Himmat-wala (incest .. adultery .. action .. thriller) - Page 2 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

Himmat-wala (incest .. adultery .. action .. thriller)

अपडेट :::::: 8

.

.

.

.


इन पांच दिनों में मैंने बोहत सोचा क्या करना चाहिए, मैं अगर यहाँ से भाग जाऊं तो रेखा बाई को मुझपर शक न हो, के मैं प्लान बना कर यहाँ से भागा हूँ. और वो मेरी माँ और बहनो पर ज़ुल्म न करे. प्लान बनाये बगैर भागना मतलब अपनी माँ और बहनो की ज़िन्दगी को बाद से बदतर बनाना. नहीं मैं ऐसे नहीं भागों गए. कुछ तो ऐसा करना पड़ेगा जिस से रेखा बाई का धयान माँ की तरफ न जाये.

सोचते सोचते कई तरह के प्लान मेरे दमाग में आते रहे लेकिन कोई भी ऐसा नहीं था जिस में रिस्क न हो. हर प्लान को सोचते सोचते मैं दो घरों में बहने लगता था कभी लगता ये प्लान सही है कभी लगता नहीं ये प्लान सही नहीं है.

ये एक बोहत बड़ी खामी थी मुझ में. मेरे लिए फ़ासिला करना मुष्काल होता था अक्सर ऐसे hi मुआमलात में. मैंने बड़ी कोशिश की अपनी सोचो को डेविड होने से बचने के लिए. हालांकि जिस तरह के माहौल में मैं रह रहा था वह एक से बढ़ कर एक हरामी और कमीने लोग बास्ते थे. रेखा बाई की मार खा खा कर मैं dheet,ziddi, सरकश, तो बन गया था लेकिन हरामी और कमीना मैं अब तक सही से नहीं बन पाया था.. या शायद हरामी और कमीना मैं भी बन चूका था लेकिन वो मेरे अंदर hi अंदर कही दबे हुए थे.... मुझे इस दुन्या से लड़ने के लिए अपनी फॅमिली को सेफ लाइफ देने के लिए इस कमीनी दुन्या की हर क्वालिटी मुझसे में होनी चाहिए. वर्ण मैं अपने मक़सद को हासिल नहीं कर सकता.

डबल माइंडेड मेरी एक ऐसी बीमारी थी. जिस ने मेरे कई साल जाया कर दिए थे, अगर मुझ में अपनी डबल माइंडेड वाली स्ट्रेस से निकलने की हिम्मत आ गई तो मैं बोहत जल्द फैसले कर लिया करूंगा.

लेकिन जान तोड़ कोशिश कर के भी मैं अपनी इस खामी पर काबू नहीं प् सका था. अब भी मुझे कोई प्लान नहीं सूझ रहा था. तो मैं अपने दोस्त अजित भाई के पास चला गया.

दूकान पर एक दो कस्टमर खड़े थे. मैंने ऐसे hi अजित भाई से कोई चीज़ ले कर कहानी शुरू कर दी. अजित भाई मुझे देख "hello हाय" बोल कर अपने काम में लग गए, मैं भी दूकान के खली होने का इंतज़ार करने लगा. थोड़ी hi देर में वो बन्दे चले गए. मैंने एक नज़र पूरे बाजार पे डाली सब अपने अपने कामो में बिजी थे तो मैं अजित भाई की दूकान के अंदर चला गया.

अजित भाई .... आज ये चेहरा क्यों उतरा हुआ है. कोई बात हो गई है क्या..???

विजय ........ नहीं अजित भाई कोई बात क्या होनी है वही सोच रहा हूँ यहाँ से कैसे जाओं कोई प्लान hi नहीं सूज रहा. जो भी प्लान बनता है सब में hi रिस्क निकल आता है....

अजित भाई .... ाचा बताओ मुझे "क्या क्या प्लान सोचा है.."'

फिर मैंने अजित भाई को इन पांच दिनों में जो जो सोचा था सब बता दिया..

अजित भाई .... (कुछ देर सोचते रहे फिर बोले) हम्म्म ये तो सब खतरे वाले प्लान हैं कुछ गड़बड़ ज़रूर हो जाएगी .... तूने जो सोचा है उस पर अमल न करना.

कुछ सोचता हूँ मैं भी.

"अजित भाई कुछ देर सोचते रहे फिर उन को एक िद्या आ hi गया"

अजित भाई .... विजय एक िद्या है तो सही लेकिन खतरा उस में भी है, लेकिन काम बनने के चांस हैं,

विजय ..... (खुश हो कर) अजित भाई तो फिर बताओ न. खतरे के बगैर तो वैसे भी कुछ नहीं हो सकता.......

अजित भाई .... तुम ने बताया था रेखा बाई ने तुमको काई बार बुरी तरह से मारा पीटा है....

विजय ........ हाँ तो इस में िद्या कहाँ से आ गया ...

अजित भाई..... तू पहले दूकान के बहार एक नज़र दाल कोई इधर पास hi तो नहीं khada......."phir मैंने अजित भाई के कहने पर दूकान से बहार आ कर देखा दूर दूर थे सब लोग.." फिर मैं दूकान के अंदर आ गया..

विजय ....... कोई नहीं है आप जल्दी से बता दें ...

अजित भाई.... देख विजय तुझे कोई ऐसा काम करना पड़ेगा जिससे रेखा बाई को तुझपे ग़ुस्सा ए और वो तुझे मारने पीटने लगे. इस से तू दो तीन दिन के लिए उस की नज़रों से दूर एक कमरे में पड़ा रहेगा.. और रेखा बाई को गालियां भी निकल देना जिससे वो तुझसे और ग़ुस्सा हो जाएगी... इस बीच अगर तू यहाँ से भाग जायेगा तू रेखा बाई को तेरी माँ पर शक नहीं होगा... और तू अपनी माँ और बहनो को भी अच्छे से समझा देना के तेरे जाने के बाद 4 5 दिन तक कुछ न खाये पियें .. इस से वो कमज़ोर तो हो जाएँगी लेकिन फिर अपनी रूटीन पर आ जाएँगी ... रेखा बाई को अपने धंदे की फ़िक्र होगी और तू ठहरा कोठे का निकम्मा लड़का उसे तुझसे कोई खतरा तो होगा नहीं, इस लिए वो तेरी फ़िक्र छोड़ देगी.

मुझे भी अजित भाई का मश्वरा ाचा लगा लेकिन इस में भी खतरा था कही माँ और बहनो इमोशनल न हो जाएँ, यही बात मैंने अजित भाई को भी बताई.

अजित भाई .... देख विजय जब तक तू यहाँ रहे गए डरता रहे गए. तू बस यहाँ से निकल फिर देखना सब ठीक हो जायेगा और मैं तो हूँ न यहाँ पर कुछ भी गड़बड़ हुई तो मैं तुझे बता दूंगा. बस किसी जगा सेट होते hi मुझे अपना नंबर दे देना......

मैं अजित भाई की साड़ी बातों पर घोर करने लगा और अपने आप को तैयार करने लगा "मैंने सोच लिया था अब्ब जो भी हो मैं ये ज़रूर करूँगा"

रेखा बाई की मार का तो मुझे डर था नहीं, एंटी मार खा चूका था के अब्ब तो आदि हो चूजा था और मेरा जिस्म भी अब इतना कमज़ोर नहीं रहा था. जब अंदर आग लगी हो तो बहरी दर्द क्या मने रखते hain....mere चेहरे पर एक दर्द भरी मुस्कराहट आ गई.....

अजित भाई .... अपने अंदर hi आग को संभल के रखो कभी ये तेरे बोहत काम आयी गई .... चल अब्ब जाने की तैयारी कर ...

मैं भी अपने आप को मज़बूत बना कर कोठे पर चला गया और फिर घोर करने लगा ऐसा क्या करून के रेखा बाई का ग़ुस्सा मुझ पर बढ़ जाये. वैसी तो वो हरदम hi मुझे ग़ुस्से और नफरत से देखती रहती थी. लेकिन अब्ब मुझे कुछ तो ख़ास करना था जिससे रेखा बाई का पारा सातवें आसमान तक जा पोहंचे ....

एक िद्या आया मैंने सोचा उस पर अमल करता हूँ शायद काम बन जाये. अब्ब पता नहीं मैं अपने मक़सद में कामियाब होता हूँ या नहीं....

अपने प्लान पर अमल करते हुए मैं उन दुसरे कमरों की तरफ बढ़ गया जो हमारे hi कोठे पर रह रही लड़कियों और औरतों के थे. में इक औरत को ढून्ढ रहा था. जो रेखा बाई की जनरों में माँ से आगे निकलना चाहती थी. साली वो भी अगवा हो कर आई थी लेकिन कोठे की ज़िन्दगी में रह कर उसे वो सब ऐशो आराम मिल रहे थे जो कभी उसे अपने रियल ghar(maa पिता का घर) में नहीं मिल सके थे. और उस की मेरी माँ से नहीं बनती थी वो जलती थी के रेखा बाई सब से ज़यादा मेरी माँ से लगाओ रखती क्यों रखती है. ज़ाहिर सी बात थी मेरी माँ की तरह वो मुझसे भी बोहत नफरत करती थी...

में उस को ढूंढ़ने के लिए सब कमरे चेक करने लगा. माँ की लौडियां साड़ी लड़कियां अपने आधे नंगे बदन लिए बातों में मशग़ूल थी. किसी ने मुझे देख कर आंख मार्डी तो किसी ने मुझे देख मोहन फेर लिया. कितनी जल्दी यहाँ के माहौल में एडजस्ट हो जाती हैं ये लड़कियां, मुसलसल छूट कुटाई से शर्म नाम की चीज़ hi इन सालियों में ख़तम हो जाती है... अब में इस खोते पर नाजायज़ लड़का था. तो सब के लिए ावें hi था. किसी की नज़र में मेरे लिए कोई वैल्यू नहीं थी. और वैसे भी मैं हर वक़्त तो मैले कुचले कपड़ों में रहता था. ख़ाक मेरी पर्सनालिटी थी यहाँ.

कभी नए कपडे तो मिलने से रहे पूरी ज़िन्दगी दूसरों के उत्तर कपडे पहने थे. साला किसी भिखारी जैसी शकल हो गई थी मेरी. मुझे नहीं याद के कब मैंने अपने बाल कटवाए हूँ या अचे से नाहा कर साफ़ सुथरे कपडे पहने हूँ.

माँ और बहनो को में बोहत पायरा लगता था. उन की नज़र में मेरे से ज़यादा ख़ूबसूरत कोई नहीं था. मेरी ऑंखें नीले रंग की थी उन में कशिश बोहत थी लेकिन अब्ब इन आँखों में हर वक़्त दर्द सहने की वजा से बोहत ज़यादा गहराई पैदा हो चुकी थी. माँ अक्सर मुझे नज़र न लगे इस लिए कला टिक्का लगाती थी. मैं है दिया करता माँ "काला टिक्का उसे लगते हैं जो ख़ूबसूरत हो. मैं तो कही से भी खूबसूरत नहीं दीखता."

माँ bolti"har माँ के लिए उसका बीटा राजकुमार जैसा होता है और तू तो मेरा बोहत hi पायरा और सुन्दर बीटा बीटा है. तेरे जैसा कोई नहीं. यहाँ तो तुझे अच्छे कपडे pehn'ne को नहीं मिलते इस लिए तू ऐसा दीखता है. देखना जिस दिन तू अपने बाल कटवा कर नए नए कपडे पहने गए. उस दिन तुझसे ज़यादा खूबसूरत कोई नहीं होगा.. " माँ की बातें सुन कर मुझे हंसी आ जाती और फिर फ़ौरन hi ऑंखें नाम हो जाती, कैसी दर्द भरी ज़िन्दगी थी, आह्ह्ह्ह काश इक रात सो जाऊं और फिर कभी न उठूं,,, कभी कभी तो दर्द बर्दश्त की सीमा लाँघ जाता था...


ऐसे hi सोचता सोचा मैं इक कमरे में पोहंचा तो देखा सामने वही साली "लाली" कमरे में कपडे उतारे किसी लड़की से मस्सगे करवा रही रही थी.
 
अपडेट ::::: 10

.

.

.

.

************************फ्लैशबैक********************

जब मैं लाली के कमरे में पहुंचा तो लाली एक लड़की से मस्सगे करवा रही. दूर के खुलने की आवाज़ से दोनों का धयान मेरी तरफ हुआ.

मुझे देख लड़की हड़बड़ा गई लेकिन लाली के होंठों पर एक कमीनी मुस्कान आ गई.

उसके बदन पर कपडे नहीं थे. उसने ग़ुस्सा होने की बजाये कमीनी मुस्कान लिए मुझे अपने पास बुलाया कर बोली

लाली ...... क्यों चंदा यहाँ क्यों आया है, क्या बात है.

विजय ...... बस वैसे hi गुज़र रहा था तो इस कमरे में ऐसे hi आ गया.

(जब मैं बोल रहा था तो लाली कुछ सोच रही थी)

लाली चल इधर आ मेरे पास बेथ तुझसे एक बात करनी है.

"मुझे भी अपने प्लान पर अमल करना था"

मेरे लाली के पास बैठने से पहले लाली ने लड़की के कान में कुछ kaha"ladki हाँ में सर हिला कर बहार चली गई"

विजय ..... लाली जी कपडे तो पेहेन लो कोई आ गया तो ग़ज़ब हो जायेगा.

लाली ..... ोये लड़के यहां कपडे पहनने की क्या ज़रुरत है. यहाँ सब ने hi तो सब का सब कुछ देखा हुआ है. चल बेथ यहाँ आ कर मेरी बात सुन.

"मैंने लाली के पास बेथ कर कुछ ऐसा किया के लाली का दमघ hi मुझ पर गरम हो गया और वो मुझे ग़ुस्से से देखने"

उसका बस नहीं चल रहा था के मुझे कच्चा hi खा जाये

लेकिन मैं उस पर तवज्जो न देते हुए कमरे से बहार आ गया. मेरा काम हो गया था. अब्ब लाली मुझपर ग़ुस्सा लाज़मी करेगी के मैंने उस के कमरे घुस कर उसे तंग किया था और उस की बात सुने बगैर hi निकल गया.

मैं जल्दी से माँ के कमरे में पोहंचा माँ बीएड पर hi बैठी थी मैंने जल्दी से माँ को बताया ..

विजय .... माँ यहाँ से जाने का बस एक hi तरीका है .

माँ ..... विज्जु बीटा क्या तरीका है मुझे बता

फिर मुझे अजित भाई ने जो बताया था वो मैंने माँ को बता दिया. और ये के मैंने लाली के कमरे में घुस कर उसके साथ क्या किया है. और फिर उस की बात सुने बगैर hi बहार आ गया. अब्ब लाली ग़ुस्से के आ कर रेखा बाई को बताये गई और फिर मेरी पिटाई होगी.

माँ मेरी साडी बात सुन कर डर गई और रोने लगी.

विजय ..... बजी जल्दी से खुद को सम्भालो उसके बाद आपको उन तीनो को भी सब समझाना है.

बाजी एक बात और है. आप लोगों ने पूरी पूरी एक्टिंग करनी है दर्द तो मुझे होगा.. और रेखा बाई ने मुझे मारना तो है लेकिन आपने अपना काम सही से करना है. और उन तीनो को भी समझा दो. लाली किसी भी वक़्त आती होगी. अगर बात बिगड़ गई तो मेरे कमरे में कुछ पैसे रख देना. जाते हुए मैं ले जाऊँगा.

माँ रोटी रही और फिर हाँ में सर हिला कर मोहन दूसरी तरफ फेर liya..ab माँ इतनी जल्दी तो चुप होगी नहीं इस लिए मैं अपने कमरे में आ कर लेट गया अब्ब मुझे इंतज़ार था. देखो अब्ब लाली या रेखा बाई मेरे साथ क्या करती है ...

कुछ देर गुज़री कुछ न हुआ तो मैंने कमरे से बहार आ कर देखा लाली ग़ुस्से में इधर उधर टहल रही है. इस का मतलब है रेखा बाई अभी कोठे पर नहीं है. लाली मुझे खा जाने वाली नज़रों से देख रही थी. मैंने सोचा कुछ और पन्गा करना चाहिए जिससे बात और बिगड़ जाये मैंने कोठे का चक्कर लगाना शुरू कर दिया. अब्ब मुझे यहाँ से जाना था तो मुझे चैन नहीं मिल रहा था जो होना है वो जल्दी hi हो जाये. वक़्त काटना अब मुश्किल हो रहा था. मैं कोठे के कमरों से बहार आ गया बहार छोटा सा लॉन बना हुआ था. उस लॉन पर मुझे लाली का पप्पी नज़र आया. मुझे (pet)puppy को देख कर तरस तो बड़ा आया लेकिन इस पप्पी से ज़यादा हम दया के लायक थे. जब कोई हम पर तरस नहीं खा रहा तो मैं इस लाली के पप्पी पर तरस क्यों खाएं. लाली भी मेरे पीछे पीछे hi लॉन में आई और मुझे घूरने लगी. बस मिल गया मुझे मौका अब्ब चुका या छक्का तो लगाना hi पड़ेगा.

जो होगा देखा जायेगा. में एक्ससिटेड हो कर पप्पी के पास जाने लगा .

लाली मुझे आवाज़ लगाने लगी. उसे कुछ गड़बड़ लगी मैंने लाली को देखते हुए लाली के पप्पी को पकड़ लिया और फिर पप्पी को घूरने लगा और लाली की तरफ कमीनी हंसी से देख कर अपने गले पर ऐसे हाथ ghumaya"jaise चाकू से गाला काटा जाता है" लाली के तो रोंगटे hi खड़े हो गए वो डर गई कही में उस के पप्पी को मारने तो नहीं वाला. लाली अपने पप्पी से बोहत प्यार करती थी.

लाली ..... देख विज्जु तू मेरे पप्पी को छोड़ दे नहीं तो तेरे साथ ाचा नहीं होगा. आज आने दो रेखा बाई को तेरी हड्डी पसली एक न करवा दी तो मेरा नाम भी लाली नहीं.

विजय ..... में लाली को चिढ़ाने लगा और पप्पी के गले पकड़ कर उसे जोरर से दबाने का नाटक करने लगा. लाली की चीख निकल गई अंदर से कुछ लड़कियणं और औरतें भाग कर बहार आ गई. वो लाली से पूछने लगी "वो चीख क्यों रही है"

लाली तो बस अपने पप्पी को hi देखे जा रही थी.

मेरी किस्मत अछि थी जो उसी वक़्त रेखा बाई की गाडी भी अंदर आते हुए दिखी. लाली भाग कर रेखा बाई के पास गई. लाली रो रो कर बताने लगी के मैं उस के पप्पी को जान से मारने वाला हूँ और कमरे में हुई बात भी बता दी.

रेखा बाई "जो किसी कुत्ते की नेसल से थी. वो तो मुझे भी किसी कुत्ते से काम नहीं समझती थी."

वो ग़ुस्से से पागल हो गई और मुझे गालियां देने लगी.

रेखा बाई .... अरे ोोू हरामज़ादे क्यों लाली के पप्पी को मरने जा रहा है. साला हरामी माँ का हरामी बीटा. लगता है पहले वाली मार भूल गया.

"मैं रेखा बाई की तरफ देख कर हसने लगा" जैसे उसे मैं कोई वैल्यू hi नहीं दे रहा हूँ...

ये देख रेखा बाई का पारा हाई होने लगा उस ने गार्ड्स को बुला कर मुझे मारने को bola.....lekin इस बार मेरा मक़सद hi कुछ और था. जैसे hi गार्ड ने मुझे मरना शुरू किया मैंने भी गार्ड्स को मरना शुरू कर दिया कभी हाथ से कभी लातों से उनपर तो कोई असर होने वाला था नहीं.

लेकिन रेखा बाई ये देख कर ग़ुस्से के मारे पागल हो गई

रेखा बाई ..... (चिल्लाते हुए) पकड़ कर उल्टा लिटा दो मादरचोद को आज तो ये मरेगा मेरे हाथों से .....

रेखा बाई की आवाज़ सुन कोठे के सारे मकीन बहार निकल ए मेरी माँ और बहने भी बहार आ गई. वो ये देख रोने लगी.....

रेखा बाई के गार्ड्स ने मुझे उल्टा लिटा कर मेरे हाथों को पहला कर कास के पकड़ लिया और दो गार्ड्स ने मेरे पैरों को...

फिर रेखा बाई ने मेरी कमर और मेरे चूतड़ों पर डंडे से ऐसे धुनाई करने लगी "जैसे सर्दियों में रोइ की धुनाई की जाती है" मेरी चीखों से कोठे और बाजार के dar-o-deewar लरज़ उठे ऐसी मार मुझे कभी भी नहीं पड़ी थी.

साला नाटक करते करते कही सच में hi न मारा जाऊं.

रेखा बाई ने अपनी साड़ी ताक़त लगा दी मुझे मरने में कमर तो खेर ज़यादा नहीं ज़ख़्मी हुई लेकिन मेरे चूतड़ों का कचूमर निकल गया. मेरी शलवार खून से सन्न गई. तब जा के माँ और मेरी बहने रेखा बाई के पैरों में गिर कर मेरे लिए माफ़ी मांगने लगी. रेखा बाई का ग़ुस्सा काम hi नहीं हो रहा था. मार कहते कहते मैं बेहोश हो गया. फिर मुझे मेरे टूटे फूटे कमरे में फ़ेंक दिया गया. और बहार से कुण्डी लगा दी.

"लाली बोहत खुश थी मुझे मार पड़ने से और अपने पप्पी की जान बच जाने से"

मैं तो बेहोश हो चूका था. पता नहीं कितना खून निकला था. और मेरे चूतड़ों का क्या हाल हो चूका था. मई सकूं से बेहोशी की नींद सो गया.

मेरे बेहोश होने के बाद माँ ने मेरी बहनो को कमरे में बुला कर सब बता दिया था जो मैंने थोड़ी देर पहले माँ को बताया था. वो सब सुन मेरी बहने जोरर जोरर से रोने लगीं. लेकिन माँ ने उन सब को शांत कर दिया और दुआ करने को कहा.

के मैं यहाँ से बच निकलने में कामियाब हो जाओं.

दुसरे दिन मुझे होश ा गया था. लेकिन हालत बोहत बुरी थी. बड़ी मुष्किल से उठ कर खटिया पर बैठा. aaaahhhhhhhhhhh maaaaaaaaaaaa ......खटिया पर बैठते hi खून फिर से निकलने लगा. बैठा न गया तो उल्टा लेट गया. कुछ देर आराम करने के बाद जो थोड़ी बोहत हिम्मत और ताक़त बची थी. कमरे की तलाशी लेने लगा. शायद कुछ काम की चीज़ मिल जाये. कमरे में अक्सर मरहम पड़ी रहती थी. मुझे रेखा बाई से बार बार मार पड़ती रहती थी तो मैं कुछ न कुछ ला के रख देता था. मैंने ने देखा के काम के लायक कुछ था या नहीं. लेकिन ज़ख़्म पर लगाने के लिए कुछ मरहम थी वो मैंने अपने कपडे उतार कर अपने ज़ख्मो पर लगाने अलग. अब्ब ज़ख़्म पीछे लगे थे तो मरहम लगाने में परेशानी होने लगी. लेकिन लगनी तो थी hi. इस लिए जैसे तैसे कर के लगा ली. कुछ रहत सी महसूस हुई फिर उल्टा लेट गया. अभी तक किसी ने दरवाज़ा नहीं खोला था. मुझे भूक लगने लगी थी लेकिन कोई नहीं आया कौन मुझे खाना खिलाये, माँ और बहने तो कुछ कर नहीं सकती थी. इस लिए मैं भी बर्दाश्त करने के इलावा कुछ कर भी नहीं सकता था. सो ऐसे hi उल्टा लेट गया. let'te hi फिर से नींद ा गई. जब आंख खुली 3 का टाइम ओह चूका था अब तो प्यास के मारे गाला भी खुश्क होने लगा था. लेकिन जैसे भी हो मुझे बर्दाश्त करना था और अपनी हालत भी ऐसी रखने थी के रेखा बाई का धयान मुझ पार्स हट जाये. इस लिए वक़्त गुजरने लगा. फिर रात भी ऐसे hi काट गई. इस बीच मैं बार बार अपने ज़ख्मो पर मरहम लगता रहा. खून तो रुक गया था लेकिन दर्द अभी भी था ख़ास कर मेरे चुत्तड़ तो ऐसे लग रहे थे जैसे किसी ने उन के ऊपर अंगारे रख दिए हूँ. मेरे होंठ भी कुछ कुछ पहात गए थे. दर्द को बर्दाश्त करने के लिए मैं अपने होंटो को डेंटन में दबा लिया करता था. दूसरी रात भी कराहते बिलकते गुज़र गई.

दूसरी सूबा कोई 11 बजे का टाइम था किसी ने दूर ओपन किया लेकिन मैं ऐसे hi पड़ा रहा. वो एक गार्ड था वो एक प्लाट में कुछ खाने को ले कर आया था. खाना रख कर वो चला गया लेकिन उस ने इस बार कुण्डी नहीं लगाई. उस के जाने के बाद मैंने खाना खाया "अब खाने से क्या दुश्मनी" कुछ जिस्म में ताक़त आई तो सोचने समझने के काबिल हुआ और अपनी हालत पर घोर करने लगा आज जाना सही है या नहीं लेकिन अभी इस काबिल नहीं था के बहार जाओं. पूरा दिन गुज़र गया शाम को गार्ड फिर खाना लाया "मैंने उस का शुक्रिया अदा किया" ..."वो हरामज़ादा मुझे घूरने लगा" उसे भी मैंने एक जोरर की लात मारी थी लेकिन खाना तो रेखा बाई के आर्डर पर आता था उस गार्ड का बस चले तो वो मुझे ज़हर hi दे देता. मैंने उसे देख दांत निकल दिए. वो अपने दन्त पिस्ता हुआ बहार चला gaya.phir मैंने खाना खाया और अपनी मरहम लगा कर फिर से उल्टा लेट गया.

उल्टा लेटने से मुझे बड़ा आराम मिल रहा था और मेरे ज़ख्म भी बड़ी हद तक ठीक हो रहे the.ye रात भी गुज़र hi गई..

अगली सूबा मैं काफी chaak-o-choband था लेकिन शो ऐसे करवा रहा था जैसे मैं अभी नजाने कितने दिनों बाद ठीक हो पाऊँगा.

3 दिन मैंने माँ ुर बहनो को नहीं देखा था. अब्ब उन से मिलना भी ज़रूरी नहीं था. सब कुछ तो उनको बता दिया था. अब्ब उन से मिलने जाना मतलब रेखा बाई को शक फ़राहम करना था.

12 बजे के करीब रेखा बाई अपने गार्ड्स के साथ मेरे कमरे में आई.

रेखा बाई बोली .... गन्दी नाली के कीड़े अब तेरी अकाल ठिकाने आई या नहीं ...

विजय ......... मैं अगर गन्दी नाली का कीड़ा हूँ तो मेरी अकाल तो कभी ठिकाने आ hi नहीं सकती .... गन्दी नाली का कीड़ा जो ठहरा ....

रेखा बाई मेरी बात सुन हंसने लगी ....

रेखा बाई .... तू नहीं सुधरने वाला. इस बार तू ठीक हो ले फिर तेरा वो हाल होगा के तू मौत की भीक मांगे गए. अब तक तो मैंने तेरे साथ अपने मतलब का तो कुछ किया hi नहीं .... बोहत जल्द तुझे ट्रेलर दिखाऊँगी ..."ये बोल वो कुटिया बहार निकल गई"

"अब्ब तू हरामज़ादी मुझे देख पाएगी तो मेरा कुछ करेगी ना"

मैंने फिर से कमरे की तलाशी ली मैंने माँ से कहा था कमरे में कुछ पैसे रखने को. मैंने अलमारी खोल के देखि तो उस में 5000 रुपया थे. पहले मैंने अपने साफ़ कपडे पहने फिर मैं हाथ मोहन धो कर वो पैसे अपने जेब में दाल लिए. फिर ऐसे hi लंगड़ाता हुआ "जैसे मुझे चलने में बोहत तकलीफ हो रही हो"

सब कोठे वाले और वालियां मुझे देख हंसने लगे. मैं बहार लॉन में आया और एक बार कोठे की तरफ देखा.

माँ का दिल हर बात जान लेता hai,shayad उसे भी आज कुछ अजीब लग रहा था वो मेरी बहनो के साथ खिड़की में कड़ी मुझे hi देख रही थी. एक बार तो दिल किया मा और बहनो से मिल कर जाऊं लेकिन इस में खतरा tha.lekin मैं कोई गलती नहीं करना चाहता था. मैं यहाँ से किसी को अंदाज़ा होने से पहले hi निकल जाना चाहता था. मैंने कुछ देर माँ और बहनो को देखा फिर पूरे कोठे और लॉन को एक नज़र देखा सब अपने अपने कामों में लगे थे. कुछ की नज़र मेरे ऊपर थी. मैं जा कर लवण में बेथ gaya.(bethne से दर्द तो हुआ लेकिन बर्दाश्त किया) माँ और बहने मुझे देख रो रही थी उन का बस नहीं चल रहा था के वो रो रो कर पूरे बाजार को hi सर पर उठा लें. आज उनकी उम्र भर की कमाई जो जा रही थी. उनका एकलौता सहारा जो जाए रहा था इक नई दुनिया को डिस्कवर करने. "कर पाटा भी है या नहीं..."

उनका तो आज सबा कुछ लूटने वाला था. मेरी भी आँखों में आंसू आने को बेक़रार थे लेकिन बड़ी मुश्किल से मैंने उन आंसुओं को निकलने से बचाया हुआ था.

मेरे लॉन में बैठने पर सब का धयान अपने अपने कामों की तरफ हो गया. जब मैंने देखा के कोई भी मेरी तरफ नहीं देख रहा है तो मैंने जल्दी से हाथ हिला कर माँ और बहनो को जाने का सिग्नल दिया.

बस आखरी सिग्नल मिलते hi माँ और प्रिय धड़ाम से नीचे गिर गेन. मेरा दिल भी खून खून होने लगा लेकिन दिल का दर्द.. "..हाय इस दिल का दर्द.." माँ और बहनो के दिल का दर्द मेरे दिल का दर्द. इतने दर्द इतनी तकलीफ.

(aahhhhhhhhhhh काश मौत आ जाये मरने से सारे दर्द ख़तम हो jayenge.lekin फिर माँ और बहनो को कौन बचाये गए. मर्डर भी नहीं सकता)

मेरे अंदर hi अंदर इतनी जोरर जोरर से चीखें निकलने लगी. लगा दिल hi फट जायेगा. माँ और प्रिय को गिरते देख मेरा मैं फिर से बदलने लगा जाऊं या ना जाऊं. जैसी अब्ब माँ और प्रिय की हालत है. कही मेरे जाते hi उनको कुछ हो न जाये. उनको बचने के लिए हिम्मत और ताक़त ढूंढ़ने जा रहा हूँ. अगर हिम्मत और ताक़त मिल भी गई और बाद में पता चला मा और बहनो में से किसी के साथ कुछ हो न गया हो. ऐसी फीलिंग आते hi मेरा दमाग फिर से चकराने लगा.

"दिल किया अपने सर को ज़मीन पे जोरर से मारों और मेरा दम निकल जाये."

क्या करों "दर्द अब्ब बर्दाश्त नहीं होता. कैसे इतनी हिम्मत करून"

कुछ देर ऐसे hi अंदर hi अंदर रोटा रहा फिर सब याद आया के आज नहीं तो फिर कभी नहीं जा पाऊँगा. इस लिए जितनी हिम्मत है उसे इकठा कर और निकल ले इस दलदल से. और कुछ ऐसा बन कर आ के रेखा बाई या उस जैसी जयंती भी हूँ मुझे रोक न सकें.

अपनी बची खुची हिम्मत को इकठा कर के मैंने एक बार फिर से खिड़की की तरफ देखा तो कोई नहीं था. मैं बहार की तरफ चल दिया.

गार्ड्स ने पुछा किधर जा रहा है "मैंने बोलै" डॉक्टर से मेडिसिन लेने जा रहा हूँ आता हूँ थोड़ी देर में..... उसने मुझे नहीं रोका और मैं बहार आ गया थोड़ी देर बाजार में चलने के बाद आस पास देख कर मैं अजित भाई की दुकान पे चला गया. दुआकान पर अजित भाई अकेले hi थे. तू जल्दी से उन से मिल कर जाने लगा.

विजय ..... ाचा अजित भाई चलता हूँ अगर ज़िन्दगी रही तो फिर मिलेंगे.

अजित भाई .... कैसे जायेगे ...

विजय ....... मतलब ????

अजित भाई .... यहाँ से पैदल hi बाजार के बाहर जा और पहले रिक्शा में बेथ कर कुछ दूर जा फिर रिक्शा से उतर कर टैक्सी में बेथ कर रेलवे स्टईओं निकल जा. यहाँ से सीधे रेलवे स्टेशन मैट जाना किसी को पता चल jayega..."mujhe अजित भाई की बात सही लगी"

मैं अजित भाई से मिलकर जाने लगा तो अजित भाई ने मुझे रोक दिया और कुछ पैसे निकल कर मुझे दिया.

विजय ..... नहीं अजित भाई पैसे हैं मेरे पास..

अजित भाई ... देख विजय तू परदेस जा रहा है वहां पैसों की बड़ी ज़रुरत रहती है इस लिए रख ले बाद में मुझे दे dena.."maine भी इंकार नहीं किया अजित भाई सही बोलल रहे थे"

फिर मैंने अजित भाई से पैसे ले कर जेब में डाले और अजित भाई के गले मिल कर निकल पड़ा. मेरी आँखों में नमी सी आ गई थी. हर कोई अजित भाई जैसा नहीं होता. फिर जैसा अजित भाई ने कहा था मैंने वैसा hi किया और पहले रिक्शा बुक किया फिर टैक्सी कर के रेलवे स्टेशन पोहंच गया..

*****************फ्लैशबैक एन्ड***************

मैं अपने ख्यालों की दुन्या से बहार आया तो देखा तो पाया के रात हो चुकी है टाइम का पता था नहीं था. मैंने इधर उधर देखा सब अपने आप में बिजी थे .फिर मैं भी आंख बंद कर के सो गया

**********************************************************************

लोकेशन: कोठा रेखा बाई

रात ...........1:ऍम का टाइम था

कुछ गाड़ियां रेखा बाई के कोठे पर ा कर रुकीं. एक कीमती गाडी में बैठे एक शख्स ने अपने एक आदमी से कुछ बोलै उसने एक नंबर मिलाया.

tring..tring..tring.. 3 बेल्ल बजते hi कॉल अटेंड हुई. उस आदमी ने मोबाइल अपने बॉस को दिया.

उधर से .... hello कौन बोल रहा है...

अननोन ....: क्यों ऋ रेखा बाई हमारी आवाज़ तो पहचानती है ना

रेखा बाई ...: अरे सर्कार अआप इस टाइम कॉल की है खैरियत तो है न..

अननोन .....: हम यहाँ तेर कोठे के बहार खड़े हैं. तू सब को उनके कमरे में भेज मुझे अंदर आना है....

रेखा बाई ...: जो हुकम सर्कार बस दो mint.."ye बोल रेखा बाई ने कॉल कट नहीं की और सब लड़कियों और औरतों को उनके कमरे में जाने को बोलै"

कुछ hi देर में सब अपने अपने कमरे में चली गई...

रेखा बाई ....: सर्कार आप आ जेएन सब को भेज दिया है मैंने उन के कमरों में

अननोन .......: (कमीनी हंसी हँसते हुए) उस बुलबुल को भी मेरे ख़ास कमरे में भेज दे बड़े दिन हो गए हैं उस का रास पिए huye."unknown अपने लुंड को मसलते हुए हंसाने लगा" हहहहहहहहहहाहा

"अपने मैं में. shaweta(maa) तुझे तो ये भी पता नहीं होगा के मैंने तुझे रेखा बाई के कोठे पर क्यों बेचा है ....... हहहहहहहहहहहहह
 
विजय कोठे पर रह कर मार खाने का आदि हो गया था, इस लिए उसे मार का डर नहीं था. रेखा बाई को जल्द hi पता चल जाएगा. क विजय भाग गया है. इस से भी एक बड़ा हंगामा होगा. विजय का भागना कुछ लोगों को बर्दाश्त नहीं होगा.

और जो अननोन बाँदा रेखा बाई के कोठे पर आया है उसका इस कहानी से बोहत कुछ लेना देना है. ये अननोन एक ऐसा हरामी बाँदा है जिसका आगे चल कर अप्प रीडर्स पता चलगे.... कई सीक्रेट हैं जो खुलें आगे जा कर विजय की माँ पर ज़ुल्म करने वालों की लिस्ट बोहत लम्बी है...... वेट एंड वेट थें रीड

प्लीज स्टे विथ में
 
लोकेशन:::::: कोठा रेखा बाई

.

.

रात ........1:ऍम ..........का टाइम था


कुछ गाड़ियां रेखा बाई के कोठे पर ा कर रुकीं. एक कीमती गाडी में बैठे एक शख्स ने अपने एक आदमी से कुछ बोलै उसने एक नंबर मिलाया.

tring..tring..tring.. 3 बेल्ल बजते hi कॉल अटेंड हुई. उस आदमी ने मोबाइल अपने बॉस को दिया.

उधर से .... hello कौन बोल रहा है...

अननोन ....: क्यों ऋ रेखा बाई हमारी आवाज़ तो पहचानती है ना

रेखा बाई ...: अरे सर्कार अआप इस टाइम कॉल की है खैरियत तो है न..

अननोन .....: हम यहाँ तेर कोठे के बहार खड़े हैं. तू सब को उनके कमरे में भेज मुझे अंदर आना है....

रेखा बाई ...: जो हुकम सर्कार बस दो mint.."ye बोल रेखा बाई ने कॉल कट नहीं की और सब लड़कियों और औरतों को उनके कमरे में जाने को बोलै"

कुछ hi देर में सब अपने अपने कमरे में चली गई...

रेखा बाई ....: सर्कार आप आ जेएन सब को भेज दिया है मैंने उन के कमरों में

अननोन .......: (कमीनी हंसी हँसते हुए) उस बुलबुल को भी मेरे ख़ास कमरे में भेज दे बड़े दिन हो गए हैं उस का रास पिए huye."unknown अपने लुंड को मसलते हुए हंसाने लगा" हहहहहहहहहहाहा

"अपने मैं में. shaweta(maa) तुझे तो ये भी पता नहीं होगा के मैंने तुझे रेखा बाई के कोठे पर क्यों बेचा है ....... हहहहहहहहहहहहह

****************************************************************************

अब्ब आएगजी

अपडेट :::::: 11


.

.

.

.

शवेता को एक सजे हुए कमरे में भेज दिया गया. वो अंदर hi अंदर कांप रही thi."wo सोच रही थी लगता है आज वो हरामी फिरसे आ गया है इस बार तो कई महीनो के बाद आया है. भकवान का शुक्र है विज्जु यहाँ नहीं वर्ण नजाने क्या हो जाता." ये सोचते hi श्वेता रोने लगी और ऊपर आसमान की तरफ देख कर ऊपर वाले से सवाल करने lagi"bhagwan कब तब मुझे ऐसी hi दर्द भरी ज़िन्दगी झेलने को मिलती रहे गई. क्या इस मजबूर माँ को कभी इस दलदल से रहे मिल सकेगी" वो फिर से रोने लगी.. श्वेता का बस नहीं चल रहा था उस आने वाले शक्श के मकरूह हाथों को अपने जिस्म से लगने से पहले hi मौत को गले लगा ले. लेकिन वो छह कर भी ऐसा नहीं कर सकती इस के मरने के बाद उसके बच्चों का क्या होगा. वो तो dar-dar के भिकारी बन जायेंगे या फिर रेखा बाई के रहते प्रिय भी इक तवायफ बन जाएगी. श्वेता के अंदर की घुटन बढ़ने लगी और वो घुटनो के बल बेथ रोने लगी. उसे कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था. इस दर्द भरी ज़िन्दगी से बच निकलने का ..... """हाय कभी तो कोई ऐसी रात ए जब सोये तो उठे तो पता चले के उस की ज़िन्दगी के सब दुःख दर्द ख़तम हो चुके हैं.""""" ऐसी फीलिंग तो अब्ब सिर्फ इक खवाब hi बन कर रह गई थी.

श्वेता ऐसे hi रट हुए अपनी सोचो में गम थी क कमरे का दूर ओपन हुआ और एक शख्स कमरे में एंटर हुआ.

श्वेता जान गई थी आने वाला कौन है उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी अपना सर उठा कर उस कमीने इंसान को देखने की.. वो ऐसे hi सर झुका कर घुटनो के बल बैठी रही.

अननोन पर्सन चल कर श्वेता के पास आ कर बेथ गया और अपने एक हाथ से श्वेता क चीन को पकड़ कर उसका चेहरा ोप्पर उठाया श्वेता ने अपनी ऑंखें बंद hi राखी हुई थी. वो इस घटिया इंसान का चेहरा तक देखना पसंद नहीं करती थी. जिसने श्वेता का सब कुछ छीन कर उसे बर्बाद कर दिया था. वो अकेला नहीं था जिसने श्वेता को बर्बाद किया था इस लिस्ट में और भी कई लोग थे. लेकिन ये अननोन पर्सन भी उन में से एक था.

अननोन ..... हाय मेरी रानी आज भी उतनी hi मासूम और ख़ूबसूरत है जितनी जवानी में हुआ करती थी. कसम से दिल तो था तुझे अपनी रखैल बना लून लेकिन मैं छह कर भी कुछ नहीं कर सकता था. मेरे अकेले का तो जोरर नहीं चलता न. सब ने मिल कर ये फैसला किया था के तेरी ये जवानी इस कोठे की नज़र की जाये. इस लिए तुझे यहाँ लाना पड़ा. लेकिन तू तो अभी भी वैसी की वैसी है. अगर तू बूढी हो जाती तो तुझे इस कोठे से निकल कर ले जाता और बहार कही ले जार कर फ़ेंक देता. लेकिन तेरी जवानी तो साड़ी hi यही रट बिलकते गुज़रे गई.

जब तक तू इस काबिल नहीं हो जाती क तुझे देख लोग तुझ पर थूकना भी पसंद न करें. तब तक तू यही सड़ती रही गई और तेरा बीटा बनेगा इस कोठे का दल्ला जो तेरे लिए और तेरी बेटी प्रिय के लिए हर ऐरा गैर गुंडा, लूचा, ग़लीज़ से ग़लीज़ गन्दी नाली के कीड़ा जैसे लोगों को ला ला कर तेरी और तेरी बेटी का सौदा करता रहेगा. तब जा के मेरे मैं को शान्ति मिलेगी. हाहाहाःहाहा

अननोन अपने कपडे निकलता हुआ बोलै

ोंकणों ..... चल अब्ब जल्दी से मेरे लुंड को अपने मोहन में ले कर चूस और चूस कर खड़ा कर. बड़े दिन हो गए हैं तेरी छूट में अपना लुंड डाले huye.chal जल्दी कर हरामज़ादी चिन्तल कही की या तेरी बेटी प्रिय को बोलों वो आ कर मेरे लुंड को अपने मोहन में ले कर खड़ा करेगी.

श्वेता ये सुन डर गई और न चाहते हुए भी उस अननोन हरामी इंसान के पास जा कर बीएड पर बेथ गई और अपने कांपते हुए हाथों से अननोन का लुंड पकड़ लिया.....

अननोन .... साली कुत्तिया तेरे हाथ क्यों कांप रहे hain"ye बोल कर उनकोंवन ने तीन थप्पड़ श्वेता के चेहरे पर जड़ दिए" श्वेता की आँखों से आंसू निकल ए वो तो खुल के रो भी नहीं सकती. वर्ण इस हरामी मादरचोद का क्या भरोसा छोटी सी प्रिय के साथ भी कुछ गलत न कर दे..

श्वेता ने खुद पर कण्ट्रोल करके बुझे मैं से अननोन के लुंड को मसलने लगी

अननोन ने एक और थप्पड़ श्वेता के बूब्स पर मारा "मोहन में दाल हरमजाआडी"

श्वेता रट हुए बेमानन से लुंड को पकड़ कर अपने में में डालने लगी. श्वेता का अंदर मैं खून हो रहा था लेकिन क्या करती बेचारी सालों से ज़ुल्म की चक्की में पिसती आ रही थी. वो छह कर भी इस अननोन पर्सन की किसी भी बात से इंकार नहीं कर सकती thi...shweta अननोन के लुंड को मोहन में ले कर सोचों में गम हो गई और छुपे लगाना भूल gai"ek और थप्पड़ उस के बूब्स पर पड़ा तो वो होश में आई" और फिर खुद को कण्ट्रोल कर अचे से लुंड के छुपे लगाने लगी. लेकिन काफी देर बाद भी अननोन का लुंड खड़ा नहीं हुआ तो उसने फिरसे श्वेता को मारना शुरू कर दिया कभी हाथों तो कभी लातों से... साली माँ की लौड़ी तुझसे एक लुंड खड़ा नहीं होता इतने साल हो गए...

चल जल्दी से अब्ब अपने कपडे utaar..lekin श्वेता ऐसे hi कड़ी रही उनसे अपने कपडे नहीं उतारे वो कभी भी अननोन के सामने अपने कपडे नहीं उतारती थी.

लेकिन अननोन जो हराम का बीज था उसे इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था. उसने श्वेता के कपडे फाड़ने शुरू कर दिए. श्वेता बस कड़ी आंसू बहाये जा रही थी. क्या करे उसके पास कोई चारा hi नहीं था. एक बीटा था जो अभी बोहत छोटा था उसकी मदद भी हासिल नहीं कर सकती थी. और था भी विजय अभी बोहत छोटा.

"""(विज्जु आ जाओ जल्दी से देखो तुम्हारी माँ का क्या हाल हो रहा है बचा ले अपनी माँ को विज्जु बीटा तेरी माँ अब्ब ये दर्द सहते सहते अंदर से ख़तम हो चुकी है. आए जा जल्दी से कही ऐसा न हो तू आये और मैं न रहूं. और फिर श्वेता अंदर hi अंदर फूट फूट कर रोने लगी. खुल कर उसे रोने की इजाज़त भी नहीं थी वर्ण श्वेता पर an-ginat गुंडे टाइप लोग छोड़ दिया करती थी रेखा बाई. ऐसा कई बार हो चूका था. इस लिए तो श्वेता अंदर से खोखली होती जा रही थी)""""

जब तक श्वेता सोचो में गम रही तब तक उस के बदन पर से सारे के सारे कपडे अननोन ने पहाड़ कर अलग कर दिए थे.

जब श्वेता को रीलीज़ हुआ वो नंगी हो चुकी थी उस ने अपने आप को छुपाने की नाकाम कोशिश करते हुए. अपने हाथों से अपने बूब्स और छूट को छुपाने की कोशिश की.

दरिंदों से भी कोई खुद को बचा सकता है क्या भला. अननोन भी एक दरिंदा hi था. और श्वेता बेचारी एक हिरणी से भी ज़यादा कमज़ोर. श्वेता को अपनी लाचारी पर अंदर hi अंदर रोना आने लगा. अब्ब एक hi तो काम आता थे श्वेता को अपने मैं में रोने का. अगर उसे खुल कर रोने का मौका मिल जाये तो शायद आस पास के सारे इलाके श्वेता के अंदर की आग से hi जल जाएँ.

अननोन ..... कसम है बनाने वाले की तू आज भी वैसे की वैसी है बिलकुल माखन के जैसी स्किन है तेरी और छूट हाय नज़र न लगे .... साला दुन्या घूम फिर ली लेकिन तेरी जैसे शरीर वाली एक भी नहीं मिली तेरी छूट को देख मेरा लुंड 1 मिंट में hi खड़ा हो जाता है. चल अब्ब अपने मोहन में दाल मेरे लुंड ko"shweta मजबूरन आगे बढ़ कर अननोन के लुंड को मोहन में ले कर चूसने लगी" थोड़ी hi देर में अननोन ने श्वेता के मोहन से अपना लुंड निकल लिया.

अननोन का लुंड 5.5" का था उसे खतरा था कही वो श्वेता में मोहन में hi न झाड़ जाये.

अब श्वेता को पता था अगला स्टेप क्या होगा इस लिए श्वेता खुद hi बीएड पर लेट गई और अपनी टांगों को उठा कर अननोन को छोड़ने का सिग्नल देने lagi."shweta का चेहरा एक ज़िंदा लाश के जैसे दिख रहा था" लेकिन अननोन को इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला था उसे तो बस श्वेता को अंदरूनी चोट पोहनचनि थी.

अननोन ने हँसते हुए अपने लुंड को श्वेता की छूट पर रख कर एक धक्का मारा और एक hi बार में सारा लुंड श्वेता की छूट में घुसा दिया. श्वेता के चेहरे पर दर्द के भाव आ गए. लेकिन उसने बर्दाश्त किया. 3/4 मिंट तक अननोन धक्के लगता रहा था फिर श्वेता की छूट में hi झाड़ गया.

अननोन मारे ख़ुशी के अंदर hi अंदर नाच रहा था. इतने सालों से श्वेता को दर्द दे कर वो फूला नहीं समां रहा था.

इसी तरह रात के 3 बजे तक अननोन श्वेता को रोंद्ता रहा और बेचारी श्वेता अपना मैं मार कर अननोन का साथ देने पर मजबूर थी.

विज्जु तो चला गया अब्ब प्रिय रह गई थी अगर उसने कोई भी गलती की तो बेचारी नन्ही प्रिय की ज़िन्दगी न बर्बाद करदें ये ज़ालिम लोग.

"रात 3 बजे तक ऐसे hi चलता रहा अननोन खुश होता रहा"

"तो श्वेता रात 3 बजे तक घुट घुट कर रोटी रही"""""""""""

********************************************************************

लोकेशन :::::: ट्रैन का सफर मुंबई तो दिल्ली

कुछ देर बाद भूक की वजा से मेरी आँख खुली तो मैंने अपने आस पास बैठे भूदे बाबा की फॅमिली की तरफ देखा. लड़कियां जाग रहे थी. लेकिन बाकी सब

सो रहे थे. मुझे भूक लग रही थी लेकिन मेरे पास खाने को कुछ था नहीं. नजाने कितने घंटे गुज़र चुके थे और कितने स्टेशन पर गाडी रुकी थी. मैं तो अपने hi ख्यालों में खोया हुआ था. इस लिए मुझे कुछ भी पता नहीं चला.

अब सोच रहा था के कैसे अपनी इस भूक का इलाज करून. उसपर से मेरे ज़ख्मों में रह रह कर टीसें उठ रही थी. ख़ास कर मेरे चूतड़ों में तो ऐसा लग रहा था जैसे an-ginat ांट्स ने काटना शुरू कर दिया हो. अब्ब इस दर्द को बर्दाश्त तो करना hi था. खुद पर कण्ट्रोल करते हुए मैं बोगी में चक्कर लगाने लगा. चलने में काफी प्रॉब्लम हो रही थी. लेकिन मैं फिर भी सब तरफ घूम फिर कर देखने लगा. लगता था रात काफी हो चुकी थी. एक जाग रहे आदमी से मैंने टाइम पुछा उसने बताया 1:ऍम का टाइम हुआ है. मतलब अब किसी स्टेशन के आने का इंतज़ार करना था. या फिर सूबा होने पर hi कुछ खाने को मिल सकता था. मैं फिर से अपनी सीट पर आ कर बेथ गया लड़कियां मेरी तरफ देखने lageen.lekin माने उनपर घोर नहीं किया और खिड़की के बहार के मंज़र देखने लगा हर तरफ अँधेरा hi अँधेरा था कुछ भी साफ़ दिखाई नहीं दे रहा था..............
 
अपडेट ::: 12

अब्ब तक्क

कुछ देर बाद भूक की वजा से मेरी आँख खुली तो मैंने अपने आस पास बैठे भूदे बाबा की फॅमिली की तरफ देखा. लड़कियां जाग रहे थी. लेकिन बाकी सब

सो रहे थे. मुझे भूक लग रही थी लेकिन मेरे पास खाने को कुछ था नहीं. नजाने कितने घंटे गुज़र चुके थे और कितने स्टेशन पर गाडी रुकी थी. मैं तो अपने hi ख्यालों में खोया हुआ था. इस लिए मुझे कुछ भी पता नहीं चला.

अब सोच रहा था के कैसे अपनी इस भूक का इलाज करून. उसपर से मेरे ज़ख्मों में रह रह कर टीसें उठ रही थी ख़ास कर मेरे चूतड़ों में तो ऐसा लग रहा था जैसे an-ginat चियूनिटों ने काटना शुरू कर दिया हो. अब्ब इस दर्द को बर्दाश्त तो करना hi था. खुद पर कण्ट्रोल करते हुए मैं बोफिए में चक्कर लगाने लगा. चलने में काफी प्रॉब्लम हो रही थी. लेकिन मैं फिर भी सब तरफ घूम फिर कर देखने लगा. लगता था रात काफी हो चुकी थी. एक जाग रहे आदमी से मैंने टाइम पुछा उसने बताया 1:ऍम का टाइम हुआ है. मतलब अब किसी स्टेशन के आने का इंतज़ार करना था. या फिर सूबा होने पर hi कुछ खाने को मिल सकता था. मैं फिर से अपनी सीट पर आ कर बेथ गया लफ्कियाँ मेरी तरफ देखने लेकिन माने उनपर घोर नहीं किया और खिड़की के बहार के मंज़र देखने लगा हर तरफ अँधेरा hi अँधेरा था कुछ साफ़ दिखाई नहीं दे रहा था.

अब्ब ागजी

अपडेट ::: 12

.

.

.

रात के उस अँधेरे में मुझे मेरी फॅमिली के चेहरे दिखाई देने लगे मैं फिर से अपनी तितलियों की यादों में खो gaya."meri ऑंखें नाम होने लगी" प्रिय की एक बात याद कर के मेरी नाम आँखों होने के बावजूद भी मेरेहोंटों पर मुस्कान आ गई.

जब रेखा बाई ने पहली बार 3 साल की आगे में प्रिय के पाऊँ में पायल बाँधी थी. मैं उस वक़्त 4 साल का था लेकिन मुझे शुरू से hi इस माहौल का अंदाज़ा होने लगा था. मैंने प्रिय के पैरों से पायल निकल कर दीवार पर दे मारी थी. जिसे देख रेखा बाई ने मुझे बोहत थप्पड़ मारे थे, माँ ने मुझे बचने के लिए रेखा बाई की बोहत मिन्नतें भी की थी. लेकिन रेखा बाई ने माँ की एक न सुनी और मुझे थप्पड़ मरती रही लेकिन मुझे इससे तब भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा था और पायल के छीन जाने से प्रिय बोहत रोइ थी उसे भी पायल पहन कर चलना बोहत ाचा लगता था.

लेकिन मेरा जो प्यार माँ और प्रिय के लिए था. प्रिय जैसे जैसे बड़ी होती गई वो मुझसे ज़यादा आत्ताच होती गई. तब मैंने उसे अचे से समझा दिया था के मुझे ाचा नहीं लगता जब तुम पायल पहनती हो. प्रिय मासूम से शकल बना कर मुझसे कहती "भाई मुझे पायल की छान छान बोहत अछि लगती है" मैं प्रिय की बात सुन कर है दिया करता और उसे अपने गले लगा कर उसके गाल को चूम लिया करता था.

मैं शुरू से hi एक अलग किसम का बचा था मेरी ऑंखें नीली थी प्रिय भी मेरी आँखों में बड़े hi घोर से देखती थी जैसे जैसे वक़्त गुज़रता गया मैंने कई बार प्रिय को रेखा बाई से बचाया.

रेखा बाई साली हरामज़ादी उसकी माँ की छूट में किसी गधे लुंड डालूं.

वो प्रिय को बचपन से hi ऐसी ट्रेनिंग देने लगी थी जिससे प्रिय जल्द hi आदि हो जाये. और माँ की तरह प्रिय भी कोठे की रौनक बने. लेकिन मेरे प्रिय और माँ के लिए प्यार और मुसलसल रहने वाली रेखा बाई से ann-bann ने प्रिय और माँ को मेरे और नज़दीक कर दिया था.

वर्ण शुरू शुरू में मा मुझे इतना प्यार नहीं करती थी. उनको लगता था क मैं भी कोठे पर पलने वालों दुसरे लड़कों की तरह hi अपनी माँ और बहन की दलाली karonnga.aur एक गन्दी नाली का कीड़ा hi बन कर रह जाऊँगा.

लेकिन गुज़रते वक़्त ने माँ को एहसास दिला दिया क उस का बीटा सब से अलग है. जब माँ को इस बात का रीलीज़ हुआ तो फिर माँ का प्यार मुझपर ऐसे टूट कर बरसा क मुझे अपनी माँ को इस दलदल से निकलने की बातें खुद बा खुद मेरे नन्हे से मंद में आने लगी. मेरा भी दिल करने लगा क हमारा भी एक घर हो जिसमे मैं माँ और मेरी छोटी प्रिय हो. और हमारा हर दिन khush-haal गुज़रे.

""इंसान कैसे कैसे खवाब बनता रहता है ज़रूरी तो नहीं जो सोचा जाये वो हो जाये. और बोहत जल्द वक़्त ने दिखा भी दिया क जो सोचा जाता है वो होता नहीं.""

कोठे पर रहते गुजरने वाले कुछ सालों ने मुझे इतना कुछ समझा और सीखा दिया था. एक इक आग का दरया सा बहने लगा था मेरे अंदर. अपनी माँ का चेहरा हर दुसरे तीसरे दिन ुझ्दा हुआ नज़र आता. तो वही मेरे अंदर डब्ब रहे आग के शोले मुझे hi जलने लगते. क्या क्या नहीं बर्दाश्त किया था मैंने और माँ ने.

ख्यालों में खोये हुए hi मेरी आँखों से आंसू बहने लगे. ट्रैन किसी स्टेशन पर रुकी हुई थी. शायद सूबा हो चुकी थी. मैंने अपनी आंख खोल कर बहार देखा तो सूबा 7/8 का टाइम हो चूका था. पता नहीं कौन सा स्टेशन था. या शायद मेरी मंज़िल ा चुकी थी. मैंने अपने हमसफ़र बूढ़े बाबा की तरफ देखा तो वो अपनी जगा पर hi बैठे थे. इस का मतलब है क ये मेरी मंज़िल नहीं थी. दिल्ली अभी दूर थी.

मैंने अपनी आँखों से बह रहे आंसुओं को साफ़ किया और फिर खुद को एडजस्ट करते हुए अपनी सीट पर से खड़ा हो गया. दर्द अब कुछ काम था लेकिन चूतड़ों की स्किन के सूख जाने के कारण अजीब सा लगने लगा था..

"साला ऐसी कंडीशन हो गई थी. जैसे किसी ग्राउंड पे बारिश हो और जब पानी धुप की वजा से भाप बन कर उड़ जाये और धुप की तपश की वजा से ज़मीन की ऊपर की तेह पर जैसे चिकनी मिटटी के "खरपड़ी" बन जाते हैं"

शायद सब को इस मिसाल की समझ न ए लेकिन जो लोग विलेज लाइफ गुज़र चुके हैं वो ये सब जानते हैं...

मैं बड़ी मुश्किल से उठ खड़ा हुआ फिर मैंने बहार स्टेशन पर जाने का सोचा कुछ खा पी लेते हैं. ऐसे तो रही सही बैटरी भी ख़तम हो जाएगी. यही सोच कर मैंने अपने पाऊँ ट्रैन के नीचे पधारे.. कुछ देर ताज़ा हवा को अपने अंदर खेंचने लगा रात भर में हालत पतली हो गई थी कुछ टेढ़ा सा हो कर बैठने से, कुछ चुत्तडों के दर्द से तो कुछ खाली पेट होने se..."jab भी मुसीबतें आती हैं, साली सब मिल कर hi आती हैं"

कुछ देर हवा खाने के बाद मैंने एक खाने के स्टाल पर पोहंचा. अब रेलवे स्टेशन पर जैसा खाना खाने को मिलता है सब hi जानते हैं. मैंने भी मैं मार कर खाने लगा.

""एक बात में भूल गया था क जब ट्रैन स्टेशन पर रुकी थी तो मैं अपने ख्यालों में गम था इस लिए मुझे नहीं पता था क ट्रैन कितनी देर रुके गई" मैं अपना पेट भरने में लगा हुआ था के ट्रैन के चलने का सिग्नल सुनाई दिया. मेरी तो हालत hi ख़राब हो गई जिस बोगी से मैं निकला था वो काफी दूर थी और गलती से मैंने उस पर घोर भी नहीं किया था क मेरे वाली बोगी कौन सी है.

मैं हड़बड़ा गया और खाना अधूरा छोड़ कर खड़ा हो गया.

ट्रैन चल पड़ी अब्ब तो मैं गया.??????????

जब मैं खड़ा हुआ तो एक साथ दो बातें हुई...????

1 एक तो ट्रैन ने चलना शुरू कर दिया..!!

2 मुझे एक आवाज़ सुनाई दी "ोये विज्जु तू यहाँ क्या कर रहा है"

ये आवाज़ सुन कर hi मेरे ज़ख़्मी धूतडों के साथ साथ मेरी गांड में भी दर्द होने लगा. साला जब मैंने उस आवाज़ की दिशा में देखा तो हमारे कोठे के साथ बने कोठे का एक गार्ड खड़ा था.... साला हरामी माँ का हरामी पुत्तर इसका यहाँ क्या काम...
 
अपडेट 13

*********

अब्ब तक्क

*********


मैं हड़बड़ा गया और खाना अधूरा छोड़ कर खड़ा हो गया.

ट्रैन चल पड़ी अब्ब तो मैं गया.??????????

जब मैं खड़ा हुआ तो एक साथ दो बातें हुई...????

1 एक तो ट्रैन ने चलना शुरू कर दिया..!!

2 मुझे एक आवाज़ सुनाई दी "ोये विज्जु तू यहाँ क्या कर रहा है"

ये आवाज़ सुन कर hi मेरे ज़ख़्मी धूतडों के साथ साथ मेरी गांड में भी दर्द होने लगा. साला जब मैंने उस आवाज़ की दिशा में देखा तो हमारे कोठे के साथ बने कोठे का एक गार्ड खड़ा था.... साला हरामी माँ का हरामी पुत्तर इसका यहाँ क्या काम...


अब्ब आएगजी

*************

अपडेट ::: 13

*************

::::::::::::::>


उस गार्ड को देखते hi मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन hi खिसक गई. एक तो चूतड़ों के दर्द ने जान निकली हुई थी. दूसरा मैं पहचान लिया गया tha.ye साला यहाँ कहाँ से आ गया. मुझे आवाज़ देने वाला कोठे का कोई कस्टमर नहीं. बल्कि साथ के कोठे का एक गार्ड था. ये भी साला मुझसे से बड़ी खार खता है. एक बार मैंने इसे बोहत बुरा भला बोल दिया था. तब ये किसी से मेरी माँ के बारे गन्दी गन्दी बातें क्र रहा था. इस लिए मेरी इस नहीं बनती thi..maine इस की सब की सामने be-izzati कर दी थी...

उस गार्ड को नज़र अंदाज़ किये में ट्रैन की तरफ भाग लिया अब्ब चलती ट्रैन में मेरी बोगी कौन सी है, मैं भूल गया था. बस याद था तो ये के यहाँ से निकला है...

आज मुझे पता चला के


""जब जान पर बन आती है. तो भागने के रिकॉर्ड टूट जाया करते हैं....""

भूके पेट और चूतड़ों के दर्द के साथ साथ मैं ऐसा भागा के क्या बताओं मैं तो ये भी भूल गया था. के मैं कई घंटों से भूका हूँ और चूतड़ों की हालत भी बोहत hi ज़यादा खस्ता है. भागते भागते मैं ट्रैन के एक दूर तक पोंछा. दूर के हैंडल को पकड़ कर मैंने फुर्ती से जम्प लगाया और ट्रैन पर सवार हो गया. मेरी सांसें ऐसे चल रही थी. जैसे कोई कुत्ता मेरे पीछे हो तब जैसे सांस फूल जाती है. वैसे hi मेरी सांसों की भी हालत थी... सांस के प्रेशर से ऐसा लग रहा था जैसे के अभी दिल भी सांस के साथ साथ बहार निकल आएगा....

जब मैंने ट्रैन के दूर से बहार देखा तो हैरान रह गया ट्रैन प्लेटफार्म से काफी बहार आ चुकी थी. सांस बहाल करते टाइम कुछ ज़यादा hi लग गया था...


"अगर मैं थोड़ा सा भी लेट हो जाता तो फिरसे रेखा बाई के चुंगल में फँस जाता"

फिर मैं ट्रैन के दूर पर खड़े हो कर पीछे उस गार्ड को देखने laga.platform बोहत दूर था लेकिन फिर भी मैं उस गार्ड को देख प् रहा tha.wo हरामज़ादा किसी को फोन कर रहा tha.ye देख कर में समझ गया क अब रेखा बाई को पता चल जाये गए. या के मैं किस ट्रैन से और किस तरफ जा रहा हूँ. अब क्या करून कहाँ जाओं.?????????


"अगले स्टेशन पर कही रेखा बाई के आदमी न पांच जाएँ. चलती ट्रैन से उतर भी नहीं सकता था. इतना बड़ा रिस्क नहीं ले सकता था मैं. कोई भी रिस्क लेते हुए मुझे माँ और बहनो के चेहरे दिखने लगते थे. "

""अगर मुझे कुछ हो गया तो माँ हमेशा के लिए उसी दलदल में फँसी रह जाएगी. और वक़्त गुजरने पर मेरी बेहेन प्रिय को भी उसी दलदल में उतरना पड़ेगा.........."""

"ऐसी सोच आते hi मेरे अंदर से खून उबलने लगा"

"नहीं नहीं मैं ऐसा कभी होने नहीं दूंगा. मैं साड़ी दुन्या को आग लगा डोंगा. अगर मेरी बेहेन को कोठे की ज़ीनत बनाया गया. माँ तो मजबूर थी पर मैं नहीं."

मैं फिर से रेखा बाई के चंगुल में फंसने वाला था. मेरा दिल किया मैं अपना सर्र जोरर से ट्रैन की लोहे की दीवार से टकरा दूँ.


""..न रहे गए सर्र और न रहेंगी ऐसी सोचें.."""

पर फिर मेरी माँ और बेहेन. नहीं नहीं मुझे खुद पर कंटोल करना सीखना होगा. वर्ण कही ऐसा न हो क में पागल hi हो जाओं. अगर मैं hi हिम्मत हार गया तो मेरे इन्तिज़ार में पीछे बैठी मेरी माँ मेरी बहने उनका क्या होगा...???

"वो तो वैसे hi मर्डर जाएँगी"

""नहीं नहीं मैं ऐसा नहीं होने दूंगा"" ..फिर मैंने अपने आप को शांत करने के लिए जोरर जोरर से लम्बी लम्बी साँसें लेने लगा. कुछ देर बाद मैं कुछ शांत हुआ .

थोड़ी देर तक सोचता रहा के सब से पहले मुझे अपने डर पर काबू पाना सीखना होगा. जो मुझे माँ और बहनो को ले कर है.


""अब देखते हैं वक़्त मेरे लिए क्या कुछ नया ले कर आता है""

जो भी करना है ठन्डे दमाग से करना होगा.

मैं वहीँ ट्रैन के फर्श पर बेथ gaya.aur दूर से बहार के मंज़र को देखते खुद को रिलैक्स करने लगा. जो सोचें मुझे परेशां करती थी. उनको अपने दमाग से निकलने के लिए मैंने अपना धयान ट्रैन से बहार भाग रहे खेत खल्यान की तयाराफ लगा दिया


(...ट्रैन या बस का सफर हो तो ऐसा लगता है जैसा के हम सफर नहीं कर रहे. हम एक hi जगा हैं और ज़मीन सफर कर रही है...)

इसलिए में ट्रैन के बहार भाग रहे खेत खल्यान को बड़े hi घोर से देख रहा था. ताके मेरा मंद डाइवर्ट हो जाये. और मेरा डर भी कुछ काम हो जाये.... साला इस डर ने चूतड़ों के साथ गांड भी फडनी शुरू करदी थी. जब से गार्ड को देखा था डर अंदर सेनिकाल hi नहीं रहा था..

मुझे बैठे अभी थोड़ी hi देर हुई थी के मुझे कुछ आवाज़ें सुनाई दी. आवाज़ों को सुन मुझे लगा कुछ गड़बड़ है. में उधर चला जिधर से आवाज़ें आ रही थे. मेरे सामने इक दूर था जो बंद था उस के अंदर से आवाज़ें आ रही थी. मैंने दूर नॉक किया.

अंदर से कोई नहीं बोलै लेकिन किसी की दबी दबी छीकें सुनाई दे रही. ऐसे लग रहा था जैसे कोई किसी का मोहन हाथ से दबा रहा हो ताके आवाज़ न निकल सके.

मैंने फिर से दूर नॉक किया. कुछ देर तक किसी ने दूर नहीं खोला और वो दबी दबी आवाज़ें भी बंद हो गई. कुछ देर मैं इन्तिज़ार करता रहा. मुझे गड़बड़ का अंदाज़ा तो हो hi गया था.


""कर भला सो हो भला""""

ये सोच कर मैंने दूर को मुसलमाल khat-khatana शुरू कर दिया. थोड़ी देर बाद दूर एक झटके के साथ खुल गया. किसी मादरचोद ने मुझे मेरे कालर से पकड़ कर अंदर खेंच लिया. मैं संभल न सका और एक झटके से अंदर केबिन के फर्श पर जा कर गिरा.

ahhhhhhhhhhhhh maaaaaaaaaaaaa :क्राई:😢

एक बार तो मेरा सर्र hi घूम गया. और चूतड़ों के बल फर्श पर गिरने से मेरे तोते hi उड़द गए. साला इतना दर्द हुआ क क्या बताओं. मुझे मेरे चूतड़ों पर मिर्चें लगी हुई सी महसूस होने लगी.

"जिन के चूतड़ों की कभी ऐसी हालत हुई होगी वही जान सकता hai......"hahahahahahahahahahahhaahahahahaha " दर्द तो हुआ, लेकिन फिर भी ये सोचते मेरे kah-kahe भी अंदर hi अंदर निकल रहे थे"

फिर मेरे पेट में एक लात पड़ी aaaaaaaaaa ......माआआआ ....मरररररररर gayyyyyyyyyaaaaaaaaaaaaaaaa....

साले वो दो लड़के थे एक ने मेरे पेट पर इतने जोरर के लत मारी. मैं अपना पेट पकड़ कर नीचे hi बेथ गया.

मेरी हालत और ख़राब हो गई. पहले hi भूक और चूतड़ों ने मेरे होश उड़ाए हुए थे. अब्ब पेट पर पड़ने वाली लात ने मेरी हालत और भी पतली करदी थी.

मेरी चीख निकल गई. कुछ देर मैं पेट के दर्द से नाचता रहा. जब कुछ रहत मिली तो देखा दो लड़के एक लड़की को पकड़ कर उसके साथ ज़बरदस्ती करने की कोशिश कर रहे थे.

साला इस दुन्या में कोई भी ऐसा नहीं जो औरतों को प्यार से देखे न क अकेला प् कर उस पर कुत्तों की तरह टूट पड़े. हरामज़ादे हर वक़्त किसी न किसी की इज़्ज़त उतारने में लगे रहते हैं. ये सोच मेरा घुस्स्सा बढ़ने लगा.


"""मुझे दुन्या से नफरत सी होने लगी.""""

फिर मैंने अपनी नज़र को घुमा कर पूरे केबिन का जायज़ा लिया. एक तरफ एक औरत लेती थी उस के सर से खून बह रहा था. उस के पास hi एक लड़की दर्री सेहमी सी बैठी हुई थी.. शकल से 15 साल की लग रही thi...aur जिस लड़की का रपे होने जा रहा था .वो जवान लग रही थी. मुझे लगा इस की मदद करनी चाहिए.

लेकिन कैसे करून वो दो थे और में अकेला. चूतड़ों का dard,,Pet में लात पड़ने से होने वाला दर्द और तीसरा कई घंटे की भूक ने मेरी बैटरी hi ख़तम कर दी थी. क्या करून में यही सोच रहा था के अचानक से मेरी आँखों के सामने मेरी माँ और बहनो के चेहरे आ गए मेरी माँ भी ऐसे hi हर्र रात बेबसी से lut'ti रहती है. और अगर मैं अपने अंदर हिम्मत पैदा न कर पाया तो इस लड़की की तरह मेरी बहने भी एक दिन इन लड़को जैसे hi किसी भेड़िये के आगे gid-gida रही हो गई.

ये सोच आते hi मेरा खून उबलने लगा मेरा दर्द कहाँ गया मुझे नहीं पता मैं दर्द को सोच hi नहीं रहा था. और न hi मुझे खली पेट होने का एहसास हो रहा था. याद था तो बस यही के मेरी बेहेन की इज़्ज़त खतरे में हैं. में ने idhar-udhar नज़र घुमाई. कोई काम की चीज़ मिल जाये. मुझे कोई चीज़ मिल नहीं रही थी मेरा ग़ुस्सा बढ़ने लगा.

अचानक मेरी नज़र एक लड़के की पेण्ट पर पड़ी जो उसने उतर दी थी. जब में सोचो में घूम tha.to उन दोनों ने लड़की के पकडे पहाड़ कर उसे नंगा कर दिया था और एक लड़के ने भी अपनी पेण्ट शर्ट उतार दी thi.abb वही बेल्ट मेरे काम आने वाली थी...

तो उन दोनों लकड़ों लड़को ने लड़की के कपडे पहाड़ दिए थे लड़की की चीखों से पूरा केबिन गूँज रहा था. मैंने बेल्ट को अपने हाथ पर लपेटा और "हुक" वाली साइड को जोरर से उस लड़के के सर्र पारर मारा जो लड़की के ऊपर चढ़ा हुआ था उस का सर्र hi खुल गया और खून का फवारा उस के सर से फूट निकला. अह्ह्ह्हह्हह वो चीखता हुआ लड़की के ऊपर से उठ कर साइड गिर गया.

दूसरा लड़का लड़की के हाथ पकडे हुए था. अचानक हमले से वो बोखला गया. वक़्त जाया न करते हुए मैंने दुसरे लड़के को बेल्ट से पीटने शुरू कर दिया. मुझे उस लड़की में अपनी बेहेन की सूरत दिखाई पद रही थी. और लड़के रेखा बाई के गार्ड्स....

उस पर मैंने इतने बेल्ट बरसाए क उस का सारे जिस्म पर जगा जगा से खून के धब्बे नज़र आने लगे. वो बेल्ट की मार खाते खाते बेहोश हो गया.

पहला लड़का जिस के सर्र पारर मैंने बेल्ट मारा था वो खून में lat-pat तो था hi. लेकिन फिर भी कुछ संभल चूका था. वो मेरी तरफ बढ़ा ,तो मैंने बेल्ट फिरर से उस के सर्र पारर दे मारा लेकिन उस हरामी ने बेल्ट को पकड़ लिया और जोरर से अपनी तरफ खेंचा. अब्ब वो साला जवान लौंडा था और मैं एक बच्चा. में लड़खड़ा गया जिससे बेल्ट मेरे हाथ से छूट गई. लड़के ने बेल्ट को अपने हाथ पर लपेटा और फिर मुझ पर छड़ दौड़ा.

मैंने बचने की बोहत कोशिश की लेकिन उसने मुझे उधेड़ना शुरू कर दिया.


"aaaaaaaaaaaa oiiiiiiiiiiiiii maaaaaaaaaaa maarrrrrrrrrrrrr गाआआअआयीयआआअ"

हयईईईई ... ""


सब से खतरनाक बेल्ट के वो वर्कर थे जो मेरे चूतड़ों पर पद रहे थे..

दुसरे लड़के की तरह अब मेरी चीखें इस केबिन में गूंजने लगी थी...


"यहाँ था hi कौन जो मुझे इस जल्लाद से बचाये"

"...मेरी हालत अचानक फिर से बिगड़ने लगी. पेट दर्द और भूक ने एक साथ यलग़र कर दी. लेकीन बेल्ट की मुसलसल मेरे चूतड़ों पर पड़ने वाली मार ने मेरे dum-kham सब निचोड़ कर रख दिया. मुझे लगने लगा आज में पक्का मारा जाऊँगा..."

वो लड़का भी ग़ुस्से में पागल हो गया था.

कोई नहीं था मुझे बचने वाला यहाँ एक औरत बेहोश पड़ी थी उसके सर्र से खून निकल रहा था. एक छोटी लड़की उस औरत के पास बैठी रोये जा रही वो बोहत घबराई हुई थी. वो कुछ करने की हालत में थी नहीं.


लेकिन ".... जाको रखे साइयाँ मारर सके न कोई ...."

लेकिन इस बीच लड़की कुछ संभल चुकी थी और उसमे अब्ब हिम्मत भी गई थी अब

वो अकेली नहीं थी और एक लड़का भी पंक्चर हो गया था.

""..अब लड़की की इज़्ज़त खतरे में हो और बाँदा भी एक हो. तो लड़की इतनी जल्दी हिम्मत नहीं हारती..""

मुझे pit'te देख लड़की ने अचानक से लड़के को जोरर का धक्का दे मारा. लड़का पहले hi सर्र से ज़ख़्मी था उसका सर्र फिरर से ट्रैन के मज़बूत लोहे से टकराया और वो लहराता हुआ नीचे गिर गया.

लड़की ने लड़के के हाथ से बेल्ट चीन...


(अब जिस लड़की की इज़्ज़त lut'te lut'te बची हो और फिरर उस को मौका भी मिल जाये उस रेपिस्ट से बदला लेना का उसे... आल रीडर्स कैन इमेजिन... क वो क्या कर सकती है)

लड़कीने बेल्ट लड़के के हाथ से छीन कर अपने हाथ पर लपेटा और लग्ग गई अपने काम पे फिरर उस ने जिंटा दर्द झेला था वो साब उस लड़के को लौटने लगी. दो बार सर्र पारर चोट लगने से लड़के की कंडीशन बोहत ख़राब हो चुकी थी. उस पारर लड़की रुके बगैर उसे बेल्ट से पीट रही थी. मनो आज उस हरामी लड़के को जान से hi मार देगी.

""..लड़की ग़ुस्से में ये भी भूल गई थी क वो अभी तक नंगी है..""

थोड़ी देर बाद मेरे कुछ होश ठिकाने ए तो मैंने देखा लड़की अभी भी लगी हुई थी.

लेकिन लड़के में कोई मूवमेंट नहीं हो रही थी. मैंने लड़की को आवाज़ लगाई. लड़की को सुनाई नहीं दिया. शायद मेरी आवाज़ बेथ गई थी. मेने फिर से आवाज़ लगाई. लेकिन बात नहीं बानी. तो फिर मैंने अपनी bachi-khuchi ताक़त को इकठा किया और लड़की के पास जा कर "जिस हाथ में बेल्ट थी" उस हाथ को पकड़ लिया.

मेरे हाथ पकड़ने पर लड़की ने मेरी तरफ देखा तो उस की ऑंखें आंसुओं से भरी हुई थी. उस की आँखें लाल सुर्ख हो चुकी थी कुछ तो आंसू बहने से और कुछ अपनी इज़्ज़त को lut'te,, देख कुछ न कर पाने की वजा से आने वाले ग़ुस्से से उनकी ऑंखें लाल हो चुकी थी. मैंने लड़की को कुछ नहीं कहा और अपने दर्द को कण्ट्रोल करते हुए नीचे झुक कर लड़के को देखने लगा. कही साला मर्डर वर्कर न गया हो. लेकिन उस की सांस चल रही. हरामज़ादा अभी मर्रा नहीं था. उस लड़के का जिस्म हरकत नहीं कर रहा था शायद अपने दोस्त की तरह ये भी बेहोश हो गया था..

मैंने लड़की से कहा बास करो ये बेहोश हो चूका है. लड़की अभी भी नंगी hi थी. वो ऐसे hi कड़ी रही...

""मैंने उस पर घोर नहीं किया.""

इतनी देर में आंटी को भी होश आ चूका था क्यूंकि जब लड़की लड़के को बेल्ट से मार रही तो बाज़ी palat'te देख छोटी लड़की ने भाग कर बाथरूम से पानी ला कर आंटी को तक़रीबन नेहला hi दिया diya.jis से आंटी होश में ै थी... आंटी के सारे कपडे गीले थे.

आंटी ने लड़की को आवाज़ लगाई तो लड़की ने आंटी की तरफ देखा. अब चूंकि खतरा टालल चूका था इस लिए लड़की भाग कर आंटी के पास गई और उनके गले लग कर रोने लगी.

मैं भी एक साइड हो कर बेथ गया. अब्ब मेरी हालत भी मेरे कण्ट्रोल से बहार होती जा रही थी. मेरी ऑंखें भी अब बंद होने को थी. दर्द और भूक के मारे मुझे बोहत वीकनेस फील हो रही थी.


""... अंदर का दर्द. बहार लगी चोटों का दर्द. उफ्फ्फ्फ़... इतना दर्द ज़िन्दगी क्या क्या नहीं इंसान से वसूलती hai....saari पेड़ों को सोचते सोचते में इक साइड लुढ़क गया...""

मेरे लुढ़कने की आवाज़ से उनका धयान मेरी तरफ गया. तब उनको अंदाज़ा हुआ क अभी भी वो खतरे से बहार नहीं हुई.

क्यूंकि मुझे देखते hi उनकी नज़र उन दोनों लड़कों पर भी पड़ी. आंटी ने लड़की को साइड किया और अपने पर्स से मोबाइल निकल कर किसी को कॉल करने लगी. कुछ देर बात करने के बाद आंटी ने लड़की को उसके नंगे होने का एहसास कराया लड़की झींप कर शर्म से दोहरी गई और. पहात से अपने बैग से अपने दुसरे कपडे निकल कर बाथरूम में घुस गई...

कुछ देर में लड़की ड्रेस चेंज कर आई फिर आंटी ने लड़की की मदद से उन दोनों

लड़कों के हाथ और पेअर बाँध दिए. रस्सी से नहीं अपने बैग में से एक दुपट्टा निकल कर उस की पत्तियां बनाई फिर बंधा.

पता नहीं आंटी ने कहा जाना था. ये भी नहीं पता था कितने स्टेशन ए रेखा बाई का क्या हुआ उस गार्ड्स ने क्या बताया रेखा बाई को.

रेखा बाई ने मुझे ढूंढ़ने के लिए क्या किया होगा.

या उसने मुझे नज़र अंदाज़ कर दिया होगा. था तो में एक कचरे के ढेर की मानिंद hi. रेखा बाई को कहाँ मेरी परवा होगी.


""मैं तो na-jaane कब का बेहोश पड़ा था""

"" जब मेरी आँख खुली तो मैंने अपने आप को एक aaali-shan कमरे में पाया....

क्याआ????????? मैं मर्डर गया हूँ. ये तो कोई स्वर्ग जैसी जगा लग रही है ...


अगर ये स्वर्ग है तो फिर ""माँ और बहने""

"""""..... नहीं नहीं मुझे स्वर्ग नहीं चाहिए मुझे मा और बहने चाहिए....."""""

""....maaa..priya"......"maaa..priya"......"maaa..priya"......"maaa..priya"

मैं जोरर जोरर से चिल्लाने लगा.

maaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaa".."priiiiiiyyyyyyyyyyyaaaaaaaaaaaaaaaaaaaa

कहाँ हो तुम "माआआआ ... प्रियाआआआ"


मेरे चिल्लाने की आवाज़ सुन कर भागते क़दमों की आवाज़ कमरे की तरफ आने लगी.

मैं अपने होश hi खो चूका था मुझे ऐसा लग रहा था. जैसे अब मैं माँ और प्रिय वाली दुन्या से बोहत दूर जा चूका हूँ और ये सब सोच मेरा कलेजा hi खून खून होने लगा.


कपड़े का दूर खुला और एक आंटी और दो लड़कियां रूम के अंदर आयी.

😢
 
जितना हालत विजय को तड़पा रहे हैं उस हिसाब से विजय के अंदर की आग ने

अगर उसे जल्द hi कुछ न बनाया तो गड़बड़ हो जाएगी

और वैसे भी अब स्टोरी काफी आगे बढ़ चुकी है

और विजलीन की क्वांटिटी भी बढ़ती जा रही है

विजय की माँ और बहनो के साथ अचानक से

कुछ भी हो सकता है

इस लिए विजय को अब जल्द hi कुछ न कुछ तो बनना पड़ेगा
 
गर इरादे पुख्ता हूँ तो मंज़लेँ आसान हो जाती हैं

हिम्मत न टूटे तो कोई सामना करने की हैसियत नहीं रखता

विजय को समझ में आने लगा है के कोठों को दुनिया की

बहार की दुन्या में भी फीमेल रेस्पेक्ट नहीं है

विजय के फ्रेमलेस के लिए बुरे को देख कर अपने अंदर हिम्मत

बढ़ने में मदद मिल रही है

नेक्स्ट 2 उपदटेस में आप सब कोबोहत अच्छे से पता चल जायेगा


के विजय के लिए भी भेड़ियों से लड़ने के लिए दरिंदा ban'na कितना

ज़रूरी है ..... भेड़ियों से लड़ने के लिए इंसान काफी नहीं होते

भेड़िये अक्सर अकेली लड़की हो या उजरत उस पर हमला कर देते हैं

विजय एक दरिंदा बनकर hi ये सबब कर सकता है
 
अपडेट ::: 15

*************

अब्ब तक्क

*************


आंटी ..... हाँ हाँ बीटा तुम यहाँ हमारे बेटे बन कर रह सकते हो ..

सब की बातें सुन कर मैं हंसने लगा.

आंटी .... इस में हंसने की क्या बात है..??

विजय .... हंसो नहीं तो और क्या करून आप सब मेरे बारे जानते hi कितना हैं ऐसे कैसे कोई भी किसी भी अनजान को अपने घर में रहने के लिए बोल सकता है. ये मज़ाक़ नहीं तो और क्या है...

आंटी .... बीटा कोई अनजान किसी गैर के लिए अपनी जान खतरे में नहीं डालता फिर तुमने क्यों अपनी जान को खतरे में दाल कर मेरी बेटी की इज़्ज़त लूटने से बचाई.

विजय ...... वो अलग बात है लेकिन मैं यहाँ नहीं रह सकता..

""क्यों नहीं रह सकते बीटा तुम यहाँ"" एक आवाज़ सुनाई दी

********************************************************

अपडेट ::: 15

अब्ब आएगजी


हम सब ने आवाज़ की दिशा में देखा

शीतल ... (ख़ुशी से चिल्लाते हुए) पापा आप आ गए.

पापा ....हाँ बीटा मुझे तो आना hi था. इतनी बड़ी प्रॉब्लम जो हो गई थी.

तो इस लिए मुझे आना hi पड़ा.

दोनों लड़कियां अपने पापा के गले लग gai."natasha अपने पापा के गले रोने लगी"

नताशा के papa(main उन्हें अंकल hi लिखूंगा) मुझे देख रहे और मैं भी उनकी आँखों में देख रहा था.

*********************************

शार्ट इंट्रो.......

*********************************

हर्ष चौहान... आगे:44 जाने मने बिजनेसमैन हैं डिटेल बाद में

दीक्षा चौहान.. आगे:42 वाइफ हर्ष चौहान

नताशा बेटी .. आगे:18

शीतल बेटी .. आगे:15

*********************************

काफी रॉब और dab-dabe वाला बाँदा लग रहा था अछि पर्सनालिटी थी.

ooncha-lamba, छोड़ा सीना, मज़बूत jism--bada hi शानदार आदमी लग रहा था. मुझे अंकल की पर्सनालिटी देख बड़ा hi ाचा लगा.

ुनवले की पर्सनालिटी dekh"akhir मुझे भी तो कुछ ऐसा hi बनना था"

सॉरी मैं गलत बोल "मुझे ऐसा बनना था क मेरे जैसा फिर कोई बन्न न पाए"

अंकल..... हाँ बीटा बोलो तुम यहाँ क्यों नहीं रह सकते.

विजय..... अंकल हर किसी का घर होता और ये घर मेरा नहीं है.

आंटी .... ऐसे मैट बोलो बीटा जब हमने तुमको अपना मान लिया है. तो ये घर तुम्हारा भी तो हुआ न.

शीतल ...... पापा भाई को यहाँ से जाने न देना. प्लीज पापा ... भाई बोहत अच्छे hain...main इन के साथ kheloongi."train में दरी सेहमी सी लड़की अब्ब एकदम मासूम सी बन्न कर बोल रही थी" मुझे मेरी प्रिय याद आने लगी.

लेकिन फिर मैंने अपने सर्र को झटक दिया.. फिलहाल सोचों से गुरेज़ hi अच्छा है

अंकल ...... तो बीटा जी अब्ब तो शीतल बेटी ने भी तुमको अपना भाई बना लिया है.

अब्ब तो यही रह जाओ. हमें भी बीटा मिल जायेगा...

विजय ..... अंकल हर इंसान की ज़िन्दगी में कोई न कोई उलझन होती है. मेरे यहाँ न रहने की भी वजा है.

अंकल ....... और वो वजा क्या है. ?????????

विजय ....... सॉरी वो मैं आप को नहीं बता सकता.......

""मैंने अपने लहजे को सख्त बनाते हुए कहा""

""अंकल आंटी और दोनों लड़कियां शॉकेड ""

अंकल ...... .हूउउउउ मतलब कोई घम्बिर बात है.

देखो बीटा हम तुम्हें यहाँ से जाने तो देंगे नहीं. अगर तुम्हारे साथ कोई मसला hai.to तुम हमें बता सकते हो. अगर तुम बताना चाहो. हो सकता है क तुम्हारे किसी काम hi आ जाएँ.

विजय ....... (हँसते हुए) कुछ मसले ऐसे भी होते हैं जिन का सलूशन हर

किसी के पास नहीं होता.

अंकल...... तो हम मिलकर कोई रातसा ढूंडनगे.

विजय........ आप कुछ नहीं कर सकते. और मेरा यहाँ रहना न सिर्फ आप सब की ज़िन्दगी के लिए खतरा है बल्कि मेरे यहाँ रहने से आप की फॅमिली की इज़्ज़त भी खतरे में आ जाएगी.

अंकल ...... देखो बीटा अगर बात खतरे की है. तो हम किसी से नहीं डरते. और अगर हमारी इज़्ज़त तुम्हारी वजा से जा सकती है. तो तुम हमपर भरोसा कर सकते हो. फिर आंटी की तरफ देख कर बोले.

इसे अपनी माँ समझो और बताओ के मसला क्या है क्या वजा है तुम्हारे यहाँ रहने से हमारी इज़्ज़त खतरे में आ जाएगी. और अब्ब तो तुम मुझे भी बोहत पसंद आ गए हो. और इतनी छोटी सी उम्र में इतनी बड़ी बड़ी बातें कैसे कर लेते हो. ""अंकल की इस बात पे "तीनो माँ बेटियां" हंसने लगी.""

अंकल ..... दांत क्यों निकाल रही हो. मेने कोई जोके सुनाया है क्या.

शीतल खिलखिला कर हँसते हुए बोली

""पापा आप के आने से पहले माँ भी यही बात कर रही थी""

इस लिए हम सब को हंसी आ गई.

अंकल ..... (मेरी तरफ देख कर) बीटा बोलो काया कहते हो अब्ब तो हाँ बोल do.dekho सब कैसे तुम्हारी हाँ सुनने के लिए तुम्हारी तरफ hi देख रहे हैं...

""..मुझे भी लगने लगा इतने अच्छे लोगों का अगर साथ मिल जाये तो मुझे फ़ायदा हो सकता है. और मुझे यहाँ रह कर कुछ ban'na भी है. इन लोगों को छोड़ कर जाऊँगा तो ऐसे लोग फिर से नहीं मिलेंगे. मेरा भी दिल था इन के पास रहने का. लेकिन ऐसे कैसे रह सकता था मैं. रेखा बाई का खतरा था. कही मेरी मदद करने के चक्कर में रेखा बाई इन भले लोगों का नुकसान न कर दे.

और दूसरी बात इनको अगर पता चला के मैं कोठे की पैदावार हूँ तो इनका क्या रिएक्शन हो गए और फिर अगर बहार से कोई ऐसा मिल गया जो मुझे जनता हो और वो आस पास के लोगों को बता दे तो अंकल आंटी की क्या इज़्ज़त रह जाएगी. नहीं या तो मुझे यहाँ से चले जाना चाहिए या फिर मुझे इनको सब सच बता देना चाहिए.

अंकल ..... बीटा इतना क्या सोच रहे हो. कोई फैसला कर लिया हो तो बताओ.

""मैं दोनों लड़कियों की तरफ देखने लगा अब्ब इनके सामने कैसे बताओं.""

अंकल ने नोटिस कर लिया मैं दोनों लड़कियों के सामने बात करना नहीं चाहता और लड़कियां भी समझ गई. वो अंकल के बोलने से पहले hi जाने लगी.

दोनों बोली..... माँ पापा आप भाई से बात करें हम थोड़ी देर में आते हैं.

दोनों चली gain.""dono काफी समझदार थे""

मैं बीएड पर बेथ गया. और सोचने लगा इनको क्या बताओं.

आंटी .....हाँ बीटा अब्ब बताओ असल बात क्या है.

विजय...... आंटी बात बोहत बड़ी है. या तो आप सुने hi ना और अगर sun'na hi चाहते हैं तो बुरा मत मानना वर्ण मुझसे बर्दाश्त करना मुश्किल हो जायेगा.

"मेरी बात सुन के आंटी की आँखों के सामने मेरे बेहोश होने से पहले का मंज़र आने लगा.

आंटी ... ठीक है बीटा तुम बताओ हम बुरा नहीं मानेंगे..

विजय .... ठीक है sun'na hi चाहते हैं आप दोनों तो फिर सुनिए. मैं एक तवायफ का बीटा हूँ.

"दोनों मेरी बात सुन्न कर शॉकेड हो gaye"..ek बार दोनों ने एक दुसरे को देखा फिर किसी गहरी सोच में गम हो गए"

"कुछ देर दोनों खामोश रहे. " फिर आंटी बोली

आंटी ....... तो बीटा इस में तुम्हारी क्या गलती है. ये तो भगवन का काम है. वो जिसे जहाँ चाहे पैदा कर दे इस में तुम्हारी क्या गलती है.

विजय ..... कीन्हा आसान है. उस पे अमल आसान नहीं है.

अंकल....... बीटा हमें इससे कोई फ़र्क़ नहीं padta.Tum कौन हो.?? किस के बेटे ho.??hum तुमसे ये कभी भी नहीं पूछेंगे..

विजय....... लेकिन मुझे फ़र्क़ पड़ता है मेरे यहाँ रहने से आप सब की इज़्ज़त खतरे में रहेगी कोई भी ऐसा शख्स मिल सकता है. जो मुझे पहचान jaye.To फिर आप उसको क्या जवाब देंगे और बात आस पास फैल गई तो इस का असर सब से ज़यादा आप पारर hi पडी गए. आप बेटियों वाले हैं मेरे यहाँ रहते आपकी बेटियां बदनाम हो jayengi.dunya को तो बस बात करने की आदत है वो आप सब के दिल की सच्चाई को कैसे मानेगी. और आप किस किस का मोहन बंद करेंगे.

मुझे क्या फारक पड़ेगा. मैं तो जबसे पैदा हुआ हूँ ये सब सुनते आया हूँ.

दोनों मेरी ये बात सुन्न कर फिरसे चुप हो गए. और किसी गहरी सोच में डूब गए...

विजय ...... ""ाचा आंटी जी अब्ब में चलता हूँ.""

"""दोनों अपनी सोच में गम थे उनको पता hi नहीं चला मेरे कमरे से बहार निकलने का"""

मैं भी इन भले लोगों के लिए किसी परेशानी का बाएस नहीं ban'na चाहता था.

"हाँ लेकिन मैंने दिल में एक फैसला कर लिया था जब किसी काबिल बन जाऊँगा तो इन लोगों से मुलाक़ात ज़रूर करता रहूँगा"

मैं चलता हुआ कमरे से बहार निकला फिर कोठी से भी बहार निकल गया.

"मैंने कोठी की तरफ घोर से देखा कही भूल न जाऊं. और फिर कोठी पर लिखे एड्रेस को दमाग के खाने में फिट कर लिया" अब्ब्में एक दिन यहाँ ज़रूर आऊँगा. सब बोहत hi मोहब्बत करने वाले लोग हैं.

कोठी दिल्ली शहर के बहरी तरफ थी.. मैं अपने hi ख्यालों में डूबा चलता hi जा रहा था. सोचो ने यलग़र की हुई थी शरीर का अंग अंग दर्द कर रहा था. लेकिन अब्ब बर्दाश्त करने की आदत का फ़ायदा होने लगा था.

***********************************************

लोकशन: हर्ष चौहान होम

हर्ष और उसकी बेटी दोनों hi अपने अपने ख्यालों में डूबे huye.kaafi देर बाद उनका धयान नताशा की आवाज़ से टूटा. नताशा के साथ शीतल भी थी और नताशा के हाथ में एक ट्रे था जिसपर कुछ ग्लास में जइसे था.

नताशा ... माँ पापा आप ऐसे gum-sum क्यों बैठे हैं और विजय भाई कहाँ hai."ye सुन्न दोनों हड़बड़ा गए. उनको पता hi नहीं चला विजय कहाँ गया"

आंटी ..... अरे अभी तो यही था. कहाँ चला gaya....shetal बीटा देखो कही बाथरूम में तो नहीं चला gaya.."shetal भाग कर बाथरूम में गई लेकिन दूर ओपन hi था और बाथरूम खाली" ये देख शीतल रोने लगी और फिर भाग कर पूरे घर में विव्य को ढूंढ़ने लगी. विजय कोठी में होता तो मिलता ना. वो तो कब का कोठी से जा चूका था.

शीतल फिरसे रोटी हुई भाग कर रूम में aai.."maa पापा भाई कहीं नहीं दिख रहे आप को तो पता होगा भाई कहाँ चले गए हैं"

अब्ब दोनों को अपनी गलती का एहसास हुआ क वो अपने ख्यालों में इतना खो क वो बहकर विजय इस लोगों से निराश हो कर hi चला गया.

हर्ष चौहान को खुद पर ग़ुस्सा आने लगा जिस लड़के ने उसकी बेटी की इज़्ज़त और जान बचाई. वो खुद उसके लिए कुछ भी नहीं कर सके और उसे जाने से रोक भी नहीं पाए.

नताशा के हाथ से ट्रे तो कब का गिर चूका था. और बीएड पर बेथ रोये जा रही थी. आज पहली बार उसे किसी लड़के में अपने भाई वाली फीलिंग्स आई thi.wo भी na-jaane कहाँ चला गया. आंटी भी नदामत के आंसू बहाये जा रहे थी.

सबसे ज़यादा बुरी हालत तो शीतल की उसने को कभी सोचा भी नहीं था क उसका भाई यहाँ से चला जायेगा. थोड़ी सी देर में उसने na-jaane कितने खवाब बन लिए थे.

भाई के साथ ये karrongi..bhai के साथ वो karrongi..bhai के साथ घूमने jaaongi..apni सहेलियों से अपने भाई को milwaongi..aur भी नजाने कितने अरमान दिल में सजा लिए थे इस नन्ही सी पारी ने. सब के सब chakna-shoor हो गए थे. शीतल बेचरी की तो रोने से हिचकियाँ आने लगी थी. शीतल की हालत देख आंटी ने हर्ष को हिलाया और कहा..

आंटी .... अभी भी वो ज़यादा दूर नहीं गया होगा आप जा कर उसे ढून्ढ कर लाएं. हर्ष चौहान हड़बड़ा कर खड़ा हुआ. और भागता हुआ बहार ा कर अपनी गाडी निकल कर दिल्ली की सड़कों पर विजय को ढूंढ़ने निकल पड़ा. अब्ब देखते हैं हर्ष चौहान को विजय मिलता है या nahi.....peeche कोठी में मातम छाया हुआ था. थोड़ी देर में कितनी खुश थी सब और अब्ब साड़ी खुशियों को किसी की नज़र लग गई थी.

इस परिवार का पूरे दिल्ली में कोई रिश्तेदार भी नहीं था.

*********************************************************************************

लोकेशन: दिल्ली

मैं चलता हुआ कमरे से बहार निकला फिर कोठी से भी बहार निकल गया.

"मैंने कोठी की तरफ घोर से देखा कही भूल न जाऊं. और फिर कोठी पर लिखे एड्रेस को दमाग के खाने में फिट कर लिया" अब्ब्में एक दिन यहाँ ज़रूर आऊँगा. सब बोहत hi मोहब्बत करने वाले लोग हैं.

कोठी दिल्ली शहर के बहरी तरफ थी.. मैं अपने hi ख्यालों में डूबा हुआ चलता hi जा रहा था. सोचों ने यलग़र की हुई थी शरीर का अंग अंग दर्द कर रहा था. लेकिन अब्ब बर्दाश्त करने की आदत का फ़ायदा होने लगा tha.main शुरू से ढीट भी था.

दर्द तो भूल कर मैं अपनी hi बनाई ख्यालों की दुन्या में गम चलता रहा.

na-jaane कितना दूर तक चला गया था. मुझे कोई अंदाज़ा नहीं था. जब मैं कोठी से निकला तो 2:पं के आस पास का टाइम तो होगा शायद. कन्फर्म नहीं है. बस अंदाज़ा hi था.

मुझे ख्यालों की दुन्या से बहार निकलने वाली एक चीख थी.

जिस में दर्द था जैसे कोई खतरे में हो.

मैंने हड़बड़ा कर अपने ird-gird के माहौल को देखा दूर दूर तक कोई भी मकान नहीं दिखाई दे रहा tha."chalte चलते मैं इतनी दूर कैसे आ गया. में इतना अपने ख्यालों में गम था के मुझे पता hi नहीं चल"

सनसन इलाका था. रोड से काफी दूर झाड़ियों में कुछ लोग दिखे मुझे.

मैं उस तरफ को चल दिया. जब वहां पोहंचा तो देखा एक लड़की ज़मीन पर पड़ी कराह रही है और एक औरत के साथ गुंडे टाइप बन्दे जबर्सती कर रहे थे.....
 
थैंक्स बीआरओ..!!!!!

विजय की लाइफ में अच्छे लोग अगर हैं तो सिर्फ उसका एक hi दोस्त अजित है..!!

अब्ब विजय को ये फॅमिली भी अछि लगी और वो नहीं नहीं चाहता के.....!!

क उस की वजा से इस प्यार करने वाली फॅमिली को भी रेखा बाई के गुंडे....!!

कोई नुक्सान पोहंचायें..!!

विजय अब्ब एक hi जगा रह कर कुछ नहीं कर सकता इस लिए उसे जाना होगा ..!!

अगर वो यहाँ रहा तो फिर सबको डस्ब बताना पड़ेगा जिससे उल्टा गड़बड़...!!

भी हो सकती है..... अभी वो हर मुआमले में किसी पर भी सही से भरोसा..!!

नहीं कर सकरा.......... अभी तो वो दुन्या को तलाशने निकला है...!!

देखते हैं वक़्त उसे क्या क्या दिखता है....!!!!!!!!!!!!!!!!!

विजय ने क्या देखा वो आपको नेक्स्ट अपडेट में पता चल जायेगा...!!!!

नेक्स्ट अपडेट 2:पं तक या उससे पहले hi अपलोड करदी जाएगी...!!!!!!

थैंक्स अगेन
 
Back
Top