Horror अगिया बेताल - Page 11 - SexBaba
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Horror अगिया बेताल

फ्रेंड्स आप सब की फरमाइश पर जल्द ही इसका नेक्स्ट पार्ट शुरू होगा
 
अगिया बेताल का बेटा

प्रस्तावना

जो कुछ रोहताश की आप बीती थी, वह कथा उसने 'अगिया बेताल' नामक पुस्तक में सुनाई है। वास्तव में रोहताश की कथा तो वहीं समाप्त हो जाती है, परन्तु कुछ मूलभूत प्रश्न थे, जिनका जवाब न तो रोहताश के पास था और न उसका पूर्वानुमान । रोहताश एक तांत्रिक था, उसने 'अगिया बेताल' की सिद्धि की थी । यह सिद्धि उसने सूरजगढ़ी के वंशजों से बदला लेने के लिये की थी। बेताल की सहायता से उसने बदला भी चुका लिया और सूरजगढ़ी का सर्वनाश भी कर दिया। बेताल को बलि देने के लिये एक बच्चे की हत्या से रोहताश का मन जल उठता है और उसे अपने कारनामे से घृणा होने लगती है । क्योंकि वह बच्चा एक विधवा पुजारिन का था, जिसे रोहताश ने पहली ही नज़र में प्यार की डोर से बाँध लिया था । वह जानता था कि यदि बेताल को साथ रखना है तो उसे बलि देनी ही पड़ेगी और ऐसी कई हत्यायें उसके हाथों से होंगी । उसने निर्णय किया कि अब वह कोई बलि नहीं चढ़ायेगा और बेताल से अपना पीछा छुड़ा लेगा, परन्तु यह संभव न हो सका । बेताल उससे अब भारी स्वार्थ पूरा करना चाहता था। रोहताश किसी तरह मन्दिर में शरण लेकर बेताल से पीछा छुड़ाता है, वह मन्दिर उसी पुजारिन विनीता ने बनवाया था । विनीता उसकी भक्तिन बन गई थी ।

फिर बेताल क्रोधित होकर विनीता को शिकार बनाता है और विनीता अनजाने में गर्भवती हो जाती है, यह बच्चा बेताल का होता है, परन्तु इसका आरोप रोहताश पर लगता है और उसे अपमानित कर मन्दिर से निकाल दिया जाता है। लोग उसे मुर्दा समझ छोड़कर चले जाते हैं। उन्हीं दिनों प्लेग फैल जाता है और यह बस्ती खाली हो जाती है ।

विनीता पागलों की तरह उसी बस्ती में भटकती रहती है । वह बेताल और चन्द्रावती (रोहताश की माँ; मरने के बाद बेताल की प्रेमिका) के वश में रहती है। रोहताश किसी तरह इनसे विनीता को मुक्ति दिलाता है और उससे विवाह करके तपोवन की ओर चला जाता है । यहीं एक मठ में उसे शरण मिलती है और कुछ माह बाद विनीता का पुत्र जन्म लेता है। अपने वचन के अनुसार रोहताश इसका नाम चन्द्र बेताल रख देता है और स्वयं उसी मठ में बैरागियों के समान जीवन बिताने लगता है ।

क्या अगिया बेताल का पुत्र साधारण इन्सानों जैसा होगा ? क्या चन्द्र बेताल में गुप्त शक्ति का अणु विधमान न होगा ?

ऐसे बहुत से प्रश्न थे। जिनका जवाब रोहताश को पहले ही जान लेना चाहिए था। तभी सही निर्णय लेना चाहिये था, परन्तु जैसा कि ऊपर लिखा जा चुका है, रोहताश को इसका पूर्वानुमान नहीं था, इसी दिन से इस कथा का जन्म होने की संभावनायें पैदा होती हैं । इन्हीं संभावनाओं ने वास्तविक रूप ग्रहण किया और 'अगिया बेताल का 'बेटा' की रचना हुई ।
 
अगिया बेताल का बेटा

मठ के एक झोंपड़े में चन्द्र बेताल ने बचपन के पहले चार वर्ष बिताये । यहाँ तक वह सिर्फ बच्चा था। अबोध बच्चा । परन्तु वह अन्य बच्चों की अपेक्षा कुछ भिन्न अवश्य था । उसका बचपन न तो हंसी की किलकारियों से गूंजा था और न ही उसे कभी भूख प्यास के लिये रोता देखा गया था । नियमित समय पर दूध देने का ध्यान विनीता को ही रखना पड़ता था । फिर भी चन्द्र बेताल को दूध के प्रति कोई रुचि नहीं जान पड़ती थी। एक-दो बार वह मिट्टी और सफेद पत्थर चबाने का प्रयास करता देखा गया था। रोहताश दम्पति ने इस पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया बस चन्द्र बेताल को हल्की सी डांट पड़ जाती ।

चन्द्र बेताल जब तीन वर्ष का हुआ तो वह झोंपड़े से बाहर खेलने कूदने निकलने लगा, परन्तु मठ की सीमा के चारों तरफ तारों की बाढ़ उसकी रुकावट का कारण बन जाती और वह मठ का चक्कर काट कर लौट आया करता था। एक-आध बार वह बाढ़ को पार करने की असफल चेष्टा के कारण ज़ख्मी हो गया, उसके बाद विनीता उसपर विशेष निगरानी करने लगी ।

चौरंगी बाबा के इस मठ में हर तरह के लोग आया करते थे । बाबा के बारे में प्रसिद्ध था कि वह बड़े से बड़ा असहाय रोग अपनी योग विद्या से ठीक कर देते हैं। आदिवासी तो बाबा को देवता मानते थे और जंगल में आकर योगी पुरुषों की सेवा किया करते थे ।

चीड़ और देवदार की सुगन्ध से महकता रमणीक वन और उसके मध्य में स्थित था यह मठ... एक भव्य मन्दिर भी बाबा ने पहाड़ी की चोटी पर बना दिया था। बाबा अधिकतर उसी मन्दिर में रहते थे, जिसका रास्ता मठ से पश्चिम दिशा में पड़ता था ।

कभी-कभी वह मठ में अपने मध्य शिष्यों को शिक्षा देने आ जाते थे, अथवा उनके प्रतिनिधि मठ की देखभाल किया करते थे । मठ कोई दो वर्ग मील क्षेत्रफल में फैला था जिसमें छोटे-छोटे सुन्दर झोंपड़े थे ।

मठ में और क्या-क्या वस्तुएं थीं, वहाँ स्त्री-पुरुष किन - किन नियमों का पालन करते थे और उनका ब्रह्मचर्य व्रत कैसा था, इस बारे में विस्तार से आगे बताया जायेगा । यही वस्तुतः यहाँ चन्द्र बेताल की घटना का प्रमुख केंद्र है, जो चार वर्ष का पूरा हो चुका है।

पांचवां वर्ष शुरू हुआ था और तीसरा दिन था कि चन्द्र बेताल मठ से गायब हो गया । वह सवेरे ही बिस्तर से नदारद था। पहले दो घंटे में उसकी साधारण खोज-बीन हुई परन्तु अगले दो घंटे में सारा मठ छान डाला गया, उसके बाद शाम होते-होते जंगल में ढूंढ मच गई।

सभी हैरान थे कि वह छोटा सा बच्चा कहाँ चला गया ?

हार कर बाबा के पास सूचना भेजी गई । बाबा ने आदिवासियों को लड़के की ढूंढ पर लगा दिया ।

इस बीच हिंसक जानवरों का खतरा नहीं था । बच्चा अधिक दूर भी नहीं जा सकता था अतः यह सोचना कि वह पहाड़ी की तरफ गया होगा गलत था । वह सीधी-सादी सड़क पर जा सकता था, जो अनेक आदिवासी गांवों के पास से गुज़रती थी ।

पिछले पांच वर्ष से जो जीवन सामान्य और निश्चित बीत रहा था, उसमें पहला मौका आया... यकीनन मनहूस मौका, जो चन्द्र बेताल की रहस्यमयी सीरत बन चुका था ।

वह रात बड़ी खामोश लग रही थी । थके हारे गुमसुम बैठे थे। रात के अधिक बीतते ही मठ के शुभचिंतक जा चुके थे। विनीता के आकर्षक सौंदर्य चेहरे पर भी अँधेरा सा छाया प्रतीत होता था। किसी आशंका

में गुम हो जाने के कारण सभी कुछ असामान्य हो गया था । घर में भोजन नहीं बना और न आज रोहताश मन्दिर जा सका अथवा उसका अधिकतर समय मन्दिर के पूजा भवन में कटता था । मन्दिर के पूजा भवन में आठ पुजारी थे जो रात-दिन अपने नियत समय पर वहाँ रहते थे । यह समय चौरंगी बाबा के आदेश से बदलता रहता था। चाँद की रात में भी बहुत से लोग इस मन्दिर में उपासना करने पहुँचते थे अतः यह रात-दिन खुला रहता था ।
 
इन दिनों रोहताश का समय शाम छः बजे से रात बारह बजे तक का था। इस बीच उसे पूजा भवन में होना चाहिये था। आज तक उसने मठ के किसी नियम का उलंधन नहीं किया था । परन्तु इस बार चन्द्र बेताल के गायब हो जाने से वह सारे नियम भूल गया और विनीता के पास बैठा रहा ।

विनीता ।

इतने वर्ष बाद वह पहली बार विनीता के समीप बैठा उसका मुख देखकर विचित्र सा महसूस कर रहा था। दोनों की निगाहें चार होतीं, मूक सी अपनी-अपनी बात कहती और झुक जातीं, फिर उठतीं,... फिर यही क्रम होता और मुंह बन्द रहता ।

वो महसूस कर रहे थे कि इन वर्षों में वो दोनों बहुत बदल चुके हैं ।.. बहुत ही क्यों ?. पूरे बदल चुके हैं। चौरंगी बाबा के आदेश से वह दोनों ही ब्रह्मचर्य का पालन कर रहे थे। और अब तो रोहताश महसूस कर रहा था कि वह भोग-विलास के योग्य रहा भी नहीं । स्त्री के प्रति उसके मन में कोई आकर्षण नहीं रहा था । इसलिये सुन्दरता का अब उसकी निगाह में कोई मूल्य नहीं था ।

उसने कभी विनीता की तरफ ध्यान नहीं दिया था, परन्तु आज बहुत सी बातें याद आते ही उसे लग रहा था कि विनीता और भी जवान हो गई है। उसके गालों की रंगत सेब जैसी हो गई है, उसकी आँखों में यौवन की अद्भुत ज्योति चमकती महसूस हो रही है और पास बैठने पर उसके शरीर से भीनी-भीनी आदम सुगन्ध उड़ती महसूस होती है, जो ज्वार ला दें ।

विनीता उदास थी परन्तु उसका उदास रूप भी रोहताश को ताज़ा कमल जैसा लग रहा था ।

"रात बहुत हो चुकी है।" विनीता ने कहा, “आप सो जाइये, हमें भगवान के भरोसे रहना चाहिये ।"

"हाँ विनी, आज मैं सचमुच उदास हो गया हूं ।"

आपका इकलौता बेटा जो घर पर नहीं है ।'

“चन्दर का नाम तो मेरी उदासी का अंश भर है।" रोहताश ने शून्य में निगाह स्थिर करते हुए कहा - "मैं जानता हूं वह कहीं भटक गया है । आदिवासी उसे खोज कर ले आयेंगे। यह तो मेरी उदासी के लिये माध्यम बन गया विनी । हकीकत में आज मैं पश्चाताप और गहरे अनुभव में गोते खा रहा हूं। एक बार मेरे जीवन में संघर्षों का दौर शुरू हुआ था, वह कभी ख़त्म नहीं होगा विनी.. कभी नहीं ।"

आज आप कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं ?"

'विनी, आज में अपनी औलाद के लिये अपने को बेचैन महसूस कर रहा हूं । चन्द्र मेरा बेटा नहीं है, वह बेताल की अमानत है, जिसके हम रक्षक मात्र हैं । मेरे दिल का यह दर्द खत्म होगा कि मेरा वंश मुझ तक ही सीमित रह गया । मेरा जीवन विधवा की मांग जैसा सूना है विनी पर मैंने तुमसे कभी कुछ नहीं कहा ।"

'ओह ! भूल जाइये वह सब । हम परिस्थितियों के सामने विवश हैं । चौरंगी बाबा की कृपा से आपकी टांगों की शक्ति लौट आई, यह

वरदान क्या कम है ? और जब तक वह चाहेंगे, हमें उनकी सेवा करनी है। कम से कम यहां सांसारिक उलझने तो नहीं हैं। कितना शान्तिपूर्ण जीवन है । यहां न तो कोई विधवा है न ब्याहता । यहां जितनी भी स्त्रियां हैं, उनकी कहानी मुझ जैसी ही है रोहताश । यहां का हर पुरुष ब्रह्मचारी है, उसे सन्तान उत्पन्न करने का कोई अधिकार नहीं । बाबा के इस नियम को तोड़ने का साहस क्या तुम में है ?"

"अगर मैंने ब्रह्मचर्य व्रत का खण्डन किया तो क्या सचमुच अपाहिज हो जाऊंगा ? क्या मैं अपनी टांगों की शक्ति फिर से खो दूँगा ?"

"बाबा कभी झूठ नहीं बोलते और न उनसे कुछ छुपाया जा सकता है ।" विनीता ने सिर घुमाते हुए कहा - "शांत चित होकर सो जाओ, आप सिर्फ सन्यासी हैं, सन्यासी ।"

इतना कहकर वह दरवाज़े से बाहर निकल गई। इसी झोंपड़े में उसका दूसरा कमरा था। वे एक साथ कभी नहीं सोये थे ।

“तुम ठीक कहती हो ।" रोहताश बड़बड़ाया, “मैं सन्यासी हूं, सिर्फ सन्यासी, फिर मुझे चन्द्र बेताल से ही क्या लेना ? चाहे वह मरे या जीये, मेरे लिये तो वह भी एक साधारण इन्सान जैसा है। सच बात तो यह है कि मैंने उसे कभी प्यार नहीं किया ।"

रोहताश खामोशी से लेट गया । परन्तु उसकी आँखों से नींद कोसो दूर थी । वह इन परिस्थितियों के बारे में सोच रहा था, जिसका व्यूह उसके चारों तरफ कसा था । वह वैरागी था, पर उसका मन पूर्णतया रूप से बैरागी नहीं था । अलबत्ता कभी-कभी विद्रोह की चिंगारी सुलग उठती। उस चिंगारी को वह दबा लेता

चौरंगी बाबा ने उसे बताया था कि जिस दिन उसने ब्रह्मचर्य व्रत तोड़ा, उसके भीतर उत्पन्न हुई ईश्वरी शक्ति नष्ट हो जायेगी और वह सीधा नर्क का भागी बनेगा ।

रोहताश एक डॉक्टर था। लोगों के प्राण बचाना उसका धर्म और कर्तव्य था । संघर्ष प्रारम्भ हुआ । बदले की भावना ने उसे डॉक्टर से निरंकुश तोचिक बना दिया । कम समय में ही वह बड़ा भयानक वहशी हो गया था । उसने कइयों को मौत के घाट उतार दिया था । यदि वह अगिया बेताल को तेईस बलि चढ़ा देता तो शायद वह इस दुनिया का सबसे बड़ा क्रूर तांत्रिक होता । यह शैतानियत तो कहीं तक बढ़ाई जा सकती थी । बुराई के रास्ते आसानी से पैदा हो जाते हैं जिनपर शैतान का साया होता है ।
 
इन्सान के अन्दर दोनों की शक्तियां विराजमान हैं... किन्तु बुरा रास्ता हमेशा सरल नज़र आता है । शैतानियत का ज़ोर दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। जिस दिन यह पूरी तरह इन्सान को अपनी अछिका में जकड़ लेगा, ईश्वर द्वारा निर्मित इस मानव का सर्वनाश हो जायेगा ।

सारी बुराइयां छोड़कर रोहताश बैरागी बना था । विधवा स्त्री से विवाह के बाद भी उसे ब्रह्मचर्य व्रत धारण करना पड़ गया था । जब

वह इस मठ में आया था तो विनीता गर्भवती थी । बेताल ने अपना गर्भ से उसका पुत्र भेजा था, जिसका रक्षक स्वयं रोहताश को बनना पड़ा । वह अपाहिज था, दया का पात्र साधु, जो मौत से लौटा था । विनीता को साथ लेकर वह आदमियों की बस्तियों से नफरत का सामान जुटाता जंगल की तरफ बढ़ता चला गया, इसी बीच उसने विनीता को अपनी पत्नी मान लिया था ।

दोनों इस मठ में शरण गत की तरह आये और उसके बाद आज तक इसी मठ के झोंपड़े में थे । छ: माह तक निरन्तर बाबा ने उसे पत्नी से दूर रखकर इलाज करवाया । फिर जब उसकी टांगों की शक्ति लौट आई तो बाबा की आज्ञानुसार उसने ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर लिया था । यह उसे बाबा ने ही बताया था कि यदि फिर से अपाहिज बनकर नर्क का भागीदार नहीं बनना चाहता और जीवन का वास्तविक आनन्द प्राप्त करना है तो उसे ब्रह्मचर्य व्रत लेकर ईश्वर शक्ति में लीन हो जाना चाहिए । सात वर्ष के कठोर तप के उपरान्त ही उसके शरीर से पाप के साये दूर हो पायेंगे ।

ज्यों - ज्यों यह समय बीतता गया, प्रारम्भ में उसे सुखद अनुभूति होती गई और वह गृहस्थ जीवन से दूर होने लगा। उसे यूँ लगता जैसे वह इस संसार में नितान्त अकेला है । किन्तु इतिहास गवाह है कि इन्सान के जीवन में कभी-कभी ऐसी घटना घट जाती है कि उसका सारा व्रत सारी तपस्या खण्डित हो जाती है ।

चन्द्र बेताल के चले जाने से उसकी मानसिक शान्ति भंग हो गई। अब तक तो उसे यह भी याद नहीं रहता कि चन्द्र उसका बेटा नहीं, किसी की अमानत है । सुन्दर और बुद्धिमान शिशु के कारण उसे असीम प्रसन्नता का बोध होता और उसे वह अपना ही पुत्र समझता, परन्तु आज न जाने उसे क्या हो गया था। उसे सारी बातें याद आ गयीं थीं, उसे याद आया कि वह साढ़े चार वर्ष ब्रह्मचर्य जीवन बिता चुका है । जिस अमानत की वह रक्षा करता रहा था वह भी चली गई, ऊपर से विनीता का उसके प्रति रूखा व्यवहार उसे भीतर से कचोटता चला गया। वह अपने आपको उफनती बाढ़ में बहती शहतीर की तरह

को महसूस कर रहा था ।

विनीता को उससे कोई लगाव नहीं रहा क्यों ?

क्या वह भी ब्रह्मकुमारी बन गई है ? कोई भी पत्नी अपने पति के इतने पास रहते हुए दूर कैसे रह सकती है ? वह योगासन तो सीखती थी परन्तु उसने भी कोई ऐसा व्रत धारण किया है, इसकी उसे कोई जानकारी नहीं थी ।

उसके मस्तिष्क में संदेह उपजा - कहीं विनीता किसी दूसरे पुरुष से प्यार तो नहीं करती ? नहीं उसका चरित्र ऐसा नहीं ।

तरह-तरह के विचार उसके मन में आते रहे, यूँ रात को जागना उसके लिये कोई नयी बात नहीं थी, परन्तु यह जागरण विचित्र सी कौतूहलता लिये था । वह इस मठ के अनेकानेक नियमों के बारे में सोच रहा था... गुफाओं में बैठा चौरंगी बाबा । क्या सचमुच सब कुछ देख लेता है और क्या यह भी सच है कि ब्रह्मचर्य ही उसकी प्राण रक्षा कर सकता है ? वह स्वयं एक डॉक्टर था, अतः इसके पीछे उसे कोई बुनियादी तर्क नज़र ही नहीं आ रहा था ।

चाँद की रोशनी खिड़की से छनती हुई उस पर बिखरने लगी ।
 
जैसे ही उसने अपने ऊपर शीतल चाँदनी का ठण्डक महसूस कर, हवा का एक झोंका चला तो उसे अचानक याद आया कि ऐसी ही चाँदनी रात की शीतलता में स्नान करके उसने अगिया बेताल को सिद्ध किया था ।

जैसे-जैसे वह 'अगिया बेताल' और अपनी उत्तेजक गतिविधियों को याद करता चला गया वैसे-वैसे उसका मन अखण्ड व्रत के साथ डोलने लगा और एक समय ऐसा भी आया कि जब वह झटके के साथ उठ बैठा। उसके मन में यह तीव्र इच्छा हुई कि वह शीतल चाँदनी रात में सैर करे । चाँदनी रात ने उसे अपने दामन में खींच लिया। उसकी अभिशप्त ग्रन्थि जैसे जाग उठी थी ।

बाहर निकलकर वह बाग़ में चहलकदमी करने लगा । चारों तरफ सन्नाटा छा चुका था । उसे किसी भी झोंपड़े में उजाला नज़र नहीं आया । मठ की मुख्य इमारत भी सोई प्रतीत होती थी ।

अचानक इसके कानों में हल्की सी खनक का स्वर पड़ा । वह बेसुध खड़ा चन्द्रमा को निहार रहा था । खनक ने उसका ध्यान भंग किया और उसने अटपटेपन से गर्दन घुमाकर देखा । उसने फूलों की क्यारियों के बीच वाले रास्ते पर किसी साये को लहराते देखा और उसे अहसास हुआ कि साया किसी स्त्री का है।

"कहीं विनीता तो नहीं ?"

शायद उसके दिल में भी ऐसी बेचैनी हो और वह उसे बाहर डोलते देखकर स्वयं भी बाहर आ गयी हो । परन्तु यह भ्रम कुछ ही सेकंड्स में टूट गया, वह जो भी थी। दूसरे रास्ते पर बढ़ रही थी और उसकी ओर से पूर्णतया बेखबर थी। अगर वह विनीता थी तो दूसरे रास्ते पर कहाँ जा रही थी ? और यदि विनीता नहीं थी तो इस तरफ कौन स्त्री मटरगश्ती करने आई थी ? इन सब प्रश्नों का जवाब न मिलने के कारण कौतूहल का बढ़ जाना स्वाभाविक था और वह कदमों की आहट को बिल्ली की तरह दबाये उसी दिशा में बढ़ चला ।

उसने सरल रास्ता अपनाया और उसी मार्ग पर आगे जा पहुँचा, फिर एक झाड़ी की ओट में खड़ा हो गया । स्त्री इसी ओर आ रही थी ।



रोहताश जो कुछ कर रहा था, नियम के विपरीत था । इस प्रकार की गुप्त क्रियायें करना यहाँ भारी आपत्ति का कारण बन सकता था । यह एक प्रकार की जासूसी थी । वह जानता था मठ में सज़ा का प्रबन्ध भी था । उसने सुना भर था कि जो मठ के नियम तोड़ता है वह स्वतः ही दण्ड का भागीदार है और फिर उसे मठ में रहने का कोई अधिकार नहीं रहता । वह पागलों की हालत में जंगलों की ओर चला जाता है जहाँ से वापस लौटने का कोई मार्ग नहीं । पता नहीं यह बात कहाँ तक सच थी परन्तु उसने अपने पाँच वर्षीय काल में आठ आदमियों में मठ से गायब होने की सूचना सुनी थी । उन्होंने यहाँ का कोई न कोई नियम भंग किया था



रोहताश ने इन बातों की तरफ कभी ध्यान नहीं दिया था। ऐसा इसलिये कि उसके दिमाग में नियम भंग करने का कोई फितूर आया ही नहीं था। वह जो कर रहा था उसे वह नियम भंग करने की गिनती में नहीं गिन रहा था । वह केवल उस स्त्री के बारे में सोच रहा था ।

आखिर वह स्त्री ठीक सामने से गुज़री ।

उसने पहचान लिया कि स्त्री विनीता ही थी ।

उसके माथे पर पसीने की बूंदें चुहचुहा रही थीं। सारा बदन भीगा-

भीगा सा प्रतीत हो रहा था । उसके हाथ कांप रहे थे और पाव ठण्डे हुए जा रहे थे। झोंपड़े में कदम रखते ही वह लड़खड़ाते और बेजान से पैरों में गर्मी देने के लिये दीवार से सहारा लगाकर खड़ा हो गया । तभी उसने साँसों की सरसराहट सुनी ।

रात्रि का तीसरा पहर बीतने को आ गया था ।

वह चौंका । अपनी सांसें रोकीं, यह सोचकर कि कहीं वह अपनी ही सांसें तो नहीं सुन रहा ? परन्तु नहीं, यह उसकी अपनी सांसें नहीं थी । साँसों का क्रम एक तप और ताल के अनुसार जारी था और ऐसी सांसें किसी जागते हुए व्यक्ति की नहीं हो सकती थीं ।

झोंपड़े में वह ऐसा ही अँधेरा छोड़कर गया था। चाँदनी भी अब सरक चुकी थी और खिड़की पर भी अन्धेरा साया खड़ा था । थोड़ी देर इसी प्रकार खड़े रहने पर वह अपनी साँसों को काबू में लेने का प्रयास करता रहा । परन्तु स्थिरता चाहकर भी नहीं आ रही थी। कंपन ज्यों- का-त्यों था । पसीना सूखने का नाम नहीं ले रहा था । न जाने उसके शरीर से कितना पसीना बह गया था ।

कुछ समय बाद उसके शून्य मस्तिष्क में चेतना का धमाका सा हुआ और अब उसकी निगाहें अन्धकार को भेद रहीं थीं। सिर्फ नज़रों से ही नहीं, बल्कि वह साँसों के क्रम से ही जान गया था कि वहाँ चन्द्र बेताल सो रहा है । चन्द्र बेताल उसी के बिस्तर पर सो रहा था । उसका बिस्तर बिछा नहीं था और फिर वह तो अपनी माँ वाले कमरे में सोता था । उसने आते वक्त देख लिया था कि विनीता का दरवाज़ा बन्द है, बाहर से नहीं बल्कि भीतर से ।

चन्द्र बेताल के कंठ से हल्की नींद की घुरघुराहट निकल रही थी ।

न जाने कितनी देर तक रोहताश उसी स्थिति में रहा, फिर उसने दियासलाई खोजकर रोशनी जला दी । रोशनी कमरे में फैलते ही उसने चन्द्र बेताल को बेसुध पड़ा देखा। उसके मुख पर अलौकिक चमक थी । और उसकी हथेलियाँ आज ज़रूरत से ज़्यादा लाल नज़र आ रहीं थीं । रोहताश ने गौर से देखा । उसके हाथों में रक्त का लेप चढ़ा था । रक्त सूख गया था अतः वह गोरे हाथ को सुख प्रदान कर रहा था ।

रोहताश के शरीर में सनसनी सी दौड़ गई ।

बड़ी भयंकर रात थी ।

उसे क्या-क्या देखने और भुगतने को मिल रहा था ।

चन्द्र बेताल के वस्त्रों पर भी रक्त के धब्बे थे ।

उसके बाल धूल में अटे पड़े थे परन्तु चेहरा एक दम तरोताजा और साफ था । सोते हुए भी उसके होंठों में एक मुस्कान सी दबी थी ।

"हे भगवान! आज क्या हो रहा है ! " रोहताश सिर थामकर वहीं बैठ

गया ।

फिर वह न जाने कब तक बैठा रहा ।

वह तब तक बैठा रहा जब तक उसने खटके की आवाज़ नहीं सुनी वह झपकी लेकर उठा । उसने लैंप उठाया और खिड़की के पास जा पहुँचा। आवाजें दूसरे कमरे से आ रही थीं। उसके बाद सन्नाटा छा गया। बाहर दूर तक अन्धकार के सिवाय कुछ नज़र नहीं आ रहा था । उसने सोचा विनीता आ गई। विनीता ही होगी ।

विनीता का ख्याल आते ही माथा तपने लगा । भोर का तारा निकलने से पहले ही वह विनीता का गला घोंटकर चल देगा । अब

उसके कन्धों पर एक ज़िम्मेदारी और आ गई थी । चन्द्र बेताल को साथ ले जाने की । न जाने क्यों अब वह चन्द्र बेताल को अपने से अलग नहीं करना चाहता था । चन्द्र के भीतर उसे अगिया बेताल का साया महसूस हो रहा था ।

वह विक्षिप्त होता जा रहा था ।

विनीता से उसने प्यार किया था

सिर्फ विनीता के लिये उसे नेक संसार त्यागना पड़ा था। जब वह नेकी के मार्ग पर चला, जब उसके मन में ईश्वर की भक्ति जागी तो उसे धोखा मिला। विनीता के लिये उसका प्यार एक कौड़ी का भी नहीं था । यह सिर्फ ढोंग था, दिखावा था, अथवा वह चरित्रवान नहीं थी, शायद कभी नहीं रही होगी ! अगर वह चरित्रवान होती तो!

तो जो कुछ उसने आज देखा वह देखने को नहीं मिलता ।

उसने विनीता को राजकन्या जैसे लिबास में देखा था। हीरे पन्ने और मोती उसके जिस्म पर जगमगाते देखे थे। रात की मादकता में वह आकाश की अप्सरा लगती थी। कितना रूप, कितना लावण्य, कितनी मादकता, कितना भोग रस, कितना उत्तेजक सौन्दर्य, उफ । विनीता उस वक्त जाने क्या लग रही थी ।

और वह इसी रूप में धीरे-धीरे थिरक रही थी । वह कैसा नृत्य था । इन्द्र का वह अखाड़ा और वहाँ मौजूद इन्सान... उफ क्या कुछ हो रहा था वहाँ सुरा थी और सेक्स की पूजा थी । सामूहिक मैथुन था । वे लोग जो मठ के विशेष मेहमान बनकर ठहरते थे। उनकी असलियत खुल कर सामने आ गई थी ।

चौरंगी बाबा ने अपने हाथों से महफिल की रौनक बढ़ाई थी और विनीता का एक-एक वस्त्र उतारा था । विनीता नाचती रही, तेज़ और

तेज़... वहाँ परियों के रूप में थिरक रही बाकी स्त्रियों के वस्त्र भी उड़ते जा रहे थे। कभी गुलाबी, कभी लाल तो कभी नीला रंगबिरंगा प्रकाश



रोहताश लैंप द्वार के पास पहुँचा । उसके हाथ में दो जुड़े रुमाल थे, बीच में गांठ पड़ रही थी । रुमाल को उसने अपने हाथ में लपेट रखा था

I

इस मठ का आधा रहस्य उसके सामने खुल चुका था उसे चौरंगी बाबा से नफरत हो चली थी। वह योगी पुरुष नहीं बल्कि ऊंची सोसायटी के लोगों के लिये वेश्याओं का दलाल था । वह एक पाखंडी था । एक पापी था, जो देवताओं की तरह से पूजा जाता था ।

रोहताश को वहाँ देख लिया गया था, शायद उन्होंने पहचान भी लिया होगा, फिर भी वह किसी तरह वहाँ से जान बचा कर भाग आया

| ज़मीन के अन्दर मन्दिर के ठीक नीचे बने उस ऐश्वर्य पूर्ण महल में पहरे की व्यवस्था शायद इसलिये नहीं समझी जाती थी, क्योंकि वहाँ कोई आता जाता नहीं था । बाबा की गुफाएं समझकर किसी को उसमें बिना आज्ञा के दाखिल होने का साहस नहीं था । यह गुफा मन्दिर वाली पहाड़ी के नीचे बनी थी । मठ के भू-भाग का एक सीधा रास्ता उन गुफाओं में ही पहुँचता था ।
 
रोहताश को वहाँ देख लिया गया था, शायद उन्होंने पहचान भी लिया होगा, फिर भी वह किसी तरह वहाँ से जान बचा कर भाग आया

| ज़मीन के अन्दर मन्दिर के ठीक नीचे बने उस ऐश्वर्य पूर्ण महल में पहरे की व्यवस्था शायद इसलिये नहीं समझी जाती थी, क्योंकि वहाँ कोई आता जाता नहीं था । बाबा की गुफाएं समझकर किसी को उसमें बिना आज्ञा के दाखिल होने का साहस नहीं था । यह गुफा मन्दिर वाली पहाड़ी के नीचे बनी थी । मठ के भू-भाग का एक सीधा रास्ता उन गुफाओं में ही पहुँचता था ।

आज रोहताश ने विलासता से भरे ऐश्वर्य पूर्ण उस भू-भाग का एक ही अंश देखा था ।

उसके सीने में एक अक्रांत ज्वाला दहक रही थी, और उसकी प्रचंड

लपर्ट अब किसी-न-किसी की राख की ढेरी में बदलने के लिये तत्पर थीं। वह क्रोधी स्वभाव का तो बचपन से ही था और उसके क्रोध ने सूरजगढ़ी के ठाकुर घराने का विनाश किया था ।

यह क्रोध जो सो गया था, आज एकाएक जाग गया और बिना सबक पढ़ाये, अपने क्रोध को शांत किये बिना वह इस स्थान को नहीं छोड़ना चाहता था । उसे महसूस हो रहा था कि ईश्वर पर अधिक भरोसा करके उसने गलती की। असल में ईश्वर कुछ है ही नहीं, इस दुनिया में जो है, वह शैतान है । शैतान ही यहाँ जी सकता है, शैतान ही यहाँ किस्मत वाला माना जाता है ।

उसने दरवाज़ा खटखटाया ।

कुछ क्षण बाद ही दरवाज़े पर आहट हुई ।

वह सावधान हो गया । दरवाज़ा पूरा खुल गया । भीतर अन्धेरा था । उसने आगे रोशनी फैलाते हुए अन्दर कदम रखा। उसने पूछने की आवश्यकता महसूस नहीं की। पर वह विनीता से दो बातें अवश्य कर लेना चाहता था । वह शायद दरवाज़ा खोलकर उसे देखते ही पीछे हट गई थी क्योंकि तत्काल वह द्वार पर नज़र आई थी।

उसने इत्मीनान से दरवाज़ा बन्द किया ।

फिर लैंप लेकर आगे बढ़ा ।

तभी वह चौंक पड़ा। कमरे में विनीता की जगह तवे की तरह काले शरीर का वहशी आदमी मौजूद था, जो चौरंगी बाबा की गुफा का एकमात्र सेवक था और बहुत कम बाहर निकलता था । लोग कहते थे कि वह गूंगा है, बहरा है। उसके बाद भी उसकी नज़रें बहुत तेज़ हैं । और वह उसी से सब काम ले लेता है ।

उसकी छोटी बारीक भौंहों वाली पीली आँखें रोहताश पर जमी थीं जिनमें ज़हर बुझा नज़र आता था। रोहताश के शरीर में ठंडी लहर दौड़ गई । वह कुछ बोला नहीं, बस चीते जैसी फुर्ती के साथ कूदकर रोहताश के सामने आ गया। पंजा रोहताश की गर्दन पर पड़ा, फिर उसने दूसरे हाथ से लैंप तोड़ दिया ।

भक्ष के साथ लपट उठी और फर्श पर नाचने लगी । उसपर एक कपड़ा जा गिरा उसके बाद रोहताश के कंठ से दर्दनाक सिसकारी निकली । वह चीख नहीं पाया शायद उसका मुंह बन्द हो गया था ।

उसके बाद वह काले दैत्य जैसे आदमी की बाँहों में झूलने लगा । आग लग चुकी थी और निरन्तर बढ़ती ही जा रही थी। यह आग तेज़ी के साथ दूसरे कमरे की ओर लपक रही थी। उस कमरे में जहाँ चन्द्र बेताल कुछ समय पहले सो रहा था ।

उस भयंकर आदमी ने रोहताश को दो-तीन झटकों में ही बेहोश कर दिया था । उसके बाद लाद कर ले गया। वह अन्धेरे मार्ग पर निश्चित भाव में बढ़ गया । गुफाओं में पहुँचकर वह पूर्वी भाग में एक चौकोर कमरे में पहुँचा । रोहताश को फर्श पर पटक कर वह बाहर निकल गया । दरवाज़ा बन्द करने के बाद उसने गैलरी पार की और चौरंगी बाबा के कक्ष में जा पहुँचा । द्वार पर खड़ी स्त्री प्रहरियों ने उसे भीतर जाने दिया । कुछ देर बाद वह चौरंगी बाबा की आज्ञा लेकर लोटा ।

रोहताश के लिये आज्ञा थी कि उसे मृत्यु कक्ष में भेज दिया जाये । ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,000

पूरा झोंपड़ा आग की लपटों से घिर चुका था। रोहताश परिवार के लिये यह सुबह मनहूस थी । वह खुद मौत के मुह में था और उसका धर्मपुत्र आग की लपटों में गुम हो चुका था । मठ में रहने वाले काफी देर में एकत्रित हुए। वे लोग आग बुझाने का प्रयत्न करने लगे । आग

। तभी बुझ पाई जब झोंपड़ी जलकर राख हो गई ।

एक नौजवान योगी पुरुष सबसे पहले झोंपड़े के मलबे को हटाने आगे बढ़ा, उसके पीछे अन्य लोग भी थे । मलबे के ढेर में उन्हें एक अजीब दृश्य दिखाई दिया। ऐसा दृश्य जिसपर कोई भी विश्वास नहीं

कर सकता था ।

सब कुछ जलकर राख हो जाने के की स्थिति के बावजूद भी एक बच्चा मलबे में चैन की नींद सो रहा था । उसका लिबास ज्यों-का-त्यों सुरक्षित था, उसके जिस्म पर जलने का कोई चिन्ह नहीं था । कहीं जख्म भी नज़र नहीं आ रहा था ।

युवक योगी पुरुष उसे स्तब्ध सा देखता रहा । पल दो पल कई पल न जाने कितनी देर अपलक वह उस बच्चे को निहारता रहा, जिसे वह अच्छी तरह जानता था । यह चन्द्र बेताल के सिवा कोई नहीं था ।

दुविधा की सी स्थिति में आकर उसने बच्चे के शरीर को छू कर देखा । शरीर में भरपूर गर्मी थी, नब्ज बराबर चल रही थी। उसकी साँस की धीमे खर्राटे ताल और लपके साफ सुनाई दे रही थीं ।

"होलिका जल गई, पर प्रह्लाद इसी तरह जीवित रहा ।" वह

बुदबुदाता रहा। बोला - "यह बच्चा अवश्य ही ईश्वर का फरिश्ता है । इसे कोई नहीं मिटा सकता। जो कुछ वेद पुराणों में लिखा है, वह आज मेरे सामने प्रत्यक्ष है, हे ईश्वर तू सर्व शक्तिमान है ।"

उसने बच्चे को उठा लिया ।

अन्य लोग भी वहाँ जमा हो गये थे ।

उन्हें जब इस घटना का पता चला तो । यह बात जंगल की आग की तरह फैल गई । इस बात को प्रसिद्धि मिलते देर नहीं लगी कि चन्द्र बेताल इन्सान नहीं बल्कि ईश्वर का भेजा फरिश्ता है ।

जब यह बात प्रसिद्ध हो ही गई थी तो चौरंगी बाबा ने इसे नया रूप देना ज़रूरी समझा । उक्त घटना बाबा के लिये जहाँ अत्यन्त लाभदायक थी, वहीं चिंता जनक भी थी । चिन्ता का कारण स्पष्ट था

जब कोई आदमी धर्मात्मा या योगी बनाकर पाप पथ पर अग्रसर हो जाता है तो उसके भीतर एक चोर भी होता है, जो उसे ऐसी किसी भी घटना के सुनते ही निर्बल बना सकता है । क्योंकि यह घटना यदि सही थी तो यह फरिश्ता आगे चलकर उसके लिये मुसीबतें भी खड़ी कर सकता था । उसके कुकर्मों का पर्दा उठा सकता था । गुफाओं में फैलाया इंद्रजाल हटा सकता था और अब तो वह इसी जंगल में हवाई पट्टी बनाने की अनुमति ले चुका था । दूर-दूर तक उसके शिष्य आश्रम चला रहे थे और वह भारत की आधी सम्पत्ति का मालिक बनने का सपना देख रहा था। छोटे-मोटे नेताओं की तो क्या बिसात देश का प्रधानमन्त्री तक उसके चंगुल में था । उसका जाल राजतंत्र की नस- नस में फैलता जा रहा था । वह देश-विदेश की सैकड़ों सुन्दरियों का स्वामी था । उसका संकेत पाते ही कहीं भी किसी की हत्या हो सकती थी। फिर भी उसने ऐसी व्यवस्था की हुई थी कि उसका भेद सदियों तक नहीं खुल सकता था । ऐसी जगह किसी फरिश्ते के उत्पन्न हो जाना अच्छा लक्षण नहीं था । और रोहताश ने उसे सारी कहानी बता ही दी थी । चन्द्र किसकी सन्तान है, वह भली प्रकार जानता था ।

उसने तुरन्त दो फ़ैसले किये ।

एक तो इस नामी फरिश्ते की हवा को और हवा दी जाए और उसका तत्काल लाभ उठाया जाये । इस तरह वह सारे देश का भगवान बन सकता था और लाखों रुपया खर्च करने के बावजूद भी जो पब्लिसिटी उसे नहीं मिल सकती थी, वह इस फरिश्ते के कारण प्राप्त हो सकती थी ।

दूसरे प्रसिद्ध का स्वार्थ सिद्ध होते ही फरिश्ते को दुनिया से अन्तर ध्यान कर दिया जाये और घोषित कर दिया जाये कि वह छोटी आयु में ही दुनिया भ्रमण पर निकल गया ताकि वह सारे संसार को अपना सन्देश दे सके। वह किसी भी भाग्यदान के घर प्रकट हो सकता है।

चौरंगी बाबा पाखंडी तो था ही परन्तु बिना चमत्कारी व्यक्तिगत के कोई पाखंड भी कैसे रच सकता है ? ऐसे चमत्कारों का उसके पास मन्दिर था और वह तन्त्र-मन्त्र भी जानता था । वह समाधि भी लगा सकता था और अंगारों पर भी सोता था। इस पाखंड को रचने से पहले वह बहुत बड़ा वेध था और उसने जड़ी बूटियों की खोज में ग्यारह वर्ष हिमालय पर बिताये थे । वहाँ उसे अनेक सिद्धियां भी प्राप्त हो गयीं थीं। वह सम्मोहन शक्ति का स्वामी भी था जिससे अनेक मानसिक रोग ठीक हो जाते थे ।

वह इस बात को तो अच्छी तरह समझ सकता था कि एक तांत्रिक के घर ईश्वर का फरिश्ता नहीं बल्कि प्रेतात्मा ही जन्म ले सकती है। और फिर वह तो बेताल पुत्र है । अगिया बेताल का तनिक भी साया यदि उसपर हुआ तो वह आग में कैसे जल सकता है ? आग तो अगिया बेताल का सबसे प्रसिद्ध खेल है । चन्द्र बेताल आग में जीवित कैसे रहा यह उसके लिये अधिक शोचनीय विषय नहीं था और इसी से यह साबित होता था कि ज्यों-ज्यों वह बड़ा होता जायेगा अनेक गुप्त शक्तियों का स्वामी बनता चला जायेगा । फिर उसको यह जानते क्या देर लगेगी कि इसके धर्म पिता की मौत कैसे हुई ? आखिर उसका धर्म पिता बाल सिद्धि प्राप्त कर चुका था । इसके अलावा भी उसे मठ के अन्य रहस्यों का पता भी चल सकता है, ऐसे साँप को पालना उसके लिये घातक ही सिद्ध हो सकता था ।

उसने अपने फैसले पर अंतिम निर्णय लिया और अपने सेक्रेट्री महामाया को बुलाया। योगी राज महामाया मठाधीश था, जो सारा कार्य भार देखता था । यह पचपन साल का चौड़े कन्धों वाला तारा चौकोर सा आदमी था, जिसके सर पर एक भी बाल नहीं रहता था । उसकी एक आँख में पीलापन पड़ा हुआ था जिससे उसकी आँखों का सामना कर पाना दुश्वार हो जाता था । उसकी मन्द मन्द चाल देखते ही बर्फ की सी ठण्ड का आभास होता था यूँ जैसे वह सिर्फ किसी खतरनाक घटना चक्र में रेंग रहा हो ।
 
महामाया अपने लंगोट के ऊपर ही 37 का रिवाल्वर सटा कर रखता था और आदतन उसका सेफ्टी केच हटा रहता था। रिवाल्वर ली मुठ पर बना हुक जनेऊ से जुड़ा रहता था। बस जनेऊ खींचने की देरी होती थी कि रिवाल्वर हाथ में और फिर शिकार ज़मीन पर ।

इसका प्रयोग वैसे तो महामाया ने केवल एक बार किया था, पर वह हमेशा सजग रहने वाला प्राणी था । उसके सर पर भारी ज़िम्मेदारियाँ थीं, जिन्हें वह महसूस करता था । वह चौरंगी बाबा का सबसे बड़ा रखवाला था। जिसके पास कातिलों की एक टोली भी थी। यह टोली

दूर दराज़ तक शिकार खेलती थी ।

एक बार बाबा ने किसी बात पर क्रोधित होकर किसी व्यक्ति को शाप दे दिया था कि उसका वंश नाश होकर रहेगा। वह कोई पत्रकार था जो चौरंगी बाबा के वन की खाल उतार रहा था। और परदे के पीछे चौरंगी बाबा को ब्लैकमेल करना चाहता था । चौरंगी बाबा ने क्रोधित होकर उसे शाप दे दिया था । अतः पत्रकार के वापस लौटने से पहले महामाया ने अपना चमत्कार कर दिखाया । पत्रकार को अपने घर में जाते ही चार लाशों का सामना करना पड़ा। बाद में वह पत्रकार पागल हो गया था। चौरंगी बाबा के योगाश्रमों की संख्या बढ़ती जा रही थी । प्रचार पर लाखों रुपया खर्च हो रहा था, इसके लिये पैसा कहाँ से आता था इसका कुछ पता नहीं था ।

चन्द्र बेताल के बारे में प्रचार शुरू होने के चंद रोज़ बाद ही लोग इस फरिश्ते के दर्शनों के लिये उमड़ पड़े, जो अग्निकुण्ड में रहता था, अग्निकुण्ड में सोता था, आग खाता था, आग पहनता था और आग में स्नान करता था ।

चौरंगी बाबा ने उसे एक गहरे कुंड में रख छोड़ा था, जिसमें आग जलती रहती थी, लोग आते, दर्शन करते । उस अग्नि की आंच में अपने बदन को सेंकते फिर फरिश्ते के नाम अपनी भेंट चढ़ाकर चले जाते ।

यह सब कुछ चालू था लेकिन इससे चन्द्र बेताल कतई खुश नहीं था । उसकी समझ में नहीं आता था कि वह किस घोर मुसीबत में फंस गया है । उसके लिये वह कुंड कैदखाना हो गया था। वह उससे बाहर नहीं निकल सकता था । उसका खाना पीना कुंड में छोड़ दिया जाता था । कभी-कभी उसे बाहर निकालकर स्नान करवाया जाता था ।

चन्द्र बेताल की बेचैनी दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी। वह इस स्थान से दूर निकल भागना चाहता था । उसके मन में एक कौतूहल जागता था, जो उसे अन्दर ही अन्दर आतंकित करता रहता था। कई बार उसने अपने माँ-बाप के बारे में पूछा परन्तु किसी ने कुछ नहीं बताया । आँखों में आँसू लिये वह उस कैदखाने में पड़ा रहता ।

इसी प्रकार दिन बीत रहे थे कि एक रात ।

आधी रात बीत चुकी थी ।

एक लबादा धारी मठ के पार्श्व भाग में प्रकट हुआ। वह दीवार के काले साये में आकर ठहर गया । और तीक्ष्ण नज़रों से सामने के भू- भाग का निरीक्षण करने लगा । मठ के मुख्य इमारत का फाटक बन्द हो गया था और सामने के बाग में घोर निस्तब्धता छाई थी । अशोक वृक्षों की कतारें अपने लम्बे सायों के साथ खामोश खड़ी थीं । उस पार झोंपड़े थे। यह झोंपड़े दूर-दूर तक फैले थे और बाहर से आने वाले लोग यहीं पर ठहरते थे। कुछ झोंपड़ों में मठ के स्थाई स्त्री-पुरुष रहते थे ।

मुख्य इमारत के एक भाग में महामाया का व्यक्तिगत स्टाफ रहता था । व्यायामशाला बाहर थी और स्त्री-पुरुषों के लिये अलग-अलग थीं। मुख्य इमारत में व्यवस्था का सारा सामान रहता था । इस इमारत के एक भाग में घुड़साल भी थे। बाहर की तरफ खुलने वाले दो दरवाज़े थे ।

साया इमारत का एक चक्कर लगाता हुआ मन्दिर मार्ग पर बढ़ गया । घने झुरमुटों के बीच से जाने वाला यह रास्ता मन्दिर की चौखट पर समाप्त होता था, उसके बीच में दो-चार छाट-माट रास्त भी कट थ जा विभिन्न दिशाओं में जाते थे ।

रास्ता सुनसान था । झींगुर अपने सूक्ष्म गलों से सीटियाँ बजा रहे थे । वह व्यक्ति सीधे रास्ते पर जाने के बजाये झुरमुटों के पीछे चला गया और एक लम्बा चक्कर काटता हुआ मन्दिर के उत्तर भाग में जा पहुँचा । मन्दिर के दक्षिण में गुफाएं थी, उत्तर की ओर जंगल पड़ता था जो किसी राक्षस की काली जटाओं की तरह बिखरा पड़ा था। पूरब में पार्श्व भाग था, जिसके नीचे तीखी नोंकदार चट्टानों का सिलसिला गहरी खाई तक चला गया था ।

मन्दिर के दक्षिण भाग में वह कुएं जैसा कुंड बनाया गया था । उस कुंड तक पहुँचने के लिये मन्दिर के भीतर से जाना आवश्यक था । वह उत्तर द्वार की तरफ था जिधर से किसी के आगमन की आशा नहीं की जा सकती थी । बन बिहार के समय यह द्वार खुलता था अन्यथा बन्द ही रहता था। वह उस तरफ से निर्भीक बढ़ता हुआ मन्दिर की चौड़ी चक्करदार सीढ़ियाँ चढ़ गया । मन्दिर के विशाल फाटक के पास जाकर उसने दीवार से सटकर एक सरसरी निगाह चारों तरफ डाली फिर आस्तीन उठाकर घड़ी में समय देखा। एक बज चुका था । घंटा बजने की जोरदार आवाज़ बुर्ज से उत्पन्न हुई और वह फाटक से सटकर खड़ा हो गया । कुछ क्षण बाद ही फाटक चरमराया और लबादे वाला फाटक में दरार होते ही उसमें समा गया ।

फाटक बन्द हो गया ।

अँधेरे में उसे किसी व्यक्ति की साँसें स्पष्ट सुनाई दीं

" जल्दी निकल जाओ। रास्ता खाली है ।" कोई फुसफुसाया ।

लबादे वाला अन्धकार में आगे बढ़ गया । उसने अपने सहयोगी से कोई वार्ता नहीं की । वह योजना बद्ध तरीके से आगे बढ़ता रहा था । अँधेरे रास्ते में एक रोशन बरामदा आया। उसने पंजों के बल भागकर उसे पार किया। फिर उसे सावधानी के साथ मूर्तियों के अजायब घर से गुज़रना पड़ा । जहाँ धुंधला सा लाल उजाला था । उस धुंधले प्रकाश के कारण मूर्तियाँ बड़ी रहस्यमयी लग रहीं थीं । उनके बीच से आड़े तिरछे होकर गुज़रते हुए वह एक बड़ी प्रतिमा के सामने पहुँचा, फिर उसने प्रतिमा की चौकी समेत वहाँ से हटाने का प्रयास जारी कर दिया । उसे अधिक समय इन्तज़ार नहीं करना पड़ा । नीचे खोखला स्थान नज़र आया जिस पर लोहे के सरिये सीढ़ियों के रूप में लगे थे ।

वह उन सीढ़ियों से नीचे उतरने लगा । अँधेरे में वह धीरे-धीरे नीचे उतर रहा था, फिर उसके पाँव फर्श पर पड़े और अँधेरे में अभ्यस्त हो चली आँखों के कारण उसने सहज ही अपनी दिशा का ज्ञान प्राप्त कर लिया। शीघ्र ही वह एक पतली सुरंग में चलता हुआ वह एक ऐसे द्वार पर जा पहुँचा जो स्टील की परतों से मढ़ा हुआ था। उसने दरवाज़े के हैंडल पर हाथ रखा ही था कि अचानक उसने अपने पीछे आहट महसूस की । वहाँ छिपने का कोई स्थान नहीं था ।

ज़मीन के अन्दर जनरेटर चलने का धीमा स्वर उत्पन्न हो रहा था इसलिये उन कदमों की आवाज़ काफी नजदीक आने पर ही उसे ज्ञात हो पाई, तभी सुरंग में रोशनी फैल गई, परन्तु वहाँ अब लबादे वाला नहीं था । एक लम्बा चौड़ा व्यक्ति, जिसकी कमर पर हन्टर लटक रहा था सुरंग में खड़ा उसी द्वार की तरफ देख रहा था, जिसके सामने कुछ क्षण पहले लबादे वाला खड़ा था । उसके नेत्रों में संदेह के भाव थे ।

वह लम्बे डग भरता हुआ लबादेवाले के पास पहुँचा । उसने हैडल पर हाथ रखा, फिर कुछ सोचकर वह दायीं ओर मुड़ गया । वह पीछे मुड़ा और दस कदम आगे चलकर दीवार पर लगे एक स्पाती बॉक्स का ढक्कन खोलने लगा । फिर उसने अन्दर एक प्लग लगाया और स्विच दबाकर बॉक्स बन्द कर दिया। अब वह इत्मीनान से सुरंग में अँधेरा कर दरवाज़े के पास नज़रें जमाये बैठ गया, उसकी निगाहें केवल द्वार पर जमी थीं ।

वह द्वार कुंड का मार्ग था । इस विशाल कुंड से पहले भी ऐसे कई चमत्कार दिखाए जा चुके थे। इस समय कुंड में धीरे-धीरे लपटें उठने लगीं थीं। यह आग तीव्रता के साथ भड़क रही थी परन्तु उस आग के भयानक रूप धारण करने से पहले लबादे वाला ऊपर कमंड फेंक कर रस्सी फसा चुका था और चन्द्र बेताल को पीठ पर बांधे उसपर चढ़ता जा रहा था । रस्सी जलने लगी, लपटें टांगें छूने लगीं पर लबादे वाला अपनी मंजिल के निकट था । वह सर्कस के खिलाड़ी की तरह तीव्रता

से ऊपर चढ़ गया ।

थोड़ी देर तक वह वहीं फर्श पर औंधे मुँह लेटा लपटों का दृश्य देखता रहा । उसे ज्ञात था कि अब एक-एक क्षण संकटपूर्ण है ।

लपटों के कारण वहाँ उजाला हो गया था । वह चारों ओर निगाह डालने के बाद तेज़ी से आगे बढ़ा। वह मन्दिर के दक्षिण रास्ते पर था, जिसके सामने कुंड के चारों ओर मैदान बिखरा हुआ था। उस मैदान को पार करते ही वह जैसे ही सीढ़ियों पर चढ़ा, मन्दिर का एक बुर्ज खुला, एक रोशनी चमकती हुई नीचे घूमने लगी और किसी ने कड़कदार स्वर में उसे रुक जाने का आदेश दिया । वह रुकने कि बजाये दक्षिण द्वार के पास दौड़ पड़ा ।

मुठभेड़ के सिवा कोई चारा नहीं रह गया था ।

वह द्वार के अँधेरे कोने से सटकर खड़ा हो गया । उसने अपने लबादे के भीतर से एक ग्यारह गोलियों वाली माउज़र निकाली और उसका सेफ्टी कैच हटा दिया । अचानक वह द्वार खुला और दो आदमी बाहर कूद पड़े। उनके हाथ में हथियार थे। एक बन्दूक लिये था, दूसरा भाला। उन्होंने दायें-बायें देखा, इस बीच लबादे वाला खुले द्वार में

समा गया ।

उन दोनों ने सावधानी से काम लिया था और लबादे वाले ने इस सावधानी का पूरा-पूरा फायदा उठाया । वह तो पहले से ही दरवाज़ा खुलने की प्रतीक्षा कर रहा था।

भीतर रोशनी थी परन्तु जब तक वह मुड़कर देखते लबादे वाला आड़ ले चुका था ।

दोनों कुछ क्षण तक चुपचाप एक जगह खड़े रहे, फिर दायें-बायें मुड़ गये ।

कुछ और आदमी भी गुफा की तरफ से आ रहे थे और सारा भू-भाग सर्च लाइट से नहाया हुआ था ।

वह धीरे-धीरे दीवार पर चिपकता हुआ आगे बढ़ रहा था। रोशनी उसके सामने कठिनाई पैदा कर रही थी, फिर उसने इसका भी इंतज़ाम कर दिया । वह रोशनी के स्रोत तक पहुँच ही गया और उसने माउज़र चला दिया । 'फट' की आवाज़ हुई और साथ ही अन्धकार छाया ।

उसकी यह प्रतिक्रिया खोजियों से छिपी न रह सकी ।

वे दरवाज़े की तरफ चिल्लाते हुए दौड़ पड़े ।
 
लबादे वाला आंधी-तूफान की तरह बीच के हिस्से में पहुँचा और उत्तर द्वार की तरफ लपक पड़ा। अब तक सारे मन्दिर में प्रकाश फैल गया था और खासी भगदड़ मची हुई थी, परन्तु वह अपने पथ पर अँधेरा फैलाते हुए उत्तर द्वार की तरफ बढ़ता ही चला गया । वह जानता था भीतर अधिक लोग नहीं रहते। तीनों पहरेदार होते हैं चौथा कुण्ड का जल्लाद है, जिसे इस प्रकार की भाग-दौड़ की आदत नहीं, एक पुजारी होगा, जिसे पश्चिम में पड़ने वाले पूजा कक्ष के अलावा किसी बात से सरोकार नहीं रहता । इनके अलावा सफाई करने वाला नौकर भी है, जो उसका सहयोगी पहले ही बन चुका है ।

उसे भीतर की सारी स्थिति का ज्ञान था। वहाँ अब भी एक ही आदमी उससे संघर्ष कर सकता था, परन्तु वह भी बुर्ज से रोशनी फेंकने में व्यस्त था । उसे नीचे उतरते देर लगेगी, और वह उतर भी गया तो... तो वह उसके सच्चे निशाने से बाहर नहीं होगा । परन्तु संयोग से वह मौत के लिये इतना फुर्तीला साबित नहीं हुआ। उससे पहले ही तमाम बाधाओं को पार करता हुआ वह उत्तर द्वार पर जा पहुँचा । द्वार पर उसका सहयोगी मौजूद था ।

द्वार खुला ।

वह तीर की तरह बाहर निकलता हुआ बोला - "अलविदा ।" उसके बाहर निकलते ही द्वार बन्द हो गया ।

I

बच्चे का हरण करने वाला मजबूत काठी वाला यह व्यक्ति निरन्तर जंगल भेदन करता रहा । मठ की तरफ वाले रास्ते पर जाने की मूर्खता वह नहीं कर सकता था और सवेरे से पहले वह खतरे की सीमा से बाहर निकल जाना चाहता था । जैसे-जैसे वह दूर होता चला जायेगा, चौरंगी बाबा की पकड़ ढीली होती चली जायेगी ।

तपोवन की सीमा से बाहर पहुँचने में उसे बड़ी भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा । सारी रात जंगल में मशालची घुड़सवार दनदनाते रहे । ये सब महामाया योगी का कातिल दस्ता था, जो जंगल का इंच- इंच छान लेना चाहता था। जैसे ही कोई घुड़सवार नज़र आता वह किसी-न-किसी वृक्ष पर चढ़कर छिप जाता । इस तरह वह भारी मुसीबत उठाता हुआ आगे बढ़ रहा था ।

यदि रात का अँधेरा न होता तो वह कभी का नज़रों में आ गया होता । सड़क अभी पांच मील दूर थी। एक बार उस इकलौती सड़क पर पहुँचने भर की देर थी फिर उसे पकड़ पाना कातिल दस्ते के लिये सपने जैसी बात हो जाती । रास्ता घंटे भर का था परन्तु कातिल दस्ते के कारण वह कई घंटों का हो गया था । वे लोग चारों दिशाओं में दौड़ रहे थे। वह उनका इरादा भी भांप चुका था ।

उनकी अधिकांश दौड़ और व्यूह रचना निकासी के मार्ग पर थी । वहाँ उन्होंने बड़ा सख्त जाल बिछा दिया था और इस समय उनकी व्यूह रचना से स्पष्ट आभास होता था कि वे उसे सुबह तक जंगल में ही छिपे रहने के लिये बाध्य कर देना चाहते हैं या रास्ता भटक जाने पर विवश कर देना चाहते हैं । इस वक्त शिकार को पकड़ने का उनका कोई इरादा नहीं था । किसी तरह सुबह होने तक इसी स्थिति में रखना चाहते थे । उसके बाद क्या शिकार बचकर निकल पायेगा ?

इस नाकाबंदी को उसने भी भांप लिया था, इसलिये व्यूह भेदने के लिये उसने पहाड़ी नदी का सहारा लिया, परन्तु इसके लिये उसे चन्द्र

बताल से खतरा पैदा हो सकता था। क्या वह ठण्डे जल में डूबे रहने पर विचलित न होगा ? रास्ते में उसने एक-दो बार उससे बातें की थीं। यह अभी नासमझ बच्चा था । बस एक ही बात अनुकूल साबित हो रही थी । वह निर्भीक बच्चा था । सारे रास्ते खामोश रहा । यह दौड़ उसे भली लग रही थी, एक बार उसने सहयोग भी दिया था और पीठ पर न चढ़कर उसके साथ पैदल भी चला था । इस निर्भीकता का कारण यह भी हो सकता था कि वह मन्दिर के पाखंड से आतंकित हो गया हो, जल्लाद के खौफनाक साये से मुक्ति पाना चाहता हो... सच बात यही थी कि वह यहाँ से भाग जाना चाहता था । चाहे किसी का सहारा क्यों न लेना पड़े । सहारा ईश्वर ने भेज ही दिया था ।

नदी मार्ग से बाहर निकलने पर दो मील का चक्कर पड़ जाता था, परन्तु इसके सिवा कोई चारा नहीं था। आगे के क्षेत्र में एक-एक कदम पर कातिल दस्ते की कड़ी नज़र थी । ?"

"मैं नदी के पानी में कूद रहा हूं।" उसने कहा- “तुम डरोगे तो नहीं

"मैं तो आग से नहीं डरता । पानी से क्या डरूंगा ?" वह अपनी महीन आवाज़ में बोला - "मुझे यहाँ से बाहर निकाल लो बाबा ।"

"ठीक है बेटे । कितना भी कष्ट क्यों न हो चिल्लाना नहीं ।"

चन्द्र बेताल से सहयोग मिलते ही वह जलधारा की तरफ मुड़ गया । दृढ़ निश्चय कर वह जल में उतर गया। सर का ज़रा सा भाग पानी से बाहर निकाले वह धारा में बहता रहा । ठीक निकासी के पास आते ही उसने पानी में गोता लगा लिया और धारा में तेजी के साथ बढ़ने लगा । कुछ क्षण में ही पीठ पर सवार चन्द्र बेताल बेचैनी से छटपटाने लगा । वह समझ गया था कि पानी उसके नाक-मुंह में घुस रहा है, पर वह इस बात को अच्छी तरह जानता था कि पानी में डूबे रहने पर भी बच्चा सही सलामत रहेगा ।

कुछ समय बाद वह साँस लेने ऊपर आ गया ।

आकाश पर तनी चाँदनी अब सुबह के उजाले में बदलने लगी थी । ओस के कारण ऊपर का पानी अत्यधिक ठण्डा हो गया था, उसका शरीर ठंड के कारण काँपने लगा था ।

इतनी देर में ही उसकी कुल्फी जम गई थी ।

धारा उसे अपने आप ही बहाये लिये जा रही थी ।

जब उसने खतरे की सीमा से बाहर महसूस किया तो वह तट की तरफ तैरने लगा । चन्द्र उसकी पीठ पर ही बेहोश हो गया था, पर इस बात की उसे अधिक परवाह नहीं थी । यूँ उसके कंधे बुरी तरह दुख रहे थे । शरीर काँप रहा था और जब वह बाहर निकला तो तत्काल आगे न बढ़ सका । उसने चन्द्र बेताल को पीठ से उतार कर लिटा दिया और स्वयं भी लेट गया ।

परचों की पिटारी भीग चुकी थी, परन्तु माउज़र सही सलामत थी, कारतूस प्लास्टिक के डब्बे में थे । अतः उसके भीगने की भी गुंजाइश नहीं थी ।

अभी खतरा टला नहीं था ।

यूँ वह जंगल के पहरेदारों से काफी दूर निकल आया था। भोर का उजाला तेज़ी के साथ फैलने लगा था । पक्षी चहल-पहल करने लगे थे और धीरे-धीरे जंगल जागता जा रहा था। उसने आधा घंटा उसी जगह

बिताया, तब तक चन्द्र को भी होश आ चुका था ।

"अगर हम दौड़ लगायें तो ठण्ड भाग जायेगी ।" उसने चन्द्र को समझाया ।

"मैं काफी तेज़ दौड़ लेता हूं ।" चन्द्र बोला ।

"तो हम दौड़ चले ?"

दोनों दौड़ने लगे। कुछ देर में ही ताज़ी हवा और शरीर की गर्मी ने उनमें नई स्फुर्ति भर दी । सारी थकान और कंपकंपी मिट गई। जिस वक्त सूरज का लाल गोला पूर्वोकाश पर उतरा वह सड़क के मुहाने पर पहुँच चुके थे । यहाँ झाड़ियों में एक पुरानी खटारा कार छिपी हुई थी ।

कार में पहुँचने के बाद उसने संतोष की साँस ली । "बाबा, क्या यह आपकी कार है ?"

"हाँ बेटा । मैं इसे यहीं छोड़ गया था ।" "आप कहाँ से आये हैं बाबा ?”

“धीरे-धीरे तुम्हें सब पता चल जायेगा बेटा । जब तुम बड़े होगे तो सब समझ जाओगे । इस वक्त तुम्हें जीवन देना आवश्यकता है । मैंने तुम्हें अपनी जान पर खेल कर प्राप्त किया है। इसलिये भी कि मेरी कोई संतान नहीं है। हम दोनों को कुछ-न-कुछ चाहिए इसलिये हम दोनों एक-दूसरे के पूर्वक साबित होंगे।"

चन्द्र का नासमझ मस्तिष्क उस उलझनपूर्ण बात को नहीं समझ

सका ।

कार सड़क पर दौड़ने लगी ।

चन्द्र बेहद प्रसन्न था ।

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