भाग 161
“बेटा, तुझे नहाने में बड़ी तकलीफ़ होती होगी?”
“हाँ, होती तो है, पर मैनेज कर लेता हूँ,” सूरज ने धीमे स्वर में जवाब दिया।
“एक हाथ से कठिन तो होता ही होगा?”
“हाँ, पर मजबूरी है…” सूरज ने मायूसी भरे स्वर में कहा।
“अरे, जब घर में तेरी नर्स मौसी है, तो उसकी मदद ले ले…”
सुगना ने बिना रुके सोनी की ओर देखते हुए कहा,
“कल सुबह ज़रा सूरज की मदद कर देना। अच्छे से स्नान कर लेगा तो उसे भी अच्छा लगेगा।”
सोनी के मन में सूरज के साथ बिताए पलों की याद ताज़ा हो उठी। उसके चेहरे पर शर्म की हल्की लालिमा झलकने लगी, जिसे केवल सूरज ही महसूस कर सका। इस ख्याल मात्र से उसकी धड़कनें भी अनायास तेज़ हो गईं।
अगली सुबह सचमुच विशेष होने वाली थी…
अब आगे
रात गहरा रही थी और सोनी अपनी स्मृतियों में अपने पुराने दिनों को याद कर रही थी
स्मृतियाँ हमारे जीवन की अमूल्य धरोहर हैं, जो बीते हुए पलों को हमारे भीतर जीवित रखती हैं। वे कभी मुस्कान बनकर सुकून देती हैं तो कभी सीख बनकर हमें मजबूत बनाती हैं। अतीत के अनुभव ही हमारे व्यक्तित्व और निर्णयों को आकार देते हैं, इसलिए स्मृतियाँ केवल यादें नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व का अभिन्न हिस्सा हैं।
सोनी का अतीत अनेक अनुभवों से भरा हुआ था, ईश्वर ने उसे सब कुछ दिया था परंतु फिर भी उसके जीवन में एक गहरी कमी आज तक बनी हुई थी—माँ बनने की अधूरी चाह। ऐसा नहीं था कि उसने और उसके पति विकास ने इसके लिए प्रयास न किए हों। उन दोनों ने भरपूर प्रयास किए, चिकित्सा कराई और हर संभव उपाय अपनाए; केवल किसी पराए पुरुष से संबंध बनाने का विचार ही उनके बीच अनकहा रह गया। जब तमाम कोशिशों के बाद भी सफलता नहीं मिली, तो विकास के मन में कभी-कभी ऐसे विकल्प भी उभरने लगे, जिन्हें स्वीकार करना सरल नहीं था। विकास को एक बार फिर अल्बर्ट की याद आई जिसके साथ सोनी के एक अनुभव के लिए संभोग किया था वह भी विकास की उपस्थिति में। पर किसी विदेशी मूल के युवक से संभोग कर जन्मी औलाद कैसी होगी यह सोचकर ही विकास की आत्मा हिल गई।
एक अलग प्रजाति के बालक को अपने घर में अपने पुत्र के रूप में पालना निश्चित ही हास्यास्पद लगता।
अपने देश और परिवार की प्रतिष्ठा, सामाजिक मर्यादाएँ और निजी भावनाएँ—इन सबके बीच विकास उलझा रहा। वह मन की बात खुलकर कह नहीं पाता था, और सोनी भी उसकी दुविधा को समझते हुए मौन साधे रहती। अमेरिका में रहकर उसके विचार अपेक्षाकृत खुले अवश्य हो गए थे, पर अपनी जड़ों और संस्कारों से पूरी तरह मुक्त हो पाना संभव नहीं था। किसी पराए परिचित पुरुष के साथ अंतरंग होने की कल्पना भी उसके लिए भीतर से झकझोर देने वाली थी। इस प्रकार दोनों के बीच एक अनकही बेचैनी थी—इच्छा भी, संकोच भी; आकांक्षा भी, और मर्यादा की दीवार भी।
माँ बनने की संभावनाओं पर विचार करते हुए उसे सरयू सिंह की याद आई थी। उसके मन में क्षणभर को यह विचार कौंधा था कि काश जीवन में सरयू सिंह उसे उस रिश्ते में न मिले होते और युवा होते, काश उसकी गोद भरने का सौभाग्य उन जैसे किसी सशक्त, आत्मविश्वासी पुरुष के साथ मिलता, जो उसके भीतर मातृत्व का सपना साकार कर पाता।
यह मात्र एक कल्पना थी—अधूरी इच्छाओं और मानसिक द्वंद्व से उपजी हुई। उस विचार के आते ही उसके मन में अनेक भाव उमड़ने लगे—आकांक्षा, अपराधबोध, जिज्ञासा और सामाजिक मर्यादाओं का दबाव। वह जानती थी कि जीवन केवल इच्छाओं से नहीं चलता; उसमें संबंधों की मर्यादा, विश्वास और आत्मसम्मान भी जुड़े होते हैं। फिर भी, उस रात उसके मन में उठे विचारों ने उसे भीतर तक झकझोर दिया था। वह समझ नहीं पा रही थी कि यह उसकी अधूरी चाह की पुकार थी या केवल एक क्षणिक भावुकता, जो एक नारी के मातृत्व की गहरी आकांक्षा से जन्मी थी।
सोनी जितना सरयू सिंह के बारे में सोचती, उतनी ही भीतर से विचलित होती जाती। अब तक सोनी ने सरयू सिंह की वासना को सिर्फ छेड़ा था और उनके मजबूत लंड को अपनी वासना जागृत करने के लिए मन ही मन प्रयोग किया था। पर पिछले भारत प्रवास की वह घटना उसके मन में गहरे अंकित थी—जब सलेमपुर में उसने संयोगवश सरयू सिंह के पुराने बक्से में अपनी लाल पैंटी को उनके वीर्य से सना देखा था, जिसने उसे यह एहसास करा दिया कि सरयू सिंह की भावनाएँ मात्र औपचारिक या प्रेम पूर्ण नहीं थीं। उस क्षण उसे पहली बार सरयू सिंह का वासना से भरा हुआ व्यक्तित्व दिखाई पड़ा था।
उसी के बाद, शायद शरारतवश, उसने उन्हें अपनी पहनी हुई पेंटी उपहार में उस बक्से में रख दिया था। यह एक साहसी, किंतु सोच-समझकर किया गया कदम था—मानो वह यह परखना चाहती हो कि उसके प्रति सरयू सिंह के मन में वास्तव में क्या स्थान है। उसे अब लगभग निश्चित हो चला था कि उनकी कल्पनाओं में वह कहीं न कहीं विशेष रूप से उपस्थित है। उम्र और सामाजिक मर्यादाओं के बावजूद, उनके भीतर दबी वासना उसे केंद्र में रखकर ही आकार लेती रही होंगी—यह बात वह समझ चुकी थी।
फिर भी, सोनी को इससे कोई आपत्ति नहीं थी। सरयू सिंह ने आज तक विवाह नहीं किया था; वे अकेले थे, और मनुष्य होने के नाते उनकी भी अपनी शारीरिक और भावनात्मक आवश्यकताएँ रही होंगी। अपनी शिक्षा और अनुभव के आधार पर सोनी यह जानती थी कि कई बार लोग अपनी सीमाओं और परिस्थितियों के भीतर ही अपनी यौन इच्छाओं को जीने के छोटे-छोटे, निजी तरीके खोज लेते हैं।
वैसे भी सोनी अपने युवा बदन को लेकर यह बात भली-भांति जानती थी कि वह कई मर्दों के आकर्षण का केंद्र थी। उसे यह बात बेहद प्रसन्न करती थी कि ईश्वर ने उसे एक खूबसूरत शरीर से नवाजा है और यदि कोई उसे अपनी कल्पना में रखकर अपनी वासना को जवान करता है तो उसे इस बात से कोई आपत्ति नहीं थी।
सोनी का आकर्षण सरयू सिंह के प्रति लगातार बढ़ता जा रहा था। अमेरिका में रहते-रहते वह अक्सर अब उनके बारे में सोचने लगी थी। क्या सरयू सिंह के साथ उसका मिलन हकीकत में संभव है? क्या सरयू सिंह, जिन्होंने आज तक विवाह नहीं किया था, सचमुच किसी युवती से संभोग की इच्छा रखते होंगे, या उनकी मनोदशा में एकांत ही स्वीकार्य होगा? और यदि वे इच्छुक हुए भी, तो क्या वे उसे मातृत्व का सुख दे पाने में सक्षम होंगे?
जितना ही सोनी इस बारे में सोचती, उतना ही उसका दिमाग उलझता जाता। लगभग रिटायरमेंट की उम्र तक पहुँच चुके एक मजबूत व्यक्तित्व वाले पुरुष के साथ संभोग की कल्पना करना उसके लिए अनोखी थी। पर कल्पनाएँ होती ही इसलिए हैं—उनमें न मर्यादा होती है, न कोई बंधन और न ही कोई पाबंदी। सोनी जितना सरयू सिंह के बारे में सोचती गई, उसे उतना ही यह मिलन सहज लगने लगा। लेकिन जब-जब वह अपनी कल्पनाओं से बाहर निकलकर वास्तविकता के धरातल पर इस विषय में सोचती, उसकी रूह काँप उठती। सरयू सिंह जैसे समाज में सम्मानित और मर्यादित व्यक्ति के सामने यह बात रखना—और स्वयं उनके साथ हमबिस्तर होने का साहस जुटाना—और हकीकत में कर पाना अत्यंत कठिन था।
सोनी तरह-तरह के उपाय सोचती, पर हर बार उसका मन उसे कल्पनाओं की दुनिया में बहुत आगे ले जाता और फिर अचानक वास्तविकता उसे रोक देती। वह मायूस हो जाती। इसी बीच कुछ महीने और बीत गए और आखिरकार सोनी की भारत वापसी का दिन निर्धारित हो गया। विकास और सोनी का अमेरिका प्रवास समाप्त होने वाला था। उन्होंने अमेरिका को अलविदा कहा, अपने पूरे परिवार के लिए अनेक प्रकार के उपहार खरीदे और अपने वतन वापसी की फ्लाइट पकड़ ली।
सोनी के दिल में जो कसक उठी थी, उसे शांत करने के लिए उसे किसी अपने के सहारे की आवश्यकता थी। आखिरकार एक ही व्यक्ति था जिसने अब तक सबका ख्याल रखा था—लाली को भी उससे बहुत उम्मीद थी—और वह थी सबकी प्यारी, सबकी दुलारी, सबका ख्याल रखने वाली सुगना।
सोनी जब जब सुगना के बारे में सोचती उसे यकीन ही नहीं होता कि अपने पति के बैरागी हो जाने के बाद और दांपत्य सुख से वंचित होने के बावजूद भी सुगना इतनी खुश कैसे रह लेती थी जैसे चेहरे पर कोई तनाव ही ना हो। सोनी को क्या पता था की सुगना उसे दौरान सोनू के सानिध्य में इस धरती पर स्वर्ग के मजे ले रही थी।
सुगना का ध्यान आते ही सोनी अपनी यादों से बाहर आ गई।
पलके खुली सोनी ने घड़ी की तरफ देखा रात के 12:00 बज चुके थे अगला दिन शुरू हो चुका था। उसे डाइनिंग टेबल पर कही सुगना की बात ध्यान आ गई उसे सूरज को स्नान कराने में मदद करनी थी। एक पूर्ण युवा जिसका दिव्य लंड सोनी ने कल ही छुआ था महसूस किया था और उसे स्वयं अपनी वासना जागृत कर अपनी जांघों के बीच गीलापन महसूस किया था उसे आज स्नान कराना निश्चित ही एक रोमांचक अनुभव होने वाला था सोनी जितना उसे बारे में सोचती गई उतना ही उसके ऊपरी होठों पर मुस्कान और निचले होठों पर गीलापन आता गया कल का दिन रोमांचक होने वाला था।
गली सुबह वह शानदार हवेली सोनी और सूरज के बीच एक नया अध्याय लिखने को तैयार थी। सोनी और सूरज को छोड़कर बाकी लोगों के लिए यह एक सामान्य दिन था। शायद सूरज को भी इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि आज का दिन उसके लिए कितना विशेष होने वाला है, पर सोनी मन ही मन कुछ ठान चुकी थी।
बच्चों से भरे घर में सुबह बड़ी हलचल रहती है। हवेली में चारों तरफ चहल-पहल हो रही थी। सभी बच्चे अपने-अपने कॉलेज के लिए तैयार हो रहे थे। कभी कोई इस चीज़ की फरमाइश करता, तो कभी किसी और चीज़ की। सुगना और सोनी नौकर-चाकरों को कभी दिशा-निर्देश देतीं, तो कभी बच्चों के लिए नाश्ते का प्रबंध करतीं।
समय की अपनी गति होती है। घर की चहल-पहल कुछ ही देर में सन्नाटे में बदल गई। सभी बच्चे अपने-अपने कॉलेज की ओर निकल चुके थे। रतन की पुत्री मालती चुस्त जींस पहनकर बाहर जा रही थी। सोनी ने पहले उसे देखा, फिर सुगना की तरफ देखा। सुगना भी शायद वही देख रही थी जो सोनी देख रही थी। मालती की गाडरी हुई कमर और भारी भारी नितंब यह चीख चीख कर कह रहे थे की उसके खेत पक चुके उन्हें जोतने का वक्त आ चुका है पर सुगना और सोनी को क्या पता था की मालती की खेत पर लाली का पुत्र राजू अक्सर भ्रमण कर रहा था और कभी-कभी उसका कच्चा खेत जोत भी दे रहा था।
सोनी ने मुस्कुराते हुए कहा,
“अब मालती के हाथ पीले करने का वक्त आ चुका है। इससे पहले कि वह हाथ से निकल जाए, उसके लिए लड़का देखना शुरू कर देना चाहिए।”
सुगना मुस्कुरा दी। उसे पता था कि सोनी के मन में यह बात क्यों आई थी।
घर में अब सिर्फ सुगना, सोनी और सूरज ही बचे थे। आज सूरज को अपने हाथ का प्लास्टर कटवाने अस्पताल जाना था, इसलिए वह कॉलेज नहीं गया था।
“मां, एक कप चाय और मिलेगा क्या?” सूरज ने अनुरोध भरे स्वर में कहा।
सुगना से पहले सोनी ने प्रतिक्रिया दी और बोली, “तुम दीदी के साथ बैठकर बातें करो, मैं लेकर आती हूं।”
सुगना आज फिर शांत थी। सूरज ने सुगना का चंचल रूप केवल बचपन में देखा था। सरयू सिंह के निधन के बाद सुगना का व्यक्तित्व अचानक बदल गया था। परंतु सूरज के लिए यह कोई बदलाव नहीं था। उसने जब से होश संभाला था, उसने सुगना को इसी संजीदा रूप में देखा था—पूरी तरह संयमित, गरिमा से भरी, एक आदर्श मां के रूप में।
आज पहली बार सूरज ने हिम्मत जुटाकर सुगना से पूछा,
“मां, तुम इतनी शांत क्यों रहती हो?”
सुगना ने अपने चेहरे पर हल्की मुस्कान लाकर कहा, “नहीं, ऐसी तो कोई बात नहीं है। तुझे ऐसा क्यों लगा?”
“दादी-नानी सब कहते हैं कि तुम पहले बहुत चंचल और खुशमिज़ाज थीं, सबको खुश रखती थीं।”
“नहीं बेटा मैं अब भी ठीक हूं..
कुछ तो बात है। सब कहते हैं, जब से बाबा का निधन हुआ, तुम बदल गईं। मौसी भी कहती हैं कि मेरी मां पहले ऐसी नहीं थीं।”
सुगना मुस्कुरा उठी। आज कई दिनों बाद उसके चेहरे पर एक अलग चमक दिखाई दी। वह सुंदर तो थी ही, पर मुस्कुराहट ने उसकी सुंदरता और बढ़ा दी। सुगना के सुंदरता पर तो सबको रश्क होता था। आज इस उम्र में भी वह कई युवा महिलाओं पर भारी थी अपने दमकते चेहरे और गठे हुए बदन से वह आज की श्वेता तिवारी को भी मात देती थी। बस सुगना की सादगी ही उसे वासना भरी निगाहों से बचा रही थी अन्यथा यदि सुगना रंग बिरंगे कपड़े पहने लगती तो निश्चित थी कई मर्दों की वासना के केंद्र में एक बार फिर आ जाती उसका दीवाना उसका छोटा भाई सोनू उसके उस कामुक रूप से कई वर्षों से वंचित था पर उसे उम्मीद थी की कभी ना कभी सुगना फिर सामान्य होगी पर शायद उसका इंतजार लंबा था।
ऐसा नहीं की सोनू ने सुगना को सामान्य करने के लिए कोशिश नहीं की पर सुगना ने जब एक बार मन बना लिया तो फिर उसे डिगा पाना कठिन थाउसने स्वयं वासना से खुद को दूर कर लिया।
मां, कहां खो गई.. सूरज ने फिर सुगना का ध्यान खींचा देख मौसी को कितना खुश रहती है और हमेशा चहकती रहती है…
तभी सोनी चाय लेकर आ गई। “मौसी” शब्द सूरज के मुंह से उसने सुन लिया था। आते ही उसने पूछा,
“अरे, मेरे बारे में क्या बातें हो रही थीं?”
“कुछ नहीं मौसी,” सूरज हंसते हुए बोला, “ मा कितना उदास रहती है, मैं कह रहा था कि बीती बातों को भूलकर आगे बढ़ना चाहिए हमेशा खुश रहना चाहिए। जीवन बार-बार थोड़े ही मिलता है।”
“हां, सूरज सच कह रहा है,” सोनी ने सहमति जताई।
मौसी चलो मां को एक बार पिकनिक पर लेकर चलते हैं ।
सुगना आज सचमुच खुश थी। उसे अच्छा लगा कि सूरज उसका ख्याल रख रहा है, उसकी चिंता कर रहा है।
सुगना ने हामी भर दी।
सोनी और सूरज ने स्नेह से सुगना की हथेलियां अपनी हथेलियों में ले लीं और प्यार से सहलाने लगे।
नियति खिड़की पर बैठी इन तीनों को देख रही थी। उसे जैसे आभास था कि समय ने इनके जीवन में अभी और भी कई रंग संजो रखे हैं।
सुगना ने सूरज के प्लास्टर लगे हाथ को सहलाते हुए पूछा,
“दर्द अब बिल्कुल नहीं होता ना?”
“नहीं मां,” सूरज ने सहजता से उत्तर दिया
नहीं मां
इसी बीच सुगना सूरज के उस जादुई अंगूठे को सहलाने लगी सूरज ने उसे महसूस भी किया पर उसके लंड में कोई हरकत नहीं हुई। सूरज इस बात पर थोड़ा आश्चर्यचकित था उसने सुगना को रोका नहीं सुगना ने बिना किसी उद्देश्य के प्यार से ही उसे अंगूठे को सहलाती रही पर सूरज के लंड में अब भी कोई हरकत नहीं हुई ।
यह बात सूरज को हजम नहीं हो रही थी कि क्यों सोनी मौसी के अंगूठा से ले जाने पर उसके लंड में तनाव आता था और वही उसकी मां सुगना के सहलाए जाने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं होती थी बात समझ में आने जैसी नहीं थी। उसे क्या पता था कि यह एक जटिल पहेली थी।
सुगना सोनी और सूरज चाय पीने लगे तीनों एक साथ बेहद खूबसूरत लग रहे थे सूरज सुगना का पुत्र था और उसके जैसे ही सुंदर। सोनी सुगना की बहन थी उसकी सुंदरता में भी कोई कमी न थी।
खूबसूरती की अपनी परिभाषा होती है उसे आप तुलनात्मक नहीं बना सकते। दो तितलियां और एक भंवरा तीनों एक से बढ़कर एक खूबसूरत थे।
यदि ईश्वर उन्हें अलग-अलग जगह पर एक ही समय पर पैदा किया होता तो निश्चित ही उन्हें देखकर सब एक ही बात कहते यह तो एक दूसरे के लिए ही बने हैं।
पर सोनी में आधुनिकता ज्यादा थी वह शहरी परिवेश में पूरी तरह ढल चुकी थी और वर्तमान में सादगी में लिपटी सुगना से कहीं ज्यादा कामुक दिखाई पड़ती थी।
चाय की आखिरी चुस्की लेते हुए सुगना ने कहा…
मुझे योगा क्लास में जाना होगा तुम्हारा डॉक्टर का अपॉइंटमेंट कितने बजे का है
मां 10:00 बजे का
तो जा जल्दी से स्नान कर ले और मौसी को भी साथ ले जाना।
सुगना ने शायद यह कहने की कोशिश की की मौसी को साथ डॉक्टर के यहां ले जाना पर सूरज और सोनी ने इसका अलग मतलब निकाला।
सुगना उठ खड़ी हुई और टेबल पर से चाय के कप लेकर रसोई की तरफ बढ़ गई।
सुगना के जाने के बाद सोनी भी उठ खड़ी हुई बोली जा तू भी तैयार हो जा तब तक मैं भी रेडी हो जाती हूं.
मौसी आपने सुना था मा ने क्या कहा..
उन्होंने कहा था जल्दी से स्नान कर ले और मौसी को भी साथ ले जाना.. सूरज ने जिस अंदाज में यह बात की थी सोनी समझ चुकी थी कि सूरज ने भी सुगना की बात का वही मतलब निकाला था।
उसने मुस्कुराते हुए कहा जा अपने कपड़े लेकर मेरे ही बाथरूम में आजा मैं मदद कर दूंगी..
सूरज की धड़कनें तेज हो गई वह अपने कमरे में चला गया धड़कने तो सोनी की भी तेज थी आज सोनी नाम मन ही मन मन जो ठाना था उसे क्या वह अमल में ला पाएगी वह इस प्रश्न और इसके संभावित उत्तरों में खो गई।
अपनी योगा ड्रेस में तैयार होकर बाहर आ चुकी थी उसने सोनी को अब भी हाल में देखकर बोला जा जल्दी कर नहीं तो लेट हो जाएगा मैं जा रही हूं..
सुगना हवेली के दूसरे भाग में जहां पर उसकी योगा क्लासेस चलती थी चली गई पूरी हवेली शांत थी पर सूरज और सोनी के दिल की धड़कनें तेज थी कुछ ही देर में सूरज अपने हाथ में एक तौलिया और कुछ कपड़े लिए अपने कमरे से बाहर निकला और सोनी के पीछे-पीछे उसके कमरे में आ गया।
सोने का कमरा बेहद खूबसूरत और बड़ा था उसका बाथरूम भी बेहद शानदार था और वह भी क्यों ना सोनी इस हवेली की मालकिन थी हवेली के ऐश्वर्य पर उसका अधिकार था।
सोनी की सूरज से नजरे मिलाने की हिम्मत नहीं हुई उसने बिना उसकी तरफ देखे कहा
तू बाथरूम में जाकर स्नान शुरू कर मैं आती हूं..
सूरज अंदर चला गया जाने से पहले उसने अपना पजामा और शर्ट बाहर ही निकाल दिया और तौलिया लपेटकर बाथरूम के अंदर आ गया।
सोनी का बाथरूम सचमुच बेहद खूबसूरत था। बाथ टब से लेकर जितनी भी सुविधा बाथरूम में दी जा सकती थी वह सब उपलब्ध थी। साथ ही विभिन्न प्रकार के शावर जेल और कई खूबसूरत तथा सुगंधित परफ्यूम की बोतल रखी हुई थी। सूरज उनकी खूबसूरती में खो गया। उसने शावर खोला और शावर से झरने का पानी उसके बदन पर गिरने लगा तभी उसे ध्यान आ जाए कि उसने अपनी बनियान नहीं उतरी है। उसने अपनी बनियान भी उतार दी और पास दीवार पर लगे टॉवल रोड़ के बगल में खाली जगह पर टांग दी।
शावर का गुनगुना पानी उसके बदन पर गिरने लगा सूरज अपना एक हाथ शावर की जद से बाहर किया हुआ था जिससे उसका प्लास्टर नहीं भींगे। और दूसरे हाथ से अपने बदन पर शावर पानी को अपने बदन पर फैला रहा था।
एक हाथ से स्नान करना इतना भी मुश्किल नहीं था पर अब जब सोनी स्वयं तैयार थी तो सूरज ने कल के अधूरे स्खलन को आज अंजाम तक पहुंचाने के लिए आगे बढ़ने का फैसला कर लिया था।
उधर सोनी ने अपने वस्त्र बदल लिए थे वह एक खूबसूरत सी नाइटी पहने हुए आगे होने वाले घटनाक्रम के बारे में सोच रही थी.. उसके भीतर एक द्वंद्व चल रहा था सूरज के तने हुए लंड को देखने उसे छूने उसे महसूस करने के लिए उसका रोम रोम उसे इस कृत्य को करने के लिए उकसा रहा था। वहीं दूसरी तरफ उसका दिमाग और अंतरात्मा उसे अपने पुत्र समान सूरज को वासना से प्रेरित होकर इस दलदल में उतरने के लिए रोकना चाह रही थी।
पर आखिरकार वासना ग्रस्त सोनी अपनी अंतरात्मा की आवाज को दरकिनार कर मन ही मन आगे बढ़ाने को तैयार हो रही थी।
सूरज ने कुछ देर एक हाथ से अपने शरीर को मलने की कोशिश करते हुए उसने सोनी को आवाज़ लगाई.
मौसी…
सोनी खुद अपनी हिम्मत जुटा रही थी. सूरज की आवाज ने उसके इधर चल रहे द्वंद्व को रास्ता दिखाया और सोनी अपनी नाइटी पहने बाथरूम में प्रवेश कर गई..
सोनी में अंदर का नजारा देखा उसके होंठ खुले रह गए..
इतना गठीला बदन शरीर की सारी मांसपेशियां अपनी जगह पर उभार उभार कर सूरज के बदन को एक खूबसूरत आकर दे रही थी शर्ट के भीतर से शायद सूरज के शरीर की यह खूबसूरती दिखाई नहीं पड़ती थी परंतु नंगे बदन सूरज को देखकर सोनी की सांस हलक में अटक गई कोई इतना खूबसूरत और इतना गठीला कैसे हो सकता है सूरज की पीठ सोनी की तरफ थी सूरज की चौड़ी पीठ और पतली कमर तथा एकदम गठीले और कसे हुए नितंब और उनके नीचे मांसल जांघें कसी हुई पिंडलियां सब कुछ सोनीकी उम्मीद से परे था।
सूरज को देखकर सोनी को सरयू सिंह की याद आ गई और आती भी क्यों नहीं सरयू सिंह का पुत्र सूरज उसके समक्ष उनसे ज्यादा वैभव और कांति लिए सोने के समक्ष उपस्थित था।
सोनी सोचने लगी सपना दीदी सचमुच महान थी जिसने इतने सुंदर पुत्र को जन्म दिया था। बेचारी सोनी को यह बात कहां पता नहीं थी की सूरज सरयू सिंह का ही पुत्र है
तभी सूरज ने एक बार फिर आवाज लगाई ..
मौसी जल्दी कीजिए देर हो जाएगी डॉक्टर के पास भी जाना है।
ठीक है ठीक है रुक जा मैं लगाती हूं.. सोनी कहते हुए आगे बढ़ी उसने अपनी हथेली पर एक खुशबूदार शावर जेल निकाला और उसे अपनी हथेली पर रगड़ा कुछ ही देर में वह सूरज की पीठ पर शावर जेल लगाने लगी सूरज ने शावर बंद कर दिया था।
सूरज की नंगी पीठ पर सोनी की कोमल हथेलियां शावर जेल के मखमली झाग के साथ-साथ घूम रही थी कभी सोनी अपनी उंगलियों से उसके मांसल बदन को महसूस करती कभी चोरी पीठ के आकार को जब उसकी उंगलियां सूरज की कमर तक पहुंचती सोने की धड़कनें तेज हो जाती और वह पर रुक जाती।
पीठ के बाद भारी सूरज की मजबूत भुजाओं की आई और धीरे-धीरे सोने की उंगलियां सूरज के अंगूठे तक पहुंच गई सोनी जानती थी कि वह क्या करने जा रही है उसने सूरज के अंगूठे पर भी अपने हाथ लगा दिए सूरज को भी एहसास हो गया की आगे क्या होने वाला है उसने सोनी को रोका नही अपितु उसका तन-बदन रोमांचित हो गया।
आखिरकार वही हुआ जिसे नियती ने निर्धारित कर रखा था जैसे-जैसे सोनी सूरज के अंगूठे को सहलाती गई उसका लंड तन कर उसकी चड्डी को तनाव देता गया कुछ ही पलों में लंड पूरी तरह खड़ा हो चुका था अब उसका तनाव सूरज के बर्दाश्त की सीमा से बाहर हो रहा था उसने सोनी का हाथ पकड़ लिया और बोला
मौसी बस..
सोनी ने अनजान बनते हुए पूछा क्या हुआ.
सूरज ने कुछ कहा नहीं अपितू घूम कर सोने के समक्ष आ गया सूरज का लंड पूरी तरह तना हुआ था और ऐसा लग रहा था जैसे वह उसकी चड्डी को फाड़कर बाहर आ जाएगा..
अपने समक्ष खूबसूरत नाइटी में अपनी गदराई हुई मौसी सोनी को देखकर सूरज मन ही मन उसे अपने आगोश में भरने की सोचने लगा पर मर्यादा की दीवार अब भी कायम थी सोनी ने अनजान बनते हुए पूछा क्या हुआ?
सूरज ने कुछ कहा नहीं अपनी नज़रें झुका दी सोनी ने सूरज की निगाहों को फॉलो किया और उसकी निगाहें सूरज के जांघों पर अटक गई जहां एक खंभे नमः आकृति चड्डी को बाहर फाड़ कर आने को तैयार थी..
ओह.. तो इसलिए ही तू परेशान था..
सूरज और सोनी की निगाहें मिली कहने सुनने को कुछ बाकी नहीं था जो होना था वह हो चुका था..
सोनी ने हिम्मत जुटा और बोली ला उसे दिन जो काम छूट गया था उसे पूरा कर देती हूं। सूरज ने कुछ बोला नहीं वह इस सुनहरे मौके को कतई नहीं खोना चाहता था। उसने अपने हाथ से अपनी चड्डी को झट से नीचे कर दिया सूरज का तनाव हुआ लंड उछाल कर बाहर आ गया और सोनी उसकी खूबसूरती में एक बार फिर से खो गई.. उसका दिल तेजी से धड़क रहा था जिसका असर उसकी चुचियों पर स्पष्ट दिखाई दे रहा था।
कांपते हाथों से सोनी ने एक बार फिर उस दिव्य पर प्रतिबंधित लंड को अपनी हथेलियों से छूने की कोशिश की और जब एक बार वह बना हुआ लंड सोनी की झाग से सनी हथेलियां के बीच आ गया मर्यादा की दीवार पिघल कर पानी पानी हो गई।
सूरज ने बिना कहे अपनी आंखें बंद कर ली पर वह सोनी की हथेली को अपने लंड पर आगे पीछे घूमते महसूस करने लगा।
शेष अगले भाग में..