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- Dec 5, 2013
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#29
मैंने मुड कर देखा . सामने शकुन्तला थी . दरअसल मैं हैरान हुआ उसे यहाँ देख कर
“तुम यहाँ सेठानी ”
सेठानी- क्यों, मैं यहाँ नहीं होसकती
मैं- बिलकुल , वो मैंने सोचा नहीं था की यहाँ तुमसे मुलाकात होगी
सेठानी- ये मुलाकाते भी बड़ी अजीब होती है, न जाने कब कहाँ किस से हो जाये. मैंने भी कहाँ सोचा था की तुमसे यहाँ मिलूंगी, खैर तुम कैसे यहाँ
मैं- दोस्त के साथ आया हूँ,
“आओ बैठते है मैं भी बोर हो रही हूँ, , कुछ लोगे तुम ” शकुन्तला ने पूछा
मैं- नहीं ठीक है . वैसे मैं तुमसे कुछ पुछू
सेठानी- जरुर
मैं- देखो मेरे पास एक सुझाव है , तुम मेरे कुछ सवालो के जवाब दो बदले में मैं तुम्हे वो जमीन दूंगा जिसकी तुम्हे चाहत है , जब तुम कहोगी
शकुन्तला ने बड़ी गहरी नजरो से देखा और बोली- मैं जानती हु, तुम अपने अतीत को शिद्दत से खोजना चाहते हो पर जितना मुझे मालूम है मैं बता चुकी हूँ . बेशक मुझे वो जमीन चाहिए पर अब मैं भी पक्की व्यापारी हूँ सौदा बराबरी का तो करू, और तुम्हारे अतीत की कीमत उस जमीन के टुकड़े से कही ज्यादा है ,
मैं- कोई तो होगा जो मेरी मदद कर सकता है ,
सेठानी- जानते हो गाँव वाले, तुम्हारे अपने घर वाले सब कतराते क्यों है तुमसे.
मैं- तुम बताओ
सेठानी- ये दुनिया तुम्हे एक श्राप समझती है गाँव में रक्त की नदी या तो उस दिन बही थी जब वो सर्प तुम्हे लेकर आया था या फिर अब , पुरे अठरह साल बाद. गाँव वाले एक बार फिर खौफ में है .
मैं- कैसा श्राप , खुल कर बताओ मुझे
शकुन्तला कुछ कहने ही वाली थी की जब्बर हमारी तरफ ही आ रहा था तो वो चुप हो गयी .
“सेठानी, तू यहाँ है बाउजी तुझे बुला रहे है , वो जो लोग आने थे आ गए है ” जब्बर ने कहा
शकुन्तला- छोटे चौधरी, मुझे जाना होगा.
शकुन्तला आगे बढ़ गयी जब्बर ने उसकी गांड को देख कर मेरी तरफ गन्दा सा इशारा किया , जी तो किया इसकी गांड तोड़ दू पर दुसरो के घर तमाशा करना मेरी आदत नहीं थी . कुछ देर बाद मोना मेरे पास आई
“थोड़ी देर लग रही तुम्हे तो पता है की शादियों में कई लोगो से मिलना होता है , खाना मंगा लू ” उसने कहा
मैं- थोड़ी देर में ,
मोना- जानती हूँ मन नहीं लग रहा होगा तुम्हारा यहाँ , किसी को जानते जो नहीं
मैं- किसी को जानना चाहता हूँ , अगर वो चाहे तो
मैंने मोना की आँखों में देखते हुए कहा
“मुझे जानने के लिए पहले तुम्हे खुद को जानना होगा, तुम और मैं एक से ही है एक को जान लिया तो दूजे को भी पहचान लिया. ” उसने कहा
“वैसे इस शानदार माहौल में एक पेग लिया जाये , क्या कहते हो ” मोना ने मुझसे पूछा
मैंने हाँ में सर हिला दिया .
सर्दी की इस कम्प्कम्प्ती रात में जो ये कडवी दावा जिस्म में जा रही थी , अन्दर दारू की गर्मी की बात ही अलग थी .
“तुम्हारे साथ होती हूँ तो बड़ा अच्छा लगता है , जब तुम हाथ थामते हो तो लगता है की इस जहाँ में मेरा कोई अपना है ” मोना ने कहा
मैं- तुम भी तो मेरी अपनी ही हो .
मैं बेशक बाते मोना से कर रहा था पर न जाने मेरी निगाहों को किसकी तलाश थी . बार बार आँखे इधर उधर देख रही थी .
“ऐसा लगता है जैसे तुम्हारी दिलचस्पी मेरे अलावा भी किसी और में है किसे तलाश रही है ये गुस्ताख आँखे ” मोना ने पूछा
“आँखे है कब गुस्ताखी कर जाये, इनकी मर्जी है , मैं तो मुसाफिर हूँ , ये आँखे बस सफ़र देखती है ” मैंने कहा
मोना- मंजिल पास ही है , सोचो जरा, मैं थोड़ी देर में आती हूँ फिर खाना खायेंगे
मोना वापिस से मंडप की तरफ चली गयी . बीच में मुझे एक दो बार शकुन्तला और सतनाम दिखे , वो लोग किसी अलग ही उदेधबुन में थे , जैसे शादी से उन्हें कोई सरोकार ही नहीं था . मुझे भी बैठे बैठे कोफ़्त होने लगी थी ऊपर से दारू का सुरूर , इस सर्द रात में मेरी तन्हाई मुझ पर हावी होने लगी , मुझे किसी अपने की तलाश थी , हसरत थी जिसकी बाँहों में मैं खुद को पा सकू,
मेरा दिल बड़ी तेजी से धडक रहा था , मैं इधर उधर घूम रहा था की मेरे कानो में पायल की आवाज आई, शादी के इस शोर में भी मैंने उस आवाज को बड़ा साफ़ सुना, जैसे ही दूसरी बार वो झंकार मेरे कानो में आई, दिल झूम उठा . होंठो पर एक ही नाम आया . रूपा.
मैंने इधर उधर देखा पर वो न दिखी, भीड़ से बचते हुए मैं मंडप की तरफ जा ही रहा था की मुझे वो दिखी जिसका दीदार करना मेरे लिए किसी इबादत से कम नहीं था . कोई चार पांच लडकियों से घिरी रूपा खिल खिला आर हंस रही थी .
और मैं बस उसे ही देखे जा रहा था बस उसे ही , आसपास अब क्या हो रहा था किसे खबर थी ,मैं कुछ कदम और आगे बढ़ा . दिल तो किया की उसे अपनी बाँहों में भर लू पर ऐसा खुले आम भी तो नहीं कर सकता था , इंतज़ार था बस कब उसकी नजर मुझ पर पड़े. और जल्दी ही वो लम्हा भी आया .
जब चेहरे पर घिरी जुल्फों को बड़े इतराते हुए हटा कर उसने मुझे देखा. हमारी नजरे आपस में मिली. मैंने उसके दिल को अपने सीने में धडकते महसूस किया. उसकी नजरे मुझ पर जम गयी थी , मैं जानता था उसे यकीन नहीं हो रहा था की मैं भी यहाँ पर हूँ . मैं उसकी तरफ बढ़ा पर उसने इशारे से मुझे रोका .
मैं वही रुक गया , उसने पास में रखी ट्रे उठाई और मेरे पास आई .
“पानी ”
मैंने गिलास उठाया .
“रूपा, ” मैंने इतना कहा की उसने टोक दिया .
“अभी कुछ मत कहो , मैं जल्दी ही मिलती हूँ बाट देखना , ”
मैंने वापिस गिलास रखा वो चली गयी . पर मेरा दिल साथ ले गयी . अब किसका दिल लगना था यहाँ किसे परवाह थी .करीब घंटे भर बाद एक लड़का मेरे पास आया और एक पर्ची मेरे हाथ में दे गया . मैंने खोल कर देखा ,, “टेंट के दाई तरफ मिलो ”
मैं जान गया ये रूपा ने भेजा था . मैं उधर से निकल गया . बाहर घुप्प अँधेरा था और तेज हवा चल रही थी . अब मुझे किस तरफ जाना था क्योंकि मेरे पास लालटेन नहीं थी और रूपा भी नहीं दिख रही थी पर मेरे दिलबर की भी अदाए बड़ी थी. मुझे पायल से इशारा कर रही थी वो . झंकार सुनते सुनते मैं शादी की जगह से काफी दूर चला आया था . और फिर मैं एक ऐसी जगह पहुंचा जहा रौशनी थी ,ये एक अजीब सी ईमारत थी जहाँ फर्श और चार खम्बे थे ऊपर कोई छत नहीं थी बीच में अलाव जल रहा था . और अलाव के पार वो खड़ी थी ...........
मैंने मुड कर देखा . सामने शकुन्तला थी . दरअसल मैं हैरान हुआ उसे यहाँ देख कर
“तुम यहाँ सेठानी ”
सेठानी- क्यों, मैं यहाँ नहीं होसकती
मैं- बिलकुल , वो मैंने सोचा नहीं था की यहाँ तुमसे मुलाकात होगी
सेठानी- ये मुलाकाते भी बड़ी अजीब होती है, न जाने कब कहाँ किस से हो जाये. मैंने भी कहाँ सोचा था की तुमसे यहाँ मिलूंगी, खैर तुम कैसे यहाँ
मैं- दोस्त के साथ आया हूँ,
“आओ बैठते है मैं भी बोर हो रही हूँ, , कुछ लोगे तुम ” शकुन्तला ने पूछा
मैं- नहीं ठीक है . वैसे मैं तुमसे कुछ पुछू
सेठानी- जरुर
मैं- देखो मेरे पास एक सुझाव है , तुम मेरे कुछ सवालो के जवाब दो बदले में मैं तुम्हे वो जमीन दूंगा जिसकी तुम्हे चाहत है , जब तुम कहोगी
शकुन्तला ने बड़ी गहरी नजरो से देखा और बोली- मैं जानती हु, तुम अपने अतीत को शिद्दत से खोजना चाहते हो पर जितना मुझे मालूम है मैं बता चुकी हूँ . बेशक मुझे वो जमीन चाहिए पर अब मैं भी पक्की व्यापारी हूँ सौदा बराबरी का तो करू, और तुम्हारे अतीत की कीमत उस जमीन के टुकड़े से कही ज्यादा है ,
मैं- कोई तो होगा जो मेरी मदद कर सकता है ,
सेठानी- जानते हो गाँव वाले, तुम्हारे अपने घर वाले सब कतराते क्यों है तुमसे.
मैं- तुम बताओ
सेठानी- ये दुनिया तुम्हे एक श्राप समझती है गाँव में रक्त की नदी या तो उस दिन बही थी जब वो सर्प तुम्हे लेकर आया था या फिर अब , पुरे अठरह साल बाद. गाँव वाले एक बार फिर खौफ में है .
मैं- कैसा श्राप , खुल कर बताओ मुझे
शकुन्तला कुछ कहने ही वाली थी की जब्बर हमारी तरफ ही आ रहा था तो वो चुप हो गयी .
“सेठानी, तू यहाँ है बाउजी तुझे बुला रहे है , वो जो लोग आने थे आ गए है ” जब्बर ने कहा
शकुन्तला- छोटे चौधरी, मुझे जाना होगा.
शकुन्तला आगे बढ़ गयी जब्बर ने उसकी गांड को देख कर मेरी तरफ गन्दा सा इशारा किया , जी तो किया इसकी गांड तोड़ दू पर दुसरो के घर तमाशा करना मेरी आदत नहीं थी . कुछ देर बाद मोना मेरे पास आई
“थोड़ी देर लग रही तुम्हे तो पता है की शादियों में कई लोगो से मिलना होता है , खाना मंगा लू ” उसने कहा
मैं- थोड़ी देर में ,
मोना- जानती हूँ मन नहीं लग रहा होगा तुम्हारा यहाँ , किसी को जानते जो नहीं
मैं- किसी को जानना चाहता हूँ , अगर वो चाहे तो
मैंने मोना की आँखों में देखते हुए कहा
“मुझे जानने के लिए पहले तुम्हे खुद को जानना होगा, तुम और मैं एक से ही है एक को जान लिया तो दूजे को भी पहचान लिया. ” उसने कहा
“वैसे इस शानदार माहौल में एक पेग लिया जाये , क्या कहते हो ” मोना ने मुझसे पूछा
मैंने हाँ में सर हिला दिया .
सर्दी की इस कम्प्कम्प्ती रात में जो ये कडवी दावा जिस्म में जा रही थी , अन्दर दारू की गर्मी की बात ही अलग थी .
“तुम्हारे साथ होती हूँ तो बड़ा अच्छा लगता है , जब तुम हाथ थामते हो तो लगता है की इस जहाँ में मेरा कोई अपना है ” मोना ने कहा
मैं- तुम भी तो मेरी अपनी ही हो .
मैं बेशक बाते मोना से कर रहा था पर न जाने मेरी निगाहों को किसकी तलाश थी . बार बार आँखे इधर उधर देख रही थी .
“ऐसा लगता है जैसे तुम्हारी दिलचस्पी मेरे अलावा भी किसी और में है किसे तलाश रही है ये गुस्ताख आँखे ” मोना ने पूछा
“आँखे है कब गुस्ताखी कर जाये, इनकी मर्जी है , मैं तो मुसाफिर हूँ , ये आँखे बस सफ़र देखती है ” मैंने कहा
मोना- मंजिल पास ही है , सोचो जरा, मैं थोड़ी देर में आती हूँ फिर खाना खायेंगे
मोना वापिस से मंडप की तरफ चली गयी . बीच में मुझे एक दो बार शकुन्तला और सतनाम दिखे , वो लोग किसी अलग ही उदेधबुन में थे , जैसे शादी से उन्हें कोई सरोकार ही नहीं था . मुझे भी बैठे बैठे कोफ़्त होने लगी थी ऊपर से दारू का सुरूर , इस सर्द रात में मेरी तन्हाई मुझ पर हावी होने लगी , मुझे किसी अपने की तलाश थी , हसरत थी जिसकी बाँहों में मैं खुद को पा सकू,
मेरा दिल बड़ी तेजी से धडक रहा था , मैं इधर उधर घूम रहा था की मेरे कानो में पायल की आवाज आई, शादी के इस शोर में भी मैंने उस आवाज को बड़ा साफ़ सुना, जैसे ही दूसरी बार वो झंकार मेरे कानो में आई, दिल झूम उठा . होंठो पर एक ही नाम आया . रूपा.
मैंने इधर उधर देखा पर वो न दिखी, भीड़ से बचते हुए मैं मंडप की तरफ जा ही रहा था की मुझे वो दिखी जिसका दीदार करना मेरे लिए किसी इबादत से कम नहीं था . कोई चार पांच लडकियों से घिरी रूपा खिल खिला आर हंस रही थी .
और मैं बस उसे ही देखे जा रहा था बस उसे ही , आसपास अब क्या हो रहा था किसे खबर थी ,मैं कुछ कदम और आगे बढ़ा . दिल तो किया की उसे अपनी बाँहों में भर लू पर ऐसा खुले आम भी तो नहीं कर सकता था , इंतज़ार था बस कब उसकी नजर मुझ पर पड़े. और जल्दी ही वो लम्हा भी आया .
जब चेहरे पर घिरी जुल्फों को बड़े इतराते हुए हटा कर उसने मुझे देखा. हमारी नजरे आपस में मिली. मैंने उसके दिल को अपने सीने में धडकते महसूस किया. उसकी नजरे मुझ पर जम गयी थी , मैं जानता था उसे यकीन नहीं हो रहा था की मैं भी यहाँ पर हूँ . मैं उसकी तरफ बढ़ा पर उसने इशारे से मुझे रोका .
मैं वही रुक गया , उसने पास में रखी ट्रे उठाई और मेरे पास आई .
“पानी ”
मैंने गिलास उठाया .
“रूपा, ” मैंने इतना कहा की उसने टोक दिया .
“अभी कुछ मत कहो , मैं जल्दी ही मिलती हूँ बाट देखना , ”
मैंने वापिस गिलास रखा वो चली गयी . पर मेरा दिल साथ ले गयी . अब किसका दिल लगना था यहाँ किसे परवाह थी .करीब घंटे भर बाद एक लड़का मेरे पास आया और एक पर्ची मेरे हाथ में दे गया . मैंने खोल कर देखा ,, “टेंट के दाई तरफ मिलो ”
मैं जान गया ये रूपा ने भेजा था . मैं उधर से निकल गया . बाहर घुप्प अँधेरा था और तेज हवा चल रही थी . अब मुझे किस तरफ जाना था क्योंकि मेरे पास लालटेन नहीं थी और रूपा भी नहीं दिख रही थी पर मेरे दिलबर की भी अदाए बड़ी थी. मुझे पायल से इशारा कर रही थी वो . झंकार सुनते सुनते मैं शादी की जगह से काफी दूर चला आया था . और फिर मैं एक ऐसी जगह पहुंचा जहा रौशनी थी ,ये एक अजीब सी ईमारत थी जहाँ फर्श और चार खम्बे थे ऊपर कोई छत नहीं थी बीच में अलाव जल रहा था . और अलाव के पार वो खड़ी थी ...........