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- Dec 5, 2013
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उसने मुझे ही पुकारा था।
“तुम्हें एक नेक सलाह देना चाहूँगा।” वह बोला – “गढ़ी वालों से उलझ कर किसी ने सफलता प्राप्त नहीं की बल्कि खुद को मिटा दिया। मुझे पूरा विश्वास है की बात तुम्हारी समझ में आ गई होगी।”
जीप आगे बढ़ गई।
उसकी बातें नश्तर की तरह सीने में उतर गई। सूरजगढ़ी... गढ़ी का ठाकुर... उसने मेरी दुनिया बर्बाद कर दी है... और चन्द्रावती... उसने भी साथ नहीं दिया – क्या उसे मालूम नहीं की मैं अन्धा हो गया हूं। अवश्य मालूम होगा – तो उसने ऐसा बयान क्यों दिया....।”
“क्यों..?”
इस क्यों का जवाब मुझे नहीं मिल पा रहा था।
और ठाकुर प्रताप जिसकी मैंने शक्ल भी नहीं देखी, क्या वह इतनी बड़ी ताकत है कि जिसकी चाहे जिंदगी उजाड़ दे।
मेरे सीने में बगावत थी।
मैं इसका बदला लूंगा।
बदला...।
प्रतिशोध की आग सीने में धधकती जा रही थी।
अगर मुझे अपनी जान भी देनी पड़ी तो भी मैं उसे सबक पढ़ाऊँगा... मेरी जिंदगी की अब तो कोई कीमत रही ही नहीं है।
अनेक आशंकाओं के बादल दिमाग में घुमड़ रहे थे
।
आज फिर वैसा ही पानी बरस रहा है... वैसी ही तूफानी रात लगती है। मेरे लिए तो सारा संसार अँधेरे की दीवार है... पर आज तो अवश्य रात और भी भयानक काली होगी।
एक सवार आगे बढ़ रहा है।
वह सवार मैं ही तो हूं।
घोड़े की लगाम आज शम्भू ने थामी है... वह अच्छी काठी भी चला लेता है। मैंने उसे चिट्ठी डालकर गाँव से बुलाया है - क्योंकि वह मेरे भरोसे का आदमी है।
मुझे याद आया दो रोज पहले शम्भू मेरी हालत देख कर कितना रोया था, वह मेरे पिता का खैरख्वाह भी रह चुका था और मुझे साहब बहादुर कहता था।
वह मेरे लिए प्राणों की आहुति दे सकता था।
शम्भू मेरे हुक्म का पालन कर रहा था। बरसात तो इस क्षेत्र में अक्सर होती थी और आये दिन घटायें छाई रहती थी।
इस रात भी मूसलाधार पानी बरस रहा था।
और मैं दृढ संकल्प लिए आगे बढ़ रहा था।
बड़ी खामोशी से यात्रा जारी थी। कभी-कभी मैं उससे पूछ लेता की हम कहाँ तक आ पहुंचे हैं, तो वह संक्षिप्त सा जवाब दे देता।
मेरी यह यात्रा अत्यंत गोपनीय थी इसलिए रात का सफ़र तय किया था। जबकि मेरी समझ में अभी तक यह बात नहीं आई थी की मैं वहां जा कर क्या करूँगा।
बस इतनी ही बात तय समझी थी की मैं सर्वप्रथम चन्द्रावती से मिलूंगा जो मेरी नामचारे की मां है। मुझे उससे विश्वासघात का कारण पूछना था।
काफी देर बाद मैंने उससे पूछा।
“अब कितनी दूर है शम्भू ?”
“तुम्हें एक नेक सलाह देना चाहूँगा।” वह बोला – “गढ़ी वालों से उलझ कर किसी ने सफलता प्राप्त नहीं की बल्कि खुद को मिटा दिया। मुझे पूरा विश्वास है की बात तुम्हारी समझ में आ गई होगी।”
जीप आगे बढ़ गई।
उसकी बातें नश्तर की तरह सीने में उतर गई। सूरजगढ़ी... गढ़ी का ठाकुर... उसने मेरी दुनिया बर्बाद कर दी है... और चन्द्रावती... उसने भी साथ नहीं दिया – क्या उसे मालूम नहीं की मैं अन्धा हो गया हूं। अवश्य मालूम होगा – तो उसने ऐसा बयान क्यों दिया....।”
“क्यों..?”
इस क्यों का जवाब मुझे नहीं मिल पा रहा था।
और ठाकुर प्रताप जिसकी मैंने शक्ल भी नहीं देखी, क्या वह इतनी बड़ी ताकत है कि जिसकी चाहे जिंदगी उजाड़ दे।
मेरे सीने में बगावत थी।
मैं इसका बदला लूंगा।
बदला...।
प्रतिशोध की आग सीने में धधकती जा रही थी।
अगर मुझे अपनी जान भी देनी पड़ी तो भी मैं उसे सबक पढ़ाऊँगा... मेरी जिंदगी की अब तो कोई कीमत रही ही नहीं है।
अनेक आशंकाओं के बादल दिमाग में घुमड़ रहे थे
।
आज फिर वैसा ही पानी बरस रहा है... वैसी ही तूफानी रात लगती है। मेरे लिए तो सारा संसार अँधेरे की दीवार है... पर आज तो अवश्य रात और भी भयानक काली होगी।
एक सवार आगे बढ़ रहा है।
वह सवार मैं ही तो हूं।
घोड़े की लगाम आज शम्भू ने थामी है... वह अच्छी काठी भी चला लेता है। मैंने उसे चिट्ठी डालकर गाँव से बुलाया है - क्योंकि वह मेरे भरोसे का आदमी है।
मुझे याद आया दो रोज पहले शम्भू मेरी हालत देख कर कितना रोया था, वह मेरे पिता का खैरख्वाह भी रह चुका था और मुझे साहब बहादुर कहता था।
वह मेरे लिए प्राणों की आहुति दे सकता था।
शम्भू मेरे हुक्म का पालन कर रहा था। बरसात तो इस क्षेत्र में अक्सर होती थी और आये दिन घटायें छाई रहती थी।
इस रात भी मूसलाधार पानी बरस रहा था।
और मैं दृढ संकल्प लिए आगे बढ़ रहा था।
बड़ी खामोशी से यात्रा जारी थी। कभी-कभी मैं उससे पूछ लेता की हम कहाँ तक आ पहुंचे हैं, तो वह संक्षिप्त सा जवाब दे देता।
मेरी यह यात्रा अत्यंत गोपनीय थी इसलिए रात का सफ़र तय किया था। जबकि मेरी समझ में अभी तक यह बात नहीं आई थी की मैं वहां जा कर क्या करूँगा।
बस इतनी ही बात तय समझी थी की मैं सर्वप्रथम चन्द्रावती से मिलूंगा जो मेरी नामचारे की मां है। मुझे उससे विश्वासघात का कारण पूछना था।
काफी देर बाद मैंने उससे पूछा।
“अब कितनी दूर है शम्भू ?”