Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में - Page 6 - SexBaba
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Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

मेरी अगली कहानी,

मज़े बनारस के,....

कुछ अंश

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आलमोस्ट खुला मैदान, कुछ पुराने पेड़ , और दो मकानों के बीच एक संकरी सी जगह थी , गली भी नहीं, बस हम दोनों का हाथ पकड़ के भाभी करीब करीब खींचते हुए उस दरार सी जगह से ले गयीं, करीब दो तीन सौ मीटर हम लोग ऐसे ही चले, फिर एक एकदम खुले मैदान में हम तीनों, कुछ भी नहीं था, बस कुछ टूटी दीवालें , ढेर सारे पेड़ थोड़े दूर दूर, और एक दो पेड़ों के नीचे कुछ साधू गांजे का दम लगाते, लेकिन एकदम अलग ढंग के, बहुत पुराने बाल जटा जूट से , भभूत लपेटे,... और जब वो चिलम खींचते तो आग की लपट ऊपर तक उठती,

भाभी ने हम दोनों को इशारे से बताया की हम उधर न देखें, और हम दोनों का हाथ पकडे पकडे, एक टूटी बहुत पुरानी दीवाल के सहारे, दीवाल में जगह जगह पेड़ उगे हुए थे, ईंटे गिर रही थीं

भाभी ने एक बार पीछे मुड़ कर देखा, तो सूरज बस अस्तांचल की ओर , एक पीले आग के गोले की तरह, आसमान एकदम साफ़,

हम दोनों भाभी का हाथ पकडे पकडे,... और जहाँ वो दीवाल ख़तम हो रही थी, कुछ बहुत पुराने खडंहर, बरगद के पाकुड़ के पेड़ , पेड़ों के खोटर , और जैसे ही हम खंडहर में घुसे,... ढेर सारे चमगादड़, ... उड़ गए, गुड्डो डर के मुझसे चिपक गयी.

लेकिन भाभी मेरा हाथ पकड़ के करीब खींचते हुए, गुड्डो मुझसे चिपकी दुबकी, आलमोस्ट अँधेरा और चमगादड़ों के फड़फाड़ने की जोर जोर आवाज, और उसी खंडहर की एक टूटी दीवार, और वो भी एक पेड़ की ओट में, दीवार में जैसे कोई ईंटों के ढहने से दो ढाई फीट का एक छेद सा बन गया था, नीचे दो ढाई फीट ईंटे थे उसके बाद वो टूटा हिस्सा, और उसके पीछे भी कोई बड़ा पेड़,

भाभी ने मुझे इशारा किया और गुड्डो को हाथ में उठा के आलमोस्ट कूद के उस टूटी जगह से मैं और पीछे पीछे भाभी,... गुड्डो मेरी गोद में चढ़ी दुबकी, कस के चिपकी,...

एक बार फिर भाभी ने मेरा हाथ पकड़ा और उस पेड़ के पीछे,.... अब जैसे हम किसी पुराने खंडहर के आंगन में पहुँच गए थे, एकदम सन्नाटा, शाम अब गहरा रही थी , और भाभी ने चारो ओर देखा, एक ओर उन्हे पीली सी रौशनी आती दिखी,... रौशनी कहीं दूर से आ रही थी झिलमिल झिलमिल,..

और एक सरसराती हुयी ठंडी हवा पता नहीं किधर से आ रही थी, चारो ओर एक चुप्पी सी छायी थी, बस वही हवा की सरसराहट सुनाई दे रही थी,

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गुड्डो का डर अब ख़तम हो चुका था, वो मेरे सामने खड़ी मुझे देख रही थी, मुस्कराते और अचानक उसने मुझे अपनी बांहों में दुबका लिया और उसके होंठ मेरे होंठों पर चिपक गए, मुझे भी एक अलग ढंग का अहसास हो रहा था अच्छा अच्छा , कोमल सा मीठा।

तभी मैंने देखा, भाभी आंगन के दूसरे किनारे से जहाँ से वो झिलमिल झिलमिल रोशनी आ रही थी, वहीं खड़ी इशारे से हम दोनों को बुला रही थीं,...

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वह पीली रोशनी एक ताखे में रखे बड़े से कडुवे तेल के दीये से आ रही थी और लग रहा था जैसे जमाने से इसी ताखे में वो दीया जल रहा हो. उसकी कालिख से पूरा ताखा काला हो गया था। और उस ताखे के बगल में एक खूब बड़ा सा पुराना दरवाजा बंद था, उसमें लेकिन कोई सांकल नहीं थी, एक चौड़ी सी चौखट और खूब ऊँची, फीट . डेढ़ फीट ऊँची, दरवाजे के चारो ओर लगता है लकड़ी के चौखटों पर किसी जमाने में चांदी का काम रहा होगा लेकिन अब सब धुंधला गया था।

दरवाजे के ऊपर कुछ मिथुन आकृतियां बनी थीं, और दरवाजे के दोनों ओर लगता है चांदी के रहे होंगे या चांदी मढ़े नाग नागिन का जोड़ा, ...
 
काम -काम्या, रम्या, प्रमदा

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काम का चरम रूप, स्त्री -पुरुष, देह मन मस्तिष्क तीनो का संगम और रस की पराकाष्ठा,...

मैं कुछ सायास सोच नहीं रहा था, गंगा की लहरें देखते हुए अपने आप मन में विचारों की, भावों की लहरे बह रही थीं,...

रस अन्त:करण की वह शक्ति है, जिसके कारण इन्द्रियाँ अपना कार्य करती हैं, मन कल्पना करता है, स्वप्न की स्मृति रहती है। रस आनंद रूप है । यही आनंद अन्य सभी अनुभवों का अतिक्रमण भी है।

कमनीया का एक कटाक्ष, सभी दृष्टि के सुखों से ऊपर होता है, बिना कहे सुख की कितनी पिचकारियां, उस कटाक्ष के साथ लजाने से छूट पड़ती हैं,... छेड़छाड़ की बातें, कभी आधी कही बातें. सब वाग सुखों का निचोड़ हो जाता है, और मिलन में तो सब रस एक साथ,... दृश्य का,वाग का, स्पर्श का, गंध का,...

पुजारी जी जैसे जैसे प्रसाद का पान करा रहे थे, ... सब कुछ भूल कर,...

जैसे शैवाल से भरा ताल भले ऊपर से जैसा लगे पर उसके नीचे प्यास बुझाने वाला निर्मल जल ,... नीति -अनीति, नाते रिश्ते भौतिक सम्बन्ध जैसे कटते जा रहे थे , जैसे काई हटती जा रही हो और अंदर का सुंदर स्वादिष्ट जल प्यास बुझाने के लिए ,...

कामना, उसको पूरा करने के लिए शक्ति और सबसे बढ़कर रस, छक कर रस पान,...

रमणी,... जिसके साथ रमण किया जाये, रम्या,... कामिनी, काम्या,... जिसकी कामना की जाये,... और स्त्री में ही पुरुष की पूर्ण आहुति होती है, वहीँ पुरुष स्थान पाता है ,

धात्री धरती बीज को धारण करती है और शष्य श्यामला धान्य से भर जाती है,

स्त्री यज्ञ की समिधा की तरह है , जिसमे पुरुष घृत की तरह,...

दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, और सृष्टि का निर्माण भले ही हो गया है , लेकिन यह काम की भावना ही चाहे पेड़ पौधे हों, अलग योनियों के जीव जंतु हो,उनकी वृद्धि के लिए जिम्मेदार है , और काम की पूर्ती के साथ जो स्त्री पुरुष दोनों को आनंद मिलता है, वह शब्दातीत है, लेकिन उस आनंद को देना और लेना दोनों ही, कर्म है,...

तभी तो उन्होंने कहा था,... ये तो कर्म है,...

और एक पल के लिए वो छवि उभरी,... वो कमनीया किशोरी मेरे ऊपर, और छलकता बिखरता मधु उसके ऊपर से ,... मेरे प्यासे होंठों को तृप्त करती,... काम्या के देह से निकला,बहा, छलका सब कुछ कमनीय है,... सब कुछ,... उन क्षणों की अनभूति ,जब सिर्फ रस बरस रहा हो, रस के सागर में डुबकी, देह तो बस सीढ़ी है उस आनंद के कूप में उतरने के लिए, सुख के पहाड़ों पर चढ़ने के लिए,

और शक्ति, ऊर्जा, सुख का स्रोत वही है , जो सृष्टि का स्त्रोत है, काम्या, रम्या, प्रमदा

जैसे गंगा की लहरों की तरह मेरे मन में विचार हिलोरे ले रहे थे थिर हुयी लहरों की तरह धीरे धीरे रुक गए. अबतक चाँद आसमान में अच्छी तरह से निकल आया था,, होली के अगले दिन का चाँद, कभी मैं छिटकी चांदनी को देखता कभी गंगा में चाँद की परछाईं को,

लेकिन फिर एक बात मन में उठी, अपनी कोई बात मैंने नहीं कही थी, लेकिन मेरे बिना कहे उन्होंने सुन भी लिया, समझ भी लिया और और मुझे आशीष भी, और उनके भी होंठ नहीं हिल रहे थे, लेकिन मैं साफ़ साफ़ सुन रहा था, जैसे आवाजों को देख रहा होऊं,...

मेरी अगली कहानी,

मज़े बनारस के,.... कुछ अंश
 
पश्यन्ती,

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एक बार फिर मन में वही उथल पुथल,... वाक् भले ही होंठो, जिह्वा तालू और कंठ के संयोजन से निकलता हो, समझी जाने वाली ध्वनियों, शब्दों का रूप लेता हो , अर्थ के साथ हम तक पहुंचता हो, लेकिन उपजता तो वह विचार के रूप में है , हमारे चैतन्य होने का प्रमाण भी है और सम्प्रेषण का साधन भी, ... और वह जन्म लेता है मूलाधार चक्र से, ध्वनि के चार रूप हैं , जो हम सुनते हैं , जिसके जरिये बातचीत करते हैं, वह है वैखरी, ध्वनि का भौतिक और सबसे स्थूल रूप, लेकिन जो विचार या चेतना के रूप में, सबसे बीज रूप में जब यह जन्म लेती है तो उसका रूप परा है, पर वह अति सूक्ष्म होती है , उसके बाद है पश्यन्ती। यदि यह जागृत है, शब्द रूप लेने से पहले ही हम उसे देख सकते हैं , और यह नाभि के स्तर पर जब विचार पहुंचता है उस समय, यानी क्या कहना है उसका मन में तो जन्म होगया पर अभी वह शब्दों का रूप अभी नहीं ले पाया है.

और शब्दों की एक सीमा है, वह विचारों को अभिव्यक्त तो करते हैं पर उसे सीमित भी करते हैं और कई बार अर्थ और विचार में अंतर् भी हो जाता है।

पश्यन्ति और वाक् के बीच मध्यमा का स्थान है, हृदय स्थल पर।

पश्यन्ती की स्थिति में शब्द और उसके अर्थ में कोई अंतर् नहीं होता और विचार का आशय, तत्वर और सहज होता है। इसमें क्या कहने योग्य है, क्या नैतिकता के आवरण में छिपा लें , ऐसा कुछ भी नहीं होता वह शुद्ध रूप में मन की बात होती है, यह वाक् स्फोट का एक सीधा साक्षात्कार होता है, जो कोई कहना चाहता है वह सब सुनाई पड़ता है। और उस स्तर तक विचारों में बुद्धि का हस्तक्षेप, सही गलत का अवरोध नहीं होता है , कामना सीधे सीधे अभिव्यक्त होती है,

और मैं भी उनकी बात सुन पा रहा था , इसका सीधा अर्थ है , ... पश्यन्ति का गुण उनके अंदर तो था ही,वाक् की इस स्थिति को सुनने, समझने की शक्ति उनके आशीष से मेरे अंदर भी बिन कहे सुनने की, सीधे मन से मेरे मन तक पुल बना के पहुंचने का रास्ता बन गया था।

दूर किसी घाट से गंगा आरती की हलकी हलकी आवाज गूँज रही थी, नाव नदी के बीचोबीच बस मध्धम गति से चल रही थी, रात हो चली थी इसलिए और कोई नाव भी आसपास नहीं दिख रही थी, हाँ किसी घाट पर जरूर कुछ कुछ लोग नज़र आ रहे थे, मंदिरों के शिखर, घंटो की आवाजें, चढ़ती हुयी रात के धुँधलके में दिख रहे थे. आज आसमान एकदम साफ़ था और चाँद भी पूरे जोबन पर,... कभी मैं आसमान में छिटके तारों को देखता कभी नदी में नहाती चांदनी को , मस्त फगुनहाटी बयार चल रही थी, हवा में फगुनाहट घुली थी, और मेरे मन तन पर भी, ...

मेरी अगली कहानी,

मज़े बनारस के,.... कुछ अंश
 
( भाग ६ )





रात भर ट्रेन में, सटासट,...

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( थोड़ा सा, फ्लैशबैक,... मैं नन्दोई और होली का दिन )

उसके जीजू ने एक हाथ से उसके गोरे मुलायम कस के दबाये , उसने गौरेया की तरह चोंच खोल दी ,... और उसके जीजू ने मेरी गाँड़ से निकला अपना लंड सीधे उसके मुंह में , लेकिन सिर्फ सुपाड़ा , ...

वो सर हिलाती रही , झटकती रही , अपनी आँखे बंद कर ली ,

लेकिन तबतक सीट का सहारा लेकर मैं भी बैठ गयी और अपनी दायीं कलाई में छुटकी की दोनों कलाइयों को मोड़ कर दबोच लिया , और दुसरे हाथ से उसके सर को पकड़ लिया ,

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" साली जी , अरे जरा आँख खोल के देख तो लीजिये न , ... " उसके जीजू ने कस के उसके निपुल मरोड़ते होये कहा , ... मारे दर्द के उसने आँखे खोल दी ,...

और अब जीजू का उसके , चिढ़ाना छेड़ना चालू हो गया ,

अरे स्साली जी आपके जीजू का इतना बुरा भी नहीं है की मेरी साली प्यार से उसे देख भी नहीं सके , ज़रा देखिये न कैसा रंग , ...

और सच में जिस तरह से घंटे भर हचक के मेरी उन्होंने ली थी , ...

मलाई कम थी , मक्खन ज्यादा लगा था मेरे पिछवाड़े का ,...

मैंने छुटकी के नथुने दबा दिए , ... और हड़काया प्यार से

" तुम्ही कहती जीजू ने दोनों बहनों में भेद किया , अरे मेरे एक छेद का मजा लिया तो थोड़ा सा ही तेरा छेद भी , जबतक नहीं चूसना शुरू करती मैं छोडूंगी नहीं ,

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और उनका मक्खन मलाई लगा लंड चूसना शुरू किया और ,

मुझे अपनी हालत दो दिन पहले की याद आ रही थी ,

होली के दिन वाली , मेरी ननद और नन्दोई ने मिल कर , ...

मैंने जम के नन्दोई के साथ होली खेली थी , कपडे उनके फाड़े ,

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उनके मोटे चर्म दंड में आठ दस कोट रंग तो लगाए होंगे और सब के सब एकदम पक्के वाले , .. पहले तो कड़ाही की कालिख रगड़ी उनके गोरे लिंग पर , ... फिर लाल , काही , बैंगनी , नीला , पेण्ट भी और हर बार ,... खूब गन्दी वाली गालियां भी

" नन्दोई जी अपने मायके जाके , मेरी ननद की ननद से आठ दस दिन चुसवाईयेगा तो ये रंग बदलेगा , और उनसे न हो तो ननद की सास से , ... हमने सूना है की वो जबरदस्त छिनार हैं पैदायशी रंडी ,... "

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लेकिन मौका पाते ही उन्होंने मुझे निहुरा दिया और पटक के पेल दिया मेरी गांड में ,...

मुझे मालूम था की मेरे पिछवाड़े के वो जबरस्दत रसिया हैं और होली में तो नन्दोई सलहज की ,...

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झड़ने के बाद उन्होंने निकाल कर मुझे दिखाया , ...

" क्यों कौन सा रंग लगाया था तूने ज़रा देख , अब पहले उस रंग का करो ,... "

मेरी नन्द तैयार थी पहले मेरे हाथ कस के पकडे फिर मेरी नाक दबा दी ,

" बिना मुंह खोले देखूं कैसे छिनार सांस लेती है अरे भौजी , नन्दोई से गाँड़ तो बहुत मजे ले ले कर मरवा रही थी , और अब चूसने में स्साली नौटंकी , चुसो भौजी कस कस के , ... "

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भाग ६ जारी

ननद, नन्दोई और ससुराल की होली

( बस दो दिन पहले )

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झड़ने के बाद उन्होंने निकाल कर मुझे दिखाया , ...

" क्यों कौन सा रंग लगाया था तूने ज़रा देख , अब पहले उस रंग का करो ,... "

मेरी नन्द तैयार थी पहले मेरे हाथ कस के पकडे फिर मेरी नाक दबा दी ,

" बिना मुंह खोले देखूं कैसे छिनार सांस लेती है अरे भौजी , नन्दोई से गाँड़ तो बहुत मजे ले ले कर मरवा रही थी , और अब चूसने में स्साली नौटंकी , चुसो भौजी कस कस के , ... "

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मुझे चूस चाट के नन्दोई का लंड साफ करना ही पड़ा ,

उसके बाद नन्दोई जी ने नन्द की गांड में ऊँगली पेल दी तो मुझे बहुत मजा आया

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मैं ननद रानी को चिढ़ाने लगी ,

" माना जिस छिनार को बचपन से कुत्ते और गदहे की आदत हो उसे ऊँगली से बहुत फरक नहीं पड़ता , लेकिन कुछ तो मजा आ ही रहा होगा ,... "

वो मुस्कराती रही और उनकी मुस्कराहट का राज थोड़ी देर बाद मेरी समझ में आया जब नन्दोई जी ने वो ननद जी के पिछवाड़े से ऊँगली निकाल के ,...

... सीधे मेरे मुंह में

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अकेली ननद से तो मैं निबट लेती लेकिन यहाँ दोनों ,... ननद ने कस के मेरा गाल दबा के मुंह खुलवा दिया और नन्दोई ने ऊँगली पूरी जड़ तक अंदर ,

" अरे भौजी तनी चूस लो कस कस के , अपने पिछवाड़े का स्वाद तो बहुत लिया होगा , जब जब गाँड़ मरवाया होगा तो अरे होली का मौका है जरा ननद का भी तो स्वाद ले लो ,... "

ननद पक्की छिनार, मेरी दुर्गत का खूब मज़ा ले रही थी, चिढ़ा रही थी...

ऊँगली निकालने के बाद भी ननद मुझे छेड़ती रही , फिर अचानक धक्का देकर मुझे पीठ के बल गिरा दिया , ... जबतक मैं सम्ह्लूं , नन्दोई जी जैसे पहले से तैयार थे , उन्होंने मेरे दोनों हाथ कस के पकड़ लिए , और मेरे नथुने दबोच लिए

ननद अब मेरे ऊपर और उनके पिछवाड़े का छेद सीधे मेरे मुंह से इंच भर ऊपर ,... जोर से उन्होंने मेरे निप्स पिंच कर लिए और मैं चीख उठी ,

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" अरे भौजी , ऊँगली से लगता है आपको स्वाद नहीं पता चला इसलिए मैंने सोचा थोड़ा सा , कम से कम चटनी चखा दूँ ,... हाँ अगर मुंह बंद करने की जरा भी कोशिश की न तो बस नाक भी बंद होगी और ,..."

एक बार पहले से भी कस अपने लम्बे नाखुनो से मेरे निप्स को नोच लिया ,...

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मैं पहले से भी ज्यादा जोर से चीखी और अब अपनी गाँड़ के छेद से मेरे खुले मुंह को उन्होंने सील कर दिया ,... उसके बाद तो बस ,... पूरे दस मिनट तक

और उसके बाद भी ननद ने सुबह मेरी सास ने जो ' पिलाया ' था उसका राज खोला

" मैं तो कह रही थी माँ से , अरे भाभी की पहली होली है , सीधे कुप्पी से , ... तो वो बोलीं रहने दे बिचक जायेगी ,... लेकिन मैंने बोला था मैं तो अपनी प्यारी भाभी को सीधे अपनी कुप्पी से ही , आखिर ननद भाभी का कोई रिश्ता होता है"

और सच में पूरा सुनहला सरबत , नन्दोई जी के सामने ही ,...ननद ने मुझे, अपनी गुलाबी झांट विहीन कुप्पी से

जब मैं इनके साथ अपने मायके आ रही थी तो गले मिलते समय , ननद ने मेरे कान में कहा

" भौजी बुरा मत मानियेगा , ... "

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" अरे होली में बुरा मानने की क्या बात " मैं बोली लेकिन उसके बाद जो ननद ने कहा तो मेरी तो ,...

वो बोली

" अरे आज तो आपको ठीक से चटनी भी नहीं चखा पायी , लौट के आइयेगा न तो सुबह से शाम तक ,... नाश्ता आपकी सास कराएंगी , दिन की जिम्मेदारी मेरी , ... रंग पंचमी भर तो ,... "

मैं यही सोच रही थी और देख रही थी अपनी छोटी बहन को ,

जीजू का सुपाड़ा चाट चाट के चिक्कन करने के बाद धीरे धीरे उसने बाकि मूसल भी और अब वो पहले के रंग में आ रहा था।

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मैं समझ रही थी , इनके मायके में ,... मुझसे ज्यादा तो रंग पंचमी में दुर्गत इस कच्ची कली की होगी ,... मेरी सास तो कच्ची अमिया की शौकीन और नन्द तो नंबरी , ... इसे देखकर ही ,...

जीजू साली को उस बर्थ पर छोड़कर मैं सामने वाली बर्थ पर बैठ गयी , खिड़की खुली हुयी थीं दोनों , बाहर ढलती हुयी रात दिख रही थी , दो तीन घण्टे का सफर और बाकी था।
 
चलती जाती ट्रेन, ढलती जाती रात

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जीजू साली को उस बर्थ पर छोड़कर मैं सामने वाली बर्थ पर बैठ गयी , खिड़की खुली हुयी थीं दोनों , बाहर ढलती हुयी रात दिख रही थी , दो तीन घण्टे का सफर और बाकी था।

हम तीनो में से न कोई सो रहा था , न कोई किसी को सोने देता।

कपडे हम सबके तो ,...

छुटकी की फ्राक तो डिब्बे में पहुँचते ही इन्होने जबरन उतार दी और वो ऊपर की बर्थ के कोने में पड़ी थी , मेरी साडी के नीचे दबी , छिपी

और वो ब्रा जिससे छुटकी के हाथ बांधे गए थे और छुटकी के काम रस में सराबोर छुटकी की चड्ढी , ... वो दोनों तो छुटकी ने अपने हाथ से उस चाय वाले को बख्शीश में दे दी थी ,

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मेरा ब्लाउज छुटकी ने खोला था और वो भी उसी ऊपर वाली बर्थ पर , हाँ पेटीकोट जिस बर्थ पर जीजा साली थे वहीँ सिकुड़ा मुकडा

और इन के कपडे हम दोनों बहनों के रहते कैसे बचते ,... अपनी टी शर्ट तो इन्होने उतार कर हुक पर खुद टांग दी थी लेकिन शार्ट मैंने और छुटकी ने मिल के उतार दी थी और वो डिब्बे के फर्श पर

लेकिन एक बर्थ पर मैं ओढ़ने वाली चादर ओढ़ कर , ... और सामने वाली बर्थ पर जीजा साली एक ही बर्थ पर एक ही चादर ओढ़े , और दोनों मिल के मुझे छेड़ रहे थे , ...

मैंने एक दो बार कहा भी की खिड़की बंद कर देते हैं पर वो मेरी छोटी बहन , अपने जीजा की साली , ... छप्पन छुरी , ... तुरंत वीटो लगा देती , ...

नहीं जीजू , इत्ती अच्छी हवा लग रही है , ... मत बंद करिये ,...

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और जैसे छोटे बच्चे जिद करते हैं न एकदम उसी तरह अपना सर खिड़की से लगाए , खिड़की के बाहर तेजी से भागते घर , पेड़ , बाग़ , गन्ने के खेत, बांसवाड़ी , देख रही थी। बाहर अंधेरा था चांदनी भी छिटक रही थी , बीच बीच में स्टेशन पड़ते जहाँ स्टेशन मास्टर बत्ती लिए , हरा सिग्नल दिखाते खड़े रहते , कभी एकाध चाय की दूकान , .... गाडी बिना रुके कभी धीमी होती कभी वो भी नहीं , ... छुटकी अगर कोई स्टेशन पर से हमारे डिब्बे की ओर देखता तो उसे शरारत से हाथ हिला देते ,

और कुछ बातों में तो एकदम बच्ची ही लगती थी वो , चेहरा उसका इतना भोला की लगता था जैसे अभी दूध के दांत भी न टूटे , अपनी उमर वालियों से भी दो साल छोटी लगती ,

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लेकिन

चेहरे से नीचे ही जहाँ किसी की निगाह पहुंचती जिसका वियाग्रा से भी न टनटनाये उसका फनफना जाता ,

उसके उभार, अपनी उमर वालियों से भी दो साल बड़ी लगती , और उसके ऊपर नए नए आ रहे जोबन , एकदम कड़े गोल गोल ,...

और वही हालत पिछवाड़े की थी , ब्वाइश लौंडों के चूतड़ जिनकी लेने के लिए लौण्डेबाज कुछ भी करने को उतारू रहते हैं एकदम उसी तरह के , बल्कि उनसे बीस ,

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पर सबसे खतरनाक चीज़ थी उसका एट्टीट्यूड , ...

मैं अपने को ही अपनी माँ की तीनो बेटियों में सबसे आगे समझती थी , लेकिन आज पहली बार उसकी नथ उतरी थी और आज ही मैं समझ गयी थी , ये मेरा भी नंबर डकायेगी , .. सेक्स में मजा लेने में ,... सेक्स तो सभी लड़कीया करती हैं , ... मिश्राइन भाभी ने सबसे पहले ये बात मुझे समझायी थी , अरे औरत का जनम लिए हो , बुर है तो चुदेगी ही , कुछ शादी के बाद चुदती हैं ( मैं उसी कैटगरी की थी ) और कुछ शादी के पहले लेकिन चुदती सभी हैं , तो फिर इतना क्या नखड़ेबाजी ,... हाँ असली वो है जो इसका मजा लेना भी जाने और देना भी जाने ,... थोड़ा बहुत नखड़ा , अदा अंदाज , मान ठीक है लेकिन मज़ा तो लड़कियों को भी मिलता है तो मुंह बनाने से क्या फायदा ,... और छुटकी भी एकदम उसी तरह की थी

और कहते हैं न की करैला और वो भी नीम चढ़ा , ... एक तो वो खुद ,... और ऊपर से इनका , उसके जीजू का साथ मिल गया ,...

अभी भी जीजू साली में कुछ खुसफुस चल रही थी

और उसके जीजू ने उसे चिढ़ाया , देख तेरी दीदी चादर के अंदर ऊँगली कर रही हैं ,

बात उनकी एकदम गलत थी ,... मेरी हथेली जरूर चुनमुनिया पर टहल रही थी , सहला रही थी पर ऊँगली अभी भी बाहर थी ,...

और वो बोल रही थी , ऐसा कुछ नहीं है , दीदी ऊँगली नहीं कर रही है

उसके जीजू ने उसे चढ़ाया , तो अपने दी को बोल ने खोल के दिखाएँ , ...

और साली ने बोल ही दिया मुझसे

" दी चादर एक बार हटा दिखा दो न , मैं भी जीजू को बता दूँ ,... "
 
दो बहनें -ऊँगली का खेल

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और साली ने बोल ही दिया मुझसे

" दी चादर एक बार हटा दिखा दो न , मैं भी जीजू को बता दूँ ,... "

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मेरी हंसी छूट गयी , उसकी भाभियों ने बहुत ट्रेन किया था , चलने के पहले भी मिश्राइन भाभी और रीतू भाभी ने बहुत कोचिंग की था कहा भी था अपने जीजू के मायके में हम लोगों की नाक मत कटवाना , पर अभी भी उसमें थोड़ी झिझक बाकी थी ,

मैंने कस के चिढ़ाया

" क्या खोल के दिखा दूँ ये तो बोल ,... " और जोर से हंसने लगी ,

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उसके जीजू ने उसे तरेर कर देखा जैसे जीजा साली का प्लान साली की गलती से फेल हो गया हो , पर उनकी साली इतनी कमजोर नहीं थी , अबकी खुल के बोली

" अपनी ,... अपनी ,... चूत "

जवाब मैंने उनको दिया ,

" लेकिन आपकी साली को भी अपनी चूत दिखानी पड़ेगी , ऐसा नहीं है की चादर के अंदर जीजा साली कबड्डी खेल रहे हों ,"

" एकदम " वो बोले

और जहाँ मैंने चादर हटाई सिर्फ अपनी जाँघों पर से और ' वहां ' से , उन्होंने भी अपनी साली के ऊपर से चादर हटा दिया ,

उनकी हथेली साली की चुनमुनिया पर थी , और उन्होंने हलके से उसे भी हटा लिया , लेकिन जीजू साली की असली प्लानिंग कुछ और थी , ...

और अबकी ये बोले ,

" हे जरा ऊँगली कर के ,... "

मैं उनकी बदमाशी समझ गयी , आज जब से हम ट्रेन में घुसे थे छुटकी ने अपनी गुलाबो उन्हें छूने नहीं दी थी , दर्द के नाम पर और एकाध बार उन्होंने कोशिश भी तो जोर से उसकी चिल्ख निकल जाती। अब वो चाह रहे थे की मैं छुटकी से कहूं , ... तो मैं वैसे तो कहती नहीं , हाँ वो मुझसे कहते तो मैं व्ही काम उनकी साली से करवाती ,

उनकी प्लानिंग मैं समझ गयी थी , और उनकी प्लानिंग समझ के , मेरा बस एक लक्ष्य होता था ,... उनकी प्लानिंग १०० % सक्सेस फूल हो ,

" नहीं आप की साली भी अपनी चूत में ऊँगली करे , ..देखें कैसी साली है जीजू की बात मानती है की नहीं ,... "

मैंने भी छुटकी को चढ़ाया

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छुटकी यार इज्जत का सवाल है , उसके जीजू ने पुचकारा और उसके गाल को खूब प्यार दुलार से चूम लिया

बस छुटकी ने मेरी ओर देखते हुए , जैसे मैं कर रही थी , वैसे ही

अपनी मंझली ऊँगली को पहले हलके हलके फुद्दी पर रगड़ा , फिर धीरे धीरे दबाते हुए अंदर , ... मेरी तरह उसने भी जाँघे कस के पूरी फैला रखी थीं ,... सिर्फ एक पोर अंदर डाल के खूब हलके से अपने जीजू को दिखाते चिढ़ाते उकसाते , गोल गोल अपनी कच्ची चूत में वो कच्ची कली घुमा रही थी।

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मैंने घुमाना तेज कर दिया तो उसने भी , वहीँ तो सारी नर्व एंडिंग्स होती हैं , और मस्ती के मारे मेरी भी हालत खराब हो रही थी , बस ज़रा सा निकाल के

हचाक

दो पोर अंदर घुस गया। मस्ती से छुटकी की आँख बंद हो गयी थी , और अब उसे मुझे देखने की भी जरुरत नहीं थी , जैसे मछली के बच्चे को तैरना सिखाने की जरूरत नहीं पड़ती वही हालत मेरी छोटी बहन की थी ,

हम दोनों बहने अब साथ साथ सिसक रहे थे , तेजी से अंदर बाहर ऊँगली कर रहे थे दोनों की गुलाबो जोर जोर से पनिया रही थी ,

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छुटकी की हालत खराब थी , उसके दोनों नए नए आ रहे जोबन एकदम पथरा गए थे , निप्स खूब कड़े , चेहरे पर मस्ती भरी हुयी थी , ... और अब वो सिसकने के साथ कमर भी उचका रही थी और एक तेजी से उसने पुश किया तो उसकी मंझली ऊँगली पूरी तरह अंदर ,

और हम दोनों जैसे होली में मिश्राइन भाभी ने मुझे और

रीतू भाभी ने उसे ट्रेनिंग दी थी एकदम उसी तरह ,

एक ऊँगली अंदर , मंझली ऊँगली

और बगल की दोनों उँगलियाँ बाहर पपोटों को रगड़ती दरेरतीं ,

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पांच मिनट तक इसी तरह , लेकिन हम दोनों से ज्यादा किसी की हालत खराब थी वो थे ,

छुटकी के जीजू , लंड एकदम बौराया , तन्नाया ,...

सामने हलवा पूड़ी खीर सब और ,... मिल कुछ नहीं रहा ,...

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एक क्लास नौ में पढ़ने वाली कच्ची किशोरी और एक तरुणी

मेरी तो आंखे खुली ही थीं , मैंने छुटकी को इशारा किया अपने उभारों को छू के ,

छुटकी को सिखाने की जरूरत नहीं पड़ती थी , अपनी उम्र की लड़कियों से थोड़ी ज्यादा ही ,... उसे मालूम था अपने जोबन का जादू , अपनी भोली मुस्कान का असर

अपने जीजू को देख कर हलके से वो मुस्करायी और एक हाथ से अपने उभारों को हलके हलके सहलाते , मसलते जोर से सिसकने लगी ,

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दुसरे हाथ की ऊँगली तेजी से उसकी चुनमुनिया में अंदर बाहर हो रही थी

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अब इनसे नहीं रहा गया , हम दोनों को तेजी से ऊँगली करते देख इनका हाथ भी अपने खूंटे पर , ... और ये देखते ही मैं और छुटकी जोर से चिल्लाये

मुझसे तेजी से इनकी साली , फाउल फाउल फाउल, स्साली की सरासर बेईज्जती , साली के रहते जीजू अपने हाथ का,...

और मेरी और मेरी बहन की परफेक्ट समझ थी बस आँखों के ईशारे

हम दोनों फर्श पर और ये सीट पर बैठे , ... जैसे दो सहेलियां मिल बाँट के लॉलीपॉप चूसें ,

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शुरआत मैंने की , होंठों के सहारे से इनके सुपाड़े का चमड़ा बहुत धीमे धीमे हटाया , छुटकी बगल में बैठे देख रही थी , सीख रही थी , .... फिर ढेर सारा थूक मैंने अपने इकट्ठा किया और सब इनके सुपाड़े पर ,

(कहानी अगले पेज पर जारी, पूरी पढ़े , कमेंट करें )
 
( भाग ६ -पिछले पृष्ठ से शुरू )





चुस्सम चुस्सवल

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और मेरी और मेरी बहन की परफेक्ट समझ थी बस आँखों के ईशारे

हम दोनों फर्श पर और ये सीट पर बैठे , ... जैसे दो सहेलियां मिल बाँट के लॉलीपॉप चूसें ,

शुरआत मैंने की , होंठों के सहारे से इनके सुपाड़े का चमड़ा बहुत धीमे धीमे हटाया , छुटकी बगल में बैठे देख रही थी , सीख रही थी , .... फिर ढेर सारा थूक मैंने अपने इकट्ठा किया और सब इनके सुपाड़े पर ,

मोटा भी कितना था , एकदम लाल , बड़े पहाड़ी आलू सा , फिर सिर्फ थोड़ी देर जीभ की टिप से उनके पेशाब के छेद में सुरसुरी की , और

गप्प ,

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अब मुझे आदत हो गयी थी , एक बार में पूरा सुपाड़ा गपक कर लेने की , थोड़ी देर चुसला चुभला के मैंने उसे अपनी ललचाती , नदीदी लार टपकाती अपनी छोटी बहन को दे दिया

और फिर एक बार अपने मुंह में ढेर सारा थूक इकठा किया , और अबकी सब थूक मेरी हथेली में

छुटकी ने बड़ी कोशिश कर के अपने जीजू का आधा से ज्यादा सुपाड़ा अपने किशोर मुंह में घोंट लिया था और हलके हलके चूस रही थी , ....

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मैंने सब थूक अब उनके चर्म दंड पर लगाया और उसी थूक लगी मुट्ठी से मालिश करने लगी ,... पूरा लंड चमक रहा था ,

फिर हम दोनों बहनों ने इन्हे बाँट लिया , सुपाड़ा छोटी के मुंह में और बाकी का मेरे हिस्से में , मैं जीभ से बॉल्स से लेकर सुपाड़े तक तेजी से सपड़ सपड़ चाट रही थी ,

अब इनकी हालत खराब हो रही थी , लेकिन हम दोनों बहने यही चाहती भी थीं , लेकिन तब तक ट्रेन धीमी होने लगी , ... रात भी अब ख़तम होने के कगार पर थी ,

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कोई बड़ा स्टेशन आ रहा था , ... और मैंने रुक के एक पल इनकी ओर देखा इन्होने छुटकी का सर पकड़ा

कोई भोसड़े में क्या लंड पेलेगा , जिस तरह इन्होने अपनी साली के मुंह में लंड ठेल दिया , अब पूरा ढाई इंच का सुपाड़ा उस छोटी साली के मुंह में धंसा घुसा और वो कस के उसके सर को दोनों हाथों से जकड रखा था ,

बचपन में मेरी भोंसड़ी वाली सास ने अच्छी ट्रेनिंग दी है अपने मुन्ने को , रुक के मैंने थोड़ा उन्हें चिढ़ाया

ट्रेन रुक चुकी थी , बाहर से चाय चाय की आवाज स्टेशन की हलचल सब कुछ सुनाई पड़ रहा था , खिड़की खुली हुयी थी ,

लेकिन न इन्हे फर्क पड़ रहा था न हम दोनों बहनों को ,

पूरे पांच मिनट तक ट्रेन खड़ी रही , और हम दोनों , हाँ ट्रेन चलने के पहले मैंने अपनी छोटी बहन को उसके जीजू का पूरा मोटा गन्ना दे दिया ,

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उसके जीजू कस कस के उसका मुंह चोद रहे थे सुपाडा उन्होंने उस कली के हलक में उतार दिया था , वो गों गों कर रही थी , लेकिन उनकी पकड़

और मैंने अब दोनों रसगुल्लों की ओर रुख किया आखिर सारा माल पानी बनता भी तो वहीँ है , बस मैं जोर जोर से चूसने लगी एक एक बॉल्स को लेकर बारी बारी से , ...

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एक तकिया लेकर मैंने उनके चूतड़ों को थोड़ा उचकाया और अब मेरी जीभ बॉल्स से लेकर पिछवाड़े के छेद तक

ट्रेन चल दी थी और हम दोनों बहनों ने आँखों ही आँखों में

और हम दोनों ने मिल के उन्हें बर्थ पर ही , पीठ के बल धक्का देकर ,... छुटकी एक बार साइड से उन्हें चूस रही थी और दूसरी साइड से मैं

कभी हम दोनों मिल के सुपाड़ा उनका चाटती चुसतीं , कभी लंड उसके हिस्से में सुपाड़ा मेरे हिस्से में ,

फिर मैंने एक और तकिया उनके चूतड़ के नीचे लगाया ,

छुटकी चूसना छोड़ के देख रही थी मैं क्या कर रही हूँ ,

मैंने इनके दोनों नितम्ब फैला के छुटकी को इनके पिछवाड़े का छेद दिखाया , और उससे कहा इसे फैलाये रहे ,

बस अब मेरी जीभ ने शरारत शुरू कर दी , पहले जीभ गोलकुंडा का चक्कर काटती रही , फिर जीभ की टिप सीधे गोल छेद के अंदर , मैं रीमिंग कर रही थी , चपड़ चपड़ चाट रही थी ,

इनकी रीमिंग करवाने में हालत खराब हो जाती थी , और यही तो मैं चाहती थी ,...

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और अब छुटकी भी अपने काम में लग गयी , पिछवाड़े का छेद बड़ी बहन के हिस्से में , और मोटा तन्नाया लंड छोटी बहन के हिस्से में ,...

दो चार मिनट में ही इनकी हालत खराब हो गयी , ...

तभी मैं चौंकी ,... जो स्टेशन गुजरा था ,... कोई उसका नाम ले रहा था ,... वो हमारे गाँव के पहले का आखिरी बड़ा स्टेशन था यहाँ से एक घंटे पूरा लगता था यानी एक घंटे में हमें उतरना होगा , और तब तक ,... शाम से इनका मन कर रहा था ,...
 
मेरी आने वाली कहानी

मज़े बनारस के कुछ और झलकियां

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तबतक भाभी आ के मेरे पास बैठ गयीं , फोन को देखते हुए थोड़ी उदास थीं , मुझसे बोलीं , सिग्नल कट कट रहा है, तेरी माँ से बात नहीं हो पायी।

गुड्डो ने पलीता लगाया, जमालो की सीधे वंश की थी वो , बोली,

" अरे मम्मी, थोड़ी देर में तो घाट पर पहुँच जाएंगे, वहां से सिग्नल मिल जाएगा, नहीं तो बाजार में से , और वैसे भी इनकी माँ को पांच छह दिन बाद, रंगपंचमी के तो बाद ही आना है , पहले इनसे तो पक्की हाँ भरवा लीजिये,... "

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भाभी जोर से मुस्करायी, और मेरे गाल पे चिकोटी काटते मुझसे बोलीं ,

सही कह रही है ये,... एक बार तू बस हां कर दे, फिर तो बनारस बुलाने की, उनको पटाने की , लिटाने की, टांग फैलवाने की जिम्मेदारी मेरी पटाउंगी मैं सटाना तुम , और ये मोटा मूसल एक बार जहां घुस गया न , ... तो एक बार चल तुम आँख बंद कर के सोचो न अपनी महतारी के बारे में , ... गोरे गोरे गाल, कड़े कड़े,... चल बोल, चढ़ेगा न आपन महतारी पे ,... "

और गुड्डो ने चिकोटी काटा जोर से , और मैंने मुस्कारते हुए बोला, ...हाँ एकदम।

भाभी खुश, गुड्डो खुश , लेकिन गुड्डो ने ही कुछ इशारा किया और भाभी ने फिर मेरी नाक पकड़ी , और बोला,

" सोच के बोलना, गंगा जी के बीच में हो, एक बार हुनकारी भर के मुकर नहीं सकते, सोच लो, बोलो, चोदोगे न आपन महतारी,... "

गुड्डो ने चिकोटी काटी और मैंने एक बार फिर से मुस्कारते हुए हाँ बोल दिया।

लेकिन भाभी को अब मौका मिल गया था, उन्होंने और जोड़ा, सिर्फ बुर चोदने का थोड़े ही इत्ते मस्त चूतड़ है , बोलो ये मोटा मूसर चुसवाओगे न अपनी महतारी की गांड मारोगे न हचक के। "

मैंने फिर से बोला हाँ लेकिन अब गुड्डो भी मैदान में आ गयी और भाभी से भी आगे बढ़ के, ...

बोली,

" तो बोल मादरचोद, बनेगा न मादरचोद अपनी महतारी को,... "

मुस्करा के वो उसने पूछा और मैंने उससे भी कस के मुस्करा के हाँ बोला,... लेकिन तब तक घाट की ओर नाव मुड़ चुकी थी।

पर अभी भी घाट कुछ दूर था, नाव को पहुंचने में आठ दस मिनट लगना था, भाभी ने गुड्डो से मुस्कराते हुए, बोला,... "

" हे ज़रा तू अपना मोबाइल निकाल, ये स्साला अपनी महतारी पर चढ़ने के लिए बौराया है , देख कैसा मस्त झंडा खड़ा किया है महतारी के नाम पे, एक बार बात कर के सेटिंग इसकी पक्की करवा दूँ, वरना ये कहेगा की ये बनारस वालियां,... "

5. " और आज से उनको डार्लिंग ही बोलना, बहुत हुआ तो मॉम डार्लिंग जिस नाम से नंबर सेव किया है फोन में, ... " गुड्डो मौका क्यों छोड़ती।

बोल तो मैं सकता नहीं था, हाँ उसकी कुर्ती में घुसे मेरे हाथ ने बदला ले लिया, कस के उसके उभार को दबाने के साथ साथ, उसके निपल को पिंच कर के, पर गुड्डो की मम्मी की आँख से मेरे हाथ की शरारत नहीं छुप सकती थी, मुस्कराते हुए उन्होंने गुड्डो की बात का जवाब खुद दे दिया,... "

" अरे इसमें कहने की बात है, डार्लिंग जब लिखा है तो डार्लिंग ही बोलेंगे ये, हाँ आगे पीछे रंडी, छिनार , कुछ लगाना चाहे तो हमको कोई ऐतराज नहीं है , पर अब नंबर लगाओ न,... "

पर गुड्डो अपनी मम्मी की बात पर उछल गयी बोली , " अरे मैं क्यों लगाऊं , जिसका फोन है, जिसने मॉम डार्लिंग के नाम से सेव किया है वो लगाएगा न मन तो अभूत कर रहा होगा लगाने का न, लो लगाओ, "
 
फोन -फोन

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माँ को फोन लग गया था , बल्कि मैंने ही लगा के दिया था और गुड्डो की मम्मी चालू हो गयीं,...

" अरे मैं बोल रही हूँ , गुड्डो की मम्मी, दो ख़ुशख़बरी बतानी थी आपको, एक तो जो हमरे मरद और तोहरे भैया के बीज से जनमा तोहार बेटा है न उनके बारे में,.. "

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स्पीकर फोन गुड्डी ने हाथ बढाकर आन कर दिया था,... और उधर से खिलखिलाहट की आवाज आ रही थी जोर जोर से हंसने की और फिर बात काट के माँ की आवाज आयी

" अरे तो कौन गलत किये थे, भुलाय गयी गवने में जब तू बिदा करा के आय रहू,... हमहीं ले गए थे सेज सेजरिया पे,... और आधे घंटे में अइसन चीख पुकार मचाई , ऊ तो हम बाहर से कुण्डी लगा दिए थे पहले, केतना खून खच्चर हुआ था, हमरे भैया अइसन फाड़े थे, रात भर,... और फिर को कउनो दिन नागा भया हो , रात तो रात कितनी बार दिन में भी,... और जउन हमरे भैया के बीज क बात कर रही हो न, तो भुलाय गयी तोहार पांच दिन वाली छुट्टी चल रही थी, तो बेचारे कहाँ इधर उधर तो हम सोचे की चला हमहीं,... अरे तोहार सैंया बनने के पहले से हमरे भैया थे , तो उस मूसल पे हमार हक कउनो कम नहीं था,... फिर पांच दिन क उपवास वो थोड़ी करते

लेकिन पहले खुसखबरी की बात बतावा और, वो कहाँ है, ... " माँ ने पूछा

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उनका इशारा मेरी ओर था लेकिन गुड्डो की मम्मी ने वो रास्ता बंद कर दिया,... ये बोल के की मेरे मुंह में कचौड़ी भरी है , इसलिए मैं अभी बात नहीं कर पाउँगा।

पर मेरी चमकी। गुड्डो की मम्मी और मेरी मॉम में ननद भौजाई का भी रिश्ता था और बहुत करीब का. गुड्डो की मम्मी की जो ससुराल थी, गुड्डो की ददिहाल, उसी गाँव की मॉम थीं, और पडोसी भी रिश्ते में भी, तो पहले दिन से ही वो ननद भौजाई का रिश्ता और वो मजाक चिढ़ाना,... और बुआ भतीजी में भी मजाक खूब होता है एकदम असली वाला तो गुड्डो की भी रगड़ाई में वो,...

लेकिन थोड़ी देर में मुझे पता पता चल गया मामला मज़ाक से बहुत ज्यादा है , पर गुड्डो की मम्मी जिस तरह से मेरी तारीफ़ कर रही थीं, उससे में और शरमा रहा था,... वो बोल रही थीं,...

" अरे अपने मायके ससुरारी, नाउ कहांर, अहिरौटी चमरौटी हर जगह टंगिया भले उठावत रहू, जाँघियां फैलावत रहु,... लेकिन एक काम बढ़िया किया आपने किया कि गाभिन, अपने भैया , गुड्डो के पापा के बीज से हुईं,...

" अरे उ भैया कौन जो बहिन को न चोदे,... "

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उधर से खिलखलाती आवाज आयी , और मैं समझ गया वो गुड्डो की मम्मी के बात के जवाब के साथ साथ मेरे और गुड्डो के रिश्ते के बारे में भी बोल रही हैं, ... और मैंने भी कस के एक बार फिर से गुड्डो के उभारों को दबा दिया और गुड्डो ने खुली जिप में ऊँगली डाल के मेरे तन्नाए मोटू को रगड़ दिया।

" और उ बेटा कौन जो महतारी को न चोदे "

मुझे आँख मारते हुए गुड्डो की मम्मी इधर से बोलीं,

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पर जो जवाब उधर से आया वो अप्रत्यशित था,...

" एकदम सोलहो आना सच, तोहरे मुंहे में घी गुड़,... आप हमरे मुंह की बात छीन ली,... लेकिन आप कुछ कह रही थीं, गुड्डो के पापा,... "

और अबकी बात काट के जो गुड्डो की मम्मी ने बोलना शुरू किया बल्कि मेरी तारीफ़ के पुल बाँधने शुरू किये,...

" अरे, अपने मामा के जामल, हमरे मरद के, गुड्डो के पापा के बीज क असर, आज इम्तहान था न तो हम और गुड्डो गए थे, बहुत मेहनत किया था लड़के ने,... "

" कैसा हुआ परचा,... " अब उधर से आयी आवाज में चिंता परेशानी सब थी,... "

अब गुड्डो की मम्मी ख़ुशी से खिलखिला रही थीं, बोलीं, ...

" अरे पहले ये बोला की अपने चोली के भीतर के दुनो गुलगुला है हमरे मरद के जनमल के खिलाएंगी न, गोल गोल मीठ मीठ."

"हाँ खिलाऊंगी, अपने हाथ से पकड़ के खिलाऊंगी लेकिन,... " उधर से भी खिलखिलाती आवाज आयी.

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" अरे हमरे मरद क बीज है , फाड़ दिया, अपने महतारी के भतार ने,... इतनी तारीफ़, इतनी तारीफ़,... हम और गुड्डो तो कोचिंग में भी गए थे,... ई इम्तहान में तो पक्का हो जाएगा , बल्कि कोचिंग वाले जोड़ के बताये की पूरे बनारस में टॉप,... नहीं पूरे यूपी में सबसे ज्यादा,... और हफ्ते भर बाद एक कोचिंग हैं उसमें तो फ्री एडमिशन और इनाम भी दिए हैं, अगला इम्तहान में भी पक्का सेलेक्शन,... गंगा मैया का आशिर्बाद है,... गुड्डो बोल रही थी अखबार में भी फोटो निकलेगी और बोर्ड के ऊपर भी फोटो लगाएंगे,... "

गुड्डो की मम्मी बोल रही थीं, उनकी आँखों में जो चमक, चेहरे पर जो ख़ुशी थी,...वो आवाज में भी छलक रही थी,...

लेकिन अब शर्मा मैं रहा था, और ये गुड्डो भी न, ... क्या जरूरत थी वो अखबार और बोर्ड वाली बात मम्मी को बताने की,... फिर उन माँ बेटी ने तो मुझसे भी ज्यादा मेहनत की, रात भर जगना, पूजा, आज सुबह से भूखे रह के,... अगर मेरा बी एच यू में एडमिशन हुआ तो मुझसे ज्यादा इन दोनों लोगों की मेहनत का नतीजा,...

तबतक गुड्डो की मम्मी खिलखिलाने लगी और वो पन्ना उन्होंने खोल दिया जो बंद रहना ही ठीक होता,...

" लेकिन पढ़ने लिखने में जितना तेज है, उतना ही,... वो तो आज हम कोचिंग में देखे, अरे एक से एक लड़कियां, पीछे पड़ी, एकदम चिपकी, अइसन तारीफ़,... दूसरा कोई होता तो कब का उन सबों को निबटा दिया होता, लेकिन ऐसे लजाय रहा था, आज कल तो लड़कियां भी इतना नहीं लजाती,... "

अब उधर से खिलखिलाने की आवाज आयी, " अरे तो अब तो इम्तहान हो गया न , अब आप किस लिए हैं , लाज शरम मिटाने के लिए,... अरे जरा उसको फोन दीजिये अभी हड़काती हूँ, ... "

और अगली आवाज में मेरे लिए इंस्ट्रक्शन था,

" अरे बोलने की जरूरत नहीं है मालूम है बनारस की कचौड़ी क स्वाद ले रहे हो, मुंह भरा है, खाओ खाओ,... लेकिन एक बात सुन लो, गुड्डो क मम्मी क कुल बात मानना, कुल बात मतलब कुल बात, और भले बड़े हो गए हो लेकिन हम दोनों के लिए बड़े नहीं हुए हो, तो मैं उनको बोल दे रही हूँ , अगर उनका मन करे तो एकाध हाथ लगावे के तो कस के लगाय भी देंगी, जउन सजा देना चाहेंगी, देंगी अगर तनिको ना नुकुर किया न,... "

लेकिन गुड्डो की मम्मी ने बात दूसरी ओर मोड़ दिया,

,,,,

तो बीच में बात काट के गुड्डो की मम्मी बोलीं,

" अरे हमरे मरद, अपने भैया क चोदी, बहुत लंड घोंटी होगी, ... लेकिन ऐसा लंड,... अरे जिस भोंसडे से निकला है न उसी भोंसडे में जाएगा और ऐसे फाड़ेगा न की जैसे कुंवारे में जब गन्ने के खेत में पहली बार फटी होगी, उससे ज्यादा दर्द होगा, भोंसड़ा एकदम से कच्ची चूत का मजा देगा, "

मुझे लग गया की अब उधर से फोन कट जाएगा, एक पल के लिए जवाब भी नहीं आया , लेकिन जब जवाब आया भी तो ऐसा, ईंट का जवाब पत्थर टाइप,...

" अरे आपके मुंह में घी गुड़,अब तो मैं आज से दिन गिनूँगी, लेकिन अगर वो आपके मरद के बीज का जना,... अरे उसके बाप का,अपने भैया का लंड घोंट के अपने भैया का पैदा किया, आपके मर्द का, अपने भैया का लंड घोंट के गाभिन हुयी, बियाई,... तो उसका लंड भी घोंट लूँगी, और ज़रा भी हिचकिचाया न तो चढ़ के चोद दूंगी उसको। "
 
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