहुत ही बड़ा हस्पताल... पर यश वर्धन की मौत के बाद... वह हस्पताल की बिल्डिंग विरान पड़ी थी... छह महीने पहले... उसे... राजगड़ मल्टी पर्पस कोऑपरेटिव ऑफिस में कन्वर्ट किया गया है...

मिलु - इन्हीं पाँच छह महीनों में... यशपुर और राजगड़ विकास के लिए... बहुत से प्रोजेक्ट अप्रूव्ड हुए हैं... वह भी... मनरेगा के तहत... पर...

विश्व - पर...

मिलु - इस बार... कोई मुर्दा नहीं है... पता नहीं पैसे कैसे गायब हो रहे हैं...

विश्व - ह्म्म्म्म... लगता है... इस बाबत हमें कोई लिंक मिलने वाला है...

तीनों - कैसे... कौन देगा...

विश्व - वही... जो मुझसे... पेपर से... कॉन्टेक्ट करना चाहता है... मुझे लगता है... इसी करप्शन पर वह कोई रौशनी डाल सकता है...

जिलु - पर टीलु कह रहा था... वह कुछ दिनों से कॉन्टेक्ट नहीं कर रहा है...

विश्व - हाँ... कर तो नहीं रहा है... अच्छा मैं यहाँ से उतर कर पैदल ही चला जाता हूँ... तुम लोग आधे घंटे बाद... अपने अपने ठिकाने पर पहुँच जाओ...

जिलु - रुको ना भाई... छोड़ देते हैं तुम्हें...

विश्व - नहीं... मैं नहीं चाहता कोई भी हमें... इकट्ठा देखे...

इतना कह कर विश्व ऑटो से उतर कर चल देता है l चलते चलते इनके कही बातों को याद करने लगता है l उसे अंदाजा था, भैरव सिंह अपनी नाक बचाने के लिए बहुत कुछ करेगा l पर जिन अधिकारियों को गवाही के लिए बुलाया जा सकता था, उन्होंने ही अपने तरफ से पागलपन का सर्टिफिकेट लेकर अपनी जान और आने वाले कानूनी पचड़े से खुद को बचा लिया l असल में भैरव सिंह के बाद सिर्फ एक ही गवाह बचता हैं l श्रीधर परीडा एसआईटी का चीफ जिसे शायद तोड़ा जा सकता है l पर कहीं भैरव सिंह इससे पहले श्रीधर परीडा को कुछ ना कर दे l और इन छह महीनों में जो भी कुछ हुआ है पुराने कडियों को जोड़ने के लिए बहुत अहम है l पर जोड़े तो जोड़े कैसे l भैरव सिंह अपने पुराने गलतियों से सबक लेकर अब जो भी कर रहा होगा फुल प्रूफ ही होगा l

ऐसे सोच सोच कर विश्व उसी पेपर वाले के दुकान पर आ पहुँचता है जहां से वह रोज उसके लिए टीलु पेपर लेकर जाता है l उसके कदम अपने आप दुकान के अंदर पहुँच जाते हैं l

दुकानदार - बोलिए साहब.. क्या चाहिए...

विश्व - (समझ नहीं पाता क्या कहे)

दुकानदार - सर यहाँ हर तरह के अखबार... किताबें मिलती हैं... बोलिए आपको कौनसा चाहिए...

विश्व - मैं... वह... असल में... मैं थोड़ा कंफ्यूज हूँ...

दुकानदार - जब मन भटके... कोई राह ना दिखे तो... यह किताब पढ़ना चाहिए... (दुकानदार एक किताब निकाल कर दिखाता है जिसके कवर पर लिखा था "शुभ संदेश")

विश्व - नहीं... मैं...

दुकानदार - अरे सहाब ले लीजिए... यह आपके लिए ही है... घर जाकर पढ़ लीजिए... अगर आपको पसंद ना आए.. तो कल लाकर लौटा दीजिएगा...

विश्व - नहीं... मैं ऐसे कैसे...

दुकानदार - अरे सहाब... मैंने कहा ना... यह किताब आपके लिए ही है... मेरी मानिये... जरा एकबार घर जाकर पढ़ लीजिए... पैसा तभी दीजिएगा जब अंदर का विषय पसंद आए... अगर पसंद ना आए... तो लाकर वापस लौटा दीजिए...

विश्व हिचकिचाते हुए किताब लेता है l तभी उसका फोन बजने लगता है l फोन निकाल कर देखता है l स्क्रीन पर दीदी डिस्प्ले हो रहा था l

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रंगमहल से अपने सरकारी क्वार्टर पर रोणा लौट आता है l सिगरेट की धुआं उड़ाते हुए अपने क्वार्टर के अंदर दाखिल होता है l ड्रॉइंग रूम में सोफ़े के पास पड़े टी पोय पर क्लाथ को हटाता है l उस टी पोय के बोर्ड पर विश्व का बड़ा सा मगर एक पुरानी फोटो लगी हुई थी l उस फोटो को देखते ही उसकी आँखों के नीचे की पेशियों में थर्राहट होने लगती हैं l वह आज महल में हुए व्याक्या को याद करने लगता है l

आओ रोणा आओ... पहले गायब होते थे... तो पता रहता था... तुम कहाँ पर हो... पर इस बार तुम ऐसे छुपे जैसे अमावस में चाँद... क्या बात है... (यह सवाल था भैरव सिंह का रोणा से)

रोणा भीमा के साथ रंगमहल के उपरी प्रकोष्ठ में आया था l यह भैरव सिंह का खास कमरा था जहां वह लोगों को बुला कर बैठक किया करता था l भैरव सिंह एक बड़े से सिंहासन नुमा कुर्सी पर बैठे रोणा का इस तरह से अभिवादन किया l रोणा के भीतर आते ही भैरव सिंह अपना हाथ उठा कर भीमा को इशारे से जाने को कहता है, भीमा अपना सिर झुका कर उल्टे पाँव लौट जाता है l भीमा के वहाँ से जाते ही

रोणा - ऐसा कुछ नहीं है राजा साहब... मैं भुवनेश्वर आपको बता कर ही गया था...

भैरव सिंह - हाँ... गए तो थे... (अचानक हैरान हो जाता है) एक मिनट... हम यह क्या देख रहे हैं... (लहजा सपाट व निरस हो जाता है) जो क्षेत्रपाल से जुड़े हों... वह लोग अपने मूंछें नहीं मुंडवाते... जानते हो ना...

रोणा - जी राजा साहब... पर इन दो महीनों में... मेरे साथ कुछ ऐसा हुआ है... जो मुझे मूंछें रखने लायक छोड़ा नहीं है...

भैरव सिंह - (अपनी भवें सिकुड़ कर रोणा की ओर देखता है) ह्म्म्म्म... चोट बहुत गहरी लगी है... दिल पर भी और दिमाग पर भी... देने वाला कौन है...

रोणा - (जबड़े सख्त हो जाते हैं, आँखों में खुन उतर आती है) व... वि... विश्वा..

भैरव सिंह - विश्वा... क्या किया उसने इसबार तुम्हारे साथ....

रोणा - (अपनी दांतों को पिसते हुए) पहली बार... उसने साबित कर दिया... मैं कितना लाचार हूँ... मैं कितना मजबूर हूँ... उसने मुझे एहसास दिलाया... के मैं एक बेचारा हूँ...

भैरव सिंह - पर तुम इसबार एक लड़की के पीछे गए थे ना.... क्या उस लड़की का... कोई संबंध है विश्वा से... जैसा कि तुम अनुमान लगा रहे थे...

रोणा - (कुछ सेकेंड के लिए चुप रहता है, फिर अपना सिर ना में हिलाते हुए) नहीं... नहीं राजा साहब... नहीं...

भैरव सिंह - पर तुमने जो अनुमान लगाया था...

रोणा - हाँ... कुछ अनुमान सही साबित हुए और कुछ गलत... प्रधान बाबु सही कह रहे थे... विश्वा जैसे सजायाफ्ता मुजरिम से... जो जैल से छूटे कुछ ही दिन हुए हों.. उससे कैसे कोई इज़्ज़त दार घर की लड़की दिल लगा सकती है... वह मेरा वहम था... जो इस बार दूर हो गया...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... इसका मतलब उस लड़की से... अब बदला नहीं लोगे...

रोणा - जी बेशक लूँगा... (अपने गाल पर हाथ फेरते हुए) अपने अपमान का बदला कैसे ना लूँ... उसे अपने नीचे लाए वगैर.. मेरी तड़प कम नहीं होगी...

भैरव सिंह - हम्म्म बहुत अच्छे... (एक कुटील मुस्कान लेकर) तो अनिकेत रोणा तुमने उस लड़की को... इस रंग महल के लिए कभी नहीं सोचा... हूँ..

रोणा - (कुछ सेकेंड के लिए स्तब्ध हो जाता है, फिर लड़खड़ाती हुई आवाज में ) सो.. सोचा... था... पर... राजा साहब... वह इतनी खूबसूरत है नहीं कि... इस रंग महल की रंगत बन सके... (नजरें झुका लेता है)

भैरव सिंह का चेहरा थोड़ा सख्त हो जाता है l वह तेज नजरों से रोणा को घूर रहा था l रोणा उसके नजरों का सामना नहीं कर पा रहा था l

रोणा - राजा साहब.. मैं आपका नमक हलाल हूँ... आप हुकुम करेंगे तो... मैं उसे इस रंग महल की रंगत बनाने के लिए... जरूर कुछ करूँगा...

भैरव सिंह - अच्छा... बड़ी जल्दी तैयार हो गए...

रोणा - वह... बात दरअसल यह है कि... उस लड़की से... मैं अपनी निजी खुन्नस निकालना चाहता था...

भैरव सिंह - (हँसने लगता है) हा हा हा हा हा... हम तो तुम्हें जांच रहे थे... बस तुम्हारी वफादारी देख रहे थे... तुम्हारे अंदर की जुनून को परख रहे थे... क्यूंकि तुम्हें बिना मूँछ के देख कर... हमें लगा तुम्हारी काबिलियत पर कहीं सीलन ना पड़ गया हो... जंक तो नहीं लग गया...

रोणा - तो बोलिए... क्या हुकुम है राजा साहब... अगर आप कहेंगे तो लड़की को उठवाकर इस रंग महल में आपके सेवा में पेश कर दूँगा...

भैरव सिंह - सबास... रोणा उस लड़की का विश्वा से जब कोई संबंध नहीं है... तो उस लड़की पर हमारा इरादा खत्म हो गया... क्यूंकि भैरव सिंह उन कलियों और फूलों को मसलता... रौंदता है... जिनकी कांटे भैरव सिंह को चुभते हैं... हम रंग महल में उसे अपने नीचे लाते हैं... जिसपर अपना नफरत उतारना हो... खैर यह बताओ... विश्वा ने तुम्हारे साथ ऐसा क्या किया... जो तुमने अपना मूंछें निकलवा दी...

यह सवाल रोणा को अंदर से छटपटा देता है l उसके जबड़े भींच जाते हैं आँखों के नीचे की मांस पेशियां फड़फड़ाने लगती हैं l आँखे नम हो कर तैरने लगती है l

रोणा - (दुख और पीड़ा से आवाज जैसे जम गया हो) राजा साहब... कुछ ऐसा किया है... जो मेरे मर्द होने की अहम को कुचल कर रख दिया है...

भैरव सिंह - ठीक है... हम समझ गए... कुछ ऐसा हुआ है... जो तुम बता नहीं सकते... और यह भी समझ गए... वह तुम पर इस कदर खुन्नस खाए हुआ है... के तुम्हारे पीछे पीछे भुवनेश्वर पहुँचकर... तुम्हारी बजा कर वापस आ गया है...

रोणा - (अपने हुए अपमान को याद कर आँखे बंद कर लेता है) राजा साहब... आपने मुझे बुलाया है... कोई हुकुम...

भैरव सिंह - हाँ रोणा हाँ... हम आज शाम को... भुवनेश्वर जा रहे हैं... छोटे राजा... युवराज और प्रधान के साथ हफ्ते दस दिन के लिए... कलकत्ता और राँची जा कर कुछ बिजनैस डील फाइनल करने हैं... तो यह कुछ दिन... राजगड़ पुरी तरह से तुम्हारे हवाले किए जा रहे हैं...

रोणा - (हैरानी से भैरव सिंह की ओर देखते हुए) मैं समझा नहीं

भैरव सिंह - अभी समझ जाओगे...

भैरव सिंह एक बेल बजाता है l कुछ देर बाद उस कमरे में भीमा के साथ सरपंच, शनिया, सत्तू आते हैं l

भैरव सिंह - रोणा कल से लेकर हमारे वापस आने तक... तुम मौका बनाओ... उस कमज़र्फ विश्वा से... तुम्हें कैसे बदला लेना है...

रोणा - मैं अभी भी समझा नहीं...

भैरव सिंह - (अपनी कुर्सी से उठ खड़ा होता है) कुछ दिन हुए हम कुछ अफवाह सुन रहे थे... इस बाबत हमने इस शनिया से बात की... तो उसने हमें जो बताया... हमें वह सब नागवार गुज़रा... शनिया ने कहा कि... रात के अंधेरे में... यह लोग तैयार नहीं थे... पर विश्वा अपनी पुरी तैयारी में था... इसलिए वह कांड हो गया... जो कभी होना नहीं चाहिए था... पर दोबारा विश्वा के पास ऐसा मौका नहीं आना चाहिए...

रोणा - तो इसमें सरपंच की क्या भूमिका है..

सरपंच - है दरोगा बाबु है... पंचायत ऑफिस में... हमने दो साल पहले एक चिट फंड शुरु किया था...

रोणा - चिट फंड...

शनिया - जी दरोगा जी... और जो लोग हमसे कुछ भी लेते थे... उसके एवज में... हम सब उसे चिट फंड में जोड़ कर दिखा देते थे... और उसके बदले उनसे... खाली कागजात पर अँगूठा या दस्तखत रख लेते थे...

रोणा - ओ...

सरपंच - हाँ... दरोगा बाबु... आज हम घर घर जा कर सबको कल की पंचायत के लिए नोटिस थमा दिया है... सबका फैसला हम पंचायत में करेंगे... या तो पैसा.. या फिर... हमारे घर पर उनका कोई काम करने आएगा... और तब तक काम करेगा... जब तक उनका कर्ज उतर ना जाए...

रोणा - तो इसमें विश्वा कहाँ आ गया... वह गाँव वालों के.. किसी के भी फटे में घुसेगा नहीं...

शनिया - वह नहीं घुसेगा... पर उसकी दीदी... वह तो घुसेगी.. और जब उसकी दीदी घुसेगी.. तो विश्वा भी घुसेगा...

रोणा - (शनिया से) याद है.. तुझे वकील बाबु ने क्या कहा था... जहां कानूनी पचड़े होंगे... तुझे उनसे पूछ कर यह करना चाहिए था...

शनिया - पर वकील बाबु हैं नहीं... और गाँव में हमारी वह इज़्ज़त रही नहीं... इसलिए हमने सरपंच जी से मशविरा किया... और राजा साहब से इजाजत ले रहे हैं...

रोणा - तुम अब तक यह नहीं समझ पाये... जहां कानून की दाव पेच होगी... वहाँ विश्वा भी अपना कानूनी दिमाग लगाएगा... और तुम लोगों को गलत साबित करेगा... तब हम क्या कर पाएंगे... क्यूंकि ... चिट फंड अगर सरकारी ज्ञांत में और मंजूरी में ना हो तो वह गैर कानूनी होती है... और इससे लोग तुम्हारे ही खिलाफ हो जाएंगे...

शनिया - राजगड़ में राजा साहब ही तो सरकार हैं... और यहाँ लोग राजा साहब के खिलाफ तो जाएंगे नहीं...

रोणा - पर तुम लोग राजा साहब नहीं हो... राजा साहब के कारिंदे हो... गाँव में लोग राजा साहब के वज़ह से लोग तुमसे डरते हैं...

सत्तू - यह हम जानते हैं... पर लोग वहाँ हमारे खिलाफ नहीं होंगे... बल्कि विश्वा के खिलाफ हो जाएंगे...

रोणा - क्या...

शनिया - जी दरोगा बाबु... जैसे ही विश्वा इन मामलों में घुसेगा... भीड़ में से हमारे ही आदमी लोगों को भड़काने का काम करेंगे...

रोणा - ह्म्म्म्म.. तो तुम लोगों ने बहुत सोच समझकर कर यह प्लान बनाया है...

सब - हाँ दरोगा जी...

रोणा - तो इसमें मेरी भूमिका क्या होगी...

भैरव सिंह - तुम बस हवाओं के रुख को पलटने मत देना रोणा... मौका ढूंढना... जब हाथ तुम्हारे मौका आयेगा... तब अपना खुन्नस जैसे चाहे वैसे निकाल लेना... पंचायत में मामला गरम होता जाएगा... हो सकता है तु तु मैं मैं होते होते वहाँ पर दंगा हो... और जहां दंगा होगा... कुछ लोग दंगे के शिकार हो जाएंगे... तब तुम्हें कुछ ना कुछ कारवाई करनी होगी... कारवाई में कुछ भी हो सकता है... उसे कानूनी जामा पहनाने की जिम्मा हमारा होगा... धारा 144 जारी होगी... तहसील ऑफिस से ऑर्डर हम दिलवा देंगे...

रोणा - (आंखे चमकने लगते हैं) वाह राजा साहब वाह... आपने तो कुएं को प्यासे तक पहुँचा दिया... मैं सब समझ गया राजा साहब... मैं सब समझ गया... गाँव में दंगा होगा... दंगे के चपेट में कुछ लोग आयेंगे ज़रूर... और दंगा होने से लेकर दंगे के बाद की रिपोर्ट मैं ऐसा बनाऊँगा की बड़े बड़े कानून के सूरमाओं के सिर चकराने लगेंगे

रोणा अपने यादों से बाहर आता है, दांतों को पिसते हुए अपनी सिगरेट का आखिरी कस भरता है l फिर उस सिगरेट को विश्व के तस्वीर पर मसल कर बुझाने लगता है l

रोणा - (विश्वा की तस्वीर से) सोच रहा है ना... मैंने राजा को क्यूँ नहीं बताया... की उस लड़की का तेरे साथ क्या रिश्ता है... वह इसलिए मादरचोद... तुझे एक कुर्सी पर बाँध कर... तेरे ही आँखों के सामने... तेरी छमीया का ना सिर्फ बजाऊंगा... बल्कि ऐसा फाड़ुंगा... ऐसा फाड़ुंगा... कोई डॉक्टर भी सी नहीं पाएगा... तुझसे राजा का लाख खुन्नस सही... पर मेरी खुन्नस के आगे राजा का खुन्नस जीरो है... उसका खुन्नस तेरे लिए उसके जुती में है... पर मेरा खुन्नस तेरे लिए मेरी नाक से भी उपर है.... इसीलिए तेरी छमीया को रंगमहल की रंगत बनाने से बचाया... क्यूंकि... उसे ताउम्र मेरी रखैल बनाऊँगा... दो दिन बाद होने वाले पंचायत में तेरे खातिर जो दंगे होंगे... वहाँ पर तेरे साथ कुछ भी हो... पर तुझे मैं मरने नहीं दूँगा... क्यूँ की तुझे मैं वह ज़ख़्म दूँगा... जो तेरी जेहन को... आत्मा तक को मरते दम तक गलाती रहेगी....
 
हाँ अब समय आ गया है

सब एक-दूसरे पर हावी होने के लिए प्रयत्नशील रहेंगे

आपको याद होगा कि

जब विश्वा की शनिया और उसके दोस्तों के साथ साथ भिड़ंत हुई थी तब विश्वा ने ही टीलु को कह दिया था उसपर अगला हमला भीड़ में से होगा

हाँ यह तो अगले अपडेट में मालुम पड़ेगा

हाँ मित्र

वीर और अनु की प्रेम पथ बहुत ही कठिन और कांटों भरा है

विक्रम का अभी वह टर्निंग पॉइंट आया नहीं है पर जल्द ही आने वाला है

हाँ रोणा ही वह पहला होगा जो भयंकर अंजाम भुगतेगा

धन्यवाद मेरे भाई बहुत बहुत धन्यवाद
 
हाँ उनके बीच दोस्ती बहुत गहरी है

वह अभी छुप छुप कर मिल रहे हैं क्यूंकि उनके सामने आते ही उन पर खतरा मंडराने लगेगा

भाई थोड़ा हल्का फुल्का लम्हा आवश्यक है क्यूंकि भविष्य में यही बच्चे भी प्रमुख भूमिका निभाने वाले हैं इसलिए विश्वा और उसके दोस्तों के साथ उनकी दोस्ती आवश्यक है

यही दस दिन वीर और अनु पर बहुत भारी पड़ने वाले हैं

अब पंचायत में क्या होगा यह अगले अपडेट में सामने आ जाएगा
 
हाँ यह बात तो है कि हम इक्कीसवीं सदी में रहते हैं पर कहीं कहीं मानसिकता अभी भी प्रस्तर युग की है

हाँ विश्व ने अपना जाल बिछाया हुआ है l अभी तक कोई भैरव सिंह के नजर में आए भी नहीं है l यह चारों विश्व के ताकत भी हैं जो कहानी के अंत तक विश्व के साथ बने रहेंगे

जाहिर सी बात है कहावत भी है

चोर चोरी से जाए पर हेरा फेरी से ना जाए

जिस खानदान ने पीढियों से सरकारी खजाने में लुट मचा रखा हो जाहिर है उसकी लालच हर पल बढ़ता ही जा रहा होगा l

पर वह क्राइम भी ऐसा कर रहा होगा कि सबुत उसके खिलाफ नहीं होंगे

पर विश्व ना सिर्फ सबुत जुटाएगा ब्लकि बनाएगा और उसके इस काम में उसके चार साथी काम आयेंगे

बेशक आपने सही अनुमान लगाया है

किसी के पास वह सभी साक्ष है

विश्व को अपनी ओर आमंत्रित भी कर रहा है ऐसा नहीं कि विश्व अपना दिमाग नहीं लगाया है

पर उनके भेंट होने में थोड़ी देरी है

जी बिलकुल पर इंस्पेक्टर रोणा का मौत इतनी जल्दी नहीं और इतनी आसान भी नहीं

कुछ ऐसा होगा जिसकी कल्पना रोणा ने कभी कि ही नहीं होगा

धन्यवाद SANJU ( V. R. ) भाई

अगला अपडेट में एरर करेक्शन कर रहा हूँ

उम्मीद है आज रात तक प्रस्तुत कर दूँगा वर्ना कल देर शाम तक ही ला पाऊँगा
 
👉एक सौ अट्ठाइसवां अपडेट

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वीर अपने केबिन में आता है l आज पहली बार था ऑफिस में वह अकेला था l आज विक्रम आया नहीं था l चूंकि विक्रम को भैरव और पिनाक के साथ कलकत्ता जाना था l केबिन में आकर वह अपनी कुर्सी पर बैठ जाता है l रिसेप्शन से कह कर वह सुपरवाइजर को बुलवाता है l उसी से मालूम होता है कि ऑपरेशन इनचार्ज और इंटेलिजंस इनचार्ज दोनों भी क्षेत्रपाल टीम के साथ कलकत्ता गए हैं, मतलब कुछ भुवनेश्वर में गड़बड़ हुआ तो वीर को प्रॉब्लम सम्भालना मुस्किल हो जाएगा l वीर थोड़ी सोच में पड़ जाता है l तभी वह सुपरवाइजर वीर को एक फाइल देता है l वीर उसे सवालिया नजर से देखता है l

सुपरवाइजर - राजकुमार जी... कल रात को युवराज जाने से पहले यह फाइल आपको देने के लिए कह गए थे.

वीर - (फाइल लेकर) ठीक है.. जाओ तुम यहाँ से..

सुपरवाइजर के जाने के बाद वीर फाइल खोलता है l फाइल में वीर के नाम कंप्यूटर प्रिंटेड एक चिट्ठी था l चिट्ठी हाथ में लिए वीर हैरानी के साथ पढ़ने लगता है

" वीर मेरे भाई

हम भाई से ज्यादा दोस्त बन कर जिए हैं l कभी ऐसा हुआ नहीं है कि मैंने अपनी दिल की हालत तुमसे कहा नहीं या तुमने अपने दिल की हालत मुझसे कहा नहीं l हाँ यह बात और है तुमने कभी अपनी नाराजगी मुझसे छुपाई नहीं और मैं तुमसे कभी नाराज़ हुआ ही नहीं

तुम मेरी तरह पहले प्यार और उसके बाद शादी करना चाहते हो l पर तुम्हारी राह कतई आसान नहीं होने वाली मेरे भाई l मेरे समय में मेरी शादी की बात तक किसीसे चलाई नहीं गई थी l पर यहाँ हालत जुदा है l तुमारी शादी राजा साहब ने सुंदरगड़ के सबसे बड़े इंडस्ट्रीयलीस्ट निर्मल सामल की बेटी से तय कर दिया है, और छोटे राजाजी ने मंजुरी भी दे दी है l इसलिए तुम्हारा रास्ता मुश्किल है, ऐसा मुझे लगता है

मुझे आसार कुछ ठीक लग नहीं रहे हैं l क्यूंकि कभी ऐसा हुआ नहीं है कि हमारे किसी नेगोसिएशन के लिए ऑपरेशन इनचार्ज, कम्युनिकेशन इनचार्ज और इंटेलिजंस इनचार्ज को उनके टीम के साथ बाहर ले जाया जा रहा है l शायद इसीलिए की आउट ऑफ स्टेट यह एक मेगा डील होने वाली है

इसलिये यहाँ पर तुम सावधान रहना l उम्मीद है कि यह सात दिन हमारे सर्विस को कोई प्रॉब्लम नहीं आएगी l बाकी तुम्हारी सिक्स्थ सेंस मुझसे हमेशा आगे रहा है l मेरी बात जानते हो l बड़े राजा जी की बात मैं कभी काट नहीं सकता था l इसलिये मैं जा रहा हूँ l तुम कभी अकेले नहीं रहे पर अब यह हफ्ता दस दिन तुमको अकेले ही संभालना होगा

बस इतना ही l तुमको आगाह करते हुए, तुम्हारा बड़ा भाई l विक्रम

चिट्ठी पढ़ते ही वीर की भंवे सिकुड़ जाते हैं l वह एक गहरी साँस छोड़ते हुए चिट्ठी की मर्म को समझने की कोशिश कर रहा होता है कि उसके टेबल पर पड़ा लैंड लाइन घन घना उठता है l वीर क्रेडल पर से रिसीवर उठाता है

वीर - हैलो.

@ - (मजाकिया लहजे में) हैलो वीर... आई आम बैक...

वीर - तुम...

@ - ओ हो हो... तो पहचान गए...

वीर - (चेहरा सख्त हो जाता है और जबड़े भींच जाती है) तुम... तुमने फोन क्यूँ किया...

@ - वाव... क्या बात है वीर... मेरी आवाज़ से पहचान लिया तुमने... यानी मैं तुम्हारे दिल में हूँ...

वीर - शट अप...

@ - ओ कॉम ऑन वीर... फोन पर आवाज वही लोग पहचान सकते हैं... जो उसके दिल में रहता हो... या तो वह दिलबर हो... या फिर दुश्मन...

वीर - तु मेरा दुश्मन है...

@ - ओलेलेए... मैं तेरा दुश्मन.... अब तु अपनी दिलबर की सोचना शुरू कर दे...

वीर - (गुर्राते हुए) क्या कहा...

@ - मैंने कहा... अब तु अनु के लिए रोने की तैयारी कर ले..

वीर - अनु... अनु ने क्या बिगाड़ा है तुम्हारा...

@ - बिगाड़ा तो अनु ने नहीं है... पर वह क्या है कि... तुम क्षेत्रपालों को मैं खुश नहीं देख सकता ना... इसलिए अनु का मरना बहुत जरूरी है...

वीर - (चिल्लाते हुए) यु बास्टर्ड.. सामने आ कर बात कर

@ - क्यूँ... आऊँ सामने...

वीर - साले हरामी... छुप कर अपने आप को बड़ा मर्द समझता है...

@ - अरे कहाँ... मैं तो खुद को छोटा मर्द समझता हूँ... बड़े मर्द तो तुम क्षेत्रपाल हो... जो अपने नाम के आड़ में किसी के भी बिस्तर पर चढ़ जाते हो... या किसी को भी अपने बिस्तर पर ले लेते हो...

वीर - (थोड़ा नर्म पड़ते हुए) देखो अनु ऐसी वैसी लड़की नहीं है... वह.. वह बहुत अच्छी है...

@ - हाँ जानता हूँ...

वीर - उसे कुछ मत करो प्लीज...

@ - अब तुम इतना गिड़गिड़ा रहे हो... तो मैं अनु को बहुत जल्द तुम्हारी आँखों के सामने ही मार दूँगा... वादा रहा... (फोन कट चुका था)

वीर - हैलो.. हेलो... यु बास्टर्ड... हैलो...

फोन से कुं कुं की आवाज़ आ रही थी l वीर क्रेडल पर रिसीवर को पटक देता है और तुरंत अपना मोबाइल निकाल कर अनु को कॉल लगाता है l फोन बजती रहती है पर अनु फोन नहीं उठा रही थी l फोन कट जाती है पर अनु फोन नहीं उठाती l वीर फिर से कॉल करता है l इसबार अनु फोन उठाती है

अनु - हैलो.

वीर - कहाँ हो तुम..

अनु - आप ही ने तो गाड़ी भेजा था... अभी ऑफिस के कैम्पस में पहुँची हूँ..

वीर - तो तुमने फोन क्यूँ नहीं उठाया..

अनु - वह फोन पर्स में थी..

वीर - ठीक है... जल्दी मेरे केबिन में आओ..

अनु फोन काट कर वीर के केबिन में पहुँचती है l जैसे ही अनु अंदर आती है वीर उसके पास पहुँच कर उसे खिंच कर अपने सीने से लगा लेता है और बड़ी आवेग से अनु को अपने सीने में भींच लेता है l थोड़ी देर बाद अनु को खुद से अलग करता है l अनु उसे हैरानी भरे नजरों से देखती है l वीर झेंप कर अपनी नजर दुसरी ओर कर लेता है

अनु - क्या हुआ..

वीर - क्या.. क्या हुआ... कुछ नहीं... क्या होगा....

अनु - आज आपको क्या हो गया है...

वीर - तुम्हें क्यूँ लग रहा है... मुझे कुछ हो गया है...

अनु - आप खुद से पूछिये... रोज खुद बाहें फैला देते थे... मैं आपके बाहों में समा जाती थी... पर आज आपने मुझे मेरे समझने से पहले ही बाहों में ले लिया... कितना आवेग भरा आलिंगन था...

वीर कुछ नहीं कहता है l मुड़ कर सीधे अपनी कुर्सी की ओर जाता है और वहाँ पर बैठ जाता है l अनु उसके टेबल के सामने आ कर खड़ी होती है और वीर की आँखों में झांकने की कोशिश करती है

वीर - (मस्ती में, गाते हुए

ऐसे ना मुझे तुम देखो सीने से लगा लूँगा...

तुमको मैं चुरा लूँगा तुमसे दिल में बसा लूँगा...

अनु - झूठे...

वीर - (सीरियस हो कर) क्या झूठ बोला तुमसे...

अनु - अगर बताना नहीं चाहते तो मत बताइए... मैं आपको ऐसे डरते हुए नहीं देख सकती... (वीर इस बार अनु की आँखों में देखने लगता है) आप ज़रूर किसी बात से डर गए हैं... बोलिए ना... किस बात से डर गए...

वीर थोड़ी देर के लिए किसी बुत की तरह स्तब्ध रह जाता है, एक गहरी साँस छोड़ते हुए अपना सिर हिला कर इशारे से अपने पास बुलाता है l अनु वीर के पास आकर खड़ी होती है l वीर अनु की हाथ पकड़ कर अनु को अपने गोद में बिठाता है और अपना सिर अनु के सीने पर रख देता है l अनु भी वीर के सिर को अपने सीने से लगा कर वीर की सिर पर अपना सिर रख देती है

वीर - अनु... मैं सिर्फ कहने के लिए राज कुमार हूँ... रईसी को जीता हूँ... पर असल में... यह मेरी बदनसीबी है... क्यूंकि मैं हमेशा अपनी कार की खिड़की से झाँक कर बाहर की दुनिया यानी तुम लोगों की दुनिया को देखा करता था... तुम लोगों की दुनिया में... हर खुशी... हर एहसास.. हर बात... हर ज़ज्बात... मेरी दुनिया के मुकाबले असली लगती थी... मुझे यह बार बार एहसास होता था... के तुम्हारी दुनिया में... मेरी खोखली दुनिया से... बेहतर कुछ तो है... मुझे जलन होती थी... तुम्हारी दुनिया से... धीरे धीरे वह जलन... नफ़रत में बदल गई... इसलिए जो मन में आता था... उसे नफरत की बैसाखी के सहारे दुनिया के उपर अपनी दिल की भड़ास उतारता था... उससे मुझे कोई खुशी भले ही ना मिलता हो... पर मेरी जलन को.. मेरे अंदर की नफरत को सुकून मिलता था.

ऐसे में एक दिन तुम मुझे मिली... मेरी सांसो में... एहसासों में... दिल में... मेरी रूह में उतरती चली गई... मैं खुद को अब दुनिया से बेहतर समझने लगा... तुम्हारा मेरे पास होने से... मुझे हमेशा लगने लगा कि... मेरी दुनिया अब उन लोगों की दुनिया से बेहतर लगने लगी... साथ साथ यह भी महसुस होने लगी... के तुम्हारे दुनिया के लोगों को... मुझसे जलन हो रही है... तुमको मुझसे छीनने की साजिश करने लगे हैं... मेरी दुनिया के लोग भी... तुम्हारी दुनिया के लोग भी... मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता... क्यूंकि मेरी दुनिया... मेरी सोच... मेरी नजर... सिर्फ तुममें... तुम्हारे आसपास.. तुम्हारे इर्दगिर्द सिमट चुका है... इसलिए अब मैं डरा डरा सा रहता हूँ... हर किसी पर शक करने लगा हूँ..

वीर बड़ी ईमानदारी के साथ अपनी जज्बातों को अनु के सामने जाहिर कर रहा था l वीर के हर एक शब्द अनु के दिल में शहद की तरह उतर रही थी l वह अंदर से थर्रा जा रही थी, वह खुशी के मारे वीर को अपने सीने में भींच रही थी

वीर - अनु.

अनु - हूँ...

वीर - कुछ कहोगी नहीं..

अनु - क्या कहूँ..

वीर - मुझे तुमसे... एक भी पल की दूरी बर्दास्त नहीं होती..

अनु - राजकुमार जी..

वीर - हूँ..

अनु - क्या आपको... इस बात का डर है... के मैं आपसे खो जाऊँगी.. या छिन जाऊँगी..

वीर - (अपना मुहँ को अनु के सीने में अंदर की ओर करते हुए हाँ में सिर हिलाता है

अनु - राजकुमार जी... मैं आपकी हूँ... आपकी ही हूँ... आप जैसे हैं... मुझे आप बहुत पसंद हैं... इतना की आपकी खुशी के लिए... अपनी वज़ूद तक मिटा सकती हूँ... (वीर की चेहरे को अपने सीने से अलग कर अपने चेहरे के सामने लाती है) मुझे आपसे... आप ही अलग कर सकते हैं... दुनिया की कोई ताकत मुझे आपसे अलग नहीं कर सकती... और अगर कभी ऐसा हुआ भी... तो वादा करती हूँ... आह तक नहीं करुँगी..

वीर - (अनु की हाथों को अपने चेहरे से हटाते हुए) है... यह तुने कैसे सोच लिया... मैं तुझको... खुद से अलग करूँगा... जी नहीं पाऊँगा..

अनु - तो फिर आप डर किससे रहे हैं..

वीर - (अनु की हाथ को अपने हाथ में लेकर चूमते हुए) अपनी किस्मत से.... मुझे तेरी कसम है अनु... कोई तुझे मुझसे अलग करने की कोशिश भी की... तो वह वीर का वह रुप देखेगा... जो उसकी रूह तक को... कपा जाएगा... मौत से दुआ मांगेगा... अपने साथ ले जाने के लिए... जिंदगी उसकी इतनी खौफनाक बना दूँगा..

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"तो क्या करने का सोचा है तुने"

यह सवाल था वैदेही का उसके दुकान में नास्ता करने आए विश्व से पूछा था l विश्व वैदेही की सवाल को अनसुना कर नास्ता खा रहा था

वैदेही - तु सुन भी रहा है... क्या पुछ रही हूँ.

विश्व - वाह दीदी... क्या पुड़ी सब्जी बनाया है... तुम्हारे हाथ में तो जादू है... क्या बढ़िया खाना बनाया है तुमने... उम्म्म्... उँगलियाँ चाटने से भी... स्वाद नहीं छूट रहा..

वैदेही - (गुस्से में मुस्कराते हुए) ले और थोड़ा सब्जी ले... (कह कर चूल्हे से सब्जी वाली कढ़ाई उठा कर विश्व की प्लेट में थोड़ी सब्जी डाल देती है

टीलु - यह क्या दीदी... मैं भी बैठा हूँ यहाँ... भाई तो मुझे कम प्यार करता है... तुम भी..

वैदेही - वह क्यूँ तुझसे कम प्यार करने लगा...

टीलु - हाँ दीदी... कल मुझे घर में काम में फ़ंसा कर यशपुर चले गए थे...

वैदेही - अच्छा तुझे भी प्यार चाहए... ले फिर... (टीलु के प्लेट पर सब्जी डालते हुए)

विश्व और टीलु पुड़ी सब्जी खाने लगते हैं l अचानक टीलु आह आह कर चिल्लाने लगता है l पर विश्व बड़ी चाव से खाना खा रहा था l उसे ऐसे आराम से खाते देख वैदेही हैरानी से विश्व को देखने लगती है

वैदेही - (तुझे विश्व से) तुझे तीखा नहीं लग रहा... मैंने बाद में... दुबारा जान बुझ कर मुट्ठी भर मिर्च डाल दिया था..

विश्व - (मुस्कराते हुए) तुम्हारे हाथों में... जहर भी अमृत बन जाए... मैंने देख लिया था... तुम को गुस्से में मिर्च डालते हुए... यह तो सिर्फ मिर्च है...

टीलु - आह आह... ओह.. उह... दीदी... चीनी.. चीनी...

वैदेही जैसे ही चीनी की कप वहाँ रखती है टीलु झपट कर कप को अपने मुहँ में उड़ेल देता है l वैदेही टीलु से माफी मांगते हुए कहती

वैदेही - माफ करना टीलु.. मैं तो विशु को यह एहसास दिलाना चाहती थी... के मैं उससे नाराज हूँ... मेरी बात का ना जवाब दे रहा है... ना ही मेरी सुन रहा है... सॉरी.. हाँ..

टीलु - ऐसा ना कहो दीदी... स्वाद तो बहुत था खाने में... पर यह दुसरी बार जब डलवाया... तो नानी याद आ रही है....

गौरी - कोई ना मेरे बच्चे... जब खाना ख़तम हो जाए... तो मुहँ में और थोड़ी चीनी उड़ेल लेना...

टीलु - आह... चुप कर बुढ़िया...

गौरी - नाशपिटे तेरी नानी बन कर दिलासा दे रही थी...

टीलु - दिलासा के बदले चीनी दे देती... तो नानी दादी सब कह देता...

गौरी - चुप... नासपिटे...

विश्व अपना खाना ख़तम कर हाथ धोने चला जाता है l टीलु भी उसके पीछे पीछे उठ कर चला जाता है l विश्व के साथ साथ अपना हाथ मुहँ धो कर दोनों वैदेही के पास आते हैं l वैदेही मुहँ फुला कर मुहँ फ़ेर लेती है l विश्व मुस्कराते हुए वैदेही की आँचल से अपना हाथ और मुहँ पोंछता है l विश्व के बाद टीलु भी वही दोहराता है l विश्व एक कुर्सी खिंच कर वैदेही के सामने बैठ जाता है

विश्व - दीदी... गुस्सा थूक दो ना

वैदेही - क्यों..

विश्व - गैरों के लिए... अपनों पर गुस्सा करना ठीक है क्या...

वैदेही - गैर... किन्हें गैर कह रहा है तु..

विश्व - वही... जिनके लिए... तुम अपने भाई पर मुहँ फुलाए हुए हो..

वैदेही - (थोड़ी इमोशनल हो कर, विश्व की हाथ पकड़ कर) वे सब हमारे आसपास पड़ोस वाले ही नहीं... हमारे गाँव वाले हैं... तेरे दिल में... क्या उनके लिए कोई दर्द नहीं है..

विश्व - (गंभीर हो कर) नहीं..

वैदेही - (विश्व की हाथ झिड़क देती है) इतने दिन तु गाँव से दुर क्या रहा... तु इतना बेदर्द... निर्मोही कैसे हो गया..

विश्व - किसी से मोह... किसी के लिए दर्द... जिंदा लोगों के लिए पाला जाता है दीदी... मुर्दों के लिए नहीं..

वैदेही - ठीक है... इन गाँव वालों के लिए ना सही... पर उन बच्चों की तो सोच... जिनका तु मामा बना बैठा है..

विश्व - दीदी... इन बे ग़ैरत गाँव वालों के लिए... बहुत सोच रही हो तुम... इतने सालों में... तुमने हर घर की चौखट में जाकर... शनिया और उसके जैसों के मुहँ पर पैसे मार मार कर... कितने घरों की इज़्ज़त पर दाग लगने से बचाया है... बदले में किसीसे पैसे वापस भी नहीं लिये... यहाँ तुम्हारे दुकान पर जो नास्ता खा कर भी पैसे देने लायक नहीं थे... फिर भी उन सबकी घर की लाज बचाया है... पर बदले में क्या मिला... मौका पाते ही... तुम्हारे नाम पर... तुम्हारे ही मुहँ पर फब्तीयाँ कसते हैं..

वैदेही - तो तु उन सब बातों का इस वक़्त बदला ले रहा है..

विश्व - हाँ... ऐसा सोच सकती हो... मेरे गुरु ने कहा था... मदत उसीकी करो... जो मदत मांगे... बिन मांगे किसी को कुछ भी दो... वह उस चीज़ की कदर नहीं करते... जैसे की तुम्हारा... तुमने उन सबकी इतने मदत किए... क्या कदर कर रहे हैं यह लोग...

वैदेही - जो भी हैं... जैसे भी हैं... वे सब हमारे अपने हैं... कोई बहन है... कोई भाई है... कोई मौसा है.. कई मौसी.. कई काका काकी...

विश्व - हाँ हाँ... कोई चाचा... कोई चाची... सब हैं तुम्हारे... पर जैसे ही भैरव सिंह का हुकुम आया... मेरे हुक्का पानी बंद करने की... सब ने तुमसे किनारा कर लिया...

वैदेही - वह लोग डरे हुए हैं...

विश्व - तो... उनका डर उनका अपना है... उन्हें अपने डर से जितना होगा... तब वह अपने किस्मत से लड़ सकेंगे... ना तुम उनके लिए कुछ कर पाओगी... ना ही मैं...

वैदेही - इसका मतलब... तु... परसों पंचायत में नहीं आएगा...

विश्व - नहीं... पंचायत मेरे लिए थोड़ी ना बुलाया गया है..

वैदेही - पर मैं जाऊँगी...

विश्व - ठीक है जाओ फिर...

वैदेही - क्यूँ... तु मेरे साथ नहीं आएगा...

विश्व - दीदी... बात अगर तुम्हारी होती तो मैं कहीं भी जा सकता हूँ.... पर जिनके लिए मेरा हुक्का पानी बंद है... मैं उनके लिए खड़ा नहीं हो सकता...

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कॉलेज की बॅटनीकल गार्डन में छटी गैंग के सदस्य बनानी और तब्बसुम को छोड़ बाकी सभी बैठे हुए हैं

भाश्वती - जिसे देखो सब अपनी अपनी जगह मशगूल हैं.

इतिश्री - कौन कहाँ..

दीप्ति - दुनिया मशगूल है... तो तुझे क्या परेशानी है..

भाश्वती - क्यूँ नहीं होगी... जब से बनानी का राकेश के साथ टांका भीड़ा है... तब से उसकी अटेंडेंस हमारे यहाँ कम हो गई है... और (रुप की ओर इशारा करते हुए) इन मोहतरमा को देखो... जब से ड्राइविंग स्कुल से नैन मक्का हुआ है... तब से हमारे पास हो कर भी... मेरे भैया के ख़यालों में हमेशा खोई रहती हैं..

इतिश्री - इनकी तो ठीक है... पर तब्बसुम कहाँ है..

दीप्ति - वैसे मानना पड़ेगा... जब नंदिनी पहली बार आई थी तब वह मुरझाई मुरझाई या फिर सीरियस रहती थी... अब देखो मन ही मन मुस्करा रही है... हम सब देखो इसके पास बैठे हैं... मगर इसे तो हमारा होश ही नहीं है... अपने में खोई हुई है..

भाश्वती - हाँ यार... देख ना... हम कबसे बतीआ रहे हैं... वह भी इसीके बारे में... पर इस कमबख्त को होश ही नहीं है..

दीप्ति - प्यार का चक्कर है... भाश्वती प्यार का चक्कर है... यह इश्क नहीं आशां बस इतना समझ लीजिए... जिसे यह रोग लग जाये... उसे अंधे बहरे होने से कौन रोक पाए..

इतिश्री - वाह वाह वाह वाह... पर हमारे गैंग में सबसे पहले... तुझे यह रोग लगा था ना... फिर तुने कौनसा एंटी डोड लिया था... के तु प्यार में तो है... पर अंधी बहरी नहीं है..

भाश्वती - ओवर डोज इतिश्री ओवर डोज... प्यार का ओवर डोज..

तीनों लड़कियाँ हँसने लगती हैं l पर इन सब बातों का रुप पर कोई असर नहीं पड़ता l वह इनके पास होते हुए भी अपने में खोई हुई थी l तभी तब्बसुम पार्क में आती है

तब्बसुम - हैलो दोस्तों.

सब - हाय..

तब्बसुम - हे नंदिनी..

सब - श्श्श्श्श्..

तब्बसुम - क्या हुआ..

इतिश्री - यह बेचारी..

भाश्वती - दिल से हारी..

दीप्ति - प्यार की मारी..

इतिश्री - राज दुलारी..

भाश्वती - कर रही है, मेरी भाभी बनने की तैयारी... (सब हँस देते हैं

तब्बसुम - तो अभी इसे होश में लाना है जरूरी.

सब - क्यूँ...

तब्बसुम - यह और (भाश्वती से) तेरे भाई ने मिलकर मेरी वाट लगा दी है...

भाश्वती - क्या...

तब्बसुम - हाँ... (रुप को हिलाती है) ऐ नंदिनी...

रुप - (चौंक कर जागते हुए) क्या... क्या हुआ...

भाश्वती - हमने कुछ नहीं किया...

दीप्ति - हाँ... तेरी प्रताप के साथ हसीन सफर वाली गाड़ी को... तब्बसुम ने ठोक दिया...

रुप बुरी तरह झेंप जाती है l शर्माते हुए अपनी किताबें चेहरे के सामने ले जाती है l तब्बसुम तेजी से किताबों को उसके हाथ से ले लेती है

रुप - किताबें क्यूँ ले ली तुमने..

दीप्ति - हाय कितने लाल लाल गाल हैं... उफ़ उस पर यह शर्म की रंगत... लड़का होती... तो कसम से.. चबा कर खा गई होती...

भाश्वती - इसीलिए तो तो लड़की है... (एक गहरी साँस छोडकर) इन एप्पल जैसे गालों को तो मेरा भाई चबा कर खाएगा...

तब्बसुम - ओ हो... बंद करो यह मज़ाक...

दीप्ति - ऐ... तेरी क्यूँ जल रही है... मज़ाक तो हम

इतिश्री, दीप्ति और भाश्वती - राजकुमारी के साथ कर रहे हैं...

रुप - ऐ... खबर दार जो मुझे राजकुमारी कहा तो...

तब्बसुम - प्लीज... तुम लोग थोड़े शांत रहोगे... नंदिनी... तुमने और प्रताप ने यह क्या किया...

रुप - क्या... हमने क्या किया...

तब्बसुम एक काग़ज़ निकाल कर रुप को दिखाती है l उसमें लिखा था 'सब ए मुशायरा', तारीख xxxx देर शाम xxxx बजे

रुप - इसमें... मेरा क्या वास्ता..

तब्बसुम - अबु ने कहा... यह आइडिया... उन्हें प्रताप ने दिया था... उस दिन जो तुम दोनों मुझे ढूंढते हुए... खुर्दा आए थे....

रुप - व्हाट... तु शायद भूल रही है... उस दिन सिर्फ प्रताप ही... रहमान अंकल से बात कर रहे थे... मैं तो सारा वक़्त तुम्हारे साथ थी... क्या यह प्रोग्राम प्रताप ओर्गानाइज कर रहा है...

तब्बसुम - नहीं... पर प्रताप ने अबु को सलाह दी है कि... इस मुशायरे में... मुझे हर हाल में... पार्टीसिपेट करना चाहिए...

भाश्वती - यानी प्रताप भैया को भी मालुम है... तु चिल्लर छाप शायरी करती है... (रुप को छोड़ सब हँसने लगते हैं)

तब्बसुम - (बिदक कर) शटअप..

रुप - देख तेरे अबु कोई छोटे बच्चे तो नहीं हैं... और... प्रताप ने कुछ सुझाये हैं तो... बात कुछ गहरी ही होगी... मत भूलो... प्रताप.. एक एडवोकेट भी हैं... एडवाइज भी देते रहते हैं... और मैं तो सलाह दूँगी के तु हिस्सा ले... क्यूंकि ना सिर्फ यह टैलेंट हंट है... बल्कि देख इनाम भी बहुत तगड़ा है...

तब्बसुम - यही तो वज़ह है... की मैं बहुत नर्वस हूँ... जैसे मैं कोई मुशायरा में सामिल होने नहीं जा रही हूँ... बल्कि कौन बनेगा करोड़पति में हिस्सा लेने जा रही हूँ...

इतिश्री - वाव... तब तो बहुत मज़ा आयेगा...

तब्बसुम - क्या मजा आयेगा... वह मुशायरे का दिन जितना करीब आता जाएगा... मेरी तो हालात खराब होती जाएगी...

दीप्ति - कोई नहीं... हम सब उस दिन तेरा परफॉर्मेंस देखने आयेंगे...

भाश्वती - ना ना... स्मॉल करेक्शन... उस रात...

सभी तब्बसुम को उस मुशायरे में हिस्सा लेने के लिए कहते हैं l चूँकि यह एक टैलेंट हंट था और इनाम भी बहुत जबरदस्त था l इतने में बनानी गार्डन में आती है और इनके पास आकर बैठ जाती है

बनानी - किस बात पर बहस चल रही है... (सब चुप हो जाते हैं

भाश्वती - ऐ तु हमारे बीच में मत पड़... तुझे जो पूछना है वह सब नंदिनी से पूछ...

बनानी - क्यूँ...

इतिश्री - यह बता... राकेश ने तुझे कितने बजे छोड़ा..

बनानी - अभी अभी... (फिर चौंक कर) क्या... क्या कहा... वह मैं बस से आई... बस थोड़ी लेट थी...

दीप्ति - ऐ चल चल... हमसे बात छुपा रही है... जबकि पुरे ब्रह्मांड को पता है... रॉकी ने नई नई गाड़ी तेरे लिए ही ली है... रोज तेरा ड्राइवर बन कर तुझे छोड़ने और ले जाने का काम करता है...

बनानी - ऐ खबर दार जो राकेश को ड्राइवर कहा...

भाश्वती - मतलब... तुझे रॉकी ने यहाँ छोड़ कर गया है...

बनानी - (मुहँ बनाते हुए)हाँ...

रुप - जैसा कि दीप्ति ने कहा... जब पुरे ब्रह्मांड को पता है... तो छुपाती क्यूँ है...

बनानी - (एक गहरी साँस छोड़ते हुए) अरे... ऐसी बातों को छुपाने में भी अपना मजा है...

भाश्वती - वाह वाह वाह वाह... मुझे लगता है.. बनानी को भी... मुशायरे में एक बार ट्राय करनी चाहिए...

बनानी - मुशायरा... कैसा मुशायरा...

भाश्वती उसे सब बातेँ बताती है l सब सुन कर बनानी भी तब्बसुम से हिस्सा लेने के लिए कहती है l फिर अचानक अपने सिर पर हाथ मारते हु

बनानी - ऑफ ओ... मैं क्या कहने आई थी... बातों बातों में भूल गई..

रुप - क्या हुआ... क्या भूल गई...

बनानी - अरे हाँ... वह भाश्वती की... विंटेज फिएट की... लगता है बहुत डिमांड है...

भाश्वती - क्या मतलब...

बनानी - अब कार पार्किंग में... ठीक भाश्वती की कार के बगल में... राकेश ने अपनी गाड़ी पार्क की... एज यु ऑल नो... राकेश की गाड़ी नई है... पर मजे की बात जानते हो... कुछ देर बाद... चार पाँच बंदे आए... वह सब... राकेश की कार के बजाय भाश्वती की कार को देखने लगे...

इतिश्री - क्या...

बनानी - हाँ... जानते हो... इस बात पर राकेश को थोड़ा जलन भी हुई...

दीप्ति - हाँ हाँ क्यूँ नहीं... भाश्वती की गाड़ी फिएट पद्मिनी जो है... एकदम एंटीक...

सब हँसने लगते हैं पर रुप नहीं हँसती l वह थोड़ी सोच में पड़ जाती है और अपनी छटी गैंग से "एक्स क्युज मी... तुम लोग क्लास चलो मैं वॉशरुम हो कर आई" कह कर वहाँ से निकल जाती है

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विश्व एक कुर्सी पर बैठा अख़बार पढ़ रहा था l कमरे में विश्व अकेला ही था l कुछ देर बाद टीलु अपना मुहँ लटकाये अंदर आता है l विश्व उसे देखता है और पूछता

विश्व - क्या हुआ... तुम्हारा मुहँ यूँ क्यूँ उतरा हुआ है..

टीलु - (उसके पास बैठ कर) आज दीदी का मन तुम्हारे वज़ह से दुखा है...

विश्व - (थोडे खामोशी के साथ टीलु को देखता है फिर) वह मेरी दीदी है... मेरी माँ है... उसे मैं अच्छी तरह से जानता हूँ... रही उसे दुख पहुँचाने की बात... तो उसके लिए मुझे कोई अफ़सोस नहीं है... (कह कर अखबार पढ़ना चालू करता है)

टीलु - भाई वैसे दीदी ने क्या गलत कहा...

विश्व - अब तुम मुझसे इस बात पर बहस करना चाहते हो...

टीलु - बहस नहीं... तुमको समझना चाहता हूँ...

विश्व - क्यूँ... तुम्हें लगता है मैं गलत हूँ...

टीलु - नहीं... नहीं तुम गलत नहीं हो सकते... पर दीदी भी कहाँ गलत है...

विश्व - (अखबार एक किनारे रख देता है) याद है... इसी घर के बाहर... एक रात हमें मारने कुछ लोग आए थे...

टीलु - हाँ...

विश्व - अब यह वही लोग हैं... जो लोगों के बीच में घुल कर हमारे लिए... पत्ते बिछा रहे हैं...

टीलु - (हैरानी के साथ) क्या... (फिर उसे कुछ याद आता है) हाँ हाँ... तुमने कहा था... दुसरा हमला... यह लोग... भीड़ के आड़ में करेंगे... मतलब...

विश्व - (मुस्कराता है)

टीलु - पर भाई... यह बात दीदी को समझ में क्यूँ नहीं आ रही...

विश्व - याद है... तुम्हीं कहा करते हो... मेरी दीदी साक्षात अन्नपूर्णा है...

टीलु - हाँ...

विश्व - तो इस गाँव के हर चौखट में पलने वाली जिंदगी के लिए फिक्र तो करेगी ही...

टीलु - इसका मतलब वह पंचायत के सभा में जाएगी...

विश्व - बेशक जाएगी....

टीलु - ओह... कहीं दीदी पर कोई खतरा तो नहीं...

विश्व - देखो टीलु... उन लोगों को अच्छी तरह से मालूम है... चूंकि मेरा हुक्का पानी बंद है... इसलिए गाँव वाले मुझसे तो मदत पूछेंगे नहीं... गाँव के हर बच्चे बूढ़े को मालुम है... जहां औरत... छोटे बच्चे आयेंगे... मेरी दीदी वहाँ कुदेगी... और मेरी दीदी जहां पर होगी... मैं वहाँ पर होउंगा ही...

टीलु - मतलब तुम दोनों पर हमला हो सकता है....

विश्व - यह कोई छोटी प्लान नहीं है... किसी शातिर का दिमाग होगा इसके पीछे...

यह सब सुनने के बाद टीलु का सिर चकरा जाता है l वह कुछ सोचता है फिर वह रसोई में घुस कर कुछ ढूंढने लगता है l कुछ बर्तन गिरने की आवाज से विश्व का ध्यान रसोई के तरफ जाता है l टीलु बाहर आता है और विश्व को देखे वगैर बाहर चला जाता है l विश्व थोड़ा हैरान होता है और अपने भवें सिकुड़ कर कुछ सोचने लगता है और थोड़ी देर बाद खुदको नॉर्मल कर फिर से अखबार उठा कर पढ़ने लगता है l तभी विश्व की मोबाइल पर रिंग बजने लगती है l विश्व स्क्रीन पर नकचढ़ी देखता है l मुस्कराते हुए विश्व फोन उठाता है

विश्व - (छेड़ने के अंदाज में) हैलो

रुप - (थोड़ी सीरियसनेस के साथ) कहाँ हो..

विश्व - (उसी शरारती अंदाज में) आप ही बताइए... मुझे कहाँ होना चाहिए..

रुप - एक बात पूछूं..

विश्व - सिर्फ एक बात... सौ पूछिये..

रुप - तुम मुझे हमेशा... भाश्वती की गाड़ी लेकर आने के लिए क्यूँ कहते थे..

विश्व - (रुप की आवाज में उसे सीरियसनेस का अनुभव होता है) क्या हुआ...

रुप - मुझे पहले यह बताओ... तुम जब भी मुझे मिलने बुलाते थे... भाश्वती की गाड़ी में आने के लिए क्यूँ कहते थे...

विश्व - ताकि आप किसी की नजरों ना आयें... वर्ना आपका मुझसे मिलना... आपके परिवार वालों को पता चल जाता... क्यूँ क्या हुआ...

रुप - पता नहीं पर... मुझे लगता है... मैं अगर भाभी की गाड़ी में आती... तो शायद ठीक रहता...

विश्व - ऐसा सोचने की कोई वज़ह...

रुप - वज़ह है... वज़ह है... याद है उस कमीने को... जिसकी तुमने किन्नरों से जिल्लत करायी थी...

विश्व - हाँ...

रुप - मुझे लगता है... उसके आदमी... उस गाड़ी का पीछा करते हुए... यहाँ तक पहुँच गए हैं...

विश्व - अच्छा... ऐसा लगने की वज़ह...

रुप - (बनानी की पार्किंग वाली बात कह देती है)

विश्व - ह्म्म्म्म... तो इस बात से डर गई मेरी नकचढ़ी...

रुप - देखो... मैं इस वक़्त मज़ाक के मुड़ में नहीं हूँ... मुझे कुछ हो जाए तो वह मुझे मंजुर है... पर मेरी गलत फहमी में मेरी दोस्त को कुछ हो जाए... यह मुझे कतई मंजुर नहीं...

विश्व - तो नकचढ़ी जी... आप यह क्यूँ भूल रही हैं... भाश्वती आपकी दोस्त है... तो मेरी बहन भी तो है...

रुप - हाँ जानती हूँ... पर पता नहीं क्यूँ... मुझे डर सा महसुस हुआ आज भाश्वती के लिए...

विश्व - ओह देवा... क्या हो गया... मैं जिस नकचढ़ी को जानता हूँ... उसे तो दूसरों को डराते हुए देखा है... यह उल्टी गंगा कैसे बहने लगी...

रुप - देखो... मुझे अभी गुस्सा आ रहा है... तुम मेरी बात का सीरियसनेस को समझ नहीं रहे हो....

विश्व - मैं तो यही चाहता हूँ... के आप जब भी मुझसे बात करें... गुस्से को अपनी नाक पर बिठा कर बातेँ करें... कम से कम मुझे लगे तो सही... के मुझसे बात करने वाली मेरी नकचढ़ी है...

रुप शर्मा कर चुपके से हँस देती है और दुसरे हाथ से अपना चेहरा छुपा लेती है, विश्व को उसकी हरकत का एहसास हो जाता है

विश्व - शब-ए-वस्ल क्या जाने क्या याद आया

वो कुछ आप ही आप शर्मा रहे

रुप - (हैरान हो जाती है) क्या तुम मेरे आस-पास हो...

विश्व - पलकें बंद कर महसुस करो मैं हूँ

आपके ख़यालों में... ख्वाबों में... तसबुर में... एहसासों में... साँसों में...

मैं ही मैं हूँ...

रुप - मैं क्या पुछ रही थी... तुम तो शेरों शायरी ले बैठ गए... अरे हाँ याद आया... पहले यह बताओ... क्या मैं भाश्वती के लिए बेफिक्र हो जाऊँ...

विश्व - बेशक... क्यूंकि जो चीज़ हो या शख्स... आपसे जुड़ी हुई हो... उनकी हिफाजत मेरे जिम्मे.... खैर वह बात बताइए... जो अभी आपको याद आया...

रुप - क्या तुमने रहमान अंकल को तब्बसुम का नाम... मुशायरे के लिए सुझाया था...

विश्व - हाँ...

रुप - क्यूँ...

विश्व - आप उनके दोस्त हैं... पर उनके हुनर की कद्रदान नहीं हैं... जब मुझे उनकी हुनर की जानकारी मिली तो लगे हाथ सलाह दे डाली... तब्बसुम जी को सब ए नज्म मुशायरे में हिस्सा लेने के लिए....

रुप - हूँह्ह्ह्... बड़े आए.. हुनर पहचानने वाले... किसी की दिल की बातों को समझते भी हो...

विश्व - क्या करूँ... मुझसे पहले दिल की बात किसी और ने समझ ली... हम से तो देर बहुत हो गई... जब भी एहसास पुछा... बस एक ही जवाब आई... इट्स अ गर्ल थिंग...

रुप - ही ही ही... (खिल खिला कर हँस देती है) बेवक़ूफ़...

विश्व - और कुछ... आपकी पेश ए खिदमत में बंदा हाजिर है..

रुप - ठीक है... अब राज कुमारी जी... तुम्हें कल फोन पर सुबह संदेश भेजेंगे... बाय...

कह कर रुप फोन काट देती है l विश्व भी मुस्कुराते हुए फोन रखता है कि अचानक रुप की कही अंतिम शब्द उसके मुहँ पर आ जाते हैं

विश्व - सुबह को संदेश... शुभ संदेश..

विश्व फौरन उठता है और किताब की दुकान से लाए शुभ संदेश किताब निकाल कर अच्छे से जाँच करने लगता है l ज्यों ज्यों पन्ने पर पन्ने पलटने लगते हैं उसकी आँखे चौड़ी होने लगती हैं l वह तुरंत अपनी जगह से उठाता है, एक डायरि और पेन लेकर आता है और हर पन्नों से शब्द छान कर लिखने लगता है l कुछ देर बाद उसके सामने एक बड़ा सा संदेश था l विश्व उसे पढ़ने लगता है

" अगर तुम यह संदेश पढ़ रहे हो, मतलब तुम इससे पहले भी अखबारों में मेरे द्वारा भेजे गए संक्षिप्त संदेशों को पढ़ा होगा l तुम्हारे बारे में मुझे उस दिन मालुम हुआ जिस दिन राजा क्षेत्रपाल के महफ़िल में तुम्हारे बारे में चर्चा हो रही थी l कुछ सरकारी अधिकारी थे जिन्होंने राजा क्षेत्रपाल को यह संदेश दिया के जैल से निकल कर राजगड़ का पुर्व सरपंच विश्व प्रताप महापात्र रुप फाउंडेशन स्कैम पर एसआईटी की तहकीकात पर आरटीआई दाखिल किया है l यह समाचार बहुत से लोगों की आँखों की नींद उड़ा रखी है l तुम अपने जगह सही थे पर तुम्हारे आरटीआई दाख़िल करने से उन्हें अपनी भूल को सुधारने का मौका दे दिया तुमने l पुराने केस पर तुम्हें कामयाबी शायद ही मिले पर अब जितने भी नए आर्थिक अपराध हुए हैं या हो रहे हैं l मैं हर एक अपराध का सबसे अहम और प्रमुख गवाह हूँ l अपराध की हर कहानी मैं तुम्हें बता दूँगा पर साक्ष्य तुम्हें ढूँढना होगा l पर इन सब के लिए हमें एक बार आमने सामने हो कर मिलना होगा l तुम बाकायदा अखबार लाते रहना l मैं तुम्हें संदेश के जरिए ही मिलने का दिन और जगह बताऊँगा

तुम्हारा एक शुभ चिंतक

यह संदेश पढ़ कर विश्व डायरि को बंद करता है l तभी कमरे में टीलु आता है

टीलु - भाई... एक खबर है..

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शाम का समय, अखाड़े के एक कोने में शनिया और उसके पट्ठे रेत में भिड़े हुए हैं l सब के सब दाव पर दाव लगाते हुए एक दुसरे को पछाड़ने की कोशिश कर रहे थे l अखाड़े के सामने रोणा अपनी जीप को रोकता है l शनिया मुड़ कर देखता है रोणा जीप से उतर कर उन्हीं के तरफ आ रहा था l रोणा जैसे ही शनिया के सामने खड़ा होता है, शनिया उसे एक जोरदार सलाम टोकता है l रोणा उन सबकी तैयारी देख कर

रोणा - बड़े उतावले लग रहे हो... इस हड्डी तोड़ तैयारी की क्या जरूरत है...

शनिया - दरोगा बाबु... एक बात तो हमें अच्छे से समझ आ गई... दिमाग उसका प्रधान बाबु के जैसा है... ताकत में किसी अड़ियल सांढ के जैसा है... ऐसे दुश्मन से... दिमाग से ही निपटाया जा सकता है... और किसी भी प्रकार से संभलने का मौका देना नहीं चाहिए...

रोणा - ह्म्म्म्म... दुश्मनी बहुत गहरी है... क्यूँ...

शनिया - यह हराम का जना... कुत्ता था... हमारे झुटन पर पलता था... हमारा थूक चाटता था...

रोणा - था... था शनिया था... वह इतिहास है शनिया... अब कि बार उसने तुम सबकी भूगोल बदल कर रख दिया है...

शनिया - मगर इस बार भूगोल उसका बदलेगा... उसे हमेशा हमेशा के लिए इतिहास हम बना देंगे...

रोणा - हूँ... कैसे... क्या करोगे... तुम भुल रहे हो... गाँव में उसका हुक्का पानी बंद है... वह गाँव वालों के झमेले में क्यूँ पड़ेगा...

शनिया - क्या... दरोगा बाबु... बताया तो था आपको... वह भी राजा साहब के सामने...

रोणा - हाँ... तुमने कहा तो है... पर...

शनिया - पर आप पुष्टि कर लेना चाहते हैं... ऐतिहात बरतने के लिए क्यूँ...

रोणा - हाँ... ऐसा समझ सकते हो... फिर भी... तुम लोगों का प्लान क्या है...

शनिया - हमारे पचासों आदमी भीड़ में बिखरे रहेंगे... वह भी हथियारों के साथ...

रोणा - बे भोषड़ी के... तुम लोग ऐसा क्या करोगे के विश्वा बहस में कुदेगा....

शनिया - अरे साब... हम छह सात दिनों से... पत्ते बिछा रहे हैं... विश्वा जब अपने घर में बंद अपने काम में मसरूफ था... हम कर्ज की बात बता कर... सबके घर में मियाँ बीवी के बीच झगड़ा सुलगा चुके थे... कल ही सबके घरों में... कर्ज वाली काग़ज़ और रसीद पहुँचा दिए... और कर्ज माफी के लिए शर्त यह रखा है... की उनके घर की लड़कियों को... हमारे अड्डे पर या घरों पर एक साल तक काम करना होगा...

रोणा - क्या... यह सब भी काग़ज़ों में लिख कर दिए हो...

शनिया - क्या बात कर रहे हैं दरोगा बाबु... ऐसी बेवक़ूफ़ी... वह भी लिखावट में... हमने तो मुहँ जुबानी कह रखा है... जिसे पंचायत में मोहर लगवाएंगे...

विश्व - तो विश्व इस मामले में क्यूँ कर कुदेगा...

शनिया - अरे साब आप तो कभी कभी राजगड़ आते थे... वह भी बुलावे पर... इन कुछ सालों में... वैदेही ही लोगों की छुट मुट खर्च उतार रही थी... और उनको बचा भी रही थी... इस बार भी वैसा ही होगा... वैदेही इन हराम खोरों के लिए पंचायत में हमसे और सरपंच से पक्का लड़ जाएगी... आज भी गाँव के कुछ मर्दों की नजर में वैदेही एक रंडी है... वह लोग नफरत करते हैं वैदेही से... उन लोगों के करीब रह कर मेरे आदमी उनको उकसायेंगे... जैसे ही बहस बढ़ेगी... वैसे ही वैदेही की जिल्लत बढ़ेगी... आखिर भाई है वह... कब तक शांत रहेगा... वह भी मैदान में उतरेगा... तब हम गाँव वालों के तरफ से विश्वा पर हमले के लिए बुलवा देंगे... फिर हर तरफ़ से हथियारों के साथ विश्वा पर टुट पड़ेंगे...

रोणा - ह्म्म्म्म... प्लान तो बढ़िया है... पर हथियार क्यूँ... लाठी डंडो से क्यूँ नहीं...

शनिया - (एक सरसरी भरी साँस छोड़ते हुए) पिछली बार हम समझ गए... इस बार विश्वा को जिंदा नहीं छोड़ना है... आइए दिखाता हूँ...

शनिया अखाड़े के दुसरे किनारे पर रोणा को ले जाता है l रोणा देखता है वहाँ पर एक भट्टी लगा हुआ है जहां कुछ लोहार तरह तरह के हथियार बना रहे हैं l रोणा देखता है दरांती, खुखरी, कुल्हाड़ी, करणी, कुदाल, बेलचा बना रहे हैं l

रोणा - क्या मज़ाक है... तुम विश्वा पर इन से हमला करोगे...

शनिया - हाँ दरोगा बाबु... क्यूंकि आपको रिपोर्ट बनाना है... विश्वा पर हमला गाँव के आम किसानो ने किया... जब लोग इन हथियारों से विश्वा पर टुट पड़ेंगे... तब...

रोणा देखता है शनिया के चेहरे पर शैतानी चमक आ जाती है, शनिया जाकर एक ढाई फिट लंबा तलवार निकालता है l जो भट्टी में जल रही आग की रौशनी से चमक रही थी l

शनिया - यह मैं अपने साथ छुपा कर पंचायत में लेकर जाऊँगा... इसीसे उस हरामजादे को टुकड़ों में काट डालूंगा...

रोणा - नहीं... तुम ऐसा नहीं करोगे...

शनिया - (हैरान हो कर) क्यूँ... ओ समझा... आप उसे गोली मारना चाहते हो...

रोणा - नहीं... तुम्हें वह करना है... जिससे राजा साहब तुम पर बहुत खुश होंगे...

शनिया - अच्छा... राजा साहब विश्वा को जिंदा छोड़ने पर खुश होंगे...

रोणा - जानते हो... मैं भी सात साल पहले विश्वा को गोली मार सकता था... पर मारा नहीं... क्यूंकि राजा साहब चाहते थे... विश्वा जब जैल से छूटे... गली गली रेंगते हुए भीख मांगे... इसलिए उसे जान से मारने के बजाय.. (लहजा बदल जाता है) लंगड़ा लूला टौंटा बना कर छोड़ना.. ताकि वह जिंदगी भर एक जगह बुत की तरह बैठा रहे... हो सके तो उसकी जुबान भी काट देना... पर अंधा मत करना... उसे बहुत कुछ देखना है... मरते दम तक... उसे सिर्फ देखते ही जीना है... ना कुछ कह पाए... ना कुछ कर पाए... सिर्फ देखता रहे... (अचानक एक चुप्पी छा जाती है दोनों के बीच, कुछ देर की चुप्पी के बाद) क्या तुम... तुम्हारे लोग कर पाओगे... विश्वा से उलझ चुके हो तुम लोग... अगर उसने पलटवार किया तो...

शनिया - हाँ दारोगा बाबु हाँ... हम विश्वा के आँखों में मिर्ची झोकेंगे... फिर उसका काम तमाम करेंगे...

रोणा - इतना कुछ सोच रखा है... क्या मेरा वहाँ होना जरूरी है...

शनिया - सरपंच ने कहा था... आपका वहाँ होना... जरूरी है... आप विश्वा को ना सिर्फ पलटवार करने से रोकेंगे... बल्कि उन लोगों को भी रोकेंगे... जो लोग गलती से विश्वा के लिए आगे आयेंगे....

रोणा - ह्म्म्म्म... बहुत खूब... और यह सब तुमने राजा साहब से कही...

शनिया - जी नहीं... यह सब... सरपंच और भीमा ने मिलकर तब कही थी.... जब राजा साहब ने हमारी मार खाने की बात... हमसे ही उगलवा ली थी...

रोणा - ठीक है फिर... परसों मैं पंचायत भवन पहुँच जाऊँगा... तब तक ना तो तुम लोग मुझसे मिलों... ना ही मैं तुम लोगों से मिलूंगा...

शनिया - ठीक है साब... जैसा आप कहें...

रोणा वहाँ से निकल जाता है l शनिया वहाँ खड़ा हो कर रोणा को जाते हुए देख रहा था l तभी उसके पास शुकरा आता है l

शुकरा - क्या बात है शनिया भाई... क्या कह रहा था दरोगा...

शनिया - कुछ नहीं... बोल रहा था... विश्वा को जान से ना मारने के लिए...

शुकरा - क्या... पर क्यूँ...

शनिया - हमें क्या... (शैतानी चमक उसके आँखों में नाचने लगती है) हम तो विश्वा को एक कुत्ते की मौत मारेंगे... उसके इतने टुकड़े करेंगे... के वैदेही बटोरते बटोरते बुढ़ी हो जाएगी... हा हा हा हा...

उधर रोणा की जीप उसके क्वार्टर के सामने रुकती है l वह उतर कर अपने क्वार्टर के दरवाजे के सामने खड़ा होता है l जेब से सिगरेट पैकेट निकाल कर एक सिगरेट मुहँ में लेकर लाइटर ढूंढता जलाने के लिए पर उसे लाइटर नहीं मिलता तो चिढ़ कर सिगरेट जेब में वापस रख देता है l फिर क्वार्टर का दरवाजा खोल कर अंदर आता है l अंदर आते ही लाइट जलाता है उसके बाद कॉबोर्ड से एक शराब की बोतल निकलता है और ढक्कन खोल कर सीधे गटकने लगता है l आधी बोतल ख़तम करने के बाद बोतल डायनिंग टेबल पर रख देता है l उसे डायनिंग टेबल पर लाइटर दिख जाती है l वह जेब से सिगरेट निकाल कर लाइटर से जलाता है l कुछ कस खिंचने के बाद एक शैतानी मुस्कान उसके होंठो पर नाचने लगती है l वह सोफ़े के पास आता है और टी पोए के उपर से चादर खिंच कर हटाता है और अपना सिगरेट को टी पोए पर मसलने वाला होता है कि रुक जाता है l क्यूंकि कल तक उस टी पोए के सन माइका पर विश्व का फोटो था, पर आज उसका फोटो है l यह देख कर उसका नशा उतर जाता है l वह सिगरेट की आँच को अपने हाथ पर लगाता है l

'आह' उसके मुहँ से निकल जाता है l उसे समझ में आता है ना तो वह नींद में है ना ही नशे में l ठीक उसी वक़्त उसके कानों में आवाज पड़ती है

"कैसे हो मेरे राजा"

वह तुरंत उस आवाज के दिशा में मुड़ जाता है l देखता है टीवी पर उस किन्नर की चलती वीडियो पॉज हुआ प़डा है l बड़ी मुश्किल से अपना थूक निगलता है l उसके मुहँ से निकल जाता है

- विश्वा...

विश्व - वाव वाव... क्या बात है... मैं यहाँ हूँ... तुने पता कर लिया...

रोणा - (होलस्टर से गन निकाल कर विश्व पर तानते हुए) यहाँ क्यूँ आए हो...

विश्व - जानता है... किसी की मौजूदगी का यूँ एहसास कौन कर लेता है... या तो वह दिलबर हो... या फिर दुश्मन...

रोणा - मैं तेरा दुश्मन...

विश्व - क्या दुश्मन... चल हट... तु कभी किसीके प्यार की काबिल हो नहीं सकता... और दुश्मनी की लायक है नहीं... पर क्या करें... कुत्ता पागल हो जाए... तो किया क्या जा सकता है...

रोणा - क्या करने आए हो...

विश्व - गन हटा बे... (रोणा गन को विश्व के चेहरे पर ले आता है, तभी उसके कानों में फिर सुनाई देता है "कैसा है मेरे राजा" l यह सुनते ही रोणा गन को नीचे कर लेता है) सुन बे घन चक्कर... जब तु भुवनेश्वर में ही मुझ पर गोली नहीं चला सका... तो यहाँ क्या उखाड़ लेगा बे...

रोणा - तु मुझे ब्लैक मेल कर बड़ा मर्द बन रहा है... इस वीडियो के आड़ में... वर्ना...

विश्व - हाँ वर्ना... वर्ना क्या... तु तो बड़ा मर्द है ना...सुन बे भोषड़ी वाले... तेरे बदन पर वर्दी और सिर पर क्षेत्रपाल का हाथ के आड़ में तुने बड़े मर्दाना काम किया है... है ना... कभी यह वर्दी उतार कर... क्षेत्रपाल का ढाल छोड़ कर... किसी आम आदमी से भीड़ के देख... यकीन मान.. जितनी भी मर्द होने की गुमान है... वह एक पल में दुर हो जाएगी... (रोणा फिर से गन तान देता है) यह बार बार क्या ड्रामा कर रहा है बे... इसे सीने पर खाने के लिए जो जिगर चाहिए... वह मेरे अंदर है... पर इसे चलाने के लिए जो कलेजा चाहिए... वह कलेजा दुर... तुझमें दिल गुर्दा फेफड़ा तक नहीं है... तु खोखला है अंदर से... अगर तुझ में जिगर होता... तो तु मेरी तस्वीर को सिगरेट से जलाने के लिए... चादर के नीचे ढक कर नहीं रखता... (अखबार निकाल कर उसे देते हुए) यह ले इसे पहले पढ़...

रोणा उस पेपर में देखता है कि नभ वाणी न्यूज चैनल वालों ने इनाम की घोषणा उन के लिए की है जो भी ट्रैफ़िक पर हुए किन्नर समावेश में हुए उस आदमी के बारे में सटीक जानकारी देगा l यह न्यूज देख कर रोणा पुरा का पुरा पसीना पसीना हो जाता है l उसके हाथ पैर कांपने लगते हैं l

विश्व - जरा सोच यह खबर जब टेलीकास्ट होगी... तब पुरे ब्रह्मांड को तेरे विषय में मालुम पड़ेगा... कितना फेमस हो जाएगा...

रोणा - (गले से मुश्किल से आवाज़ निकालते हुए) क्यूँ आए हो यहाँ... क्या.. क्या चाहते हो मुझसे...

विश्व - बस इतना.. तु.. या तेरे थाने का कोई भी... पंचायत भवन तो दुर... उसके आसपास नजर नहीं आने चाहिए... (रोणा की आंखे फैल जाते हैं) हाँ कुत्ते हाँ... तु या तेरे कोई भी आदमी मुझे उस दिन पंचायत भवन में नजर नहीं आने चाहिए... और सुन जब तक तु मेरे बातों पर चलता रहेगा... तेरे राज... राज ही रहेंगे... जिस दिन तुने अपनी कुत्ता गिरी के चलते मुझ पर भौंकने की कोशिश भी की... उसी दिन पुरी दुनिया के सामने... तेरा राज खुल जाएगी...

रोणा - सरपंच ने... लिखित में... पुलिस की मौजूदगी मांगी है...

विश्व - फिर भी तु या तेरे थाने का कोई मुझे वहाँ पर दिखने नहीं चाहिए...

कह कर विश्व टीवी के पास जाता है और पीछे से पेन ड्राइव निकाल कर चला जाता है l विश्व के जाने के बाद रोणा धप कर सोफ़े पर बैठ जाता है l

रोणा - एक मौका... सिर्फ एक मौका... तुझे अगर इन राजगड़ के गालियों में पेट के बल रेंगने को और मौत मांगने को मजबूर ना कर दिया... तो मेरा नाम अनिकेत रोणा नहीं....

तभी उसका मोबाइल बजने लगती है l वह निरस मन से मोबाइल निकाल कर देखता है स्क्रीन पर टोनी डिस्प्ले हो रहा था l टोनी का नाम देख कर उसके आँखों में एक चमक उभर जाती है l वह झट से कॉल उठाता है l

रोणा - हैलो...

टोनी - रोणा सर...

रोणा - हाँ क्या खबर निकाला तुमने...

टोनी - आपने जिस गाड़ी की मॉडल और नंबर दिया था... उस गाड़ी का पता चल गया है... पर

रोणा - पर क्या...

टोनी - वह गाड़ी जिस लड़की का है... उसका नाम नंदिनी नहीं है... बल्कि भाश्वती है... और वह xxxx कॉलेज में साईंस फर्स्ट ईयर की स्टूडेंट है... और भाश्वती वह लड़की नहीं है... जिसकी फोटो आपने मुझे दी थी...

रोणा - (चिल्लाते हुए) क्या बकते हो... (उठ खड़ा होता है)

टोनी - सच कह रहा हूँ रोणा बाबु...

रोणा - तो उस लड़की की बहन या कोई रिश्तेदार भी तो हो सकती है...

टोनी - जी मैंने... सब छान लिया है... भाश्वती के माँ के नाम पर वह गाड़ी है... वह अपनी माँ बाप की इकलौती बेटी है... हमने सोचा शायद नंदिनी भी उसी कॉलेज में पढ़ती हो... पर नंदिनी की फोटो कॉलेज में किसी ने भी नहीं पहचाना...

रोणा - (गुस्से से पुरा जिस्म थर्राने लगता है, बड़ी मुश्किल से पूछता है) ह्म्म्म्म... और...

टोनी - वह... मेरे नए आइडेंटिटी के बारे में...

रोणा - सुन बे हरामी... जिस दिन उस लड़की की पता ढूंढ निकालेगा.... उस दिन मुझे फोन करना... और हाँ जल्दी करना... मेरी सब्र टूटने से पहले तक... वर्ना उसके बाद.....

रोणा फोन काट देता है, और गुस्से से छटपटाते हुए मोबाइल को फर्श पर पटक देता है l और बालों को नोचते हुए सोफ़े पर फैल जाता है
 
शुक्रिया मेरे दोस्त आपका बहुत बहुत शुक्रिया

हाँ इनकी इस आत्मीयता का वज़ह भी है

चूंकि दोनों बचपन से ही घर से बाहर रहकर पढ़ाई किए थे और साथ रहे थे

हाँ अब वीर की परेशानी काफी बढ़ जाने वाली है

थैंक्स दोस्त

हाँ वैदेही को गाँव वालों की बहुत चिंता है जिसकी वज़ह से विश्व गाँव का सरपंच बना था l

शुक्रिया मेरे दोस्त

हाँ यही हार रोणा को और भी उग्र बनाता रहेगा

रवि वार को आएगा
 
यह मत भूलिए

पिनाक ने किसी को अनु की सुपारी दी है

यह क्या झोल झाल है यह कुछ अपडेट के बाद मालुम होगा

इसके पीछे एक विशेष राज है

जिसको बाद में जोडार के सामने विश्व राज खोलेगा

बेशक

कोई शक़ नहीं पर यह चरित्र कहानी में आ चुका है

विश्व से जब भेंट होगी तब आपको मालुम पड़ेगा

हाँ यह बात तो आपने सही कही

विश्व का प्रमुख टार्गेट राजा क्षेत्रपाल है जिसे कानून व्यवस्था के जरिए सजा देना चाहता है

पर दूसरों के लिए अलग प्लान बना रखा है

पर SANJU ( V. R. ) भाई राजगड़ में क्षेत्रपाल परिवार से उत्पीड़ित और प्रताड़ित कोई भी खुद्दार नहीं है l

बाकी विश्व अपने हिसाब से अपना काम किए जा रहा है

धन्यवाद मेरे बंधु मेरे भाई मेरे दोस्त आपका बहुत बहुत शुक्रिया तह दिल से आभार
 
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