Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर - Page 25 - SexBaba
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Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर

#118.

चैपटर-5: रेत मानव

(12 जनवरी 2002, शनिवार, 18:25, मायावन, अराका द्वीप)

चट्टानों के बाद रेत वाला क्षेत्र शुरु हो गया था।

सुयश की टीम में अब सिर्फ 5 लोग ही बचे थे। जेनिथ अब रास्ते भर मन में नक्षत्रा से बात करके खुश हो लेती थी।

तौफीक जेनिथ के अचानक बदले इस व्यवहार को समझ नहीं पा रहा था।

कभी-कभी वह जेनिथ से बोलने की कोशिश करता था, पर जेनिथ के रेस्पांस ना करने की वजह से अब वह बिल्कुल शांत हो चुका था।

क्रिस्टी भी ऐलेक्स के ना रहने की वजह से अब बोर होने लगी थी।

अलबर्ट के जाने के बाद शैफाली को भी कुछ झटका लगा था, पर वह धीरे-धीरे जंगल के हिसाब से ढल गयी थी।

एक सुयश ही था, जो कुछ नार्मल रहने की कोशिश कर रहा था।

“लगता है कैप्टेन और शैफाली को छोड़कर हम सभी इस रहस्यमय जंगल के अंधकार में खो जायेंगे?” क्रिस्टी ने दुखी होते हुए जेनिथ से कहा।

“तुम ऐसा क्यों सोच रही हो क्रिस्टी?” जेनिथ ने क्रिस्टी की ओर आश्चर्य से देखते हुए कहा।

“कैप्टेन को टैटू के रुप में कुछ शक्तियां मिल गयीं। शैफाली को आँखें मिल गयीं और कोई अंजान शक्ति उसे बार-बार बचा रही है। पर इसके अलावा जितने भी लोग हैं, वह सब एक-एक करके इस रहस्यमय जंगल का शिकार हो रहे हैं। शायद कल मेरा या तुम्हारा नाम भी गायब हो जाने वाले लोगों की लिस्ट में आ जाये।” क्रिस्टी ने नकारात्मक अंदाज में कहा।

क्रिस्टी की बात सुन जेनिथ को कुछ बोलते ना बना क्यों कि क्रिस्टी कह तो सही रही थी।

धीरे-धीरे शाम होने को आ रही थी। वह रेतीला क्षेत्र सभी को कम खतरनाक दिख रहा था।

ऐसा लग रहा था कि जैसे पहले कभी इधर से कोई नदी निकलती रही हो और अब उस नदी के सूख जाने की वजह से वह पूरा क्षेत्र रेत में बदल गया हो।

तभी इन्हे उसी रेत के एक तरफ एक छोटा पानी का जोहड़ दिखाई दिया।

“कैप्टेन, शाम होने वाली है, इस समय जंगल के अंदर कोई सुरक्षित स्थान ढूंढना बहुत मुश्किल होगा, क्यों ना हम आज रात इस रेत वाली जगह पर ही बिता लें? यहां पानी भी हमें मिल गया है।” तौफीक ने सुयश

को देखते हुए कहा।

सुयश को तौफीक का विचार सही लगा, इसलिये उसने अपना सिर हिला कर तौफीक को अनुमति दे दी।

सभी वहीं एक साफ-सुथरी जगह देख बैठ गये।

सुयश ने 2 पत्थरों की मदद से आग जला ली। खाना खा कर सभी वहीं सो गये। रात में किसी भी प्रकार की कोई मुश्किल नहीं आयी।

सुबह सभी लोग नित्य कर्मों से निवृत होकर चलने के लिये तैयार हो गये। चूंकि क्रिस्टी पहले तैयार हो गयी थी, इसलिये वह अकेली रेत पर बैठकर एक छोटी सी लकड़ी की मदद से जमीन पर ऐलेक्स का चित्र

बनाने लगी।

क्रिस्टी की ड्रांइग अच्छी थी। कुछ ही देर में उसने ऐलेक्स का चेहरा और एक हाथ जमीन पर ड्रा कर दिया, तभी जेनिथ की आवाज सुन वह लकड़ी को वहीं फेंक, अधूरा चित्र छोड़कर जेनिथ की ओर बढ़ गयी।

तभी एक अजीब सी घटना घटी। वह जमीन पर बनी अधूरी आकृति सजीव हो गयी।

उसने जमीन से अपना सिर उठा कर स्वयं को देखा और फिर कुछ दूर पड़ी लकड़ी को उठाकर अपने आधे बने चित्र को पूरा करने लगा।

लगभग 1 मिनट में ही उसने अपने पूरे शरीर को ड्रा कर दिया। अब वह रेत पर बना इंसान, सजीव होकर रेत से बाहर आ गया। धीरे-धीरे उसका शरीर बड़ा होने लगा।

तभी सुयश की निगाह उस रेत मानव पर पड़ गयी।

“सभी लोग सावधान! एक नया खतरा हमारे सिर पर मंडरा रहा है।” सुयश ने सभी को सचेत करते हुए कहा।

सुयश की बात सुनकर सभी का ध्यान अब उस रेत मानव की ओर गया। अब रेत मानव का आकार लगभग 50 फुट का हो गया था।

अब वह पास खड़े तौफीक पर झपट पड़ा। तौफीक किसी प्रकार गुलाटी मार कर रेत मानव की पकड़ से बच निकला।

यह देख रेत मानव ने दोबारा तौफीक को अपनी हथेली से पकड़ने के लिये अपना हाथ तौफीक की ओर बढ़ाया, पर इस बार तौफीक सावधान था, उसने तेजी से अपनी जेब से चाकू निकालकर रेत मानव की उंगलियां काट दीं।

रेत मानव ने अपनी कटी हुई उंगलियों की ओर देखा, तभी आश्चर्यजनक तरीके से रेत मानव की उंगलियां फिर से निकल आयीं।

यह देख तौफीक घबरा कर दूर भागने लगा।

“यह रेत मानव यहां आया कहां से?” सुयश ने चिल्लाते हुए सभी से पूछा- “क्यों कि मैंने इसे कहीं से आते हुए नहीं देखा?”

“कैप्टेन शायद यह इसी रेत से प्रकट हुआ है।” जेनिथ ने कहा- “क्यों कि मैंने भी इसे कहीं से आते हुए नहीं देखा।“

तभी रेत मानव ने क्रिस्टी पर हमला कर दिया। क्रिस्टी लगातार रेत मानव के चेहरे को देख रही थी।

उसे यह चेहरा कुछ जाना-पहचाना लग रहा था। क्रिस्टी ने उछलकर रेत मानव के वार से स्वयं को बचाया।

तभी उसकी नजर अपने द्वारा बनाये गये उस चित्र की ओर गई। वह चित्र इस समय पूरा बना हुआ था। यह देख क्रिस्टी हैरान हो गई।

“कैप्टेन!” क्रिस्टी ने चीखकर कहा- “मैं अभी रेत पर ऐलेक्स का चित्र बना रही थी, यह रेत मानव शायद उसी चित्र से प्रकट हुआ है?”

इस बार रेत मानव ने सुयश पर हमला कर दिया। रेत मानव का घन जैसा घूंसा सुयश से आकर टकराया।

सुयश इस शक्तिशाली प्रहार से दूर जा गिरा। भला था कि हर जगह रेत थी, जिससे सुयश को जमीन पर गिरने से चोट नहीं लगी।

उधर क्रिस्टी समझ गयी कि यह किसी प्रकार की जादुई रेत है, जिस पर बनाई कोई भी आकृति सजीव हो जाती है।

यह सोचकर क्रिस्टी ने रेत पर इस बार एक तलवार की आकृति बना दी।

रेत पर तलवार की आकृति बनते ही तलवार सजीव हो गई, पर यह क्या? तलवार ने सजीव होते ही क्रिस्टी पर ही आक्रमण कर दिया।

यह देख क्रिस्टी भागकर उस तलवार से बचने लगी।

“कैप्टेन, मैंने रेत पर तलवार बनायी, मगर अब यह तलवार भी हम पर अटैक कर रही है।” क्रिस्टी ने चिल्लाते हुए सुयश से कहा।

“तो फिर अब रेत पर कुछ मत बनाना, यह रेत ही हम लोगों की दुश्मन है, तुम इस पर जो कुछ भी बनाओगी, वह हमसे ही लड़ने लगेगी।” सुयश ने कहा।

अब एक नहीं बल्कि 2-2 खतरे उनके सामने थे। रेत मानव लगातार सुयश पर आक्रमण कर रहा था, तो वहीं तलवार क्रिस्टी के पीछे पड़ी थी।

शैफाली एक किनारे खड़ी हो कर सब कुछ शांति से देख रही थी। ऐसा लग रहा था कि जैसे उसे इस लड़ाई से कोई मतलब ही ना हो या फिर उसे पता हो कि यह युद्ध कौन जीतने वाला है?

“नक्षत्रा !” जेनिथ ने नक्षत्रा को पुकारा- “अब तो तुम्हारी समय रोकने की शक्ति रीचार्ज हो गयी होगी, क्या अब हमें उसका उपयोग करना चाहिये?”

“बिल्कुल नहीं।” जेनिथ की आशा के विपरीत नक्षत्रा ने उत्तर दिया- “जब तक बहुत जरुरी ना लगे, तब तक तो बिल्कुल नहीं। क्यों कि यहां से बचने के बाद अगर कोई इससे भी बड़ी समस्या आयी, तो क्या होगा? इसलिये थोड़ी देर तक चुपचाप खड़ी हो कर इस युद्ध का आनन्द उठाओ, फिर देखते हैं कि आगे क्या करना है?”

जेनिथ को नक्षत्रा से किसी ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी, इसलिये वह हैरान रह गई।

क्रिस्टी अपनी फुर्ती से लगातार तलवार से बच रही थी। तभी उसके दिमाग में एक विचार आया।

अब वह तलवार से बचते-बचते रेत मानव के पैरों के पास पहुंच गई।

तलवार ने जैसे ही क्रिस्टी पर वार किया, क्रिस्टी ने झुककर वह वार बचाया, पर तलवार का वह वार रेत मानव का एक पैर काट गया।

रेत मानव सुयश पर वार करते-करते पैर कटने की वजह से लड़खड़ाया।

“कैप्टेन!” क्रिस्टी ने तेज आवाज में सुयश से कहा- “आप यहां से हट जाओ, मैं इन दोनों को अकेले ही संभाल लूंगी।“

यह कह क्रिस्टी अब रेत मानव के दूसरे पैर के पास खड़ी हो गई। तलवार ने एक बार फिर से क्रिस्टी पर वार किया।

क्रिस्टी ने भी पुनरावृति कर रेत मानव का दूसरा पैर भी तलवार से कटवा दिया।

सुयश अब जेनिथ और शैफाली के पास जा कर खड़ा हो गया और क्रिस्टी का यह अभूतपूर्व प्रदर्शन देखने लगा।

रेत मानव अब दोनों पैर कट जाने से जमीन पर गिर गया था। उसके पैर दोबारा से उगना शुरु हो गये थे।

क्रिस्टी अब किसी रबर की गुड़िया की तरह रेत मानव के शरीर पर चढ़ गयी और तलवार से लगातार रेत मानव के अंगों को कटवाने लगी।

रेत मानव का आक्रमण तो इस समय रुक गया था, पर उसके कटे अंग तेजी से वापस जुड़ रहे थे।

क्रिस्टी को लग गया कि इस तरह से वह इन दोनों रेत की शक्तियों से नहीं जीत सकती।

यह सोच इस बार क्रिस्टी उछलकर उस स्थान पर आ गयी, जहां पर उसने उस रेत मानव को जमीन पर ड्रा किया था।

तलवार अब भी क्रिस्टी के पीछे थी। क्रिस्टी ने तलवार से बचते हुए, रेत मानव के चित्र को, जमीन पर

हाथ फेर कर मिटा दिया।

क्रिस्टी का सोचना बिल्कुल सही था। क्रिस्टी के द्वारा रेत मानव की आकृति के मिटाए जाते ही रेत मानव वापस से बिखरकर रेत बन गया और वहां की जमीन में वापस समा गया।

यह देख सभी खुशी से चीख कर क्रिस्टी का हौसला बढ़ाने लगे।

तभी क्रिस्टी पर लगातार वार कर रही वह तलवार अचानक से रुक गयी।

अब वह तलवार क्रिस्टी पर वार करने की जगह तेजी से जमीन पर एक शेर की आकृति को ड्रा करने लगी।

जब तक क्रिस्टी कुछ समझ पाती, तलवार ने जमीन पर शेर की आकृति को पूर्णतया ड्रा कर दिया।

तलवार के द्वारा बनाई शेर की आकृति अब सजीव होकर क्रिस्टी की ओर आगे बढ़ने लगी।

यह देख सुयश तेजी से आगे बढ़कर तलवार की ओर झपटा।

पर अचानक से तलवार ने सुयश पर हमला कर दिया। सुयश अब आकृति को मिटाने की जगह स्वयं तलवार से बचने की कोशिश करने लगा।

तलवार अब एक बार सुयश पर वार करती और जब तक सुयश उठता, तब तक वह रेत पर एक भालू का चित्र ड्रा करने लगी।

उधर क्रिस्टी भी अब शेर से बचने में पूरी तरह से व्यस्त हो गयी थी। यह देख जेनिथ भागकर उस स्थान पर पहुंच गई, जहां पर क्रिस्टी ने रेत पर तलवार का चित्र बनाया था।

जेनिथ ने आगे बढ़कर रेत से तलवार का चित्र मिटा दिया, परंतु तब तक तलवार ने भालू का चित्र पूरा कर दिया था।

अब तलवार तो रेत में मिल गई, पर रेत से भालू उठकर खड़ा हो गया। लेकिन भालू ने खड़े होते ही किसी पर हमला नहीं किया, बल्कि एक तेज आवाज कर शेर का ध्यान भी अपनी ओर करवाया।

शेर अब क्रिस्टी से लड़ना छोड़ कर भालू की ओर देखने लगा।

किसी को भी समझ नहीं आया कि ये दोनों जानवर लड़ना छोड़कर रुक क्यों गये? तभी भालू और शेर एक दिशा की ओर भागे।

सभी को लगा कि जैसे वह जीत गये हों, इसलिये वह दोनों जानवर वहां से भाग रहे हैं।

पर वह दोनों जानवर बहुत विचित्र थे। भागते हुए जब दोनों जानवर रेत में काफी दूर तक पहुंच गये, तो दोनों अचानक से रुक कर, जमीन पर भयानक जानवरों की आकृतियां ड्रा करने लगे।

एक पल में क्रिस्टी समझ गयी कि अब क्या होने वाला है। उसने तेजी से भालू और शेर की बनी आकृतियों को ढूंढ कर रेत से मिटा दिया।

शेर और भालू मारे गये थे, परंतु तब तक शेर और भालू ने 5 खतरनाक जानवरों को और रेत से जिंदा कर दिया था, और उन जानवरों के चित्र उन सबसे बहुत दूर बना ये गये थे।

अब धीरे-धीरे रेत के उस किनारे पर भयानक जानवर बढ़ते जा रहे थे। जो भी जानवर रेत से उत्पन्न होता, वह हमला करने की जगह अन्य जानवरों का निर्माण शुरु कर दे रहा था।

“क्रिस्टी!” सुयश ने क्रिस्टी की ओर देखते हुए कहा- “अब हम कुछ भी नहीं कर सकते, रेत पर जानवरों की फौज बढ़ती जा रही है। किसी भी पल ये सब हम पर हमला कर सकते हैं और हम अब इनकी आकृतियों को रेत से मिटा भी नहीं सकते। हमें अब भागना ही पड़ेगा।”

“नहीं कैप्टेन, क्रिस्टी भागने वालों में से नहीं है, माना कि मेरे पास कोई चमत्कारी शक्ति नहीं है, फिर भी मैं आपसे वादा करती हूं कि मैं यहीं पर खड़े-खड़े इन सारे जानवरों को मार सकती हूं।”

क्रिस्टी के शब्दों में ज्वाला सी नजर आने लगी।

सभी भौचक्के से क्रिस्टी के चेहरे को देख रहे थे। किसी की समझ में नहीं आया कि क्रिस्टी कैसे बिना किसी शक्ति के इन सारे जानवरों को एक साथ मारने का दावा कर रही है।

तभी रेत के उस ओर से सैकड़ों की संख्या में जंगली जानवर उनकी ओर गर्जना करते हुए चल पड़े।

क्रिस्टी ध्यान से सभी को अपनी ओर आते देख रही थी, तभी क्रिस्टी ने जेनिथ, तौफीक, शैफाली और सुयश की ओर देखते हुए कहा-

“सभी लोग एक गहरी साँस ले लीजिये और नहाने के लिये तैयार हो जाइये।”

इससे पहले कि कोई क्रिस्टी के शब्दों को समझ पाता , क्रिस्टी ने रेत पर बैठकर एक नदी को ड्रा कर दिया।

क्रिस्टी के नदी को ड्रा करते ही उफान मारती नदी की एक लहर आयी, जिससे रेत पर बने सभी निशान एक साथ मिट गये और इसी के साथ गायब हो गया, हर वह जानवर जो कि रेत से बना था।

नदी की लहर ने रेत पर बनी नदी के चित्र को भी मिटा दिया, परंतु ना जाने क्यों वह नदी गायब नहीं हुई।

सभी पानी से निकलकर किनारे पड़ी रेत पर वापस आकर लेट गये।

इस खतरनाक युद्ध ने सभी को थका दिया था, फिर भी सभी की आँखों में क्रिस्टी के लिये प्रशंसा के भाव थे।

“देखा क्रिस्टी, मैं ना कहती थी कि तुम्हें इस जंगल में कुछ नहीं होगा।” जेनिथ ने क्रिस्टी को देखते हुए कहा-

“तुम्हें पता है कि दुनिया में उत्पन्न हर जानवर चाहे एक दिन खत्म हो जाये, पर इंसान कभी खत्म नहीं होगा। क्यों कि उसके हौसले से बढ़कर कुछ नहीं है और तुम्हें एक बात और बताऊं, तुम्हें कभी भी किसी चमत्कारी शक्ति की जरुरत नहीं पड़ेगी, तुम्हारी शारीरिक फुर्ती और दिमाग ही तुम्हारी शक्ति है। आज तुमने वो कर दिखाया, जो शायद कोई चमत्कारी शक्ति वाला नहीं कर पाता। शायद इस रहस्यमयी जंगल ने तुम्हें इसीलिये चुना है।”

क्रिस्टी जेनिथ के शब्दों को सुनकर खुश हो गयी। उसने जेनिथ को गले से लगा लिया। यह देख शैफाली भी उनसे आकर लिपट गयी।

कुछ देर गले लगे रहने के बाद क्रिस्टी सबसे अलग हो गयी।

तभी क्रिस्टी को नदी में कोई सुनहरी वस्तु चमकती हुई दिखाई दी। क्रिस्टी सबसे अलग हो कर ध्यान से उस चमकीली वस्तु को देखने लगी।

क्रिस्टी के देखते ही उस वस्तु की चमक थोड़ी और बढ़ गयी। यह देख क्रिस्टी ने एक गहरी साँस भरी और पानी में छलांग लगा दी।

कुछ ही देर में क्रिस्टी नदी से बाहर आ गयी। अब उसके हाथ में एक काँच की पेंसिल थी। पेन्सिल के अंदर सुनहरी रेत थी, जो अपने आप पेन्सिल के अंदर घूम रही थी। उसी रेत से सुनहरी रोशनी निकल रही थी।

“यह क्या चीज है?” सुयश ने पेन्सिल को देखते हुए पूछा।

“मुझे भी नहीं पता, मुझे तो बस ये चमकता दिखाई दिया, इसलिये मैं इसे ले आयी।” क्रिस्टी ने कहा।

“शायद इस जंगल के तिलिस्म ने आपको, आपकी ड्रांइग के लिये यह पेन्सिल दी है।” शैफाली ने मुस्कुराते हुए कहा- “एक बार चला कर देखिये, कहीं यह कोई जादुई पेंसिल तो नहीं ?”

“एक मिनट रुको ।” सुयश ने क्रिस्टी को चेतावनी देते हुए कहा-

“एक तो यह पेन्सिल इस रेत पर मत चलाना, दूसरा अगर इससे कुछ बनाना तो ऐसी कोई खतरनाक चीज मत बनाना जो फिर से हम पर हमला कर दे।”

क्रिस्टी ने सुयश की बात को ध्यान से सुना और धीरे से सहमति से सिर हिला दिया।

क्रिस्टी ने पेन्सिल से अपनी हथेली पर एक सेब बना लिया। सुनहरी इंक से बना सेब काफी अच्छा लग रहा था।

पर उस सेब को बनाने से कोई चमत्कारी घटना नहीं घटी, यह देख सभी खुश हो गये।

क्रिस्टी ने वह पेन्सिल उस भयानक युद्ध के एक प्रतीक के तौर पर अपनी जेब में रख ली।

सभी अब उठकर आगे चलने की तैयारी करने लगे।

जारी रहेगा_______✍️
 
#119.

गोंजालो से युद्ध:

(13 जनवरी 2002, रविवार, 07:10, सामरा राज्य, अराका द्वीप)

पंचशूल प्राप्त करने के बाद व्योम को उसमें काफी शक्ति का अहसास होने लगा था।

व्योम ने एक नजर फिर उस मूर्ति वाली दिशा की ओर मारी और जंगल में उस दिशा की ओर बढ़ गया।

सुबह का समय था, हवाओं में ठंडक का अहसास था। सामरा घाटी में चारो ओर रंग बिरंगे फूल लगे थे, जो कि उस घाटी की सुंदरता को बहुत ही खूबसूरत बना रहे थे।

रास्ते में लगे पेड़ों से व्योम ने फल खाकर पानी पी लिया था। व्योम को चलते हुए एक घंटा हो गया था।

रास्ते में व्योम को एक साफ पत्थर दिखाई दिया, व्योम कुछ देर के लिये उस पत्थर पर बैठकर इस घाटी के बारे में सोचने लगा।

व्योम को लग रहा था कि इस जंगल में अनेकों खतरों का सामना करना पड़ेगा, पर रास्ते में उसे कोई भी खतरा दिखाई नहीं दिया।

तभी व्योम को सूखे पत्ते के खड़कने की एक आवाज सुनाई दी। उसकी आँखें तुरंत आवाज की दिशा में घूम गईं।

व्योम को दूर से चलकर आता हुआ एक साया दिखाई दिया। ऐसे घने जंगल में किसी को देखकर, व्योम तुरंत एक पेड़ की ओट में छिप गया।

धीरे-धीरे चलता हुआ वह साया व्योम के बगल से गुजरा। वह सामरा राज्य की खूबसूरत राजकुमारी त्रिकाली थी।

त्रिकाली का रंग दूध के समान गोरा और बाल भूरे रंग के थे।

त्रिकाली ने किसी पौराणिक राजकुमारी की तरह पीले रंग की सुंदर सी ड्रेस पहन रखी थी। उसके गले में सोने का हार और हाथों में सोने की चूड़ियां भी पहन रखीं थीं।

त्रिकाली के हाथ में एक सोने की थाली थी, जिसमें कुछ पूजा का सामान रखा था।

त्रिकाली को देखकर व्योम को बहुत आश्चर्य हुआ।

“इतने भयानक जंगल में इतनी सुंदर लड़की अकेले क्यों घूम रही है?” व्योम ने अपने मन में सोचा- “और... इसका पहनावा तो किसी राजकुमारी के जैसा है। इस लड़की के इस प्रकार घूमने में कुछ ना कुछ तो रहस्य अवश्य है?...कहीं यह उन बौनों की राजकुमारी तो नहीं है? मुझे इसका पीछा करके देखना चाहिये।”

यह सोच व्योम दबे कदमों से त्रिकाली के पीछे चल दिया।

त्रिकाली भी उसी दिशा में जा रही थी, जिधर व्योम ने एक ऊंची सी मूर्ति को पहाड़ से देखा था।

कुछ देर तक पीछा करते रहने के बाद व्योम को वह मूर्ति दिखाई देने लगी।

मूर्ति को देख व्योम हैरान रह गया। वह मूर्ति हिं..दू देवी महा…का..ली की थी। मूर्ति में देवी को नरमुंडों की माला पहने और जीभ निकाले दिखाया गया था। देवी ने अपने आठों हाथों में अलग-अलग शस्त्र को धारण कर रखा था।

“देवी की मूर्ति अटलांटिक महासागर के इस रहस्यमय द्वीप के जंगल में कहां से आयी?” व्योम को मूर्ति को देख बिल्कुल भी विश्वास नहीं हो पा रहा था।

त्रिकाली, मूर्ति के पास जाकर रुक गयी। त्रिकाली ने अपने हाथ में पकड़ी पूजा की थाली को वहीं जमीन पर रख दिया और देवी की मूर्ति के सामने हाथ जो ड़कर अपना सिर झुकाया।

अब त्रिकाली पूजा की थाली से सामान निकालकर देवी की पूजा करने लगी। व्योम अभी भी पेड़ के पीछे छिपा हुआ त्रिकाली को देख रहा था।

तभी व्योम की नजर त्रिकाली की ओर बढ़ रहे एक अजीब से जीव पर पड़ी।

वह जीव कई जानवरों का मिला-जुला रुप दिख रहा था।

उस जानवर का शरीर 6 फुट ऊंची एक विशाल बिल्ली की तरह का दिख रहा था, उसके सिर पर कुछ अजीब से पंखों का ताज जैसा लगा दिखाई दे रहा था। उसके शरीर पर मछली के समान गलफड़ बने थे, जिसे देखकर साफ पता चल रहा था कि वह जीव पानी में भी आसानी से साँस ले सकता है।

उस जानवर की पूंछ पीछे से किसी झाड़ू के समान थी। उसने अपने गले में धातु के लॉकेट में एक पीले रंग का रत्न पहन रखा था।

व्योम ने आज तक किताबों में भी कभी ऐसा जीव नहीं देखा था।

वह जीव दबे पाँव त्रिकाली की ओर बढ़ रहा था।

व्योम देखते ही समझ गया कि यह जीव त्रिकाली पर हमला करने जा रहा है। व्योम ने अपनी जेब से चाकू को निकालकर तुरंत अपने हाथ में पकड़ लिया और धीरे-धीरे उस जीव की ओर बढ़ने लगा।

उस विचित्र जीव का पूरा ध्यान त्रिकाली पर था, इसलिये उसने पीछे से आते व्योम को नहीं देखा।

व्योम ने उस जीव के पास पहुंच, जोर से आवाज की।

इससे पहले कि वह जीव कुछ समझ पाता, व्योम छलांग मारकर उसकी पीठ पर चढ़ गया और अपने दोनों हाथों की कुण्डली बना उस जीव का गला पकड़ लिया।

व्योम की आवाज सुन त्रिकाली ने पीछे पलटकर देखा। त्रिकाली की नजर जैसे ही उस जीव पर पड़ी, वह उस जीव को पहचान गयी।

वह जीव जैगन का सेवक गोंजालो था, जिसमें अनेकों विचित्र शक्तियां थीं।

गोंजालो को देख त्रिकाली डर गयी, क्यों कि वह गोंजालो की शक्तियों से भली-भांति परिचित थी।

तभी त्रिकाली की नजर गोंजालो की पीठ पर बैठे व्योम की ओर गयी, जो एक साधारण चाकू से गोंजालो से भिड़ा हुआ था।

व्योम की हिम्मत और उसके बलिष्ठ शरीर की मसल्स देख त्रिकाली व्योम पर मोहित हो गई।

तभी गोंजालो ने अपनी पीठ को नीचे की ओर सिकोड़ा और फिर बहुत तेजी से ऊपर कर दिया।

व्योम को गोंजालो के इस दाँव का कोई अंदाजा नहीं था, इसलिये व्योम गोंजालो की पीठ से उछलकर एक पेड़ से जा टकराया।

वह टक्कर इतनी प्रभावशाली थी कि वह पेड़ ही अपने स्थान से उखड़ गया।

त्रिकाली को लगा कि इतनी भयानक टक्कर के बाद तो व्योम उठ भी नहीं पायेगा, पर त्रिकाली की आशा के विपरीत व्योम उछलकर खड़ा हुआ और फिर से गोंजालो को घूरने लगा।

अब गोंजालो ने अपने सिर को एक झटका दिया। ऐसा करते ही उसके सिर पर लगे पंखों के ताज से कुछ पंख निकलकर तेजी से व्योम की ओर बढ़े। उन पंखों के आगे के सिरे, काँटों जैसे नुकीले थे।

उन पंखों का निशाना व्योम के दोनों पैरों की ओर था। काँटों को अपनी तरफ बढ़ते देख व्योम तेजी से उछला।

पर जैसे ही व्योम उछला, वह 50 फुट ऊपर तक हवा में चला गया।

यह देख गोंजालो और त्रिकाली को छोड़ो, व्योम स्वयं ही आश्चर्य में पड़ गया। व्योम अब हवा में धीरे-धीरे किसी पतंग की मानिंद लहरा रहा था।

“यह मैं हवा में कैसे लहरा रहा हूं? क्या यह उस पंचशूल की किसी शक्ति का असर है?” व्योम ने सोचा।

तभी गोंजालो की पूंछ तेजी से लंबी हुई और व्योम के पैरों में लिपट गई।

इससे पहले कि व्योम कुछ समझ पाता, गोंजालो ने व्योम को अपनी पूंछ में लपेटकर बिजली की तेजी से एक चट्टान पर पटक दिया।

एक बहुत जोरदार आवाज हुई और चट्टान के टुकड़े-टुकड़े हो गये, पर व्योम को एक खरोंच भी नहीं आयी।

यह देख त्रिकाली मंत्रमुग्ध हो गई- “वाह! कितना बलशाली पुरुष है, मैं तो इसे साधारण मानव समझ रही थी, पर इसमें तो बहुत सी शक्तियां हैं।”

त्रिकाली को अब इस युद्ध में मजा आने लगा था। वह किसी दर्शक की भांति एक पेड़ के पास खड़ी होकर इस युद्ध का पूर्ण आनन्द उठाने लगी थी।

व्योम भी स्वयं की शक्तियों से आश्चर्य में था।

इस बार व्योम ने गोंजालो की पूंछ को पकड़कर जोर से घुमाया और उसे आसमान में दूर उछाल दिया।

यह व्योम की एक छोटी सी ताकत का नमूना था। गोंजालो आसमान में बहुत ऊंचे तक गया, पर अचानक उसने अपने शरीर को सिकोड़कर अपने वेग को नियंत्रित किया और आसमान से लहराते हुए नीचे की ओर आने लगा।

इस बार गोंजालो के शरीर के मछली वाले भाग से एक बिजली निकलकर कड़कती हुई व्योम की ओर बढ़ी।

वह बिजली व्योम के शरीर से जाकर टकराई।

गोंजालो पूरा निश्चिंत था कि इस बार व्योम के शरीर के चिथड़े उड़ जायेंगे, पर गोंजालो की बिजली का व्योम पर कोई असर नहीं हुआ।

इस बार व्योम ने अपना दाहिना हाथ झटककर गोंजालो की ओर बढ़ाया।

व्योम के दाहिने हाथ में अब पंचशूल नजर आने लगा।

पंचशूल से एक बिजली की लहर निकलकर गोंजालो पर पड़ी और गोंजालो का पूरा जिस्म उस तेज बिजली से झुलस गया।

तभी हवा में एक गोला प्रकट हुआ। गोंजालो उस गोले में समा कर गायब हो गया।

उधर त्रिकाली लगातार व्योम की अद्भुत शक्तियों को देख रही थी। अब उससे रहा ना गया और वह बोल उठी- “तुम कौन हो पराक्रमी? तुम में तो देवताओं जैसी अद्भुत शक्तियां हैं।”

अपना काम करके पंचशूल वापस हवा में विलीन हो गया।

त्रिकाली को अंग्रेजी भाषा में बात करते देख व्योम आश्चर्य से भर उठा।

“मेरा नाम व्योम है, मैं तो एक साधारण इंसान हूं, यह सारी शक्तियां तो मुझे इस रहस्यमय घाटी से प्राप्त हुईं हैं। मैं अभी स्वयं इन्हें समझने की कोशिश कर रहा हूं। पर आप कौन हैं? और इस खतरनाक घाटी में अकेली क्या कर रहीं हैं? और आप इतनी अच्छी अंग्रेजी भाषा कैसे बोल रहीं हैं?”

“मेरा नाम त्रिकाली है। मैं इसी द्वीप की रहने वाली हूं और मुझे अंग्रेजी ही नहीं, और भी कई भाषाएं आती हैं।” त्रिकाली ने कहा- “पर तुम इस द्वीप पर कैसे आ गये? यहां पर तो किसी का भी पहुंचना बिल्कुल

नामुमकिन सा है।”

“इस क्षेत्र में मेरी बोट का एक्सीडेंट हो गया था, जिसके कारण भटककर मैं यहां आ गया।” व्योम ने मुस्कुराते हुए कहा- “वैसे इस द्वीप का नाम क्या है? और यह किस देश के अंतर्गत आता है?”

“इस द्वीप का नाम अराका है और यह एक स्वतंत्र द्वीप है। यह किसी देश की सीमा में नहीं आता और मैं इस द्वीप के राजा कलाट की बेटी हूं। मैं यहां देवी की पूजा के लिये आयी थी। तभी पीछे से उस जीव ने आक्रमण कर दिया था, पर आपने मुझे बचा लिया। इसके लिये आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।”

“अच्छा तो आप इस द्वीप की राजकुमारी हैं।” व्योम ने थोड़ा झुककर त्रिकाली को सम्मान देते हुए कहा- “लेकिन आप इतने भयानक जंगल में अकेले यहां क्या कर रहीं हैं? यहां तो हर कदम पर खतरे भरे हुए हैं।”

“मैं पूजा पर हमेशा अकेली ही आती हूं।” त्रिकाली ने कहा- “वैसे मेरे गले में हमेशा रक्षा कवच रहता है, जिसकी वजह से जंगल के कोई भी जानवर मुझ पर आक्रमण नहीं करते हैं, पर आज नहाने के बाद, मैं रक्षा कवच गले में पहनना भूल गई।”

यह कहकर त्रिकाली ने अपने वस्त्रों में छिपा एक काले रंग का मोटा सा धागा निकाला, जिसके नीचे एक लाल रंग का रत्न लगा हुआ था।

“क्या आप यह रक्षा कवच मेरे गले में बांध सकते हैं?” त्रिकाली ने रक्षा कवच को व्योम की आँखों के आगे लहराते हुए कहा।

“जी हां! क्यों नहीं ।” व्योम ने त्रिकाली के हाथों से रक्षा कवच लेकर एक नजर उस पर डाली और फिर उसके पीछे की ओर आ गया।

त्रिकाली ने अपने भूरे बालों को अपने हाथों से आगे की ओर कर लिया। व्योम की नजर त्रिकाली की दूध सी सफेद गोरी गर्दन की ओर गई।

व्योम थोड़ी देर तक त्रिकाली को निहारने लगा, तभी त्रिकाली बोल उठी- “क्या हुआ बंध नहीं रहा है क्या?”

“न...नहीं...नहीं ऐसी कोई बात नहीं है...वो...वो...मैं कुछ सोचने लगा था?” व्योम ने घबरा कर कहा और त्रिकाली के गले में उस धागे को बांध दिया।

जब व्योम, त्रिकाली के गले में रक्षा कवच बांध रहा था, तो त्रिकाली ने देवी का..ली को देखते हुए आँख बंद करके होंठो ही होंठो में कोई मंत्र बुदबुदाया, जो व्योम को दिखाई नहीं दिया।

रक्षा कवच गले में बंधते ही त्रिकाली के होंठो पर एक गहरी मुस्कान छा गई।

“ठीक से तो बांधा है ना?” त्रिकाली ने मुस्कुराते हुए कहा- “कहीं खुल तो नहीं जायेगा?”

“नहीं ... नहीं …. मेरी बांधी गांठ कभी नहीं खुलती।” यह बोलते हुए व्योम के चेहरे पर भी मुस्कुराहट आ गयी।

तभी त्रिकाली ने अपने वस्त्रों में छिपा एक और रक्षा कवच निकाल लिया। व्योम की नजर अब दूसरे रक्षा कवच पर थी, जैसे वह पूछना चाहता हो कि अब इसका क्या?

त्रिकाली व्योम को इस प्रकार देखते पाकर बोल उठी- “अरे यह तुम्हारे लिये है। यहां कदम-कदम पर खतरे भरे पड़े हैं, इसलिये तुम्हारा बचाव भी जरुरी है।”

व्योम पहले तो हिचकिचाया फिर उसने त्रिकाली से रक्षा कवच अपने गले में बंधवा लिया।

रक्षा कवच बांधने के बाद त्रिकाली व्योम से बिना कुछ कहे अपनी अधूरी पूजा को पूरा करने के लिये दोबारा से देवी की मूर्ति के पास बैठ गई।

व्योम ने बीच में कुछ कहना ठीक ना समझा, इसलिये वह भी अपने जूते उतारकर, त्रिकाली के पास वहीं जमीन पर बैठ गया।

व्योम अब आँख बंद किये, हाथ जोड़े बैठी त्रिकाली को अपलक निहार रहा था।

थोड़ी देर पूजा करने के बाद त्रिकाली ने आँखें खोली और व्योम को बगल में बैठा देख मुस्कुरा उठी। फिर त्रिकाली ने देवी के सामने हाथ जोड़कर सिर झुकाया।

“तुम भी देवी के सामने हाथ जोड़ लो।” त्रिकाली ने व्योम से कहा- “देवी सबकी इच्छाएं पूरी करती हैं।”

व्योम ने कुछ सोचा और फिर उसने भी देवी के सामने सिर झुकाया।

व्योम के सिर झुकाते ही उसके गले में पड़ा रक्षा कवच का लाल रत्न एक बार तेजी से चमका, जिसे चमकते देख त्रिकाली के चेहरे पर एक गहरी मुस्कान आ गयी।

त्रिकाली अब उठकर खड़ी हो गयी और एक दिशा की ओर चल दी।

“अरे-अरे... कहां जा रही हो आप?” त्रिकाली को जाते देख व्योम बोल उठा- “अभी तो मुझे आपसे बहुत सारे प्रश्नों का जवाब चाहिये।”

“अगर जवाब चाहिये तो मेरे साथ चलना पड़ेगा। मैं यहां पर तुम्हारे किसी भी सवाल का जवाब नहीं दे सकती।” त्रिकाली ने कहा।

“ठीक है मैं चलने के लिये तैयार हूं।” व्योम भी त्रिकाली के पीछे-पीछे चल दिया।

जारी रहेगा_______✍️
 
#120.

मैग्नार्क द्वार: (13 जनवरी 2002, रविवार, 10:20, मायावन, अराका द्वीप)

सभी जंगल में आगे की ओर बढ़ रहे थे।

रेत मानव से सभी को बचाने के बाद क्रिस्टी में एक अंजाना सा विश्वास आ गया था। अब वह थोड़ा खुश सी लग रही थी। शायद अब उसे भी इस रहस्यमय जंगल से निकलने की उम्मीद हो गई थी।

“क्या बात है?” शैफाली ने मुस्कुराते हुए कहा- “आज तो क्रिस्टी दीदी बहुत खुश दिख रही हैं। कुछ खास है क्या?”

शैफाली की बात सुन जेनिथ के चेहरे पर भी एक भीनी सी मुस्कान बिखर गई।

“खुशी की तो बात ही है, इतने खतरनाक रेत मानव और तिलिस्मी मुसीबतों से सबको बचाना कोई आसान बात थोड़ी ही थी।” जेनिथ ने कहा।

“आप सही कह रहीं हैं जेनिथ दीदी।” शैफाली ने जेनिथ से कहा- “कम से कम क्रिस्टी दीदी को अपनी ताकत के बारे में पता तो है। एक हम हैं, पता ही नहीं चलता कि आखिर हमारे पास शक्तियां कौन सी हैं? कभी याद आती हैं, तो एक पल में ही सब चली जाती हैं। मैं तो स्वयं को ही नहीं समझ पा रही हूं।”

सभी बात करते हुए क्रिस्टी के द्वारा उत्पन्न हुई नदी के किनारे-किनारे चल रहे थे।

जैसे-जैसे यह लोग आगे बढ़ रहे थे, पत्थरों का रंग सफेद से नारंगी होता जा रहा था।

तभी सभी को 2 छोटे पहाड़ों के बीच एक बड़ा सा अर्द्धचंद्राकार आर्क दिखाई दिया।

वह नदी इसी आर्क के बीच से होकर आती दिख रही थी। आर्क से निकलकर सूर्य की सुनहरी किरणें नदी के पानी को प्रकाशित कर रहीं थीं।

“वाह! कितना सुंदर दृश्य है।” जेनिथ ने उस दृश्य को अपनी आँखों में भरते हुए कहा- “वह आर्क बिल्कुल किसी प्रकृति के द्वार की तरह प्रतीत हो रहा है।”

सभी मंत्रमुग्ध से कुछ देर तक उस दृश्य को देखते रहे, फिर आगे बढ़कर उस आर्क के पास पहुंच गये।

दूसरी ओर जाने का रास्ता आर्क के बीच से ही होकर जा रहा था।

उस पथरीले आर्क के दोनों ओर 2 जलपरियों की मूर्तियां भी बनीं थीं, जिन्होंने अपने हाथों में ग्लोब पकड़ रखी थी।

उस आर्क के पास जमीन पर एक छोटा सा बोर्ड लगा था, जिसके बीचो बीच में अलग-अलग अंग्रेजी के 7 अक्षर भी चिपके हुए थे।

वह अक्षर थे- “CRANGAM” उन अक्षरों को देखकर सभी के मुंह से एक साथ निकला- “क्रैंगम!”

“लगता है यह भी किसी प्रकार के तिलिस्म का हिस्सा है।” क्रिस्टी ने कहा- “क्यों कि यहां कि सारी चीजें किसी के द्वारा बनाई गयी दिख रहीं हैं।”

“सही कहा क्रिस्टी ने।” सुयश ने भी उस पूरे आर्क को देखते हुए कहा- “मुझे भी यह कोई नयी समस्या दिख रही है, पर इस क्रैंगम का मतलब क्या हुआ?”

पर सुयश के इस सवाल का जवाब उनमें से किसी के भी पास नहीं था।

“सभी लोग ध्यान रखें।”तौफीक ने कहा- “कोई भी किसी भी चीज को, समझे बिना नहीं छुएगा। क्यों कि हमें नहीं पता कि किस चीज में क्या परेशानी छिपी हुई है?”

सभी ने तौफीक की बात पर सहमति जताते हुए अपने सिर हिलाये।

“कैप्टेन अंकल!” शैफाली ने सुयश से कहा- “क्यों ना हम बिना किसी चीज को छुए हुए नदी के बगल में मौजूद छोटे से जमीनी रास्ते से उस पार चलें? क्यों कि हम कितना भी सोचकर किसी भी चीज को हाथ

लगाएं? हम उसमें छिपी परेशानी को पहचान नहीं पायेंगे।”

“शैफाली सही कह रही है।” सुयश ने सभी को देखते हुए कहा- “हमें बहुत धीरे-धीरे बिना किसी चीज को छुए ही इस आर्क को पार करना पड़ेगा।”

सुयश की बात सुन तौफीक ने स्वयं आगे बढ़कर उस आर्क के उस पार जाने की सोची, तभी तौफीक का हाथ किसी अदृश्य दीवार से टकराया।

उस अदृश्य दीवार ने तौफीक को उस पार नहीं जाने दिया।

“कैप्टेन, यहां पर कोई अदृश्य दीवार है, जो मुझे उस पार नहीं जाने दे रही।” तौफीक ने अदृश्य दीवार को हाथ से टटोलते हुए कहा।

तौफीक की बात सुन सभी ने हाथ के स्पर्श से उस दीवार को छूकर देखा।

“अब क्या करें कैप्टेन?” क्रिस्टी ने कहा- “हमारा उस पार जाना भी जरुरी है और यह आर्क की अदृश्य दीवार हमें उस पार जाने भी नहीं दे रही।”

मगर सुयश से पहले ही शैफाली बोल उठी- “नदी.... हो ना हो इस आर्क के उस पार जाने का रास्ता इस नदी से होकर जाता होगा।”

“मैं भी शैफाली की बात से सहमत हूं।” जेनिथ ने कहा- “हममें से किसी को पानी के अंदर उतरकर उस पार जाने की कोशिश करनी होगी।”

“यह कोशिश मैं करती हूं।” क्रिस्टी ने अपना हाथ ऊपर उठाते हुए कहा।

किसी ने भी क्रिस्टी की बात पर ऐतराज नहीं जताया। यह देख क्रिस्टी ने अपनी जींस को थोड़ा फोल्ड करके ऊपर चढ़ाया और अपने जूते उतारकर नदी में कूद गयी।

क्रिस्टी ने अपना सिर पानी की सतह के नीचे करते हुए उस आर्क को पार करने की कोशिश की, पर क्रिस्टी को पानी के अंदर भी वह अदृश्य दीवार महसूस हुई।

यह सोच क्रिस्टी डाइव मारकर नदी की तली की ओर चल पड़ी।

नदी कोई ज्यादा गहरी नहीं थी। थोड़ी ही देर में क्रिस्टी नदी की तली में खड़ी थी।

नदी के तली में बहुत से नीले पौधे लगे हुए थे। तभी क्रिस्टी के निगाह पानी में बने बाकी के आधे आर्क पर पड़ी।

वह आधा आर्क उल्टा बना हुआ था, यानि अगर वह नदी ना होती तो वह आर्क नहीं एक पूरा रिंग दिखाई देता।

पानी के अंदर के आर्क की ओर 2 परियां बनीं थीं, जिन्होंने अपने हाथों में जादुई छड़ी पकड़ रखी थी।

वह दोनों परियां आर्क से जुड़ी उल्टी खड़ीं थीं।

जब क्रिस्टी को पानी के अंदर से आर्क में जाने का कोई रास्ता नहीं दिखाई दिया, तो वह नदी से निकलकर बाहर आ गयी।

क्रिस्टी ने नदी के अंदर का पूरा दृश्य सभी को बता दिया।

“इसका क्या मतलब हुआ?” जेनिथ ने कहा- “अगर हम पानी से भी उस पार नहीं जा सकते और जमीन से भी नहीं तो फिर हम उस पार कैसे जायेंगे?”

“एक मिनट क्रिस्टी दीदी मुझे जरा एक बार फिर से बताना कि नीचे 2 जलपरियां उल्टी खड़ी हैं, आपने सही बताया ना?” शैफाली ने क्रिस्टी से दोबारा से पुष्टि करते हुए कहा।

“हां...बिल्कुल सही।” क्रिस्टी ने अपना सिर हां में हिलाते हुए कहा।

अब शैफाली उस आर्क को देखती हुई कुछ तेजी से सोचने लगी।

तभी जेनिथ की नजर क्रिस्टी के पैरों की ओर गयी और वह बोल उठी- “अरे क्रिस्टी ये तुम्हारे पैरों में यह नीले रंग का जेली जैसा पदार्थ कहां से लग गया?”

जेनिथ की बात सुन क्रिस्टी ने भी अपने पैरों की ओर देखा। उसके पैर में नीले रंग की जेली लगी थी।

“मुझे लगता है, यह जेली मुझे नदी के तली में खड़े होने पर लग गया होगा। क्यों कि वहां पर कुछ नीले पौधे थे।”

यह कहकर क्रिस्टी अपने पैरों से नीली जेली को हटाने लगी।

वह जेली किसी स्किन की तरह पैर से निकल रही थी। जेली के पैर से निकलने के बाद दोनों पैर की जेली किसी रबर के मोजे जैसी लग रही थी।

क्रिस्टी ने उस जेली को वहीं जमीन पर फेंक दिया।

तभी कुछ सोचती हुई शैफाली जोर से बोल उठी- “इस आर्क में ऊपर की ओर 2 जलपरियां बनी हैं और नीचे नदी की ओर 2 परियां। जबकि परियों को हवा में और जलपरियों को पानी में होना चाहिये था। इसका साफ मतलब है कि हमें इस आर्क को घुमाना होगा।”

शैफाली की सोच से सभी प्रभावित हो गये क्यों कि शैफाली का लॉजिक तो बिल्कुल सही था।

यह सुन तौफीक ने आगे बढ़कर उस पत्थर के आर्क को घुमाने की कोशिश की, पर पूरी ताकत लगाने के बाद भी वह आर्क अपनी जगह से हिला तक नहीं।

“लगता है कि इस आर्क में कुछ प्रॉब्लम और भी है।” जेनिथ ने कहा- “कहीं इस बोर्ड पर लिखे क्रैंगम शब्द में तो कोई रहस्य नहीं छिपा?” जेनिथ के शब्द सुन सभी उस क्रैंगम शब्द को ध्यान से देखने लगे।

“कैप्टेन!” तौफीक ने सुयश का ध्यान क्रैंगम शब्द की ओर करते हुए कहा- “ध्यान से देखिये। क्रैंगम शब्द में कुल 7 अक्षर हैं। इसमें ‘N’ अक्षर को छोड़कर बाकी सभी अक्षर लाल रंग से चमक रहे हैं, जबकि ‘N’ हरे

रंग से चमक रहा है। इसका मतलब ‘N’ को छोड़कर सभी अक्षर गलत स्थान पर लगे हैं, यानि कि ये सारे अक्षर ‘रम्बल-जम्बल’ हैं।”

सभी को तौफीक का तर्क बहुत सही लगा। अब सभी उन अक्षरों से किसी उचित शब्द को बनाने में लग गये।

कुछ देर सोचने के बाद इस प्रतियोगिता का समापन शैफाली ने अपने शब्दों से किया-

“यहां पर ‘MAGNARC’ शब्द लिखा है। इसका मतलब हुआ कि मैग्ना के द्वारा बनायी गयी आर्क। यानि कि ये सारे अक्षर उल्टे लिखे थे। शायद इन अक्षरों को सीधा करके सही करने के बाद यह आर्क भी घूमना शुरु हो जाये।”

यह सुनकर तौफीक ने आगे बढकर ‘C’ अक्षर को अपनी जगह से खिसकाने के लिये जैसे ही छुआ, वह तुरंत पत्थर का बन गया। यह देख सभी बहुत ज्यादा डर गये।

जेनिथ को छोड़ सभी की आँखों में दुख के भाव लहराने लगे।

“अब क्या करें कैप्टेन?” क्रिस्टी ने डरते हुए कहा- “हमारा एक और साथी इस जंगल की भेंट चढ़ गया... और अब हमारे पास आगे बढ़ने का कोई रास्ता भी नहीं है।”

“ऐसा नहीं हो सकता, अगर यह तिलिस्म बनाया गया है तो इसका हल भी यहीं कहीं होना चाहिये।” सुयश ने दृढ़ विश्वास दिखाते हुए कहा।

तभी सुयश को वेदालय वाला दृश्य याद आने लगा, जब आर्यन ने अपने दिमाग से धेनुका नामक गाय से स्वर्णदुग्ध प्राप्त किया था।

अचानक से सुयश आर्यन की तरह सोचने लगा। अब उसकी निगाहें तेजी से अपने चारो ओर घूमने लगीं।

तभी उसकी नजर क्रिस्टी के द्वारा फेंके गये नीले रंग की जेली पर पड़ी।

“मिल गया उपाय।” यह कहकर सुयश बिना किसी को कुछ बोले जूते उतारकर नदी में कूद गया।

किसी की समझ नहीं आया कि सुयश क्या करना चाह रहा है।

थोड़ी ही देर में सुयश नदी के पानी से बाहर निकला। उसके दोनों हाथों में अब नीले रंग की जेली लगी थी, जो कि एक रबर के दस्ताने की तरह प्रतीत हो रही थी।

सुयश ने आगे बढ़कर क्रैंगम के अक्षरों को छुआ, पर हाथ में जेली लगे होने के कारण सुयश को कुछ नहीं हुआ।

सुयश ने जैसे ही सभी अक्षरों को सही स्थान पर लगाया, सभी अक्षर हरे रंग से चमकने लगे और आर्क में कहीं एक तेज ‘खटाक’ की आवाज उभरी।

अब सुयश ने आर्क को हिलाकी देखा, सुयश के हिलाते ही आर्क अपनी जगह से घूमने लगी।

कुछ ही देर में जलपरियां पानी के नीचे चलीं गयीं और परियां पानी के ऊपर आ गयीं।

सुयश ने इसके बाद उस आर्क के बीच से निकलने की कोशिश की और वह आर्क के बीच से होता हुआ दूसरी ओर पहुंच गया।

यह देख जेनिथ, क्रिस्टी और शैफाली भी आर्क के दूसरी ओर निकल गये।

क्रिस्टी के एक नजर पत्थर बने तौफीक पर डाली। वह अभी भी पत्थर बना था। तौफीक को देख क्रिस्टी की आँखों में दुख के भाव नजर आये।

तभी सुयश को जाने क्या हुआ, वह दोबारा आर्क के पहली ओर गया और पत्थर बने तौफीक को खींचकर आर्क के दूसरी ओर ले आया।

जैसे ही तौफीक का शरीर आर्क के दूसरी ओर पहुंचा, अचानक दोनों परियां सजीव हो गईं।

परियों ने एक नजर पत्थर बने तौफीक की ओर डाली।

अब उनके हाथ में पकड़ी जादुई छड़ी से सुनहरी किरणें निकलीं और पत्थर बने तौफीक पर पड़ीं।

सुनहरी किरणों के पड़ते ही तौफीक वापस से सजीव हो गया। सभी यह देखकर खुश हो गये।

तभी परियों सहित नदी और आर्क सबकुछ हवा में विलीन हो गया। अब वह एक पथरीले रास्ते पर खड़े थे।

शैफाली ने तौफीक को सारी घटना बता दी। यह सुन तौफीक ने सुयश को गले से लगा लिया।

सभी मुस्कुराते हुए फिर से आगे की ओर बढ़ गये।

जारी रहेगा______✍️
 
#121.

चैपटर-6

प्रकाश शक्ति:
(14 वर्ष पहले.......... 07 जनवरी 1988, गुरुवार, 17:30, रुपकुण्ड झील, चमोली, भारत)

रुपकुण्ड झील, भारत के कुमाऊं क्षेत्र का एक चर्चित पर्यटन स्थल है, जो कि देवभूमि कहलाने वाले उत्तर भारत का एक हिस्सा है।

रुपकुण्ड झील से कुछ ही दूरी पर, तीन पर्वतों की एक श्रृंखला है, जिसकी नोक त्रिशूल के आकार की होने के कारण उसे त्रिशूल पर्वत कहा जाता है।

त्रिशूल पर्वत से कुछ ही दूरी पर नन्दा देवी का प्रसिद्ध मंदिर है।

रुपकुण्ड झील के पास शाम के समय एक लड़की हाथों में कैमरा लिये झील के आसपास की फोटोज खींच रही थी। काली जींस, काली जैकेट पहने उस लड़की के काले घने बाल हवा में लहरा रहे थे।

तभी वहां मौजूद एक गार्ड की नजर उस लड़की पर पड़ी।

“ओ मैडम! इस क्षेत्र में शाम होने के बाद टूरिस्ट का आना मना है।” गार्ड ने उस लड़की पर एक नजर मारते हुए कहा।

“हलो ! मेरा नाम कलिका है। मैं दिल्ली की रहने वाली हूं।”यह कहते हुए कलिका ने अपना सीधा हाथ, हाथ मिलाने के अंदाज में गार्ड की ओर बढ़ाया।

कलिका का हाथ आगे बढ़ा देख गार्ड एकदम से सटपटा गया।

शायद आज से पहले किसी भी टूरिस्ट ने उससे हाथ नहीं मिलाया था। गार्ड ने एक क्षण सोचा और फिर कलिका से हाथ मिला लिया।

“ऐक्चुली मैं दिल्ली से छपने वाली एक पत्रिका की एडिटर हूं और मैं रुपकुण्ड झील के बारे में अपनी पत्रिका में एक लेख लिख रही हूं।”

कलिका ने गार्ड से धीरे से अपना हाथ छुड़ाते हुए कहा- “दिन के समय की बहुत सी फोटोज मैंने पहले से ही खींच रखी है, पर अब मैं शाम के समय की कुछ फोटोज खींचना चाहती हूं।”

“अच्छा-अच्छा...तो आप लेख लिखती हैं।” गार्ड ने खुश होते हुए कहा- “ठीक है मैडम। खींच लीजिये आप यहां की फोटोज... पर मेरी भी एक-दो फोटो अपनी पत्रिका में जरुर डालियेगा।”

“हां-हां...क्यों नहीं....आप अगर मुझे यहां के बारे में बताएं तो मैं आपका इंटरव्यू भी अपनी पत्रिका में डाल दूंगी।” कलिका के शब्दों में सीधा-सीधा प्रलोभन था।

“जरुर मैडम...मैं आपको यहां के बारे में जरुर बताऊंगा।” इंटरव्यू के नाम पर तो गार्ड की बांछें खिल गयीं और आज तक उसने जो भी वहां के गाइड से सुन रखा था, वह सारा का सारा बताना शुरु कर दिया-

“वैसे तो यहां का बहुत पुराना इतिहास किसी को भी नहीं पता? यह झील 1942 में सुर्खियों में तब आयी, जब यहां के एक रेंजर एच. के. माधवल को इस झील के किनारे 500 से भी ज्यादा नरकंकाल मिले, जो कि बर्फ के पिघलने की वजह से अस्तित्व में आये थे।

बाद में यूरोपीय और भारतीय वैज्ञानिकों ने इस जगह का दौरा किया और कार्बन डेटिंग के आधार पर इन कंकालों के बारे में पता किया।

“उनके हिसाब से यह कंकाल 12वी से 15वी सदी के बीच के थे। इन सभी कंकालों के सिर पर क्रिकेट की गेंद के बराबर के ओले गिरने के निशान पाये गये, जिससे यह पता चला कि शायद ये किसी बर्फीले तूफान का शिकार हो गये थे? यहां हर साल जब भी गर्मियों में बर्फ पिघलती है तो हर तरफ मानव कंकाल नजर आने लगते हैं।

सर्दी के दिनों में यह जगह पूरी बर्फ से ढक जाती है। बाकी इस झील की गहराई मात्र 2 मीटर है। इसके पश्चिम दिशा में ब्रह्मताल और उत्तर दिशा में त्रिशूल और नंदा देवी पर्वत है।” इतना कहकर गार्ड चुप हो गया।

“वाह आपको तो बहुत कुछ पता है यहां के बारे में।” कलिका ने मुस्कुराते हुए गार्ड की ओर देखा।

गार्ड अपनी तारीफ सुन कर भाव-विभोर हो गया।

“अच्छा मैडम अब अंधेरा हो गया है, तो आप जब तक यहां की फोटो लीजिये, मैं जरा आगे से टहल कर आता हूं।“ इतना कहकर गार्ड एक दिशा की ओर चल दिया।

गार्ड को दूसरी ओर जाते देख कलिका की आँखें खुशी से चमक उठीं।

कलिका ने झट से अपना कैमरा अपनी पीठ पर लदे बैग में डाला और जैसे ही गार्ड उसकी नजरों से ओझल हुआ, वह रुपकुण्ड झील के

पानी में उतर गयी।

चूंकि कलिका का बैग वाटरप्रूफ था इसलिये उस पर पानी का कोई प्रभाव नहीं पड़ना था।

कलिका ने एक डुबकी ली और झील की तली में इधर-उधर अपनी नजरें दौड़ाने लगी।

पता नहीं कैसे अंधेरे में भी कलिका को बिल्कुल ठीक दिखाई दे रहा था।

तभी कलिका की नजरें झील की तली में मौजूद एक सफेद पत्थर की ओर गयी। वह पत्थर बाकी पत्थरों से थोड़ा अलग दिख रहा था।

सफेद पत्थर के पास पहुंचकर कलिका ने धीरे से उसे धक्का दिया।

आश्चर्यजनक तरीके से वह भारी पत्थर अपनी जगह से हट गया। पत्थर के नीचे कलिका को एक तांबे की धातु का दरवाजा दिखाई दिया, जिस पर एक हैण्डिल लगा हुआ था।

कलिका ने हैण्डिल को खींचकर दरवाजा खोला। दूसरी ओर बिल्कुल अंधकार था।

कलिका उस अंधकारमय रास्ते से दूसरी ओर चली गयी।

उस स्थान पर बिल्कुल भी पानी नहीं था। कलिका ने जैसे दरवाजा बंद किया, सफेद पत्थर स्वतः लुढ़ककर उस दरवाजे के ऊपर आ गया।

उधर बाहर जब गार्ड लौटकर आया तो उसे कलिका कहीं दिखाई नहीं दी।

“लगता है मैडम बिना बताए ही वापस चली गयीं?” गार्ड ने मन ही मन कहा- “एक फोटो भी नहीं ले पाया उनके साथ।” यह सोच गार्ड थोड़ा उदास हो गया।

उधर कलिका ने जैसे ही दरवाजा बंद किया, उसके चारो ओर तेज रोशनी फैल गयी।

ऐसा लगा जैसे धरती के नीचे कोई दूसरा सूर्य उदय हो गया हो।

कलिका ने अपने आसपास नजर दौड़ायी। इस समय वह एक छोटे से पर्वत की चोटी पर खड़ी थी।

चोटी से नीचे उतरने के लिये बहुत सारी पत्थर की सीढ़ियां बनीं थीं।

कलिका वह सीढ़ियां उतरते हुए नीचे आ गयी। अब उसके सामने एक विशाल दीवार दिखाई दी। उस दीवार में 3 द्वार बने थे।

पहले द्वार पर अग्नि का चित्र बना था, दूसरे द्वार पर एक सिंह का और तीसरे द्वार पर मृत्यु के देवता यमराज का चित्र बना था।

यह देख कलिका ठहर गयी।

तभी कलिका को एक जोर की आवाज सुनाई दी- “कौन हो तुम? और यहां क्या करने आयी हो?”

“पहले अपना परिचय दीजिये, फिर मैं आपको अपना परिचय दूंगी।” कलिका ने बिना भयभीत हुए कहा।

“मैं इस यक्षलोक के द्वार का प्रहरी यक्ष हूं, मेरा नाम युवान है। बिना मेरी आज्ञा के इस स्थान से कोई भी आगे नहीं बढ़ सकता। अब तुम अपना परिचय दो युवती।” युवान की आवाज काफी प्रभावशाली थी।

“मैं हिमालय के पूर्व में स्थित ‘कालीगढ़’ राज्य की रानी कलिका हूं, मैं किसी शुभ उद्देश्य के लिये यक्षलोक, ‘प्रकाश शक्ति’ लेने आयी हूं। अगर मुझसे किसी भी प्रकार की धृष्टता हो गयी हो, तो मुझे क्षमा करें यक्षराज।”

कलिका का एक-एक शब्द नपा तुला था।

कलिका के मनमोहक शब्दों को सुन युवान खुश होता हुआ बोला- “ठीक है कलिका, तुम यहां से आगे जा सकती हो, पर ये ध्यान रखना कि प्रकाश शक्ति पाने के लिये तुम्हें ‘यक्षावली’ से होकर गुजरना पड़ेगा।

‘यक्षावली’ यक्ष के प्रश्नों की प्रश्नावली को कहते हैं। यहां से आगे बढ़ने पर तुम्हें 5 यक्षद्वार मिलेंगे। हर यक्षद्वार पर तुम्हें एक प्रश्न मिलेगा। तुम्हें उन प्रश्नों के सही उत्तर का चुनाव करना होगा, अगर तुम्हारा एक भी चुनाव गलत हुआ तो तुम्हारा कंकाल भी रुपकुण्ड के बाहर मिलेगा।"

“जी यक्षराज, मैं इस बात का ध्यान रखूंगी।” कलिका ने युवान की बात सहर्ष मान ली।

“आगे प्रथम यक्षद्वार है, जिस पर कुछ आकृतियां बनीं हैं, हर द्वार के पीछे वही चीज मौजूद है, जो द्वार पर बनी है। अब तुम्हें पहला चुनाव करना होगा कि तुम किस द्वार से होकर आगे बढ़ना चाहती हो?” इतना कहकर युवान चुप हो गया।

कलिका तीनों द्वार पर बनी आकृतियों को ध्यान से देखने लगी।

एक घंटे से ज्यादा सोचने के बाद कलिका ने अग्नि के द्वार में प्रवेश करने का निश्चय किया।

“मैं अग्निद्वार में प्रवेश करना चाहती हूं यक्षराज।” कलिका ने कहा।

“मैं इसका कारण भी जानना चाहता हूं कि तुमने क्या सोचकर यह निश्चय किया?” युवान की गम्भीर आवाज वातावरण में उभरी।

“यहां पर तीन द्वार हैं।” कलिका ने बारी-बारी से उन तीनों द्वार की ओर देखते हुए कहा- “अगर मैं तीसरे द्वार की बात करुं, तो वहां पर स्वयं यमराज विद्यमान हैं और यमराज मौत के देवता हैं, इसलिये वो तो किसी भी हालत में मुझे आगे जाने नहीं देंगे। अब अगर दूसरे द्वार की बात करुं, तो वहां पर एक सिंह बैठा है। सिंह की प्रवृति ही आक्रामक होती है। अगर उसका पेट भरा भी हो तो भी विश्वास के साथ नहीं कहा जा सकता, कि वह आक्रमण नहीं करेगा। इसलिये उस द्वार में भी जाने पर खतरा हो सकता है। अब अगर मैं पहले द्वार की बात करुं तो वहां पर अग्नि विराजमान हैं, अग्नि की प्रवृति सहायक और आक्रामक दोनों ही होती है।

यानि अग्नि हमारा भोजन भी बनाती है, अग्नि का प्रकाश हमें मार्ग भी दिखलाता है, पर वही अग्नि अपने आक्रामक रुप से हमें भस्म भी कर सकता है। यहां पर कहीं भी नहीं लिखा है कि अग्नि उस द्वार के अंदर

किस रुप में मौ जूद है, तो मैं कैसे मान लूं कि वह आक्रामक रुप में द्वार के अंदर है? ये भी तो हो सकता है कि वह सहायक रुप में हो। इसीलिये मैंने यहां पर मैंने अग्नि का चयन किया है।”

“उत्तम...अति उत्तम।” युवान की खुशी भरी आवाज उभरी- “तुम्हारा तर्क मुझे बहुत अच्छा लगा कलिका। तुम अग्नि के द्वार में प्रवेश कर सकती हो।”

यह सुनकर कलिका अग्नि द्वार में प्रवेश कर गयी। द्वार के अंदर बहुत अंधकार था, पर कलिका के प्रवेश करते ही उस कमरे में एक दीपक प्रज्वलित हो गया। कलिका उस कमरे से होती हुई आगे की ओर बढ़ गयी।

कुछ आगे जाने पर वह कमरा समाप्त हो गया। परंतु कमरे से निकलने के लिये पुनः तीन दरवाजे बने थे।

उन दरवाजों के बाहर एक खाने की थाली रखी थी।

तभी युवान की आवाज फिर सुनाई दी- “तुम्हारे सामने द्वितीय यक्षद्वार का चयन उपस्थित है कलिका।

पहले द्वार के अंदर एक बालक है, दूसरे द्वार के अंदर एक युवा मनुष्य है तथा तीसरे द्वार के अंदर एक वृद्ध

मनुष्य है। तीनों ही अपने स्थान पर भूखे हैं। यक्षद्वार के बाहर एक थाली में भोजन रखा है। अब तुम्हें यह चुनाव करना है कि यह भोजन की थाली तुम कि से खिलाओगी? अगर तुम्हारा चयन गलत हुआ तो तुम्हें मृत्यु से कोई नहीं बचा सकता।” यह कहकर युवान चुप हो गया।

कलिका ने एक बार फिर से दिमाग लगाना शुरु कर दिया।

काफी देर तक सोचने के बाद कलिका ने कहा - “यक्षराज, मैं यह भोजन की थाली वृद्ध पुरुष को खिलाना चाहती हूं क्यों कि युवा पुरुष तो बालक और वृद्ध के सामने भोजन का अधिकारी नहीं हो सकता। उसे सदैव ही इन दोनों को खिलाने के बाद खाना चाहिये। अब अगर मैं भोजन की थाली की बात करुं, तो इस थाली में अधिक मात्रा में अनाज उपस्थित है और यह कहीं नहीं लिखा है कि बालक कि आयु कितनी है?

तो यह भी हो सकता है कि बालक बहुत छोटा हो और अगर वह माँ का दूध पीने वाला बालक हुआ, तो वह थाली में रखे भोजन को ग्रहण ही नहीं कर पायेगा। इस स्थिति में भोजन ना तो वृद्ध को मिलेगा और ना ही बालक खा पायेगा।

यानि ये पूरा भोजन व्यर्थ हो जायेगा और कोई यक्ष कभी भोजन को व्यर्थ नहीं होने देता, ऐसा मेरा मानना है, इसलिये मैंने इस भोजन को वृद्ध पुरुष को खिलाने का विचार किया।”

“अद्भुत! तुम्हारे विचार तो बिल्कुल अद्भुत हैं कलिका। मैं ईश्वर से प्रार्थना करुंगा कि प्रकाश शक्ति तुम्हें ही मिले।” युवान कलिका के विचारों से बहुत ज्यादा प्रभावित हो गया।

“धन्यवाद यक्षराज!” यह कह कलिका भोजन की थाली उठा कर वृद्ध पुरुष के कमरे में चली गयी।

कमरे में एक जर्जर शरीर वाला व्यक्ति जमीन पर लेटा था।

कलिका ने उस वृद्ध को उठाकर उसे बहुत ही प्रेम से भोजन कराया और अगले द्वार की ओर बढ़ गयी।

अगले यक्षद्वार पर सिर्फ 2 ही दरवाजे बने थे। उस द्वार के बाहर एक स्त्री की प्रतिमा खड़ी थी।

यह देख कलिका थोड़ा प्रसन्न हो गयी।

उसे लगा कि इस बार चुनाव थोड़ा सरल हो जायेगा।

तभी वातावरण में युवान की आवाज पुनः गूंजी- “यह तृतीय यक्षद्वार है कलिका, इस द्वार में प्रवेश का चयन करने के लिये मैं तुम्हें एक कथा सुनाता हूं, यह कथा ही अगले प्रश्न का आधार है इसलिये ध्यान से सुनना।”

यह कहकर युवान एक कहानी सुनाने लगा- “एक गाँव में एक स्त्री रहती थी, जो ईश्वर की बहुत पूजा करती थी। एक बार उस स्त्री के पति और भाई जंगल मे लकड़ी लेने गये। जब वह लकड़ी लेकर आ रहे थे, तो उन्हें रास्ते में एक मंदिर दिखाई दिया।

जंगल में मंदिर देखकर दोनो ही व्यक्ति मंदिर में प्रवेश कर गये। तभी कहीं से मंदिर में कुछ डाकू आ गये और उन्होंने दोनों व्यक्तियों के पास कुछ ना पाकर, उनके सिर काट कर उन्हें मार दिया। बाद में वह स्त्री अपने पति और भाई को ढूंढते हुए उस मंदिर तक आ पहुंची।

दोनों के ही कटे सिर देखकर वह ईश्वर के सामने विलाप करने लगी। उसका दुख देखकर ईश्वर प्रकट हुए और दोनों के ही सिर धड़ से जोड़ दिये। पर उनके सिर जोड़ते समय ईश्वर से एक गलती हो गयी। उन्होंने पति के सिर पर भाई का...और भाई के सिर पर पति का सिर जोड़ दिया।

तो बताओ कलिका कि वह स्त्री अब किसका चुनाव करे? अगर तुम्हें लगता है कि भाई का सिर और पति के शरीर का चुनाव उचित है, तो तुम इस स्त्री के साथ प्रथम द्वार में प्रवेश करो और अगर तुम्हें लगता है कि पति का सिर और भाई का शरीर वाला चुनाव उचित है, तो तुम्हें इस स्त्री के साथ दूसरे द्वार में प्रवेश करना होगा।” इतना कहकर युवान चुप हो गया।

पर इस बार कलिका का दिमाग घूम गया। वह कई घंटों तक वहां बैठकर सोचती रही, क्यों कि एक गलत चुनाव का मतलब उसकी मृत्यु थी।

कलिका लगातार सोच रही थी- “अगर मैं भाई का सिर और पति के शरीर का चुनाव करती हूं तो भाई के चेहरे को देखते हुए वह स्त्री पति के प्रति पूर्ण समर्पित नहीं हो सकती। यहां तक कि उसे पति से सम्बन्ध

बनाना भी असहज महसूस होगा। इस प्रकार वह स्त्री एक पत्नि का दायित्व उचित प्रकार से नहीं निभा सकती।

अब अगर मैं पति का सिर और भाई के शरीर का चुनाव करती हूं, तो वह स्त्री उस शरीर के साथ कैसे सम्बन्ध बना सकती है, जो उसके भाई का हो। यानि दोनों ही स्थितियां उस स्त्री के लिये अत्यंत मुश्किल वाली होंगी।" धीरे-धीरे 4 घंटे बीत गये। आखिरकार वह एक निष्कर्ष पर पहुंच ही गयी।

“यक्षराज, मैं पति का सिर और भाई के शरीर वाला चुनाव करुंगी क्यों कि जब मैंने मानव शरीर का गहन अध्ययन किया तो मुझे लगा कि मानव का पूरा शरीर मस्तिष्क नियंत्रित करता है, यानि किसी मानव शरीर में इच्छाओं का नियंत्रण पूर्णरुप से मस्तिष्क के पास होता है, शायद इसीलिये ईश्वर ने हमारी पांचो इंन्द्रियों का नियंत्रण सिर वाले भाग को दे रखा है।

आँख, कान, नाक, जीभ ये सभी सिर वाले भाग की ओर ही होते हैं, अब बची पांचवी इंद्रिय त्वचा, वह भी मस्तिष्क से ही नियंत्रित होती है। यानि मस्तिष्क जिस प्रकार से चाहे, हमारे शरीर को परिवर्तित कर सकता है। अब अगर दूसरे तरीके से देंखे तो मनुष्य का प्रथम आकर्षण चेहरे से ही शुरु होता है। इसलिये मैंने ये चुनाव किया और मैं दूसरे द्वार में प्रवेश करना चाहती हूं।”

“अद्वितीय मस्तिष्क की स्वामिनी हो तुम कलिका। तुम्हारा तर्क बिल्कुल सही है।” युवान ने खुश होते हुए कहा।

युवान के इतना कहते ही उस स्त्री की प्रतिमा सजीव हो गयी।

कलिका उस स्त्री को लेकर दूसरे द्वार में प्रवेश कर गयी। कलिका अब चतुर्थ यक्षद्वार के सामने खड़ी थी।

जारी रहेगा________✍️
 
#122.

कलिका अब चतुर्थ यक्षद्वार के सामने खड़ी थी।

यहां पर एक ही दरवाजा था और उस दरवाजे पर एक समान सी दिखने वाली तीन स्त्रियों की आदमकद मूर्तियां खड़ीं थीं।

“यह चतुर्थ यक्षद्वार है कलिका। इसके भी पीछे की एक कहानी है।

"एक राजकुमार दूसरे राज्य के भ्रमण पर गया। रास्ते में उसने उस राज्य की राजकुमारी को देखा। राजकुमारी देखने में बहुत सुंदर थी। इसलिये राजकुमार ने उस राजा के सामने उसकी पुत्री से विवाह का प्रस्ताव रखा। उस राजा की तीन पुत्रियां थीं, जो देखने में बिल्कुल एक जैसी थीं। राजा ने तीनों पुत्रियों को राजकुमार को दिखाया और पूछा कि वह किस से शादी करना चाहते हैं? अब तुम्हें उस राजकुमार के लिये उचित कन्या का चुनाव

करना पड़ेगा।”

यह सुनकर कलिका ने तीनों मूर्तिंयों को ध्यान से देखना शुरु कर दिया, पर 2 घंटे के बाद भी कलिका को तीनों में एक भी असमानता नहीं दिखाई दी।

“ये तो बिल्कुल एक जैसी हैं, इनमें उचित कन्या का चुनाव कैसे सम्भव है?” कलिका अब परेशान होने लगी, पर उसने अभी भी हिम्मत नहीं हारी।

2 घंटे और बीत गये, पर कलिका को कुछ समझ नहीं आया।

आखिरकार थककर उसने मूर्तियों के स्थान पर इधर-उधर देखना शुरु कर दिया।

तभी कलिका की नजर मूर्तियों के पास पड़े 1 फुट लंबे एक धातु के तार पर पड़ी।

“ये तार यहां पर क्यों पड़ा हुआ है? कहीं इसका उपयोग मूर्ति में तो कहीं नहीं होना है?” यह सोच कलिका ने उस धातु के तार को जमीन से उठा लिया और एक बार फिर मूर्तियों को ध्यान से देखने लगी।

तभी कलिका को मूर्ति के कान में तार के बराबर का बारीक छेद दिखाई दिया। कलिका ने उस तार को पहली मूर्ति के कान में डालना शुरु कर दिया।

वह तार थोड़ी ही देर में उस मूर्ति के दूसरे कान से बाहर आ गया।

यह देख कलिका के चेहरे पर मुस्कान बिखर गयी। अब उसने वही तार दूसरी मूर्ति के कान में डाल दिया, इस बार तार दूसरी मूर्ति के मुंह से बाहर आ गया।

कलिका ने इस बार वह तार तीसरी मूर्ति के कान में डाला, इस बार वह तार किसी भी जगह से बाहर नहीं आया।

यह देख कलि का बोल उठी- “यक्षराज, मैंने पहली मूर्ति के कान में तार डाला तो वह दूसरे कान से बाहर आ गया। इसका मतलब यह राजकुमारी किसी की बात को एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देती है। इसलिये यह राजकुमार के लिये उपयुक्त नहीं होगी।

दूसरी मूर्ति के कान में तार डालने पर उसके मुंह से बाहर आ गया। इसका मतलब यह राजकुमारी किसी भी बात को पचा नहीं पाती। ऐसी राजकुमारी अपने घर के भेद को भी दूसरों को बता सकती है।

तीसरी मूर्ति के कान में तार डालने पर तार कहीं से भी बाहर नहीं आया। इसका मतलब यह राजकुमारी किसी भी बात को ध्यान से सुनती है और उसे अपने अंदर आत्मसात कर लेती है। इसलिये तीसरी राजकुमारी ही राजकुमार के लिये उचित चुनाव है।”

“अकल्पनीय! तुमने हर बार की भांति ही इस बार भी सही चुनाव किया है कलिका। यही राजकुमारी, उस राजकुमार के लिये सबसे उचित चुनाव है।” युवान ने कहा।

इसी के साथ वह राजकुमारी की मूर्ति जीवित हो गई, जिसे लेकर कलिका उस द्वार में प्रवेश कर गई।

राजकुमारी को उस राजकुमार से मिलाने के बाद कलिका पांचवे और आखिरी द्वार की ओर बढ़ गयी।

पर कलिका जैसे ही बाहर निकली। इस बार वह आश्चर्य से भर उठी।

इस समय वह एक ऐसे बड़े से मैदान में खड़ी थी, जहां पर 4 ऊंची-ऊंची मूर्तियां लगी थीं। हर मूर्ति के नीचे एक बड़ा सा मटका रखा था। वह मूर्तियां अग्निदेव, सूर्यदेव, चंद्रदेव एवं व्यास ऋषि की थीं।

तभी एक बार फिर युवान की आवाज वातावरण में गूंजी- “यह तुम्हारा पांचवां और आखिरी यक्षद्वार है। अगर तुम यहां सफल हो गयी तो तुम्हें प्रकाश शक्ति मिल जायेगी।

"इस द्वार में तुम्हें इस चीज का चुनाव करना है कि यहां उपस्थित चारो व्यक्तियों में प्रकाश शक्ति किसके पास हो सकती है? तुम्हें जो उत्तर सही लगे, उसे तुम चुन सकती हो, परंतु ये याद रखना कि ये आखिरी द्वार है, अगर तुम यहां गलत हो गयी तो कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम कितने द्वार को पार किया है? तुम ऐसी स्थिति में भी अनुतीर्ण ही कहलाओगी और अपने प्राणों से हाथ धो बैठोगी।” यह कहकर युवान चुप हो गया।

एक बार फिर कलिका का कार्य शुरु हो चुका था। लेकिन आश्चर्यजनक तरीके से इस बार कलिका ने अधिक समय नहीं लिया।

“यक्षराज, चंद्रदेव स्वयं सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित हैं, इसलिये उनके पास प्रकाश शक्ति नहीं हो सकती। अब अगर हम अग्निदेव की बात करें तो अग्नि भी बिना किसी सहारे के आगे नहीं बढ़ती है, इसलिये मुझे लगता है कि इनके पास भी प्रकाश शक्ति नहीं हो सकती।

"अब बचे 2 लोग-सूर्यदेव और महर्षि व्यास। सूर्यदेव स्वयं के प्रकाश से प्रकाशित तो हैं, पर इनका प्रकाश हमें निरंतर प्राप्त नहीं होता है। इसलिये मुझे नहीं लगता कि सूर्यदेव के पास भी प्रकाश शक्ति हो सकती है।

अब बचे सिर्फ महर्षि व्यास। तो अगर हम ध्यान दें तो महर्षि व्यास ने वेदों की रचना की है और वेद ही सम्पूर्ण ज्ञान का स्रोत है। यानि ज्ञान के प्रकाश से बढ़कर कुछ हो ही नहीं सकता। ये दिन में, रात में, सुख में, दुख में, आशा में, निराशा में हर पल हमें अपने ऊर्जान्वित करता है। अगर दूसरे प्रकार से देखें, तो वेदों

में इन सभी देवताओं का वर्णन किया गया है। यानि वेदों के द्वारा इन सभी देवताओं को भी ऊर्जा मिली है। इसलिये मुझे लगता है कि प्रकाश शक्ति केवल महर्षि वेद व्यास के पास ही होगी।”

“बिल्कुल सही कहा कलिका, वेदों के प्रकाश से बढ़कर इस ब्रह्मांड में और कोई प्रकाश नहीं है। आगे बढ़कर महर्षि वेद व्यास के सामने रखी मटकी का चयन करो और प्रकाश शक्ति की स्वामिनी बन जाओ।” युवान ने हर्षित स्वर में कहा।

कलिका ने आगे बढ़कर महर्षि वेद व्यास के सामने रखी मटकी में हाथ डाला। अंदर उसके हाथ का स्पर्श किसी चीज से हुआ। कलिका ने वह चीज मटके से निकाल ली।

वह सुप्रसिद्ध पुस्तक ऋग्वेद थी।

कलिका ने उस पुस्तक का प्रथम पृष्ठ खोला, पुस्तक को खोलते ही, उसमें से एक बहुत तीव्र प्रकाश की किरणें निकलीं और कलिका के शरीर में समा गयीं।

इतनी तेज रोशनी के कारण कलिका की आँखें बंद हो गयीं। जब उसने अपनी आँखें खोलीं तो वह यक्षलोक के मुख्य द्वार के पास खड़ी थी।

तभी एक बार पुनः युवान की आवाज उभरी- “प्रकाश शक्ति प्राप्त करने के लिये तुम्हें हार्दिक शुभकामनाएं कलिका। इस प्रकाश शक्ति ने भी तुम्हें चुनकर सर्वश्रेष्ठ का ही चुनाव किया है। वैसे मैं इस यक्षावली के समय अंतराल में तुम्हारे चरित्र और तुम्हारे तर्कों से अति प्रसन्न हुआ, इसलिये जाने से पहले तुम मुझसे कोई एक वरदान मांग सकती हो।”

“यक्षराज मैं आपसे स्वयं के लिये नहीं वरन् अपनी पुत्री के लिये कोई ऐसी शक्ति मांगना चाहती हूं, जो उसके पूर्ण जीवनकाल में उसकी सुरक्षा करे।” कलिका ने हाथ जोड़कर कहा।

“बालकों को शक्ति देना, उन्हें उनके मार्ग से भ्रमित करना होता है कलिका। इसलिये मैं तुम्हारी पुत्री को हिमशक्ति दे तो रहा हूं, लेकिन इसका प्रयोग वह 20 वर्ष की आयु के बाद ही कर पायेगी। अब जाओ

कलिका इन वेदों की शक्ति से दुनिया को प्रकाशित करो।”

कलिका ने यक्षराज को हाथ जोड़कर अभिवादन किया और योग गुफा की ओर चल दी।

खून की बारिश: (13 जनवरी 2002, रविवार, 12:40, मायावन, अराका द्वीप)

आर्क वाले द्वार को पार करने के बाद सभी आगे बढ़ते जा रहे थे।

दूसरी ओर का रास्ता भी पथरीला था और छोटे-छोटे पौधों से भरा था। कुछ दूर के बाद बर्फ से ढकी पहाड़ियां नजर आ रहीं थीं।

“पता नहीं किसने इस रहस्यमय जंगल का निर्माण किया है?” क्रिस्टी ने मुंह बनाते हुए कहा- “खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है और ऊपर से पूरे रास्ते भर क्या-क्या मुसीबतें डाल रखीं हैं?”

“मैं तो अगर यहां से बच कर निकल गयी तो अगले 20 वर्ष तक जंगल क्या किसी भी पार्क में भी नहीं जाऊंगी?” जेनिथ ने हंसते हुए कहा।

“मुझे तो ये जंगल बहुत अच्छा लग रहा है।” शैफाली ने भी जेनिथ और क्रिस्टी की बातों के बीच में घुसते हुए कहा- “मैंने तो अपने जीवन भर कुछ देखा ही नहीं था, फिर जब मुझे यहां इतनी प्राकृतिक चीजें नजर

आयीं, तो मैं बहुत खुश हो गयी।”

तभी आगे बढ़ते हुए सभी को जमीन में दीमक की बांबियां बनी दिखाई दीं।

“ये लो...अब पता नहीं कौन सी मुसीबत आने वाली है?” सुयश ने कहा- “जब भी कोई नया क्षेत्र शुरु होता है, तो कोई ना कोई मुसीबत जरुर आती है। पता नहीं इन बांबियों से दीमक निकलकर हमारा क्या करेंगे?”

“कैप्टेन हम तो इन 4 बांबियों को ही देखकर डर गये। जरा नजर उठा कर आगे तो देखिये, यहां कुछ दूरी के क्षेत्र में ऐसी हजारों बांबियां हैं।” क्रिस्टी ने आगे के रास्ते पर नजर मारते हुए कहा।

बंबियों के आगे बहुत दूर तक मशरुम के पेड़ भी नजर आ रहे थे। मशरुम आकार में काफी बड़े और चमकदार दिख रहे थे। दूर से देखने पर वह किसी छतरी की भांति नजर आ रहे थे। मशरुम को देख सभी आगे बढकर उन्हें देखने लगे।

“यह मशरुम कुछ जरुरत से ज्यादा बड़े और चमकदार नहीं लग रहे हैं?” जेनिथ ने कहा।

“यह ‘मून लाइट मशरुम’हैं।” सुयश ने उन मशरुम के पेड़ को देखते हुए कहा- “यह जापान में पाये जाते हैं। रात के समय यह बहुत तेज रोशनी बिखेरते हैं और यह अत्यंत जहरीले होते हैं, इसलिये इन्हें खाया

नहीं जाता।”

“सच में यह जंगल बहुत ही विचित्र है।” तौफीक ने कहा- “कुछ किलोमीटर की ही दूरी पर यहां मौसम एकदम बदल जाता है और यहां पाये जाने वाले पौधे और जीव तो शायद ब्रह्मांड के कोने-कोने से लाकर यहां रखे गये हैं। सब अपने आप में बहुत ही अनोखे और रहस्यमय हैं।”

तभी दीमक वाली बांबियों से लाल रंग की बड़ी-बड़ी चींटियां निकलना शुरु हो गयीं।

“अरे बाप रे, यह तो ‘रेड आंट’हैं, ये तो अफ्रीका के जंगलों में पायी जाती हैं, यह इतनी खतरनाक होती हैं कि अजगर और शेर जैसे जानवर को भी पल भर में खत्म कर देती हैं। सबसे बड़ी मुसीबत इनका संगठित

होना है। यह एक जगह पर लाखों की संख्या में रहती हैं। हमें इनसे अपना बचाव करना पड़ेगा।”

तभी लाल चींटियों ने सबको चारो ओर से घेरना शुरु कर दिया।

“कैप्टेन ... इनसे कैसे बचा जा सकता है?” तौफीक ने पूछा।

“इनसे सिर्फ आग से ही बचा जा सकता है, पर वह हमारे पास यहां पर है नहीं।” शैफाली ने कहा।

तब तक लाल चींटियों ने सभी को चारो ओर से घेर लिया। अब वह किसी सैनिक की तरह उन पर हमला करने के लिये आगे बढ़ने लगी।

वह चींटियां लगातार बांबियों से निकलती ही जा रहीं थीं।

तभी कुछ चींटियों ने जेनिथ के ऊपर हमला कर दिया। जेनिथ चींटियों से बचने के लिये जैसे ही पीछे की ओर बढ़ी, तभी जेनिथ का पैर एक मशरुम के पेड़ से टकराया और जेनिथ जमीन पर गिर पड़ी।

जेनिथ के गिरते ही चींटियां जेनिथ पर झपटीं, तभी जेनिथ ने अपने बचाव में टूटा हुआ मशरुम का टुकड़ा आगे कर दिया।

मशरुम से निकलती रोशनी और खुशबू शायद चींटियों को पसंद नहीं थी। वह उस मशरुम के पेड़ से दूर हटने लगीं।

यह देख जेनिथ ने वह मशरुम का टुकड़ा चींटियों की ओर उछाल दिया। मशरुम का टुकड़ा जिस जगह पर गिरा, चींटियां उस जगह से दूर हट गईं।

यह देखकर जेनिथ ने चीख कर कहा- “कैप्टेन, आप सब लोग अपने हाथों में मशरुम ले लीजिये। ये सारी चींटियां मशरुम से डर रहीं हैं।”

जेनिथ की बात सुन सभी ने मशरुम को तोड़कर अपने हाथों में ले लिया और उसे अपने शरीर से आगे कर चींटियों को पीछे की ओर धकेलने लगे।

जेनिथ की तरकीब काम कर गयी। मशरुम के डर से सारी की सारी चींटियां अपने बिलों में वापस चलीं गईं।

“बाल-बाल बचे।” सुयश ने सभी को देखते हुए कहा- “अगर जेनिथ को समय रहते यह तरकीब ना पता चलती, तो अब तक चींटियों ने हमें चट कर जाना था।”

“कैप्टेन अगर सही कहें तो यह पहली ऐसी मुसीबत थी जो इतनी आसानी से समाप्त हो गई।” क्रिस्टी ने कहा।

पर वह मुसीबत ही क्या, जो इतनी आसानी से खत्म हो जाए।

चींटियों के अपनी बांबियों में घुसते ही उन बांबियों से गाढ़े लाल रंग का धुआं निकलना शुरु हो गया।

“लीजिये क्रिस्टी दीदी, आपके कहते ही मुसीबत शुरु हो गई।” शैफाली ने मुस्कुराते हुए कहा- “अब देखते हैं कि यह मुसीबत किस प्रकार की है?”

वह लाल धुंआ धीरे-धीरे पूरे वातावरण में फैलने लगा।

“मेरे हिसाब से हमें यहां रुक कर इस लाल धुंए को देखने की जरुरत नहीं है।” सुयश ने सभी को देखते हुए कहा- “है तो यह किसी प्रकार की मुसीबत ही? इसलिये हमें इस धुंए के फैलने के पहले ही इस स्थान को छोड़ उन बर्फीली पहाड़ियों की ओर जाना होगा।”

सुयश का विचार सभी को सही लगा, इसलिये वह सभी तेजी से सामने दिख रही बर्फीली पहाड़ियों की ओर भागने लगे।

ऐसा लग रहा था कि उन सुर्ख बादलों ने इन्हें भागते देख लिया हो, अब धुंआ और तेजी से वातावरण में फैलने लगा।

“एक बात और सभी लोग ध्यान रखना।” सुयश ने भागते हुए सभी से कहा- “हम सभी ने कुछ देर पहले विषैले मशरुम को छुआ था, तो जब तक हम अपना हाथ ठीक तरह से साफ ना कर लें, कोई भी इन हाथों से अपने मुंह और आँख को नहीं छुएगा।” सभी ने भागते हुए अपनी सहमति जताई।

तभी भागते हुए तौफीक ने पलटकर पीछे देखा, अब वह धुंआ इतना ज्यादा बढ़ गया था कि उसने अब बादलों के एक गुच्छे का रुप धारण कर लिया था।

अब बादल हवा के बहाव से उन्हीं की ओर आ रहे थे।

“कैप्टेन, सावधान!” तौफीक ने सुयश को चेतावनी देते हुए कहा- “अब वह धुंआ बादलों का रुप धारण करके तेजी से हमारी ओर आ रहा है।”

तौफीक की बात सुनकर सुयश ने भी एक बार पलटकर उन खून से सुर्ख बादलों को देखा और अपने दौड़ने की स्पीड बढ़ा दी।

तभी उन बादलों ने बरसना शुरु कर दिया। लाल रंग के बूंदों की वह बारिश बिल्कुल खून की बारिश जैसी प्रतीत हो रही थी।

तभी शैफाली की निगाह उससे कुछ दूर पर गिरी उन बूंदों पर गयी।

वह खूनी बूंदें जमीन पर जिस जगह गिर रहीं थीं, वहां मिट्टी में बुलबुले उठने के बाद एक छोटा सा गड्ढा हो जा रहा था।

यह देख शैफाली चीख उठी - “और तेज भागो, यह साधारण बारिश नहीं तेजाब की बारिश है, जिस पर भी इसकी बूंद गिरेगी, उसका शरीर गलने लगेगा।”

शैफाली के यह शब्द सुनते ही सभी के पैरों में जैसे पंख लग गये हों, सभी पूरी ताकत से बर्फीली पहाड़ियों की ओर भागने लगे।

बर्फीली पहाड़ियां अब ज्यादा दूर नहीं रह गयीं थीं, पर खूनी बादल तो अब उनके सिर पर आ गये थे।

तभी खूनी बारिश की कुछ बूंदें जेनिथ के ऊपर गिरीं। जेनिथ के शरीर की त्वचा उस जगह से झुलस गई।

यह देख जेनिथ ने मन में जोर से नक्षत्रा को समय को रोकने को कहा। नक्षत्रा ने तुरंत समय को रोक दिया। समय के रुकते ही सभी के साथ वह खूनी बूंदें भी हवा में ही रुक गईं।

“इस समस्या का हल तुम्हें तुरंत ढूंढना होगा दोस्त।” नक्षत्रा ने जेनिथ से कहा- “अगर तुमने ज्यादा समय यहां पर लगा दिया तो आगे किसी दूसरी मुसीबत से मैं तुम्हारी मदद नहीं कर पाऊंगा?”

जेनिथ की नजरें तेजी से अपने चारो ओर घूमने लगीं।

उसे किसी ऐसी चीज की तलाश थी, जो उन सभी को इस खूनी बारिश से बचा सके।

उधर नक्षत्रा तेजी से जेनिथ की जली हुई त्वचा को सही करने लगा। काफी देखने के बाद भी जेनिथ को आसपास कुछ नहीं दिखाई दिया।

तभी जेनिथ की नजर अपने आसपास गिरी बूंदों की ओर गईं।

बूंदे जिस जगह गिरीं थीं, उस जगह की हर चीज को उसने जला दिया था, सिवाय एक चीज के....और वह था मून लाइट मशरुम।

जेनिथ के एक सेकेण्ड तक मशरुम की संरचना को ध्यान से देखा और खुश होकर नक्षत्रा को समय को रिलीज करने के लिये बोल दिया।

जैसे ही नक्षत्रा ने समय को रिलीज किया, जेनिथ ने चीखकर सभी से कहा- “सभी लोग तुरंत मशरुम को छतरी की तरह इस्तेमाल करो, मशरुम पर इस खूनी बारिश का कोई असर नहीं हो रहा।

जेनिथ के इतना कहते ही सभी ने एक-एक मशरुम को तोड़कर छतरी की तरह प्रयोग करने लगे।

जेनिथ ने भी एक मशरुम तोड़कर अपने सिर पर लगा लिया। जेनिथ के घाव भी अब भर गये थे।

यहां तक कि किसी को पता भी नहीं चला कि जेनिथ के ऊपर खूनी बूंद गिरी भी थी।

खूनी बूंदें मशरुम पर गिर रहीं थीं, पर अब ये सभी लोग मशरुम के नीचे सुरक्षित थे।

“रुको नहीं... चलते रहो।”सुयश ने सभी को रुके देख चिल्ला कर कहा- “हम इस समय एक विचित्र तिलिस्म में हैं, अगर हम रुके तो ये बादल फिर अपना स्वरुप बदलकर हम पर किसी और रुप में हमला करने लगेंगे। इसलिये जितनी जल्दी हो सके, इस क्षेत्र से बाहर निकलो।”

सुयश के इतना कहते ही सभी फिर बर्फीली पहाड़ियों की ओर भागने लगे।

कुछ ही देर के प्रयास के बाद आखिरकार सभी बर्फीली पहाड़ियों के पास पहुंच ही गये।

खूनी बादलों ने भी अब इनका पीछा छोड़ दिया था।

भागते-भागते सभी इतना थक गये थे कि वहीं जमीन पर लेट गये।

सभी ने अपनी जान बच जाने पर एक बार फिर ईश्वर का धन्यवाद किया और टुकुर-टुकुर आँखों से उस बर्फीले क्षेत्र को देखने लगे, जहां पर

कोई नयी मुसीबत इनका इंतजार कर रही थी।

जारी रहेगा_______:writing:
 
#123.

श्वेत महल: (8 दिन पहले.....05 जनवरी 2002, शनिवार, 14:10, निर्माणशाला, अराका द्वीप)

कैस्पर अराका द्वीप के गर्भ में स्थित अपनी निर्माणशाला के एक कमरे में बैठा हुआ था।

चारो ओर स्क्रीन ही स्क्रीन लगीं थीं, जिन पर मायावन के अलग-अलग जगहों के दृश्य दिख रहे थे।

पता नहीं क्यों आज कैस्पर को बहुत बेचैनी हो रही थी?

“अराका के निर्माण के बाद मैग्ना बिना बताए पता नहीं कहां गायब हो गयी ? लगभग 19000 वर्षों से मैग्ना का कोई अता-पता नहीं है। पता नहीं अब वह जीवित भी है या नहीं? माँ भी मैग्ना के बारे में कुछ नहीं बता रहीं हैं? पता नहीं क्यों आज मैग्ना की बहुत याद आ रही है? क्यों ना कुछ दिनों के लिये श्वेत महल चला जाऊं, वही एक ऐसी जगह है, जहां मैंने मैग्ना के साथ आखिरी बार वक्त बिताया था।

..... हां यही ठीक रहेगा ....पर.... पर ऐसे में अगर कोई मायावन को पार कर गया तो?.....नहीं...नहीं.... हजारों वर्षों में जब आज तक कोई मायावन को पार नहीं कर पाया तो इन कुछ दिनों में क्या पार कर पायेगा? और वैसे भी मेरा कृत्रिम

स्वरुप तिलिस्मा के हर प्रकार के निर्माण में सक्षम है...और...और मैं कुछ दिनों में तो लौट ही आऊंगा? हां यही ठीक रहेगा।”

यह सोचकर कैस्पर ने निर्माणशाला का पूर्ण अधिकार अपने कृत्रिम रोबोट के हाथों में थमाया और एक काँच की लगभग 10 फुट लंबी आदमकद कैप्सूलनुमा ट्यूब में बैठकर निर्माणशाला के गुप्त द्वार से बाहर निकल गया।

कैप्सूल की स्पीड बिल्कुल गोली के समान थी।

लगभग 1 घंटे के तेज सफर के बाद कैस्पर को समुद्र के अंदर एक मूंगे की बहुत बड़ी दीवार दिखाई दी।

यह देख कैस्पर ने काँच की ट्यूब में लगा एक नीले रंग का बटन दबा दिया। बटन के दबाते ही काँच के कैप्सूल से निकलकर कुछ तरंगें मूंगे की दीवार की ओर बढ़ीं।

जैसे ही वह तरंगें मूंगे की दीवार से टकरायीं वह मूंगे की दीवार किसी दरवाजे की भांति एक ओर सरक गयी।

अब कैस्पर के सामने एक विशालकाय मत्स्यलोक था, जिसकी रचना माया ने ही की थी।

चूंकि कैस्पर हजारों वर्षों के बाद यहां आया था, इसलिये मत्स्यलोक की आधुनिकता देखकर वह स्वयं हैरान रह गया।

चारो ओर विशालकाय आधुनिक इमारतें और पानी के अंदर बिजली की तेजी से तैरते आधुनिक जलयान वहां की अतिविकसित सभ्यता की कहानी कह रहे थे।

यह देख कैस्पर ने अपनी काँच की ट्यूब में लगे एक और बटन को दबा दिया, जिससे कैस्पर का वह ट्यूबनुमा जलयान अदृश्य हो गया।

कैस्पर धीरे-धीरे चारो ओर देखता हुआ मत्स्यलोक को पार कर गया।

मत्स्यलोक के आगे पानी में एक विशाल पर्वत दिखाई दिया। जिसके चारो ओर विचित्र जलीय पौधे लगे हुए थे।

कैस्पर ने पर्वत के पास पहुंचकर पुनः एक बटन दबाया। बटन के दबाते ही पर्वत में एक जगह पर एक गुप्त रास्ता दिखाई देने लगा।

कैस्पर ने अपने जलयान को उस गुप्त रास्ते के अंदर कर लिया।

कैस्पर के अंदर प्रवेश करते ही गुप्त द्वार स्वतः बंद हो गया।

गुप्त द्वार के बंद होते ही उस खोखले पर्वत में चारो ओर रोशनी फैल गयी और इस रोशनी में चमक उठा, वहां मौजूद माया महल।

माया महल को देखते ही कैस्पर की आँखों के सामने मैग्ना का चेहरा नाच उठा।

हजारों वर्ष पहले मैग्ना के साथ अपनी माँ माया के लिये जल पर तैरने वाले इसी महल का निर्माण तो दोनों ने किया था, पर पोसाईडन

की इच्छा के अनुसार उन्हें यह महल समुद्र की लहरों से हटाना पड़ा।

पोसाईडन नहीं चाहता था कि समुद्र में उससे श्रेष्ठ महल किसी दूसरे के पास हो। इसलिये कैस्पर ने चुपके से इस महल को तोड़ने की जगह मत्स्यलोक के इस भाग में छिपा दिया था, जहां पर किसी की भी नजर उस महल पर ना पड़े और मैग्ना के लिये बादलों पर एक दूसरे श्वेत महल का निर्माण किया था।

पूरा माया महल एक अदृश्य ऊर्जा के ग्लोब में बंद था, जिससे समुद्र का पानी महल के अंदर नहीं आ रहा था।

कैस्पर अपने जलयान से उतरा और माया महल में प्रवेश कर गया।

हजारों वर्षों के बाद भी महल में कोई भी बदलाव नहीं आया था। सब कुछ पहले की ही तरह था, बस पूरे महल में कोई भी इंसान नहीं था।

कैस्पर महल के कई कमरों से होता हुआ, एक ऐसे कमरे में पहुंचा जहां एक 10 फुट का समुद्री घोड़ा खड़ा था। वह घोड़ा जीवित होकर भी किसी स्टेचू की तरह खड़ा था।

“चलो ‘जीको’ आज हजारों साल बाद मैं तुम्हें बाहर की सैर करा लाता हूं।” यह कहकर कैस्पर उस घोड़े पर सवार हो गया।

कैस्पर के सवार होते ही वह समुद्री घोड़ा बिजली की तेजी से पर्वत से बाहर निकल गया और समुद्र की सतह की ओर चल दिया।

कुछ ही देर में जीको समुद्री की सतह पर पहुंच गया।

समुद्र की सतह पर पहुंचते ही जीको एक सफेद रंग के उड़ने वाले घोड़े में परिवर्तित हो गया और कैस्पर को लेकर आकाश की ऊंचाइयों की ओर बढ़ चला।

आसमान में ऊंचाई पर हवा काफी तेज थी। चारो ओर सफेद बादलों के गुच्छे अलग-अलग आकृति में हवाओं में घूम रहे थे।

काफी देर तक उड़ते रहने के बाद जीको कैस्पर को लेकर श्वेत महल के पास पहुंच गया।

पर श्वेत महल का नजारा देख कैस्पर हैरान रह गया। श्वेत महल के बाहर कई आसमान में उड़ने वाले काँच के पारदर्शी यान खड़े थे।

उस यान से उतरकर कई बच्चे खड़े उस श्वेत महल को निहार रहे थे।

उन बच्चों के पास एक स्त्री और पुरुष भी खड़े थे, जो कि किसी गाइड की तरह से बच्चों को उस श्वेत महल के बारे में बता रहे थे।

“यह मेरा महल टूरिस्ट प्लेस कब से बन गया?” कैस्पर ने आश्चर्य से उस भीड़ को देखते हुए सोचा- “और सबसे बड़ी बात कि पृथ्वी वासियों के पास इतने आधुनिक यान कैसे आ गये?

कैस्पर ने जीको को वहीं बादलों में भीड़ से कुछ दूरी पर रोक दिया और स्वयं चलता हुआ उस गाइड सरीखे स्त्री -पुरुष की ओर बढ़ा।

“हैलो... मेरा नाम कैस्पर है। क्या मैं पूछ सकता हूं कि आप लोग कौन हैं? और यहां मेरे महल के बाहर क्या कर रहे हैं?” कैस्पर ने पुरुष की ओर हाथ बढ़ाते हुए कहा।

वह स्त्री-पुरुष कैस्पर को देखकर आश्चर्य से भर उठे।

पुरुष ने बच्चों को पीछे करते हुए कहा- “तुम्हारा महल?....ये तुम्हारा महल कब से बन गया?...यह तो नक्षत्रलोक की संस्कृति का हिस्सा है। और तुम हो कौन? और आसमान में इतनी ऊंचाई तक कैसे पहुंचे?”

“यही सवाल तो मुझे तुमसे करना चाहिये....और यह नक्षत्रलोक क्या है? और तुम लोगों ने मेरे महल पर कब्जा कब किया?” कैस्पर के शब्दों में अब गंभीरता आ गयी।

“एक मिनट रुकिये।” स्त्री ने बीच में आते हुए कहा- “मेरा नाम वारुणी है और मेरे साथी का नाम विक्रम है। मुझे लगता है कि अगर आप सही व्यक्ति हैं, तो शायद हम दुश्मन नहीं हैं। हमें कहीं बैठकर आपस में

बात करना चाहिये?”

कैस्पर को वारुणी की बात सही लगी इसलिये उसने हां में सिर हिलाते हुए कहा- “ठीक है, मुझे तुम्हारी बात मंजूर है, चलो इस महल में ही बैठकर बात करते हैं।”

“पर हम इस महल में प्रवेश नहीं कर सकते... इसके आसपास अदृश्य किरणों का घेरा है।” विक्रम ने कहा- “हम इस अदृश्य घेरे को पार नहीं कर सकते।”

“यह महल तो तुम्हारी संस्कृति का हिस्सा है तो तुम इसमें प्रवेश क्यों नहीं कर सकते?” कैस्पर ने कटाक्ष करते हुए कहा- “अच्छा अब सब लोग एक दूसरे का हाथ पकड़ लीजिये और आप में से कोई एक मेरा हाथ पकड़ ले... मैं आप लोगों को महल के अंदर लेकर चलता हूं।”

यह सुन वारुणि कैस्पर का हाथ पकड़ने के लिये आगे बढ़ी। तभी विक्रम हंसते हुए बीच में आ गया- “अरे-अरे...तुम कहां उसका हाथ पकड़ने चल दी। तुम मेरा हाथ पकड़ो..कैस्पर का हाथ मैं पकड़ लेता हूं।”

विक्रम और वारुणी की शैतानी भरी हरकत देख कैस्पर को एक बार फिर मैग्ना की याद आ गयी।

मगर तुरंत ही कैस्पर ने अपनी भावनाओं पर कंट्रोल किया और विक्रम का हाथ पकड़, उन सभी को अदृश्य दीवार के पार लेकर, महल के अंदर की ओर बढ़ गया।

चैपटर-7

मैग्ना शक्ति:
(13 जनवरी 2002, रविवार, 14:25, मायावन, अराका द्वीप)

खूनी बारिश को पार करने के बाद सभी बर्फीली घाटी के पास पहुंच गये थे।

जहां तक मशरुम के पेड़ उगे थे, वहां तक पथरीली जमीन थी। उसके आगे से बर्फ की घाटी शुरु हो गयी थी।

एक ऐसी भी जगह थी जो पथरीली जमीन और बर्फ की घाटी को 2 बराबर भागों में बांट रही थी।

“बहुत ही विचित्र धरती है यहां की। लगता है कि जैसे हम किसी फिल्म स्टूडियो में घूम रहे हों, जहां हर थोड़ी दूर पर एक कृत्रिम वातावरण बनाया गया हो।” जेनिथ ने बर्फ की घाटियों की ओर देखते हुए कहा।

“सही कह रही हो जेनिथ दीदी, यहां पर हर चीज कृत्रिम लग रही है।” शैफाली ने कहा- “और हर वातावरण में एक मुसीबत होती है, जो हमें मारने की कोशिश करती है। ऐसा लग रहा है कि जैसे कोई नहीं

चाहता कि हम इस द्वीप में आगे बढ़ें?”

“नहीं शैफाली।” क्रिस्टी ने शैफाली को टोकते हुए कहा- “जिसने इस द्वीप की रचना की, वह अवश्य ही बहुत सी विचित्र शक्तियों का मालिक होगा, अगर वह हमें आगे बढ़ने नहीं देना चाहता तो हर मुसीबत का कोई समाधान नहीं रखता, मुझे तो ऐसा लग रहा है कोई हमारी शक्तियों का आकलन कर रहा है और आगे इन सबसे भी ज्यादा बड़ी मुसीबतें हमें मिलने वाली हैं।”

सभी धीरे-धीरे चलते हुए बर्फ की घाटी में प्रवेश कर गये।

“तुम ऐसा किस आधार पर कह रही हो क्रिस्टी।” सुयश ने क्रिस्टी की बातें सुन उससे सवाल किया।

“कैप्टेन, अगर आप इस द्वीप की शुरु से सारी घटनाओं को क्रमबद्ध करेंगे, तो पूरी घटनाएं आपको एक वीडियो गेम की तरह लगेंगी।”

क्रिस्टी ने अपने तर्कों के द्वारा समझाना शुरु कर दिया-

“जिस प्रकार वीडियो गेम में हर स्टेज को पार करने के बाद अगली स्टेज और कठिन हो जाती है, ठीक उसी प्रकार हमारे साथ भी इस द्वीप पर ऐसा ही हो रहा है। जैसे पहले जब हम इस द्वीप पर आये तो एक जादुई वृक्ष से मिले, जो हमें फल नहीं दे रहा था, फिर जेनिथ का बर्फ में फंस जाना और वह मगरमच्छ

मानव दिखाई दिया, फिर ड्रेजलर पर अजगर का आक्रमण, फिर नयनतारा पेड़ से शैफाली की आँखें आना, फिर शलाका मंदिर का मिलना। यहां तक कि किसी भी घटना में हमें किसी भयानक मुसीबत का सामना नहीं करना पड़ा। इसका मतलब वह इस जंगल की पहली स्टेज रही होगी।

इसके बाद लगातार, ब्रूनो, असलम, ऐलेक्स, जॉनी और ब्रैंडन को हमें खोना पड़ा। शायद वह इस जंगल की दूसरी स्टेज रही होगी। पर अगर पिछली कुछ घटनाओं पर हम निगाह डालें तो वहां पर हमें बहुत बड़ी मुसीबतों का सामना करना पड़ा जैसे आग की मुसीबत, फिर एक के बाद एक लगातार 2 विशाल जानवर स्पाइनोसोरस और टेरासोर का सामना करना पड़ा।

फिर सैंडमैन का हमला, फिर अत्यन्त मुश्किल मैग्नार्क द्वार.....तो अगर हम इन सारी घटनाओं को देखें तो हम पर आ रही मुसीबतें खतरनाक और खतरनाक होती जा रहीं हैं। मैं इन्हीं कैलकुलेशन के आधार पर कह रही हूं कि आगे कोई और बड़ी मुसीबत हमारा इंतजार कर रही है।”

क्रिस्टी के तर्क काफी सटीक से लग रहे थे।

लेकिन इससे पहले कि कोई कुछ बोल पाता, तभी एक पास के बर्फ के पहाड़ से कोई काले रंग की चीज बर्फ पर फिसलकर उधर आती हुई दिखाई दी।

उसे देखकर तौफीक ने सबका ध्यान उस तरफ कराते हुए कहा- “लो आ रही है कोई नयी मुसीबत? दोस्तों तैयार हो जाओ, उसका सामना करने के लिये।”

तौफीक की बात सुन सभी का ध्यान अब उस बर्फ पर फिसल रही काली चीज पर था।

सभी पूरी तरह से सतर्क नजर आने लगे। कुछ ही देर में वह काली चीज इन सभी के सामने आकर खड़ी हो गयी।

वह एक काले रंग का 10 इंच ऊंचा एक पेंग्विन था, जो अब टुकुर-टुकुर उन्हें निहार रहा था।

“दोस्तों ये ‘लिटिल ब्लू पेंग्विन’ है, ये संसार का सबसे छोटा पेंग्विन होता है।” सुयश ने पेंग्विन को देखते हुए कहा- “वैसे यह खतरनाक नहीं होता, पर इस द्वीप का कोई भरोसा नहीं है, इसलिये सभी लोग सावधान रहना।”

अब वह छोटा पेंग्विन शैफाली को ध्यान से देखने लगा।

फिर वह पेंग्विन अपनी चोंच से बर्फ पर कुछ लकीरें सी खींचने लगा। सभी हैरानी से उस पेंग्विन की यह हरकत ध्यान से देख रहे थे। बर्फ पर लकीरें खींचने के बाद वह पेंग्विन उन लकीरों से दूर हट गया।

जैसे ही सभी की नजरें उन लकीरों पर पड़ी, सभी आश्चर्यचकित हो उठे, क्यों कि उस पेंग्विन ने बर्फ पर अंग्रेजी के कैपिटल लेटर से MAGNA लिखा था।

अब शैफाली गौर से उस पेंग्विन को देखने लगी।

शैफाली को अपनी ओर देखता पाकर वह पेंग्विन एक दिशा की ओर चल दिया।

“लगता है यह पेंग्विन शैफाली को कहीं ले जाना चाहता है, जहां पर मैग्ना का कोई रहस्य छिपा है।” जेनिथ ने पेंग्विन की हरकतों को ध्यान से देखने के बाद कहा।

जेनिथ की बात सुन शैफाली धीरे-धीरे उस पेंग्विन के पीछे चल दी।

पेंग्विन ठुमकता हुआ आगे-आगे चल रहा था, बीच-बीच में वह पलटकर देख लेता था कि शैफाली उसके पीछे आ रही है कि नहीं? बाकी के सारे लोग शैफाली के पीछे थे।

सभी के दिल में उत्सुकता थी कि आखिर यह पेंग्विन उन्हें ले कहां जाना चाहता है?

पेंग्विन कुछ आगे जाकर एक बर्फ के गड्ढे के पास रुक गया। उसने एक बार फिर पलटकर शैफाली को देखा और उस गड्ढे में कूद गया।

शैफाली ने उस गड्ढे के पास पहुंचकर उसमें झांककर देखा, पर नीचे अंधेरा होने के कारण उसे कुछ नजर नहीं आया।

तभी शैफाली के आसपास की बर्फ पर दरारें नजर आने लगीं।

यह देख सुयश ने चीखकर शैफाली को आगाह किया- “शैफाली तुरंत हटो वहां से..तुम एक जमी हुई झील के ऊपर हो, और वहां की बर्फ टूटने वाली है।”

लेकिन इससे पहले कि शैफाली अपना कुछ भी बचाव कर पाती या फिर वहां से हट पाती, शैफाली के पैरों के नीचे की बर्फ टूटकर झील में गिर गयी और उसी के साथ शैफाली भी झील में समा गई।

यह देख सभी के मुंह से चीख निकल गई।

सभी भाग कर उस बड़े बन चुके गड्ढे में झांकने लगे।

“शैफालीऽऽऽऽ...शैफालीऽऽऽऽऽऽ” सुयश ने जोर की आवाज लगा कर शैफाली को पुकारा।

उधर शैफाली को झील में गिरकर बिल्कुल भी ठंडा महसूस नहीं हो रहा था।

यहां तक कि उसे पानी में साँस लेने में भी किसी प्रकार की परेशानी नहीं हो रही थी।

पेंग्विन अब कहीं नजर नहीं आ रहा था।

तभी शैफाली को उस झील की तली में एक डॉल्फिन तैरती हुई

दिखाई दी।

“झील के पानी में डॉल्फिन कहां से आ गयी? जरुर इस झील में कोई ना कोई रहस्य छिपा है? मुझे इसका पता लगाना ही होगा।” शैफाली ने अपने मन में दृढ़ निश्चय किया ।

पर जैसे ही वह झील के अंदर डुबकी

लगा ने चली, उसे सुयश की महीन सी आवाज सुनाई दी, जो ऊपर से आ रही थी।

कुछ सोच वह झील की सतह पर आ गई।

शैफाली को सुरक्षित देख सभी की जान में जान आयी।

“कैप्टेन अंकल... आप लोग परेशान मत होइये, मैं झील के पानी में बिल्कुल सुरक्षित हूं, पर मुझे झील के अंदर कोई रहस्य छिपा हुआ लग रहा है, तो आप लोग मेरा थोड़ी देर तक इंतजार करें। मैं अभी झील का

रहस्य पता लगा कर आती हूं।” शैफाली ने कहा।

“पर शैफाली झील का पानी तो बहुत ठंडा होगा, तुम इतने ठंडे पानी में ज्यादा देर तक साँस नहीं ले पाओगी।” तौफीक ने अपनी चिंता जाहिर करते हुए कहा।

“आप चिंता ना करें, मुझे पानी में साँस लेने में कोई तकलीफ नहीं हो रही। बस आप लोग थोड़ी देर तक मेरा इंतजार करें।” इतना कहकर शैफाली ने झील के पानी में डुबकी लगायी और झील की तली की ओर

चल दी, जिधर उसने अभी डॉल्फिन को तैरते हुए देखा था।

थोड़ी ही देर में शैफाली को डॉल्फिन फिर से नजर आ गयी, जो कि तैर कर एक दिशा की ओर जा रही थी।

शैफाली ने उस डॉल्फिन का पीछा करना शुरु कर दिया।

झील की तली में पहाड़ी कंदराओं के समान बहुत सी गुफाएं बनी हुईं थीं।

जारी रहेगा______✍️
 
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