Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 126 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

Bhaisaab nice ki bajaya ek photo hi bhej diya kijie mujhe bhi achha lagegaa..

Nice padhakar mujhe kyaa maza aaegaa
 
Great..

Letus see how story moves on..

As life has no end this story will also last till readers are there and writer is enjoying readers coments
 
Ye to kisi aur ki soni hai...

Already posted pic in this

Any way update sent..

Thanks for visiting be available
 
स्वागत है पर सोनी की पिक्चर नही भेजी आपने...

164 ऑलरेडी posted hai
 
क्या आप चाहते हैं कि सूरज और ऐसी मधु का मिलन मत हो?

और कौन कौन चाहता है...
 
दुखी मत होइए नियती ने सूरज के भाग्य में बहुत कुछ लिखा है इंतजार करिए
 
भाग 172

हवेली की दीवारों ने आज एक नया और डरावना राज़ अपने भीतर दफन कर लिया। सुगना की आँखों में अब हताशा नहीं, बल्कि एक अजीब सा संतोष था। उसे लग रहा था कि उसने अपने बेटे को बचाने का 'सुरक्षित' रास्ता खोज लिया है—एक ऐसा रास्ता जहाँ वह स्वयं किनारे पर रहकर सूरज को किनारे लगा सकेगी।




पर हाय री सुगना की किस्मत….. उसे यह ज्ञात ही नहीं था की जिस मधु के भरोसे वह सूरज की मुक्ति का मार्ग खोज रही है वह उसकी सगी बहन नहीं है अपितु उसका सृजन सोनू के वीर्य से हुआ है और वह लाली के गर्भ से जन्मी है.. यह करामात भी सूरज की मौसी सोनी की थी….



नियति विधाता के विधान के पन्ने पलट रही थी और उनके लेख को समझने का प्रयास कर रही थी..



अब आगे..शाम हो चुकी थी….सूरज और रोजी के उस एकांत फ्लैट से बाहर निकलने का दृश्य किसी युद्ध के मैदान से लौटे पराजित सैनिकों जैसा था। बाहर की ठंडी हवा ने उनके जिस्मों को तो शांत कर दिया था, लेकिन ज़हन में सवालों का एक बवंडर अब भी उठ रहा था।रोजी के मन में एक अजीब सी कशमकश थी। उसने सूरज का वो प्रचंड रूप देखा था—वो लिंग की अद्भुत कठोरता और फिर वो अचानक हुआ पतन। वह इस विज्ञान को समझ नहीं पा रही थी। उसे लगा कि शायद उसकी ही किसी कमी ने सूरज को विचलित कर दिया। वहीं सूरज के लिए आज का दिन किसी भयावह सपने जैसा था। वह बार-बार सोनी मौसी के उस 'उपचार' के बारे में सोच रहा था। क्या वो असर सिर्फ कुछ देर का था? क्या वह वाकई कभी एक पूर्ण मर्द बन पाएगा?दोनों ने भारी मन से एक-दूसरे को विदा किया। सूरज जब अपने घर पहुँचा, तो उसकी आँखों में थकान और हार का एक ऐसा मिश्रण था जिसे छुपाना नामुमकिन था।रोजी के घर से निकलते वक्त सूरज के ज़हन में अभी भी उसकी बातों और यादों का खुमार था, लेकिन बनारस की गलियों में कदम रखते ही हकीकत का शोर उससे टकराया। शहर की आबोहवा आज बदली-बदली सी थी। जैसे-जैसे वह मुख्य मार्ग की ओर बढ़ा, उसे भगवा वस्त्रों का एक सैलाब अपनी ओर आता दिखाई दिया।

सड़क पर साधुओं का एक विशाल झुंड चला आ रहा था। कोई शंख नाद कर रहा था, तो कोई हाथों में त्रिशूल लिए हर-हर महादेव के नारे लगा रहा था। लगभग 100 से 200 साधुओं के इस जत्थे ने पूरी सड़क को अपने घेरे में ले लिया था, जिससे एक लंबा जाम लग गया। गाड़ियों के हॉर्न की आवाज़ें उन साधुओं के भजनों और मंत्रोच्चार के बीच दबकर रह गई थीं।

सूरज अपनी बाइक रोककर किनारे खड़ा हो गया। उसकी नज़रों के सामने एक अजीब सा मंजर था—भस्म रमाए साधु, लंबी जटाओं वाले तपस्वी और भगवा चोले में लिपटे हुए युवा साधक और साध्वियां…बनारस आज अपनी उस आदिम ऊर्जा को समेटे हुए लग रहा था जिसे दुनिया देखने आती है।

तभी सूरज की नज़र कुछ साधुओं पर पड़ी जो दीवारों पर बड़े-बड़े रंगीन पोस्टर चिपका रहे थे। पोस्टर के सबसे ऊपर मोटे अक्षरों में लिखा था: "बनारस महोत्सव: 20 वर्षों का महा-संगम"।

सूरज ने इस महोत्सव के बारे में बुजुर्गों से सुन रखा था। यह कोई साधारण मेला नहीं था; यह दो दशकों में एक बार आने वाला वह योग था जब देश-दुनिया के सिद्ध महात्मा गंगा तट पर एकत्रित होते थे। अगली पूर्णमासी से शुरू होने वाला यह उत्सव पूरे बनारस के लिए आस्था और आकर्षण का सबसे बड़ा केंद्र बनने वाला था।

सूरज की धड़कनें तब थम गईं जब उसकी नज़र पोस्टर के केंद्र में छपी दो तस्वीरों पर पड़ी। एक ओर एक दिव्य महात्मा थे, जिनकी आँखों में ब्रह्मांड की गहराई थी—वे साक्षात् विद्यानंद लग रहे थे। लेकिन दूसरी ओर जो तस्वीर थी, उसने सूरज के होश उड़ा दिए।

वहाँ एक अति सुंदर साध्वी की फोटो लगी थी। भगवा रेशमी वस्त्र, गले में रुद्राक्ष की माला और मस्तक पर अष्टगंध का तिलक। उस साध्वी के नैन-नक्श, वह सुराहीदार गर्दन और आँखों की वह चमक... सूरज को लगा जैसे वह सोनी को देख रहा हो। हालाँकि, वह चेहरा और भी दिव्य, और भी प्रखर लग रहा था, जैसे किसी ने सोनी की छवि को दिव्यता के सांचे में ढाल दिया हो।

साध्वी के चेहरे पर एक ऐसी शांति और अधिकार का भाव था जो उनके विलक्षण होने की गवाही दे रहा था। सूरज चाहकर भी अपनी नज़रें उस पोस्टर से हटा नहीं पा रहा था। पोस्टर पर नीचे लिखा था—'महा-अनुष्ठान की मुख्य संरक्षिका: परम पूज्य वज्र-नंदिनी' । जाम धीरे-धीरे खुलने लगा, साधुओं का झुंड आगे बढ़ गया, लेकिन सूरज वहीं जड़ खड़ा रहा। उसके मन में सवालों का बवंडर उठने लगा। क्या यह महज़ एक इत्तेफाक था या सोनी के जीवन का कोई ऐसा पक्ष था जिसे वह अब तक नहीं जान पाया था? पूर्णमासी अब दूर नहीं थी, और बनारस की फिज़ाओं में किसी बड़े रहस्य के खुलने की गन्ध आने लगी थी।

सूरज को एक पल के लिए उसे साध्वी की फोटो में सोनी दिखाई पड़ने लगी। सोनी सूरज के लिए वरदान थी या अभिशाप यह तो कहना कठिन था पर अब तक सूरज को जितना भी सुख मिला था वह सोने की बदौलत ही मिला था वह अब भी उसे देवीय वरदान के रूप में ही मान रहा था।

सूरज के दिमाग में न जाने कितनी बातें चल रही थी कभी-कभी उसे लग रहा था की साधु बन जाना ही उचित है ना दुनिया की चिंता आगे बढ़ने की ललक बस शांत और निश्चल भाव से अपना जीवन जीना….

रोजी के साथ हुई असफलता से हुई निराश सूरज को परेशान कर रहे थी और वह अपने दिमाग में झंझावात लिए हवेली की ओर प्रस्थान कर रहा था।



तुलसी के चौरे पर दीया जलाकर सुगना जैसे ही पलटी, उसकी नज़र सूरज पर पड़ी। सूरज का उतरा हुआ चेहरा और उसकी बुझी हुई देह देख सुगना चिंतित हो गयी और बोली..सुगना (हैरानी और चिंता से): "अरे सूरज! आ गया बेटा? सुबह को तो तू बड़े चाव से निकला था, फिर अभी ऐसा क्यों लग रहा है जैसे किसी भारी मुसीबत से लड़कर आ रहा हो? चेहरा इतना उतरा हुआ क्यों है ?"

सूरज ने अपनी माँ की नज़रों से बचने की कोशिश की। उसने अपना बैग एक तरफ पटका और बिना कुछ बोले सोफे पर बैठ गया। उसका अपनी हथेलियों में सिर छुपा लेना सुगना को और भी बेचैन कर गया।

सुगना (पास आकर, उसके कंधे पर हाथ रखते हुए): "बोल न बेटा, क्या बात है? कुछ हुआ क्या? किसी से कहा-सुनी हो गई या कोई और बात है? तू तो ऐसा बुझा-बुझा कभी नहीं रहता।"

सूरज (खिझते हुए, पर दबी आवाज़ में): "कुछ नहीं हुआ माँ, बस... एक अजीब सी थकान है। ऐसा लग रहा है जैसे दिमाग की नसें फट जाएंगी। सब कुछ होते हुए भी जैसे कुछ खाली-खाली सा लग रहा है।"

सुगना (गंभीर होकर): "खालीपन काम की वजह से नहीं आता सूरज। तेरी आँखों में वो चमक गायब है जो आज सुबह थी। तू तो ऐसे लौटा है जैसे कोई जंग हार गया हो। सोनी रोजी के बारे मैं बता रही थी तू उससे मिलने गया था ना?

सूरज घबरा गया क्या सोनी मौसी ने मां को सब कुछ बता दिया नहीं नहीं वह ऐसा नहीं कर सकती..

सुगना ने आगे बोला.. जन्मदिन की पार्टी में कोई बात हो गई क्या? क्या उसने कुछ ऐसा कह दिया जो तुझे चुभ गया?"

जन्मदिन की बात कर सुनकर सूरज को संतोष हो गया कि उसकी समझदार मौसी ने उसे अनोखे मिलन की बात निश्चित ही छुपा कर उसे जन्मदिन की पार्टी में तब्दील कर दिया है।

सूरज (तपाक से): "नहीं माँ! रोजी ने कुछ नहीं कहा। वह तो... वह बहुत अच्छी है।"

सुगना (संदेह भरी नज़रों से देखते हुए): "सूरज, तू मुझसे कुछ छुपा रहा है। तेरा ये तनाव साधारण नहीं है। तेरी उम्र में लड़के उमंग से भरे होते हैं, और तू है कि हार मानकर बैठ गया है। क्या तुझे अपनी काबिलियत पर भरोसा नहीं रहा? या फिर तू किसी ऐसी उलझन में फँस गया है जिसका रास्ता तुझे दिख नहीं रहा?"

सूरज को वो पल याद आया जब सब कुछ ठीक होते-होते अचानक खत्म हो गया था। उसके अंदर एक चीख दबी थी, पर वह अपनी शारीरिक विफलता की बात माँ से नहीं कह सकता था। उसने बात को मोड़ने की कोशिश की।

सूरज: "माँ, बस समझ लीजिए कि आज मेरा दिन नहीं था।"

सुगना (उसे ढांढस बंधाते हुए): "देख बेटा, कुछ बताएगा तो तेरी मदद कर पाऊंगी ना वरना तुझे ऐसे देखकर मैं भी उदास हो जाऊंगी"

सूरज (उठते हुए): "कोई बात नहीं है माँ, बस आज मुझे अकेले छोड़ दीजिए। मुझे बस शांति चाहिए।"

सूरज अपने कमरे की ओर बढ़ गया, लेकिन सुगना वहीं खड़ी रही। वह नहीं जानती थी कि सूरज जिस 'तनाव' की बात कर रहा है। उसे समझ आ गया था कि उसके बेटे का आत्मविश्वास बुरी तरह हिला हुआ है, और वह 'तनाव' महज़ काम का नहीं, बल्कि कुछ अनोखा है पर वह सुगना की समझ से परे था।

सुगना को सूरज अब भी एक किशोर की भांति दिखाई पड़ता था आखिर मां की नजर में बच्चे कब बड़े होते हैं सुगना को इस बात का कतई इल्म नहीं था कि विद्यानंद ने जिस अभिशाप की बात की थी वह घटित हो चुका था और उसकी झलक सूरज को दिखाई पड़ चुकी थी।

सुगना अपनी छोटी बहन सोनी के कमरे की ओर तेज़ कदमों से बढ़ रही थी। उसके मन में रह-रहकर सूरज का वह बुझा हुआ चेहरा घूम रहा था। सोनी, जो स्वभाव से चंचल और जीवन के रंगों को जीने वाली महिला थी, सुगना की हालत देखकर ठिठक गई।

"दीदी? क्या हुआ सब खैरियत तो है?" सोनी ने मुस्कुराते हुए पूछा,

सुगना ने बेहद संजीदा स्वर में कहा “सूरज….. देख ना……

सूरज का नाम सुनकर सोनी सतर्क हो गई उसने सुगना की बात काटते हुए पूछा सूरज आ गया क्या? क्या हुआ सूरज को?

उसे उम्मीद थी कि सूरज आज किसी 'विजयी' मुद्रा में लौटा होगा।

सुगना ने सोनी का हाथ पकड़ लिया, उसकी आवाज़ कांप रही थी। "सोनी, सूरज... वह लड़का पूरी तरह टूट गया है। सुबह को तो वह उमंग और उन्माद से पार्टी मनाने निकला था, पर शाम को जब लौटा तो लगा जैसे उसकी रूह ही मर गई हो। वह किसी से बात नहीं कर रहा, बस चादर ओढ़कर पड़ा है। मुझे डर लग रहा है, उसे इतना तनाव में मैंने पहले कभी नहीं देखा।"

सोनी को अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ। "क्या? ऐसा कैसे हो सकता है? दीदी, मैंने तो उसे... मेरा मतलब है, वह तो बहुत खुश था।" सोनी के मन में हलचल मच गई। उसे लगा कि कहीं उसके 'उपचार' का कोई उल्टा असर तो नहीं हुआ? वह बिना वक्त गंवाए सुगना को ढांढस बंधाते हुए तेज़ कदमों से सूरज के घर की ओर चल दी।

कमरे में अंधेरा था। सूरज बिस्तर पर चादर ओढ़े दुनिया से कटकर पड़ा था। सोनी धीरे से कमरे में दाखिल हुई। उसने देखा कि सूरज का शरीर चादर के नीचे से उकडू लेटा हुआ पड़ा था। उसके दोनों घुटने उसके सीने से लगे हुए थे। वह बिस्तर के किनारे बैठी और बेहद कोमलता से सूरज के सिर पर अपनी उंगलियां फेरने लगी।

"सूरज.. उठ तो सही। मुझे पूरी बात बता ..आखिर हुआ क्या," सोनी ने फुसफुसाते हुए कहा।

सूरज ने चादर के भीतर से ही भारी आवाज़ में कहा, "मौसी... प्लीज, मुझे अकेला छोड़ दो। मैं बाद में बात करूँगा।"

सोनी कहाँ मानने वाली थी। उसने शरारत से उसकी चादर खींची और इधर-उधर की बातें करने लगी। परंतु सूरज कोई जवाब नहीं दे रहा था। अच्छा आज क्या हुआ? क्या गोरी गुड़िया रोजी ने तुम्हें धोखा दिया?"

सूरज की कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। सोनी ने हार नहीं मानी। उसने सूरज का वह हाथ अपने हाथों में लेकर उसे जादुई अंगूठे को छूने की कोशिश की परंतु सूरज ने हाथ खींच लिया।

सूरज तुम्हारी इस खामोशी से मेरा कलेजा फटा जा रहा है। मैं तुम्हारी खुशी देखकर खुश और तुम्हारा दुख देखकर दुखी होती हूं मैं तुम्हें बहुत प्यार करती हूं और तुम्हारे चेहरे पर उदासी बिल्कुल नहीं देख सकती। फिर भी यदि तुम मुझसे बात नहीं करना चाहते हो तो मैं चली जाती हूं। सोनी बिस्तर से उठने का प्रयास करने लगी।

मौसी का इतना अपनापन पाकर सूरज का बांध टूट गया। वह फफक-फफक कर रो पड़ा। सोनी ने तुरंत उसे अपनी बांहों में खींच लिया। सूरज ने अपना सिर सोनी की गोद में रख दिया और फूट-फूटकर रोने लगा। बाहर खड़ी सुगना ने जब यह दृश्य देखा, तो उसकी आँखों में भी आँसू आ गए। उसने मन ही मन अपनी बहन को दुआएं दीं कि वह उसके बेटे का बोझ हल्का कर रही है।

सोनी ने सूरज को एक छोटे बच्चे की तरह अपनी गोद में समेट लिया। सूरज की सिसकियाँ सोनी के सीने के पास गूँज रही थीं। उसके गर्म आँसू सोनी की गोद को भीगो रहे थे। सूरज की गर्म सांसे कपड़ों का आवरण पर कर सोनी की जांघों पर महसूस हो रही थी जिससे सोनी को एक अजीब सी सिहरन हुई, पर इस वक्त उसकी प्राथमिकता सूरज का दुख कम करना था।

थोड़ी देर बाद, सोनी ने उसे खुद से अलग किया और अपनी हथेलियों से उसके आँसू पोंछते हुए अधिकारपूर्ण लहजे में बोली, "सुन, अपनी मौसी के सामने कभी मत रोना। तेरे चेहरे की मुस्कान ही मेरी दौलत है। अब साफ़-साफ़ बता, उस रोजी के साथ क्या हुआ? सब कुछ... विस्तार से।"

सूरज ने एक लंबी सांस ली। अब उसके और सोनी के बीच कोई पर्दा नहीं था। उसने रोजी के बारे में बताना शुरू किया—कैसे उसने फ्लैट को महकाया था, कैसे उसने वह सफेद झीना कुर्ता पहना था।

सोनी की आँखों में चमक आ गई। "अच्छा? तो वह इतनी तैयारी में थी? फिर? उसने तुम्हें कैसा देखा? क्या वह तुम्हारी मर्दानगी देखकर डरी नहीं?" सोनी ने थोड़ा 'नॉटी' होते हुए पूछा।

सूरज थोड़ा सहज हुआ और हल्के से मुस्कुराया। "मौसी, जब उसने मुझे उस धोती में देखा, तो वह दंग रह गई थी। उसने कहा कि मैं किसी प्राचीन देव जैसा लग रहा हूँ। उसने... उसने मेरा हाथ पकड़कर मुझे बिस्तर तक ले गई।"

सोनी ने चुटकी लेते हुए पूछा, "और फिर? क्या उसने उस खास हिस्से को छुआ?"

सूरज का चेहरा गुलाबी हो गया। "हाँ मौसी... उसने उसे अपनी हथेलियों में भरा। वह उसे सहला रही थी। वह बार-बार कह रही थी ये इतना सख्त और इतना सुंदर होता है…उसने अब तक इस किताबों में ही देखा था। वह इससे किसी खिलौने की भांति खेल रही थी।" सूरज अब खुलकर बता रहा था। "उसने जब उसे अपनी मुट्ठी में लिया, तो मुझे लगा जैसे मैं स्वर्ग में हूँ।"

सोनी ने अपनी भौहें मटकाते हुए बोला.. मजा तो आएगा ही अपने हाथ से थोड़ी आता है।

सोनी ने आगे पूछा …रोजी खुश तो थी ना?

सूरज मुस्कुराया "हाँ मौसी! वह तो उसे देखकर अपनी सुध-बुध खो बैठी थी। यहाँ तक कि जब मेरा स्खलन हुआ, तो वह नज़ारा देख कर वह चकित रह गई। वह वीर्य की धार उसके चेहरे और सीने पर गिर रही थी। "

सोनी के चेहरे पर एक गहरी मुस्कान थी, पर फिर उसकी आवाज़ गंभीर हुई। "तो फिर यह उदासी क्यों? जब सब इतना अच्छा था, तो तुम ऐसे दुखी दुखी क्यों लौटे? क्या स्खलन के बाद उसका तनाव कम हो गया था?

नहीं मौसी वह तो वैसे ही तना था। यह तो पहले भी होता आया है कि चाहे कितनी ही बार स्खलन कर लो उसका तनाव कम नहीं होता है। सूरज ने सोनी को समझाने की कोशिश की।

फिर क्या हुआ…सोने की आंखों में कोतूहल था

सूरज की मुस्कान फिर से गायब हो गई। उसने वह त्रासदी सुनाई—कैसे जब वह अंतिम प्रहार करने वाला था, जब वह रोजी की 'मखमली खाई' में उतरने ही वाला था, उसका वह फौलादी अंग अचानक एक 'मुरझाए केले' की तरह बेजान हो गया।

सोनी यह सुनकर हक्की-बक्की रह गई। "क्या? प्रवेश से ठीक पहले? ऐसा कैसे हो सकता है सूरज?"

सूरज ने सिसकते हुए कहा, "पता नहीं मौसी। जैसे ही मेरा लिंग उसके योनि के अग्रभाग से सटा, मेरा सारा जोश ठंडा पड़ गया। मुझे लगा जैसे मैं नपुंसक हो गया हूँ।

सूरज ठीक से बता … भगनासे पर?

शायद हाँ ….सूरज ने कहा।

सोनी ने सूरज का हाथ फिर से सहलाया। उसे समझ नहीं आया सोनी को लगा जैसे ही यह सूरज की अति उत्तेजना या मानसिक दबाव का परिणाम था। वह फिर से 'दोस्त' वाले मोड में आ गई। "अरे पागल! इसमें रोने वाली क्या बात है? यह तो बड़े-बड़े सूरमाओं के साथ हो जाता है। जब मंज़िल इतनी खूबसूरत हो, तो कभी-कभी दिल धड़कना भूल जाता है।"

उसने सूरज की ठुड्डी उठाकर शरारत से पूछा, "अच्छा ये बताओ, जब वह निढाल था, तब भी रोजी ने उसे जागने की कोशिश नहीं की? क्या उसने अपने मुँह का इस्तेमाल नहीं किया?"

सूरज अब पूरी तरह सहज हो गया था। "किया था मौसी... उसने बहुत कोशिश की। वह उसे अपने होंठों के बीच लेकर उसे जगाने की कोशिश कर रही थी, पर मैं इतना शर्मिंदा था कि मेरा दिमाग ही काम नहीं कर रहा था।"

सोनी खिलखिलाकर हँसी। "तो अगली बार हम उसे ऐसा तैयार करेंगे कि वह थकेगा ही नहीं। अब उदासी छोड़ और अपनी मौसी को यह बता कि क्या तूने उसकी उस 'गुप्त कली' को अपनी नज़रों से देखा था? कैसी थी वह?"

नहीं मौसी वह बहुत शर्मा रही थी मैंने भी जिद नहीं की पर वह है बहुत खूबसूरत मैंने उसका ऊपर वाला हिस्सा एक झलक देखा.था. सूरज ने शर्माते हुए कहा..

“और इसे…” सोनी ने अपनी चूचियों की तरफ इशारा करते हुए पूछा।

सूरज ने एक झलक सोने की भारी चूचियों की तरफ देखा और तुरंत अपनी नज़रें नीचे कर ली..

हा देखा …सूरज ने सकुचाते हुए कहा

यह हुई ना बात…तूने उसे छुआ भी ? सोनी ने उसे उकसाते हुए पूछा..

हा मौसी बड़ा मजा आया…भगवान ने आप लोगों को कितना कुछ दिया है.. सोनी पूरे संजीदगी से उसकी बातें सुन रही थी..

सूरज की आँखों में फिर से वही चमक लौट आई। उसने विस्तार से रोजी के अंगों और उनकी बनावट के बारे में सोनी को बताया। सोनी बीच-बीच में उसे छेड़ती रही, जिससे सूरज का तनाव पूरी तरह सोनी के प्यार में बह गया।

सूरज अब मुस्करा रहा था। उसे अहसास हुआ कि सोनी सिर्फ उसकी मौसी नहीं, बल्कि उसके जीवन की सबसे बड़ी राज़दार और ताकत है।

सोनी और सूरज के बीच की वह बातचीत केवल दिलासा नहीं थी, बल्कि एक नई योजना की नींव थी। सोनी ने सूरज की आँखों में आँखें डालकर उसे समझाया, "सूरज, पिछली बार तूने दोहरा मजा लेने की कोशिश की पहले हस्तमैथुन और फिर संभोग इस उम्र में उत्तेजना ज्यादा होती है इसे काबू में रखना…. इस बार याद रखना—सीधा निशाना। कोई हस्तमैथुन नहीं, सीधा प्राकृतिक संभोग।"

सूरज को मौसी की बात तार्किक लगी। कुछ दिनों की हिचकिचाहट के बाद, उसने एक बार फिर रोजी को मनाया। रोजी, जो खुद उस अधूरेपन की कसक झेल रही थी, इस बार और भी ज़्यादा उम्मीदों के साथ तैयार हो गई।

मिलन का दिन फिर आया। जाने से पहले सोनी ने सूरज को अपने पास बुलाया। उसने सूरज के अंगूठे को उसी जादुई तरीके से सहलाया, जिससे उसकी रगों में बिजली दौड़ने लगी। सूरज का अंग फिर से अपनी पूरी भव्यता के साथ जाग उठा। सोनी ने उसके माथे को चूमा और सूरज को विदा किया सोनी ने अपने ईश्वर से उसकी सफलता की कामना की और शाम होने का इंतजार करने लगी।

सूरज आत्मविश्वास से भरा हुआ रोजी के पास पहुँचा। फ्लैट का माहौल फिर से वैसा ही मादक था। रोजी ने जब सूरज के उस 'वज्र' जैसे अंग को देखा और छुआ, तो उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। उसे लगा कि आज तो कुदरत मेहरबान है। उसने अपनी कोमल हथेलियों से उसे सहलाया, उस पर अपने रसीले होंठ रखे, लेकिन सूरज ने मौसी की हिदायत याद रखी। उसने रोजी को धीरे से बिस्तर पर लिटाया।

रोजी ने अपनी रेशमी जाँघें खोल दीं। सूरज ने खुद को उसकी 'मखमली खाई' के मुहाने पर सटाया। वह पल आ गया था। सूरज ने धीरे से अपने लिंग के शीर्ष (Glans) को रोजी की योनि के द्वार (भग्नाशे) से स्पर्श किया।

लेकिन जैसे ही वह 'गीला और गर्म' स्पर्श हुआ, नियति ने फिर वही क्रूर मज़ाक किया। वह स्पर्श, जो आग भड़काने वाला होना चाहिए था, सूरज के लिए किसी 'इलेक्ट्रिक शॉक' जैसा साबित हुआ। पलक झपकते ही, वह फौलादी अंग फिर से मुरझा गया। जैसे किसी ने जलते हुए दीपक पर बर्फीला पानी डाल दिया हो।

रोजी की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने अपने कोमल हाथों से उसे फिर से सहलाया, अपने मुँह की गर्माहट दी, हर वो जतन किया जो एक प्रेमिका कर सकती है, पर सब व्यर्थ। सूरज का वह अंग अब एक बेजान मांस का टुकड़ा मात्र रह गया था। दोनों की आँखों में आँसू थे। वे फिर से उसी भारी मन और अनसुलझे सवालों के साथ अपने-अपने घर लौट आए।

जब सूरज घर लौटा और उसने सोनी को सारी आपबीती सुनाई, तो सोनी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसे अपनी विशेषज्ञता पर इतना भरोसा था कि उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि उसका 'उपचार' इस तरह फेल हो सकता है।

सोनी (हैरानी से): "यह नामुमकिन है सूरज! अगर वह जाग रहा है, तनाव में आ रहा है, तो ऐन मौके पर ही ऐसा क्यों हो रहा है? वो स्पर्श तो उसे और भड़काना चाहिए, बुझाना नहीं।"

सूरज फूट-फूटकर रोने लगा। "मौसी, मैं खत्म हो चुका हूँ। जैसे ही मेरा लिंग उसकी योनि को छूता हूँ, मुझे ऐसा लगता है जैसे उसका सारा लहू वापस लौट जाता हो और वो। निस्तेज हो जाता है। अब तो रोजी भी मुझसे दूर हो जाएगी। वह कब तक एक बेजान शरीर के साथ सबर करेगी?"

सोनी ने सूरज को गले लगा लिया। वह खुद परेशान थी, उसके पास इस 'विचित्र' समस्या का कोई तुरंत जवाब नहीं था। फिर भी, उसने हार नहीं मानी। उसने सूरज के आँसू पोंछे और बेहद गंभीर होकर बोली:

ईश्वर पर विश्वास रख….सब ठीक हो जाएगा।

सोनी का खुदपर से विश्वास उठ चुका था इसलिए उसने भगवान का सहारा लिया।

सोनी का दिमाग काम नहीं कर रहा था यह एक अनोखी समस्या थी जिस पर यकीन कर पाना कठिन था।

रात का सन्नाटा गहरा चुका था, पर सोनी की आँखों में नींद का नामो-निशान नहीं था। वह अपने कमरे की खिड़की के पास खड़ी चाँदनी को ताक रही थी, लेकिन उसका मन उन सवालों के चक्रव्यूह में फँसा था जिसका सिरा कहीं मिल ही नहीं रहा था। सूरज की वह विचित्र समस्या—स्पर्श होते ही पौरुष का ढह जाना—सोनी के लिए अब केवल एक पारिवारिक चिंता नहीं, बल्कि एक मानसिक गुत्थी बन चुकी थी।

सोनी एक नर्स थी उसे कई सारी समस्याओं और बीमारियों के बारे में पता था पर यह अनुभव उसके लिए बिल्कुल नया था। जितना ही वह इसके बारे में सोचती उतना ही उलझती जाती।

उसने सूरज के लिंग को अपने हाथों से महसूस किया था हाथों से ही क्या उसे अपने होठों और अपनी जीभ तथा मुंह की उष्णता से उसे स्खलित भी किया था। परंतु उसमें उसे कोई कमी दिखाई नहीं पड़ी थी। पर जब जब सोनी सूरज के अंगूठा सहलए जाने से उसके लिंग में आने वाले तनाव के बारे में सोचती वह उसे किसी दैवीय विधि विधान की तरह दिखाई पड़ने लगता।

सोनी को बखूबी याद था कि बचपन में भी वह इस अनुभव को खेलखेल में कई बार कर चुकी थी और बाद में सुगना के कई बार डांटने के पश्चात उसने यह कार्य छोड़ दिया था।

क्या उसे सूरज की मदद नहीं करनी चाहिए? क्या वह सूरज की इस समस्या को स्वयं देखना चाहेगी? वो जितना ही इस बारे में सोचती उतनी ही परेशान होने लगती।

पर कैसे? सोनी यहीं पर आकर रुक जाती क्या वह यह प्रयोग खुद कर सकती है?

प्रश्न भी सोनी के थे और उत्तर भी उसके ही पास था पर उत्तर देने के लिए सोनी शायद अभी तैयार नहीं थी।

सूरज किताबों के बीच घिरा रहता, पर रह-रहकर उसका ध्यान अपनी उस शारीरिक विफलता की ओर चला जाता। उसकी उदासी गहरी थी। सोनी यह भांप लेती और बीच-बीच में उसके पास आती। वह उसे अकेलापन महसूस नहीं होने देती थी।

वक्त गहरे घावों को भी भर देता है.. सूरज अपनी मर्दाना कमजोरी को भूलकर अपनी दिनचर्या में लीन होने की कोशिश करने लगा परीक्षाएं सर पर थी वह एक होनहार विद्यार्थी था। परंतु अब भी उसकी मां एकांत में अपनी उसे कमजोरी पर चला जाता और वह बहुत ज़्यादा निराश हो जाता।

उसकी एक मात्र हमराज उसकी मौसी सोनी ही थी जो उसका मर्म समझती। कभी कभी सोनी मुस्कुराते हुए उसके पास बैठती और हौले से उसके अंगूठे को सहलाने लगती। वह स्पर्श सूरज की रगों में सोई हुई उत्तेजना को फिर से जगा देता। वह उसे हस्तमैथुन (Masturbation) के जरिए उस दबाव को बाहर निकालने का मौका देती, ताकि उसका मन हल्का हो सके। सूरज ने भी धीरे-धीरे अपनी इस विडंबना को नियति मानकर स्वीकार कर लिया था। उसे अहसास था कि अभी उसकी मुक्ति का मार्ग केवल किताबों के पन्नों से होकर गुज़रता है।

एक शाम, सूरज अपनी मेज पर सिर टिकाए बैठा था। सामने एनाटॉमी की भारी-भरकम किताबें खुली थीं, पर उसकी नज़रें शून्य में थीं। सोनी दूध का गिलास लेकर कमरे में दाखिल हुई।

सोनी (प्यार से सिर सहलाते हुए): "क्या हुआ मेरे डॉक्टर साहब? आज फिर किताबों से हार मान ली क्या?"

सूरज (एक लंबी सांस लेकर): "मौसी, ये पढ़ाई... ये सब बेमानी लगता है। मैं दूसरों का इलाज करने की पढ़ाई कर रहा हूँ, जबकि खुद एक ऐसी बीमारी का शिकार हूँ जिसका इलाज किसी किताब में नहीं है।"

सोनी ने दूध का गिलास मेज पर रखा और सूरज की आँखों में आँखें डालकर बोली, "तू बस अपनी परीक्षाओं पर ध्यान लगा सूरज। तू इस कॉलेज का सबसे काबिल लड़का है। अगर तूने इस बार टॉप किया, तो मैं तुझे एक ऐसा 'उपहार' दूँगी जिसकी तूने कल्पना भी नहीं की होगी।"

सूरज के मुरझाए चेहरे पर एक हल्की सी जिज्ञासा उभरी। उसने सोनी का हाथ थाम लिया।

सूरज: "उपहार? कैसा उपहार मौसी?

सोनी…मै तुझे अभी नहीं बता सकती पर मुझे पता है तुझे उसकी सबसे ज्यादा जरूरत है…

क्या मुझे अपनी पसंद का उपहार माँगने का हक होगा?" सूरज ने पूरी मासूमियत से पूछा

सोनी के चेहरे पर एक रहस्यमयी और मादक मुस्कान तैर गई। उसकी आँखों में एक ऐसी चमक थी जिसे सूरज पूरी तरह समझ नहीं पाया, पर उसने एक सिहरन महसूस की।

सोनी (धीमी आवाज़ में): "हाँ सूरज... वादा करती हूँ। उपहार तेरी पसंद का ही होगा। तू जो माँगेगा, वह तुझे मिलेगा। बस तुझे कॉलेज में अव्वल आना होगा।"

सूरज की धड़कनें तेज़ हो गईं। उसने सोनी की हथेलियों की नरमी को महसूस किया। उसे लगा जैसे मौसी के इस वादे के पीछे कोई बहुत बड़ा राज़ छुपा है।

सूरज (उत्साह के साथ): "सच मौसी? जो मैं चाहूँगा वही? क्या आप मुकरेंगी तो नहीं?"

सोनी ने अपनी उंगली उसके होंठों पर रख दी। "मौसी कभी अपने वादे से नहीं मुकरती। अब अपनी सारी ऊर्जा इस पढ़ाई में लगा दे। तुझे साबित करना है कि तू कमज़ोर नहीं है। तेरा यह दिमाग ही तेरी सबसे बड़ी ताकत है।"

सोनी के इस प्रोत्साहन और उस 'अनोखे उपहार' की लालसा ने सूरज के भीतर एक नई जान फूँक दी। वह पूरी लगन से पढ़ाई में जुट गया।

सूरज किताबों में डूब गया और सोनी दूर खड़ी उसे देखती रही, यह सोचते हुए कि जब परीक्षा के बाद वह 'उपहार' देने का वक्त आएगा, तो क्या वह खुद को संभाल पाएगी?

उसे अंदेशा था कि सूरज क्या मांगेगा..

शेष अगले भाग में

 
क्रूर तो है पर करुणा भी है...ध्यान रखिए सबको अपने हिस्से का प्यार और वासना मिली है सूरज भी अछूता न रहेगा
 
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