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- Dec 5, 2013
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#20
दिमाग में सवाल इतने थे की सोचते सोचते सरदर्द होने लगा था . मैं सीधा जाकर नहाया और फिर सरोज के पास गया , पीली साडी में सरोज बड़ी कातिल लग रही थी, मुझे देखते ही वो शुरू हो गयी .
सरोज- कहाँ थे तुम , आजकल न जाने क्या हुआ है न दिन की फ़िक्र है न रात की , बीते महीने से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था की तुमने खाना छोड़ा हो, कोई कमी है तो बताओ , मैं तुम्हारी पसंद का खाना बनाती हु फिर भी .
मैं- माफ़ी चाहता हूँ बस मैं आ नहीं पाया रात को , थका हुआ था तो वहीँ पर सो गया .
देखो - ये जानते हुए भी की खेतो पर अकेले सोना खतरनाक है ,फिर भी मैंने तुम्हे रोका नहीं पर अब जब आस पास ऐसी घटनाये हो रही है मुझे फ़िक्र है तुम्हारी, बेशक मैं सो चुकी हु तुम्हारे साथ फिर भी तुम बेटे हो मेरे .
मैंने सरोज की नजरो में अपार ममता देखि .
मैं- कैसी घटनाये
सरोज- तुम्हे नहीं मालूम, लोग कहते है की लाला के मुनीम को दिल का दौरा नहीं पड़ा था उसे किसी सांप ने काटा था . उसके बाद जुम्मन की भैंस को भी कोई जानवर खा गया , और तो और परसों पीपल वाले रस्ते पर एक आधी खाई नील गाय मिली है . फिर लाला पर हुआ हमला . मेरा जी बड़ा घबराता है जब तुम लोग बे टाइम घर से बाहर रहते हो. न तुम सुनते हो न करतार और न तुम्हारे चाचा .
मैं- ध्यान रखूँगा और कोशिश करूँगा समय से घर आने का .
सरोज- मुझे तो लगता है कोई साया है तुम पर , गाँव वाले बताते है रात रात भर तुम मजार पर उस पागल संग रहते हो. मुझे डर है कहीं वो मेरे बेटे को कुछ खिला पिला न दे.
मैं- अरे काकी, पागल नहीं है वो , मैं अपनी सुना देता हु उसे वो मुझे सुना देता है , मैं मजार पर जाता हु मेरी माँ के पेड़ की वजह से , उसके पास बैठता हु तो लगता है की माँ के आँचल तले हु, इसलिए चला जाता हु .
सरोज फिर आगे कुछ न बोली ,सिवाय इसके की खाना आ रही है वो .
ख़ामोशी से मैंने खाना खाया, मैं थोड़ी देर सोना चाहता था तो करतार के पलंग पर जाके लेट गया . सरोज भी अपना काम करने लगी . मेरा ध्यान दो बातो पर था शकुन्तला से मिलने पर , मोना सिंह की वो तस्वीर और रूपा के साथ घर बसाने को . पर चूँकि रूपा कुछ दिनों के लिए बाहर थी तो मैंने अपने ध्यान फिलहाल के लिए शकुन्तला पर लगाया.
कुछ सोचने के बाद मैं उठा और सीधा अपनी साइकिल लेकर उस जमीं पर आया जिसको खरीदने की ख्वाहिश लाला महिपाल की थी , आखिर इस टुकड़े में क्या ख़ास बात थी , नहर नजदीक थी , सड़क नजदीक थी और महिपाल अपना रकबा बढ़ा सकता था . इस जमीन से हम दो फसल ही लेते थे बाजरा और सरसों या गेहू,
मैंने अनुमान लगाना शुरू किया और कुछ सोचा, मुझे वापिस आते आते शाम के चार पांच बज गए थे , जब मैं लौट रहा था तो रस्ते में मैंने देखा मेरी ताई अपने घर के बाहर ही खड़ी थी , न जाने क्या हुआ मुझे मैं साइकिल से उतर गया और पैदल ही गहर के सामने से गुजरने लगा . ताई ने मुझे देखा और आवाज दी, - देव, बेटे.
मेरी जिन्दगी में ये पहली बार था जब मेरे अपनों ने मुझे आवाज दी थी . मैं रुक गया
“जी, ताईजी ”
ताई- कैसा है मेरा बेटा
मैं- जी ठीक हूँ
ताई- वहां क्यों खड़ा है अन्दर चल तेरा ही घर तो है बेटा
मैं- फिर कभी आऊंगा
ताई- तेरी झिझक समझती हूँ बेटा दोष हमारा ही अपने खून को , अपनी औलाद को आँखों के सामने परायो के जैसे पलता जो देखते रहे,
मैं- वो बात नहीं है ताईजी , मैं आता हु फिर कभी
ताई- तेरी दीदी की शादी है तुझे मालूम तो होगा ही ,आना है तुझे, आना ही क्या रस्मे, शादी के काम सँभालने है , कितने दिनों बाद परिवार में कोई शुभ दिन आ रहा है
मैं- जी बिलकुल, ये भी कोई कहने की बात है
मैंने कहा और अपना रास्ता पकड़ लिया. परिवार, जब भी कोई परिवार की बाते करता था मुझे बड़ी हंसी आती थी , घर आकर भी मेरे पास क्या था करने को , ये खाली चारदीवारी मेरा मजाक उडाती थी , हंसती थी मुझ पर , मेरी बदकिस्मती पर. और मैं हमेशा की तरह मन मसोस कर रह जाता था .
मेरे पास एक चाबी थी , मोना के पास एक तस्वीर थी , एक खोयी हुई हवेली की, उस हवेली और मेरी खुशियों में एक समानता तो थी दोनों ही खोयी हुई थी . मैंने एक कागज लिया और जो तस्वीर मैंने देखि थी वो बनाने लगा. वैसी तो नहीं बनी पर उस जैसी कह सकते है .
अब बस मुझे उस आदमी की तलाश करनी थी जो उस हवेली के बारे में जानता हो . चौपाल पर बैठे कुछ बुजुर्गो से मैंने पूछा पर कुछ ने आना कानी की कुछ ने गर्दन न में हिला दी. दरअसल ये हमेशा से ही था , गाँव के लोग मुझसे दूर ही रहते थे , बाबा ने भी कहा था की मैं लोगो से जुडु पर ये लोग मुझसे ऐसे भागते थे जैसे की मैं कोई संक्रमित जीव होऊ .
खैर मैं घर आया तो मैंने देखा सरोज काकी और करतार में किसी बात को लेकर बात हो रही थी .
मैं- क्या हुआ,
कट्टु- देखो न भाई , माँ हमेशा मुझे ही काम के लिए कहती रहती है
सरोज- तो छोटा कौन है , वो ही करेगा काम
मैं- क्या काम है ऐसा
सरोज- रामेशवर जी की लड़की की शादी है , कन्यादान के लिए कहा है इसे दे आने को पर ये जा नहीं रहा
कट्टु- भाई, रामेश्वर ने अपना मकान नहर पार खेतो में बनाया हुआ है अब तुम ही बताओ कौन जायेगा इतनी दूर, थोडा सा जीमने के लिए मैं तो न जाऊ इतनी दूर .
मैं- बस इतनी सी बात मैं चला जाता हूँ उसमे क्या है
कट्टु और सरोज दोनों ने ही घुर कर मेरी तरफ देखा .
मैं- क्या -
सरोज- आजतक किसी के यहाँ तुम गए भी हो
मैं तो आज चला जाता हूँ उसमे क्या है . करतार मेरे नए कपडे निकाल ला. जरा.
नए कपडे पहन के मैं रामेश्वर की लड़की की शादी में जा पहुंचा, सर्दियों की रात में शादी होना भी बड़ा गजब होता है , मैंने सबसे पहले कन्यादान किया सरोज ने जो जेवर, साड़ी दी थी वो दी, खाना खाया इन सब में मुझे रात के तक़रीबन दस बज गए थे, किसी ने बताया की बारात दरवाजे पर आ पहुंची मैं देखने लगा. थोडा समय और गुजर गया . पर मुझे लौटना था तो मैं चल पड़ा बस नहर की पुलिया के पास पहुंचा तो मैंने देखा की ......................
दिमाग में सवाल इतने थे की सोचते सोचते सरदर्द होने लगा था . मैं सीधा जाकर नहाया और फिर सरोज के पास गया , पीली साडी में सरोज बड़ी कातिल लग रही थी, मुझे देखते ही वो शुरू हो गयी .
सरोज- कहाँ थे तुम , आजकल न जाने क्या हुआ है न दिन की फ़िक्र है न रात की , बीते महीने से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था की तुमने खाना छोड़ा हो, कोई कमी है तो बताओ , मैं तुम्हारी पसंद का खाना बनाती हु फिर भी .
मैं- माफ़ी चाहता हूँ बस मैं आ नहीं पाया रात को , थका हुआ था तो वहीँ पर सो गया .
देखो - ये जानते हुए भी की खेतो पर अकेले सोना खतरनाक है ,फिर भी मैंने तुम्हे रोका नहीं पर अब जब आस पास ऐसी घटनाये हो रही है मुझे फ़िक्र है तुम्हारी, बेशक मैं सो चुकी हु तुम्हारे साथ फिर भी तुम बेटे हो मेरे .
मैंने सरोज की नजरो में अपार ममता देखि .
मैं- कैसी घटनाये
सरोज- तुम्हे नहीं मालूम, लोग कहते है की लाला के मुनीम को दिल का दौरा नहीं पड़ा था उसे किसी सांप ने काटा था . उसके बाद जुम्मन की भैंस को भी कोई जानवर खा गया , और तो और परसों पीपल वाले रस्ते पर एक आधी खाई नील गाय मिली है . फिर लाला पर हुआ हमला . मेरा जी बड़ा घबराता है जब तुम लोग बे टाइम घर से बाहर रहते हो. न तुम सुनते हो न करतार और न तुम्हारे चाचा .
मैं- ध्यान रखूँगा और कोशिश करूँगा समय से घर आने का .
सरोज- मुझे तो लगता है कोई साया है तुम पर , गाँव वाले बताते है रात रात भर तुम मजार पर उस पागल संग रहते हो. मुझे डर है कहीं वो मेरे बेटे को कुछ खिला पिला न दे.
मैं- अरे काकी, पागल नहीं है वो , मैं अपनी सुना देता हु उसे वो मुझे सुना देता है , मैं मजार पर जाता हु मेरी माँ के पेड़ की वजह से , उसके पास बैठता हु तो लगता है की माँ के आँचल तले हु, इसलिए चला जाता हु .
सरोज फिर आगे कुछ न बोली ,सिवाय इसके की खाना आ रही है वो .
ख़ामोशी से मैंने खाना खाया, मैं थोड़ी देर सोना चाहता था तो करतार के पलंग पर जाके लेट गया . सरोज भी अपना काम करने लगी . मेरा ध्यान दो बातो पर था शकुन्तला से मिलने पर , मोना सिंह की वो तस्वीर और रूपा के साथ घर बसाने को . पर चूँकि रूपा कुछ दिनों के लिए बाहर थी तो मैंने अपने ध्यान फिलहाल के लिए शकुन्तला पर लगाया.
कुछ सोचने के बाद मैं उठा और सीधा अपनी साइकिल लेकर उस जमीं पर आया जिसको खरीदने की ख्वाहिश लाला महिपाल की थी , आखिर इस टुकड़े में क्या ख़ास बात थी , नहर नजदीक थी , सड़क नजदीक थी और महिपाल अपना रकबा बढ़ा सकता था . इस जमीन से हम दो फसल ही लेते थे बाजरा और सरसों या गेहू,
मैंने अनुमान लगाना शुरू किया और कुछ सोचा, मुझे वापिस आते आते शाम के चार पांच बज गए थे , जब मैं लौट रहा था तो रस्ते में मैंने देखा मेरी ताई अपने घर के बाहर ही खड़ी थी , न जाने क्या हुआ मुझे मैं साइकिल से उतर गया और पैदल ही गहर के सामने से गुजरने लगा . ताई ने मुझे देखा और आवाज दी, - देव, बेटे.
मेरी जिन्दगी में ये पहली बार था जब मेरे अपनों ने मुझे आवाज दी थी . मैं रुक गया
“जी, ताईजी ”
ताई- कैसा है मेरा बेटा
मैं- जी ठीक हूँ
ताई- वहां क्यों खड़ा है अन्दर चल तेरा ही घर तो है बेटा
मैं- फिर कभी आऊंगा
ताई- तेरी झिझक समझती हूँ बेटा दोष हमारा ही अपने खून को , अपनी औलाद को आँखों के सामने परायो के जैसे पलता जो देखते रहे,
मैं- वो बात नहीं है ताईजी , मैं आता हु फिर कभी
ताई- तेरी दीदी की शादी है तुझे मालूम तो होगा ही ,आना है तुझे, आना ही क्या रस्मे, शादी के काम सँभालने है , कितने दिनों बाद परिवार में कोई शुभ दिन आ रहा है
मैं- जी बिलकुल, ये भी कोई कहने की बात है
मैंने कहा और अपना रास्ता पकड़ लिया. परिवार, जब भी कोई परिवार की बाते करता था मुझे बड़ी हंसी आती थी , घर आकर भी मेरे पास क्या था करने को , ये खाली चारदीवारी मेरा मजाक उडाती थी , हंसती थी मुझ पर , मेरी बदकिस्मती पर. और मैं हमेशा की तरह मन मसोस कर रह जाता था .
मेरे पास एक चाबी थी , मोना के पास एक तस्वीर थी , एक खोयी हुई हवेली की, उस हवेली और मेरी खुशियों में एक समानता तो थी दोनों ही खोयी हुई थी . मैंने एक कागज लिया और जो तस्वीर मैंने देखि थी वो बनाने लगा. वैसी तो नहीं बनी पर उस जैसी कह सकते है .
अब बस मुझे उस आदमी की तलाश करनी थी जो उस हवेली के बारे में जानता हो . चौपाल पर बैठे कुछ बुजुर्गो से मैंने पूछा पर कुछ ने आना कानी की कुछ ने गर्दन न में हिला दी. दरअसल ये हमेशा से ही था , गाँव के लोग मुझसे दूर ही रहते थे , बाबा ने भी कहा था की मैं लोगो से जुडु पर ये लोग मुझसे ऐसे भागते थे जैसे की मैं कोई संक्रमित जीव होऊ .
खैर मैं घर आया तो मैंने देखा सरोज काकी और करतार में किसी बात को लेकर बात हो रही थी .
मैं- क्या हुआ,
कट्टु- देखो न भाई , माँ हमेशा मुझे ही काम के लिए कहती रहती है
सरोज- तो छोटा कौन है , वो ही करेगा काम
मैं- क्या काम है ऐसा
सरोज- रामेशवर जी की लड़की की शादी है , कन्यादान के लिए कहा है इसे दे आने को पर ये जा नहीं रहा
कट्टु- भाई, रामेश्वर ने अपना मकान नहर पार खेतो में बनाया हुआ है अब तुम ही बताओ कौन जायेगा इतनी दूर, थोडा सा जीमने के लिए मैं तो न जाऊ इतनी दूर .
मैं- बस इतनी सी बात मैं चला जाता हूँ उसमे क्या है
कट्टु और सरोज दोनों ने ही घुर कर मेरी तरफ देखा .
मैं- क्या -
सरोज- आजतक किसी के यहाँ तुम गए भी हो
मैं तो आज चला जाता हूँ उसमे क्या है . करतार मेरे नए कपडे निकाल ला. जरा.
नए कपडे पहन के मैं रामेश्वर की लड़की की शादी में जा पहुंचा, सर्दियों की रात में शादी होना भी बड़ा गजब होता है , मैंने सबसे पहले कन्यादान किया सरोज ने जो जेवर, साड़ी दी थी वो दी, खाना खाया इन सब में मुझे रात के तक़रीबन दस बज गए थे, किसी ने बताया की बारात दरवाजे पर आ पहुंची मैं देखने लगा. थोडा समय और गुजर गया . पर मुझे लौटना था तो मैं चल पड़ा बस नहर की पुलिया के पास पहुंचा तो मैंने देखा की ......................