Thriller "विश्वरूप" ( completed ) - Page 18 - SexBaba
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Thriller "विश्वरूप" ( completed )

भाई मेरे मैं कहानी को कहानी की तरह पढ़ना चाहता हूँ l कोई भी चरित्र कैसा भी चरित्र हो मैं उसमें लॉजिक ढूंढता हूँ l इसलिए इस बेशक इस फोरम में अनगिनत कहानियाँ हैं पर मैं चुनिंदा कहानियों को पढ़ता हूँ l और हमेशा देवनागरी लिपि को प्राथमिकता देता हूँ l मेरी इस कहानी को अवश्य खत्म करने जा रहा हूँ पर फिर भी क्लाईमेक्स बिना पैर सिर के नहीं होगी इतना आश्वासन देता हूँ l आपकी कहानी मैं अवश्य पढ़ूंगा क्यूँकी आपकी कहानी सर्टिफाइड है
 
हाँ यह बात बहुत से पाठकों ने पहले से ही अनुमान लगा लिया था

बस अगले अपडेट का इंतजार कीजिए वैसे कल देर रात तक पोस्ट कर दूँगा

हाँ पर जैसे कि शुभ्रा ने कहा विश्वा किया वही जो राजा चाहता था पर हुआ नहीं जैसा राजा चाहता था

हाँ भाई सत्तू है तो बहुत होशियार l

विश्वा से हार का खीज उसने केके पर उतारा

भाई सिस्टम में अभी भी भैरव सिंह का रौब और रुतबा काफी हद तक कायम है

हाँ यह भी कोर्ट में एक प्रोसिजर है जुडिशरी सिस्टम में ह्युमनटरीन ग्राउंड में ऐसे केस को कंसिडर किया जा सकता है l भैरव सिंह इसी बात का फायदा उठा रहा है
 
👉एक सौ इकसठवाँ अपडेट

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राज्य के बहु चर्चित राजगड़ मल्टिपल को-ऑपरेटिव सोसाइटी आर्थिक व आपराधिक मामलों पर आज स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई शुरु किया गया l अदालत में प्रोसिक्यूशन के लिए वादी पक्ष के गवाह, वकील विश्व प्रताप महापात्र और इस केस में तहकीकात करने वाले एक्जिक्युटीव मैजिस्ट्रेट श्री नरोत्तम पत्री जी उपस्थित थे, केस के शुरुआत में वादी पक्ष के वकील विश्व प्रताप महापात्र ने केस के संबंधित गवाह और मैजिस्ट्रेट श्री नरोत्तम पत्री की कानूनी सुरक्षा की मांग की l जिस पर अदालत शायद कल अपना फैसला सुनाए l पर अपनी डिफेंस स्वयं करने की मांग कर स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट को यशपुर लाने वाले राजगड़ के राजा, सम्मानीय राजा साहब श्री भैरव सिंह क्षेत्रपाल जी निजी कारण उल्लेख कर कोर्ट की कारवाई को अतिरिक्त सात दिन आगे करने के लिए अनुरोध किया है l

हमने जब वह निजी कारण के बारे में जानकारी प्राप्त करने की कोशिश की तो सूत्रों से पता चला है कि बीते कल उनकी सुपुत्री की मंगनी तय की गई थी l पर ऐन मौके पर मंगनी की रस्म के कुछ ही समय पूर्व वर लापता हो गए हैं l आश्चर्य की बात यह है कि वर वधु से उम्र में काफी बड़े हैं और कटक भुवनेश्वर ट्विन सिटी के नामचीन बिल्डर हैं, श्री कमल कांत महानायक उर्फ केके l पर हैरानी की बात यह है कि राजगड़ के गाँव वाले इसे मंगनी के बजाय शादी कह रहे थे l और वर शादी की मंडप छोड़ कर भाग गया है l खैर जो भी हो इतना अवश्य सच है की राजगड़ के महल में एक अनुष्ठान हो रहा था पर उसमें वर की अनुपस्थिति के कारण बाधा उत्पन्न हो गया l यह निःसंदेह किसी भी पिता के लिए दुःख का कारण है l इसलिए अदालत राजा साहब को मनःस्थिति को समझते हुए इस केस में रियायत बरतने के लिए निर्णय किया है l कल अदालत उन्हें कितने दिन की रियायत देती है यह पता चलेगा l पर चूँकि राज महल से वर लापता हुआ है और राजा साहब ने थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करायी है, अदालत ने पुलिस को अतिशीघ्र इस पर रिपोर्ट प्रस्तुत कर अदालत में पेश करने का आदेश दिया है l

पुलिस ने भी अपनी तहकीकात तेज कर दी है l अब तक के लिए इतना ही l मैं सुप्रिया कुमारी रथ प्राइम टाइम बुलेटिन नभ वाणी से l नमस्कार

वैदेही टीवी बंद कर देती है l पीछे मुड़ कर देखती है विश्वा और उसके सारे दोस्त खाना खा रहे थे l पाँचों की ध्यान सिर्फ खाने पर थी l वैदेही उनसे अपना ध्यान हटा कर गौरी की तरफ देखती है l गौरी बड़ी गहरी चिंतन में खोई हुई थी l

वैदेही - क्या हुआ काकी... क्या सोच रही हो... कहाँ खो गई हो...

गौरी - (अपनी सोच से बाहर आती है) नहीं... कुछ भी तो नहीं...

वैदेही - सुबह से देख रही हूँ... तुम खोई खोई सी रहने लगी हो...

टीलु - क्यूँ नहीं रहेगी बोलो... अरे दीदी... हम सब दावत खाने चले गए... बुढ़िया को यहीं छोड़ गए... कम से कम... कुछ पकवान तो लाने चाहिए थे ना...

गौरी - मुहँ बंद कर नाशपीटे...

टीलु खी खी कर हँसने लगता है l पर गौरी की चेहरा देख कर वैदेही टीलु के तरफ देख कर आँखे दिखा कर चुप रहने के लिए कहती है l

वैदेही - क्या हुआ काकी...

गौरी - (वैदेही की तरफ़ देख कर) वैदेही... मैंने... इन क्षेत्रपालों की दरिंदगी देखी है... तुमने झेला भी है... तुम सांप पर विश्वास कर सकती हो... पर इन क्षेत्रपालों को... हरगिज नहीं..

वैदेही - पर अब हुआ क्या है काकी...

गौरी - देखना... राजा कुछ ना कुछ करके... केस की सुनवाई को... खिंचता जाएगा... और धीरे धीरे अपने दुश्मनों को... निपटाता जाएगा... तुझे क्या लगता है... वह दूल्हा जो ग़ायब है... वह कभी मिलेगा... नहीं... वह अब कभी भी... दुनिया के सामने नहीं आएगा... क्यूँकी... मैं दावे के साथ कह सकती हूँ... वह अब तक... आखेट गृह के जानवरों का निवाला बन चुका होगा...

विश्व - (खाना खा चुका था, हाथ धो कर वैदेही के पल्लू से हाथ साफ करते हुए) तो काकी... क्या आपको... उस वर के गायब होने का दुख है...

गौरी - नहीं... शायद हाँ... ऐसा लग रहा है... जैसे कोई बवंडर आने वाला है... जिसके लिए... राजा ने दरवाजा खोल दिया है... कई जिंदगियां अब तहस नहस होने वाले हैं...

विश्वा - काकी... अगर वह केके... अब इस दुनिया में नहीं है... तो यह भी सच है कि... उसकी मौत की मातम मनाने वाला कोई है भी नहीं... और वह कोई संत महात्मा तो था नहीं... बेग़ैरत... बेईमान... मतलब परस्त था... बुढ़ापे में... राजा जैसे सांप की बात मान कर... एक कम उम्र की लड़की से शादी करने बेशरमो की तरह दौड़ा चला आया...

सीलु - हाँ... उसके साथ जो भी हुआ होगा... वह उसकी कर्मों का फल होगा... वही उसकी किस्मत में लिखा था... जिसे उसीने ही चुना था...

टीलु - हाँ... (वैदेही की पल्लू से अपना हाथ पोछते हुए) वह कहावत है ना... सांप की फन से... जो अपना पिछवाड़ा खुजाएगा... वह यम दर्शन किए बिना कहाँ जाएगा...

वैदेही - यह कहाँ की कहावत है...

टीलु - क्या दीदी... आपने कभी सुना नहीं...

सीलु - (टीलु के सिर के पीछे एक टफली मार कर) हमने भी नहीं सुना... किसने कहा था... कब कहा था...

टीलु - तुझे भी नहीं पता... एक महान... आदमी ने कहा था...

विश्व - ऐ.. ज्यादा सीन मत बना... अब बोलो कौन महान आदमी था...

टीलु - क्या... मैंने था... कह दिया... सॉरी सॉरी... एक महान आदमी ने कहा है...

वैदेही - ओ... अब मैं समझ गई... और वह महान आदमी तु है...

टीलु - वाह दीदी वाह.. (सबसे) देखा... दीदी समझ गई...

विश्व और बाकी मिलकर टीलु झुका कर दो चार घुसे बरसा देते हैं l वैदेही उन सबको रोकती है l टीलु वैदेही के पीछे छिप जाता है l तभी दास सादे कपड़े में वहाँ पर आता है l

विश्व - क्या बात है दास बाबु... आप... अचानक यहाँ..

दास - तुम लोगों की बातेँ बाहर तक सुनाई दे रही थी... बात तो सच है... केके गायब है... मुझे उसे ढूढ़ना है... और रिपोर्ट बना कर... अदालत में पेश करना है...

विश्व - आपने जैसा रिपोर्ट... अनिकेत रोणा पर बनाया था... वैसा ही रिपोर्ट इस गुमशुदगी पर बना कर अदालत में पेश कर दीजिए...

दास - यह लास्ट ऑप्शन है... क्या और कोई रास्ता है... इस
बार... भैरव सिंह... मुझ पर हावी होने की कोशिश करा है... मैं ज़वाब में उस पर हावी होना चाहता हूँ...

विश्व - दास बाबु... रिपोर्ट एक दिन में नहीं बनती... आप भी कुछ दिनों की मोहलत मांगिये... फिर तहकीकात शुरु कीजिए... क्यूँकी... भैरव सिंह ने... एसपी ऑफिस से... केके की जान को खतरा बता कर... पुलिस को बाराती बनाया था... पर केके तो... महल के भीतर से गायब हुआ है ना... वह भी... भैरव सिंह के अपने सिक्युरिटी के बीच...

दास - (मुस्करा देता है) समझ गया... मुझे क्या करना है... अच्छी तरह से समझ गया...

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अगले दिन सुबह क्षेत्रपाल महल के छत पर व्हीलचेयर पर नागेंद्र सिंह को बिठा कर कुछ नौकर रुप के दिखाए जगह पर रख देते हैं l रुप सबको नीचे जाने के लिए कहती है, जो नौकर नागेंद्र को लाए थे वह सब नीचे चले जाते हैं l रुप व्हीलचेयर को धकेल कर छत पर थोड़ी दूर लेकर आती है l जहां से पूरा गाँव दिख रहा था l सुबह की नरम धूप के रंग में रंगी गाँव बहुत ही खूबसूरत दिख रहा था l

रुप - (चहकते हुए) देखो दादाजी... कितना सुंदर यह गाँव है... पर दूर से... (चेहरा संजीदा हो जाता है) आप लोगों की... झूठी अहं के चलते... इस गाँव की अंदर की पिंजर... ढांचा और जिंदगी... बदसूरत हो गई है... पर... पर अब बदलेगा... या यूँ कहूँ... बदल रहा है... (नागेंद्र की तरफ मुड़ कर) क्यूँकी अब इस महल की रौनक छूट रहा है... जाहिर है... वह रौनक... खुशियाँ... अब धीरे धीरे... गाँव में बसने वाली है... या यूँ कहूँ... शायद... बसने लगी है...

लकवाग्रस्त अपाहिज सा नागेंद्र की ओर मुस्कराते हुए रुप देखती है l नागेंद्र के आँखों में रुप के लिए गुस्सा झलक रहा था l रुप नागेंद्र की भावनाओं को दरकिनार कर नागेंद्र से कहती है l

रुप - दादाजी... आपमें ना... ताकत बहुत है... बेकार में मुझ पर गुस्सा कर... ताकत को जाया कर रहे हो... इसी गुस्से को... अगर खड़े होने के लिए... इस्तमाल किए होते... तो शायद.. अब तक खड़े भी हो गए होते... (नागेंद्र अपनी टेढ़ी मुहँ से गुँ गुँ कर रुप को झिड़कने लगता है) वैसे... जानते हैं... मैं पिछले दो दिनों से बहुत खुश हूँ... अपनी खुशी को आज मैं आपके साथ बाँटने इस छत पर लाई हूँ... अगर चाची या भाभी होतीं... तो उनसे यह खुशी शेयर कर रही होती... बार बार कर रही होती... नाच रही होती झूम रही होती... वह क्या है ना... लड़कियाँ अपनी खुशी को... ज्यादा देर तक पेट में... दबा कर नहीं रख सकती... इसलिए किसी को भी... बता देना बहुत जरूरी होता है... अब इस महल में... आप से बेस्ट कौन हैं... जिनसे अपनी दिल की बात कही जाए... और सबसे छुपाई भी जाए.... जानते हैं... राजा साहब... मेरे अनाम... पर अपनी भड़ास... अपनी खीज निकालने के लिए... ओर अपनी बेटी को.. उसकी नाफरमानी और बदतमीजी को... सबक सिखाने के लिए... एक बुढ़े लंगुर से शादी तय कर दी थी... हूँह्ह... मुझे और मेरे अनाम को नीचा दिखाने के लिए... मेरे दोस्तों को कटक और भुवनेश्वर से झूठ बोल कर उठा लाए थे... क्यूँकी जाहिर है... इस शादी के खिलाफ विक्रम भैया... चाचा चाची सभी थे... राजा साहब को यह लगा... उनकी इस कदम पर... सब मेरे लिए पैरों में गिर कर गिड़गिड़ाएंगे... पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ... जो जो रस्में... भैया... चाचा चाची को निभाने चाहिए थे... उन्हीं रस्मों को निभाने के लिए... मेरे दोस्तों से कहा गया... पर वह कहते हैं ना... बाप से बढ़कर बेटा... विकी भैया ने ऐसा खेल खेला... के राजा साहब को जब पता चलेगा... यकीन मानिये दादा जी... उनको तो हार्ट अटैक आ जाएगा...

भैया ने इस खेल में... मेरे दोस्तों को भी शामिल कर दिया... और जानते हैं... अनाम के दोस्त... उस चिरकुट लंगुर को... महल अंदर आए और महल में ही कहीं छुपा दिया... जिसे राजा साहब... अपने नाकारे निकम्मे पहरेदारों के साथ... इंस्पेक्टर दास को लेकर... अंदर ढूढ़ने लगे... तभी... भैया ने मेरे भाई होने का रस्म अदा किया... आह...(झूम कर घूम जाती है) क्या कहूँ दादाजी... पहले तो भैया ने गाँव वालों को वहाँ से भगा दिया... ताकि कोई गवाह ना बन जाएं... फिर.. चाची से नए जुते लेकर... अनाम को पहना दिया... हा हा हा... अनाम भी भौचक्का रह गया... क्यूँकी अनाम तक को पता नहीं था... क्या हो रहा था... चाचा ने अपनी जेब से खंजर निकाल कर अनाम के हाथों में थमा दिया... चाची के पास मेरे सहेलियाँ भागते हुए आईं... आरती और तिलक की थाली दी... चाची ने अनाम की आरती उतारी और तिलक भी लगाया... तब तक... अंदर से इंस्पेक्टर भी आ गया... अपने साथ लाए फोर्स को... विवाह बेदी तक... दो लाइन में खड़ा कर दिया... और अनाम को... वैदेही दीदी ने... हाथ थाम कर... उन पुलिस वालों के बीच से लेकर आईं... मेरे बगल में बिठा दिया... (एक गहरी साँस छोड़ते हुए) हूँ ह्म्म्म्म... वैदेही... आपको... याद है ना दादाजी... पाईकराय खानदान की अंतिम चराग... जिसकी आह अब क्षेत्रपाल घर परिवार सबको जला रही है... खैर... फ़िर भैया ने... (चहकते हुए) पंडित से... जल्दी जल्दी मंत्र पढ़वाया... फटा फट... जल्दी जल्दी... बिल्कुल राजधानी एक्सप्रेस की तरह... फ़िर अग्नि के फेरे भी लगवा दिए... और... (गले में मंगलसूत्र निकाल कर दिखाती है, और अपनी भौंहे नचा कर) अनाम मेरे गले में मंगलसूत्र पहना दिया... अब मैं... क्षेत्रपाल नहीं रही... मैं अब... (बड़े एटीट्यूड के साथ) रुप नंदिनी विश्व प्रताप महापात्र हूँ... अब मैं विश्व की हो गई हूँ... हम अब विश्वरूप हैं... विश्वरूप...

नागेंद्र की आँखे बड़ी और फैली हुई दिखने लगी थी l मुहँ फाड़े हैरत भरे नजरों से रूप को अबतक सुने जा रहा था l उसके चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे वह कोई असंभव सी बात सुन लिया हो l रुप मुस्कराते हुए पूछती है

रुप - आपकी हालत समझ सकती हूँ... आपको यकीन नहीं हो रहा है... पर यह सच है... उतना ही सच... जितना कि सूरज का निकलना... हमारी साँसे चलना... यह देखिए... (अपनी बालों के बीच छुपाये माँग की सिंदूर को दिखाती है) मैं अब... इस घर में... विश्व प्रताप की व्याहता हूँ...

नागेंद्र अब उबलने लगता है l गहरी गहरी साँसे चलनी लगती है l शरीर का ज्यादातर हिस्सा काम नहीं कर रहा था पर फिर भी वह व्हीलचेयर से उठने की कोशिश कर रहा था l मानों उठ कर रुप की गला दबोच लेगा l रुप नागेंद्र की असहायता देख कर सहानुभूति के साथ कहती है l

रुप - दादाजी... मुझे समझ में नहीं आ रहा... आपको किस बात का गुरुर है... ना हाथ आपके साथ है... ना आपके पैर... ना ताकत... आपका दिन शुरु होता है... तो उन लोगों के रहमोकरम से... जिनकी जिंदगियों को अपने बर्बाद कर दिया था.... सिर्फ साँस और एहसास ही तो आपके साथ है... वर्ना... आपकी इसी गुरुर ने... आपसे... आपका दूसरा बेटा... बहु... और पोते को... दूर कर दिया... बड़ा पोता और बहू भी अब कभी इस महल में वापस नहीं आयेंगे... पर भरोसा रखिए... इस केस के खत्म होने तक... और ज्यादा से ज्यादा... अट्ठाइस दिन... सिर्फ तब तक इस महल की मेहमान हूँ... उसके बाद भी... अगर राजा साहब को सजा हो जाती है... और आपका साँस आपके साथ दे... मैं आपको अपने साथ ले जाऊँगी और सेवा करती रहूँगी... आपकी आखरी साँस तक... दादाजी मैं आपको तड़पाने के लिए ना यह सब किया है... ना ही आप लोगों से कोई बदला लेने... मैंने बस अपने हिस्से की जमीन... अपने हिस्से का आसमान ले लिया है... जो मेरा था... मेरी किस्मत में लिखा था... और आप लोग मुझे कभी नहीं दे सकते थे...

अब नागेंद्र का मुहँ एक ओर थोड़ा टेढ़ा हो गया था l गुस्से के कारण किसी सांप की तरह फुत्कार रहा था l उसकी टेढ़े मुहँ से लार बहने लगा था l रुप नागेंद्र की ऐसी हालत देख कर थोड़ा डर जाती है और भागते हुए नीचे नौकरों को बुलाने जाती है l थोड़ी देर बाद कुछ नौकर ऊपर आते हैं और नागेंद्र को उसके कमरे में ले जाते हैं और उसके बिस्तर पर सुला देते हैं l नागेंद्र अभी भी गहरी गहरी साँसे ले रहा था l रुप उसके माथे पर हाथ फेरती है l कुछ देर बाद कमरे में भैरव सिंह आता है l भैरव सिंह को देख कर रुप नागेंद्र को छोड़ कर उठ जाती है और बेड के सिरहाने एक किनारे पर खड़ी हो जाती है l

भैरव सिंह - बड़े राजा जी को क्या हुआ...

रुप - उनकी हवा पानी बदलने के लिए... नौकरों की मदत से... छत पर ले गई थी...

भैरव सिंह - तुम भूल कैसे गई... अंतर्महल में रहने वाली... नौकरों के सामने नहीं जाती...

रुप - महल में... जब मैंने... आपकी मुहँ से... हम का रुतबा खो बैठी.. और तुम पर आ गई... इसलिए शायद... दासी बराबर हो गई... और वैसे भी... केके साहब से आपने लगभग रिश्ता जोड़ ही दिया था... अगर शादी हो गई होती... तो अंतर्महल वाली बंधन से थोड़ी आजादी होती...

भैरव सिंह - (बात बदल कर) छत पर... बड़े राजा जी को क्या हुआ...

रुप - शायद... अपनी लाचारी और बेबसी पर उन्हें गुस्सा आया...

भैरव सिंह - गुस्सा... किस बात पर... तुमने उन्हें ऐसा क्या कहा...

रुप - मैंने... मैंने उन्हें... सब सच बताया... एक एक शब्द... अक्षरश सच बताया...

भैरव सिंह - ऐसा कौनसा सच बता दिया... जिस पर उन्हें अपनी लाचारी और बेबसी पर गुस्सा आया...

रुप - वही... परसों सुबह से लेकर देर शाम तक... महल में जो भी कुछ हुआ... अक्षरश सब बता दिया... बड़े राजा जी की घर में... शहनाई बज रही थी... पर उस जलसे में... उन्हें कोई पूछने वाला तक नहीं था... अगर वह मंडप के पास होते... जो भी हुआ अपनी आँखों से देख सकते थे...

भैरव सिंह - (जबड़े और मुट्ठीयाँ भिंच जाती हैं, चेहरा सख्त हो जाती है)

रुप - बड़े राजा जी से विस्तार से कहा तो उन्हें गुस्सा आया... पर... आपको क्यूँ गुस्सा आ गया... क्या आपको लगता है... कुछ जानना बाकी रह गया इसलिए... आप चाहें तो... विस्तार से... आपको भी कह सकती हूँ...

भैरव सिंह - (दबी आवाज में) बदजात... जुबान बंद रख...

रुप - कुछ सच्चाई सुनी नहीं जा सकती... कुछ झेली नहीं जा सकती...

भैरव सिंह - अभी हारे नहीं हैं हम... बस इतने पर इतरा रही हो...

रुप - ना... हरगिज नहीं... बस अपनी किस्मत पर इतरा रही हूँ... वह किस्मत जो आपने लिखने की कोशिश की... पर कलम टुट गया...

भैरव सिंह - मत भूलो... यहाँ किस्मत हम लिखा करते हैं... परसों वही हुआ... जिसकी किस्मत में जो लिखा था...

रुप - वही तो कह रही हूँ... परसों मेरे साथ वही हुआ... जो मेरी किस्मत में लिखा हुआ था... और वह भी हुआ... जो आपने नहीं लिखा था...

भैरव सिंह - (अपनी दांत पिसते हुए) अब तुम... यहाँ से जा सकती हो...

रुप - जी... जैसी आपकी मर्जी...

रुप कमरे से निकल जाती है l भैरव सिंह एक कुर्सी खिंच कर नागेंद्र के बगल में बैठ जाता है l रुप ने उसे एक तरह से गुस्सा दिला गई थी l इसलिए पहले वह खुद को नॉर्मल करता है फिर नागेंद्र की ओर देखता है l नागेंद्र गहरी गहरी साँसें ले रहा था l

भैरव सिंह - बड़े राजा जी... अगर आप नाराज हैं... की परसों की बातेँ ही नहीं... बल्कि इन कुछ दिनों में जो भी कुछ हुआ... हमने आपसे जिक्र नहीं किया... तो आपकी नाराजगी जायज है... पर हम... रुप के मन में... थोड़ा डर बिठाना चाहते थे... और यह दिखाना चाहते थे... हम जब चाहें... उसकी किस्मत को... ठिकाने लगा सकते हैं... बाकी कुछ ऐसे लोग थे... जिन्हें हम सबक पढ़ाना चाहते थे... (उठ जाता है और बिस्तर के छोर पर आकर खड़ा होता है) थोड़ा गलत तो हुआ... पर... असल में... हम चाहते थे... विश्व... इतना मजबूर हो जाए... वह रुप नंदिनी के लिए... खुल कर सामने आ जाए... पर ऐसा... हो नहीं पाया... हम इस शादी की आड़ में... केके को ठिकाने लगाना चाहते थे... बस वही हो गया...

इतना कह कर भैरव सिंह चुप हो कर नागेंद्र की ओर देखता है l नागेंद्र की होंठ खुले थे लार बहती जा रही थी और आँखे नम थीं l क्यूँकी उसे एहसास हो रहा था, विश्व और रुप की चोरी की शादी और उसमें उसीके परिवार का शामिल होने के बारे में भैरव सिंह या उसके आदमियों को कुछ भी मालूम नहीं है l और सबसे अहम बात यह कांड क्षेत्रपाल महल की परिसर में पुलिस की देख रेख में हुआ था l रुप ने सच कहा था नागेंद्र ना सिर्फ लाचार था और बेबस भी था l सब जानते हुए भी भैरव सिंह को अवगत नहीं करा सकता था l इसलिए नागेंद्र की आँखे नम थीं l नागेंद्र अपनी आँखे बंद कर लेता है l भैरव सिंह समझता है, विश्व ने जिस तरह से उसकी सोच को मात दे कर केके को छुपा दिया वह भी उसीकी महल में, शायद इसी बात से नागेंद्र दुखी है l कमरे से बाहर आता है कुछ नौकरों को नागेंद्र के पास जाने की हिदायत दे कर अपनी रणनीतिक कमरे की ओर जाता है l बीच रास्ते में भीमा आकर सिर झुका कर खड़ा हो जाता है l

भीमा - हुकुम...

भैरव सिंह - क्या बात है...

भीमा - दारोगा आया है... आपसे मिलने...

भैरव सिंह - तुमने वज़ह पूछी...

भीमा - जी हुकुम... वह केके के बारे में कुछ बताने आया है...

भैरव सिंह अपनी भौंहे सिकुड़ कर सोचने लगता है फिर अपना सिर हिला कर दीवान ए आम कमरे में जाता है l भीमा उसके पीछे पीछे चल देता है l कमरे में पहुँच कर देखता है दास एक आदम कद फोटो के सामने खड़ा था l वह भैरव सिंह की फोटो थी जिसमें भैरव सिंह हाथ में गन लिए एक मरे हुए शेर के सिर पर पैर रख कर खड़ा था l आहट पा कर दास पीछे मुड़ता है l

भैरव सिंह - कहो इंस्पेक्टर... कैसे आना हुआ...

दास - आपने... कल सुबह थाने में रिपोर्ट दर्ज करायी थी... और अपने वक़ील के हाथों... अदालत में... दोपहर को... हम ही पर... नाकारी का इल्ज़ाम लगवा दिया..

भैरव सिंह - कुल इंस्पेक्टर कुल... लगता है... बहुत गर्म हो रहे हो... भीमा...

भीमा - जी हुकुम...

भैरव सिंह - जरा पंखा तेज चालाओ... इतनी तेज चालाओ.. के आज इंस्पेक्टर साहब की गर्मी उतर जाए... (भीमा कमरे में लगे सारे पंखे चला देता है) बैठिए... इंस्पेक्टर साहब... (कह कर भैरव सिंह बैठ जाता है)

दास - माफ़ कीजिए राजा साहब... जब मैं ड्यूटी पर होता हूँ... तब किसी के साथ... बैठ नहीं सकता... खास कर वह अगर... कोर्ट में मुल्जिम हो...

भैरव सिंह - अच्छा... तो अब आप ड्यूटी पर हैं... कहिये.. कौनसी ड्यूटी बजाने आए हैं...

दास - फिलहाल तो आपकी बजाने आया हूँ...

भैरव सिंह - (कुर्सी की आर्म रेस्ट को कसके पकड़ लेता है) इंस्पेक्टर...

दास - आई मीन... आप ही की ड्यूटी बजाने आया हूँ... आपने परसों अदालत में... प्रधान के हाथों... बड़ी चालाकी से... क्या झूठ बोला... शादी नहीं... मंगनी थी... मंगनी से केके की गुमशुदगी में... पुलिस को गवाह बना दिया... और जज ने भी... आपकी केस में सुनवाई की एक्सटेंशन के लिए... हमसे रिपोर्ट माँग की है...

भैरव सिंह - इंस्पेक्टर... गलत क्या कहा है... आप ही के सामने तो केके गायब हुआ है...

दास - ना... हमारे आँखों के सामने नहीं... आपके महल के भीतर से... जिसकी सिक्युरिटी... आप ही के प्रबंधन में थी... हम तो... बाराती थे... बारात को... महल के द्वार तक पहुँचाना ही हमारा जिम्मा था...

भैरव सिंह - फिर भी आप जानते हैं... आपने तो ढूँढा भी था... कमरे में क्या... केके बाथरुम में भी नहीं मिला था...

दास - कमरे में नहीं मिला... बाथरुम में भी नहीं मिला... पर इसका मतलब यह तो नहीं... के केके... उसी कमरे में था... महल में पच्चीस से ज्यादा कमरे हैं... क्या पता... आपने ही उसे किसी और कमरे में बंद कर दिया हो... और पुलिस को गुमराह कर रहे हों...

भैरव सिंह - इंस्पेक्टर... (गुर्राते हुए) यह बताओ... केके के बारे में... क्या जानकारी लाए हो...

दास - अरे जानकारी कहाँ... तहकीकात तो अब शुरु होगा... उसके लिए... मैं खास ऑर्डर लेकर आया हूँ...

भैरव सिंह - (भौंहे सिकुड़ कर) खास ऑर्डर...

दास - जी राजा साहब... आपकी एफआईआर को हमने बहुत सीरियसली लिया है... हमारे पास जो भी सबूत थे... उन्हें अदालत में पेश कर... केके को ढूंढने के लिए... खास परमिशन ले ली है... (कह कर एक काग़ज़ अपनी जेब से निकालता है) उस दिन महल की सेक्यूरिटी... आप ही की... ESS के गार्ड्स और उनका इनचार्ज अमिताभ रॉय कर रहा था... इसलिए जब तक सबकी पूछताछ नहीं हो जाती... तब तक यह लोग आपके महल की पहरेदारी नहीं कर सकते...

भैरव सिंह - (कुर्सी से उठ खड़ा होता है) ह्व़ाट डु यू मीन... यह महल है... क्षेत्रपाल महल... तुम इस महल की सिक्युरिटी हटाने की बात कर रहे हो...

दास - जी राजा साहब... पर यकीन रखिए... उनसे केवल पूछताछ होगी... उसके बाद ही कोई निष्कर्ष निकलेगा... केके जी का अगवा हुआ है... या भाग गए हैं... (काग़ज़ को भैरव सिंह के हाथ में देते हुए) आप चाहें तो... एडवोकेट प्रधान से... वेरीफाए कर सकते हैं...

भैरव सिंह काग़ज़ लेकर पढ़ता है और दास की ओर देखता है l दास के चेहरे पर किसी भी तरह का कोई भाव नहीं दिख रहा था l

भैरव सिंह - तो फिर इस महल की सिक्युरिटी...

दास - हम हैं... पब्लिक सर्वेंट... मैं दो कांस्टेबलों को... आपकी महल की सिक्युरिटी के लिए कह दूंगा... (भैरव सिंह की मुट्ठीयाँ भिंच जाती हैं, दांत के पीसने से कड़ कड़ की आवाज़ आने लगती है)

भीमा - हुक्म... आप कहें तो... इसे यहीँ महल में जिंदा गाड़ दूँगा...

दास - (भीमा के तरफ पलटता है) ओले ओले ओले... तेरे को गुस्सा आया... मैं यहाँ पूरी बंदोबस्त करके आया हूँ... पिछली बार की बातेँ भूल गया क्या... (भैरव सिंह के तरफ मुड़ कर) राजा साहब... आपकी सारी सिक्युरिटी टीम.. क्षेत्रपाल महल से दूर... रंग महल में रहेगी... चूंकि लोग बहुत हैं... हम लॉकअप में नहीं रख सकते... और जब तक... उनसे पूछताछ पूरी नहीं हो जाती... तब तक... इस महल के आसपास.. कोई दिखना नहीं चाहिए... बड़े राजा जी की देख भाल के लिए... दो जन दिन में... दो ज़न रात को... राजकुमारी जी की देख भाल के लिए... दो जन दिन में और दो जन रात को... आपके लिए... थोड़ा रिलैक्स है... आप चार चार जन रख सकते हैं... रसोई के लिए भी चार चार लोग शिफ्ट के हिसाब से... और महल की सुरक्षा की आप चिंता मत कीजिए... इतने दिनों में... इतना जो जान ही गया हूँ... राजगड़ में सुरक्षा महल को नहीं... बल्कि... राजगड़ को महल वालों से... चाहिए... फिर भी... मैं दो दो कांस्टेबल डिप्लॉय कर दूँगा... आई थिंक... आप सब समझ गए...

भैरव सिंह - अच्छी... तरह से...

दास - तो ठीक है... मैंने आपको जो हमारी एसओपी दे दिया है... उसे आप फॉलो कर... मुझे खबर कीजिए... उसके बाद... मैं रिपोर्ट की तैयारी करूँगा... (मुड़ कर जाने लगता है, तभी कमरे में बल्लभ प्रवेश करता है l बल्लभ को देख कर भैरव सिंह दास को रोकता है)

भैरव सिंह - एक मिनट... (दास रुक जाता है) तुमने कोर्ट से यह ऑर्डर कैसे हासिल की...

दास - ओ... तो वकील साहब को देख कर... आपके मन में यह प्रश्न ऊँघा...

बल्लभ - कैसा ऑर्डर राजा साहब...

भैरव सिंह वह काग़ज़ बल्लभ को थमा देता है l बल्लभ उस ऑर्डर को देख कर हैरान होता है और दास से पूछता है l

बल्लभ - यह.. यह ऑर्डर कब ली...

दास - वकील साहब... आप लीगल एड्स वाईरस हैं... आई मीन एडवाइजर हैं... आप पैवेलियन में रह कर कमेंट्री कर सकते हैं... असली खेल तो... मैदान में खिलाड़ी खेलता है... आप भूल रहे हैं... कोऑपरेटिव सोसाईटी की केस में... ईंवेस्टीगेशन इंचार्ज... एक्जीक्यूटिव मैजिस्ट्रेट नरोत्तम पत्री हैं... उनकी भी अपनी एडमिनिस्ट्रेटिव पावर हैं... जिनको एक्जीक्युट कर के... कोर्ट की ऑर्डर की बेस पर... यह ऑर्डर ले लिया गया... (बल्लभ एक झिझक भरी नजर से भैरव सिंह को देखता है)

भैरव सिंह - तो इस ऑर्डर के पीछे का खिलाड़ी... विश्वा है...

दास - वाह... राजा साहब... वाह... ओके... अब मैं चलता हूँ... (फिर से जाने को होता है, इस बार भी भैरव सिंह की आवाज़ सुन कर रुक जाता है)

भैरव सिंह - दास... तुम्हें नहीं लगता... तुम बहुत तेजी से भाग रहे हो... उस रास्ते पर... जो बहुत फिसलन भरा है... जिसे विश्वा ने बनाया है... (एक पॉज लेकर) कभी भी... गिर सकते हो... मुहँ के बल... जब उठने की कोशिश करोगे... कमर टूट चुकी होगी...

दास - (मुस्करा कर) राजा साहब... अब लगता है... मुझे कुछ देर के लिए... ड्यूटी से बाहर जाकर बात करनी चाहिए... (भैरव सिंह के सामने एक कुर्सी के सामने आ जाता है) क्या मैं अब... बैठ सकता हूँ... (भैरव सिंह कुछ नहीं कहता पर फिर भी दास बैठ जाता है) राजा साहब... मैं अब आपसे जो कहूँ... उसे ध्यान से... सुनिएगा... और गौर कीजिएगा... विश्वा गिरफ्तार हो चुका था... रुप फाउंडेशन के केस में... जैल में अपनी सजा काट रहा था... तब आपकी और ओंकार चेट्टी की दोस्ती परवान चढ़ रही थी... प्रत्यक्ष राजनीति में आपकी दखल बढ़ने लगी थी... तब लगभग... पाँच साल पहले... जगत पुर के मस्जिद से... कुछ लोग... चीनी माउजर और कुछ असलाह बारुद के साथ गिरफ्तार हुए थे... उन्हें भुवनेश्वर सेंट्रल जैल मैं रखा गया था... एक स्पेशल सेल बना कर उसमें रखा गया था... उन्हें मिडिया आतंकवादी कह कर प्रचार कर रहा था... उस समय... आपकी सलाह पर... तत्कालीन मुख्यमंत्री जी नेतृत्व में... भुवनेश्वर में... वाइब्रेंट भुवनेश्वर का आयोजन किया गया था... याद है... (कमरे में दास जिस अंदाज से कह रहा था, खामोशी के साथ सब सुन रहे थे l ऐसा प्रतीत हो रहा था मानों उस कमरे में दास के सिवा कोई है ही नहीं l एक पॉज लेकर) याद होगा ही... उसी दिन... जैल पर बहुत बड़ा आतंकी हमला हुआ... पर अफसोस... उस जैल मैं कैद आतंकी के साथ... उसे बचाने आए सभी आतंकी... पुलिस की काउंटर अटैक में मारे गए...

भैरव सिंह - तुम कहानी कह रहे हो... या बकचोदी कर रहे हो...

दास - पुलिस वालों को... उस आतंकी हमले को नाकाम करने के लिए... वाह वाही.. प्रमोशन और मेडल मिला... पर असल में... उस वाह वाही या.. मेडल का असली हकदार... विश्व प्रताप था... (भैरव सिंह और बल्लभ की आँखें चौड़ी हो जाती है) एक अकेले विश्वा ने... ना सिर्फ सारे आतंकीयों को.. खत्म किया.. बल्कि पुलिस कैजुअल्टी को जीरो किया... पर बदले में... ना नाम लिया... ना इनाम... हमने कोशिश भी बहुत की... उसे नाम... पहचान और इनाम देने के लिए... पर उसने एक बात कहा था... उमाकांत सर जी की गवाही... झूठी ना हो जाए... उनके लिए ही... सजा पूरी करना चाहता है...

भैरव सिंह - इस कहानी का मतलब क्या है... इंस्पेक्टर...

दास - हमने एक इंक्वायरी कमिटी बैठाई थी... जिसमें हमें यह मालूम हुआ था... के वे लोग.. जो आतंकी की पहचान लिए मरे... सब आप ही के आदमी थे... आपने.. चेट्टी के बेटे... यश के साथ मिलकर... ईलीगल ड्रग्स तस्करी किया करते थे... मामला बहुत ऊपर तक पहुँचा था... पर चूँकि आपके पास... कुछ ऑफिसरों के... सीडी वगैरह था... धीरे धीरे केस को... दबाव के चलते डायल्युट हो गया था... उसके बाद... आपकी और चेट्टी के रिश्ते में दरार आई... और यह ड्रग्स का धंधा भी बंद हो गया...

बल्लभ - इस कहानी का... इस केस से क्या मतलब है दास बाबु...

दास - मैंने विश्वा की लकीर को बढ़ते देखा है... वह जब कुछ भी नहीं था... अकेला था... तब आपकी धंधे की वाट लगा चुका है... तो आज वह क्या कर सकता है.. यह सोचिए...

बल्लभ - कुछ नहीं कर सकता वह... जब सिस्टम और सरकार हमारी जेब में है...

दास - पूरी तरह से नहीं... जैसे कि मैं... सिस्टम में हूँ... पर सच्च के साथ हूँ... और विश्वा... सच के साथ खड़ा है... वक़्त बदलता है... राजा साहब...

भैरव सिंह - फिर भी... क्या कर लोगे...

दास - राजा साहब... एक वक़्त था... जब विश्वा दिन रात... आपके बारे में सोचता था... पर आज देखिए... आप... आपका पूरा कुनवा... विश्वा के बारे में... दिन रात सोच रहे हैं... राजा साहब... विश्वा आपके दिमाग में... जिंदगी में... हर एक जगह में घुसा हुआ है... बेस्ट ऑफ लॉक...

कह कर दास अपनी जगह से उठ जाता है और बाहर की ओर चला जाता है l भैरव सिंह के कानों में दास के आखिरी लफ्ज़ गूँज रहा था l एक गहरी साँस लेकर अपनी कुर्सी से उठता है और तेजी से उस कमरे की ओर जाता है जिस कमरे में केके शादी के समय कपड़े बदलने गया था l पीछे पीछे भीमा और बल्लभ भागते हुए जा पहुँचते हैं l भैरव सिंह कमरे को अच्छी तरह से मुआयना करता है l फिर बालकनी जाकर नीचे की ओर देखता है, फिर मुड़ कर बाथरुम में जाता है और दीवार पर लगे आईने में झाँकता है फिर टैप खोल कर अपने मुहँ पर पानी की छींटे मारता फिर भीगे चेहरे से आईने को देखता है l फिर वह बाथरुम से निकल कर कमरे में आता है l कमरे में एक कुर्सी पर बैठ जाता है और हँसने लगता है, "हा हा हा हा हा... " उसकी हँसी देख कर भीमा और बल्लभ हैरान होते हैं l किसी अनहोनी की आशंका के चलते एक दुसरे की ओर देखने लगते हैं l थोड़ी देर के बाद बल्लभ हिम्मत कर के भैरव सिंह से पूछता है l

बल्लभ - राजा साहब...

भैरव सिंह - (हँसी तो नहीं रुकती पर धीमी हो जाती है और बल्लभ की ओर सवालिया नजर से देखता है)

बल्लभ - क्या कोई अनहोनी हो गई...

भैरव सिंह - हाँ प्रधान हाँ... विश्वा ने... हमारे घर... रिश्तों में.. और लोगों में घुसपैठ कर रखा है... अब हमारे समझ में आया... विश्वा... राजगड़ में.. कैसे कामयाब रहा...

बल्लभ - मैं कुछ समझा नहीं...

भैरव सिंह - सिस्टम में दो फाड़ है... एक हिस्सा.. विश्वा के लिए काम कर रहा है... और दूसरा हमारा... जिससे हम कम करवा रहे हैं... परिवार में घुसपैठ... तुम जानते हो... पर सबसे अहम बात... हमारे आदमियों में... उसके आदमी भी हैं... (भीमा और बल्लभ चौंकते हैं)

भीमा - क्या... हमारे आदमियों के बीच... विश्वा का आदमी... यह कैसे हो सकता है हुकुम...

भैरव सिंह - हो सकता है नहीं... हो गया है... जब से विश्वा गाँव लौटा है... उसका हर एक वार... सटीक बैठ रहा है... विश्वा कितनी आसानी से... अपना घर हासिल कर लिया... कैसे पंचायत ऑफिस में घुस कर... आसानी से... तुम सबको धो डाला... फिर... अनिकेत रोणा को... कितनी खूबी से... हमारे ही हाथों से हटा दिया... अब इस शादी में... कितनी आसानी से... केके के कमरे में... उसके बंदे पहुँचते हैं... और हमारी ही आँखों के नीचे से गायब कर देते हैं...

भीमा - पर... केके ग़ायब कहाँ हुआ... वह तो बाथरुम में बंद था... हमसे इंस्पेक्टर ने झूठ बोला... इसलिए हम ढूंढ नहीं पाए...

भैरव सिंह - हा हा हा हा...

बल्लभ - क्यूँकी... इंस्पेक्टर दाशरथी दास... विश्व के लिए राजगड़ आया है.... उसका दोस्त... उसका हमदर्द है...

भैरव सिंह - बिल्कुल... पर सवाल है... वह चार बंदे.. जिन्होंने केके को... ग़ायब किया... वह जो भी थे... महल में अंदर कैसे आए... उन्हें कैसे मालूम हुआ... केके कौन-से कमरे में है... क्या बिना किसी अंदर वाले की मदत से... यह मुमकिन था...

कमरे में सन्नाटा छा जाती है l भैरव सिंह का चेहरा सख्त हो जाता है l भीमा की हलक सूखने लगता है l

भैरव सिंह - भीमा...

भीमा - जी.. जी... हु.. हुकुम...

भैरव सिंह - महल के बाहर की पहरेदारी... रॉय की जिम्मे थी... पर अंदर की...

भीमा - हुक... हुकुम... हमारे सारे आदमी वफादार हैं... सबको हमने परखा हुआ है...

भैरव सिंह - आपने सारे परखे हुए आदमियों को बुलाओ....

भीमा उल्टे पाँव बाहर जाता है l उसके जाते ही भैरव सिंह उठ खड़ा होता है और बल्लभ की ओर देख कर कहता है l

भैरव सिंह - प्रधान...

बल्लभ - जी राजा साहब..

भैरव सिंह - एक सिस्टम... कभी अगर अपडेट ना किया गया हो... तो वह सिस्टम... एक ना एक दिन... करप्ट हो ही जाता है...

बल्लभ - जी राजा साहब...

भैरव सिंह - विश्वा हम पर हावी इसलिए नहीं हो पाया... के हम पुरानी सिस्टम में सड़ रहे थे... बल्कि हमारी सिस्टम में... विश्व ने वाईरस डाल दिया था... अब वक़्त आ गया है... सिस्टम को अपडेट... नहीं तो... अपग्रेड करना पड़ेगा...

बल्लभ - राजा साहब.... क्या आपको पता चल गया है... वह कौन था... जिसने... दुश्मन के लिए... अंदर से... दरवाजा खोला था...

भैरव सिंह - हाँ... प्रधान... अब तुम भी उसे पहचान जाओगे... और समझ जाओगे...

बल्लभ यह सुन कर चुप हो जाता है l थोड़ी देर बाद भीमा अपने सारे लोगों के साथ कमरे में आता है l उन्हें देख कर भैरव सिंह भीमा से पूछता है l

भैरव सिंह - क्या सब आ गए...

भीमा - नहीं पर यह सारे मेरे बंदे हैं... बाकी जो भी हमसे जुड़ा हुआ है... सबको यही देखते हैं..

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... सोच समझ कर जवाब दो... क्या तुम्हारे सभी आदमी आ गए हैं...

भीमा - जी सिर्फ सत्तू नहीं दिख रहा है... लगता है... रंग महल में... केके साहब का अंजाम देख कर... किसी ठर्रे की दुकान में... लुढ़का हुआ होगा...

भैरव सिंह के होठों पर एक हल्की सी मुस्कान आ जाती है और वह बल्लभ की ओर देखने लगता है l बल्लभ की आँखे हैरत से फैल जाती है और मुहँ खुल जाती है l

बल्लभ - (भीमा से) यह सत्तू... तुम्हारे साथ कब से है... भीमा..

भीमा - यही करीब तीन... या साढ़े तीन साल से...

बल्लभ - वह इतनी जल्दी... तुम लोगों से जुड़ा... और इस काबिल भी हो गया... के तुम उससे... अपने साथ हर काम में... काम लेते रहे...

बल्लभ के इस सवाल पर भीमा का भी मुहँ खुला रह जाता है l वह शुकुरा और शनिया की ओर देखने लगता है l

बल्लभ - सत्तू... कहाँ है... शनिया...

शनिया - वह कल पीने जाएगा बोला था... पर कल से दिख नहीं रहा है... हमें लगा.... (चुप हो जाता है)

बल्लभ - क्या लगा...

शनिया - वकील बाबु... हम सत्तू पर कैसे शक कर सकते हैं... जब जब विश्वा से... लड़ाई हुई... वह हमारे साथ... कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा था...

बल्लभ - ठीक है... तुम्हारी बात मान लेते हैं... पर... तुममें से जब भी कोई विश्वा के हाथों पीटा... क्या सत्तू को भी... विश्वा के हाथों पीटते... देखा...



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वैदेही की दुकान में सत्तू बैठा हुआ था l उसके इर्द गिर्द विश्व और उसके साथी घेर कर बैठे हुए थे l

वैदेही - (सत्तू से) तो... तुझे लगता है... महल में तेरी पोल पट्टी खुल चुकी होगी...

सत्तू - हाँ...

सीलु - नहीं... मुझे नहीं लगता...

सत्तू - राजा को दूर से ही सही... जितना देखा है... जितना आंका है... इतना तो कह सकता हूँ... उस जैसा गलीच... नीच... काईंया... कमीना... कोई नहीं हो सकता...

विश्व - तब तो... तुझे राजगड़ ही नहीं... यशपुर भी छोड़ कर चले जाना चाहिए...

सत्तू - नहीं... मेरे पास... भागने के लिए... कोई वज़ह है ही नहीं...

वैदेही - पर तु रहेगा कहाँ...

सत्तू - दीदी... मुझे तुम अपना नौकर रख लो... मैं बर्तन माँज लूँगा... टेबल साफ कर दिया करूँगा...

वैदेही - फिर भी... तेरी जान को खतरा है...

सत्तू - जानता हूँ... भैरव सिंह अब चोट खाया हुआ सांप है... पर मेरे पास... जीने के लिए वज़ह भी तो होना चाहिए... मैं तो बदला लेने... उसे मारने के लिए... भीमा और शनिया से जुड़ा... पर... महल के भीतर... साढ़े तीन साल में... इन्हीं कुछ दिनों में जा पाया... पर तब भी... मैं उसके आसपास फटक भी नहीं पाया...

विश्व - ऐसा क्यूँ सोच रहा है... तुने बदला नहीं लिया... राजा से उसके खास आदमी... इंस्पेक्टर रोणा को मरवाया... भीमा के साथ रह कर... ना जाने कितनी बार... राजा को मुहँ की खाने पर मजबूर कर दिया... और अब... केके...

टीलु - हाँ राजा ने कभी सोचा भी नहीं होगा... जिस आस्तीन को अपनी बांह में चढ़ाया है... उसी आस्तीन ने उसके बांह को काट दिया है...

मीलु - हाँ... हम सब बस अनुमान लगा रहे हैं... के राजा को पता चल गया होगा...

जिलु - हाँ... तुझे बिल्कुल यहाँ नहीं आना चाहिए था... मैं तो कहता हूँ... उन्हें शक़ होने से पहले... तुझे महल वापस चले जाना चाहिए...

विश्व - नहीं... अगर मन में बात उठी है... तो कहीं ना कहीं सच होगी... अगर सत्तू को कुछ हो गया... तो हम लोग भी... खुद को माफ नहीं कर पाएंगे...

सत्तू - मुझे मेरी फिक्र नहीं है विशु भाई... मैं बस मरने से पहले... राजा का दर्दनाक अंत देखना चाहता हूँ... अभी भी मरने को तैयार हूँ... अगर परसों... विशु भाई और राजकुमारी जी की शादी की बात खुल जाती... तो भैरव सिंह के लिए.. शर्मनाक और दर्दनाक जरूर होती...

वैदेही - तुम्हीं ने अभी बताया ना... भैरव सिंह बहुत कमीना है...

सत्तू - हाँ..

वैदेही - तो समझ लो... अभी वक़्त आया नहीं...

टीलु - पर क्यूँ दीदी... हमें वह दिमागी तौर पर दबाना चाहता है... यह बात सामने आ जाती... तो भैरव सिंह दिमाग से और भी कमजोर हो जाता...

वैदेही - नहीं... तुम लोग भैरव सिंह को नहीं जानते... जितना मैं जानती हूँ... (एक गहरी साँस लेती है फिर) रंग महल में जब... मुझे रौंदा जा रहा था... तब बीच बचाव करने मेरी माँ आई थी... तब मेरी माँ ने पूछा था क्यूँ... भैरव सिंह ने जवाब दिया था... जिस पेड़ को वह लगाया है... उसका फल खाना उसका हक् बनता है... तब मेरी माँ ने उसे ललकारते हुए... नंदिनी की बात छेड़ी थी... जिसे सुनने के बाद... भैरव सिंह ने... मेरी माँ को मेरे ही आँखों के सामने मार डाला था... (वैदेही का चेहरा सख्त हो जाता है और दर्द भी झलकने लगता है पर आँसू नहीं निकलते) (वैदेही की अतीत सामने आते ही विश्व की जबड़े भिंच जाती हैं, एक पॉज लेकर) आज नंदिनी... सुरक्षित महल में इसलिए है... क्यूँकी अभी तक भैरव सिंह को गुमान है... की नंदिनी भैरव सिंह की बेटी है... जिस दिन उसे मालूम पड़ा कि नंदिनी... विशु की पत्नी है.. तब उसके मन से... नंदिनी के लिए... जो कुछ भी भावना है... सब कुछ खत्म हो जायेगा... राजा अपनों के लिए कुछ करे ना करे... पर जिससे दुश्मन मान लेता है... उसके लिए... वह... (चुप हो जाती है)

सत्तू - ओ... माफ करना दीदी... पर अभी भी... राजकुमारी जी का महल में रहना कहाँ तक ठीक है...

वैदेही - इस केस में विशु की ही जीत होगी.. यह सबको मालूम है... राजा को भी... और कम से कम तब तक... नंदिनी एक बेटी की तरह... उस महल में रहना चाहती है... रहना भी चाहिए...

सत्तू - ठीक है दीदी... आपने सोचा है... तो ठीक ही सोचा होगा...

वैदेही - हाँ... और मैंने यह भी सोचा है कि तुम अभी विशु के साथ... बच्चों के लिए जो लाइब्रेरी बनाया गया है... वहीँ पर कुछ दिन के लिए छुप जाओ...

सत्तू - छुपना... क्यों दीदी...

सीलु - अबे ढक्कन... तु छुपा रह... तु भी सलामत रहेगा... और दीदी भी सलामत रहेगी... समझा...

विश्व - तुम सब चुप रहोगे... (सत्तू से) एक काम करो... तुम अब.. मेरे साथ... उमाकांत सर के घर चलो... फ़िलहाल के लिए... बाद में सोचते हैं... क्या करना होगा...

वैदेही - हाँ यही सही रहेगा.. तुम विशु के साथ जाओ.... हम थोड़ा जायजा लेते हैं... तुम्हारा राजगड़ में रहना... तुम्हारे लिए कितना हानिकारक हो सकता है...

सत्तू उठ नहीं रहा था l विश्वा उसे ज़बरदस्ती अपने साथ खिंच कर दुकान से ले जाता है l उनके जाने के बाद सीलु वैदेही से पूछता है l

सीलु - दीदी... इस सत्तूका क्या इतिहास है... और इसे आप... कब से जानती हैं...

वैदेही - (एक गहरी साँस छोड़ती है) तुम लोग विशु के अतीत को कितना जानते हो...

टीलु - शायद... सब कुछ... इसलिये तो हम समझ नहीं पाए... हमारे मैदान में... सत्तू कबसे खेल रहा था... वह भी मिस्टर एक्स बन कर...

जिलु - हाँ... हम सब डेढ़ सालों से लगे हुए थे... पर कभी इसे नहीं पहचान पाए...

वैदेही - वह इसलिए... की सत्तू की कहानी... पाँच साल पहले शुरु होती है... और उसको राजा से... अपने प्यार का बदला चाहिए था... इसलिए वह भीमा से जुड़ गया था...

सब - क्या...

वैदेही - हाँ... इसलिए पुछा... विशु के अतीत को कितना जानते हो...

सीलु - दीदी आप बताती जाओ... हम देखते हैं... हमें क्या पता नहीं है...

वैदेही - दिलीप कुमार कर... मानीया गाँव का सरपंच था...

सब - हाँ हम जानते हैं...

वैदेही - उसकी सबसे छोटी बेटी... जिसकी बलि... क्षेत्रपाल महल की रस्म में ले ली गई थी..

वैदेही बताती है कि वह साढ़े पाँच साल पहले जब विश्व से मिलने भुवनेश्वर जा रही थी विश्व की ग्रैजुएट होने पर बधाई देने जा रही थी l बस स्टैंड में दिलीप कुमार कर की बीवी कल्याणी उसे रोक कर कैपिटल हस्पताल लेकर जाती है जहां दिलीप कर अपनी आखरी साँस ले रहा था l वहीँ पर वैदेही को मालूम होता है कि कैसे भैरव सिंह ने अपना काम निकल जाने के बाद दिलीप कर को छोड़ दिया था l जिसके वज़ह से दिलीप कर लकवा ग्रस्त हो गया था l उसके इलाज के वक़्त उसकी बड़ी बेटी और बेटा सारी दौलत लेकर भाग गए थे l जब उसकी पत्नी कल्याणी भैरव सिंह से मदत माँगने गई थी तब भैरव सिंह ने उसकी छोटी बेटी को विक्रम के क्षेत्रपाल बनने की रस्म की भेट चढ़ा दी गई थी, और वहीँ पर दिलीप कर से मालूम हुआ था कि जयंत राउत जी की हत्या यश ने की थी l और सत्तू वही लड़का था जिसकी शादी दिलीप कर की बेटी से तय हुई थी पर दिलीप कर की जान बचाने के लिए रंग महल की रस्म के बदले पैसा लाकर अपनी माँ को दिया था और हमेशा के लिए रंग महल में रह गई थी l सत्तू उस वक़्त हस्पताल में इनकी देखरेख कर रहा था l दिलीप कर के मौत के बाद उसकी बेटी को वापस पाने के लिए भीमा के गिरोह में शामिल होने के लिए बड़ी कोशिश की l उसे कामयाबी तीन साल पहले मिली l पर उसे एक दिन मालूम हुआ कि उसकी मंगेतर ने किसी कारण से आत्महत्या कर ली थी l उसीका बदला लेने के लिए ताक में था l वह भैरव सिंह को मार देना चाहता था l पर कभी इतना हिम्मत जुटा नहीं पाया l एक दिन वैदेही ने उसे शनिया के साथ पहचान लिया था l उसके बाद मौका मिलने पर वैदेही ने ही विश्व का साथ देने के लिए राजी कर लिया था l सब सुनने के बाद

सीलु - ओ... पर दीदी यह गलत बात है...

वैदेही - क्या गलत है...

मीलु - हाँ... आपको हमें उसके बारे में कह देना चाहिए था... और उसको हमारे बारे में...

वैदेही - उसे... सिर्फ विशु के बारे में पता था... और विशु को उसके बारे में... एक वही था... जो हमें खबर कर देता था... की भैरव सिंह किसको... हमारी जासूसी करने भेजा है... विशु उसी हिसाब से अपनी तैयारी कर लेता था...

टीलु - तो यह विशु भाई की गलती है... विशु भाई को हमें बता देना चाहिए था...

वैदेही - तुम लोगों को तब बताया गया... जब जरूरत हुई... तुम लोगों के बारे में भी तो... विशु ने मुझे बहुत देर बाद कही थी... (चारों चुप हो जाते हैं) विशु को... सबकी फिक्र रहता है... जिस बात को जब खोलना है... तब खोलता है... क्यूँकी अगर सारी बातेँ खुल जाए... तो पता नहीं किस पर क्या खतरा हो जाए...

तभी शनिया, शुकुरा अपने कुछ साथियों के साथ वैदेही के दुकान पर आते हैं l वैदेही के साथ इन चारों को देख कर थोड़ा ठिठकते हैं l

शनिया - सत्तू कहाँ होगा...

वैदेही - अपनी अम्मा से जाके पूछ ना...

शनिया - देख हमें खबर है... वह यहाँ आया हुआ था... इसलिए तुझे... प्यार से पूछ रहे हैं...

सीलु - दीदी नहीं कहेगी... तो क्या उखाड़ लोगे बे...

शनिया - ओ... विश्वा ने तेरी वकालत करने के लिए... अपने कुत्ते छोड़ रखे हैं... (चारों उठ खड़े हो जाते हैं) (वैदेही उन्हें हाथ दिखा कर शांत रहने के लिए इशारा करती है)

वैदेही - शनिया... यह तु भी जानता है... मैं एक अकेली तुम लोगों के लिए काफी हूँ... इन्हें ललकार मत... वर्ना तु आया मर्दाना लिबास में... पर जाएगा... जनाना कपड़ों में...

शुकुरा - देख वैदेही... हम बस इतना जानने आए हैं... सत्तू यहाँ आया था या नहीं... अगर आया था... तो अब कहाँ गया...

वैदेही - यह एक दुकान है... दिख नहीं रहा है क्या... यहाँ तेरी तरह लोग आते हैं और चले जाते हैं... वह भी आया था... चला गया... अब कहाँ गया... उसे मुझे क्या...

शुकुरा - देख वैदेही... बात राजा सहाब की है... उसने राजा साहब से गद्दारी की है... राजा साहब.. उसे ढूंढने और उनके सामने पेश करने के लिए कहा है...

शनिया - हमें खबर मिली थी... सत्तू कुछ देर पहले तेरे दुकान में था... इससे पहले कि राजा साहब का गुस्सा तुम और तुम्हारे भाई पर उतरे... बेहतर होगा कि तु सत्तू का पता बता दे...

टीलु - ओए ढक्कनों... इतनी जल्दी भूल गए... तुम्हारे राजा जिस कुर्सी पर बैठ कर तुम लोगों को हांकता है ना.. दीदी ने उसे तुम लोगों के आँखों के सामने राजा को उसी कुर्सी से उतारकर... खुद बैठी थी और तुम्हारे राजा को हांकी थी...

मील - हाँ यह सारे गुड़ गोबर... जल्दी भूल जाते हैं... कहो तो हम अभी के अभी याद दिला दें...

शनिया - बस वैदेही... हम सब समझ गए... हमें बस शक़ था... तुमने उसे यकीन में बदल दिया... कोई नहीं... वैसे भी तुमसे मेरा पुराना हिसाब बाकी है... (कह कर अपने चेहरे पर एक कटे दाग पर हाथ फेरता है) एक दिन... सूद समेत लौटाऊंगा...

तभी सब विश्व को आते देखते हैं l वे लोग धीरे धीरे खिसक जाते हैं l विश्व दुकान पर पहुँच कर शनिया और उसके गुर्गों को जाते हुए देखता है l फिर अपनी दीदी और दोस्तों को देख कर पूछता है

विश्व - यह किस लिए आए थे...

वैदेही - सत्तू की सच्चाई को.. पक्का करने आए थे...

विश्व - इसका मतलब... सत्तू सही समय पर... महल से निकल गया...

वैदेही - हाँ...

सीलु - और भी कुछ हुआ है विश्व भाई... (विश्व सीलु की ओर देखता है)

वैदेही - कुछ नहीं हुआ है... तुम लोग खामख्वाह... बात का बतंगड बना रहे हो...

विश्व - टीलु... क्या हुआ...

टीलु - शनिया... अपना पुछ लेकर आया था... दीदी को धमकी देकर गया है... यह बात और है... तुमको देखते ही... अपनी दुम दबा कर भाग गया... (शनिया जिस रास्ते लौट गया था विश्व की नजर वहाँ पर टिक जाता है)

वैदेही - अब तु उस तरफ क्यूँ देख रहा है...

विश्व - मैं यह समझने की कोशिश कर रहा हूँ... के इन्हें अपनी शक को पक्का करने के लिए... यहाँ क्यूँ आना पड़ा... क्यूँकी गाँव में हमारे सिवा... राजा का खिलाफत तो कोई करेगा नहीं... और जाहिर सी बात है... जो राजा के खिलाफ जाएगा... वह हमारे खेमे में होगा... फिर...

वैदेही - कुछ नहीं... यह उनकी खुजली है... जब होने लगती है... यहाँ आकर मिटा कर जाते हैं...

विश्व - (वैदेही की ओर देख कर) यह लोग राजा के खोटे सिक्के सही.... कायर हैं... बुजदिल हैं... उस पर... मक्कार है... जितनी सावधानी राजा से रख रहे हैं... उतनी ही इनसे भी रखना होगा...

वैदेही - यह लोग क्या हैं... मैं जानती हूँ... पिछले सात सालों से... इनसे लोहा ले रही हूँ... और आज अचानक तु... क्यूँ फिक्र मंद होने लगा है...

विश्व - दीदी... दुश्मन अगर बहादुर हो तो विश्वास किया जा सकता है... पर अगर कायर और मक्कार हो... तो सावधानी जरूरी हो जाता है... क्यूँकी ऐसे लोग... सामने से नहीं पीठ पर वार करते हैं...

वैदेही - अब तु मुझे समझायेगा... यह लोग कैसे हैं...

सीलु - ओ हो... अब तुम और दीदी किस बात पर बहस करने लग गए...

विश्व - देखो... इस बार मैं जब भी केस के सिलसिले में यशपुर जाऊँ... तब तुम लोग दीदी के पास रुकना...

मीलु - हाँ समझ गए... पर तुम शायद भूल रहे हो... गवाहों के लिस्ट में... हमारा भी नाम है...

जिलु - तो ऐसा करते हैं... हम जब भी यशपुर या कहीं भी बाहर जाएंगे... दीदी को साथ ले जाएंगे...

वैदेही - चुप रहो तुम लोग... यह क्या बहकी बहकी बातेँ करने लग गए... कुछ छछूंदर आए थे... चले गए... जो मेरे भाई को देख कर ही भाग गए... वह लोग क्या हो कर लेंगे... और हम यहाँ किस विषय पर बात कर रहे थे... और बात कहाँ जा रहा है...

विश्व - दीदी... मुझे तुम्हारी चिंता है...

वैदेही - मैंने कहा ना बस... (अपनी एक टेबल के ड्रॉयर खोल कर एक दरांती और दो हाथ लंबा कुल्हाड़ी निकालती है) अब तक... मैं इन्हें अपने साथ लेकर... इनसे लोहा ले रखा था... उनमें इतना भी दम नहीं है... इनसे पार पा जाएं... (वैदेही देखती है पाँचो उसे गौर से देख रहे थे, फर्क़ बस इतना था कि सिवाय विश्व के चारों बेवक़ूफ़ों की तरह मुहँ फाड़े देख रहे थे) क्यूँ टीलु...

टीलु - (होश में आता है) जी... जी दीदी...

वैदेही - (विश्व से) हमने अपनी जान बचाने के लिए... यह लड़ाई छेड़ी नहीं थी विशु... इस लड़ाई का मकसद अलग है... गाँव के हर जान में सोये हुए पुरुषार्थ को जगाना है... अगर इसके लिए... यह लड़ाई हमारी बलि ले भी ले...

विश्व - दीदी...

वैदेही - अरे बात तो पूरी करने दे... अगर इस बीच मुझे कुछ हो जाए... तब बिना मेरी बहु के... मेरी लाश को उठने मत देना..

विश्व - दीदी...

गुस्से से पैर पटक कर चला जाता है l वैदेही उसे आवाज देती रह जाती है l विश्व के चारों दोस्त वहीँ पर खड़े रह जाते हैं l विश्व के आँखों से ओझल होने के बाद पुलिस की गाड़ी आकर दुकान के आगे रुकती है l गाड़ी से दास उतरता है l

वैदेही - अरे दास बाबु... आप... अभी...

दास - जी... मैं विश्व से मिलने आया था...

वैदेही - वह तो अब... नदी किनारे गया होगा...

दास - अभी.. पर क्यूँ...

वैदेही - जब भी नाराज होता है... या परेशान होता है... ढलती सूरज की ओर देख कर खुद को शांत करने की कोशिश करता है..

दास - ओ अच्छा...

वैदेही - कोई खास काम था..

दास - जरूरी तो नहीं पर... केस के सिलसिले में... कुछ कहना था...

सीलु - आज आप बात ना ही करो तो अच्छा रहेगा... आज भाई का मुड़ बिगड़ गया है... (सीलु दुकान में जो हुआ कहने लगता है)

दास - बात तो उसने सही कहा है वैदेही जी... बहादुर और चालक दुश्मन अलग होते हैं... कायर और मक्कार अलग... बेशक राजा को अपनी हार दिख रहा है... पर यह भी सच है... जो जिंदगी... वह जिया है... उसे बचाने के लिए... हर कोशिश करेगा... किसी भी हद तक जाएगा... अभी तक विश्व की कोई कमजोरी.. राजा के हाथ नहीं लगी है... तो जाहिर है.. उसकी नजर... अब आप पर होगी...

टीलु - इंस्पेक्टर साहब... अगर बात इतनी ही गम्भीर है... तो हम दीदी के आसपास रहेंगे...

दास - हाँ... मैं एक काम करता हूँ... कांस्टेबल जगन को भी कह देता हूँ... वह भी आसपास रहेगा...

वैदेही - लो... अब आप भी...

दास - जी वैदेही जी... यह लड़ाई सबसे महत्त्वपूर्ण हैं... इसमें विश्व की हार होनी नहीं चाहए...

वैदेही - मैं मानती हूँ... पर...

दास - नहीं वैदेही जी... राजा हमेशा एक बात कहता है... या यूँ कहूँ के... मानता है... के उसके बराबर कोई नहीं है... बात सच है... विश्व की शख्सियत राजा से अलग है... विश्व जहां सच के लिए खड़ा है... वहीँ राजा... झूठ और अहं के लिए खड़ा है... विश्व बेशक शातिरपना अपनाता है... पर दिल से साफ है... वहीँ राजा... झूठ मक्कारी कमीनापन से शातिरपना अपनाता है...
 
शुक्रिया avsji भाई आपका बहुत बहुत शुक्रिया आभार l मेरी इस तरह से इस अपडेट की प्रस्तुति से आपको एहसास हो गया कि कहानी बड़ी तेजी से अपनी समाप्ति की ओर भाग रहा है l

जी बिल्कुल l रुप अभीतक सलामत भी इसी वज़ह से है क्यूँकी भैरव सिंह को इस बात का गुमान है कि रुप उसकी बेटी है l

बाकी अब भैरव सिंह सही मायने में अकेला हो गया है l जैसे कि वैदेही ने उसे श्राप दिया था l

कुछ बातेँ हैं जिसे औरतें कभी भी अपनी पेट में नहीं रख सकते l तो जाहिर है उगलना तो पड़ेगा l नागेंद्र से बढ़िया ऑपशन कुछ था ही नहीं l बाकी रही चरित्र भाई मैं भी अपनी अनुभव की आधार पर प्रस्तुत किया है 😜

कहानी की आधार वैदेही ही है l भैरव सिंह की बर्बादी की मुल भी वैदेही ही है l राजा अपनी लगातार हार से पागल हुआ जा रहा है और सारे के सारे दुश्मन मक्कार हैं l इसलिए वैदेही पर खतरा बढ़ता ही जा रहा है l

हाँ सेबती अब एक मात्र कड़ी है l पर भैरव सिंह चूँकि अब तक आश्वस्त है l मैं और ज्यादा छेड़ना नहीं चाहता l जब तक सच्चाइ सामने आएगी तब तक चिड़िया खेत चुग चुकी होगी l

हाँ पर जैसे कि कहानी में विश्व अनजान था l वर पक्ष से केवल वैदेही ही जानती थी l सेनापति दंपति को पीड़ा तो होगी ही पर वह आपस में समझा लेंगे l रही गाँव वालों की बात अब उन्हें इतना मालूम हो गया है कि वर भाग गया है l और बात को बतंगड़ करने के लिए सात दिन बहुत होते हैं l बाकी आप समझ सकते हैं l

हाँ भाई जैसा कि मैंने पहले भी कहा था l कहानी में अनायास ही कुछ चरित्रों को जोड़ दिया l अब जब कहानी में आ गए हैं तो उनके चरित्रों को उपयोग के साथ साथ न्याय भी करना पड़ेगा l और सच कहूँ भाई छोटी छोटी नाटक लिखने वाला जब इतना बड़ा कहानी लिखेगा l डर तो रहेगा कहीं कहानी में कोई भटकाव ना हो जाए l और ऊब जाना स्वाभाविक लगता है l

भाई इस कहानी से जुड़ने वाले बहुत से मित्रों ने यही सुझाव दिया है l हाँ इच्छा तो है पर सच यह भी है कि कहानी में कुछ परिवर्तन आवश्यक है l चूंकि इस फोरम के अनुरूप कहानी को गढ़ने की प्रयास में हाथ आजमाने की चेष्टा की थी l पर विफल रहा l कहानी को समाप्त हो जाने दीजिए मैं आपसे ना सिर्फ सहायता लूँगा बल्कि आपसे जुड़ना भी चाहूँगा l

अवश्य l ❤️
 
हर रावण के यहाँ विभीषण होता है या होते हैं l भैरव सिंह यहाँ कैसे अलग हो सकता है

ज़रूरी नहीं कि पिता बुरा हो तो संतान भी बुरे हों l दिलीप कर भैरव सिंह की संगत और छत्र छाया में अनगिनत कुकर्म किए l अंत काल में उसे अपना कर्म फल मिला भी बेटा बहु और बड़ी बेटी उसे छोड़ कर चले गए l एक छोटी बेटी थी जो अपने पिता के लिए क्षेत्रपाल की बलि चढ़ गई l पर अपनी बलिदान से दिलीप कर से वकील जयंत बाबु की हत्या का राज फास कर वैदेही से माफी मांगी थी l बलात्कार के बाद भी लड़ने की हिम्मत और हौसला वैदेही की रही l पर वही हिम्मत दिलीप कर की बेटी ना कर सकी l

सत्तू का चरित्र निःसंदेह उच्च स्तर का है l जो पहले अपनी प्रेमिका की खोज में बड़ा जतन कर भीमा के गिरोह में शामिल हुआ पर अपनी प्रेमिका को प्राप्त ना कर सका l ऐसे चाहने वाले भी हर प्रेमिका के भाग्य में नहीं होते l अपना प्यार ना हासिल कर पाया पर अपनी शत्रु की बेटी की प्यार को हारने नहीं दिया l इस में प्रतिशोध नहीं है l अपितु उसके व्यक्तित्व का एक अलग पहचान है l निसंदेह बहुत बड़ा त्याग भी है l

हाँ आपकी बातों में दम तो है l पर इतिहास में गर्भ में ऐसे चरित्र समाने नहीं आ पाते l वैदेही जैसी चरित्र जिस तरह से अपनी छाप छोड़तीं हैं l

दो चरित्र एक तरफ अनिकेत रोणा दूसरी तरफ़ दाशरथी दास l दोनों की सौबत और संगत अलग अलग थे l जहां अनिकेत रोणा भैरव सिंह के छत्र छाया में निरंकुश हो गया l भाग्य ने उसे उसी भैरव सिंह के हाथों मरवा दिया l वहीँ दाशरथी दास जैल में नौकरी के दौरान तापस सेनापति के दिग्दर्शन में रहा l दिल से अच्छा था इसलिए जैल में ही विश्व से दोस्ती भी हो गया था l यहाँ तक आपातकाल में विश्व से मदत लिया करता था l यह दोस्ती भी है और सम्मान भी l

पुलिस ऑफिसर भी अच्छे और ईमानदार होते हैं l इसमें कोई संदेह नहीं है l मेरे लिए पुलिस ऑफिसर हमेशा उनकी वर्दी में सुपर हीरो ही लगते हैं l जिस समाज में पुलिस अत्यधिक भ्रष्ट या लाचार हो l वही समाज को सुपर हीरो की प्रतीक्षा रहती है l भारत में पुलिस ऑफिसरों पर अनगिनत फ़िल्में बनी हुई है l रही अजय देवगन की सिंघम फिल्म तो मैंने देखा नहीं है कारण मैंने तेलुगु डब्ड तमिल फिल्म सूर्या की सिंघम देखा था l उसके तीनों सीरीज मैंने देखा है l उससे बहुत पूर्व शायद 1996 में मैंने तेलुगु में साई कुमार की पोलिस स्टोरी देखा था l वह फ़िल्में बहुत जबरदस्त थीं l

हाँ मैं कहानी में इसे और भी रोमांचक बना कर प्रस्तुत कर सकता था l पर इससे कहानी की लंबाई और भी खिंच जाती l यह शादी जब भैरव सिंह के सामने खुलेगा तब भैरव सिंह एक दम से पागल हो जाएगा l यह राज भैरव सिंह के सामने खुद रुप ही खोलेगी l

मेरी भी इच्छा यही है

क्यूँकी सबसे अहं इस शादी में सेनापति दंपति का ना होना l तो कुछ करते हैं l

धन्यवाद SANJU ( V. R. ) भाई सच कहूँ तो मुझे कहानी में हमेशा से आपकी, avsji भाई की और लियोन भाई और उन सभी मित्रों की समीक्षा और विश्लेषण का प्रतीक्षा रहती है ताकि कहानी को अगला मोड़ व अंत प्रदान कर सकूं l

मैंने कहानी को अंतिम मोड़ पर पहुँचा दिया है और आशा है बहुत जल्द एक बेहतरीन अंत प्रदान कर पाऊँगा l

तह दिल से शुक्रिया आभार
 
शुक्रिया मेरे लियोन भाई

हाँ रूप ने अपने दोस्तों को अपने पास देख कर और उनसे बात समझ कर विक्रम को चिट्ठी लिखी सेबती के हाथों l विक्रम को अंदाजा था विश्व वह शादी रुकवा देगा l बाकी वह वैदेही से मिलकर प्लान बनाया था l

पता नहीं कितना सच है पर अनुभव से बता रहा हूँ, लड़कियाँ अपनी पेट में बात छुपा नहीं सकती उन्हें किसी ना किसी को बताना होता है l रुप के लिए सबसे सुरक्षित कान नागेंद्र था l जिससे उसे कोई खतरा नहीं था l

हाँ भाई अब धीरे धीरे युद्ध का मैदान खुलने लगा है l दो फाड़ हो रहे हैं l भैरव सिंह के खेमे में बुरे लोग इकट्ठे हो रहे हैं और सच्चे अच्छे बरसों से भैरव सिंह के सितम सहने वाले एक तरफ हो रहे हैं l भैरव सिंह पागल हुआ जा रहा है l इसलिए वह गलतियों पर गलतियाँ कर रहा है l सत्तू का एक अपना दुखद इतिहास रहा है l वह अपनी प्रेमिका को ढूंढने और प्रतिशोध लेने भीमा से जुड़ा था पर वह कभी भैरव सिंह के सामने नहीं पहुँच पाया और जब गया उसकी हिम्मत जवाब दे गया l यही वज़ह है कि वह विश्व का साथ दिया l

हाँ भैरव सिंह विश्व की किसी आत्मीय को तलाश रहा है l जब कोई नहीं मिलेगा तब वह वैदेही पर अपना ध्यान केंद्रित करेगा l अब तक वैदेही सुरक्षित है क्यूँकी अहंकार वश भैरव सिंह ने वैदेही को ना कुछ करने की बात कही थी l पर वह अपनी ही दी हुई जुबान से पलटेगा l

हाँ आख़िर गौरी रही है रंग महल में कैद और नौकरानी बन कर l उसे राजा के हर कुकर्म का अंदाजा है l
 
👉एक सौ बासठवाँ अपडेट

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उमाकांत सर जी का घर

सुबह धूप खिल चुका है, विश्व और उसके चारों दोस्त घर में नहीं हैं l सत्तू नहा धो कर अपना पूजा पाठ ख़तम करता है और कपड़े बदल कर लाइब्रेरी वाले कमरे में आता है l अंदर एक शख्स को देख कर ना सिर्फ वह चौंकता है बल्कि उसके कदम ठिठक जाते हैं l वह विक्रम था जो एक कुर्सी पर बैठा किसी गहरी सोच में खोया हुआ था l जैसे ही वह सत्तू को देखता है हड़बड़ा कर कुर्सी से उठता है और एक झिझक के साथ अपना सिर झुका कर खड़ा होता है l

सत्तू - युवराज... आ प...

विक्रम - हाँ... (कुछ पल की चुप्पी के बाद) क्या... क्या मैं... तुमसे बात कर सकता हूँ...

सत्तू - जी... कहिए..

विक्रम - (झिझक और बैचेनी के साथ सत्तू के पास आता है) सत्तू... सबसे पहले... मैं तुम्हें थैंक्यू कहना चाहता हूँ... अगर तुम ना होते... तो मेरी बहन की राखी का लाज ना रख पाया होता...

सत्तू - कोई बात नहीं युवराज जी...

विक्रम - सत्तू... मैं... वह मैं

सत्तू - कहिए युवराज...

विक्रम - (संजीदा हो कर) सत्तू... मैं.. तुम्हारा... गुनाहगार हूँ... (कहकर अपनी जेब से एक खंजर निकालता है और सत्तू के हाथ में थमा देता है, सत्तू उसे हैरानी से देखता है ) तुम्हें... बदला लेना था ना... यह लो... तुम्हारा गुनाहगार तुम्हारे सामने है... मार डालो...

सत्तू एक पल के लिए खंजर को हाथ में लेकर देखता है फिर विक्रम को देखता है l फिर विक्रम के हाथ में खंजर रख देता है l

सत्तू - युवराज जी... किस्मत ने मुझे इस लायक ना छोड़ा... के किसीसे वफा निभा सकूँ... और खुद को इस लायक नहीं बना पाया... के... किसी से बदला ले सकूँ... ऐसा नाकारा... क्या किसी से बदला लेगा...

विक्रम - ऐसा ना कहो सत्तू... अभी तुम्हारे सामने भले ही खड़ा हुआ हूँ... पर... सच यह है कि.... की मैं अपनी नजरों में अभी गिरा हुआ हूँ...

सत्तू - मेरी शिकायत और नफरत जिससे थीं... आज वह अपनी लाचारी और बेबसी में घिरा हुआ है... जो कभी वक़्त को मुट्ठी में कर... खुद अपनी ही नहीं... दूसरों की किस्मत लिखने का दावा भर रहा था.... आज वह खुद वक़्त की ठोकर में पड़ा हुआ है... यह वक़्त बहुत जालीम है युवराज...

विक्रम - तुम... तुम किसकी बात कर रहे हो...

सत्तू - (हँसता है) मैं राजा भैरव सिंह की बात कर रहा हूँ... जिसने कभी भी... क्या वक़्त... क्या जिंदगी... किसी की ना परवाह किया... ना कदर... वक़्त बढ़कर कोई नहीं होता युवराज जी... आज वक़्त ने उसी राजा को छोड़ दिया है...

विक्रम - तुम्हारे साथ वक़्त ने क्या न्याय किया है सत्तू...

सत्तू - वक़्त कभी किसीके साथ न्याय नहीं करता.. वक़्त उसका साथ देता है... जो उसकी कदर करता है... और उसे छोड़ देता है जो उसकी बेकद्री करता है... मैंने भी कभी वक़्त की बेकद्री की थी... वक़्त ने मेरे साथ वही किया... आज जब जिंदगी का फलसफा समझ में आ गया.. मैंने वक़्त के साथ चलने और साथ देने का फैसला किया युवराज...

विक्रम - यह... यह तुम मुझे बार बार... युवराज मत कहो... मेरे दिल को ही नहीं... मेरे वज़ूद को चोट पहुँचा रही है...

सत्तू - (चुप रहता है और गौर से विक्रम को देखने लगता है l विक्रम को सत्तू की वह नजर असहज करने लगता है इसलिये विक्रम दूसरी तरफ जा कर एक कुर्सी पर बैठ जाता है)

विक्रम - (सत्तू से नजर मिलाने से कतराते हुए) तुमने कौनसी वक़्त की बेकद्री की है....

सत्तू - (विक्रम के दूसरी तरफ एक कुर्सी पर बैठ जाता है) मेरी रिश्ता जब... कर बाबु की बेटी से तय हो गई थी... तब विश्व के साथ हो रहे हर अन्याय का मैं... साक्षी रहा हूँ... मेरा मौन समर्थन... अपने ससुर के हर कुकर्म के प्रति... वक़्त के प्रति मेरी बेकद्री थी...

विक्रम - वक़्त ने तुम्हें बहुत जल्द आईना दिखा दिया... जब कि राजा साहब... अभी भी झुके नहीं हैं...

सत्तू - जिसकी कमाई जितनी... उसकी गंवाई भी उतनी है... मेरे हिस्से की... मैंने गंवा दी... राजा जी की तो हालात खराब है... वह अपने साथ अपनी पुरखों की कमाई भी गंवा रहे हैं... युवराज...

विक्रम के पास कहने के लिए कुछ सूझ नहीं रहा था l विक्रम अपनी नजर उठा कर सत्तू को देखता है, सत्तू उसे एक टक देखे ही जा रहा था l

विक्रम - तुम्हारा गुस्सा... तुम्हारा नफरत किसके लिए है सत्तू...

सत्तू - राजा साहब के लिए... पर मेरी खून में ना तो वह उबाल था... ना ही मेरे जज्बातों में.. उतनी गर्मी... जब एहसास हुआ... के राजा साहब के वज़ूद को ललकारना मेरे बस की बात नहीं है.. तब मैंने वैदेही दीदी को देखा... जो डटकर राजा साहब की आदमियों से लोहा ले रही थी... एक दिन मौका पाकर... उनसे बात की... तो उन्होंने ही कहा था... के एक दिन उनका भाई लौटेगा... राजा की महल का... ईंट से ईंट बजा देगा... कोई तो हो... उस महल की दरवाजा अंदर से खोलने के लिए...

विक्रम - तो तब जाकर तुमने... भीमा के जरिए.. महल में घुसने की कोशिश की...

सत्तू - हाँ... युवराज...

विक्रम - (चिढ़ जाता है) यह बार बार मुझे युवराज क्यूँ कह रहे हो...

सत्तू - (चुप रहता है)

विक्रम - (झिझकते हुए) तुम चाहते... तो... विश्व और रुप के बारे में राजा साहब से कह देते... उससे भी तो तुम्हारा बदला... (रुक जाता है)

सत्तू - नहीं युवराज... बदला वह होता है... जो अपनी नाकामी के ज़ख्मों को... दुश्मन के दुश्मन की जीत से... भरता है... विश्व और रुप की प्रेम की जीत में... मेरी जीत है... बदला भी है... और क्या चाहिए युवराज...

विक्रम - ( उठ खड़ा होता है) मैं तुम्हारा गुनाहगार जितना था... हूँ... उतना ही कर्जदार भी रहूँगा... मैं चाहे किसी के भी सामने अपनी नजरें और सीना ताने खड़ा हो जाऊँ... पर तुम्हारे सामने मेरी नजरें हमेशा झुकी हुई रहेगी... जो मुझे मेरे किए उस गुनाह को याद दिलाता रहेगा... जो मैंने जान बुझ कर या होशोंहवास में नहीं किया था... पर गुनाह हुआ था... जिसकी भरपाई वक़्त ने की है... मैंने अपने भाई को खो दिया... मैंने उस पहचान को छोड़ दिया... जिसके बदौलत यह सब हुआ... आज मैं एक आम राजगड़ वासी हूँ... मैं फिर से पूछ रहा हूँ... क्या तुम कभी भी... मुझे माफ कर पाओगे...

सत्तू - (कुछ पल के लिए चुप हो जाता है) नहीं... नहीं युवराज... आप महान हो... सच्चाई के लिए... अपनों को छोड़ किसी आम के लिए खड़े हो गए... आपका कद अब बहुत बड़ा हो गया है... आपके आगे मेरा कद बहुत छोटा है... आप मुझसे कुछ मांगीए मत... आप झुक तो सकते हैं... पर मैं ऊपर उठ नहीं सकता... हम सब एक अनचाहे लड़ाई का अब हिस्सा हैं... अपने अपने किरदार में हैं... इस लड़ाई का अंजाम सिर्फ और सिर जीत ही होनी चाहिए... यह जीत मेरे भीतर की हीन भावना... आपके भीतर की युवराज को ख़तम कर देगी... तब हम सब एक होंगे...

विक्रम - देखो सत्तू... इतनी बड़ी बड़ी बातेँ मेरी समझ से परे हैं... मैंने तुमसे एक सीधा सा सवाल किया है... तुम उसका सीधा सा जवाब क्यूँ नहीं दे रहे...

सत्तू - जिंदगी छोटी है युवराज... पर तजुर्बे बहुत दिए... आप और मैं एक ही कश्ती में सवार क्यूँ हैं... क्यूँकी हम सब ने कुछ न कुछ खोया है... कोई ज्यादा... कोई कम... हम सबको ज़ख्म मिला है... दर्द किसीका ज्यादा है... किसी का कम... पर सामने तूफान है... हम सब अपनी अपनी भूमिका को लिए... इस कश्ती को किनारे पर पहुँचाना है... उसी वक़्त जब हम किनारे पर होंगे... ना आपके दिल में कोई गिला होगा... ना मेरे दिल में कोई शिकवा... इसलिए... आपका यह सवाल इस वक़्त जायज नहीं है... और सच कहूँ तो मेरे पास इसका जवाब नहीं है... (विक्रम उसे एक टक देखे जा रहा था) युवराज... आप मेरी नज़र में अब भी युवराज हैं... मेरी भावनायें भड़की जरूर थी पर... लाचारी और बेबसी मुझ पर हावी रही... मुझे बदला लेना नहीं आया... ऐसा सिर्फ मेरी हालत नहीं है... इस गाँव के हर एक उस शख्स का है... जो अपनी लाचारी और बेबसी के तले... पुश्तों से झेल रहे सितम के खिलाफ आग को बुझने नहीं दिया है... आज विश्व की लड़ाई में... अपनी लड़ाई देख रहे हैं... एक दिन विश्व के साथ खडे होकर बवंडर बन जाएंगे... उस बवंडर का हम भी हिस्स होंगे... तब जो जीत होगी... वह जीत हम सबकी होगी... आपकी... मेरी... इन गाँव वालों की... वही जीत... हमारी अतीत के ज़ख्मों को हमेशा के लिए भर देगी... बस उस जीत की प्रतीक्षा कीजिए... उस जीत के बाद... आपमे और हम में कोई फर्क़ ना होगा... तब ना आप युवराज होंगे... ना मैं ऐसा...

सत्तू चुप हो जाता है l विक्रम उसे सुन रहा था और सत्तू की कही हर एक शब्द उसे झिंझोड रहा था l विक्रम नजरें उठा कर सत्तू की ओर और देख नहीं पाया l झुके कंधे और थके कदम को उठा कर बाहर निकल जाता है l पीछे सत्तू एक गहरी साँस लेकर अंदर चला जाता है l

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अपनी कार से उतर कर महल की सीडियां चढ़ते हुए बल्लभ दरवाजे पर खड़े भीमा के पास आकर खड़ा होता है l

बल्लभ - राजा साहब कहाँ है भीमा...

भीमा - अपने खास कमरे में... आप ही का इंतजार कर रहे हैं...

बल्लभ - चलो फिर...

भीमा - नहीं वकील बाबु... राजा साहब... खास आपसे बात करना चाहते हैं... हमें... हिदायत दी गई है... जब तक ना बुलाया जाए... तब तक हममें से कोई... अंदर नहीं जाएगा...

बल्लभ - ओ...

बल्लभ और कुछ नहीं कहता है l भीमा को वहीँ छोड़ कर आगे बढ़ता है और रणनीतिक प्रकोष्ठ में दरवाजे पर खड़ा होता है l देखता है दीवार पर लगे टीवी के स्क्रीन पर एक न्यूज क्लिप पॉज हो कर रुक गया है l

बल्लभ - गुस्ताखी माफ राजा साहब... क्या मैं अंदर आ सकता हूँ...

भैरव सिंह - हूँह्ह्हम्म्म्... आओ... प्रधान आओ... (बल्लभ अंदर आता है) (टीवी की ओर इशारा करते हुए) क्या इस लड़की को जानते हो... (बल्लभ टीवी की स्क्रीन पर देखता है, वह सुप्रिया रथ थी)

बल्लभ - जी राजा साहब... यह सुप्रिया रथ है... नभ वाणी न्यूज एजेंसी में... एडिशनल एडिटर है... और...

भैरव सिंह - और...

बल्लभ - प्रवीण रथ की बहन है...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म...

भैरव सिंह चुप हो जाता है, बल्लभ उसे देखता है, भैरव सिंह आँखे मूँद कर बड़े शांत स्वभाव से अपनी हाथ मल रहा था l

बल्लभ - राजा साहब... क्या कुछ गलत हो गया है...

भैरव सिंह - नहीं... बल्कि जो गलत कर रहे हैं... उनके लिए... हम कुछ सोच रहे हैं...

बल्लभ - मैं कुछ समझा नहीं...

भैरव सिंह - हम एक... वाइल्ड लाइफ पर डॉक्यूमेंट्री देख रहे थे... एक शेर बुढ़ा हो गया है... कुछ करने की हालत में नहीं है... तब कुछ कुत्ते उस पर टुट पड़े... (कह कर बल्लभ की ओर देखता है) पर यहाँ शेर बुढ़ा नहीं हुआ है... हाँ पर... शांत बैठा हुआ है... और वह भी अपनी मांद के अंदर... तो कुत्तों ने झुंड बना कर... मांद में घुसने की कोशिश में हैं.... उनके लिए एक अच्छी खबर है... के शेर थोड़ा घायल है... पर वह... जो भूल रहे हैं... शेर जब घायल हो जाता है... तब जंगल में... मौत शिकारी के ऊपर मंडराने लगती है... पर यहाँ शेर... अपनी ही मांद में है... अब उनकी खुशफहमी बहुत जल्द दूर करना होगा...

भैरव सिंह बल्लभ की ओर देखता है l बल्लभ कुछ सोच रहा था l भैरव सिंह बल्लभ से पूछता है

भैरव सिंह - क्या सोचने लगे प्रधान....

बल्लभ - मैं सब समझ रहा हूँ राजा साहब... विश्व अपना कुनबा बढ़ा रहा है... जो खेल हमने उसे फंसाने के लिए खेला था... वही खेल वह हमसे खेल रहा है... हमने तब मीडिया का साथ लिया था... विश्व अब मीडिया को हमारे खिलाफ इस्तेमाल कर रहा है...

भैरव सिंह - कुछ नया बोलो प्रधान...

बल्लभ - मैं समझा नहीं राजा साहब...

भैरव सिंह - कुछ ऐसा... जो हमारी जेहन से छूट गया हो...

बल्लभ - (कुछ कहने को होता है पर चुप हो जाता है)

भैरव सिंह - कुछ कहते कहते रुक क्यूँ गए प्रधान...

बल्लभ - राजा साहब... मुझे लगा... और दो दिन बाद... हमें... कोर्ट के सामने पेश होना है... तो उसके लिए हमारी क्या तैयारी है... या करनी है... आप उस पर बात करना चाह रहे हैं...

भैरव सिंह - (बल्लभ के पास आता है और उसके आँखों में आँखे डाल कर पूछता है) तुम्हें क्या लगता है प्रधान... क्या मैं पागल हो गया हूँ...

बल्लभ - (सकपका जाता है)

भैरव सिंह - चौंको मत... कभी कभी इस हम को ढोते ढोते... थक जाता हूँ... इसलिए हम को छोड़ कर... मैं को बाहर लाया हूँ... अब बोलो... क्या मैं तुम्हें पागल लगता हूँ...

बल्लभ - (हकलाते हुए) न.. नह.. नहीं.. र.. रा.. राजा साहब... मैं ऐसा सोच... भी.. नहीं सकता...

भैरव सिंह - अगर मैं पागल नहीं हूँ... तो क्या मैं... बेवकूफ़ी कर रहा हूँ... क्या लगता है तुम्हें...

बल्लभ - आई एम सॉरी... राजा साहब... मैं बाद में आता हूँ...

भैरव सिंह - हँसते हुए) हा हा हा हा... डर गए... (अचानक सीरियस हो कर) हाँ डरना चाहिए... तुम्हें ही नहीं... मुझसे जुड़े हर एक शख्स को... मेरे बारे में जानने वाले हर एक शख्स को... डरना चाहिए... फिर... (कुछ देर के लिए एक पॉज लेता है) फिर क्यूँ... कुछ लोग मुझसे डरना छोड़ रहे हैं... और उनका कुनबा बढ़ता ही जा रहा है...

बल्लभ - ऐसा नहीं है राजा साहब... अगर विश्वा आप से डर ना रहा होता... तो सेनापति दंपति को छुपाता क्यूँ...

भैरव सिंह - मेरा मन मत बहलाओ प्रधान... मत बहलाओ... यह डर... जिसकी धार पर... हम आजादी के बाद भी... शाशन में दखल रखा करते थे... वह डर जिसकी जागीर... हमने विरासत में... विरासत में पीढ़ी दर पीढ़ी हासिल की... वही डर की जागीर... अब किसी रेत की तरह... मेरी मुट्ठी से फिसलती जा रही है... (एक पॉज) है ना...

बल्लभ - नहीं... राजा साहब... यह सच नहीं है...

भैरव सिंह - मेरे परदादा... सौरभ सिंह क्षेत्रपाल... इस डर की जागीर... लंबोदर पाइकरॉय परिवार को तबाह व बर्बाद कर... कायम की थी... जिसे पुस्तैनी विरासत को तरह... मुझ तक... जिम्मेदारी आई.... पर... मेरे आगे की पीढ़ी... मुझसे ही तौबा कर ली है... और मुझसे... अब यह जागीर छूटने लगा है... (चुप हो जाता है)

बल्लभ - राजा साहब...

भैरव सिंह - नहीं प्रधान नहीं... मैं मायूस या निरास नहीं हूँ... बल्कि... मैं अब संकल्पबद्ध हूँ...

बल्लभ - किस चीज़ के लिए राजा साहब...

भैरव सिंह - सौरभ सिंह क्षेत्रपाल के दिए... हम की बोझ ढोते ढोते... वह बोझ कहीं फिसल गया है... अब मुझे कुछ ऐसा करना होगा... जिससे मेरी आने वाली पीढ़ी... मेरे दिए हम को ढोएगी....

इतना कह कर भैरव सिंह चुप हो जाता है l बल्लभ भी खामोश हो जाता है l कमरे में इस कदर शांति थी के भैरव सिंह के तेज तेज चलते साँसे बल्लभ को सुनाई दे रही थी l

बल्लभ - (थूक को हलक से उतारते हुए) मैं कुछ कुछ समझ रहा हूँ... आपने... फ्री लांसर मर्सीनरीज को क्यूँ बुलाया है... पर उन्हें आने में अभी भी वक़्त है... पर कोर्ट में तो हमें... दो दिन के बाद पेश होना है....

भैरव सिंह - हाँ... उसके लिए... तुम अपना दिमाग लगाओ... कुछ सिचुएशन बनाओ.... ताकि अदालत हमें कुछ वक़्त दे दे... (बल्लभ खामोश रहता है) क्या सोचने लगे...

बल्लभ - राजकुमारी जी की शादी टुट गई...

भैरव सिंह - गलत... सगाई...

बल्लभ - जी जी... सगाई... पर अब...

भैरव सिंह - कुछ करो... इसीलिये तो तुम हमारे... लीगल एडवाइजर हो...

बल्लभ - ठीक है... मैं कुछ... सोच कर बताता हूँ... क्या मैं अब... आपसे इजाजत ले सकता हूँ...

भैरव सिंह - बेशक...

सुन कर वापस जाने लगता है l दरवाजे पर पहुँच कर मुड़ता है और भैरव सिंह से पूछता है l

बल्लभ - राजा साहब... जाने से पहले... एक बात पूछूं...

भैरव सिंह - (तब तक अपनी कुर्सी पर बैठ चुका था) हाँ... पूछो...

बल्लभ - आप... आप करना क्या चाहते हैं...

भैरव सिंह - इतिहास... तुमने हमेशा एक कहावत सुनी होगी... इतिहास खुद को दोहराता है...

बल्लभ - जी... सुना है...

भैरव सिंह - (मुस्कराते हुए) इस गाँव में... लंबोदर पाइकरॉय की संख्या बढ़ रही है... उन्हें अब सौरभ सिंह क्षेत्रपाल के इलाज की जरूरत है... राजगड़ ही नहीं... बहुत जल्द पूरा स्टेट वह दौर देखेगा... जो अब तक... किंवदन्तीओं में सुनते आए हैं...

बल्लभ के तन बदन में कप कपी दौड़ जाता l वह अपना सिर झुका कर कमरे से निकल जाता है l

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अगले दिन

वैदेही कनाल के पास आती है, देखती है विक्रम सीढ़ियों पर बैठा बहती पानी की धार को देख रहा था l वैदेही सीढ़ियां उतरकर विक्रम के बगल में बैठ जाती है l विक्रम वैदेही को देखता है और फिर बहती पानी की ओर देखने लगता है l

वैदेही - जानते हो... इस कनाल को मेरे पिता... रघुनाथ महापात्र ने बनाया था...

विक्रम - ओह... तो क्या प्रताप... अपने पिता को याद करने के लिए... यहाँ आता है...

वैदेही - नहीं ऐसी बात नहीं है... वह जब भी... थोड़ा अंदर से अस्तव्यस्त या भ्रम में होता है... या खुद से नाराज होता है... तब वह इसी कनाल के पास आता है... और कभी कभी... महल के पीछे वाली घाट पर जाता है... कभी उगते सूरज को देखता रहता है... तो कभी डूबते सूरज को....

विक्रम - हाँ... मैं भी उससे दो तीन बार... नदी की घाट पर मिला हूँ...

वैदेही - हूँ... वैसे तुम इस वक़्त... यहाँ क्या कर रहे हो...

विक्रम - क्या आप प्रताप को ढूंढने आई थीं...

वैदेही - सवाल के जवाब में सवाल नहीं होता विक्रम...

विक्रम - हाँ... सवाल के जवाब में सवाल नहीं होता... पर जिसे ज़वाब की तलाश हो... वह क्या जवाब देगा...

वैदेही - तुम्हें किस सवाल का जवाब तलाश है विक्रम...

विक्रम - पता नहीं... मैं सवाल का जवाब ढूंढ रहा हूँ... या सवालों से भाग रहा हूँ...

वैदेही - हूँम्म्म्... मतलब तुम अब भ्रमित हो...

विक्रम - (कोई जवाब नहीं देता)

वैदेही - कल सुबह... तुम लाइब्रेरी गए थे... फिर वहाँ से निकले... घर में बहुत अशांत रहे... आज सुबह से घर से निकले हो... और अब यहाँ मिल रहे हो... (विक्रम अपनी नजरें फ़ेर लेता है) क्या इसीलिए... तुम कनाल के किनारे... जवाब ढूंढने आए हो...

विक्रम - (वैदेही से नजरें चुराते हुए) हाँ शायद...

वैदेही - कल लाइब्रेरी में क्या हुआ विक्रम... (विक्रम फिर भी ना नजरें मिलाता है ना ही कोई जवाब देता है) कम से कम... मेरे इस सवाल का जवाब तो दो...

विक्रम - (बहती पानी की धार की ओर देखते हुए) मैं... एक नाकामयाब... नाकारा आदमी हूँ... जब कभी अच्छा बनने की कोशिश की... तो ना तो दुनिया ने... ना अपनों ने... मुझे अच्छा बनने दिया... जब बुराई की हद तक बुरा बनने की कोशिश की.. बुरा भी ना बन पाया... बाप की दी हुई पहचान... और अपनी वज़ूद के बीच झूलता ही रह गया... जिससे दोस्ती करी... उसे खो दिया... जिसे बेटे की तरह... खुद से ज्यादा चाहा... वही भाई मुझे छोड़ कर चला गया... बाप दादाओं की पहचान से छुटकारा चाहा... पर... मैं अपने अतीत से... अतीत की हर गुनाह से छूटना चाहता हूँ... पर... (रुक जाता है)

वैदेही - मुझे फिर भी... जवाब नहीं मिला... कल सुबह तुम लाइब्रेरी गए थे... वहाँ क्या हुआ...

विक्रम एक हारे हुए आदमी की तरह वैदेही की ओर देखता है और मायूसी भरे आवाज में सुबह हुई सत्तू के साथ सारी बातों को वैदेही से जिक्र करता है l सब सुनने के बाद

वैदेही - ह्म्म्म्म... तो तुम्हें लगता है... सत्तू तुम्हें माफ नहीं किया... (विक्रम कोई जवाब नहीं देता) देखो विक्रम... तुमने... अपने पिता का खेमा छोड़ दिया... इसका मतलब यह तो नहीं हुआ... के तुमने अपनी सारे गुनाहों से तौबा कर लिया... अनजाने सही... गुनाह तो हुआ है... जितना तुम खुद को गुनाहगार समझ रहे हो... तुम उतना ही... सत्तू के भावनाओं के गुनाहगार हो... विक्रम... तुम्हें परिवार ने... इस गाँव के साथ नजाने कितनी पीढ़ियों से... किस किस तरह से जुल्म किए हैं... उनके आत्मा और जेहन में... नजाने कितने और कैसे कैसे ज़ख्म दिए हैं... तुमने अपने पिता का खेमा बेशक छोड़ दिया... पर तुमने गाँव वालों को तो बदले में नहीं चुना ना... बस तुम उन्हें चुन लो... तुम्हारे इसी कर्म से... तुम्हारे पुरखों के गुनाहों के वज़ह से... पीढ़ियों से दर्द झेल रहे गाँव वालों के ज़ख्म... भर जाए...

विक्रम - क्या इसीलिए आपने मुझे... गाँव में रुक जाने के लिए कहा था...

वैदेही - हाँ... विक्रम... तुम अगर उस दिन... गाँव से चले गए होते... तो तुम आगे चल कर अपनी ही नजरों में भगोड़े हो जाते... तुम अगर यहाँ रुकते हो... तो इस गाँव पर हुए हर अत्याचार का प्रायश्चित... तुम्हारे हाथों हो पाएगा...

विक्रम - प्रताप... गाँव वालों के लिए लड़ तो रहा है...

वैदेही - हाँ वह लड़ रहा है... क्यूँकी उसके हिस्से युद्ध है... पर तुम्हारे हिस्से प्रायश्चित है... जो कि तुम्हें यहाँ रह कर... उन्ही के बीच रह कर... तुम्हें करना है... हाँ अगर इन सबसे बच कर जाना चाहते हो... तो जा सकते हो... तुम्हें तुम्हारी पहचान कचोट रही है... सिर्फ सत्तू ही नहीं... पुरे गाँव वालों के लिए... तुम युवराज ही हो... तुम्हें विक्रम बनना है... उनके नजर में... उनके लिए बनना है... तो तुम्हें यहाँ उनके साथ उनके बीच रहकर बनना पड़ेगा...

विक्रम - मैं अकेला...

वैदेही - तुम अकेले नहीं हो... तुम्हारे साथ वह है... जो मुझे यहाँ लेकर आई है...

विक्रम पीछे मुड़ कर देखता है सीढ़ियों के ऊपर शुभ्रा टीलु के साथ खड़ी थी l विक्रम अपनी जगह से उठ खड़ा होता है l वैदेही भी खड़ी होती है l

वैदेही - तुम सुबह से घर से निकले... शाम तक घर नहीं लौटे... तुमने यह भी नहीं सोचा... के छह आँखे तुम्हारी राह तक रहीं हैं...

विक्रम - मैं... मैं वाकई शर्मिंदा हूँ..

वैदेही - होनी भी चाहिए... जाओ... शुभ्रा को लेकर घर जाओ... यह मत भूलो... वह अकेली जान नहीं है...

विक्रम और वैदेही दोनों शुभ्रा के पास आते हैं l विक्रम शुभ्रा की हाथ पकड़ कर कहता है

विक्रम - मुझे माफ कर दो शुब्बु... मैं भूल गया था... के मैं अकेला नहीं हूँ...

वैदेही - यह तुम्हारी गलती है विक्रम... तुम अकेले नहीं हो... फिर भी... खुद को अकेलेपन में घेरे रखे हुए थे...

विक्रम - कहा तो था... मैं शर्मिंदा हूँ... (शुभ्रा से) मुझे माफ कर दो... मुझे हर सजा मंजुर है... बस रूठना मत...

शुभ्रा - विकी... रूठ कर... मैंने क्या खोया था... यह मैं जानती हूँ... मैं बस चाहती हूँ... आप उस दौर से कभी ना गुजरें... मैं आज आपके हर कदम... हर फैसले में... आपके साथ हूँ... बस आप कभी खुद को अकेला मत समझिए... खुद को अकेला मत कीजिए...

विक्रम - वादा... आगे से... ऐसा नहीं होगा...

वैदेही - बस बस... भावनाएँ ज्वार की तरह उमड़ रही है... बाकी जो भी बात करनी हो घर पर करो...

विक्रम - (अपना सिर हिला कर शुभ्रा को साथ लेकर जाने लगता है फिर अचानक रुक कर मुड़ता है और वैदेही से) दीदी... आप महान हो...

वैदेही - मैंने ऐसा कुछ भी नहीं किया है... जिससे कोई मुझे महान कहे... जाओ जाओ... मेरी बड़ाई मत करो...

विक्रम मुस्करा देता है और शुभ्रा का हाथ थाम कर चल देता है l टीलु और वैदेही उन्हें जाते हुए देखते हैं l थोड़ी देर के बाद

टीलु - दीदी... विक्रम ने तो सही कहा ना... आप वाकई महान हो...

वैदेही - अब तु शुरु हो गया...

टीलु - तुम सबको चुप करा दोगी... पर विश्वा भाई को कैसे चुप कराओगी... वह तो कहते ही हैं... तुम महान हो...

वैदेही - हम्म... मतलब तुमने कुछ किया है.... अब सच सच बता... क्या गुल खिला कर आया है...

टीलु - कुछ... कुछ तो नहीं...

वैदेही - देख अगर मुझे कुछ पता चला तो तेरी खैर नहीं...

टीलु - दीदी... मैंने कुछ नहीं किया... बस गाँव वालों के कान भरे... वह भी अपनी मीठी मीठी बातों से...

वैदेही - ऐ... क्या किया

टीलु - कुछ नहीं... शुकुरा और भूरा की कुटाई करवा दिया...

वैदेही - क्या... पर क्यों...

टीलु - वे दोनों हरामी साले...

वैदेही - (एक थप्पड़ मारती है) अपनी दीदी के सामने गाली देता है...

टीलु - आह.. (गाल सहलाते हुए) वे दोनों हैं ही... उस गाली के लायक... (वैदेही हाथ उठाती है मारने को) पुरी बात तो सुनो... (वैदेही का हाथ रुक जाता है) वे दोनों... मल्लि से... उसके के बारे में.. पूछताछ कर रहे थे...

वैदेही - क्या...

टीलु - हाँ... पास ही खड़ा था... मैंने गाँव वालों उल्टा सीधा जो भी आया... उन दोनों के बारे में बोल दिया... बोलते बोलते... गाँव वालों की अंदर की मर्दानगी को ललकारा... बस और क्या... उन दोनों की कंबल कुटाई करवा दिया... वह साले... अपने पैरों पर भी नहीं चल पाए... हम लोगों ने ही उठा कर रंग महल के बाहर फेंक आए... मेरा मतलब है छोड़ आए...

वैदेही - (संजीदा हो जाती है) ह्म्म्म्म... मतलब... भैरव सिंह... वह अनुष्ठान करेगा...

टीलु - हाँ दीदी... मुझे भी यही लगता है... क्यूँ ना विश्वा भाई से इस बारे में बात करें...

वैदेही - नहीं... हरगिज नहीं... विशु को... सिर्फ केस पर ध्यान देने दे... मल्लि को मैं अपनी निगरानी में रखूंगी... उसे मैं कुछ भी होने नहीं दूंगी...

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कोई अनजान हस्पताल का एक विशेष कमरा l मेडिकल बेड पर प्रतिभा लेटी हुई है l उसे सलाईन चढ़ाया जा रहा है l तापस प्रतिभा को जूस पीला कर ग्लास को बगल की टेबल पर रख देता है l बुझे मन से तापस प्रतिभा से सवाल करता है l

तापस - अब कैसा लग रहा है...

प्रतिभा - हाँ... थोड़ा बेहतर लग रहा है... (तापस उठ कर खिड़की के पास जाकर खड़ा हो जाता है) क्या हुआ...

तापस - (मूड कर प्रतिभा को देख कर) जान... तुम बहुत स्वार्थी हो... तुम्हें मेरे बारे में... जरा भी खयाल नहीं है...

प्रतिभा - आप ऐसे तो ना कहिए...

तापस - (चुप रहता है)

प्रतिभा - एक कैद सी जिंदगी हो गई है... आदत नहीं थी मुझे... इसलिए...

तापस - (चुप रहता है)

प्रतिभा - प्रताप को भी तो... मेरी खबर लेनी चाहिए थी...

तापस - अब से वह तुमसे बात करेगा...

प्रतिभा - (चेहरे पर रौनक आ जाती है) क्या..

तापस - हाँ... मैंने लेनिन को... कुछ अरेंजमेंट करने के लिए कहा है... वह जुगाड़ लगाने गया है...

प्रतिभा - तो यह शुरु से कर देना चाहिए था... सत्रह दिन... ऐसा लग रहा है... जैसे... अर्सा हो गया है...

तापस - ह्म्म्म्म...

प्रतिभा - क्या ह्म्म्म्म... प्रताप भी... मेरी कोई खैर लेता ही नहीं...

तभी कमरे में लेनिन आता है l हाथ में कुछ फल वगैरह थे l उसे देखते ही प्रतिभा सवाल दाग देती है l

प्रतिभा - क्या अरेंजमेंट किया तुमने...

लेनिन - आंटी जी... मैंने खबर भिजवा दिया है... कुछ ही देर में... एक मोबाइल हमें मिल जाएगा... पर कॉल... विश्वा भाई करेंगे... तब तक के लिए... आपको इंतजार करना पड़ेगा...

प्रतिभा - (लेनिन से) आजा मेरे बच्चे.. आ.. तेरा माथा चूम लूँ... आ...

लेनिन तापस की ओर देखता है l तापस उसे इशारे से प्रतिभा के पास जाने को कहता है l लेनिन प्रतिभा के पास जा कर झुकता है l प्रतिभा लेनिन के कान को जोर से पकड़ लेती है l लेनिन दर्द से चिल्लाने लगता है l

प्रतिभा - यह जुगाड़... पहले क्यूँ नहीं किया... मेरी जान पर बन आई... तब जाकर कर रहा है...

लेनिन - आह आह... आपने ही तो... भाई से वादा किया था... आप रह लेंगी... भाई को आपकी बहुत चिंता थी...

प्रतिभा - मालूम है... उसे मेरी कितनी चिंता है... अब बोल उस तक कैसे खबर पहुँचाई तुने...

लेनिन - डैनी भाई... कटक में हैं... मैंने उन तक खबर पहुँचाई है... वह एक एनक्रीपटेड़ मोबाइल भिजवा रहे हैं... और विश्वा भाई को भी खबर कर दिया होगा... विश्वा भाई अपना टाइम निकाल कर... आपको फोन करेंगे...

प्रतिभा - यह एनक्रीपटेड़ क्या होता है...

तापस - जान... एनक्रीपटेड़ का मतलब होता है...

प्रतिभा - मैंने आपसे नहीं पूछा है... आप चुप रहिए... (तापस चुप हो जाता है) (लेनिन से) हाँ मैं तुझसे कुछ पूछ रही थी...

लेनिन - आह... एनक्रीपटेड़ मतलब... जिस पर कॉल ट्रेस ना हो पाए...

प्रतिभा - अच्छा... तो यह जुगाड़... पहले क्यूँ नहीं किया...

लेनिन - मुझे लगा था... सॉरी सॉरी... भाई को लगा था... आप महीना चालीस दिन रह लेंगी... पर भाई गलत निकले...

प्रतिभा - (और जोर से कान खींचती है) क्या कहा... मेरा प्रताप गलत है...

लेनिन - नहीं नहीं... आह... मैं... मैं गलत निकला... आंटी जी... प्लीज मेरा कान छोड़ दीजिए... दर्द हो रहा है...

प्रतिभा - (लेनिन का कान छोड़ देती है और बेड पर पालथी मार कर बैठ जाती है) ले छोड़ दिया... तो फोन कब लाकर दे रहा है...

लेनिन - बस दो ढाई घंटे के अंदर...

प्रतिभा - ह्म्म्म्म... अब आ मेरे पास...

लेनिन - नहीं नहीं आंटी... मैं...

प्रतिभा - अब तु सीधी तरीके से मेरे पास आता है... या...

डरते डरते बेमन से लेनिन फिर से अपना सिर झुकाता है l इसबार प्रतिभा लेनिन का सिर अपनी हाथों में लेती है और लेनिन के माथे को चूम लेती है l लेनिन हैरानी से प्रतिभा की ओर देखता है l

प्रतिभा - अब क्या हुआ...

लेनिन - (हैरान हो कर) आप पहली बार मुझे प्यार किया है...

प्रतिभा - हाँ तो... पहली बार कोई काम ढंग से किया...

लेनिन - (आँखे छलकने को होता है पर मुस्करा देता है) मैं जा रहा हूँ... मोबाइल लाने...

कह कर बाहर चला जाता है l प्रतिभा अपनी हाथ से सलाइन की सुई को निकाल देती है l तापस हैरानी और फिक्र से प्रतिभा के पास आता है l पर तब तक प्रतिभा बेड से उठ खड़ी हो चुकी थी l

तापस - जान... तुम कमजोर हो अभी...

प्रतिभा - कुछ नहीं होगा... मेरा दवा लाने लेनिन गया है...

तापस - कहीं तुम... जानबूझकर अपनी सेहत खराब तो नहीं कि..

प्रतिभा - ऐसा कुछ नहीं है... मैं प्रताप के जुदाई में आधी हो गई थी... पर उसकी आवाज़ सुनने की चाहने... मेरे अंदर... फिर से ऊर्जा भर दी है...

तापस - (पास के एक कुर्सी पर बैठ जाता है) ह्म्म... एक उम्र में आते आते... जरूरतें बदल जाती हैं... पति से ज्यादा औलाद चाहिए होता है...

प्रतिभा - हो गया... ताना मारने की कोई जरूरत नहीं है... मैं जानती हूँ... तुम बाप बेटे... कॉन्टैक्ट में हो... उसकी हर खबर तुम्हारे पास है... मेरा दिल कह रहा है... कुछ ना कुछ हुआ ज़रूर है... पर तुमने मुझे बताया नहीं है... आज तो मैं जान कर ही रहूँगी.. समझे...

तापस - (दबी आवाज में) मर गए...

प्रतिभा - ऐसे कैसे... यम राज आयेंगे तो... सामने खड़ी हो जाऊँगी...

तापस - तुमने सुन लिया क्या...

प्रतिभा - हाँ... और आप भी सुन लीजिए... आज प्रताप की भी खैर नहीं है... तुम बाप बेटे मिलकर क्या गुल खिलाए हैं... यह जान कर ही रहूँगी... (तापस उठ कर जाने की कोशिश करता है) बैठिए... कहाँ जा रहे हैं...

तापस - (बैठ जाता है) मैं वह... लेनिन कहाँ गया... यह देखने जा रहा था...

प्रतिभा - वह आ जाएगा... ह्म्म्म्म... पहले यह बताइए... क्या कहा आपने.. उम्र के हिसाब से... जरूरतें... कुछ ऐसा ही कहा ना आपने...

तापस - अरे जान... तुम क्यूँ अपना बीपी बढ़ा रही हो... बेकार में... तुम्हारे गुस्से का शिकार बन गया... बेचारा लेनिन...

प्रतिभा - अच्छा... क्या ऐसा कर दिया मैंने...

तापस - अरे जरा सोचो... कितना बढ़िया अरेंजमेंट किया है... एक प्राइवेट हास्पिटल में... तुम्हें एक वीआईपी कमरे में रखा है...

प्रतिभा - ह्म्म्म्म... और...

तापस - और... मुझे मेल नर्स के रुप में... हॉस्पिटल में... रखवा दिया है...

प्रतिभा - ह्म्म्म्म... और...

तापस - और क्या...

प्रतिभा - मैं आज आपके चिकनी चुपड़ी बातों में आने वाली नहीं... समझे... आज एक एक करके सबकी खबर लूँगी... अभी आपको लेनिन बेचारा लग रहा है ना... प्रताप से फोन पर बात हो जाने दीजिए... फिर बेचारों की फ़ेहरिस्त में आप भी नजर आओगे...

तापस - (बड़बड़ाते हुए) जो पहले से ही बेचारा हो... वह क्या नजर आएगा...

प्रतिभा - हो गया...

तापस - क्या... तुमको यह भी सुनाई दिया...

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नागेंद्र को रुप बाउल से कुछ तरल चम्मच से खिला रही थी l कमरे में दोनों के सिवा कोई है नहीं l नागेंद्र गुस्से में था, आनाकानी के बावजूद रुप के हाथों से खाना खा रहा था l नागेंद्र का खाना पूरा हो जाता है l रुप उसके मुहँ को गिले टावल से साफ करने लगती है l उसी वक़्त रूप कि फोन वाइब्रेट होने लगती है और मोबाइल की स्क्रीन चमकने लगती है l नागेंद्र हैरान हो कर रुप को देखता है l रुप मोबाइल निकाल कर देखती है, स्क्रीन पर बेवक़ूफ़ डिस्प्ले हो रहा था l नाम देख कर रुप की होंठों पर मुस्कान बिखर जाती है l मुस्कराते हुए नागेंद्र से कहती है

रुप - आपके दामाद जी का फोन है... (कॉल उठा कर, दबी आवाज में) हैलो...

विश्व - आप कहाँ हैं...

रुप - दादाजी को खाना खिला चुकी हूँ... उन्हें सुला कर... आपसे बात करती हूँ...

विश्व - नहीं... आप जल्दी अपने कमरे में आइये... मैं आपका इंतजार कर रहा हूँ...

रुप - क्या.. आप महल में हैं...

विश्व - हाँ...

रुप - (थोड़ी घबराहट के साथ) कैसे.. क्यूँ... राजा साहब के होते हुए...

विश्व - ससुरा नहीं है... रंग महल गया हुआ है... इसीलिए तो... आया हूँ...

रुप - अच्छा... आ रही हूँ...

रुप फोन काट कर नागेंद्र की तरफ देखती है l नागेंद्र हैरत से आँखे चौड़ी कर देख रहा था l रुप भी उसे देख कर शर्माने की नाटक करते हुए चिढ़ाते हुए l

रुप - यह फोन उन्होंने ही दिया था... वह सेबती है ना... उसके हाथों... ताकि मुझे कभी अकेलापन महसूस ना हो... अब वह मेरे कमरे में आ गए हैं... वह क्या है ना... महल में पहरेदारी अब सात दिन से ना कि बराबर हो गया है... और ऊपर से राजा साहब रंग महल गए हैं... अब मैं उन्हें समझा बुझा कर.. भेज कर... वापस आपके पास आती हूँ... आप तब तक... लेट कर आराम कीजिए... ह्म्म्म्म...

नागेंद्र को जितना गुस्सा आ रहा था उतना ही लाचार और बेबस था l शरीर के कुछ ही हिस्से में जान थी पर मुहँ के साथ साथ हाथ पैर भी उसके लकवा ग्रस्त था l अपनी गुस्सा जताने के लिए लंबी लंबी साँसे ले रहा था l रुप मुस्कराते हुए नागेंद्र को देख कर उसे उसी हालत में छोड़ कर कमरे से बाहर निकलती है l बाहर दो नौकर थे उन्हें कमरे के बाहर ठहरने के लिए कह कर अंतर्महल की ओर चली जाती है l

कमरे में पहुँच कर देखती है बेड पर विश्व हेड रेस्ट पर अपना सिर टिका कर बैठा हुआ था l रुप थोड़ी एटिट्यूड के साथ विश्व से कहती है

रुप - क्या हुआ... आप इस वक़्त... यहाँ... इरादा क्या है..

विश्व - यह आप मुझे... आप आप क्यों कह रही हैं...

रुप - वह इसलिए... की अब आप... हमारे पति परमेश्वर जो हैं...

विश्व - मैंने पहले ही आपसे कहा था... आप मेरे लिए... हमेशा राजकुमारी रहेंगीं... और मैं आपका गुलाम... अनाम...

रुप - हाँ तब तक... जब तक... राजकुमारी... रुप नंदनी सिंह क्षेत्रपाल थीं... अब वह एक... मामूली एडवोकेट को पत्नी... मिसेज़... रुप नंदिनी महापात्र है... और हाँ... वह एक सच्ची भारतीय गृहिणी है...

विश्व - ओ अच्छा... पर मुझे आपसे... आप सुनना बड़ा अजीब लग रहा है...

रुप - तो आदत डाल लीजिए... चाहे आगे चल कर... आप हमें आप कहें या ना कहें... हम तो आपको आप ही कहेंगे... वैसे आपने बताया नहीं... आप यहाँ आए किस लिए...

विश्व - (सीधा हो कर बेड पर पालथी मार कर बैठ जाता है) बतायेंगे बतायेंगे... जरा पास तो आइये... आप ही का बेड है... हमारे पास बैठिए तो सही...

रुप - अच्छा... मुझे अभी मालूम पड़ा... वह भी आपसे कि यह बेड मेरा है...

विश्व मुस्करा देता है और रुप की ओर देखने लगता है l रुप मुहँ पर शरारती पाउट बना कर विश्व से कहती है l

रुप - अगर वह बात सोच रहे हो... तो भूल जाओ... हाथ भी लगाने नहीं दूंगी...

विश्व - क्यूँ भई... हक बनता है हमारा... आखिर पति परमेश्वर जो हैं आपके... वैसे भी... शिकायत रहती है आपको मुझसे... की मैं... डरपोक हूँ... फट्टु हूँ...

रुप - तो... प्यार में हमेशा... मर्जी तो हमारी ही रहेगी... वैसे भी... आप ही ने कहा था... छत वाली आखिरी मुलाकात पे... अगली बार जब आयेंगे... मुझे ले जायेंगे...

विश्व - आप अभी कहिये... ले चलते हैं...

रुप - नहीं... अगर ले जाने आए हैं... तो अभी नहीं... जब तक केस निपट नहीं जाती... तब तक तो नहीं... हाँ अगर इस बीच दादाजी को कुछ हो गया तो...

विश्व - उन्हें कुछ नहीं होगा... वह जिंदा इसलिए हैं... ताकि मुझे राजा साहब के कदमों पर घुटनों के बल गिरा देख सकें... बड़ी सख्त जान है उनकी...

रुप - वैसे इस वक़्त... आप क्यूँ आए हैं... वह भी शाम को... राजा साहब अगर आ गए तो...

विश्व - तो आपके कमरे में तो सीधा नहीं आयेंगे ना... वैसे भी... माँ... मुझसे बात करना चाहती थीं...

रुप - (भाग कर आती है और विश्व के सामने बैठ जाती है) ऊइ माँ... हमने इतना बड़ा कांड कर दिया... और उन्हें खबर तक नहीं की...

विश्व - आप जानती हैं... क्यूँ... वह रूठीं हुईं हैं... हम दोनों मिलकर मनाएंगे और माफी भी मांग लेंगे...

इतना कह कर विश्व अपना मोबाइल निकालता है और एक नंबर पर विडियो कॉल करता है l थोड़ी देर बाद स्क्रीन पर प्रतिभा दिखती है पर ज़वाब में वह कुछ नहीं कहती l

विश्व - कैसी हो माँ...

प्रतिभा -(रूखी आवाज में) मरी तो नहीं हूँ...

विश्व - माँ प्लीज... ऐसी बातेँ मत करो... तुम जानती हो... मैं क्यूँ तुम्हें लेनिन के साथ भेज दिया था...

प्रतिभा - हाँ पता है... पर... सत्रह दिन हो गए हैं... मुझे कुछ भी पता नहीं चल रहा है... तेरा यह दोस्त लेनिन... ऐसी ऐसी जगहों पर घुमा रहा है... जहां मोबाइल की टावर भी नहीं है... इसलिए वैदेही से भी बात नहीं हो पा रही है...

विश्व - माँ... देखते देखते जब सत्रह दिन बीत गए... तो और बीस पच्चीस दिन भी बीत ही जायेंगे... बस इतनी सी बात के लिए... तुम अपनी जान पर ले आई...

प्रतिभा - कुछ नहीं होगा मुझे... मर नहीं सकती मैं... (नर्म और प्यार से) मुझे तो... पोते पोतीयों के साथ खेलना है... कितना कुछ करना है... (एक पॉज) तु कैसा है...

विश्व - अच्छा हूँ... तुम्हारा आशीर्वाद है... बस कुछ ऐसा हो रहा है... जो मेरे बस से बाहर था...

प्रतिभा - क्यूँ... तेरा केस तो मजबूत है ना...

विश्व - पर उसके लिए केस की सुनवाई शुरु भी तो होनी चाहिए... राजा साहब ने... अपनी चाल चल दी... वैसे मुझे कोई शिकायत नहीं है... क्यूँकी ऐसा तुमने चाहा था...

प्रतिभा - क्या मतलब मैंने चाहा था... मैंने चाहा था... तु केस जीत जाए बस...

विश्व - और तुमने यह भी कहा था... जब मैं कटक लौटुं... तो तुम्हरी बहु के साथ ही लौटुं...

प्रतिभा - तो इससे... इस केस का क्या संबंध...

विश्व - यह आप अपनी बहु से पूछिये...

कह कर विश्व रुप की ओर मोबाइल का रुख कर देता है l रुप घबरा कर प्रतिभा को झिझकते हुए नमस्ते करती है l

प्रतिभा - अरे नंदिनी... तुम... मतलब... प्रताप अभी तुम्हारे साथ... महल में है क्या...

रुप - (मुस्कराने को कोशिश करते हुए) जी... जी.. माँ जी...

प्रतिभा - एक मिनट... प्रताप महल में तुम्हारे साथ... और यह कह रहा है... राजा साहब अपनी चाल चल दी... क्या माजरा है...

रुप - माँ जी... आप ठंडे दिमाग से... मेरी पूरी बात सुनिए..

रुप कहना शुरु करती है, कैसे केके से मुलाकात के बाद उसे मालूम हुआ कि उसकी शादी भैरव सिंह ने केके से तय कर दी थी l कैसे भैरव सिंह ने किस किस को शादी का न्योता दिया था l कैसे और किस तरह से उसके दोस्तों को राजगड़ लाया गया था l रुप कैसे विक्रम तक खबर पहुँचाई और उसकी शादी हो गई l जिसको आधार बना कर भैरव सिंह ने केस की सुनवाई को सात दिन के लिए टाल पाने में कामयाब हो पाया l सारी बातेँ सुनने के बाद

प्रतिभा - इतना कुछ हो गया... और तुम दोनों अभी बता रहे हो...

रुप - आपसे कॉन्टैक्ट करना मुश्किल था... और हमारे पास वक़्त ही नहीं था...

विश्व - हाँ... और यह सब आपके वज़ह से हुआ...

प्रतिभा - मेरी वज़ह से कैसे...

विश्व - आप ही ने कहा था.. मैं कटक आपके बहु के साथ लौटुं... आपके मुहँ से जैसे ही निकला... भगवान ने तथास्तु कर दिया... इसलिए इतना कुछ हो गया...

प्रतिभा - (मुस्कराते हुए) ठीक है... मैं समझ गई... (तापस की ओर देख कर) क्या तेरे डैड को खबर थी...

तापस - अरे भाग्यवान कैसा सवाल कर रही हो...

प्रतिभा - आप चुप रहिए... (विश्व से) देख सच सच बताना...

विश्व - (झिझकते हुए) हाँ... हाँ..

प्रतिभा - देख प्रताप... तूने मुझे खबर क्यूँ नहीं की... मैं समझ गई... तुझे लगा होगा... तेरी माँ कमजोर दिल की है... पर तुने यह कैसे सोच लिया... तेरी माँ का दिल ही नहीं है...

विश्व - (शर्मिंदा होते हुए) स.. सॉरी माँ...

प्रतिभा - खैर जो भी हुआ... मुझे खुशी है... पर तुम दोनों... दुसरी बार शादी के लिए तैयार रहना... यहाँ तुम दोनों की... फिर से... धूम धाम से शादी होगी... (तापस से) क्यूँ जी...

तापस - हाँ हाँ क्यूँ नहीं...

विश्व - जैसा तुम ठीक समझो माँ...

प्रतिभा - अच्छा अब तु हट... मुझे अब बहु से बात करने दे... (विश्व मोबाइल को रुप की हाथ में दे देता है) हाँ तो बहु रानी... तुम्हारे कमरे में... यह ऐसे ही चला आता है...

रुप - (शर्मा कर अपना सिर हिलाती है)

प्रतिभा - कहीं तुम दोनों ने... सुहाग रात तो नहीं मना लिया...

रुप - (चौंक जाती है) नहीं... नहीं माँ जी... नहीं...

प्रतिभा - ह्म्म्म्म... अच्छी बात है... वैसे क्यूँ नहीं मनाया...

रुप - आपकी आशीर्वाद नहीं था... इसलिए...

प्रतिभा - इसलिए... या मौका नहीं मिल पाया... इसलिए...

तापस - यह क्या भाग्यवान... बहु से कैसी बातेँ कर रही हो...

प्रतिभा - आप तो चुप ही रहिए... (रुप से) ऐ... मैंने कुछ पूछा तुम से...

रुप - बात मौके की नहीं है माँ जी... सुहाग रात ससुराल में होती है... मैं अभी तक मैके में हूँ...

प्रतिभा - (मुस्कराते हुए) अच्छा विचार है... चलो... कोई तो काम हमारे हिस्से छोड़ा तुम दोनों ने...

विश्व - माँ... अब तो कोई शिकायत नहीं है ना तुम्हें...

प्रतिभा - है... अभी भी है... पर तुम दोनों को एक साथ देख कर सब भूल गई... (तभी फोन पर सीलु का नाम डिस्प्ले होने लगता है)

विश्व - अच्छा माँ... अपना खयाल रखना... सीलु कॉल कर रहा है... लगता है... ससुरा वापस आ रहा है... मुझे जाना होगा...

प्रतिभा - ठीक है बेटा... पर ध्यान रहे... जैसे अपने डैड को हर बात शेयर कर रहा है... मुझसे भी करते रहना...

विश्व - जी.. माँ..

प्रतिभा - लव यू... कुडोस...

दोनों - लव यू मॉम...

फोन कट जाता है l सीलु बार बार कॉल लगा रहा था l विश्व कॉल उठाता है l उसके बाद रुप को देखता है और कॉल काट कर दरवाज़े के पास जाता है और मुड़ कर रुप से कहता है

विश्व - अच्छा... तो हम चलते हैं...

रुप - फिर कब मिलोगे...

विश्व - जब आप कहोगे...

रुप - अच्छा तो अब आप जाइए...

विश्व - क्या... रूखा सूखा...

रुप - (बेड से उतर कर विश्व के पास जाती है) तो जनाब को... क्या चाहिए...

विश्व - भई शादी किए हैं... कम से कम... मुहँ तो मीठा कर ही सकती हैं...

रुप - (इतराते हुए) आज आपके इरादे नेक नहीं लग रहे हैं... कहीं... कोई... हरकत कर दी... तो...

विश्व - इरादा तो केवल मुहँ मीठा करने का है... अब हाथों का क्या... भई हाथ हैं... हरकत तो करेंगे ही...

रुप - (विश्व की गिरेबान पकड़ कर खिंच कर दीवार से सटा देती है) आप शायद भूल रहे हैं... मैं बहुत खतरनाक हूँ...

विश्व - (रुप के हाथों को पकड़ कर पलट जाता है, अब रुप पीठ के बल दीवार से सटी हुई थी और विश्व का चेहरा रुप के चेहरे के पास था) हमें सब याद है... पर आप यह भूल रहीं हैं... मैं बिल्कुल भी खतरनाक नहीं हूँ...

शर्म से रुप के गाल लाल हो जाते हैं, अनिच्छा से अपनी हाथ छुड़ाने की कोशिश करती है l विश्व हाथ छोड़ देता है पर दोनों हाथ दीवारों से लगा कर बीच में रुप को रोक देता है और l विश्व और रुप एक दुसरे की आँखों में झाँक रहे थे l एक दुसरे की साँसे टकरा रहे थे l दोनों की साँसों में धीरे धीरे तेजी आने लगती है l रुप की आँखों में मदहोशी साफ झलक रही थी l अपने निचले होंठ को दांत से हल्का दबा लेती है l मुस्कराते हुए आँखे बंद कर अपनी होंठ को खोल कर विश्व की तरफ आगे बढ़ा देती है l रुप के होठों पर विश्व की गर्म साँसों को महसूस होती है l रुप की बदन एक सर्द भरी आह के साथ कप कपा जाती है l पर कुछ देर के बाद भी कुछ नहीं होता l हैरानी के मारे अपनी आँखे धीरे से खोलती है l विश्व नहीं था, गायब हो चुका था l रुप अपनी दांत भिंच लेती है, चिढ़ जाती है और बड़बड़ाने लगती है

रुप - बेवक़ूफ़... फट्टु.. स्टुपिड... अगली बार देखना... काट खाऊँगी...

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एक हाथ में एक शराब का बोतल और दूसरे हाथ में दो ग्लास लिए भैरव सिंह नागेंद्र के कमरे में आता है l कमरे के भीतर दो नौकर दरवाजे के पास खड़े थे l भैरव सिंह उन्हें देखता है और नागेंद्र सिंह को देखता है l जो आँखे मूँदे अपनी बिस्तर पर लेटा हुआ था l भैरव सिंह उन नौकरों से पूछता है

भैरव सिंह - बड़े राजा जी का खाना हो गया...

एक नौकर - कुछ देर पहले... राजकुमारी जी ने शाम का खाना खिला दिया था...

भैरव सिंह - ह्म्म्म्म... ठीक है... तुम दोनों जाओ यहाँ से... मतलब इस कमरे से दूर... हम थोड़ी देर... बड़े राजाजी के साथ बैठेंगे...

दुसरा नौकर - दूर मतलब... कहाँ राजा साहब...

भैरव सिंह का चेहरा सख्त हो जाता है l मुड़ कर उस नौकर की ओर देखता है l नौकर का पसीना छूट जाता है l

भैरव सिंह - जाओ... उतना ही दूर जहां तुम्हें... कॉलिंग बेल सुनाई दे...

दोनों - जी राजा साहब... हम समझ गए...

भैरव सिंह - अब दफा हो जाओ यहाँ से...

दोनों नौकर बाहर निकल जाते हैं l उनके जाते ही भैरव सिंह एक टेबल खिंचते हुए बेड के पास लता है l उस पर शराब की बोतल और दो ग्लास रख देता है l भैरव सिंह नागेंद्र की ओर देखता है, नागेंद्र की आँखे खुल चुकी थी l

भैरव सिंह - आपकी नींद में खलल पड़ी, उसके लिए हमें माफी चाहते हैं...

भैरव सिंह बेड की हैंडल को घुमाता है l बेड का सिरा थोड़ा ऊपर उठ जाता है l ऐसा लगता है जैसे नागेंद्र पैर फैला कर बेड पर पीठ के बल बैठा हुआ है l भैरव सिंह बोतल की ढक्कन खोल कर दोनों ग्लास में शराब उड़ेलता है l फिर एक ग्लास लेकर नागेंद्र के पास बैठता है और

भैरव सिंह - ना जाने कब आखरी बार... मिलकर पिया था... आज आपके साथ... हम पीना चाहते हैं...

हैरानी के साथ नागेंद्र भैरव सिंह को देखता है l भैरव सिंह ग्लास को नागेंद्र के होठों पर लगा देता है और अपना ग्लास उठा कर नागेंद्र से कहता है

भैरव सिंह - चियर्स बड़े राजा जी...

भैरव सिंह अपना ग्लास खाली कर देता है फिर नागेंद्र के मुहँ में थोड़ा डाल देता है l नागेंद्र वह शराब का घूंट गटक लेता है l फिर शराब की ग्लास को नीचे रख कर

भैरव सिंह - जो हुकूमत की डोर विरासत में मिला था... हम उसे कायम रखने में.. नाकाम रहे... इन कुछ दिनों में... हालात ने... हमें क्या कुछ नहीं दिखाया... (उठ का कमरे में चहल कदमी करते हुए) महल के दर के अंदर कभी पुलिस आ नहीं पा रही थी... आती भी तो जुते बाहर खोल कर आते थे... (नागेंद्र को देखते हुए) आज आलम यह है कि... दो टके का पुलिस ऑफिसर... महल में... अपने लोगों के साथ घुस आता है... वह भी जुते पहन कर... (फ़िर से चहल कदमी करते हुए) गाँव वाले... कभी नजरें उठा कर इस महल की तरफ़ देखना तो दूर... अगर आ जाते थे... तो उल्टे पाँव लौट जाते थे... पर... पहली बार ऐसा हुआ... के हमें पीठ दिखा कर... गाँव वाले लौटे... और आज तो हद हो गई... हमारे नाम के साये में... महल के लोगों से डरने वाले... आज.. महल के लोगों पर... लाठी डंडे चाला दिए... (फिर रुक जाता है और नागेंद्र के तरफ देखते हुए) यह सब हमारी ही गलती है... गलती शायद बहुत छोटा शब्द है... अपराध हो गया है हमसे... (पास आता है और नागेंद्र के सामने बैठकर) हमनें जिसे... चींटी समझा... आज वह बाज बन गया है... जिसकी अहमियत दीवारों पर रेंगने वाली छिपकली से ज्यादा नहीं थी... आज वह मगरमच्छ बन गया है... हाँ बड़े राजा जी... हाँ... विश्वा के बारे में बात कर रहे हैं... (अब फिर से शराब को ग्लास में डालता है और एक घूंट पहले नागेंद्र को पिलाता है फिर खुद अपना ग्लास ख़तम कर देता है, फिर नागेंद्र को देख कर) हमनें... गलतियाँ बहुत की है... अपनी खानदानी गुरुर के चलते... वैदेही को जिंदा रहने दिया... विश्व को जिंदा छोड़ दिया... यही दोनों... अब हमें... हमारा दुर्दिन दिखा रहे हैं... (एक गहरी साँस छोड़ते हुए) वर्ना किसी पुलिस वाले की औकात कहाँ हो सकती थी... के हमें हमारी ही महल में नजर बंद कर सके... किसी अदालत में कहाँ जुर्रत थी... के हमें कठघरे में खड़ा कर सके... पर यह सब हुआ... हमारे साथ हुआ... (अपनी जगह से उठ कर खिड़की के पास जाता है और बाहर की ओर देख कर) हम जानते हैं... आपने अपनी मौत को रोके रखा है... क्यूँकी आपको उस जलील... हराम खोर विश्व का अंत देखना है... हमने भी आपको इस बात का वादा किया है... पर उस वादे ने.. हमसे बहुत बड़ी कीमत ली है... हम हर जलालत को झेलते रहे... के ठीक है... राजगड़ के लोग... अभी भी हमसे खौफ खा रहे हैं... विश्व चाहे कितना भी बरगला ले... गाँव वाले हमारे खिलाफ जा नहीं सकते... (नागेंद्र के तरफ़ मुड़ कर) पर आज यह भरम भी टुट गया... आज गाँव वाले... हमारे लोगों पर लाठी चला कर... हमें हमारे आने वाले कल का... ऐलान कर दिया... अभी भी अगर हम खामोश रहे... तो यह क्षेत्रपाल की नाकारा पन होगा... नपुंसकता होगी... (नागेंद्र के पास बैठ जाता है) एक बात हमेशा से कही जाती है... इतिहास खुद को दोहराता है... हाँ बड़े राजा जी... अब इतिहास खुद को दोहराएगा... जो इतिहास सौरभ सिंह क्षेत्रपाल ने रचा था... पाईकरॉय परिवार के खिलाफ... अब वही इतिहास... राजगड़ के हर एक परिवार के खिलाफ दोहराया जाएगा... जिससे ऐसा भूगोल का रचना होगा... के आइंदा कोई माईकालाल फिर कभी... महल की तरफ़ आँख उठा कर नहीं देखेगा... फिर कभी कोई ख़ाकी वर्दी वाला इस महल की चौखट पर नहीं आएगा... फिर कभी किसी क्षेत्रपाल को... अदालत में पेश करने की... सपने में भी नहीं सोच पाएगा... हाँ बड़े राजा जी... हाँ... इस बार सभी ने... अपना अपना लक्ष्मण रेखा लांघ लिया... अब हर कोई... अपनी अपनी अमर्यादा के लिए... कीमत चुकाएंगे... आप सोच रहे होंगे... यह सब... कैसे होगा... हा हा... हा हा हा हा हा... हाँ मैंने अपनी चालें चल दी है... एक बहुत बड़ी प्राइवेट आर्मी को मैंने हायर किया है... क्यूँकी ना सिर्फ लोग... बल्कि सिस्टम में रह कर भी... जिन्होंने सिस्टम के जरिए... हमें यह दिन दिखाए हैं... हर एक जान को... हम सजा देंगे... मर्सीनरीज बहुत जल्द पहुँचने वाले हैं... उनके पहुँचने के बाद... सिर्फ खून खराबा होगा... सिर्फ खून खराबा... कुछ इतिहास दफन हो जाएंगे... कुछ किवदंती जन्म लेंगे.... इसलिए आज आपके पास... आपका आशीर्वाद लेने आए हैं... (नागेंद्र की आँखे बड़ी हो जाती है) हाँ आपको हैरानी हो रही है... यह सिर जो कभी किसी के आगे नहीं झुकता... आज कैसे आपके आगे झुक गया... वह इसलिए... के पूरी दुनिया में.... एक आप ही हैं... जो मेरे साथ हैं... और रिश्ते में... मेरे पिता भी हैं...

भैरव सिंह नागेंद्र के दोनों हाथों को पकड़ कर अपने सिर पर रख लेता है और और कुछ देर बाद नागेंद्र का हाथ छोड़ देता है और जब अपना सिर उठाता है नागेंद्र को उसकी आँखों में एक शैतानी चमक दिखती है l वह चमक इतनी तेज थी के नागेंद्र के चेहरे पर डर साफ नजर आने लगती है l
 
थैंक्स लियोन भाई

हाँ अब विक्रम का एक महत्त्वपूर्ण भूमिका आने वाली है

प्रतिभा का विश्व से बात करना एक आवश्यकता थी l भले ही वह अपने पति के साथ छुपी हुई हो सच यह भी है कि वह एक बंदिनी की तरह जी रही है l विश्व से बात करने के बाद उसमें एक स्फूर्ति, एक ऊर्जा आ गई है l

भैरव सिंह बहुत ही अहंकारी है l अहंकार इतना के सबको अपने सामने झुका हुआ देखना चाहता है l अब चूँकि एक के बाद एक सिर उठ रहे हैं और तो और अपनी स्टेट के सिस्टम ने उसे कटघरे में ला खड़ा कर दिया है इसलिये वह वही इतिहास दोहराना चाहता है जो उसके परदादा सौरभ सिंह ने पाईकराय परिवार के साथ कर क्षेत्रपाल की दहशत और दबदबा कायम किया था l
 
जी बिल्कुल

यहाँ हर कोई अपने अपने कर्मों का फल भोग रहे हैं l

और कुछ ऐसे हैं जो भोगने जा रहे हैं l

भैरव सिंह एक दुराचारी अहंकारी इंसान है

वह अपनी अहंकार को प्राथमिकता देता है आज जब धीरे धीरे क्षेत्रपाल का आतंक का प्रभाव कम होता दिख रहा है, महसुस हो रहा है तो उसके परदादा ने जो पाईकराय परिवार के साथ कर अपनी ना सिर्फ राजगड़ बल्कि पूरे स्टेट में जमाया था जिसका फल आज तक भोग रहे थे l उसी आतंक का इतिहास को भैरव सिंह दोहराना चाहता है l उसे अब यह मालूम हो गया है l पूरा सिस्टम उसके साथ नहीं है और विश्व उसके पारम्परिक लड़ाकों से अकेला ही भीड़ सकता है l इसलिए उसने अपनी दहशत और दबदबा को फिर से कायम करने के लिए एक प्राइवेट आर्मी हायर किया है l

मैंने पहले भी कहा था l कहानी बेशक मैं लिख रहा हूँ पर इसे मोड़ व दिशा आप जैसे मित्र दे रहे हैं l और मैं पूरी कोशिश कर रहा हूँ कहानी और पाठकों के भावनाओं का सम्मान कर सकूँ

इतना विश्वास रखिए भैरव सिंह वह इतिहास कभी भी दोहरा ना पाएगा l हाँ उसके लिए कई जानें जरूर जायेंगी और भैरव सिंह अपनी अंजाम को पहुँच जाएगा l
 
भाई यों मेरे दोस्तों मैं पहले भी कह चुका हूँ कुछ निजी कारणों से मैं पेज पर आ नहीं पाया था l खैर अब अगला भाग प्रस्तुत कर रहा हूँ l इसके बाद सिर्फ और दो अपडेट ही आयेंगे l एक सौ पैंषठवाँ अपडेट अंतिम होगी और अंतिम रुप देना बहुत ही मेहनत का काम लग रहा है l कहानी शुरु करना आसान होता है पर उसे बिल्कुल सही अंजाम तक पहुँचाना एकदम टेढ़ी खीर बन गया है
 
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