रोहताश को वहाँ देख लिया गया था, शायद उन्होंने पहचान भी लिया होगा, फिर भी वह किसी तरह वहाँ से जान बचा कर भाग आया
| ज़मीन के अन्दर मन्दिर के ठीक नीचे बने उस ऐश्वर्य पूर्ण महल में पहरे की व्यवस्था शायद इसलिये नहीं समझी जाती थी, क्योंकि वहाँ कोई आता जाता नहीं था । बाबा की गुफाएं समझकर किसी को उसमें बिना आज्ञा के दाखिल होने का साहस नहीं था । यह गुफा मन्दिर वाली पहाड़ी के नीचे बनी थी । मठ के भू-भाग का एक सीधा रास्ता उन गुफाओं में ही पहुँचता था ।
आज रोहताश ने विलासता से भरे ऐश्वर्य पूर्ण उस भू-भाग का एक ही अंश देखा था ।
उसके सीने में एक अक्रांत ज्वाला दहक रही थी, और उसकी प्रचंड
लपर्ट अब किसी-न-किसी की राख की ढेरी में बदलने के लिये तत्पर थीं। वह क्रोधी स्वभाव का तो बचपन से ही था और उसके क्रोध ने सूरजगढ़ी के ठाकुर घराने का विनाश किया था ।
यह क्रोध जो सो गया था, आज एकाएक जाग गया और बिना सबक पढ़ाये, अपने क्रोध को शांत किये बिना वह इस स्थान को नहीं छोड़ना चाहता था । उसे महसूस हो रहा था कि ईश्वर पर अधिक भरोसा करके उसने गलती की। असल में ईश्वर कुछ है ही नहीं, इस दुनिया में जो है, वह शैतान है । शैतान ही यहाँ जी सकता है, शैतान ही यहाँ किस्मत वाला माना जाता है ।
उसने दरवाज़ा खटखटाया ।
कुछ क्षण बाद ही दरवाज़े पर आहट हुई ।
वह सावधान हो गया । दरवाज़ा पूरा खुल गया । भीतर अन्धेरा था । उसने आगे रोशनी फैलाते हुए अन्दर कदम रखा। उसने पूछने की आवश्यकता महसूस नहीं की। पर वह विनीता से दो बातें अवश्य कर लेना चाहता था । वह शायद दरवाज़ा खोलकर उसे देखते ही पीछे हट गई थी क्योंकि तत्काल वह द्वार पर नज़र आई थी।
उसने इत्मीनान से दरवाज़ा बन्द किया ।
फिर लैंप लेकर आगे बढ़ा ।
तभी वह चौंक पड़ा। कमरे में विनीता की जगह तवे की तरह काले शरीर का वहशी आदमी मौजूद था, जो चौरंगी बाबा की गुफा का एकमात्र सेवक था और बहुत कम बाहर निकलता था । लोग कहते थे कि वह गूंगा है, बहरा है। उसके बाद भी उसकी नज़रें बहुत तेज़ हैं । और वह उसी से सब काम ले लेता है ।
उसकी छोटी बारीक भौंहों वाली पीली आँखें रोहताश पर जमी थीं जिनमें ज़हर बुझा नज़र आता था। रोहताश के शरीर में ठंडी लहर दौड़ गई । वह कुछ बोला नहीं, बस चीते जैसी फुर्ती के साथ कूदकर रोहताश के सामने आ गया। पंजा रोहताश की गर्दन पर पड़ा, फिर उसने दूसरे हाथ से लैंप तोड़ दिया ।
भक्ष के साथ लपट उठी और फर्श पर नाचने लगी । उसपर एक कपड़ा जा गिरा उसके बाद रोहताश के कंठ से दर्दनाक सिसकारी निकली । वह चीख नहीं पाया शायद उसका मुंह बन्द हो गया था ।
उसके बाद वह काले दैत्य जैसे आदमी की बाँहों में झूलने लगा । आग लग चुकी थी और निरन्तर बढ़ती ही जा रही थी। यह आग तेज़ी के साथ दूसरे कमरे की ओर लपक रही थी। उस कमरे में जहाँ चन्द्र बेताल कुछ समय पहले सो रहा था ।
उस भयंकर आदमी ने रोहताश को दो-तीन झटकों में ही बेहोश कर दिया था । उसके बाद लाद कर ले गया। वह अन्धेरे मार्ग पर निश्चित भाव में बढ़ गया । गुफाओं में पहुँचकर वह पूर्वी भाग में एक चौकोर कमरे में पहुँचा । रोहताश को फर्श पर पटक कर वह बाहर निकल गया । दरवाज़ा बन्द करने के बाद उसने गैलरी पार की और चौरंगी बाबा के कक्ष में जा पहुँचा । द्वार पर खड़ी स्त्री प्रहरियों ने उसे भीतर जाने दिया । कुछ देर बाद वह चौरंगी बाबा की आज्ञा लेकर लोटा ।
रोहताश के लिये आज्ञा थी कि उसे मृत्यु कक्ष में भेज दिया जाये । ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,000
पूरा झोंपड़ा आग की लपटों से घिर चुका था। रोहताश परिवार के लिये यह सुबह मनहूस थी । वह खुद मौत के मुह में था और उसका धर्मपुत्र आग की लपटों में गुम हो चुका था । मठ में रहने वाले काफी देर में एकत्रित हुए। वे लोग आग बुझाने का प्रयत्न करने लगे । आग
। तभी बुझ पाई जब झोंपड़ी जलकर राख हो गई ।
एक नौजवान योगी पुरुष सबसे पहले झोंपड़े के मलबे को हटाने आगे बढ़ा, उसके पीछे अन्य लोग भी थे । मलबे के ढेर में उन्हें एक अजीब दृश्य दिखाई दिया। ऐसा दृश्य जिसपर कोई भी विश्वास नहीं
कर सकता था ।
सब कुछ जलकर राख हो जाने के की स्थिति के बावजूद भी एक बच्चा मलबे में चैन की नींद सो रहा था । उसका लिबास ज्यों-का-त्यों सुरक्षित था, उसके जिस्म पर जलने का कोई चिन्ह नहीं था । कहीं जख्म भी नज़र नहीं आ रहा था ।
युवक योगी पुरुष उसे स्तब्ध सा देखता रहा । पल दो पल कई पल न जाने कितनी देर अपलक वह उस बच्चे को निहारता रहा, जिसे वह अच्छी तरह जानता था । यह चन्द्र बेताल के सिवा कोई नहीं था ।
दुविधा की सी स्थिति में आकर उसने बच्चे के शरीर को छू कर देखा । शरीर में भरपूर गर्मी थी, नब्ज बराबर चल रही थी। उसकी साँस की धीमे खर्राटे ताल और लपके साफ सुनाई दे रही थीं ।
"होलिका जल गई, पर प्रह्लाद इसी तरह जीवित रहा ।" वह
बुदबुदाता रहा। बोला - "यह बच्चा अवश्य ही ईश्वर का फरिश्ता है । इसे कोई नहीं मिटा सकता। जो कुछ वेद पुराणों में लिखा है, वह आज मेरे सामने प्रत्यक्ष है, हे ईश्वर तू सर्व शक्तिमान है ।"
उसने बच्चे को उठा लिया ।
अन्य लोग भी वहाँ जमा हो गये थे ।
उन्हें जब इस घटना का पता चला तो । यह बात जंगल की आग की तरह फैल गई । इस बात को प्रसिद्धि मिलते देर नहीं लगी कि चन्द्र बेताल इन्सान नहीं बल्कि ईश्वर का भेजा फरिश्ता है ।
जब यह बात प्रसिद्ध हो ही गई थी तो चौरंगी बाबा ने इसे नया रूप देना ज़रूरी समझा । उक्त घटना बाबा के लिये जहाँ अत्यन्त लाभदायक थी, वहीं चिंता जनक भी थी । चिन्ता का कारण स्पष्ट था
जब कोई आदमी धर्मात्मा या योगी बनाकर पाप पथ पर अग्रसर हो जाता है तो उसके भीतर एक चोर भी होता है, जो उसे ऐसी किसी भी घटना के सुनते ही निर्बल बना सकता है । क्योंकि यह घटना यदि सही थी तो यह फरिश्ता आगे चलकर उसके लिये मुसीबतें भी खड़ी कर सकता था । उसके कुकर्मों का पर्दा उठा सकता था । गुफाओं में फैलाया इंद्रजाल हटा सकता था और अब तो वह इसी जंगल में हवाई पट्टी बनाने की अनुमति ले चुका था । दूर-दूर तक उसके शिष्य आश्रम चला रहे थे और वह भारत की आधी सम्पत्ति का मालिक बनने का सपना देख रहा था। छोटे-मोटे नेताओं की तो क्या बिसात देश का प्रधानमन्त्री तक उसके चंगुल में था । उसका जाल राजतंत्र की नस- नस में फैलता जा रहा था । वह देश-विदेश की सैकड़ों सुन्दरियों का स्वामी था । उसका संकेत पाते ही कहीं भी किसी की हत्या हो सकती थी। फिर भी उसने ऐसी व्यवस्था की हुई थी कि उसका भेद सदियों तक नहीं खुल सकता था । ऐसी जगह किसी फरिश्ते के उत्पन्न हो जाना अच्छा लक्षण नहीं था । और रोहताश ने उसे सारी कहानी बता ही दी थी । चन्द्र किसकी सन्तान है, वह भली प्रकार जानता था ।
उसने तुरन्त दो फ़ैसले किये ।
एक तो इस नामी फरिश्ते की हवा को और हवा दी जाए और उसका तत्काल लाभ उठाया जाये । इस तरह वह सारे देश का भगवान बन सकता था और लाखों रुपया खर्च करने के बावजूद भी जो पब्लिसिटी उसे नहीं मिल सकती थी, वह इस फरिश्ते के कारण प्राप्त हो सकती थी ।
दूसरे प्रसिद्ध का स्वार्थ सिद्ध होते ही फरिश्ते को दुनिया से अन्तर ध्यान कर दिया जाये और घोषित कर दिया जाये कि वह छोटी आयु में ही दुनिया भ्रमण पर निकल गया ताकि वह सारे संसार को अपना सन्देश दे सके। वह किसी भी भाग्यदान के घर प्रकट हो सकता है।
चौरंगी बाबा पाखंडी तो था ही परन्तु बिना चमत्कारी व्यक्तिगत के कोई पाखंड भी कैसे रच सकता है ? ऐसे चमत्कारों का उसके पास मन्दिर था और वह तन्त्र-मन्त्र भी जानता था । वह समाधि भी लगा सकता था और अंगारों पर भी सोता था। इस पाखंड को रचने से पहले वह बहुत बड़ा वेध था और उसने जड़ी बूटियों की खोज में ग्यारह वर्ष हिमालय पर बिताये थे । वहाँ उसे अनेक सिद्धियां भी प्राप्त हो गयीं थीं। वह सम्मोहन शक्ति का स्वामी भी था जिससे अनेक मानसिक रोग ठीक हो जाते थे ।
वह इस बात को तो अच्छी तरह समझ सकता था कि एक तांत्रिक के घर ईश्वर का फरिश्ता नहीं बल्कि प्रेतात्मा ही जन्म ले सकती है। और फिर वह तो बेताल पुत्र है । अगिया बेताल का तनिक भी साया यदि उसपर हुआ तो वह आग में कैसे जल सकता है ? आग तो अगिया बेताल का सबसे प्रसिद्ध खेल है । चन्द्र बेताल आग में जीवित कैसे रहा यह उसके लिये अधिक शोचनीय विषय नहीं था और इसी से यह साबित होता था कि ज्यों-ज्यों वह बड़ा होता जायेगा अनेक गुप्त शक्तियों का स्वामी बनता चला जायेगा । फिर उसको यह जानते क्या देर लगेगी कि इसके धर्म पिता की मौत कैसे हुई ? आखिर उसका धर्म पिता बाल सिद्धि प्राप्त कर चुका था । इसके अलावा भी उसे मठ के अन्य रहस्यों का पता भी चल सकता है, ऐसे साँप को पालना उसके लिये घातक ही सिद्ध हो सकता था ।
उसने अपने फैसले पर अंतिम निर्णय लिया और अपने सेक्रेट्री महामाया को बुलाया। योगी राज महामाया मठाधीश था, जो सारा कार्य भार देखता था । यह पचपन साल का चौड़े कन्धों वाला तारा चौकोर सा आदमी था, जिसके सर पर एक भी बाल नहीं रहता था । उसकी एक आँख में पीलापन पड़ा हुआ था जिससे उसकी आँखों का सामना कर पाना दुश्वार हो जाता था । उसकी मन्द मन्द चाल देखते ही बर्फ की सी ठण्ड का आभास होता था यूँ जैसे वह सिर्फ किसी खतरनाक घटना चक्र में रेंग रहा हो ।