Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 129 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

भाग 174

सोनी का चेहरा लाल हो गया। उत्तेजना और ग्लानि के बीच झूलती हुई वह अंततः एक निर्णय पर पहुँच रही थी। वह जानती थी कि यह रास्ता काँटों भरा है, पर सूरज की खातिर वह अपनी 'पवित्रता' की बलि देने को भी तैयार होने लगी थी।

उसने चाँदनी को खिड़की से आते देखा और मन ही मन मुस्कुराई। उसकी कल्पनाओं ने उसे डराया भी था और एक नया विश्वास भी दिया था। उसे अब लगने लगा था कि वह सूरज को उस 'अनोखे उपहार' के ज़रिए एक नया जीवन देने में ज़रूर सफल होगी।

इसी संतुष्टि और कामुक रोमांच के साथ, सोनी भी एक गहरी और सपनों भरी नींद की आगोश में चली गई…



पर सूरज जाग रहा था…

अब आगे

अपने कमरे में सूरज बिस्तर पर लेटा हुआ था, लेकिन नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी। बाहर सन्नाटा पसर चुका था, पर उसके भीतर ख्यालों का एक तूफ़ान उठा हुआ था। कमरे की खिड़की से छनकर आती चाँदनी सीधे उसके बिस्तर पर गिर रही थी, जो उसे बार-बार उस 'तोहफे' की याद दिला रही थी जिसका वादा सोनी मौसी ने उससे किया था।

अब उसके ज़हन में रोजी की छवि नहीं, बल्कि सोनी मौसी का वह गदराया हुआ बदन था।

सूरज के मन में रोजी और सोनी मौसी की तुलना एक कोमल कली और एक पूर्ण विकसित पुष्प के द्वंद्व जैसी थी:

एक तरफ रोजी थी—पवित्रता और मासूमियत का प्रतीक। उसका यौवन अभी सुबह की पहली किरण जैसा कच्चा और अल्हड़ था। उसकी देह में एक कसी हुई लचक थी, जैसे कोई नई खिलती कली, जो अभी स्पर्श से अनजान है। उसकी सुंदरता में एक शीतल सुकून था, जो मन को बाँधता था।

दूसरी तरफ सोनी मौसी थीं—यौवन के ढलते पड़ाव पर भी एक मादक और गदराया हुआ बदन। उनका शरीर किसी पके हुए रसीले फल की तरह था, जिसमें अनुभव की मिठास और नारीत्व की पूर्णता भरी थी। जहाँ रोजी में 'कसावट' थी, वहीं सोनी में 'भराव' और 'विस्तार' था। उनकी गेहुँआ रंगत और भारी अंगों का उभार सूरज की कल्पनाओं में एक दहकती आग की तरह था, जो मर्यादा की हर दीवार को पिघलाने की शक्ति रखता था।

सूरज के लिए रोजी एक 'शीतल जल' थी जिससे प्यास बुझती, पर सोनी मौसी वह 'नशीली मदिरा' थीं जिसका एक घूँट ही उसे मदहोश कर देने के लिए काफी था।

सूरज सोनी में स्त्री के तीनों रूप देख रहा था और वह उनसे हर बार सुख चाह रहा था जो स्त्री एक पुरुष को दे सकती है…

वात्सल्य जो बचपन से अब तक उसे देती आई थी और बीच-बीच में देती रहती थी..

एक सखा का.. सोनी सूरज की दोस्त भी थी और हमराज भी एक बहन के रूप में वह हमेशा एक दोस्त के जैसे उसका साथ देती थी..

और अब सोनी का वह तीसरा रूप जो स्त्री और पुरुष के मिलन को पूर्णता प्रदान करता है..

सोनी का यह रूप निराला था …

सूरज के हाथों में अब एक,

पुरानी शराब का प्याला था..

उसने अपनी आँखें मूँद लीं और कल्पना की उस जादुई दुनिया में उतर गया जहाँ मर्यादा की दीवारें ढह चुकी थीं। सूरज की कल्पना में, कमरे की मद्धम रोशनी के बीच सोनी मौसी खड़ी थीं। उन्होंने लगभग वैसा ही झीना कुर्ता पहन रखा था जैसा सूरज ने रोजी के लिए पसंद किया था। वह सफ़ेद बारीक कपड़ा उनकी गेहुँआ रंगत और शरीर के उभारों के साथ जैसे न्याय करने की कोशिश कर रहा था। कुर्ते का गला थोड़ा गहरा था, जिससे सोनी की सुराहीदार गर्दन और हँसली की हड्डियों के नीचे का उभार साफ़ झलक रहा था।

जैसे ही सोनी ने एक कदम आगे बढ़ाया, कुर्ते के पतले कपड़े के नीचे उनके भारी और सुडौल वक्षों की थरथराहट ने सूरज की कल्पना को झकझोर दिया। वे उरोज किसी अनुभवी नारी की परिपक्वता और एक युवती की कसावट का अद्भुत मिश्रण लग रहे थे। पारभासी कपड़े को भेदते हुए उनके गाढ़े गुलाबी रंग के निप्पल अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे थे। सूरज ने सोचा कि शायद माँ न बनने के कारण ही उनका यह रूप आज भी इतना नैसर्गिक और अछूता बना हुआ है। वे गुलाबी बिंदु उस सफ़ेद कपड़े को एक सहारा दे रहे थे, जैसे कोई स्तंभ किसी भव्य भवन की छत को थामे हो।

सूरज की नज़रें और नीचे उतरीं। कुर्ते के घेरे के पीछे से सोनी की पतली और लचकदार कमर किसी नागिन की तरह बलखाती महसूस हो रही थी। उसके ठीक नीचे उनकी गहरी और गोल नाभि, जिसे भोजपुरी संस्कृति में सौंदर्य का चरम माना जाता है, उस झीने कपड़े के पीछे से एक रहस्यमयी भँवर की तरह दिख रही थी।

जैसे-जैसे सोनी चलतीं, कुर्ते के दोनों पट हवा में लहराते और उनकी जंघाओं के जोड़ पर काली आभा को उजागर कर जाते। भारी, मांसल और गोरी जंघाओं का वह दृश्य सूरज को अपने पास बुला रहा था। उन जंघाओं के आपस में टकराने से उत्पन्न घर्षण की आवाज़ सूरज के कानों में संगीत की तरह गूँज रही थी। जंघाओं के ऊपरी हिस्से पर, जहाँ दोनों टाँगें एक त्रिकोण बनाती थीं, वहाँ की हल्की श्यामल रंगत और उसके पीछे छिपी उस वर्जित योनि की कल्पना मात्र से सूरज का रोम-रोम सिहर उठा।

सोनी की इस दैवीय और कामुक छवि को अपने दिमाग में गढ़ते हुए सूरज भावुक हो उठा। उसकी आँखों में वासना और सम्मान का एक अजीब मिश्रण था। वह चाहता था कि वह इस कल्पना को अपनी बाँहों में भर ले, लेकिन हकीकत की कड़वाहट उसके सामने खड़ी थी। उसने अपने लिंग की ओर हाथ बढ़ाया, पर वहाँ वही सन्नाटा था—कोई हलचल नहीं, कोई उत्तेजना नहीं।

उसका मन तो वेग से दौड़ रहा था, पर उसका पौरुष अब भी निढाल पड़ा था। यह देखकर उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसने हाथ जोड़कर ईश्वर से प्रार्थना की: "हे महादेव, मुझे दुनिया की कोई दौलत नहीं चाहिए। बस एक बार हकीकत में मुझे अपनी मौसी को इस रूप में देखने का सौभाग्य दे दीजिए। क्या मेरा यह शरीर कभी उनकी इस दिव्यता के काबिल बन पाएगा? आखिर मुझे मेरे किस पाप की सजा मिल रही है?"

कल्पना और वास्तविकता के बीच की यह दूरी एक गहरी खाई की तरह थी। एक ओर सोनी थी, जो अपने पति के आलिंगन में सूरज की यादों के सहारे अपनी प्यास बुझा रही थी, और दूसरी ओर यह बेबस नौजवान था, जो अपनी मर्दानगी की वापसी के लिए अपनी मौसी को ही अपना मंदिर मान बैठा था।

धीरे-धीरे, मानसिक थकान और भावनाओं के भारी बोझ ने सूरज की पलकों को झुका दिया। वह उसी झीने कुर्ते के पीछे छिपी सोनी को अपने सीने से लगाए नींद की आगोश में चला गया। हवेली अब पूरी तरह शांत थी, पर उस शांति के गर्भ में एक ऐसा 'कल' छिपा था, जहाँ रिश्तों की नई परिभाषा लिखी जाने वाली थी।

हवेली के विशाल दालान में सुबह की गुनगुनी धूप संगमरमर के फर्श पर खेल रही थी। पूरा परिवार आज फिर एक साथ जुटा था। मेज पर पीतल के गिलासों में गरमा-गरम चाय और ताजे बने पकवानों की खुशबू तैर रही थी। सूरज अपनी कामयाबी की चमक ओढ़े सबके बीच बैठा था, पर चर्चा का रुख अचानक अतीत की गलियों की ओर मुड़ गया।

दादी कजरी ने अपनी धुंधली आँखों से दीवार पर टंगी एक आदमकद तस्वीर की ओर देखा। वह तस्वीर सरयू सिंह की थी—रौबदार मूँछें, आँखों में एक अजीब सी चमक और चेहरे पर खानदानी रईसी का तेज।

कजरी (एक लंबी आह भरते हुए): "आज अगर ऊ रहितें, तँ हवेली के ई खुशी देख के निहाल हो गइले रहितें। कइसन भाग रहे उनका, जवने कुल-खानदान के सूरज जैसन कोहिनूर मिलल।"

पदमा नानी ने भी अपनी माला फेरते हुए हामी भरी। सरयू सिंह का नाम आते ही जैसे माहौल की हवा बदल गई। सुगना की आँखें तुरंत झुक गईं, लाली के चेहरे पर एक फीकी मुस्कान आई, और सोनी... सोनी जैसे पत्थर की मूरत बन गई। उसके कानों में सरयू सिंह की वह भारी आवाज़ और उनकी छुअन की यादें एक सिहरन पैदा कर गई। उसे याद आया कि कैसे सलेमपुर की उस कोठरी में सरयू सिंह के साथ उसने मर्यादाओं की धज्जियां उड़ाई थीं, और कैसे उनकी अकाल मृत्यु के पीछे वह राज़ दफन था जिसमें कहीं न कहीं सोनी का भी योगदान था।

पदमा (भोजपुरी में सुगना की ओर इशारा करते हुए): "जब-जब सूरज के बाबा के नाम आवेला, सुगना सबसे ज्यादा दुखी हो जाले।

कजरी में आगे कहा….आखिर होवे काहे ना? कुंवर जी के छाया में ही तँ ई पूरा परिवार फलल फूलल।"

सुगना ने धीरे से अपनी साड़ी के पल्लू से आँख का कोना पोंछा। आज सरयू सिंह होते तो अपने पुत्र की सफलता को देखकर कितना खुश होते।

कजरी (सूरज का हाथ थामते हुए): "बबुआ, तू तँ उनका आँख के तारा रहलू। तोहार बाबा तोके गोद में लेके पूरा अँगना डोलत रहलन। ऊ कहत रहलें कि 'हमार सूरज एक दिन अइसन चमकती कि पूरा बनारस ओकरा ओजियारे में रही'। देखऽ, आज ऊ बात सच हो गईल।"

सूरज के मन में 'बाबा' की यादें किसी परिकथा जैसी थीं। उसे याद था कि कैसे वे उसे हमेशा अपनी गोद में उठाकर कलेजे से सटाए रखते थे कैसे उनके पास हमेशा कोई न कोई अनोखा खिलौना होता था।

उसे नहीं पता था कि जिस इंसान को वह देवता तुल्य मान रहा है वही उसका पिता है और , उसी के पौरुष की छाया इस हवेली की हर स्त्री पर पड़ी थी यहां तक की सोनी भी जिसकी छत्रछाया में वह अपना पुरुषत्व जागृत करने का प्रयास कर रहा था।

सूरज (भावुक होकर): "दादी, मुझे याद है जब मैं छोटा था, बाबा मुझे कंधे पर बिठाकर गांव घुमाते थे।उनकी आवाज़ में जो रौब था, वो आज भी मेरे कानों में गूँजता है। काश, आज वो अपनी आँखों से मुझे डॉक्टर की सफेद कोट में देख पाते।"

हवेली के इस भावनात्मक माहौल में जहाँ एक तरफ गर्व और ममता का सैलाब था वहीं घर की सभी महिलाएं उनके साथ बिताए गए कामुक पलों को भी याद कर रही थी । किसी स्त्री के लिए यह मुमकिन ही नहीं था कि उनके साथ एक बार संभोग करने के बाद वह उन्हें भूल जाए।

इससे इतर सोनू और विकास भी सरयू सिंह के अनुशासन और उनके व्यक्तित्व की चर्चा करने लगे।

तभी पदमा नानी ने सुगना के कंधे पर हाथ रखा और फिर से भोजपुरी में माहौल को संभालने की कोशिश की।

पदमा: "अरे सुगना! अब आँख मति पोंछू। ई तँ सब उनके पुन्य ह कि आज हवेली में अइसन उत्सव मनावत बानी जा। ऊ जहाँ भी होइहें, ऊपर से हमनी के असीसत होइहें। देखऽ तँ, तोहार बेटा डॉक्टर बन गइल, अब तँ हवेली के कवनो दुख टिके ना पाई।"

सूरज को लग रहा था कि 'बाबा' का आशीर्वाद उसके साथ है, पर उसे नहीं पता था कि अब उसकी असली परीक्षा उस 'उपहार' में छिपी है, जो उसे उन रिश्तों के पार ले जाने वाला था जहाँ सरयू सिंह ने अपनी सत्ता छोड़ी थी।

लाली बीती रात को याद कर रही थी। उत्सव के शोर के बाद जब हवेली सन्नाटे में डूबी, तो सोनू के मन में भी हलचल तेज़ हो गई। सुगना का वह सजा-धजा रूप और उसे हंसना खिलखिलाती देखकर सोनू के भीतर दबी हुई पुरानी वासना फिर से जाग उठी थी। लाली की उपस्थिति में उसने सुगना की उन्हीं पुरानी यादों को टटोला और उसकी उत्तेजना का पूरा वेग लाली की जांघों के बीच उतार कर न सिर्फ लाली को तृप्त कर दिया…अपितु कई दिनों बाद अपनी उत्तेजना पर सुगना का अंश महसूस किया.. सुगना सोनू की जान थी पर सुगना ने यह जानने के बाद की वह सरयू सिंह की पुत्री है खुद को वासना से पूरी तरह विमुक्त कर लिया था.. पर कल उसके चेहरे की मुस्कुराहट नैसर्गिक थी और वही सुगना की पहचान थी.

हमेशा की तरह सोनू और विकास वापस लखनऊ के लिए निकलने वाले थे…

हवेली के हाल में जब विदाई की घड़ियाँ आईं, तो लाली ने अपनी चंचलता और अधिकार के साथ मोर्चा संभाल लिया। जैसे ही विकास ने अपना सूटकेस उठाया और सोनू ने अपनी गाड़ी की चाबी जेब में डाली, लाली बीच में आकर खड़ी हो गई। उसके चेहरे पर कल रात की वह मादक चमक अभी भी बरकरार थी, जो एक तृप्त स्त्री की पहचान होती है।

लाली (दोनों की ओर देखते हुए): "अरे, आप दोनों का तो बस चले तो पंख लगा के उड़ जाएँ! अभी इतनी जल्दी क्या है? सूरज डॉक्टर बन के आया है, हवेली में बरसों बाद ऐसी रौनक आई है, और आप दोनों को अपने काम की पड़ी है? कम से कम दो दिन और रुकिए, तभी इस जश्न का असली मजा आएगा।"

सोनू और विकास एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। लाली का यह आग्रह केवल आतिथ्य नहीं था, बल्कि उसके पीछे बीती रात की वह कामुक ऊर्जा थी जिसने लाली को आनंदित कर दिया था और वह इस आनंद को दोबारा भोगना चाहती थी।

सोनू की नज़रों में कल शाम की वह सुगना तैर रही थी—सजी-धजी, रेशमी साड़ी में लिपटी, जिसकी खिलखिलाहट ने सोनू के भीतर उस पुरानी आग को फिर से सुलगा दिया था। कल रात जब वह लाली के साथ बिस्तर पर था, तो उसकी बाहों में लाली तो थी, पर उसके बंद नेत्रों के सामने अपनी सगी दीदी सुगना का वह गदराया हुआ बदन और वही चिर-परिचित खुशबू थी। सुगना की उसी कल्पना के वेग ने सोनू को कल रात इतना उतावला बना दिया था कि लाली दंग रह गई थी। उसने वर्षों बाद अपने पति के भीतर वह प्यास देखी थी, जिसने लाली की देह को भी कल रात पूरी तरह सराबोर कर दिया था।

सोनू ने लाली की आँखों में झाँकते हुए एक तिरछी नज़र सुगना पर डाली, जो पास ही खड़ी मुस्कुरा रही थी।

सुगना ने भी लाली की बात का समर्थन किया उसे इस बात का इल्म नहीं था कि उसे लेकर सोनू के मन में कामुक भावनाएं जाग रही है।

उसने बेहद प्यार से कहा…

हां सोनू रुक जा, बहुत दिन बाद घर में खुशियां आईल बा एक-दो दिन साथे रहबे सबके मन लगी..

हाई कमान का फरमान आ चुका था सुगना की बात टालने का दम किसी में ना था वह इस घर और पूरे परिवार की लाडली थी…

विकास (हँसते हुए): "भाई, अब तो मना करना मुश्किल है। चलो, व्यापार तो चलता रहेगा, अपनों के साथ ये दो दिन फिर कहाँ मिलेंगे।"

विकास ने सोनी की ओर देखा जैसे कल रात की बात याद दिला रहा हो…उसे उम्मीद थी कि आज भी उसे सोनी की मुनिया से वैसा ही स्वागत मिलेगा..

पदमा नानी (भोजपुरी में चहकते हुए): "ई तँ बहुते नीक भइल! सोनू और विकास बाबू रुकीहें तँ हवेली में अउरी दू दिन चहल-पहल रही। सुगना, देखलू? तोहार भाई आजुओ तोर कतना बात मानेला।"

हवेली का वह भव्य हाल अब फिर से हंसी-ठिठोली से भर गया था। लेकिन इस भीड़ के बीच, सूरज और सोनी की नज़रें जब मिलीं, तो उनमें एक मूक संवाद हुआ। विकास और सोनू के रुकने से वह 'उपहार' देने की राह थोड़ी और चुनौतीपूर्ण हो गई थी, पर रोमांच और भी बढ़ गया था।

सोनू और विकास के रुक जाने से जहां पूरा परिवार खुश था वहीं सूरज के चेहरे से खुशियां गायब थी। जिस उपहार का वह बेसब्री से इंतजार कर रहा था उसे पर ग्रहण लग चुका था।

सूरज ने मौका पाकर सोनी को घेर लिया। विकास और सोनू के रुकने के फैसले ने उसे भीतर से तोड़ दिया था। उसकी आँखों में छाई निराशा अब हल्की नाराजगी में बदल चुकी थी।

सोनी अलमारी से कुछ सामान निकाल रही थी, तभी सूरज उसके ठीक पीछे जा खड़ा हुआ।

सूरज (बेहद धीमी और रुआँसी आवाज़ में): "मौसी, यह सब क्या है? आपको ज़रा भी अहसास है कि आप क्या कर रही हैं? मामा और फूफा को रोकने की क्या ज़रूरत थी? आप जानती हैं कि मैं किस हाल में हूँ।"

सोनी धीरे से पलटी। उसके चेहरे पर एक मदहोश कर देने वाली मुस्कान थी। उसने अपनी रेशमी साड़ी का पल्लू ठीक किया और सूरज की आँखों में आँखें डालकर उसे निहारने लगी।

सोनी (धीमे से): "अरे, मेरे डॉक्टर बाबू! इतना गुस्सा? मैंने तो कुछ नहीं किया, यह तो लाली और तेरी माँ सुगना ने उन्हें रोका। और वैसे भी, अपनों के बीच रहने में बुराई क्या है? क्या क्या तू अपने मौसी और मामा को नहीं चाहता है?"

सूरज (तड़पकर): "चाहने की बात नहीं है मौसी, जाने दीजिए मौसी आप नहीं समझेंगी।

आपने वादा किया था कि परीक्षा के बाद वो 'उपहार' देंगी। मैं यहाँ एक-एक पल गिन रहा हूँ और आप हैं कि….। क्या आपको मेरी तकलीफ का ज़रा भी अंदाज़ा है?"

सोनी एक कदम और करीब आई। उसके शरीर की गर्माहट और वही चन्दन की खुशबू सूरज के नथुनों से टकराई। उसने अपनी कोमल उँगलियाँ सूरज की ठुड्डी पर रखीं और उसे थोड़ा और उकसाते हुए बोली।

सोनी: "तड़प तो अच्छी होती है सूरज। जो आग जितनी धीरे सुलगती है, उसका अहसास उतना ही गहरा होता है। अभी तो बस शुरुआत है।इंतजार रख क्या पता तुम्हें वो मिल जाए जो तुम ढूँढ रहे हो?"

सोनी की आवाज़ में वह खनक थी जिसने सूरज की नसों में दौड़ते खून की रफ्तार बढ़ा दी। वह जैसे ही कुछ और कहने के लिए आगे बढ़ा, अचानक कमरे के दरवाज़े पर भारी कदमों की आहट हुई। सूरज झटके से पीछे हटा।

विकास मुस्कुराते हुए कमरे के भीतर दाखिल हुआ। उसने सूरज के उतरे हुए चेहरे और सोनी की उस रहस्यमयी मुस्कान को देखा।

विकास (हँसते हुए): "अरे वाह! यहाँ क्या मंत्रणा चल रही है? सूरज, लगता है तेरी मौसी का जादू तुझ पर पूरी तरह चल गया है। यह है ही ऐसी, एक बार किसी को अपनी बातों में उलझा ले, तो फिर उसे होश नहीं रहता।"

सूरज सकपका गया। उसके माथे पर पसीने की बूंदें चमकने लगीं। वह कुछ बोलने ही वाला था कि सोनी ने स्थिति संभाल ली।

सोनी (खिलखिलाकर): "अरे छोड़िये भी! यह अब बड़ा डॉक्टर बन गया है ना, तो मुझे सलाह दे रहा था कि इस उम्र में मुझे अपनी सेहत का ख्याल कैसे रखना चाहिए। इसे लगता है कि इसकी मौसी अब बूढ़ी हो रही है।

विकास ने सोनी के कंधे पर हाथ रखा और प्यार से बोला, "बूढ़ी? तुम्हें जो एक बार देख ले, वो अपनी उम्र भूल जाए।

सभी हंसने लगे…

अंततः वह घड़ी आ गई। तीसरे दिन दोपहर को विकास और सोनू विदा हुए।

विकास ने विदा लेते हुए सोनी को गले लगाया और पिछली रातों के अनुराग की चर्चा की। सोनी जानती थी कि उसकी वह कामुकता विकास के लिए नहीं, बल्कि सूरज की कल्पनाओं के कारण थी।

जैसे ही मेहमानों की गाड़ी ओझल हुई, सूरज को लगा जैसे उसके सीने से पत्थर हट गया हो।

सूरज बाज़ार गया और एक प्रतिष्ठित दुकान से वही पारभासी, सफ़ेद मलमली कुर्ता खरीदा जिसकी उसने कल्पना की थी। उसने 'एक्सेल' साइज़ का चुनाव किया, यह सोचते हुए कि मौसी का भरा हुआ बदन उस कपड़े को किस तरह तान देगा।

उसने वह गिफ्ट बॉक्स सोनी की मेज पर रख दिया और अंदर एक पर्ची छोड़ दी। सूरज के जाने के बाद सोनी ने जब उस कुर्ते को देखा, तो उसकी साँसें अटक गईं। वह कपड़ा इतना झीना था कि उसकी मर्यादा का आखिरी पर्दा भी उसके सामने छोटा पड़ रहा था।

सोनी ने वह पर्ची उठाई और पढ़ना शुरू किया उसके कलेजे की धड़कन बढ़ती जा रही थी

आप मेरे रिश्ते में मौसी जरूर है पर पिछले कई वर्षों से आपने मुझे हमेशा सही राह दिखाई है आपकी वजह से ही मुझे अपने लिंग में पहली बार तनाव महसूस हुआ और मैं हस्तमैथुन का सुख ले पाया आप मेरे लिए ईश्वर का वरदान है मुझे पता नहीं कि मैं सामान्य हूं या असामान्य पर मुझे विश्वास है कि यदि अपने साथ दिया तो शायद मेरा पुरुषत्व जाग सके।

मैंने अपनी प्रेमिका की कल्पना हमेशा इसी रूप में की है पहले यह कपड़ा मैंने पहले रोजी के लिए लाया था पर पर मैं सफल नहीं हो पाया मुझे आप इस कपड़े में अप्सरा के रूप में दिखाई पड़ती है.. यदि आप इस एकमात्र वस्त्र को धारण कर सके तो यह मेरी कल्पना साकार करने जैसा होगा बाकी आप मेरी पूज्य हैं और हमेशा रहेंगी।।।

इंतजार रहेगा.. आपको आहत करने के लिए क्षमा प्रार्थी हूं।

सोनी भावुक को गई… तभी सोनी के मन में एक विचार आया। उसने मुस्कुराहट के साथ अपनी पुरानी अलमारी खोली और मखमली कपड़े में लिपटी एक पुरानी चीज़ निकाली।

सोनी ने मन ही मन कहा: "अगर खेल आग का है सूरज, तो चिंगारी भी वैसी ही होगी। तूने मुझे जो पहनाना चाहा है, वह तेरी प्यास है, पर मैं जो तुझे दूँगी, वह तेरी मर्यादा और पौरुष का नया संगम होगा।"

शेष अगले भाग में

 
अभी से पेट फुला लीहे तो मजा कैसे लीहे
 
देखिए आगे क्या होता है..आनंद तो आएगा
 
बड़े दिनों बाद आगमन हुआ स्वागत है
 
बड़े उत्तम विचार है...पर सब्र करिए सुगना अभी धीरे धीरे जागृत हो रही..अभी तो खुश हुई है सबको खुश करने में अभी समय है
 
भाग 175

मैंने अपनी प्रेमिका की कल्पना हमेशा इसी रूप में की है पहले यह कुर्ता मैंने पहले रोजी के लिए लाया था पर मैं सफल नहीं हो पाया मुझे आप इस कपड़े में अप्सरा के रूप में दिखाई पड़ती है.. यदि आप इस एकमात्र वस्त्र को धारण कर सके तो यह मेरी कल्पना साकार करने जैसा होगा बाकी आप मेरी पूज्य हैं और हमेशा रहेंगी।।।

इंतजार रहेगा.. आपको आहत करने के लिए क्षमा प्रार्थी हूं।

सोनी भावुक को गई… तभी सोनी के मन में एक विचार आया। उसने मुस्कुराहट के साथ अपनी पुरानी अलमारी खोली और मखमली कपड़े में लिपटी एक पुरानी चीज़ निकाली।



सोनी ने मन ही मन कहा: "अगर खेल आग का है सूरज, तो चिंगारी भी वैसी ही होगी। तूने मुझे जो पहनाना चाहा है, वह तेरी प्यास है, पर मैं जो तुझे दूँगी, वह तेरी मर्यादा और पौरुष का नया संगम होगा।"

अब आगे..

उसने उस रहस्यमयी वस्तु को एक रेशमी रुमाल में लपेटकर अलमारी के सबसे सुरक्षित कोने में रख दिया। अब उसके चेहरे पर घबराहट नहीं, बल्कि एक अद्भुत आत्मविश्वास था। वह जानती थी कि आज की रात हवेली की दीवारों के पीछे एक ऐसा इतिहास लिखा जाएगा, जहाँ एक मौसी की युक्ति उसके भांजे के जीवन का सबसे बड़ा 'चमत्कार' सिद्ध होगी।

रात्रि का भोजन समाप्त हो चुका था। हवेली के गलियारों में चहल-पहल धीरे-धीरे शांत हो रही थी। सुगना अपनी थकान मिटाने कमरे में जा चुकी थी और लाली ने भी रसोई का काम समेट लिया था। विदा होते समय सोनी ने सूरज की आँखों में झाँककर उसे वह गुप्त निमंत्रण दे दिया था—"रात ठीक 11 बजे, मेरे कमरे में..."

सूरज के लिए घड़ी की हर एक सेकंड की सुई किसी भारी हथौड़े की तरह धड़क रही थी। उसके ज़हन में वही सफेद झीना कुर्ता घूम रहा था जो वह बाज़ार से लाया था। उसे पूरी उम्मीद थी कि आज रात सोनी मौसी उसी पारभासी लिबास में उसका स्वागत करेंगी और वह उनकी देह के हर उभार को अपनी नज़रों से पी पाएगा।

जैसे ही दीवार घड़ी ने 11 का अंक छुआ, सूरज ने दबे पाँव सोनी के कमरे का दरवाज़ा खोला। कमरा मद्धम पीली रोशनी में नहाया हुआ था और इत्र की हल्की खुशबू हवा में तैर रही थी। सूरज की नज़रें सबसे पहले बिस्तर की ओर गईं, पर उसे गहरा धक्का लगा। सोनी मौसी ने वह झीना कुर्ता नहीं, बल्कि अपनी नियमित गुलाबी रेशमी नाइटी पहनी हुई थी।

सूरज के चेहरे पर छाई मायूसी सोनी से छिपी नहीं रही। उसने आगे बढ़कर सूरज का हाथ थामा और उसे बिस्तर के किनारे बैठाया।

सोनी (धीमी और गंभीर आवाज़ में): "तू उदास क्यों हो गया?

सूरज ने अपनी नज़रें झुकाए हुए कहा

मौसी आपको मेरा गिफ्ट पसंद नहीं आया?

“ सूरज अपनी मौसी को उसे वस्त्र में देखना तुझे अच्छा लगेगा? क्या तेरी नजरों में वह उचित है?” सोनी ने जिस विश्वास के साथ यह प्रश्न पूछा था उसका उत्तर ना के अलावा कुछ और नहीं हो सकता था परंतु सूरज चतुर था समझदार था उसने अपना सर झुकाए हुए ही कहा..

मौसी मैंने आपको पूजा है आपको चाहा है मैं आपकी दिल से बहुत इज्जत करता हूं परंतु न जाने मुझे क्यों ऐसा लगता है कि आप ही मेरी हर समस्या का निवारण कर सकती है मैंने अपनी कल्पनाओं में कई बार आपको उस वस्त्र में देखा है और आज मैं अपनी कल्पना को साकार होते हुए देखना चाहता हूं बाकी यह मेरी इच्छा है पूरा करना न करना आपकी मर्जी। मैं सचमुच आपसे प्यार करने लगा हूं एक मौसी की तरह भी और अपने आराध्य की तरह भी।

सोनी निरूतर थी। जो संवेदना और आत्मविश्वास से सूरज ने यह बात कही थी उसने सोनी के अंतर्मन को छू लिया था। आखिर किसी की कल्पना पर कोई कैसे रोक लगा सकता है? उसने स्वयं भी तो सूरज को लेकर कई कल्पनाएं की थी। यह तो सूरज था जो खुलकर अपनी बात का पाया था अन्यथा यदि सोनी स्वयं अपनी कल्पनाओं की बात सूरज के समक्ष रखती तो उनके बीच की मर्यादा नग्नता में तब्दील हो जाती।

चल ठीक है तेरी बात मानती हूं पर मैंनेभी तेरे लिए कुछ सोच कर रखा है…

सोनी ने अलमारी से वही रेशमी रुमाल में लिपटी चीज़ निकाली जिसे उसने दोपहर में सहेज कर रखा था। सूरज ने कोतूहल वश उसे खोला, तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गई।

रुमाल के भीतर अमेरिका से लाया गया एक 'ब्लाइंडफोल्ड' (आँखों की पट्टी) और 'हैंडकफ्स' (हथकड़ी) जैसी कोमल पट्टियाँ थीं। यह विकास का लाया हुआ वह उपहार था जिसे सोनी और विकास कभी-कभी अपने एकांत में प्रयोग करते थे।

सूरज भी आधुनिक युग का लड़का था उसने इन कामुक गैजेट्स को ब्लू फिल्मों में देखा था। उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि उसकी सोनी मौसी इस प्रकार के गैजेट्स भी अपने साथ रखती हैं।

सोनी ने सूरज का दिया हुआ गिफ्ट पैकेट अलमारी से बाहर निकाला और बाथरूम की तरफ जाते हुए बोली अब रेडी हो जा मैं भी आती हूं…और हां जितना दिया है उतना ही पहनना…सोनी मुस्कुराते हुए बाथरूम के अंदर प्रवेश कर गई सूरज का अंतर्मन मुस्कुरा रहा था.

सोनी ने तय कर लिया था कि आज वह सूरज के मन से उस डर को हमेशा के लिए निकाल फेंकेगी।

सूरज बिस्तर पर पूरी तरह नग्न होकर लेट चुका था सिरहाने लकड़ी के पलंग पर वह अपने हैंड कफ फंसा चुका था। और आंखों पर सोनी द्वारा दी हुई मलमल की पट्टी चढ़ा चुका था।

मद्धम पीली रोशनी ने कमरे के वातावरण को एक स्वर्णिम आभा से भर दिया था। बिस्तर पर लेटा हुआ सूरज इस समय किसी मर्त्य मानव जैसा नहीं, बल्कि यूनान के किसी प्राचीन शिल्पकार द्वारा तराशी गई 'कामदेव' की जीवंत प्रतिमा जैसा प्रतीत हो रहा था। आँखों पर बंधी मलमल की काली पट्टी और सिरहाने से बंधे उसके हाथ उसे एक अनूठे समर्पण के सौंदर्य में ढाल रहे थे।

सूरज का शरीर उस उम्र में था जहाँ किशोरावस्था की कोमलता और पौरुष की दृढ़ता का मिलन होता है। उसकी चौड़ी और पुष्ट छाती पर पसीने की बारीक बूंदें मोतियों की तरह चमक रही थीं, जो उसकी तेज़ होती धड़कनों के साथ लयबद्ध तरीके से ऊपर-नीचे हो रही थीं। उसके सीने के मध्य से नाभि तक जाती हुई महीन रोमराजि (बालों की लकीर) उसके गोरे रंग पर एक कामुक विरोधाभास पैदा कर रही थी।

उसकी पतली कमर और पसलियों का उभार उसकी कसरती देह की गवाही दे रहा था। जाँघें मांसल, सुडौल और किसी पत्थर की नक्काशी जैसी चिकनी थीं। उन जाँघों के बीच आराम करता उसका वह 'अंग' अपनी नैसर्गिक मासूमियत और खूबसूरती के साथ शांत था। यद्यपि वह अभी तनावमुक्त था, फिर भी उसकी बनावट, उसका गुलाबीपन और उसके मूल की पुष्टता उसकी सुप्त शक्ति का परिचय दे रही थी। वह एक 'मुरझाए हुए कमल' की भांति कोमल था, जो अपनी रति के स्पर्श का इंतज़ार कर रहा था ताकि खिलकर वज्र बन सके।

तभी बाथरूम का दरवाज़ा खुलने की हल्की सी चरचराहट हुई। नंगे पैरों की धीमी आहट और सोनी के पाजेब की छनछन सूरज के कानों में रस घोलने लगी। सोनी जब बाहर आई, तो उसने वही सफेद झीना कुर्ता पहन रखा था। वह कपड़ा इतना महीन था कि सोनी की परिपक्व देह का हर उतार-चढ़ाव किसी रहस्य की तरह खुल रहा था। कुर्ते के पारभासी कपड़े के नीचे से उसके पुष्ट और भारी वक्ष अपनी पूरी गरिमा के साथ उभर रहे थे, जिनके गहरे गुलाबी निप्पल उस कपड़े को भेदने की कोशिश कर रहे थे।

सोनी बिस्तर के पास आकर रुक गई। उसने पट्टी में बंधे सूरज के उस दिव्य और निष्पाप चेहरे को देखा। सूरज के अधखुले होंठ और उसकी गर्दन की उभरी हुई नसें उसकी उत्तेजना को बयां कर रही थीं।

कुछ देर बाद सूरज को बिस्तर पर एक हल्का सा दबाव महसूस हुआ। सोनी बिस्तर पर आ चुकी थी। सोनी ने महसूस किया कि सूरज के लिंग में अब भी कोई तनाव नहीं है। मिलन का इंतजार कर रहे एक युवक के लिंग में तनाव न हो यह असामान्य बात थी पर अब सोनी के लिए यह सामान्य हो चुका था।

वह कक्ष अब एक ऐसी मूक परीक्षा का स्थल बन चुका था, जहाँ कामकला की हज़ारों वर्षों की विरासत एक युवक के शांत पौरुष के सामने घुटने टेक रही थी। बिस्तर पर लेटा सूरज, जिसकी आँखों पर काली मलमल की पट्टी और हाथों में रेशमी बेड़ियाँ थीं, किसी बलिष्ठ मृग की भांति निष्प्राण और समर्पित था।

सोनी ने, जो उस सफेद झीने कुर्ते में किसी अप्सरा जैसी मादक लग रही थी, अपना पहला दांव खेला। उसने अपनी रेशमी और अनुभवी हथेलियों में सूरज के उस 'अंग' को भरा। वह अंग अभी भी किसी 'मुरझाए हुए कमल' की पंखुड़ी की तरह कोमल और शीतल था। सोनी ने अपनी उंगलियों के पोरों से उसके आधार (Base) की नसों को सहलाया, उन्हें जगाने के लिए उन पर दबाव बनाया, पर वहाँ कोई स्पंदन नहीं हुआ।

उसने अपने पुष्ट और भारी वक्षों को नीचे झुकाया। कुर्ते के उस पारभासी और खुरदरे कपड़े का घर्षण जब सूरज के उस कोमल मांस से हुआ, तो लगा जैसे आग और बर्फ का मिलन हो रहा हो। सोनी ने उन विशाल कलशों के बीच उस अंग को दबाकर 'मर्दन' (रगड़) शुरू किया, ताकि देह की गर्मी उस सुप्त पौरुष में प्राण फूंक सके। सूरज के गले से दबी हुई आहें निकल रही थीं, उसका सीना धौंकनी की तरह चल रहा था, पर उसकी जाँघों के बीच का वह हिस्सा किसी गहरी निद्रा में लीन था।

जब स्पर्श और घर्षण निष्फल रहे, तो सोनी ने हार मानने के बजाय उस अंग की शारीरिक संरचना की गहराई में उतरने का निर्णय लिया। उसने अपनी नज़रों से उस अंग की अद्भुत बनावट को पिया। वह अधखिला होने के बावजूद इतना सुडौल और आकर्षक था कि कोई भी शिल्पी ईर्ष्या कर ले। उसके शीर्ष पर स्थित वह 'सुपाड़ा' (Glans) अभी अपनी रक्षात्मक खाल (Foreskin) के भीतर पूरी तरह छुपा हुआ था।

सोनी ने उसे अनावृत्त करने का जतन शुरू किया। उसने अपने एक हाथ के अंगूठे और तर्जनी से उस मखमली खाल को धीरे से पीछे की ओर खींचने का प्रयास किया। वह खाल इतनी तंग और रेशमी थी कि जैसे ही वह पीछे सरकती, वह पुनः अपनी जगह पर लौट आती। सोनी को अहसास हुआ कि सूरज की इस 'निष्पाप देह' ने अब तक पूर्ण विस्तार का अनुभव ही नहीं किया है।

एक हाथ से यह कार्य असंभव देख, सोनी ने अपने दूसरे हाथ का भी सहारा लिया। उसने दोनों हाथों की उंगलियों के तालमेल से उस गीली और फिसलन भरी चमड़ी को पूरी ताकत और नज़ाकत से पीछे की ओर धकेला। जैसे-जैसे वह आवरण हट रहा था, भीतर से वह गहरा गुलाबी और मांसल शिखर बाहर झांकने लगा। वह हिस्सा इतना संवेदनशील और चमकदार था जैसे किसी सीप के भीतर से कोई कीमती मोती बाहर आ रहा हो।

सोनी ने उस अनावृत्त सुपाड़े के मुहाने पर अपने होठों की तप्त और आर्द्र साँसें छोड़ीं। उसने अपनी जुबान की नोक से उस गुलाबी मुहाने को सहलाया, उसे अपने मुँह के अंधेरे और ऊष्म संपुट में भरकर चूसने का हर संभव प्रयास किया। उसकी लार उस अंग पर एक रेशमी लेप की तरह चमक रही थी। सोनी ने अपनी कामकला की हर वह विधा झोंक दी जिससे पत्थर भी पिघल जाए—हल्के दांतों का दबाव, जीभ का गोल घुमाव और हथेलियों की तीव्र रगड़।

पर विडंबना देखिए, वह अंग जो अपनी बनावट में किसी देवता के वरदान जैसा सुंदर था, व्यवहार में किसी शापित पत्थर की तरह जड़ बना रहा। सोनी के इतने गहन और कामुक उपक्रमों के बाद भी, वह 'वज्र' बनने के बजाय अपनी कोमलता में ही सुरक्षित रहा। वह सुपाड़ा, जिसे अब तक उत्तेजना के मारे फटने लगना चाहिए था, सोनी की आँखों के सामने किसी लाचार और कोमा में गए व्यक्ति की भांति निष्प्राण पड़ा था। तनाव जो सूरज के लिंग में आना चाहिए था, वह अब सोनी की थकी हुई उंगलियों और उसकी टूटती उम्मीदों में सिमट कर रह गया था।

सोनी के यह प्रयास सूरज के लिंग में तनाव तो नहीं भर पाए अपितू सूरज को तनावग्रस्त कर दिया। सोनी के मन में भी निराशा के भाव थे।

सोनी बिस्तर पर आ चुकी थी। सोनी को लिंग में तनाव भरने का वह अद्भुत राज पता था। अपनी हार को जीत में बदलने के लिए सोनी ने सूरज के उसे जादुई अंगूठे को सहलाया और उसके लिंग में तनाव भरता गया। खूबसूरत और तना हुआ लिंग सोनी के आंखों के सामने अपनी पूर्ण गरिमा के साथ उपस्थित था। सोनी की योनि में एक अजब सिहरन हुई..

सोनी धीरे से उसके ऊपर आई और अपनी जाँघों को सूरज की जाँघों के दोनों तरफ फैलाकर बैठ गई। हालाँकि सूरज आँखों पर पट्टी बँधी होने के कारण सोनी की नग्नता को देख नहीं पा रहा था, लेकिन उसे अहसास था कि मौसी उसके ठीक ऊपर है और उनकी देह की ऊष्मा उसे छू रही है। सोनी की चिकनी जांघों का स्पर्श अपनी जांघों पर महसूस कर सूरज का तना हुआ लिंग में तनाव और बढ़ गया। सूरज की धड़कनें तेज थी उसे फिर वह डर सताने लगा कि कहीं उसे दिन जो रोजी के साथ हुआ था कही वह दुबारा तो नहीं होगा…

सोनी ने धीरे से झुककर सूरज के कान के पास फुसफुसाते हुए कहा, "सूरज... अब मैं वो करने जा रही हूँ जो शायद मर्यादा के खिलाफ है, पर मुझे तुझे तेरा उपहार देना है और तुझे इस त्रासदी से निकालना है। मुझे माफ करना।"

सोनी की आवाज़ में ममता और एक अनजानी सी सिहरन घुली हुई थी। उसने कोमलता से सूरज के उस फौलादी लिंग को अपनी हथेली में भरा। वह पूरी तरह जागृत और गर्म था। सोनी ने उसे अपनी जाँघों के बीच के उस सबसे संवेदनशील हिस्से, अपनी भग्नासा (Clitoris) को सूरज के लिंग के शीर्ष (Glans) के करीब ले आई।

जैसे ही सोनी ने सूरज के लिंग के मुकुट को अपनी भग्नासा से स्पर्श कराया, सूरज के पूरे शरीर में बिजली का एक झटका सा लगा। वह पल जिसका उसे डर था, आ चुका था—रोजी के साथ इसी स्पर्श पर उसका पतन हुआ था।

सूरज (हैरानी और उत्साह में): "मौसी! यह... यह तो अभी भी तना हुआ है! क्या आपने सच में इसे वहां स्पर्श किया है?"

सोनी (धीमी और मादक आवाज़ में): "हाँ सूरज... देख, तेरा पौरुष हार नहीं मान रहा। यह तो और भी ज़्यादा सख्त हो गया है।"

सूरज: "मौसी... एक बार फिर से कीजिए ना! मुझे यकीन नहीं आ रहा!"

सोनी के मन में भी एक अजीब सा उन्माद जाग उठा था। उसने एक बार फिर उसके लिंग को अपनी भग्नासा से स्पर्श कराया। सूरज के लिंग पर आया काम-रस (Pre-cum) और सोनी की बुर पर आया काम रस जब एक-दूसरे से मिले, तो एक मखमली फिसलन पैदा हुई। सोनी ने उसे विश्वास दिलाने के लिए उसके लिंग को अपनी भग्नासा पर थोड़ा और रगड़ा।

सूरज (उत्साह से चिल्लाते हुए): "मौसी! यह तो जादू है! मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि यह अभी भी पत्थर की तरह तना हुआ है। मैं हार नहीं रहा मौसी, मैं जीत रहा हूँ!"

सोनी को सूरज की यह खुशी देखकर एक असीम संतोष मिला। उसकी ममता अब धीरे-धीरे कामुकता में घुलने लगी थी। उसने सूरज के लिंग को अपनी जाँघों के बीच दबाया और उसे अपनी भग्नासा पर बार-बार रगड़ना शुरू किया। हर रगड़ के साथ सूरज का आत्मविश्वास बढ़ रहा था। वह जो कल तक अपनी मर्दानगी को कोस रहा था, आज सोनी के सुरक्षित स्पर्श में एक विजेता महसूस कर रहा था।

सोनी की सिसकियाँ भी अब गहरी होने लगी थीं। सोनी का शरीर स्वयं उत्तेजना से कांप रहा था परंतु उसका ध्यान उसकी पूरी एकाग्रता सूरज के उस अटूट तनाव पर थी।

सोनी: "देख सूरज, तू संपूर्ण है। तेरा डर सिर्फ एक वहम था। आज तूने अपनी उस कमी को जीत लिया है।"

सूरज के चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान थी जो महीनों बाद लौटी थी। सोनी के भग्नाशे के सीधे स्पर्श के बावजूद, उसका तनाव न केवल कायम था, बल्कि वह अपनी पराकाष्ठा को छू रहा था। उसे समझ आ गया था कि उसे अब किसी उपचार की नहीं, बस इसी विश्वास की ज़रूरत थी।

रात की खामोशी में केवल उनकी तेज़ होती धड़कनों और रेशमी कपड़े की सरसराहट सुनाई दे रही थी। सूरज के बार-बार अनुरोध करने पर सोनी ने अपनी हिचकिचाहट को एक तरफ रख दिया। उसे लगा कि यदि एक बार और स्पर्श करने से सूरज का आत्मविश्वास हमेशा के लिए लौट आता है, तो वह यह जोखिम बार बार उठाएगी।

सोनी ने सूरज के लिंग को अपनी भग्नासा (Clitoris) पर फिर से रगड़ना शुरू किया। लेकिन इस बार उत्तेजना की लहर इतनी तीव्र थी कि वह केवल एक 'प्रयोग' नहीं रह गई। रगड़ते-रगड़ते सोनी को खुद होश नहीं रहा कि कब उसका शरीर और नीचे झुक गया और वह स्पर्श भग्नासा से खिसक कर उसकी योनि (Labia) के कोमल होठों तक पहुँच गया। सोनी का अपना काम-रस (lubrication) अब सूरज के लिंग के शीर्ष को पूरी तरह भिगो चुका था।

सूरज, जिसकी आँखों पर अब भी मलमल का पर्दा था, इस अभूतपूर्व अहसास से पागल हो उठा। उसे अपनी मर्दानगी पर इतना भरोसा पहले कभी नहीं हुआ था।

मौसी मेरे हाथ खोल दीजिए मैं आपको आलिंगन में लेना चाहता हूं.. सोनी स्वयं उत्साहित थी और खुश थी उसने सूरज के हाथ उस हैंड कफ से बाहर निकाल दिए।

सूरज ने अपनी बाहें खोल दीं और एक मासूम पुकार के साथ सोनी को अपने आलिंगन में आमंत्रित किया। सोनी भी उसकी इस अपार खुशी में बह गई और उसे सीने से लगाने के लिए नीचे झुकी।

उसी क्षण, कुदरत ने अपना खेल दिखाया। जैसे ही सोनी झुकी, उसकी योनि ठीक सूरज के तने हुए लिंग के मुहाने पर आ गई। आलिंगन की चाहत में सूरज की कमर खुद-ब-खुद ऊपर की ओर उठी और उसके लिंग का सुपड़ा (Glans) सोनी की योनि के द्वार में प्रवेश कर गया।

सोनी बुरी तरह चौंकी। उसे एक गर्म और बिजली जैसा अहसास अपनी देह की गहराइयों में महसूस हुआ। उसने सूरज के चेहरे की तरफ देखा सूरज की आंखें अब भी उस ब्लाइंडफोल्ड से बंद थी। वह अपनी कमर ऊपर उठाकर अलग होना चाहती थी, पर सूरज की मजबूत बाँहों ने, जो इस वक्त जीत के उन्माद में थीं, उसे अपनी ओर और कस लिया। उस खिंचाव के कारण सूरज का पत्थर जैसा सख्त लिंग लगभग पूरा सोनी के भीतर समा गया।

सोनी (काँपती और दबी आवाज़ में): "सूरज... मुझे छोड़... यह पाप है! हम यह नहीं कर सकते!"

सोनी के शब्द 'पाप' की बात कर रहे थे, पर उसके बदन की सिहरन और उसकी योनि की पकड़ कुछ और ही बयाँ कर रही थी। उसका शरीर सूरज के उस प्रचंड पौरुष को ठुकरा नहीं पा रहा था। उसकी कमर ऊपर उठने के बजाय खुद-ब-खुद नीचे की ओर झुकती गई, जिससे वह मिलन और भी गहरा हो गया।

कमरे में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया। कुछ पलों के लिए सब कुछ थम गया। न सूरज ने अपनी कमर हिलाई, न ही सोनी ने कोई हलचल की। वे बस उसी स्थिति में एक-दूसरे में सिमटे रहे।

नियति सांसे थामें इस अद्भुत और कामुक दृश्य को देख रही…थी खजुराहो की मूर्तियों जैसे प्रेम आलिंगन में लिप्त सूरज और सोनी की जोड़ी अनुपम थी अद्वितीय थी..

शेष अगले भाग में…

पाठकों से अनुरोध है की इसी परिपेक्ष्य में सूरज और सोनी की तस्वीर साझा करें पर ध्यान रहे पिक्चर सुंदर होनी चाहिए गंदी नहीं..




पिक्चर के साथ आपको क्या पसंद आया क्या नापसंद यह भी मुझे सूचित करेंगे तो मुझे और भी खुशी होगी धन्यवाद।



अगला अपडेट मिलन का अपडेट है जो आपके द्वारा भेजी गई चित्र के बाद आपके डायरेक्ट मैसेज पर भेज दिया जाएगा..

 
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