Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर - Page 28 - SexBaba
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Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर

#130.

सुनहरी हिरनी: (14 जनवरी 2002, सोमवार, 07:30, लैडन नदी के किनारे, पेलो पोनेसस प्रायद्वीप, ग्रीस)

लैडन नदी का शांत जल सूर्य की झिलमिलाती रोशनी में चमचमा रहा था।

जंगल में पक्षियों का कलरव कानों में मधुर रस घोल रहा था। हवाओं में काफी नमी थी।

आकृति उस नदी के किनारे एक पेड़ पर छिप कर बैठी थी।

ऐसा लग रहा था कि जैसे उसे किसी का इंतजार हो।

पेड़ की उस झुकी डाल से पानी में आकृति को अपना चेहरा नजर आ रहा था, जो कि इस समय भी शलाका से मिल रहा था।

“जाने कब छूटेगा इस चेहरे से पीछा मेरा? अब तो अपना चेहरा याद भी नहीं है मुझे....वो भी क्या दिन थे... जब आर्यन को सिर्फ मुझसे प्यार था, पर इस मनहूस शलाका ने उसे मुझसे छीन लिया।....पर अब बस अब नहीं चाहिये मुझे यह चेहरा ... अब मुझे कुछ भी करके आज उस सुनहरी हिरनी को पकड़ना ही होगा, अब वहीं मेरी आखिरी उम्मीद है। सुर्वया ने कहा था कि आज वह सुनहरी हिरनी मुझे यहां जरुर मिलेगी।”

यह सोच आकृति ने फिर से अपनी नजरें पेड़ से कुछ दूर बने रास्ते पर लगा दी।

धीरे-धीरे आकृति को पेड़ पर छिप कर बैठे 3 घंटे बीत गये।

इन 3 घंटों में नदी किनारे असंख्य जानवर आये और पानी पीकर चले गये, पर वह सुनहरी हिरनी नहीं आयी, जिसका कि आकृति को इंतजार था।

तभी आकृति को एक बड़ा सा शेर उधर आता दिखाई दिया।

उस भयानक शेर को देख आकृति ने तुरंत अपने हाथ में पहनी एक नीले रंग की अंगूठी का नग अंदर की ओर दबा दिया।

नग के दबाते ही आकृति अदृश्य हो गई, अब वह नजर नहीं आ रही थी।

शेर के चलने का तरीका बड़ा ही रहस्यमयी था, वह चारो ओर देखता धीरे-धीरे अपने कदम बढ़ा रहा था।

शेर चलते हुए लैडन नदी के किनारे पहुंचा और फिर अपना मुंह पानी में डालकर पानी पीने लगा।

पेट भरकर पानी पीने के बाद उस शेर ने अपना मुंह उठा कर एक जोर की दहाड़ मारी।

वह दहाड़ इतनी तेज थी कि एक बार तो आकृति पेड़ से गिरते-गिरते बची।

तभी बहुत जोर की धम-धम की आवाज सुनाई देने लगी।

ऐसा लग रहा था कि जैसे कोई बहुत बड़ा जानवर चलता हुआ उस दिशा में आ रहा था।

शेर चुपचाप खड़ा उस दिशा की ओर देखने लगा, जिधर से वह आवाज आ रही थी।

कुछ ही देर में आकृति को उस दिशा से एक सुनहरी हिरनी आती हुई दिखाई दी, जिसका आकार उस शेर से भी बड़ा था।

हिरनी की 12 सींघें सोने की बनी दिख रहीं थीं। हिरनी के पैर भी पीतल के बने नजर आ रहे थे और उसके पूरे शरीर से विचित्र सी सुनहरी रोशनी प्रस्फुटित हो रही थी।

“अरे बाप रे! यह हिरनी है या कोई विशाल सांड? क्या इसे ही पकड़ना है मुझे? पर इसे पकड़ना तो आसान नहीं होगा। यह इतनी खतरनाक है, शायद तभी ‘हरक्यूलिस’ को दिये 12 कार्यों में से एक कार्य इसे पकड़ना था।”

आकृति के दिमाग में उस सुनहरी हिरनी को देख अजीब-अजीब से ख्याल आने लगे।

वह सुनहरी हिरनी अपनी मदमस्त चाल से लैडन नदी के किनारे पहुंच गई।

उसे देख शेर ने नदी का रास्ता उसके लिये छोड़ दिया और अपना मुंह दूसरी ओर घुमाकर, इस तरह से चारो ओर देखने लगा, मानो उस सुनहरी हिरनी की वह रखवाली कर रहा हो।

सुनहरी हिरनी ने नदी में अपना पैर रखा और धीरे-धीरे पूरी की पूरी नदी में समा गई।

आकृति के हाथ में अब मकोटा का दिया नीलदंड नजर आने लगा था। वह पुनः अपनी अंगूठी के नग को दबा कर सदृश्य हो गयी।

आकृति ने अपने नीलदंड को हवा में लहराया।

उस नीलदंड से नीले रंग की रोशनी निकली और नदी किनारे खड़े शेर के मुंह पर पड़ी।

अब हवा में लहराती हुई आकृति शेर के सामने जा खड़ी हुई।

शेर ने आकृति को देखकर दहाड़ने की कोशिश की, पर उसके मुंह से आवाज ना निकली।

एक दो बार और कोशिश करने के बाद शायद शेर समझ गया कि वह दहाड़ नहीं पायेगा, इसलिये उसने अब आकृति को घूरकर देखा और हिंसक भाव से उसकी ओर बढ़ने लगा।

आकृति की एक नजर नदी पर भी थी, फिर भी उसने शेर को अनदेखा नहीं किया।

शेर लगातार आकृति की ओर बढ़ रहा था, पर अब आकृति के चेहरे पर मुस्कुराहट दिख रही थी।

आकृति ने अपने नीलदंड को हवा में गायब कर दिया और खाली हाथ ही मुस्कुराते हुए शेर का इंतजार करने लगी।

शेर ने पास पहुंचकर, आकृति की ओर एक लंबी छलांग लगाई।

आकृति पहले से ही सतर्क थी, उसने अपने शरीर को एक ओर झुकाते हुए, एक ही छलांग में शेर की पीठ पर सवार हो गई और अपनी पूरी ताकत से शेर का गला दबाने लगी।

पता नहीं आकृति के हाथों में कितनी शक्ति थी, कि शेर छटपटा कर अपना गला छुड़ाने की कोशिश करने लगा।

तभी आकृति ने एक झटके से शेर के सिर को पीछे की ओर मोड़ दिया।

असीम शक्ति थी आकृति के हाथों में, शेर की गर्दन टूटकर लटक गयी।

एक मिनट से भी कम समय में निहत्थी आकृति ने खूंखार शेर को निपटा दिया था।

अब उसने एक नजर लैडन नदी पर मारी। आकृति ने एक बार फिर से स्वयं को अदृश्य कर लिया और नदी की ओर चल दी।

वह सुनहरी हिरनी नदी में कहीं नजर नहीं आ रही थी। अतः आकृति भी पानी के अंदर प्रवेश कर गई।

तभी बाहर पड़ा मरा हुआ शेर अचानक से उठा और एक दिशा की ओर भाग गया।

आकृति ने पानी में डुबकी मारी और उस सुनहरी हिरनी को ढूंढती नदी की तली की ओर चल दी ।

ऊपर से पता नहीं चल रहा था, पर अंदर से नदी काफी गहरी थी।

कुछ ही देर में आकृति को नदी की तली में सुनहरी रोशनी सी दिखाई दी। बिना आवाज तैरती हुई आकृति उस सुनहरी रोशनी की ओर चल दी।

पर नदी की तली में जो नजारा दिखाई दिया, वह देख आकृति सिहर उठी।

नदी की तली में एक विशाल ड्रैगन सो रहा था और वह सुनहरी हिरनी, उस ड्रैगन के मुंह के पास कुछ कर रही थी।

जी हां यह वही ड्रैगन था जिसे शैफाली ने अपने सपने में मैग्ना की सवारी बनते देखा था।

पता नहीं ड्रैंगो बेहोश था या सो रहा था, आकृति को यह समझ नहीं आया।

तभी उस सुनहरी हिरनी को अपने पीछे किसी के होने का अहसास हुआ।

उसने पलटकर देखा, पर उसे कोई नजर नहीं आया। तभी उसे पानी की लहरों में थोड़ी सी हलचल होती दिखाई दी।

सुनहरी हिरनी को शक हो गया कि उस दिशा में कोई है? उसने अपनी सोने की सींघों को तेजी से पानी में गोल-गोल लहराया।

सींघों के लहराते ही पानी में एक गोल तरंग सी बन गई, जो उस दिशा की ओर झपटी, जिधर आकृति अदृश्य अवस्था में खड़ी थी।

आकृति को उस सुनहरी हिरनी से ऐसी कोई आशा नहीं थी, इसलिये वह इस वार से बच नहीं पाई।

आकृति उन जल तरंगों से टकरा गई और सदृश्य हो कर सुनहरी हिरनी को दिखाई देने लगी।

सुनहरी हिरनी की नजर जैसे ही आकृति पर पड़ी, वह अपनी सींघों को हिलाकर बिजली की तेजी से आकृति पर झपट पड़ी।

आकृति ने किसी तरह से अपना बचाव कर लिया।

पानी में लड़ने का आकृति को कोई अभ्यास नहीं था, इसलिये वह चाहती थी कि यह सुनहरी हिरनी जितनी जल्दी पानी से बाहर निकले।

अब आकृति के हाथ में नीलदंड नजर आने लगा।

उसने नीलदंड को गोल घुमा कर सुनहरी हिरनी पर ऊर्जा का हमला किया, पर हिरनी की स्पीड पानी में भी बहुत तेज थी। वह आसानी से उस ऊर्जा के वार से बच गई।

पर नीलदंड को देख सुनहरी हिरनी समझ गयी कि आकृति के अंदर चमत्कारी शक्तियां हैं, इसलिये उसने बचकर निकलना ही उचित समझा और नदी की सतह की ओर चल दी।

आकृति यही तो चाहती थी, उसने अपने नीलदंड से, बचकर भागती हिरनी पर एक जाल फेंका।

चूंकि सुनहरी हिरनी की नजर आकृति की ओर नहीं थी, इसलिये वह जाल से बच नहीं सकी और जाल में फंस कर छटपटाने लगी।

आकृति ने जाल को कसा और पानी से निकलकर बाहर आ गयी।

पर बाहर आते ही उसकी नजर नदी के बाहर खड़े शेर और देवी आर्टेमिस पर पड़ी।

आकृति ने आर्टेमिस को देखते ही पहचान लिया। वह एक ग्रीक देवी थी।

ओलंपस पर्वत के 12 देवी-देवताओं में से एक.....शिकार की देवी... जिससे बचना बहुत ही मुश्किल माना जाता था।

आकृति वहां आने से पहले ही आर्टेमिस के बारे में सब कुछ पढ़ चुकी थी।

उसे पता था कि सुनहरी हिरनी आर्टेमिस की बहुत प्रिय है, इसलिये वह आर्टेमिस की बिना जानकारी के सुनहरी हिरनी को यहां से ले जाना चाहती थी।

आर्टेमिस की तीखी निगाहें कभी आकृति पर तो कभी उसके जाल में फंसी सुनहरी हिरनी की ओर जा रही थी।

आकृति आर्टेमिस से युद्ध नहीं करना चाहती थी।

क्यों कि आर्टेमिस से युद्ध करने का मतलब सभी ग्रीक देवताओं को अपने विरुद्ध करना हो जाता। अतः आकृति ने भागने में ही अपनी भलाई समझी।

इससे पहले कि आर्टेमिस कुछ समझ पाती, आकृति के हाथ में नीलदंड चमका और रोशनी के एक झमाके के साथ आकृति सुनहरी हिरनी के साथ गायब हो गयी।

आर्टेमिस को आकृति से इस प्रकार की कोई उम्मीद नहीं थी, इसलिये वह सुनहरी हिरनी को नहीं बचा पायी।

पर आर्टेमिस की आँखों से अब अंगारे बरस रहे थे। वह सोच भी नहीं सकती थी कि कोई मनुष्य इस प्रकार उसकी सबसे प्रिय सुनहरी हिरनी को ले उड़ेगा।

अब वह गुस्से से अपने पैर पटकती, ओलंपस पर्वत की ओर चल दी।

जारी रहेगा_______✍️
 
SANJU ( V. R. ) dada 130 wa update post kar diya hai, kaahe naaraaj ho? Reply hi nahi de rahe?:hide2:
 
Kya boltti public ? Ho jaye update ?

Per iske liye minimum 3 reply chahiye:approve: Varna kal hi dunga:D
 
#131.

चैपटर-10: ज्वालामुखी

(14 जनवरी 2002, सोमवार, 10:25, मायावन, अराका द्वीप)

शलाका से मिलने के बाद सभी की रात बहुत अच्छी बीती थी।

उन्हें इस बात की कुछ देर के लिये चिंता जरुर हुई थी कि वह अभी भी घर नहीं जा सकते, परंतु शलाका के उत्साहपूर्ण शब्दों को सुनकर सभी में आशा की एक नयी किरण अवश्य जगी थी।

एक नयी सुबह हो चुकी थी, सभी नित्य कर्मों से निवृत हो कर पुनः आगे की ओर बढ़ चले।

कुछ दूरी पर उन्हें एक ऊंचा सा पहाड़ नजर आ रहा था और पहाड़ की चढ़ाई शुरु हो गयी थी।

पहाड़ के रास्ते में कोई भी पेड़ नहीं लगा था और ना ही कहीं कोई छांव दिखाई दे रही थी, पर सुबह का समय होने की वजह से मौसम थोड़ा सुहाना था।

“तुमने सही कहा था शैफाली, कि यहां पर आना हम लोगों की नियति थी, जहाज का रास्ता भटकना तो एक निमित्त मात्र था।” सुयश ने शैफाली को देखते हुए कहा।

“आपको तो यहां आकर खुश होना चाहिये कैप्टेन अंकल।” शैफाली ने मुस्कुराते हुए कहा- “अगर आप यहां नहीं आते, तो आपकी जिंदगी एक साधारण मनुष्य की भांति समाप्त हो जाती और आपको अपने इस दुनिया में आने का उद्देश्य भी नहीं पता चल पाता।”

“सही कहा शैफाली। अगर यहां आने के पहले मुझसे कोई पूर्वजन्म की बातें करता तो मैं उसे कोरी गप्प समझ कर टाल देता, परंतु यहां आने के बाद तो जैसे जिंदगी के मायने ही बदल गये।” सुयश की आवाज में एक ठहराव था।

“मुझे लगता है कैप्टेन कि अब जल्द ही शैफाली की जिंदगी का राज भी खुलने वाला है।” क्रिस्टी ने चलते-चलते कहा।

“ईऽऽऽऽऽऽ! मैं तो पूर्वजन्म में भी किसी से प्यार नहीं करती होंगी। ऐसा मेरा विश्वास है।” शैफाली ने अपना मुंह बनाते हुए कहा।

“मेरी जिंदगी तो जैसे हर जन्म में कोरा कागज ही थी।” इस बार तौफीक ने भी बातों में शामिल होते हुए कहा।

“ऐसा नहीं है तौफीक अंकल, अगर आप अभी तक हम लोगों के साथ जीवित हैं, तो तिलिस्मा में प्रवेश करने का कोई ना कोई उद्देश्य तो आपके पास भी होगा।” शैफाली ने उदास तौफीक का हाथ पकड़ते हुए

कहा।

“सिर्फ उद्देश्य होना ही जरुरी नहीं है, उद्देश्य का बेहतर होना भी जरुरी नहीं है।” जेनिथ के मुंह से जल्दबाजी में तौफीक के प्रति कटाक्ष निकल गया, जिसे तौफीक ने ध्यान से सुना, पर उस पर कोई रिएक्शन नहीं दिया।

“कैप्टेन अंकल!” शैफाली ने कहा- “अचानक से गर्मी कुछ बढ़ गयी लग रही है। प्यास भी बार-बार लग रही है।”

शैफाली की बात पर सभी ने अपनी सहमति जताई क्यों कि सभी हर थोड़ी देर बाद पानी पी रहे थे।

बर्फ के क्षेत्र से निकलने के बाद अचानक से गर्मी का बढ़ जाना किसी को भी समझ में नहीं आ रहा था।

तभी जमीन धीरे-धीरे थरथराने लगी।

“यह जमीन क्यों कांप रही है?” क्रिस्टी ने चारो ओर देखते हुए कहा- “कैप्टेन क्या भूकंप आ रहा है?”

तभी सुयश को पहाड़ की चोटी से धुंआ निकलता हुआ दिखाई दिया।

यह देख सुयश ने चीख कर कहा- “हम पर्वत की ओर नहीं बल्कि एक ज्वालामुखी की ओर बढ़ रहे हैं और वह फटने वाला है।”

सुयश के शब्द सुनकर सभी भयभीत हो गये क्यों कि दूर-दूर तक ज्वाला मुखी से बचने के लिये उनके पास ना तो कोई सुरक्षित स्थान था और ना ही ज्वालामुखी से बचने का कोई साधन।

जमीन की थरथराहट बढ़ती जा रही थी। जमीन के थरथराने की वजह से पहाड़ से कई बड़ी चट्टानें लुढ़ककर इनके अगल बगल से गुजरने लगीं।

“अब क्या करें कैप्टेन? क्या हम सब यहीं मारे जायेंगे?” क्रिस्टी ने घबराते हुए सुयश से कहा।

“नक्षत्रा ! क्या कोई हमारे बचाव का साधन है तुम्हारे पास?” जेनिथ ने नक्षत्रा से पूछा।

“तुम्हें पता है जेनिथ, कल बर्फ के ड्रैगन से बचने में पूरा समय जा चुका है और अभी 24 घंटे भी पूरे नहीं हुए हैं, इसलिये मैं ज्यादा कुछ नहीं कर सकता। हां अगर तुम्हारे ऊपर कोई पत्थर गिरा तो मैं तुम्हारी चोट को सही कर दूंगा, पर बाकी लोगों के लिये मैं वह भी नहीं कर सकता।”

नक्षत्रा की बात सुन जेनिथ का चेहरा उतर गया।

आसपास का तापमान अब बहुत ज्यादा बढ़ गया था।

तभी एक कान फाड़ देने वाला भयानक धमाका हुआ और ज्वालामुखी से हजारों टन लावा निकलकर आसमान में बिखर गया।

कुछ लावा के गोले इनके बिल्कुल बगल से निकले।

लावा की गर्मी अब सभी को साफ महसूस होने लगी थी।

तभी ज्वालामुखी का मैग्मा बहकर इन्हें अपनी ओर आता दिखाई दिया, मैग्मा के पास आने की स्पीड बहुत तेज थी।

किसी के पास अब भाग निकलने का भी समय नहीं बचा था। चारो ओर धुंआ और राख वातावरण में फैल गयी थी।

“सभी लोग मेरा हाथ पकड़ लें।” तभी शैफाली ने चीखकर कहा।

शैफाली की बात सुन सभी ने जल्दी से शैफाली का हाथ पकड़ लिया।

जैसे ही सभी ने शैफाली का हाथ थामा, शैफाली के चारो ओर एक पारदर्शी रबर का बुलबुला बन गया।

तभी मैग्मा आकर बुलबुले से छू गया, पर मैग्मा से बुलबुले पर कोई असर नहीं हुआ।

यह देखकर सभी ने राहत की साँस ली। वह बुलबुला उन्हें किसी कवच की तरह से सुरक्षित रखे हुआ था।

“बाल-बाल बचे।” क्रिस्टी ने अपने दिल की धड़कनों पर काबू पाते हुए कहा- “अगर शैफाली 1 सेकेण्ड की भी देरी कर देती, तो हमारा बचना नामुमकिन था।”

“पर शैफाली अब हम इससे निकलेंगे कैसे? क्यों कि लावा इतनी जल्दी तो ठंडा नहीं होता, फिर हम कब तक इस बुलबुले में बंद रहेंगे।” जेनिथ ने शैफाली से आगे का प्लान पूछा।

“अभी आगे के बारे में तो मुझे भी कुछ नहीं पता, मुझे तो अभी जो कुछ समझ में आया, वो मैने कर लिया। अब लावा थोड़ा ठंडा हो तो हम इससे निकलने की सोचें।” शैफाली ने कहा।

“ज्वालामुखी से निकले लावा की ऊपरी परत को ठंडा होने में कुछ ही घंटे लगते हैं, पर लावा की अंदर की परत को ठंडा होने में 3 महीने से भी ज्यादा का समय लगता है।” सुयश ने सबको समझाते हुए कहा-

“और हम इस समय ज्वालामुखी की ढलान पर खड़े हैं, जहां पर लावा रुक ही नहीं सकता, यहां पर तब तक नया लावा आता रहेगा, जब तक ज्वालामुखी से लावा निकल रहा है।

"हम ये भी नहीं कह सकते कि

ज्वालामुखी से लावा कितने समय तक निकलेगा। यह लावा कुछ महीने तक भी निकल सकता है। यानि की किसी भी तरह से अब हम इस जगह पर कई महीनें तक खड़े होने के लिये तैयार हो जाएं।”

“यानि हम लावा से मरें या ना मरें, भूख और प्यास से अवश्य मर जायेंगे?” तौफीक ने कहा।

“कैप्टेन अगर हम इस बुलबुले को लुढ़काकर यहां से दूर ले चलें तो?” जेनिथ ने सुझाव दिया- “ज्यादा से ज्यादा कुछ घंटों में हम इसे लुढ़काकर ज्वालामुखी की पहुंच से दूर जा सकते हैं।”

जेनिथ का विचार वाकई काबिले तारीफ था।

अभी ये लोग बुलबुले को लुढ़काने के बारे में सोच ही रहे थे, कि यह काम स्वयं ज्वालामुखी ने कर दिया।

हवा में उड़ता हुआ एक पत्थर का काला टुकड़ा आया और बुलबुले से टकरा गया।

जिसकी वजह से बुलबुला लुढकता हुआ ज्वाला मुखी से नीचे की ओर चल दिया।

कोई भी इसके लिये तैयार नहीं था, इसलिये सभी के सिर और शरीर आपस में टकरा गये।

फिर भी सभी खुश थे क्यों कि वह बिना मेहनत ज्वाला मुखी से दूर जा रहे थे।

कुछ ही देर में बुलबुले के घूमने के हिसाब से सभी ने अपने शरीर को एडजेस्ट कर लिया।

जेनिथ की तरकीब काम कर गयी थी। पर वह मुसीबत ही क्या जो इतनी आसानी से चली जाये।

लुढ़कता हुआ उनका बुलबुला एक बड़े से सूखे कुंए में जा गिरा और इससे पहले कि कोई कुंए से निकलने के बारे में सोच पाता, उस कुंए में उनके पीछे से लावा भरने लगा।

कुछ ही देर में लावा किसी सैंडविच की तरह से इनके बुलबुले के चारो ओर फैल गया। अब बुलबुला लुढ़कना तो छोड़ो, हिल भी नहीं सकता था।

यह देख सभी हक्का -बक्का रह गये।

“हां तो जेनिथ तुम क्या कह रही थी?” सुयश ने आशा के विपरीत मुस्कुराते हुए जेनिथ से पूछा- “इसको लुढ़का कर कहीं ले चलें... लो अब लुढ़का लो इसे।”

सुयश को मुस्कुराते देख पहले तो सभी आश्चर्यचकित हो गये फिर उन्हें लगा कि सच में दुखी होने से कौन सा हम इस मुसीबत से बच जायेंगे, इसलिये सभी के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गयी।

“मुझे तो ऐसा लगता है कैप्टेन, कि इस द्वीप का निर्माता हम पर लगातार नजर रखता है, इसलिये जैसे ही हम कोई उपाय सोचते हैं, वह हमारी सोच के विरुद्ध जाकर एक नयी मुसीबत खड़ी कर देता है।” जेनिथ ने कहा।

सभी ने सिर हिला कर अपनी सहमति जताई।

“अब क्या करें कैप्टेन? क्या सच में 3 महीने का इंतजार करना पड़ेगा यहां से निकलने के लिये?” क्रिस्टी ने कहा।

“नहीं...अब हमें बिल्कुल इंतजार नहीं करना पड़ेगा।” सुयश ने कहा- “यह शब्द मैंने ढलान पर खड़े होकर बोले थे, पर अब हम एक कुंए में हैं। अब अगर मैग्मा सूखा तो वह चट्टान में बदल जायेगा और फिर उस

चट्टान के अंदर हमारी जीते जी ही समाधि बन जायेगी।”

सुयश का यह विचार तो बिल्कुल डराने वाला था।

“यानि की हम यहां जितनी ज्यादा देर फंसे रहेंगे, उतना जिंदा रहने की संभावना खोते जायेंगे।” क्रिस्टी ने पूछा।

“जी हां, मैं बिल्कुल यही कहना चाहता हूं।”सुयश ने कहा- “अब चुपचाप सभी लोग बैठ जाओ और शांति से यहां से निकलने के बारे में सोचो।”

सभी को बैठे-बैठे आधा घंटा बीत गया, पर किसी के भी दिमाग में कोई प्लान नहीं आया।

“कैप्टेन ... देवी शलाका ने हमें कहा था कि जब तक आप हमारे साथ हो, हम नहीं हार सकते।” जेनिथ ने सुयश को याद दिलाते हुए कहा-

“सोचो...आप सुयश नहीं आर्यन बनकर सोचो...आप कोई ना कोई

उपाय अवश्य निकाल सकते हो? तिलिस्मा ने यूं ही नहीं आपको चुना है, कुछ तो है आपमें...जो हम सबसे अलग है।”

जेनिथ की बात सुनते ही सुयश को जोश आ गया और वह तेज-तेज बड़बड़ा ने लगा- “अगर मेरी जगह आर्यन होता तो वह क्या करता? ....हमारे पास भी कुछ नहीं है...इस कुंए में भी कुछ नहीं है?”

तभी सुयश की नजर बैठी हुई शैफाली पर पड़ी- “तुम बैठने के बाद तौफीक के बराबर कैसे दिख रही हो शैफाली?”

सभी सुयश की यह अजीब सी बात सुनकर शैफाली की ओर देखने लगे, जो कि सच में बैठकर तौफीक के बराबर दिख रही थी।

“अरे कैप्टेन अंकल....कुंए में नीचे की ओर कुछ है, मैं उस पर ही बैठी हुई हूं।” शैफाली ने हंसते हुए कहा।

“क्या है कुंए के नीचे?” सुयश ने हैरान होते हुए शैफाली को उस जगह से हटा दिया और टटोलकर उस चीज को देखने लगा, पर उसे समझ नहीं आया कि वह चीज क्या है?

“आप हटिये कैप्टेन अंकल, मैं छूकर आप से ज्यादा बेहतर तरीके से बता सकती हूं कि कुंए में नीचे क्या है?” यह कहकर शैफाली सुयश को हटाकर उस चीज को छूकर देखने लगी।

थोड़ी देर के बाद शैफाली ने कहा- “कैप्टेन अंकल, यह चीज कोई धातु की बनी लीवर जैसी लग रही है।”

“लीवर...।” सुयश बुदबुदाता हुआ कुंए की बनावट को ध्यान से देखने लगा और फिर खुशी से चिल्लाया- “मिल गया उपाय, बाहर निकलने का।”

सुयश के शब्द सुन सभी भौचक्के से खड़े सुयश को देखने लगे।

सुयश ने सभी को अपनी ओर देखते हुए पा कर कहा - “दरअसल हम जिसे कुंआ समझ रहे हैं, वह एक पुराने समय का फव्वारा है, जो जमीन के अंदर से इस कुंए जैसी जगह पर जोड़ा गया है। पुराने समय में ज्वालामुखी के पास रहने वाले जमीन के तापमान का नियंत्रण करने के लिये एक हाई प्रेशर वाला फव्वारा बनवाते थे। जिससे जब जमीन का तापमान बढ़ता था, तो वह फव्वारा चलाकर आस-पास की जमीन पर पानी का छिड़काव करते थे। ये वैसा ही एक फव्वारा है। अब अगर हम इस फव्वारे को किसी भी प्रकार से चला दें, तो यहां से पानी बहुत हाई प्रेशर के साथ बाहर आयेगा और इसी हाई प्रेशर से हम भी बुलबुले सहित बाहर निकल जायेंगे।”

“कैप्टेन...पर ये फव्वारा चलेगा कैसे?” क्रिस्टी ने पूछा।

“शैफाली ने जिस लीवर को छुआ, वह अवश्य ही इसी फव्वारे को चलाने वाला लीवर होगा और ऐसे लीवर हमेशा नीचे की ओर दबा कर चलाये जाते हैं।”

यह कहकर सुयश शैफाली की ओर घूमा- “शैफाली क्या तुम बता सकती हो कि तुम्हारा यह बुलबुला कितना प्रेशर झेल सकता है?”

“कैप्टेन यह एक चमत्कारी शक्ति से बना बुलबुला है, जो बुलबुला हजारों डिग्री का तापमान सह सकता है, मुझे नहीं लगता कि वह किसी भी शक्ति से टूट सकता है।” शैफाली के शब्दों में गजब का विश्वास दिख रहा था।

“फिर ठीक है...आप लोग जरा एक दूसरे को कसकर पकड़ लें, हम बस उड़ान भरने ही वाले हैं।” यह कहकर सुयश उस लीवर के ऊपर खड़ा हो गया और उछलकर जोर से लीवर पर कूदा।

परंतु वह लीवर टस से मस नहीं हुआ।

यह देख सुयश ने तौफीक को भी अपने पास बुलाया- “तुम्हें भी मेरे साथ इस लीवर पर कूदना होगा तौफीक...काफी समय से ना चलाये जाने की वजह से शायद लीवर जाम

हो गया होगा।”

तौफीक ने धीरे से सिर हिलाया।

अब सुयश ने गिनती गिनना शुरु कर दिया- “3....2.....1।”

सुयश के 1 बोलते ही सुयश और तौफीक दोनों पूरी ताकत से लीवर पर कूद पड़े।

दोनों की सम्मिलित शक्ति से लीवर एक बार में ही नीचे हो गया। 10 सेकेण्ड तक सभी ने इंतजार किया, परंतु कुछ नहीं हुआ।

जैसे-जैसे समय बीत रहा था, सबके चेहरे लटकते जा रहे थे क्यों कि यह तरीका शायद उन सबकी आखिरी उम्मीद थी।

तभी कुंए के नीचे से कुछ खट-पट की आवाज आनी शुरु हो गयी। सुयश सहित सभी के चेहरे पर मुस्कान आ गयी।

तभी बहुत ताकत से बुलबुले के नीचे से पानी की फुहार बुलबुले पर पड़ी, जिसकी वजह से बुलबुला कुंए से निकलकर आसमान में बहुत ऊंचे तक चला गया।

वहां से तो ज्वालामुखी भी नीचे लगने लगा था।

यह देख सभी ने जोर का जयकारा लगाया- “तो इसी बात पर बोलो कैप्टेन सुयश जिंदाबाद।”

सभी खुशी से चीख रहे थे। इतनी ऊंचाई से उन्हें पोसाइडन पर्वत भी दिखाई दे गया।

तभी बुलबुला अधिकतम ऊंचाई तक पहुंचकर हवा में धीरे-धीरे किसी पैराशूट की तरह नीचे आने लगा।

हवा में इस तरह नीचे आना भी अपने आप में किसी एडवेंचर से कम नहीं था। सभी के चेहरे खुशी से भरे हुए थे।

उनके चेहरों पर सुयश के लिये सम्मान के भाव नजर आ रहे थे।

जारी रहेगा________✍️
 
Jiska bhi posting me issue hai, filhaal ke liye exforum.live use karo usme sahi post ho raha hai👍
 
#132.

“कैप्टेन...आपको क्या लगता है कि मुसीबत अब खत्म हो गई?” जेनिथ के शब्द सुन सभी ने उधर देखा, जिधर जेनिथ देख रही थी।

उधर देखते ही उनकी साँसें फिर से अटक गयीं क्यों कि हवा में तैरता हुआ वह बुलबुला अब ज्वालामुखी के अंदर गिरने वाला था।

“आसमान से गिरे...खजूर में अटके तो सुना था, पर कुंए से निकले और ज्वालामुखी में लटके नहीं सुना था।” क्रिस्टी के शब्दों में फिर निराशा झलकने लगी।

बुलबुला अब सीधे ज्वालामुखी के अंदर, उसके लावे में जाकर गिरा था। जहां से निकलना अब शायद ही संभव हो पाता।

सभी की नजरें ज्वालामुखी के अंदर की ओर गई।

प्रेशर कम हो जाने की वजह से लावा अब ज्वालामुखी के ऊपर से होकर नहीं बह रहा था।

ज्वालामुखी के लावे की सतह अब काफी कम होकर ज्वालामुखी के अंदर ही सीमित हो गई थी।

लग रहा था कि जैसे द्वीप की तरह वह ज्वालामुखी भी कृत्रिम है। क्योंकि ज्वालामुखी के अंदर वह लावा, पत्थरों से बने एक विशाल बैल के मुख से निकल रहा था।

सभी एक बार फिर लावे के जाल में फंस गये थे। ऐसा लग रहा था कि जैसे लावा उन्हें छोड़ना नहीं चाहता था।

ज्वालामुखी की दीवारें भी सपाट थीं और अंदर कोई ऐसा स्थान नहीं था, जहां वह बुलबुले से निकलकर खड़े हो सकें।

“अब क्या करें कैप्टेन?...हम एक बार फिर फंस गये।” जेनिथ ने कहा।

तभी सुयश को ज्वालामुखी का सारा लावा, ज्वालामुखी के अंदर ही एक दिशा की ओर बहकर जाता दिखाई दिया।

“शायद उस तरफ से कोई रास्ता मिल जाये?” सुयश ने सभी को लावा के बहने वाली दिशा में इशारा करते हुए कहा।

“पर कैप्टेन...यह भी तो हो सकता है कि उधर से वह लावा वापस पृथ्वी की कोर में जा रहा हो?”

तौफीक ने कहा- “और अगर ऐसा हुआ तो हम पाताल में चले जायेंगे, जहां से हमारे निकलने के आसार बिल्कुल खत्म हो जायेंगे।”

“हमारे पास उस रास्ते के सिवा और कोई रास्ता भी नहीं है तौफीक।”

सुयश ने तौफीक को समझाते हुए कहा- “ये भी तो हो सकता है कि उधर से हमें बचकर निकलने का कोई रास्ता मिल जाये?”

तौफीक ने एक गहरी साँस भरी और सुयश के प्रस्ताव पर अपनी मुहर लगा दी।

अब सभी बुलबुले को धकेलकर उस दिशा में ले आये, जिधर से बहकर लावा पहाड़ों के अंदर कहीं जा रहा था।

बुलबुला अब लावे के साथ स्वतः ही तैरने लगा।

पहाड़ की ढलान लावे को गति दे रही थी। कुछ देर बाद वह लावा, आगे जा रहे एक लावे के झरने में गिरता दिखाई दिया।

लावा का झरना देखकर सभी और भयभीत हो गये।

तभी सुयश को झरने के पहले एक जगह पर कुछ खाली स्थान दिखाई दिया। जिसके ऊपर की ओर कुछ गुफा जैसे छेद दिखाई दे रहे थे।

वह स्थान थोड़ा ऊंचा होने के कारण लावा उस ओर नहीं जा रहा था।

“हमें अपने बुलबुले को उस खाली स्थान की ओर ले जाना होगा।” सुयश ने सभी को वह खाली स्थान दिखाते हुए कहा।

सभी अपने शरीर को मोड़ते हुए उस बुलबुले को खाली स्थान तक ले आये।

“यहां से आगे लावा का झरना है, जो कि पृथ्वी की कोर तक जाता हुआ हो सकता है, इसलिये हमें इस स्थान से ऊपर बने उन गुफाओं की ओर जाना होगा। शायद उससे हमें कहीं आगे निकलने का मार्ग दिखाई दे जाये। पर बुलबुले के अंदर रहकर हम उन गुफाओं तक नहीं जा सकते, इसलिये हमें अब बुलबुले से निकलना ही पड़ेगा।” सुयश ने सबको समझाते हुए कहा।

“पर कैप्टेन, हम लोग इस समय एक जीवित ज्वालामुखी के अंदर हैं, अगर यहां तापमान ज्यादा हुआ, तो बुलबुले से निकलते ही हम मारे जायेंगे।” जेनिथ ने कहा।

“तुम ठीक कह रही हो जेनिथ, पर मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं कि ऐसा कुछ नहीं होगा। क्यों कि यह एक बनाया गया कृत्रिम ज्वालामुखी है। यह ज्वालामुखी की तरह व्यवहार कर सकता है, पर ज्वालामुखी जितना तापमान नहीं बना सकता। इसलिये मैं विश्वास के साथ कहता हूं कि हम बाहर सुरक्षित रहेंगे।”

यह कहकर सुयश ने शैफाली को बुलबुले को हटाने का आदेश दे दिया।

हर बार की तरह सुयश इस बार भी सही था। उस स्थान पर गर्मी ज्यादा थी, पर इतनी गर्मी नहीं थी कि वह सहन नहीं कर पायें।

सभी को गर्मी की वजह से पसीना आने लगा था, पर शैफाली के शरीर का तापमान अभी भी नार्मल था।

शायद उसकी ड्रेस में कुछ ऐसा था जो उसे तापमान का अहसास ही नहीं होने दे रहा था।

अभी सब उन गुफाओं तक पहुंचने के बारे में सोच ही रहे थे कि तभी शैफाली को कुछ दूरी पर कोई सुनहरी चमकती हुई चीज दिखाई दी।

शैफाली बिना किसी से बोले उस दिशा की ओर बढ़ गयी।

सभी शैफाली को उस दिशा में जाते देख, उसके पीछे-पीछे चल दिये।

वह चमक लावे की राख में दबी, किसी सोने की धातु वाली वस्तु से आ रही थी।

शैफाली ने आगे बढ़कर उस वस्तु पर से राख को साफ करना शुरु कर दिया।

शैफाली को ऐसा करते देख, सभी उस वस्तु को साफ करने लगे।

सभी के प्रयासों के बाद वह वस्तु अब साफ-साफ नजर आने लगी थी। वह एक विशाल ड्रैगन का सोने का सिर था।

सभी हतप्रभ से खड़े उस विशाल ड्रैगन के सिर को देखने लगे।

“यह ज्वालामुखी के अंदर सोने का बना सिर कहां से आया।” तौफीक ने कहा- “यह तो पुरातन कला का अद्भुत नमूना लग रहा है।”

“यह नमूना नहीं है।” पता नहीं क्या हुआ कि अचानक शैफाली बहुत ज्यादा गुस्से में दिखने लगी।

शैफाली का यह प्रचंड रुप देख सभी डर गये।

“क्या हुआ शैफाली?” सुयश ने शैफाली के सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा- “तुम ठीक तो होना?”

“हां कैप्टेन अंकल मैं ठीक हूं।” शैफाली ने नार्मल तरीके से कहा- “पता नहीं क्यों मुझे इस ड्रैगन के सिर को छूकर बहुत अपनापन महसूस हो रहा है।”

इस बार शैफाली के शब्द ने सबको डरा दिया। शैफाली अभी भी उस ड्रैगन के सिर को धीरे-धीरे सहला रही थी।

तभी भावनाओं में बहकर शैफाली की आँख से आँसू निकलने लगे।

वह आँसू उस ड्रैगन के सिर पर जा गिरे।

शैफाली के आँसुओं में जाने कौन सी शक्ति थी कि शैफाली के आँसू ड्रैगन के सिर पर पड़ते ही ड्रैगन के सिर से तेज रोशनी निकलकर शैफाली में समा गई और इसके बाद वह सोने का सिर धीरे-धीरे पिघलने लगा।

यह देख सुयश ने शैफाली को चेतावनी दी- “शैफाली तुम्हारे हाथ में मौजूद ड्रैगन का सिर पिघलने लगा है, अगर तुम उसे ज्यादा देर तक पकड़े रही तो तापमान की वजह से तुम्हारा हाथ भी पिघल सकता है। इसलिये उसे अपने हाथ से छोड़ दो।”

पर सुयश की चेतावनी का शैफाली पर कोई असर नहीं हुआ, वह उस ड्रैगन के सिर की आखिरी बूंद के पिघलने तक उसे पकड़े रही।

धीरे-धीरे ड्रैगन का पूरा सिर पिघलकर ज्वालामुखी के लावे में समा गया।

थोड़ी देर तक शैफाली वहां खड़ी रही, फिर सुयश के साथ उन गुफाओं के छेद की ओर चढ़ने लगी।

सभी समझ रहे थे कि शैफाली के दिमाग में कुछ उथल-पुथल चल रहा है, पर किसी की हिम्मत अभी उससे कुछ पूछने की नहीं हो रही थी।

राक्षसलोक: (14 साल पहले.....14 जनवरी 1988, गुरुवार, 08:30, योग गुफा, हिमालय)

त्रिशाल को कलिका का इंतजार करते हुए योग गुफा में बैठे आज 8 दिन बीत गये थे। तभी किसी के पैरों की धमक से त्रिशाल का ध्यान भंग हुआ।

त्रिशाल ने आँख खोलकर देखा। सामने हनुका खड़ा त्रिशाल को निहार रहा था।

“यति राज को त्रिशाल का प्रणाम।” त्रिशाल ने हनुका को देखकर हाथ जोड़कर अभिवादन किया।

“सदैव प्रसन्न रहो।” हनुका ने अपने हाथों को खोलकर आशीर्वाद देते हुए कहा- “लग रहा है देवी कलिका, यहां पर अभी तक नहीं पहुंची।”

“पिछले 8 दिन से मैं उनकी यहां पर प्रतीक्षा कर रहा हूं, पता नहीं कैसे उन्हें आने में देर हो रही है?” त्रिशाल ने अपना रोष प्रकट करते हुए कहा।

तभी एक दिशा से कलिका की आवाज आयी- “अब आपकी प्रतीक्षा का समय समाप्त हुआ त्रिशाल, मैं आ गयी।”

कलिका को सकुशल आते देख त्रिशाल खुश हो गया।

“आपके चेहरे पर फैली मुस्कान बता रही है कि प्रकाश शक्ति आपको मिल गयी है।” त्रिशाल ने कलिका के चेहरे को देखते हुए कहा।

कलिका ने त्रिशाल की बात सुन धीरे से सिर हिलाया।

“तो फिर ‘राक्षसलोक’ चलने की तैयारी करें। अब ‘कालबाहु’ के अंत का समय निकट आ चुका है।” त्रिशाल ने जोर से हुंकार भरी।

हनुका ने दोनों को आशीर्वाद दिया और फिर आकाश मार्ग से उड़कर कहीं गायब हो गया।

त्रिशाल और कलिका अब राक्षसताल की ओर चल दिये थे।

राक्षसताल मानसरोवर झील के बगल में ही था। वह योग गुफा से ज्यादा दूरी पर नहीं था, इसलिये त्रिशाल और कलिका कुछ ही देर में राक्षसताल तक पहुंच गये।

राक्षसताल का आकार चंद्रमा के समान प्रतीत हो रहा था।

दोपहर का समय था, जिसके कारण पानी की स्वच्छता दूर से ही नजर आ रही थी।

त्रिशाल और कलिका धीरे से राक्षसताल के पानी में उतर गये। राक्षसताल का पानी, बिल्कुल खारा था।

कुछ ही देर में दोनों राक्षसताल की तली तक पहुंच गये।

राक्षसताल की तली के अंदर एक पर्वत श्रृंखला डूबी हुई थी।

तभी त्रिशाल को 2 पर्वतों के बीच एक पतला सा रास्ता दिखाई दिया, जिसके दूसरी ओर से कुछ चमक सी आती हुई प्रतीत हो रही थी।

त्रिशाल और कलिका उस पतले रास्ते पर चल पड़े। कुछ आगे उन्हें पानी के अंदर, पहाड़ में बनी एक गुफा नजर आयी।

गुफा किसी विशाल राक्षस के मुंह जैसी प्रतीत हो रही थी। वह चमक उसी गुफा के अंदर से आ रही थी।

वैसे तो वह गुफा राक्षस के मुंह की सिर्फ आकृति मात्र थी, पर उसकी पत्थर पर बनी बड़ी-बड़ी आँखें और विशाल दाँत किसी भी मनुष्य को डराने के लिये काफी थे।

“क्या इसी रास्ते से होकर हमें राक्षस लोक जाना है?” त्रिशाल ने कलिका से पूछा।

“लग तो ऐसा ही रहा है....पर जरा एक मिनट ठहरिये...पहले मुझे पूरी तरह से संतुष्ट हो जाने दीजिये।” कलिका ने कहा और ध्यान से उस गुफा को देखने लगी।

तभी गुफा को ध्यान से देख रही कलिका को राक्षस की आँख की पुतली कुछ हिलती नजर आयी।

यह देख कलिका चीखकर बोली- “रुक जाइये त्रिशाल, यह राक्षसलोक का मार्ग नहीं है, यह स्वयं कोई राक्षस है, जो विशाल गुफा का भेष धारण करके यहां पर बैठा है। मैं अभी इसका सच बाहर लाती हूं।”

यह कहकर कलिका ने अपने सीधे हाथ को उस राक्षस की आँख की ओर करके एक झटका दिया।

कलिका के हाथ को झटका देते ही, उसके हाथ से सफेद रंग की तेज रोशनी निकलकर उस राक्षस की आँख पर पड़ी।

वह सफेद रोशनी इतनी तेज थी, कि उस गुफा बने राक्षस ने घबरा कर अपनी आँखें बंद कर ली।

त्रिशाल को समझने के लिये इतना काफी था। वह जान गया कि यह सच का कोई राक्षस है।

“चलो राक्षसलोक पहुंचने से पहले अपनी शक्तियों के प्रदर्शन का इससे अच्छा अवसर नहीं मिलेगा।” त्रिशाल ने कहा- “तो दोनों में से कौन करेगा इस राक्षस का अंत?”

“आप ज्यादा उतावले नजर आ रहे हो, आप ही कर लो पहले प्रयोग। मैं जब तक इस चट्टान पर बैठकर आराम कर रही हूं।”

यह कहकर कलिका सच में आराम से एक चट्टान पर जा कर बैठ गयी।

जारी रहेगा_______✍️
 
kamdev99008

Kamu bhaiya humne itne update pel diye, or ju abhi tak gayab ho? :sigh:
 
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