Incest पाप ने बचाया - SexBaba
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Incest पाप ने बचाया

hotaks

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"रजनी", "ओ रजनी बिटिया" जरा एक लोटा पानी ला, जोर की प्यास लगी है", - गांव का मुखिया उदयराज अपने सिर से गेहूं का बोझ जमीन पर गिराकर, अंगौछे से अपना पसीना पोछते हुए अपनी बिटिया को आवाज लगते हुए बोला।

रजनी- "लायी बाबू"


(Hello दोस्तों नमस्कार मैं हूँ S_Kumar, यह मेरी पहली कहानी है, आप लोगों की तरह कहानियों का शौकीन मैं भी हूँ, काफी दिनों से कहानियां पढ़ता चला आ रहा हूँ। आज सोचा क्यों न मैं भी एक कहानी लिखूं।

मैं कोई professional writer नही हूँ और न ही मैंने कभी कोई कहानी लिखी है, तो अगर कोई गलती हो तो माफ कीजियेगा और अगर अच्छी लगे या न भी लगे तो भी comment कीजियेगा।

यह कहानी हिंदी font में होगी जिसकी एक छोटी सी झलक आप लोग शुरू में ही देख चुके हैं, और हां यह कहानी पारिवारिक संबंधों पर आधारित है तो जिसको भी ऐसी कहानियां नही पसंद वो कृपया न पढ़ें। यह कहानी सामाजिक नियमों के खिलाफ है, पारिवारिक रिश्तों पर आधारित है, यह पुर्ण रूप से काल्पनिक है वास्तविकता से इसका कहीं कोई संबंध नही, अगर कहीं कोई संबंध पाया गया तो वह बस एक संयोग ही होगा। इस कहानी में बताए गए कोई भी तंत्र मंत्र या टोना टोटका या कोई विधि बस एक कल्पना हैं वास्तविकता से इसका कोई संबंध नही।

इस कहानी का update मैं 2 या 3 दिन के अंतराल पे दूंगा अगर कोई जरूरी काम या किसी और चीज़ में busy न हुआ तो, और अगर हुआ तो ये अंतराल और भी बढ़ सकता है और इसके लिए भी मुझे माफ़ कीजियेगा।)

तो चलिए फिर कहानी को आगे बढाते हैं---

Update-1

बात बहुत पहले की है उत्तर प्रदेश में कहीं दूर-दराज एक बहुत ही पिछड़ा हुआ गांव था-विक्रमपुर। बहुत ही पिछड़ा हुआ इशलिये क्योंकि यह एक बहुत बड़ी नदी के दूसरी तरफ था। शहर से इसका कोई खास लेना देना नही था। कुल मिलाकर 100-200 घर होंगे वो भी काफी दूर-दूर थे।

नदी के किनारे होने की वजह से गांव बहुत ही हरा भरा था। यह गांव बहुत बड़े जंगल से चारों तरफ से घिरा हुआ था। यह गांव कई दशकों पहले और भी बड़ा हुआ करता था, आज जो इस गांव में सिर्फ 100-200 घर है वहीं एक वक्त इस गांव में 1000-1500 घर हुआ करते थे, जो कि आज के वक्त में सिमटकर केवल 100-200 घर ही रह गए थे।

लेकिन ऐसा क्यों? आखिर क्या ऐसा हो रहा था

इस गांव में जो परिवार के परिवार धीरे धीरे खत्म हो रहे थे। बहुत तेजी से नही बल्कि बहुत धीरे धीरे, एक बार को अचानक से देखने में नही लगेगा परंतु जब कोई गांव का बाहरी इंसान गौर से इस गांव की दशकों पुरानी हिस्ट्री से दूसरी जगहों की तुलना करता तो वो भी सोच में पड़ जाता कि आखिर ऐसा क्यों?

माना कि मौत हर जगह होती है, जो इस दुनियां में आया है उसे जाना ही है, लेकिन हर जगह एक balance maintain है। लोग मर रहे हैं तो बच्चे पैदा भी हो रहे हैं। एक पीढ़ी गुजर रही है तो नई पीढ़ी आ भी रही है।

परंतु इस गांव में मृत्यु दर बहुत ज्यादा थी और जन्म दर नाम मात्र।

देखने में लोग बिकुल स्वस्थ रहते, न जाने कब कैसे धीरे धीरे बीमार पड़ते और चले जाते, इस गांव के लोग जब बाहरी दुनिया में इलाज कराने जाते तो report में कहीं कुछ नही आता। वैसे तो जल्दी इलाज़ के लिए जाते नही थे क्योंकि इस गांव के लोग थे- रूढ़िवादी, अन्धविश्वासी और वो झाड़ फूंक, में ज्यादा विश्वास रखते थे।

इस गांव के लोगों ने जानबूझ के भी अपने आप को दीन दुनियां से अलग कर रखा था। इसका पहला कारण तो ये ही था कि यह गांव चारों तरफ जंगल से घिरा हुआ था, नदी के दूसरी छोर पर था और.....और... इस गांव के लोगों को सबसे ज्यादा नफरत थी- गलत चीजों से, जैसे- गलत काम करना, झूठ बोलना, किसी का दिल दुखाना, बेईमानी करना, कोई भी गलत काम, गलत सोच, गलत विचार, भावना किसी के मन में नही थी, जैसे कोई जानता ही नही था इन सब चीजों को। यही main वजह थी जो इस गांव के लोग बाहरी दुनिया से ज्यादा मेल जोल नही रखना चाहते थे क्योंकि उस गांव के अलावा हर जगह गलत चीज़ें थी, गलत काम था, गलत सोच थी, गलत भावना थी। यूँ समझ लीजिये हर जगह कलयुग था और इस गांव में सतयुग था।

लेकिन सोचने वाली बात ये है कि ऐसा गांव में क्या था कि परिवार के परिवार धीरे धीरे खत्म हो रहे थे, न कोई महामारी, न कोई रोग, न कोई आक्रमण, न कोई दंगा फसाद, फिर ऐसा क्या था? ऐसा नही है कि गांव के लोग इससे अनजान थे वो जानते थे कि कुछ तो इस गांव में गड़बड़ है, परंतु उनके पास इसका कोई इलाज नही था, उनके पास कोई रास्ता नही था इससे बाहर निकलने का, इसलिये गांव के लोगों के मन में कहीं न कहीं किसी कोने में एक उदासी सी रहती थी।

परंतु ऐसा क्या था, जिसकी वजह से ऐसा हो रहा था, वो आपको आगे इस कहानी में पता चलेगा---

Update-2

दोस्तों यह कहानी दो मुख्य किरदार के इर्द गिर्द ही रहेगी, कहानी में कुछ और किरदार भी आएंगे आगे चलकर, कहानी का हीरो गांव का मुखिया ही है।

कहानी के मुख्य पात्र-

उदयराज
- उदयराज विक्रमपुर गांव का मुखिया है, उसकी उम्र 44 वर्ष है, वह बहुत ही नेकदिल और ईमानदार इंसान है। 20 वर्ष की उम्र में ही उसकी शादी विमला से हो गयी थी, जो अब इस दुनियां में नही है।

विमला से उसके 2 बच्चे हुए, 1 लड़का और 1 लड़की, जब वह 22 वर्ष का था तब लड़का पैदा हुआ जिसका नाम अमन रखा गया था, जो अभी 7 वर्ष पहले इस दुनिया से चला गया उसी रहस्यमयी वजह से जो गांव में थी। उदयराज जब 23 वर्ष का था तब विमला को 1 बेटी पैदा हुई जिसका नाम रजनी रखा गया। रजनी अमन से एक वर्ष छोटी थी।

इस वक्त वो अपनी बेटी के साथ ही रहता है करीब कुछ सालों से।

उदयराज गांव का मुखिया तो था ही साथ ही साथ वह एक तजुर्बेदार किसान भी था, खेतों में खुद ही सारा काम संभालने की वजह से उसका शरीर काफी बलिष्ट था, कद काठी ऊंची थी, रंग थोड़ा सांवला था, धूप में अक्सर कड़ी मेहनत करने की वजह से भी हो गया था।

उदयराज को खेती करना बहुत पसंद था, खेतों में वो अकेला ही लगा रहता था, लोग कहते भी थे कि उदयराज कुछ आदमी वगैरह रख लिया करो काम में मदद हो जाया करेगी तो वो कहता कि इतना तो मैं अकेले ही कर लूंगा, जब मुझे लगेगा कि काम बस के बाहर है तो रख लूंगा।

खेतीबाड़ी में ज्यादा वक्त देने से वो मुखिया का काम कम ही संभाल पाता था, परंतु उसका स्वभाव अत्यंत सरल और अच्छा होने की वजह से खुद गांव वालों ने उससे कहा रखा था कि "मुखिया तो हमारे तुम ही होगे उदयराज, भले ही तुम मुखिया का सारा काम अपने परम मित्र बिरजू से कराओ, पर मुखिया तो तुम ही हो"

उदयराज भी गांववालों से इतना सम्मान मिलने पर उनका दिल नही दुखाना चाहता था इसलिये वह गांव का मुखिया बना हुआ था पर ज्यादातर काम उसका मित्र बिरजू ही देखता था।

रजनी- रजनी की उम्र 21 वर्ष थी, उसका विवाह हो चुका था उसकी एक छोटी बेटी भी थी (ये बहुत भाग्य की बात थी क्योंकि गांव में बच्चे बहुत मुश्किल से हो रहे थे)।

रजनी अपनी माँ की तरह काफी गोरी थी। बला की खूबसूरत, कद काठी में सुडौल थी, भरा पूरा यौवन था उसका, बड़े बड़े स्तन, चौड़े और भारी नितम्ब, वो एक अत्यंत मादक जिस्म की मालकिन थी, उसकी चाल तो अलग ही कहर ढाती थी। पर उस गांव में कोई भी मर्द या लड़का कभी भी किसी परायी लड़की या स्त्री को बुरी नज़र से नही देखता था और न ही कभी कोई ऐसा विचार अपने मन में लाता था, जैसे ये सब गलत विचार उन्हें पता ही नही था। इतने शरीफ थे इस गांव के लोग।

जो स्त्री विधवा होती थी या अपने पति से किसी भी वजह से दूर रहती थी और जो पुरुष विदुर होते थे जिनकी पत्नी की मृत्यु हो गयी होती थी वो कामाग्नि में जल जल कर जीवन बिता देते थे पर कभी परायी स्त्री या पुरुष को कभी गंदी या गलत निगाह से नही देखते थे।

रजनी का पति थोड़ा सनकी था और शारीरिक रूप से रजनी से कमजोर था, उसे स्त्री में कोई खास रुचि नही रहती थी, न ही उसे सेक्स पसंद था, उसके अंदर बहुत बचपना था, शादी के इतने साल बाद तक भी कभी ऐसा नही हुआ कि उसने रजनी को सेक्स में चरमसुख दिया हो, यौनसुख के लिए रजनी हमेशा ही प्यासी रहती थी, पर क्या करे स्त्री थी कुछ कह भी नही सकती थी लोक लाज की वजह से। इस वजह से उसका पति उसकी नज़रों में उतरता चला गया, पर ऐसा नही था कि वो अपने पति की इज़्ज़त नही करती थी बस ये था कि वो ये उम्मीद छोड़ चुकी थी की उसका पति कभी बिस्तर पे उससे रगड़ रगड़ के संभोग करेगा, जिससे वो सन्तुष्ट हो सकेगी। क्योंकि वह अब यह जान चुकी थी कि उसके पति में इतनी ताकत ही नही थी कि वो उस जैसी सुडौल और भरे जिस्म वाली औरत की प्यास बुझा सके।

उसकी यौवन की रसीली गहराइयों के आखिरी छोर तक उसका पति न तो अभी तक पहुच पाया था और न ही कभी पहुंच पायेगा ये वो जानती थी, उसकी पूरी गहराई को नापने के लिए एक बलिष्ट मर्द की जरूरत थी, और वो कभी भी किसी भी कीमत पर पराये मर्द के बारे में सोच भी नही सकती थी, या यूं मान लो उसे पता ही नही था कि व्यभिचार भी कोई चीज़ होती है। इसलिए वो अब इसको अपना भाग्य मानकर कामाग्नि में जल रही थी।

पर रजनी थी बहुत हंसमुख और चंचल स्वभाव की। एक बेटी हो जाने के बाद भी उसका बचपना नही गया था।

(रजनी के पति और उसके ससुराल के बारे मे और अन्य पात्र के बारे में विस्तार से अगले अपडेट में)
 
Update-3

रजनी के ससुराल वाले इतने नेक और भले इंसान थे कि जब उसके भाई की मौत हुई तो उन्होंने रजनी को अपने मायके में ही रहने को बोल दिया था ताकि रजनी के पिता को कोई दिक्कत या परेशानी न हो, उनको एक सहारे की जरूरत थी, और बाप को एक बेटी से अच्छा सहारा कौन दे सकता है, आप लोग तो जानते ही हैं कि बेटियां बाप की लाडली होती है। बेटियां बाप से ज्यादा गहराई से जुड़ी होती है अक्सर बेटे के मुकाबले।

बेटे अमन की मौत के बाद उदयराज बहुत अकेला हो गया था, उनको एक सहारे की जरूरत थी इसलिए रजनी के ससुराल वालों ने रजनी को इतनी छूट तक दे दी कि वो चाहे तो उम्र भर अपने मायके में रहकर अपने पिता की देखभाल करे।

रजनी के ससुराल में भी कम ही लोग थे, उसके सास-ससुर, (रजनी के ससुर का नाम बलराज था), देवर देवरानी और उनका एक बेटा (जो बड़ी ही मुश्किल से कई मन्नतों के बाद पैदा हुआ था)।

जब रजनी के भाई की मृत्यु हुई और उसके मायके में ससुराल में हर जगह गमहीन माहौल था, और उसके पिता उस वक्त बिल्कुल अकेले रह गए थे तो एक दिन उसके ससुर ने घर के आंगन में शाम को जब सब लोग बैठे थे, रजनी को बुलाकर ये बात कह दी-

बलराज- बहू, बड़ी बहू जरा इधर आना बेटी, तुमसे कुछ बात कहनी है।

(कुछ देर इंतजार करने के बाद भी जब बहू नही आई तो उन्होंने बगल में बैठी अपनी पत्नी से कहा)

बलराज- लगता है बहू ने सुना नही, जरा तुम जाकर आवाज लगा देना, किसी काम में व्यस्त है क्या शायद?

बलराज की पत्नी- हां लगता तो है, घर के पीछे की तरफ जानवरों को चारा तो नही डाल रही, रुको मैं बुला कर लाती हूं।


फिर रजनी की सासु उसे बुला कर लायी और बलराज ने सभी के सामने उससे ये कहा कि बेटी देखो तुम्हारे पिता मेरे समधी होने के साथ साथ एक परम मित्र भी हैं, तो मेरा ये फर्ज बनता है कि मुसीबत की घड़ी में मैं उनके काम आऊं,अब जब तुम्हारा भाई भी इस दुनियां में नही है तो वो बहुत अकेले पड़ गए हैं, उन्हें एक सहारे की बहुत जरूरत है, ये तो तुम जानती ही हो।

उन्होंने आगे कहा- देखो बेटी कोई भी पिता या माँ कभी भी अपनी बेटी के ससुराल में रहकर जीवन नही बिताना चाहेगा और न ही बिताता है वार्ना मैं उनको यहीं बुला लेता।


(रजनी सिर नीचे करके चुपचाप सुन रही थी, बगल में उसके देवर देवरानी भी बैठे थे, बस उसका पति ही वहां नही था, वो कहाँ था अभी थोड़ी देर में बताऊंगा)

बलराज आगे बोला- तो मेरी प्रिय बड़ी बहू मैने और तुम्हारी सास ने यहां तक कि तुम्हारे देवर देवरानी ने भी यही सोचा है कि अगर तुम चाहो तो उम्र भर अपने मायके में रहकर अपने पिता की सेवा कर सकती हो और उनका ख्याल रख सकती हो, क्योंकि हम लोग उनका दर्द बहुत अच्छे से महसूस कर रहे है और तुम भी कर ही रही होगी, आखिर बेटी हो तुम उनकी।

यह तुम्हारी इच्छा पर निर्भर करता है तुम यहाँ रहना चाहो तो यहां रहो और अपने पिता जी के पास रहना चाहो तो वहां रह सकती हो उम्र भर। लेकिन ऐसा अपने मन में कभी गलती से भी मत सोचना की यहां की धन दौलत, जमीन जायदाद तुम्हे नही मिलेगा, जो हिस्सा तुम्हारा है वो तुम्हारा ही है तुम चाहे यहां रहो या न रहो, क्योंकि गलत तो कभी इस गांव में सदियों से नही हुआ और आगे भी नही होगा शायद, बेटी शायद शब्द मैंने इश्लिये लगाया क्योंकि भविष्य का किसी को नही पता, पर तुम्हारे साथ कभी गलत नही होगा जब तक मैं जिंदा हूं।

अब तुम्हारे पति को ही देख लो हमे क्या पता था कि ये नालायक निकलेगा, जिसको अपने परिवार की कोई फिक्र नही, अपनी पत्नी की कोई फिक्र नही, वो कहाँ है, कब आएगा, सही सलामत है भी या नही कुछ नही पता, उसकी नालायकी और बेफिक्री के कारण ही मैंने जमीन जायदाद का जो तुम्हारे हिस्से का है वो पहले ही तुम्हारे नाम कर दिया है, मुझे उस पर विश्वास नही, उसको मैं अपना बेटा नही मानता, जब उसने मेरी फूल जैसी बहू को, हम सबको इतना दुख दिया है, तो मैं भी उसे अब अपना बेटा नही मानता। तुम खुद ही देखो पिछले 8 9 महीने से बिना किसी को कुछ बताये कहाँ चला गया पता नही, कुछ सूत्रों से सुनने में मिला कि शहर भाग गया है।


(इतना सुनते ही रजनी की आंखों से आंसू बहने लगे, वो घूंघट किये हुए थी, वो अपने आपको संभाल न सकी और जब ये सुना कि उसका पति शहर भाग गया तो आंसू बह निकले, हालांकि वो बहुत हंसमुख स्वभाव की थी, धैर्यवान थी पर ऐसी खबर सुनके इंसान रो ही पड़ेगा न)

उसकी सास ने उठकर उसे गले से लगा लिया और बोली- न बेटी न, रोना नही मेरी बेटी, और उसके सिर को सहला सहला कर चुप कराने लगी

बलराज- बेटी तू फिक्र मत कर उसको उसके किये की सजा तो ईश्वर देगा ही, ये मेरा दिल कहता है कि आने वाले वक्त में तुझे भरपूर सुख मिलेगा, तू चिंता मत कर, बस इस वक्त जो पहाड़ हम सबके सिर पे टूटा है उससे संभालना है। यह मेरा घर है और इस घर में जब तक मैं जिंदा हूँ मेरी ही चलेगी, बेटी तू पूरी तरह आजाद है अपनी मनमर्जी की जिंदगी जीने के लिए, तेरे ऊपर कोई बंधन नही है तू चाहे जहां रह सब तेरा ही है।

मैं अपने मित्र उदयराज से बात कर लेता हूँ कि तू अब उसके साथ ही मायके में रहेगी, उनकी सेवा करेगी, देखभाल करेगी, नही मानेंगे तो मैं मना लूंगा सब समझा के, क्योंकि यहां तो तेरी सास है, देवरानी है देवर है, उनके पास कौन है कोई नही, तुझे उनके पास होना चाहिए। मैं बात करता हूँ उनसे पर तु कुछ बोल तो सही बस रोये जा रही है, अपनी मन की बात तो बता बेटी।

इतना सुनते ही रजनी रोते हुए अपने ससुर के पैरों में पड़ गयी और बोली- मैं धन्य हूं जो आप जैसे पिता समान ससुर मुझे मिले, जिन्होंने मुझे इतनी छूट दे दी कि मैं उम्र भर भी अपने मायके में अपने बाबू जी के साथ रहूं तो भी उन्हें कोई परेशानी नही, मैं धन्य हूँ पिताजी।

रजनी ने आगे बोला- कौन बेटी नही चाहेगी की वो अपने बाबूजी के साथ रहे बस मुझे यही चिंता होती थी कि आप लोगों की सेवा का फल मुझे नही मिल पायेगा।

बलराज- नही बेटी ऐसा नही है इतने दिन तूने हमारी सेवा तो कर ली न अब वहां उनको तेरी जरूरत है, हम धन्य है तेरी सेवा से, और तेरी जैसी बहू किसी को सौभाग्य से ही मिलती है, बस ये मेरा बेटा ही नालायक निकला।


(इतने में रजनी की देवरानी बोली)

रजनी की देवरानी- दीदी आप फिक्र मत कीजिये हम सब है यहाँ, संभाल लेंगे, कोई परेशानी नही होगी, आप वहां देखिए और संभालिये।

बलराज- ठीक है बेटी मैं कल ही उदयराज से बात कर लेता हूँ


(और फिर रजनी की सास उसकी देवरानी भावुक होकर एक दूसरे से लिपटकर रोने लगी, और काफी देर बाद जाकर एक दूसरे को सांत्वना देकर चुप हुई, रजनी के ससुर और देवर भी भावुक होकर वहां से उठकर बाहर चले गए)

(अगले दिन बलराज ने उदयराज से अपने मन की बात कही, काफी न नुकुर के बाद उसने उदयराज को मना लिया और रजनी उसके अगले ही दिन अपनी बेटी के लेकर अपने मायके अपने बाबूजी के पास आ गयी उनके साथ रहने, उनकी सेवा करने)

(रजनी ने इस वक्त अपने पति के बारे में क्या सोचा, की वह उनके बगैर कैसे रहेगी और वो आ गया तो क्या होगा, रजनी ने अपना ससुराल छोड़कर अपने मायके में अपने पिता के साथ रहने का निर्णय लेने में देरी क्यों नही की, और रजनी के ससुर ने ऐसा क्यों बोला कि "मेरा दिल कहता है कि आने वाले वक्त में तुझे भरपूर सुख मिलेगा" इसके बारे में अगले अपडेट में)
 
Update-4

पिछला-

(रजनी ने इस वक्त अपने पति के बारे में क्या सोचा, की वह उनके बगैर कैसे रहेगी और वो आ गया तो क्या होगा, रजनी ने अपना ससुराल छोड़कर अपने मायके में अपने पिता के साथ रहने का निर्णय लेने में देरी क्यों नही की, और रजनी के ससुर ने ऐसा क्यों बोला कि "मेरा दिल कहता है कि आने वाले वक्त में तुझे भरपूर सुख मिलेगा" इसके बारे में अगले अपडेट में)

अब आगे-

रजनी ने अपने मायके जाते वक्त अपने पति के बारे में, उनके निर्णय के बारे में इंतजार नही किया और न ही कुछ सोचा क्योंकि इनके पीछे कुछ कारण थे :

1.घर में उनके पति की कोई अहमियत नही रह गयी थी, ये उसके पति की खुद की करतूतों की वजह से हुआ था। जिस इंसान ने कभी अपने घर के लोगों की कोई परवाह न कि हो, हमेशा अपने मन की किया हो, एक वक्त ऐसा आता है कि उसकी अहमियत कम हो जाती है।

2. वो खुद 8 9 महीने से बिना किसी से कुछ बताये लापता हो गया था, कुछ सूत्रों से पता लगा था कि वो इस गांव के नियम कानून, उसकी सदियों से चली आ रही प्रतिष्ठा को दरकिनार करके, अपने घरवालों को छोड़कर, अपने पत्नी और बेटी को छोड़कर सदा के लिए बाहरी सांसारिक दुनिया में जीने के लिए चला गया था, जहां हर तरह के गलत काम होते थे और उनमे उसको मजा आने लगा, कुछ पता नही था कि वो कहाँ है और आएगा भी या नही।

3. रजनी तो वैसे भी अकेली ही जीवन बिता रही थी चाहे उसका पति हो या न हो उसके जीवन में कोई रस या उमंग नही था, अब तो वो उसे छूता भी नही था, छूने की बात तो बहुत दूर थी वो रजनी को मानता ही नही था, वो तो हमेशा ही कामाग्नि में जलती रहती थी, इसलिए रजनी ने भी उसे अपने दिल से निकल दिया था पर वो अंदर से उदास रहती थी।

4. जब रजनी के सामने ये बात आई कि वह अपने बाबू जी के साथ रह सकती है तो वो अंदर ही अंदर खिल उठी। रजनी का अपने बाबू से बचपन से ही बहुत लगाव था, वो अपने पिता की लाडली थी, हमेशा से ही वो अपने पिता के लिए एक मित्र बनकर रही है। जब उसकी शादी में उसकी बिदाई हो रही थी तो उसके बाबू जी उसकी जुदाई में बेहोश हो गए थे, रजनी को भी होश नही था वो भी ससुराल में काफी दिनों तक रोती रही थी और इधर रजनी के पिता अपनी बेटी के वियोग में बीमार भी पड़ गए थे काफी झाड़ फूक के बाद जाके ठीक हुए थे।

उसके पिता भी रजनी के अंदर अपनी पत्नी की छवि देखते थे क्योंकि रजनी अपनी माँ की तरह दिखती थी पर असलियत मे वो अपनी माँ से कहीं ज्यादा सुंदर और कामुक औरत थी।

वैसे भी रजनी ससुराल में भी अकेली ही थी बिना पति के क्या ससुराल, वो मन ही मन अपने बाबू जी के पास आना चाहती थी, पर उसने कभी ये जिक्र नही किया था और जब ये प्रस्ताव उनके सामने आया तो वह मना नही कर पाई।

वैसे भी मायके में लड़कियां ज्यादा स्वछंद और खुले रूप में रह सकती है, ससुराल की तरह वहां ज्यादा कोई बंदिश नही होती, जैसे चाहो वैसे रहो, जैसा मन में आये पहनो।

रजनी को कहीं न कहीं ये अहसास था कि उसका पति वापिस नही आएगा अब, क्योंकि गांव ही उसे स्वीकार नही करेगा, वो सारे नियम क़ानून तोड़कर बाहरी दुनिया में मजे लेने गया था उसे अब कोई स्वीकार नही करेगा।

एक तरीके से वो अब विधवा सी हो गयी थी, और अगर वो आ भी गया तब भी वो ससुराल जाने वाली नही अब, अब वो ही घर जमाई बनके मायके में रहेगा अगर आएगा तो, पर ऐसा कभी होगा ही नही, इसलिए अब उसका रास्ता साफ था, वो तो अब अपने बाबू जी के ही साथ रहना चाहती थी, उसने तो शादी से पहले भी कई बार अपने बाबू से कहा था कि- मुझे नही करनी शादी वादी, मैं तो अपने बाबूजी के ही साथ रहूंगी, इस पर उसके बाबू जी हंस देते और कहते- बेटी ये तो नियम है सृष्टि का।

पर अब सब बदलने वाला था अब वो हो रहा था जो रजनी का दिल चाहता था।

इसलिए रजनी बिना ज्यादा देर किए अपने बाबू जी के पास मायके में आ गयी।

अन्य पात्र-

सुखिया काकी-
सुखिया काकी यही कोई 60 62 साल की होंगी। हालांकि वो उसकी दादी की उम्र की थी पर रजनी बचपन से ही उन्हें काकी कहती थी।

सुखिया काकी रजनी के मायके में पड़ोस में ही रहती थी हालांकि गांव में घर थोड़ा दूर दूर थे पर एक सुखिया काकी का ही घर था जो रजनी के घर के काफी नजदीक था।

सुखिया काकी के घर में केवल उसकी 2 बेटियां थी जिनकी शादी हो चुकी थी वो अब अकेली ही रहती थी, ज्यादातर वो रजनी के घर पर ही रहती थी अक्सर खाना भी उनका यहीं बन जाता था।

सुखिया काकी ने रजनी को बचपन से ही पाला पोशा था और उस वक्त जब रजनी की माँ का देहान्त हो गया था तो सुखिया काकी ने ही रजनी और उसके भाई अमन को पाल पोश के बड़ा किया था इसलिए सुखिया काकी को रजनी अपनी माँ ही मानती थी और उनसे अपने दिल की हर बात कह देती थी।

सुखिया काकी को रजनी ने ही कहा था कि -

काकी आप यहीं रहा करो न हमारे घर, आप भी अकेली ही रहती हो अपने घर में, मेरे साथ ही रहो आपका खाना पीना तो मैं यहीं बना ही देती हूं, आप इस उम्र में क्यूं इतना काम करती हो। मेरे साथ ही रह करो अब मैं आ गयी हूं न।

तो काकी बोली- बेटी तू कहती तो सही है। मेरा भी मन करता है कि मैं तेरे साथ ही रहूं, तेरे साथ मुझे भी सुकून मिलता है मन भी लगा रहता था, पर उधर भी देखभाल तो करना ही पड़ेगा न, अब अगर उधर बिल्कुल न जाऊं तो सब खराब हो जाएगा, साफ सफाई भी करना रहता है, एक गाय है उसको भी चार पानी देना पड़ता है, पर मैं सुबह शाम तेरे पास ही तो रहती हूं, देख तू खाना भी मेरा यहीं बना देती है तो खाना खाने के लिए तो आती ही हूं।

तो रजनी बोली- अरे मेरी प्यारी काकी माँ तुमने मुझे पाल पोश ले बड़ा किया है क्या मेरा इतना भी फ़र्ज़ नही की मैं अब इस उम्र में तुम्हारा काम संभाल लूं, देखो अब मैं आ गयी हूं न तो मैं अब इस घर का और उस घर का, दोनों घर का काम संभाल लूंगी, आप बस मेरे साथ ही रहा करो,

हाँ अगर घूमे फिरने और देखभाल करने या टहलने के लिए जाना हो तो उधर चली जाया करो, पर अब मेरे साथ ही रहो, मुझे तुम्हारा और बाबूजी का साथ बहुत अच्छा लगता है।

तो काकी बोली- अच्छा मेरी बिटिया ठीक है, पर तू अकेले ही कितना काम करेगी, और मैं अगर बिल्कुल बैठ गयी तो मेरे शरीर में भी तो जंग लग जाएगा न, काम करने की तो हम गांव के लोगों को आदत होती है बेटी, इसलिए मुझे काम करने से न रोक, नही तो मैं भी जल्दी ही ऊपर चली जाउंगी बीमार होके, और रही बात तेरे साथ ही रहने की तो मैं तेरे साथ ही रहूंगी, पर अपने बाबू जी से तो पूछ लेती एक बार।

इस पर रजनी बोली- बाबू जी मेरी बात कभी नही टालते, और उन्हें इस बात से क्यों परेशानी होगी? ठीक है काकी जैसा आपको ठीक लगे आप काम करो पर ज्यादा नही।

काकी- ठीक है मेरी बिटिया।


(ऐसी है सुखिया काकी)

(रजनी के ससुर ने ऐसा क्यों बोला कि "मेरा दिल कहता है कि आने वाले वक्त में तुझे भरपूर सुख मिलेगा" इसके बारे में कहानी में आपको आगे चलकर पता लग जायेगा, इसके अलावा इस गांव पर क्या ऐसा काला साया था जो इतने ईमानदार लोग अच्छे लोग, जिन्होंने कभी कुछ गलत किया ही नही फिर भी उन लोगों के साथ इतना गलत हो रहा था कि धीरे धीरे लोग कम हो रहे थे, अपनो को खो रहे थे, जन्मदर बहुत कम था और मृत्युदर ज्यादा,

जो एक बैलेंस बिगड़ गया था उसका रास्ता क्या है?

क्या होगा इसका हल?

कैसे बचेगा इस गांव का अस्तित्व?

कहानी में आगे पता चलेगा)
 
Update-5

(रजनी घर के अंदर से एक लोटा पानी साथ में गुड़ लेकर बाहर आई)

रजनी- लो बाबू जी पानी।

(उदयराज खाट पर लेटा हुआ था और अंगौछा मुँह पर डाल लिया था)

उदयराज - (खाट से उठते हुए) हाँ बिटिया ला, अरे गुड़ क्यों ले आयी, ऐसे ही पानी दे देती।

रजनी- ऐसे भला क्यों दे देती पानी अपने बाबू को, खाली पानी नही देते पीने को।


(रजनी खाट पर अपने बाबू जी के बगल में बैठते हुए बोली, उसने आज लाल रंग का लहँगा चोली पहना हुआ था, जिसमे वो बहुत खुबसूरत लग रही थी)

उदयराज- ये गुड़ कुछ नया सा लग रहा है, इतना मीठा गुड़ मैंने आजतक नही खाया।

रजनी- बाबू जी ये आपकी बिटिया के हाँथ का गुड़ है जो उसने अपनी ससुराल में बनाया था, और आते वक्त अपने बाबू जी के लिए ले आयी हूं, ये एक नई किस्म के गन्ने से बना गुड़ है। जिसको मैंने बनाया है, ताकि आपके जीवन में मिठास भर सकूँ (रजनी ने बड़े ही चहकते हुए मुस्कुराकर कहा)

उदयराज- बेटी मेरे जीवन की मिठास तो तू है, तेरे आने से तो वैसे ही अब मेरे जीवन में बाहार आ गयी है। मैं बहुत अकेला हो गया था पर अब तेरा साथ पा कर मैं बहुत खुश हूं, और यह गुड़ तो वाकई में तेरा मेरे प्रति प्रेम की मिठास का अहसास करा रहा है।

रजनी- बाबू अब मैं आ गयी हूं न तो अब आप अकेले बिल्कुल नही है, और मैं अब आपके जीवन में ख़ुशियों के रंग भर दूंगी। ऐसा कहते हुए रजनी अपने बाबू जी के गले से लग गयी।

उदयराज- ओह्ह! मेरी बेटी, मेरी लाडली।


(ऐसा कहते हुए उदयराज ने भी रजनी को निष्छल भाव से कस के अपनी बाहों में भर लिया)

(परंतु रजनी की जब मोटी मोटी चूचियाँ उदयराज के सीने से टकराई और दब गई तो उदयराज थोड़ा झिझका, परंतु रजनी अपने बाबू से लिपटी रही, उसके मादक, गदराए बदन ने उदयराज को थोड़ा विचलित सा तो कर दिया पर तुरंत ही उसने मन में आये इस गंदे भाव को झिड़क दिया)

उदयराज ने जब महसूस किया कि रजनी हल्का हल्का सुबुकने सी लगी है तो उसने उसको अपने से थोड़ा अलग करते हुए उसके सुंदर और गोरे गोर चहरे को अपने हांथों में लेकर बोला-



उदयराज- अरे तू रो रही है, क्यों भला, अब मेरे पास आ गयी है फिर भी रो रही है, अभी तो बोल रही थी कि मेरी जिंदगी खुशियों से भर देगी मेरी बिटिया, क्या ऐसे रो रो के भरेगी क्या? ह्म्म्म

रजनी- बाबू ये तो खुशी के आंसू है, सच तो ये है कि मैं आपके बिना नही रह सकती अब, मैं आपको बचपन से ही बोलती आ रही थी न कि मुझे शादी नही करनी, मुझे तो बस आपके साथ रहना है, और आज ईश्वर ने मेरी सुन ली, इसलिए ये आंसू निकल आये।

उदयराज- बेटी मैं भी तेरे साथ ही रहना चाहता था, कौन पिता भला अपनी बेटी के साथ नही रहना चाहेगा पर इस दुनियां के, समाज के नियम कानून तो नही बदल सकते न, मेरा बस चलता तो मैं तेरे जीवन में किसी तरह का कोई दुख आने ही न देता।

रजनी- मैं जानती हूं बाबू, आप मुझे कितना स्नेह करते हैं। पर अब हम कभी दूर नही रहेंगे चाहे जो भी हो।

उदयराज- हां बिल्कुल मेरी बेटी।


(दोनों घर के सामने द्वार पर खुले आसमान के नीचे एक दूसरे को बाहों में लिए खाट पे बैठे थे।

गांव का कोई भी दूसरा इंसान कभी भी इस तरह अपनी जवान गदराई सगी बेटी को बाहों में नही लेता था पर उदयराज और रजनी की बचपन की ये आदत गयी नही थी। जो जवानी में भी बरकार थी। हालांकि कभी भी उनके मन में कभी कोई पाप नही था। ये बस बाप बेटी का एक निश्छल प्रेम था)

तभी सुखिया काकी सामने से आती हुई बोली-

अरे आज बहुत प्यार आ रहा है अपने बाबू पर hmmm

रजनी कुछ झेंपती हुई उदयराज से झट से अलग हो गयी और बगल में बैठते हुए बोली- क्यों न आये काकी कितने दिनों बाद अपने बाबू जी के पास आई हूं।

काकी- अरे बाबा तो करले प्यार पगली मैंने कब मना किया, तुझे तो पता ही है मेरी मजाक करने की आदत है, मैं तो ये कहने आयी थी कि तेरी गुड़िया जो अंदर कमरे में सो रही है वो अब उठ गई है जा के उसको दूध पिला दे, जैसे तुझे अपने बाबू की जरूरत है वैसे ही उसे तेरी।


इतना कहकर काकी हंसने लगी और रजनी भागी भागी घर में गयी और अपने 2 साल की बेटी जो रो रही थी उसको दूध पिलाते हुए बाहर आने लगी।

उदयराज थोड़ी देर काकी से इस बार अगली फसल कब तक बोई जाए इस पर बातचीत करने लगा फिर उठकर उसने जो बोझ फेंका था उसको उठाकर एक साइड में दालान में रखा और बैलों को चारा डालने चला गया।
 
सबसे पहले तो आपका और अन्य साथियों का बहुत बहुत धन्यवाद भाई। यह मेरी लाइफ की पहली स्टोरी है और मुझे नही पता था कि इसको इतना पसंद किया जाएगा,

आप लोग मेरी स्टोरी को इतना पसंद कर रहे है इस बात ने मेरे हौसले को उचाईयों तक पहुचा दिया है। मैं पूरी कोशिश करूंगा कि जल्दी जल्दी updates दूँ।

आप लोगों को मेरी लेखनी पसंद आई इसके लिए आप लोगों को पुनः धन्यवाद।
 
Update-6

रजनी अपनी बेटी को दूध पिलाती हुई बाहर आ गई और खाट पर बैठ गयी। काकी वहीं नीचे खाट पर बगल में पटरे पर बैठी थी।

रजनी बोली- काकी आज क्या बनाऊं खाने में शाम के 6 तो बज गए उसकी भी तैयारी करनी है न।

काकी- अरे बेटी कुछ भी बना ले जो तेरा मन कहे।


रजनी की बायीं चूची में दूध खत्म हो गया तो उसने अपनी बेटी को दायीं चूची का दूध पिलाने के लिए बड़ी लापरवाही से दूसरी तरह गुमाया और जिस चूची का दूध खत्म हो गया था उसको चोली के अंदर कर लिया फिर दायीं चूची को काकी के सामने ही बड़ी लापरवाही से चोली को ऊपर सरका के बाहर निकाला, चूची बड़ी और कसी होने की वजह से उछलकर बाहर उजागर हो गयी, उसकी चूची काफी बड़ी, मोटी और गोरी गोरी थी, इतनी गोरी चूची पर बड़ा सा गुलाबी निप्पल किसी को भी पागल कर देता, निप्पल बहुत मनमोहक था अलग ही कहर ढा रहा था, चूची उसकी इतनी सख्त और बड़ी थी कि वो रजनी के एक हाँथ में नही समा रही थी। दूध उतरने की वजह से उन दिनों रजनी की चूचियाँ काफी बड़ी, सख्त और गदराई सी हो गयी थी जो उसके सीने को अलग ही उभार देती थी।

रजनी ने हथेली में अपनी चूची लेकर आगे वाली तर्जनी और मध्यमा उंगली को गुलाबी- गुलाबी निप्पल के दोनों तरफ रखा और निप्पल को बेटी के मुंह में डाल दिया, उंगली से निप्पल के आस पास पकड़ने और दबाव बनने पर निप्पल से एक-दो बूंद दूध की टपक गयी।

यह सब काम वह बिना काकी की तरफ देखे कर रही थी, उसे आभास भी नही था कि काकी उसको देख रही है। वैसे भी वहां कोई पुरुष तो था नही, तो वो बेधकड होके ये कर रही थी।

एकाएक उसने काकी की तरफ देखा जो उसे ही देख रही थी।

रजनी- क्या हुआ काकी (और मुस्कुरा दी)

काकी भी मुस्कुराते हुए- कुछ नही अपनी बेटी का मनमोहक यौवन देखकर अपने दिन याद आ गए, बहुत खूबसूरत और मादक हैं ये।

रजनी- धत्त....काकी आप भी न । (रजनी थोड़ी झेंप गयी)

काकी- सच में तेरी चूची बहुत खूबसूरत है।

(काकी के मुँह से "चूची" शब्द सुनकर रजनी गनगना सी गयी)

रजनी- काकी...अब बस भी करो। अपनी ही बेटी को छेडोगी अब आप। वो तो यहां पर बस मैं और आप ही थे तो मैं थोड़ा बेपरवाह सी हो गयी।

काकी- अरे तो क्या हुआ, तेरी काकी हूं मैं, तेरी माँ समान। पर सुन मेरी बेटी कभी भी खुले में या खुले आसमान के नीचे बच्चे को दूध पिलाना हो तो हमेशा चूची को ढककर ही पिलाया कर, चूची को कभी भी बच्चे को दूध पिलाते वक्त ऐसे उजागर नही करते।

(बार बार काकी के मुंह से "चूची" शब्द सुनकर उसे सिरहन सी हुई)

रजनी- पर क्यों काकी।

काकी- क्यूंकि इससे दूध में नज़र लग सकती है और बच्चे की तबियत पर असर पड़ सकता है।

रजनी- हां काकी ये बात तो आपने बिल्कुल सही कही, अब मैं आगे से ख्याल रखूंगी।


और फिर काकी उठकर अंदर से रजनी की चुनरी ले आयी जो रजनी अपनी बेटी को अंदर से लाते वक्त वहीं भूल आयी थी, और उसे रजनी ने अपने ऊपर डालकर ढक लिया।

काकी- पर बिटिया जो भी हो दामाद जी को तो जन्नत का मजा मिलता होगा (काकी ने फिर छेड़ते हुए बोला)

रजनी- मजा तो तब मिलेगा न जब उन्हें इसकी कद्र होती। आपको तो मैंने सबकुछ बता ही रखा है। (ये कहते हुए वो थोड़ा उदास हो गयी) अब मुझे उनसे कोई मतलब नही है। जब उन्हें नही तो मुझे भी नही उनकी परवाह।

काकी- ओह्ह मेरी बेटी मुझे माफ़ कर देना, मुझे ध्यान ही नही रहा, उस नासमझ की बुद्धि में न जाने क्या घुस गया है जो इतनी सुंदर, मदमस्त पत्नी की कोई परवाह नही। तूने सही किया बेटी। परंतु तू दुखी मत हो बेटी समय हमेशा एक जैसा नही रहता।

हम स्त्रियों की किस्मत में तड़पना ही लिखा है। अब मुझे ही देख तेरे काका के जाने के बाद मैंने कैसे अपनी जिंदगी काटी है मुझे ही पता है।

रजनी- हां काकी वो तो मैं जानती ही हूँ। पर अब हम साथ मिलकर रहेंगे। इसलिए ही तो मैं यहां आ गयी हूँ। अच्छा काकी मैंने जो पूछा वो तो तुमने बताया नही।


(रजनी ने बात पलटते हुए कहा, दरअसल वो काकी से अभी इस टॉपिक पर बात करने से शरमा रही थी क्योंकि वो जानती थी कि काकी मजाकिया स्वभाव की है और धीरे धीरे वो गंदी बातें छेड़ देंगी, तो वो भी उसमें रम जाएगी फिर खाना बनाने में देरी होगी, हालांकि उसे भी ये सब बहुत पसंद था पर अभी वो थोड़ा झिझक रही थी)



काकी- क्या पूछा तूने मैं तो भूल ही गयी।

रजनी- अरे बड़ी भुलक्कड़ हो गयी है मेरी काकी भी (रजनी ने दूध पी चुकी बेटी को खाट पे लिटाते हुए कहा), मैन पूछा था न कि खाने में क्या बनाऊं?

काकी- अच्छा हां, तो तू बना ले न जो तुझे पसंद हो।

रजनी- जब से आई हूं 3 4 दिन से मैं अपनी पसंद का ही बना रही हूँ।

काकी- अच्छा तो एक काम कर आज अपने बाबू जी के पसंद का कुछ बना और उन्हें बताना नही, खुश हो जाएंगे।

रजनी- हां काकी ये सही है, उनको दाल पकवान पसंद है बहुत तो मैं वही बनाती हूँ।


इतना कहकर रजनी काकी को खाट पर लेटी बेटी को पंखा करने को बोलकर रसोई में रात का खाना बनाने चली जाती है। काकी बोलती है कि मैं भी आती हूं मदद करने तो वो उनको मना कर देती है और फिर काकी बच्ची को पंखा करने लगती है।
 
Update-7

उदयराज बैलों को चारा डाल कर आया और आते ही काकी से पूछा- रजनी कहाँ गयी?

काकी- वो रात का खाना बनाने अंदर रसोई में गयी है।


(उदयराज भी सुखिया को काकी ही बुलाता था)

उदयराज- काकी आज गर्मी कितनी है न देखो मैं कितना पसीना-पसीना हो गया, बैलों को चारा डालते-डालते, ये नया बैल जो पिछले महीने खरीदा है न, इसके बड़े नखरे हैं सूखा भूसा तो खाता ही नही है बिल्कुल, जब तक उसमे हरी घास काटकर न मिलाओ, दूसरा वाला पुराना बैल बहुत सीधा है जो दे दो खा लेता है।

इसी नए के चक्कर में रोज घास को मशीन में डालकर काटना पड़ता है और इतना काम बढ़ जाता है। सोच रहा हूँ कुएं पे जा के नहा लूँ।


ऐसा कहते हुए उसने अपनी बनियान निकल दी और खाट पर बैठ गया, काकी जो पंखा बच्ची को कर रही थी वो अब उदयराज को करने लगी स्नेहपूर्वक, और उसके इस उम्र में भी गठीले शरीर को देखते हुए बोली- हां तो जा के नहा ले न कुएँ के ठंडे ठंडे पानी से राहत मिल जाएगी, रस्सी कुएँ पर ही है बाल्टी लेता जा घर के अंदर से, साबुन भी ले लेना कुएं पर होगा नही, रजनी ने दोपहर को हटा दिया था वहां से।

उदयराज खाट से उठा और अंगौछा कन्धे पे रख के घर के अंदर जाने लगा।

(उदयराज के घर का मुख्य दरवाज़ा पुर्व की तरफ था, घर पक्का बना हुआ था, घर में एक आंगन और चारों तरफ चार कमरे थे उन चार कमरों के पीछे एक छोटी सी कोठरी भी थी उस कोठरी के ऊपर घर के पीछे लगे बरगद के पेड़ की ठंडी छाया आती थी जिससे वो कोठरी गर्मियों के मौसम में दिन में भी ठंढी रहती थी, पहले जो औरतें घर में रहा करती थी वो अक्सर कोठरी में ही खाट बिछा के वही लेटती थी। अब तो खैर घर में रजनी और काकी ही थे। घर के मुख्य दरवाजे और आंगन के बीच एक बरामदा था, उन चार कमरों में जो दक्षिण की तरफ कमरा था वो रसोई थी। उसके ठीक सामने जो कमरा था उसके बगल में बाथरूम था और बाथरूम के सामने एक चौकी थी जिसपर पानी से भरी बाल्टियां या खाली बाल्टियां भी रखी रहती थी।

घर के आगे बड़ा सा द्वार था, द्वार पर कई तरह के पेड़ थे जैसे नीम, महुआ, अमरूद, सफेदा, आम, गूलर।

घर के ठीक सामने करीब 100 मीटर दूर कूआं था जो सफेद रंग से पुता हुआ चारों तरफ से क्यारियों से घिरा हुआ बहुत ही सुंदर लगता था, उन क्यारियों में अनार के पेड़ लगे हुए थे जिनपर फूल आ गए थे इसके अलावा वहां कई प्रकार की सब्जियां और फूल भी लगाए हुए थे जो कुएं के आने वाले पानी से हमेशा हरे भरे रहते थे, कुएं से आगे गांव का आम रास्ता था जिसपर इक्के दुक्के लोग आते जाते रहते थे और जब उन्हें उदयराज इधर उधर दिख जाता था तो वो "जय राम जी की मुखिया" कहना नही भूलते थे।

घर के उत्तर की तरफ पशुओं का दालान था और उसके विपरीत दिशा में आम का बाग था)

उदयराज ऊपर से निवस्त्र था बस धोती पहन रखी थी, घर में जाते हुए जब वो बरामदा पार करके आंगन तक पहुंचा तो सामने का दृश्य देखकर स्तब्ध रह गया।

सामने रजनी पीढ़े पर बैठ के सिलबट्टे पर दाल पीस रही थी, पीसने की वजह से वो काफी झुकी हुई थी जिससे उसकी बड़ी बड़ी गुदाज चुचियाँ साफ दिख रही थी, चुचियों के बीच की घाटी इतनी मादक थी कि कुछ सेकेंड के लिए उदयराज देखता रह गया, दाल पीसने की वजह से वो बार बार आगे पीछे हो रही थी जिससे मोटी मोटी चूचियाँ चोली में हिल रही थी मानो अभी उछल कर बाहर आ जाएंगी। रजनी ने गर्मी की वजह से चुन्नी बगल में रख दी थी।

उदयराज यह देखकर थोड़ा झेंप गया पर एक ही पल में उसके अंदर तक रोमांच दौड़ गया, उसे अपने मन में अपनी ही सगी बेटी की सुडौल चुचियाँ देखते हुए ग्लानि हुई और वह बनावटी खांसी करता हुआ आंगन में आ गया।

उसे देखकर रजनी भी अपनी अवस्था देखकर थोड़ा झिझक गयी और चुन्नी उठाकर चुचियों को ढकते हुए अपने बाबू के बलिष्ट ऊपरी नंगे बदन को देखकर थोड़ी शरमा सी गयी, जब से रजनी मायके आयी थी आज पहली बार उसने अपने बाबू को इस तरह नंगा देखा था, इससे पहले उसने अपने बाबू को इस तरह निवस्त्र कई साल पहले देखा था पर इस समय वो पहले से ज्यादा मजबूत और बलिष्ट दिख रहे थे। अक्सर वो बनियान ही पहने रहते थे पर आज एकदम से हल्के बालों से भरी चौड़ी छाती और मजबूत भुजाओं को देखकर वो भी अंदर तक न जाने क्यों सिरह सी गयी।

फिर मंद मंद मुस्कुराते हुए बोली- क्या हुआ बाबू, कुछ चाहिए क्या?

उदयराज- हां बेटी, वो बाल्टी लेने आया था, काफी गर्मी है न तो मन किया कि कुएं पर जा के नहा लूं।

रजनी- हाँ बाबू क्यों नही, साबुन भी लेते जाना, वहीं रखा है, और तौलिया मैं पहुँचा दूंगी आप जा के नहा लो।

उदयराज- ठीक है मेरी रानी बिटिया।


इतना कहकर वो बाल्टी उठाकर जाने लगा फिर न जाने क्यों वो रुका और पलटकर देखा तो रजनी उसे ही देख रही थी, नजरें मिलते ही रजनी मुस्कुरा दी और वो भी मुस्कुराते हुए बाहर कुएं पे चला गया।
 
Update-8

रजनी ने जल्दी जल्दी दाल पीसी और आगे का काम करने लगी कुछ देर बीत गए एकदम उसे याद आया कि अरे तौलिया तो देना भूल ही गयी, याद आते ही वो तुरंत बारामदे में भागती हुई गयी और खूंटी में टंगी तौली उठाकर घर से बाहर आ गयी।

बाहर आ कर उसने देखा कि काकी तो खाट के पास है ही नही, उसने इधर उधर नज़र दौड़ाई तो देखा कि काकी बच्ची को लेकर बगल वाले आम के बाग में टहल रही थी।

वो तौली लेकर तेज कदमों से कुएं की तरफ बढ़ने लगी, शाम का वक्त था 7:30 हुए होंगे थोड़ा अंधेरा छाने लगा था, जैसे ही वो कुएँ के पास पहुंची सामने का नज़ारा देख ठिठक सी गयी और अपने दोनों हाँथ कमर पर रखकर थोड़ा बनावटी गुस्से से अपने मन में ही बोली- ये लो, अभी तक बाबू जी मेरे न जाने क्या सोचते बैठे हैं, अभी तक तो इनको गर्मी लग रही थी, अब न जाने कौन सी दुनिया में खोए हैं

दरअसल उदयराज कुएं से पानी निकालकर लोटा भरकर बगल में रखकर कुछ सोचने लगा और उस सोच में ही डूब गया था, उसका मुंह सड़क की तरफ था और रजनी उसके पीछे थी अभी वो कुएं की सीढ़ियां चढ़ी नही थी।

रजनी को एकदम शरारत सूझी, वो दबे पांव सीढियां चढ़कर चुपके से अपने बाबू के बिल्कुल पीछे आ गयी और बगल में रखा पानी से भरा लोटा उठा कर अपने बाबू के सर के ऊपर करीब 1 फ़ीट तक ले गयी और सर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्ररर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर बोलते हुए पानी की धार छोड़ दी और उसकी हंसी छूट गयी, लगी खिलखिला के हंसने।

उदयराज चौंक गया हड़बड़ाहट में उठा तो उसका सर लोटे से लगा, लोटा रजनी के हाँथ से छूट कर कुएं के फर्श पर गिरा और टन्न... टन्न..... टन्न....की आवाज करता हुआ नीचे क्यारियों में चला गया।

रजनी को मानो खुशियों का खजाना मिल गया हो, वो खिलखिलाकर हंसती हुई क्यारियों में उतर गई और लोटा उठा कर लायी जो मिट्टी से सन गया था और उसे धोते हुए बोली- ऐसे नहाओगे आप, बाबू जी मेरे, मै तो भागी भागी आयी तौली लेके, सोचा कि बाबू जी नहा लिए होंगे कहीं देरी न हो जाये और आके देख रही हूं तो जनाब न जाने किस सोच में डूबे हैं, किस सोच में डूबे थे मेरे बाबू?

इतने प्यार और मनोहर तरीके से पूछते हुए रजनी फिर हंसने लगी

उदयराज सम्मोहित सा उसकी अदाओं को देखते हुए खुद भी हंस दिया और बोला- बेटी तूने तो मुझे डरा ही दिया था, अरे वो मैं खेती बाड़ी के बारे में सोचने लगा था तो सोचता ही राह गया।

रजनी- सच, खेती बाड़ी के बारे में ही सोच रहे थे न, कहीं मेरी माँ की याद तो नही सता रही थी मेरे बाबू को।

उदयराज- अब तू आ गयी है तो भला क्यों सताएगी उनकी याद। (उदयराज ये बात तपाक से बोल गया पर बाद में पछता भी रहा था कि मैं ये क्या बोल गया)

रजनी- हां बिल्कुल मैं हूँ न आपका ख्याल रखने के लिए, चलो अब जल्दी से नहा लो।

उदयराज- बेटी एक बात के लिए मुझे माफ़ कर देना।

रजनी- (उदयराज के करीब आते हुए) अरे बाबू आप ऐसे क्यों बोल रहे है, ऐसा क्या किया अपने जो आप ऐसा बोल रहे हैं।

उदयराज- वो अभी 4 बजे के आस पास जब तू मेरे लिए पानी लेकर आई थी पीने के लिए तो खाट पर मैंने तुझे बाहों में ले लिया था, मुझे ऐसा नही करना चाहिए था कोई देखा लेता तो क्या सोचता, और काकी ने तो देख ही लिया था, आखिर जो भी हो रिश्ते की एक मर्यादा होती है, हर चीज़ की एक उम्र, सही तरीका और कायदा होता है, दरअसल बेटी मैं अकेलेपन की वजह से अपनो के लिए तरस गया था इसलिय.......

रजनी ने आगे बढ़कर अपने बाबू के होंठो पर उंगली रखते हुए बोला- अब बस करो, और ये क्या बोले जा रहे हो आप, आपकी बेटी हूँ मैं कोई परायी नही, क्या जब मैं छोटी थी तब आप मुझे गोद में नही लेते थे, तो अगर आज मैं बड़ी हो गयी तो क्या आप मुझे अपने उस प्यार से वंचित कर देंगे, सिर्फ इसलिये की आज मैं बड़ी हो गयी हूँ, और अगर मुझे खुद आपकी गोदी में सुकून मिलता हो तो फिर क्या कहेंगे आप? मैं आपकी बेटी हूँ, आपके सिवा कौन है मेरा, आपके बिना नही रह सकती मैं इसलिए उम्र भर आपकी सेवा के लिए आपके पास आ गयी हूँ, अगर आप भी मुझे गोद में लेकर बाहों में भरकर प्यार और दुलार नही करेंगे तो मुझे मेरी माँ की कमी कौन पूरा करेगा (इतना कहते हुए रजनी की आंखें नम हो गयी) और वो आगे बोली- बाप बेटी का प्रेम तो हमेशा निष्छल रहता है इसमें ये कहाँ से आ गया बाबू की कोई क्या सोचेगा, जो कोई जो सोचेगा सोचने दो, कोई भी चीज़ गलत तब होती है जब जबरदस्ती हो, जब मुझे आपकी बाहों में सुख मिलता है तो आप मुझे इससे वंचित न करो।

उदयराज को अपनी गलती का अहसास हुआ और उसकी मन की ग्लानि भी छूमंतर हो गयी उसने अपनी बेटी को अपनी बाहों में भर लिया, अंधेरा थोड़ा बढ़ गया था अब, रजनी अपने बाबू की बाहों में समा गई और अपनी बाहें उनकी नंगी पीठ पर लपेट दी और लपेटते ही न जाने क्यों उसकी हल्की सी सिसकी निकल गयी, ये उदयराज ने बखूबी महसूस किया फिर उदयराज उसके आंसुओं को पोछता हुआ बोला- तूने मेरी मन की उलझन दूर कर दी बेटी, मैं तुझे कभी अपने से दूर नही जाने दूंगा क्योंकि मैं भी तेरे बिना नही रह सकता, मैं भी क्या क्या सोचने लगता हूँ।

रजनी बोली- हाँ वही तो कह रही हूं सोचते बहुत हो आप, अब चलो नहा लो जल्दी।


इतना कहते ही वो फिर कुछ ध्यान आते ही चौंकी और बोली- हे भगवान मेरी कड़ाही, वो तो चूल्हे पर लाल हो गयी होगी। फिर वो अपने को उदयराज की बाहों से छुड़ा कर इतना कहते हुए भागी, उदयराज नहाते हुए अपनी बेटी को देखने लगा, भागते वक्त उसके चौड़े नितम्ब अनायास ही ध्यान खींच रहे थे, वह एक टक लगा के जब तक वो घर में चली नही गयी उसके भरपूर गुदाज बदन को देखता रहा, जाने क्यों नज़रें हटा नही पाया और इस बार उसे न जाने क्यों ग्लानि भी नही हुई। एक अजीब सी तरंग उसके बदन में दौड़ गयी, ये सब क्या था वो समझ नही पा रहा था।

नहा कर वो घर में आया और कपड़े पहने फिर मंदिर में दिया जलाने गया तो देखा की दिया पहले से ही जल रहा था, समझ गया कि रजनी ने ही जलाया होगा, मन खुश हो गया उसका ये सोचकर कि मेरे घर की लक्ष्मी आ गयी है अब, भले ही बेटी के रूप क्यों न हो, और पूजा करके बाहर आ गया, बाहर पड़ी खाट पर लेट गया, मस्त हवा चलने लगी और उसकी आंख लग गयी

तब तक काकी बाग़ से वापिस आ गयी और बच्ची को पालने में लिटा दिया और घर में गयी ये देखने की खाना बना या नही।
 
Update-9

काकी घर में आवाज़ लगाती हुई गई- रजनी! ओ रजनी बिटिया! खाना बन गया?

रजनी- हाँ काकी, लगता है आज आपको जल्दी ही भूख लग गयी। बस दाल में तड़का लगा दूँ, हो गया बस।

काकी- अरे मुझे नही री पगली! मैं तो तेरे बाबू के लिए पूछ रही थी, वो नहा के आया और बाहर खाट पे लेटे-लेटे सो गया, लगता है आज ज्यादा ही थक गया है खेतों में काम करके।

रजनी- क्या! बाबू सो गए, हे भगवान! मैं भी न, वैसे खाना बन गया है मैं उन्हें बुला कर लाती हूँ, आज मैंने उनकी पसंद का खाना बनाया तो वो सो गए जल्दी।

इतना कहते हुए वो बाहर गयी, और काकी बोली- हाँ तू बुला ला मैं दाल में तड़का लगा के निकलती हूँ खाना सबका।

रजनी- हाँ ठीक है।


रजनी बाहर आई एक नज़र अपनी बेटी पर डाला वो पालने में खेल रही थी, ठंढी हवा चल रही थी। बरामदे में लालटेन जल रही थी जिसकी हल्की रोशनी बाहर आ रही थी। अमावश्या की रात होने के कारण घाना अंधेरा था चारों तरह, एक लालटेन पशुओं के दालान के दरवाजे पर जल रही थी लेकिन उसकी रोशनी दूर तक नही थी।

रजनी अपने पिता की खाट पर बैठ गयी और उनके ऊपर झुकते हुए उनके माथे और बालों को सहलाते हुए बड़े प्यार से बोली- बाबू, ओ बाबू, तुम तो सो ही गए, चलो उठो खाना खा लो, बन गया है।

रजनी का इस तरह आधा उसके ऊपर लेटने से उसका मखमली बदन उदयराज को अंदर तक झकझोर गया, रजनी की मोटी मोटी चूचियाँ अपने पिता के सीने से दब गई, जिससे उदयराज जग गया, उसने ये सोचा भी नही था कि आज का दिन इतना खास होगा कि रजनी उसे इस तरह कामुक तरीके से उठाएगी, उदयराज इसके लिए तैयार नही था, उसका मन मयूर झूम उठा, अपनी ही सगी बेटी की भारी उन्नत चुचियाँ उसके चौड़े सीने से दबी हुई थी और उसके सख्त निप्पल उदयराज को बखूबी महसूस हुए, रजनी लगभग आधी अपने पिता पर चढ़ी हुई थी जिससे उसे न चाहते हुए भी नारी बदन से बहुत ही लज़्ज़त का अहसास हुआ और इस हरकत ने एक बार फिर बरसों से दबी हुई उसकी कामेक्छा के तार को हिला दिया, परंतु दूसरे ही छड़ उसने इस गंदे ख्याल को अपने दिमाग से झटक सा दिया और

जैसे ही उसने रजनी को स्नेहपूर्वक अपनी बाहों में भरने की कोशिश की रजनी की बेटी रोने लगी, रजनी ने झट उठकर उसे गोद में उठा लिया और उदयराज बोला- हाँ बेटी चलो, मैं हाथ मुँह धो के आता हूँ, अरे वो ठंडी हवा चल रही थी तो मेरी आँख लग गयी थी ऐसे ही, और इस गुड़िया को यहां किसने अकेले लिटा दिया।

रजनी मुस्कुराते हुए बोली- अरे वो काकी लिटा कर गयी थी पालने में। चलो आप आओ।


इतना कहकर रजनी बेटी को गोद में लेकर घर में चली गयी।

उदयराज घर में आया तो आंगन में काकी ने सबका खाना परोस दिया था, उदयराज ने देखा कि आज उसकी बेटी ने उसकी मनपसंद चीज़ बनाई है तो वो बहुत खुश हुआ और बोला- अरे वाह! आज तो मेरी बिटिया ने ये सब बना डाला।

रजनी बोली- हाँ बाबू, रोज तो मेरे ही मन का बन रहा है, तो आज मैंने सोचा कि आज वो बनाउंगी जो मेरे बाबू को पसंद है। रजनी उदयराज के बगल में बैठ गयी खाना खाने।

फिर सब खाना खाने लगे, उदयराज उंगलियां चाट चाट के खाना खा रहा था,

काकी बोली- आज तू बड़ा उंगलिया चाट चाट के खा रहा है हम्म और हंसने लगी।

रजनी भी हंसने लगी उसके चेहरे पर अलग ही चमक थी।

उदयराज- क्या करूँ काकी खाना ही इतना स्वादिस्ट बनाया है मेरी रानी बिटिया ने।

काकी- अच्छा क्या रोज स्वादिष्ट नही बनता क्या? (काकी ने छेड़ते हुए बोला, रजनी ने काकी की तरफ गोल गोल आंखें घुमाते हुए बड़ी अदा से देखा)

उदयराज- अरे बनता है बाबा, पर आज न जाने क्यों बहुत ही मन को भा रहा है।

रजनी- बाबू अब आपके लिए हर रोज़ मैं ऐसे ही खाना बनाउंगी।

काकी- अरे अपनी उंगलिया कम चाट, चाटना है तो उसकी उंगलियां चाट जिसने ये बनाया है (काकी ने फिर छेड़ते हुए कहा)

उदयराज- अरे हाँ काकी तूने सही कहा।

और इतना कहकर उदयराज ने बगल में बैठी रजनी का हाँथ पकड़कर चूम लिया और रजनी अपने बाबू की इस हरकत से जोर से हंस पड़ी, उसे अजीब सी गुदगुदी हुई।

रजनी- अरे मेरे बाबू, आपको इतना प्यार आ रहा है मेरे ऊपर, आपने मुझे गदगद कर दिया, लाओ अब मैं ही आपको अपने हाँथ से खिला देती हूं खाना। (रजनी ने मन में सोचा की देखो मेरे बाबू जी का अकेलापन दूर होने से वो अब कितना खुश हैं, मैं इनका साथ कभी नही छोडूंगी, ऐसे ही प्यार दूंगी)

उदयराज- (हंसते हुए) नही नही बेटी फिर कभी खिलाना अपने हाँथ से अभी तू खाना खा।


काकी भी बाप बेटी का ऐसा प्यार और उदयराज की बचकानी हरकत को देखकर हंसने लगी।

उदयराज बहुत खुश था उसकी जिंदगी में मानो जैसे बाहर सी आ गयी थी, इतना खुश काकी ने उसे काफी सालों बाद देखा था।

सबने मिलके खाना खाया और फिर बाहर आ गए, रजनी बर्तन धोने लगी और काकी ने गुड़िया को पालने में लिटा दिया।

उदयराज अपना बिस्तर उठा के कुएं के पास ले गया वहां सीधी ठंडी हवा आ रही थी।

रोज की तरह काकी ने अपना और रजनी का बिस्तर द्वार पे ही नीम के पेड़ के नीचे लगा दिया बिस्तर अक्सर रजनी ही लगती थी पर आज काकी ने लगाया।

इतने में रजनी बर्तन धो के बाहर आ गयी और अपने बिस्तर पर आके बैठ गयी और बोली- अरे बाबू अपना बिस्तर वहां कुएं के पास ले गए आज।

काकी- हां उधर सीधी ठण्डी हवा आती है न इसलिए।

रजनी ने गुड़िया को गोद में लिया और अपने बिस्तर पर लेटते हुए बोली- काकी

काकी- हम्म

रजनी- मुझे अपना शेरू नही दिखाई दिया जब से मैं आयी हूँ। कहाँ गया वो? (शेरू उदयराज के कुत्ते का नाम था जब रजनी की शादी नही हुई थी उस समय उदयराज उसे नदी के पास से ले आया था उस वक्त शेरु छोटा था जिसे रजनी ने पाला था)

काकी- क्या बताऊँ बेटी जब से तेरे बापू अकेले हुए, शेरु भी अकेला सा हो गया था फिर उसकी आदत बिगड़ गयी और वो घुमक्कड़ किस्म का हो गया है, 3-4 दिन में एक बार ही अपने घर आता है 1, 2 दिन रहेगा फिर इधर उधर घूमना चालू कर देगा। देखो क्या पता कल सुबह घूमता फिरता आये अपने घर।

रजनी- शेरु अपना कुत्ता कितना अच्छा था न, मेरे न रहने से देखो सब जैसे बेसहारा हो गए थे इतना कहके रजनी थोड़ी भावुक सी हो गयी फिर बोली अच्छा काकी उसकी कुतिया भी होगी न जो हमेशा उसके साथ रहती थी, जिससे उसके कई बच्चे हुए थे, वो सब कहाँ है?

काकी- वो तो मर गयी बेटी, कई बच्चे भी मर गए, कुछ को दूसरे गांव वाले उठा ले गए पालने के लिए, अभी इस वक्त तो उसकी एक बेटी है।जिसका नाम मैंने बीना रखा है।

रजनी- अच्छा, तो वो कहाँ है, कितनी बड़ी है।

काकी- अरे वो भी तेरी तरह अपने बाप से बहुत प्यार करती है, जहां जहां शेरु जाएगा बीना भी उसके पीछे पीछे जाएगी, बीना भी अब काफी बड़ी हो गयी है, लगभग शेरु के बराबर ही हो गयी है, सफेद रंग की है।

रजनी- अच्छा, इतना प्यार है बाप-बेटी में

काकी- हम्म, और क्या, अगर शेरु को खाना दो, तो जबतक बीना आ नही जाएगी तबतक वो अकेले खाना छूता भी नही है।

रजनी को बड़ा आश्चर्य हुआ और वो उनको देखने के लिए उतावली हो गयी और काकी से बोली- देखो न काकी मेरे न होने की वजह से मेरे शेरु को भी दर-दर भटकना पड़ रहा है, सब कितना बिखर-बिखर सा गया था न, लेकिन अब मैं सब सही करूँगी।

काकी- हाँ बेटी बिल्कुल, (काकी आगे बोली) आजकल तो शेरु कुछ अलग ही शरारत करता है बीना के साथ, एक दो दिन देखा था मैंने।

रजनी- क्या? क्या शरारत करता है शेरु, कोई बाप अपनी बेटी से शरारत करेगा क्या?

काकी- अरे हाँ करता है वो।

रजनी- ऐसा क्या करता है वो (उत्सुकता से)

काकी- अरे वो बीना का पिशाब का रास्ता सूंघता है (काकी थोड़ा फुसफुसाते हुए सही शब्द का प्रयोग न करके कुछ इस तरह बोली)

रजनी- ईईईशशशशश.....क्या काकी! सच में, हे भगवान!, बेटी है वो उसकी, ऐसा क्यों करता है वो।

काकी- मुझे लगता है कि बीना अब बड़ी हो गयी है, वो यौनाग्नि में गरम हो रही है धीरे धीरे, अब ये तो जानवर हैं बेटी, इनके लिए क्या रिश्ता नाता, पर देखने में मजा आ जाता है, कैसे सूंघता है वो बीना की.....बू

रजनी जानती थी कि काकी क्या बोलने वाली है वो भी थोड़ी गरम हो गयी थी ये सुनकर तो वो बात काटते हुए बोली- कब देखा था काकी अपने?

काकी- अरे यही कोई 4 दिन पहले।

रजनी- पर काकी मुझे बड़ी हैरानी हो रही है सुनके, वो बेटी है उसकी, सगी बेटी।

काकी- बेटी ये नशा ही ऐसा होता है, जब चढ़ जाता है तो कुछ नही देखता, और फिर वो तो जानवर हैं उन्हें इस बात से कोई फर्क नही पड़ता। तुझे दिखाउंगी किसी दिन।


रजनी काफी गर्म हो जाती है ये सोचकर कि एक बाप अपनी ही सगी बेटी की बूर कैसे सूंघ सकता है, कैसा लगता होगा उस वक्त, उसकी सांसें उखड़ने सी लगती है, कितना गलत है ये, फिर भी इसमें मजा क्यों है? सोचकर ही कैसा लग रहा है। बड़ी मुश्किल से अपने को संभाल कर काकी को सोने को बोलकर खुद भी सोने लगती है और कुछ ही पल में नींद के आगोश में चली जाती है।
 
Update-10

उदयराज रोज की तरह सुबह जल्दी उठा जाता है आज उसको अपना एक दूर वाला खेत जोतना था तो वो खेतों में जुताई के लिए अपने बैलों को तैयार करने लगता है।

रजनी और काकी भी जल्दी उठकर नाश्ता तैयार करती है।

इतने में उदयराज का दोस्त बिरजू उनके घर आता है, रजनी और काकी घर में होती है, उदयराज बाहर बैलों को तैयार कर रहा होता है, बिरजू को आते हुए देखता है।

बिरजू- "जय राम जी की उदय भैया" (बिरजू उदयराज का मित्र था वो उदयराज को भैया कहकर ही बोलता था, उदयराज का मुखियागीरी का ज्यादातर काम बिरजू ही देखता था)

उदयराज- "जय राम जी की बिरजू" अरे आओ बिरजू! बैठो, कहो कैसे आना हुआ इतने सवेरे सवेरे, सब ठीक तो है, 3 4 दिन से दिखे ही नही, कहाँ हो भई।

बिरजू- अरे भैया! आपको तो पता ही है गांव में कितना काम है, फुरसत ही नही मिलती। (कहते हुए खाट पे बैठ जाता है)

उदयराज- अरे तू नही होता...तो मैं तो पागल ही हो जाता, कितना काम संभालता है तू मेरा।

उदयराज काकी को जोर से आवाज लगता है- काकी, अरे बिरजू आया है, चाय-वाय बन गयी हो तो ले आओ जरा!

काकी की घर के अंदर से हल्की आवाज आती है - हाँ, ला रहे हैं, उनको बोलो की बैठें खाट पे।

बिरजू- अरे! ये तो मेरा फ़र्ज़ है भैया, आपके प्रति भी और गांव वालों के प्रति भी।, अरे आज सुबह सुबह बैलों को तैयार कर लिया, खेतो की जुताई करनी है क्या?

उदयराज- हां, वो नदी के पास वाला खेत है न, सोच रहा हूँ इस बार धान की फसल वहीं लगाऊंगा।

बिरजू- हां ठीक रहेगा, उधर नदी की वजह से पानी भी भरपूर रहेगा, जुताई तो मुझे भी अपने खेत की करनी थी, पर क्या करूँ, वक्त ही नही मिल पा रहा है।

उदयराज- अरे तो तू परेशान क्यों होता है, मैं कर दूंगा भई। बता देना जब करना हो।

बिरजू- ठीक है भैया, अच्छा देखो मैं बातों बातों में जिस काम के लिया आया था वो ही भूल गया कहना।


इतने में काकी दोनों के लिए चाय और पोहा लेके आती है और बिरजू को देखके बोलती है-अरे बिरजू कैसा है, आज इतनी सुबह सुबह?

बिरजू- नमस्ते काकी! अरे हां वो कुछ काम था उदय भैया से, तो सोचा सुबह ही मिल लूं फिर कहीं किसी काम से न निकल जाए कहीं, और आ के देख रहा हूँ तो बैल तैयार ही कर रहे थे।

काकी- अच्छा! ले चाय पी, और सब ठीक है न?

बिरजू- हाँ काकी सब ठीक है।


काकी चाय रखके अंदर घर में जाने लगती है ये बोलते हुए की तुम दोनों चाय पियो मैं जरा रजनी का हाँथ बंटा लूं काम में।

इतना सुनते ही बिरजू बोला

बिरजू- अरे रजनी बिटिया आयी हुई है क्या, कब आयी?

काकी- हाँ आयी है यही कोई 5 6 दिन हुए, अभी जरा व्यस्त है नही तो आती बाहर।

बिरजू- चलो कोई बात नही फिर कभी मिल लूंगा, ठीक तो है न वो।

काकी- हाँ ठीक है (इतना कहकर काकी घर में चली जाती है)

उदयराज और बिरजू चाय पीने लगते है और पोहा खाने लगते हैं

उदयराज- हां बोल तू क्या बोल रहा था, किस काम से आया था।

बिरजू- अरे हाँ! भैया मैं ये कहने आया था कि पश्चिम की तरफ जो नहर, नदी से निकलकर हमारे गांव की सरहद से होते हुए जा रही है, जिससे हमारे गांव के खेतों और बगल वाले गांव के खेतों की सिंचाई भी होती है उसको थोड़ा चौड़ा करने की सोच रहा था ताकि ज्यादा पानी आ सके, उसी का मुआयना करने के लिए जरा चलना पड़ेगा आपको। गांव वालों का भी यही कहना है कि एक बार मुखिया जी को दिखा कर उनकी सहमती लेनी होगी।

उदयराज- हम्म, ये तो अच्छी बात है, नहर चौडी हो जाएगी तो पानी भी ज्यादा आएगा और अतिरिक्त मिट्टी पड़ने से उसके दोनों किनारे के बांध और मजबूत हो जायेगें।

बिरजू- हां वही तो! पर एक बार आपको चलकर देखना होगा।

उदयराज- हाँ हाँ क्यों नही! अभी तो मैं खेत पर जा रहा हूँ, वहां से फुरसत होके मैं नहर के पास आ जाऊंगा दोपहर तक तुम वहीं मिलना।

बिरजू- ठीक है भैया, मैं और हरिया, परशुराम वगैरह वही मिलेंगे आपको।

उदयराज- ठीक है


उदयराज और बिरजू चाय पी चुके थे, इतना कहकर बिरजू चला गया, फिर उदयराज ने भी काकी को बुला कर सारी बात बताई और ये बोलकर की वो दोपहर को खाना खाने आएगा और फिर नहर के काम के सिलसिले में फिर जाएगा, रजनी को बोल देना की वो चिंता न करे और बैल लेके चला जाता है।

रजनी और काकी घर का सारा काम निपटा के अपना नाश्ता ले के बाहर द्वार में बैठी नीम के पेड़ के नीचे नाश्ता कर रही होती है, उस वक्त सुबह के 8 बज चुके थे सुबह के सूरज की रोशनी पेड़ों के पत्तों से छनकर हल्की हल्की आ रही थी, सुबह का बहुत ही मनमोहक वातावरण था, कि इतने में शेरु सामने कुएं की तरफ से आता हुआ दिखाई देता है।

रजनी- काकी देखो सामने! शेरु आ गया।

काकी- हां! लो आज आ ही गया, वो देख इधर ही आ रहा है। इत्तेफ़ाक़ देखो अभी कल ही इसकी चर्चा हो रही थी आज आ ही गया।

शेरु ने नजदीक आके जैसे ही रजनी को देखा तो कूं कूं कूं करके रजनी के पैर चाटने लगा, रजनी को गुदगुदी हुई तो वो हंसते हुए उसके सर को सहलाते हुए बोली- अरे मेरे शेरु! कैसा है तू? कमजोर तो हो गया है काकी पहले से।

काकी- हाँ कमजोर तो हो ही गया है, बिचारा

रजनी उसकी पीठ और सर सहलाते हुए बोली- तेरी बेटी बीना कहाँ रह गयी? हम्म

शेरु काफी कूं कूं करता हुआ रजनी के आगे पीछे गोल गोल घूमता फिर उसके पैर चाटने लगता, कभी हाँथ चाटता।

काकी- वो भी आती होगी पीछे पीछे

रजनी- अच्छा तू रुक, तू भूखा होगा न, तेरे लिए खाना लाती हूँ।

इतना कहकर रजनी घर में गयी और दूध और बिस्किट मिक्स करके ले आयी।

पर शेरु खा ही नही रहा था, बार बार खाने की तरफ ललचाई नज़रों से देखता फिर कूं कूं करके रजनी के पैरों में इधर उधर गोल गोल घूमता।

रजनी बोली- काकी देखो भूख इसको लगी है फिर भी खा नही रहा, खा न क्या हुआ?

काकी बोली- मैंने बताया नही था ये बिना अपनी बेटी के खाने को सूंघेगा तक नही।

रजनी- अरे हां काकी, सच में, देखो तो कैसे भूख से तड़प रहा है पर सूंघ तक नही रहा खाने को, अभी तक दूसरा कुत्ता होता तो साफ कर चुका होता, आखिर ये मेरा कुत्ता है, मुझे नाज़ है इसपे। कितना प्यार करता है अपनी बेटी से देखो।

और ऐसा कहते हुए बैठकर शेरु को अपनी गोद में लेकर उसकी पीठ सहलाने लगती है

काकी- अरे अभी उसको ज्यादा मत छू, न जाने कहाँ कहाँ किस किस के घर घूम फिर के आया है, किसी को भी प्यार करेगी तो ढंग से ही करने लगेगी।

रजनी- काकी कोई बात नही कितने बरसों बाद तो मिली हूँ अपने शेरु से, अभी मैं नहाने जाउंगी तो इसको भी पकड़कर नहला दूंगी, और फिर इसको कहीं जाने नही दूंगी।

काकी- हाँ अब देखना ये खुद ही कहीं जाएगा नही, तुझे देख लिया है न।

तभी रजनी को बीना का ध्यान आता है- काकी ये बीना कहाँ मर गयी, आप तो बोल रही थी कि अपने बाप के पीछे पीछे ही लगी रहती है अभी तक तो मुझे दिखी नही, कोई आशिक मिल गया क्या उसको रास्ते में जो अपने बाप को भूल गयी।

इतना कहकर रजनी जोर से हंस दी।

काकी- अरे आशिक तो उसका....खुद उसका बाप ही है, किसी और को तो वो घास भी न डाले। इसलिये ही तो उसे बड़े प्यार से सूंघने देती है

इस बात पर रजनी ने शर्माते और मुस्कुराते हुए काकी को देखा, और उसे कल रात की बात याद आ गयी।

रजनी बोली- हाँ तो क्यों न दे सूंघने आखिर उसका पिता उसका इतना ख्याल रखता है, इनाम तो देगी न उनको (रजनी ने शर्माते हुए कहा)

काकी ने तपाक से कहा- ख्याल तो उदयराज भी तेरा बहुत रखता है, हम्म्म्म

रजनी शर्म से जैसे जमीन में गड़ गयी, बोली- धत्त! काकी, बहुत बेशर्म हो तुम।

काकी (मंद मंद मुस्कुराते हुए)- आखिर इनाम तो मिलना ही चाहिए, न

रजनी तो शर्म से बिल्कुल लाल हो गयी, कुछ देर कुछ बोल न पाई।

फिर बोली- आप बहुत गंदी हो, (और मुस्कुराने लगी।)


इतने में ही बीना भी दिखाई दी आती हुई, वो भी आके काकी के आस पास घूमने लगी क्योंकि रजनी को वो पहचानती नही थी, फिर रजनी ने जब खाने की कटोरी आगे बढ़ाई तो दोनों बाप बेटी खाने लगे रजनी अंदर जा के रोटी भी ले आयी और दोनों को पेट भर खाना खिलाया।

फिर रजनी मन में ही मंद मंद मुस्कुराते हुए, काकी की बात सोचते हुए नहाने चली गयी, और शेरु और बीना को भी पकड़कर नहला दिया, दोनों साफ सुथरे हो गए।

दोपहर को उदयराज आया तो रजनी ने नहाकर आज जो पहना था उसे देखकर मन्त्रमुग्ध सा हो गया, रजनी ने नीले रंग की साड़ी और काले रंग का ब्लाउज पहन रखा था, उसका गोरा रंग अलग ही चमक रहा था, गोरे गोरे सुंदर चेहरे पर जो तेज था उसे देखकर ही आज उदयराज को नशा सा हो गया, बड़े बड़े उन्नत स्तन बड़ी मुश्किल से ही ब्लॉउज में समा रहे थे, अनायास ही उदयराज की नज़र बार बार अपनी ही सगी बेटी की चुचियों पर जा रही थी और वो बार बार अपने आप को गंदे ख्याल से बाहर निकलता।

उदयराज अंदर बरामदे में बैठा था काकी उस वक्त बाहर थी

रजनी पानी और गुड़ लेकर आई, तो उदयराज बोला- आज तो बहुत ही खूबसूरत लग रही है मेरी बिटिया।

रजनी मुस्कुरा दी और बोली- हाँ, आपकी बेटी हूँ न तो लगूंगी ही, पर आप मुझसे सुबह मिले नही न, चले गए ऐसे ही (रजनी ने शिकायत वाले लहजे से कहा)

उदयराज- अरे मेरी बिटिया रानी, मुझे लगा कि तुम काम में व्यस्त हो तो मैं काकी को बता कर चला गया, क्या मेरी बिटिया नाराज़ हो गयी क्या मुझसे?

रजनी- ऐसा कभी हो सकता है क्या, की मैं अपने बाबू जी से नाराज हो जाऊं, मैं चाहे कितनी भी व्यस्त रहूँ पर अपने बाबू जी के लिए हमेशा मेरे पास वक्त है।

उदयराज- इतना प्यार करती हो अपने पिता से।

रजनी- बहुत, आपके बिना मैं जी नही सकती बाबू।

उदयराज ने उठकर रजनी को बाहों में भर लिया, रजनी भी जल्दी से अपने बाबू की बाहों में समा गई।

एक बार फिर रजनी के गुदाज मदमस्त बदन ने उदयराज को मचलने पर मजबूर कर दिया, रजनी को बाहों में लेते वक्त तो उसकी मंशा भावनात्मक प्रेम की थी पर जैसे ही वो अपनी सगी बेटी के जवान, मदमस्त मांसल बदन से चिपका, वो अपने आप को संभाल न पाया और रजनी के कामुक बदन से मदहोश हो गया, एक बार फिर रजनी की उन्नत, कठोर चुचियाँ उदयराज के सीने से दब गई और मसल उठी।

कुछ देर रजनी उसको और वो रजनी को देखते रहे फिर उदयराज थोड़ा भारी आवाज से बोला- तो मैं कौन सा तेरे बिना अब रह सकता हूँ, तू तो जान है मेरी।

पर वो जल्द ही अपने आप को संभाल ले गया ये सोचकर कि कहीं रजनी कुछ और न समझ बैठे और अनर्थ हो जाये

परंतु उसे इतना तो अहसास हो रहा था कि रजनी भी उसकी बाहों में आने में जरा भी देर नही करती, वो भी कुछ अनजाना सा सुख उसकी बाहों में तलाशती है।

इतने में काकी के कदमों की आवाज सुनाई थी तो वो अलग हो गए।

रजनी ने उदयराज के लिए खाना परोसा और फिर उदयराज खाना खा के नहर के काम के सिलसिले में रजनी को बताकर चला गया ये बोलकर की वो शाम तक आएगा।

रजनी और काकी ने भी खाना खाया और रजनी ने फिर शेरु और बीना को भी खाना दिया।
 
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