Incest पाप ने बचाया - Page 4 - SexBaba
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Incest पाप ने बचाया

Update- 31

उदयराज ने अपने किये जाने वाले कर्म को जानने के लिए दिए गए कागज को पढ़ने के लिए खोला, सफेद कागज पर सुनहरे रंग से लिखे अक्षर प्रकट हो गए, उदयराज यह चमत्कार देखकर ही दंग रह गया और पढ़ने से पहले एक बार वो कागज उसने माथे चढ़ा लिया, फिर उसने पढ़ना शुरू किया, उसमे लिखा था-

"उदयराज तुम्हारे पुर्वज द्वारा नियति के नियमों में छेड़छाड़ करने से कुपित नियति द्वारा किये गए अव्यवस्थित संतुलन को दुबारा संतुलित कर सही रास्ते पर लाने के लिये तुम्हे जो कर्म करना होगा वो है "महापाप कर्म"




व्यभिचार के रास्ते पर चलकर तुम्हे एक महापाप करना होगा, और ऐसा कर तुम्हे अपने कुल में पापकर्म को स्थान देकर उसकी स्थापना करनी होगी, इस कर्म की शुरुवात तुमसे होगी जो आनेवाले भविष्य में तुम्हारे कुल के लिए जीवनदायी होगी, तुम्हे यह महापाप अपना कर्म समझकर आनंद लेते हुए करना है।

इसके लिए तुम्हे आने वाली अमावस्या की रात से ठीक सात दिन पहले, अपने घर की किसी ऐसी स्त्री जिससे तुम्हारा खून का रिश्ता हो और जो बच्चे को स्तनपान कराती हो, मेरे द्वारा दिये गए दिव्य तेल से बिना उसका चेहरा देखे और बिना उसका कोई और अंग छुए सिर्फ उसकी योनि (बूर) को रात के 12 बजे छूना है, हाथ में तेल लगा कर उसकी योनि (बूर) का मर्दन 10 मिनट तक करना है और उससे निकलने वाले रस को उंगली से निकलकर पहले स्वयं चाटकर ग्रहण करना है फिर उसे चटाना है, रस को पांच बार चाटना और चटाना है, ध्यान रहे इस दौरान उसके शरीर के किसी भी और अंग पर तुम्हारी नज़र नही पड़नी चाहिए। वह स्त्री उस रात ठीक 12 बजे घर के किसी एकांत कमरे में तुम्हारा इंतज़ार करेगी, उसका शरीर पूर्ण रूप से चादर से ढका होगा, कमरे में कपूर की खुश्बू फैली होगी और कमरे के दरवाजे पर एक हल्की रोशनी का दिया जलता होगा।

ऐसा तुम्हे तीन रात करना है, फिर चौथी रात तुम्हे उस स्त्री को कमर से नीचे निवस्त्र कर उसकी योनि को खोलकर देखना और सूंघना है तथा कमर से नीचे की नग्नता के दर्शन करना है, फिर पांचवी रात पुनः तुम्हे उस स्त्री को कमर से नीचे निवस्त्र कर उसकी योनि को देखना, सूंघना और चुम्बन करना है और निकलने वाले रस को मुँह लगा के उसका रसपान करना है। ध्यान रहे इस दौरान भूल कर भी उसका चेहरा नही देखना और न ही शरीर का कोई और अंग छूना और देखना है, इतना ही नही इन सात दिनों के अंदर दिन में भी तुम्हे उस स्त्री के सामने नही पड़ना है, सिर्फ रात को ये कर्म करना है।

अगली छठी रात अब तुम्हे उसी कमरे में अपना पूरा शरीर चादर से ढककर लेटना है वह स्त्री तुम्हे कमर से नीचे निवस्त्र कर तुम्हारे लिंग का दर्शन करेगी, उसे छुएगी, सूंघेगी, उसका मर्दन करेगी और उसका चुम्बन लेगी, बाकी सब वैसे ही होगा, कमरे में कपूर की महक होगी और दरवाजे पर एक छोटा सा दिया जलता रहेगा।

छठी रात के बाद सातवें दिन, सुर्यास्त के बाद तुम उस स्त्री को देख सकते हो।

दिन में वह स्त्री घर में किसी जगह, कागज पर अपने मन की इच्छा लिखकर, छुपाकर रखेगी तुम्हे वह ढूंढकर पढ़ना है और उस कागज में लिखे अनुसार उस स्त्री की मन की इच्छा की पूर्ति अमावस्या की रात को करना होगा। ठीक उसी रात को तुम्हे कुलवृक्ष की जड़ में चौथी कील भी ठोकनी होगी और स्त्री से दूध भी अर्पित कराना होगा।

वह स्त्री कोई और नही तुम्हारी पुत्री ही होगी, क्योंकि वही एक स्त्री तुम्हारे परिवार में बची है जिससे तुम्हारा खून का रिश्ता है इसलिए यही सब कर्म विधि मैंने तुम्हारी पुत्री के कागज पर भी लिखा है, जिस दिन से ये कर्म शुरू होगा ठीक उसी दिन से तुम्हे न अपनी पुत्री को देखना है न उसके सामने पड़ना है।



मेरा आशिर्वाद सदा तुम्हारे साथ है, धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा, सदा खुश रहो।"

कर्म पत्र पढ़कर तो उदयराज को ऐसा लग जैसे पृथ्वी और आकाश एक साथ विपरीत दिशा में घूम रहे हैं उसने एक बार नही दो तीन बार अच्छे से पूरा-पूरा कर्म को पढ़ा। विश्वास नही हुआ उसे की नियति ये चाहती है जो उसके मन में थोड़ा थोड़ा पहले से ही है, उसका तो मन मयूर ही झूम उठा। तभी वह भागकर रजनी वाले कमरे में गया तो देखा रजनी भी बेसुध सी खड़ी यही सोच रही थी, उसे भी विश्वास नही हो रहा था, दोनों की नजरें मिली तो उदयराज मुस्कुराया और रजनी ने शर्मा के सर नीचे कर लिया।

उदयराज ने रजनी के चेहरे को ठोड़ी पर हाथ लगा के उठाया तो उसकी आंखें बंद थी, उसने धीरे से बोला- आज अमावस्या की रात से ठीक पहले का आठवाँ दिन है, कल सातवां दिन होगा, कल सुबह से मै तुम्हें नही देखूंगा, न तुम्हारे सामने पडूंगा।

रजनी की आंख बंद थी वो सुन रही थी उसके होंठ कंपन से थरथरा जा रहे थे।

उदयराज- मुझे तो लगा था कि आज रात मुझे मेरी अनमोल चीज़ मिल जाएगी पर नियति ने उसे 7 दिन पीछे धकेल दिया है, पर कोई बात नही मैं बर्दाश्त कर लूंगा।

रजनी ने धीरे से आंखें खोल के उदयराज की आंखों में देखा और बोली- बाबू, कल रात से रोज 5 रात तक मैं घर के पीछे वाली कोठरी में आपका रात के 12 बजे इंतज़ार करूँगी, और छठी रात आप मेरा इंतज़ार करना, इस दिनों हम एक दूसरे को न देखेंगे, न एक दूसरे के सामने पड़ेंगे, जैसा कि उसमे लिखा है। फिर सातवें दिन, मैं एक पर्ची में अपने मन की इच्छा उसमे लिख के घर में कहीं छुपा दूंगी आपको वो ढूंढकर उस पर्ची में लिखे अनुसार आगे का कर्म करना है और उस दिन सूर्यास्त के बाद हम एक दूसरे को देख सकेंगे, वह अमावस्या की रात होगी, उसी रात कुलवृक्ष में कील भी गाड़नी है, अब आपके और मेरे सब्र का इम्तहान है बाबू, हमे इसे बखूबी निभाना है।

उदयराज ने रजनी के चहरे को अपने हाथों में लेकर बोला- हाँ मेरी बच्ची, मेरी बेटी, बस आज की रात ही हम एक दूसरे को देख सकते हैं फिर तो 6 दिन बाद ही देख पाएंगे, और उदयराज गौर से रजनी को देखने लगा, उसके चेहरे को निहारने लगा, रजनी भी एक टक अपने बाबू को निहारने लगी फिर एकएक शर्माकर उनसे लिपट गयी, उदयराज ने उसे बाहों में कस लिया।

उदयराज- बेटी लेकिन हमारे बीच कोई तो ऐसा होना चाहिए जो जरूरत पड़ने पर सब संभालता रहे, मान लो मैं दिनभर बाहर रहूंगा और तुम घर में, परन्तु कभी कोई काम ही पड़ गया या तुम्हे मुझे खाना ही परोसना हो, या रात को बच्ची को ही संभालने वाला कोई तो होना चाहिए, ताकि हमे कर्म करने में कोई अड़चन आ आये।

रजनी- बाबू आप उसकी चिंता छोड़िए, वो मैं काकी को समझा दूंगी अपने तरीके से, उनको कुछ बताऊंगी नही पर फिर भी समझा दूंगी, वो सब संभाल लेंगी।

उदयराज- मेरी बेटी कितनी समझदार है, और कहते हुए वो उसके गालों को चूमने लगा।

रजनी ने आंखें बंद कर ली और अपने बाबू से लिपट गयी।

तभी नीलम की अम्मा आवाज लगाती हुई उनके घर की तरफ आ रही थी, ये सुनते ही उदयराज और रजनी झट से अलग हो गए और रजनी ने वो कागज छुपा दिया, भागकर बाहर आई- हाँ अम्मा क्या हुआ? बच्ची रो रही है क्या?

नीलम की अम्मा- हाँ बिटिया ये रो रही है, ले इसको दूध पिला दे और सब लोग चलो अब, खाना भी बन गया है, सब लोग खाना खा लो, काकी भी वहीं बैठी हैं, बस सब तुम लोगों का ही इतंज़ार कर रहे हैं।

रजनी- हाँ अम्मा चलती हूँ।

उदयराज ने भी अपना कागज छुपा के रख दिया और फिर रजनी और उदयराज दोनों लोग नीलम की अम्मा के साथ उसके घर आ गए।

आज पूरा गांव दिए कि रोशनी से जगमगा रहा था, बिरजू के घर सबने एक साथ खाना खाया, काफी बातें और हंसी मजाक भी हुआ फिर रजनी, काकी और उदयराज उन लोगों का धन्यवाद करके अपने घर आ गए।

उदयराज ने पहले की तरह अपनी खाट कुएं के पास लगाई और सोने के लिए लेट गया।

रजनी और काकी ने भी पहले की तरह अपनी खाट नीम के पेड़ के नीचे लगाई और लेटकर बातें करने लगी।

रजनी ने काकी को अपनी तरह से समझा दिया, उसने असल बात नही बताई, बस अपनी तरह से समझा दिया।

काकी ने भी उसको निश्चिन्त होकर कर्म करने के लिए बोला, काकी को भी लगा कि कोई ऐसा कर्म है जो गुप्त रूप से करना है।

फिर काकी सो गई पर रजनी की आंखों में नींद नही थी, वो बेचैन थी, वही हाल उदयराज का भी था वो भी अपनी खाट पर करवटें बदल रहा था। काफी देर सोचते सोचते फिर न जाने कब दोनों की आंख लग गयी।
 
Update- 32

अगले दिन सुबह उदयराज जल्दी ही उठ गया, उसे लगा वह काफी जल्दी उठ गया है कहीं रजनी पर उसकी नज़र न पड़ जाए, पर रजनी तो उससे भी पहले उठकर घर में जा चुकी थी।

काकी उठकर अपनी खाट पर बैठी थी, उदयराज ने सुबह का नित्यकर्म किया और काकी ने उसको नाश्ता लाकर दिया, उसने नाश्ता किया और आज अमावस्या की रात से ठीक सातवें दिन का पहला दिन था, रात का उसे बहुत बेसब्री से इंतज़ार था, अपनी किस्मत पर वो फूला नही समा रहा था, सोच सोच कर अपने में ही मुस्कुराये जा रहा था फिर अपने दिल पर काबू करते हुए वो उठा, बैलों को तैयार किया और खेतों की तरफ जाने लगा, बिरजू के घर के नजदीक आकर उसने सोचा एक बार बिरजू से मिल ले।

वह वहीं बैलों को एक पेड़ के पास बांधकर बिरजू के घर गया, बिरजू अभी नाश्ता कर रहा था उदयराज को देखते ही उठ खड़ा हुआ।

बिरजू- अरे भैया आप इतनी सुबह सुबह, आओ बैठो, नीलम, ओ नीलम, अपने बड़े बाबू के लिए नाश्ता ले आ (नीलम उदयराज को बड़े बाबू कहकर बुलाती थी)

उदयराज- अरे नही बिरजू मैं नाश्ता करके आया हूँ, मैं जरा खेतों में जा रहा था बैल लेके सोचा तेरे से मिलता चलूं। (इतना कहते हुए उदयराज खाट पे बैठ गया)

तभी नीलम उदयराज के लिए चाय और महुवे का नमकीन पोहा लेके आयी और आते ही उसने उदयराज को प्रणाम किया।

उदयराज ने नाश्ता किया हुआ था लेकिन फिर भी नीलम की जिद पर उसे ठूस ठूस के खाना पड़ा।

उदयराज- नीलम तू मेरी बिटिया रजनी से कम नही है, वो भी मुझे ऐसे ही जिद करके खिलाती है।

नीलम- बड़े बाबू आपका पद तो पिता से भी ऊंचा है आप तो मेरे बड़े बाबू हैं तो भला मैं आपकी सेवा में क्यों पीछे रहूँगी।

बिरजू- ये बात तो सही है भैया, भले ही बेटा एक बार को पिता की सेवा में पीछे हट जाए पर ये बेटियां कभी पीछे नही हटती, इसलिए ये बेटियां पिता के दिल के इतने करीब होती हैं (बिरजू ने नीलम को देखते हुए कहा)

उदयराज- दिल के करीब नही रहती बिरजू, बल्कि दिल में बसी होती हैं।

नीलम यह सुनकर गदगद हो गयी और अपने बाबू बिरजू को तिरछी नजरों से देखकर शर्मा कर घर में चली जाती है।

उदयराज बिरजू से कुछ गांव के काम की बात करता रहा फिर उठकर अपने खेतों में चला गया।

उदयराज बार बार अपने ध्यान को दूसरे कामों में लगाने की कोशिश करता रहा पर बार बार उसका मन रात में मिलने वाली खुशी को महसूस कर वासना से भर जाता। वो बार बार सोचता कि आज रात को जिंदगी में पहली बार वो अपनी ही सगी बेटी के साथ ऐसा करेगा, कितना मजा आएगा, कैसी होगी रजनी की? कैसा लगेगा जब मैं उसको छुउंगा, बरसों से मैं स्त्री की योनि के लिए तरस गया हूँ और आज मैं अपनी ही बेटी की बूर छुउंगा, उसको छेड़ूँगा, मसलूंगा, यही सब सोच सोच के वो कामोन्माद में पागल हुआ जा रहा था।

यही हाल घर में रजनी का भी था, उसके लिए भी दिन काटना किसी पहाड़ से कम नही था, आज उसने अपनी बेटी को दिन में सुलाया ही नही ताकि वो रात भर सोती रहे और उसे रात में कोई परेशानी न हो, वो निश्चिन्त होकर अपने बाबू के साथ महापाप कर उसका आनंद ले सके।

उदयराज दोपहर को भोजन करने के लिए घर आया, काकी ने उसको खाना दिया, खाना खाकर वो फिर से खेतों में चला गया।

खैर किसी तरह दिन बीता शाम हुई और उदयराज घर आया, बैलों को हौदे में बांधकर चारा डाल दिया।

नाहा धोकर तरो ताज़ा हो गया, फिर खाट उठायी और कुएं के पास जाकर लेट गया, अंधेरा हो चुका था, दिल की धड़कने बढ़ गयी थी।

खाना अभी बना नही था, रजनी घर में जल्दी जल्दी बना रही थी, बेटी तो उसकी आज जल्दी ही सो गई थी, दिन में रजनी ने सुलाया जो नही था।

आखिर खाना बन गया और काकी ने उदयराज को खाना बाहर ही लाकर दिया, उदयराज के खाना खा लेने के बाद घर में रजनी और काकी ने भी खाना खाया, फिर काकी बाहर आके रजनी की बिटिया को अपनी खाट पे लेके लेट गयी।

उदयराज भी अपनी खाट पे लेट के बड़ी बेसब्री से इतंज़ार करने लगा, अभी तो रात के 10 बजे थे, सीधा सीधा 2 घंटा बचा था, बिस्तर पर करवटें बदल बदल के उसका बुरा हाल हो गया, कभी लेटता, कभी उठकर धीरे धीरे टहलने लगता, फिर लेट जाता।

उधर रजनी ने आज घर की पीछे वाली कोठरी में जा के उसके अंदर पड़ी खाट बाहर निकाल कर उसमे एक चटाई बिछा दी, दिन में फूलों से बनाई हुई मालाओं से उसने पूरी कोठरी सजा दी और उसमे मिट्ठी की कटोरी में कुछ कपूर रखकर जला दिए, कपूर और फूलों की महक ने पूरी कोठरी को सुगंधित कर डाला, यहां तक कि उसकी सुगंध आंगन तक आ रही थी।

फिर रजनी आंगन में आके पड़ी हुई खाट पर लेट गयी अभी काफी वक्त बचा था, इंतज़ार तो उससे भी नही हो रहा था।

आखिरकार जैसे तैसे 11:30 हो गए, रजनी की सांसे तेज चलने लगी, वह खाट से उठी और एक हल्का पीला चादर लिया, घर के सारे दिये और लालटेन बुझा दिए बस एक छोटा सा घी का दिया जलाकर कोठरी के दरवाजे पर रख दिया।

बाहर का मेन दरवाजा खुला हुआ था बस वैसे ही उसके किवाड़ सटाये हुए थे।

रजनी कोठरी में जाके चादर ओढ़कर चटाई पर लेट गयी, और बेसब्री से अपने बाबू का इंतज़ार करने लगी, सांसे उसकी भारी हो चली थी। मंद मंद वो मुस्कुराये जा रही थी, आज क्या होने वाला है।

रात का सन्नाटा छा चुका था, सब सो गए थे।

उदयराज धीरे से अपनी खाट से उठा, धीरे धीरे चलता हुआ वो घर की तरफ बढ़ने लगा, जब काकी की खाट के पास से गुजरा तो देखा कि काकी सो रही थी।

आखिरकार वो घर के मेन दरवाजे पर पहुँचा, दरवाजा हल्का सा आपस में सटाया हुआ था उसने हल्का हाथ लगा के दरवाजा खोला, बस इतने से ही रजनी जान गई कि उसके बाबू घर में आ गए हैं वो सिरह उठी, चादर को उसने अच्छी तरह तान के अपना पूरा बदन उससे ढक लिया।

जैसे ही उदयराज ने दरवाजा खोला पूरे घर में फैल चुकी कपूर और फूल की महक उसके नथुनों में पड़ी, इस महक ने काम वासना को और भड़काने में आग में घी का काम किया।

घर के अंदर दाखिल होकर उदयराज दरवाजे को अंदर से धीरे से बंद कर आगे बढ़ा, गुप्प अंधेरा था बरामदे में, अंदाजे से वो अलमारी के पास गया और दिव्य तेल की शीशी उठा ली, जैसे ही आंगन में आया तो देखा सबसे पीछे बनी कोठरी के दरवाजे पर दिया रखा हुआ है जिसकी मध्यम हल्की रोशनी आस पास तक ही फैली हुई थी।

दरवाजा खुला हुआ था, वातावरण बिल्कुल शांत था, जैसे ही उदयराज दरवाजे तक आया रजनी को इसका अहसास हो गया वो कसमसा उठी, उदयराज ने उसे देखा, जमीन पर चटाई बिछा कर सर से लेकर पाँव तक पीले रंग का चादर ओढ़े उसकी सगी शादीशुदा बेटी लेटकर पाप का आनंद लेने के लिए अपने पिता का इंतज़ार कर रही है, इस बात को सोचकर वो झूम उठा, आखिर वो पल आ ही गया। चादर से पूर्ण रूप से ढके होने के बाद भी अपनी बेटी के पूर्ण शरीर की लंबाई चौड़ाई देखकर उसे जोश चढ़ गया। रजनी पीठ के बल बिल्कुल सीधी लेटी थी हाथों को उसने सर के ऊपर ले जाकर मुठ्ठी से चादर तान कर चादर को पकड़ा हुआ था जिससे उसकी मोटी मोटी दोनों चूची तन कर ऊपर को उठ गई थी और उसके उभार चादर के ऊपर से ही दिख रहे थे, काम वासना से वशीभूत होकर तेज चलती हुई सांसों की वजह से उसके उन्नत मोठे उरोज सांसों के साथ साथ ऊपर नीचे होते हुए बहुत मादक लग रहे थे। कुछ देर उदयराज पास खड़े होकर उसके पूर्ण शरीर को बहुत बेशर्मी और कामुक नज़र से निहारता रहा फिर एक नज़र उसने पूरी कोठरी में डाली, पूरी कोठर फूलों से सजी थी, मानो वो उसका सुहागरात कक्ष हो, खुद रजनी ने उसे सजाने में इतनी मेहनत कर डाली थी तो इसका मतलब ये था कि खुद उसकी सगी बेटी उसके साथ पाप का सुख भोगने के लिए कितनी बेताब है। इतना मजा तो उसे बहुत वर्ष पहले सुहागरात में अपनी पत्नी के साथ भी नही आया था जितना आज सगी बेटी के साथ आ रहा था जबकि अभी तो उसने कुछ शुरू भी नही किया था, आखिर छुप छुप कर सगे रिश्ते में किये गए व्यभिचार और पाप में कितना मजा छिपा होता है।

फिर वह एकाएक चादर के ऊपर से ही सांसों के साथ ऊपर नीचे होते हुए रजनी के भारी चूचीयों को निहारते हुए उसके दायीं तरफ कमर के पास बैठ गया।

रजनी ने कसमसा कर अपनी जांघे भीच ली, उदयराज ने तेल की शीशी बगल में रखी, अपना सीधा हाथ उसने चादर के अंदर डाला और धीरे धीरे रजनी की नाभि पर रखा, रजनी स्पर्श महसूस कर गनगना गयी उसके मुँह से हल्की ही aaahhhh निकल गयी, फिर उदयराज अपना हाँथ नाभि के नीचे की ओर बढ़ाने लगा रजनी कंपन से थरथरा उठी, उदयराज की उंगलियां नाभि के नीचे बंधी साड़ी के छोर से टकराई, रजनी बार बार वासना में अपनी जाँघे भीच ले रही थी, उदयराज ने अपनी उंगलियां साड़ी के अंदर प्रवेश करा दी पर तुरंत उसे साड़ी के नीचे बंधे साये के नाड़े ने रोक दिया, उदयराज ने तुरंत चादर में ढके रजनी के मुंह की तरफ मदहोश आंखों से देखा, रजनी को महसूस हुआ कि उसके बाबू उसकी तरफ देख रहे हैं वह चादर के अंदर ही वासना से वशीभूत हो मुस्कुरा उठी।

फिर एकाएक उदयराज ने नाड़े की डोरी को सर्रर्रर्रर्रर से खींचकर खोल दिया, डोरी खुल गयी, रजनी ने लाज के मारे अपनी जाँघे और भीच ली, माना कि वो खुद बेताब थी अपने बाबू की उंगलिया अपनी बूर पर महसूस करने के लिए पर एक सगी बेटी होने के नाते और आज जीवन में ये पहली बार हो रहा था कि उसके बाबू उसके साथ ये कर रहे थे तो वह लज़्ज़ा से गड़ी भी जा रही थी। उसकी सांसे भारी हो चली थी, माथे और चेहरे पर वासना की गर्मी से पसीना आना शुरू हो गया था।

उदयराज ने अपना हाथ साये के अंदर डाल दिया और उसकी उंगलियां बूर के ऊपरी हिस्से पर जा पहुँची, बूर के उस हल्के फूले हुए ऊपरी हिस्से (जो हल्के बालों से भरा था) पर उदयराज अपनी उंगलियां चलाने और सहलाने लगा, एकाएक उसने अपनी बीच की उंगली जहां से बूर की फांक की शुरुवात होती है उसपर रखा और बूर की दरार में हल्का सा उंगली डुबोते हुए पूरी बूर को हथेली में भर लिया।

रजनी ने aaaaahhhhhh bbaaabbbuuu की हल्की सी मादक आवाज निकालते हुए अपनी जाँघे हल्का सा खोलकर अपनी मक्खन जैसी बूर अपने बाबू को छूने के लिए परोस दी।

उदयराज होश खो बैठा, आज वो अपनी सगी शादीशुदा बेटी की बूर छू चुका था, क्या मक्खन जैसी बड़ी बड़ी फांकों वाली बूर थी उसकी अपनी ही सगी बेटी की, बूर की फांकों पर भी हल्के बाल थे, फांकों की साइड में भी हल्के बाल थे, उदयराज ने चार पांच बार बूर को पूरा पूरा हथेली में भरकर भींचा, रजनी होशो हवास खो चुकी थी।

दोनों के शरीर का कोई भी अंग नही छू रहा था बस उदयराज रजनी की साड़ी में हाथ डाले उसकी बूर को सहला और मसल रहा था।

उदयराज अपनी चारों उंगलिया बूर पर फिराने लगा, कभी वो बूर के ऊपरी हिस्से को सहलाता कभी फांकों और दरार को सहलाता हुआ बूर के नीचे तक हाथ ले जाता, इतना मजा तो उसे अपनी पत्नी की बूर चोदकर भी नही आया था जितना बेटी की खाली छूकर ही आ रहा था।

कामवासना में रजनी की बूर फूलकर खुल चुकी थी, पर उसका कसाव बरकरार था, रजनी को चुदे हुए कई साल हो गए थे, बूर उसकी जल्द ही रिसना चालू हो गयी, और रस उदयराज की उंगलियों को गीला करने लगा, चादर के अंदर रजनी बेसुध पसीने पसीने हो गयी थी, वासना में उसकी आंखें बंद थी, अपने होंठों को वो बड़ी कामुकता से दांतों से काट ले रही थी, मन तो उसका बेसब्र हो चुका था कि कस के बाबू से लिपट जाए पर....क्या करे, सब्र तो करना ही था।

रजनी ने अब अपनी जाँघे और खोल दी, उदयराज ने फांकों को उंगलियों से फैलाकर बूर की भगनासा (cliteries) पर उंगली गोल गोल घूमने लगा रजनी का बदन थरथरा गया, नस नस गनगना गयी, मुँह से न चाहते हुए भी hhhhaaaaiiiiiiii bbbbaaaabbuuuu, aaaaaahhhhhhhh, oooooooohhhhhhh, mmmmaaaaaaa सिसकते हुए बोल ही पड़ी।

तभी उदयराज को तेल का ध्यान आया उसने झट हाथ बाहर निकाल कर वो दिव्य तेल अपनी अंजुली में शीशी से निकालकर उड़ेला वह लाल रंग का दिव्य तेल था दिए कि हल्की रोशनी में वह चमक रहा था और उसकी मन मोहक खुशबू पूरी कोठरी में फ़ैल गयी, अब कोठरी में फूल, कपूर और तेल की मिश्रित खुशबू फैल कर सम्मोहित सा कर दे रही थी उदयराज एक हाँथ पर तेल को अंजुली में लिए रहा और दूसरे हाथ से साड़ी को उठा कर तेल वाला हाथ साड़ी में डालकर बूर पर तेल उड़ेल दिया, बूर पर तेल गिरते ही रजनी फिर गनगना गयी।

तेल को उसने पूरी बूर पर अच्छे से मला, फिर हाथ बाहर निकाल कर और तेल लिया और एक बार फिर साड़ी में हाथ डाल कर बूर पर अच्छे से तेल लगाया और बूर सहलाने लगा, तेल की मनमोहक गंध ने समा बांध दिया, हाथ से उसने बूर को थपथपाया, फांकों को सहलाया, रजनी हाय हाय करने लगी।

पूरी बूर तेल से सन गयी थी, फूल कर उसका आकार बड़ा हो गया था, भगनासा खिलकर बाहर हो उठ आया था। बूर की फांकें मुँह खोल चुकी थी। बूर ने थरथरा कर कामरस छोड़ना शुरू कर दिया था, उदयराज भगनासा को सहलाता जा रहा था, कभी वो अपने हाथ को बूर की दरार में चलाता हुआ नीचे ले जाता और फिर वापिस ऊपर लाता कभी चार उंगलियों को एक साथ भगनासा पे रखकर गोल गोल रगड़ने लगता।

रजनी haaaai bbaabu, uuuuufffc bbbbaaau, uuuhhhiii mmaaaannn, hhhhhhaaaaiiiiiii ddddaaaiyyyyyaaa, न चाहते हुए भी बोले जा रही थी।

एकएक उदयराज ने बूर की दोनों फांक को तर्जनी और अनामिका उंगली से फैलाकर चीरा और बीच वाली उंगली से बूर की छेद पर गोल गोल सहलाने लगा, रजनी की बूर अब बेताहाशा कामरस छोड़ने लगी। रजनी उदयराज के इस प्रहार से थरथरा गयी और वह अपनी दोनों जांघों को कस के भीचते हुए hhhhhhaaaaiiiiiiii bbbaaaaabbuuuuu बोलते हुए बायीं ओर पलट गई, उदयराज का हाँथ बूर पर था और जांघ भिचने से दब गया था उसने वहां से अपना हाथ निकाला और मुस्कुराते हुए चादर के ऊपर से रजनी के नितम्ब देखने लगा, फिर उसने पीछे से हाथ को साड़ी में डालना शुरू किया, रजनी समझ गयी और मुस्कुरा पड़ी, उदयराज ने भारी नितम्ब को न छूते हुए सीधा अपना हाथ पीछे की तरफ से ले जाकर बूर पर रख दिया, रजनी चिहुँक उठी और उसकी जोर से सिसकी निकल गयी, उदयराज फिर से पीछे से बूर सहलाने लगा, उसने बूर के संकरी छेद पर फिरसे उंगली घुमाना चालू कर दिया

उदयराज अचंभित था कि शादीशुदा होने के बाद भी और एक बच्ची होने के बावजूद उसकी सगी बेटी की बूर का छेद कितना संकरी था, जैसे की वो कुवारी हो।

कितना छोटा सा नरम नरम मुलायम सा मनमोहक छेद था उसकी अपनी ही सगी बेटी की मक्खन जैसी बूर का।

आग की भट्टी की तरह धधकने लगी थी बूर उसकी, कितना गर्म था वो छोटा सा बूर का छेद, वो समझ गया कि उसके दामाद के बस का नही था इस बूर को फाड़ना, इसलिए ये अभी तक कुंवारी जैसी है।

उदयराज ने रजनी के बूर के छेद से निकलते हुए कामरास को बीच वाली उंगली से ऐसे उठाया जैसे मक्ख़न के भरे हुए डिब्बे में से उंगली डाल कर कोई मक्खन उठाता है।

फिर उस कामरस में भीगी हुई उंगली को उसने अपनी नाक के पास ला के सूंघा।

पेशाब और कामरस की भीनी भीनी महक ने उदयराज को पागल ही कर दिया, उसके मुँह से आखिर निकल ही गया- aaaaaahhhhhhh bbeeeettttiiii, hhhhhaaaaaiii

रजनी के मुंह से भी uuuuuuffffff bbbbaaabbbuuuu निकला। वह सिसकारियों पे सिकारियाँ ले रही थी।

उस कामरस में पेशाब की महक ज्यादा थी जिसने उदयराज को बदहवास कर दिया। मन तो उसका कर रहा था कि लप्प से बूर को मुँह में भर के खा जाए, पर.....क्या करे, सब्र तो करना ही था।

कामरस सूंघने के बाद उसने उसे चाट लिया, फिर हाथ साड़ी के अंदर डाला और हाँथ बूर से दुबारा लगते ही रजनी फिर गनगना गयी, उदयराज ने फिर बूर की संकरी छेद से रिसते कामरस को उंगली से उठाया और फिर चाट गया ऐसा उसने पांच बार किया, पूरे मुँह में उसके रजनी का कामरस लगा हुआ था।

रजनी बेचैन होकर सिसकते हुए फिर पीठ के बल लेट गयी और उदयराज ने फिर से साड़ी में हाथ डाल दिया, फिर बूर को सहलाने लगा, बूर ने और कामरस छोड़ा, उदयराज ने इस बार वो कामरस उंगली में लगाया और चादर के अंदर रजनी के मुँह तक ले गया, अपनी ही पेशाब और कामरस की गंध से लिपटी अपने बाबू की उंगली को सूंघकर रजनी भी मचल उठी, पहले उदयराज ने उंगली उसकी नाक के पास ले जाकर उसे सुंघाया फिर एकाएक रजनी ने स्वयं ही वासना से आसक्त होकत अपने होंठ उस कामरास को चाटने के लिए खोल दिये।

उदयराज ने उंगली रजनी के मुँह में डाल दी और वो उसे बहुत की कामुक अंदाज़ में चाटने लगी, उदयराज ने रजनी को भी पांच बार उसी की बूर का कामरस चटाया, रजनी पूरी तरह मदहोश हो चुकी थी।

ये सब करते करते लगभग दस मिनट या उससे भी ज्यादा हो गया था, उदयराज ने बेमन से अपनी बेटी की बूर से हाँथ हटा लिया और तेल की शीशी उठा कर अपनी तड़पती बेटी को कोठरी में छोड़कर जाने लगा, उसने पलटकर एक बार फिर रजनी को देखा और कोठर से बाहर निकल गया, रजनी तड़पती सिसकती रह गयी, उदयराज का लंड तनकर विकराल रूप ले चुका था, उसने बरामदे में आकर लंड को adjust किया और शीशी को अपनी जगह पर रखा फिर धीरे से घर से बाहर निकल गया और जाकर अपनी खाट पर औंधे मुंह लेट गया, आज जो हो चुका था उसपर उसे विश्वास ही नही हो रहा था और लग रहा था कि उसके हाथ अब भी अपनी सगी बेटी की बूर को सहला रहे हैं काफी देर तक मदहोश होकर वो यही सब सोचता रहा की कितनी मस्त मक्खन जैसी बूर है रजनी की, कितना छोटा सा छेद है बूर का, और अब जल्द ही वो मुझे देखने को मिलेगी और फिर भोगने को और फिर न जाने कब आंख लगी कुछ पता नही।

रजनी भी काफी देर तक कोठरी में पड़ी सिसकती रही, उसे अभी भी ऐसा लग रहा था कि उसके बाबू की उंगलियां उसकी बूर को छेड़ रही हैं, सहला रही हैं, फांकों को फैला रही हैं। उसमे इतनी भी हिम्मत नही बची थी कि वो उठकर बाहर आ जाये, कामाग्नि में पूरी तरह जल रही थी वो, बहुत देर तक सिसकते सिसकते कब उसकी आंख लगी कुछ पता नही।
 
दोस्त आपके suggestion के लिए शुक्रिया, आपसे पहले भी कुछ भाइयों ने ये suggestion दिया था, पर मैं इसके लिए माफी चाहूंगा, क्योंकि मेरा ये मानना है कि story को पढ़कर अपने दिलो दिमाग में जो कल्पना चलती है वह लगाई गई pics से कहीं ज्यादा बेहतर होती है, पहली बात तो story के हिसाब से pics मिलती नही और इधर उधर की फालतू pics लगा के खुद के मन में बनने वाली कल्पना धूमिल हो जाती है। जो मजा अपनी खुद की कल्पना में है वो लगाई गई pics में नही होती।

या तो pics खुद से draw की गई हो story के according, पर इतना टाइम और इतनी skill अभी है नही।

तो उम्मीद है कि आप समझ गए होंगे, बाकी आपका बहुत बहुत शुक्रिया comments करने के लिए।

Story पढ़ते रहिये और खुद की कल्पना में खो जाइये
 
Update- 33

अगले दिन उठते ही उदयराज को ऐसा महसूस हुआ कि जैसे नया युग आरंभ हो चुका हो, मन और तन में अद्भुत खुमारी का अहसास हो रहा था, मन इतना खुश था कि मानो संसार की सारी खुशियाँ आज उसकी झोली में हो, जैसे कोई ऐसा कठिन युद्ध जीत लिया हो जो असंभव था, उसने अपने हांथों को देखा और सोचने लगा बीती रात को किस चीज़ को छुआ था इन्होंने uuuuffff, मानो अभी भी बूर पर रेंग रहे हों, वो नरम नरम बूर की फांकें, उसकी गंध, सुबह उठते ही जैसे उसके नथुनों से वही गंध हवा में मिलकर टकरा रही हो। पाप का आगाज हो चुका था।

रजनी तो वहीं कोठरी में पड़ी पड़ी सिसकते हुए सो गई थी, सुबह 5 बजे करीब उसकी आंख खुली तो ऐसा लगा जैसे नई दुनियां में आ गयी हो, सब कुछ वही था, वही घर, वही आंगन, पेड़, पशु, सब वही था पर फिर भी सब नया नया सा लगने लगा, उसके साथ उसके अपने ही पिता ने रात को क्या किया?, कैसे किया? ये सोचते ही सुबह सुबह ही उसकी बूर फिर तड़प उठी, बहुत बेचैन हो गयी वो, फिर जैसे तैसे उठी, और आज फिर होने वाले उसी पापकर्म को सोचकर मुस्कुराते हुए घर के काम में लग गयी।

उदयराज कल की तरह आज भी जल्दी नाश्ता करके खेतों में चला गया।

दोपहर हुई, दोपहर से शाम हुई और शाम से रात, खाना खा के उदयराज आज फिर बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था, जैसे ही घड़ी की सुई ने 11:45 बजाए, वो तुरंत उठा और घर की तरफ चल दिया, दरवाजा कल की तरह खाली भिड़ाया हुआ था, धीरे से दरवाजा खोलकर अंदर गया, तेल की शीशी उठायी और कोठरी की तरफ चल दिया, सामने कोठरी के दरवाजे पर आकर रजनी को देखा तो वो आज भी कल की तरह पूरा चादर ओढ़े लेटी तो थी पर कुछ खास तरीके से, दरअसल रजनी बायीं तरफ करवट होकर लेटी थी, उसके नितम्ब दरवाजे की ओर थे, उसके पैर घुटनो तक मुड़े हुए थे जिससे उसकी भारी मदमस्त गांड उभरकर पीछे को निकल आयी थी।

अपने बाबू की आहट पाकर वो हल्का सा कसमसाकर हिली।

रजनी का दरवाजे की तरफ गांड करके लेटने का अर्थ उदयराज को समझ आते ही उसके चेहरे पर कामुक मुस्कान आ गयी वो समझ गया कि उसकी बेटी चाहती है कि वो आज उसकी बूर को पीछे से हाथ डाल के सहलाये।

उदयराज ने देखा कि ठीक कल की तरह आज भी रजनी ने कोठरी को नए फूलों से सजा रखा था और फूल तथा कपूर की खुशबू से कोठरी महक उठी थी।

उदयराज धीरे से आ के रजनी की गांड के पास बैठ गया, और अपना हाथ धीरे धीरे नाभी की ओर बढ़ाया, साड़ी के अंदर हाथ डालकर उसने नाड़े को खींचकर खोल दिया, साड़ी और साये की पकड़ अब ढीली हो गयी थी, रजनी सिसक उठी aaaahhhhhhh, उसकी बूर तो आज पहले ही रस छोड़ रही थी।

फिर उदयराज ने वहां से अपना हाथ निकालकर गांड की तरफ से गांड को न छूते हुए अपना हाथ सीधा बूर पर रख दिया, रजनी oooooohhhhh bbbaabbuuu कहकर चिहुँक उठी, उसका पूरा बदन थरथरा और गनगना उठा, उदयराज को हाथ लगाते ही ये महसूस हुआ कि उसकी बेटी की बूर तो पहले से ही भट्ठी की तरह जल रही है, मदहोश हो गया वो इतनी नरम और गरम बूर को छूकर, बूर तो फूलकर अपने सामान्य आकार से काफी ज्यादा बड़ी हो चुकी थी पर उसका प्यारा सा नरम नरम संकरी छेद वैसे ही कसा हुआ था, बूर की फांकें संभोग की आग में गरम होकर जल रही थी। उदयराज अपनी सगी बेटी की

पूरी बूर को हथेली में भरकर मीजने लगा, फांकों पर तर्जनी उंगली से दबाने लगा, पूरी बूर का मानो मुआयना कर रहा हो, कभी अपनी बीच वाली उंगली को बूर की दरार में डुबोता तो कभी फांकों पर हल्के हल्के बालों को सहलाता।

रजनी का बदन अब थरथराने लगा, उत्तेजना चरम सीमा तक इतनी जल्दी चढ़ जाएगी ये रजनी को विश्वास नही था, उसकी बूर नदी की तरह बहकर कामरस छोड़ने लगी।

रजनी हाय हाय करने लगी, उसको असीम आनद की अनुभूति होने लगी, काफी देर उदयराज अपनी सगी बेटी की बूर को छेड़ता, सहलाता, और भींचता रहा, कभी वो cliteries को दो उंगलियों से पकड़कर सहलाता, कभी अपनी तर्जनी उंगली cliteries पर गोल गोल घुमाता और फिर कभी उँगलियों से बूर के मदमस्त नरम नरम छोटे से छेद को छेड़ता। जैसे ही उदयराज अपनी सगी शादीशुदा बेटी की बूर के भागनाशे को छेड़ता रजनी बुरी तरह थरथरा जाती, उसका पूरा बदन ऐंठ जाता और उसके मुंह से

aaaaaahhhhhhh, hhhhaaaaaiiiiiiiii, uuuuuuuuuuffffffffff, bbbaaaaabbbbbuuuuu, धीरे धीरे सिसकारियों के साथ निकलने लगता। रजनी को इतना मजा अभी तक कभी नही आया था वो तो जैसे जन्नत में पहुँच गयी थी।

रजनी के काम रस से उदयराज की पूरी उंगली काफी पहले ही भीख चुकी थी, उदयराज ने अपना हाथ साड़ी के अंदर से निकाला और दिव्य तेल को हाथ पर उड़ेला, फिर हाथ को बड़ी सावधानी से बचाते हुए की वो भारी नितंबों को न छू जाए, बूर तक ले गया और सारा तेल बूर पर उड़ेलकर मर्दन करने लगा, उदयराज कुछ पल तक कस कस के बूर का मर्दन करता रहा, रजनी को एकाएक लगा कि वो अब झड़ जाएगी, इतना उनसे बर्दाशत नही हो पायेगा अब, तो एकदम से उसने चादर के अंदर से ही अपने बाबू का हाथ पकड़ लिया और कुछ देर पकड़े रही, अपनी उखड़ती सांसों को काबू करती रही। वो नही चाहती थी कि वो यूँ ही सिर्फ हाथ से सहलाने से झड़े, कई वर्षों से वो चुदी नही थी, वो अपने बाबू का लंड खाकर उसकी जबरदस्त चुदाई से झड़ना चाहती थी।

उदयराज रजनी के इस तरह उसका हाथ पकड़ने से समझ गया कि रजनी क्या बोल रही है, उसने अपना हाथ कुछ देर रोककर बूर पर रखे रहा फिर उंगलियों को अपनी नाक के पास लाके सूंघा और कामरस को चाटने लगा

रजनी ने अपना हाथ वहां से हटा लिया और पीठ के बल लेट गयी, उसने महसूस किया कि उसके बाबू बड़े चाव से कामांध होकर उसकी बूर का रस चाट रहे हैं, कोठरी में बहुत कम रोशनी थी और चादर के अंदर से तो बिल्कुल दिख नही रहा था, वह खाली आवाज से ये महसूस कर रही थी कि उसके बाबू उसकी बूर का मक्ख़न चाट रहे हैं, वह मुस्कुरा उठी, उदयराज ने फिर अपना हाथ नाभी की तरफ से साड़ी के अंदर डाला और फूली हुई बूर की दरार में तर्जनी उंगली डालकर मक्ख़न निकाला, जैसे ही उदयराज ने तर्जनी उंगली को बूर की दरार में डुबोया, रजनी के मुंह से फिर से एक बड़ी ही aaaaaaaaahhhhhhhhhh निकल गयी।

पेशाब की महक में सना वो बूर का मक्ख़न उदयराज मदहोश होकर चाट गया, अपनी सगी शादीशुदा बेटी के पेशाब की महक उदयराज को इतनी अच्छी लग रही थी कि उसका मन कर रहा था कि वो बस अपनी बेटी के बूर पर मुँह लगा के उससे निकलने वाला पेशाब जी भरके पी ले, वो देखना चाहता था कि उसकी बेटी की बूर से पेशाब कैसे निकलता है, जब वो बैठ कर मूतती है तो उसकी बूर देखने में कैसी लगती है, वो दृश्य कितना मादक होगा।

पर अभी उसमे कुछ वक्त बाकी था जल्दी ही वो अपना ये ख्वाब पूरा करेगा। यही सब सोचते हुए उसने पांच बार अपनी बेटी की बूर से काम रस रूपी मक्ख़न अपनी तर्जनी उंगली से निकलकर चाटा।

फिर उसने कल की तरह रजनी की ही बूर का मक्ख़न अपनी उंगली में लगा के उसके होंठो तक ले गया, रजनी उसकी महक से फिर मदहोश हो गयी और लब खोल दिये, उदयराज ने उंगली उसके मुँह में डाल दी और वो चाटने लगी जैसे बरसों की प्यासी हो, उदयराज कभी उसके होंठों पर अपनी उंगली से वो रस लिपिस्टिक की तरह लगाता और रजनी जीभ होंठों पर फिरा फिरा के चाटती तो कभी अपनी पूरी उंगली उसके मुँह में घुसेड़ देता और रजनी लॉलीपॉप की तरह चूसती, ऐसे ही उसने पांच बार बूर का रस अपनी बेटी को चटाया।

देखते ही देखते लगभग दस मिनट से ऊपर हो गए थे, उदयराज को अब बेमन से उठकर जाना था, जैसे ही उसने साड़ी की अंदर से अपना हाथ निकाला और तेल की शीशी बंद करने लगा रजनी समझ गयी कि अब बाबू चले जायेंगे, वो मन ही मन बहुत तड़प उठी, जैसे कह रही हो कि बाबू न जाओ, न जाओ मुझे तड़पता हुआ छोड़कर, आपकी छुवन से मेरी बूर में आग लग गयी है इसमें अपना मोटा मूसल जैसा लन्ड डालकर इसको रात भर चोदो, फाड़ डालो इसे बाबू, बहुत प्यासी है ये, अभी न जाओ बाबू, आपकी बेटी आपसे चुदना चाहती है, उसकी बूर सिर्फ आपकी है चोदो उसे।

पर जो कर्म लिखा था उसका पालन तो करना ही था, उदयराज भी बेमन से उठा और एक नज़र उसने रजनी को देखा और वहीं उसी के सामने खड़े खड़े ही, उसे दिखाते हुए उसने अपना मूसल जैसा बलशाली लंड धोती के ऊपर से ही adjust किया, रजनी को साफ साफ तो नही दिखा पर इतना तो जरूर दिखा की उसके बाबू का हाथ उनके लन्ड पर था, ये समझकर उसकी हल्की सी सिसकी निकल गयी कि उसके बाबू का लंड उसकी बूर में जड़ तक घुसने के लिए दहाड़े मार कर खड़ा हो चुका है।

उदयराज कोठरी से बाहर निकल गया और रजनी तड़पती रही।

इसी तरह एक रात और बूर की सहलाई और छुआई में निकल गयी।

उदयराज और रजनी को बेसब्री से इंतज़ार था अब चौथी रात का जिसमे होना था- "नग्न"

कमर से नीचे तक नग्न होकर अपना अनमोल खजाना अपने बाबू की आंखों के सामने लाने के लिए रजनी बेसब्र हो रही थी तो वहीं उदयराज भी अपनी बेटी की मक्ख़न जैसी बूर को देखने के लिए पागल हुआ जा रहा था, वह बार बार ये सोचकर सिरह उठता था कि जब वो रात को कमर से नीचे का जिस्म साड़ी उतारकर पूर्ण नग्न कर देगा तो उस वक्त उसकी अपनी सगी शादीशुदा बेटी का नंगा जिस्म देखने में कैसा लगेगा, उसकी बूर कैसी होगी, बूर की बनावट कैसी होगी, उसकी जाँघे कैसी होंगी, उसकी गांड कैसी और कितनी बड़ी होगी, देखकर कैसा लगेगा, अभी तक तो उसने सिर्फ बूर को ही छुआ था पर अब वो कमर से नीचे का सारा जिस्म नंगा करके देखेगा। यही सब सोचकर वह वासना में गनगना जाता। अब उसे और रजनी को इंतज़ार था तो बस बूर दिखाई की रात का।
 
Update- 34

तीसरी रात जब उदयराज ने अपनी सगी बेटी की बूर का मर्दन करके और बूर का मक्ख़न खा के कर्म को पूरा किया तो वह अपने साथ लाये एक कागज पर कुछ लिखने लगा और लिखकर रजनी के सर के पास रखकर कोठरी से निकल गया, दिन में ये बात उसके दिमाग में आई थी कि कर्म के अनुसार एक दूसरे को देख नही सकते, एक दूसरे से बोल नही सकते पर लिखकर बयां तो कर ही सकते हैं। इसलिए उदयराज ने कागज पर कुछ लिखा और रजनी के पास रखकर चला गया। रजनी को उस वक्त ज्यादा साफ न दिखने से ठीक से पता नही चल पाया कि उसके बाबू क्या कर रहे हैं, उसे ये लगा कि पिछली रात की तरह वो अपने दहाड़ते हुए लन्ड को समझा रहे हैं कि थोड़ा सा और सब्र कर ले, और यह सोचकर वो मुस्कुराकर सिसकते हुए सो गई थी, पर चौथे दिन जब वो सुबह 4 बजे उठी तब उसे वो कागज मिला, रात का दिया तो बुझ चुका था, झट से उसने दिया जलाया और कागज खोला-

"मेरी प्रिय बेटी इतना सुख मुझे जीवन में कभी नही मिला....कभी नही, तू इतनी सुंदर है, तेरा वो अंग इतना कोमल और नरम नरम है कि मैं होश खो देता हूँ, इन तीन दिनों में मैंने जो तेरा काम रस चखा है, उससे मुझे कभी दूर मत करना, तुझे पाकर मैं धन्य हूँ, तेरे हुस्न से, तेरी अदा से मैं कायल हो गया हूँ तू सिर्फ मेरी है सिर्फ मेरी।


तीन रात तो बीत गयी अब चौथी रात होगी, उस रात का मुझे बहुत ही बेसब्री से इंतज़ार है, तब मैं तेरी वो देखूंगा.....वो, जिसको मैं तीन दिन से छू कर महसूस कर रहा था, चौथी रात मेरे जीवन की एक बहुत ही अनमोल रात है। ऊपर के रसीले होंठ को तो मैंने हमेशा देखा है जो कि दुनियाँ में सबसे रसीले हैं पर अब मैं नीचे के भी रसीले और नशीले होंठ देखूंगा, मैं तो दीवाना हो गया हूँ, जैसे कोई दूल्हा अपनी दुल्हन को उसकी मुँह दिखाई पर कुछ उपहार देकर या उसकी कोई मनोकामना पूरी कर उसके तन मन का सम्मान करता है वैसे ही मेरे मन में भी आवाज उठ रही है कि मैं अपनी बेटी को उसकी वो दिखाई पर उसकी मनोकामना पूर्ण कर उसका सम्मान करूँ, बोल मेरी रानी बिटिया मैं तेरी क्या मनोकामना पूर्ण करूँ?"

इतना पढ़ते ही रजनी तो सातवें आसमान में उड़ने लगी, गदगद हो गयी वो, उसने भी जल्द ही एक कागज कलम उठाया और मुस्कुराते हुए कुछ लिखने लगी। जब काकी घर में आई तो उनको देकर बोली- काकी ये पर्ची बाबू के तकिए के नीचे चुपचाप रख देना, कर्म से संबंधित कुछ है।

काकी समझ गयी कि इसको खोलना नही है और तुरंत ही जाकर उदयराज के तकिए के नीचे धीरे से रखकर चली आयी।

अभी थोड़ा अंधेरा था उदयराज सो ही रह था 5 बज चुके थे फिर 5:15 हुए, थोड़ा थोड़ा उजाला होने लगा, उदयराज उठा, आज कौन सा दिन था उठते ही सबसे पहले ये ख्याल उसके मन में आते ही ख़ुशी से पगला गया।

बिस्तर समेटने के लिए जैसे ही तकिए को उठाया, सामने कागज fold कर पड़ा हुआ था, मन मयूर झूम उठा उसका ये जानकर की बेटी ने उसकी उसकी छोड़ी हुई पर्ची पढ़ ली है और ये उसका जवाब है, हो न हो जरूर उसने ये काकी के हाथ रखवाया होगा, मन में तो उसके हुआ कि घर में जाके रजनी को बाहों में भरकर ताबड़तोड़ चूमने लगे, पर वासना और खुशी का घूंट पीकर रह गया। उस पर्ची को उसने उठाकर धोती में ये सोचते हुए खोंस लिया कि खेत में जाके तसल्ली से पढ़ेगा।

जल्दी जल्दी वो तैयार होकर खेतों में हल और बैल लेकर निकल गया, आज उदयराज को अपने दूर वाले खेत की मेड़ पर मिट्टी भी चढ़ानी थी, एक खेत तो उसका कुल वृक्ष के पास भी था पर वो खाली जोतकर छोड़ा हुआ था उस खेत के बाद नदी थी तो उसमें अक्सर वो धान की फसल लगाता था।

उदयराज ने जल्दी से खेत में पहुँचकर वो कागज खोला-


मेरे बाबू, मेरे दिल के राजा, मैं भी आपके बिना अब नही जी सकती, मेरा सिर्फ काम रस ही क्या, सबकुछ आपका है, और आजीवन रहेगा जितना जी भरके चाहो उतना चखो, मैं तो खुद आपकी दीवानी हूँ, मैं सिर्फ आपकी हूँ सिर्फ आपकी, मेरी हर चीज़ आपकी है, मेरे हर अंग पर सिर्फ आपका हक़ है, ऐसा यौन सुख एक बेटी को सिर्फ अपने बाबू से ही मिल सकता है और किसी से नही, और बाबू आज रात को जो आप देखोगे न उसको बूर कहते हैं, बताया तो था अभी कुछ दिन पहले धीरे से आपके कान में मेरे भोले बाबू जी। कितना शर्माते हो आप, अपनी ही बेटी से कोई इतना झिझकता है पगलू कहीं के। बेटी तो अपने बाबू के दिल में बसी होती है छुप छुप कर अपने पिता के दिल में रहती है मां से भी ज्यादा।

आपकी बेटी सिर्फ आपकी है और उसकी बूर सिर्फ आपके लिए है, एक बात बोलूं बाबू, मैं अभी भी कुंवारी जैसी ही हूँ कई वर्षों से, बस आप समझ जाइये की अब आपको मुझे कैसे और कितना प्यार देना है, आज रात का मुझे भी बहुत बेसब्री से इतंज़ार है, मैं आज लाल रंग की साड़ी पहनूँगी और अपने बगल में एक और घी का दिया बिना जलाए रखे रहूँगी क्योंकि बाहर वाले दिये से अच्छे से दिखेगा नही आप जब आना तो वो दिया जला लेना।


और मुझे आपसे जो चाहिए वो है सिर्फ आपका साथ और बस आपका प्यार, लेकिन फिर भी आपका मान रखने के लिए जब वक्त आएगा तब मैं मांग लूंगी अपने बाबू से क्योंकि अभी मुझे सिर्फ आपका प्यार पाने के सिवा कुछ सूझ नही रहा, और आपने ये जो तरीका निकाला है बात करने का उस पर तो मैं वारी वारी जाऊं मेरे बाबू मैं भी आपसे बात करना चाहती थी पर बेबस थी। आज की रात आपकी बेटी बहुत बेसब्री से आपका इंतजार करेगी।"

उदयराज ये पढ़ते ही झूम उठा किसी तरह उसने दिन भर सारा काम किया और शाम को जल्दी ही घर आ गया, काकी द्वार पर बैठी उसका इंतजार कर रही थी, उठकर गयी और पानी लायी, उदयराज ने पानी पिया और जाकर नहा लिया।

रजनी ने जल्दी जल्दी खाना बनाया और काकी ने उदयराज को बाहर ही नीम के पेड़ के नीचे खाना दिया और घर में रजनी और काकी ने भी खाना खा लिया, आज रजनी की बेटी थोड़ा रो रही थी रजनी ने उसे दूध पिलाया फिर काकी उसे काफी देर बाहर घुमाती रही और वो सो गई, काकी उसको लेकर अपनी खाट पर लेट गयी थोड़ी देर बाद उसकी भी आंख लग गयी। जैसे ही वक्त हुआ उदयराज अपनी खाट से उठा, रोज की तरह धीरे धीरे कदमों से चलता हुआ दरवाजे तक पहुँचा, जैसे ही हल्के दरवाजे की खुलने की आवाज हुई उधर कोठरी में लेटी रजनी ने नशे में अपनी आंखें मूंद ली, सांसे तेज चलने लगी, दिल धक धक करने लगा।

उदयराज ने आज तेल की शीशी नही ली बस कागज और कलम लिया।

आज कोठरी से लाल गुलाब की अत्यंत मनमोहक खुशबू आ रही थी जिसमे कपूर की खुशबू भी मिली हुए थी।

उदयराज कोठरी के दरवाजे के सामने आकर खड़ा हो गया, रजनी का दिल रोमांच से भर गया, उसने रोज की तरह कसमसा के अपने बाबू को ये आभास कराया कि वो उनका बेसब्री से इंतज़ार कर रही है।

आज दिये कि मध्यम रोशनी में लाल गुलाब से सजी कोठरी काम वासना को चरम पर पहुँचा रही थी, उदयराज अपनी बेटी की मेहनत पर गदगद हो गया, आखिर रोज रजनी हमारे इस प्यार को और सुखमय बनाने के लिए कितनी मेहनत कर रही है, मैं कसम खाता हूं कि अपनी बेटी के एक एक अंग को चरम सुख की प्राप्ति कराऊंगा, इतना प्यार दूंगा उसे की रोम रोम पुलकित हो उठेगा उसका। उदयराज ने एक संकल्प किया और एक भरपूर नज़र कोठरी में सजे फूलों पर डाली और उसमे से एक गुलाब तोड़कर हाथ में ले लिया।

उदयराज ने देखा रजनी ने बगल में एक छोटा दिया और माचिस रख दिया था, रजनी आंखें मूंदें चादर ओढ़े अपने बाबू की हर हरकत को भांप रही थी उसके दिमाग में बस अब एक ही बात थी कि अब आगे बाबू क्या करेंगे, अब क्या करेंगे, सारी दुनियां भूल चुकी थी वो।

उदयराज ने एक भरपूर नज़र अपनी बेटी के बदन पर डाली और उसके घुटनों के पास दायीं ओर बैठ गया, कागज और कलम बगल में रखकर कागज के ऊपर फूल जो उसने तोड़ा था उसको रख दिया।

रजनी से बर्दाश्त नही हो रहा था वो बार बार कसमसा के अपने बाबू को यह इशारा कर रही थी कि बाबू खोलो न।

उदयराज ने रजनी के पैरों से दबे चादर को पकड़कर ऊपर की तरफ हटाना शुरू किया जैसे ही रजनी के पैर बाहर दिखे उदयराज अपनी बेटी के गोरे गोरे दोनों पैर देखकर ही सम्मोहित सा हो गया, आज तीन दिन के बाद वो रजनी के पैर देख रहा था, रजनी ने अपने पैर के अंगूठे और उंगलियों को आपस में रगड़कर अपने बाबू को रिझाया।

पैरों में पड़ी पायल और दोनों पैर की उंगलियों में पड़ी बिछिया ने उदयराज का मन मोह लिया, लाल रंग की नेल पॉलिश उस गोरे गोरे पैर पर कयामत ही लग रही थी, कोठरी में हल्की रोशनी थी पर फिर भी रजनी का गोरा बदन चमक रहा था।

उदयराज ने पैरों को घूरते हुए चादर को खींचकर पूरा कमर तक पलट दिया, रजनी की सांसें तेज तेज चलने लगी, उदयराज ने देखा कि रजनी ने लाल साड़ी पहनी हुई थी आज वो दुल्हन की तरह लाल साड़ी पहनकर लेटी थी, चादर खिंचने से रजनी की साड़ी थोड़ा ऊपर चढ़ गई थी जिससे उसके गोरे गोरे पैर और उसपर भूरे भूरे रोएं देखकर उदयराज का लन्ड हरकत करने लगा।

पहले तो उदयराज ने पैर की तरफ से साड़ी ऊपर करने की सोची पर उसने इरादा बदलकर अपना हाथ ऊपर की तरफ बढ़ाया। रजनी समझ गयी और उसने साड़ी का पल्लू जो पीठ के नीचे दबा हुआ था उसको खींचकर लेकर कमर के पास रख दिया ताकि उसके बाबू को दिक्कत न हो, उदयराज ने चादर को और ऊपर तक किया अब रजनी की नाभि दिखने लगी, रजनी की गहरी नाभि देखकर उदयराज मदहोश हो गया एकदम से उसके दिमाग में आया कि योनि चुम्बन की रात तो कल है पर मैं नाभि तो चूम ही सकता हूँ और एकदम उसने नाभि पर एक गर्म जोरदार चुम्बन जड़ दिया।

रजनी को इसका आभास बिल्कुल नही था वह oooohhhhhhh bbbbaabbbuuuu कहकर चिहुँक उठी, उदयराज ताबड़तोड़ किसी बरसों के प्यासे की तरह नाभि और उसके आस पास कई चुम्बन अंकित करने लगा फिर उसने अपनी जीभ रजनी की गहरी नाभि में डाल दिया और डालकर काफी देर घुमाता रहा, कभी चूमता कभी घुमाता, रजनी uuuuuuuuffffffffff bbbbaaaaabbbbuuuuu करते हुए सिसक उठी।

उदयराज ने कुछ देर नाभि और उसके आस पास चूमने के बाद साड़ी के अंदर हाथ डालकर नाड़े की डोर खींचकर नाड़ा खोल दिया, साड़ी ढीली हो गयी और साया भी ढीला हो गया।

रजनी ने खुद ही अब सिसकते हुए अपने दोनों पर फैला कर अपने बाबू को जैसे पैरों के बीच आने का इशारा किया, उदयराज तुरंत समझ गया और उठकर दोनों पैरों के बीच आ गया।

और फिर वो हुआ जिसका बड़ी बेसब्री से इंतज़ार केवल उदयराज और रजनी को ही नही बल्कि नियति को भी था।

उदयराज ने अपने दोनों हांथों से रजनी की साड़ी को कमर से दोनों ओर से पकड़ा और धीरे धीरे नीचे की ओर सरकाने लगा, रजनी ने सिसकते हुए स्वयं ही अपने भारी नितंबों को उठाकर साड़ी को साये सहित नीचे खींचे जाने में अपने बाबू की मदद की, जैसे जैसे साड़ी नीचे सरकती गयी वैसे वैसे रजनी का निचला दूधिया बदन उजागर होता गया, रजनी की लाल रंग की पैंटी जो आज उसने जानबूझकर पहनी थी धीरे धीरे उदयराज की आंखों के सामने आती गयी, मोटी मोटी केले के तने के समान मांसल जांघे और उसमे फंसी छोटी सी लाल रंग की पैंटी ने उदयराज के होशो हवास उड़ा दिए।

जाँघों के बीच पैंटी के अंदर रजनी की फूली हुई बूर का आकार, दिये कि माध्यम रोशनी में साफ दिख रहा था, पैंटी उसकी बूर की फांकों में कुछ अंदर तक धंसी हुई थी और बूर जो वासना में काम रस छोड़े जा रही थी उससे बूर की जगह पर पैंटी गीली हो चुकी थी।

अभी साड़ी और साये को उदयराज ने घुटनों तक नीचे सरकाया था और उसकी नज़र अपनी सगी बेटी की माँसल मोटी मोटी कसी हुई जाँघों से हट ही नही रही थी, बहुत ही कामुक और बेशर्मी से आंखें फाड़े वो अपनी बेटी की टांगें, जांघ, पैंटी और नाभि को निहारता रहा फिर अचानक झुककर उसने दोनों जांघों को चूम लिया, उदयराज के होंठ अपनी जांघों पर लगते ही रजनी के जिस्म में गहराई तक कामुक तरंगे दौड़ गयी, वह सिरह उठी, तन और मन गनगना उठा, "उफ्फ बाबू" की हल्की आवाज निकालते हुए उसका बदन थरथराया।

वो डर भी रही थी कि कहीं बाबू बदहवासी में उसकी बूर को न चूम लें, क्योंकि बूर को चूमने और चाटने की रात कल है आज तो केवल दर्शन और सूंघने की रात है।

उदयराज बदहवासी में जांघों को चूमे जा रहा था और रजनी भी पागलों की तरह छटपटा रही थी, उसके मुंह से धीरे धीरे लगातार uuuuuiiiiimmmmmaaaaaaa........hhhhhhaaaaiiiiiiiiii.....bbbbbbbaaaabbbuuuuuuu, uuuuufffffffff....dddddaaaiiiiiyyyyyaaaaaa

निकले जा रहा था

उसका मन कर रहा था कि वो अपने पैरों की उंगलियों को आपस में रगड़े पर दोनों पैर के बीच उदयराज बैठा था, एकाएक उदयराज ने उठकर उसकी साड़ी को साये समेत खींचकर दोनों पैर से निकालकर बगल में रख दिया, रजनी ने भी अपने दोनों पैर अच्छे से उठाकर साड़ी को पूरा निकलने में अपने बाबू की मदद की। रजनी के बदन पर अब कमर से नीचे सिर्फ लाल रंग की पैंटी रह गयी थी, उदयराज रजनी के दोनों पैरों के बीच खड़ा मंत्र मुग्द होकर अपनी बेटी की मांसल गोरी गोरी जांघे और घुटने फिर नीचे के पैर घूरता रहा कुछ देर देखता रहा, उसका लन्ड फौलाद की तरह तनकर खड़ा हो चुका था, एक पल को उसे लगा कि वो अपना कंट्रोल खो देगा पर जैसे तैसे अपने को संभाला, रजनी ने चादर के अंदर से अपने बाबू को जब अपनी जांघे और पैंटी के ऊपर से बूर को घूरते देखा तो शर्म से अपने हांथों से अपने चेहरे को ढक लिया जबकि उसने चादर ओढा हुआ था फिर भी लज़्ज़ा वश वह सिरह उठी।

उदयराज पागलों की तरह रजनी के नंगे बदन को घूरे जा रहा था, इतनी सुंदर तो उसकी पत्नी भी नही थी जितनी उसकी बेटी थी, क्या मोटी मोटी गोरी गोरी मांसल जाँघे थी, तभी उदयराज नीचे बैठ गया और अपने दोनों हाथ से पैंटी को पकड़ा जैसे ही रजनी को अपने बाबू की उंगलियां अपनी पैंटी पर कमर के दोनों ओर महसूस हुई उसके बदन में हलचल हुई और सांसे और भी उखड़ने लगी, उदयराज ने पैंटी को नीचे सरकाना चालू किया, एक बार फिर रजनी ने धीरे से oooohhhhh mmmeerrrrreeee bbbbbbaaaabbbuuu बोलते हुए अपने भारी मांसल गुदाज नितम्ब को धीरे धीरे ऊपर ऊठाकर पैंटी को आसानी से निकल जाने में अपने बाबू की भरपूर मदद की

और......

उदयराज ने पैंटी को खींचकर नीचे घुटनों तक उतार दिया और जो उसने देखा उससे उसका मन मयूर और झूम उठा, रजनी ने पैंटी के अंदर भी गुलाब के फूलों की पंखुड़ियों से अपनी प्यारी सी मक्ख़न जैसी मादक कसी हुई जवान बूर को छुपा रखा था। जब उदयराज ने पैंटी को घुटनों तक नीचे उतार दिया तो उसने देखा कि रजनी की बूर पर गुलाब के फूलों की पंखुड़ियां रखी हुई है जिससे उसको देख पाना मुश्किल है, उदयराज अपनी बेटी की इस नटखट अदा पर फिदा हो गया और ताबड़तोड़ उसकी जाँघों और नाभि, कमर के आस पास, और पैरों को चूमने लगा, रजनी hhhhaaaaaiiiiiii, hhhhaaaaaiiiiii करती हुई मादक सिसकारी लेने लगी, अपनी इस शरारत पर वो मुस्कुरा भी रही थी। उदयराज को तो होश ही नही था उसको तो जैसे जन्नत मिल चुकी थी जन्नत।

उदयराज ने जब मदहोशी की हालत में चूमकर उठा तो पास रखे घी के दिये को जलाकर थोड़ा पास रख लिया, अब कोठरी में थोड़ा ज्यादा उजाला हो गया, फिर उदयराज धीरे से रजनी की बूर पर झुका और गुलाब की एक एक पंखुड़ी को अपने होंठों से पकड़कर हटाने लगा, जैसे ही उदयराज की सांसें रजनी के बूर पर लगी, वो तो aaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh.....hhhhhhhhhaaaaiiiiiiiiiiiiii............bbbbbbbaaaaaaaabbbbbbbuuuuu बोलते हुए अपने होंठों को दांतों से दबाकर मचल उठी, उसका निचला बदन हल्का सा थरथरा उठा।

उदयराज ने एक एक करके सारी गुलाब की पंखुड़ियों को हटाकर बूर को पा ही लिया। अब बूर का अंतिम आवरण भी हट चुका था। एक सगी बेटी की बूर उसके पिता के सामने खुल चुकी थी, नियति भी इस महापाप की शुरुवात पर मुस्कुरा उठी।

रजनी की वो प्यारी प्यारी नरम नरम मदहोश कर देने वाली गोरी गोरी बूर उदयराज के आंखों के सामने थी, रजनी अब नीचे से मदरजात नग्न अपने बाबू के सामने पड़ी थी। ऊऊफफ बूर की वो मक्ख़न जैसी फांकें, क्या मस्त बूर थी रजनी की, गोरी गोरी मोटी मोटी मांसल जाँघों के बीच वो बड़ी सी फांकों वाली अपनी सगी बेटी की बूर को देखकर उदयराज बदहवास हो गया, उसे मानो होश ही नही, इतनी सुंदर बूर है उसकी अपनी ही सगी बेटी की, वो फूला नही समा रहा था, उत्तम श्रेणी की बूर थी रजनी की, बड़ी बड़ी नरम नरम फांकें थी बूर की, बूर की फांकों के बीच से हल्का काम रस रिस रहा था, दोनों फांकों पर हल्के हल्के बाल थे और फांकों के बीच प्यारा सा भगनासा हल्का हल्का दिख रहा था, रजनी ने लज़्ज़ा से अपने चेहरे को अपने हांथों से ढक लिया।

बूर के ऊपर हल्के हल्के काले काले बाल थे, बूर के नीचे जाँघों के बीच चटाई पर गुलाब की पंखुड़ियां गिरी हुई थी।

एकएक उदयराज ने बगल में रखा दिया उठा लिया और उसको बूर के पास बूर को अच्छे से देखने के लिए लाया, बूर को दिए कि रोशनी में नजदीक से देखते ही उदयराज ने नशे से एक पल के लिए आंखें बंद कर ली, सांसे उसकी भी उखड़ने लगी, लन्ड ने धोती में हाहाकार मचा रखा था, जैसे अभी इजाजत मिले तो फाड़कर बाहर आ जाये।

एकएक जब रजनी ने देखा कि उसके बाबू दिया उठाकर उसकी बूर नजदीक से देख रहे हैं तो उसने खुद ही अपने दोनों पैर को फैलाने की कोशिश की पर पैंटी अभी घुटनों में फंसी थी।

उदयराज ने ये देखते ही दिया रखकर पैंटी को खींच कर पूरा पैर से बाहर निकाल दिया और बगल में साड़ी के ऊपर रखने ही वाला था कि अपनी सगी शादीशुदा बेटी की काम रस और पेशाब से सनी पैंटी से आती भीनी भीनी महक ने उसका ध्यान खींचा लिया और उसने रजनी को दिखाते हुए उसकी पैंटी को अपनी नाक से लगा के कस के उसे सूंघा और नशे से उसकी आंखें बंद हो गयी, रजनी भी धीरे से खिलखिला के हंस पड़ी पर उसने जल्द ही अपनी आंखें बंद कर ली क्योंकि दो दिए कि रोशनी में अब उसके बाबू चादर के अंदर से हल्के हल्के दिख रहे थे।

उदयराज ने जी भरके पैंटी को सूंघा मानो जैसे को वो अपनी बेटी की कोई भी चीज़ छोड़ना नही चाहता हो, रजनी भी ये सोचकर मुस्कुरा रही थी कि उनकी बेटी की नंगी बूर सामने खुली हुई है और मेरे बाबू अपनी बेटी की कच्छी में उलझे हैं।

पैंटी निकल जाने के बाद रजनी ने धीरे धीरे पैरों को फैलाते हुए घुटनों को मोड़कर अपनी जाँघों को खोलकर फैला दिया, उदयराज ने दिया फिर से उठाकर रजनी की बूर के पास किया।

जाँघों के फैलने से रजनी की बूर फ़ैलती और खुलती चली गयी दोनों फांकों के फैलने से वो प्यारा सा गुलाबी संकरी, छोटा सा बूर का छेद उदयराज की आंखों के सामने आ गया, बूर की cliteries खिलकर बाहर आ गयी और दोनों फांकों के हल्का खुलने से उनके बीच रिस रहे लिसलिसे काम रस से हल्के दो तीन तार बन गए, रजनी की बूर काम रस से सराबोर हो चुकी थी।

बूर की ये आभा देखकर उदयराज से अब बर्दाश्त नही हुआ और कुछ देर बूर को निहारने के बाद झट से उसने दिया बगल में रखा और अपनी नाक अपनी सगी शादीशुदा बेटी के बूर की फांकों के बीच लगा कर एक गहरी सांस खींचकर उसको सूंघा, कामरस और पेशाब की भीनी भीनी गंध उसके रोम रोम तक समाती चली गयी, बूर पर नाक लगाते ही रजनी की जोरदार सिसकी निकल गयी और मचलकर aaaahhhhhhhhhh mmmeeeerrrrreeeee pppppyyyaaaaarrrrrreeeeee bbbaaaaabbbbuuuuuu कहते हुए उसने तड़पकर अपनी कमर से ऊपर का हिस्सा धनुष की तरह ऊपर को मोड़ लिया, जिससे उसकी दोनों विशाल चूचीयाँ ऊपर को उठ गई। उसकी आंखें नशे में बंद हो गयी, एकएक रजनी के हाथ अपने बाबू के सर को पकड़कर अपनी दहकती बूर पर और दबाने तथा बालों को सहलाने के लिए उठे पर कर्म के नियम का ध्यान आते ही वो मन मकोसकर रह गयी और अपनी मुट्ठी भींच कर हाय हाय करने लगी।

उदयराज ने पांच छः मिनट तक रजनी की बूर को खूब जी भरके सूंघा, दोनों हांथों से कभी नरम नरम फांकों को खोलकर सूंघता, और कभी फांकों के बगल, ऊपर, नीचे और भागनाशे को सूंघता, कभी अपनी नाक से भागनाशे को रगड़ता और जब जब ऐसा करता रजनी हाय हाय करने लगती और उसका बदन पूरी तरह हिल जाता, उदयराज का बहुत मन कर रहा था कि वो अपनी सगी बेटी की बूर चाट चाट के खा जाए पर आज रात उसकी इजाजत नही थी। रजनी भी यही चाहती थी पर क्या करे। रजनी की बूर तड़प तड़प कर लिसलिसा काम रस छोड़ने लगी, जो पूरी तरह से उदयराज की नाक और मुँह पर लग चुका था, उदयराज ने बूर से मुँह हटा के काम रस को जीभ निकल कर होठों पे लगे काम रस को चाट लिया, क्योंकि वो आज रात बूर पर न तो जानबूझ कर होंठ लगा सकता था और न ही जीभ।

काफी देर बूर सूंघने के बाद उठकर बैठ गया, मस्त हो चुका था वो अपनी बेटी की बूर सूंघकर, रजनी ने तड़पकर अब अपने पैर सीधे किये और उदयराज पैरों के बीच से उठकर खड़ा हो गया, रजनी ने अपने पैरों को सटा कर बड़ी अदा से एक बार फिर अपनी मदमस्त बूर अपने बाबू के सामने कर दी, खड़े होकर उदयराज ने रजनी की फूली हुए मदमस्त चौड़ी और लंबी बूर को ललचाई नज़रों ने एक बार फिर घूरा, पर अब वक्त पूरा होने वाला था या हो सकता था ज्यादा भी हो गया हो, आज वो अपनी बेटी की बूर देखकर धन्य हो चुका था और अब आगे आने वाले असीम आनंद की कल्पना कर वो वासना से भर गया।

रजनी भी समझ गयी कि अब बाबू जाने वाले हैं वह चाहती तो थी कि अपने बाबू को अपने नितम्ब भी दिखाऊँ पर ये उसने फिर "बाद" पर छोड़ दिया, उदयराज ने बगल में जलता हुआ दिया बुझा दिया और एक बार फिर अपनी बेटी की बूर को झुककर जल्दी से जोर से सूंघा रजनी एकदम से चिहुँक उठी, उदयराज ने फिर बगल में कागज के ऊपर रखे गुलाब की पंखुड़ियों को तोड़ा और और बूर को उससे ढक दिया, रजनी अपने बाबू के इस सम्मान पर गदगद हो गयी, और उदयराज ने साड़ी और साये से रजनी के निवस्त्र हिस्से को ढक दिया फिर चादर उसके ऊपर डाल दी और कागज लेकर वहीं बैठकर कुछ लिखा और अपने खड़े लन्ड को adjust करता हुआ पर्ची को बगल में रखकर कोठरी से बाहर निकल गया।

रजनी काफी देर तक लेटी सिसकती रही उसकी बूर रह रहकर अब भी काम रस छोड़ रही थी।

वो सोचने लगी कि आज आखिर उसके बाबू ने उसकी बूर देख ही ली, एक बाप ने अपनी सगी बेटी की बूर को देख लिया, छू लिया और सूंघ भी लिया, कितना मादक है ये महापाप, ये व्यभिचार, मेरे बाबू मुझे पहले क्यों नही मिले? खैर आखिर मिल तो गए देर से ही सही, कितना मजा आएगा जब वो मुझे तृप्त करेंगे।

यही सब सोचते हुए रजनी काफी देर तक खोई रही फिर सो गई।
 
Comment करने के लिए आपका बहुत बहुत आभार, मेरी ऐसी कोई मंशा नही थी कि मैं अपने readers को wait कराऊँ, जैसे किसी chocolate को एक ही बार में खा के खत्म कर दो तो मजा एक बार आएगा और फिर खत्म पर वही चॉकलेट अगर टुकड़ों में बाट कर थोड़ा थोड़ा खाओगे तो मजा अलग ही आएगा, मुझे तो यही लगा था इश्लिये इस कहानी में ऐसा हुआ, पर फिर भी अगर readers ये चाहते हैं कि सबकुछ जल्दी जल्दी हो तो इस कहानी में आने वाले आगे की चीज़ों को मैं फ़ास्ट रखूंगा, actually मुझे इसका अंदाजा ही नही था, कहानी माइंड में आती गयी और मैं लिखता चला गया, वैसे अगर मेरे रीडर्स को काफी wait करना पड़ रहा है तो मैं माफी चाहता हूं और इसका ध्यान आगे रखूंगा।

आपका बहुत बहुत शुक्रिया।
 
Update- 35

अगले दिन रोज की तरह जब रजनी सुबह 4 बजे सोकर उठी तो उसने देखा कि कमर के नीचे के जिस्म चादर के अंदर पूर्ण नग्न था रात में जो उसके पिता ने साड़ी और साया उसके बदन पर रख दिया था वो करवट बदलते हुए इधर उधर गिर गया था, यह देखकर वो अपने आप में ही शर्मा गयी और बगल में पड़ी पैंटी को उठाकर पहले लेटे लेटे ही पैरों में डालकर जाँघों तक चढ़ाया फिर उठ बैठी और पैंटी पहन ली, खड़ी होकर फिर उसने साड़ी और साया भी पहन लिया, चटाई पर ढेर सारी गुलाब की पंखुड़ियां फैली हुई थी जो रात में हुए बाप बेटी के अत्यंत कामुक पापलीला को बयाँ कर रहे थे, रजनी ने उन्हें हाथ में उठाकर बड़े ही मादक ढंग से सूंघा और मुस्कुरा पड़ी।

आज पांचवा दिन था एकाएक रजनी की नज़र बगल में पड़े कागज पर पड़ी, उसने दिया जलाया और कागज खोला, उसमे लिखा था-

"ऐसी वो तो तुम्हारी माँ की भी नही थी मेरी रानी बेटी, मुझे ऐसी ही वो चाहिये थी, धन्य हो गया मैं तुझे पाकर, अब बर्दाश्त नही हो रहा मेरी बिटिया, आज पांचवी रात होगी और हाय मुझे आज अपनी बेटी के नीचे के होंठ खाने को मिलेंगे"

रजनी मन ही मन पढ़कर मुस्कुरा उठी और सोचने लगी बाबू बर्दाश्त तो अब मुझसे भी कहाँ हो रहा है

उसने फिर एक कागज लिया उसमे मुस्कुराते हुए कुछ लिखा और कल की तरह काकी के हाँथ से उदयराज के तकिए के नीचे रखवा दिया, काकी ने आज वो कागज लेते हुए रजनी को मुस्कुराते हुए देखा तो रजनी शर्मा गयी, काकी को ये तो शक था कि कर्म में कुछ तो रसीला लिखा हुआ है, जो ये बाप बेटी कर रहे हैं, पर एक बड़ी बुजुर्ग होने के नाते उसने बस अभी रजनी और उदयराज के कर्म को सुरक्षा देना ही उचित समझा, वो जानती थी कि एक न एक दिन रजनी उसे ये भेद बताएगी।

उदयराज रोज की तरह उठा और अत्यंत खुशी से बिस्तर समेटने लगा तो कल की तरह आज भी उसे तकिए के नीचे कागज मिला, उसने वो कागज आज भी धोती में ये सोचते हुए खोंस लिया को खेत में अकेले में पढ़ेगा एकांत में।

रोज की तरह फटाफट तो फावड़ा लेकर खेत में पहुँच गया, आज बैल का कोई काम नही था तो वो बस गुड़ाई के लिए फावड़ा लेकर खेत चला गया, बड़ी बेसब्री से उसने वो कागज खोला-

मेरे प्यारे बाबू, अम्मा की कैसी थी कैसी नही ये तो मुझे नही पता, पर मैं अम्मा की जगह नही लेना चाहती, मैं आपकी बिटिया हूँ और बेटी रहकर ही आपका वो प्यार पाना चाहती हूं, मैं हमेशा आपको केवल पिता के रूप में ही सोचकर अत्यंत उत्तेजित हुई हूँ, और आप मेरे बाबू है ही, मुझे आपसे बाबू वाला यौनसुख चाहिए तभी तो ये महापाप फलित होगा न बाबू, और हमारे कुल की रक्षा हो पाएगी, हमे पाप करना है बाबू पाप, और मेरे शुग्गु मुग्गु बाबू उसको बूर बोलते है बूर, अभी कल भी बताया फिर भूल गए उसका नाम। आपकी बेटी की बूर है वो जो आज रात आपको खाने को मिलेगी, मैं बेसब्री से इंतज़ार करूँगी अपने बाबू का। आपकी तरह मैं भी पगला गयी हूँ।

उदयराज ने खुश होते हुए वो कागज मोड़कर रख लिया और खड़े होते हुए लंड को संभाला, दिन भर खेतों में काम करके शाम को घर आया और रोज की तरह सबकुछ वैसे ही बीता और देखते देखते रात हो गयी, सब सो चुके थे आखिर वो पल आ ही गया, उदयराज चुपचाप धीरे धीरे घर में पहुँचा, कोठरी के सामने आके खड़ा हुआ, रजनी को आहट लगते ही वो कसमसाई, आज अपनी बेटी उसे और भी गदराई लग रही थी, बगल में आज भी एक और दिया रखा हुआ था, आज उदयराज बहुत बेसब्र था, रोज की तरह आज भी रजनी ने कोठरी को सुहागरात की तरह सजाया हुआ था, गुलाब के फूलों से सुसज्जित कोठरी अलग ही शोभा बढ़ा रही थी और उफ्फ ये गुलाब और कपूर की महक, दिल खुश कर दे रही थी।

उदयराज बेसब्रों की तरह रजनी की कमर के पास दायीं ओर बैठ गया, कोठरी में बाहर जल रहे दिए कि हल्की रोशनी आ रही थी।

उदयराज ने सबसे पहले पैरों की तरफ से चादर को हटाकर कमर तक कर दिया, आज भी रजनी ने दूसरी लाल साड़ी ही पहनी थी, चादर कमर से ऊपर तक हटते ही नाभि और आस पास का हिस्सा दिखने लगा, नाभि खुलते ही किसी भूखे की तरह उदयराज उस पर टूट पड़ा, एकाएक उसने कई चुम्बन ताबड़तोड़ नाभि पर अंकित कर दिए, रजनी चिहुकते हुए हंस पड़ी अपने बाबू की बेसब्री देखकर, और फिर सिसकने भी लगी, कुछ देर नाभि को चूमने के बाद उसने अपनी जीभ नाभि में घुसेड़ दी, रजनी का पूरा शरीर हिल गया, नाभि का रसपान करने के बाद उदयराज ने आज अपनी बेटी की साड़ी को पैरों की तरफ से ऊपर उठाकर उसे नग्न करके उसका यौवन चखने की सोची, उसने अपनी बेटी के पैरों को बहुत प्यार से निहारा और उन्हें ही देखकर इतना मदहोश हो गया की झुककर अपनी बेटी के पैरों की उंगलियों, अंगूठे और एड़ी को चूमने और चाटने लगा, रजनी एक बार फिर अपने बाबू की इस तड़प पर खिलखिलाकर सिसकते हुए हंस दी और अपने पैर की उंगलियों को आपस में वासना से बेकाबू होकर रगड़ने लगी।

फिर जैसे ही उदयराज ने पैर के पास साड़ी को उठाने के लिए पकड़ा, रजनी ने अपने दाहिने पैर के पंजे को "ना" में हिलाते हुए इशारा किया। (जैसे हम सर हिलाकर ना करते हैं)

उदयराज अपनी बेटी की इच्छा को समझ गया की वो चाहती थी कि साड़ी को ऊपर की तरफ से खोलकर कल की तरह खींचकर पूरा निकाल दें ताकि पैर से लेकर नाभि तक का पूरा हिस्सा बिल्कुल नग्न हो जाये और पूरे पैर अच्छे से फैलाये जा सकें, उदयराज अपनी बेटी की इस कामुक इच्छा को भांपते ही बड़े प्यार और दुलार से उसके दाहिने पैर जो की "ना" का इशारा करते हुए हिल रहे थे, ताबड़तोड़ चूमने लगा, रजनी फिर हंस पड़ी अपने बाबू के इस प्यार और दुलार पर।

आख़िरकर उदयराज ने साड़ी को ऊपर से खोलने के लिए हाथ बढ़ाया और साड़ी के अंदर हाथ डालकर नाड़े को खींचकर खोल दिया फिर रजनी के दोनों पैरों के बीच आकर साड़ी को साये समेत कमर से पकड़कर नीचे खींच दिया, आज रजनी ने पैंटी नही पहनी थी। रजनी ने अपने भारी गुदाज नितम्ब उठाकर साड़ी को निकल जाने में अपने बाबू की भरपूर मदद की।

बाहर जलते दिये कि हल्की रोशनी में एक बेटी की मदमस्त फाँकों वाली कसी कसी कमसिन, वासना में फूली हुई, हल्का हल्का काम रस छोड़ती हुई बूर उसके पिता की नज़रों के सामने उजागर हो गयी। उदयराज आंखें फाड़े कुछ देर अपनी सगी बेटी की बूर निहारता रहा, उसकी बनावट और आकार, उसकी आभा देखकर वासना से भर गया, कैसी फूली हुई बूर थी, मोटी मोटी दोनों मांसल जांघों के बीच वो अंग्रेजी के वी "\!/" जैसा आकार लिए करीब पांच पांच इंच लंबे दोनों फांक आपस में सटे हुए थे, मानो बूर के अंदर रखे असीम सुख के खजाने की रक्षा कर रहे हों। हल्के काले काले बालों से बूर हल्की छिपी हुई सी लगती थी।

उदयराज ने अपनी सगी बेटी की बूर को अभी कल ही देखा था आज दूसरा दिन था फिर भी उसे ऐसा लग रहा था जैसे पहली बार देख रहा हो।

आज अपनी बेटी के पैंटी न पहनने पर उदयराज उसकी मंशा जान गया और बेताब होते हुए उसने एक ही झटके में साड़ी और साये हो खींचकर पैर से निकाल कर बाहर कर दिया।

और फिर बिना समय गवाये वासना से वशीभूत शेर की तरह दहाड़ता हुआ अपनी सगी बेटी की बूर पर टूट पड़ा, उसने अपने होंठों से अपनी सगी बेटी की बूर पर एक बहुत जोरदार और कामुक चुम्बन जड़ दिया, खुद आज उसके मुँह से बड़ी ही मादक आवाज में aaaaahhhhhhhhhh bbbbbbeeetttttiiii निकला।

अपने बाबू का अचानक अपने बूर पर जोरदार चुम्बन पा के रजनी का बदन सर से लेकर पाँव तक सरसराहट में हिल गया, अंग अंग थरथरा उठा, बड़ी ही तेज और मादक आवाज में उसने भी aaaaaaaaaahhhhhhhhhh.....bbbbbbbbbaaaaaaaabbbbbbbbuuuuuuu

बोलते हुए अपने पैरों को हवा में जितना हो सके फैलाते हुए अपनी कसी कसी मांसल जाँघों को खुलकर अपने बाबू के लिए खोल दिया, जिससे उनकी बूर उभरकर उदयराज के मुंह के सामने आ गयी और दोनों फांकें खुलकर फैल गयी, हल्के दीये कि रोशनी में उदयराज अपनी सगी बेटी की फैली हुई बूर को देखकर और भी पागल हो गया और उसने अपनी लंबी सी जीभ निकाली, फिर जीभ को बूर के नीचे अंतिम छोर पे गांड की छेद के पास लगाया और सर्रर्रर्रर्रर से पूरी बूर को चाटता हुआ नीचे से एकदम ऊपर तक आया, अपने बाबू के ऐसा करने से रजनी बौखला गयी और मदहोशी में अपनी आंखें बंद करके अपने होंठों को दांतों से काटते हुए बड़ी जोर से सिसकी और uuuuuuiiiiiiiiiiiiii mmmmmaaaaaaaaaaaaaa बोलते हुए

पूरे बदन को धनुष की तरह ऊपर को मोड़ती चली गयी, उसकी विशाल चूचियाँ तनकर ऊपर को उठ चुकी थी और निप्पल तो इतने सख्त हो गए थे कि वो खुद ही उन्हें हल्का हल्का मसल रही थी।

बूर की पेशाब और काम रस की गंध से उदयराज पागल हो चुका था, उसने इसी तरह कई बार पूरी पूरी बूर को नीचे से लेकर ऊपर की तरफ विपरीत दिशा में लप्प लप्प करके चाटा, जब उदयराज बूर के ऊपरी हिस्से पर पहुचता तो बूर के ऊपर बालों में अपनी जीभ फिराता और फिर जीभ को फैलाके गांड की छेद के पास रखता और फिर सर्रर्रर्रर्रर्रर्रर से लपलपाते हुए पुरी बूर पर जीभ फिराते हुए ऊपर की ओर आता और कभी तो वो ऊपर आकर बूर के ऊपर घने बालों पर जीभ फिराता कभी जहां से दरार शुरू होती है वहां पर जीभ को नुकीली बना कर दरार में डुबोता और भगनासे को जी भरकर छेड़ता, फिर भगनासे के किनारे किनारे जीभ को गोल गोल घूमता।

रजनी की पूरी बूर उदयराज के थूक से गीली हो चुकी थी, उसकी बूर से निकलता काम रस उदयराज बराबर अपनी जीभ से चाट ले रहा था, पूरी कोठरी में हल्की हल्की चप्प चप्प की आवाज के साथ दोनों बाप बेटी की सिसकियां गूंजने लगी।

उदयराज ने फिर एक बार अपनी जीभ को नीचे गांड के छेद के पास लगाया और इस बार उसने जीभ को नुकीला बनाते हुए जीभ को अपनी बेटी की बूर की दरार में नीचे की तरफ डुबोया और दरार में ही डुबोये डुबोये नुकीली जीभ को नीचे से खींचते हुए ऊपर तक लाया, पहले तो एक बार जीभ रजनी की बूर के संकरी छेद में घुसने को हुई पर फिर फिसलकर ऊपर चल पड़ी और भगनासे से जा टकराई, फिर उदयराज ने वहां ठहरकर भगनासे को लप्प लप्प करके कई बार चाटा।

रजनी के बदन की एक एक नस आनंद की तरंगों से गनगना उठी, बड़ी ही तेज तेज उसके मुँह से अब सिसकियां निकल रही थी मानो अब लाज, संकोच और डर (की कोई सुन लेगा) जैसे हवा हो चुका था, अपने पैरों को मोड़कर उसने अपने बाबू की पीठ पर रख लिया था, गनगना कर कभी वो अपने बाबू को पैरों से जकड़ लेती कभी ढीला छोड़ देती। बेतहासा कभी अपना सर दाएं बाएं पटकने लगती, कभी अपने हांथों से चूचीयों को कस कस के मीजती, चादर उसका उनके चेहरे से हट चुका था पर वो नीचे की तरफ नही देख रही थी, उसकी आंखें अत्यंत नशे में बंद थी, कभी थोड़ी खुलती भी तो वो हल्का सा कोठरी की छत को देखती।

उनकी सांसे बहुत तेज ऊपर नीचे हो रही थी, लगातार उसके बाबू उसकी बूर को एक अभ्यस्त खिलाड़ी की भांति चाटे जा रहे थे, जीवन में पहली बार ढंग से किसी मर्द की जीभ उसकी बूर पर लगी थी और वो भी खुद उसके सगे पिता की, आज पहली बार वो अपने बाबू से अपनी बूर चटवा रही थी, इतना परम सुख उसे कभी नही मिला। उदयराज की मर्दाना जीभ की छुअन से रजनी नशे में कहीं खो गयी थी।

नियति भी इन बाप बेटी के धैर्य को देखकर चकित थी, दोनों ने ही अपने कामोन्माद को किस तरह काबू किया हुआ था, कोई और होता तो अब तक सब भूल कर संभोग कर चुका होता, क्योंकि सगे बाप बेटी के रिश्ते में छुप छुप के हुए इस व्यभिचार में ख़ुद को इतना संभाले रहना सबके बस की बात नही।

पूरी कोठरी में बूर चाटने की चप्प चप्प आवाज सिसकियों के साथ गूंज रही थी। एकएक उदयराज को कुछ कमी महसूस हुई वो और ज्यादा गहराई से अपनी सगी बेटी की बूर को खाना चाहता था, उसने रजनी के बूर से मुँह हटाया तो उसके होंठों और रजनी की बूर की फाँकों के बीच लिसलिसे कामरस और थूक के मिश्रण से दो तीन तार बन गए, उदयराज ने बड़ी मादकता से उसे चाट लिया और उठने लगा।

रजनी ने झट से चादर चहरे पर डाल लिया और असमंजस में सोचने लगी कि क्या बाबू आज इतनी जल्दी चले जायेंगे? नही नही, इतनी जल्दी नही जाना चाहिए बाबू को, मुझे अभी और चुम्बन चाहिए अपनी बूर पर, वो थोड़ा दुखी हो गयी, उदयराज झट से कोठरी से बाहर गया, रजनी ने उदासी से ये सोचकर अपने पैर नीचे कर लिए की आज बस इतना ही, वो ऐसे ही चटाई पर जांघ फैलाये पैर नीचे किये लेटी रही, लेकिन उसका दिल कह रहा था कि उसके बाबू गए नही हैं, जरूर कोई बात है, क्योंकि जाते तो वो अपनी बेटी की बूर को ढककर जाते, सम्मान दे के जाते, आखिर वो इंतज़ार करने लगी उनके आने का। उसने अपनी बूर को स्वयं ढका भी नही वैसे ही बूर खोले लेटी रही।

उदयराज कोठरी से निकलकर अपना दहाड़ता हुआ खड़ा लंड लेकर बरामदे में अंधेरे में तकिया ढूंढने लगा पर उसे वहाँ तकिया मिला नही।

फिर उसे अपने बिस्तर का ध्यान आया कि उसके बिस्तर पर तकिया रखा हुआ है, वो अपना तना हुआ लंड लेकर धीरे से दरवाजा खोलकर बाहर गया, बाहर गुप्प अंधेरा था, दरवाजे की हल्की सी खुलने की आहट से रजनी एक बार फिर पूरी तरह उदास हो गयी उसे लगा कि बाबू तो सच मे चले गए, पर फिर भी उसका मन नही माना और वो इंतज़ार करती रही, उसे विश्वास था कि उसके बाबू ऐसे नही जा सकते।

उदयराज धीरे से अपने बिस्तर से बेहद मुलायम तकिया उठा लाया और घर का दरवाजा खोल अंदर आ गया, रजनी दुबारा दरवाजे के खुलने की आहट से प्रफुल्लित हो उठी और चादर को अच्छे से ओढ़ लिया।

उदयराज ने रजनी के पैर को उठाया तो रजनी ने स्वयं ही पैर हवा में उठा कर जाँघों को पूरा फैलाकर अपनी प्यारी फूली हुई बूर एक बार फिर अपने बाबू के सामने खोलकर परोस दी।

उदयराज ने जब रजनी की गांड के नीचे हाथ लगा के उसे गांड को ऊपर उठाने का इशारा किया तो रजनी ने एकदम से अपनी गांड को ऊपर उठा लिया, उदयराज ने जब गांड के नीचे तकिया लगाया तब रजनी को समझ आया कि उसके बाबू तकिया लेने गए थे ताकि बूर और खिलकर ऊपर को उठ सके, वो मंद मंद मुस्कुरा उठी।

अब वो गांड के नीचे तकिया लगाए अपने दोनों पैर हवा में विपरीत दिशा में फैलाये, अपनी जाँघों को अच्छे से खोले और बूर को एकदम से ऊपर उठाकर अपने बाबू के सामने मदरजात नंगी पड़ी थी, तकिया लगने से उसकी कमर का हिस्सा ऊपर उठ गया था और अब नीचे से उसकी गांड का काफी हिस्सा भी दिख रहा था।

उदयराज ने बगल में पड़े दिए को भी जला दिया

अब तो रजनी ने शर्म की वजह से अपना चेहरा अपने हाथों से ढक लिया क्योंकि उसकी बूर अब पूरा उभरकर उसके बाबू के सामने आ गयी थी और अब कोठरी में रोशनी भी ज्यादा हो गयी थी।

दिये कि तेज रोशनी में जब उदयराज ने अपनी बेटी की मोटी मोटी गोरी शख्त फैली हुई जाँघे, पैर, कमर और नाभि तथा नाभि के आस पास का हिस्सा, जाँघों के नीचे तकिए पर भारी भारी उन्नत मांसल नितम्ब का कुछ निचला हिस्सा, और काम रस तथा थूक से सनी, फूली हुई काले काले हल्के बालों वाली गोरी गोरी बूर जिसकी फांकें फैलने की वजह से हल्की खुली हुई थी और भगनासा खिलकर बाहर निकला हुआ था, देखा तो उदयराज दुबारा पागल होने लगा।

उसने दहाड़ते हुए अपनी दो उंगलियों से अपनी बेटी की बूर की फांकों को अच्छे से चीरा, एक तो जांघे फैलने से बूर पहले ही खुली हुई थी ऊपर से उदयराज ने उंगलियों से फांकों को और चीर दिया जिससे बूर का लाल लाल संकरी छेद और भगनासा दीये की रोशनी में चमक उठा, उदयराज लपकते हुए बूर पर बेकाबू होकर टूट पड़ा और जीभ से बूर के लाल लाल कमसिन कसे हुए छोटे से छेद को बेताहाशा चाटने लगा।

रजनी का बदन अचानक ही बहुत तेजी से थरथराया और रजनी ने aaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhhhh, uuuuuuuuuiiiiiiiiiiiiiiiiimmmmmmaaaaaaaaaaaaaaaa कहते हुए बड़ी मुश्किल से अपनी आवाज को सिसकते हुए दबाया।

उदयराज लप्प लप्प जीभ से अपनी बेटी की बूर के छेद को चाटे जा रहा था, रजनी फिर से तड़प तड़प कर अपना सर दाएं बाएं पटकती, पूरा बदन ऐंठती, गनगना जाती, अपनी मुठ्ठियों को कस कस के भीचती, तो कभी अपने स्तन भींच लेती, अपने पैरों को उसने फिर से अपने बाबू की पीठ पर लपेट दिया और जब जब उसका बदन थरथराता वो अपने पैरों से अपने बाबू को जकड़ लेती।

उदयराज ने थोड़ी देर अपनी बेटी की बूर के छेद को चाटा फिर अपनी जीभ को नुकीला किया और बूर के नरम नरम छोटे से लाल लाल छेद के मुहाने पर गोल गोल घुमाने लगा, रजनी अब जोर जोर से काफी तेज तेज छटपटाने और सिसकने लगी, उसे क्या पता था कि उसके बाबू बूर के इतने प्यासे हैं, वो बूर के इतने अच्छे खिलाड़ी हैं, वो बूर चाटने में इतने माहिर है, ऐसा सुख तो उसके पति ने कभी सपने में भी नही दिया, उसे पता लग चुका था कि उसके बाबू अपनी सगी बेटी की बूर के कितने भूखे हैं। कोठरी में काफी तेज तेज सिसकारी गूंजने लगी।

उदयराज ने एक बार फिर से पूरी बूर को नीचे से ऊपर की ओर अपनी जीभ से लपलपा के चाटा, उदयराज का अब इरादा था अपनी जीभ अपनी बेटी के बूर की छेद में डालने का पर इतने भर से ही रजनी अब काफी त्राहि त्राहि करने लगी, उसके मुँह से अब थोड़ी ज्यादा जोर से hhhhhhhhhaaaiiiiiiiiiiiii. bbbbbaaabbbbuuuuu.........uuuuuuuufffffff. bbbbbbaaaaaabbbbbbuuuuuuu, mmmmaaaaarrrrrrr jjjjaaauuungggiii bbaaaabbuuu सिसकते हुए निकलने लगा।

उदयराज को अपनी प्यारी बेटी पर तरस आया, वो सोचने लगा की अगर वो और ज्यादा करता है तो ये उसके साथ अन्याय होगा क्योंकि वो क्या पता बर्दाश्त न कर पाए और कर्म का नियम तोड़ बैठे।

उसकी प्यारी बेटी जब उसे प्यार से अपना यौवन चखा रही है तो उसे उसकी तड़प का ध्यान रखना चाहिए क्योंकि इस वक्त वो उसकी प्यारी सी कमसिन सी दहकती बूर में अपना 9 इंच का फ़ौलादी लंड घुसाके उसे चोद तो सकता नही, और न ही इस वक्त रजनी योनि चुम्बन से झड़ना चाहती है, (वो जानता था कि उसकी सगी बेटी भी कई वर्षों से लंड की प्यासी है और वो झडेगी तो सिर्फ अपने बाबू के लंबे और मोटे लंड की रगड़ से)

तो हद से ज्यादा तड़पाकर उसकी दिमाग की नसों पर ज्यादा जोर डालना अच्छी बात नही।

ये सोचते हुए उसने अपनी बेटी की बूर से धीरे से अपना मुँह हटाया, पर फिर एकदम से सटा कर कुछ देर ऐसे ही लेटा रहा, काम रस रजनी की बूर से रिसता रहा और उदयराज उसे धीरे धीरे चाटता रहा, रजनी की उखड़ती सांसे धीरे धीरे थोड़ी कम हुई, एक अंतिम चुम्बन लेते हुए उदयराज उठ बैठा, रजनी ने अपने पैर चटाई पर अपने बाबू के अगल बगल रख दिये, उदयराज ने रजनी की साड़ी और साया उठाया और अपनी बेटी की बूर को सम्मान पूर्वक ढक दिया, रजनी समझ गयी कि अब उसके बाबू जा रहे हैं, अपने बाबू द्वारा दिये जाने वाले सम्मान से वो गदगद हो गयी, उसकी बूर से अभी भी रस बह रहा था, बदन अभी भी हल्का हल्का कामवेग से थरथरा जा रहा था।

उदयराज ने बगल में रखा दिया बुझा दिया और रजनी की गांड के नीचे से तकिया निकाला और आज कागज पर बिना कुछ लिखे उसको वहीं छोड़कर तकिए पर लगे काम रस को सूंघता हुआ कोठरी से बाहर निकल गया।
 
Update- 36

उदयराज तकिए को नाक से लगाये सूंघता हुआ घर से बाहर निकला और धीरे से जाकर कुएं के पास अपनी खाट पर औंधे मुंह लेट गया काफी देर तक वो अपनी बेटी की बूर का काम रस लगा तकिया सूंघता रहा, जब जब आंख बंद करता ऐसा लगता रजनी की बूर ठीक उसके मुंह के सामने है उन नरम नरम लज़्ज़त भारी फांकों की छुअन, हल्के हल्के बूर के बाल और लिसलिसे काम रस की महक उसके मन मस्तिष्क पर चढ़ गई थी, काफी देर तक तो वो पागलों की तरह तकिए को ही दुलारता रहा फिर उससे रहा नही गया और वह खाट पर पेट के बल लेट गया, उसने लेटे लेटे रात के अंधेरे में अपना फौलाद हो चुका 9 इंच लंबा और 4 इंच मोटा लंड धोती में से निकालकर, बेटी की बूर का काम रस लगा तकिया ठीक लंड के नीचे रखा और काफी देर तक हौले हौले धक्का मारते मारते ये सोचते हुए की उसका फ़ौलादी लंड अपनी बेटी की मक्ख़न जैसी बूर में डूबा हुआ है सो गया।

इधर रजनी भी बदहवास सी अपनी उखड़ती सांसों को संभालती लेटी रही, काफी देर तक उसकी बूर हल्का हल्का संकुचित होती रही और हल्का कामरस रिस रिसकर उसकी जाँघों में गिरता रहा, उसे ऐसा लग रहा था कि उसके बाबू की मर्दाना जीभ अब भी उसकी बूर को नीचे से ऊपर लपलपा के चाट रही है, किस तरह उसके बाबू उसकी बूर चाट रहे थे, haaaaiiiiiii अब तो अपनी बेटी की बूर का एक एक कोना उन्होंने अच्छे से देख लिया, छू लिया और चूम लिया है, फिर सिसकते हुए, मंद मंद मुस्कुराते हुए वो भी धीरे धीरे सो गई।

सुबह करीब 4:30 तक रजनी एक मादक अंगडाई लेकर उठी तो देखा कि कमर से नीचे से तो वो निवस्त्र है केवल चादर ही उसके तन पर पड़ा था, रोज की तरह उसने जल्दी से अपनी साड़ी बांधी और रात की बात याद आते ही बूर में उसके फिर से हलचल सी होने लगी, अपने को बड़ी मुश्किल से संभालते हुए उसकी नज़र कागज कलम पर पड़ी।

उसने देखा कि कल रात बाबू ने उसके लिए कुछ लिखकर छोड़ा नही, और आज 6ठे दिन का ध्यान आते ही रजनी का मन अंगडाई लेकर झूम उठा, क्योंकि आज होना था उल्टा, इस ख्याल से ही रजनी का बदन सुबह सुबह भोर में ही गनगना गया, आज उसे वो देखने, छूने, सहलाने और चूमने को मिलेगा जिसकी कल्पना मात्र से ही वो सिरह जाती थी, सोचते ही शर्म के मारे उसका चेहरा लाल हो गया, आखिर एक बेटी अपने ही सगे पिता के उस अंग को कैसे खोलेगी, कैसे देखेगी, कैसे छुएगी और फिर कैसे चूमे......। कितनी शर्म आएगी, आखिर वो उसी से पैदा हुई है, देखने में कैसा होगा वो, न जाने कितना लंबा और मोटा होगा वो।

ये सोचते ही बदन उसका पुनः गनगना गया, निप्पल सख्त होने लगे, अभी तक जो हुआ उसे ही बर्दाश्त कर पाना मुश्किल था और आज जो होगा......uuuuufffff, कहीं वो अपना नियंत्रण न खो बैठे, पर अभी पूरा दिन बाकी था।

रजनी ने कुछ सोचकर कागज कलम उठाया और शर्माते हुए कुछ लिखने लगी, तब तक 5 बज चुके थे उसने चुपके से बाहर जा के वो कागज काकी को दिया, काकी उसको देखकर मुस्कुराने लगी तो वो भी शर्मा गयी और आज के कर्म के बारे में समझाते हुए बोली- काकी आज रात मैं बाहर सोऊंगी और बाबू अंदर। काकी मंद मंद मुस्कुराती रही फिर रजनी का हाथ अपने हाथों में लेकर बोली- मेरा आशीर्वाद तुम दोनों के साथ है, महात्मा द्वारा बताया गया कर्म पूर्ण रूप से फलित हो, मुझे ये तो नही पता कि कर्म में क्या लिखा था पर जो भी हो उसमे तू मेरी तरफ से निश्चिन्त रहना मेरी बच्ची, हर वक्त मैं तुम दोनों के साथ हूँ, रजनी गदगद होकर काकी से लिपट गई, काकी कुछ देर रजनी के सर को सहलाती रही फिर बाहर आ गयी।

बाहर हल्का अंधेरा था, अपनी बेटी को लेकर राजनी घर में आ गयी, उसके बाबू जहां लेटे थे उस तरफ उसने देखा भी नही।

काकी जब वो कागज उदयराज के पास खाट पे रखने आयी तो देखा उदयराज पेट के बल सो रहा था और तकिया उदयराज के सर के पास न होकर जांघ के नीचे दबा हुआ है, काकी ने सोचा पहले तो कभी उदयराज को ऐसे सोते हुए देखा नही, कुछ तो हलचल है इन बाप बेटी की जिंदगी में पर जो भी होगा अच्छा ही होगा, ये सोचकर उसने वो कागज वहीं सिरहाने की तरफ बिस्तर के नीचे डाल दिया और दबे पांव आ गयी।

उदयराज कुछ देर बाद जब अंगडाई लेता हुआ उठा तो उसने देखा कि धोती उसकी अस्त व्यस्त है और तकिया जाँघों के पास है फिर रात का ध्यान आते ही हल्की सी वासना की खुमारी उसके बदन में दौड़ गयी और आज तो छठा दिन था, काफी देर खाट पे ही बैठे बैठे वो मुस्कुराते हुए सोचता रहा कि उसका किसी और चीज़ में मन नही लग रहा, अब हर वक्त अपनी सगी बेटी रजनी का ही ख्याल रहता है मन मस्तिष्क में, सोकर उठते ही और फिर रात को जब तक सो न जाओ हर वक्त उसका मुस्कुराना, हंसना, उसके होंठ, होठों की लाली, उसका गदराया यौवन, उसकी मांसल जाँघे, उसके उन्नत स्तन और हाय उसकी मक्ख़न जैसी कमसिन बूर। मेरी जिंदगी को उसने रंगों से भर दिया है, कितना मजा है अपनी ही सगी बेटी के साथ छुप छुप कर उसका साथ पाते हुए, उसकी मर्जी से किये गए इस पाप के आनद में। मुस्कुराते हुए वो आज की आने वाली रात को याद करते हुए उठा और अपनी धोती पहले सही की फिर बिस्तर समेटने लगा जैसे ही उसने बिस्तर उठाया उसके नीचे कागज पड़ा था, कागज उठा के उसने धोती में खोंस लिया और काकी की तरफ देखा, काकी उस वक्त बैलों और गायों को चारा डाल रही थी, बिस्तर समेटकर वो नित्यकर्म से फारिग हुआ, तब तक 7 बज चुके थे।

उदयराज ने जल्दी जल्दी नाश्ता किया और बैल व हल लेकर खेतों की तरफ निकल गया आज उसे कुल वृक्ष के पास वाले खेत की जुताई करनी थी वह खेत कुल वृक्ष से करीब 100 मीटर की दूरी पे था, खेत में पहुचते ही उसने हल को बैलों के बीच सेट किया और उनको वहीं छोड़कर खेत की मेड़ पर बैठ गया, धोती में खोसा हुआ कागज जल्दी से निकाला उसमे लिखा था-

"मेरी प्रिय बाबू, मेरे शुग्गु मुग्गु, मेरे राजा, आज मैं बाहर सोऊंगी और आप अंदर, मैं रात का खाना बनाकर और जब सब लोग खा लेंगे तो कुछ देर के लिए दालान की तरफ टहलने चली जाउंगी और आप फिर घर में चले जाना और मेरा इंतज़ार करना। बस आज की रात और सब्र करना है हमे।"

उदयराज के मन में मानो हज़ारों शहनाइयाँ एक साथ बजने लगी, खुशी खुशी वो उठा और खेत जोतने लगा, फिर शाम को घर वापिस लौटा रास्ते में जब वो नीलम के घर के पास से गुजर रहा था तो उसने नीलम को उसके घर के आगे कच्ची सड़क के पास लगे धतूरे के पौधों से उसकी पत्तियां तोड़ते देखा।

उदयराज- अरे नीलम बिटिया क्या हुआ?, धतूरे के पत्ते का क्या काम आ गया, सब ठीक तो है।

नीलम- बड़े बाबू नमस्ते (नीलम ने पलटकर उदयराज को देखा तो नमस्ते किया)

उदयराज- नमस्ते मेरी बिटिया, क्या हुआ?

नीलम- अरे बाबू, मेरी ही गलती की वजह से मेरे बाबू को हाथ में थोड़ा गुम चोट लग गयी है। वो तो नीचे खाट थी नही तो काफी चोट लग सकती थी।

उदयराज- कैसे?

नीलम- अरे वो द्वार पर जो जामुन का पेड़ है न उसमे बहुत मीठे मीठे जामुन लगे हैं, उसदिन अपने भी तो देखा था।

उदयराज- हाँ हाँ, फिर

नीलम- आज सुबह मेरा मन था जामुन खाने का तो मैंने बाबू को सुबह बोला, नही तो वह फिर कहीं चले जाते काम से, पहले तो बाबू ने बोला कि ठीक है मैं तोड़ देता हूँ पर फिर मैं ही जिद करके पेड़ पर चढ़ गई और बाबू नीचे खाट डालकर उसके पास खड़े थे मैं जामुन तोड़ तोड़ के नीचे खाट पे फेंक रही थी कि अचानक मेरा पैर फिसला और मैं सीधा बाबू के ऊपर गिरी, वो तो खाट थी तो हम दोनों ही खाट पर गिर पड़े नही तो काफी चोट लग जाती, और तो और डाल भी टूट गयी पर गनीमत थी कि डाल हमारे ऊपर नही गिरी आधी टूटकर लटक गई, तो अम्मा ने बोला कि जा हल्दी और फिटकरी गरम करके धतूरे का पत्ता ऊपर से लगा के हाथ में बांध दे, दो तीन बार दिन में बदल बदल के बांध सही हो जाएगा, तो दिन में सुबह एक बार बांधी थी और फिर अभी बांधने जा रही हूं।

उदयराज- लो इतना कुछ हो गया और हमे पता भी नही, चल जरा देखूं कैसा है बिरजू।

फिर उदयराज नीलम के साथ उसके घर गया बिरजू को देखने, तो उसको शाम तक काफी आराम था, सीधे वाले हाँथ में पूरे हाँथ में सूजन थी, पर अब थोड़ा कम हो गयी थी, फिर उदयराज कुछ देर वहां रुका और हाल चाल पूछकर घर आ गया।

(नीलम और बिरजू की ये कहानी और विस्तार से अगले कुछ आने वाले updates में दूंगा, अभी चलते हैं आगे की ओर)

उदयराज बिरजू को देखने चला गया था इस वजह से घर शाम 7 बजे तक पहुचा तो काकी को बताने लगा।

काकी भी चकित रह गयी और बोली- इतना बड़ा हादसा होते होते बच गया और हमे कुछ पता भी नही चला, इस जामुन के चक्कर में किसी दिन अपना और दुसरों का भी हाथ पैर तुड़वा बैठेगी ये लड़की, बताओ शादीशुदा जवान लड़की का भारी भरकम शरीर इतने ऊपर से गिरेगा तो चोट तो लगेगी न, वो तो गनीमत है कि खाट थी, जामुन की डाल वैसे ही नाजुक होती है, चढ़ना ही नही चाहिए था, खैर काल जाउंगी दिन में रजनी को लिवा के देखने।

उदयराज- हां जरूर चली जाना। वैसे अब काफी आराम है।

काकी- चल अब तू नहा ले थोड़ी गर्मी भी है आज, रजनी खाना बना रही है, बैलों को मैं चारा डाल देती हूं।

उदयराज नहाने चला गया फिर आ के काकी के ही पास आकर खाट पर लेट गया, दालान के पास लालटेन हल्की रोशनी फैला रहा था, आज अमावस्या से एक दिन पहले की रात थी।

सब कुछ प्लान के मुताबिक ही हुआ, पहले तो काकी ने उदयराज को बाहर खाना ला के दिया उसने खाना खाया, फिर काकी और रजनी ने घर में खाना खाया, खाना पीना होने के बाद काकी के इशारे से कहने पर उदयराज कुएं की तरफ चला गया और रजनी घर से बाहर आकर दालान की तरफ चली गयी, फिर उदयराज घर में चला गया और रजनी काकी के पास आकर बाहर खाट पर लेट गयी।

रजनी आज पूरे 5 दिन बाद बाहर लेट रही थी, ठंडी ठंडी हवा उसके गदराए बदन से टकराकर अंदर तक झुरझुरी पैदा कर रही थी, बेटी उसकी सो चुकी थी, पर उसकी आँखों में नींद का नामो निशान नही था। काकी ने उसको नीलम और बिरजू की बात बताई तो वो भी चकित रह गयी और उसने भी काकी के साथ कल दिन में उसके घर चलने को कहा। रजनी ने काकी के पास अपनी बेटी को पहले ही उठाकर लिटा दिया और काकी ने उसके ऊपर अपना आँचल डाल दिया, धीरे धीरे 11 बज गए, जैसे जैसे वक्त नजदीक आता जा रहा था रजनी की सांसें बढ़ती जा रही थी साथ ही साथ उसे अपनी बूर में चीटियाँ सी रेंगती महसूस हो रही थी, मदहोश होकर वो कभी पेट के बल तो कभी पीठ के बल खाट पर लेटती रही, धीरे धीरे काकी बात करते करते नींद के आगोश में चली गईं।

वक्त आ गया था अब घर में अपने बाबू के पास जाने का, रजनी खाट से उठी और दालान के पास जाके जल रहे लालटेन को बुझा दिया और आके एक बार काकी और अपनी बेटी को देखा फिर बेचैनी से घर के दरवाजे की तरफ बढ़ी, दरवाजे पर हल्का सा हाथ रखते ही वो हल्का सा आवाज करते हुवे खुल गया, उदयरक चटाई पर लेटा था अपनी बेटी के घर में दाखिल होने की आवाज सुनकर उसने चादर ओढ़ लिया, कोठरी रोज की तरह सजाई हुई थी

पर आज गुलाब और सफेद चमेली के फूलों से सजी कोठरी अलग ही मदहोशी का माहौल बना रही थी और ऊपर से उदयराज ने आके जब कपूर जलाया था तो कोठरी अत्यंत महक उठी थी।

रजनी बरामदे से गुप्प अंधेरे में होती हुई आंगन तक धीरे धीरे चलते हुए अपनी पायल खनकाते हुए पहुँची, कोठरी के आगे रखा दिया हल्की रोशनी चारों तरफ फैला रहा था, पायल की छन्न छन्न करती हुई रजनी कोठरी के दरवाजे तक पहुँची तो अंदर देखा कि उसके बाबू चादर ताने चटाई पर लेटे हुए हैं। बगल में रोज की तरह एक दिया और रखा है।

रजनी की सांसें थोड़ी तेज हो चली थी, उदयराज ने जब देखा कि उसकी बेटी उसके पास आ चुकी है तो उसने अपना ध्यान जान बूझ कर थोड़ा इधर उधर लगाया ताकि उसका लन्ड पहले ही हाहाकार न करने लगे, पर होनी को कौन टाल सकता है लाख कोशिश के बाद भी उसके लन्ड में थोड़ी हलचल तो होने ही लगी थी।

रजनी धीरे से आके अपने बाबू के बगल में दायीं ओर कमर के पास बैठ गयी, अभी केवल बाहर का दिया जल रहा था तो कोठरी में रोशनी काफी हल्की थी।

थोड़ी देर तक वो अपने बाबू के बलिष्ट शरीर को चादर के ऊपर से निहारती रही फिर एकाएक उसने अपना हाथ उठा कर अपने बाबू की जांघ पर रखना चाहा पर झट से पीछे हटा लिया और बाबू के मुंह की तरफ देखने लगी, उदयराज ने चादर पूरा सर से पांव तक तान के ओढ़ रखा था और अंदर धोती में उसका बलशाली लन्ड हिचकोले ले रहा था।

रजनी ने इस बार अपना हाँथ चादर के अंदर डाला और सीधे पैर के ऊपर घुटनों से नीचे जहां पर धोती खत्म हो रही थी वहां रखा।

अपनी सगी बेटी का हाथ और उसकी नरम नरम उंगलियां अपने सीधे पैर पर पड़ते ही उदयराज का लन्ड लाख रोकने के बाद भी फ़नफना ही गया, बेटी की छुअन से उदयराज का रोवाँ रोवाँ खड़ा हो गया।

लंड इतना शख्त हो गया कि चादर तना हुआ होने के बाद भी उसके ऊपर से दिखने लगा, रजनी की जब नजर उसपर पड़ी तो वो तो शर्म से लाल हो गयी।

अभी तक इतना कुछ हो चुका था फिर भी कभी रजनी ने चुपके से भी अपने बाबू के लंड की तरफ नही देखा था, एक आदर्श और शालीन नारी का परिचय अभी तक रजनी सभ्यता से देती चली आयी थी, बाप बेटी में भले ही रिश्ते की मर्यादा की लाज रखते हुए धीरे धीरे ही सब आगे बढ़ रहा था पर रजनी ने कभी उस लाज को तोड़कर एकदम से अपने कदम आगे नही बढ़ाये थे, चाहे इसे एक बेटी का अपने पिता के प्रति लज़्ज़ा कहो या आदर्श जो भी था पर था तो जरूर।

पर आज पहली बार अपने बाबू का लंड चादर के ऊपर से ही देखकर, ये देखकर की लन्ड इतना बड़ा है कि चादर तना हुआ होने के बाद भी लंड ने चादर को और ऊपर तंबू की तरह तान दिया है, वासना से भर गई, उसने धीरे धीरे अपना हाथ ऊपर को सरकाया उदयराज के पैर के बाल उसके हाथ में लगने से उसकी बूर झनझना गयी।

उदयराज आंखें बंद किये अपनी बेटी के ऊपर को सरकते नरम नरम हाथ को महसूस कर उत्तेजित होता जा रहा था।

रजनी के एकाएक अपना हाथ धोती में डाल दिया और ऊपर को सरकाते हुए जाँघों तक ले आयी, रजनी की हालत बुरी हो चली थी उसे बहुत शर्म आ रही थी पर मन भी आगे बढ़ने के लिए बहुत बेचैन था।

फिर रजनी ने अपना हाथ जाँघों पर रखा और वहां अपना हाथ फेरने लगी, जाँघों के जोड़ से लेकर घुटने तक वह अपना हाथ धीरे धीरे फेरने लगी, अपने सगी बेटी का मुलायम नरम हाथ अपनी जाँघों पर रेंगते हुए महसूस कर उदयराज का लंड और भी टनटना गया। धोती बंधी हुई होने की वजह से रजनी को अपना हाथ जाँघों तक पहुचाने में थोड़ी सी दिक्कत हो रही थी, कोठरी में तेज सांसे और हल्की हल्की हांथों की चूड़ियों की खनखनाहट गूंज रही थी।

रजनी ने जाँघों को सहलाते हुए अपनी उंगलियां अपने बाबू के मोटे मोठे बालों से भरे अंडकोषों पर रख दी, तो पहले तो वो खुद ही चिहुँक सी गयी, इतने बड़े आंड भी हो सकते हैं उसने सोचा नही था और उनपर वो काले काले बाल, उनकी छुवन, दो माध्यम आकार के अमरूद जैसे बड़े बड़े आंड को अपने हाथ में लेते ही रजनी शर्म और अति उत्तेजना से पानी पानी होती चली गयी, उदयराज के मुँह से भी काफी तेज aaaaaaahhhhhhhhhhh की आवाज निकल गयी जिसने रजनी के रोये रोये को खड़ा कर दिया।

उसका बदन गनगना गया, कैसे वो आज अपने सगे पिता के आंड को छू रही थी, अपने आप में ही वो वासना से रोमांचित हो उठी।

फिर एकाएक वो अपनी सांसे थामे कर्म के नियम का पालन करते हुए अपने हाथ से दोनों आंड को हौले हौले सहलाने लगी, उदयराज ने अपनी दोनों जाँघे खोल दी और अपनी ही सगी बेटी के हाथ को अपने आंड पर पाकर उसका लंड तेजी से स्पंदन करने लगा। (स्पंदन एक छोटा छोटा झटका होता है)

रजनी अपने बाबू के दूसरी जांघ पर भी हाथ फेरने और सहलाने लगी, अब उसकी लज़्ज़ा धीरे धीरे थोड़ी कम हुई और उत्तेजना और वासना उसपर हावी होती गयी। कभी वो आंड को सहलाती तो कभी दोनों जांघ को, पर लंड को उनसे अभी भी नही छुआ था परंतु हाथ इधर उधर करते हुए हाथ की कलाई और चूड़ियों से मोटा शख्त लन्ड टकरा ही जा रहा था। चूड़ियों की खनखनाहट बराबर कोठरी में गूंज रही थी।

अचानक रजनी ने अपना हाथ लंड की जड़ पर रखकर उसको मुठ्ठी में भर ही लिया, घने बालों से भरा हुआ था उसके बाबू का फ़ौलादी लंड। रजनी की जोरदार सिसकी निकल गयी, oooooooohhhhhhh bbbbbbaaabbbuuu बोलते हुए उसकी सांसे उखड़ने लगी।

अपनी ही सगी बेटी द्वारा लंड को मुठ्ठी में पकड़ते ही उदयराज कराह उठा और उसके लंड ने तो मानों जोरदार अंगडाई लेते हुए बगावत कर दी हो, रजनी की बूर अब रिसने लगी, सांसे धौकनी की तरह चलने लगी, रजनी ने कुछ पल लंड को मुठ्ठी में पकड़े रहा फिर एकाएक अपनी उंगलियां अपने बाबू के लंड के ऊपर घने बालों में चलाने लगी,उसको सहलाने लगी (जैसे उसकी नाक की लौंग उसमे गिरखर खो गयी हो और वो उसको ढूंढ रही हो), फिर एकाएक दुबारा से उसने मोटे लंड को अपनी मुट्ठी में भर लिया और अपना हाथ ऊपर तक लाके लंड की पूरी लंबाई और चौड़ाई का जायजा सा लिया, अपने ही सगे बाबू के लगभग 9 इंच लंबे और 4 इंच मोटे लंड, जिसपर चारों ओर कईं नसें उभरी हुई थी, को अपने हांथों में लेकर रजनी बदहवास हो गयी, बूर में उसकी अनगिनत चीटियाँ रेंगने लगी, एक पल को उसे वो लंड उसकी बूर की अनंत गहराई में उतरता हुआ महसूस हुआ तो वो थरथरा गयी, और झट से हाथ बाहर खींच लिया, थूक का एक बड़ा घूंट उसके गले से उतर गया, आंखें बंद कर कुछ पल अपनी सांसों को समेटती रही, अपनी जाँघों को उसने एक दो बार भींचकर अपनी बूर को दबाया।

फिर रजनी ने अपने बाबू के तने हुए चादर को पैर की तरफ से हटाया और कमर तक पलट दिया, धोती में तंबू बना हुआ था, उसे देखकर वह वासना में मुस्कुरा उठी वो, फिर उसने अपने नरम हांथों से अपने बाबू की धोती के छोर को जो कमर के पीछे घुमाकर धोती में ही खोसी हुई थी, कमर के नीचे हाथ डालकर खींचकर खोला उदयराज के कमर उठा कर उसकी मदद की, रजनी ने उखड़ती सांसों के साथ धोती की छोर पकड़कर लपेटी हुई धोती को खोलकर ढीला किया और फिर कमर से पकड़कर नीचे सरकाने लगी। रजनी अब बगल से उठकर उदयराज की दोनों टांगों के बीच आ गयी।

धोती ढीली होने के बाद बड़े आराम से नीचे सरकने लगी, अपने कोमल हांथों से अपने बाबू की कमर के पास दोनों ओर धोती पकड़कर रजनी ने धोती को नीचे जाँघों तक सरका दिया, उदयराज का लंबा मोटा शख्त लंड एक बार को धोती में खड़ा होने की वजह से फंसा फिर तुरंत उछलकर सामने आ गया।

दिये कि हल्की रोशनी में अपने सगे पिता का काले काले बालों वाला हल्का काला सा लगभग 9 इंच लंबा और 4 इंच मोटा लंड, जिसपर कईं नसें अति उत्तेजना की वजह से उभर आई थी, देखकर रजनी की सांसें हलक में अटक गई, लंड इतना भी बड़ा और मोटा हो सकता है उसने सोचा नही था, उसने तो आजतक बस अपने पति का करीब 6 इंच लंबा लंड ही देखा था वो भी बहुत कम, उसके सगे पिता इतने बड़े लंड के मालिक हैं ये देखकर वो वासना से सराबोर होकर गनगना उठी, रोम रोम उसका संभोग के लिए तड़प उठा, बूर से उसकी काम रस की धारा बह निकली।

उदयराज वासना में आंखें बंद किये लेटा रहा, काफी देर तक रजनी अपने बाबू का विशाल लंड उस पर उगे बाल, नीचे दो बड़े बड़े आंड और जाँघे निहारती रही, किस तरह लंड रह रह कर फुदक रहा था, छोटे छोटे झटके ले रहा था मानो वो अपनी ही सगी बेटी की बूर मांग रहा हो, कितना लंबा था उसके बाबू का लंड और उसकी मोटाई तो देखो, अम्मा कैसे झेलती होंगी बाबू को और मैं कैसे.....और ऊपर का मुँह तो देखो लंड का कितना बड़ा और गोल सा है, बूर की गहराई में जाकर जब ये ठोकर मरेगा तो कितना मजा आएगा, पर इतना मोटा मेरी बूर में जायेगा कैसे? पर जैसे भी जाएगा मेरी आत्मा तृप्त कर देगा और ये सोचते हुए रजनी की आंखों में वासना के डोरे तैरने लगे।

लंड को देखकर रजनी की लज़्ज़ा काफी हद तक कम हुई और वासना उसकी आँखों में नजर आने लगी, उसके धोती को खींचकर पूरा पैर से बाहर निकाल दिया, उदयराज अब कमर से नीचे मदरजात नंगा हो गया।

रजनी ने बगल में रखा दिया जैसे ही जलाया, उसकी रोशनी में अपने बाबू का चमकता लंड देखकर और मचल उठी, हल्का काला, लंबा और मोटा लंड लोहे की रॉड की तरह सीधा खड़ा था, टांगें उदयराज ने दूर दूर फैला ली थी।

रजनी ने अपने बालों में लगी क्लिप को खोलकर अपने बालों को बंधन से आजाद कर लिया और आंख बंद कर सर को दाएं बाएं हिलाकर अपने दोनों हांथों से बालों की लटों को खोलते हुए बालों को हवा में लहराया, हाथ ऊपर करने से रजनी के ब्लॉउज में कसी कसी भारी चूचीयाँ उभरकर ऊपर को उठ गई।

फिर एक मादक मुस्कान बिखेरते हुए आंखें फाड़े अपने सगे बाबू के खड़े लन्ड को किसी जन्मों जन्मों से प्यासी नारी की भांति घूरने लगी, अपने मुलायम हांथों से उसने लंड को पकड़ लिया और हौले हौले पूरे लंड पर सिसकते हुए हल्के हाँथ फेरने और सहलाने लगी, उदयराज की अब मस्ती में आहें निकलने लगी वो aaaahhhhhhhhhhh mmmmeeerrriiii bbbbbeeettttiiii, aaaaaahhhhhhh mmmmmeeerrrriiiiiI rrraaaannniiiii bbbbbiiiitttttiiiyyyyyyaaaaaa, aaaiiiiisseeeee hhhhhiiiiiiiii, aaaaaaahhhhhhhhh

रजनी अपने बाबू की आहें और सिसकारी सुनकर और उत्तेजित होती चली गयी और खुद भी सिसकते और आहें भरती जा रही थी, कभी वो दोनों आंड सहलाती, कभी दोनों जाँघों पर हाथ फेरती, कभी पेट को सहला देती फिर अपने नरम नरम हाथों से लंड को पकड़कर पुरा नीचे से ऊपर तक सहलाती। रजनी लंड को सहला तो रही थी पर उसने लंड की चमड़ी को पीछे नही होने दिया था, वो इतने हल्के हांथों से सहला रही थी कि लंड के सुपाडे को उसने अभी तक खुलने नही दिया था, पर अपने बाबू का मोटा सुपाड़ा देखकर वो मदहोश हो गयी थी, हल्के हांथों की रगड़ से लंड की चमड़ी बिल्कुल हल्का सा नीचे हो गयी थी और थोड़ा सा लंड का सुपाड़ा दिख रहा था, लंड के मूत्र का छेद देखकर रजनी की बूर की गहराई में कई तार बज उठे।

पूरी कोठरी में उसके बाबू के लंड से आती मूत्र की हल्की गंध फैल गयी जो कि रजनी की चुदास को बढ़ा रही थी।

तभी रजनी से रहा नही गया और उसने अपनी नाक अपने बाबू के लंड के सुपाडे पर लगाई और उसे सूंघने लगी, अपने बाबू के विशाल लंड की पेशाब और काम रस की तेज गंध उसे अपने रोम रोम में समाती हुई महसूस हुई, अपनी बेटी की सांसों की गर्मी अपने लंड के सुपाड़े पर महसूस कर उदयराज हिल गया, वासना में वो जल रहा था।

रजनी काफी देर सुपाड़े को सूंघती रही फिर पूरे लंड और दोनों आंड को सूँघा और घने घने बालों में भी अपनी नाक फिराई। अपनी सगी बेटी की गर्म उत्तेजित साँसों को अपने लंड, आंड और बालों पर महसूस कर उदयराज पगला गया।

फिर एकाएक रजनी ने वो किया जो उदयराज ने सोचा भी नही था, रजनी ने अपने दोनों हाथ अपने बाबू की कमर के अगल बगल रखे और लंड पर झुक गयी, बाल उसके खुले थे तो उसके बाबू का कमर वाला हिस्सा ज्यादातर रजनी के बालों से ढक गया। उसकी दोनों जाँघों पर रजनी के घने बाल थे झुकने की वजह से रजनी की चूचीयाँ ब्लॉउज से मानो कूदकर बाहर ही आ जाने को हो रही थीं।

रजनी अपने बाबू के विशाल खड़े लंड के ऊपर एक वासनात्मक मुस्कान लेकर झुकी और अपने होंठों को गोल बनाया मानो वह शीटी बजा रही हो, फिर अपने बाबू के सुपाडे पर, जो ऊपर से बिल्कुल थोड़ा सा खुला था बस खाली मूत्र छेद दिख रहा था और उस पर भी काम रस लगा हुआ था, अपने होंठ रखे और धीरे धीरे अपना मुँह खोलती और साथ ही साथ सुपाडे कि चमड़ी को नीचे सरकाती चली गयी, बरसों से सुपाडे की चमड़ी जो खुली नही थी चिरचिराकर खुलती और नीचे सरकती चली गयी, रजनी ने अपना पूरा मुँह गोल गोल फाड़े अपने बाबू का सुपाड़ा अपने मुँह में भर लिया।

उदयराज aaaaaaaahhhhhhhhhhhhh, hhhhhhhhhaaaaaaiiiiiiiiiii,,,bbbbbbbeeeetttttttiiiiii करके सीत्कार उठा उसकी

तो सांसे ही थम सी गयी और आंखें अत्यंत नशे में बंद हो गयी, उसकी बेटी इतनी माहिर निकलेगी उसने सोचा नही था, ऐसा मजा उसे आजतक आया ही नही, हालांकि उसकी पत्नी भी लंड कभी कभी थोड़ा चूस लेती थी पर ये अदा, ufffffff उदयराज तो अपनी बेटी का कायल ही हो गया। रजनी ने तीन चार बार ऐसा ही किया और हर बार उदयराज का पूरा बदन हिल जा रहा था, पूरी कोठरी में आह और सिकारियाँ गूंज रही थी।

अपने बाबू का पूरा लंड तो रजनी अपने मुँह में अभी नही ले सकी पर फिर भी बहुत ही कामुक अदा से और सिसकते हुए वो मोठे फूले हुए सुपाड़े को जी भरके चाटने लगी और आधे से ज्यादा लंड अपने मुँह में धीरे धीरे भरकर चूसने लगी।

उदयराज हाय हाय करने लगा, रजनी का झटके से पूरा लंड मुँह में भरना फिर अपने होंठों को सुपाडे तक ले जाना, फिर सुपाडे को मुँह में लेकर लोलोपोप की तरह चूसना उदयराज को सातवें आसमान में ले गया, उदयराज ने जैसा सोचा था, उससे कहीं ज्यादा मजा आया था उसको, रजनी ने जैसे ही सुपाडे को मुँह में भरकर पूरे सुपाड़े पर गोल गोल जीभ घुमाई उदयराज को ऐसा लगा जैसे किसी ने उसे ऊपर आसमान में ले जाकर छोड़ दिया हो और वो बड़ी तेजी से धरती की तरफ गिर रहा हो।

रजनी ने फिर अपनी जीभ गोल नुकीली बनाई और अपने बाबू के लंड के छेद पर जहां से बार बार चाट लेने के बाद भी काम रस की बूंदें निकलकर बाहर आ जा रही थी, फिराने लगी और हल्का हल्का अपनी जीभ लंड के मूत्र छेद में घुसेड़ने सी लगी, जीभ की नोक से वो काम रस की बूंदों को चाट ले रही थी और ऐसा करते हुए खुद भी hhhhhhhhhhhaaaaaaaiiiiiiiiiiiiii,,,,,,,,,bbbbaaaabbbbuuuuuuuu,,,,ooooooohhhhhhhhh...... bbbbbbbbaaaaabbbbbuuuuu धीरे धीरे कहते हुए सिसके जा रही थी।

दोनों सगे बाप बेटी महापाप के असीम आनंद में डूबे हुए थे।

रजनी ने फिर कई बार अपने बाबू के सुपाड़े की चमड़ी को पहले अपने हांथों से ऊपर चढ़ा कर सुपाड़े को ढका और फिर अपने होंठो को गोल गोल बना कर सुपाड़े पर रखकर अपने लाली लगे रसीले होंठों से खींचकर पूरा नीचे तक बड़े ही मादक ढंग से सिसकते हुए खींचा।

हर बार उदयराज की जोरदार आँहें निकल गयी। उदयराज का पूरा लंड, आंड, जाँघे और चटाई भी रजनी के कामुक थूक से सन गए थे, दिए कि तेज रोशनी में थूक से सना काला मोटा लंड मानो अंगडाई लेकर और भी चमक उठा। उदयराज का लंड अपनी सगी बेटी की करीब 10 मिनट की चुसाई से इतना शख्त हो गया था की मानो अभी उसकी नसें फट जाएंगी, मानो गरज गरज कर वो बूर मांग रहा हो, वो भी अपनी सगी बेटी की बूर।

रजनी भी मदहोशी में बदहवास हो गयी थी, हाय हाय करे वो भी लंड चूमे और चूसे जा रही थी पर काफी देर दोनों हांथों के बल झुके झुके उनके हांथों में भी दर्द होने लगा था। फिर एकाएक उसने मुँह से अपने बाबू का लंड निकाला और लंड के मुँह से निकलते ही "पक्क़" की आवाज पूरी कोठरी में गूंज गयी, उदयराज के मुँह से जोर की सिसकी निकल गयी।

रजनी उठ बैठी, आंखें उसकी मादकता और वासना से बंद थी, थूक में सना दहाड़ता हुआ लंड दीये की रोशनी में हल्के झटके खाते हुए हिल रहा था, रजनी ने अपने बाबू के विशाल लंड और लटकते आंड को वासना भरी और ललचाई नज़रों से देखते हुए अपने बाल समेटे और क्लिप लगाकर बांध दिए।

समय भी हो चुका था, कर्म के नियम का पालन भी करना था, उसका मन बिल्कुल भी नही था जाने का, बूर ने तो उसकी लंड देखकर बगावत कर दी थी, बिल्कुल जिद पर अड़ गयी थी बच्चों की तरह कि बस लंड चाहिए तो चाहिए, बहुत हो गया, वो उसे लाख समझाती रही कि मेरी प्यारी सी बच्ची मान जा, बस एक रात और एक दिन की बात है, पर वो नही मानी, बहुत दिन से वो मान रही थी रजनी की बात पर आज मानने को तैयार नही थी, थोड़ा तो उसे चाहिए था, जरूर चाहिए था, जैसे कोई रेगिस्तान का प्यासा बस दो बूंद पानी की मांगता है बस वैसे ही रजनी की बूर अब लंड मांग रही थी।

फिर रजनी को एक बात सूझी की नियम के अनुसार नीचे का हिस्सा तो अब छू सकते हैं, समझ आते ही राजनी के मुख पर एक मादक मुस्कान फैल गयी। उसने बड़ी अदा से अपनी बूर को एक हल्का सा चांटा लगाया।

कुछ देर सोचने के बाद रजनी से झट से बगल में जलता हुआ दिया बुझा दिया और कोठरी में अंधेरा हो गया, उदयराज ने सोचा कि उसकी बेटी अब जाएगी, उसका भी मन थोड़ा उदास हो गया पर तभी चूड़ियों की खनखनाहट हुई।

रजनी ने अपने बाबू के ऊपर झुककर अपना बायां हाथ उनके कमर के बगल में थोड़ी दूर पर रखा और कमर तक आधा अपने बाबू के ऊपर झुक गयी, उदयराज असमंजस में सोचता रहा को मेरी बिटिया क्या कर रही है? रजनी ने कमर से ऊपर का शरीर का भार अपने दाएं हाथ पर टेक लिया और बाएं हाथ से अपनी साड़ी ऊपर करने लगी, अपनी साड़ी को उसने कमर तक खींचकर ऊपर चढ़ाया, आज उसने काले रंग की पैंटी पहनी थी, साड़ी कमर तक उठने से भारी भारी गुदाज नितम्ब बाहर जलते दिए की रोशनी में उजागर हो गए, काली रंग की पैंटी में गोर गोर कसे हुए मांसल नितम्ब किसी को भी उन्हें हथेली में भरकर मसलने के लिए उकसा देते।

फिर रजनी ने बैलेंस संभालते हुए जल्दी से अपने दाएं हाथ से अपनी पैंटी को भी सरका के जाँघों तक कर दिया, उसकी भारी भरकम गुदाज गोरी गांड उछलकर बाहर आ गई, उदयराज चादर के अंदर बहुत असमंजस में था कि उसकी बेटी क्या कर रही है? पर उसे थोड़ा तो अंदाजा हो गया कि रजनी उसके ऊपर झुकी हुई है।

पैंटी खुलने से राजनी की तड़पती बूर से गरम गरम काम रस की कई बूँदें उदयराज की जाँघों पर जब गिरी तब उदयराज को आभास हुआ कि उसकी बेटी ने अपनी बूर खोली है, इसका अहसास होते ही उदयराज का लंड और हाहाकार मचाने लगा। तभी राजनी ने वो किया जिसके बारे में उदयराज ने उस वक्त सोचा भी नही था।

राजनी ने धीरे से दाएं हाथ से अपने बाबू के फ़ौलादी लंड के सुपाड़े को उसकी चमड़ी नीचे करके खोला और खड़े लंड को नीचे की तरफ टेढ़ा करके तेजी से aaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhh......bbbbbbbbaaaaaaaabbbbbuuuuuu की मादक आवाज निकालते और सिसकते हुए

अपनी प्यारी सी मक्ख़न जैसी काम रस से सनी हुई बूर की फांकों के बीच लगा दिया, बूर की फांकों को वो चीर नही पाई क्योंकि उसने दूसरे हाथ से बैलेंस बनाया हुआ था।

जैसे ही उदयराज के लंड का सुपाड़ा रस टपकाता हुआ अपनी सगी बेटी की बूर की मक्ख़न जैसी फूली हुई भीगी भीगी फाँकों से टकराया, उदयराज, अत्यंत नरम नरम और गरम गरम फांकों की कोमलता के अहसास से झनझना गया, उसके मुँह से aaaaaaaaaaaaaaaaaaahhhhhhhhhhhhhhh,,,........mmmmmmeeeeeeerrrrrrriiiiiiiiii.....bbbbbbbbeeeeettttttiiiiiiiiiiii........tttttteeeerrrrrriiiiiiii.....bbbbbooooooooooorrrrrrrrrrr

सिसकते हुए बहुत तेज़ी से निकला।

उदयराज ने अपना हाथ राजनी की भारी गांड पर रखकर उसको मसलना और नीचे को दबाना चाहा पर मुठ्ठी भींचकर त्राहि त्राहि कर उठा, क्या करता नियम से जो बंधा था।

रजनी की आंखें असीम आनंद में बंद हो चुकी थी, आज जीवन में पहली बार उसके सगे पिता का मोटा लंड अपनी सगी शादीशुदा बेटी की धधकती बूर से छू चुका था।

अपने बाबू के लंड को उसने अभी भी अपने हाथ से पकड़ रखा था, उदयराज के लंड का सुपाड़ा काफी मोटा था राजनी की प्यारी सी कमसिन सी बूर वासना में फूलकर काफी रस छोड़ रही थी, राजनी ने लंड को हाथ से पकड़े पकड़े अपनी बूर की फांकों में आगे पीछे दाएं बाएं घुमा घुमा कर रगड़ा और खुद ही हाय हाय करने लगी और फिर एकाएक उसने अपना दूसरा हाथ भी लंड को छोड़कर अपने बाबू ले कमर के बगल में रख लिया और पूरा बैलेंस बनाते हुए अपनी गांड को हल्का सा नीचे की ओर दबाया, लंड फांकों में और धंस गया, राजनी ने अपनी गांड को कस कस के आगे पीछे दाएं बाएं कई बार हिलाया।

लंड का सुपाड़ा बूर की फांकों के बीच खिलकर बाहर आ चुके भग्नासे से जब अच्छे से रगड़ खाने लगा तब राजनी ने जोर से सिसकते हुए और oooooooooohhhhhhhhhh bbbbbbbbbbaaaaaaabbbbbbbbuuuuuuuuu की तेज मादक आवाज निकलते हुए

अपनी गांड को उछाल उछाल कर अपनी बूर के भग्नासे को अच्छे से पांच सात बार अपने बाबू के सुपाड़े और पूरे लंड पर रगड़ा और कराहते हुए उठ बैठी, लंड पक्क़ की आवाज के साथ उछलकर फिर टनटना कर खड़ा हो गया और झटके खाने लगा।

उदयराज मदहोश हो चुका था, oooohhhhhh...bbbbbeeeettttiiiiii, hhhhaaayyy mmmmeerrriiii rrraaaaannnniii धीरे धीरे उसके मुँह से निकल रहा था।

राजनी ने फट से धोती उठायी और लंड पर रखने से पहले लंड के सुपाडे को जिस पर अब उसकी बूर का रस भी लगा हुआ था मुँह में एक बार फिर भर कर जोर से चूस लिया, फिर दोनों आंड को मुँह में भरकर चूसा और फिर धोती से अपने बाबू के लंड को ढककर अपनी पैंटी पहनी और साड़ी नीचे कर बेमन से कोठरी से निकल गयी।

 
सबसे पहले तो comments करने के लिए आपका शुक्रिया, मैं आपकी भावनाओं की कद्र करता हूँ, देखिए इस दुनियां में हर तरह की चीज़ें हैं, अच्छा है तो बुरा भी है, यही कहानी का मूल भी है, अगर आपको कहानी पसंद आ रही है तो जरूर पढ़ें, वैसे कहानी के शुरू में ही ये लिख दिया गया है, जिसको भी पारिवारिक रिश्तों पर ऐसी कहानी नही पसंद वो कृपया न पढ़ें पर ये पूरी तरह आप पर निर्भर है, अगर आपको अच्छी लग रही है तो जरूर पढ़ें।

आपका बहुत बहुत शुक्रिया, बने रहें कहानी के साथ और comments करते रहे, इससे मुझे आगे और अच्छा लिखने की हिम्मत मिलती है।
 
Update- 37

रजनी बदहवास सी कोठरी से निकलकर अपनी पायल से छम्म छम्म की आवाज करती हुई बरामदे को अंधेरे में पार कर घर के दरवाजे तक आयी और धीरे से दरवाजा खोलकर बाहर आ गयी, दरवाजे को धीरे से सटाया, संभोग की तीव्र इच्छा से बदन में उठ रही गर्मी से निकलते पसीने पर जब बाहर की ठंडी ठंडी पुरवैया हवा रात के गुप्प अंधेरे में पड़ी, तो बदन में एक ठंडी लहर दौड़ गयी, बदहवास सी वो आके अपनी खाट पे पेट के बल तकिए में मुँह गड़ाए हांफती हुई लेट गयी, पेट के बल लेटी अपनी तेज तेज चलती साँसों को वो काफी देर तक संभालती रही।

अपने बाबू के लंड का वो आगे का मोटा सा खुला और फूला हुआ चिकना चिकना सुपाड़ा मानो अब भी उसकी बूर की नरम नरम फांकों के बीच रगड़ रहा हो, संभोग की तीव्र इच्छा की उठती तरंगों से बेबस होकर वो बार बार अपनी जाँघों को भींचकर अपनी बूर को दबा दे रही थी, पर बूर भला अब मानने को कहां तैयार थी एक बार दहाड़ते लंड को छू जो लिया था उसने, पेट के बल लेटे लेटे ही रजनी ने अपना सीधा हाँथ नीचे ले जाकर साड़ी के ऊपर से ही अपनी दहकती बूर पर रखा और उसको अपनी हथेली में भरकर मानो समझाती मनाती रही।

पेट के बल लेटने से गहरे गोल गले के ब्लॉउज में से उसकी पीठ का काफी हिस्सा खुला हुआ था जिसपर पुरवईया की ठंडी ठंडी हवा लग रही थी मानो हवा भी दौड़ती हुई आकर उसकी मादक पीठ और जिस्म को बार बार चूम रही हो। तेज हवा बहने से ऊपर नीम के पेड़ की डालियां हिल रही थी, उसकी हल्की नरम नरम पत्तियां हवा से हिलकर आपस में टकराकर सर्रर्रर सार्रर्रर की आवाज पैदा कर रही थी और कभी कभी पकी हुई नीम की छोटी छोटी कुछ निम्बोली टूटकर रजनी की नंगी खुली हुई पीठ पर गिरती तो राजनी का कामाग्नि में जलता बदन और दहक उठता।

कुछ देर पेट के बल लेटने के बाद वो पलटकर पीठ के बल लेट गयी और जैसे ही उसने अपना चेहरा ऊपर किया नीम की एक छोटी पकी हुई निम्बोली उसके रसीले नशीले निचले होंठ पर आकर गिरी और वो मंद मंद मुस्कुरा दी, मानो ऐसा लगा कि कमाग्नि में सुलगते हुए उसके बदन से निकलने वाली मादक महक हवा के साथ बहकर धीरे धीरे प्रकृति के कण कण में घुल गयी हो और प्रकृति भी मदहोश होकर उसके अंग अंग को किसी न किसी बहाने से चूम रही हो।

तभी न जाने कैसे उसकी बेटी उठ गई, काकी उसे थपथपाने लगी परंतु रजनी ने उसे उठाकर गोदी में ले लिया, काकी फिर आस्वस्त होकर सो गई, रजनी अपनी बेटी को दूध पिलाते हुए खाट पे लेट गयी और अपना आँचल बेटी के सर पर डाल दिया, फिर धीरे धीरे वो भी नींद की आगोश में जाती गयी।

उधर कोठरी में अपनी बेटी के जाने के बाद उदयराज काफी देर तक यूँ ही अपने खड़े दहकते, झटके मारते हुए लंड पर धोती रखे लेटा रहा, सांसें उसकी भी तेज चलते हुए धीरे धीरे काबू में आ रही थीं। वो मन में अपनी बेटी के बारे में सोचने लगा कि रजनी ने आज अपने आप जो किया वो कितना उत्तेजित कर देने वाला है, इसका मतलब वो बहुत तड़प रही है।

उदयराज ने मन में एक कसम ली-

"कसम है मुझे मर्दानगी की कि अपनी बेटी को मैंने परम चरमसुख नही दिया तो मेरा नाम भी उदयराज नही।"

इतना सोचते हुए वो सोने की कोशिश करने लगा एकाएक उसे लगा कि उसके लंड का सुपाड़ा उसकी बेटी की मखमली बूर की फाँकों में टच हो रहा है एकदम से उसकी आंखें खुल गयी और उसने अपने हाथ से लंड को मसल दिया और फिर सोने की कोशिश ये सोचकर करने लगा कि कल अमावस्या की रात है, नियम कानून अब खत्म हो जाएंगे, कल मेरी बेटी दिन में अपने दिल का हाल और आगे क्या होगा इस सब को एक कागज पर लिखकर घर में कहीं छुपकर रखेगी मुझे वो ढूंढकर पढ़ना है और फिर उसी अनुसार काम करना है, देखता हूँ मेरी बेटी क्या चाहती है?

तभी उसके मन के कोने से एक आवाज आती है कि उदयराज पहले तू वो कागज तो ढूंढ के दिखाना, न जाने कहाँ छुपकर रखेगी रजनी, कल तो सारा घर छान मारना पड़ेगा मुझे और फिर वो मुस्कुराते हुए सोने की फिर कोशिश करने लगा फिर धीरे धीरे उसको नींद आ ही गयी।

सुबह रजनी की नींद सबसे पहले खुली, वो मादक सी अंगडाई लेती हुई उठी और उठते ही सबसे पहले अपने बाबू का चेहरा उसकी आँखों में घूम गया और फिर कल रात क्या क्या हुआ ये सोचते ही पूरे बदन में ख़ुशी की तरंगें बहने लगी, और आज...आज थी अमावस्या की रात वाला 7वां दिन। मंद मंद मुस्कुराते हुए रजनी खाट से उठकर खड़ी हुई और सीधे घर में गयी, बरामदे में रखे कागज कलम को उठाया और चुपचाप कुछ देर तक कुछ लिखती रही फिर उस कागज को गोल गोल किया और दरवाजे की कुंडी में अंदर से फंसा कर बाहर निकल गयी।

जब बाहर आई तो काकी उठ चुकी थी, रजनी की बेटी अभी सो ही रही थी। रजनी ने काकी को बोला कि जब बाबू घर से बाहर आएं तो वो उसे इशारा करके बता देंगी।

उदयराज सोकर उठा और जल्दी जल्दी अपनी धोती बांधी हल्का हल्का उजाला होना शुरू हो गया था, उदयराज ने कोठरी से बाहर आकर बरामदे की तरफ कदम बढ़ाया, अभी बरामदे में अंधेरा था, जैसे ही उसने दरवाजे की कुंडी में हाथ लगाया, रजनी का लिखा हुआ कागज उसके हाथ में आ गया, वो समझ गया कि रजनी ने ही यहां ये लगाया होगा, उसने वो कागज धोती में खोसा और दरवाजा खोलकर पहले एक बनावटी खांसी खाँसा, ताकि अगर र

रजनी कहीं बाहर सामने हो तो समझ जाएं और हुआ भी ऐसे ही, रजनी अपने बाबू की आवाज सुनते ही दालान के बगल में अमरूद के पेड़ के नीचे चली गयी और उदयराज सामने कुएं पर चला गया, कुएं से पानी निकाला और मुँह धोने लगा।

रजनी फट से आई और घर में चली गयी। काकी बड़ा सा झाड़ू लेकर द्वार बहारने लगी, क्योंकि रात में काफी हवा चलने से द्वार पर नीम की काफी पत्तियां और पकी हुई निम्बोली फैली हुई थी, द्वार बहार कर काकी ने जानवरों को चार डालना शुरू कर दिया।

रजनी घर के अंदर नाश्ता तैयार करने लगी।

उदयराज ने मुँह धोकर नीम की दातुन तोड़ी और दातून करके मुँह धोकर तरोताजा हो गया। फिर उसने एकाएक धोती में खोसा हुआ कागज निकाला और कुएं पर बैठकर सड़क की ओर मुँह करके पढ़ने लगा-

"मेरे बाबू मेरे शुग्गु मुग्गु, मेरे राजा, कल मैं बहुत बेसब्र हो गयी थी और मुझसे रहा नही गया, मुझे यह लिखते हुए बहुत शर्म भी आ रही है, आज 7वां दिन है और अमावस्या की रात है, सुर्यास्त के बाद हमारे सारे बंधन खत्म हो जाएंगे, मैं दिन में अपने मन की बात और आगे का कर्म जो मेरी मर्जी पर निहित है कागज पर लिखकर घर में कहीं छुपा कर काकी के साथ नीलम के घर चली जाउंगी, मैं नियम के अनुसार आपको जरा भी अंदाजा नही दे सकती कि मैं वो कहाँ छुपाउंगी, आपको ही वो अपनी मेहनत और बुद्धि से उसे ढूंढना है, मेरे बाबू ये क्रिया एक तरीके से हमारे आने वाले सुखमय जीवन की चाबी है अगर आप इसे सूर्यास्त से पहले पहले ढूंढ लेते हो तभी ये ताला खुलेगा।




एक पल को मैं डर भी रही हूं कि कहीं आपको मेरा छुपाया हुआ कागज नही मिला तो......मैं जीवन भर आपका प्यार पाने के लिए तड़पना नही चाहती, एक बेटी अपने पिता के प्यार के लिए तरसना नही चाहती, यह एक कठिन परीक्षा है आपकी और मेरी भी, इसमें असफल मत होना मेरे बाबू, नही तो आपकी बेटी आपके लिए तरस कर रह जायेगी और आप भी उसके लिए तड़पकर रह जाओगे, ये नियति ने कैसा खेल खेला है सबकुछ देकर भी बीच में एक ऐसी गहरी खाई रखी है जिसको कैसे भी करके पार करना ही है। मैंने पहले इसके विषय में ज्यादा गौर नही किया था पर अब समझ आ रहा है कि ये कितनी कठिन स्थिति और कितना कठिन मोड़ है, सबकुछ इसी मोड़ पर निर्भर है, मान लो वो कागज आपको सूर्यास्त से पहले नही मिल पाया तो सारी मेहनत, सारी उम्मीद, सारी खुशी यहीं पर रुक जाएगी, नियम के अनुसार हम आगे ही नही बढ़ पाएंगे। कैसे अपने कुल के लोगों की जान बचाएंगे और कैसे सबका भविष्य सुरक्षित करेंगे।

महात्मा जी ने भी कैसा रहस्मयी कर्म बताया है?

नीलम के घर मैं दोपहर 12:30 तक जाउंगी और सूर्यास्त से पहले 6:30 तक आ जाउंगी और आकर मैं सीधे घर में उस जगह जाउंगी जहां मैंने कागज छुपाया होगा और जब मुझे वो कागज वहां नही मिलेगा तो मैं समझ जाउंगी की आप और मैं जीत चुके हैं आगे बढ़ने के लिए।



मेरे बाबू मुझे पूरा भरोसा है कि आप अपनी बेटी को जीतकर पा लेंगे, आपकी बेटी सिर्फ आपकी है, सिर्फ आपकी।

उदयराज ने वो कागज मुस्कुराते हुए दुबारा अपनी धोती में खोंस लिया। उदयराज ने मन में सोचा- मेरी बेटी तू उस कागज को जहन्नुम में भी छुपा देगी तो भी मैं ढूंढ निकालूंगा, मेरी तो तू है ही, तुझे मुझसे अब कोई दूर नही कर सकता, तेरे यौवन के महासागर में तो मुझे गोता हर हाल में लगाना है, हर हाल में।

पर वो मन में सोचने लगा कि कैसी विडंबना है अपने ही हाथ से उसे वो काम करना पड़ रहा है जिससे वो डर भी रही है, पर तू डर मत मेरी बेटी, डर मत। घर में ही तो छुपायेगी, पूरा घर छान मारूंगा।

उदयराज कुएं से उतरकर द्वार पर आके सामने खाट पर बैठ गया, काकी ने उसको नाश्ता ला के दिया उसने नाश्ता किया और आज ये सोचकर बैल लेके खेतों में चला गया कि दोपहर 12 बजे तक आ जायेगा।

खेत में जाते वक्त वो बिरजू से एक बार मिलकर गया।

रजनी ने घर का सारा काम किया और शेरु और बीना को भी उसने खाना दिया, तभी उसने ध्यान से देखा तो पाया कि बीना गर्भवती है और वो किससे गर्भवती हुई थी ये सोचकर तो उसकी बूर में फिर से चीटियाँ सी रेंगने लगी उसने जोर से काकी को आवाज लगाई- काकी ओ काकी, इधर तो आओ।

काकी- हाँ राजनी बेटी क्या हुआ?

रजनी- देखो जरा बीना गर्भवती है न?

काकी- हाँ है तो। आखिर हो ही गयी गर्भवती और हो भी क्यों न प्यार जो मिला है इतना उसको अपने बाबू का (काकी ने चुटकी लेते हुए कहा)

रजनी और काकी ने एक दूसरे को मुस्कुरा के देखा और रजनी शर्मा गयी।

रजनी ने मन में सोचा आखिर शेरु ने अपनी सगी बेटी बीना को चोद चोद के गर्भवती कर ही दिया और वो इस बात से सिरह गयी कि कैसे एक सगे बाप ने अपनी ही सगी बेटी को चोद चोद के गर्भवती किया।

शेरु और बीना ने खाना खाया फिर इधर उधर चले गये।

तब तक दिन के 11:30 हो चुके थे रजनी ने अब बरामदे में रखे कागज कलम को उठाया और एक बार को आंखें बंद की फिर मुस्कुराते हुए आंखें खोली और थोड़ा सा कागज का टुकड़ा फाड़ा फिर उसमें कुछ लिखा और उसको घर में ही कहीं अपने दिल पर पत्थर रखकर (बहुत भारी मन से) छिपा दिया।

12 बजे तक उदयराज आया, रजनी रसोई में थी, काकी ने उदयराज को खाना परोसा और फिर उदयराज ने मुस्कुराते हुए खाना खाया फिर बाहर चला गया, रजनी और काकी ने भी खाना खाया।

कुछ देर बाद काकी ने बाहर आकर उदयराज को बोला कि अब वो और रजनी नीलम के घर जा रहे हैं और फिर 12:30 तक दोपहर में काकी और रजनी उदयराज की नज़र बचा के नीलम के घर चले गए।
 
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