Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 117 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

मुझे उम्मीद है आप सब तक 164 अपडेट पहुंच चुका है बाकी पाठकों से भीअनुरोध है कि खुल कर कहानी के मंच पर आएं और कहानी को आगे बढ़ाने में अपना योगदान दें
 
यूं ही जुड़े रहिए और इसी प्रकार मेंरे पढ़ने लायक कुछ ना कुछ भेजते रहिए
 
मित्र बड़े दिनों बाद तो आए हो डांटो मत देते भाई
 
वेलकम बैक जुड़े रहिए..

अपडेट सेंट

प्रिय दोस्तों यह कहानी आप सबके एंटरटेनमेंट के लिए बनाई गई है और मेराइंटरटेनमेंट यही है कीआप इस कहानी से जुड़करअपने विचार रखते रहे और आपके विचारों में ही मुझे आगे कहानी लिखने का सूत्र मिल जाता है यह यह कहानी सिर्फऔर सिर्फ टाइम पास करने का एक जरिया है जो आप सबके सहयोग से ही आगे बढ़ सकता है आप खुलकर आएंगी तोमुझे लगेगा की हां इस कहानी के पाठक है और मुझेआगे लिखने का मन करेगा मुझे अभी भी इंतजारहै अपने प्रिय पाठकों का
 
भाग 165

सरयू सिंह के मन में लड्डू फूट रहे थे, पर चेहरे पर उन्होंने एक बुजुर्गियत भरा अनुशासन बनाए रखा। उन्होंने अपनी चाय खत्म की और बोले, "ठीक कहत बाड़ू । हमरो मंदिर गईला बहुत दिन हो गइल बा। तू तैयारी करऽ, हम साथे चलब।"

सरयू सिंह के मन में लड्डू फूट रहे थे वह सोनी को अपनी नजरों ओझल नहीं होने देना चाहते थे। अपनी वासना में वही अभी भूल चुके थे कि निमंत्रण मंदिर जाने का था ना की सोनी की जवानी का रसास्वादन का।

यह तो सिर्फ सुगना जानती थी और शायद इसीलिए उसने सोनी को वह विशेष साड़ी पहनाई थी।



अब आगे….

कुछ ही देर बाद सोनी सुगना और सरयू सिंह पैदल ही मंदिर के लिए निकल पड़े यह मंदिर तंत्र-मंत्र के लिए जाना जाता था।

मंदिर के मार्ग में सरयू सिंह आगे आगे चल रहे थे और सोनी और सुगना पीछे-पीछे सरयू सिंह चाहते तो थे की सोनी उनके आगे चले और वह उसकी रसीली जवानी का रसपान अपनी आंखों से कर पाए परंतु यह कहना उचित नहीं होता पर जैसे ही वह मंदिर की सीढ़ियों के समीप पहुंचे उन्होंने सुगना और सोनी से कहा..

अब तू लोग आगे आ जा हम पीछे बानी। पीछे से लफूवा सब बदमाशी कर सकेला।

मंदिर की उन ऊँची सीढ़ियों पर, धूप और अगरबत्ती के धुएं के बीच, जब सरयू सिंह की नज़रें सोनी की गुलाबी शिफॉन वाली देह पर ठहरीं, तो वक्त जैसे ठहर गया। बनारस की वह शाम अचानक बरसों पुरानी उन मदहोश रातों में तब्दील हो गई, जब सलेमपुर की उनकी कोठरी में वासना का राज हुआ करता था।

सोनी को उस गुलाबी साड़ी में देखकर सरयू सिंह के मन में कामुकता का एक ऐसा ज्वार उठा, जिसने मर्यादा की हर दीवार को हिलाकर रख दिया। उन्हें वह दिन याद आ गया जब उन्होंने खुद शहर के सबसे बड़े कपड़े वाले के यहाँ से यह 'गुलाबी शिफॉन' खास साड़ी सुगना के लिए पसंद की थी। उस वक्त सुगना उनकी प्रेयसी थी और सरयू सिंह उसके यौवन के दीवाने थे।

उन्हें याद आने लगा कि कैसे उन्होंने सुगना से ज़िद की थी कि वह बिना किसी अंतःवस्त्र के केवल इस महीन साड़ी को अपने बदन पर लपेटे। जब सुगना वह साड़ी पहनकर उनके सामने आई थी, तो शिफॉन का वह पारदर्शी कपड़ा उसके उभरते हुए बदन की हर लकीर को और भी नुमाया कर रहा था। सरयू सिंह ने उस वक्त सुगना को अपनी गोद में खींच लिया था।

सरयू सिंह की आँखों के सामने वह दृश्य सजीव हो उठा, जब उन्होंने अपने कांपते और मजबूत हाथों से उस गुलाबी साड़ी की एक-एक तह को खोला था। उन्हें याद आया कि कैसे सुगना के मथुनी जैसे उरोज उस साड़ी के हटने के बाद उनकी आँखों के सामने आए थे। वह रेशमी अहसास, सुगना का वह मादक और नग्न बदन, और उस साड़ी का फर्श पर गिरना—यह सब सरयू सिंह के मस्तिष्क में किसी चलचित्र की तरह चलने लगा। उन्होंने सुगना के उस मटकते बदन का जो आनंद लिया था, वह सुख आज सोनी को देखकर उनके पौरुष में एक तीखी लहर पैदा कर रहा था।

जब से उन्हें पता चला था कि सुगना उनकी अपनी पुत्री है तभी से वह सुगना को अपनी कामुकता की जद से बाहर कर चुके थे पर आज उसे गुलाबी साड़ी को देखकर उनके मन में उसे दिन की यादें ताजा हो गई थी।

आज वही साड़ी सोनी के बदन पर थी। सोनी भी उसी गर्भ से निकली थी जिस गर्भ से सुगना दोनों ने सुंदरता रति की पाई थी। अपनी आत्मज्ञानी को मिटाने के लिए उन्होंने अपने मनोमस्तिष्क में सुगना की जगह सोनी के कामुक बदन को स्थान दे दिया था।

सोनी ने पीछे मुड़कर यह देखने की कोशिश की की सरयू सिंह पीछे तो है ना? उसकी नज़रें सरयू सिंह से चार हो गई और सोनी ने अपनी नज़रें झुका ली।

उसी समय सरयू सिंह ने जब एक झलक सोनी की उस पतली कमर और साड़ी के नीचे से झलकती नाभि को देखा, तो उन्हें लगा जैसे सुगना का वही पुराना यौवन और भी ज़्यादा निखर कर उनके सामने आ गया है।

सुगना अपनी सहज चाल में थी, लेकिन उसके बगल में चलती सोनी का व्यक्तित्व उस शाम कुछ अलग ही छटा बिखेर रहा था। सरयू सिंह दो कदम पीछे थे, और उनकी अनुभवी आँखों के लिए यह दूरी किसी वरदान से कम नहीं थी।

सोनी जैसे ही मंदिर की पहली सीढ़ी पर चढ़ी, हवा के एक शरारती झोंके ने उसकी गुलाबी शिफॉन की साड़ी को उसके बदन से और भी कसकर सटा दिया। पारदर्शी कपड़े के नीचे से सोनी की कसरती और सुडौल जंघों की हरकत साफ़ झलक रही थी। सरयू सिंह की नज़रें किसी शिकारी की तरह सोनी के निचले हिस्से पर ठहर गईं। हर पायदान ऊपर चढ़ते वक्त सोनी के भारी और पुष्ट नितंब एक खास लय में मटक रहे थे, जिससे साड़ी का महीन कपड़ा रह-रहकर खिंच जाता और उसकी गोरी पिंडलियों का उभार नुमाया हो जाता।

सोनी का यौवन इस वक्त अपने पूर्ण 'कसाव' पर था। सीढ़ियाँ चढ़ते समय जब वह अपना संतुलन बनाने के लिए थोड़ा आगे झुकती, तो उसकी पतली कमर का वह गहरा मोड़ और चोली के नीचे से झलकती पीठ की ढलान सरयू सिंह के भीतर एक तीखी सिहरन पैदा कर देती। उन्हें सुगना की मौजूदगी का अहसास तक नहीं था; उनकी दुनिया तो बस उस गुलाबी रेशम के घेरे में सिमट गई थी जो सोनी की 'रसभरी जवानी' को ढँकने की नाकाम कोशिश कर रहा था.

सरयू सिंह पीछे चलते हुए अपनी मूँछों को मरोड़ रहे थे, और उनके गले से एक भारी घूँट नीचे उतरा। वे सोनी की उस मटकती हुई जवानी का एक-एक कतरा अपनी नज़रों से पी जाना चाहते थे। उन्हें याद आ रहा था कि कैसे उन्होंने सुगना के लिए यह साड़ी चुनी थी, पर आज सोनी के इस गदराए हुए बदन' पर यह लिबास किसी कयामत से कम नहीं लग रहा था।

जब-जब सोनी का पैर अगली सीढ़ी पर पड़ता, उसकी जांघों की मांसलता साड़ी के आर-पार एक मादक थिरकन पैदा करती। सरयू सिंह का पौरुष इस दृश्य को देखकर अपनी मर्यादा की ज़ंजीरें तोड़ने को आतुर था। उन्हें लग रहा था कि वे इस भीड़भाड़ वाले रास्ते पर ही सोनी को अपनी बाहों के 'अमरबेल' में लपेट लें और उस गुलाबी शिफॉन को हटाकर उस कंचन जैसी देह का स्पर्श करें।

मंदिर की घंटियों की गूँज के बीच, सरयू सिंह के कानों में केवल सोनी की पायल की रुनझुन और उसके कपड़ों की वह सरसराहट गूँज रही थी जो उनकी वासना को और भी भड़का रही थी। सोनी अपनी ही मदमस्त चाल में ऊपर चढ़ती जा रही थी, यह जानते हुए भी कि पीछे से कोई अनुभवी आँखें उसके बदन के एक-एक उतार-चढ़ाव का 'मानसिक वस्त्रहरण' कर रही हैं।

उनकी साँसें भारी होने लगीं। उनके मन में लड्डू फूट रहे थे और एक आदिम इच्छा कुलाँचे मार रही थी—वही इच्छा कि वे एक बार फिर उन हाथों से इस गुलाबी शिफॉन को सोनी के बदन से उतारें। सोनी की वह मादक चाल और सीढ़ियाँ चढ़ते वक्त उसके नितंबों का उभार सरयू सिंह के भीतर उस लंड को जगा चुका था, जिसे उन्होंने बरसों से संभोग सुख से वंचित रखा था।

वे मन ही मन बुदबुदाए, "विधाता, ई कवन परीक्षा लेत हव? साक्षात अप्सरा उतार देले हव...।"

मंदिर की उस भीड़ में, सरयू सिंह का चेहरा भले ही शांत और बुजुर्गियत वाला था, पर उनकी धोती के भीतर छिपा उनका पौरुष और उनके मन के भीतर चल रहा 'वस्त्रहरण' का वह पुराना खेल, सोनी को अपनी आगोश में लेने के लिए छटपटा रहा था। सुगना की योजना कामयाब हो चुकी थी—सरयू सिंह अब केवल एक ससुर नहीं, बल्कि उस गुलाबी साड़ी के भीतर छिपी जवानी को हासिल करने के लिए बेताब एक शिकारी बन चुके थे।

आखिरकार सुगना सोनी और सरयू सिंह मंदिर के प्रांगण में पहुंच चुके थे। मंदिर के भीतर पीतल के घंटों की गूँज और मंत्रोच्चार के बीच एक अजीब सा भारीपन था। मंदिर में भीड़भाड़ थी। सुगना ने जान-बूझकर सोनी को सरयू सिंह के बिल्कुल बगल में खड़ा कर दिया।

"बाबूजी, पंडित जी से कहि के सोनी के नाम से विशेष संकल्प करवा दीं। कोख हरियर होखे के मन्नत बा।" सुगना ने धीरे से कहा।

पंडित जी ने जब मंत्र पढ़ना शुरू किया, तो भीड़ के दबाव का बहाना बनाकर सुगना ने सोनी को हल्का सा धक्का दिया, जिससे सोनी आगे को गिरने लगी परंतु सरयू सिंह के मजबूत हाथों में उसे थाम लिया। उसका नंगा पेट सीधे सरयू सिंह की हथेली में था। उस रेशमी त्वचा पर खुरदुरे हाथों की छुअन ने सोनी के बदन में बिजली दौड़ा दी। सरयू सिंह का हाथ पत्थर की तरह सख्त था, जिसमें एक दहकती हुई गर्मी थी।

सोनी संभली और खड़ी हो गई। परंतु कलेजा अभी भी धक धक कर रहा था। पूजा प्रारंभ थी।

सभी ईश्वर से अपनी-आप की मन्नते मांग रहे थे। यहां तक कि कहानी के पाठक भी। परंतु सबका निचोड़ एक ही था वह था सोनी और सरयू सिंह का संभोग।

पूजा समाप्त होने के बाद, पंडित जी ने मन्नत का एक धागा दिया। सुगना ने कहा, "बाबूजी, आप ही अपने हाथ से सोनी की कलाई पर यह धागा बाँध दीजिये। बड़ों का आशीर्वाद फलीभूत होता है।"

जब सरयू सिंह ने सोनी की कोमल कलाई को अपने खुरदरे और मजबूत हाथों में थामा, तो सोनी का पूरा शरीर कांप उठा। धागा बाँधते समय सरयू सिंह की उंगलियाँ जान-बूझकर सोनी की हथेलियों और कलाई के भीतरी हिस्से को सहला गईं। वह स्पर्श एक बुजुर्ग का नहीं, बल्कि एक ऐसे पुरुष का था जिसके पौरुष को सोनी अपनी जांघों के बीच स्थान देने वाली थी।

सरयू सिंह ने धीमी और भारी आवाज़ में कहा, "ईश्वर तोहार मनोकामना पूरा करसु।"

नियति सोनी की जिह्वा पर विराजमान हो गई और सोनी ने भी मुस्कुराते हुए कहा..

“और रऊओ…”

हम सभी को पता है की सरयू सिंह की मनोकामना क्या थी।

उसी रात आखिरकार सुगना ने हिम्मत जुटाई और वह हमेशा की तरह दूध लेकर सरयू सिंह के करीब गई। सुगना दबे पांव सरयू सिंह के कमरे में दाखिल हुई। सरयू सिंह बिस्तर पर बैठे एक पुरानी मैगजीन पलट रहे थे, पर उनका ध्यान कहीं और था।

सरयू सिंह ने उसकी ओर देखा। कभी यह चेहरा उनकी रातों का सुकून हुआ करता था, उनकी प्रेयसी, उनकी अर्द्धांगिनी जैसी। पर आज समय का चक्र ऐसा घूमा था कि वह जान चुके थे कि वह उनकी पुत्री थी।

सुगना ने झिझकते हुए अपनी नज़रें झुकाईं और बेहद भावुक स्वर में बोलना शुरू किया।

सुगना: "बाबूजी, आज एगो अइसन बात मन में बा जेकरा बोझ से हमार छाती फाटत बा। समझ में नईखे आवत कि कैसे कहीं, पर अपना पुराना हक से हमके ई बात कहे के हिम्मत करत बानी। अगर रउआ हमके गलत ना समझीं, त हम कुछ बोलीं?"

सरयू सिंह ने सुगना के चेहरे पर उभरी व्याकुलता को देखा। उन्होंने ममता और पुराने जुड़ाव के वशीभूत होकर सुगना का हाथ अपने मजबूत हाथों में थाम लिया। उनकी आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव था।

सरयू सिंह: "अरे पगली! हमरा से कवनो बात करे में तोहरा के चिंता ना करे के चाहीं। तू त हमार जान प्राण हउ। जवन मन में बा, एकदम खुलकर बोल। तोहार हर बात सुने और माने खातिर हम हमेशा तैयार बानी।"

सुगना ने एक लंबी और ठंडी सांस ली। उसकी उंगलियाँ सरयू सिंह की हथेलियों पर थिरकीं, जैसे वह शब्द बटोर रही हो। फिर उसने अपनी नज़रें उठाकर सीधे उनकी आँखों में झाँका।

सुगना: "बाबूजी, ई बात सोनी के विषय में बा... ओकर सूनी गोद के लेके।"

सरयू सिंह - ह आज पूजा त भईले बा कौनो और बात बा का?

सुगना: "बाबूजी, सोनी के हालत अब हमरा से देखल नहीं जात। विकास भैया के शहर वाला डॉक्टर त साफ कह देले बाड़न कि कमी उन्ही में बा। सोनी के जिनगी बिना लइका-बच्चा के एकदम रेगिस्तान हो जाई।"

सरयू सिंह: "शहर के डॉक्टर भी हार मान गइले? बाकिर सुगना, एहमें हमनी का का कर सकत बानी जा? ई त सब नसीब के बात ह। देखऽ, हमनी मंदिर में मन्नत मंगले बानी जा, भगवान कुछ न कुछ जरूर करिहें।"

सुगना: "भगवान ओही के साथ देले जे खुद प्रयास करेला। नसीब बदलल जा सकेला बाबूजी, जइसे रउआ हमार बदलले रहनी।"

सरयू सिंह: "सुगना... उ... उ वक्त अलग रहे। अउर सोनी और तू हमरा खातिर एक जैसन बाड़ू। ई मर्यादा के खिलाफ बा।"

सुगना: "मर्यादा त तब टूटी जब सोनी केहू गैर मरद के पास जाई। रउआ त परिवार के बानी। अइसे भी हमनी के जवन रिश्ता रहल बा, ओकरा हिसाब से त उ राउर साली लागत बिया। का रउआ अपना साली के गोद सूनी रहे देब?

सरयू सिंह सुगना को आश्चर्य से देख रहे थे सचमुच वह ऐसी बात कह रही थी जिस पर यकीन करना संभव नहीं था सरयू सिंह का मुंह खुला का खुला रह गया तभी सुगना ने आगे कहा..

सोनी सूरज के पिता से गर्भधारण करे खातिर पूरा मन से तैयार बिया। उ खुद चाहत बिया कि ओकरा के सूरज जइसन 'तेजस्वी' बेटा मिले लेकिन ओकरा के नइखे मालूम कि सूरज रउरे दिहल ह"

सरयू सिंह: (गहिरा सांस लेत, हिचकिचात ) "बाकिर सुगना, दुनिया का कही? अगर केहू के भनक लग गइल त जियब मुहाल हो जाई। सोनी के मरद अउर परिवार का ई बोझ सह पाई?"

सुगना: "दुनिया के फिकर छोड़ि बाबूजी। दुनिया त तबो थू-थू करी जब सोनी बांझ कहलाई। ई राज रउआ, हमरा बीच ही रही सोनी के भी ना मालूम चली। विकास भैया के त बस अपना खानदान के वारिस से मतलब बा, उ काहे केहू से कुछ कहे जइहें?"

सरयू सिंह: "तबो... ई मन गवाही नहीं देत बा। धरम-करम के का होई? ई कवन रीति ह?"

सुगना: (थोड़ा अउर नजदीक जाके) "कवनो मेहरारू के गोद भरल सबसे बड़ धरम ह। रउआ त ओकर उजड़ल बगिया हरियर करे के पुन्य कमायब। देखब, जब लइका के किलकारी गूँजी, त ई सब डर अउर मर्यादा धरल रह जाई। सोनी बड़ा उम्मीद लगवले बिया, का रउआ ओकरा के अइसहीं तड़पत छोड़ देब?"

सरयू सिंह: "अगर सोनी के ईहे मंजूर बा... त हमरा के सोचल पड़ी। बाकिर याद रखिहऽ सुगना, ई बात केहू से मत कहीह।"

सरयू सिंह ने एक गहरी सांस ली। उनके मन में लड्डू फूट रहे थे—सोनी की वह कसी हुई देह, उसकी मादक मुस्कान। गुलाबी साड़ी में उसकी लचकती काया…

सुगना - ना कभी ना …..सुगना ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा।

पर इ संभव कैसे होई? सरयू सिंह सोच में पड़ गए।

घर में सबसे समझदार आप ही बानी। कोनो उपाय लगा कर सोनी के जीवन में खुशियां भर दी।

सुगना ने अपनी भावनात्मक बातों से सरयू सिंह को लगभग तैयार कर लिया।

अच्छा अभी तू जा हम सोच के बताइब।

अगली सुबह की ताजी धूप जब आंगन में बिखरी, तो सरयू सिंह के चेहरे पर एक गजब की गंभीरता थी। उन्होंने सुगना को अपने पास बुलाया और अपनी रजामंदी देते हुए वे शर्तें रखीं जो इस 'गुप्त अनुष्ठान' की नींव बनने वाली थीं।

सरयू सिंह ने सुगना की आँखों में आँखें डालकर धीमी मगर वजनदार आवाज़ में कहा:

"सुगना, हम तैयार बानी। कुल के दीपक खातिर अउर सोनी के अँधियार जिनगी में अंजोर (उजाला) लावे खातिर हम ई कदम उठावे के राजी बानी। पर एक बात गाँठ बाँध लऽ, सोनी के ई रत्ती भर भी पता ना चले के चाहीं कि ओकर कोख सिंचित करे वाला 'पुरुष' कवन बा। ऊ ई जाने कि ई कवनो दैवीय विधान बा, कवनो अनजान 'अंश' बा। मर्यादा के ई पर्दा कबो हटे के ना चाहीं।"

सुगना ने राहत की सांस ली और बाबूजी के अनुशासन को सर आँखों पर रखा। और उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा।

बिल्कुल ऐसे ही कइल जाई सोनी के पता न चली..

सुगना प्रसन्न हो गई…उसने जो प्लान किया था वह घटित हो रहा था सरयू सिंह पूरी तरह तैयार हो चुके थे और सोनी को वह पहले ही रजामंद कर चुकी थी अब इस मिलन का इंतजाम करना बाकी था.

सुनहरी धूप फर्श पर मखमली कालीन बिछा रही थी, सुगना और सोनी एक-दूसरे के बेहद करीब बैठी थीं। कमरे में लोबान की भीनी-भीनी खुशबू तैर रही थी। सुगना ने सोनी का कोमल हाथ अपनी हथेलियों में लिया। उसकी आँखों में एक ऐसी गंभीरता थी जो केवल बड़े संकल्पों में दिखाई देती है।

सुगना ने बातचीत की कमान संभालते हुए विषय को बहुत ही सलीके और गहराई से छेड़ना शुरू किया।

सुगना: (सोनी का हाथ थाम के, फुसफुसा के) "देखऽ सोनी, ई दुनिया के रीति-रिवाज त बांझ कह के तोके मार डालिहें। बाकिर एगो रस्ता बा, जवना से तोहार सूनी गोद हरियर हो सकेला।"

सोनी: (आसा भरी नजरों से) "का कहत बाड़ू दीदी? डॉक्टर त मना कर देले बाड़न, अब कवन रस्ता बचल बा?"

सुगना: "शहर के डॉक्टर फेल हो सकले बाड़न, बाकिर ओकर चमत्कार फेल ना होई। नगर के बाहर एगो 'दिव्य महात्मा' अइले बाड़न। उ कवनो साधारण पुरुष ना हउवन, साक्षात देव-अंश हउवन। कई गो अइसन मेहरारू, जेकर उम्मीद टूट गइल रहे, आज उनकर कृपा से लइका खिलावत बाड़ी।"

सोनी: (हिचकिचाते हुए) "महात्मा? बाकिर दीदी, उ कइसे कृपा करिहें? का कवनो जड़ी-बूटी दिहें?"

सुगना: (गंभीर होके) "ना सोनी, बात समझे के कोशिश करऽ। उ अपना तपोबल अउर शरीर के शक्ति से तोहार कोख भरिहें। तोके उनके साथे एकांत में समय बितावे के पड़ी, उनके सानिध्य में संभोग करे के पड़ी। उ तोहार देह अपवित्र ना, बल्कि धन्य कर दिहें।"

सोनी: (कांपत आवाज में) "ई का कहत बाड़ू दीदी? केहू पर-पुरुष के साथे? हमार धरम-करम... अउर विकास का सोचिहें?"

सुगना: "अरे पगली! विकास के त पता भी ना चली। अउर रहल बात धरम के, त बांझ रहल सबसे बड़ पाप ह। उ महात्मा हउवन, उनकर स्पर्श में अमृत बा। जइसे उनकर तेज बा, ओइसहीं तोके 'तेजस्वी' बेटा मिली। ई कवनो पाप ना, एगो साधना ह। का तू अपना अंचरा में लइका के किलकारी ना सुनल चाहत बाड़ू?"

सोनी: (नजरे नीची करते हुए) "चाहत त बानी दीदी... बाकिर बहुत डर लागत बा। का उ सच में हमार गोद भर दिहें?"

सुगना: "हमार भरोसा करऽ। हम खुद उनकरा बारे में सब जान के ही तोसे कहत बानी। बस एक बार हिम्मत करऽ, तोहार पूरा जिनगी स्वर्ग हो जाई।"

सोनी किम कर्तव्यविमूढ़ होकर सुगना को देख रही थी।

सुगना: "सोनी, ई कवनो खेल नईखे, ई तोहर साधना के फल पावे के बेरा बा। हम सब तैयारी क लेले बानी। सलेमपुर वाली हवेली में हमार जवन कमरा बा, उहवाँ ई 'गुप्त अनुष्ठान' संपन्न होई। उहवाँ सिर्फ तू रहबू, हम रहब, अउर ऊ 'शक्ति' रही जे तोहार जीवन बदले आवत बा।"

सोनी की धड़कनें तेज हो गईं। उसने सुगना की आँखों में झाँकते हुए धीरे से पूछा, "दीदी, एक बार त बता दऽ कि ऊ पुरुष हवें कवन? हमार मन बार-बार इहे पूछत बा।"

सुगना: (दृढ़ता के साथ) "ना सोनी! ई सवाल फिर मत करबू। हम वादा कइले बानी कि पहचान गुप्त रही। बस एतना जान लऽ कि तोहरी कोख में जवन बीज पड़ी, ऊ 'सूरज' जइसन तेजस्वी ना सही, त ओकरा से कम भी ना होई। ई हमार अनुमान ना, विश्वास बा। बस जइसे हम कहत बानी, ओही मर्यादा के पालन तोके करे के पड़ी।"

सुगना ने सोनी को पास खींचते हुए बहुत ही धीमी और मादक आवाज़ में उस 'अनुष्ठान' की विधि समझानी शुरू की, जिसमें कामुकता और नियम दोनों का अद्भुत संगम था।

सुगना: "सोनी, उस दिन तोके पूरी तरह सज-धज के, अपन पूर्ण सुंदरता के साथ तैयार होखे के होई। भले ऊ पुरुष तोहार चेहरा ना देखी, पर तोहार सौंदर्य ओकरा 'वेग' के जगावे खातिर ज़रूरी बा। बिस्तर पर तोके अपनी घुटनों के बल बइठ के, शरीर के आगे की ओर झुका लेवे के होई, जइसे कवनो समर्पित हिरणी होखे। तोहार नितंब बाहर की तरफ उभरे के चाहीं... आज के लोग एकरा के कुछ और कहेले (डॉगी स्टाइल)', पर हमनी खातिर ई वंश-वृद्धि के मुद्रा बा।"

सोनी ने लज्जा से अपनी पलकें झुका लीं, पर सुगना की बातों ने उसके भीतर एक मीठी अगन जगा दी थी।

सुगना: "ऊ महात्मा साक्षात दिव्य तेज लेके अईहें। ऊ तोहार वस्त्र ना उतरिहें, तोहार मर्यादा भंग ना होई। ऊ पीछे से अईहें, बस तोहार लहंगा ऊपर उठईहें अउर पीछे से ही तोहरे भीतर प्रवेश करिहें। न तू उनका के देखबू, न ऊ तोहार कवनो अउर अंग देखीहे। ऊ अपना 'बीज' तोहरे भीतर डालीहें अउर चुपचाप निकल जइहें। बस तोके धैर्य रखे के होई।"

सुगना ने सोनी की ठुड्डी उठाकर उसे अपनी ओर देखने पर मजबूर किया। उसकी आवाज़ अब और भी गंभीर हो गई थी।

सुगना: "एक बात याद रखबू सोनी, ऊ बहुत तेजस्वी पुरुष हवें। जब ऊ तोहरे भीतर अपना पौरुष स्थापित करिहें, त ओकर वेग प्रचंड होई। तोहार बदन थरथराई, मन विचलित होई, पर तोके बिना आवाज़ कइले उस 'आशीर्वाद' के झेल लेवे के बा। कामुकता अउर उत्तेजना के बिना ई मिलन संभव नईखे, एहसे तोहार मन अउर देह—दोनों के समर्पित होखे के पड़ी। मर्यादा इहे बा कि तू ऊ पट्टी ना खोलबू अउर पहचान ना पूछबू।"

सोनी के मन में सरयू सिंह के उस 'वज्र' जैसे पौरुष की छवि कौंध गई, जिसकी उसने कल्पना की थी। सुगना की बातों ने उसके भीतर एक ऐसा रोमांच भर दिया था कि वह उस 'अज्ञात' के प्रचंड प्रहार को सहने के लिए मानसिक रूप से व्याकुल हो उठी। उसे लगा कि वह लहंगा ऊपर उठाना और उस अदृश्य पुरुष का उसके भीतर समा जाना ही उसकी नियति का सबसे बड़ा सच होने वाला है।

सुगना ने सोनी को गले लगा लिया। सोनी का तपता हुआ शरीर गवाही दे रहा था कि वह उस 'दिव्य महात्मा' के प्रचंड वेग को झेलने के लिए पूरी तरह तैयार है।

बिसात बिछ चुकी थी….

शेष अगले भाग में
 
Have you read the story before that please answer my one question

Who is father of Madhu who is with sugna at present..

Please donot mind I just want to check sincerely this story is being read

Welcome and waiting for your reply
 
आप सभी के प्रतिक्रियाओं के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद का कई सारे पुरानेपाठक दिखाई पड़े और कुछनए पाठक भी कहानी सेजुड़े।

जिन पाठकों ने 163 पर अपनीप्रतिक्रिया दी थी उन्हें और जिन्होंने 164 की मांग रखी थी उन्हें भी यह अपडेट भेजा जा चुका है यदि किसी का नाम गलती से छूट गया हो तो कृपया मुझे याद दिला कर अनुग्रहित करें आप सबका जुड़ाव और कहानी के प्रति आपके कॉमेंट्स ही इस कहानी की जान और शान है जुड़े रहिए और लगातार मार्गदर्शित करते रहिए
 
थैंक्स

धन्यवाद

Sent

Thanks jude rahen

Aapse ek praan poocha tha Madhu kiski beti hai par aapne bataya nahi..lagata hai aapne ab tak purane episode nahi padhe hai। Main update to saare bhej dungaa par aapko link nahi milega kahani ka ek bar padh kar bataiega..

Aasha hai aap bura nahi मानेंगे

इंतजार रहेगा

Jude rahie उम्मीद करते हैं मजा आआएगा

आपकी सराहना के लिए धन्यवाद यूं यूं ही कुछ नककुछलिखकर यूं ही कुछ न कुछलिखकर अपने विचार रखते रहे
 
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