Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 128 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

भाग 173

सोनी के इस प्रोत्साहन और उस 'अनोखे उपहार' की लालसा ने सूरज के भीतर एक नई जान फूँक दी। वह पूरी लगन से पढ़ाई में जुट गया। उसे नहीं पता था कि वह उपहार कोई वस्तु नहीं, बल्कि स्वयं सोनी का वह समर्पण था जो उसकी मर्दानगी की असली परीक्षा लेने वाला था।

सूरज किताबों में डूब गया और सोनी दूर खड़ी उसे देखती रही, यह सोचते हुए कि जब परीक्षा के बाद वह 'उपहार' देने का वक्त आएगा, तो क्या वह खुद को संभाल पाएगी? मर्यादा और ममता की बलि देकर वह सूरज को नया जीवन देने के लिए अब बस सही समय का इंतज़ार कर रही थी।

अब आगे…

अगली सुबह जब सूरज ने चाय की मेज पर वह पोस्टर की फोटो अपने मोबाइल में दिखाया, तो सुगना के हाथ से कप छूटते-छूटते बचा और सोनी की चंचलता पत्थर जैसी खामोशी में बदल गई।

सुगना (कांपते स्वर में): "यह... यह तो मोनी है! मेरी छोटी बहन! पर यह साध्वी का भेष? ये वज्र-नंदिनी?"

सोनी (हैरानी से): "दीदी, २० साल बाद यह वापसी? पोस्टर पर लिखा है 'महा-अनुष्ठान की संरक्षिका'। यह कोई साधारण संयोग नहीं है।"

सूरज ने अपनी माँ और मौसी की व्याकुलता देखकर उन्हें संभाला। उसे अब समझ आ रहा था कि उसकी 'मोनी मौसी' ही वह रहस्यमयी साध्वी है।

विवशता और प्रतीक्षा

सुगना: "सूरज, मुझे अभी उसके पास ले चल! मेरी बहन इतने पास है और मैं यहाँ बैठी हूँ?"

सूरज: "माँ, अभी मुमकिन नहीं है। विद्यानंद जी और साध्वी जी बनारस महोत्सव में ही आएंगे । हमें तब तक इंतज़ार करना ही होगा।"

विद्यानंद की बात सुनकर सुगना एक बार फिर अतीत में खो गयी…

समय बीतता गया। कुछ दिनों बाद….

विश्वविद्यालय के परिणामों की सूची में सबसे ऊपर 'सूरज सिंह' का नाम किसी कोहिनूर की तरह चमक रहा था। यह खबर जैसे ही बनारस की उस भव्य हवेली की दहलीज़ तक पहुँची, पूरे माहौल में एक असीम ऊर्जा दौड़ गई। सुगना की आँखों से ममता और गर्व के आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। उसने हवेली के आँगन में स्थित मंदिर में एक-एक कर कई घी के दीये जलाए और हाथ जोड़कर अपनी संतानों के भाग्य की इस सुनहरी लकीर को सराहा।

सूरज जब हवेली पहुँचा, तो दृश्य किसी राज्याभिषेक से कम नहीं था। हवेली के मुख्य द्वार को ताजे गेंदे के फूलों और आम के पत्तों के बंदनवारों से बड़ी खूबसूरती से सजाया गया था। शाम ढलते ही हवेली के बड़े दालान में एक भव्य भोज का आयोजन हुआ, जिसमें घर के हर छोटे-बड़े सदस्य ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

जैसे ही सूरज ने हाल में कदम रखा, उसकी बड़ी बहनों—रीमा और मालती—ने हाथ में थाली लेकर उसकी आरती उतारी और बलैयाँ लीं। "मेरा भाई अब बड़ा डॉक्टर बन गया है! अब हमारे पूरे खानदान का नाम रोशन होगा," रीमा ने उसके माथे पर चंदन का तिलक लगाते हुए बड़े गर्व से कहा। मालती ने एक महीन रेशमी कुर्ता उसे भेंट किया, जिसे उसने खास तौर पर सूरज के लिए ही चुना था।

भाई राजू और राजा की खुशी का तो ठिकाना ही न था; उन्होंने सूरज को अपने कंधों पर उठा लिया। राजा ने जोश में चिल्लाकर कहा, "अब किसी को भी इलाज के लिए बाहर भटकने की ज़रूरत नहीं डॉक्टर हमारे पास है।" दोनों भाइयों ने मिलकर उसे एक कीमती कलाई घड़ी उपहार में दी।

छोटी बहन मधु तो अपने बड़े भाई के गले से ही लिपट गई। उसने अपनी छोटी सी सेविंग (बचत) को तोड़कर सूरज के लिए एक असली 'स्टेथोस्कोप' खरीदा था। "भैया, अब आप बिल्कुल असली वाले डॉक्टर लगोगे," उसने मासूमियत से कहा, जिसे सुनकर सबकी हँसी छूट गई।

सुगना मधु की मासूमियत को देख रही थी विधाता ने उसे किस संकट में डाल दिया था…

आगे घर के तीनों महारानियां एक साथ खड़ी थी। सुगना सूरज की मां, सुगना की सहेली और सोनू की पत्नी लाली और उसके पश्चात हम सब की वर्तमान में चहेती सोनी। सूरज ने सबसे पहले सुगना के चरण छुए.

सुगना तो जैसे निहाल हो गई थी, वह बार-बार सूरज का माथा चूमती और कहती, "आज मेरा जीवन सफल हो गया, मेरे लाल।"

लाली की भी कमोवेश यही प्रतिक्रिया रही.. सूरज था ही इतना प्यारा और अब तो वह सब की आंखों का तारा बन चुका था।

इसके पश्चात सूरज ने अपनी प्यारी सोनी मौसी के चरण छूने की कोशिश की पर सोनी ने उसे बीच में ही रोक लिया और उसे अपने आलिंगन में ले लिया सूरज और सोनी का यह आलिंगन निश्चित ही प्रेम का था पर सोनी और सूरज दोनों अपने-अपने हिस्से की कामुकता जीवंत कर रहे थे जब सोनी को यह एहसास हुआ तो उसने सूरज को अलग किया और उसके माथे पर चुमते हुए बोली..

1 मिनट रुक.. सोनी ने अपने गले में पड़ी हुई सोने की चैन उतारी और उसे सूरज के गले में पहनाते हुए बोली मेरे सोना के लिए यह सोना मेरी तरफ से…

सभी जानते थे की सोनी सूरज को बहुत प्यार करती है शायद इसलिए भी की भगवान ने उसे कोई संतान नहीं दी थी।

सभी सूरज और सोनी को लेकर भावुक हो गए।

इस जश्न के खास अवसर पर हवेली में दो और महत्वपूर्ण शख्सियतें मौजूद थीं। लाली के पति और सुगना का भाई सोनू, जो अब एक प्रभावशाली शासकीय अधिकारी बन चुके थे, और विकास, जो सोनी के पति और एक प्रतिष्ठित व्यवसायी थे।

सूरज ने पूरी विनम्रता से उन दोनों के पैर छुए। सोनू और विकास ने भी उसे बाहों में भरकर इस बड़ी उपलब्धि के लिए ढेरों बधाइयां दीं।

आज सुगना का पूरा भरा-पूरा परिवार एक ही छत के नीचे था। सुगना की माँ पदमा और उसकी सास कजरी—ये दोनों हवेली की सबसे बुजुर्ग और सम्मानित स्तंभ थीं। सफेद सूती साड़ियों और चांदी जैसे सफेद बालों में वे किसी तपस्विनी जैसी गरिमामयी और सुंदर लग रही थीं। बढ़ती उम्र के बावजूद ईश्वर ने उन्हें ऐसा तेज दिया था कि उनके चेहरों पर झुर्रियां नहीं, बल्कि अनुभव की चमक झलकती थी। सूरज ने अपनी नानी और दादी के पैर छुए, तो दोनों ने उसे दिल खोलकर भोजपुरी में आशीष दिया।

पदमा (सूरज की नानी) ने सूरज को दुलारते हुए अचानक एक ऐसा प्रस्ताव रख दिया जिसने माहौल में एक नई हलचल पैदा कर दी। उन्होंने सोनी की ओर इशारा करते हुए कहा:

पदमा: "अब सूरज बाबू डॉक्टर बन गइलें, तँ अब इनके खातिर कवनो सुघर, गुनवान लइकी देखे के चाहीं। हमार तँ आँख तरस गइल बा हवेली में नई पतोहू के आवे के राह देखत-देखत।"

सोनी, जो सूरज की उस अंदरूनी कमजोरी (मर्दाना समस्या) और उनके बीच हुए उस गुप्त 'उपचार' के राज़ को दिल में दबाए बैठी थी, एक पल के लिए हक्का-बक्का रह गई। उसे समझ नहीं आया कि वह क्या कहे। उसने बात को सँभालने की कोशिश करते हुए कहा:

सोनी: "अरे माई, अभी तँ बेचारा पढ़ के निकलल बा। थोड़ा ओकरा के अपने काम में जमे दँ, अभी बियाह के का जल्दी बा?"

तभी दादी कजरी ने पदमा का साथ देते हुए अपनी बात रखी:

कजरी: "काहे ना जल्दी बा सोनी? देखत नइखू, हमनी के उमर अब ढल रहल बा। सूरज डॉक्टर बन गइल, ई तँ भगवान के बहुते बड़ किरपा ह। अब एकर बियाह हमनी के अपने सोझा देख लेब, तँ हमनी के परान शांति से निकल जाई।"

सोनी ने घबराहट में फिर से बात घुमानी चाही, पर तभी सोनू (सूरज के मामा) ने मुस्कुराते हुए हस्तक्षेप किया:

सोनू सुगना की तरफ देखते हुए बोला "दीदी, माई और काकी सही कहत बाड़ी। सूरज अब अपने पैर पर खड़ा बा। रँउआ लोग फिकिर ना करीं, हम और विकास भाई मिलके कवनो बहुते नीक खानदान के लइकी खोजब। बस थोड़ा समय दीं।"

विकास ने भी सोनू की हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा:

विकास: "एकदम सही बात बा। सूरज खातिर लइकी तँ हमनी के अइसन खोजब कि पूरा बनारस देखत रह जाई। बस थोड़ा नीक घड़ी और मौका देखल जाई।"

सुगना इस पूरे संवाद के दौरान बस चुपचाप मुस्कुरा रही थी। उसकी आँखों में एक अजीब सा संतोष था। उसे अपने बेटे की कामयाबी और परिवार के इस अटूट प्यार को देखकर मन ही मन बड़ी खुशी हो रही थी। वह जानती थी कि उसके परिवार के ये बड़े बुजुर्ग और मुखिया जो भी निर्णय लेंगे, वह सूरज के हित में ही होगा।

हवेली का माहौल अब पूरी तरह से हंसी-ठिठोली और भविष्य की योजनाओं में रंग चुका था। सूरज अपनी नानी और दादी के उन भोजपुरी आशीर्वादों के बीच बैठा मुस्कुरा तो रहा था, पर उसकी नज़रें रह-रहकर सोनी मौसी से टकरा रही थीं, जैसे वह उनसे पूछ रहा हो कि आगे क्या होगा …उसे उसका उपहार कब मिलेगा।

हवेली के हाल में उत्सव की वह हल्की गूँज अभी भी बाकी थी, पर रात गहराने के साथ-साथ शोर सन्नाटे में बदल चुका था। सोनू और विकास अपने पुराने दोस्तों के साथ बाहर गप्पे मार रहे थे। सूरज के मन में एक अजीब सी हलचल थी—सफलता का गौरव तो था, पर उसके भीतर का वह 'अँधेरा' उसे रह-रहकर कचोट रहा था। वह दबे पाँव सोनी मौसी के कमरे की ओर बढ़ा।

कमरे का दरवाज़ा थोड़ा खुला था। भीतर मद्धम पीली रोशनी में सोनी आईने के सामने खड़ी थी। वह अपनी भारी सिल्क की साड़ी के पल्लू को सँभालते हुए अपने कान की सोने की बाली उतारकर मेज पर रख रही थी। उस क्रिया में जब उसने अपना हाथ उठाया, तो उसकी साड़ी का पल्लू कंधे से थोड़ा और सरक गया। आईने के अक्स में उसकी मादक कमर और खुले हुए पेट की गोलाई चमक रही थी। सूरज किवाड़ से टिका उसे ललचाई नज़रों से निहारता रहा।

सोनी ने आईने में सूरज को देखा और धीरे से मुस्कुराते हुए पलटी।

सोनी (कोमल आवाज़ में): "सूरज? इतनी रात को यहाँ? सोए नहीं अब तक?"

सूरज धीरे-धीरे कमरे के भीतर आया। उसकी नज़रें सोनी के गले में चमकती उस जगह पर टिक गईं जहाँ से उसने कुछ देर पहले अपनी चेन उतारी थी। उसने अपनी गर्दन झुकाई और अपने गले में पड़ी उस सुनहरी चेन को छुआ, जो सोनी ने आज शाम सबके सामने उसे पहनाई थी।

सूरज (धीमी आवाज़ में): "मौसी... आज शाम सबके सामने आपने जब अपने हाथों से यह सोने की चेन मेरे गले में डाली, तो मुझे लगा कि मैं दुनिया का सबसे भाग्यशाली इंसान हूँ। पर सच कहूँ मौसी, मुझे ऐसे महंगे और बाहरी उपहारों की कोई आवश्यकता नहीं है।"

सोनी ने गौर से सूरज की आँखों में देखा। सूरज थोड़ा और करीब आया, उसकी आवाज़ में एक दर्द था।

सूरज: "यह चेन, यह सफलता, सब अधूरा है मौसी। मुझे आपकी ज़रूरत है आप ही मेरी इस सबसे बड़ी कमी से मुक्ति दिला सकती है। मुझे फिर से एक संपूर्ण पुरुष बनने में मदद कीजिए मौसी। यही मेरे लिए सबसे बड़ा उपहार होगा।"

सूरज की यह माँग सुनते ही सोनी का चेहरा गंभीर हो गया। उसने तुरंत इस माँग को स्वीकार नहीं किया।

सोनी (कठोर स्वर में): "सूरज! तू जानता है तू क्या कह रहा है? मर्यादा और रिश्तों की एक अपनी दीवार होती है। मैं तेरी मौसी हूँ। समाज और संस्कार हमें इसकी इज़ाजत नहीं देते। ऐसी बातें सोचना भी पाप है।"

सूरज: "मौसी, आप मेरी सिर्फ मौसी ही नहीं, मेरी सबसे अच्छी दोस्त भी हैं। यदि आप मेरी पीड़ा नहीं समझेंगी, तो कौन समझेगा? मैं घुट-घुट कर जी रहा हूँ।"

सूरज बार-बार मिन्नतें करता रहा, पर सोनी के मन में हिचकिचाहट और रिश्तों की दुहाई बनी रही। अंत में, सूरज ने अपना 'अंतिम अस्त्र' इस्तेमाल किया। वह अपने घुटनों पर बैठ गया और दोनों हाथ जोड़कर भावुकता से बोला।

सूरज: "मौसी, आपने वादा किया था कि कॉलेज टॉप करने पर आप मुझे मनचाहा उपहार देंगी। आज मैं अपना वह उपहार माँग रहा हूँ। मुझे और कुछ नहीं चाहिए, बस मेरी इस कमी को दूर करने में मेरी मदद कीजिए।

सोनी निस्तब्ध होकर उसे देख रही थी

क्या आप अपना वादा तोड़ देंगी?"

सोनी ने सूरज के चेहरे पर छाई उस हताशा को देखा जिसने उसके आत्मविश्वास को राख कर दिया था। उसने तय कर लिया कि अब मर्यादा की बेड़ियाँ काटने का समय आ गया है।

सूरज की तड़प और उसकी बेबसी देख सोनी का दिल पिघल गया। उसने अपनी गर्दन नीची की, आँखें बंद कर अपने ईश्वर को याद किया और मन ही मन एक कठिन निर्णय लिया। उसने अपनी उँगलियाँ सूरज के माथे पर फेरीं और उसे उठने का संकेत दिया।

सोनी (धीमी आवाज़ में): "ठीक है सूरज... यदि विधाता को यही मंजूर है, तो मैं ज़रूर प्रयास करूँगी। पर अभी नहीं।"

सूरज की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। अभी यह संवाद खत्म ही हुआ था कि अचानक दरवाज़ा खुला और सोनी का पति विकास कमरे में दाखिल हुआ। सूरज की आँखों में आँसू देख वह ठिठक गया।

विकास: "अरे डॉक्टर साहब! क्या हुआ? आज इतनी बड़ी जीत का दिन है और आपकी आँखें क्यों नम हैं?"

सूरज ने तुरंत खुद को सँभाला और मुस्कुराते हुए बोला।

सूरज: "अंकल, यह खुशी के आँसू हैं। मेरी यह सफलता मौसी की वजह से ही है। इन्होंने हर वक्त और हर तरीके से मेरी मदद की है। इनके प्रोत्साहन के बिना मैं यहाँ तक नहीं पहुँच पाता।"

सोनी ने स्थिति को सँभालते हुए प्यार से सूरज को झिड़का।

सोनी (मुस्कुराते हुए): "चल-चल, अब ज्यादा मस्का मत लगा। बहुत रात हो गई है, अब जाकर सो जा।"

विकास सूरज और सोनी के इस स्नेह को देखकर बहुत खुश हुआ। उसने सूरज के कंधे पर हाथ रखा।

विकास: "वाकई सूरज, सोनी तुम्हारी बहुत फिक्र करती है। मुझे तुम पर गर्व है। अब तुम बड़े डॉक्टर हो, आने वाले समय में तुम्हें पूरे परिवार का ख्याल रखना है।"

सूरज ने विकास से आशीर्वाद लिया और खुशी-खुशी अपने कमरे की ओर लौट गया। उसके कदम अब हल्के थे, क्योंकि उसे उस दिन का इंतज़ार था जब सोनी उसे वह 'अनोखा उपहार' देने वाली थी।

उस रात में जहाँ एक ओर उत्सव की थकान थी, वहीं दूसरी ओर भावनाओं का एक गहरा ज्वार उमड़ रहा था। सूरज के कमरे से बाहर निकलते ही सोनी ने एक गहरी साँस ली। उसका मन अभी भी उस वादे के बोझ और आने वाले कल की अनिश्चितता के बीच झूल रहा था।

सोनी ने धीरे से अपने कमरे का दरवाज़ा बंद किया और आईने के सामने खड़ी होकर अपनी भारी सिल्क की साड़ी की पिने खोलने लगी। वह अपनी नाइट ड्रेस निकालने ही वाली थी कि तभी पीछे से दो मजबूत बाँहों ने उसे अपनी गिरफ्त में ले लिया। यह विकास था। कई दिनों तक व्यापार के सिलसिले में बाहर रहने के बाद, वह अपनी पत्नी की मादकता और उसकी देह की खुशबू के लिए प्यासा था।

विकास ने सोनी के गले पर अपनी पकड़ मजबूत की और उसके कंधे पर मद्धम चुंबन अंकित किया। सोनी एक पल के लिए ठिठकी। उसके दिमाग में अभी भी सूरज की बेबसी और उसकी 'अनोखी माँग' घूम रही थी।

सोनी (धीमी आवाज़ में): "विकास... अभी नहीं। घर में इतने मेहमान हैं, सब थके हुए हैं। थोड़ा रुक जाइए।"

पर विकास आज सुनने के मूड में नहीं था। उसने सोनी की गर्दन के पास फुसफुसाते हुए कहा, "इतने दिनों बाद घर आया हूँ सोनी, और आज तुम्हारी यह सुंदरता... यह सिल्क की साड़ी और तुम्हारा यह रूप मुझे पागल कर रहा है।"

विकास ने बड़े प्यार से सोनी को घुमाया और उसे अपनी बाहों में उठाकर बिस्तर की ओर ले गया। सोनी ने विरोध करने की कोशिश तो की, पर एक पत्नी होने के नाते वह अपने पति की इच्छा को टाल न सकी। उसने खुद को विकास के हवाले कर दिया, लेकिन उसका मन कहीं और भटकने लगा था।

जैसे ही विकास ने सोनी की देह से वस्त्रों का बोझ कम करना शुरू किया, सोनी की आँखों के सामने वह दृश्य तैरने लगा जो कुछ देर पहले घटित हुआ था। सूरज के वे कांपते हाथ, उसकी वह बेबसी और उसका वह वादा। विकास जब सोनी के बदन को सहला रहा था, तब सोनी के जहन में एक अद्भुत द्वंद्व चल रहा था।

वह सोचने लगी—जब वह दिन आएगा, जब सूरज मेरे सामने होगा, तब दृश्य कैसा होगा? क्या सूरज का वह पौरुष, जो रोजी के सामने हार मान गया था, मेरी मादकता के सामने चट्टान की तरह खड़ा रह पाएगा? क्या उसका वह अद्भुत लिंग मेरी देह की गर्मी पाकर अपनी कठोरता बनाए रखेगा?

सोनी इन कामुक कल्पनाओं के भँवर में डूबती चली गई। उसे अहसास भी नहीं हुआ कि विकास मैं उसे कब पूरी तरह नग्न कर दिया है। उसे इसका एहसास तब हुआ जब उसने विकास के होठों की गर्मी को अपनी प्यासी बुर पर। महसूस किया।

सोने की बुर पूरी तरह गीली हो चुकी थी विकास के होठों पर उसका काम रस लग चुका था।

विकास (हैरान होकर): "मेरी रानी... लगता है तुम भी मेरा उतनी ही शिद्दत से इंतज़ार कर रही थीं। इतनी गर्मी, इतनी चिकनाहट!"

सोनी ने कोई जवाब नहीं दिया, बस अपनी आँखें मूँद लीं। उसने विकास को अपने आगोश में लेने के लिए अपनी गोरी बाहें खोल दी..

सोनी क्या कहती विकास जो उसकी योनि के अधरों से चूम रहा था वह रस सूरज के लिए उत्सर्जित हुआ था पर उसका स्वाद विकास को मिल रहा था।। विकास संभोग की मुद्रा में आ गया।

विकास ने जैसे ही सोनी की योनि के द्वार पर अपना लिंग टिकाया, उसका सुपड़ा बिना किसी प्रतिरोध के अंदर आ गया। सोनी की योनि पूरी तरह नम और चिकनी हो चुकी थी। विकास को लगा कि यह उसकी अपनी उपस्थिति का जादू है, पर हकीकत में सोनी अपनी कल्पनाओं में सूरज के लिंग के स्पर्श को महसूस कर रही थी।

विकास ने एक जोरदार धक्के के साथ उसके भीतर प्रवेश किया। विकास का लिंग अपना काम कर रहा था, लेकिन सोनी की कल्पनाओं में वह 'सूरज का लिंग' था जो उसकी गहराइयों को नाप रहा था। उसे लगा जैसे सूरज की वह दबी हुई ऊर्जा उसके भीतर फूट रही है।

सोनी के मन में एक प्रार्थना सी गूँजी, "हे विधाता! मेरी रक्षा करना, यह मैं क्या सोच रही हूँ?" पर उसकी देह उसकी सोच के वश में नहीं थी। कल्पनाओं के उस तीव्र वेग ने सोनी की कामुकता को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया। विकास की हर हरकत उसे उस 'आने वाले प्रयोग' की तैयारी लगने लगी।

जैसे-जैसे विकास की गति बढ़ी, सोनी का शरीर धनुष की तरह अकड़ने लगा। उसकी जाघें काँपने लगीं और उसने विकास की पीठ को अपने नाखूनों से जकड़ लिया। कल्पना और यथार्थ के उस अनोखे मेल ने सोनी को एक ऐसा चरम सुख (Orgasm) प्रदान किया, जो उसे महीनों से नहीं मिला था। उसकी पूरी देह शिथिल हो गई।

उधर विकास ने भी एक लंबी कराह के साथ अपना सारा वीर्यपात सोनी की गहराइयों में कर दिया। दोनों हाँफते हुए एक-दूसरे से लिपटे रहे। विकास को अपनी पत्नी की इस सक्रियता पर गर्व हो रहा था।

कुछ देर बाद विकास गहरी नींद में सो गया, लेकिन सोनी की आँखों में एक मद्धम चमक थी। सोनी सूरज के उसे अनोखे उपहार के बारे में सोचने लगी।

एक तरफ उसकी मर्यादा थी, वह पवित्र रिश्ता जो उसे सूरज की 'मौसी' बनाता था। समाज की नज़र में वह पूजनीय थी, रक्षक थी। दूसरी तरफ उसकी अंतरात्मा चीख-चीख कर कह रही थी कि यदि सूरज को इस नर्क से कोई निकाल सकता है, तो वह केवल वही है।

"क्या मुझे सूरज के साथ वह सब करना होगा, जो रोजी नहीं कर पाई? क्या मुझे अपनी मर्यादा की लक्ष्मण रेखा लांघकर उसके पौरुष की अग्नि को अपनी देह से सुलगाना होगा?"

यह विचार आते ही सोनी के शरीर में एक सिहरन दौड़ जाती। उसे डर था कि कहीं यह उसका 'बलिदान' नहीं, बल्कि उसके भीतर दबी हुई वासना का खेल तो नहीं? वह खुद से पूछती—क्या वह वास्तव में सूरज को ठीक करना चाहती है, या वह उस 'वज्र' जैसे अंग की शक्ति से आकर्षित हो रही है जिसे उसने अपनी आँखों से देखा और हाथों से महसूस किया था?

सोनी के ज़हन में सूरज के उस अंग की छवि बार-बार कौंधती। वह मजबूती, वह नस-नस में दौड़ती गर्मी, और फिर अचानक उसका निढाल हो जाना। सोनी को महसूस हो रहा था कि वह जाने-अनजाने सूरज के प्रति आसक्त होती जा रही है। एक औरत होने के नाते, उस 'प्रतापी पौरुष' ने उसके भीतर की सोई हुई कामनाओं को जगा दिया था।

लेकिन जैसे ही वासना का ज्वार उठता, उसकी नैतिकता उसे झिड़क देती: "सोनी! वह तेरा भांजा है। तू उसकी ढाल है, उसकी कामुकता का केंद्र नहीं। क्या तू अपनी भग्नासा (clitoris) से उसका स्पर्श करके उसे ठीक करेगी या खुद को उस पाप की आग में झोंक देगी?"

सोनी बिस्तर पर करवटें बदलने लगी। उसके मन की गूँज उसे चैन नहीं लेने दे रही थी:

"पर क्या एक मौसी का अपने भांजे के सामने नग्न होना और उसकी इंद्रिय को अपनी देह से सहलाना धर्म के विरुद्ध नहीं होगा? "

"अगर मेरा यह कदम उसे एक संपूर्ण मर्द बना सकता है, तो क्या यह पाप है या पुण्य? अगर वह ठीक नहीं हुआ, तो उसकी पूरी ज़िंदगी बर्बाद हो जाएगी। क्या एक मौसी अपने बच्चे को तिल-तिल मरते देख सकती है?"

क्या होगा अगर वह सूरज को एक 'प्रयोग' की तरह ले? क्या वह अपनी देह को एक 'औषधि' की तरह इस्तेमाल कर सकती है? उसका मन उसे मजबूर कर रहा था कि वह आगे बढ़कर सूरज की इस गुत्थी को सुलझाए।

उसे रह-रहकर याद आता कि कैसे सूरज उसके कंधे पर सिर रखकर रोया था। उसकी वह बेबसी सोनी के दिल को चीर देती थी। वह खुद से कहती, "सूरज का वह आंसू मेरी छाती पर गिरा था, वह केवल संवेदनाओं का पानी नहीं था, वह एक पुकार थी। वह मुझसे मदद मांग रहा है, जिसे वह शब्दों में कह नहीं सकता।"

सोनी ने ठंडी सांस ली। उसके भीतर की कामुकता अब ममता और कर्तव्य के साथ एकाकार हो रही थी। उसे लग रहा था कि मर्यादा की पवित्रता अपनी जगह है, लेकिन एक डूबते हुए इंसान को बचाने के लिए अगर किनारा छोड़ना पड़े, तो वह पीछे नहीं हटेगी।

"मुझे उसे महसूस करना होगा। मुझे यह देखना होगा कि जब वह मेरे करीब आता है, तो उसकी धड़कनें क्या कहती हैं। क्या मेरी भग्नासा का स्पर्श उसे वो स्थिरता दे पाएगा जो उसे एक विजेता बनाए?"

सोनी का चेहरा लाल हो गया। उत्तेजना और ग्लानि के बीच झूलती हुई वह अंततः एक निर्णय पर पहुँच रही थी। वह जानती थी कि यह रास्ता काँटों भरा है, पर सूरज की खातिर वह अपनी 'पवित्रता' की बलि देने को भी तैयार होने लगी थी।

उसने चाँदनी को खिड़की से आते देखा और मन ही मन मुस्कुराई। उसकी कल्पनाओं ने उसे डराया भी था और एक नया विश्वास भी दिया था। उसे अब लगने लगा था कि वह सूरज को उस 'अनोखे उपहार' के ज़रिए एक नया जीवन देने में ज़रूर सफल होगी।

इसी संतुष्टि और कामुक रोमांच के साथ, सोनी भी एक गहरी और सपनों भरी नींद की आगोश में चली गई…

पर सूरज जाग रहा था…

शेष अगले भाग में
 
स्वागत है ...साथ बनाए रखिए...
 
अच्छा लगा आप मजा ले रहे है....जुड़े रहिए
 
Sab saath me rahenge

कुछ वादों में

कुछ यादों में

कुछ राहों में

कुछ बाहो में ...
 
देखते हैं सूरजऔर सोने का मिलन होता है या नहीं और यदि होता भी है तो कैसे?
 
सूरज इनाम का तो हकदार है ही...
 
Nice pic..you will get this pose in story somewhere.

I like it
 
Please remo

Pl do not mind but I request Please remove this photo...does not looks good..

Dear readers please donot post ugly pics...Post only erotic photos..
 
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