Incest वो तो है अलबेला (incest + adultery) - Page 4 - SexBaba
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Incest वो तो है अलबेला (incest + adultery)

अपडेट 23

सुबह सुबह उठा कर अभय अपने बेड पर बैठा था। तभी एक आवाज उसके कानो में गूंजी...

"उठ गए बाबू साहेब ,गरमा गर्म चाय पी लो।"

अभय ने अपनी नज़रे उठाई तो पाया, रमिया अपने हाथों में चाय लिए खड़ी थी...

अभय हाथ बढ़ा कर चाय लेते हुए बोला...

अभय --"अरे तुम!! तुम कब आई??"

रमिया --"मैं तो कब से आई हूं, बाबू साहेब। आप सो रहे थे तो, जगाना मुनासिब नहीं समझा। ठीक है आप चाय पियो मैं खाना बनाने जा रही हूं।"

ये कहकर रमिया जैसे ही जाने के लिए मुड़ी...अभय की नजरें उसकी गोरी पतली कमर पर अटक गई...

खैर रमिया तो नही रुकी, पर जाते हुए उसके कूल्हे इस कदर थिरक रहे थे की, अभय की नजरें कुछ पल के लिए उस पर थम सी गई। जैसे ही रमिया अभय की आंखो से ओझल होती है। अभय अपना चाय पीने में व्यस्त हो जाता है....

अभय चाय पी ही रहा होता है की, उसके फोन की घंटी बजी...

फोन की स्क्रीन पर नजर डालते हुए पाया की उसे रेखा आंटी कॉल कर रही थी। रेखा का कॉल देखते ही, अभि अपने सिर पे एक चपेत मारते हुऐ....फोन को रिसीव करते हुए...

अभि --"गुड ...मॉर्निंग आंटी!!"

"आंटी के बच्चे, जाते ही भूल गया। कल रात से इतना फोन कर रही हूं तुझे, कहा था तू ? मुझे पता था, की तू मुझसे प्यार नही करता, इसलिए तू फो...."

अभि --"आ...आराम से, सांस तो ले लो आंटी।"

अभि, रेखा की बातों को बीच में ही काटते हुए बोला...

रेखा --"तुझे सांस की पड़ी है, जो तू लाके दिया है। इतना टाइट है की उसकी वजह से सांस भी नही लिया जा रहा है।"

रेखा की बात सुनते ही अभि के चेहरे पर एक मुस्कान सी फैल जाती है।

अभि --"अंदाजे से लाया था, मुझे क्या पता छोटी पड़ जायेगी।"

रेखा --"तो पूछ लेता, की कौन सी साइज लगती है मुझे?"

अभय --"तो फिर सरप्राइज़ कैसे होता...आंटी? वैसे जब छोटी है तो क्यों पहेना आपने?"

रेखा --"क्यूंकि...तूने जो लाया था। मैं भला कैसे नही पहनती?"

अभय --"ओहो...क्या बात है, कसम से दिल खुश हो गया। अभि सुबह उठते ही मेरा मूड खराब था। मगर अब मस्त हो गया। एक काम करो ना आंटी, पिक सेंड करो ना। मैं भी तो देखूं कितना टाइट है??"

रेखा --"क्या...कितना टाइट है??"

अभय --"मेरा मतलब की, कितनी छोटी है?"

कहते अभय मन ही मन मस्त हुए जा रहा था।

रेखा --"o... हो, देखो तो जरा। थोड़ी भी शर्म नही है इन जनाब को। मुझे तो पता ही नही था की तू इतना भी मस्तीखोर हो सकता है??"

अभि --"तो अब पता चल गया ना आंटी, सेंड करो ना प्लीज़।"

रेखा --"तू बेशर्म होगा, मैं नही। मैं नही करने वाली।"

अभि --"अरे करो ना...आंटी। आज तक किसी औरत को ब्रा...पैंटी में नही देखा।"

रेखा --"है भगवान, कहा से सीखा तू ये सब? ऐसा तो नहीं था मेरा अभि, गांव जाते ही हवा लग गई क्या...तुझे भी?"

अभय --"वो कहते है ना...जैसा देश वैसा भेष। पर आप छोड़ो वो सब , सच में मेरा बहुत मन कर रहा है, इसके लिए तो लाया था। अब पाहेनी हो तो फोटो क्लिक करो और सेंड कर दो ना।"

रेखा --"धत्, मुझे शर्म आती है, और वो भी तुझे कैसे सेंड कर सकती हूं? तुझे मैने कभी उस नजर से देखा नही, हमेशा तुझे अपने बेटे की नजर से ही देखा मैने।"

ये सुनकर अभि कुछ सोचते हुए बोला.....

अभि --"हां...तो मैने भी आपको एक मां की तरह ही माना है हमेशा, अब बच्चे को कुछ चाहिए होता है तो अपनी मां के पास ही जाता है ना। तो वैसे मुझे भी जो चाहिए था वो मैने अपनी मां से मांगा। पर शायद आप नाम की ही मां हो, क्योंकि अगर आप सच में मुझे अपना बेटा समझती, तो अब तक जो मैने बोला है वो आप कर देती।"

रेखा --"हो गया तेरा, मुझे मत पढ़ा। मुझे पता है, की तुझे बातों में कोई नही जीत सकता। और वो तो तू दूर है, नही तो आज तेरा कान ऐठ देती, अपनी मां को ब्रा पैंटी में देखते हुए तुझे शर्म नही आयेगी...

अभि --"नही आयेगी, कसम से उल्टा बहुत मजा आएगा। सेंड कर ना मां..."

आज अचानक ही अभय के मुंह से रेखा के लिए मां शब्द निकल गए। और जब तक अभय को ये एहसास हुआ...एक बार अपने सिर पे हल्के से चपेट लगाते हुए दांतो तले जीभ दबा लेता है, और शांत हो कर बस मुस्कुराए जा रहा था। दूसरी तरफ से रेखा भी शांत हो गई थी, अभय समझ गया था की, रेखा इस समय अत्यधिक भाऊक हो चुकी है। ये जान कर वो एक बार फिर बोला...

अभय --"अब अगर इमोशनल ड्रामा करना है तुझे तो, मैं फोन कट कर देता हूं..."

कहकर अभि फिर से मुस्कुराने लगा...

रेखा --"नही.... रुक। फोन कट करने की हिम्मत भी की ना?"

अभय --"तो क्या...?"

रेखा --"तो..तो..?"

अभय --"अरे क्या तो...तो?"

रेखा --"तो क्या? फिर से कर लूंगी और क्या कर सकती हूं।"

इस बात पर दोनो हंस पड़ते है...हंसते हुए रेखा अचानक से रोने लग जाति है। अभय समझ गया की की आखिर क्यूं...?

अभि --"अब तू इस तरह से रोएगी ना, तो मैं सब पढ़ाई लिखाई छोड़ कर तेरे पास आ जाऊंगा।"

अभय की बात सुनकर रेखा कुछ देर तक रोटी रही, फिर आवाज पर काबू पाते हुए बोली...

रेखा --"कान तरस गए थे, तेरे मुंह से मां सुनने के लिए। और उस मां शब्द में अपना पन तूने , मुझे तू बोल कर लगा दिया।"

अभि --"हो गया तेरा भी ड्रामा, आज मेरा कॉलेज का पहला दिन है, मुझे लगा अपनी का को ब्रा पैंटी में देख कर जाऊ, पर तू तो अपने आसू बहाब्रही हैं..."

ये सुनकर रेखा खिलखिला कर हस पड़ी....

रेखा --"शायद मैं तुझे भेज भी देती..., मगर अब जब तूने मुझे मां कह ही दिया है तो... सॉरी बेटा। मां से ऐसी गन्दी बात नही करते।

अभय --"ये तो वही बात हो गई की, खुद के पैर पर कुल्हाड़ी मारना। ठीक है मेरी मां, मैं भी देखता हूं की, मेरी मां कब तक अपना खज़ाना छुपाती है अपने बेटे से।"

रेखा --"मैं भी देखती हूं....।"

अभय --"अच्छा ठीक है अब, मैं नहाने जा रहा ही, आज पहला दिन है तो एक दम फ्रेश माइंड होना चाहिए।"

रेखा --"अच्छा ... सुन।"

अभय --"अब क्या हुआ...?"

रेखा --"I love you..."

ये सुन कर अभि एक बार फिर मुस्कुराया, और बोला...

अभि --"जरा धीरे मेरी प्यारी मां, कही गोबर ने सुन लिया तो। सब गुर गोबर हो जायेगा।"

रेखा --"ये मेरे सवाल का जवाब नही, चल अब जल्दी बोल,, मुझे भी काम करना है...।

अभि --"पहले फोटो फिर जवाब.... बाय मम्मी।"

इससे पहले की रेखा कुछ बोलती, अभि ने फोन कट कर दिया।

अभि मुस्कुराते हुए बेड पर से उठा, और बाथरूम की तरफ बढ़ चला.......

_____________________________

अमन डाइनिंग टेबल पर बैठा नाश्ता कर रहा था। उसके सामने निधि, उसकी मां ललिता, चाची मालती और ताई मां संध्या भी बैठे नाश्ता कर रहे थे।

अमन नाश्ता करते हुए, मलती की तरफ देखते हुए बोला...

अमन --"क्या बात है चाची, आज कल चाचा नही दिखाई देते। कहा रहते है वो?"

अमन की बात सुनकर, मलती भी अमन को घूरते हुए बोली...

मलती --"खुद ही ढूंढ ले, मुझसे क्यूं पूछ रहा है??"

मलती का जवाब सुनकर, अमन चुप हो गया । और अपना नाश्ता करने लगता है...

इस बीच संध्या अमन की तरफ ही देख रही थी, थोड़ी देर बाद ही संध्या ने अपनी चुप्पी तोडी...

संध्या --"अमन बेटा...आज कल मुझे तेरी शिकायत बहुत आ रही है। तू बेवजह ही किसी ना किसी से झगड़ा कर लेता है। ये गलत बात है बेटा। मैं नही चाहती की तू आगे से किसी से भी झगड़ा करे।"

संध्या की बात सुनकर, अमन मुस्कुराते हुए बोला...

अमन --"क्या ताई मां, आप भी ना। मैं भला क्यूं झगड़ा करने लगा किसी से, मैं वैसे भी छोटे लोगो के मुंह नही लगता।"

अमन का इतना कहें था की, मलती झट से बोल पड़ी...

मलती --"दीदी के कहने का मतलब है की, तेरा ये झगड़ा कही तुझ पर मुसीबत ना बन जाए इस लिए वो तुझे झगड़े से दूर रहने के लिए बोल रही है। जो तुझे होगा नही। तू किसी भी लड़के को इस पायल से बात करते हुए देखेगा तो उससे झगड़ पड़ेगा।"

पायल का नाम सुनते ही संध्या खाते खाते रुक जाती है, एक तरह से चौंक ही पड़ी थी...

संध्या --"पायल, पायल से क्या है इसका......

संध्या की बात सुन कर वहा बैठी निधि बोली...

निधी --"अरे ताई मां, आपको नही पता क्या? ये पायल का बहुत बड़ा आशिक है।"

ये सुन कर संध्या को एक अलग ही झटका लगा, उसके चेहरा फक्क् पड़ गया था। हकलाते हुए अपनी आवाज में कुछ तो बोली...

संध्या --"क्या...कब से??"

निधि --"बचपन से, आपको नही पता क्या? अरे ये तो अभय भैया को उसके साथ देख कर पगला जाता था। और जान बूझ कर अभय भैया से झगड़ा कर लेता था। अभय भैया इससे झगड़ा नही करना चाहते थे वो इसे नजर अंदाज भी करते थे, मगर ये तो पायल का दीवाना था। जबरदस्ती अभय भैया से लड़ पड़ता था।"

अब धरती फटने की बारी थी, मगर शायद आसमान फटा जिससे संध्या के कानो के परदे एक पल के लिए सुन हो गए थे। संध्या के हाथ से चम्मच छूटने ही वाला था की मलती ने उस चम्मच को पकड़ लिया और संध्या को झिंझोड़ते हुए बोली...

मालती --"क्या हुआ दीदी? कहा खो गई...?"

संध्या होश में आते ही...

संध्या --"ये अमन झगड़ा करता....?"

"अरे दीदी जो बीत गया सो बीत छोड़ो...l"

मालती ने संध्या की बात पूरी नही होने दी, मगर इस बार संध्या बौखलाई एक बार फिर से कुछ बोलना चाही...

संध्या --"नही...एक मिनट, झगड़ा तो अभय करता था ना अमन के...?"

"क्यूं गड़े मुर्दे उखाड़ रही हो दीदी, छोड़ो ना।"

मलती ने फिर संध्या की बात पूरी नही होने दी, इस बार संध्या को मलती के उपर बहुत गुस्सा आया, कह सकते हो की संध्या अपने दांत पीस कर रह गई...!

संध्या की हालत और गुस्से को देख कर ललिता माहौल को भांप लेती है, उसने अपनी बेटी निधि की तरफ देखते हुए गुस्से में कुछ बुदबुदाई। अपनी मां का गुस्सा देखकर निधि भी दर गई...

संध्या --"तू बीच में क्यूं टोक रही है मालती? तुझे दिखाता नही क्या? की मैं कुछ पूछ रही हूं?"

संध्या की बात सुनकर मालती इस बार खामोश हो गई...मलती को खामोश देख संध्या ने अपनी नज़रे एक बार फिर निधि पर घुमाई।

संध्या --"सच सच बता निधि। झगड़ा कौन करता था? अभय या अमन?"

संध्या की बात सुनकर निधि घबरा गई, वो कुछ बोलना तो चाहती थी मगर अपनी मां के दर से अपनी आवाज तक ना निकाल पाई।

"हां मैं ही करता था झगड़ा, तो क्या बचपन की बचकानी हरकत की सजा अब दोगी मुझे ताई मां?"

अमन वहा बैठा बेबाकी से बोल पड़ा..., इस बार धरती हिली थी शायद। इस लिए तो संध्या एक झटके में चेयर पर से उठते हुए...आश्चर्य के भाव अपने चेहरे पर ही नहीं बल्कि अपने शब्दो में भी उसी भाव को अर्जित करते हुए चिन्ह पड़ी...

संध्या--"क्या...? पर तू...तू तो काहेता था की, झगड़ा अभय करता था।"

अमन --"अब बचपन में हर बच्चा शरारत करने के बाद डांट ना पड़े पिटाई ना हो इसलिए क्या करता है, झूठ बोलता है, अपना किया दूसरे पे थोपता है। मैं भी बच्चा था तो मैं भी बचाने के लिए यही करता था। मना जो किया गलत किया, मगर अब इस समय अच्छा गलत का समझ कहा था मुझे ताई मां?"

संध्या को झटके पे झटके लग रहे थे, सवाल था की अगर इसी तरह से झटका उसे लगता रहा तो उसे हार्ट अटैक ना आ जाए। जिस तरह से वो सांसे लेते हुए अपने दिल पर हाथ रख कर चेयर पर बैठी थी, ऐसा लग रहा था मानो ये पहला हार्ट अटैक तो नही आ गया.....

संध्या के आंखो के सामने आज उजाले की किरणे पद रही थी मगर उसे इस उजाले की रौशनी में उसकी खुद की आंखे खुली तो चुंधिया सी गई...

शायद उसकी आंखो को इतने उजाले में देखने की आदत नही थी, पर कहते है ना, जब सच की रौशनी चमकती है तो अक्सर अंधेरे में रहने वाले की आंखे इसी तरह चौंधिया जाति है....
 
अपडेट 24

संध्या की हालत और स्थिति कुछ ऐसी थी की मानो काटो तो खून नहीं। दिल में रह रह कर दर्द उठते मगर वो रोने और पछताने के अलावा कुछ भी नही कर सकती थी। आज जब उसे संभालने के लिए ललिता और मालती के हाथ उसकी तरफ बढ़े तो उसने उन दोनो का हाथ दिखाते हुए रोक दिया।

संध्या का दिल पहली बार इस तरह धड़क रहा था मानो बची हुई जिंदगी की धड़कन इस पल ही पूरी हो जायेगी। नम हो चुकी आंखो में दर्द का वो अश्क लिए एक नजर वो अमन की तरफ देखी....

अमन की नज़रे भी जैसे ही संध्या से मिली, वो अपनी आंखे चुराते हुए बोला.....

अमन --"सॉरी ताई मां, उस समय सही और गलत की समझ नही थी मुझमें।"

अमन का ये वाक्य पूरा होते ही.....संध्या तड़प कर बोली।

संध्या --"निधी.....तू भी। तुझे तो पता था ना सब, फिर तू मुझे क्यूं नही बताती थी? इसलिए की अमन तेरा सगा भाई था?"

संध्या की बात पर निधि भी कुछ नही बोलती, और अपना सिर नीचे झुका लेती है......।

ये देख कर संध्या झल्ला पड़ी। और एक गहरी सांस लेते हुए बोली...

संध्या --"मेरा बच्चा, चुपचाप हर चीज सहता रहा। मुझे सफाई भी देता रहा। मगर मेरी मत मारी गई थी ना, जो उसकी एक न सुनी और तुझे सच्चा और अच्छा समझ कर उसको पिटती रही। तू काहेता है ना की तू छोटे लोगो के मुंह नही लगता। तो अब से तू पायल के आस पास भी नजर आया, तो अभि तक तूने मेरा प्यार ही देखा है, नफरत भी बहुत जल्द ही देखेगा।"

संध्या की ये बात सुनकर अमन के होश उड़ गए, वो चेयर पर से उठते हुए बोला...

अमन --"ये आप क्या बोल रही है ताई मां। मैं पायल को नही छोड़ सकता। मैं उससे बचपन से बहुत प्यार करता हूं, और मेरे प्यार के बीच में कोई आया ना तो मै...."

अभि अमन ने अपना वाक्य पूरा बोला भी नही था की, उसके चेहरे पर एक जोरदार तमाचा पड़ा।

"नालायक, शर्म नही आती तुझे? जिस इंसान ने तुझे इतना प्यार दिया उसी के बारे में ऐसा बोल रहा है।"

अमन का गाल लाल हो चुका था। अपने एक गाल पर हाथ रखे जब अमन ने अपनी नज़रे उठाई तो पाया की उसे थप्पड़ मरने वाला कोई और नहीं बल्कि खुद उसका बाप रमन था। ये देख कर अमन बिना कुछ बोले, अपना बैग उठता है और वह से चल पड़ता है...

अमन के जाते ही, निधी भी वहा से चुप चाप निकल लेती है। अब वहा पे सिर्फ मालती, ललिता, रमन और संध्या ही बचे थे।

रमन --"अब तो खुश हो न भाभी तुम?"

रमन की बात सुनकर, संध्या रुवासी ही सही मगर थोड़ा मुस्कुरा कर बोली...

संध्या --"खुश, किस बात पे? अपने बच्चे को बेवजह पिटती रही मैं, इस बात पे? जिसे सीने से लगाकर रखना चाहिए था वो दुनिया की भीड़ में भूखा प्यासा भटकता रहा, उस बात पे? ना जाने कैसे उसने अपने दिल को समझाया होगा, उस बात पे?या उस बात पे ? की जब भी कभी उसे तकलीफ हुई होगी उसके होठों से मां शब्द भी निकलेंगे होगे या नहीं? और तू एक थप्पड़ मार कर पूछता है की खुश हु की नही?पर आज खुश हूं मैं, की मेरा बेटा उस काबिल है की दुनिया की भीड़ में चलने के लिए उसे किसी के सहारे की जरूरत नहीं। क्या कहता था तू? ना जाने कौन है वो, जो इस हवेली को बर्बाद करने आया है। बात ठीक है तेरी, वो सिर्फ हवेली ही नही बल्कि ना जाने क्याबक्या बर्बाद करेगा? और पहेली शुरुआत हुई है मुझसे.....l"

ये कहते हुए संध्या वहां से चली जाती है......

_____________________________

कॉलेज के गेट पर बैठा अभय, पायल का रास्ता तक रहा था...

"अरे मेरा भाई, इतना बेचैन क्यूं हो रहा है? आ जायेगी भाभी?"

अजय अपने हाथ में सिगरेट लिए उसकानेक कश लेते हुए बोला...

अभय --"ये बेचैनी यूं ही नहीं खत्म होगी अजय, जब तक मेरे यार का दीदार ना हो जाए।"

कहते हुए अभय सच में बेचैनी से कभी इधर तो कभी उधर चहल कदमी कर रहा था, ये देख कर अजय मुस्कुराते हुए बोला...

अजय --"यार भाई, सच बताऊं तो, क्या लग रही थी आज भाभी? कसम से !"

अजय की ये बात सुनकर, अभय का दिल धड़क कर रह गया, एक गहरी सांस लेते हुए वो बस पायल का इंतजार ही कर रहा था की, वो खूबसूरत सा चांद दिन के उजाले में अभय के सामने नजर आया,, जिसे देख कर अभय अपने दिल पर हाथ रख कर एक ठंडी सांस लेता है...

पायल अपनी सहेलियों के साथ कॉलेज की तरफ चली आ रही थी। उसकी खुली जुल्फें इस तरह से हवा में लहरा रही थी की एक पल के लिए मानो वो समय ही ठहर सा गया हो। जो लड़के जहा थे वही खड़े रह गए। सब की नजरे बस उस नाज़नीन पर अटक कर रह गई थी। उसके कान में बलिया इस तरह से झूल रहे थे मानो सावन के महीने में झूला। गोरे मासूम मुखड़े पर तो कोई ही ऐसा हो जिसका दिल ना घायल हो जाए और उस पर माथे पर चमकती एक छोटी सी बिंदी उसके पूरे रूप और यौवन रानी बना रही थी।

अभय का भी हाल कुछ वैसा ही था, जैसे और कॉलेज के लडको का। अभय की नजरे थी या फेविकोल का जोड़ , जो पायल के उपर ऐसी थमी की हटने का नाम ही नही ले रही थी।

पायल के पैरो में पायल की छनकार एक अजब सी खुमारी भर से रही थी, जो उसके चलने से छनक रहे थे...अभय पूरा दीवाना हो चुका था। और जब तक वो होश में आता, पायल उसके नजदीक आ पहुंची थी।

अभय के नजदीक आकर पायल रुक गई, अभय को इस तरह अपनी तरफ देखता देख, पायल अजय से बोली...

पायल --"जरा संभल के, पागलों के साथ रह कर तू भी पागल मत हो जाना।"

पायल की आवाज अभय को उसकी खूबसूरती की दुनिया से जमीन पर लाकर पटक देती है, और ये कह कर पायल जैसे ही आगे जाने के लिए बढ़ी थी...

अभय --"अब इस कदर कयामत हम पर बरसेगी, तो पागलपन क्या कही जान ही ना निकल जाए।"

अभय की बात सुनकर, पायल अभय की तरफ पलटी तो नही, मगर हल्का सा अपना चेहरा घुमाते हुए बोली...

पायल --"इस कयामत का हकदार कोई और है, उम्र बीत जायेगी तुम्हारी, यूं राह तकते तकते...।"

ये कह कर पायल हल्के से मुस्कुराई और फिर आगे बढ़ी ही थी की,...

अभय --"अगर मैं कहूं, की वो हकदार मैं ही हूं तो?"

पायल इस बार फिर मुस्कुराई.....

पायल --"उसे पता है, मैं उसे कहा मिल सकती हूं।"

ये कह कर पायल आगे बढ़ जाती है...। अभय मुस्कुराते हुए अपने दिल पर हाथ रखा ही था की...एक जोरदार झटके के साथ वो नीचे जमीन पर गिर गया...

अभय के जमीन पर गिरते ही, पायल, अजय और बाकी सभी लोग हैरत से अपनी नज़रे घुमा कर देखते है तो। सामने अमन अपने हाथो में एक मोटा डंडा लेकर खड़ा था।

जल्द ही अभय खड़े होते हुए, अपने कपड़े पर लगे मिट्टी को अपने चेहरे पर एक एटीट्यूड के भाव के साथ पूछते हुए अपने शर्ट की बाहें मोड़ते हुए बोला...

अभय --"अच्छा था, मगर बुजदिलों वाला था। पीछे से नही आगे से मार।"

अभय की बेबाकी और निडरता देखकर, वहा खड़े सब लड़के आपस में काना फूसी करने लगे। मगर एक अकेली पायल ही थी जो वहा पर अभय जैसी ही चेहरे पर एटीट्यूड लिए खड़ी मुस्कुरा रही थी.....

"भाई ये वही छोकरा है, जिसने डिग्री कॉलेज का काम रुकवा दिया।"

अमन के साथ में खड़ा वो लड़का बोला...

उस लड़के की बात सुनकर, अमन भी अपनी हरामीगिरी दिखाते हुए बोला...

अमन --"तू नया है, शायद इसी लिए तुझे मेरे बारे में पता नही। वो जो लड़की तेरे पीछे खड़ी है, दुबारा उसके आस पास भी मत भटकना, ये तेरे लिए अखरी चेतावनी है।"

अमन की बात सुनकर, अभय मुस्कुराते हुए एक नजर पीछे मुड़ कर पायल की तरफ देखता है। और वापस अमन की तरफ देख कर बोला।

अभय --"डिलोग्रटो ऐसे मार रहा है, जैसे तंबाकू का एडवर्टाइज कर रहा है, चेतावनी...वार्निंग। इस लड़की के आस - पास की बात करता है तू।"

ये कह कर अभि, अमन की तरफ ही देखते हुए अपने पैर पीछे की तरफ उल्टे पांव पायल की तरफ चलते हुए...पायल के बराबर में आकर खड़ा हो जाता है...

सब लोग अभय को ही देख रहे थे, अजय ने भी अभय के बारे में जैसा सोचा था वैसा ही अभय के अंदर निडरता दिख रहा था। पायल की नजरे तो अभय पर ही टिकी थी। मगर बाकी कॉलेज के स्टूडेंट ये समझ गए थे की जरूर अब कुछ बुरा होने वाला है की तभी वो हुआ....जिस चीज का किसी को अंदाजा भी ना था.....!!!
 
Yaha par kuchh hamare aise bhi experienced log the jinke comments padh kar pahle lagta tha ki yaar sach me inke andar vo expeareanced jhalkata hai, story ki Neev, deevar aur chhat Kaya hoti sab samjhate hai but...

Flow flow me unka experience bhi overflow me ja raha hai,

Kahani mai likh raha hu ya aap sab, Sandhya aisi hai, Sandhya vaisi hai, yaha tv serial chal raha hai, story khinch rahi hai, dono ma bete chutiya hai....

Aam ke ped me fal laga ki nahi aap sab decide karne lag gaye ki ye wala aam jaldi pakega ye wala baad me...

Mujhe to lagta hai ki aap log yaha comments nahi iss story ka frustration nikaal rahe ho...

Koi kah raha hai poll karne se achhi story nahi banti., Aapko poll nahi karna chahiye tha.

Matlab kya hai? Agar iss web site pe poll ka options nahi hota to matlab 23 update ke baad mai story nahi likh pata,

Maine poll kya kar diya sab ke deemag me ye aa gaya ki mai poll ke hisaab se story likhunga...how can you say tha??

Sab log aaps me lad rahe hai comments ke jariye,

Maaf karna magar vaisa writer nahi hu jo apni kahani me sirf hero ko hi majboot dikhata hai,

Story likhane ke liye har ek character main hota hai sirf hero hi nahi,

Abhay ne kuchh nahi kiya abhi tak,, kya kare jaakar goli maar de sidha,

Story hai bolo to 5 update me khatm kar du happy ending and go to the next....

Sorry...if I heart someone's feelings
 
Karo yaar jisko jaisa comments karna hai Karo, but story ka futer mat decide Karo, jo cheej aap logo ne abhi tak padhi nahi us par dimaag mat lagao,

Kaun galat hai kaun sahi , ye kahani hi bata sakti hai,

Agar galat hai to kyu? Aisa hua to kyu? Ye kyu hi ek aisa shabd hai jispe kahaniya banti hai, aur us kyu ka jawaab bhi vo kahani hi de sakti hai,
 
अपडेट 24

लम्हा एक पल के लिए थम सा गया था, जब पायल ने अभय के गाल को चूम लिया.....

अभय भी उस पल ये भूल गया की उसके सामने अमन गुस्से में अपने हाथों डंडा लेकर खड़ा था। वही पर खड़े बाकी कॉलेज के लवंडे लापड़ी भी इस बात से हैरान थे। किसीको भी अपनी आंखो पर विश्वास नहीं हो रहा था, की जो उन सब ने अभि चांद लम्हे पहले देखा था क्या वो सच था या सपना?

क्योंकि पायल किस तरह की लड़की थी, ये उन सब से छुपा नहीं था। कभी न हंसने वाली वो लड़की, हमेशा खुद में उलझी सी रहने वाली वो लड़की आज कैसे एक अंजान लड़के के गालों पर अपने गुलाबी होठों का मोहर लगा सकती है? ये सवाल वाकई वहा खड़े सब के अंदर प्रश्न बन कर रह गया था।

ये तो बात थी वहा खड़े कॉलेज के सब विद्यार्थियों की, मगर अमन के दिल पर क्या गुजरी थी? ये तो अमन का चेहरा बखूबी बयां कर रहा था।

अमन गुस्से में झल्लाया अपने हाथ में वो डंडा लिए अभय की तरफ दौड़ा। मगर अभय तो उस खूबसूरत अहसास से बाहर ही नहीं निकला था अभि तक, अपनी नज़रे पायल के मासूम चेहरे पर अटकाए वो दीवाना ये भूल गया की उसके उपर वार करने अमन उसकी तरफ शताब्दी एक्सप्रेस की तरह बढ़ा आ रहा है।

पायल भी इस बात से बेखबर वो भी अभय की आंखो में खुद को भूल बैठी थी। मगर जैसे ही अमन पास पहुंचा और अपना डंडा हवा में उठाकर अभय को मरना चाहा, वहा पर खड़ा अजय किसी चीते की भाती झपट्टा मरते हुए, अभय को एक और धकेल देता है...जिसके वजह से हल्का धक्का पायल को लग जाता है और पायल अपना संतुलन खो बैठती है...और वो उस दिशा में गिराने लगती है जिस दिशा में अमन ने डंडा चलाया था...

अमन का जोरदार प्रहार पायल की हथेलियों पर पड़ा जिसकी वजह से पायल दर्द में चीखते हुए नीचे जमीन पर ढेर हो गई...

पायल अपना हाथ पकड़े दर्द में कराह रही थी, तभी जमीन पर गिरा अभय फुर्ती के साथ उठ खड़ा होता है और पायल की तरफ बढ़ा और उसे संभालते हुए उसकी हथेली को अपने हथेली में ले कर प्यार से सहलाते हुए अमन की तरफ गुस्से में देखता है...

अमन --"इसके साथ यही होना चाहिए था। साला बचपन से इसके पीछे घूम रहा हु, और तू कल का आया हराम का जना तेरे गाल पे चुम्मिया बरसा रही है..."

अब तक अमन बोल ही रहा था की, अभय गुस्से में खड़ा होते हुए...में की तरफ बढ़ा। अमन ने एक बार फिर डंडा हवा में उठाया लेकिन बहुत देर हो चुकी थी, अभय थोड़ा झुकाते हुए इतनी जोरदार से घूंसा उसके अमन के पेट में मारा की अमन दर्द में जोर से चिंखा और उसके हाथ से डंडा चूत गया, और दोनो हाथ से अपने पेट को पकड़ते हुए जमीन पर गिर गया और ऐसे दर्द से तड़प रहा था मानो अब मरा की तब...

अभय काफी गुस्से में था, उसे अमांबकी हालत की जरा भी परवाह नहीं, और तड़प रहे अमन पर अपने लात बरसाने लगा...

अमन खुद को अभय से बचाने की कोशिश करता लेकिन अभय लगातार अमन के ऊपर अपने लात बरसा रहा था...

अमन की इस तरह धुलाई होते देख सब का चेहरा फक्क् पद गया था, मगर तभी वहा मुनीम ना जाने कहा से पहुंच गया...

मुनीम के साथ 2 लट्ठेहेर भी थे। अमन को जमीन पड़ा कलाथता और ऊपर से अभय का जोरदार लात का बरसाना देख मुनीम, जीप में से उतरते हुए...

मुनीम --"हे छोकरे, रुक साला...।"

कहते हुए मुनीम अपने लठहेरे को इशारा करता है, वो दोनो लठ्ठहेरे अभय की तरफ अपना लाठी लिए दौड़े, ये देख कर अभय अमन की ओर से अपना रुख मोड़ लिया, और पास में पड़ा वो डंडा उठा कर इतनी जोर से फेक कर मारा की वोदांडा जाकर एक लट्ठेरे के मुंह पर लगा और वो वही ढेर हो गया, मगर दूसरा लट्ठबाज बिना उसकी परवाह किए अभय की तरफ अभि भी बढ़ा आ रहा था। मगर शायद अभय बहुत गुस्से में था, वो भी तेजी के साथ उसकी तरफ दौड़ा, और वही खड़ी एक लड़की के दुपट्टे को पकड़ते हुए अभय हवा हो गया...

वो लट्ठबाज जब तक कुछ समझता, अभय उसके सामने खड़ा था, और जैसे ही उसने अपनी लाठी अभय के ऊपर ताना तब तक अभय ने उस दुपट्टे को उस लट्ठबाज के गले की फांसी का फंदा बना दिया। अभय ने जोर लगाकर उसके गर्दन को उस दुपट्टे से कसा तो वो लठबाज भी छटपटाते हुए खुद को उस दुपट्टे को खुद को आजाद करने की कोशिश करने लगा...

मगर तभी अभय ने एक जोर का घूंसा उसके कनपटी दे मारा और देखते ही देखते वो आदमी धड़ाम से ज़मीन गिरते हुए बेहोश हो गया...

अब अभय ने मुनीम की तरफ मुंह फेरा, अभय का अक्रोश देखकर मुनीम की हवा खिसक गई, और अपना धोती पकड़े इतनी जोर से भगा मानो उसके पीछे मौत पड़ी हो...

मगर अभय के ऊपर शायद खून सवार था, जमीन पर पड़ी लाठी को हाथ में लिए अभय मुनीम के पीछे भागा...

ये देख कर कॉलेज का हर लड़का भी उसी तरफ भागा, मगर तभी अमन के साथ आए दो लड़के अमन की तरफ बढ़े और अमन को सहारा देकर उठते हुए जीप की तरफ ले जाने लगे,

अमन की हालत एकदम खराब थी, उसके शरीर में जरा भी दम ना था, शायद बेहोश हो गया था....

इधर मुनीम की गति शायद अभय की गति से तेज ना थी, और जल्दी ही अभय मुनीम के सामने आकर खड़ा हो गया...

अभय का गुस्सा देखकर, मुनीम डरते हुए बोला...

मुनीम --"अरे छोरे, मैने तेरा क्या बिगाड़ा है? मुझे छोड़ दे, जाने दे मुझे.....आह...आ..आ..आ..

अभय ने एक जोरदार लाठी मुनीम के पैर पर मारा, मुनीम की हालत और चिल्लाहाट देख कर ही पता चल रहा था की उसका पर टूट चुका है...

मुनीम जमीन पर पड़ा चटपटा रहा था, अभय उसकी बराबर में आकर बैठते हुए बोला...

अभय --"कुछ नही किया है, इसी लिए तो एक पैर तोड़ा है। जितनी बार तू मुझे दिखेगा उतनी बार तेरे शरीर का एक एक पुर्जा इसी तरह तोडूंगा...."

कहते हुए अभय उठा, और पायल की तरफ भागा...

जब अभय पायल के पास पहुंचा तो, पायल वही बैठी अभय को देख कर मुस्कुरा रही थी...

अभय झट से पायल के पास पहुंचा, और परेशान होते हुए उसका हाथ अपने हाथ में लेकर देखते हुए...

अभय --"तू पागल हो गई है क्या, अगर हाथ की जगह कही और लग जाता तो...?"

अभय की की घबराहट देखकर, पायल ने इस बार अभय का हाथ पकड़ा और उसकी एक उंगली को पकड़ते हुए चूम लेती है...

अभय को सारा मामला समझ आ जाता है......

अभय समझ गया की, पायल ने ऐसा क्यूं किया...?

पायल की आंखे भीग चुकी थी...अभय की तरफ नाम आंखो से देखते हुए बोली...

पायल --"बहुत समय लगा दिया, मैं तो पूरी तरह से पागल हो गई थी। हर पल हर घड़ी बस तुम्हे ही याद करती थी। और जब आज तुम आए तो....?मुझसे छुपने की क्या जरूरत थी? मेरी हालत का जरा सा भी अंदाजा है क्या तुम्हे...?"

पायल की बेचैनी देख कर अभय को कुछ समझ नहीं आ रहा था की वो पायल को क्या सफाई दे? अभय बिना कुछ बोले पायल को अपनी बाहों में भर लेता है...। पायल भी इस तरह से अभय से सिमट जाती है मानो आज उसे कोई सुरक्षित जगह मिली हो....

अभय --"हाथ की उंगलियों पर उन 5 तिल को देखकर तुमने मुझे पहेचान लिया, और मैं यह हैरान था की तुम किसी और को कैसे....?

पायल ने अपना हाथ अभय के मुंह पे रखते हुए बोली...

पायल --"तुम्हे पहचानने के लिए मुझे किसी चिन्ह की जरूरत नहीं, पर तुम्हे यकीन दिलाने के लिए मैने वो तिल तुम्हे दिखाया। कहा चले गए थे तुम? गांव के लोग कहते थे की अब तुम कभी नहीं आओगे...?"

अभय ने अपने दोनो हाथो से पायल के कमल के समान गोरे मुखड़े को अपनी हथेलियों में भरते हुए बोला...

अभय --"कैसे नही आता, मेरा दिल तुम्हारे पास है?"

तभी वहा अजय आ जाता है....

अजय --"अरे प्रेमी प्रेमिकाओं, वो अमन कही मर मारा तो नही गया। उपर से मुनीम की टांगे भी तोड़ दी है, कसम से बता रहा हु अभय, तेरा चाचा पागल हो जायेगा ये सब देख के....

अभय --"पागल करने ही तो आया हूं.....।"

_____________________________

इधर हवेली में जीप जैसे ही प्रवेश होती है। अमन के दोनो दोस्त उसे सहारा देते हुए जीप से उतारते हुए हवेली के अंदर ले आते है, जहा हॉल में सब बैठे थे। सब से पहले नजर ललिता की पड़ती है....

"हाय री मेरा बच्चा....क्या हुआ इसे??"

कहते वो भागते हुए अमन के पास आ जाति है और रोते हुए अमन को सहारा देते हुए सोफे पर लिटा देती है, संध्या मलती, भी घबरा जाति है....

संध्या तो झपटते हुए बिना देरी के अमन के पास आकर बैठते हुए...

संध्या--"क....क्या हुआ इसे? कोई डॉक्टर को बुलाओ?"

ये सुनकर मालती भागते हुए, अपने टेलीफोन की तरफ बढ़ी।

सब के चेहरे के रंग उड़ गए थे। ललिता और संध्या अब बहुत ज्यादा घबरा गए थे, कही न कही संध्या सबसे ज्यादा अमन को प्यार करती थी बचपन से तो प्यार उमड़ने में देरी नही लगी। और जल्द ही रोने लगी...

संध्या अमन के चेहरे को सहलाते हुए गुस्से में बोली....

संध्या --"मैने पूछा क्या हुआ इसे?"

संध्या की गुस्से से भरी आवाज सुनकर वो दोनो लड़के सहम से गई....

"वो...वो ठाकुराइन, कॉलेज के एक लड़के ने बहुत मारा...."

वो लड़का सहमे से आवाज में बोला...

संध्या गुस्से में तिलमिला कर बोली.....

संध्या --"कॉलेज के लड़के ने?? इतनी हिम्मत। चल मेरे साथ, तुम लोग डॉक्टर को बुलाओ जल्दी.....मैं उस छोकरे की खबर ले कर आती हूं।"

कहते हुए संध्या बहुत ही गुस्से में उन लड़कों के साथ हवेली से चल देती है...

शायद संध्या इस बात से बेखबर थी की जिस लड़के की वो खबर लेने जा रही है, वो कोई और नहीं उसका खुद का बेटा ही है....
 
अपडेट 26

संध्या की आँखों में गुस्से का लावा फूट रहा था। उन दोनो लड़को के सांथ वो कार में बैठ कर कॉलेज़ की तरफ रुक्सद हो चूकी थी...

इधर कॉलेज़ में अभय का गुस्सा अभी भी शांत नही हो रहा था। पायल उसके सीने से चीपकी उसको प्यार से सहलाते हुए बोली...

पायल --"शांत हो जाओ ना प्लीज़। गुस्सा अच्छा नही लगता तुम्हारे उपर।"

पायल की बात सुनकर अभय थोड़ा मुस्कुरा पड़ता है, जीसे देख कर पायल का चेहरा भी खील उठा...

पायल --"ये सही है।"

अभय --"हो गया तुम्हारा, चलो अब डॉक्टर के पास हाथ दीखा दो, कहीं ज्यादा चोट तो नही आयी।"

अभय की बात सुनकर पायल एक बार फीर उसके गाल को चुमते हुए बोली...

पायल --"कैसी चोट? मुझे कहीं लगा ही नही। उसका डंडा मेरे हांथ के कंगन पर लगा था। देखो वो टूट कर गीरा है।"

ये सुनकर अजय चौंकते हुए बोला...

अजय --"तो फीर तू...दर्द में कराह क्यूँ रही थी?"

पायल अपने मासूम से चेहरे पर भोले पन को लाते हुए बोली...

पायल --"मुझे क्या पता? मुझे लगा की, शायद मेरे हांथो पर ही चोट लगा है इसलिए..."

अजय --"बस कर देवी! तेरा ये नाटक उस मुनिम का पैर और अमन की पसली तुड़वा बैठा। मुझे तो डर है की, ठकुराईन और रमन क्या करने वाले है?"

अजय की बात सुनकर, अभय पायल को अपने से अलग करते हुए उसके माथे को चूमते हुए बोला...

अभय --"जाओ तुम क्लास में जाओ, मुझे अजय से कुछ बात करनी है।"

अभय की बात सुनकर, पायल एक बार फीर उससे लीपट कर बड़ी ही मासूमीयत से बोली...

पायल --"रहने दो ना थोड़ी देर, चली जाउगीं बाद में।"

अभय भी पायल को अपनी बाहों में कसते हुए बोला...

अभय --"अरे मेरी जान, मैं तो यहीं हूं तुम्हारे पास। क्लास मत मीस करो जाओ मैं हम आते हैं।"

पायल का जाने का मन तो नही था, पर फीर भी अभय के बोलने पर वो अपने सहेलीयों के सांथ क्लास के लिए चली गयी...

उन लोग के जाने के बाद, अभय और अजय दो कॉलेज़ गेट के बाहर ही बैठ गये। तब तक वहां पप्पू भी आ गया। उसके हांथ में पानी का बॉटल था जीसे वो अभय की तरफ बढ़ा देता है...

अभय पानी पीने के बाद थोड़ा खुद को हल्का महसूस करता है...

अभय --"सून अज़य, तुझे अपना वो पूराना खंडहर के पास वाला ज़मीन याद है?"

अजय --"हां भाई, लेकिन वो ज़मीन तो तारो से चारो तरफ घीरा है। और ऐसा कहा जाता है की, वो ज़मीन कुछ शापित है इसके लिए तुम्हारे दादा जी ने उस ज़मीन के चारो तरफ उचीं दीवाले उठवा दी और नुकीले तारो से घीरवा दीया था..."

अजय की बात सुनकर, अभय कुछ सोंचते हुए बोला...

अभय --"कुछ तो गड़बड़ है वहां। क्यूंकि जीस दीन मैं गाँव छोड़ कर जा रहा था। मैं उसी रास्ते से गुज़रा था, मुझे वहा कुछ अजीब सी रौशनी दीखी थी। तूफान था इसलिए मैं कुछ ध्यान नही दीया। और हां, मैने उस रात उस जंगल में भी कुछ लोगों का साया देखा था। जरुर कुछ हुआ था उस रात, वो बच्चे की लाश जीसे दीखा कर मुझे मरा हुआ साबित कीया मेरे चाचा ने। कुछ तो लफ़ड़ा है?"

अभय की बात बड़े ही गौर से सुन रहा अजय बोला...

अजय --"लफ़ड़ा ज़ायदाद का है भाई, तुम्हारे हरामी चाचा उसी के पीछे पड़े हैं।"

अभय --"नही अजय, लफ़ड़ा सीर्फ ज़ायदाद का नही, कुछ और भी है? और ये बात तभी पता चलेगी जब मुझे मेरे बाप की वो गुप्त चीजें मीलेगीं।"

अभय की बात सुनकर अजय असमंजस में पड़ गया...

अजय --"गुप्त चीजें!!"

अभय --"तू एक काम कर...."

इतना कहकर, अभय अजय को कुछ समझाने लगा की तभी वहां एक कार आकर रुकी...

अजय --"ये लो भाई, लाडले की माँ आ गयी।"

अभय पीछे मुड़ कर उस तरफ देखा भी नही और अजय से बोला...

अभय --"जाओ तुम लोग मै आता हूं। इससे भी नीपट लूं जरा।"

अभय की बात सुनकर, अजय और पप्पू दोने कॉलेज़ में जाने लगे...

कार में से वो दोनो लड़के और संध्या बाहर नीकलती है। संध्या का चेहरा अभी भी गुस्से से लाल था।

संध्या --"कौन है वो?"

उन दोनो लड़कों ने अभय की तरफ इशारा कीया....

अभय कॉलेज़ की तरफ मुह करके बैठा था। संध्या को उसका चेहरा नही दीखा क्यूकी अभय उसकी तरफ पीठ कीये था...

संध्या कीसी घायल शेरनी की तरह गुस्से में अभय के पास बढ़ी, पास आकर वो अभय के पीछ खड़ी होते हुए गुर्राते हुए बोली...

संध्या --"तेरी हीम्मत कैसे हुई मेरे बेटे पर हांथ उठाने की? तूझे पता भी है वो कौन है? वो इस कॉलेज़ का मालिक है जीसमे तू पढ़ रहा है। और तेरी इतनी हीम्मत की तू..."

संध्या बोल ही रही थी की, अचानक अभय उसकी तरफ जैसे ही मुड़ा, संध्या की जुबान ही लड़खड़ा गयी। संध्या कब शेरनी से बील्ली बनी समय को भी पता नही चला। गुस्से से लाल हुआ चेहरा काली अंधेरी रात की चादर ओढ़ ली थी।

अभय --"क्या बात है? इतना गुस्सा? पड़ी उसके पीछवाड़े पर है और दुख रहा तुम्हारा पीछवाड़ा है। आय लाईक दैट, ईसे ही तो दील में बसा कीसी के लीए प्यार कहते हैं। जो तेरे चेहरे पर उस हरामी का प्यार भर-भर के दीख रहा है। जो मेरे लिए आज तक कभी दीखा ही नही। खैर मैं भी कीससे उम्मिद कर रहा हूँ। जीसके सांथ मै सिर्फ नौ साल रहा। और वो १८ साल।"

अभय --"मेरे ९ साल तो तेरी नफ़रत मे बीत गये, तू आती थी पीटती थी और चली जाती थी, उस लाडले के पास। ओह सॉरी...अपने यार के लाडले के पास।"

ये शब्द सुनकर संध्या तुरंत पलटी और वहां से अपना मुह छुपाये जाने के लिए बढ़ी ही थी की...

अभय --"क्या हुआ? शर्म आ रही है? जो मुह छुपा कर भाग रही है?"

संध्या के मुह से एक शब्द ना नीकले, बस दूसरी तरफ मुह कीये अपने दील पर हांथ रखे खुद की कीस्मत को कोस रही थी...

अभय --"मुझे तब तकलीफ़ नही हुई थी जब तू मुझे मारती थी। पर आज़ हुई है, क्यूकीं आज तेरे चेहरे पर उसके लीए बेइंतहा प्यार दीखा है, जो मेरे लिए तेरे चेहरे पर आज भी वो प्यार का कत...कतरा...!"

कहते हुए अभय रोने लगता है...अभय की रोने की आवाज संध्या के कानो से होते हुए दील तक पहुंची तो उसका दील तड़प कर थम सा गया। छट से अभय की तरफ मुड़ी और पल भर में अभय को अपने सीने से लगा कर जोर जोर से रोते हुए बोली...

संध्या --"मत बोल मेरे बच्चे ऐसा। भगवान के लिए मत बोल। तेरे लीए कीतना प्यार है मेरे दील में मैं कैसे बताऊं तूझे? कैसे दीखाऊं तूझे?"

आज अभय भी ना जाने क्यूँ अपनी मां से लीपट कर रह गया। नम हो चूकी आँखे और सूर्ख आवाज़ मे बोला...

अभय --"क्यूँ तू मुझसे दूर हो गई? क्या तूझे मुझमे शैतान नज़र आता था?"

कहते हुए अभय एक झटके में संध्या से अलग हो जाता था। भाऊक हो चला अभय अब गुस्से की दीवार लाँघ रहा था। खुद को अभय से अलग पा कर संध्या एक बार फीर तड़प पड़ी। इसमें कोई शक नही था की, जब अभय संध्या के सीने से लग कर रोया तब संध्या का दील चाह रहा था की, अपना दील चीर कर वो अपने बेटे को कहीं छुपा ले। मगर शायद उसकी कीस्मत में पल भर का ही प्यार था। वो लम्हा वाकई अभय के उस दर्द को बयां कर गया। जीसे लीए वो बचपन से भटक रहा था...

अभय --"तू जा यहां से, इससे पहले की मै तेरा भी वही हाल करुं जो तेरे लाडले का कीया है, तू चली जा यहां से। तूझे देखता हूं तो ना जाने क्यूँ आज भी तेरी आंचल का छांव ढुंढने लगता हूं। यूं बार बार मेरे सामने आकर मुझे कमज़ोर मत कर तू। जा यहां से..."

संध्या के पास ऐसा कोई शब्द नही था जो वो बदले में बोल सके सीवाय बेबसी के आशूं। फीर भी हीम्मत करके बोल ही पड़ी...

संध्या --"माफ़ कर दे, बहुत प्यार करती हूँ तूझसे। एक मौका दे दे...?"

संध्या की बात सुनकर अभय हसंते हुए अपनी आखं से आशूं पोछते हुए बोला...

अभय --"दुनीया में ना जाने कीतने तरह के प्यार है, उन सब को मौका दीया जा सकता है। मगर एक माँ की ममता का प्यार ही एक ऐसा प्यार है जो अगर बेईमानी कर गया उसे मौका नही मीलता। क्यूंकी दील इज़ाजत ही नही देता। यक़ीन ही नही होता। कभी दर्द से जब रोता था तब तेरा आंचल ढुढता था वो मौका नही था क्या? तेरे आंचल के बदले उस लड़की के कंधे का दुपट्टा मेरी आशूं पोछ गये। भूख से पेट में तड़प उठी तो तेरे हांथ का नीवाला ढुढा क्या वो मौका नही था? उस लड़की ने अपना नीवाला खीलाया। कभी अंधेरे में डर लगा तो सीर्फ माँ बोला पर तू थी ही नही क्या वो मौका नही था? उस लड़की ने अंधेरे को ही रौशन कर दीया। मैं प्यार का भूखा हूं, और वो लड़की मुझसे बहुत प्यार करती है। अगर...मेरे...प्यार...को कीसी ने छेड़ा!! तो उसे मै ऐसा छेड़ुंगा...की शरीर की क्या औकात रुह भी दम तोड़ देगी उसकी। समझी...। अब जा कर अपने लाडले को अच्छे से समझा देना। की नज़र बदल ले, नही तो ज़िंदगी बदल दूंगा मैं उसका।"

और ये कहकर अभय वहां से जाने ही वाला था की एक बार फीर रुका, मगर पलटा नही...

अभय --"क्या कहा तूने? हीम्मत कैसे हुई मेरे बेटे को हांथ लगाने की? हांथों से नही लातो से मारा है उसको।"

कहते हुए अभय कॉलेज़ के अंदर चला जाता है। संध्या के लिए अब मेरे पास शब्द कम पड़ रहें हैं उसकी हालत बयां करने के लिए। हर बार उसकी किस्मत उससे ऐसा कुछ करा रही थी, जो उससे उसके बेटे को और दूर ले जाती। संध्या आज ना जाने कीस मोड़ पर खड़ी थी, ना तो उसके इस तरफ कुआँ था और ना ही उस तरफ खांई। थी तो बस तनहाई, बेटे से जुदाई....
 
अपडेट 27
अभी के जाते ही, संध्या ने अमन को अपनी कार से हॉस्पिटल की तरफ चल पड़ती है। उसकी हालत किसी बेबस - लाचार की तरह हो चुकी थी। वो आखिर करे भी तो क्या करे?

उसकी आंखों के सामने दो लोग थे जिसे वो दुनिया में सबसे ज्यादा प्यार करती थी। एक था अमन जो उसका खुद का बेटा तो नहीं मगर बेटे से कम भी नहीं था, जिसे वो बचपन से प्यार करती आई थी, खुद के बेटे से भी ज्यादा।

और दूसरी तरफ था, उसका खुद का बेटा, जिसे वो कभी भी अपनी का की ममता न दे सकी थी। बजाने अनजाने उसने अभी को सिर्फ दुख और तकलीफ ही आज तक देती आई थी।

कार हॉस्पिटल के सामने आ कर रुकी, अमन की हालत इतनी खराब थी कि, उसके मुंह से सिर्फ दर्द की कराह निकल रही थी। ये दर्द भरी कराह संध्या के दिल पर किसी बिजली की तरह गिर पड़ती थी, और ऐसा होना प्राकृतिक भी था क्योंकि बरसी से लेकर आज तक जितने प्यार से उसने अमन को पाला था, इस हालत में वो उसे कैसे देख सकती थी।

अमन को हॉस्पिटल में भर्ती करने के बाद वो हॉस्पिटल वार्ड के बाहर चेयर पर बैठते हुए खुद से बोली...

संध्या - "बस बहुत हो गया...मुझे मेरे बेटे को किसी न किसी तरह समझाना होगा। ये जो रास्ता वो चुन रहा है अपने साथ अन्याय होने का, ये रास्ता बिल्कुल गलत है। मार झगड़े से किसी भी चीज का हल नहीं निकलता।"

ये बात खुद से कहते हुए, उसने अपनी आंखों से आंसू को पोंछा और तभी उसे रमन की आवाज सुनाई पड़ी...

रमन - क्या हुआ भाभी...मेरे बेटे को?

रमन के आवाज में गुस्से की झलक थी, जिसे संध्या महसूस कर सकती थी।

संध्या - वो...कॉलेज में इसकी लड़ाई हो गई थी।

रमन - उसी लड़के के साथ न भाभी? जिसको आप अपना बेटा समझती है? इसीलिए आप चुपचाप बिना उसे कुछ बोले वहां से चली आई? मगर मैं चुप नहीं बैठूंगा भाभी, उस लड़के को तो मैं उसकी गलती की सजा जरूर दूंगा।

कहते हुए रमन जैसे अपने पैर मोड़ें....

संध्या - रुक जाओ रमन, जो कुछ भी हुआ अमन के साथ उससे मुझे भी तकलीफ हो रही है। और...और, अभी ने जो कुछ अमन के साथ किया वो भी गलत था। माना कि अमन को पायल के साथ इस तरह का बरताव नहीं करना चाहिए था और इस बरताव के लिए अभी को भी अमन को मारने की जरूरत नहीं थी। मगर इसमें अभी का कोई कुसूर नहीं है रमन, उसने जो भी किया वो उस लम्हे में वो गुस्से में था, और ये सब कुछ गुस्से में हो गया उससे।

रमन - अच्छा...कल को अगर उसने गुस्से में अमन की जान ले लेता तो भी आप यही कहती?

संध्या - शांत हो जाओ रमन, मै अभी से इसके बारे में बात करूंगी, और उसे समझाऊंगी।

रमन - क्या समझाएंगी आप? वो कल का छोकरा डिग्री कॉलेज बनने से रोक दिया, और आप उसकी बात मान कर डिग्री कॉलेज बंद कर दिया। और अब कहती हो कि आप उसे समझाओगे?

संध्या - डिग्री कॉलेज मैने उसके कहने पर बंद नहीं की रमन, बल्कि तुम्हारी बेईमानी और मक्कारी थी, जो तुमने गांव वालों के साथ किया, और जब सच्चाई सामने आई तब मैने वही किया जो होना चाहिए था।

रमन संध्या की बातों से गुस्से में और लाल हो रहा था, उसके हाथ पैर गुस्से में कांप रहे थे।

रमन - चलो मन मैने मक्कारी की गांव वालों के साथ, मगर मैने जो भी किया वो पिता जी का सपना पूरा करने के लिए किया। और इसमें गांव वालों का भी फायदा ही था, हां मानता हु कि उपजाऊ जमीन पर मुझे वो डिग्री कॉलेज बनने का हक नहीं था, मगर ये मेरी सिर्फ नासमझी और भूल थी।

संध्या - इसीलिए मैने तुम्हे कुछ नहीं बोला इस बात के लिए रमन, और इसी तरह अभी भी नासमझी में अमन पर हाथ उठा दिया और तुम्हे इस बात को भूल जाना चाहिए।

रमन कुछ बोलने ही वाला था कि, मुनीम ने उसे इशारे में रोक दिया। मुनीम का इशारा पाकर उस वक्त रमन अपने आप को शांत कर लेता है.....
 
Sabse pahle to Mai clear kar du ki.

Xforum par meri ek hi I'd hai jo aap log padh rahe ho.

Maine ek hi story likhi hai wo hai vo hai albela.

Iske alawa maine aur koi kahani nahi likhi. Shayad ye baat moderator ya admin confirm kar sakte hai IP address ke jariye.

Bahut time baad mai xforum par login hua hoon.

Mai ek hi story me itna doob jata hoon aur hamesha lagta hai ki shabd ya direction sahi nahi Jaa Raha hai, to dusri story shuru karne ki Mai sinch hi nahi sakta.

Mai wo writer nahi jo pahli kahani ko chhod kar dusari shuru kar doon.

Mai wo writer hoon jo story complete karne ke baad bhi us story me sirf yahi dekhata raheta hoon ki kya achha ho sakta tha.

Agar aap log ye kahani padhe hai Puri to app logo ne ek baat notice ki hogi ki Mai kabhi jyada reply nahi deta hoon. Na hi reviews ki maang karta hoon.

Ye Mera default behaviour hai. Iska matlab ye nahi ki Mai reviews nahi chahta. Bus iska matlab ye ki Mai apni story me kho jata hoon.
 
Ye un writer ko clear karna chahiye honestly ki wo hemantstar nahi hai, yani mai nahi hoon.

Agar kisi ne mere plot par banai hui kahani apna skill diya hai to ye bahut badi baat hai. Zaruri nahi ki original writer hi kahani ko achha likh sakta hai, achha writer wo nahi jo ek achha plot bana de, achha writer wo hota hai jo story ko Aisa bana de jise padh kar ek lagaae sa ho jaye.

I realy appreciate those writers who started to write the story on the same plot.

You should support them.

Aur agar aap sab chahte hai ki ek story ek hi jagah continue ho to mai us baat ka bhi respect karta hoon.

Agar aap log chahenge to Hi mai story continew karunga.

Kyunki Mai nahi chahta ki ek baar fir se aap sabka Dil toote.
 
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