दिव्यास्त्र.[The power of five elements] - Page 12 - SexBaba
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दिव्यास्त्र.[The power of five elements]

अपडेट 92



मेधावी की मौत देखकर शुक्राचार्य को बेहद गुस्सा आने लगा था. और उन्होंने उसी गुस्से से जल निकला और उसपर मात्रा जाप करके छोड़ दिया. और ऐसा करते hi जो जल बहा जमीन पैर गिरा वो अचानक से एक रूप लेने लग गया. किसी विशाल जीव का रूप. जो पहले तो समाज में नहीं आया लेकिन जब बन कर रेडी हो गया तब समाज में आया. ये एक ड्रैगन था. बहुत hi विशाल और उड़ने वाला ड्रैगन और मुँह से ज्वाला निकलने वाला भी. उसकी चमड़ी इतनी सख्त थी की मेरी तलवार को टूट जाएगी लेकिन इस खरोच तक नहीं aayegi.ise शक्तियों से hi हराना पड़ेगा. इसलिए मेरी तलवार को मैंने दिव्यास्त्र में बदला और बहा से उड़द गया.

शुक्राचार्य- जाओ और सर्वनाश कर दो उसका.

ये सुनते hi ड्रैगन ने एक बहुत hi भयंकर दहाड़ मरी और होने मुँह से इतनी भयंकर ज्वाला निकली जिसमे प्रेशर से में और दूर को उड़द गया. मैंने पीछे पलट कर देखा तो वो भी उड़ कर मेरे पीछे आने लगा था. इसलिए मैंने अपनी गति बड़ाई. तो उसकी रफ़्तार भी तेज़ hi गयी. और होगी भी क्यों नहीं. मयाबी हो तेहरा. वो बार बार मुझपर आग उगल रहा था. और दिव्यस्त्र मुझे उस आग से ठीक समय पैर बचा ले रहा था.

मैंने पीछे देखा तो वो मेरे बहुत करीब आज्ञा था और अपना मुँह पूरा खोल कर मुझे निगलने को कोसिस कर रहा था. तभी मैंने दिव्यास्त्र का मुख उसकी तरफ किया और शक्ति का प्रयोग किया जो सीधे उसके खुले मुख से उसके डिल में जेक लगी. और ऐसा होते hi उसका डिल का धड़कना कुछ देर के लिए रुक गया. और वो झटपटता हुए नीचे गिरने लगा. और इसी मौके का फायदा उठा कर मैंने रुका और दिव्यास्त्र को एक ऐसी तलवार में बदलने को कहा जो आसानी से इसकी चमड़ी को चीयर सके.

मेरा ऐसा कहते hi दिव्यास्त्र बैसि hi तलवार में बदल गया. और में उसे लेके नीचे की तरफ तेज़ी से जाने लगा. हम काफी ऊंचाई पैर थे इसलिए नीचे जाने में हमें वक़्त लग रहा था. ड्रैगन अभी भी झटपटा रहा था. इसी मौके का फायदा उठा कर में तेज़ी से उसके बगल में गया. और टॉवल उसके पेट में घुसा दी. और बही पैर रुक गया. मेरे रुकने से तलवार भी रुक गयी. लेकिन ड्रैगन तेज़ी से नीचे hi जा रहा था. और ऐसे hi मेरी तलवार उसे नीचे से ऊपर चीरती हुई निकल गयी. और ड्रैगन का काम तमाम होगया. और में इस बात की कृषि मन hi रहा था की पीछे से मेरे ऊपर हमला हुआ और में तेज़ी से उड़ता हुआ थोड़ा दूर जा पहुंचा और पर कटे पक्षी की तरह नीचे गिर गया. जो एक खली मैदान था. मेरे गिरते hi. बहा पैर चारो तरफ गहरा गद्दा बन गया.

में थोड़ी देर के लिए एक दम सुन्न हो गया. मुझे कुछ समाज में नहीं आया की क्या हुआ और कैसे हुआ.

और अचानक से में हिला. जैसे में एकदम नींद से जाग गया हु. और जागने के बाद मैंने आजु बाजु देखा तो में एक गद्दे में पड़ा था. हालत ख़राब हो गयी थी. मैंने कार्बेट बदली और हाथो का प्रयोग करके अपने घुटनो पैर आया और बाजु में पड़े दिव्यस्त्र को उठा लिया. तभी मेरे कानो में कुछ आवाज पड़ी. जो कदमो की थी बहुत सरे कदमो की. पूरी जमीन हिल रही थी. उनके कदमो से. भयंकर कम्पन्न उत्पन्न हो रहा था. और ये आवाजे मेरे राइट साइड से आरही थी. इसलिए मैंने उस तरफ मुंडी को घुमा कर देखा. तो में हैरान रह गया. मेरे सामने करीब 1 लाख से भी ज्यादा असुर चले आरहे थे. कुछ बहुत hi भद्दे थे. और कुछ बहुत hi बेकार. देखकर मुझे तो उलटी होने लगी थी. और उन सबके आगे चल रहा था मेधावी. जिसे मैंने अभी कुछ देर पहले hi मार दिया था. एक पल को तो मुझे यकीन hi नहीं हुआ की ये जिन्दा कैसे हो गया. फिर मुझे याद आया की मृत संजीवनी विद्या.

शुक्राचार्य के पास ये विद्या थी और वो किसी को भी जीवित कर सकते थे. जिसका सरीर सही सलामत बचा है.

ये याद आते hi मैंने अपना माथा पीट लिया. और सोचा इसका अंत कभी होगा भी या नहीं. में सोच रहा था और वो मेरे करीब आते जा रहे थे. तभी मैंने सोचा की ये सब छोडो और खड़े हो. इनका मुकाबला करो. इनका अंत अब अलग तरीके से करना पड़ेगा. जैसे अभी तक करते आया हु.

ये सोचकर में फिर से खड़ा हुआ और गद्दे से बहार निकला.

में अकेला और मेरे सामने लाखो की भीड़. सोच hi सकते हो इसका क्या परिणाम होने वाला था.

तभी मेरे पीछे से आवाज आई.

मदद चाहिए.

ये आवाज सुनके मेरे चेहरे पैर हसी आगयी. क्युकी ये आवाज रेनू की थी. और में सूरे था की उसके साथी बाकि सभी भी यहाँ आई होंगी. इसलिए में पीछे मुदा जहा वो चारो अपने असली अवतार में कड़ी हुई थी हाथो में हथियार लिए.

प्राची- तुम्हारी हालत तो बकै में ख़राब हो गयी है.

मैं- है मामला थोड़ा हाथ से निकल गया था. वर्ण मैंने सब संभल लिया था.

आलिआ- वो तो दिख hi रहा है. अब ये बताओ की हमें बिना साथ लिए तुम यहाँ अकेले क्यों आये.

मैं- फिलहाल ये मटर छोड़ दे तो कैसा रहेगा. क्युकी सामने बहुत hi बड़ी समस्या है.

सुरभि- इसको बाद में देख लेंगे. आलिआ. Don't वोर्री पूरा हिसाब लेंगे हम.

तभी मुझे सामने से मेधावी की आवाज आई.

मेधावी- अभी भी मौका है हार मानलो और हमें वो अस्त्र दे दो.

मैं- ये सवाल तब पूछना था जब मैंने तुझे दो हिस्सों में बात दिया था अभी कुछ देर पहले.

मेधावी- धोके से.

प्राची- क्या इसे मार दिया था तुमने. फिर ये जिन्दा कैसे हुआ.

मैं- संजीवनी विद्या से कर दिया होगा शुक्राचार्य ne.or समाज को किसी का भी सरीर सलामत मत छोड़ना.

रेनू- ok कप्तान.

मैं- बकवास बंद करो.

वो चारो मेरे बगल में आगयी.

मैं- मेधावी में तुम्हे एक आखिरी मौका देता हु. चले जाओ अपनी सेना को लेके. वर्ण इसके बाद जो अंजाम होगा उसके जिम्मेदार तुम खुद होंगे.

मेधावी- में तैयार हु अंजाम भुगतने को. क्या तुम हो.

मैं- हमेशा से.

ये कहके मेधावी ने अपनी सेना को हमला करने का आदेश दे दिया और वो सभी जानवर चिल्लाते हुए हमारी तरफ बढ़ने लगी. और यहाँ हमने भी उनकी तरफ दौड़ लगा दी.

और जैसे hi हम करीब पहुंचे हम सभी एक साथ उछाल गए. और धड़ाम से उनकी सेना के बीच गिरे और हमारी शक्तियों का बेग इतना ज्यादा था की आस पास के असुर तो उसी बेग से उड़द गए. तभी प्राची ने बायु का बवंडर बनाया बहुत hi तेज़. और रेनू तो अपनी तलवार जिसको भी लगा रही थी वो उसी समय रख में बदलता जा रहा था. बही आलिआ भी अपनी छड़ी की शक्तियों का बखूबी इस्तेमाल कर रही थी. और सुरभि अपनी तलवार से बर्फ निकाल कर जमा रही थी सभी को. और आलिआ उन जमे हुए लोगो के टुकड़े कर रही थी. प्राची का बवंडर असुरो को अपनी चपेट में लेने लगा था. तभी मैंने दिव्यास्त्र का इस्तेमाल करके उस बवंडर में भयंकर बिजली उत्पन्न कर दी. और अब वो बवंडर सभी को भस्म करता जा रहा था.

बही में अपनी शक्तियों का काम और अपने हाथो का इस्तेमाल ज्यादा कर रहा था. दिव्यास्त्र को तलवार में बदल कर.

तभी मेधावी में कुछ किया जिससे वो बवंडर तुरंत hi बंद हो गया लेकिन उसमे से केवल रख hi nikli.uski सेना की.

और इसी गुस्से से वो मेरी तरफ बड़ा और में उसकी तरफ.

और वो उछाल गया और में भी और हमारी शक्तिया हवा में टकरा गयी. और ऐसा होते hi हवा में भयंकर बेग उत्पन्न हो गया.

मेधावी- तेरा अंत में करके hi रहूँगा.

मैं- लेकिन आज नहीं.

ये कहके मैंने अपने हाथो से आग निकलना सुरु किया और मैंने जहा उसका हाथ पकड़ा हुआ था बहा उसे जलन होने लगी.

मेधावी- ये चल अच्छी है लेकिन काम की नहीं है.

मैं- तो फिर ये कैसे है.

ये कहके मैंने हाथ को ठंडा कर दिया और जहा उसे पकड़ा हुआ था. बहा से उसे में बर्फ में ज़माने लगा. बर्फ काफी तेज़ी से उसके सरीर पैर चढ़ गयी और वो बही जैम गया. और उसके जमते hi मैंने उसे नीचे छोड़ दिया. और वो तेज़ी से नीचे गिरने लगा. मुझे लगा गिरते hi ये टूट जायेगा. लेकिन साला गिरने से एक सेक्. पहले hi पता नहीं कैसे उसके सरीर पैर जमी बर्फ पिघल गयी. और वि सही सलामत नीचे गिरा. ये देखकर में तेज़ी से नीचे गया. अपनी तलवार को सीधा करके. जो सीधे उसके सीने में धसने वाली थी. लेकिन साला फिर बच गया. बाजु हैट गया. लेकिन ये दोतरफा हमला था. जमीन पैर तलवार लगते hi. ताकवर से भयंकर बिजली निकली लिखे बहुत hi भयंकर. और चारो तरफ फ़ैल गयी. मेधावी ने खुद को कैसे बचाया पता नहीं. लेकिन बाकि जितने भी असुर उसकी चपेट में आये वो नहीं बचा पाए खुद को और जल कर रख हो गए.

ये देखकर मेधावी का गुस्सा बाद गया. और उसने अपना आकार बड़ा कर लिया. इतना की मुझे आसानी से कुचल सके. ये देखकर हम सबकी आँखे फटी की फटी रह गयी.

आलिआ- ये क्या करने को सोच रहा है.

मैं- सायद हमें कुचलने ki.baise ये हमारे किये मौका है.

रेनू- में समाज गयी.

ये कहके रेनू स्पीड से उसकी तरफ बड़ी और जोर से तलवार उसके पेअर में घुसा दी. तभी मैं और प्राची उड़ते हुए गए और एक एक पंच उसके थोबड़े पैर जड़ दिया. जिससे वो नीचे गिरने लगा. वो भी उसी की सेना पैर.

मैं- होशियार है पैर है तो बचा hi.

सुरभि- सही कहा. लेकिन यहाँ इसी सेना बचे नहीं है. ये ख़त्म होने का नाम hi नहीं ले रहे है.

रेनू- देव कुछ बड़ा तरय करना चाहिए. ताकि ये सब जल्दी ख़त्म हो सके. क्युकी हम ऐसे hi महीनो तक लगे रहेंगे तब भी ये ऐसे hi लड़ते रहेंगे.

मैं- बैसे में भी कुछ ऐसा hi सोच रहा था. एक काम करो तुम सभी मेरे पीछे आजाओ. जरा इनको अपनी असली ताकत का नमूना दिखते है.

प्राची- बढ़िया है.

ये कहके सभी मेरे पीछे आगयी. और मैंने अपनी आँखों को बंद किय अपने हाथो को जोड़ा और मन में अपने मंत्र का जाप किया. और ऐसा करते hi तिरदये खुल गयी. और अब समय था इनको बताने का की मेरी ताकत ये दिव्यास्त्र से नहीं है.

मैंने तिरदये से सभी को देखा लगभग 50000 असुरो को जो इस वक़्त बहा लड़ाई करने हमारी तरफ hi बाद रहे थे.

ऐसा समझिये की में एक साथ सभी को निशाना बना रहा था. एक hi बार में साडी सेना को ख़त्म करने का प्लान. और जैसे hi सभी पैर निशान लग गए. मैंने अपनी आँख से भयंकर ज्वाला निकली. और ज्वाला निकलते hi. उसे मात्रा कुछ सेक्. लगे होंगे और हमारे सामने मौजूद सरे असुर पल भर में रख में बदल gye.vo भी एक साथ.

सुरभि- अगली बार इसी से शुरुवात करना. खामखा इतनी एनर्जी वास्ते करवा दी.

मैं- है क्यों नहीं.

और इसी के साथ मेधावी की साडी सेना का अंत हो गया. और ये सीन देखकर मेधावी की तो हालत hi ख़राब हो गयी उसे समाज में नहीं आया की आखिर ये कोनसी शक्ति है. क्युकी ये तिरदये हर किसी को नहीं दिखती है. मेधावी को जरा भी अंदाजा नहीं था की अभी यहाँ पैर क्या हुआ. उसे तो बस इतना पता था की मेरी शक्तियों ने एक hi बार में उसकी सेना का अंत कर दिया. पर कैसे किया इसका पता केवल शुक्राचार्य को लगा होगा बाकि किसी को नहीं.

ऐसा करने के बाद मैंने अपनी आँखों को बापिस से खोल लिया. और सामने का नजारा बकै काफी डरने वाला था. दुसरो को.

और फिर में मेधावी के पास गया.

मैं- अब भी लड़ना चाहते हो.

मेधावी- ये कैसे किया तुमने.

मैं- बहुत कुछ है जो तुम अभी नहीं जानते हो. और जानने की जरुरत भी नहीं है. तुम एक अच्छे इंसान बन सकते हो. अगर बनना चाहते हो तो. तुम्हारे पास अभी समय है.

मेधावी- में ये अच्छे से जनता हु. लेकिन में ऐसा नहीं कर सकता. इस जन्म में तो बिलकुल नहीं.

ये कहके उसने तलवार मेरे पेअर में घुसा दी. जिससे मुझे बकै में दर्द हुआ.

और ये सब देखकर ुम चारो को गुस्सा आज्ञा. और वो चारो एक साथ मेधावी पैर टूट पड़ी. वो पहले से थोड़ा घायल था. उसके पेअर में चोट लगी थी. मेरे कई प्रहार उसने सेहन करे थे. लेकिन वो इतना कमजोर नहीं था की इतनी जल्दी हार मान जाये. पर

मेरे सामने जो हो रहा था उसे भी झुटलाया नहीं जा सकता था. क्युकी वो किसी भी हमले को रोक नहीं रहा था. बस अपने ऊपर होने दे रहा था. और इसी बीचे प्राची ने उसकी गार्डन को उदा दिया रेनू ने उसी समय उसके सरीर में आग लगा दी और बस उसका काम हो गया.

अबकी बार सचमे हो गया इसका काम तमाम.

अब केवल शुक्राचार्य बचे हुए थे. बाकि कोई नहीं काम से काम मुझे तो यही लग रहा है. शक्तिया कमजोर होने के बावजूद किसी ने मुझे अभी तक मरने का प्रयास नहीं किया था. मतलब की ऐसी शक्ति का प्रयोग जिससे बकै मेरी मौत हो सके. ये बात मुझे कुछ अजीब से लग रही थी. ये सेना लेके आना युद्ध करना. ये सब अलग बात है लेकिन प्राण घातक हमला अभी तक नहीं हुआ था मुझपर. इसलिए मुझे कुछ डाउट सा हो रहा था की ये सब आखिर क्यों हो रहा है………….



तो बे कॉन्टिनुए………………….
 
अपडेट 93



में यही सोच रहा था की प्राची ने मुझे टोका.

प्राची- क्या हुआ क्या सोच में दुब गए.

मैं- यार सोचने की बात है. अभी तक किसी भी असुर ने इस प्रकार का हमला नहीं किया मुझपर जिससे बकै मेरी जान पैर बन आये. जबकि ये बात जानते हुए भी की यहाँ मेरी जान जा सकती है. सोचने वाली बात है न. ये सेना ये सबकी जरुरत hi नहीं पड़ती.

ये सुनकर सभी के दिमाग की घंटी बजी.

प्राची- अच्छा hi हुआ न की उन्होंने ऐसा हमला नहीं किया और हम उन्हें परास्त करने में सफल रहे.

मैं- ये बात भी ठीक है लेकिन सोचने वाली बात है. कही कोई और खिचड़ी तो नहीं पाक रही है अंदर

मैंने ये कहा hi था की पता नहीं क्या हुआ अचानक से हमारे चारो तरफ एक घेरा सा बन गया. जैसे कोई कवच. और हम अभी सोच hi रहे थे की ये क्या है तभी शुक्राचार्य की आवाज आई.

शुक्राचार्य- बहुत खूब अच्छा दिमाग लड़ाया लेकिन अफ़सोस की थोड़ी देर हो गयी ये समझने में. अभी तक हमने तुमपर किसी भी घातक शक्ति का प्रयोग इस लिए नहीं किया क्युकी ये तुम्हारे साथी तुम्हारे साथ नहीं थे. ये सेनिको को भेजना तो बस इक चारा था इन सभी को यहाँ बुलाने का. और देखो सभी आगये यहाँ पैर. और मैंने ऐसा इसलिए किया क्युकी तुम सबकी शक्तिया जुडी हुई है. और तुम यहाँ थे लेकिन तुम्हारे साथी नहीं. इसलिए मेरी शक्तियों का असर तुमपर ज्यादा नहीं हो रहा था. क्युकी ये चारो एक संतुलित वातावरण में उपस्थित थी. और अब ये यहाँ आचुकी है जहा तुम सबकी शक्तिया कमजोर हो गयी है. इसलिए मेरे हर प्रहार का तुम सभी पैर असर पड़ेगा. अगर में यहाँ देव को हानि भी पहुँचता तब भी ये आसानी से बच निकलता. क्युकी तुम चारो की शक्तिया इसकी रक्षा कर देती. लेकिन अब जब सब साथ में हो तो सभी को एक साथ ख़त्म करूँगा me.kyuki तुम चारो इसकी ताकत भी हो और कमजोरी भी.

मैं- बहुत खूब लेकिन अब बचा कोण है. ये शक्ति का प्रयोग किसके लिए करोगे. तुम्हारा राजा तुम्हारी सेना सभी तो समाप्त हो चुके है.

शुक्राचार्य- हो जाने दो. इस अस्त्र से में सभी को पुनः जीवित कर लूंगा. बस फिर देखना तुम असुरो का केहर.

मैं- आप अभी तक नहीं सुधरे. जब शिव जी ने आपको निगल लिया था तब आपका ह्रदय परिवर्तित हो गया था. लेकिन कहते है न. की बुरा इंसान चाहे कितना hi क्यों न सुधर जाये. बुराई एक न एक दिन उसे बापिस अपनी तरफ खींच hi लेती है.

शुक्राचार्य- तुम्हे जो समाज न है समाज लो.

ये कहकर उन्होंने मंत्र फूक कर हमारे ऊपर छोड़ दिया. और ऐसा करते hi कुछ बहुत hi घातक कला धुआँ उस चक्र में फ़ैल गया. और चक्र पूरी तरह से बंद हो गया. इस धुए में हम सास भी नहीं ले प् रहे थे.

शुक्राचार्य- जानते हो ये क्या है. ये कालकूट से भी ज्यादा घातक ज़हर है. जिसे मैंने खुद बनाया है. और इसका परिक्षण भी किया है. में जनता हु तुम्हारे अंदर कालकूट है. लेकिन कालकूट इस ज़हर को कटेगा नहीं. बल्कि इसमें मिलके और ज़हरीला हो जायेगा और जो प्राण तुम्हारे बच गए थे अब नहीं बचेंगे. और अगर किसी तरह तुम बच भी गए. तब भी तुम्हारे ये साथी नहीं बचेंगे.

ये सुनते hi मेरे काम खड़े हो गए. मैंने उन चारो को देखा तो वो लगभग बहसः होने की कगार पैर hi थी. और ये सब देखकर मुझे लगने लगा की आज हम सभी का अंतिम समय आ hi गया है. में इन्हे कैसे बचा पाउँगा. माँ ममी दादू और मां को भी नहीं बचा पाया में तो. तभी मुझे दिव्यस्त्र का ख्याल आया मैंने सोचा एक बार तरय करके देखता hi सायद काम बन जाये.

मैंने दिव्यास्त्र को इन चारो की रक्षा करने को कहा. इन्हे जीवित रखने को कहा.

मेरे ऐसा कहते hi दिव्यास्त्र से एक रौशनी निकली और एक एक करके इन चारो के सरीर में समां गयी. और फिर वो बहा क्या करने लगी पता नहीं. लेकिन थोड़ी hi देर में वो रौशनी बिलकुल काली होल बहार निकल गयी. हलाकि हम कवच में थे ीये वो रौशनी भी कवच में hi रह गयी. उसके बाद मैंने खुद को बचने को कहा. तो दिव्यास्त्र ने फिर से बही किया और रौशनी मेरे अंदर समां गयी. और सायद वो सरे ज़हर को अपने अंदर लेके बहार निकाल रही थी. और उन्ही के जैसे मेरे अंदर से भी वो रौशनी थोड़ी hi देर में बिलकुल काली होक बहार निकल गयी.

वो चारो फिलहाल बेहोश hi थी. लेकिन उनकी ससे चल रही थी. जो अच्छी बात थी मेरे लिए. में भी एक दम से ढीला सा पद गया था.

शुक्राचार्य- कमल कर दिया. देखा ये है दिव्यास्त्र की असली ताकत. ये सब देखकर मेरी इक्छा और बाद गयी है इसे पाने की. और अब सम्भालो मेरे इस बार को.

उन्होंने फिर से कोई मंत्र पद के उस कवच में छोड़ दिया. और ऐसा करते hi.kavach ले चारो तरफ से भयंकर बिजली के झटके लगने lage.ham सभी को. और इसी झटके को बजह से रौशनी ने जो ज़हर हमारे सरीर से बहार निकला था. वो फिर से आज़ाद हो गया. दिव्यास्त्र की शक्तिया कमजोर होने के कारण. और फिर से वो हमारे सरीर में जाने लगा.

मैंने सोचा ऐसा काम नहीं बनेगा मुझे कुछ और तरय करना होगा.

यही सोचकर में बही बैठ गया. अपनी आँखों को बंद किया और मंत्र का जाप करने लगा. जैसे hi तिरदये खुली मैंने सीधा प्रहार किया उनके कवच पैर. मेरी साडी शक्तिया उनके कवच से टकरा रही थी जिस बजह से उनका कवच कमजोर पड़ने लगा था और वो खुलने लगा था. जैसे कवच खुला. मैंने अपनी शक्ति का प्रयोग सीधा इस ज़हर पैर किया. और एक छोटे से हिस्से पैर प्रहार होते hi पूरा ज़हर उसकी मदद करने के लिए एक साथ आज्ञा. जैसे ये जीवित हो और सब समझ रहा है. ज़हर मेरी शक्तियों से लड़ने की पूरी कोसिस कर रहा था. लेकिन नाकाम रहा और बही पैर उसका भी अंत हो गया.

ये सब देखकर शुक्राचार्य का दिमाग फिर गया. उन्हें समाज में नहीं आया की अब वो और क्या प्रयोग करे.

में उन्ही को देख रहा था.

तो उन्होंने भी अपनी आँखो को बंद किया और पता नहीं क्या करने लगे. तभी अचानक से चारो तरफ से काली शक्तिया उड़द उड़द कर उनके सामने आने लगी वो भी एकता होने लगी. साडी शक्तिया मिलकर एक जुट होकर हमला करने का प्लान था शुक्राचार्य का.

जो पूरा भी नहीं होने दिया मैंने. और फिर से तिरदये से हमला किया उनके उस काली शक्ति के घेरे पैर. और ऐसा होते hi वो शक्तिया चिल्लाने लगी. वो नर्क की उस आग में जलने लगी. जिसकी कल्पना भी कोई नहीं करना चाहता. जितनी भी शक्तिया बहा आती जा रही थी. सभी को ये पीड़ा होना स्टार्ट हो गया था. सायद शुक्राचार्य को इसका पता नहीं चला और वो साडी शक्तियों को इकठा करने में लगे हुए थे. और यहाँ काला धुआँ बढ़ता hi जा रहा था. मेरी शक्तिया उन्हें जलने की कोसिस कर रही थी. लेकिन जैसे जैसे और शक्तिया उनके साथ जुड़ रही थी. मेरी शक्तियों का असर उनपर काम होने लगा था. फिर भी मैंने शक्ति का प्रहार जारी रखा. और दूसरे हाथ में दिव्यास्त्र को उठाया और उसको भी भयंकर शक्ति प्रहार करने को कहा उस काले धुए पैर. और मैंने उसे उनकी तरफ कर दिया. दिव्यास्त्र ने भी अपनी शक्तियों से उसपर प्रहार करना सुरु कर दिया.

थोड़ी देर तक फिर वो कमजोर पड़ने लगी. लेकिन हैरानी की बात थी इनका अंत नहीं हो रहा था. मेरी दोनों शक्तिया मिलकर भी उनको काम नहीं कर प् रही थी. उनकी शक्तिया बढ़ती hi जा रही थी. मेरे फाॅर्स में कोई कमी नहीं थी लेकिन बहा का फाॅर्स आउट ऑफ़ कण्ट्रोल होता जा रहा था. तभी अचानक से मेरे माथे पैर चार हथेली रखा गयी. जो किसी और की उन चारो की थी. और ऐसा करते hi उनकी शक्तिया भी मेरी शक्तियों से मिल गयी. और अब पुरे फाॅर्स से एक बार फिर हमला शुरू हुआ. और फिर से वो कमजोर पड़ने लगी. लेकिन अगेन उनका अंत नहीं हो रहा था. में तो ये देखकर हैरान था की ऐसी और कितनी शक्तिया है जो ख़त्म होने का नाम hi नहीं ले रही है. सायद अनगिनत.

हम सबको शक्तिया मिलकर भी उनको जरा सी चोट नहीं पंहुचा प् रही थी. जो बकै में चिंता का विषय था.

इसलिए मैंने फिलहाल शक्तियों का इस्तेमाल करना बंद कर दिया.

रेनू- ये आखिर कोनसी शक्ति है जो ख़त्म hi नहीं हो रही है.

मैं- ये वो बुराई है जो हर किसी के अंदर कही न कही निबास करती hi है. चाहे वो कितना hi सज्जन क्यों न हो. लेकिन ये बुराई उसके अंदर भी रहती hi है. किसी न किसी रूप में. जैसे लालच जलन, हवस, ेट्स. शुक्राचार्य इसी को एक साथ कर रहे है. और इसी लिए शक्तियों का ज्याद असर इन पैर नहीं हो रहा है. क्युकी ये अमर है. हमेशा जीवित रहती hi है. इनको केवल भगाया जा सकता है. वो भी अच्छे से.

आलिआ- ये कैसे होगा.

मैं- सभी एक दूसरे का हाथ पकड़ लो और घेरा बना कर बैठ जाओ. और मेरे साथ ध्यान लगाओ और गुरुदेव के द्वारा दिए गए मंत्र का पूरी भक्ति से जाप करो.

रेनू- इससे काम बनेगा.

मैं- विस्वास रखो. सब कुछ भूल जाओ. खुद को भी. बस मंत्र को याद रखो और महादेव के आकर को. बाकि सब भुला दो.

ऐसा कहके हम सभी ने अपनी आँखे बंद कर ली. और महादेव का नाम लेकर मंत्र का उच्चारण सुरु कर दिया हमने. वो भी जोर जोर से. ताकि आठों दिशाओ में इस मंत्र की गूंज फ़ैल जाये. हम सभी कोर्स में उच्चारण कर रहे थे. मन में महादेव का मूर्ति विराजमान थी. और बहार उनके नाम का मंत्र.

ॐ नमः सिवाय………

अब हुआ ये की ये मंत्र की गूंज चारो तरफ फैलने लगी. और जब शुक्राचार्य के कानों में बार इनकी गूंज सुनाई दी तो उनका ध्यान टूट गया. और उन्होंने देखा की देव एंड पार्टी hi मंत्र का उच्चारण कर रही है. और उनके उच्चारण से उनके ऊपर hi एक सफ़ेद रौशनी फैलती जा रही है. और इस रौशनी को देखते hi वो कला धुआं पीछे हटने लगा. जैसे दर कर शेर का शिकार पीछे को होता है. शेर के बढ़ते हर कदम के साथ.

बैसे hi ये धुआँ भी पीछे को होने लगा. और शुक्राचार्य ने ये देखकर फिर से धायण लगाने की कोसिस की लेकिन अब वो सफल hi नहीं हो प् रहे थे. इसलिए उन्होंने इन पांचो का ध्यान तोड़ने का फैसला किया और इनके ऊपर एक के बाद एक कई मंत्रो का जाप करके छोड़ा लेकिन किसी का कोई भी असर नहीं है. वो सफ़ेद रौशनी उनके हर वॉर को नाकाम कर रही थी. जो हालत कुछ देर पहले देव की थी. की उनकी शक्तिया काले धुए पैर असर नहीं कर रही थी. बैसे hi हालत अब शुक्राचार्य की थी. उनका हर वॉर नाकाम हो रहा था. रौशनी उन्हें हमारे करीब भी नहीं आने दे रही थी.

और ऐसे hi देखते hi देखते वो सफ़ेद रौशनी उस काले धुए को निगल गयी. और बहा पैर अब उसका जरा सा भी ाँस न बचा. और इसके साथ एक और अच्छी घटना ये हुई की. सफ़ेद रौशनी के पड़ने से. पाताललोक का माहौल एक दम से बदल गया था. जहा पहले मनहूसियत की बदबू आती थी चारो तरफ से. बही अब एक उम्मीद की नै किरण नजर आने लगी थी. ऐसा लग रहा था जैसे इस रौशनी ने यहाँ की साडी मनहूसियत का नाश कर दिया हो. और ये देखकर शुक्राचार्य के दिमाग ने काम करना बंद कर दिया. उन्हें अभी भी समाज नहीं आरहा था की इसे कैसे रोका जाये.

तभी उनके दिमाग की बत्ती जाली और उन्होंने अपना रूप बदल लिया. और वो बन गए भगवन परसुराम.

पूरी तरह से. इनके पास ये कला भी. जिससे ये किसी का भी रूप ले सकते थे.

गुरु परसुराम बनने के बाद इन्होने जोर से आवाज लगाई

वत्स आँखे खोलो.

ये आवाज मेरे कानो से टकराई. और में इसे पहचान गया वो भी अच्छे से. काम से काम मुझे तो यही लगता था. और बाकिओ को भी.

ये आवाज सुनकर हम सभी ने मंत्र का उच्चारण बंद कर दिया और अपनी आँखों को खोल लिया. तो हमारे सामने गुरुदेव खड़े हुए थे.

हम सभी ने उन्हें प्रणाम किया.

मैं- आप यहाँ गुरुदेव. और शुक्राचार्य कहा गए.

गुरुदेव- वत्स ये युद्ध समाप्त हो चूका है. और वो हार मान कर यहाँ से चले गए है. इसीलिए मुझे यहाँ आना पड़ा तुम्हे बधाई देने के लिए.

मैं- ये सब तो आपके आसीर्बाद से hi संभव हुआ है गुरुदेव. आपकी hi दी हुई शिक्षा हमारे काम आई है.

गुरुदेव- में जनता हु वत्स. इसीलिए में तुम सभी को एक एक तोहफा देना चाहता हु. क्युकी में बहुत कुश हु तुम सबके कौशल से.

मैं- क्या गुरुदेव.

गुरुदेव- अभी बताता हु.

ये कहके उन्होंने अपना हाथ आगे किया और कुछ करने लगे. और थोड़ी hi देर में उनके हाथो में कोई अस्त्र जैसा कुछ आज्ञा. जिसका प्रभाव बहुत hi तेज़ था. आते चारो तरफ का माहौल बदल सा गया था.

और तभी मेरे मन से आवाज आई.

गुरुदेव- वत्स वो में नहीं हु. बल्कि एक छल है शुक्राचार्य का. बचो उससे जल्दी. वो तुम सभी पैर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करने जा रहे है.

ये सुनते hi. मेरी आँखे चढ़ गयी. और मुझे खुद पैर इतनी हैरानी हुई की में समाज क्यों नहीं पाया. और मैंने बिना कोई समय गाबए दिव्यास्त्र को हाथो में ले लिया. लेकिन बहुत देर हो गयी. और उन्होंने ब्रह्मास्त्र को हैंपर छोड़ दिया. ऐसा होते hi मैंने सभी को कहा की अपने हाथो को जोड़ कर इसे प्रणाम करो जल्दी. होने अस्त्र त्याग दो.

मैंने तो ऐसा तुरंत hi कर लिया. लेकिन वो चारो कुछ समाज hi नहीं पाई. और अगले hi पल उन पैर ब्रह्मास्त्र का भयंकर प्रहार हो गया. और पल भर में hi उन चारो के प्राण निकल गए. और बहा पैर एक विस्फोट जैसा भी हुआ जिसके प्रभाव से में उड़ता हुआ दूर जा गिरा.

वही ब्रह्मास्त्र अपना कार्य करके बापिस चला गया. और बहा पैर छोड़ गया उन चारो की लाशो को. जो पूरी काली पद गयी थी. इनके सरीर नहीं भस्म हुए क्युकी इनके पास दिव्यास्त्र की शक्तिया मौजूद थी. बाकि जो सबसे मैं चीज़ होती है वो जरूर चली गयी थी. इन सभी के प्राण.

इस धमाके में मेरे कान एक दम से सुन्न हो गए थे. मुझे कुछ भी समाज में नहीं आरहा था की क्या हुआ अभी. जो भी हुआ क्या वो सत्य था. या कोई सपना.

तभी शुक्राचार्य अपने असली रूप में आगये और मेरी तरफ बढ़ने लगे.

मेरे हाथो में दिव्यास्त्र नहीं था. और मुझे उसकी जरुरत थी जैसे hi मैंने ये स्मरण किया वो तुरंत hi मेरे हाथो में आज्ञा. और में हिलता डुलता अपने घुटनो पैर बैठ गया. मेरे सामने शुक्राचार्य आचुके थे.

शुक्राचार्य- अब क्या करोगे तुम वत्स. तुम्हारे साथी अब मरे गए है और तुम्हारी शक्तिया पहले से भी और कमजोर हो गयी है. अभी भी समय है मुझे ये सोप दो. या फिर अपनी मृत्यु को स्वीकार करो. उसके बाद भी ये होगा तो मेरा hi.

मैं- आपने मेरा सब कुछ चीन लिया मुझसे. और अब मेरी बरी है.

ये कहके मैंने एक जोरदार प्रहार किया दिव्यास्त्र से उन पैर. और वो उसके प्रहार से थोड़े दूर जा गिरे.

और मैंने अपने दोनों हाथो को जोड़ा और बोलना सुरु किया.

मैं- आप एक ब्राह्मण है गुरु है इसलिए में आपकी हत्या नहीं करूँगा. क्युकी मुझे मेरे सर पैर ऐसा कलंक नहीं चाहिए है. लेकिन आपको सजा जरूर दूंगा. आपने जिस शक्ति को प्राप्त करने के लिए ये सब किया है. अब वो आपकी कभी नहीं हो पायेगी. जानना चाहते है कैसे. तो देखिये.

मैंने अपनी आँखों को बंद किया और दिव्यास्त्र से बात करना शुरू किया.

मैं- हे दिव्यास्त्र हे पंचमहाभूतो के प्रतीक. उनकी साडी शक्तियों को होने अंदर सामने वाले हे पवित्र दिव्यस्त्र. इस समय में आपका स्वामी हु और उस हिसाब से आपको मेरे हर आदेश का पालन करना hi होगा. और में आपको आदेश देता हु. की अपने आप को हमेशा के लिए इस ब्रह्माण्ड में विलीन कर लीजिये साडी शक्तियों के साथ. और फिर कभी भी जागृत मत होइएगा. चाहे कोई भी आपका स्मरण करे. कभी भी किसी के भी सामने मत आइयेगा. आपने आप को विभाजित कर लीजिये. और विलीन हो जाइये इस ब्रह्माण्ड में.

बही ये सुनके शुक्राचार्य को ऐसा झटका लगा जिसकी कल्पना भी उन्होंने नहीं की होगी. और वो होर से नहीं चिल्ला उठे. और खड़े होक दिव्यास्त्र की तरफ दौड़ने लगे. तभी दिव्यास्त्र में इतना भयंकर विस्फोट हुआ की सारा पतलोक उससे कम्प गया. और में और शुक्राचार्य उस धमाके से और दूर जेक गिरे. मेरी हालत तो बैसे hi ख़राब थी. इस धमाके के बाद और ज्यादा ख़राब हो गयी. बही शुक्राचार्य भी कुछ देर के लिए एक दम सुन्न हो गए.

और दिव्यस्त्र इस धमाके से पांचो ांसो में बात गया और देखते hi देखते बहा से गायब हो गया. और अपने साथ अपनी शक्तिया भी ले गया जो मेरे अंदर थी और उन चारो के सरीर में थी.

और यहाँ दिव्यास्त्र का अंत हो गया. और यही वो प्लान था जो देव सबसे अंत में करने वाला था जब सब उसके हाथो से निकल जाने वाला था. है अगर ऐसा कुछ नहीं होता तो दिव्यास्त्र भी सलामत रहता.

बही शुक्राचार्य इस झटके को संभल hi नहीं पाए. और देव को कोसने लगे की ये क्या कर दिया उसने. उनके लिए वो कहाबत सही हो गयी थी हाथ को आया परन्तु मुँह न लगा.

और इस बात से जो गुस्सा आरहा था उसे निकलना भी जरुरी था. इसलिए वो खड़े हुए और अपने हाथो में एक तलवार ले ली. और देव की तरफ बाद गए. बही देव बेहोश हो चूका था. उसका सरीर अब पहले से बहुत कमजोर हो गया. इन शक्तियों से जो सरीर बज्र के सामान था अब वो एक आम इंसान के शरीर में बदल गया था. शुक्राचार्य देव के करीब पहुंचे और तलवार को हवा में उठाया और जैसे hi हमला किया तभी देव और उन चारो के सरीर बहा से गायब हो गए. और ये देखकर शुक्राचार्य फिर से अपना माथा पकड़ कर बैठ गए. उनके हाथ से ये मौका भी चला गया. और अब उनके हाथ कुछ नहीं था. इतना सब खोने के बाद भी. उन्होंने इतने बलिदान दिए उस अस्त्र को प्राप्त करने के लिए. लेकिन उन सभी के बलिदान बेकार चले गए. और दिव्यस्त्र भी हाथ नहीं लगा. ये वो दर्द था जो इस समय केवल शुक्राचार्य hi महसूस कर प् रहे थे.

इसमें देव की जीत भी हुई और हार भी. उसने दिव्यास्त्र को गलत हाथो में नहीं पड़ने दिया. इससे उसकी जीत हुई. लेकिन वो अपनों को नहीं बचा सका और इस प्रकार उसकी हार हुई.

बही शुक्राचार्य के हाथो में केवल हार hi लगी. उन्होंने हर तरह के सडयंत्र रचे लेकिन उनका कोई भी सडयंत्र उन्हें दिव्यास्त्र नहीं दिला सका. जिस बजह से उनका मानसिक आघात पंहुचा था. और इस आघात के साथ वो जीवित hi नहीं रहना चाहते थे. इसीलिए उन्होंने उसी समय योगाग्नि से खुद के प्राण ले लिए. और अब उनकी रख बहा पैर पड़ी हुई थी. जिसे हवा अपने साथ उदा ले जा रही थी.

बाकि

अब देखते है की क्या होता hai…..dev और बाकि सभी कहा गायब हुए है. और इस ात्र के समाप्त होना पैर कोई दुष्परिणाम तो नहीं निकलते है.

तो बे कॉन्टिनुए………………….

 
अपडेट 94



Shukracharya or unke asuro kaam ho gya tha. Halaki sare asur samapt nahi hue the. Parantu shukracharya ke jane ke baad unhone apni haar swikaar kar li thi. Or patallok ka vatavarn bhi in pancho ki shaktiyo se badal gya tha. Jis bajah se jo burai baha nivaas karti thi vo ab kam ho gyi thi.

And dev or uska pariwar is waqt gehri neend me so rahe the. Sirf dev hi jeevit tha. Lekin vo koma me tha. Or vo koma se uthna hi nahi chahta tha.gurudev ne tamam kosis karke dekh li lekin dev hai ki uthne ka naam hi nahi le raha tha.

Bahi man me dev ki aatma bahut takleef me thi. Uske sab apne ja chuke the. Jis bajah se vo brih ki peeda se gujar raha tha. Tabhi uski antaraatma me swayam mahadev ne use darshan diye. Jinhe dekhkar dev ne unhe pranaam kiya.

Mahadev- putra mujhe tumper bahut garv ho raha hai. Tumne jo karya kiya hai vo bakai me sadharan nahi hai.

Me bahut prasann hu tumse. Parantu tum jaag kyu nahi rahe ho.

Main- mahadev aap to jante hi hai. Bhale hi me apne karya me safal raha hu. Parantu me apna sab kuch kho chuka hu.or aise akele mujhe nahi jeena hai. Isliye me vinti karta hu Aapse ki mere prano ko har leejiye.

Mahadev- putra tumhare pariwar ka antim samay yahi tha. Unki kismat me jo likha tha vo hua. Parantu tum aise haar nahi maan sakte tumhe jeena hoga putra

Main- mahadev mujhe itni badi saja mat deejiye. Me nahi jee paunga. Kam se kam aise to bilkul nahi. Mera pariwar hi meri pehchan hai. Unke moh se me bimukh nahi ho sakta. Mujhe unki jarurat hai.

Mahadev- me samjhta hu putra tumhari manodasha.

Main- kya un sabhi ko bapis lane ka koi marg nahi hai. Me har sambhav chounotiyo ko paar kar jaunga. Bas aap unhen Jeevan daan de dijiye. Chahiye to mere pran le lijiye. Parantu un sabhi ko jeevan de dijiye prabhu.

Ye sunkar mahadev soch me pad gye. Vo aisa kar sakte the. Parantu isse prakriti ke chakra me badlav ho jayega ye baat bhi vo achhe se jante the. Filhal jo hua hai vo badal sakta tha. Parantu ek satya ye bhi tha ki vo ye sab swayam hi karna chahte the. Arnav unhi ka ans tha or vo usi ko itne dukh me nahi dekh sakte the. Abhi tak Hui sari parikshao me vo utrin raha hai. Usne apni sujh bujh ka badiya pradarshan kiya hai jis bajah se mahadev usper ati prasann the. Isliye unhone faisla kar liya dev or baki sabhi ko Jeevan daan dene ka.

Mahadev- putra tumhare dukh ne mujhe vivas kar diya hai. Tum mere ans ho or me tumhe dukh me kadapi nahi dekh sakta. Isliye tumhare ab tak ke liye gaye karyo ka fal me tumhe avashya hi dunga. Parantu aisa karne se kai badalav bhi aayenge prakriti me. Jinhe tumhe hi fir se vyavasthit karna hoga. Kya tum aisa karne ko tatpar ho.

Ye sunte hi dev ke chehre ki hasi bapis aagyi. Use aisa anubhav pehle kabhi nahi hua tha. Vo turant hi dandvat ho gya or mahadev ki istuti karne laga.

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं । विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् ॥

निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं । चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम् ॥

निराकारमोङ्कारमूलं तुरीयं । गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम् ।

करालं महाकालकालं कृपालं । गुणागारसंसारपारं नतोऽहम् ॥

तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभीरं । मनोभूतकोटिप्रभाश्री शरीरम् ॥

स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गा । लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा ॥

चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं । प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ॥

मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं । प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि ॥

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं । अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशं ॥

त्रय: शूलनिर्मूलनं शूलपाणिं । भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम् ॥

कलातीतकल्याण कल्पान्तकारी । सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी ॥

चिदानन्दसंदोह मोहापहारी । प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥

न यावद् उमानाथपादारविन्दं । भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् ।

न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं । प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं ॥

न जानामि योगं जपं नैव पूजां । नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यम् ॥

जराजन्मदुःखौघ तातप्यमानं । प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो ॥

रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये ॥।

ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ॥

Ye pura kehne ke baad fir se dev ne unhe pranaam Kiya. Or ye sampurn श्रीरुद्राष्टकं sunne ke baad mahadev ati prasann ho gye.

Mahadev- putra tumhari is stuti se me bahut prasann hua hu. Tumhari is bhakti or shraddha ke fal ke rup me tumhe vardaan swarup tumhe or tumhare pariwar ko jeevan pradaan karta hu. Parantu vats meri baat yaad rakhna tumhe is sansaar ka santulan fir se banana hoga.

Main- prabhu aapke aadesh ka me puri nistha se palan karunga. Jo bhi mere vash me hoga me use avashya hi karunga. Kripa kar mujhe bataye ki kis prakaar ke badlav honge.

Mahadev- putra ye tumhe jab sahi samay aayega tab tumhare gurudev tumhe avgat kara denge. Tab tak apna jeevan sadhram dhang se jeete raho or bhakti ke marg per chalte raho. Mera aasirbaad hai tumhare sath hai hamesha.

Main- ye sunkar me dhanya ho gya prabhu. Aapki kripa samast sansaar per banaye rakhe.

Ye sunne ke baad mahadev ne Tathastu bola or bo antardhyan ho gye. Bahi iske baad dev or uska samast parivar nidra se jaag gya. Unhe sab kuch yaad tha. Unhe aisa laga jaise vo so rahe the or pratah hote hi jaag gye.

Dev Prachi aalia Renu or Surbhi gurudev ke aashram me the or baki log ghar per.

Gurudev ne jab sabhi ko sahi salamat dekha to go mahadev ki leela samajh gye or unhe koti koti dhanyabaad diya. Bahi dev ke is kaarname per samast devtao ne un sabhi per phulo ki varsha ki or apne apne aasirbaad in sabhi ko pradaan kiye.

Bahi dev ne gurudev ko mahadev ke dwara kahe gye vachan sunaye ye bhi ki vo prakriti me badalaav ki baat kar rahe the.

Tab gurudev ne dev ki bato ko samjha or usse kaha.

Gurudev- vats. Mahadev ne kaha hai to satya hi hoga. Parantu abhi uska samay nahi aaya hai. Jab vo samay aayega tab me swayam hi tumhe iski suchna de dunga. Tab tak ke liye apna karm karte raho.

Or gurudev ne use aasirbaad diya.

Vo din nikal jane ke baad dev and party sabhi ko pranaam karke apne ghar lout gyi. In charo ko kuch pata hi nahi tha ki unhe kya hua tha. Tab dev ne unhe sari ghatna bigatbaar suna di. Or jab unhe pata chala ki divyastra fir se vilupt ho gya hai to sabhi ko tagda jhatka laga. Khaskar renu or surbhi ko. Kyuki unki vo shaktiya ja chuki Jo divyastra se unhe mili thi. Sirf unki hi nahi baki sabhi ki bhi divyastra wali shaktiya ja chuki thi. Lekin dev ke pass janm se mili shaktiya thi. Bahi aalia ek pari thi to uske pass bhi shaktiya thi. Prachi ko dev se virasat me shaktiya mili thi. Vo uske pass thi. Or rahi baat Renu or Surbhi ki to unke pass gurudev ke dwara diye gye mantra abhi bhi the. Jo unki soi hui janm se mili shaktiyo ko jaga dete the. Is prakaar sabhi ke pass unke janm se mili shaktiya already thi. Or yahi baat dev ne un charo ko batai to vo sabhi samaj gyi. Or kush bhi ho gyi.

Bahi ghar pahuchne per sabhi apne gharwalo se mile. Unhe dekhkar aisa laga jaise varso ke bichde aaj mil rahe ho. Or aisa swabhavik bhi tha. Aakhir apni mrityu ko parast karke jo aaye the sabhi. Uske baad sari kahani gharwalo ko sunai gyi. Jise suke sabhi dhanya ho gye. Or sabhi ne agle hi din ghar me ek badi puja ka aayojan Kiya. Samast devi devtao ko dhanyabaad dene ke liye.or ye puja swayam gurudev ne sampann karwai. Tridev or samast devi devtao ka aasirbaad baras pada iske baad sabhi per.

Or fir aise hi inki jindagi chalti rahi. Clg pura hone ke baad gurudev ne Renu or Surbhi ke liye shadi ke prastaav ko bheja un dono ke liye unhone bahut hi sundar or susil ladko ka chayan Kiya jise ek hi najar me dono pariwar ki majuri mil gyi. Akhir gurudev ke chayan kiye hue ladke the. Unme mana karne jaisa kuch tha hi nahi. Or badi Dhoom dham se un dono ka vivah sampann kara diya gya. Vo bhi gurudev ke dwara. Ye unhi ka farz tha. Jo unhone bakubhi nibhaya. Or dono ka vivah sampann ho gya. Jaha Renu pahuchi nasik or Surbhi pahuchi ujjain. Dono hi mahadev ki sharan me thi. Jaha unka sundar bhavisya unke liye tayyar baitha tha.

Bahi dev or Prachi ke clg hojane ke baad inke vivah ki baat chali. Or sabko keval ek hi tension thi ki Prachi ke perants kaise react karenge. Parantu mahadev or gurudev ke aasirbaad se aisa kuch nahi hua jo nahi hona tha. Prachi ke maa papa is shadi ko razi ho gye. Or unhe Aalia se koi aitraj bhi nahi tha. Unhe bas beti ki kushi pyari thi. Jab khud Prachi ne kaha ki use koi problem nahi hai tab unke liye koi prashn bacha hi nahi karne ko. Or bahi aalia ke maa papa ko bhi Aalia ne prithvi per bulaya or fir sabki sehmati or mujudgi me in teeno ka vivah bhi sampann karaya gya. Sabhi bahut kush the. Khaskar bade log. Kyuki unke bache ab settle Jo ho gye the.

Vivah ke baad kuch rashmi ko pura karne ke liye ye teeno Parilok gaye. Jaha ranipari ne apne jamai ka bahut hi bhavya swagat kiya. Or fir baha ke reeti ribazo karaye gaye teeno ko. Jise unhone puri shraddha se sampann kiya. Or fir kuch din vahi ruke or fir bapis prithvi loute aaye.

Bahi inki shaktiyo ke liye ye teeno roj hi dhyan lagate the. Or unhe jaagrit karte the. Halaki unke istemaal ka mouka inhe nahi milta tha. Parantu dev samaj ki burai ko saaf karne ke liye Inka istemaal karta rehta tha. Gunde badmasho ke safaye me. Police or kanun ki madad vo chhipkar karta tha.

Bahi chirag or lucky bhi settle the apni life me. Clg ke baad dono ne apni apni pasand se shadi kar li. Jise ye log clg me hi mile the. Or ye raaj aaj bhi unke seene me dafn hai ki dev or bakio ke pass powers hai. Or achhi baat ye thi ki lucky police me chala gya tha. Or kai mouko per vo dev ko suchana deta rehta tha madad ke liye. Khaskar bahut hi kathin paristhitiyon me. Jaha police jyada kuch nahi kar sakti thi.

Or chirag vo business minded tha isliye usne dev ki madad se ek chhota sa business shuru kar diya. Or dheere dheere vo patri per bhi chalne laga. Jisse in sabhi ki life's set ho chuki thi.

Bahi jaisa mahadev ne kaha tha kuch badlab honge prakriti me. Or aisa samay bhi najdeek aane laga tha. Jab kuch bhayankar sankat samast brahmand per aane ke aasar banne lage the. Jiske liye gurudev ne dev ko sachet kar diya tha.

Baki ab agle part me dekhenge ki ye sankat akhir kya hai. Or dev inse kaise niptega. Apni seemit shaktiyo ke sath……….

Tab tak ke liye…..

RADHE RADHE

TO ALL MY READERS……...

AND MAT BHULIYE….

IT'S JUST A BEGINNING……….

 
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