Incest पाप ने बचाया - Page 3 - SexBaba
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Incest पाप ने बचाया

Update-21

उदयराज और रजनी सो गए कुछ देर बाद पुर्वा भी सो गई, सुबह हुई, पुर्वा और रजनी एक साथ जगे, रजनी ने काकी को जगाया और तीनों ने सुबह की नित्य क्रिया करके नहा धो लिया, पुर्वा और काकी नाश्ता बनाने लगी, आज रजनी ने नीली रंग की साड़ी काले ब्लॉउज के साथ पहनी थी जिसमे वो गज़ब ढा रही थी, उसका गोरा बदन दमक रहा था, ब्लॉउज में भारी भारी चूचीयाँ बाहर आ जाने को कसमसा रही थी, नितंबों ने अलग ही हाहाकार मचाया हुआ था। ऐसा लग रहा था स्वर्ग से उतरकर कोई अप्सरा जंगल में आ गयी हो।

रजनी कुटिया में उदयराज को जगाने के लिए गयी।

रजनी- बाबू उठो, (कहते हुए उसने एक बार पीछे मुड़कर देखा और फिर अपने बाबू के गाल पर झुककर एक भीगा सा चुम्बन जड़ दिया)

तपाक से उदयराज की आंखें खुल गयी, अपनी शादीशुदा बेटी का ये रूप देखकर और इस तरह चुम्बन देकर उठाना उसे इतना मधुर लगा कि वो उसे देखता रह गया, कामुक भीगे हुए रसीले होठों के गीले गीले चुम्बन का अपने गालों पर अहसास उदयराज को मदमस्त कर गया

नीली साड़ी में अपनी ही शादीशुदा बेटी को देखकर उसका मन मचल उठा, तभी उसकी नज़र रजनी के ब्लॉउज पर गयी, पल्लू सीने से गिर चुका था, गोरी गोरी चूचीयों के बीच बनी गहरी घाटी में जैसे वो थोड़ी देर के लिए डूब गया, रजनी समझ गयी कि उसके बाबू कहाँ खोए हैं। उसने अपने बाबू की ठोढ़ी को तर्जनी उंगली से उठाते हुए कहा- उठो न बाबू, रात में देखके जी नही भरा।

उदयराज- गज़ब की बिटिया पाई है मैंने, इससे भला अब मेरा जी भरेगा, आज तूने मेरा दिन बना दिया।

रजनी- अच्छा जी! मैंने भी तो दुनियां का सबसे अच्छा पिता पाया है, चलो अब उठो न बाबू कोई आ जायेगा।

उदयराज- ऐसे नही उठूंगा

रजनी- फिर कैसे उठोगे, उठो न

उदयराज- नही, पहले जरा सा दिखा दे न, चखने का मन कर रहा है

रजनी- क्या?

उदयराज ने अपनी हथेली रजनी के बायीं मोटी चूची पर रख दिया और हल्का सा दबा दिया।

रजनी हल्का सा - uuuiiiimmmaaa

रजनी- अभी रात को तो सब किया था मेरे बाबू, जी नही भरा (सिसकते हुए)

उदयराज- क्या कोई रात को खाना खा ले तो सुबह नाश्ता नही करता क्या? सुबह तो फिर उसे भूख लगेगी न,

रजनी- बदमाश! ये दिन है बाबू रात की बात अलग थी, यहां सब हैं कभी भी कोई आ सकता है।

उदयराज- बस जल्दी से, एक बार बस, बहुत देखने का मन कर रहा है, फिर उठ जाऊंगा पक्का।

रजनी- बदमाश बाबू! अच्छा लो देख लो जल्दी से

रजनी मुस्कुराते हुए पीछे पलट के देखती है, भाग्यवश उस वक्त कोई इधर नही आ रहा था।फिर उसने अपने ब्लॉउज के नीचे के दो बटन खोले और ब्रा और ब्लॉउज को ऊपर खींचकर एकदम से दोनों ही बड़ी बडी चूचीयों को एक साथ अपने बाबू के सामने उजागर कर दिया, दोनों बड़ी बड़ी चूचीयाँ उछलकर उदयराज की आंखों के सामने आ गयी, आज उदयराज दोनों चुचियों को एकसाथ देखकर वासना से सराबोर हो गया, लंड उसका धोती में खड़ा हो गया, इतनी गोरी गोरी चूची उसकी खुद की शादीशुदा बेटी की ही होगी उसने कभी सोचा नही था और उसपर ये मोठे मोठे गुलाबी रसीले निप्पल, अभी रात में ही उदयराज ने एक चूची को खोला था पर अंधेरा होने की वजह से अच्छे से देख नही पाया था पर इस वक्त सुबह की रोशनी में दोनों ही चूचीयाँ उसके सामने नग्न थी। उदयराज उन्हें निहारने लगा, रजनी शर्मा गयी

उदयराज ने दोनों हाँथ बढ़ा के दोनों चूची को हथेली में भर लिया और एक बार कस के दबा कर निप्पल को मसल दिया रजनी की aaahhhhhhh निकल गयी मचलते हुए वो बोली- बाबू बस करो कोई आ जायेगा

उदयराज- अच्छा मेरी बेटी एक बार पिला दे दोनों

रजनी ने ब्लॉउज को और ऊपर चढ़ा कर छोड़ दिया और अपने दोनों हाँथ उदयराज के दोनों कंधों के ऊपर रखकर उसके ऊपर झुक गयी और अपनी बायीं चूची का निप्पल मुँह में डालते हुए बोली- लो जल्दी पी लो

उदयराज ने लपककर जितना हो सके चूची को मुँह में भर लिया और पीने लगा रजनी की जोश में आंखें बंद हो गयी, पीते वक्त उदयराज बीच बीच में हल्का काट लेता और जब उसकी जीभ निप्पल से टकराती तो रजनी दबी आवाज में सिसक उठती iiiiiiiiiissssssshhhhhh. aaaaaaaahhhhhhhhhh, रजनी वासना से भर उठी वह डर भी रही थी कि कहीं कोई आ न जाये।

तभी रजनी बोली- बाबू अब बस करो जल्दी से दूसरी पियो देखो कोई आ जायेगा और उसने बायीं चूची उदयराज के मुंह से निकाल कर दायीं चूची उसके मुँह के सामने कर दी निप्पल मुँह से निकलने पर दूध की एक दो बूंदे उदयराज की मूंछों के आसपास गिर गयी जो कि देखने मे बहुत खूबसूरत लग रही थी।

उदयराज ने जीभ निकाल कर रजनी को दिखाते हुए उसे चाट लिया और रजनी हंस पड़ी

और फिर रजनी ने अपनी दायीं चूची के निप्पल को अपने बाबू के होंठों से छुआया उदयराज ने अपनी जीभ निकल के निप्पल के चारों ओर घुमाने लगा तो रजनी वासनामय होते हुए बोली- बाबू चुसो न जल्दी, जरूर कोई आ जायेगा, खेल बाद में करना इसके साथ बदमाश।

उदयराज लप्प से चूची मुँह में भरकर पीने लगा, उसके तो दिन ही बदल गए थे इतनी मदमस्त चूचीयाँ पीने को मिलेंगी वो भी अपनी ही सगी शादीशुदा बेटी की उसने सोचा नही था। आज तो वो झूम उठा था, रजनी की आंखें मस्ती में बंद थी, एक बार फिर उसने मुड़कर दरवाजे की तरफ देखा अभी तक भी रास्ता साफ था रजनी एकाएक बोली- बाबू थोड़ा रुको

उदयराज रुक गया, रजनी ने चूची पकड़कर उसके मुह से बाहर निकाली और बोली- मुँह खोलो, आ करो

उदयराज ने बच्चे की तरह आ कर लिया, रजनी ने एकाएक अपनी चूची को जोर से दबाकर दूध की धार उदयराज के मुंह में डाल दी, चिर्रर्रर्रर की आवाज के साथ दूध की धार से उदयराज का मुँह कुछ ही पल में आधा भर गया, रजनी ने हस्ते हुए बोला मेरे बाबू जी अभी इतना पी लो बाकी का बाद में दूंगी तो खाली कर लेना, इतना कहकर रजनी अपनी चुचियों को ढकते हुए उठ खड़ी हुई, उदयराज उसे देखते हुए गट गट करके दूध पी गया और जैसे ही रजनी मुस्कुराते हुए जाने को पलटी उसने रजनी का नरम मुलायम हाँथ पकड़ लिया।

रजनी- अब क्या बाबू, जाने दो न, जरूर कोई आ ही जायेगा।

उदयराज- फिर कब दोगी।

रजनी- जब मौका मिलेगा, सब्र करो सब दूंगी अपने बाबू को

उदयराज- सब दोगी

रजनी- हां...दूंगी

उदयराज- सब.....वो भी (उदयराज का मतलब बूर से था)

रजनी का चेहरा शर्म से लाल हो गया और धीरे से बोली- dhaaaatttt बाबू, कोई अपनी शादीशुदा सगी बेटी की "वो" मांगता है। मेरे बेशर्म बाबू।

उदयराज- किसी का तो पता नही पर मुझे तो चाहिए वो, जरूर चाहिए, दोगी न

उदयराज ने हाँथ छोड़ दिया और रजनी मुस्कुराके जाने लगी फिर दरवाजे तक जाके रुकी, पलट के देखा और बोली- हां वो भी दूंगी, खूब दूंगी, जी भरके दूंगी, पर घर पहुँच के, थोड़ा सब्र बाबू, अब उस पर आपका ही हक़ है वो हमेशा से ही आपकी थी और हमेशा रहेगी और मुस्कुराते हुए भाग गई, उदयराज ने अपने लंड को धोती के ऊपर से ही मसल दिया और किसी तरह adjust करके उठा और बाहर आ गया।

काकी और पुर्वा नाश्ता बना चुकी थी, पुर्वा ने रजनी को देखते हो बोला- अरे बहन तुम्हारे बाबू जी उठ गए।

रजनी (अपने को संभालते हुए)- हां उठ गए नहा कर आ रहे हैं।

पुर्वा- ठीक है मैं नाश्ता लगती हूँ

रजनी- नही बहन तुम रहने दो मैं लगा देती हूं तुम अपनी माता जी के पास जाओ शायद वो बुला रही थी तुम्हे।

रजनी और काकी नाश्ता लगाने लगती हैं

सुलोचना ने रात भर मंत्र जागृत करके सात ताबीज़ तैयार कर दिए थे जिसको पीपल के पत्ते से लपेटा हुआ था और उसको काले कपड़े में बांधकर एक डोरी से जोड़ना था ताकि हाँथ पर बांधा जा सके, पुर्वा ने उसे तुरंत तैयार कर दिया, सुलोचना भी फिर नहा कर तैयार हो गयी, सबने नाश्ता किया।

सुलोचना- मैंने ताबीज़ तैयार कर दी है, पुर्वा को छोड़कर सबलोग इसको अपने हाँथ पर बांध लो, छोटी बच्ची और बैलों को भी बांध देना पुत्र।

उदयराज- हां माता जी

और उदयराज सबको वो ताबीज़ बांध देता है जाके बैलों के गले में भी बांध आता है।

सुलोचना- मेरे ख्याल से हमे सुबह जल्दी ही निकल जाना चाहिए, ताकि शाम तक वहां पहुंच जाएं, पुर्वा यही रहेगी

काकी- बहन अगर हम शाम तक वहां पहुचेंगे तो हम वापिस तो कल ही आ पाएंगे तो ऐसे में क्या पुर्वा रात भर इस जंगल में अकेली रहेगी, आखिर वो भी एक लड़की है, बच्ची ही है, मेरे ख्याल से हमे उसे अकेला नही छोड़ना चाहिए। आप हम लोगों की इतनी चिंता कर रही है तो हमारा भी फ़र्ज़ बनता है कि हम भी आपलोगों का ख्याल रखें।

उदयराज- हां बिल्कुल

सुलोचला- तुम्हारी चिंता जायज है बहन, पर तुम इसकी चिंता मत करो, हमारी आदत है और वैसे भी उसके पास मन्त्रो की शक्ति है उसे कुछ नही होगा, हम कल दोपहर तक आ जाएंगे।

पूर्वा- हां अम्मा आप मेरी फिक्र मत करो मैं कई बार अकेले रह चुकी हूं।

काकी- ठीक है

फिर सभी लोग तैयार हो जाते है उदयराज अपने बैल तैयार करता है सबलोग बैलगाड़ी में बैठ जाते हैं और उदयराज बैलगाड़ी चलाने लगता है।

उदयराज का मन अब बिल्कुल नही लग रहा था उसका लंड बार बार रजनी को देखके खड़ा हो जा रहा था, रजनी भी उसे देख देख के मुस्कुरा रही थी, रजनी का आमंत्रण उसका यौवन उदयराज पर इतना हावी होता जा रहा यह कि एक पल को वो ये भी भूल गया कि आखिर वो किस काम के लिए निकला है, यही हाल रजनी का भी हो रहा था। उनके जीवन में रसभरी बाहर आ चुकी थी, उदयराज ने कभी सोचा भी नही था कि उसे अपनी ही शादीशुदा बेटी से यौनसुख मिलेगा। वो बैलगाड़ी चलता हुआ यही सब सोचे जा रहा था कि तभी उसकी तन्द्रा भंग होती है जब बैलगाड़ी सिंघारो जंगल में प्रवेश कर जाती है, वाकई में ये जंगल मायावी सा था, काफी गहरी घनी छाया थी, बहुत बड़े बड़े वृक्ष थे।
 
Update-22

बैलगाड़ी घने जंगल में दनदनाती हुई आगे बढ़ती जा रही थी, सुबह की शीतल ठंडी हवा चेहरे पर लगकर ताजगी का अहसास करा रही थी, उदयराज बैलों को हाँके जा रहा था, रजनी, काकी और सुलोचला पीछे बैठी हुई थी, काकी और रजनी बार बार सर घुमा घुमा कर जंगल में विचित्र लंबे लंबे पेड़ों को देख रही थी, कुछ पेड़ ऐसे थे जिनकी प्रजाति अभी तक उन्होंने कहीं देखी नही थी।

तभी सुलोचना उठकर उदयराज के बिल्कुल पीछे बैठ गयी ताकि वो उसको आगे का short रास्ता बता सके।

कभी अचानक तेज हवा चलने लगती तो कभी वातावरण बिल्कुल शांत हो जाता, कभी किसी पेड़ की डालियां एकदम हिलने लगती जैसे उन्हें कोई झकझोर रहा हो, कभी जानवरों की आवाज़ें आने लगती कभी सब शांत हो जाता।

रजनी और काकी यही सब देखकर चकित थी पर डर उन्हें लेश मात्र भी नही छू पाया था, अभी सुबह का ही वक्त था, उदयराज भी ये सब देखता हुआ बैलगाड़ी चलता जा रहा था, तभी रजनी को एकाएक एक बहुत बड़ा बरगद के जैसा बिल्कुल पीला वृक्ष दिखाई दिया।

रजनी- काकी वो पेड़ देखो बरगद जैसा एकदम पीला है और कितना बड़ा है।

काकी- हां बेटी ये तो बिल्कुल पीला है।

सुलोचना- उस पेड़ की तरफ ज्यादा मत देखो, ऐसे ही कई मायावी पेड़ हैं इस जंगल में जो बार बार रंग बदलकर आकर्षित और सम्मोहित करते हैं।

काकी- हां बहन ठीक है, तम ठीक कह रही हो हमे अपने रास्ते और मंजिल पर सीधा ध्यान रखना चाहिए न कि इधर उधर।

रजनी- हां बिल्कुल। हमे तो बैलों पर और बैलगाड़ी चलाने वाले पर ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि वही तो हमे मंजिल तक ले जाएंगे। क्यों बाबू? (रजनी हंसते हुए उदयराज को छेड़ते हुए बोली)

उदयराज ने पलट कर रजनी को देखा तो रजनी मुस्कुरा दी, उदयराज बोला- हां क्यों नही, घर भी तो जल्दी पहुचना है अब। उदयराज ने ये बोलते हुए एक बार फिर रजनी को देखा।

रजनी को बात का मतलब समझ आते ही शर्म आ गयी और उसने काकी और सुलोचना की नजरें बचा कर थोड़ा सा जीभ निकाल कर उदयराज को फिर चिढ़ाया, मानो कह रही हो कि तब तक तो बस सब्र करो।

उदयराज ने भी मौका देखके इशारा किया मानो कह रहा हो कि बस मौका मिलने दे बताता हूँ फिर।

रजनी हंस दी, उदयराज भी मुस्कुरा दिया।

सुलोचना उदयराज के पीछे बैठे बैठे रात के लिए मशाल बनाने लगी और बोली- एक बार अपने अपने ताबीज़ को ठीक से जांच लो और अच्छे से बांध लेना, यह मायावी जंगल इसी के सहारे पार किया जा सकता है।

उदयराज अब तेजी से बैलों को हांकने लगा उसे बस अब एक ही धुन सवार थी कि कैसे भी जल्दी काम खत्म करके बस घर पहुचना है।

जैसे जैसे सुलोचला रास्ता बताये जा रही थी वो बैलगाडी उसी रास्ते पर दौड़ाता जा रहा था।

ऐसे ही रास्ता कटता जा रहा था दोपहर हो गयी तभी रजनी ने काकी के कान में कहा- काकी मुझे पेशाब करना है, तेज से लगी है, कब से रोककर बैठी हूँ।

काकी- अरे पगली ये भी कोई रोकने की चीज़ है, बोल देती न। उदय ओ उदय जरा बैलगाडी कहीं रोकेगा की बस ऐसे ही दौड़ाता जाएगा। रुक जरा

उदयराज- क्यों क्या हुआ काकी? उदयराज ने बैलगाडी रोक दी।

सुलोचना- क्या हुआ बहन?

काकी- अरे वो रजनी को जोर से पेशाब लगी है, कब से दबाए बैठी है।

उदयराज ने रजनी की तरफ देखा तो रजनी ने आंखों के इशारों से मिन्नत सी की, कि जरा रोको बाबू।

उदयराज ने बैलगाडी रोक दी

सुलोचला- लेकिन पुत्री रुको

रजनी- क्या हुआ अम्मा।

सुलोचला- ऐसे मायावी जंगल में यूं ही पेशाब करना खतरनाक हो जाएगा, क्योंकि प्रेत, मानव स्त्री के मूत्र की गंध से और प्रेतनी मानव पुरुष के मूत्र की गंध से तुरंत आकर्षित हो जाते है और वो फिर उसका पीछा करने लगते है अभी तो तुमने ताबीज़ पहना हुआ है तो कोई परेशानी नही है पर वो तुम्हारे मूत्र की गंध को अपने अंदर समाहित करके हमेशा तुम्हारे पीछे लगे रहेंगे जैसे ही ये ताबीज़ हटी फिर वो तुम पर हावी हो जाएंगे। तो उन्हें मूत्र को सूंघने से ही रोकना पड़ेगा।

रजनी को जोर पेशाब लगी थी वो तो कसमसा रही थी

काकी- तो फिर कैसे होगा, अब पेशाब तो किसी को भी लग सकती है, हमने तो इसके बारे में चलने से पहले सोचा ही नही था, कितना खतरनाक है ये जंगल, तो कैसे होगा बहन, अब रजनी को तो लगी है न जोर से।

सुलोचला- हल है न, मैं किसलिए हूँ तुम्हारे साथ, देखो मानव मूत्र पर प्रेत या प्रेतनी की छाया पड़ने से पहले अगर मनुष्य योनि के विपरीत लिंग का मूत्र उसपर पड़ जाए तो उस मूत्र पर उसके बाद उसपर पड़ने वाले मूत्र का अधिकार हो जाता है मतलब वह अकेला नही रहता और फिर ऐसी बाधा नही आ पाती।

काकी- मैं समझी नही

रजनी और उदयराज भी असमंजस की स्थिति में सुलोचना को देखने लगे। रजनी तो बार बार अपनी जांघों को भीच ले रही थी, काफी देर से उसने पेशाब दबा रखा था।

सुलोचला- अरे, बहन जैसे कि रजनी के पेशाब करने के बाद अगर कोई पुरुष उसपर पेशाब कर दे तो रजनी सुरक्षित हो जाएगी, उसपर उस पुरुष का अधिकार स्थापित हो गया।

काकी- तो पुरुष तो हमारे साथ केवल इस वक्त उसके बाबू ही हैं।

सुलोचला- हाँ तो क्या हुआ, वो ही करेंगे इसमें क्या हर्ज है अपनी बेटी की रक्षा के लिए करना पड़ेगा।

रजनी के पेशाब करने के बाद उसके बाबू उसपर पेशाब करके उसमें अपना पेशाब मिला देंगे तो रजनी खाली नही रहेगी इसपर उदयराज का अधिकार साबित हो जाएगा और इसके अलावा मैं पानी में मंत्र मारकर और एक फूल दे देती हूँ रजनी और उदयराज थोड़ा दूर जाकर एक साथ खड़े हो जाये फिर रजनी हाथ में पानी लेकर अपने और उदयराज के चारों ओर एक गोला बना लेगी और लोटा उदयराज को देखकर दक्षिण दिशा में विपरीत मुँह करके पेशाब कर लेगी और फिर उसके बाबू भी दक्षिण दिशा में रजनी के पेशाब में अपना पेशाब मिला देंगे फिर दोनों गोले से बाहर आकर जहां पर गोला बंद किया था वहां फूल रख देंगे मैं मंत्र से उसको बंद कर दूंगी। फिर कोई दिक्कत नही है।

उदयराज- लेकिन मुझे तो पेशाब आ ही नही रही अम्मा (उदयराज ने ये कहते हुए रजनी की तरफ देखा तो रजनी कसमसाते हुए झेप गयी)

सुलोचना- अरे बेटा नही आ रहा तो पानी पी ले एक लोटा, लेकिन तू दो बूंद भी अपना पेशाब उसके पेशाब में मिला देगा तो वो सुरक्षित हो जाएगी।

उदयराज- माता मैं तो मज़ाक कर रहा था मैं अपनी बेटी की सुरक्षा के लिए कुछ भी कर सकता हूँ।

सुलोचना- जानती हूं बेटा, जो इंसान पूरे गांव की सुरक्षा के लिए अपने पूरे परिवार को लेके जिसमे एक छोटी सी बच्ची भी है इतने जोखिम भरे रास्ते पर निकल सकता है उसके लिए तो ये कुछ भी नही, पुत्र तुझे इसका फल अवश्य मिलेगा।

और फिर सुलोचना ने एक लोटे में जल लेकर उनमे मंत्र फूंका और रजनी को दे दिया रजनी उसे लेकर बैलगाडी से उतरी उसके पीछे उदयराज भी चलने लगा, कुछ दूर जाकर रजनी ने पलटकर देखा और बोली यहीं ठीक है बाबू थोड़ा ओट भी है।

रजनी ने बताये अनुसार हाथ में जल लेकर अपने और उदयराज के चारों ओर एक घेरा बना दिया फिर लोटा उदयराज को देकर बोली- अब तुम उधर मुह करो पीछे मत देखना बाबू, ठीक है।

उदयराज- किधर?

रजनी- उधर

उदयराज- अरे उधर किधर?

रजनी- दक्षिण दिशा की तरफ, नही उत्तर दिशा की तरफ।

उदयराज- हे भगवान इतना तेज पेशाब लगा है कि कुछ समझ नही आ रहा मेरी बेटी को।

रजनी- हाँ लगी है न बाबू, अब उधर मुँह करो, काकी और अम्मा दोनों इधर ही देख रही है।

उदयराज- देखने दो मैं क्या डरता हूँ उनसे (उदयराज ने मस्ती करते हुए कहा)

रजनी- बाबू करने दो न, अब, मान भी जाओ मेरे बाबू

उदयराज- इससे भी सुरक्षित तरीका सुझा है मुझे।

रजनी- क्या?

उदयराज- इससे अच्छा तो तुम मेरे मुँह में ही पेशाब कर देती, न जमीन पर गिरता न ऐसी ऐसी आफत आती, मेरे मुँह में वो सुरक्षित रहता।

रजनी (जोर से हंसते हुए) - हे भगवान! बदमाश! गंदे!, बहुत बदमाश होते जा रहे हो बाबू तुम, मेरे पेशाब मुँह में लिए फिरोगे, बोलोगे कैसे? तुम न दीवाने होते जा रहे हो बस, अब बाबू धुमो न उधर मुझे करने दो न।

उदयराज- तुम हो ही इतनी हसीन, क्या करूँ।

रजनी- बदमाश!

उदयराज- अच्छा ठीक है पहले बोलो मुझे पिलाओगी न।

रजनी- क्या? दुद्धू, वो तो तुम्हारा ही है मेरे बाबू, क्यों नही पिलाऊंगी (बहुत प्यार से बोला रजनी ने)

उदयराज- वो नही, वो तो मैं पियूँगा ही, मुझे तो ये भी पीना है।

रजनी- क्या?

उदयराज (धीरे से)- अपनी शादीशुदा बेटी का पेशाब

रजनी का मुँह खुला का खुला रह गया-hhaaaiii dddaaaiiiyaa, dhhaaattt, गंदे! हे भगवान बाबू, ये गंदा होता है न

उदयराज- कुछ भी हो मुझे तो पीना है थोड़ा सा ही सही

रजनी शर्म से लाल हो गयी

उदयराज- बोलो न, तभी उस तरफ घूमूंगा!

रजनी- बहुत बदमाश हो तुम बाबू, अच्छा ठीक है पर घर पे और बस थोड़ा सा और पीना नही है बस मुँह में लेकर फिर थूक देना, ठीक

उदयराज- ठीक

रजनी- चलो अब उधर देखो मुझे बहुत जोर से लगी है बर्दाश्त नही होता अब।

और उदयराज उत्तर दिशा की ओर मुह करके खड़ा हो गया, रजनी का किया हुआ वादा सोचके उसका लन्ड फ़नफना उठा पर जल्द ही उसने adjust कर लिया क्योंकि काकी और सुलोचना ज्यादातर इस तरफ ही देख रही थी

रजनी दक्षिण की तरफ घूमी और जल्दी से अपनी साड़ी को थोड़ा सा उठा के उसके अंदर हाथ डाल के पेंटी को घुटनों तक साड़ी के ही अंदर नीचे सरकाया फिर नीचे बैठ गयी और पेशाब की धार छोड़ दी, पेशाब की धार की शीटी सी आवाज उदयराज के कानों तक पड़ी तो उसका मन मचल उठा, रजनी इतना तो समझ गयी कि बाबू पेशाब की धार की आवाज तो सुन ही रहे हैं, रजनी की मखमली बूर की फांकों के बीच से एक मोटी पेशाब की धार जमीन में इतनी तेज लग रही थी की वहां हल्का सा गढ्ढा हो गया, आखिर उसे पेशाब लगा ही इतना तेज था, काफी देर से दबाए हुए थी, पेशाब की धार छोडते ही उसने राहत की सांस ली।

अभी पेशाब करते हुए उसे कुछ सेकंड ही हुए होंगे कि पास के पेड़ की डाल काफी जोर से हिली जैसे किसी ने झकझोर दिया हो

काकी- ये क्या हुआ बहन।

सुलोचला- आ गए हरामजादे, स्त्री का पेशाब सूंघने, अगर अभी ये गोला न बनाया होता तो टूट पड़ते पेशाब पर, और अगर ताबीज़ न बंधी होती तो हावी वो जाते, उदयराज और रजनी ने भी हिलती हुए डाली को देखा पर डरे नही।

काकी- कितना खतरनाक है ये जंगल वाकई में।

रजनी करीब 30 सेकंड तक मूतती रही फिर उठ गई उसकी मखमली मुलायम बूर से निकला हुआ काफी सारा पेशाब जमीन पर था उसने शर्माते हुए उदयराज को देखा और लोटा ले लिया, उदयराज की नज़र जब रजनी के मूत पर पड़ी तो वो उसे मदहोशी से देखने लगा।

रजनी उत्तर की तरफ मुँह करके खड़ी हो गयी फिर उदयराज रजनी के पेशाब के पास बैठ गया और अपना पहले से ही सख्त हो चुके करीब 9 इंच लंबा 3 इंच मोटा काला लंड निकालकर मूतने लगा, उदयराज के लंड से भी पेशाब को धार सुर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर की आवाज के साथ निकलने लगी और रजनी के पेशाब में जा मिली, जैसे ही रजनी ने अपने बाबू के पेशाब की धार की आवाज सुनी और ये सोचा कि मेरे बाबू का पेशाब मेरे पेशाब से मिल गया, उसके तन बदन में मीठी तरंगे दौड़ गयी, आज ये पहली बार हुआ था , बदन गनगना गया उसका। मन ही मन वो सोचने लगी कि बाबू का लंड कैसा होगा? ये सोचते ही शर्म की लालिमा उसके चेहरे पर दौड़ गयी।

उदयराज मूत चुका था वो अब उठ गया, लंड उसने धोती के अंदर करके कुछ इस तरह एडजस्ट किया कि रजनी को भी इसका अहसास न हो कि वो खड़ा है, वो सारे पत्ते एक ही बार में खोलना नही चाहता था।

फिर रजनी और उदयराज उस गोले के बाहर आ गए और रजनी गोले के मुह पर जब फूल रखने लगी तो सुलोचना ने मंत्र पढ़कर उसको बांध दिया

रजनी ने एक नज़र पेशाब पर डाली, अपने पेशाब में अपने बाबू का मिला हुआ पेशाब देखकर उसकी बूर थोड़ी गीली सी हो गयी और अजीब सी गुदगुदी का अहसाह हुआ, फिर उसकी नज़र अपने बाबू पर गयी जो उसे ये देखते हुए देख रहे थे तो वो शर्मा गयी।

उदयराज बोला- लो अब तुम हो गयी मेरी, तुम पर हो गया मेरा अधिकार।

रजनी- वो तो मैं आपकी बचपन से हूँ, मेरे ऊपर आप ही का हक़ है बाबू। अब चलो

उदयराज और रजनी बैलगाडी तक आ गए।

काकी- अब मिली शांति

रजनी- हां काकी, देखो न कितना सुकून है मेरे चेहरे पर।

सब हंस पड़े

काकी- अब जब यहां रुके ही हैं तो खाना पीना खा के थोड़ा आराम करके फिर चलते हैं।

सुलोचना- ठीक है

फिर सबने कुछ दूर एक घने पेड़ के नीचे खाना खाया और कुछ देर आराम करने लगे

कुछ देर आराम करने के बाद उदयराज फिर बैलगाडी सुलोचना के बताए अनुसार चलाने लगा और शाम हो गयी।

सुलोचला - यहां से लगभग तीन किलोमीटर का रास्ता और है फिर पहुंच जाएंगे, यहां पर अब भूत प्रेतों का खतरा नही है क्योंकि अब हम महात्मा पुरुष के स्थान की परिधि में प्रवेश कर गए हैं

उदयराज, काकी और रजनी ने देखा कि वहां से बड़े बड़े पहाड़ शुरू हो गए थे, सुलोचना ने बनाये हुए मशाल जलाकर बैलगाडी के side में लगी मशालदानी में लगा दिए, जंगल में कुछ दूर तक रोशनी फैल गयी।
 
Update-23

कुछ ही पलों में जलती हुई मशाल की जगमगाती रोशनी के साथ बैलगाडी पहाड़ों से भरी हसीन वादियों में प्रवेश कर गयी। बैलगाड़ी में बैठी रजनी, काकी और उदयराज को एक असीम शक्ति, और सुकून का अहसास हुआ, पहाड़ों के बीच होते हुए बैलगाडी एक ऐसे दो बड़े बड़े पहाड़ों के पास पहुँची, वहां पर कुछ आदिवासी घूम रहे थे उनके हाथ में भी मशाले थी। सामने दो पहाड़ों के बीच एक छोटी सी गुफा थी उसके द्वार पर दो आदिवासी पहरा दे रहे थे, आस पास चारों तरफ पहाड़ ही पहाड़ थे जिनमें और भी गुफायें थी।

सुलोचना- पुत्र बैलगाडी रोको, हम पहुँच गए हैं यही वो जगह है, वो सामने की गुफा के अंदर उन महात्मा का वास है।

उदयराज ने बैलगाड़ी रोक दी।

रजनी और काकी चकित होकर देख रहे थे, वहां के वातावरण में एक अजीब ही चुम्बकीय शक्ति थी जो अत्यंत ऊर्जा का अहसास करा रही थी।

सुलोचना बैलगाड़ी से उतरी और लाठी के सहारे उस मुख्य गुफा द्वार तक गयी उसे देखते ही वहां पर पहरा दे रहे आदिवासी ने सुलोचना को झुक कर अभिवादन किया, ये देखकर उदयराज, रजनी और काकी चकित रह गए।

सबको बड़ा गर्व हुआ कि वह एक ऐसे इंसान के साथ हैं जिसकी यहां पर इतनी इज़्ज़त है। उदयराज सुलोचना के प्रति खुद को मन ही मन बहुत आभारी और कृतज्ञ महसूस करने लगा। उसने मन ही मन खुद से ये प्रण किया कि वह जिस भी तरह से सुलोचना के काम आ सकता है जरूर आएगा। सुलोचना के इस तरह निस्वार्थ रूप से उसकी मदद करना उसके दिल को गहराई तक छू गया।

सुलोचना ने उस आदिवासी से कुछ बात की फिर पीछे मुड़कर सबको बैलगाडी से उतरकर आने के लिए कहा।

उदयराज ने बैलगाडी एक पेड़ से बांध दी, सुलोचना के इशारे पर एक आदिवासी ने बैलों के चारे के इंतजाम कर दिया, सबलोग गुफा के द्वार पर गए, आदिवासी ने सबको झुककर अभिवादन किया और सब गुफा के अंदर प्रवेश कर गए।

अंदर जाकर उन्होंने देखा कि कई कक्ष बने हुए थे जिसमें से एक में सुलोचना उन्हें ले गयी और बोली- अभी यहीं बैठो।

गुफा के अंदर काफी बड़े बड़े चट्टानो को काटकर बैठने के लिए और लेटने के लिए बनाया हुआ था, सब बैठ गए, तभी एक आदिवासी उनके लिए बांस की बनी बड़ी गिलास में कुछ पेय पदार्थ पीने के लिए लाया।

उस आदिवासी ने सुलोचना से कुछ कहा फिर सुलोचना ने बोला- लो ये पियो, थकान उतर जाएगी।

सबने दिव्य रस पिया और वाकई में उन्हें पीने के बाद काफी ऊर्जा महसूस हुई, उस वक्त शाम के 7 बज चुके थे, बाहर अंधेरा हो गया था, गुफा के अंदर व बाहर मशाले जल रही थी।

सुलोचना ने एक आदिवासी को कुछ बोलकर अंदर भेजा।

उदयराज- माता ऐसा जान पड़ता है ये लोग आपको बहुत अच्छे से जानते हैं।

सुलोचना- हां बिल्कुल, इन लोगों के साथ मैं कुछ महीने रही हूं जब मैं मन्त्र सीख रही थी। ये लोग मुझे बहुत इज़्ज़त देते हैं और बात मानते हैं।

काकी- हां वो तो दिख ही रहा है बहन, पर मान लो आप हमारे साथ न होती तो हम कैसे इनकी भाषा समझते और कैसे आगे बढ़ते। आप तो जैसे वरदान बनकर आयी हैं हमारे लिए।

सुलोचना- नही बहन ये तो मेरा फ़र्ज़ है, अपनी प्रतिज्ञा से मैं बंधी हूँ, जन मानस की सेवा करना ही मेरा धर्म है, इसलिए ही मैंने अपने पति की अधूरी इच्छा को पूरा करने के लिए ये सब सीखा और कई वर्षों से मैं यही कर रही हूँ। अच्छा बहन क्या घर से घर का कुछ चावल लायी हो हमे हवन में उसकी जरूरत पड़ेगी।

उदयराज- हां माता हम घर से कुछ अनाज लाये थे, उसमे चावल भी है।

सुलोचना- ठीक है वो निकाल कर थोड़ा सा एक पोटली में ले लो।

काकी ने वैसा ही किया।

तभी वह आदिवासी आया और उसने सुलोचना से कुछ कहा।

सुलोचना- आओ चलो अब मेरे साथ।

सब सुलोचना के पीछे चल दिये, वो गुफा के अंदर आगे आगे लाठी लिए चल रही थी और उसके पीछे काकी और फिर रजनी और सबसे पीछे उदयराज।

गुफा के अंदर एक छोटी सुरंग थी वो लोग उसी में से आगे बढ़ रहे थे, ये सुरंग अंदर ही अंदर एक बड़ी सी गुफा में जा कर मिलती थी उस गुफा के चारो तरफ भी कई छोटे कक्ष बनाये गए थे।

आखिर वो उस गुफा तक पहुचे जहां वह महात्मा विराजमान थे। उनकी आभा देखते ही बनती थी, उनके अगल बगल एक आदिवासी सेवक और एक सेविका खड़ी थी जो उन्हें मोरपंख से बने पंखे से हवा कर रहे थे। उस गुफा में कई तरह की जड़ीबूटियां, फूल और सुगंधित मालाएं लगी थी। महात्मा के ठीक सामने एक छोटा सा हवन कुंड था, दीवारों पर मशालें जल रही थी लेकिन धुवां नाममात्र भी नही था।

सुलोचना ने उनको प्रणाम किया साथ ही उदयराज और रजनी तथा काकी ने भी प्रणाम किया। सब महाराज के सामने बैठ गए।

महात्मा सुलोचना को देखते ही बोले- आओ पुत्री, कैसी हो?

सुलोचना- महात्मन मैं ठीक हूँ। आपकी कृपा है।

महात्मा- जीती रहो पुत्री।

महाराज ने उदयराज के ऊपर दृष्टि डाली कुछ पल उसे देखा फिर आंखें बंद की, कुछ मंत्र बोले और फिर आंखें खोल कर बोले- विक्रमपुर के मुखिया उदयराज सिंह!, बोलो पुत्र इस वीरान घने जंगल में अपनी पुत्री के साथ कैसे आना हुआ, क्या कष्ट है?

सुलोचना को छोड़कर सब भौचक्के रह गए, क्योंकि सुलोचना उनकी महिमा जानती थी, उदयराज का मुँह खुला का खुला रह गया यह सोचकर कि बिना बताये मंत्रों की शक्ति से ही महात्मा ने उसका नाम, गांव, संबंध सब जान लिया, वह बहुत प्रभावित हुआ, वह समझ गया कि अब उसकी समस्या का समाधान मिल जाएगा। इतना दिव्य महात्मा उसने आज तक नही देखा था और बोली उनकी कितनी सरल है, न कोई घमंड न कोई गुरूर। यही सही सच्चे महात्मा का व्यक्तित्व होता है।

वह हाँथ जोड़कर बोला- महात्मा, ये हमारा सौभाग्य है कि माता सुलोचना की कृपा से आज हमे आपके दर्शन मिले। आपने अपनी शक्ति से स्वयं ही मेरा नाम और गांव जान लिया।

महात्मा- जीते रहो पुत्र, सब ईश्वर की शक्ति और उन्ही की माया है, बताओ क्या कष्ट है?

उदयराज- महात्मा, विक्रमपुर गांव में कई पीढियों से एक ऐसी समस्या चली आ रही है जिसका हल न तो हमारे पूर्वज खोज पाए और न ही हम, हमारे गांव की जनसंख्या पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ने की बजाय घट रही है, कई सौ सालों पहले जहां 1000-2000 घर थे आज वो सिमटकर 100-200 ही रह गए हैं, जन्मदर और मृत्युदर में बहुत ही बड़ा अंतर आ गया है, बच्चे जल्दी नही होते है और होते भी हैं तो ज्यादातर कम उम्र में ही खत्म हो जाते हैं।

उदयराज ने आगे कहा- लोग बीमार पड़ते है, इलाज़ कराओ तो मर्ज का पता ही नही लगता और कुछ दिन बाद मौत हो जाती है, धीरे धीरे करके कितने परिवार पूरे के पूरे साफ हो गए उनका अब नामो निशान नही, हर मौजूदा परिवार में लोगों ने अपनो को खोया है और जो परिवार पूरे के पूरे साफ हो गए वो तो हो ही गए। मैन खुद अपनी पत्नी और बेटे को खोया है, ये मेरे साथ मेरी काकी हैं जिन्होंने अपने पति और बेटे को खोया है, महात्मा जी अगर किसी मर्ज का पता हो तो समस्या का हल निकले पर यहां तो कुछ पता ही नही चलता। इस तरीके से तो एक दिन ऐसा आएगा कि हमारा और हमारे कुल का ही नामो निशान मिट जाएगा, कोई बचेगा ही नही। आखिर हमने किसी का क्या बिगाड़ा है

जबकि हम और हमारे कुल के लोग निहायत ही सीधे साधे हैं, न किसी से कोई बैर न किसी से कोई झगड़ा, कभी किसी का अहित नही सोचते, किसी के साथ ग़लत नही करते, ऐसा कोई काम नही करते जिससे किसी का दिल भी दुखे, और ये आज से नही पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है। बहुत ईमानदार, शरीफ, भोले भाले सच्चे लोग हैं हमारे कुल में, हमारे गांव में।

बाहरी दुनियां में देखो, कितना अधर्म, कुकर्म, अनैतिक कार्य, कितना ही गलत-गलत काम होता है पर मजाल क्या है हमारे यहां कभी ऐसा कुछ हुआ हो, गलत हम सोच ही नही सकते और न कर सकते हैं, यही हमारी रीति है यही हमारा स्वभाव है और यही हमारी पहचान और मूल है। जो मान मर्यादा हमारे पूर्वजों द्वारा बनाई गई है उसकी लाज का पालन आज भी हमारे कुल का एक एक शख्स कर रहा है और करता रहेगा।

बाहरी दुनियां से तो हमने अपने आप को पीढ़ियों से ही अलग कर रखा है ताकि हमारे कुल के लोगों पर कभी पाप, कुकर्म, अनैतिक, गलत काम, अधर्म की छाया भी न पड़े, और हमे मोक्ष प्राप्त हो।

महात्मा जी, सुलोचना, रजनी, और काकी सब ध्यान से सुन रहे थे।

उदयराज ने आगे कहा
 
Update-24

उदयराज ने अपनी समस्या बताते हुए आगे कहा- हे महात्मा हमारी रक्षा कीजिये, नही तो हमारा नाश हो जाएगा, बाहरी दुनियां में पाप, दुराचार, अधर्म सब कुछ हो रहा है, परंतु फिर भी पूरी दुनियां आगे बढ़ रही है, जनसंख्या बढ़ रही है एक संतुलन बना हुआ है, मृत्य हो रही है तो जन्म भी हो रहे हैं, लोग गलत करके भी खुश है, परंतु हम लोग डर और दुख के साये में जी रहे है, आगे हमारे कुल, हमारी सभ्यता का क्या होगा, हमारा तो अस्तित्व ही खतरे में आ गया है, महात्मा हमारी जान बचाइए, कोई रास्ता बताइए जिससे ये पता लगे कि ऐसा क्यों है, क्यों हमारी संख्या अनायास ही घट रही है, क्यों हमारा संतुलन बिगड़ गया है, और इसका हल क्या है? यह कैसे सुधरेगा? इसके लिए क्या करना होगा? इतना सबकुछ विस्तार से बताते-बताते उदयराज की आंखें नम हो गयी थी, महात्मा को इसका अहसास था, अन्य लोग भी काफी उदास हो गए।

महात्मा ने उन्हें सांत्वना दी और बोले- चिंता मत करो हर समस्या का हल होता है, क्या तुम अपने घर से कुछ चावल के दाने लाये हो।

सुलोचना- हाँ महात्मा लाये हैं और सुलोचना ने वह छोटी चावल की पोटली महात्मा को दे दी।

महात्मा ने अपने सामने बने हवन कुंड में कुछ लकड़ियां रखकर जला दी, उसमे कुछ जड़ी बूटियां डाला फिर एक सुगंधित द्रव्य डाला और उदयराज के घर के चावल के कुछ दाने उसमे डाल दिए और बाकी बचे हुए दाने उन्होंने उदयराज, काकी और रजनी को देते हुए कहा इसको मुट्ठी में बंद कर लो और सुलोचना को छोड़कर आप लोग अपने कुल देवता या कुल वृक्ष को आंखें बंद कर ध्यान करो।

उदयराज, काकी और रजनी ने आंखें बंद कर अपने कुलवृक्ष को ध्यान किया।

महात्मा ने मंत्र पढ़ना शुरू किया और ध्यान लगाया, कुछ देर बाद आंख खोला और बोले- ह्म्म्म तो ये बात है।

सबने आँखे खोल दी

महात्मा- मैं जो बताने जा रहा हूँ अब ध्यान से सुनो

ये जो तुम्हारे गांव में बरगद जैसा कुलवृक्ष है वो 500 साल पुराना है।

उदयराज- हां महात्मा लगभग, बहुत पुराना हमारा कुलवृक्ष है वो।

महात्मा- उसी वृक्ष के नीचे बैठकर तुम्हारे एक समकालीन पूर्वज महात्मा ने जो उस वक्त मुखिया भी थे, एक यज्ञ किया था और अपने सम्पूर्ण कुल को मोक्ष दिलाने के लिए बाहरी दुनियाँ से अलग कर बांध दिया था, उन्होंने पहले अपने मंत्र की शक्ति से तुम्हारे कुल के सभी लोगों के अंदर से अधर्म, पाप, गलत सोच, गलत काम का नाश कर उनको पूर्ण स्वच्छ किया और सबकी नीयत को साफ कर पूर्ण कुल को बांध दिया और ये बंधन आज भी लगा हुआ है, उन्होंने ऐसा सोचा कि जब हम लोगों के मन में गलत नीयत होगी ही नही तो हम गलत करेंगे ही नही, बस ईश्वर के बनाये हुए नियम पर चलेंगे, प्रकृति के हिसाब से चलेंगे और बाहरी दुनिया से हमे कोई मतलब ही नही होगा तो हम सब के सब मोक्ष को प्राप्त होंगे, उन्होंने ये सब सम्पूर्ण कुल की भलाई के लिए किया पर ये धीरे धीरे उल्टा पड़ता चला गया और ऐसी स्थिति आ गयी कि संतुलन बिगड़ गया, अब क्योंकि वो महात्मा सिद्ध पुरुष थे तो उनके मंत्र की काट किसी के पास तुम्हारे कुल में नही है और उनके बाद न ही कभी कोई ऐसा सिद्ध पुरुष आया जो इसको समझ पाता और इसको तोड़ पाता। धीरे धीरे जीवन मरण का संतुलन बिगड़ता गया और आज ये स्थिति है कि तुम्हारे कुल के एक तिहाई परिवार खत्म हो चुके हैं।

उदयराज, रजनी और काकी चकित रह गए ये जानकर और अचंभित थे कि कैसे कुछ ही पलों में महात्मा ने उनके कुल की सारी जन्म पत्री खोल कर रख दी थी

उदयराज- तो महात्मा जी क्या जो लोग मर चुके हैं उन्हें मोक्ष प्राप्त हुआ होगा।

महात्मा- नही

उदयराज का अब माथा ठनका।

उदयराज- पर क्यों महात्मा, हम तो सदैव ईश्वर और प्रकृति के बनाये हुए नियम के हिसाब से चल रहे हैं।

महात्मा- जिसकी अकाल मृत्यु हो उसे कभी मोक्ष प्राप्त नही होता, पहले वो प्रेत योनि में भटकता है और जैसा की तुमने बताया कि तुम्हारे गांव में लोग बीमार पड़ते हैं और मर जाते हैं तो ये एक अकाल मृत्यु हुई, और अकाल मृत्यु पाने वाले को मोक्ष प्राप्त नही होता, अकाल मृत्यु का अर्थ है जब कोई जीव अपनी पूर्ण आयु जिये बिना बीच में ही किसी भी कारणवश मर जाये। ऐसे में वो प्रेत योनि में चला जाता है और जब तक उसकी तय आयु पूरी न हो जाये वो वहीं भटकता रहता है, तुम्हारे पूर्वज ने अपनी तरफ से तो अच्छा ही करने की कोशिश की पर वह ये भूल गए कि कोई कितना भी बड़ा महात्मा या सिद्ध पुरुष हो, कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, ईश्वर के बनाये हुए नियम से छेड़छाड़ नही कर सकता और अगर जानबूझ कर करता है तो वह विनाशकारी ही होता है, तुम्हारे पूर्वज ने सोचा कि हम गलत करेंगे ही नही तो सब के सब मोक्ष को प्राप्त होंगे पर नियति ने फिर अकाल मृत्यु देना शुरू कर दिया, और नियमानुसार मोक्ष प्राप्ति विफल हो गयी, क्योंकि मोक्ष प्राप्ति के लिए ईश्वर के बनाये नियमों का सही से पालन करते हुए पूर्ण आयु को प्राप्त होना होता है तभी वह मिलता है पर कुछ विशेष वजह से यह फिर भी नही मिलता, मोक्ष प्राप्ति इतना आसान नही जितना तुम्हारे पूर्वज द्वारा समझा गया और उनकी इस भूल की वजह से कितनो की जान चली गयी।

उदयराज महात्मा का मुंह ताकता रह गया।

महात्मा- नियति कभी भी अपने बनाये हुए नियम में होने वाले छेड़छाड़ के मकसद से बनाये गए नियम को पूर्ण नही होने देती, सोचो अगर यह इतना ही आसान होता तो दुनियां के सब लोग इसका ऐसे ही पालन करके मोक्ष प्राप्त कर लेते और जीवन मरण के झंझट से मुक्त हो जाते, सब लोगों को स्वर्ग की प्राप्ति हो जाती और फिर तो नरक भी खाली हो जाता और मृत्यलोक भी, ये संसार ही खत्म हो जाता, जरा सोचो उदयराज सोचो, क्या होगा अगर सब लोग इतनी आसानी से मोक्ष की प्राप्ति कर स्वर्ग को चले जाएं तो?

इस मृत्यलोक में जीवन की उत्पत्ति तो खत्म ही हो जाएगी, लोग ईश्वर के बनाये हुए नियम पर बड़ी आसानी से चलते हुए अपनी पूरी आयु जीकर मोक्ष प्राप्त कर स्वर्ग में चले जायेंगे, नया जन्म कैसे होगा, धीरे धीरे संसार खाली, नरक के लोग भी अपनी सजा पूरी कर स्वर्ग को प्राप्त हो जाएंगे और नर्क भी खाली हो जाएगा, जब गलत काम होगा ही नही तो एक वक्त तो ऐसा आएगा न की नर्क नगरी में ताला लग जायेगा और मृत्यु लोक भी खत्म।

तो क्या ये इतना आसान है कि कोई इंसान कुछ सिद्धियां प्राप्त करके नियति को ललकारे की देख मैं कुछ छोटी मोटी शक्तियां प्राप्त करके तेरे बनाये नियम को तोड़कर वो कर लूंगा जो मैं चाहता हूँ, क्या ऐसा हो सकता है? सोचो जरा

उदयराज को बहुत शर्मिंदगी महसूस हो रही थी उसके पूर्वज द्वारा किये गए इस बेवकूफी भरे कार्य से

महात्मा ने आगे समझाया
 
Update-25

महात्मा- एक बात को समझने की कोशिश करो इस ब्रम्हांड में अगर कोई भी चीज़ है तो उसका अस्तित्व जरूर है, और सबकुछ ईश्वर ने ही बनाया है, इस संसार को चलाने के लिए सब चीज़ की जरूरत है

देखो जैसे अगर सफेद है तो काला भी है बिना काले के सफेद का अस्तित्व ही नही है

अगर पुण्य है तो पाप भी है और अगर पाप ही नही होगा तो पुण्य के अस्तित्व को पहचानेंगे कैसे? हमे कैसे पता चलेगा कि पुण्य इसको बोलते है, पुण्य का अस्तित्व पाप से है और पाप का पुण्य से

इसी तरह सिपाही का अस्तित्व चोर से है, चोर है तो सिपाही है, चोर नही तो सिपाही का क्या अस्तित्व

उदयराज महात्मा के चरणों में पड़ गया- हे महात्मा मुझे अब समझ आ रहा है कि हमारे पुर्वज ने क्या गलती की, हमने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है, हमे नियति से छेड़छाड़ नही करनी चाहिए थी।

महात्मा- पुत्र इसमें तुम्हारा कोई दोष नही, ये तुम्हारे द्वारा नही हुआ है, इसके लिए खुद को दोषी मत समझो, तुम्हारे पुर्वज ने अपने मंत्र की शक्ति से तुम्हारे कुल को बांध दिया है इसलिए तुम्हारा कोई दोष नही।

उदयराज- तो महात्मा जी इसका हल क्या है? कैसे हम इसको तोड़कर बाहर निकल सकते हैं। कैसे हम खुद को और बचे हुए लोगों को बचा सकते हैं।

महात्मा ने फिर अपनी आंखें बंद की ध्यान लगाया और आंखें खोली, उन्होंने उदयराज, रजनी और काकी को मुठ्ठी में लिए हुए चावल के दानों को हवन में विसर्जित करने के लिए बोला, सबने वैसा ही किया, महात्मा ने फिर एक मुट्ठी चावल लिया और आंखें बंद कर ध्यान लगाया, कुछ देर बाद आंखें खोल कर फिर से उदयराज, काकी और रजनी को चावल के दाने देकर मुट्ठी बंद करने को कहा, सबने वैसा ही किया और महात्मा ने आंखें बंद कर मंत्र पढ़ना शुरू किया। कुछ समय बाद उन्होंने आंखें खोली।

महात्मा- इसका हल है, इसके लिए तुम्हे उपाय और कर्म दोनों करने होंगे, उपाय तुम्हे तुम्हारे पुर्वज द्वारा लगाए गए मंत्र को काटने के लिए करना होगा और कर्म तुम्हे नियति के नियम को दुबारा स्थापित करने के लिए करना होगा जो खंडित हो चुका है इस वक्त। फिर सब धीरे-धीरे सही हो जाएगा।

उदयराज- कैसा उपाय और कैसा कर्म महात्मा जी?

महात्मा- उपाय ले लिए मैं तुम्हे मन्त्र से सुसज्जित करके चार कील दूंगा जिसको तुम्हे मेरे बताये गए जगह पर गाड़ना है?

उदयराज- बताइए महात्मा जी, जो जो आप कहेंगे मैं करने के लिए तैयार हूं।

महात्मा- पहली कील तुम्हे यहां से जाते वक्त जंगल में एक पीला वृक्ष मिलेगा उसकी जड़ों में गाड़ देना है ध्यान रहे उस पेड़ को छूना मत किसी पत्थर से उस पेड़ को बिना छुए कील को ठोककर गाड़ देना और फिर उस पर एक काम और करना है जो मैं तुम्हे और सुलोचना को एकांत में बताऊंगा।

उदयराज, काकी और रजनी को अब वो पेड़ याद आ गया जो उन्होंने आते वक्त देखा था पीले रंग का

काकी- हाँ महात्मा जी, आते वक्त हमने एक पीला बड़ा सा वृक्ष देखा था, बहुत मायावी वृक्ष जान पड़ता था वो।

महात्मा- वो एक शैतान प्रेत है जो किसी श्राप से वृक्ष रूप में वहां सजा भुगत रहा है उसकी सजा पूर्ण होते ही वह पेड़ सूख जाएगा और उसको मुक्ति मिल जाएगी। वह बहुत पुराना वृक्ष है, डरो मत वह तुम्हारा कुछ नही बिगाड़ सकता जब तक तुम सब लोगों ने सुलोचना द्वारा दी गयी ताबीज़ बांध रखी है बस उस पेड़ को छूना मत, कील गाड़ने के बाद उस पेड़ को तुम्हे कुछ अर्पित करना पड़ेगा जो मैं एकांत में उदयराज और सुलोचना को बताऊंगा, वह अर्पित करते ही वह शैतान खुश हो जाएगा और तुम्हारे पुर्वज द्वारा लगाए गए बंधन के मंत्र को काटने में मदद करेगा।

दूसरी कील तुम्हे अपने गांव की सरहद पर गाड़नी है जब यहां से जाते वक्त तुम अपने गांव के सरहद पर पहुँचो तो दूसरी कील सरहद पर गाड़कर गांव में दाखिल हो जाना, और यहां भी कील गाड़ने के बाद उस पर वही अर्पित करना होगा जो पेड़ पर किया था।

तीसरी कील घर की चौखट पर रात के ठीक बारह बजे गाड़नी है और यहां पर कुछ अर्पित नही करना है केवल कील ही गाड़नी है।

उदयराज- और महात्मा जी चौथी? (बड़ी उत्सुकता से)

महात्मा- चौथी कील तुम्हे अमावस्या की रात को ठीक 12 बजे अपने कुलवृक्ष के नीचे उसकी जड़ में गाड़ना है परंतु यहां पर फिर तुम्हे वही चीज़ अर्पित करना है जो तुमने जंगल के पेड़ और गांव के सरहद पर कील के ऊपर की थी, ध्यान रहे खाली घर की चौखट पर गड़ी कील पर कुछ अर्पित नही करना, खाली तीन जगह।

उदयराज- परंतु महात्मा जी हमारा जो कुलवृक्ष है उसकी जड़ के ऊपर तो एक बहुत बड़ा चबूतरा बना हुआ है, उसकी जड़ तो बहुत नीचे है।

महात्मा- तुम कुलवृक्ष के तने में थोड़ा छुपाकर गाड़ देना उससे भी काम हो जाएगा।

उदयराज- ठीक है महात्मा जी

महात्मा- अपने मुट्ठी में लिए हुए चावल के दानों को अब हवन कुंड में डाल दो।

सबने वैसा ही किया

महात्मा ने बगल में खड़े आदिवासी से कुछ कहा और वह एक पात्र में चार कीलें ले आया।

महात्मा ने उसे बगल में रखा।

उदयराज- महात्मा जी ये तो उपाय हो गया और इनके अलावा अपने जो कर्म बताया उनमे क्या करना होगा? वो कौन सा कर्म है? जिसको करके मैं नियति की खंडित हुई व्यवस्था को पुनः स्थापित कर सकता हूँ।

महात्मा- वो मैं तुम्हे एकांत में बताऊंगा, वो कुछ अलग है क्योंकि हर चीज़ की एक मर्यादा होती है और तरीका होता है।

महात्मा ने सबको अभी पुनः थोड़ा विश्राम करने के लिए कहा और सुलोचना सबको लेके बगल के कक्ष में गयी, वहां पर एक आदिवासी ने सबको एक पात्र में कंदमूल और फल तथा दिव्य रस खाने पीने के लिए दिए।

महात्मा ने वो कीलें तैयार करना शुरू कर दिया
 
Update- 26

सबने फल खाये और आराम करने लगे, उदयराज को अब बहुत सुकून था वह सोच रहा था अब जाके कितने ही सदियों बाद उन्हें उनकी समस्या का हल मिला है। वह खुद को बहुत भाग्यशाली समझ रहा था।

इतने में सुलोचना उठ कर महात्मा जी के पास गई, महात्मा जी ने वो चार कीले तैयार कर पीपल के पत्तों में बांध कर रख दी थी।

महात्मा ने सुलोचना से कहा की केवल उदयराज को उनके दूसरे कक्ष में भेजो। उदयराज गया, उस कक्ष में केवल महात्मा और उदयराज ही थे।

उदयराज- जी महात्मा जी

महात्मा- आओ बैठो, मैंने कीलें तैयार कर दी हैं, इस पीपल के पत्ते में हैं, इसे संभाल कर रखो और कील गाड़ने ले बाद उस पर जो अर्पित करना है वो है बच्चे को स्तनपान करा रही किसी स्त्री का दूध, और इस वक्त तुम्हारे साथ केवल एक ही स्त्री ऐसी है जो बच्चे को स्तनपान कराती है, वो है तुम्हारी बेटी- रजनी।

उदयराज- हां महात्मा जी इस वक्त तो वही ऐसी स्त्री है जो स्तनपान करा रही है। परंतु इसको करेंगे कैसे, और ये तो आप सिर्फ गुप्त तरीके से मुझे बता रहे हैं मैं अपनी बेटी को ये कैसे बताऊंगा?

महात्मा- जो मैं तुम्हे बता रहा हूँ वही मैं सुलोचना को बता दूंगा वो तुम्हारी बेटी को समझा देगी, और इसको करना ऐसे है कि कील गाड़ने के बाद सीधे स्तन से उसको दबाकर एक धार उसपर गिरा देनी है

उदयराज- ठीक है, और महात्मा जी वो कर्म क्या है जो मुझे करना है।

महात्मा ने एक बड़ा सा कागज जिसमे कुछ लिखा था जो गोल गोल मोड़ कर एक सुनहरे धागे से बांधा हुआ था, उदयराज को दिया और बोला- वो कर्म इसमें लिखा हुआ है इसको घर पर जाकर ही एकांत में खोलना और पढ़ना, रास्ते में बिल्कुल नही, संभाल कर रख लेना, मैंने सोचा था कि वो कर्म मैं तुम्हे जुबानी बताऊंगा पर यह उचित नही इसलिये कागज में लिखकर दे रहा हूँ, इसको पढ़ना, जैसा इसमें लिखा है उसका पालन करना, इसके साथ ये एक दिव्य तेल है ये भी मैं तुम्हे दे रहा हूँ, इसका क्या प्रयोग है इस कागज़ में लिखा है

इस कर्म को तुम्हे करना ही होगा नही तो उपाय अधूरा रह जायेगा और विफल हो जाएगा, ये दोनों उपाय और कर्म एक दूसरे के पूरक हैं, एक को भी छोड़ा तो दूसरा विफल हो जाएगा और कर्म पूरा होने के ठीक दो महीने बाद इस कागज़ को मुझे पुनः वापिस करने आना होगा।

उदयराज ने वो कागज और दिव्य तेल की शीशी ले ली और बोला- महात्मा अपने कुल के जीवन की रक्षा से बढ़कर कुछ नही, आप जो कहेंगे जैसा कहेंगे, जो भी कर्म इसमें लिखा होगा मैं उसका पालन करूँगा। परंतु मेरी एक चिंता है।

महात्मा- क्या पुत्र?

उदयराज- अगर इस कागज़ को मेरे खोलने से पहले धोखे से यह किसी के हाथ लग गया और उसने खोल लिया तो क्या होगा?

महात्मा- यह जादुई पत्र केवल तुम्हारे नाम से ही बना है अगर यह किसी के हाँथ लग भी गया और वो उसको खोल भी लेगा तो उसे कुछ लिखा हुआ दिखाई नही देगा, ऐसा ही एक जादुई पत्र मैं तुम्हारी बेटी रजनी को भी दूंगा और यही सारी बात उसे भी कहूंगा, क्योंकि यह कर्म तुम दोनों के द्वारा ही हो सकता है और किसी के नही, इसका मुख्य कारण यह है कि तुम्हारे जिस पुर्वज ने ऐसा किया था वो उस वक्त गांव का मुखिया था और इस वक्त गांव के मुखिया तुम हो, तो ये कर्म तुम्हारे द्वारा ही सम्पन्न होना चाहिए।

उदयराज- जो आज्ञा महात्मा (परंतु उदयराज मन ही मन बेचैन था कि ऐसा क्या कर्म है जिसमे मेरी बेटी का भी सहयोग आवश्यक है बिना उसके ये हो नही सकता, अब खैर जो भी हो वो तो घर पहुँच कर इस दिव्य कागज को खोलकर ही पता चलेगा, और इसको वापिस करने भी आना है)

महात्मा ने फिर रजनी को बुलाया और यही सारी बातें कहते हुए एक और जादुई पत्र उसको दिया जो केवल उसके नाम था, रजनी ने उन्हें प्रणाम किया और वापिस कक्ष में आ गयी और उसने वो कागज संभाल कर रख लिया।

महात्मा ने फिर सुलोचना को बुलाया और उसको अर्पित करने वाली बात समझा कर बोला- ये बात उदयराज की बेटी को समझा दो और अभी रात के 2 बजे हैं आप लोग आराम कर लीजिए और फिर सुबह शीघ्र ही निकल जाइए।

सुलोचना ने ऐसा ही किया, सबने कुछ घंटे विश्राम किया फिर महात्मा जी को प्रणाम करके गुफा से निकल गए, सुबह के 4 बज गए थे, उदयराज ने अपनी बैलगाडी तैयार की और सब वापिस सुलोचना की कुटिया की तरफ रवाना हो गए, उदयराज बहुत खुश था पर असमंजस में भी था कि क्या कर्म है जो उसे करना होगा, यही हाल रजनी का भी था। वह तेजी से बैलगाडी चलाये जा रहा था, दोपहर हो गयी और दूसरा पहर शुरू हो गया, आखिरकार वह उस पीले पेड़ के पास पहुचे।

उदयराज ने बैलगाडी रोक दी और बोला- यही वो पेड़ है न

काकी और सुलोचना- हां यही है

वो पीला पेड़ बहुत बडा और अजीब था, रजनी को भी पता था कि मुझे अब यहां क्या करना है।

उदयराज ने रजनी को देखा तो वो मुस्कुरा पड़ी और मजाक में बोली- बाबू पहली कील यहीं ठोकनी है न

उदयराज- हां बेटी और चौथी घर पे (उदयराज ने भी मजाक में double meaning में बोला)

रजनी- चौथी नही तीसरी बाबू तीसरी, अभी से भूल गए (रजनी अपने बाबू का मतलब तो समझ गयी पर बात बदलते हुए बोली)

उदयराज- मुझे तो कील ठोकने से मतलब है चाहे तीसरी हो या चौथी।

और सब हंसने लगे

रजनी झेंप गयी

उदयराज- चलो अब मैं अपना काम करता हूँ और मेरी बिटिया रानी तुम अपना काम करो, पता है न क्या करना है।

रजनी- हां हां पता है मेरे बाबू जी, अम्मा ने सब बात दिया है। आप अपना काम तो करो पहले

उदयराज में एक कील निकाली और एक हाथ में पत्थर लिया, पेड़ की जड़ के पास गया और बिना उसको छुए कील जड़ में थोक दी, पेड़ की जड़ों के आस पास काफी झाड़ियां थी, कील ठुकते ही पेड़ की जड़ से एक पीला द्रव्य निकला और उसकी बड़ी बड़ी शाखायें काफी तेजी से हिली, हवाएं चलने लगी, ऐसा लगा पूरे जंगल में साएं सायं की आवाजें गूंज रही है अगर वो ताबीज़ न पहनी होती तो डर ही गए होते सब, उदयराज कील ठोकर वापिस आ गया

रजनी ने फिर मजे लिए- बाबू कील ठोक दी, बहुत दर्द हुआ होगा न उसको, तभी तो देखो कैसे शाखायें हिलने लगी, जैसे बेचारा फड़फड़ा रहा हो। अपने बाबू को देखते हुए बोली- बेदर्दी

उदयराज भी मजे के मूड में आ गया- असली कील ठुकती है तो ऐसे ही दर्द होता है

रजनी मतलब समझते ही मुस्कुरा दी और बैलगाडी से उतरी और बोली अब चलो मेरे साथ मुझे भी तो अपना काम करना है चलो दिखाओ कील कहाँ ठोकी है।

उदयराज ने double meaning में बोला- जहां ठोकी जाती है वहीं ठोकी है, अब क्या तुम्हारे बाबू को ये भी नही पता होगा कि कील कहाँ ठोकी जाती है।

रजनी मतलब समझते ही बुरी तरह शर्मा गयी और हंसते हुए बोली- बहुत बदमाश होते जा रहे हैं मेरे बाबू। कोई आस पास है इसका भी ख्याल नही।

और उदयराज रजनी को लेके पेड़ तक जाने लगा, सुलोचना और काकी बैलगाडी में ही बैठी देख रही थी।

उदयराज ने पेड़ के पास पहुँच के रजनी को वो कील दिखाई और बोला जो भी करना पेड़ को बिना छुए करना।

रजनी- ठीक है, पर मेरे बाबू पहले अपना मुँह उधर करो, पीछे घूमो, काकी और अम्मा इधर ही देख रही है, कहेंगी की कैसे बेशर्म पिता हैं, अपनी शादीशुदा बेटी की तरफ ऐसा करते हुए देख रहे हैं, चलो पीछे घूमो जल्दी।

उदयराज पीछे की तरफ घूम गया और धीरे से बोला- मन तो देखने का कर रहा है बहुत, कितने दिन हो गए देखे।

रजनी भी धीरे से बोली- मेरे बेसब्र बाबू, अभी दो दिन पहले ही देखा है, थोड़ा सब्र करो, सबकुछ जल्दी जल्दी करेंगे तो जल्दी घर पहुचेंगे, समझें बुध्धू।

उदयराज अपनी शादीशुदा बेटी की मंशा जानकर झूम उठा

रजनी ने पेड़ की जड़ के पास बैठकर अपने ब्लॉउज के नीचे के 3 बटन खोले और अपनी दाहिनी चूची को बाहर निकाल लिया, दूध से भरी हुई उसकी मोटी मदमस्त गोरी सी चूची उसके हांथों में नही समा रही थी, उसने निप्पल को निशाने पर लगा कर चूची को हल्के से दबाया और दूध की एक पतली धार गड़ी हुई कील पर गिरा दी, दूध लगते ही पेड़ शांत हो गया, सनसनाती हुई हवाएं चलना बंद हो गयी, ये सब देखकर सब चकित रह गए। रजनी ने चूची को अंदर कर ब्लॉउज के बटन लगा लिए और उदयराज के साथ बैलगाड़ी के पास आके अपनी जगह पर बैठ गयी

काकी- सदियों से चली आ रही समस्या के सुधार आ आग़ाज आज मेरी बेटी और मेरे उदय ने कर ही डाला।

सुलोचला- हाँ बहन बिल्कुल, हम सबका आशीर्वाद इन दोनों के साथ है।

काकी- बिना आपके आशीर्वाद के ये संभव नही था बहन, हम आपके बहुत आभारी है।

सुलोचना- ये तो मेरा फ़र्ज़ है, मेरे द्वार सदा आपके लिए खुले हैं, अब हमें शीघ्र ही चलना चाहिए ताकि शाम तक कुटिया पर पहुँच जाएं फिर एक रात मेरी कुटिया पर रुककर कल सुबह तड़के ही निकल जाना

काकी- जैसी आपकी आज्ञा

उदयराज ने बैलगाडी की डोर संभाल ली और तेजी से चलाने लगा।
 
Update-27

उदयराज तेजी से बैलगाडी चलाये जा रहा था और सोचे जा रहा था कि जब वो गांव पहुँचेगा तो लोगों की भीड़ लग जायेगी, लोग पूछेंगे की क्या हुआ, क्या हल निकला, क्या उस दिव्य पुरुष से मिले या नही, सफर कैसा रहा? सफर आसान था या कठिन था, तो उनको मैं क्या बताऊंगा, बिरजू, परशुराम ये सब बड़ी उत्सुकता से इतंज़ार कर रहे होंगे। इसी तरह गांव की स्त्रियां रजनी और काकी से पूछेंगी, तो क्या हमें उन्हें सही सही बताना चाहिए, पूरे गांव में चर्चा करना ठीक नही होगा, चलो एक बार को उपाय तो मैं उनसे बता भी दूंगा पर कर्म का क्या करूँ, उसके बारे में तो मुझे अभी खुद भी नही पता। एक काम करता हूँ गांव वालों को खाली यही बोलूंगा की उपाय बताया है और एक हवन करने को बोला है कुल वृक्ष के नीचे बस, और काकी और रजनी को भी बस इतना ही बताने को बोल दूंगा।

उदयराज ऐसा सोचता हुआ बैलगाडी चलाये जा रहा था।

धीरे धीरे शाम हो गयी और वो सुलोचना की कुटिया पहुँच गए।

सबको बहुत भूख लगी थी क्योंकि रास्ते में वो रुके ही नही, जल्दी पहुचने के चक्कर में।

सब बैलगाडी से उतरे, उदयराज ने बैलगाडी पेड़ से बांध दी और बैलों को घास चरने के लिए लंबी रस्सी से बांध दिया।

पुर्वा सबको देखकर बहुत खुश हुई और सबके लिए तांबे के गिलास में पानी और गुड़ लेके आयी, सब खाट पर बैठ गए और सबने पानी पिया।

सुलोचना ने पुर्वा को जल्दी से खाना बनाने के लिए बोला तो रजनी भी जिद करके उसका हाँथ बटाने चली गयी

बाहर उदयराज, काकी और सुलोचना बैठे थे।

उदयराज- माता जी आपने इस मुश्किल काम में हमारा जो साथ दिया है, हमे जो रास्ता दिखाया और इतना ही नही सदैव हमारे साथ बनी रही उसका अहसान मैं कभी नही चुका पाऊंगा, आपकी वजह से आज हमारी और हमारे कुल की जान बची है, एक तरह से देखा जाए तो आप ही इसकी नींव हो, हम तो घर से बस चल दिये थे ये सोचकर कि आगे जो होगा जैसा होगा देखा जाएगा, आप न मिलती तो मेरा यह प्रण सफल नही होता, मैं अगर आपके किसी भी तरह काम आ पाऊंगा, किसी भी वक्त तो आप निसंकोच मुझसे कहियेगा, आपको मैंने माता माना है मुझसे जो भी बन पड़ेगा मैं आपकी सेवा में करूँगा।

सुलोचना- पुत्र जैसा कि मैंने पहले ही बताया पहली बात तो ये है कि ये तो मेरा फ़र्ज़ है, मैं अपने फ़र्ज़ से बंधी हुई हूँ दूसरा जब तुमने मुझे माँ माना है तो तुम मेरे पुत्र हुए और पुर्वा तुम्हारी बहन हो गयी, तो क्या मैं अपने पुत्र के लिए इतना नही कर सकती। केवल तुम ही मुझे पाकर नही बल्कि मैं और पुर्वा भी तुम सबको पाकर बहुत खुश है, हमने इससे पहले और भी बहुत लोगों की मदद की है पर न जाने क्यों तुम लोगों से एक अजीब सा लगाव हो गया है, पुर्वा को मैंने इतना खुश पहले कभी नही देखा, जितना वो तुम लोगों से मिलकर हुई है।

वो तो मुझसे कह भी रही थी कि अम्मा रजनी कितनी अच्छी लड़की है ऐसी लड़की मैंने आजतक नही देखी, मैं तो अब उसकी पक्की सहेली बन चुकी हूँ, तो मैंने कहा हाँ वो अब खाली तेरी पक्की सहेली नही अब तेरी भतीजी भी हो गयी है, तो वो चौंक कर बोली- क्या वो मेरी भतीजी और मैं उसकी बुआ।

मैं- हाँ, बिल्कुल

तो वो बोली- कैसे अम्मा

तो मैं बोली- उसके बाबू ने मुझे अपनी माँ माना है और मैंने उनको अपना पुत्र, तो हुई न तू रजनी की बुआ और उसके बाबू की बहन।

उसका चहरा मारे खुशी के खिल उठा जैसे उसकी एकांत जिंदगी में किसी ने एक जान फूंक दी हो वो चहकते हुए बोली- पर अम्मा मैं तो रजनी से उम्र में दो तीन साल छोटी हूँ, बुआ छोटी और भतीजी बड़ी, बड़ा मजा आएगा फिर तो और वो मेरी सहेली भी है।

सुलोचना- क्या है न पुत्र जब मैं यहां जंगल में आई तो वह काफी छोटी थी, इस घने भयानक जंगल में बस हम दो ही प्राणी है, मेरी तो उम्र कट गई लेकिन वो तो बच्ची है, कभी कभी बहुत अकेलापन महसूस करती है हालांकि मैं उसको तंत्र मंत्र की विद्या सिखा रही हूं तो वो उसमे व्यस्त रहती है परंतु फिर भी अकेलापन तो खलता ही है, हम माँ बेटी आपस में कितनी और कबतक बातें करेंगे, मैं महसूस करती हूं कि उसकी जिंदगी में बहुत अकेलापन और खालीपन है वो भी और बच्चों की तरह दोस्त बनाना चाहती है, लोगों के बीच में रहना चाहती है भरा पूरा परिवार चाहती है पर क्या करें नियति ने यही चाहा था शायद, मुझे अपनी चिंता नही बस उसकी चिंता होती है, मेरी वजह से उस बच्ची का जीवन नीरस होकर रह गया है, यही कारण है कि जब भी कोई फरियादी अपनी फरयाद लेके महात्मा जी के पास जाता है तो यहां रुकता है और हम उसकी मदद करते हैं उस वक्त मेरी बेटी पुर्वा बहुत प्रफ़ुल्लित रहती है पर फिर बाद में लोगों के चले जाने के बाद थोड़ा उदास हो जाती है। परंतु जब से तुम लोग आए हो वो तो बहुत ही खुश है खासकर रजनी से मिलकर और देख लेना तुम लोग जब जाने लगोगे तो रो देगी जरूर।

काकी की आंखें भर आयी ये सुनकर उसने सुलोचना को गले से लगा लिया और बोली- बहन तुमने तो अपने वचन के चलते इस फूल सी बच्ची को बचपन से जंगल की जिन्दगी दी है उसके साथ कितना अन्याय किया लेकिन तुम करती भी क्या? सबकुछ ईश्वर के हाँथ में है वो जो चाहते हैं वैसा ही होता है परंतु तुम्हारे मुँह से ये सब सुनकर अब पुर्वा बेटी की नीरस जिंदगी पर बहुत दुख हो रहा है।

सुलोचना ने आगे कहा- मुझे इससे ज्यादा चिंता इस बात की है कि मेरी काफी उम्र हो चली है मैं कब तक की मेहमान हूँ पता नही, तंत्र मंत्र के सहारे मैं जी रही हूं पर कब तक जिऊंगी, इस दुनियां में जो आया है उसको एक न एक दिन जाना ही है पर मेरे चले जाने के बाद इसका क्या होगा? कहाँ जाएगी? किसके पास रहेगी? कौन इसका होगा जो इसका ख्याल रखेगा? मैंने अपना वचन पालन करने के चक्कर में अनजाने में ही अपनी फूल सी बिटिया का जीवन बहुत कष्टमय कर दिया है, इस बात को सोच सोच कर मैं अपने को बहुत कोसती हूँ पर क्या करूँ, एक को पूरा करती तो दूसरा छूट जाता और ये बात मैंने आजतक किसी से कही भी नही है आज न जाने क्यों तुम लोगों से अपनापन जैसा प्यार मिला तो बोल रही हूं।

इतना कहकर सुलोचना के आंखों में आंसू आ गए लेकिन वो बहुत मजबूत नारी थी उसने तुरंत अपने को संभाल लिया।

उदयराज ने आगे बढ़कर सुलोचना को गले से लगा लिया और उसके आंसू पोछते हुआ बोला- माता ये आप कैसे सोच सकती हैं कि आप अकेली हैं या मेरी बहन पुर्वा अकेली है, उसका भी भरा पूरा परिवार है अब, जब आपने मुझे पुत्र माना है और मेरी इतनी मदद की है तो क्या मैं आपको और अपनी बहन को अकेला छोड़ दूंगा, नही ऐसा नही हो सकता, मेरी एक विनती है मैं आपको और अपनी बहन पुर्वा को अपने गांव विक्रमपुर लेकर जाना चाहता हूं, और आप मेरी बात टालेंगी नही, बोलिये माता, अब आप मेरे साथ ही चलिए।

सुलोचना- पुत्र मैं तुम्हारी इस इच्छा से बहुत कृतज्ञ हूँ पर मैं इस जंगल में रहकर जनमानस की सेवा करने के लिए प्रतिबद्ध हूँ नही तो मैं अपने पुत्र के साथ जरूर चलती, मेरी पति का संकल्प अधूरा रह जायेगा।

उदयराज- तो आप मेरी बहन पुर्वा को ही मेरे साथ भेजिए, वो वहां हमारे साथ रहेगी तो उसका जीवन बदल जायेगा, उसकी सारी जिम्मेदारी मेरी हुई अब।

काकी- हाँ बहन, उसे ही हमारे साथ भेज दो, रजनी और उसकी जोड़ी बहुत जमेगी, बुआ भतीजी की।

सुलोचना- पुत्र उसे भी मैं जरूर भेज देती पर अभी उसकी मंत्र विद्या अधूरी है, जो कि 2 महीने बाद पूरी हो जाएगी तो जब तुम महात्मा जी को वो कागज वापिस करने आओगे तो अपनी बहन को साथ लिवा जाना, क्योंकि मैंने प्रण किया था कि मैं अपनी पुत्री को तंत्र मंत्र सीखा कर निपुण बना दूंगी ताकि वह अपने जीवन में आने वाली परेशानियों को स्वयं हल कर सके, उसकी मंत्र विद्या पूरी होने वाली है बस दो अमावस्या उसको मंत्र और जगाना है और उसके लिए दो महीने लगेंगे।

सुलोचना ने आगे कहाँ- पुत्र तुमने तो मेरी सबसे गहरी चिंता को एक पल में दूर कर दिया और सुलोचना ने उदयराज को गले से लगा लिया।

उदयराज ने सुलोचना से कहा- माता जरा मेरी बहन को इस बात से अवगत तो करा दो।

सुलोचना जैसे ही पुर्वा को घर के अंदर से बुलाने को हुई काकी ने रोकते हुए कहा- रुको बहन मैं बुलाती हूं

काकी- रजनी ओ रजनी!

रजनी- हां काकी, आयी

और रजनी भागती हुई बाहर आई

रजनी- हाँ काकी क्या हुआ?

काकी- अरे अपनी बुआ को लेके नही आई।

रजनी- कौन बुआ?

काकी- अरे पुर्वा, वो तेरी बुआ बन गयी है, तुझे नही पता।

रजनी चौकते हुए- क्या! मुझे तो नही पता, कैसे, वो तो मेरी सहेली है पर वो मेरी बुआ भी है अरे वाह! ये हुई न बात। पर कैसे?

काकी- तेरे बाबू ने बहन को माँ माना है तो वो हुई न तेरी बुआ।

रजनी- अरे हां, सो तो है, बुआ ओ बुआ जरा बाहर आओ (रजनी ऐसे बोलते हुए कुटिया में चली गयी और कुछ देर बाद दोनों ही मस्ती करती हुई बाहर आई)

सुलोचना- देखो, दो तीन दिन में ही कितना प्यार है दोनों में। पुर्वा अब तू खुश है न अपनी भतीजी और भैया को पा के।

पुर्वा- हाँ अम्मा, बहुत खुश!

उदयराज ने पुर्वा को देखा और पूछा- खुश तो मैं भी हूँ तुम्हे पाकर मेरी बहन, क्या तुम मेरे साथ हमारे गांव चलना चाहोगी?

पुर्वा और रजनी आश्चर्य से एक दूसरे को देखने लगी

रजनी- बाबू क्या पुर्वा हमारे साथ चल रही है? (रजनी ने चौकते हुए कहा)

उदयराज- अब ये तो पूर्वा के ऊपर है, उसका क्या मन है

पूर्वा- मन तो मेरा भी है भैया पर मैं अम्मा को अकेला छोड़ कर नही जा सकती, और मेरी मंत्र विद्या भी अभी अधूरी है।

उदयराज- हां मेरी बहन हमारी बात हो गयी है, माता जी ने बोला है कि दो महीने बाद मैं तुम्हे लेने आऊंगा, तुम कुछ दिन वहां रहना फिर कुछ दिन यहां रहना, ऐसे करके जब जहां तुम्हारा दिल करे रहना।

पुर्वा सुनकर बहुत खुश हो गयी और सुलोचना के गले लग गयी सुलोचना ने हाथ बढ़ा कर रजनी को भी गले से लगा लिया

काकी और उदयराज भी काफी खुश थे, फिर हंसी खुसी रजनी और पुर्वा कुटिया में चले गए खाना बनाने।
 
Update- 28

रजनी और पूर्वा ने मिलकर फटाफट खाना बनाया और सबने जल्द ही खाना खा लिया, अंधेरा हो गया था, मशालें जल चुकी थी।

दिन में काफी थके होने की वजह से सब सोने की तैयारी करने लगे, काकी ने बच्ची को ले रखा था, रजनी और पुर्वा मिलकर सबका बिस्तर लगा रही थी, आज काफी गर्मी थी तो कुटिया के अंदर किसी का सोने का मन नही था, सबका यही विचार था कि बाहर ही बिस्तर डाल कर यहीं सब सोते हैं।

रजनी और पुर्वा खाट बिछा बिछा के सबका बिस्तर लगा रही थी कुटिया के दरवाजे पर एक मशाल जल रही थी जिससे माध्यम रोशनी फैली हुई थी।

रजनी बिस्तर लगाते लगाते बार बार उदयराज को देखे जा रही थी और उदयराज की नजरें भी रजनी पर टिकी हुई थी तभी कुछ ऐसा हुआ जिसकी कल्पना रजनी ने नही की थी

उदयराज ने नज़र बचा कर अपनी तर्जनी उंगली अपने होठ पर रखते हुए रजनी से होंठों पर एक kiss मांगी।

रजनी को बिल्कुल भी अंदाजा नही था कि उसके बाबू आज जिंदगी में पहली बार इस तरह kiss मांगेंगे, उनका इस तरह नज़रें बचा कर अपनी शादीशुदा बेटी से kiss मांगना रजनी को रोमांचित कर गया, वो सर झुका के मुस्कुरा उठी।

उदयराज अपने गाल पर हाथ रखकर बैठा था और काकी से बातें कर रहा था, हाथ कुछ इस तरह रखा था कि चुपके चुपके नज़र बचा के kiss मांग सके, जब जब रजनी उसकी तरफ देखती उदयराज बड़ी ही मिन्नत करते हुए इशारे से अपनी उंगली को होंठों पे रखते हुए kiss मांगता।

रजनी ने पुर्वा से नज़र बचा के अपने बाबू को हाथ से पिट्टी लगेगी (पिटाई) का इशारा करते हुए शर्मा गयी। कुछ देर बाद फिर सिर उठा के देखा तो उदयराज ने फिर बड़े ही रोमांटिक अंदाज में kiss मांगा। रजनी के होंठ अपने बाबू के होंठ से मिलने के लिए तरसने लगे, उसने आखों से इशारा किया कि यहां तो सब हैं कैसा होगा?

उदयराज भी इस बात से उदास हो गया कि चांस नही मिलेगा, आज सो भी तो बाहर रहे हैं सब, उस दिन की तरह कुटिया में सोए होते तो मजा आ जाता, पर आज गर्मी थी काफी, अंदर सोना काफी मुश्किल भरा हो सकता था।

तभी बच्ची रोने लगी, शायद गर्मी से थोड़ा परेशान हो गयी थी काकी उठकर उसको घुमाने लगी और घुमाते घुमाते वो थोड़ा दूर बैलगाडी की तरफ चली गयी।

उदयराज को तभी पेशाब लगी और वो कुटिया के पीछे जाने लगा, उसने सोचा कि चांस तो मिलेगा नही आज, छोड़ो।

कुटिया के पीछे temporary बाथरूम बनाया हुआ था जिसमे सुलोचना और पुर्वा नहाते थे उसमे पानी से भरी हुई तांबे की गगरी और एक लोटा रखा हुआ रहता था।

रजनी ने उदयराज को कुटिया के पीछे जाते हुए देख लिया कुटिया के पीछे ओझल होने से पहले उदयराज ने रजनी को एक बार पलट के देखा तो रजनी मुस्कुरा दी। उदयराज कुटिया के पीछे अंधेरे में चला गया।

रजनी और पुर्वा ने बिस्तर लगाने का काम पूरा किया और पुर्वा बोली- रजनी तुम बिस्तर पर लेटो मैं अम्मा को पैर में मालिश करके आती हूँ और जैसे ही पुर्वा कुटिया में गयी। रजनी तुरंत कुटिया के पीछे आ गयी

उदयराज थोड़ी दूर पर पेशाब करके लौटकर बाथरूम में हाथ धो रहा था उसे पता नही था कि रजनी चुपचाप आके उसके पीछे खड़ी हो गयी है जैसे ही वो उठा और मुड़ा, रजनी को देखकर उसका मन मयूर झूम उठा, वहां अंधेरा तो था पर पास की चीजें समझने लायक दिख रही थी

रजनी चुप खड़ी अपने बाबू को देख रही थी और उदयराज भी उसकी आँखों में देखने लगा

धीरे से बोला- मुझे लगा था तुम जरूर आओगी, और लपककर अपनी बेटी को बाहों में कसकर भर लेता है। रजनी भी अपने बाबू की बाहों में समा जाती है, दोनों एक दूसरे के पूरे बदन को इस तरह सहलाने और भींचने दबाने लगते हैं जैसे बरसों से मिले नही हैं,

उदयराज के दोनों हाथ रजनी के पीठ, कमर और भारी नितंबों पर मचल मचल कर चलने लगे, सहलाते सहलाते वह कस कस के पीठ कमर और गांड को दबा देता तो रजनी की aaaaaahhhhhh निकल जाती, सिसकियां गूंजने लगी अब रजनी की।

वो धीरे से उदयराज के कान में बोली- बाबू अब मुझसे बर्दास्त नही होता, आपको क्या लगता है मैं निर्दयी हूँ आपको तड़पाती हूँ, नही मेरे बाबू, मैं आपके बिना खुद नही रह सकती और कस के उदयराज से अमरबेल की तरह लिपट गयी।

उदयराज- oooohhhhh मेरी प्यारी बिटिया, मैंने ऐसा कब सोचा, तू तो मेरी जान है, मैं भी तो तेरे बिना नही रह सकता अब, बहुत प्यास लगी है।

रजनी- घर चलके सारी प्यास खूब बुझा लेना अभी थोड़ा सब्र मेरे बाबू।

उदयराज रजनी की आंखों में देखने लगा, रजनी की मोटी उन्नत चूचीयाँ उदयराज के चौड़े सीने में पिस गयी थी, जो कि उदयराज को जन्नत का अहसास करा रही थी, उसके निप्पल कड़क होकर उदयराज के सीने में चुभ रहे थे।

रजनी की आंखों में देखते हुए उदयराज ने अपने होंठ उसके बाएं गाल पर रखकर एक चुम्बन जड़ दिया, रजनी की सिसकी निकल गयी उसने वासना में आंखें बंद कर ली।

उदयराज गाल पर कुछ देर अपने गीले होंठ रखे रहा फिर धीरे से अपने होंठ रगड़ता हुआ रजनी के होंठ के किनारे पर लाया (जहां पर होंठ खत्म होते हैं) वहां बने हल्के से गढ्ढे में अपनी जीभ निकाल कर डाल दी और फिर जीभ की नोक को लिपिस्टिक की तरह रजनी के होंठ के बाएं किनारे से लेकर दाएं किनारे तक धीरे धीरे रगड़ता हुआ लाया, ऐसा उसने 3 4 बार इधर से उधर किया, रजनी असीम आनंद में पहुँच गयी, जीवन में पहली बार उसके बाबू उसके नरम मुलायम लालिमा से भरे होंठ छू रहे थे वो भी इस तरह, वो सिरह उठी और बुरी तरह अपने बाबू से लिपटने के बाद अपने होंठ खोल दिये, उदयराज ने लप्प से अपनी सगी शादीशुदा बेटी की जीभ अपने मुँह में भर ली और बेताहाशा चूसने लगा, रजनी की सांसें धौकनी की तरह चलने लगी, उसकी उखड़ती सांसे उदयराज को और वासना से भर दे रही थी, आज पहली बार सगे बाप बेटी के होंठ एक दूसरे से इस कदर मिल रहे थे।

तभी अचानक एक जुगनू उदयराज के सर पे आके बैठ गया और उसकी हल्की सी टिमटिमाती रोशनी रजनी की अधखुली वासनामय आंखों में पड़ी और उसे होश आया कि कोई आ सकता है इस तरफ, जगमग जगमग टिमटिमाता हुआ जूगनु उदयराज के सर से उतरकर कंधे की तरफ जा ही रहा था कि लड़खड़ा कर रजनी की चूचीयों पर गिर पड़ा और उदयराज के चौड़े मर्दाना सीने व रजनी की मदमस्त मोटी-मोटी गोरी चूचीयों के बीच आ गया, उसकी मदमस्त टिमटिमाती रोशनी दोनों के बीच गजब का उजाला कर रही थी कि तभी उदयराज की भी नज़र उसपर पड़ी और जैसे ही उसने रजनी के होंठ छोड़े जूगनु मोटी मोटी चूची की घाटी में गिर पड़ा और अंदर चला गया, रजनी ने अपने अंगूठे से ब्लॉउज के सबसे ऊपरी बटन को पकड़ कर ब्लॉउज को आगे की तरफ ताना, तो उदयराज की नज़र मोटी मोटी चूचीयों पर पड़ी, नीचे से पड़ रही जूगनु कि रोशनी ने रजनी की पूरी भारी भारी मोटी चुचियों की गोलाई के दर्शन उदयराज को करा दिए, यहां तक कि उदयराज को रजनी के फूले हुए दोनों कड़क गुलाबी निप्पल भी बखूबी दिख गए, इतना सुंदर और वासनात्मक दृश्य देखकर उदयराज पागल हो गया और झुककर बदहवासी से चूचीयों को ताबड़तोड़ चूमने लगा, कभी बीच की घाटी को चूमता तो कभी ब्लॉउज के ऊपर से ही पूरी चूची को, रजनी aaaaaaaahhhhh, hhhhhhhaaaaaiii bbbaaabbbuuuu करने लगी, जूगनु अंदर फड़फड़ा रहा था, एकाएक उदयराज ने रजनी को पलट दिया और उसकी दोनों वासना से सख्त हो चुकी मोटी मोटी चूची को अपनी हथेली में भरकर बहुत सख्ती से भर भरके दबाने लगा, रजनी एक बार फिर बदहवास हो गयी, aaaaaaaaahhhhhhh mmmeeerrreee bbaabbbuu bbaasssss kkaaro कहते हुए उसने भी अपनी बाहें पीछे कर अपने बाबू के गले में लपेट दी और अपने बाबू के ऊपर ही झूल सी गयी, वासना पूरे बदन में इस कदर रेंग रही थी कि दोनों से ही अब खड़ा होना मुश्किल हो गया था, जहां रजनी की मखमली बूर अब रिसने लगी थी वहीं उदयराज का विशाल लन्ड भी लोहे की तरह शख्त हो गया था। उदयराज ने रजनी के दोनों निप्पल पकड़े और मसलने लगा, रजनी ने वासनामय स्वर में धीरे से बोला- बाबू बस करो नही तो वो जूगनु मर जायेगा अंदर ही, और बहुत देर हो गयी अब जाने दो न कोई आ जायेगा इधर।

उदयराज ने एक बार फिर रजनी को होंठों को अपने होंठो में भर लिया और चूसने लगा रजनी की आंखें फिर बंद हो गयी पर कुछ पल बाद वो बड़ी मुश्किल से बोली- बाबू बस करो नही तो यहीं सब हो जाएगा और सब जान जाएंगे, अब सब्र करो, जल्दी से जल्दी घर चलो फिर जी भरके सब कर लेना।

उदयराज ने बड़ी मुश्किल से रजनी को छोड़ा और वो अपनी उखड़ी सांसों को संभालती और भागती हुई कुटिया के दायीं तरफ से आगे की तरह आ गयी।

काकी बच्ची को लेके खाट पे लेटी थी, रजनी को आता देख बोली- अरे रजनी बिटिया कहाँ गयी थी।

रजनी- काकी वो स्नानघर में जो गगरी रखी है न वो खाली हो गयी थी तो मैंने सोचा उसमे पानी भर दूँ, रात में किसी को जरूरत पड़ जाएगी तो?

काकी- हाँ ठीक है, अच्छा किया, ले गुड़िया को दूध पिला दे कब से रो रही है, कितनी देर घुमाती रही मैं इसको, नही तो रो रही थी, भूखी है शायद।

रजनी- हाँ काकी दो।

और रजनी उसको लेकर खाट पे लेट गयी, दूध पिलाने के लिए जैसे ही उसने अपनी साड़ी का पल्लू हटाया, ब्लॉउज के अंदर जूगनु टिमटिमाते हुए रोशनी करने लगा। काकी देखते ही बोली- अरे रजनी ये अंदर कैसे घुस गया?

रजनी हंसते हुए- पता नही काकी, मुझे पता ही नही चला ये कब अंदर चला गया। सब बदमाश हो गए हैं आजकल

और जैसे ही रजनी ने ब्लॉउज के नीचे के तीन बटन खोलकर चूची को बाहर निकाला, मौका पाते ही जुगनू आजाद होकर जगमगाता हुआ ऊपर उड़ गया और उसे देखकर रजनी मुस्कुराती रही।

उदयराज पहले थोड़ी देर वहां खड़ा रहा फिर वो भी कुटिया की बायीं तरफ से धीरे धीरे आ गया और आकर अपनी खाट पर लेट गया, सबकी खाट थोड़ी थोड़ी दूर पर आसपास ही थी, उदयराज सबसे किनारे लेटा था, उसके बाद काकी की खाट थी फिर रजनी और पुर्वा की और दुसरी तरफ सबसे किनारे सुलोचना की।

पूर्वा और सुलोचना भी आ गए और फिर कुछ देर सब बातें करते रहे फिर सो गए।
 
Update-29

सुबह उदयराज की आंख सबसे बाद में खुली, उसने देखा कि सब उठ चुके हैं और तैयारियों में जुटे हैं, वह भी उठ गया फटाफट चलने की तैयारियां करने लगा, नहा धो कर रजनी ने आज गुलाबी साड़ी और मैचिंग ब्लाउज पहना था वहीं पुर्वा ने नीला सूट सलवार पहना हुआ था, रजनी तो कयामत लग ही रही थी पर पुर्वा भी किसी से कम नही थी हालांकि वो रजनी से थोड़ा कम गोरी थी पर उसके तीखे नैन नक्श और भरा पूरा यौवन अनायास ही किसी का भी मन अपनी तरफ खींच लेते थे।

उदयराज कभी साइड से तो कभी सामने से दिख रहे रजनी के उन्नत भारी दुधारू उरोज जिसको वो रात को चूस नही पाया था घूरे जा रहा था, रजनी भी अपने बाबू की नजरें भांप कर शर्मा जा रही थी

तैयार होने के बाद सबने नाश्ता किया और फिर चलने की बारी आई तो सुलोचना ने कहा- पुत्र ये ताबीज़ जो मैंने बना कर दिए हैं, तुम लोग हमेशा अपने पास रखना, और हर दीपावली पे अमावस्या की रात इसको पुनः मन्त्र से सुसज्जित कर इसकी शक्ति बरकरार रखनी है।

उदयराज- पर माता हर दीपावली की रात इसको करेगा कौन? हमे तो ये सब आता नहीं।

सुलोचना- अरे तुम्हे किसने कहा करने को पुत्र, तुम्हारी बहन पुर्वा ये सब किसलिए सीख रही है, मैं उसे हर तंत्र मंत्र विद्या में माहिर बना दूंगी, और वो सदैव अपने परिवार और विक्रमपुर की रक्षा में ढाल बनकर खड़ी रहेगी।

पूर्वा ने बगल में खड़ी रजनी का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा- क्यों नही, अभी तो मैं सीख रही हूं, सीखने के बाद देखना, मजाल क्या की मैं अपनी भतीजी और भैया तथा पूरे परिवार पर किसी भी तरह की कोई आंच आने दूंगी।

रजनी - मेरी प्यारी बुआ (और उसका हाथ चूम लिया)

उदयराज ने प्यार से पुर्वा के सर पे हाथ फेरा और माथे को चूमते हुए बोला- मेरी प्यारी बहन, अब तो मेरे पास मेरी बेटी और बहन दोनों हो गयी, कितना भाग्यशाली हूँ मैं, मेरी कलाई पर अभी तक राखी के दिन रजनी ही राखी बांध देती थी ताकि कलाई सूनी न रहे पर अब तो साक्षात बहन ही मिल गयी, कितनी खुशियां दे रहा है ईश्वर मुझे, (ऐसा कहते हुए उदयराज ने रजनी की तरफ देखा तो रजनी नज़रें झुकाकर शर्मा गयी)।

पुर्वा- मैं भी आज बहुत खुश हूं अपने भैया को पाकर, कम से कम मेरा एक भाई तो है जिसको मैं राखी बाँधूँगी।

सुलोचना- हाँ बिल्कुल, क्यों नही। अच्छा! राखी के दिन रजनी बिटिया अपने बाबू की बहन बन जाती थी? (सुलोचना ने आश्चर्य से पूछा)

रजनी- हाँ अम्मा, मैं ही बहन बनकर राखी के दिन बाबू को राखी बांध देती थी, काम चलाऊं बहन हूँ मैं अपने बाबू की (और रजनी खिलखिलाकर हँस देती है), पर लगता है अब ये पद मुझसे छिन जाएगा (रजनी ने मजाक में कहा)

उदयराज भी हसने लगता है- हाँ ये तो मेरी सब कुछ है, बिटिया तो मेरी ये है ही, राखी के दिन बहन भी बन जाती है, बस अब माँ बनना बाकी है

और सब जोर से हंसने लगते हैं।

रजनी- जरूरत पड़ी तो वो भी बन जाउंगी।

सुलोचना - जरूर बन जाना, जो स्त्री पूरा घर संभालती हो वो एक तरह से सब होती है।

पुर्वा- रजनी, मेरी सखी, मेरी भतीजी क्या तुम इस बात से उदास हो गयी कि मैंने तुमसे राखी बांधने का हक़ छीन लिया, मेरे साथ साथ तुम भी पहले की तरह राखी बांधते रहना।

रजनी- अरे नही बुआ मैं तो मजाक कर रही थी, राखी तो मैं अपने बाबू को बाँधूँगी ही, प्यारा प्यारा उपहार जो लेना है (रजनी ने फिर मजाक में कहा और हंसने लगी उसके साथ साथ सब हसने लगे)

उदयराज- क्यों नही, मेरी बिटिया रानी जो तेरा मन करे वो कर।

फिर सुलोचना और पुर्वा ने रजनी की बेटी को गोदी में लेकर काफी प्यार किया और अब सबने निकलने की तैयारी की, उदयराज ने बैलगाडी तैयार की, सबने सुलोचना और पुर्वा से विदाई ली, पुर्वा और रजनी थोड़ा भावुक हो गयी।

रजनी, काकी ने सारा सामान बैलगाडी में रख लिया और बैलगाडी में बैठ गयी फिर उदयराज बैलगाडी लेकर अपने गांव की तरफ चल दिया।

सुबह के आठ बजे रहे थे और 4 बजे से पहले वो गांव पहुचना चाहता था इसलिए अब बिना कहीं रुके उसे बैलगाडी चलाना था, समय बीतता गया, काकी और रजनी एक दूसरे से बातें कर रही थी, एकाएक उदयराज को याद आया कि उसने वो बात तो काकी और रजनी को समझायी ही नही की गांव पहुचने पर क्या करना है। उसने तुरंत बैलगाडी पेड़ की छांव में रोकी तो काकी बोली- क्या हुआ उदय?

उदयराज- काकी मैं एक बात बताना भूल गया।

काकी और रजनी- क्या भूल गए।

उदयराज- अच्छा ये बताओ गांव पहुचकर क्या हमें सारी की सारी बातें जस की तस सबको बतानी चाहिए, कि महात्मा ने ये उपाय बताए हैं और ये कर्म बताया है, जबकि कर्म तो हमे अभी खुद भी नही पता, क्यों काकी? क्या हमें बताने चाहिए?

काकी- हां बात तो सही है, ये सब हमे ही करना है तो हम ही चुपचाप करेंगे, सबको क्यों बताना?

रजनी- पर सब पूछेंगे तो, और आखिर पूछेंगे ही, सबको पता है कि हम किस यात्रा पर निकले हैं?

उदयराज- मैंने सोचा है कि हम गांव वालों को ये बोल देंगे कि एक यज्ञ करना है बस, और दिखावे के लिए सबके सामने एक यज्ञ कर देंगे और वो भी दो महीने बाद जब पुर्वा आ जायेगी तब।

काकी- हां ये ठीक है, गांव वालों को बोल देंगे कि महात्मा ने बोला है उनके यहां से कोई शिष्या आके यहां यज्ञ कराएगी और फिर सब ठीक हो जाएगा वैसे उन्होंने अपनी मंत्र की शक्ति से काफी कुछ ठीक कर दिया है। बस एक यज्ञ करना बाकी है वो दो महीने बाद ही हो पायेगा।

रजनी- पर जब गांव वाले पूछेंगे की इसका कारण क्या था तो क्या बतायेंगे?

उदयराज- वो तो हम सच सच जो भी था बता देंगे।

काकी- हां ये ठीक है

उदयराज- तो फिर तुम लोग भी गांव की स्त्रियों को पूछने पर यही बताना।

रजनी और काकी- हाँ, ठीक है।

फिर उदयराज बैलगाडी चलाने लगा।

करीब 2 बजे के आस पास वो लोग अपने गांव की सरहद पर पहुँचे, सरहद के बाहर ही उदयराज ने बैलगाडी रोक दी।

रजनी ने अपने बाबू को लोटे में पानी पीने को दिया, उदयराज ने पानी पीने के बाद लोटा रजनी को देते हुए कहा- आखिर मेरी बेटी को मेरी प्यास का ध्यान रहता है।

रजनी- रहेगा क्यों नही भला, ये भी कोई कहने की बात है। बेटी हूँ आपकी।

उदयराज- चलो अब यहां पर भी एक कील गाड़ ही देते हैं, उदयराज ने एक कील निकली और सरहद पर बने कुछ दूर एक छोटे से मंदिर के पीछे जाकर गाड़ दी, फिर रजनी बैलगाड़ी से उतरी और उदयराज की तरफ देखकर मुस्कुराती हुए मंदिर तक गयी, उदयराज बैलगाडी के पास आकर खड़ा हो गया, वो उनके गांव की सरहद थी तो वहां किसी भी तरह का कोई डर नही था।

रजनी मंदिर के पीछे गयी जहां कील गाड़ी हुई थी, कील के पास बैठकर उसने अपना ब्लॉउज खोलना शुरू कर दिया, नीचे के तीन बटन खोले, इस बार रजनी ने अपनी दोनों ही दुधारू मोटी मोटी चुचियाँ बाहर निकाल ली और दोनों हथेली में ले ली, धूप सीधी चूचीयों पर पड़ रही थी, रजनी ने एक साथ दोनों चूचीयों को पकड़ा और दोनों ही निप्पल को एक साथ कील पर निशाना लगा के दबा दिया, दूध की दो धार चिरर्रर्रर्रर्रर की आवाज करती हुई कील पर पड़ी, रजनी अपनी ही चूचीयों कि चमक देखके मदमस्त हो गयी, फिर जल्दी से चूचीयों को ब्लॉउज के अंदर डाल दिया और बटन बंद करते हुए बैलगाडी तक आ गयी।

काकी बैलगाडी में छपरी में बैठी थी और उदयराज बाहर खड़ा अपनी बेटी को देख रहा था, रजनी ने अपने बाबू को अपनी तरफ देखते हुए देखकर मुस्कुरा पड़ी और छपरी में काकी के पास जा के बैठ गयी।

उदयराज बैलगाडी चलाने लगा, बैलगाडी अब गांव की सरहद के अंदर प्रवेश कर चुकी थी, कुछ किलोमीटर चलने के बाद उन्हें कुछ लोग आते जाते दिखने लगे। उदयराज को देखकर ही वो जोर जोर से चिल्लाने लगे- उदयराज भैया की जय हो, हमारे मुखिया की जय हो, वो गांव के छोर पर रहने वाले किसान थे, पर जब तक उदयराज गांव के काफी अंदर अपने घर पहुचता पूरे गांव में हल्ला हो गया कि मुखिया जी आ गए।

उदयराज ने सबका प्रणाम स्वीकार किया और बैलगाडी घर की तरफ आगे बढ़ा दी। रजनी और काकी तो बहुत ही प्रसन्न थे। वहां की औरतों ने काकी के पैर छूने शुरू कर दिए, काकी ने सबको बड़ी मुश्किल से समझाया, और सबको आर्शीवाद दिया।

करीब 1 घंटे और चलने के बाद वह अपने घर पहुचा तो देखा कि उसके घर के बाहर गांव वालों की काफी भीड़ पहले से मौजूद थी, और बैलगाडी के पीछे पीछे भी कई लोग आ चुके थे। सबको यही जानना था कि आखिर क्या हुआ? सब दुआ और प्रार्थना करे जा रहे थे कि शुक्र है सब सही सलामत वापिस आ गए।
 
Update- 30

उदयराज ने बैलगाडी अपने घर के बाहर कुएं के पास रोकी, काकी और रजनी बैलगाडी से उतरी, उदयराज, काकी और रजनी कुएँ के पास खड़े हो गए , गांव की सबसे उम्र दराज महिला ने लोटे में जल लेकर एक साथ तीनो के सर के किनारे किनारे सात बार गोल गोल घुमाते हुए आरती उतारी और फिर उस जल को नीम के पेड़ पर अर्पित कर दिया।

बिरजू और परशुराम ने बैठने के लिए पहले से ही खाट बिछा रखी थी, उदयराज सबसे मिला और खाट पर बैठ गया, रजनी और काकी भी बगल वाली खाट पर बैठ गए।

गांव वालों का वहाँ जमावड़ा लग गया था, तभी नीलम भीड़ में से निकलकर आयी और खुशी से रजनी और काकी के गले लग के मिली। उसने उदयराज को भी प्रणाम किया।

नीलम- कैसी है मेरी बहन? काकी आप कैसी हो?

काकी- मैं ठीक हूँ मेरी बच्ची।

रजनी- मैं भी ठीक हूँ, मेरी सखी, तू बता कैसी है।

नीलम- मैं तो बिल्कुल ठीक हूँ।

बिरजू- नीलम बिटिया हाल चाल बाद में पूछते रहना पहले जा अपनी सहेली, काकी और मेरे परम मित्र मुखिया जी के लिए पानी ले के आ।

नीलम दौड़ी दौड़ी घर में गयी और सबके लिए अपने हाथ से बनाई मिठाई और पानी लेके आयी।

नीलम ने सबको पानी दिया- सबने नीलम के हाथ की बनी मिठाई खाई और उदयराज ने तो खूब तारीफ कर डाली, रजनी और काकी ने भी नीलम की तारीफ करते हुए मिठाई खाई और पानी पिया।

गांव की सभी स्त्रियां और पुरुष आस पास जमावड़ा लगाए खड़े थे, सामने बिरजू और परशुराम बैठे थे।

उदयराज और रजनी को तो जल्दी से जल्दी महात्मा द्वारा दिये गए कागज खोलकर देखने की पड़ी थी, और गांव वाले घेरकर बैठे थे।

तभी बिरजू उदयराज से बोला- भैया अब बताओ, क्या हुआ? कैसा रहा? क्या वो दिव्य पुरुष मिले? हमारी समस्या का हल मिला?

उदयराज और काकी ने उपाय और कर्म वाली बात छोड़कर बाकी की सारी बातें गांव वालों को बता डाली। इसके हल के लिए उन्होंने यही बोला कि एक यज्ञ कराना पड़ेगा और वो भी एक शिष्या दो महीने बाद आ के कराएगी। ये सब सुनकर गांव वाले हैरान रह गए और कुछ लोगों ने तो अपने उस पूर्वज को ही भला बुरा कहना शुरू कर दिया।

काकी ने उनको समझाया कि जो हुआ सो हुआ पर अब उन्हें भला बुरा कहने से क्या फायदा।

बिरजू उदयराज से- भैया आपको यह कुल भगवान की तरह पूजेगा आपने जो यह अत्यंत कठिन यात्रा परिवार सहित करके अपने कुल की जीवन की रक्षा की है, ऐसा तो आजतक कोई मुखिया न कर पाया, आप ही हमारे मुखिया है और सदा रहेंगे, आज पूरा गांव आपको नतमस्तक कर रहा है, सब युगों युगों तक आपके आभारी रहेंगे।

उदयराज ने बिरजू को गले से लगा लिया और बोला - अरे पगले, तुम सब मेरा परिवार हो, मैं अपने परिवार के लिए नही करूँगा तो और कौन करेगा, ये तो मेरा फ़र्ज़ है, और तुम सबने तो मुझे पहले ही गांव का मुखिया बना कर इतना प्यार और सम्मान दिया है, बल्कि देख मेरा तो सारा काम भी तू ही संभालता है तो क्या मेरा ये फ़र्ज़ नही था कि मैं मुखिया होने के नाते ये सब करूँ, सबकी आंखें नम हो गयी।

उदयराज- वो तो हमारी किस्मत अच्छी थी जो भयानक जंगल में हमे एक माता जी मिली जिनके बारे में मैं बता चुका हूं, वो न होती तो ये असंभव था, हम उस जंगल को पार ही नही कर पाते। पूजा करनी है तो उस देवी की करो और अब वो हमारी माता हैं। मैं उन्हें यहां एक बार सबसे मिलाने जरूर लाऊंगा।

उदयराज ने ये बात नही बताई की उस कागज को वापिस देने जाना है, उसकी जगह पर उसने ये बोला कि मैं सुलोचना को यहां एक बार जरूर लाऊंगा और उनको लेने के लिए जाना पड़ेगा।

बिरजू और परशुराम- हां भैया जरूर, हम भी उस महान देवी से मिलना चाहते हैं, पूरा गांव उनको देखना चाहता है।

उदयराज- हां जरूर दो महीने बाद मैं जाऊंगा उनको और शिष्या को लेने फिर वही लोग यज्ञ कराएंगे।

अब जाके गांव वालों को तसल्ली हुई।

तभी बिरजू और परशुराम गांव वालों से बोले- अच्छा तो हमारे भाइयों अब आप लोग कृपया अपने अपने घर को जाएं बाकी की बातचीत हम बाद में करेंगे, आप लोग समझ सकते हैं हमारे मुखिया और उनका परिवार यात्रा करके काफी थक चुका है तो अब उन्हें आराम करने दें।

सभी उदयराज को प्रणाम कर अपने अपने घर को जाने लगे और घर जाके सबने खुशी के दिये जलाए मानो दीपावली हो आज, पूरा गांव शाम को ही जगमगा उठा। अंधेरा होना शुरू हो गया था।

नीलम और उसकी माँ- आप सब लोगों का खाना आज हमारे घर ही बनेगा, तो आप लोग खाना बनाने के लिए परेशान मत होना, हमारे घर ही खाना है आज।

उदयराज, काकी और रजनी ने मना किया पर नीलम नही मानी और सबका खाना बनाने चली गयी। काकी भी कुछ देर अपने घर का हाल चाल लेने चली गयी।

नीलम की माँ ने रजनी की बिटिया को गोदी में ले कर अपने घर की तरफ घुमाने ले गयी और अब घर में यहां पर बच गए रजनी और उदयराज।

रजनी उठकर घर का ताला खोलने जाने लगी जैसे ही रजनी घर के दरवाजे तक पहुँची उदयराज बोला- रजनी बिटिया रुको पहले मैं दरवाजे की डेहरी पर तीसरी कील गाड़ दूँ।

रजनी- हां बाबू ठीक है।

उदयराज ने तीसरी कील निकाली और एक पत्थर से ठोक कर मुख्य दरवाजे की डेहरी के बीचों बीच कील गाड़ दी।

रजनी ने दरवाजा खोला और अंदर चली गयी घर में अभी कोई दिया या लालटेन नही जल रहा था तो काफी अंधेरा था क्योंकि बाहर भी हल्का अंधेरा हो चुका था तो घर में और अंधेरा था। अभी रजनी घर के अंदर दाखिल हुई ही थी कि उदयराज ने जल्दी से कदम बढ़ा के उसको पीछे से बाहों में कस लिया।

रजनी की aaaaaaaaaahhhhh निकल गयी। उदयराज रजनी की गर्दन, गाल कान के आस पास ताबड़तोड़ चूमने लगा और अपनी बिटिया के गुदाज बदन को मसलने लगा, रजनी ने भी एकांत का फायदा उठाते हुए अपनी बाहें पीछे ले जाकर अपने बाबू के गले में लपेट दी, और अपने गाल आगे बढ़ा बढ़ा के अपने बाबू को चुम्मा देने लगी, उदयराज ने कुछ ही पलों में रजनी का पूरा मुँह चूम चूम के गीला कर दिया, रजनी सिसक उठी और बड़ी मादकता से बोली- बाबू थोड़ा सब्र।

उदयराज पीछे से उसकी चूचीयाँ हथेली में भरकर दबाने लगा और धीरे से बोला- और कितना सब्र मेरी बेटी, अब तो घर आ गए न, कब से तड़प रहा हूँ तेरे लिए। उदयराज कुछ देर तक पीछे से रजनी की चूचीयों को ब्लॉउज के ऊपर से मर्दन करता रहा, कभी पूरा हथेली में भर भर के दबाता तो कभी निप्पल को मसलता, पूरी चूची तनकर सख्त हो गयी थी

रजनी तो हाय... हाय करती हुई बेहाल होने लगी, एकएक उदयराज ने अपने बेटी को अपनी तरफ गुमाया और उसके नर्म बेताब होंठों पर अपने होंठ रख दिये, रजनी की आंखें बंद हो गयी, दोनों एक दूसरे के होंठों को खा जाने की स्थिति तक चूसने लगे, कभी उदयराज रजनी के निचले होंठों को अपने मुँह में भरकर चूसता तो कभी रजनी अपने पिता के होंठों को मुँह में भरकर चूसती, उदयराज के हाँथ रजनी की पीठ, कमर और गांड पर रेंगने लगे, तभी उदयराज ने रजनी की गुदाज उभरी हुई गांड को हथेली में भरकर मीजने लगा, रजनी चिहुँक उठी, और सिसकारियां लेने लगी। साथ ही साथ दोनों एक दूसरे के होंठों का रसपान किये जा रहे थे, कुछ ही देर बाद रजनी ने अपने को बड़ी मुश्किल से अपने बाबू से थोड़ा आजाद करते हुए कहा- बाबू, रुको जरा, थोड़ा सा और सब्र करलो बाबू, बस थोड़ा सा ही।

उदयराज- सब्र तो कर ही रह हूँ मेरी बिटिया रानी, पर अब नही होता (उदयराज की आँखों में वासना साफ झलक रही थी, उसकी आवाज भारी हो गयी थी)

रजनी- सब्र तो मुझसे भी नही हो रहा बाबू, पर रात भर के लिए रुक जाओ, फिर सब दूंगी (रजनी में काम भावना में सिसकते हुए कहा)

उदयराज- सब क्या?

रजनी- वो

उदयराज रजनी को कस के अपनी बाहों में भीचते हुए- वो क्या मेरी बिटिया।

रजनी- वही बाबू, जिसके लिए मेरे पिताजी तड़प रहे हैं। (रजनी धीरे से फुसफुसाके बोली)

उदयराज- किसके लिए तड़प रहा हूँ मेरी बिटिया। बोल न, बोल भी दे, तेरे मुँह से सुनना चाहता हूं उसको क्या बोलते हैं?

रजनी- मुझे शर्म आती है। आप समझ जाइए न बाबू।

उदयराज- मुझे नही समझ आ रहा बता न मेरी बेटी।

रजनी- वही जो दोनों जांघों के बीच में होती है, अब समझें।

उदयराज- नही, क्या बोलते हैं उसको?

रजनी समझ गयी कि उसके बाबू बहुत मस्ती में हैं और उसको भी बहुत मजा आ रहा था ऐसी बातों से

रजनी थोड़ी देर शांत रही फिर धीरे से अपने बाबू के कान के पास अपने होंठ ले जा के बोली- बूबूबूबूरररर, बूर बोलते हैं उसको बाबू, बूर (और ये शब्द बोलते ही और भी कस के अपने बाबू से लिपट गयी उसकी आह निकल गयी), फिर बोली मैं अपने बाबू को रात को अपनी बूर दूंगी खाने को, ठीक, अब खुश।

उदयराज अपनी बेटी के मुंह से ये शब्द सुनकर अवाक रह गया और मदहोश होकर बोला- मुझे अपनी बेटी की बूर खाने को मिलेगी।

रजनी भी ये शब्द बोलने के बाद अंदर ही अंदर गनगना गयी कि आज जीवन में पहली बार वो किस तरह उस खास अंग का नाम अपने बाबू के सामने ही ले रही है और उसे इसमें कितना आनंद आया फिर वो थोड़ा और खुलकर बोली

रजनी (सिसकते हुए) - हाँ और वो भी अपनी शादीशुदा बेटी की, पूरी रात, जी भरके,अब खुश।

उदयराज अत्यंत खुश हुआ और एक बार फिर से उसने रजनी के गालों, होंठों पर ताबड़तोड़ चुम्बन जड़ना शुरू कर दिया। रजनी फिर से सिसकने लगी।

उदयराज- सिर्फ खाने को मिलेगी, पीने को नही।

रजनी- खाना हो खा लेना, पीना हो पी लेना, जो मर्जी कर लेना।

उदयराज- उसमे से जो मूत निकलता है उसको मैं पियूँगा, पिलाओगी न

रजनी- dhaatt,

फिर बोली- जरूर, मेरे बाबू, जरूर, जी भरके पी लेना

उदयराज ने खुश होकर रजनी को अपनी गिरफ्त में से आजाद किया, घर में काफी अंधेरा था, रजनी ने अपने बाबू से एक बात कही- बाबू हमे अभी अपने अपने कागज पढ़ लेना चाहिए, न जाने उसमे क्या लिखा होगा, मैं मंदिर में दिया जला देती हूं और लालटेन भी, इससे पहले की कोई आ जाए हमे वो पढ़ लेना चाहिए कि उसमे क्या कर्म लिखा है दोनों के लिए।

उदयराज- हां मेरी बेटी तू ठीक कहती है।

और रजनी ने मंदिर में दिया जलाया फिर पूरे घर में लालटेन जलाई, उदयराज उसे ये सब करते हुए देखता रहा, जब दोनों को नज़रें मिलती तो दोनों मुस्कुरा देते। फिर रजनी बोली मैं पीछे वाली कोठरी में जा रही हूं पढ़ने और आप बरामदे में बैठ के पढ़ लो।

उदयराज- हां ठीक है

और दोनों ने अलग अलग कमरे में जाके अपना अपना कागज खोला।
 
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