A wedding ceremony in village - Page 16 - SexBaba
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A wedding ceremony in village

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फाइनली लखन ने अपना मन मजबूत कर लिया और विनीता का साथ देने का निश्चय कर लिया. उसने भी मिटटी को अपने हाथो में भरा और अपने हाथो को विनीता के चेहरे पर रख दिया और उसके चेहरे गालो होंठो बालो को आगे से पीछे ऊपर से नीचे तक उस मिटटी से सराबोर कर दिया. चेहरे गर्दन पर मिटटी मलने के बाद उसकी बहो से होते हुए उसके कंधो पर रख दिया. और विनीता के कंधो और उसकी बहो पर मिटटी का लेपन करने लगा. लखन सिंह के साथ बिताए गए कामुक पालो ने पहले भी विनीता को उत्तेजित करा था पर इस बार की बात कुछ अलग था मन के प्रेम भाव की वजह से आज उनके खुरदुरे हाथो का स्पर्श उसे अलग hi आनंद दे रहा था. पर वो ये बात लखन जी पर ज़ाहिर नहीं करना चाहती थी क्युकी लखन जी की झिझक देख कर उसे तो यही लग रहा था की लखन जी के मन में उसके लिए वैसा कोई भाव नहीं इसलिए वो अपने भावो को उनपर ज़ाहिर करके उन्हें ऐम्बर्रास फील नहीं करना चाहती थी.

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विनीता: देखा लाख जी कितना आसान है. आप दिमाग से ये बात निकल दीजिये की आप मुझे कहा छू रहे है, बस यु सोचिये की आप किसी वास्तु पर पेंटिंग कर रहे है. आप जितना ये सोचेंगे की आप मुझे कहा सचहु रहे है उतना आप ज्यादा उनकंफर्टबले फील करेंगे इसलिए ज्यादा सोचिये मत.

लखन: जी

विनीता की गर्दन पर मिटटी को मलते मलते लखन धीमे धीमे अपने हाथो को सरकता हुआ नीचे को लेन लगा. विनीता की सासे सासे तेज़ ते चल रही थी उसका सीना ऊपर नीचे हो रहा था. और वो छह कर भी इस उत्तेजना को काबू नहीं कर सकती थी क्युकी जीवन में पहली बार कोई मर्द उसके नग्न स्तनों को अपने हाथो से स्पर्श करने जा रहा था. नीचे आते आते लखन सिंह ने अपने हाथो को विनीता के स्तनों से दूर रखने का भरसक प्रयत्न करा पर उनके हाथ की उंगलिया विनीता के स्तनों के किनारो से स्पर्श हो hi गई. इस हलके से स्पर्श ने विनीता के पुरे बदन में करंट की एक लेहेर दौड़ा दी. और सिर्फ विनीता hi नहीं लखन जी के हाथ भी काँप गए और उन्होंने अपने हाथो को पीछे खींच लिया.

पर विनीता भी अंदर से काफी उत्तेजित हो चुकी थी और वो जल्द से जल्द इस उत्तेजना को महसूस करना चाहती थी और इससे बेहतर अवसर उसे नहीं मिल सकता था जहा बिना उसके चरित्र पर दाग लगे वो इसे महसूस कर सकती थी. इसलिए विनीता ने लखन के पीछे हेट हाथो को बीच में hi थाम लिया और उनके हाथो को नीचे ज़मीन में रख कर उन्हें ढेर साडी मिटटी से सराबोर कर दिया. और दुबारा उनके हाथो को अपने स्तनों के समीप लेकर छोड़ दिया क्युकी वो खुद उनके हाथो को अपने स्तनों पर रखकर उनके सामने अपनी कामुकता को ज़ाहिर नहीं करना चाहती थी.

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विनीता: लखन जी आप फिर सोच रहे है मैंने आपसे कहा न कुछ सोचिये मत जिन अंगो को छूने में आपको ज्यादा झिझक हो रही है वह पहले hi मृदा लेपन करके इस झिझक को दूर कर लीजिये ताकि आगे की पूजा आसान हो जाए.

विनीता ने लखन को हिम्मत देने के लिए उनके कंधो को थम लिया. और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करा और विनीता का प्रोत्साहन पाकर लखन ने जैसे hi अपने हाथो को आगे बढ़ाया उनकी हथेलिए सीधा विनीता के स्तनों से जा मिली. विनीता के तन बदन में करंट दौड़ गया और लखन सिंह भी कुछ पल को स्तब्ध रह गए उनसे न हाथ चलाया जा रहा था न हटाया वो बस जड़ से विनीता के स्तनों पर अपनी हथेली रखे बैठे थे. पर अपने स्तनों पर उन खुरदुरे हाथो के स्पर्श ने विनीता को बेहद उत्तेजित कर दिया और इस उत्तेजना में उसने लखन सिंह के काढ़ो को कुस कर पकड़ लिया. विनीता के चेहरे के भाव से साफ़ ज़ाहिर था की वो किस कदर उत्तेजित थी पर लखन सिंह की आँखों पर पट्टी थी इसलिए वो उन भावो को देख hi नहीं सकते थे यदि देखते तो समझ जाते की आग दोनों तरफ बराबर लगी है. इसलिए वो तो इस पकड़ को बेचैनी की पकड़ hi समझ रहे थे की विनीता किस कदर बेचैन है उसे कितना अजीब लग रहा होगा ये सब करवाते हुए पर मजबूरी वश वो पीछे भी नहीं हैट सकती इसलिए जल्द से जल्द इस पूजा को ख़तम करना hi होगा.

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इसलिए अपनी उत्तेजना को काबू करते हुए लखन ने धीमे धीमे अपने हाथो में भरी मिटटी विनीता के स्तनों पर मलना शुरू करदी. पर उत्तेजना पर किसका वश चला है कुछ पल तो लखन विनीता के स्तनों को एक पूजन क्रिया की तरह छूटे रहे थे पर धीमे धीमे उनके अंदर की काम उत्तेजना उन पर हावी होने hi लगी और वो विनीता के उभारो की सुडौलता को स्पर्श करके उसके आवेग में बह चले. उनके दिलो दिमाग पर विनीता के स्तनों का सुडौल अकार हावी होता जा रहा था. वो विनीता के स्तनों के हर हिस्से को सेहला रहे थे उसे अच्छे से छू कर महसूस कर रहे थे. शायद आँख पर बंधी पट्टी ने इस उत्तेजना के अग्नि में घी का काम करा था. क्युकी जब हमारी कोई एक ज्ञानेंद्री सुप्तावस्था में चली जाती है तो बाकि ज्ञानेन्द्रिय ज्यादा एक्टिव हो जाती है. इसलिए आँखों के बंद हो जाने से उनका ध्यान पूरी तरह से केवल स्पर्श पर केंद्रित था ऐसे में उत्तेजना का बढ़ना स्वाभाविक था. और ये उत्तजेना उनके लिंग पर हावी हो रही थी और वो झटके पे झाकतके खा रहा और उसका अकार पल प्रतिपल बढ़ता जा रहा था.

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विनीता के स्तन के हर हिस्से पर मीठी लग चुकी थी पर शायद लखन भावावेश में इतने खो गए थे की उन्हें इसका ध्यान hi नहीं था. एक घंटे की इस पूजा में वो 15 मं से ज्यादा समय से विनीता के स्तनों को सेहला रहे थे. उनका लिंग पूरी तरह खड़ा हो गया था. कुछ पल बाद जब उन्हें ये एहसास हुआ की वो काफी देर से कामुकता में बहकर विनीता के स्तन दबा रहे तो उन्होंने तुरंत अपने हाथ पीछे खींच लिए. अचानक से उनके यु हाथ पीछे खींच लेने से विनीता का आनंद भी अचानक से रुक गया. लखन को खुद पर काफी गुस्सा आ रहा था की कैसे वो इस कदर उत्तेजित हो गए की उन्हें याद hi नहीं रहा की वो कबसे विनीता के स्तन सहलाने के साथ दबाने भी लगे. क्या सोच रही होगी वो उनके बारे में बेचारी मजबूरीवश मन भी नहीं कर प् रही होगी. और इधर विनीता ये सोच रही थी की काश ये पल यही तुम जाता और लखन जी यही उसके स्तनों के साथ खेलते रहते. दोनों hi एक दुसरे की मनोदशा से पूरी तरह अनजान इस प्रक्रिया को संपन्न कर रहे थे.

लखन को विनीता की बात याद आई की जितनी जल्दी वो ये पूजा पूरी कर लेंगे उतना अच्छा होगा तो उन्होंने दुबारा अपनी मुट्ठी में वो मिटटी भरी. और अपने हाथ विनीता के मखमली पेट की तरफ बड़ा दिए. ज्योही उन मिटटी से साणे गंदे खुरदुरे हाथो का स्पर्श उस रेशम से ज्यादा मुलायम पेट से हुआ विनीता सिसकारी लेने को मजबूर हो गई, ये सिसकारी लखन सिंह ने भी सुनी पर इसे भी वो विनीता की मजबूरी मि निकली आह hi समझे. वो अपने हाथो को विनीता के पेट पर ऊपर से नीचे तक चला रहे थे. क्या पतला मुलायम पेट था विनीता के शरीर के रोए रोए खड़े हो गए थे वो किस तरह अपनी उत्तेजना कल काबू करे थी वो hi जानती थी.

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अपने पेट पर घूमती लखन सिंह की उंगलियों ने उसकी छूट को भी अंदर से पानी पानी कर दिया था. जब पेट पर स्पर्श ने उसका ये हाल जार दिया था तो जब उसकी जाएंगे के बीचे उसकी छूट को छुएंगे वह मिटटी लगाएंगे तब क्या हाल होगा कही लखन जी को उसके छूट के गीलेपन का एहसास तो नहीं हो जाएगा अगर ये पानी बह कर बहार आ गया और उन्हें एहसास हो गया तो वो क्या सोचेंगे मेरे बारे में.

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दोनों इसी बात से चिंतित थी की सामने वाला उनके बारे में क्या सोचेगा काश वो एक दुसरे के मन की व्याकुलता एक दुसरे की उत्तेजना को समझ पते तो ये पूजा कितनी आसान और कामुक हो जाती उनके लिए पर शायद अघोरी उनकी मनोदशा समझता था इसीलिए उसने उन्हें आँख में पट्टी बांधने का सुझाव दिया क्युकी वो जनता था की वो इस सुझाव को ज़रूर अपनाएंगे और एक दुसरे के मन के भावो से अनजान बने रहेंगे. विनीता लखन दोनों कमर के ऊपर का सामने का भाग पूरी तरह मिटटी से मॉल गया था पर पीछे पीठ वाला हिस्सा अब भी शेष था और पूजा की शर्त के मुताबिक वो एक दुसरे की तरफ पीठ कर नहीं सकते थे ऐसे में उन्हें एक दुसरे को आलिंगन करके अपने हाथ पीछे लेजाकर एक दुसरे की पीठ पर मृदा लेपन करके hi इस पक्रिया को आगे बढ़ाना था और ऐसा करने पर उनके नग्न शरीरो का स्पर्श होना स्वाभाविक था पर इसके शिव कोई चारा भी नहीं था.

विनीता: लखन जी हम सामंने से तो मिटटी लेपन कर चुके पर हमारी पीठ वाला हिस्सा अब भी बचा है और हम एक दुसरे की तरफ पीठ कर नहीं सकते तो ऐसे में हमे अपने हाथ पीच लेजाकर hi करना होगा और उसके लिए हमे एकदूसरे के करीब आना होगा.

विनीता ये बोल तो गई पर वो hi जानती थी उसे ये बोलते हुए कितनी शर्म आ रही थी. वही लखन सिंह के दिल की धड़कने तेज़ तेज़ चल रही थी की जिस महिला के स्तनों को छूने भर से उनका लुंड खड़ा हो गया जब वो उसके नंगे बदन को अपनी बहो में भरेंगे उसकी चिकनी पीठ को सेहलाएँगे तो कही बहक न जाए कही स्तनों की तरह इस बार उनकी पकड़ इतनी मजबूत न हो जाए की विनीता को उनकंफर्टबले लगने लगे. पर उन्हें सबसे ज्यादा चिंता अपने उत्तेजित लिंग की थी की कही वो विनीता से स्पर्श न कर जाए और उसे उनकी मनोदशा का पता न चल जाए. पर इसके अलावा कोई चारा भी नहीं पीठ पर मिटटी लेपन करने का यही एकमात्र तरीका था. इसलिए लखन ने इसके लिए हामी भर दी.

लखन: जी ठीक है हम जल्द hi य ख़तम कर लेंगे.

विनीता: जी बिलकुल हम दोनों एक साथ एक दुसरे की पीठ पर मिटटी मिलेंगे तो जल्द कर लेंगे.

लखन विनीता ने अपने दोनों हाथो दो मिटटी से भर लिया और एक दुसरे के आमने सामने खड़े हो गए. एक बार फिर विनीता ने अपने हाथ लखन के कंधे पर रखे और हाथो को सरकते हुए उनके पीठ की तरफ ले गई. एक गहरी सास लेते हुए लखन ने भी अपने हाथो को विनीता की बगलो से निकलते हुए उसकी पीठ की तरफ ले चले. दोनों ने एक दुसरे को अपनी बहो में भर लिया. समझ नहीं आ रहा था की उन्हें एक दुसरे की पीठ पर मिटटी मालनी थी इसलिए एक दुसरे को बहो में भरा था या एक दुसरे को बहो में भरना था इसलिए एक दुसरे की पीठ पर मिटटी मॉल रहे थे. पर जो भी बेहद कामुक था और इसका प्रभाव भी उन पर साफ़ दिखाई दे रहा था. लखन सिंह कमर के ऊपर से विनीता के बदन से चिपके थे पर कमर के नीचे विनीता के बदन से दूरी बनाए रखने का भरसक प्रयत्न कर रहे थे ताकि उनका लिंग उसे स्पर्श न करे और उसे उसके तनाव का पता न चले. पर इस कामुक अवस्था की कामुकता उन पर एक बार फिर हावी होती जा रही थी विनीता के स्तन उनके सीने यहाँ वह रगड़ खा रहे थे जो उन्हें उत्तेजित कर रहे थे. विनीता भी खुद पर काबू नहीं कर प् रही थी उसके अंदर की काम वासना उसे लखन जी की बहो में पिघल जाने को मजबूर कर रही थी.

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एक दुसरे क प्रेम से पूरी तरह अनजान वो प्रेमी जोड़ा एक दुसरे के नंगे जिस्मो को बहो में भरे उस एकांत कक्षा में मिटटी से सराबोर खड़ा था. उनके हाथ एक दुसरे की पीठ पर यहाँ वह घूम रहे पर शायद मिटटी लेपन का उद्देश्य कही पीछे छूट गया था और कामुकता उस उद्देश्य पर हावी हो गई थी. विनीता तो इस कदर उत्तेजना में डूब गई थी की उसने अपना सर लखन सिंह के काढ़े पर टिका दिया.

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विनीता की गरम गरम सासे लखन को अपने कंधो पर साफ़ महसूस हो रही थी. ये सासे उन्हें विनीता के ज्यादा और ज्यादा करीब आने को मजबूर कर रही थी. कामुकता उनपर हावी होती जा रही थी विनीता के बदन पर लखन की पकड़ कास गई तो विनीता ने भी लखन को कास कर अपनी बहो में जकड लिया. दोनों के जिस्म इस कदर चिपक गए थे की विनीता के स्तन लाख की बालो से भरी छाती में दबे रहे थे. उत्तेजना विनीता पर इस कदर हावी हो गई थी की वो खुद भी अपने उभारो को लखन जी छाती में रगड़ रही थी. विनीता की सासे उखड रही थी उसने लखन सिंह को कास कर पकड़ रखा था.

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इधर नीचे जो अपने उत्तेजित लिंग की वजह से लखन सिंह ने विनीता से दूरी बनाई थी कामुकता के बहाव में वो दूरी भी मिट गई. उन दोनों की जाँघे एकदम समीप आ गई इतना समीप लखन सिंह का लिंग विनीता के पेट पर रगड़ रहा था उसकी नाभि में दस्तक दे रहा था. उत्तेजना के उन्माद में लखन सिंह भी अपने लिंग को विनीता के कोमल पेट पर ज्यादा से ज्यादा दबाने की कोशिश कर रहे थे.

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ऐसा नहीं था की वो ये सब जानबूझ कर रहे थे पर कामुकता का उन्माद चीज़ hi ऐसी की इंसान छह कर भी खुद को रोक नहीं पता. वाओ दोनों बहकते जा रहे थे शायद बहकते बहकते hi वो लिंग उस स्थान तक भी पहुंच जाता जिसके अंदर दाखिल होना hi हर लिंग की नियति होती औरत की योनि, ये उत्तेजना न जाने किस पड़ाव पर रूकती शायद अब तक उनके बीच मर्यादा की जो दीवार बानी हुई थी वो गिर जाती अगर वो न होता जो अकस्मात् हो गया.

अचानक तीव्र आवाज़ में वो अलार्म घडी बज उठी उसमे लगा एक घंटे का अलार्म बज उठा. अचानक बजे इस अलार्म ने उन दोनों को अपने सेंसेस में वापस आने को मजबूर कर दिया. दोनों एक झटके में एक दुसरे से अलग हो गए. आँखों में पट्टी बंधी होने के बावजूद उन दोनों ने अपना चेहरा छुपा लिया शायद उस शर्मिंदगी की वजह से जो वो अपने अंदर महसूस कर रहे थी. विनीता इसलिए की अपनी बाप की उम्र के इंसान की बहो में इस कदर उत्तेजित हो गई और लखन इसलिए की एक भली महिला के भलाई का उन्होंने फायदा उठाने की कोशिश की. वो तो अच्छा हुआ की उनकी आँखों में पट्टी बंधी थी वर्ण शायद वो एक दुसरे नज़र hi न मिला पते. अलार्म बजे जा रहा था और दोनों बट बने खड़े थे उन्हें समझ नहीं आ रहा था की अब आगे क्या करे एक घंटे का समय पूरा हो गया था और उनके कमर के नीचे का हिस्सा अब भी बाकी था. इससे साफ़ ज़ाहिर था की वो काफी देर से एक दुसरे को बहो में जकड़े हुए थे. पर पूजा का ये चरण अब भी अधूरा था और जैसा की उसमे एक घंटे के न्यूनतम समय की जो सीमा थी वो तो पार हो गई पर अधिकतम समय की कोई सीमा नहीं थी और उन्हें अब भी ये चरण पूरा करके hi आगे बढ़ना था. और इसके लिए उनका दुबारा इस चरण को कंटिन्यू करना ज़रूरी था पर लखन में तो दुबारा विनीता को स्पर्श करने की भी हिम्मत नहीं थी.

अचानक लखन को अपने पैरो पर किसी के हाथो का स्पर्श मेहोस हुआ. वो हड़बड़ा कर एक पल को पीछे हेट पर उन हाथो ने दुबारा उनके पैरो को थाम लिया. वो समझ गए की विनीता ने अभी जो कुछ हुआ उसे भूलते हुए इस पूजा को दुबारा आरम्भ कर दिया. अब तो वो खुद को और भी ज्यादा छोटा महसूस कर रहे थे. वही लखन जी के पैरो के पास बैठकर उनके पैरो में मीठी मल्टी विनीता यही सोच रही थी की शायद वो उनकी बहो में उत्तेजना में कुछ ज्यादा कामुक हरकते करने लगी इसिलए अपनी पत्नी के बिना जी रहे लखन भी उत्तेजित होने को मजबूर हो गए और जैसे hi उस अलार्म की आवाज़ से उन्हें इस बात का बहन हुआ वो एक पल में विनीता से अलग हैट गए इसलिए ये साड़ी गलती उसकी hi है और उसे इस पूजा को कंटिन्यू करना होगा. लखन चुपचाप खड़े खड़े विनीता की हथेलियों को अपनी टांगो पर चलता महसूस कर रहे थे पर न अब उनके मुख से कुछ कहा जा रहा था न विनीति से. दोनों बस शांति से मृदा लेपन की इस क्रिया को पूरा कर रहे थे.

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लखन की टांगो में नीचे मिटटी मलने के बाद विनीता के हाथ उनके जांघो तक पहुंच गए. अपनी जांघो पर घूमते विनीता के हाथ उन्हें एक बार फिर उत्तेजित होने को मजबूर कर रहे थे और अब जल्द hi विनीता के हाथ उनके लिंग तक पहुंच जाएंगे ऐसे में विनीता को उनकी उत्तेजना का पता चल जाएगा. इसलिए अपनी उत्तेजना को काबू करने के लिए उन्होंने अपने निचले होंठ को अपने दातो के बीच कास कर भींच लिया ताकि उससे होने वाले दर्द से उनके अंदर से उत्तेजना का असर कुछ कम हो जाए. लखन सिंह की जांघो पर मिटटी मलने के बाद विनीता ने अपने हाथो में ढेर साड़ी मिटटी भरी पर उनके लिंग को छूने की बजाए घुटनो के बल उचक कर अपने हाथ पीछे लेजाकर उनके नितम्बो को अपने हाथो में भर लिया और उनके नितम्बो पर मिटटी मलने लगी.

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शायद सबसे अंत में उनके लिंग को स्पर्श करना चाहती थी ताकि उसके बाद उसे कही और स्पर्श न करना पड़े. जीवन में पहली बार कोई स्त्री लखन सिंह के चूतड़ों को इस तरह सेहला रही थी आज तक उनकी पत्नी ने भी कभी उनके नितम्बो को इस तरह नहीं छुआ था.

विनीता के स्पर्श जितना ज्यादा उन्हें उत्तेजित करने की कोशिश कर रहे थे उतना hi उनके होंठ पर उनके दांतो की पकड़ मजबूत होती जा रही थी. वो अपने होंठ को इतनी कास कर भींचे हुए थी की उसपर राखत की बूंदे छलक आई थी. और वो ज्यादा से ज्यादा अपना ध्यान विनीता के स्पर्शो से हटाकर उस दर्द पर केंद्रित करने की कोशिश कर रहे थे और कही न कही वो इसमें सफल भी हो रहे थे. लखन जी के नितम्बो पर मृदा लेपन करने के पश्चात् विनीता के हाथ उनके बदन उस अंतिम बचे हिस्से की तरफ बाद रहे थे यानि उनका लिंग. अब तक लाख ने काफी हद तक अपने लिंग पर काबू कर लिया था और वो सामान्य से थोड़ा बहुत hi ज्यादा उत्तेजना में था. विनीता की उंगलियों ने लखन सिंह के अंडकोषों को स्पर्श करा और इधर लखन सिंह अपने दांतो का ज़ोरदार दबाव अपने होंठो पर डाला. विनीता समझ रही थी इतनी ज्यादा उत्तेजना की वजह से उनका लिंग निश्चित hi काफी तनाव में होगा पर जब उसका हाथ उनके लिंग से स्पर्श हुआ तो आश्चर्य चकित रह गई क्युकी उनका लिंग एकदम सामान्य था उसमे उत्तेजना का लेशमात्र भी अंश नहीं था.

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विनीता का दिल पूरी तरह टूट गया क्युकी उसके स्पर्श से लखन सिंह पर जरा भी फ़र्क़ नहीं पड़ा यानी साफ़ था उनके मन में उनसके लिए किसी तरह भाव नहीं और वो इसे सिर्फ एक पूजा की तरह कर रहे है.

विनीता ने मृदा लेपन के अपने हिस्से को जल्दी से पूरा और उनके मुरझाए हुए लुंड को अपने हाथो से अलग कर दिया. पट्टी के नीचे hi विनीता की आँखे आंसुओ से भर आई थी. लाख सिंह की बहो में उसे जो आनंद मिला था उनके मुरझाए हुए लिंग को देखकर उसके सरे सपने चकनाचूर हो गए थे. लखन जी पुरे शरीर पर मिटटी लेपन करने के बाद वो उठ कर कड़ी हो गई और अपनी आवाज़ को सख्त करते हुए लखन जी को अपने हिस्से का बचा हुआ काम करने के लिए कहा.

विनीता: लखन जी मैंने अपने हिस्से का काम कर दिया अब आप भी जल्द से जल्द इस प्रक्रिया को पूरा कर दे ताकि हम उस मिटटी को अपने शरीर से धो सके. प्लीज जल्दी कीजिये.

लखन: जी

अब लखन सिंह विनीता के आगे घुटनो के बल बैठ गया. और अपने हाथो में मिटटी भरके धीमे धीमे विनीता की टांगो में मिटटी मलने लगा. पर अब लखन सिंह के हाथो का स्पर्श विनीता में वो उत्तेजना नहीं जगा रहा था जो कुछ देर पहले थी क्युकी वो जानती थी की वो उसे सिर्फ एक पूजा की तरह छू रहे है किसी उत्तेजना में नहीं. विनीता की टांगो और जांघो पर मिटटी मलने के बाद लखन सिंह ने अपने हाथो में मिटटी को भरा को अपने हाथ पीछे लेजाकर विनीता के नितम्बो को थम लिया.

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क्या नरम सुडौल नितम्ब का स्पर्श महसूस हुआ था कुछ पल को तो उनके हाथ विनीता के नितम्बो पर जड़ हो गए थे और उनका मन उन नितम्बो की सुडौलता पर आसक्त होने लगा पर जल्द hi उन्होंने अपनी भावनाओ को काबू करा और शीग्र अति शीघ्र विनीता के नितम्बो पर मृदा लेपन की क्रिया को पूरा कर. अपने नितम्बो पर चले उनके तेज़ तेज़ हाथो ने विनीता को अब पूरी तरह यकीन दिला दिया की उनके मन विनीता के रूप सौंदर्य के प्रति किसी तरह का कामुक भाव नहीं है वर्ण एक स्त्री के नग्न नितम्बो को स्पर्श करने के बाद हर पुरुष उन्हें ज्यादा से ज्यादा छू कर सेहला कर महसूस करना चाहता है पर लखन जी के पास इसका अवसर होने के बावजूद उन्होंने ऐसा नहीं किया.

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विनीता के नितम्बो पर मिटटी मलने के पश्चात् लखन सिंह ने एक बार फिर अपने हाथो को मिटटी से भरा और छान भर के अंदर वो साड़ी मिटटी विनीता की जांघो के बीच उसकी छूट और उसके आस पास के हिस्से पर मॉल दी. जब तक विनीता अपनी छूट पर लखन जी हाथो के स्पर्श को महसूस कर पति लखन जी अपना काम पूरा भी कर दिया था. दोनों मृदा लेपन का अपना अपना हिस्सा पूरा कर चुके थे पर उनकी आँख में पट्टी बंधी होने की वजह से अब भी ये निश्चित नहीं था की कही उनके बदन का कोई हिस्सा मृदा लेपन से अछूता तो नहीं रह गया था.

लखन: चलिए ये प्रैक्रिया पूरी हुई अब हम नहाने जा सकते है.

विनीता: एक मं रुकिए अघोरी बाबा ने कहा था की हमारे शरीर का कोई हिस्सा मिटटी से अछूता न रहे.

लखन: है तो हमने ध्यान से हर जगह मिटटी मॉल दी है.

विनीता: ऐसा हमे लग रहा है शायद हमारी आँखों में पट्टी बंधी होने की वजह से कोई जगह रह गई हो.

लखन: फिर क्या करे.

विनीता: एक hi तरीका है हमे कुछ देर के लिए ये पट्टी खोलनी होगी और ये सुनिश्चित करना होगा की कोई जगह बच न गई हो.

लखन: क्या आपको इसमें उनकंफर्टबले नहीं लगेगा.

विनीता: वैसे भी हमारे शरीर पर मिटटी की परत छड़ी है तो हम पूरी तरह वस्त्रहीन तो नहीं होंगे.

लखन: जी ठीक है.

दोनों एक दुसरे के सामने आकर खड़े हो गए और एक साथ दोनों ने अपनी अपनी आँखों में बंधी पट्टी की गाँठ खोल दी. पट्टी हटाकर जब लखन ने अपने सामने कड़ी विनीता पर नज़र डाली तो देखते hi रह गए. ऐसा लग रहा था जैसे उसने अपने पुरे बदन पर मिटटी के बने वस्त्र पेहेन रखे हो पर उस मिटटी की परत के नीचे भी उसके उन्नत उभारो के ऊपर के उभरे हुए निप्पल ालक से नज़र रहे थे कमर पर दमकती नाभि भी बेहद कामुक लग रही थी पर जो जगह सबसे ज़ादा ध्यान आकर्षित करने वाली थी वो थी उसकी जांघो के बीच की वो दरार जिसके ऊपर जमी मिटटी की परत ने उसकी असलियत छुपाने की भरसक कोशिश की पर जैसे अन्धकार प्रकाश को ढकने की कितनी भी कोशिश करले पर प्रकाश अपना रास्ता बना hi लेता है वैसे hi उस मिटटी ने उस दरार को कितना hi धक् लिया हो पर फिर भी वो दरार साफ़ नज़र आ रही थी. उस मिटटी से साणे होने के बावजूद भी विनीता का रूप यौवन कीचड ने खिले कमल की तरह निखार कर दमक रहा था.

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वही जब ने लखन को देखा तो न चाहते हुए भी उनकी नज़रे सीधा उनकी जांघो के बीच hi गई जहा उनका हल्का फुल्का उत्तेजित लिंग झूल रहा था जैसे उस पर है रहा था उसे उसकी हार का एहसास करा रहा था की उसका स्पर्श भी उसके अंदर उत्तेजना नहीं जगा पाया. दोनों ने एक दुसरे को ऊपर से नीचे तक देखा की कही कोई जगह छूट तो नहीं गई और संतुष्ट होने पर दुबारा अपने आँखों में पट्टी बाँध ली. मृदा लेपन का ये चरण पूरा हो गया था. अब समय इस मिट्टी को उस जल कुंड में धोने का ताकि उसके बाद योनि पूजा की तीसरी और आज की अंतिम विधि पूरी की जा सके. इसलिए दोनों एक बार फिर एक दुसरे का हाथ थम कर उस जल कुंड की तरफ बाद चले.
 
जल कुंड के पास पहुंच कर पूजा की शर्त के मुताबिक वो दोनों एक साथ उस जल कुंड में उतर गए.

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वो जल कुंड इतना ज्यादा बड़ा नहीं था की वो एक दुसरे से दूर दूर बैठ सके उन्हें एक दुसरे से सात के hi बैठना था और साथ में एक दुसरे के बदन से उस मिटटी को साफ़ भी करना था. कुछ मिटटी तो जल कुंड में उतारते hi पानी के साथ धूल गई पर अब भी काफी मिटटी उनके बदन पर लगी थी.

विनीता: लखन जी यहाँ समय की कोई बाध्यता नहीं तो हम जल्दी से जल्दी खुद को साफ़ करके बहार निकल सकते है.

लखन: जी मई भी वही सोच रहा.

विनीता: तो जल्दी जल्दी आप मुझे साफ़ करिये मई आपको साफ़ कर देती हु.

उनके शरीर गर्दन तक पानी में दुबे हुए थे जगह की कुमी की वजह से वो दोनों एक दुसरे की इर्द गिर्द जांघो को फैला कर बैठने को मजबूर थे. ऐसे में उनके जननांगो का बेहद नज़दीक आना स्वाभाविक था हलाकि मर्यादावश वो दोनों इतनी दूरी बनाने हुए थी उनका आपस में स्पर्श न हो पर फिर भी एक दुसरे के बदन को साफ़ करते करते यदा कड़ा उनका स्पर्श हो hi जा रहा था. पर जल की ठंडक उनकी उत्तेजना को काबू में रखे हुए थी. दोनों ने हाथ नीचे ले जाकर शीघ्रता के साथ एक दुसरे की जांघो को साफ़ करा एक दुसरे के सीने को साफ़ करा वो अपने हाथ तेज़ तेज़ चला रहे थे ताकि ये स्नान का चरण शीघ्रता से पूरा हो जाए. कुछ अलग hi बात थी उस मिटटी में जिसे लगाने के बाद उनके शरीर से अलग hi सुगंध आ रही थी और विनीता की त्वचा इतनी कोमल और चिकनी हो गई थी की कोई कह hi नहीं सकता था की ये एक 30 वर्षिता औरत की त्वचा है या 16-17 साल की नवयुवती की. वही लखन सिंह भी अपने शरीर में अलग जोश अपने लिंग में अलग hi ताकत महसूस कर रहे थे. साफ़ था इस इस मिटटी में कुछ ऐसे अवयव मिलाए गए थे जो स्त्री पुरुष के अंदर जोश और उत्तेजना का संचार करते है.

विनीता के पेट और सीने की मिटटी साफ़ करते करते लखन के हाथ जब एकबार उसके स्तनों से अपारष हुए तो लखन कप एक पल को लगा की उसने किसी रेशम से मुलायम वास्तु को स्पर्श कर लिया हो.

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छान भर को उसके मन में उत्तेजना का संचार हुआ और ये उत्तेजना बिजली की गति से उसके लिंग तक पहुंच गई और पानी के अंदर hi लिंग ने एक तेज़ झटका और वो लिंग सीधा विनीता की जांघो में रगड़ खा गया. विनीता भी एक पल को झटका खा गई पर लखन ने खुद को थोड़ा पीछे खींचते हुए अपने हाथ उसके स्तनों से पीछे खींच लिए और अपना एक हाथ नीचे ले जाकर अपने लिंग को अपनी मुट्ठी में भींच लिया ताकि वो दुबारा झटके खता हुआ विनीता के यहाँ वह स्पर्श न हो. लखन ने एक बार फिर अपने जबड़ो को कास कर भींचे और अपना एक हाथ सीधा विनीता के स्तनों पर रख दिया और छान भर के भीतर वह से साडी मिटटी साफ़ करके अपने हाथ पीछे खींच लिए.

चेहरे की मिटटी साफ़ करने के बाद बारी बारी से खड़े होकर एक दुसरे की तरफ घूमकर उनहोनेनेक दुसरे के पीछे पीठ और नितम्बो पर लगी मिटटी को भी साफ़ कर दिया.

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जब लखन सिंह ने विनीता के नितम्बो को स्पर्श करा तो वह की त्वचा भी पहले से ज्यादा मुलायम और सुगन्धित थी. एक दुसरे को पूरी तरह साफ़ करने के बाद उन्होंने एक दुसरे के जननांगो पर भी पानी की तेज़ तेज़ चीते मार कर वह लगी मिटटी को पूरी तरह साफ़ कर दिया. और तसल्ली के लिए एक एक पल को वह भी स्पर्श करके देखा जब लखन ने विनीता की योनि को छुआ तो वो कुछ पहले से ज्यादा फूली हुई और उभरी हुई सी थी शायद ये भी इस मिटटी का hi प्रभाव था और जब विनीता ने लखन के लिंग को स्पर्श करा तो इस बार वो पहले से ज्यादा उत्तेजित था पर ये कहना मुश्किल था की ये उसके स्पर्श का असर है या उस मिटटी का पर इसे उस मिटटी का hi असर मानते हुए विनीता ने अपने हाथ पीछे खींच लिए.

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स्नान की विधि भी पूरी हो गई थी और अब वो पूरी तरह शुद्ध थे उस अंतिम विधि को पूरा करने के लिए जिसे सोच कर hi दोनों उत्तेजना से भर उठे थे. लखन तो पिघले भी इस उत्तेजना को महसूस कर चुके थे जब विनीता ने उन्हें ब्लोजॉब दिया था पर विनीता के के लिए आज ये पहला मौका था जब एक मर्द उसका स्खलन करवाने वाला था उसकी योनि को अपने होंठो से स्पर्श करने वाला था. इस ख्याल ने उसके पुरे बदन को पसीना पसीना कर दिया था.

दोनों उस जलकुंड से बहार निकल आए और एक गहरी सास लेते हुए विनीता उस जल कुंड की दीवारों का सहारा लेकर अपनी जांघो को फैला कर कड़ी हो गई.

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उसकी आँखों पर तो पट्टी बंधी थी इसलिए उसे अंदाज़ा नहीं था की लखन जी क्या कर रहे है पर वो यही समझ रही थी की किसी भी पल वो उसकी योनि की पूजा आरम्भ कर देंगे. पर इस अंतिम चरण को करने में लखन सिंह के हाथ काँप रहे थे क्युकी अब तक पौंआ के सभी चरणों में विनीता उनके साथ रही पर ये चरण उन्हें अकेले पूरा करना था और ये चरण सिर्फ अभिषेक तक सीमित होता तो भो ठीक था पर उसके बाद ऊँगली दाल कर योनि को स्खलित करवाना और फिर उस स्खलित द्रव्य का प्रसाद ग्रहण करना उनके लिए बेहद कामुक और मुश्किल था. जो मर्द इतने सालो से एक स्त्री से दूर रहा उसे यु एक योनि को चाटने को बोल दिया जाए तो तो उसका उत्तेजित होना स्वाभाविक था और यही उत्तेजना उनकी चिंता की वजह थी की अब तक तो अपने होंठो को भीच्वकर उन्हें अपनी उत्तेजना को काबू कर लिया पर कही इस अंतिम पड़ाव पर आकर उनकी उत्तेजना का बांड टूट न जाए वो कुछ ऐसा न कर बैठे जो मर्यादा के बहार हो यही बात उन्हें व्याकुल कर रही थी.

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काफी देर विनीता लखन सिंह की तरफ से किसी प्रतिक्रिया का इंतज़ार करती रही पर कुछ न होने पर वो समझ गई की लखन जी एक बार फिर इस चरण में आगे बढ़ने में झिझक रहे है. वो समझ रही थी की जिस दिन उसे इस तरह का काम करने को कहा गया था वो कितना टूट गई थी कितनी मुश्किल हुई थी उसे ये सब करते हुए हो सकता है इस वक़्त कुछ वही फीलिंग्स लखन जी की हो. वो या जानती hi नहीं थी की लखन उसकी योनि में मुँह लगाने की बात से विचलित नहीं है बल्कि ऐसा करने से उत्पन्न होने वाली उत्तेजना से विचलित है. पर अपनी सोच के अनुसार लखन जी की चिंता को समझते हुए उसे यही महसूस हुआ की जब तक वो खुद लखन जी को उसकी योनि पूजा आरम्भ करने को नहीं कहेगी वो उसे स्पर्श भी नहीं करेंगे. इसलिए उसने खुद से आगे बाद कर लखन जी हाथ थम लिया.

विनीता: लखन जी मई समझती हु इस वक़्त आप पर क्या बीत रही है क्युकी मई भी कुछ दिन पहले ऐसी hi परिस्थिति से गुज़र चुकी हु. पर हमे ये करना hi होगा जिनके लिए हमने ये पूजा आरम्भ की थी उनके लिए करना होगा विक्रम शोभा के लिए करना होगा और आप मेरी तरफ से निश्चिन्त रहिये अगर आपको ज़रा भी ऐसा लगता है की आपके ये सब करने से मई आपके बारे में गलत सोचूंगी आपके चरित्र पर शक करुँगी तो ऐसा बिलकुल भी नहीं होगा. कुछ दिन पहले ऐसे hi एक चरण में मुझे भी कुछ यही सब करना पड़ा था क्या उससे मेरा चरित्र ख़राब हो गया क्या आपकी मेरे बारे में सोच बदल गई क्या आप मुझे निम्न श्रेणी का समझने लगे.

लखन: नहीं ऐसा बिलकुल नहीं है बल्कि आपकी इज़्ज़त तो मेरी नज़रो में और बाद गई.

विनीता: तो बस यही सोच कर आप भी इस पूजा में आगे बढिये मैंने आपसे वडा करा था न की मई आखिर तक आपका साथ दूंगी तो मई अपना वडा निभाऊंगी. इसलिए कुछ मत सोचिये ये बस एक वक़्त है जो बीत जाएगा और कल फिर से एक नै सुबह होगी.

लखन: आपकी बाते कितनी उत्साहपूर्ण होती है हारे हुए इंसान में भी जीतने का नया जोश भर देती है. काश आप........ (बोलते बोलते उसके शब्द रुक गए पर मई और आप समझ रहे थे की वो क्या कहने जा रहे थे और यही सोच रहे थे की काश वो शब्द न रुके होते.)

विनीता: जी काश आप क्या.

लखन: जी कुछ नहीं काश मुझमे भी आप जैसी हिम्मत होती.

विनीता: ओह ये.. ( मन में- मई तो कुछ और hi समझी थी) चलिए पूजा आरम्भ करते है.

लखन: जी

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विनीता अपनी आँखों पर पट्टी बंधे उस कुंड की दीवारों का सहारा लेकर अपनी जांघो को खोले कड़ी थी और लखन जी उसके सामने घुटनो के बल हाथ से टटोल टटोल कर उन कलशो को ढून्ढ रहे थे जिनमे योनि पूजा में प्रओग किये जाने वाले पदार्थ रखे थे. हाथ से टटोल कर उन्होंने प्रथम कलश उठाया उसे खोल कर उसमे अपनी उंगली दाल कर उसने अपनी नाक के पास लेकर उसे सुंघा उसमे प्रथम तत्त्व यानि अम्बर तत्त्व का द्योतक तेल.

लखन: मैंने प्रथम कलश अपने हाथो में थम रखा है कृपया इसे इसकी सही जगह पंहुचा दीजिये.

विनीता अपने हाथ आगे करके उस कलश को दूसरी तरफ थाम लिया और उसे उसकी सही जगह यानि अपनी योनि पर लेजाकर रख दिया.

विनीता: आप अपनी पूजा आरम्भ कर सकते है.

लखन: हे प्रजनन की देवी गया ये अभिषेक आपको समर्पित है आप प्रजनन की देवी है संतान उत्पत्ति आपके प्रसद से होती है तो मेरे वंश को भी अपना प्रसाद देकर हमे अनुग्रहित करे.

इतना कह कर लखन ने उस कलश में भरे तेल को विनीता की योनि पर उड़ेलना आरम्भ कर दिया. आँख पर पट्टी होने बावजूद विनीता को अपनी जांघो से बहकर बहकर नीचे जाता तेल साफ़ महसूस हो रहा था. योनि की अन्तः पूजा की लिए कुछ तेल शेष रख कर बाकि सारा तेल लखन ने विनीता की योनि पर उड़ेल दिया और वो कलश अपने समीप रख लिया. उसके बाद उन्हों दूसरा कलश जिसमे पृथ्वी तत्त्व यानि दही था उसे भी अपनी उंगलियों से छूकर और सूंघकर महसूस करा उसके बाद थोड़ा दही तेल वाले कलश में दाल दिया और एक बार फिर विनीता की सहायता से वो कलश उसकी योनि पर रख दिया और फिर एक बार गया देवी को याद करते हुए वो दही से भरा कलश भी विनीता की योनि पर उड़ेल दिया. इसके बाद अग्नि तत्त्व यानि शहद, वायु तत्त्व यानि दूध और जल तत्त्व यानि जल का कुछ अंश प्रथम कलश में रोककर उसी प्रक्रिया को दोहराते हुए उन तीनो कलशो से भी विनीता की योनि का अभिषेक कर दिया. तेल दही शहद दूध और जल से अभिषेक के साथ hi योनि पूजा में बाह्य पूजा का चरण पूर्ण हुआ. विनीता को अपनी छूट और जांघो पर बेहद चिपचिपा चिपचिपा सा महसूस हो रहा था. पर वो फिर भी दम साढ़े कड़ी थी क्युकी अब शेष बची पूजा उसकी उत्तेजना और संयम की असली परीक्षा थी जीवन में पहली बार कोई चीज़ उसकी योनि के अंदर दाखिल होने वाली थी भले hi वो किसी पुरुष की उंगलिया hi हो.

विनीता: लखन जी अब बस पूजा के अंतिम चरण hi बचे है अब मत रुकिएगा और न कुछ सोचियेगा जितना सोचेंगे उतना ये पूजा मेरे और आपके दोनों के लिए ज्यादा कठिन होती जाएगी. मई तैयार हु आप पूजा को आगे बढाइये लाइए अब अपना हाथ दीजिये ताकि कलश की तरह उसे भी उसकी सही जगह तक पंहुचा दू.

विनीता की धड़कने बेहद तेज़ तेज़ चल रही थी और कुचब ऐसी hi मनः स्थिति लखन सिंह की भी थी पर फिलहाल उनमे कुछ बोलने की शक्ति न थी इसलिए उन्होंने चुपचाप उन पांच पदार्थो से भरे कलश में अपनी दो उंगलियों को दुबारा और अपना हाथ विनीता के हाथ की तरफ बड़ा दिया. और विनीता ने भी चुपचाप उनके हाथ को थामकर उसे लेजाकर अपनी योनि पर रख दिया.
 
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विनीता अपनी योनि पर लखन की उंगलियों की छुअन महसूस कर रही थी और लखन शांत चित्त अपनी घटती बढ़ती धड़कनो को काबू करने की कोशिश करते हुए बस चुपचाप वह बैठे थे. उन्हें समझ नहीं आ रहा था की वो कैसे विनीता की योनि के अंदर उंगलिया डाले.

विनीता: लखन जी आप जितनी देर सोचने में लगाएंगे उतना ज्यादा समय हमे इस असुविधाजम्क अवस्था में बिताना होगा जो भी करना है अब आपको करना है तो आप hi सोच ले आपको इन सबमे कितना समय लगाना है. इसे जल्द से जल्द ख़तम करना है या यही बस समय व्यर्थ करना है.

विनीता की बात सुनकर लखन ने एक गहरी सास ली और उन पांच पदार्थो में डूबी अपनी दो उंगलियों को सीधा विनीता की योनि के अंदर दाखिल कर दिया.

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अपनी योनि में प्रवेश करती लखन की उंगलियों को महसूस करते हुए विनीता एक तेज़ आह लेने को मजबूर हो गई. उसने अपनी आवाज़ दबाने की भरसक कोशिश की पर जीवन में प्रथम बार किसी चीज़ के अपनी योनि में प्रवेश करने की उत्तेजना को वो छुपा न सकीय. उसकी ये कामुक सिसकारी लखन ने भी सुनी और ऐसे माहौल में औरत की सिसकारी मर्द को ज्यादा उत्तेजित करती है और लखन भी कितने hi चरित्रवान क्यों न हो थे तल एक मर्द hi इसलिए इस सस्करि की प्रतिक्रिया में उनका लिंग भी झटके खाने को मजबूर हो गया. लखन ने धीमे धीमे अपनी उंगलियों को विनेगा की योनि में अंदर बहार करना शुरू कर दिया.

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हलाकि उनके मन में विनीता के लिए बहुत सम्मान था पर उसकी कुंवारी छूट की कसावट न चाहते भी उनका ध्यान इस और आकर्षित कर रही थी. लखन की उंगलिया योनि की डीआरओ से रगड़ती हुई अंदर बहार हो रही थी इसी साफ़ ज़ाहिर था की विनीता सच कह रही थी उसकी योनि अब तक अछत कुंवारी है.

वही विनीता का भी उत्तेजना के मरे बुरा हाल हो रहा था उसने नेहा गरिमा से उनकी चुदाई के किस्सों के बारे में बड़ा सुना था पर किसी चीज़ के छूट के अंदर जाने पर क्या कामुक एहसास होता है उसका रियल अनुभव उसे आज हुआ. कोई चीज़ जब छूट की दीवारों से रगड़ कहते हुए अंदर जाती है तो शरीर का रोम रोम झनझना जाता है उस झनझनाहट को उसने आज मेहसुआ किया. लखन जानते थे की विनीता अंदर से अछत यौवना है और वो उंगलियों से उसका कौमार्य भांग नहीं करना चाहते थे इसलिए वो अपनी उंगलिया ज्यादा अंदर नहीं दाल रहे थे और उंगलिया भी बड़े हौले हौले अंदर बहार कर रहे थे. हलाकि विनीता का मन तो कर रहा था की लखन अपनी उंगलिया को अंदर और अंदर गहराई तक उतर दे अपनी स्पीड बड़ा कर इस रोमांच को डंगना तिगुना चौगुना कर दे पर कामुकता और उत्त्तेना के बावजूद लिहाज और मर्यादा के बेड़ियों ने होंठो को जकड रखा था. अपनी उत्तेजना को बर्दाश्त करने के लिए उसने कुंड की दीवार को कास कर पकड़ रखा था.

उसकी सासे उखड रही थी पेअर भरी हो रहे थे वो किस तरह पीछे दीवार का सहारा लेकर कड़ी थी वही जानती थी. उसका पेट में तूफ़ान सा उठ रहा था जैसे बरसो से किसी नदी के बहाव को बाँध बना कर रोक दिया गया हो और वो नाड़ी आज पुरे वेग के साथ उस बाँध को तोड़ कर बह जाने को मचल रही हो. कुछ यही हालत इस वक़्त विनीता की थी शादी होने के बावजूद जो छूट एक पति के सुख से वंचित रही आज उसे लखन सिंह के रूप में एक हंसती मिल गया था जो अपनी उंगलियों से hi उस बाँध को तोड़ कर उसे बह जाने को अग्रसर कर था. और एक मर्द से मिलान को तरसती विनीता की प्यासी छूट कब तक इस रगड़े घिसाई को बर्दाश्त कर पति बाँध की दीवारे कमज़ोर पद चुकी थी बस ज़रूरत थी एक तेज़ प्रवाह की. और एक तेज़ प्रवाह के साथ वो बाँध टूट गया विनीता आज जीवन में पहली बार इतना झड़ी इतना झड़ी की लखन की उंगलिया उस कामेउस से सराबोर हो गई. लखन को खुद पर बहुत शर्म आ रही है की जो महिला उसका हर कदम पर साथ दे रही है जो उम्र उसकी बेटी आशा से भी छोटी है उसके साथ उसे ये सब करना पड़ा ये सोचते हुए लखन ने अपनी उंगलिया योनि से बहार निकल ली.

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इधर विनीता के सासे तेज़ तेज़ चल रही वो इतनी ज़ोर ज़ोर सर सासे ले रही थी की उसकी सासो की आवाज़ तक लखन जी को सुनाई दे रही थी. उत्तेजना के मरे उसके होंठ सूख गए पाँव लड़खड़ा रहे थे पर अब भी एक अंतिम काम करना बाकी था प्रसाद ग्रहण और वो भी सीधा योनि मुख से. अपनी उंगलियों से लखन ने विनीता का स्खलन तो करवा दिया पर अब उसकी योनि पर अपना मुँह लगाने में उन्हें बहुत शर्म आ रही थी की कैसे वो ऐसा कर सकते है. पर अब विनीता जे लिए पल पल बहुत भरी पद रहा था.

विनीता: लखन जी प्लीज अब ये सोचना बंद कीजिये मुझे एक एक पल खड़ा रहना भरी लग रहा है प्लीज ये पूजा ख़तम कीजिये इसकी आखिरी रसम को भी पूरा करिये.

विनीता की बात सुनकर लखन ने भी अपना दिल मजबूत कर लिया और अपने होंठ विनीता की योनि की तरफ बड़ा दिए और हाथो से अंदाज़ा लगते हुए अपने होंठ उस योनि मुख पर रख दिए.

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विनीता का मुँह खुला का खुला रह गया और उसके मुँह से एक तेज़ सिसकारी निकल पड़ी. लखन भी विनीता की हालत को समझ रहा था पर वो ये नहीं समझ रहा था की कही न कही विनीता खुद भी ये चाहता है इसलिए उसने ज्यादा समय व्यर्थ न करते हुए अपनी जीभ को विनीता की योनि पर ऊपर से नीचे तक फिर दिया उसे अपनी जीभ पर तेल दूध दही शहद जल के साथ विनीता की योनि से निकले कामरुस के स्वाद का भी एहसास हो रहा था.

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क्या मादक स्वाद था उस कामरुस का और कामुक एहसास था उन होंठो का योनि मुख पर विनीता लखन दोनों उस पल में एक अलग hi दुनिया में पहुंच गए. पर जल्द hi लखन ने खुद पर काबू रखते हुए अपने होंठ वापस हटा लिए.

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प्रसाद ग्रहण का ये अंतिम काम भी पूरा हो गया था और इसके साथ पूरी हो गई थी आज की गया पूजा जो प्रारम्भ तो बेहद शांत और सौम्य तरीके से वृक्षारोपण और कन्या भोज के साथ शुरू हुई पर अंत आते आते लखन के होंठो को विनीता पर योनि तक जाने को मजबूर कर दिया. ये अंतिम पड़ाव पूरा करने के बाद लखन चुपचाप उठ कर खड़े हो गए विनीता से कुछ कहने सुनने की उनमे हिम्मत न थी उन्होंने अपने कपडे भी नहीं उठाए और बस विनीता को इतना बोल कर की वो कमरे के बहार जा रहे है कमरे के बहार निकल गए. लखन जी के कमरे से चले जाने के बाद विनीता ने अपनी आँखों में बंधी पट्टी को खोला अपनी जांघो के बीच से बहते पांच पदरश और कामरुस के मिश्रण को बहते देखा. कुछ पल विनीता वही आँखे बंद करे खड़े खड़े कुछ देर पहले के लम्हो को याद करती रही. कुछ देर बाद जब विनीता की सासे थमी उसकी लड़खड़ाती टांगो में बल आया तो विनीता ने जल कुंड के पानी से अपनी छूट और जांघो को साफ़ करा अपने कपड़ो को समेटा और उन्हें पेहेन कर बहार आ गई.

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बहार लखन अपने दुसरे कपडे पहने शयनकक्ष में नज़रे झुकाए बैठे क्युकी फिलहाल विनीता से नज़रे मिलाने की उनमे हिम्मत न थी शर्म और मर्यादा ने उनके होंठो कल सी दिया था. विनीता भी उनकी झुकी नज़रे देख कर उनकी मनोदशा को समझ गई और फिलहाल उसने भी बात न करना hi सहक समझा शायद सुबह तक वो भी नार्मल हो जाए. इसलिए वो भी चुपचाप अपने बिस्तर पर आकर लेट गई और लखन ज़मीन पर बीते पालो को याद करते आँखे वंद करके लेट गए. आँख बंद करते hi उन्हें वो अनुभव महसूस होने लगे जब उन्होंने विनीता के स्तनों को दबाया था उसके नितम्बो को छूआ था उसकी योनि में अपनी उंगलियों को अंदर बहार करा था उसकर कामरुस को अपने होंठो से चखा था और ये सब सोचते सोचते hi न जाने कब उनके हाथ अपने लिंग पर पहुंच गए और वो विनीता के बदन की कोमलता को याद करते करते अपना लिंग मसलने लगे. वो अपने लिंग को मसलते रहे उसे रगड़ते रहे जब उसके अंदर की गर्मी शांत नहीं हो गई. उनकी ये धोती भी उनके वीर्य से सराबोर हो गई.

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विनीता के बारे सोचते सोचते उन्हें अपना लुंड तो झाड़ दिया था पर जिस तरह जब कोई मुरुष अपना लुंड मसल रहा होता है तब उसे सही गलत का बहन नहीं रहता पर झड़ने के बाद उसके मन में एक ग्लानि का भाव उत्पन्न होता है. यही हाल इस वक़्त लखन जी का था उत्तेजना के वशीभूत होकर विनीता की बदन की कामुकता के प्रति आसक्त होकर वो स्खलन तो कर बैठे पर झड़ने के बाद उन्हें खुद पर गुस्सा आ रहा था अपनी सोच पर घिन आ रही थी की जो स्त्री उनके लिए उनके परिवार के लिए इतना बड़ा बलिदान दे रही है अपने मान सम्मान को टाक पर रख कर इतना कुछ कर रही है उसके प्रति वो इस तरह का भाव अपने मन में लाए भी किस तरह उन्हें विनीता के बारे में ये सब सोचने का बड़ा पछतावा हो रहा था. पर अब जो होना था वो तो हो चूका था इसलिए उन्होंने चुपचाप अपने वस्त्रो में से एक नै लुंगी निकली और उसे लेकर स्नानकक्ष की तरफ चले गए. विनीता उन्हें देख न पाई क्युकी वो भी आँखे बंद करे अपने खयालो में खोई हुई थी.

विनीता अब भी उन्ही पालो में खोई हुई थी उसे अब भी अपने बदन पर लखन जी के हाथो का स्पर्श महसूस हो रहा था अपनी योनि में चीटिया सी रेंगती महसूस हो रही थी जैसे लखन जी अब भी अपनी उंगलियों को उसमे अंदर बहार कर रहे हो. ये सब सोचते सोचते hi विनीता की अपनी छूट में गीलापन महसूस होने लगा और उसकी बंद आँखे खुल गई. उसने पलट कर एक नज़र लखन जी की तरफ देखा जो अपनी लुंगी बदल कर वापस अपनी जगह आकर लेट गए थे. वो कुछ पल एकटक लखन जी के रोबीले चेहरे को देखती रही फिर नज़रे फेर ली. क्या सोच रही हु मई वो मेरी सहेली के ससुर है और मई उनके साथ बिताए लम्हो से इतना उत्तेजित हो रही हु ये गलत है. वैसे भी जो बात संभव hi नहीं है उसके बारे में व्यर्थ सोच कर मई सिर्फ खुद को hi तकलीफ दूँगी. जो हो नहीं सकता उसके बारे सोच कर कुछ फायदा नहीं मई उनके प्रति कोई भी भाव क्यों न राखु पर ये मई भी जानती हु की उनके मन में मेरे प्रति वैसा कोई भाव नहीं है. और शायद हमारे बीच उम्र का जो अंतर है उसे देखते हुए अच्छा होगा मई भी ऐसा कोई भाव न राखु यही सही रहेगा बस कल की अंतिम पूजा को संपन्न करू और लखन जी की ज़िन्दगी से हमेशा हमेशा के लिए चली जाऊ. है यही सही रहेगा यही सही रहेगा.

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विनीता और लखन दोनों hi कही न कही एक दुसरे के प्रति आसक्त थे पर एक दुसरे के प्रति लिहाज और मर्यादा का ये बंधन उन्हें अपने मन के भावो एक दुसरे पर ज़ाहिर करने से रोके हुए था. नवग्रह पूजा में आठ ग्रहो की पूजा संपन्न हो चुकी थी और अब केवल एक गृह शेष बचा था शुक्र यानि वीनस जिसे गॉडेस ऑफ़ लव भी कहा जाता है. क्या ये प्रेम की देवी इनके मन के छुपे हुए प्रेम को एक दुसरे के सामने ला पाएगी या ये प्रेमी जोड़ा इस केवल पूजा की शर्तो को पूरा करते करते बिना एक दुसरे के मन के भावो को जाने hi एक दुसरे को अलविदा कह देगा ये तो नवग्रह पूजा के अंतिम गृह की पूजा में hi पता चलेगा तब तक इन्हे यही एक दुसरे के इतने करीब होते हुए भी एक दुसरे के वियोग की अग्नि में जलना होगा शायद यही विधि का विधान था.
 
लखन सिंह की कोठी

रात्रि ने अपनी दस्तक देदी थी जिससे ज़ाहिर था की कहानी का ये अथवा दिन भी अपनी समाप्ति की तरफ अग्रसर था. और इधर गरिमा के तन बदन में वासना की आग लगी हुई थी जीतू ने उसकी मालिश तो बेहद कामुक की पर वो उसकी वासना की आग को हवा देकर बिना बुझाए hi खुद ठंडा होकर चला गया और गरिमा को वैसे hi वासना की आग में जलता छोड़ गया. और यहाँ गाँव में गरिमा एक अनकहा सा लोखड़ौन झेल रही थी जहा न उसकी सहेलिया था न उसका परिवार न उसकी परिचित जगह लेदेकर थी तो एक बड़ी सी कोठी में एक 20 बी 15 का कमरा एक 55 साल का बुद्धा रसोइया और उसका 18 साल का जवान बीटा जो बार बार ऐसी परिस्थितिया उत्पन्न कर देते थे की गरिमा छह कर भी उस उत्तेजना के जंजाल से निकल नहीं पति थी दिन रात अपने अकेलेपन के माहौल में बस यही सब सोचती रहती थी और इस उत्तेजना के दलदल में धास्ति जा रही धास्ति hi जा रही थी.

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कुछ यही हाल गरिमा का इस वक़्त भी था. जीतू उसे गरम तो कर गया पर उस गर्मी को ठंडा करे बिना चले गया और अब तो उसे हरिया का भी सहारा नहीं था जिसने उसे इस हवस के दलदल में खींचा था उसके पास अगर कोई ऑप्शन था बस बिहारी काका जिन्हे सुबह उसने झिड़क कर कमरे से भगा दिया था. वो अब उनके बारे में hi सोच रही थी क्या आज रात फिर वो उसके खाने में नींद की गोलिया मिलेंगे क्या आज रात फिर वो चुपके से उसके कमरे में आएँगे पर क्या आज भी उसके ऊपर मुठ मार्के hi चले जाएंगे. नहीं आज मई उनके सामने नींद से जाग जाउंगी या नींद में hi उन्हें खुद को छोड़ने को मजबूर कर दूँगी. पर अगर मैंने वो नींद की गोली मिला खाना खा लिया तो मई सो जाउंगी एक काम करती हु वो खाना कमरे में ले आती हु और यहाँ खाउंगी hi नहीं उन्हें यही लगेगा की मई नींद में हु पिछली बार की तरह. हम्म ये सही रहेगा.

इधर नीचे खाना बन तो चूका था पर काका की गरिमा को आवाज़ देने की हिम्मत नहीं हो रही थी. काका सोच रहे थे की कल रात में उसे छोड़ दिया अब किस मुँह से बेटी कहे. उन्होंने जीतू से गरिमा को आवाज़ लगाने को कहा hi था की ऊपर सीढ़ियों से गरिमा आती नज़र आई. गरिमा अपना ऐटिटूड बरक़रार रखा और काका की तरफ देखा भी नहीं.

गरिमा: मुझे प्लेट में खाना लगाकर दे दीजिये मई अपनर कमरे में खाउंगी.

काका ने भी चुपचाप खाने की प्लेट लगाकर गरिमा को पकड़ा दी और गरिमा खाना लेकर वापस मुड़ी hi थी की जीतू ने उसे आवाज़ देकर रोक लिया.

जीतू: गरिमा दी

गरिमा: हम्म क्या है

जीतू: वो दरअसल हरिया काका का फ़ोन आया था वो कल शाम को वापस आएँगे और वो लकड़ी का पल भी बन गया है तो उन्होंने आपको तैयार रहने को कहा है वो कल शाम को आपको लेने आएँगे आपको शादी वाली जगह में ले जाने के लिए.

गरिमा: हम्म ठीक है.

हरिया के वापस आने की खबर सुनकर गरिमा ख़ुशी से भर उठी पर ये सुनकर की कल hi हरिया उसे उसकी सहेलियों के पास छोड़ आएगा वो थोड़ा मायूस भी हो गई क्युकी जब वो कल शाम hi आएगा और सीधा हवेली की तरफ चल देगा तो उसे उसका साथ समय बिताने का मौका hi नहीं मिल पाएगा. और ये सोचते हुए भी उसका दिल धक् कर गया की आज की रात उसकी इस कोठी में आखिरी रात है. यही सब सोचते हुए ेओ खाने की थाली लेकर अपने कमरे में आ गई. उसके मन में ानकेको ख्याल आ रहे थे की चुकी ये काका के लिए भी उसके साथ आखिरी रात है तो वो भी इसका भरपूर फायदा ुटजाने की कोशिश करेंगे और निश्चित उन्होंने आज भी उसके खाने में नींद की ग्लोइया मिले होगी. पर वो इस रात को केवल सोने में बर्बाद नहीं करना चाहती थी इसलिए उसने खाना बिना खाए प्लेट को बिस्तर के नीचे छुपा दिया और रात गहरी होने का इंतज़ार करने लगी जब काका हर रात की तरह वो अलमारी सरका कर उसके कमरे में आएँगे.

गरिमा का एक एक पल बड़ी मुश्किल से बीत रहा था वो नीचे हो रही खटपट की आवाज़े सुनने के लिए दरवाज़े पर कान लगाए हुए थी और उनके थमने का इंतज़ार कर रही थी. नीचे खटपट की आवाज़े रुक गई थी शायद जीतू खाना खा कर बहार बने सर्वेंट क्वार्टर में चला गया था हुए अब कोठी में वो और काका hi थे. अब शायद किसी भी पल काका उसके कमरे में आते hi होंगे. जब बड़े ज़ोर की भूक लगी हो और पिज़्ज़ा आर्डर करे तो 30 मं का इंतज़ार भी बड़ा भरी लगता है कुछ यही हाल गरिमा का था उसकी छूट को बड़े ज़ोर की भूक लगी थी उसे उम्मीद थी की जल्द hi वो 55 साल का लुंड उसकी भूक शांत करने आता होगा पर ये इंतज़ार उससे बर्दाश्त नहीं हो रहा था. वो दरवाज़े पर कान लगा कर बहार की आहत को सुनने का प्रयत्न कर रही थी की शायद उसे काका के कदमो की आहत सुनाई पद जाए पर बहार एकदम ख़ामोशी छै हुई थी.

गरिमा का साबरा अब जवाब दे रहा था वो कभी उस अलमारी की तरफ जाकर उसके पीछे की आहत को सुनने का प्रयत्न करती तो कभी दरवाज़े से नीचे की ाहतो को सुनने का पर हर तरफ सन्नाटा पसरा था. पूरा दिन तो उसने जैसे तैसे काट लिया क्युकी उसे उम्मीद थी की हर रात की तरह आज भी काका उसके ऊपर मुठ मारने तो आएँगे hi पर अब उसे समझ आ रहा था की आज जिस तरह उसने काका को झाड़ा है की वो नींद की गोलिया तक खाने को मजबूर हो गए थे ऐसे में शायद अब वो नहीं आने वाले. पर वो ऐसा कैसे कर सकते है ये जानते हुए की आज रात के बाद उन्हें दुबारा मेरे साथ कुचब करने का मौका नहीं मिलने वाला शायद गलती मेरी hi थी मैंने hi सख्ती का कुछ ज्यादा नाटक कर दिया अगर ऐसा न होता तो शायद आज कज रात को हम यादगार बना देते. पर अब वो कर भी क्या सकती थी जो होना था वो तो हो चूका था इस वक़्त इतनी रात में तो वो जीतू को भी नहीं बुला सकती थी और अगर बुलाती भी तो क्या पता सुबह की तरह अपने इनएक्सपेरिएन्स की वजह उसे दुबारा गरम करके खुद झाड़ जाता उसे तो इस वक़्त एक अनुभवी लुंड चाहिए था जो उसकी गर्मी को ठंडा कर सके और ये काम सिर्फ बिहारी काका hi कर सकते थे.

पर हर बीतते पल और बहार छै ख़ामोशी से क्लियर होता जा रहा था की बिहारी काका अब आज रात उसके कमरे में नहीं आने वाले और शायद आज उसके खाने में नींद की गोलिया भी नहीं मिले गई है. उसने बिस्तर के नीचे राखी खाने की प्लेट निकली और उसमे राखी हर सब्ज़ी को थोड़ा थोड़ा चख कर देखा स्वाद से तो कुछ अंदाज़ा लगाना मुश्किल था की उसमे कोई दवा मिली है की नहीं पर थोड़ा थोड़ा चकने के बाद उसने प्लेट दुबारा नीचे सरका दी और बिस्तर पर लेटकर इंतज़ार करने लगी की क्या उसे सर भरी भरी लग रहा है क्या उसे नींद आ रही है. पर आज रात तो उसकी आँखों से नींद जैसे उड़न छू हो गई थी इससे साफ़ ज़ाहिर था की काका ने आज के खाने में नींद की गोली नहीं मिले है और जब नींद की गोली नहीं मिले तो ज़ाहिर है उनका आज रात उसके कमरे में आने का भी कोई इरादा नहीं. इसलिए आज उसे प्यासा hi रहना होगा इसलिए परिस्थिति से समझौता करते हुए वो चुपचाप बिस्तर पर लेट गई और आँखे बंद करके जबरदस्ती सोने की झूठी कोशिश करने लगी.

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पर गरिमा को आँख बंद करके लेते हुए कुछ पल की उसे अपने स्तनों पर किसी के होंठो की गरम गरम साँसे महूसस हुई गरिमा समझ गई की आखिरी उसका इंतज़ार ख़तम हुआ और उसके अंदर जल रही आग को ठंडा करने बिहारी काका आ hi गए उसने साडी शर्मा हाय को टाक पर रखते हुए बिहारी काका को कास कर अपनी बहो में जकड लिया और उसके सर को अपने सीने पर दबाने लगी. वो बिहारी काका का सर अपने सीने पर दबाए जा रही दबाए जा रही थी पर बिहारी काका चुपचाप बैठे ठेठे.

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उससे उनकी ये ख़ामोशी बर्दाश्त नहीं हो रही थी वो छह रही थी की बिहारी काका उस पर टूट पड़े उसके बदन को राउंड कर रख दे पर बिहारी काका तो जैसे जड़ हो गए थे. जब गरिमा से और बर्दाश्त न हुआ तो उसने आँखे खोल hi दी और वो ये देख कर शॉक रह गई की वो अपनी कामुकता की आग में इतनी देर से एक तकिया को अपने सीने से दबाए बिहारी काका के ख्वाब देख रहे थी. बिहारी काका तो कमरे में कही थे hi नहीं वो जल बिन मछली की तरह तड़प उठी और एक बार फिर बिस्तर पर करवाते बदलते हुए खुद को किसी तरह सुलाने की भरसक कोशिश करने लगी.

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पर जब पेट को बड़े ज़ोर की भूक लगी हो तो इंसान लाख कोशिश कर ले उसे नींद नहीं आती तो छूट की भूक भी भूक होती है वो भी पेट की भूक से किसी मैने में कम नहीं होती. और इस वक़्त गरिमा की छूट को बड़े ज़ोर से लुंड की भूक लगी थी और वो लुंड भी उसकी पहुंच के दायरे में था बस कुछ सीढ़ियों भर की दूरी पर और फिलहाल उसके और उस लुंड के बीच में कोई बढ़ा भी नहीं थी अगर कोई बढ़ा थी वो उसकी खुद की इच्छाशक्ति की क्या उसमे खुद से नीचे जाकर अपने से दुगनी उम्र के बुड्ढे आदमी से चुदाई के लिए पूछने की इच्छाशक्ति शक्ति है. उसके शरीर में वासना की आग लगी थी कल हरिया के आने की खबर ने भी उसकी बेचैनी को वादा दिया था. उसके मन में विचार तो अनेको आ रहे थे, या तो वो कल रात की घटना को काका पर डालते हुए खुद को उनकी नज़रो में पाक साफ़ रखते हुए चुपचाप सोने की कोशिश करते हुए इस रात को यही काट सकती थी और यहाँ से जाने के बाद ये अफ़सोस कर सकती है की वो उस आखिरी रात को खुलकर एन्जॉय नहीं कर पाई. या कुछ पल के लिए अपनी इज़्ज़ार को किनारे रख कर यहाँ अपनी इस आखिरी रात को खुल कर एन्जॉय कर सकती थी पर फैसला उसे hi करना और जल्द से जल्द करना था.

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ये एक हाउसवाइफ के सेडक्टिव की कहानी थी जिस सेडक्टिव के दलदल में गरिमा ने अपने कदम रख दिए वो दलदल उसे अपने अंदर खींच रहा था गरिमा छह कर भी इससे नहीं निकल सकती थी. ये एक ऐसा अँधेरा रास्ता था जहा जाने का तो रास्ता था पर वापसी का कोई रास्ता नहीं था. गरिमा को भी इस वासना के दलदल के बहार आने का रास्ता नहीं सूझ रहा था वो बस खुद को जस्टिफाई करने में लगी थी की अगर एक रात मई एक बुड्ढे के साथ उसके सामने खुद को ज़ाहिर करके सेक्स कर लुंगी तो क्या हो जाएगा हरिया के साथ भी तो करा था. और वैसे भी उस बेचारे की तो बीवी भी नहीं है कितना तड़पता होगा अपनी बीवी के साथ कुछ प्यार भरे पल बिताने के लिए अगर मई एक रात के लिए उसकी बीवी की कुमी पूरी कर दूंगी तो इसमें गलत क्या है ये तो बड़े पुण्य का काम होगा. और वैसे भी भगवान् ने औरत को बनाया क्यों था मर्द के लिए hi न मर्द की काम इच्छाओ की पूर्ति के लिए. तो अगर एक मर्द काम वासना के लिए तड़प रहा है और मेरे पास मौका है की मई उसकी मदद कर सकती हु तो ऐसा न करना पाप होगा. एक औरत होने के नाते मेरा फ़र्ज़ है एक मर्द की हवस को मिटाना. औरत बानी hi मर्द के नीचे सोने के लिए है तो अगर मई ये करुँगी तो ये गलत कैसे होगा.

गरिमा ने आज की रात को खुल कर जीने का मन बना लिया था अगर प्यासा कुए के पास नहीं आ रहा था तो अब कुए को hi प्यासे के पास जाना पड़ेगा यानि अगर काका नेरे पास नहीं आ रहे थे तो अब मुझे hi उनके पास जाना होगा. गरिमा ने हरिया की बीवी के कपड़ो में से एक सेक्सी सी घाघरा चोली निकल ली जिसमे घाघरा कुछ छोटा और टाइट था घुटनो से खुछ नीचे तक और चोली भी बेहद टाइट और पीछे से एक धागे के सहारे बंधी. गरिमा ने अपने पहने हुए कपडे उतर कर ये घाघरा चोली पेहेन ली. यु तो नीचे जाकर उसे अपनी चड्डी उतरवाई hi थी पर चुदाई से पहले चड्डी सरकवाने का अपना अलग hi मज़ा है इसलिए उसने एक कासी हुई चड्डी भी पेहेन ली जिसमे उसकी फूली हुई छूट और पीछे गांड का एक एक कटाव साफ़ नज़र आ रहा था.

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गरिमा ने खुद को आईने में देखा चोली इतनी ज्यादा टाइट थी की उसमे से गरिमे के बड़े बड़े स्तनों के क्लीवेज उभर भर बहार निकलर पद रहे थे और अंदर ब्रा की गैरमौजूदगी में उन स्तनों के निप्पल भी चोली के अंदर से hi अपने आकर और स्थान का एहसास करा रहे थे. चोली और घाघरे के बीच उसका पेट पूरी तरह खुला था खुद को ज्यादा कामुक बनाने के लिए उसनर घाघरा थोड़ा नीचे से बंधा था ताकि उसकी काका को उसकी नाभि और कमर के सपाहट दर्शन हो jae.Choli के ऊपर से एक चुनरी भी दाल ली ताकि काका को एकदम से ऐसा न लगे की वो जानबूझ कर बदन दिखाऊ कपडे पेहेन कर आई है.

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मेकअप का ज्यादा सामान तो गरिमा के पास था नहीं और जो हरिया की बीवी का थोड़ा बहुत था भी वो भी गरिमा ने लगाना ठीक नहीं समझा क्युकी इतनी रात में मेकअप कौन करता है यदि वो पूरा मेकअप करके काका के पास जाएगी तो ऐसा लगेगा की एक तवायफ अपने ग्राहक को खुश करने के लिए सज धज कर उसके पास आई है. बस अपनी कामुकता बढ़ाने के लिया उसने अपने बालो को खोल लिया. खुले लम्बे बालो और इस कासी हुई घाघरा चोली में गरिमा गाँव की किसी अल्हड गद्रे बदन वाले भाभी जैसी hi लग रही थी. गरिमा उस 56 साल के बुड्ढे रसोइया के पास जाने को पूरी यारह तैयार थी हरिया के साथ जो कुछ भी हुआ उसके लिया कही न कही गरिमा को बेनिफिट ऑफ़ डाउट दिया जा सकता था की पहली रात हरिया ने उसकी बेहोशी का लाभ उठकर उसे नंगा करके उसके रात गुज़री, फिर उसकी जगह में एक कीड़ा चिपक और उस कीड़े का ज़हर चूसते चूसते हरिया के होंठ उसकी छूट तक पहुंच गए, उसके बाद वो तो अच्छे मन से हरिया की मलुष करने गई थी पर वह बहक कर हरिया के साथ सम्भोग कर बैठी और उस खँडहर में भी हरिया ने hi पहले करते हुए उसे बहकने को मजबूर करा पर जो कुछ गरिमा ने काका के साथ करा और करने जा रही थी उसमे तो संदेह की भी कोई गुंजाइश नहीं थी ये तो स्पष्ट रूप से उसकी वासना का प्रतिफल था.

पर अब जो भी हो आज गरिमा ने अपनी थोड़ी बहुत बची खुची मर्यादा की लक्ष्मण रेखा को भी पार कर दिया और आहिस्ता से अपने कमरे का दरवाज़ा खोल कर बहार आ गई. बहार एकदम सन्नाटा पसरा हुआ था किचन में हल्का हल्का निघटबुलब जल रहा था काका हर रात किचन में hi चादर बिछाकर सोते है. अब उस 32 वर्षीया शादीशुदा महिला हुए 56 वर्षीय बुड्ढे रसोइयों के बीच चाँद सीढ़ियों का फैसला था. गरिमा ने आहिस्ता आहिस्ता बिना आवाज़ किये सीढ़ियों से नीचे उतरना शुरू कर दिया पर ये नीचे जाती सीडिया अपने साथ गरिमा का चरित्र भी नीचे ले रही थी अब देखना ये था की वासना के उन्माद में जलती इस हाउसवाइफ का चरित्र की किस सीमा तक नीचे जाने वाला था.

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गरिमा धीमे धीमे सीढिया उतर रही थी, उसके हर नीचे जाते कदम के साथ उसका बचा खुचा चरित्र भी नीचे जाता जा रहा था. गरिमा सीडिया उतर कर सीधा किचन की तरफ बाद चली. किचन के दरवाज़े पर पहुंच कर उसने अंदर झक कर देखा अंदर बिहारी काका फर्श पर चादर बिछाए अपने सर पर एक हाथ रखे आँखों को बंद करे लेते हुए थे. वो सो रहे थे या नहीं ये तो नहीं कहा जा सकता था पर आज सुबह की घटना के बाद उनके अरमान ज़रूर सो गए थे अब समय था उन अरमानो को वापस जगाने का. एक 32 साल की महिला 56 साल के बुड्ढे को अपना सब कुछ सौपने जा रही थी काफी कुछ तो वो कल रात hi सौप चुकी थी पर तब भी एक चीज़ बची थी उसका सम्मान क्युकी कल रात जो भी हुआ वो उसने उन भांग के लड्डुओं का आवरण ोड कर करा पर आज तो वो आवरण भी नहीं था. कल तो उसने एक 12-13 साल की गरिमा का स्वांग रच करके अपने हवस की आग शांत कर्ली पर आज जो करना था वो इस 32 वर्षीया गरिमा को खुद करना था.

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किचन के गेट पर पहुंच कर गरिमा ने दरवाज़े पर एक तेज़ खटखट की जिसे सुन कर बिहारी काका की नींद टूट गई और उनकी गर्दन स्वतः hi आवाज़ की दिशा में घूम गई और किचन के दरवाज़े पर गरिमा को यु खड़े देख वो हड़बड़ा कर उठ बैठे.

काका- मेमसाब आप यहाँ, क क कुछ काम था.

गरिमा- मेमसाब बिटिया से सीधा मेमसाब.

काका ने शर्म से अपनी नज़रे झुका ली- क्या करे मेमसाब बिटिया कहने का हक़ तो हम खो दिए है कल रात जो हम आपके साथ किये उसके लिए ऊपर वाला हमे कभी माफ़ नहीं करेगा.

गरिमा- इसीलिए आप उपरवाले का काम आज खुद करने वाले थे उन नींद की गोलियों को खाकर.

काका- और क्या करते कहा मुँह छुपाते अपना मन अपने भांग के लड्डू खा लिए थे पर हम तो होश में थे हम कैसे बहक गए.

गरिमा- पर बेहोशी का असर तो आप पर भी था सुबह आप मेरे भी बाद उठे इससे साफ़ है की आपने भी वो भांग के लड्डू खाए थे वर्ण अगर आप रात में मेरे साथ वो सब करके यहाँ आ जाते तो मुझे कुचब पता चलता hi नहीं. पर आप भी वही सो गए इससे साफ़ ज़ाहिर है की आप भी नशे में थे.

गरिमा की बात सुनकर तो काका का मुँह खुला का खुला रह गया उन्हें तो अपनी सफाई में कुछ जवाब नहीं सूझ रहा था यहाँ तो खुद विक्टिम हु मुज़रिम की पैरवी करने लगा.

काका- है बिटिया शायद यही हुआ होगा हमने भी तुम्हारे साथ वो भांग का लड्डू खा लिया होगा और भांग के नशे में हमे याद नहीं आया. है ऐसा hi हुआ होगा.

गरिमा- मेमसाब से फिर बिटिया अच्छा है, पर भांग के नशे में होने के बावजूद भी आपने वो सब तो करा न मेरे साथ. और इंसान नशे में वही सब करता है जो वो एक्चुअल में करना चाहते है तो मतलब ये सब करना चाहते थे तभी भांग के नशे ने आपको ये सब करने को मजबूर किया.

गरिमा की बात सुनकर काका एक बार फिर सकपका गए उन्हें तो लगा था गरिमा उनके प्रति थोड़ा नरम हो रही है पर अचानक से बदले तेवर ने फिर से उनकी बोलती बंद करदी. वो तो बड़ी जल्दी मेमसाब से दुबारा बिटिया पर आ गए थे गरिमा ने फिर से उन्हें बैकफुट पर धकेल दिया.

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काका: मेमसाब वो मई मई वो.....

गरिमा: पहले आप डीडे कर लीजिये की आप मुझे क्या बुलाना चाहते है जो आपका दिल सच में चाहता है वो बुलाइये मुझे. ये मेमसाब बीत्या मेमसाब करके खुद को और मुझे कंफ्यूज न करिये.

अब काका कहे तो तब जब उन्हें कुछ समझ आ रहा हो वो तो गरिमा के तेवर को समझ hi नहीं प् रहे थे की वो तेवर उसके पक्ष में है या विपक्ष में.

गरिमा: मई समझ सकती हु की पत्नी के चले जाने के बाद इतने सालो तक पत्नी के बिना जीना पड़ा आपको. दिन का उजाला तो काम की भाग दौड़ और जीतू और बाकि लोगो के बीच काट जाता होगा पर रात की ख़ामोशी और अकेलापन आपको बेचैन कर देते होंगे. आप अपनी पत्नी को बहुत मिस करते होंगे और ऐसे भांग के नशे में मैंआपके पास आई तो मुझमे hi आपको अपनी बीवी नज़र आई होगी और अपनी बीवी के धोके में आप मेरे साथ वो सब कर बैठे.

गरिमा की बात सुनकर काका की फिर से जान में जान आई की हां ये बात चल जाएगी.

काका: है है बिटिया बिलकुल यही हुआ था (रट हुए) बहुत याद करते है हम अपनी निर्मला को, जीतू को जनम देते hi हमे छोड़ कर चली गई. जीतू बहुत छोटा था तो दूसरी शादी कैसे कर लेते पूरा जीवन अकेले hi गुज़ार दिया कल रात भांग के नशे में जब तुम हमारे पास आई तो हम तोहका hi अपनी निर्मला समझ लिए और ू सब कर बैठे. हमसे बहुत बड़ी गलती हुई गई हुंका माफ़ कार्डो.

गरिमा: अगर गुस्सा होती तो इतनी रात में यु अकेले में आपके पास न बैठे होती.

काका: मतलब कल रात जो हुआ उसके लिए आप मुझसे गुस्सा नहीं हो.

गरिमा: कल रात के लिए तो नहीं पर आज सुबह जो हुआ उसके लिए ज़रूर गुस्सा हु.

काका: जी मई कुछ समझा नहीं.

गरिमा: अरे मन नशे की हालत में आप बहक गए और मुझे अपनी पत्नी समझ कर वो सब कर बैठे पर इतनी सी बात पर आप अपनी जान देने निकल पड़े.

काका: आपसे इतना बुरा भला सुनने के बाद और क्या करता कुछ समः नहीं आया मुझे.

गरिमा: मानती हु मई गुस्सा हुई पर उस कंडीशन में मई और क्या रियेक्ट करती पर मेरा गुस्सा ठंडा होने के बाद आपको मुझर साडी बात समझने की कोशिश करनी चाहिए न की अपनी जान लेने की. अब देखिये न आपको बचने के चक्कर में मई सीढ़ियों से गिर पड़ी.

काका को अब थोड़ा रिलैक्स फील हो रहा था की गरिमा ने कल रात के लिए उसे माफ़ कर दिया. वर्ण वो तो सुबह से इसी दर में था की कही वो इस बारे में लखन सिंह से न बता दे.

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काका: मुझे माफ़ कर दीजिये मेरी वजह से आपको चोट लगी.

गरिमा: अब माफ़ी मांग रहे है सुबह से तो एक बार भी पूछने नहीं आए की कैसी है चोट दर्द तो नहीं हो रहा.

काका: ऐसा नहीं है बिटिया मन तो बड़ा कर रहा था पूछने का पर हिम्मत नहीं हो रही थी तुम्हारे सामने आने की. पर मैंने जीतू को भेजा था तुम्हारे पास लेकर मालिश के लिए.

गरिमा: मुझे चोट जीतू की वजह स नहीं लगी थी आपकी वजह से लगी थी आपको पूछने आना चाहिए था.

काका: है आना तो चाहिए था मेरी गलती है पर अब पूछ लेता हु अब सही है न चोट जीतू ने अच्छे से मालिश करदी थी न.

गरिमा: है जहा जहा वो कर सकता था और मई करवा सकती थी वह वह करदी थी पर वो भी एक जवान लड़का है अब हर जगह उससे मालिश नहीं करवा सकती न.

काका: जी मई समझा नहीं

गरिमा: अरे सीडी से मई कूल्हों के बल गिरी थी तो वह भी धमक लगी थी पर अब उससे वह पर मालिश नहीं करवा सकती थी न तो केवल कमर कमर की करवा ली थी.

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बिहारी काका तो वैसे भी गरिमा के कूल्हों के कुछ ज्यादा hi दीवाने थे. पहली बार गरिमा के कूल्हों को उसके पेटीकोट के ऊपर से hi देख कर वो अपनी धोती में hi झाड़ गए थे. ऐसे में गरिमा के मुँह से उसके कूल्हों का ज़िक्र सुन कर उनके ज़हन में वही दृश्य ताज़ा हो गया. और वो सोचने लगे की काश उन्हें गरिमा के कूल्हों की मालिश करने का मौका मिल जाता. पर उन्हें क्या पता था की 24 घंटो में एक पल ऐसा होता है जब आप ऊपर वाले से जो मानगो मिल जाता है और शायद ये वही पल था.

गरिमा: क्या सोचने लगे आप.

काका: है हम्म कुछ नहीं कुछ भी तो नहीं.

गरिमा: वैसे आप बुरा न मनो तो एक बात कहु.

काका: है बिलकुल मई क्यों बुरा मानुगा.

गरिमा: अब जीती से तो मई अपने कूल्हों की मालिश नहीं करवा सकती थी पर अब आप तो मुझे बिना कपड़ो के देख hi चुके हो भले hi नशे में देखा हो पर देखा तो है तो क्या आप मेरे कूल्हों की मालिश कर सकते हो.

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काका को अपने कानो पर यकीन नहीं हो रहा था की जो उन्होंने सुना वो सच है. अभी चाँद सेकंड पहले उन्होंने उपवाले से ये विश मांगी और 4ग से भी तेज़ स्पीड से उपरवाले ने वो विश पूरी भी करदी. पर काका को अब भी ये एक मज़ाक लग रहा था.

काका हलके हलके हस्ते हुए: क्या मज़ाक कर रही हो आप.

गरिमा सीरियस होते हुआ: आपको क्यों लग रहा मई मज़ाक कर रही हु मई सीरियस हु. मेरे कूल्हे अब भी दर्द कर रहे है और जीतू से यहाँ मालिश नहीं करवाना चाहती और खुद कर नहीं प् रही तो मुझे आपका ख्याल आया. पर अगर आपको कोई दिक्कत है तो कोई बात नहीं कल रात तक की बात है कल मई अपनी सहेलियों के पास पहुंच जाउंगी उनसे करवा लुंगी.

अचानक काका को हाथ या लड्डू हाथो से निकलता महसूस हुआ तो उसने उसे लपक कर उसे पकड़ लिया.

काका: अरे नहीं नहीं बिटिया ऐसी बात नहीं है मई मन कहा कर रहा हु बस मुझे समझ नहीं आ रहा था मई ये कैसे करूँगा.

गरिमा: जैसे कल वो सब करा था.

काका: जी मतलब

गरिमा: अरे मतलब अब मेरा कुछ आपसे कहा छुपा सब कुछ तो आप कल hi देख चुके हो तो मई किचन की स्लाबे के पास पेटीकोट ऊपर करके कड़ी हो जाउंगी और आप मेरे पीछे बैठ कर मेरी चड्डी थोड़ा नीचे सरका के मेरे कूल्हों पर मालिश कर देना. अगर आपको दिक्कत न हो तो.

गरिमा का इरोटिक प्रपोजल सुनकर hi काका का खून उनकी नसों में तेज़ तेज़ दौड़ने लगा. उनका लिंग धोती के अंदर अपना अकार बड़ा कर अपने मौन समर्थन के संकेत देने लगा. और अपने थूक को गटकते हुए बिहारी काका ने सर हिलाकर अपनी सहमति ज़ाहिर कर दी. गरिमा भी मन hi मन अपनी चालाकी पर मुस्का दी और सोचने लगी की तू मन भी कैसे करता ठरकी बुड्ढे मेरी गांड

देखकर तो तू धोती में hi झाड़ गया था तो भला ये मौका कैसे छोड़ता. तू भी कमल है गरिमा सुबह बेटे से गांड मसलवाई और बाप तेरी गांड मसलने को व्याकुल हुआ जा रहा है.

काका फ़ौरन लपक कर किचन में वो तेल की शीशी ढूंढ़ने लगे और गरिमा उठ कर किचन स्लाबे के पास आकर कड़ी हो गई. बिहारी काका बदहवास से किचन के सामन में वो तेल वाली शीशी ढून्ढ रहे थे. जब इंसान ज्यादा hi एक्ससिटेड होता है तो उसका दिमाग काम करना बंद कर देता है कुछ यही स्थिति इस बिहारी काका की थी जो दिन भर किचन में काम करने वाले इंसान को भी एक तेल की शीशी ढूंढ़नी पद रही थी. उनकी फुर्ती और तेज़ी देखते hi बन रही थी वो बड़ी मुश्किल से अपनी ख़ुशी को छुपाने का प्रयास कर रहे थे पर उनकी आँखे उनकी ख़ुशी को ज़ाहिर कर hi दे रही थी.

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गरिमा को भी उनकी इस व्याकुलता और भागम भाग पर बड़ी हसी आ रही थी.

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आख़िरकार वो तेल की शीशी ढून्ढ कर काका उसे लेकर गरिमा के पास ले आए. गरिमा भी एक हलकी सी स्माइल देते हुए पलट कर उनकी तरफ पीठ करके कड़ी हो गई हुए काका एक कटोरी में तेल लेकर अपने तेज़ी से धड़कते दिल के साथ उसके पीछे उसके पैरो के पास ज़मीन पर बैठ गए.

अब बस इंतज़ार था तो घाघरे के उठने का.........

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गरिमा किचन की स्लाबे की तरफ मुँह करे कड़ी और बिहारी काका उसके पीछे ज़मीन पर पैरो के पास बैठे थे और धड़कते दिल के साथ गरिमा के अपना घाघरा उठाने का इंतज़ार कर रहे थे. क्या वाकई गरिमा उनके सामने अपना घाघरा ऊपर कर देगी उन्हें अब भी इस बात पर यकीन नहीं हो रहा था. कही गरिमा उनके साथ मज़ाक तो नहीं कर रही उन्हें टेस्ट तो नहीं कर रही पर मन भी वो कर नहीं सकते थे क्युकी अगर कही ये बात सच हुई तो बेवजह ये हाथ आया सुनहरा मौका उनके हाथ से निकल जाएगा. यही सोचते हुए वो गरिमा के अगले कदम का इंतज़ार कर hi रहे थे की गरिमा ने हौले हौले अपने हाथ नीचे की तरफ लेजाकर अपने घाघरे के निचले छोर को अपने दोनों हाथो में थम लिया. कुछ पल यही कड़ी रही यु झुके होने उसकी फूले हुए कूल्हों का सुडौल अकार उसके घाघरे में से साफ़ नज़र आ रहा था.

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गरिमा का यु झुके हुए खड़े रहना काका को शशंकित कर रहा था की कही उसने अपना इरादा बदल तो नहीं दिया. वो ये सब सोच hi रहे थे की गरिमा के हाथ दुबारा ऊपर की तरफ जाने लगे और सिर्फ हाथ hi नहीं उन हाथो में थमा उसका घाघरा भी उसके हाथो के साथ ऊपर होता जा रहा था और गरिमा मांसल जाँघे हर बीतते पल के साथ बिहारी काका के सामने नंगी होती जा रही थी. घाघरा बेहद आहिस्ता आहिस्ता अपना घाघरा ऊपर करती गई करती गई जब तक घाघरा उसकी चड्डी के ऊपर नहीं पहुंच गई. गरिमा का घाघरा पूरी तरह ऊपर उठ चूका था और उसकी कासी हुई काली चड्डी जो बमुश्किल उसके चौड़े भरी कूल्हों की धक् पाने की नाकाम कोशिश कर रही थी अब काका के सामने पूरी तरह बेपर्दा था. काका को अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था की गरिमा ने वास्तव में अपना घाघरा उठा दिया. यु तो उन्होंने कल रात hi गरिमा की नंगी छूट देखि भी थी और छोड़ू भी थी पर आज की बात कुछ अलग hi थी क्युकी जब औरत अपनी मर्ज़ी से अपना बदन दिखती है तो अलग एक्ससिटेमेंट होता है. कल गरिमा ने जो कुछ करा नशे में करा पर आज उसने सब कुछ जानते बूझते सोच समझ कर अपना घाघरा उठाया था.

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काका अपलक से गरिमा की उस काली चड्डी और उनमे से थोड़ा थोड़ा इधर उधर से झाकते उसके बड़े बड्स कूल्हों को hi निहार रहे थे. वो किस काम से गरिमा के पीछे बैठे थे गरिमा ने क्यों अपना घाघरा ऊपर करा ये बात उनके ध्यान से hi उतर गई और शायद उन्हें ध्यान आती भी नहीं अगर गरिमा खुद उन्हें न टोकती.

गरिमा: काका ो बिहारी काका क्या हुआ आप तो चुपचाप बैठे है मालिश नहीं करनी क्या.

काका तो जैसे किसी नींद से जागे: है हम्म है है है करता हु करता हु.

काका ने कटोरी से थोड़ा तेल अपने हाथो में लिया और उसे अपने हाथो में चुपड़ कर अपने हाथ गरिमा के कूल्हों की तरफ बड़ा दिए. और चड्डी के किनारे से बहार निकले कूल्हों के हिस्सों पर hi मालिश करने लगे. पर गरिमा ने तो उन्हें अपने कूल्हों का पूर्ण दीदार करने का फैसला कर लिया था.

गरिमा: बिहारी काका मालिश क्या मेरी चड्डी के ऊपर से hi कर डोज.

काका: है क्या जी

गरिमा: जी मालिश क्या चड्डी के ऊपर से hi कर डोज चड्डी तो नीचे करो मेरी मई घाघरा पकडे हु नहीं तो मई hi कर देती तो अभी आप hi कार्डो ताकि अच्छे से मालिश कर सको.

काका ने धड़कते दिल के साथ गरिमा की चड्डी के सिरों को दोनों तरफ से थम लिया. गरिमा बड़ी कुशलता से बिहारी काका को अपने त्रिया चरित्र के दर्शन करा रही थी. बिहारी काका ने भी गरिमा की बात मानते हुए अपना थूक गटकते हुए गरिमा की चड्डी को नीचे सरकना शुरू कर दिया और उसे नीचे करते गए करते गए जब उसके कूल्हे पूरी तरह नंगे नहीं हो गए और गरिमा की चड्डी उसके घुटनो तक नीचे कर दी.

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अब गरिमा के बड़े बड़े कूल्हे उनके सामने पूरी तरह नंगे थे जिनपर बिहारी काका पहले दिन से फ़िदा थे. बिहारी काका का मन तो कर रहा था की आपन चेहरा आगे उन बड़े बड़े तरबूज़ों को अपने दांतो में भर ले उन्हें ऊपर से नीचे तक चाट ले पर कही ऐसा करने से गरिमा नाराज़ न हो जाए और जो कुछ मिल रहा है वो भी हाथ से निकल जाए यही सोच कर उन्होंने अपनी भावनाओ को काबू में रखा. और अपने हाथो में दुबारा ढेर सारा तेल मलकर गरिमा के कूल्हों पर हौले हौले मालिश करना शुरू करदी.

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अपने चूतड़ों की नरम त्वचा पर काका के खुरदुरे झुर्रीदार हाथो का स्पर्श गरिमा को अलग hi आनंद की अनुभूति करा रहा था. उसने अपनी आँखों को बंद करके किचन स्लाबे को कसकर थम लिया पर काका का यु हौले हौले उसके कूल्हों को दबाना उसे गवारा नहीं थी वो तो चाहती थी की काका उसके चूतड़ों को मसल कर रख दे.

गरिमा: काका ऐसा लग रहा है जैसे आप मेरी कूल्हों की मालिश नहीं कर रह वह क्रीम लगा रहे है. थोड़ा ज़ोर लगाइये ताकि मुझे भी कुछ आराम मिले मेरा दर्द दूर हो.

काका: ठीक है बिटिया.

काका ने अपने हाथो की पकड़ गरिमा के कूल्हों पर मज़बूत करदी और अपने हाथो की गिरफ्त में लेकर गरिमा के कूल्हों कल कास कास कर मसलने दबाने लगे. काका के यु ताकत लगाने से गरिमा को अब ज्यादा मज़ा आ रहा था.

गरिमा (मन में): क्या बात है बुड्ढे बड़ी ताकत है तेरे हाथो में चिंता न कर आज रात भर में तेरी साडी ताकत निचोड़ कर रख दूंगी. कल रात तो तेरे मन में एक दर था जिस वजह से तू पूरी ताकत नहीं लगा पाया पर आज तेरा सारा दर दूर करके तुझे पूरी ताकत से छोड़ने को मजबूर कर दूंगी ताकि तू भी मज़ा ले और मुझे भी इस गाँव में मेरी आखिरी रात में भरपूर मज़ा आए. और अब भी बिटिया कह रहा है अगर तेरी कोई बेटी होती तो क्या उसके चूतड़ भी ऐसे मसलता ठरकी बुड्ढे.

गरिमा चुपचाप वह खड़े खड़े एक 56 साल के बुड्ढे से अपने कूल्हे मसलवा रही थी और बिहात्रि काका भी पूरी तबियत से अपने काम में लगे थे पर इससे आगे बढ़ने की उनमे हिम्मत नहीं थी. पर गरिमा तो आज पूरी तैयारी से आई थी और अब समय था इस खेल को उसके दुसरे चरण में ले जाने का और इसके लिए क्या करना था वो गरिमा ने सोच लिया था.

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गरिमा: बिहारी काका आपसे एक बात पूछू.

काका: है है बिटिया पूछो मई क्यों बुरा मानुगा.

गरिमा: जीतू ने बताया था अपनी माँ की बारे में की वहुत सुन्दर और गोरी चिट्टी थी हुए मई तो सामान्य सी हु कोई बहुत ज्यादा सुन्दर भी नहीं हु फिर कल रात आप मुझे अपनी बीवी कैसे समझ बैठे.

काका: किसने कहा आपसे की आप सुन्दर नहीं कोई आँख का अँधा hi होगा.

गरिमा: मेरे पति कहते है की उनके लिए बड़ी खूबसूरत खूबसूरत लड़कियों के रिश्ते आए थे पर उनके माँ बाप ने मुझे पसंद करा.

काका: अरे नहीं नहीं बिटिया वो मज़ाक में कहते होंगे आप तो बाला की खूबसूरत हो शायद हमार बीवी से भी ज्यादा खूबसूरत.

गरिमा: नहीं मज़ाक तो आप कर रहे हो.

काका: नहीं बिटिया हम सच कह रहे है गंगा मैया की सौगंध.

गरिमा ने जानबूझ कर ऐसा कहा था क्युकी वो जानती थी ऐसा कहने पर काका उसने हुस्ना की तारीफ करने से खुद को रोक नहीं पाएंगे. काका से अपने हुस्ना की तारीफ करवाने के काब गरिमा ने अपना अगला पैतरा चला.

गरिमा: अच्छा काका क्या मुझमे और आपकी बीवी में कोई समानता थी जो आप मुझे अपनी बीवी समझ बैठे सच सच बताइयेगा.

काका: है बिटिया तुम्हारा डील डॉल बहुत कुछ हमार बीवी जैसा hi है.

गरिमा: डील डॉल से आपका मतलब ज़रा खुलकर बताइये क्या क्या मिलता है हमारा झिझकिये मत जब आपसे कल रात के लिए गुस्सा नहीं हु तो ये बात तो खुद मई पूछ रही हु इसका क्यों बुरा मानूगी.

काका: बिटिया उसका बदन भी तुम्हार तरह गदराया हुआ था.

गरिमा: गदराया बदन क्या होता है.

गरिमा की बाते काका का ध्यान उसके गद्रे बदन की तरफ आकर्षित कर रही थी और कही न कही काका को उत्तेजित कर रही थी और वो उत्तेजना गरिमा के कूल्हों पर पड़ते उसके हाथो के दबाव से साफ़ पता चल रही थी.

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काका: अब क्या बताए हम बिटिया कैसे बताए.

गरिमा: बताइये न हमने कहा न हम बुरा नहीं मानेगे गदराया बदन कैसा होता है.

काका: जब औरत के हर अंग पर चर्बी भरपूर हो तो उसे hi गदराया बदन कहते है.

गरिमा: मतलब मोटा यानि मई और आपकी बीवी मोठे थे.

काका: न इतना मोटा की भद्दा लगे और न इतना पतला की किसी अंग को हाथो में लो हड्डिया तक पकड़ में आ जाए. गदराया बदन तो वो होता है की किसी भी अंग को हाथो में लो तो ऐसा एहसास हो कोई गुदगुदी चीज़ पकड़ी है न की हड्डी का ढांचा.

गरिमा: ये तो रही ओवरआल बदन की बात पर कोई विशेष अंग ऐसा नहीं था जो हमारा एक जैसा हो.

काका: आपकी कमर बिलकुल हमार बीवी की तरह मांसल गुदगुदी और चिकनी है उसकी कमर में भी ऐसे hi दो दो बल पड़ते थे.

गरिमा जानबूझ कर का को अपने हर अंग की तारीफ करने को मजबूर करके उनका ध्यान अपने अपने एक एक अंग पर ले जा रही थी.

गरिमा: और

काका भी अब जोश में आ चूका था: और आपकी ये मोती मोती भरी भरी जाँघे हमारी बीवी की जाँघे भी आपके जैसी भरी भरी थी.

ये बताते बताते काका का ध्यान स्वतः hi गरिमा की जांघो पर पहुंच गया.

गरिमा: और

काका: और आपकी हसी बिलकुल हमारी बीवी जैसी है सुन्दर सी प्यारी सी.

गरिमा: और कुछ हिअ हममे जो आपको आपकी बीवी की याद दिलाता है.

काका कुछ पल को चुप हो गया, गरिमा भी समझ गई की अब वो जिन अंगो के बारे बताना छह रहे उनके बारे में बोलने से हिचकिचा रहे है.

गरिमा: मैंने आपसे कहा नै खुल कर कहिये मई यहाँ आपसे खुल कर बात कर रही हु आपके सामने यु खुल कर कड़ी हु और आप अब भी हिचक रहे है. मई यहाँ सिर्फ आपके अंदर का गिल्ट दूर करने आई हु सच में इसलिए खुल कर बोलिये.

काका: आपके चूची मेरा मतलब है की आपके ये भरी भरी स्तन हमार बीवी के भी ये बहुत बड़े बड़े थे.

गरिमा अपने स्तनों की तारीफ सुन कर शर्मा गई.

गरिमा हल्का हल्का हस्ते हुए: अच्छा तो इन्हे चूचिया कहते है ये तो हमे आज पता चला हम तो इन्हे बूब्स या दूध hi कहते थे.

गरिमा का यु खुल कर बात करना काका को भी अब थोड़ा फ्रैंक करा रहा था. गरिमा के किचन में आने पर जो दर काका के मन में था वो अब थोड़ा थोड़ा दूर हो रहा था. पर पूरी तरह खुलने की अब भी उसमे हिम्मत नहीं थी.

गरिमा: क्या कोई और अंग बचा हमारा जो आपको आपकी बीवी की याद दिलाता है.

काका: जी एक जगह और है.

गरिमा: तो वो भी बता दीजिये.

काका: आपके ये कूल्हे ये मोठे मोठे बड़े बड़े कूल्हे हमार बीवी के कूल्हे भी पुरे गाँव में सबसे बड़े थे हम तो शादी से पहले उसके कूल्हों का साइज देखकर उसे पसंद कर लिए थे.

इतना कहते कहते काका एक पल को बहक सा गया और अपना चेहरा गरिमा के कूल्हों के नज़दीक ले गया और एक गहरी सास लेते हुए उसके कूल्हों से आती महक को सूंघने लगा. गरिमा को भी काका की ससो की गर्माहट अपने कूल्हों पर महसूस हो रही थी. गरिम को भी इसमें बड़ी किंकी फीलिंग आ रही थी पर उसने अपनी भावनाओ पर काबू रखा और ये ज़ाहिर नहीं होने दिया की उसे पता चल गया की काका उसकी गांड सूंघ रहा है.

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गरिमा: तो आपको मोठे कूल्हे वाली औरते अच्छी लगती है.

काका: बेहद

बिहारी काका पूरी तरह गरिमा की कूल्हों की महक में मगन थे और इसी मागंता में वो हामी भर गए. पर जब उन्हें अपने जवाब का एहसास हुआ की वो क्या बोल गए तो एकदम सकपका गए.

काका: जी मेरा मतलब है की मई वो कह रहा था की ऐसा नहीं है वो दरअसल बस आपका डील डॉल हमार बीवी जैसा था तो बस वो......

गरिमा: जी मई समझ गई की मई उपरसे नीचे तक आपको बीवी की याद दिलाती हु इसीलिए आप वो सब कर बैठे.

काका: जी जी है है यही बात है.

गरिमा: चलिए जो हुआ सो हुआ उसके लिए न पूरी तरह आप दोषी है न मई हम दोनों नशे में थे और नशे में हम वो सब कर बैठे पर मुझे ख़ुशी है की नशे में hi सही मेरी वजह से आप जिस बीवी को दिन रात याद करते है एक रात के लिए hi सही आपको उसके साथ होने का एहसास मिला. शायद इसिलए वो सब हुआ.

काका: फिर भी हम बहुत शर्मिंदा है कल रात जो हुआ.

गरिमा: चलिए हम यहाँ इतनी रात में आए hi इसलिए थी की आपकी शर्मिंदगी और दर को दूर कर सके और मुझे लगता है अब मुझसे यु खुल कर बात करके आप अच्छा फील कर रहे होंगे.

काका: जी

अब बिहारी काका क्या बताते की उसके चूतड़ों को मसलते हुए वो क्या क्या फील कर रहे थे. वो तो अपनी इमेजिनेशन में उसकी गांड में लुंड भी पेल दिए थे.

गरिमा: वैसे अब मेरे कूल्हों का दर्द भी ठीक लग रहा है तो मई अपना घाघरा नीचे कर लेती हु.

काका के दिल पर तो जैसे वज्रपात हो गया. उनका बस चलता तो साड़ी रात यही गरिमा के कूल्हों को मसलते रहते पर अब गरिमा ने फुलस्टॉप लगा दिया तो बेचारे कर भी क्या सकते थे. बेमन से उन्होंने अपने हाथ पीछे खींच लिए हुए गरिमा ने अपना घाघरा नीचे करके अपनी चड्डी को ऊपर चढ़ा लिया. खुद को ठीक करके गरिमा बिहारी काका की तरफ पलटी जो अब भी नीचे ज़मीन पर बैठे थे.

गरिमा स्माइल करते हुए: अब अपने मन में कोई शर्मिंदगी मत रखियेगा न ये सोचियेगा की मेरे मन में आपके लिए कोई बुरा भाव है मई अब आपको समझ गई हु. और है कल रात हमारे बीच जो भी हुआ वो सिर्फ हमारे बीच में रहेगा मई उस बारे में किसी से कुछ नहीं कहूँगी अपनी सहेलियों या अपने घर पे भी नहीं.

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काका उठकर गरिमा के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए : जी बहुत बहुत शुक्रिया आपका दिल सच में बहुत बड़ा है.

गरिमा: और कूल्हे भी आपकी बीवी की तरह आप hi ने तो बताया न. (खिलखिला कर हस्ते हुए)

काका थोड़ा झेपते हुए: क्या आप भी.

गरिमा: अच्छा अब हम चलते है आप भी आराम करिये और अपनी बीवी को इतना मत याद करा करिये दुनिया में और भी चीज़े है उनमे दिल लगाइये.

काका: अब क्या करे बिटिया दिन तो काट जाता है पर रात में अकेलेपन में निर्मला याद आ hi जाती है. ये अकेलापन चीज़ hi ऐसी है क्या कर सकते है. अब ये अकेलापन तो हमारी मौत के साथ hi जाएगा.

गरिमा: मई समझ सकती हु आप कितना अकेला महसूस करते होंगे. काश मई आपकी कुछ मदद कर सकती. चलिए आप आराम करिये मई भी चलती हु.

काका को भी बेमन से हां करनी पड़ी. काका को गुड नाईट कहकर गरिमा वह से चल दी और कमरे से बहार निकल गई और बेचारे अपना खड़ा लुंड रगड़ते हुए उसे पीछे अपनी गांड मटकते हुए जाते देखते रह गए.

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पर गरिमा एक अनुभवी महिला थी वो भले hi नेहा की तरह खेली खाई नहीं हुई थी पर यहाँ आने के बाद उसका मर्दो की जिन हवस भरी नज़रो और नियत से सामना हुआ उसने चाँद दिनों में hi उसे मर्दो का एक्सपर्ट बना दिया था. और वो समझ गई थी वासना की चिंगारी को जितना हवा दी जाए स्त्री पुरुष में मिलान की आग उतना hi बाद जाती है उसके हरिया के केस में भी यही हुआ था हरिया ने भी उसकी वासना को इतना बड़ा दिया था वो उससे मिलान करने से खुद को रोक नहीं पाई. और यही अब वो बिहारी काका के साथ कर रही थी. बिहारी काका तो बेचारे मन मसोस कर वापस अपनी चटाई पर आकर लेट गए और गरिमा को याद कर करके hi अपना लुंड मसलने लगे. पर गरिमा सीढ़ियों से वापस जाने की बजाए दरवाज़े की झिर्री से उन्हें अपना लुंड मसलते देख रही थी.

गरिमा मन में: बिहारी काका कई रात मेरे खाने में नींद की गोली मिलकर सिर्फ मेरे पेट पर लुंड खाद कर चले जाते थे न और मुझे वो मज़ा महसूस भी नहीं करने देते थे उसकी इतनी सजा तो झेलनी hi होगी. पर चिंता न करे सजा के बाद मज़ा भी भरपूर मिलेगा. अब समय आ गया है अपना फाइनल स्टेप लेने का.

गरिमा अपना आखिरी वार करने को तैयार थी क्या चल रहा था उसके दिमाग में. एक तरफ तो वो काका को उत्तेजित करके तड़पने की सजा में छोड़ कर चलदी अब किस तरह वो काका की इस सजा को मज़ा में बदलने वाली थी वो तो गरिमा और बिहारी काका के मिलान के इस आखिरी अपडेट में पता चलने वाला था. पिछले तीन चरण में उसने काका के वासना रुपी जिस लोहे को गरम करा था अब समय था उस पर अपनी कामुकता के लोहे की अंतिम चोट करने की. जितना बिल्डप होना था हो चूका था जितना इंतज़ार होना था हो चूका था अब समय था एक बड़े अपडेट का बिहारी काका और गरिमा के मिलान का.

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गरिमा किचन से बहार चली गई और बेचारे बिहारी काका उसे जाते देखते रह गए और मन मसोस का वापस अपनी चटाई पर लेटकर बस गरिमा का ख्वाब देख देखकर अपना लुंड हिलाकर संतोष करने लगे की कहा वो शहर की खूबसूरत औरत और कहा मई उसकी बाप की उम्र का गवर देहाती बुद्धा आदमी भला मैंने कैसे सोच लिया वो मुझसे छुड़वा लेगी. दूसरी तरफ बजाए ऊपर अपने कमरे में जाने के गरिमा वही किचन के बहार छुपकर कड़ी रहकर गरिमा दरवाज़े की झिर्री से काका को अपना लुंड मसलते देख रही थी की उसने आधा काम तो कर दिया उनकी बीवी की याद दिलाकर उनके अंदर अकेलापन की चिंगारी को हवा देदी और अपनी मोती चौड़ी गांड के दर्शन कराकर उस अकेलेपन की चिंगारी में वासना का पेट्रोल भी दाल दिया. और जब इस अकेलेपन की चिंगारी और वासना के पेट्रोल का मिलान होगा तो उत्तेजना की ज्वाला तो भड़केगी hi.

कुछ देर यही बहार खड़े रहने के बाद अब गरिमा के दुबारा एक नए रूप में अंदर जाने का समय आ गया था. तो उसने अपने पैरो से खत खत की आवाज़ करि ताकि काका सावधान हो जाए और अपना लुंड मसलना बंद करदे क्युकी वो नहीं चाहती थी की वो भी सुबह जीतू की तरह बिना उसे शांत करे hi झाड़ जाए. बहार से आती खत खत की आवाज़ से काका भी रुक गर और दरवाज़े की तरफ देखने लगे और कुछ पल बाद hi गरिमा दुबारा से किचन के अंदर आ गई.

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अभी गरिमा को गए बमुश्किल 15-20 मं हुए होंगे और उसके यु अचानक वापस आने से बिहारी काका भी चौंक गए. इतनी देर से अपना लुंड मसलने से उनका लुंड भी थोड़ा तन गया था इसलिए उसका तनाव छुपाने के लिए उन्होंने अपना हाथ उसके सामने कर लिए ताकि गरिमा को वो नज़र न आए पर गरिमा तो जानती थी वो क्या छुपा रहे है.

काका: का हुआ बिटिया कुछ चाही का, का फिर दर्द हुई रहा है का.

गरिमा: नहीं नहीं दर्द में तो आराम है अब डर्क्स नहीं हो रहा.

काका का चेहरा उतर गया उन्हें तो लगा था की शायद गरिमा के कही और भी दर्द हो रहा था इसीलिए वापस आई है. पर अब वो सोचने लगे की अगर वो दर्द की वजह से वपा नहीं आई तो कई आई.

काका: फिर का बात है बिटिया कुछ चाही का पानी चाही का. पानी तो तुम्हार कमरा के बहार वाले फ्रिज में हम रखवा दिए थे.

गरिमा: नहीं पानी नहीं चाहिए.

काका: फिर बात का है बिटिया बताओ.

गरिमा खामोश कड़ी थी वो जानती थी उसे क्या कहना है पर वो जानबूझ कर बिहारी काका का एक्ससिटेमेंट बड़ा रही थी.

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गरिमा: काका मई चली तो गई थी पर सीडिया चढ़ते हुए बस आपके बारे में सोचती रही आपके अकेलेपन के बारे में सोचती रही. कायदे से कल आपने मेरे साथ जो कुछ किया भले hi नशे में किया उस पर मुझे आपसे गुस्सा होना चाहिए था पर मुझे आप पर गुस्सा आने की बजाए तरस आ रहा था. मई अपने कमरे में पहुंच कर भी ये सोचती रही की मई क्या कुछ नहीं कर सकती आपके लिए कल तो मई चली जाउंगी फिर मुझे ख्याल आया की कल से पहले मेरे पास आज की ये रात तो है न और इस आज की रात में क्या मई ऐसा कुछ नहीं कर सकती जिससे एक रात के लिए hi सही आपका अकेलापन दूर हो जाए. फिर मुझे ख्याल आया की आपको मुझमे अपनी पत्नी का अक्सा नज़र आया मेरा डील डॉल मेरी हसी आपको अपनी पत्नी की याद दिला गए तो क्या यहाँ मई अपनी इस अंतिम रात में मई आपके उन पालो को जो अपने अपनी पत्नी के साथ बिताए उन्हें दुबारा ताज़ा नहीं कर सकती.

बिहारी काका गरिमा की बातो को बड़े ध्यान से सुन रहे थे पर अब भी स्पष्ट कुछ समझ नहीं आया की वो कहना क्या छह रही है.

काका: मई कुछ समझा नहीं बिटिया.

गरिमा: मेरे कहने का ये मतलब है की क्या इस आखिरी रात में मई आपके साथ यही इस किचन आपकी पत्नी की तरह आपके बगल में सो सकती हु. कल रात जब नशे में आप मुझे पत्नी समझ बैठे तो अगर आज बिना नशे के मई खुद से आपकी पत्नी की तरह व्यवहार करू तो क्या इससे आपको आपकी पत्नी का साथ महसूस होगा और आपका अकेलापन दूर होगा. शायद ये रात आपको आपकी बाकि ज़िन्दगी काटने में कुछ मदद कर सके.

काका को अपने कानो पर यकीन नहीं हो रहा था उसने कुछ पल पहले hi उपरवाले से मनाया था की गरिमा आज साडी रात यही उसके साथ रहे और गरिमा खुद से उसके पास आ गई वो भी साडी रात के लिए. उसे समझ नहीं आ रहा था की वो अपनी ख़ुशी को कैसे छुपाए.

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काका: बिटिया क्या सच में तुम यहाँ मेरे बगल में लेतोगी.

गरिमा: है अगर आपको ये सही लगे तो मई आज की रात यहाँ आपके साथ रुक सकती हु और बिलकुल आपकी बीवी की तरह आपको ट्रीट कर सकती हु.

गरिमा की ये बीवी की तरह वाली बात सुनकर काका का शरीर में करंट सा दौड़ रहा था क्या वाकई आज एक रात के लिए उसकी बीवी वाला हर काम करेगी हर काम से मतलब हर काम फिर भी उसका मन नहीं मन तो उसने पूछ hi लिया.

काका: बीवी की तरह से मतलब.

गरिमा: बीवी की तरह मतलब जैसे आपकी बीवी आपसे बात करती थी जो आप उससे कहते थे वो सब आप मुझे कह लीजिये, आप दोनों एक दुसरे को जिस नाम से पुकारते थे आज आप मुझे उस नाम से पुकार लीजिये. आप दोनों एक दुसरे को जिस तरह बहो में भरकर सोते थे वैसे मई आपके साथ लेट जाउंगी. मतलब हम लोग खुद पर कण्ट्रोल रखेंगे और कल रात की तरह कुछ भी गलत नहीं करेंगे बस केवल एक दुसरे को ये एहसास देंगे की मई आपकी निर्मला हु और आप मेरे पति. और इसमें कुछ गलत भो नहीं है और इस वक़्त यहाँ कोई है भी नहीं तो ये बात हमारे बीच hi रहेगी न आप किसीसे कहियेगा जीतू से भी नहीं मई कहूँगी तो किसी को कुछ पता नहीं चलेगा तो कोई कुछ गलत नहीं सोचेगा.

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गरिमा की पूरी बात सुनकर काका का मन जो ख़ुशी से फूला नहीं समां रहा था थोड़ा मायूस हो गया क्युकी गरिमा ने साफ़ साफ़ कह दिया था की वो यहाँ कुछ गलत करने नहीं आई है सिर्फ उन्हें उनकी पत्नी का एहसास देने आई है और गलत से उसका मतलब साफ़ था की वो किस बात को गलत कह रही थी और उसके लिए उसने साफ़ मन कर दिया था. पर जो एहसास वो देने की बात कर रही थी पूरी रात उसकी बहो में उसकी बीवी बांके सोने की बात कर रही थी यही बहुत था और काका का लुंड तो इसी बात पे धोती के अंदर झटके खाने लगा था. गरिमा ये तो जानती थी की काका मन hi मन ख़ुशी से फूले नहीं समां रहे थे बस सोचने का दिखावा कर रहे है पर फिर भी काका की सहमति लेने के लिए उसने उनसे पूछ hi लिया.

गरिमा: तो बोलिये क्या आज रात आप मेरे साथ अपनी बीवी का एहसास जीना चाहते है.

काका: बिटिया अब हम क्या कहे कुछ समझ नहीं आ रहा कल रात जो हमने किया उसके बाद हमार हिम्मत नहीं है पर तुम इतने प्यार से हमे कुछ देने आई हो तो मन भी कैसे कर सकते है. ठीक है शायद इसी रात को याद करके हम अपनी बाकि बची ज़िन्दगी का अकेलापन काट ले.

गरिमा: तो बताइये आपकी निर्मला आपको क्या कहकर बुलाती थी.

काका: हमार निर्मला वो तो जीतू के होने से पहले हमे बस सुनिए जी hi कहती थी और जीतू के होने के बाद जीतू के बापू कहती थी.

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गरिमा स्माइल करते हुआ उनके करीब आगे और सीधा उनके गले लग गई. काका को तो यकीन hi नहीं हो रहा था की गरिमा जैसी हुस्न की मल्लिका जो उम्र में लगभग उसकी आधी है खुद से उसके सीने से लगी है. गरिमा ने काका को कसकर अपनी बहो में जकड रखा था पर काका की अब भी हिम्मत नहीं हो रही थी उसे अपनी बहो में लेने की.

गरिमा: जीतू के बापू इतने सालो बाद आपकी निर्मला अपने सीने से लगी है क्या आप उसे अपनी बहो में भी नहीं भरना चाहते.

काका: बिटिया मई......

गरिमा: बिटिया नहीं निर्मला आपकी निरमला इतस ok आप मुझे अपनी बहो में भर सकते है इसमें कुछ गलत नहीं है इतना चलता है मई आपको परमिशन देती हु. अपनी बहो में भर कर आपकी निर्मला कप महसूस कर लीजिये मेरे बच्चे के बापू.

गरिमा ने ये बात इतनी ऐडा से कही की बिहारी काका का लुंड उत्तेजना में झटके खाने को मजबूर हो गया और बिहारी काका ने भी गरिमा को अपनी बहो में कास लिया.

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जिस औरत को नशे की गोलिया देकर वो बस उसके पेट पर अपना लुंड झाड़ कर चले आते थे उसी कामुक औरत को बिहारी काका किचन के बीचो बीच अपनी बहो में जकड़े खड़े और गरिमा भी उनकी पत्नी बनने का स्वांग रचते हुए उनका पूरा साथ दे रही थी जिस वजह से उनके लुंड धोती के अंदर झटके पे झटके खाए जा रहा था जिसका एहसास गरिमा को भी हो रहा था पर वो ये ज़ाहिर नहीं कर रही थी पर वो ये ज़रूर समझ गई थी की उसका तीर सही निशाने पर लगा है और आज रात उसका बुद्धा पति उसे बहुत मज़ा देने वाला है. कल रात तो मैंने नशे का नाटक रच कर इसे छोड़ने को मजबूर किया था पर आज मई बिना नशे का नाटक करे इसे इस हद तक उत्तेजित कर दूंगी की ये मुझे चोदे बिना रुक नहीं पाएगा. औरत के जिस्म का नशा तो वो नशा है जो दुनिया के सभी नशो से ज्यादा नशीला है और कोई मर्द उस नशे में डूबने के बाद खुद को बहकने से रोक नहीं पता. और चुकी मैंने पहले hi कुछ गलत न करने की बात केहड़ी है तो जो भी होगा वो सिर्फ काका की तरफ से होगा मुझे सिर्फ उनकी उत्तेजना की धीमी होती चिंगारी में अपनी कामुकता का घी डालते रहना है आग अपने आप भड़क उठेगी.

यकीन नहीं हो रहा था की ये वही गरिमा है जो जब यहाँ पहले दिन आई थी तब एक पतिव्रता पत्नी थी जिसकी मर्ज़ी के बिना उसकी जान बचने के लिए hi सही पर एक अप्पतिजनक रात बिताने पर उसने हरिया को इतना मारा की उसके हाथो निशान पद गए थे और आज कुछ दिनों में hi उसके अंदर बरसो से दबी उत्तेजना ने उसे इस पड़ाव पर ला दिया की वो खुद अपने से दुगनी उम्र के बुड्ढे कस साथ रात बिताने आई थी. पर इन कुछ दिनों वो इतनी शातिर हो गई थी की उसने बिहारी काका को अपने त्रिया चरित्र के ऐसे जाल में फसा लिया था की इसमें जो कुछ हो रहा था या होने वाला था सब गरिमा की इच्छा से हो रहा था पर बिहारी काका को यही लगने वाला था की वो बहक कर सब कुछ कर रहे है. उन्हें आभास hi नहीं हो रहा था की वो गरिमा के हाथ के एक मोहरे भर बन कर रह गए है और गरिमा उन्हें अपने हिसाब से उसे कर रही थी. पर जो भी हो इतना तै था की आज की ये रात इस किचन वासना और हवस का ऐसा तूफ़ान उठने वाला था जिसमे उम्र के सरे बंधन सभी रिश्ते मर्यादाए पीछे छूट जाने वाली थी और एक औरत मर्द का जो वास्तविक रिश्ता वही शेष रह जाने वाला था.

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उस रात के सन्नाटे में बिहारी काका और गरिमा या ये कहे जीतू के बापू और उनकी पत्नी निर्मला एक दुसरे को बहो में जकड़े खड़े थे.

गरिमा: क्या आपको ये एहसास अच्छा लग रहा है.

काका गहरी सास लेते हुए: बहुत अच्छा लग रहा है.

गरिमा: तो क्या अब हम लेट सकते है क्युकी आप साडी रात अपनी पत्नी के साथ खड़े खड़े तो नहीं गुज़रते होंगे.

काका को भी एहसास हुआ की वो काफी देर से गरिमा को बहो में जकड़े खड़े है. और वो गरिमा को छोड़ कर परे हैट गए.

काका: ओह हां माफ़ करना बिटिया माफ़ करना.

गरिमा हस्ते हुए: अब भी बिटिया क्या अपनी अपनी पत्नी निर्मला को बिटिया कहते थे.

काका झेपते हुए: नहीं नहीं मेरा मतलब है निर्मला वो एकदम से मुँह से निकल गया.

गरिमा: चलिए अभी तो साडी रात है हमारे पास बस हमे अपने इमोशंस पर काबू रखना होगा.

गरिमा बार बार इस तरह की बात करके बिहारी काका को ये एहसास दिला रही थी की वो यहाँ कुछ गलत नहीं करने वाली है पर दूसरी तरफ अपनी हरकतों और बातो से काका तो उत्तेजित होने को महसूस कर रही थी.

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गरिमा: तो क्या हम आपकी इस चटाई पर लेटने चले.

काका: क्या हम दोनों इस पर लेट पाएंगे मई कोई बड़ी चटाई ले अत हु.

गरिमा: इतस ok मई यहाँ बड़ी चटाई में लेटने नहीं आई हु जिस तरह आप अपनी पत्नी के साथ लेटते थे बस उन्ही पालो को आपके लिए ताज़ा करने आई हु.

काका अपना थूक गटकते हुए: उस तरह मेरे साथ लेटने में आपको उनकंफर्टबले तो नहीं लगेगा.

गरिमा: जब आपसे अपने कूल्हों पर मालिश करवाते हुए उनकंफर्टबले नहीं लगा तो केवल लेटने में क्यों लगेगा. आप बस इतना बताइये आप दोनों कैसे लेटते थे.

काका: क्या बताऊ शादी के बाद ज्यादा समय गुजरने का हमे मौका hi नहीं मिला बस 3 साल hi एक दुसरे के साथ रह पाए हम. बहनो की शादी करते करते मेरी शादी hi काफी लेट हुई मई 34 का था और वो 24 की पर उम्र का ये अंतर भी हमारे प्यार में बढ़ा न बना. 3 सालो में वो दो बार पेट से हुई पर बच्चा नहीं तेरा चौथी साल जब वो पेट से हुई तो देखरेख के लिए अपनी माँ के यहाँ चली गई और वही जीतू को जनम देते हुए चल बसी. बस वही उसके साथ गुज़ारे हुए तीन साल मेरी ज़िन्दगी के सबसे बेहतरीन तीन साल थे और उन्ही तीन सालो के सहारे मई आज तक ज़िंदा हु.

बिहारी काका की बाते सुनते हुए गरिमा को सचमे काफी बुरा लग रहा था पर दूसरी तरफ उसे ये भी लगा की अगर मई सच में इस रात को उनकी ज़िन्दगी की यादगार रात बना दू तो यहाँ से जाने से पहले उनके लिए मेरा सबसे अच्छा गिफ्ट होगा. पर वो उनके सामने खुलकर खुद को ज़ाहिर भी नहीं करना चाहती थी इसलिए उन्हें hi इतना उत्तेजित करना होगा की वो खुलने को मजबूर हो जाए.

गरिमा: देखिये मई आपकी निरमल को तो वापस नहीं ला सकती पर एक रात के लिए आप मुझे hi अपनी निरमला मानकर उन पालो को दुबारा जी सकते है. इसलिए अब आप सुबह तक के लिए ये बात अपने दिमाग से निकल दीजिये की मई गरिमा हु आपके मालिक की मेहमान आप मुझे hi निर्मला hi बुलाइये.

काका: जी

गरिमा: ऐसे नहीं मुझे नाम से बुलाइये.

काका: Gar....mera मतलब है निर्मला.

गरिमा: गुड चलिए क्या अब हम चटाई पर चले.

काका: हम्म

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गरिमा चटाई पर आकर बैठ गई पर बिहारी काका थोड़ा सकुचा रहे थे क्युकी ने कुछ गलत न करने की पाबन्दी लगा दी है तो उन्हें दर था की कही जाने अनजाने में उत्तेजनावश उनसे कुछ गलत हो गया तब वो क्या सफाई देंगे आज तो भांग की गोलियों का बहाना भी नहीं है. पर गरिमा बार बार उन्हें चटाई में अपने पास आने को कह रही थी और जब उसने अपना हाथ उनकी तरफ बड़ा दिया था तो वो उसके आकर्षण की डोर में बंधे हुए उसके हाथो को थामे हुए चटाई में उसके समीप जाकर बैठ गए.

गरिमा: बताइये मई कौन हु.

काका: मेरी निरनाला.

गरिमा: तो आप साडी रात अपनी निर्मला के साथ खड़े और बैठे तो नहीं बिताना चाहोगे न. तो बताइये आप दोनों कैसे सोते एकदम सावधान मुद्रा में या एक दुसरे की तरफ पीठ करके या एक दुसरे की तरफ फेस करके.

काका ख़ुशी में बीते पालो को याद करते हुए: नहीं उन तीन सालो कभी हम एक दुसरे की तरफ पीठ करके नहीं सोए हम तो हमेशा एक दुसरे के दुसरे की तरफ चेहरा करके एक दुसरे की आँखों में देखते हुए एक दुसरे को कास कर बहो मर भर कर सोते थे मेरी टांग उसकी टांगो पर रहती थी और उसकी मेरे ऊपर. हम रात भर इस कदर एक दुसरे को बहो में जकड़े रहते थे की हवा भी हमारे बीचे दाखिल नहीं हो सकती थी. पर आप चटाई के उस्तराफ लेट जाइये मई मई थोड़ा दूसरी बनाकर लेट जाऊंगा.

गरिमा: क्यों मई उस तरफ और थोड़ा दूर क्यों लेट जाएंगे. अभी तो आप कह रहे थे की मई आपकी निर्मला हु फिर.

काका: नहीं उस तरह आपको उनकंफर्टबले लगेगा इसलिए.

गरिमा: कोई बात नहीं इतना मई मैनेज कर लुंगी और वैसे hi लेटूंगी जैसे आपकी निर्मला लेटती थी.

इतना कह कर गरिमा खुद चटाई पर लेट गई और हाथो के इशारे से बिहारी काका को भी अपने करीब आकर लेटने को कहा.

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गरिमा: क्या हुआ जीतू के बापू आपकी निर्मला इतने प्यार से आपको बुला रही है और आप अब भी इतनी दूर बैठे हो क्या नाराज़ हो अपनी निर्मला से की मई इतने दिन आपसे दूर रही आओगे नहीं मेरे पास.

जीतू काका को तो अपनी किस्मत पर यकीन hi नहीं हो रहा था की गरिमा जैसी हीघक्लास्स खूबसूरत औरत खुदसे उन्हें अपने करीब उसे बहो में भरकर लेटने को आमंत्रित कर रही और इतने बरसो से औरत के साथ को तरस रहे अधेड़ उम्र के मर्द को इतनी सुन्दर औरत यु कामुक तरह से बुलाए तो भला वो कैसे इंकार कर सकता था इसलिए बिहारी काका गरिमा के आमंत्रण के मोहपाश में बंधे उसके करीब जाकर लेट गए. गरिमा उनकी तरफ चेहरा करके लेट गई और बड़े पुअर और ऐडा से उनकी आँखों में आँखे दाल कर देखने लगी. फिर गरिमा सरक कर उनके बदन के एकदम करीब आ गई और नीचे हाथ लेजाकर बिहारी काका की टांग उठाकर अपनक टांग के बीच फसा ली और अपने हाथ बिहारी काका की पीठ के पीछे लेजाकर बिहारी काका को कसकर अपनी बहो में जकड लिया. वो बिहारी काका को इतना कसकर अपनी बहो में जकड़े थी की उसकी बड़ी बड़ी चूचिया बिहारी काका के सीने में डाब रही थी.

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गरिमा: क्या ऐसे hi लेटते थे आप दोनों.

बिहारी काका की धड़कने इस कदर तेज़ तेज़ चल रही थी की उनसे जवाब भी नहीं दिया जा रहा था. पर फिर भी गरिमा के सवाल पर थूक गटकते हुए उन्होंने हामी में सर हिला दिया.

गरिमा: पर क्या सिर्फ आपकी निर्मला भी आपको बहो में भर्ती थी आप नहीं भरते थे.

काका हकलाते हुए: न... न.. नहीं नहीं b..b.

भरता था न मई भी भरता था.

गरिमा: तो किस बात का इंतज़ार कर रहे है अपनी निर्मला आपके इतना करीब है भर लीजिये उसे अपनी बहो में.

बिहारी काका के हाथ काँप रहे थे पर उन कापते हाथो को वो गरिमा के पीछे ले गए और उन्हें गरिमा की पीठ पर रखते हुए उन्होंने भी गरिमा को अपनी बहो में समेत लिया. उत्तेजना के मरे उनकी आँखे बंद हो गई और गरिमा की छूट के बेहद करीब उनका लुंड झटके खाने को मजबूर हो गया जिस पर उनका कोई ज़ोर नहीं चल रहा था. उन्हें ये समझ आ रहा था की इतने करीब होने की वजह से गरिमा को नीचे उनके लुंड के झटके का साफ़ साफ़ एहसास हो रहा होगा और वो उनकी उत्तेजना पर गुस्सा हो सकती है इसलिए उन्होंने पीछे हटने की कोशिश की पर गरिमा ने अपने बहो की पकड़ और मजबूत करके उन्हें पीछे नहीं हटने दिया.

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गरिमा: क्या हुआ जी आप पीछे क्यों हैट रहे है मुझसे कुछ गलती हो गई क्या.

काका: नहीं दरअसल वो मई वो... ममम.. वो मई

गरिमा: मई समझ रही हु आप उस उत्त्की वजह से परेशां है जो आपकी जांघो के बीच हो रही है और आप उसे कण्ट्रोल नहीं कर प् रहे है. पर इतस ok ये नार्मल चीज़ है इसमें गलत क्या है जो आप इसे छुपा रहे. कोई भी मर्द और औरत अगर रात के इस कामुक माहौल में इस तरह एक दुसरे के कर्रेब आए तो उनमे उत्तेजना का जागना स्वाभाविक है इसमें अलग क्या है. अलग तो तब होता जब आपमें उत्तेजना न जगती. पर आप भी एक मर्द है और एक औरत को अपनी बहो में भरे है तो आपका उत्तेजित होना स्वाभाविक है. इतस ok मई इस बात का बुरा नहीं मानूगी बल्कि खुश हु आप मुझे अपनी पत्नी मानकर उत्तेजित फील कर रहे है. आप मुझे रात भर यही बहो में रख सकते है मई इसके लिए तैयार हु.

गरिमा की बाते सुनकर उनके हाथ दुबारा उसकी पीठ तक पहुंच गए और उन्होंने गरिमा को फिरसे अपनी बहो में भर लिया.

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एक पल को उनके मन में ये ख्याल भी आ रहा था की कही गरिमा भी अंदर से छुडासी तो नहीं है और ये सब जानबूझ कर रही है पर फिर आज सुबह का उसका बिहेवियर और अभी की गई उसकी सेंटीमेंटल बाते उनके मन संदेह उत्पन्न कर रहे थे की हो सकता है गरिमा वास्तव में उनकी मदद करने के लिए hi ये सब कर रही हो इसलिए उनका अपनी तरफ से कुछ गलत करना ठीक नहीं होगा.

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गरिमा: क्या आपको मेरे साथ अच्छा लग रहा है.

काका: बहुत अच्छा.

गरिमा: तो आप साडी रात अपनी पत्नी को यही बहो में भरकर लेते रहते थे जैसे मेरे साथ लेते है.

काका: है लगभग ऐसे hi.

गरिमा: लागबजांग क्या होता है मैंने कहा न आप जैसे उनके साथ लेटते थे वैसे hi मेरे साथ रहिये वर्ण ये सब बेकार है.

काका: अब मई जैसे उसके लेटता था उसी पूरी तरह आपके साथ नहीं कर सकता.

गरिमा: क्यों नहीं कर सकते क्या दिक्कत थे ऐसा क्या अंतर है मेरे साथ लेटने में और उनके साथ लेटने में.

काका उन पालो को याद करते हुए: अब क्या बताऊ वो मेरी पत्नी थी हमारे बीचे एकदूसरे के बदन को छूने की कोई सीमा नहीं थी मई कभी उसकी जांघो को सहलाता कभी उसके कूल्हों को कभी उसकी कमर को उसके कपड़ो के अंदर हाथ डालने पर भी मुझपर कोई बंधन नहीं था पर वो सब मई आपके साथ नहीं कर सकता. इसीलिए लगभग बोलै आप मेरे अकेलेपन के लिए जितना कर रही है उतना hi बहुत है.

गरिमा सोच में डूब गई मन hi मन तो वो काका को अपने बदन से खेलने की परमिशन दे चुकी थी पर इसे वो ज़ाहिर नहीं करना चाहती थी इसीलिए सोचने का ये दिखावा कर रही थी.

गरिमा अपने चेहरे पर गंभीर भाव लेट हुए: क्यों नहीं कर सकते?

काका: जी मई कुछ समझा नहीं.

गरिमा: मई आज रात के लिए आपकी पत्नी हु और आप मेरे पति है फिर ये सब आप मेरे साथ क्यों नहीं कर सकते.

काका के दिल की धड़कने तेज़ हो गई उनके लुंड ने नीचे एक तेज़ झटका खाया वो समझ तो गए थे की गरिमा क्या कह रही है पर फिर भी क्लियर करना ज़रूरी था.

काका: देखिये अपने गलत करने को मन करा है तो मई जो अपनी पत्नी के साथ करता था जिस तरह उसे छूटा था उस तरह आपको छुंगा तो वो भी तो गलत होगा न.

गरिमा: क्यों केवल छूना कैसे गलत हो जाएगा अभी अपने मेरे कूल्हों की मालिश की तब भी तो अपने मेरे कुल्ह को छुआ तब वो सही था तो अब गलत कैसे हो जाएगा. और गलत से मेरा मतलब केवल सम्भोग से था मतलब मई आपका वो अपने अंदर नहीं ले सकती थी वो सिर्फ उसीके लिए है जिसके नाम का सिन्दूर मेरी मांग में है. पर बात अगर सिर्फ छूने की है तो उसमे क्या गलत है अगर मेरे बदन को छू कर आपको आपकी बीवी का एहसास मिलता है तो इसमें कुछ गलत नहीं. इसलिए मई आपको परमिशन देती हु की आप मुझे छू सकते है जहा मर्ज़ी चाहे छू सकते है जैसे चाहे छू सकते थे कपड़ो के अंदर हाथ डालकर छूना चाहे हो तो वैसे भी छू सकते है मई आपको नहीं रोकूंगी. सम्भोग छोड़ कर आपको बाकि सबकी इज़ाज़त है.

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बिहारी काका को यकीन नहीं हो रहा था की गरिमा ने अपना पूरा बदन उनके हवाले कर दिया वो जहा चाहे जैसे चाहे उसे छू सकते है. केवल सम्भोग की पाबन्दी लगाई पर अपने जिस्म से खेलने की खुली छूट देदी और बिहारी काका जैसे एक अधेड़ बुड्ढे को अगर इतनी छूट भी मिल है तो यही उसके लिए किसी ख़ज़ाने से कम नहीं.

काका: क्या सच में क्या वाकई आपको कोई दिक्कत नहीं होगी मई आपको कही भी छू.

गरिमा: पहले तो आप ये बताइये की आप अपनी पत्नी को आप कहते थे या तुम.

काका: उसे तो मई तुम hi कहता था.

गरिमा: फिर मुझे क्यों आप कह कर पाप में दाल रहे हो. और रही मुझे छूने की बात तो एक रात के लिए hi सही पति तो मन है न आपको तो एक पति का इतना हक़ तो होता है अपनी पत्नी पर की उसे जहा मर्ज़ी चाहे छू सकता था.

काका: ऐसा लग रहा है जैसे सच में मेरी निर्मला hi मेरे पास लौट आई है.

गरिमा: आपकी निर्मला hi तो हु मई जीतू के बापू.

गरिमा की बातो ने पूरी तरह बिहारी काका को मदहोश सा कर दिया था हुए उन्होंने उसे कास कर अपनी बहो में जकड लिया और अपने हाथो को गरिमा के पीठ से नीचे सरकते हुए उसके कूल्हों पर जाकर थम गए और कुछ देर उसके कूल्हों को सहलाते हुए घाघरे के ऊपर से hi उसके कूल्हों को अपनी मुट्ठी में बबीच लिया. गरिमा के कूल्हों को दोबच्ते हुए वो एकटक उसकी आँखों में देख रहे थे और उसकी आँखों के भावो को पद रहे थे की कही उसकी आँखों में नाराज़गी तो नहीं. प् बजाए नाराज़गी के गरिमा ने अपने होंठो पर हलकी सी स्माइल लेकर उन्हें अपनी मौन सहमति देदी ये हलकी सी स्माइल कामक्रिया में आगे बढ़ने का खुला आमंत्रण भी था और बिहारी काका अंहभावी व्यक्ति ने इस मौन आमंत्रण को समझ लिया और गरिमा के घाघरे को अपने हाथो में थम लिया और आहिस्ता आहिस्ता उसे ऊपर खींचने लगे. एक बार फिर उस किचन में गरिमा का घाघरा उसकी जांघो को नंगा करता हुआ ऊपर उठता जा रहा था. कुछ देर पहले जब गरिमा ने खुद अपना घाघरा ऊपर करा था तब दृश्य भले hi कामुक हो पर उसके पीछे का उद्देश्य उतना कामुक नहीं था क्युकी वो बस मालिश के लिए ऊपर करा गया था पर अब जब ये घाघर ऊपर हुआ था तो ये दृश्य हुए इसके पीछे का उद्देश्य दोनों hi कामवासना से ओट प्रोत थे.

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बिहारी काका ने गरिमा का घाघरा खींच कर उसकी कमर तक ऊपर चढ़ा दिया. और अपने हाथ गरिमा की जांघो पर फिरने लगे अब उन्हें गरिमा के गुस्से की भी चिंता नहीं थी क्युकी गरिमा ने खुद उन्हें इसकी परमिशन दी थी. अपनी चिकनी कोमल जांघो पर बिहारी काका के रूखे झुर्रीदार हाथो का स्पर्श गरिमा को कामुक कर रहा था. बिहारी काका की आँखे बंद थी उसने भी उत्तेजना के मरे अपनी आँखे बंद कर्ली और गहरी गेर्हरि सासे लेने लगी. गरिमा की जांघो को सहलाते सहलाते जैसेही काका के हाथ उसकी चड्डी तक पहुंचे वो कुछ पल को ठिठक गए और उनके मुँह से एक ओह की आवाज़ निकल गई जिसकी प्रतिक्रिया में गरिमा की भी आँखे खुल गई.

गरिमा: क्या हुआ आप अचानक से चौंक क्यों गए.

काका थोड़ा झेपते हुए: नहीं नहीं कुछ नहीं वो मई आँख बंद करके सच में अपनी निरमला के खयालो में खो गया था पर... जाने दीजिये.

गरिमा: पर क्या नहीं जाने क्यों दीजिये बताइये न पर क्या.

काका: छोड़िये ऐसी कोई बड़ी बात नहीं.

गरिमा: ठीक है छोटी बात hi सही पर मुझे जननी है आप बताइये आपको मेरी कसम.

काका: अरे अपने कसम क्यों दी ऐसी कोई बताने लायक बात नहीं थी.

गरिमा: जैसी भी बात हो मुझे बताइये.

काका: दरअसल आपकी जांघो को छूटे छूटे मई सच में निरमला के खयालो में खो गया था और उसीके बारे में सोच रहा था पर जैसे hi आपकी चड्डी पर हाथ पड़ा तो एहसास हुआ आप निरमला नहीं हो.

गरिमा: ऐसा क्यों

काका: क्युकी मेरी निर्मला रात में सोते वक़्त अंदर चड्डी नहीं पहनती थी पर आप पेहटी है तो पहने रहिये कोई दिक्कत नहीं है.

गरिमा: अगर अपनी पत्नी रात में अंदर चड्डी नहीं पहनती थी और अगर मई यहाँ उनके रोले निभा रही हु तो मई कैसे पेहेन सकती हु. इतस ok मई भी नहीं पहनुंगी.

इतना कह कर गरिमा ने बिहारी काका की टांगो के बीच से अपनी टांग निकल कर अपने पैरो को मोड़ कर बिना देर किये अपनी चड्डी खींच कर उतारदी और उसे किचन के दरवाज़े के पास फ़ेंक दिया.

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बिहारी काका को यकीन नहीं हो रहा था की उनके एक बार कहने भर से गरिमा ने एक पल में अपनी चड्डी उतारदी क्या ये वही औरत है जिसने सुबह मुझे इतना भला बुरा कहा था की मई खुदखुशी करने को मजबूर हो गया था और अब सिर्फ मेरे अकेलेपन को दूर करने के लिए अपनी चड्डी उतर कर अपनी छूट को नंगा करने को तैयार हो गई. क्या वाकई ये सिर्फ मेरा अकेलापन hi दूर करना चाहती है या ये भी अंदर से गरम हो गई है और अंदर से छुडासी है. या ये भी हो सकता है ये आई तो अकेलापन दूर करने hi थी पर अब एक मर्द की बहो में अपने बदन पर उसके हाथो के स्पर्श ने इसे उत्तेजित कर दिया हो. जो भी हो अगर ये बेहेक्ति भी है तो उसमे फायदा तो मेरा hi है और इस बात ये पूरी तरह मुझे ब्लामे भी नहीं दे पाएगी. पर उसके लिए मुझे भी अपनी तरफ से थोड़ा प्रयास करना होगा ताकि अगर ये छोड़ने के इरादे से न भी आई हो तो भी बहक कर मुझसे छोड़ने को मजबूर हो जाए.

काका: एक और बात कहु.

गरिमा: है कहिये.

काका: दरअसल जब मई उसके साथ सोता था तो मई भी इतने कपडे पेहेन कर नहीं सोता था बस नीचे जांघिया पहनता था तो अगर तुम्हे दिक्कत न हो तो क्या मई अपनी धोती और बनियान उतर दू.

गरिमा: आपके कपडे है पेहेनना न पेहेनना आपकी मर्ज़ी है मई मन करने वाली कौन होती हु.

गरिमा की सहमति मिलते hi बिहारी काका ने भी अपनी धोती की गाँठ खोल कर धोती उतर कर फ़ेंक दी और साथ hi साथ अपनी बनियान भी उतर दी. अब भयहारी का सफ़ेद बालो से भरा झुर्रीदार बदन बस उनके पटरे वाले अंडरवियर में था. दूसरी तरफ अपनी चड्डी उतर कर गरिमा दुबारा बिहारी काका की बहो में समां गई.

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बिहारी काका ने भी इस बार बिना किसी संकोच और दर के गरिमा को अपनी बहो में समेत लिया. अब तक उस लुंड का तनाव धोती की परतो में छुपा हुआ था पर वो धोती उतारते hi उस लुंड का तनाव अपने पूर्ण रूप में सामने आ गया और वो पतला सा पटरे का जांघिया उस लुंड के तनाव को रोकने में पूरी तरह नाकाम था और अब तो गरिमा की छूट के सामने चड्डी की कोई दीवार भी न थी और उसका घाघरा तो पहले hi कमर तक ऊपर उठ चूका था. ऐसे में इस बार गरिमा और काका के आलिंगनबद्ध होते hi बिहारी काका के तने हुए लुंड ने सीधा गरिमा के जांघो के बीचे घुस कर उसकी छूट के मुहाने को छू गरिमा को अपनी उत्तेजना का एहसास करा दिया. पर गरिमा तो इसके लिए तैयार होकर आई थी इसलिए अपनी छूट के द्वार पर उनके लुंड एहसास होने के बाद भी उसने किसी तरह की कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. गरिमा के कोई आपत्ति न करने पर काका की हिम्मत भी बाद गई और एक बार फिर अपने हाथ नीचे लेजाकर इस बार गरिमा के नंगे हो चुके चूतड़ों को अपनी मुट्ठी में भर लिया.

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अभी कुछ समय पहले भी उन्होंने इन कूल्हों को अपने हाथो से मसला था पर इस बार की बात hi कुछ और थी. गरिमा के चूतड़ों को भींच कर वो आगे की तरफ दबाव डालने लगे और इधर आगे से अपने तने हुए लुंड का दबाव गरिमा की नंगी छूट पर दाल रहे थे. ये तो गनीमत थी की बीच में उस जांघिये की दीवार थी वर्ण उस लुंड के तनाव को देखते हुए साफ़ था की एक hi झटके में वो गरिमा के अंदर काफी अंदर तक उतर जाता. पर भले hi जांघिये के रहते वो गरिमा के अंदर दाखिल नहीं हो सकते थे पर फिर भी जांघिये के अंदर से hi अपना लुंड गरिमा की छूट पर रगड़ रगड़ कर पूरा मज़ा ले रहे थे और गरिमा भी उनके इस मज़े में किसी तरह का कोई विरोध नहीं कर रही थी जिससे उनकी कामुक हरकते पल प्रतिपल बढ़ती hi जा रही थी. गरिमा ने भी उत्तेजना के मरे अपनी आँखे बंद किये हुए काका को खुली छूट दे राखी थी, काका भी गरिमा के चेहरे के भावो को ध्यान से देख रहे थे क्युकी उसकी एक न उनके सरे अरमानो पर बिजली गिरा देती और जो वासना की आग उनके अंदर जल उठी थी वो ठंडी hi न हो पति. गरिमा की बंद आँखों से उसकी उत्तेजना को समझते हुए बिहारी काका ने उसके चूतड़ों को पीछे से थोड़ा खोल दिया और अपनी हथेली को उसके गांड के बीच की दरार में दाल दिया और गरिमा की गांड की दरार को रगड़ते रगड़ते अपनी तर्जनी ऊँगली सीधा गरिमा की गांड के छेड़ के अंदर दाल दी.

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गरिमा एकदम से चिहुंक उठी उसने उम्मीद नहीं की थी की बिहारी काका एकदम से इतने फ्रैंक हो जाएंगे की सीधा उसकी गांड के चीड़ में ऊँगली दाल देंगे. उसने एक्पाल को अपनी गांड को हल्का सा सिकोड़ लिया पर काका ने इसके बावजूद अपनी ऊँगली को बहार नहीं निकला. ऐसे में गरिमा अपनी आँखे खोलने को मजबूर हो गई.

गरिमा: काका वो आपने अपनी उंगली गलत जगह दाल दी है.

काका: तुम मुझे काका कह रही हो जीतू के बापू नहीं.

गरिमा: नहीं वो अचानक से मुँह से निकल गया पर आपकी उंगली गलत जगह घुस गई है.

काका: नहीं बिटिया मैंने तो तुम्हे निर्मला समझ के hi ये करा वो क्या है मई हर रात अपनी निर्मला के गांड के छेड़ को अपनी उंगली से ज़रूर सहलाता था बिना ऐसा करे न उसे नींद आती थी न मुझे. उसे इसमें बड़ा मज़ा अत था पर माफ़ करना तुम्हे बुरा लगा तो मई निकलल लेता हु.

गरिमा: नहीं नहीं रहने दीजिये रहने दीजिये अगर आप हर रात अपनी पत्नी के साथ ये सब करते थे तो भला मई मन कैसे कर सकती हु. अगर आपको ये अच्छा लग रहा है तो आप करते रहिये.

काका: शुक्रिया बिटिया मेरा मतलब है निर्मला.

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इतना कह कर बिहारी काका ने अपनी ऊँगली को गरिमा की गांड में अंदर बहार करना शुरू कर दिया. पीछे से काका गरिमा की गांड में ऊँगली अंदर बहार कर रहे थे और आगे से अपना लुंड झंघिये के अंदर से ुकि छूट पर रगड़ रहे थे. गरिमा का तो उत्तेजना के मरे बुरा हाल हो रहा था उसे पता नहीं था की गांड में ऊँगली करवामे में इतना मज़ा अत है. उसने काका को कास कर अपनी बहो में जकड लिया और अपने निचले होंठ को अपने दातो में भींच लिए जब इतने से भी उसकी उत्तेजना काबू न हुई तो उसने अपने सर काका के सीने पर रख दिया गरम गरम सिसकारियां भरने लगी. गरिमा के मुँह से निकलती गरम गरम आहे को अपने बालो से भरे सीने पर महसूस हो रही थी और इसीसे उन्हें आभास हो रहा था की गरिमा किस कदर उत्तेजित है और अगर उस उत्तेजना को चरम पर पंहुचा दिया जाए तो वो उनके लुंड के नीचे आने को मजबूर हो जाएगी.

काका गहरी गहरी सास लेते हुए: तुम्हे पता है जब मई यु उसकी गांड में ऊँगली करता था तो वो हद से ज्यादा उत्तेजित हो जाती थी और मेरे होंठो को अपने होंठो में भरकर मुझे पागलो की तरह चूसने लगती थी. पर.........

गरिमा: अगर वो करती थी तो मई भी करुँगी.

इतना कह कर गरिमा ने अपना चेहरा ऊपर करा और अपने होंठ बिहारी काका के होंठो के करीब लेजाकर उनके बालो को सहलाते हुए उनकी आँखों में आँखे डालकर देखते हुए उनको होंठो को अपने होंठो में भर लिया.

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गरिमा बिहारी काका के कटे पिटे मूछो से भरे होंठो को अपने रसीले होंठो में भरकर चूस रही थी. गरिमा का ये मादक चुम्बन बिहारी काका को भी बावला सा कर रही थी और इसी बावलेपन में उनकी उंगली गरिमा की गांड में तेज़ तेज़ अंदर बहार हो रही थी. जितनी तेज़ गति से बिहारी काका की ऊँगली अंदर बहार हो रही थी गरिमा का चुम्बन और कामुक होता जा रहा था. ये कहना मुश्किल था की इनमे से क्रिया है और कौन प्रतिक्रिया सीधे शब्दों में कहे तो ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल थी चुम्बन की कामुकता की वजह ऊँगली की बढ़ती गति थी या ऊँगली की बढ़ती गति की वजह चुम्बन की कामुकता. पर इस वक़्त दोनों सरे रिश्ते नाटो को भूले हुए बस एक औरत और मर्द के रीढ़ते को निभाते हुए पूरी तरह से एक दुसरे में गुंथे पड़े थे.

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