Incest Porn Kahani Rishta - Page 19 - SexBaba
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Incest Porn Kahani Rishta

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आपका इस कहानी में एक साहित्यिक अंदाज़ में रूचि है मैं इस बात से वाकिफ हूँ और बहुत खुश भी हूँ.

आपकी साडी बातों का मैंने शायद जवाब दे दिया था लेकिन मुझे लगता है की आप शायद संतुष्ट नहीं हुए.

मैंने पहले भी कहा था फिर से कह रही हूँ की कोई भी समाधान या सोच या फैसला न तू सबसे अच्छा होता है, न hi ये होता है की सब उसको अनुमोदित करे या सराहें या उसका विरोध करें. हर एक व्यक्ति अपनी समझ से फैसला लेता है और वो उससे सबसे जयादा उचित लगता है.

रही बात परिवार की तू कोई जरुरी नहीं है की सब एक छत के नीचे रहकर एक दूसरे की इज़्ज़त करे और हर अच्छे बुरे फैसले की बात मने. ऐसे भी परिवार हैं जो कहने को तू िक्खत्ते हैं लेकिन अंदर hi अंदर सब मौका ढूंढने में लगे रहते हैं की कैसे दूसरे को नीचे दिखाएँ.

ऐसा हर परिवार में नहीं होता क्योँकि सबके समर्थ अलग अलग होते हैं.

आप से अनुरोध है की एक बार अपनी सोच को अलग रखकर सोचिये की संध्या ने जो फैसला लिया, अगर वो न लेती तू क्या यह परिवार बच पता.

मैंने आपको ये जवाब आपसे बहस करने के लिए नहीं दिया.

मैं आपकी साहित्यिक प्रतिभा का दिल से मान करते हुए ये बात कही है. इस कहानी को पढ़ने वालों में कुछ hi चुने हुए लोग हैं जो कहानी के मर्म को जानने के इच्छुक हैं जिनमे से आप एक हो.

आप को मेरी किसी भी बात का जरा सा भी बुरा लगा हो तू क्षमा चाहती हूँ.
 
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अपडेट 94

संध्या जब बेहोश हुई तू उससे हॉस्पिटल पंहुचा दिया गया और वंहा वो होश में आने पर अपनी यादाशत खो चुकी थी लेकिन उसके साथ साथ वो प्रेग्नेंट भी हो चुकी थी. डॉक्टर्स को वो अपने बारे में कुछ नहीं बता प् रही थी. वो बच्चा जिससे उसने बचाया था उस बाजार के मालिक का बीटा था. वो और उसकी पत्नी अपने आप को संध्या के कर्ज़दार समझते थे जिसने उनके बच्चे को बचाया था. दोनों उसका पूरा इलाज़ करवा रहे थे और जब वो कुछ ठीक हो गयी तू उससे अपने घर ले आये और उसकी पूरी देखभाल करने लगे.

वक़्त बीतता रहा और संध्या ने एक खूबसूरत बच्चे को जनम दिया जो की एक लड़का था और संध्या ने अपने आप को उसकी परवरिश में व्यस्त कर लिया.

वो पति पत्नी (राजाराम और शोभा) संध्या का पूरा ख्याल रखते थे. जब संध्या हॉस्पिटल में पंहुच गयी थी तब उन्होंने उसके सामान को धर्मशाला से लेने गए तू उसका मालिक राजाराम का दोस्त था, इस वजह से सामान दे दिया लेकिन उस बैग में टाला लगा हुआ था. पति पत्नी काफी वक़्त तक इस दुविधा में थे की इस बैग को खोले या न खोले. उन्होंने सोचा की बैग में पता नहीं क्या हो, उन्होंने सोचा की जब ये ठीक हो जाएगी तब इससे खोलेंगे.

जब काफी वक़्त तक संध्या की यादाशत वापिस नहीं आयी तब डॉक्टर्स के कहने पर उस बैग को खोला गया तू उसमे संध्या के कपडे थे और एक बहुत पुराणी छोटी सी डायरी थी जिसमे एक पुराण फोटो भी था और उस डायरी में एक नंबर भी लिखा हुआ था. राजाराम ने उस नंबर पर फ़ोन किया तू उससे कोई जवाब नहीं मिला. वो लगातार कई दिन तक उस नंबर पर फ़ोन करता रहा लेकिन कोई जवाब नहीं. राजाराम थोड़ा सा चिंतित हो गया की या तू ये नंबर गलत है या वो व्यक्ति जवाब देना नहीं चाहता. दोनों पति पत्नी ने सोच लिया की अब इससे वो दोनों अपने पास रखेंगे और जिंदगी भर इस देवी को बहिन मानकर अपने घर में रखेंगे.

ऐसे hi एक दिन राजाराम, शोभा और संध्या बैठे हुए थे की एक अनजान नंबर से फ़ोन आया और वो पूछने लगा तू राजाराम ने कुछ कुछ जो उससे पता था बता दिया और उस व्यक्ति ने कहा की ठीक है जैसा आप कान्हे हम वैसा hi कर लेंगे और फिर फ़ोन बंद हो गया. इधर राजाराम और शोभा रात को उस फ़ोन के बारे में बात करते रहे और आगे क्या करना है उस बारे में विचार विमर्श करते रहे.

इनको यही विचार विमर्श करने देते हैं और हम चलते हैं उधर रुचिका और दिया के पास

रुचिका 'मैं कुछ भी नहीं भूली हूँ, क्या वो तुम्हारे पति नहीं हैं'

दिया 'मेरे मैंने या न मैंने से क्या होता है. ये उन पर निर्भर करता है की वो मुझे पत्नी मानते हैं या नहीं. जब तक वो मुझे पत्नी नहीं मानते, तब तक सिर्फ और सिर्फ तुम hi उनकी पत्नी हो'

रुचिका 'शायद तुम भूल गयी हो की गुरु जी ने क्या कहा था?'

दिया 'मैं कुछ नहीं भूली हूँ, मुझे अच्छी तरह से याद है. मई उस पूजा को कैसे भूल सकती हूँ क्योँकि उस पूजा की वजह से मेरी इनसे (सूरज जी) काफी लड़ाई हुई थी. लेकिन होनी को कौन ताल सकता है, इनका गुरूजी पर अंध विश्वास है और उन्होंने बता दिया था की अगर ये पूजा नहीं होगी तू सब कुछ ख़तम हो जायेगा, जो कुछ भी हमारे पास है सब तबाह जो जाएग और हम में से कोई भी जीवित नहीं बचेगा'

रुचिका 'मैं समझी नहीं'

दिया 'तुम्हे मैंने बताया था न की इन्हे, मुझे, दीपक जी और अवनि को किडनैप कर लिया गया था. उन लोगों ने हमें नग्न करके रखा था और हम दोनों को सूरज जी और दीपक जी के सामने नग्न रखा जिससे हमें बहुत शर्म आ रही थी, लेकिन क्या कर सकते थे. थे और अपनी नज़रे नीचे किये हुए थे. ये दोनों भी शर्म से गधे हुए थे और इन्होने भी अपनी नज़रों को झुका रखा था.

हम सब मन में सोच रहे थे की या तू हम बचेंगे नहीं और बच भी गए तू जिन्दा कैसे रहेंगे.

अभी हम ये सोच hi रहे थे की मोहन भाई साहब पता नहीं कान्हा से फरिश्ता बनकर आये और उन गुंडों को मार भगाया और हमें वंहा से छुड़ाया और हमें कपडे दिए और हम सब वापिस आ गए.

उस घटना से हम सब बहुत डरे हुए थे. हम सबने मोहन भाई साहब का एहसान भूल नहीं पा रहे थे. हमने इन्हे बहुत कुछ देना चाहा लेकिन ये बहुत hi स्वभिमाई व्यक्ति हैं और इन्होने कहा की हम दोनों इसकी बहने हैं और कहने लगे की बहिन से भी कोई कुछ लेता है. हमने भी इनको दिल से अपना बड़ा भाई मानकर इज़्ज़त दी और इतना hi नहीं इन्हे राखी भी बांधने लगी.

उस घटना के बाद पता नहीं क्या हुआ की हमारा बिज़नेस में नुक्सान होने लगा. छोटा मोटा नुक्सान तू चलता है लेकिन एक डैम से 10 करोड़ का घटा हो गया और दीपक जी को कोई 3 से 4 करोड़ का. हम पति पत्नी गुरूजी के पास गए और उन्होंने पहले तू हम दोनों को ये सलाह दी की अबसे कभी भी सूरज जी अकेले बिज़नेस नहीं करेंगे. अब से सूरज जी को दीपक जी के साथ बिज़नेस करने की सलाह दी उससे फायदा तू नहीं हुआ लेकिन नुक्सान भी नहीं हुआ.

हम फिर से गुरु जी के पास गए मैं और ये (सूरज जी). गुरु जी ने ध्यान लगाया और जो बात बताई उससे करने में मेरा बिलकुल दिल नहीं था. गुरु जी ने कहा की अगर वो उपपाये नहीं किया तू बिज़नेस hi नहीं बल्कि जिंदगी पर भी खतरा है. उन्होंने बताया की जिन लोगों ने हमें किडनैप किया था उन्होंने हमारी बलि की तयारी कर राखी थी.

हमें याद आया की जब हम नग्न थे तू वो गुंडे किसी महात्मा जैसे शक्श को लेकर आये थे जो हमारे ऊपर कुछ जल सा छिड़क कर मंतर पढ़ रहा था और पता नहीं वो लोग किस भाषा में बात कर रहे थे जो हमें समझ नहीं आ रहा था. हम तू दर से hi थार थार कांप रहे थे. मुझे गुरूजी की बातों पर विश्वास होने लगा लेकिन वो जो करने के लिए कह रहे थे बिलकुल मन गवाही नहीं दे रहा था.

मैं और ये (सूरज जी) घर वापिस आ गए और इनका गुरु जी पर अंध विश्वास था और इन्होने मुझे भी कहा की ये तू करना hi पड़ेगा. मैंने सख्ती के साथ कह दिया की मैं नहीं करुँगी क्योँकि मेरा मानना था की ये सब बेकार की बातें हैं और जो होना है वो होकर रहेगा. वक़्त बीतता रहा और हम दोनों के बीच एक दुरी आने लगी.

फिर एक दिन पता लगा की दीपक जी और अवनि का एक्सीडेंट हुआ है, लेकिन वो बच गए हैं. इधर सूरज जी को सीने में दर्द होने लगा तू इनको हॉस्पिटल में भर्ती करवा दिया गया और पता लगा की इनको हार्ट अटैक हुआ है जो की माइल्ड था. डॉक्टर्स ने कह दिया की इन्हे खुश रखे और कोई भी बुरी खबर न दे.

मैंने गुरूजी से पता किया तू उन्होंने कह दिया की 'पुत्री जो मैं देख रहा हूँ वो शायद तुम नहीं समझ पा रही हो. तुम्हे अगर अपने घर को बचाना है तू वो पूजा करनी hi पड़ेगी.'

मैंने गुरूजी से कहा 'आप एक बात बताइये की मैंने अग्नि को साक्षी मानकर inko(Pati) मन है और वचन दिया है. अब अगर मैं आपकी बात मानकर इस पूजा में शामिल होती हूँ तू मैं अपने वचन से हैट नहीं जाउंगी'

गुरूजी 'पुत्री तुमने सूरज को हर कष्ट में साथ निभाने का वचन भी दिया है. तुमने ये वचन भी दिया है की इनकी हर बात मानोगी. ये वचन भी दिया था की उनकी परछाई बनकर उनसे कभी अलग नहीं होगी. जब तुम इनकी बात नहीं मानोगी तू फिर ये वचन भी टूट जायेंगे'

दिया 'गुरूजी, मुझे एक शंका है की अगर मैं इस पूजा में बैठत्ती हूँ तब मुझे आपकी बात मैंने से उस शख्स से मेरा दूसरा रिश्ता है, वो भी तू ख़राब हो जायेगा'

तब उन्होंने कहा की 'पुत्री उस रिश्ते को तुमने खुद चुना है, जबकि ये जो मैं बता रहा हूँ, बहुत पहले लिखा जा चूका है और ये न तुम बदल सकती हो और न hi मैं. तुम चाहे कितना भी मन करो, जब ऊपर वाला चाहेगा, तुम इंकार नहीं कर पाओगी'

मैं भरी मन से वंहा से वापिस आ गयी और सूरज जी को पूजा के लिए हाँ कह दी'

रुचिका 'फिर क्या हुआ'

दिया 'फिर तू तुम्हे पता hi है, गुरूजी ने हमें बता दिया था की हम सब बहुत जल्दी मिलेंगे और हम सब मिले'

रुचिका 'ये हम सब हम सबकी पत्नियां है का क्या छाकर है'

दिया 'तुम्हे याद होगा जब हम गुरु जी के पास गए थे और तुम्हारी बीमारी का पूछने गए थे, तब उन्होंने कहा था न की जो पूजा हुई थी उसका मतलब यही था की हम तीनों हम इन् तीनों पुरुषों की पत्नियां हैं और हमें ये भी चेतावनी दी थी की कोई भी किसी के साथ जबरदस्ती नहीं करेगा. तुम तीनों असल में एक की पत्नी हो, लेकिन ऐसा वक़्त आ सकता है जब तुम्हे दूसरे पुरुष की पत्नी का धरम निभाना पद सकता है और मैं ये होते हुए देख रहा हूँ, लेकिन फिर से कह रहा हूँ की जबरदस्ती किसी की पत्नी नहीं बनना है. हाँ ये भी सच है की जरुरत पड़ने पर पीछे भी नहीं हटना है. तुम सब अब एक परिवार हो और सबने अलग होने की सोचना भी नहीं है नहीं तू मैं भी कुछ नहीं कर पाउँगा. ये भी बता दूँ की अगर तुम सब िक्खत्ते रहोगे तब कोई भी मुसीबत कितनी भी बड़ी हो वो उस पूजा के सुरक्षा चाकर की वजह से ताल जाएगी'

रुचिका 'मतलब की तुम अब इनकी पक्की वाली बीवी हो'

दिया 'गुरूजी के कहे अनुसार हूँ तू सही, लेकिन ये सिर्फ और सिर्फ तुम्हे hi अपनी पत्नी मानते हैं'

रुचिका 'ऐसा नहीं है क्योंकि गुरूजी ने इन्हे भी कहा था की 'तुम्हारी जिंदगी में और पत्नियां आएँगी' इन्हे पता है और ये सब जान चुके हैं की तुम इनको बीवी बन चुकी हो'

दिया 'लेकिन यह भी उतना hi सत्य है की इन्होने दुनिया के सामने भले hi मुझे बीवी कहा हो, लेकिन दिल से कभी भी मुझे बीवी नहीं बल्कि बहिन hi मन है'

रुचिका 'अच्छा यार एक बात बता की तुम्हारा मन है की तुम इन्हे बीवी वाला प्यार दो'

दिया 'शायद तुम भूल गयी हो की गुरूजी ने बड़े hi स्पष्ट शब्दों में कहा था की कोई किसी के साथ जबरदस्ती नहीं करेगा, तू मैं कैसे कर सकती हूँ'

रुचिका 'अब ये तू क्लियर हो गया न की तुम मन से चाहती ये तू हो'

दिया उसकी बात सुनकर सोच में पद गयी और वो अमेरिका में हुए उस वाकये को याद करने लगी की जब डांस के बाद वो सब खाना खाने जा रहे थे तब मोहनलाल ने दिया की कमर में हाथ डालकर अपने से चिपकते हुए डिनर लेने चल दिए.

उस वक़्त मोहनलाल की उँगलियों में दिया की नंगी कमर की छुआ और उँगलियों की पोरे उसके नंगे पेट को स्पर्श कर रहे थे. मोहनलाल की उँगलियों का आपने शरीर पर स्पर्श ने दिया की भावना को भड़का दिया और उसके मन में उठल पुथल मचने लगी. इतना hi नहीं मोहनलाल की बाजु से दिया के उन्मत्त उरोजों पर दबाव पद रहा था. जब साथ साथ चल रहे थे तू आगे पीछे होने से बाजु का दबाव उरोजों पर और उँगलियों का दबाव पेट पर कभी काम तू कभी जयादा हो रहा था. ऐसा लग रहा था की कोई उरोजों को दबा रहा हो जैसे की दबाये और छोड़ दे. ये महसूस करते hi दिया मदहोश होने लगी. जब वो डिनर टेबल पर पंहुचे तब तक दिया किसी और hi दुनिया में पंहुच चुकी थी और मोहनलाल के पुकारने पर भी उससे कोई होश न रहा तू मोहनलाल ने उसकी कमर में चुटकी काट ली तू वो होश में आयी.

अभी रुचिका उसके कंधे पर हाथ रखकर हिला रही थी की कान्हा खो गयी

दिया हड़बड़ाते हुए कहने लगी 'मैंने तू इन्हे बड़ा भाई मन है और आज भी मानती हूँ, लेकिन गुरूजी के अनुसार मेरा इनसे रिश्ता बहुत पहले hi लिखा जा चूका है. अगर ऐसा है तू मैं कौन होती हूँ उस फैसले को बदलने वाली. अगर नियति में लिखा है की मुझे उनकी बीवी का धरम निभाना है तू उनकी बीवी बनूँगी और पुरे तन मन से बनूँगी'

रुचिका 'वह क्या कहने, मैं तू वादा ले रही थी और मैडम जी तू पहले से hi तैयार बैठी हैं'

दिया 'चलो मान लिया की मैं तैयार हूँ लेकिन मुझे एक बात समझ नहीं आयी की बीवी कभी भी अपने पति को दूसरी औरत के साथ नहीं बांटती है और तुम मुझ से वादा लेना छह रही हो क्योँ?'

रुचिका उसकी बात सुनकर थोड़ा सा उदास हो गयी और उसकी आँखों में नमी आ गयी और वो कहने लगी 'मेरी जिंदगी का तू पता नहीं और मैं इन्हे कोई भी पत्नी का सुख नहीं दे पायी. ये इतने अच्छे है की मेरे से कभी शिकायत तू दूर कभी उफ़ भी नहीं किया, नहीं तू मर्द लोग ऐसी सिथिति में ऐसी पत्नी की पीठ पीछे पता नहीं क्या क्या करते हैं. कुछ तू ऐसी बीमार बीवी को छोड़ कर hi भाग जाते हैं. भगवन ने मेरी सहायता के लिए तुझे और अवनि को भेज दिया. अवनि का तू पता नहीं लेकिन तुम तू उनकी बीवी वाले रूप में रह चुकी हो और मेरी हालत को जानते हुए मैं चाहुगी की तुम इन्हे पत्नी का सुख दो, मुझे बुरा नहीं बल्कि अच्छा लगेगा' ये कह तू गयी लेकिन उसकी आँखों में आयी नमी साडी हकीकत बयां कर गयी

दिया 'मैं इसमें कुछ नहीं कर पाऊँगी क्योँकि इनको (मोहन जी) अपने निश्चय से नहीं डिगा सकते और वो कभी भी ये सब नहीं करेंगे'

रुचिका 'लेकिन यार एक बात बताओ की सूरज जी इस बात के लिए कभी राज़ी होंगे की तुम इन्हे पत्नी वाला सुख दो'

दिया हंसने लगी और कहने लगी 'वो रहते इस ज़माने में हैं और बात करते हैं पता नहीं किस युग की. उनका मन्ना है की अब मैं तीनों की पत्नी हूँ और मोहन जी सबसे बड़े हैं तू मुझपर सबसे पहला अधिकार मोहन जी का है'

रुचिका 'यार सच्ची में ऐसा बोलै'

दिया 'हाँ यार और उनकी बात सुनकर मुझे एक बार झटका भी लगा था और जब मैंने ये पूछा तब उन्होंने जो कहा मेरे पैरों टेल ज़मीन hi निकल गयी' और फिर वो रोने लगी.

रुचिका उससे चुप करने लगी लेकिन वो चुप होने का नाम hi नहीं ले रही थी और बस रोटी रोटी भावनाओं में बहकर इतना hi बोल कर चुप हो गयी 'मेरी जिंदगी पता नहीं मुझे कान्हा ले जा रही है. मेरे लिए तू एक तरफ कुंआ और दूसरी तरफ खाई है, समझ नहीं आ रहा की क्या करूँ'

अभी और कोई बात होती की मोहनलाल आये और बहुत hi घबराये हुए से लग रहे थे और बस इतना hi कहा की वो दो चार दिन के लिए कहीं बहार जा रहे हैं और दिया से रुचिका की देखभाल का वादा लेकर चले गए.
 
आपने बहुत सही समीक्षा और विश्लेषण किया है.

बात बिलकुल सच है की हर व्यक्ति को हर एक पातर पसंद आये मुमकिन नहीं है.

ये भी जरुरी नहीं है की एक hi पातर सबको पसंद आये.

हर एक व्यक्ति अपनी सोच के हिसाब से किसी पातर को अच्छा या बुरा कहता है. इसलिए इस विषय पर अनावश्यक बहस उचित नहीं है.

मैं यही बात पहले भी कह चुकी हूँ और इस बहस का अंत करने के लिए कहानी को निष्कर्ष की तरफ जल्दी से जल्दी ले जाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है.

आपकी सलाह और सुझाव को पूरा सम्मान दिया जायेगा.

धन्यवाद्
 
आपका जवाब पड़खार आपने सिर्फ मेरे मन को hi ठेस नहीं पंहुचायी है बल्कि आपने अपने आप को सही और बाकि साड़ी दुनिया को गलत तेरा दिया है.

मैं यंहा पर यह कहानी किसी फायदे या किसी लाभ के लिए नहीं लिख रही थी बल्कि लोगों के मनोरंजन के लिए लिख रही थी.

मैंने आज तक कभी भूल से भी किसी का दिल नहीं दुखाया है.

आपकी बात ने आज मुझे सच में दुखी कर दिया है.

इतनी बेइज़्ज़ती का बाद मुझे अब इस फोरम पर रहने का कोई अधिकार नहीं है.

अब मैं इस फोरम पर नहीं आउंगी.

आपकी सोच आपको मुबारक.

धन्यवाद्
 
अपडेट 95

अभी और कोई बात होती की मोहनलाल आये और बहुत hi घबराये हुए से लग रहे थे और बस इतना hi कहा की वो दो चार दिन के लिए कहीं बहार जा रहे हैं और दिया से रुचिका की देखभाल का वादा लेकर चले गए.

इनको हम जाने देते हैं और हम चलते हैं आदित्य के पास.

ऐसे hi 6 महीने और बीत गए और िरा मैडम के पति का सड़क दुर्घटना में देहांत हो गया और वो भी काफी हद तक गमगीन हो गयी. उसका मन भी अब काम में काम लगता था लेकिन क्लाइंट्स के दबाव में काम करना पद रहा था.

संध्या जब बेहोश हुई तू उससे हॉस्पिटल पंहुचा दिया गया और वंहा वो होश में आने पर अपनी यादाशत खो चुकी थी लेकिन उसके साथ साथ वो प्रेग्नेंट भी हो चुकी थी. डॉक्टर्स को वो अपने बारे में कुछ नहीं बता प् रही थी. वो बच्चा जिससे उसने बचाया था उस बाजार के मालिक का बीटा था. वो और उसकी पत्नी अपने आप को संध्या के कर्ज़दार समझते थे जिसने उनके बच्चे को बचाया था. दोनों उसका पूरा इलाज़ करवा रहे थे और जब वो कुछ ठीक हो गयी तू उससे अपने घर ले आये और उसकी पूरी देखभाल करने लगे.

वक़्त बीतता रहा और संध्या ने एक खूबसूरत बच्चे को जनम दिया जो की एक लड़का था और संध्या ने अपने आप को उसकी परवरिश में व्यस्त कर लिया.

िरा मैडम को अपने पति की अस्थियाई विसर्जन के लिए कोई भी भरोसेमंद शक्श नहीं मिल रहा था. उससे आदित्य की याद आयी और वो उसके साथ अस्थियां विसर्जन करने गयी और आदित्य ने उसके साथ जाकर उसका पूरा ख्याल रखा और सब काम उसने खुद hi संभल लिए.

वंहा पर कई बार ऐसा भी हुआ की उस जगह पर मांगने वालों ने उन्हें दुआए देते हुए कहा 'जोड़ी सलामत रहे'. यह सुनकर आदित्य को कई बार मांगने वालों पर गुस्सा भी आ जाता, लेकिन िरा मैडम ने उससे शांत करवाया और कहा की 'इन्हे क्या पता की हम दोनों का आपस में क्या रिश्ता है. ये इन् सब का नार्मल तरीका है मांगने का. किस किस का मुंह रोकोगे, ये सभी यही बोलेंगे. इनसे जयादा उलझना ठीक नहीं है, चुप करके अपना काम करके निकल जाना hi अक्लमंदी है'

उसके बाद आदित्य शांत हुआ और वो दोनों सरे क्रियाकर्मों को करके वापिस आ गए. िरा मैडम को आदित्य पर जितना भरोसा था वो किसी और पर नहीं था. वो हर समस्या में आदित्य से मदद लेने लग गयी थी. उसका हाल ये हो गया था की आदित्य उसके लिए एक तरह से उसकी बैसाखी बन गया था.

जबकि आदित्य अपनी दशा से विचलित था और अब वो कई बार िरा मैडम की बातों से चिढ़ने लगा था लेकिन क्योँकि वो उनकी इज़्ज़त करता था इसलिए चुप रह जाता था.

ऐसे hi चलता रहा, आदित्य अब दुखी रहने लगा था, उससे अब अपने जीवन में खालीपन दिखने लगा था. उसका मन अब किसी भी काम में नहीं लगता था और वो संध्या के बारे में सोच सोच कर परेशान हो जाता था.

उधर िरा मैडम की जिंदगी में भी उसके पति की मौत के बाद खालीपन आ गया था, लेकिन वो इस खालीपन को कुछ हद तक आदित्य की मदद से काम करने की कोशिश कर लेती थी.

एक बार िरा मैडम और आदित्य किसी बिज़नेस मीटिंग की वजह से कहीं मिले और उन दोनों ने मीटिंग के बाद थोड़ा वक़्त साथ बिताने का मैं बनाया. आदित्य ने पहले तू मन किया लेकिन िरा मैडम ने इतने प्यार से यह बात कही थी की वो बिलकुल भी मन नहीं कर पाया. उस मुलाकात में दोनों को एक दूसरे के बारे में कुछ और जयादा अच्छे से जानने का बहुत कुछ मिला और फिर दोनों अपने अपने शहर लौट गए.

इस मुलाकात से एक बात साफ़ हो गयी की दो टूटे हुए इंसान जब इक्कठे होते हैं तू एक दूसरे का दर्द चाहे समाप्त न कर पाएं लेकिन काम तू कर hi देते हैं.

ऐसे hi एक बार फिर से िरा मैडम और आदित्य को किसी बिज़नेस मीटिंग में मिलना था और वंहा पर दो दिन और एक रात रहना था. उस मुलाकात के दौरान िरा मैडम ने आदित्य को ुद्दस्स देखकर उसकी उद्दासी को दूर करने के उद्देश्य से पूछा की 'काम का क्या हाल है'

आदित्य 'अब मेरा काम में दिल नहीं लगता है, लेकिन मैं इस काम को जो पकड़ा है, जल्दी hi पूरा करने की कोशिश करूँगा, लेकिन उसके बाद आगे आप किसी और के साथ काम कर लीजियेगा, मैं शायद न कर पौन'

िरा मैडम उसकी बात सुनकर हक्का बक्का हो गयी लेकिन बात को सँभालते हुए 'दिल तू मेरा भी नहीं लगता क्योँकि मैं अपने पति को भूल नहीं पा रही हूँ. मैं तू काम इसलिए ले रही थी क्योंकि तुम्हारे साथ मेरा वादा था की काम की कभी कमी नहीं आने दूंगी. अगर तुम्हारा मन नहीं है तू मैं किसके लिए काम लूँ. मैं भी इस काम के बाद कंपनी को धीरे धीरे समेटना शुरू कर दूंगी'

आदित्य 'ऐसा क्योँ'

िरा मैडम 'और क्या करूँ, मैं अपने पति पर विश्वास करती थी, वो तू चले गए और उनके बाद मैंने किसी पर विश्वास किया है तू वो सिर्फ और सिर्फ तुम हो. अब अगर तुम भी साथ छोड़ रहे हो तू मैं इस बिज़नेस को करके क्या करुँगी'

आदित्य 'आपके बच्चे?'

िरा मैडम 'मेरा कोई बच्चा नहीं है'

आदित्य 'आपके माता पिता, सास ससुर, भाई बहिन'

िरा मैडम 'ये समझ लो की अब इस दुनिया में मेरा कोई नहीं है, जो भी रिश्ते थे वो सब ख़तम हो चुके हैं'

आदित्य 'ऐसा क्योँ'

िरा मैडम 'हर व्यक्ति की जिंदगी में कोई न कोई ऐसा राज होता है जिससे वो किसी के साथ नहीं बाँट सकता'

आदित्य सोचते हुए 'ये तू आप बिलकुल सही कह रही हो'

िरा मैडम को तभी कुछ याद आया और पूछने लगी 'तुम्हारी पत्नी का कुछ पता चला'

आदित्य उदास होते हुए 'नहीं'

िरा मैडम 'पुलिस ने क्या बताया?'

आदित्य 'मैंने पुलिस में कंप्लेंट hi नहीं की थी'

िरा मैडम 'क्योँ नहीं की, चलो पहले पुलिस कंप्लेंट hi करते हैं'

आदित्य 'नहीं बिलकुल भी नहीं'

िरा मैडम 'क्योँ नहीं करना चाहते?'

आदित्य 'आपने अभी कहा था न की जिंदगी में कुछ राज ऐसे होते हैं जिन्हे कोई भी शक्श किसी से भी शेयर नहीं कर सकता, ऐसा hi कुछ मेरे साथ भी है'

िरा मैडम 'और वो तुम मुझे बताओगे नहीं और मुझे पूछना भी नहीं चाहिए'

इसके बाद दोनों के बीच बिज़नेस पर बात तू होती लेकिन पर्सनल बात नहीं होती थी. परन्तु एक बात जरूर थी की अब दोनों की बात करने की फ्रीक्वेंसी धीरे धीरे बढ़ने लग गयी थी और एक दूसरे के प्रति इज़्ज़त का भाव भी बढ़ने लगा था.

एक दिन आदित्य को फ़ोन आया की िरा मैडम की तबियत बहुत जयादा खराब है तू आदित्य उसके पास पंहुच गया और वो हॉस्पिटल में एडमिट थी. डॉक्टर से पता करने पर पता चला की उससे कुछ डिप्रेशन हो गया जो किसी बात की वजह से है जो इसने अपने दिल में दबायी हुई है. वो तभी ठीक हो पायेगी जब किसी नजदीकी व्यक्ति से अपने दिल की बात काके अपने आप को हल्का कर सके.

आदित्य जैसे hi िरा मैडम से मिलने गया तू उसकी हालत देखकर उससे बहुत दुःख हुआ. वो अपने दुःख को भूल गया और उसने डॉक्टर से मिलकर उससे वंहा से डिस्चार्ज करवाया और उसकी देखभाल करने के लिए कुछ दिन की छुट्टी लेकर उसके साथ रहकर उसको आराम पंहुचने लगा.
 
अपडेट 96

आदित्य जैसे hi िरा मैडम से मिलने गया तू उसकी हालत देखकर उससे बहुत दुःख हुआ. वो अपने दुःख को भूल गया और उसने डॉक्टर से मिलकर उससे वंहा से डिस्चार्ज करवाया और उसकी देखभाल करने के लिए कुछ दिन की छुट्टी लेकर उसके साथ रहकर उसको आराम पंहुचने लगा.

आदित्य िरा मैडम का ध्यान रखने के लिए उसके घर पर hi रहने लगा.

िरा मैडम को अब से मैं िरा लिखूंगी.

िरा के घर पर रखकर आदित्य उसका हर तरह से ख्याल रखने लगा. उसने दिन रात एक करके उसको डिप्रेशन से काफी हद तक बहार निकल चूका था.

िरा के साथ रहते हुए ऐसे कई मौके आये थे जब आदित्य की उँगलियों ने उसके नरम नरम शरीर का स्पर्श किया था. चाहे ये अनजाने में हुआ हो लेकिन इस स्पर्श ने दोनों के दिलों में एक चिंगारी तू लगा hi दी थी.

इस चिंगारी के लगते hi दोनों का मन करता था की दोनों साथ बैठे और जयादा से जयादा वक़्त गुजरते हुए एक दूसरे की नजदीकियों का भरपूर आनंद उठाये.

इस सब में कई बार ऐसे मौके भी आते जब िरा और आदित्य कुछ बीती बातों को याद करते हुए ुद्दस्स हो जाते. दोनों की उद्दासी अगर देखा जाये तू एक जैसी थी लेकिन उसमे भी एक अलगाव था.

िरा को तू अपने पति की याद आ जाती थी और उसकी आँखों में आंसू आ जाते थे. आदित्य उसके आसुओं को अपने हाथों से पांच कर उससे सांत्वना देने लगता. ऐसा करने में आदित्य की उँगलियों का स्पर्श िरा के चेहरे पर उसकी उद्दासी को काम कर देता था. इतना hi नहीं उससे अपने मन में कुछ ऐसा होने लगता था जैसे की आदित्य उसके हर दर्द की दवा हो. उसका मन करता था की आदित्य उसके चेहरे को छुए और महसूस करे लेकिन वो ऐसा नहीं कर पति थी.

आदित्य की उद्दासी का कारन संध्या थी. वो उद्दासी के साथ साथ दर को भी महसूस करता था. उससे ये दर था की पता नहीं उसके साथ क्या हुआ होगा. वो अपने को इस सब के लिए दोषी मंटा था और उससे लगता था की वो उससे जाने से रोक सकता था. िरा उसके दुःख में उससे हिम्मत न हरने की बात करती थी और वो अपने चेहरे पर फीकी सी मुस्खरहाट ले आता था.

आदित्य ये इसलिए करता था ताकि िरा को दुःख न पंहुचे. िरा अपने हाथ को उसके हाथ पर रख देती थी. आदित्य को पहले तू बड़ा अजीब लगता था लेकिन अब धीरे धीरे उससे इसकी आदत होने लगी थी. इतना hi नहीं वो तू इस स्पर्श के नशे में खो जाता था. ऐसा hi चलता रहा और उन दोनों की नजदीकियां बढ़ने लगी.

दो हफ्ते बीतने के बाद आदित्य ने वापिस जाने के लिए कहा तू िरा ुद्दस्स हो गयी.

आदित्य ने उससे कहा की उसकी छुटियाँ ख़तम हो गयी हैं और उससे जाना तू पड़ेगा hi न.

िरा ने उससे कहा की 'अब यही रह जाओ और जॉब छोड़कर उसका काम संभल ले'

आदित्य उसके चेहरे को देखकर सोचने लगा की ये क्या कह दिया. एक बार तू उससे लगा की बात तू ठीक है लेकिन अगले hi पल उसके दिमाग़ ने कोई ऐसा सन्देश भेजा जिससे आदित्य ने उससे कहा 'अभी तू मुझे जाना होगा और इस बारे में अगर हम बाद में बात करें तू जयादा अच्छा होगा'

आदित्य की बात सुनकर िरा एकदम से आदित्य के गले लग गयी और उससे कहने लगी 'मैं फिर से अकेली हो जाउंगी और अब तुम्हारे बिना कुछ भी अच्छा नहीं लगेगा'

आदित्य भी अपने हाथों को उसकी पीठ पर लेजाकर उसकी पीठ को सहलाते हुए कहने लगा 'जाना तू पड़ेगा hi, लेकिन ये वादा है की रोज बात करूँगा. अब अपना ख्याल रखना और किसी चीज़ की जरुरत हो तू कॉल कर लेना'

इतना कहकर आदित्य िरा से अलग हुआ और वंहा से निकल गया. हालाँकि जब िरा उसके गले लगी थी तू उसके शरीर की गर्मी ने एक बार उसके निर्णय को हिला दिया था, लेकिन वो इस मोहपाश से निकल आया था और अपने गंतव्य की तरफ चल पड़ा था.

उधर मोहनलाल के जाने के बाद रुचिका काफी देर तक दिया को छेड़ती रही की अमेरिका में क्या क्या हुआ था.

दिया रुचिका की बात सुनकर कई बार उन दिनों को याद करके उसमे खो जाती थी, लेकिन वो रुचिका को क्या बताये. वो चाहे कितना भी रुचिका की नज़रों में मोहनलाल की पत्नी हो, लेकिन यह भी सच्चाई है की कोई भी पत्नी अपने पति को दूसरे के साथ देखकर खुश नहीं होती.

इस बात को ध्यान में रखकर दिया उससे इधर उधर की बातें करके उसका दिल बहलाती रही. फिर उससे दवाई खिलाकर सुला दिया.

उसके सोने के बाद दिया की आँखों में नींद कान्हा थी. रुचिका ने उसके दिल के तारों को छेड़ दिया था और वो अमेरिका के उन लम्हों को याद करने लगी.

उससे याद आने लगे वो पल जब डांस करने के बाद मोहनलाल और दिया डिनर करने लगे. डिनर करते वक़्त दोनों साथ साथ आये थे, लेकिन लेडीज अपना एक ग्रुप बनाकर अलग बैठ गयी और गेट्स अलग.

वो सब डिनर करते हुए बातचीत करने में मशगूल थे, लेकिन दिया और मोहनलाल के बीच तू कुछ और hi चल रहा था. वो दोनों एक दूसरे को तिरछी नज़रों से बीच बीच में निहार रहे थे. कई बार ऐसा होता की दोनों की नज़रे आपस में टकरा जाती, तब शर्म की वजह से अपनी नज़रों को चुराने लगते. उस वक़्त तू अपनी नज़रों को हटा लेते लेकिन दिल में हलचल मचने की वजह से फिर से एक दूसरे को निहारने लगते. ऐसा कई बार हुआ की उनकी नज़रों का टकराव हुआ और हर बार अपनी नज़रे हटाने या झुकाने का प्रयास करते लेकिन दोनों को hi पता था की क्या चल रहा है. दिल में एक मीठी सी चुभन हो रही थी और एक दूसरे की तरफ खिचाव को महसूस काके फिर से निहारने लगते.

दोनों को समझ नहीं आ रहा था की ये क्या हो रहा है? क्या ये फिजिकल अट्रैक्शन है, मानसिक खिचाव है, या एक दूसरे के साथ वक़्त बीतने की चाहत है या कुछ और.

जब डिनर ख़तम हुआ तू सब लोगों को एक ग्रुप फोटो खिचवाने के लिए कपल्स को साथ साथ खड़े होना था. जब मोहनलाल और दिया खड़े हुए तू वो दोनों साथ साथ तू खड़े हुए लेकिन इस तरह से जैसे साथ खड़े होने में शर्म महसूस हो रही हो.

जब दूसरे कपल्स ने उन्हें इस तरह देखा तू वो कहने लगे 'क्या आप दोनों आपस में प्यार नहीं करते?'

मोहनलाल 'नहीं नहीं हम तू बहुत प्यार करते हैं, आप ऐसा क्योँ पूछ रहे हैं'

उनमे से एक कपल ने उन्हें कहा की आप दोनों तू ऐसे खड़े हैं जैसे की आप एक न होकर दो हो या आप दोनों में कोई लड़ाई है.

ग्रुप फोटो में हमें इस तरह खड़े होना है, जिसमे हम दोनों दो न होकर बल्कि एक हैं' ये कहकर उस कपल ने सिखाया की कैसे खड़े होना है. बाकि कपल्स भी वैसे hi आकर खड़े हो गए. मोहनलाल और दिया के पास कोई चारा नहीं था क्योँकि वक़्त उन दोनों को पास लेन में लगा हुआ था.

खड़े होने के लिए महिला को आगे खड़े होना था और पुरुष को महिला के पीछे खड़ा होकर अपने हाथ आगे लेकर उससे आलिंगन में लेना था.

मोहनलाल ने जब ये देखा तू उससे बड़ा hi अजीब लगने लगा. दिया ने आँखों के इशारे से यह सब करने के लिए अपनी स्वीकृति दे दी.

मोहनलाल जैसे hi दिया के पीछे गया तू वो दिया के शरीर से उठाने वाली सुगंध और परफ्यूम की सुगंध के मिश्रित स्वरुप को सूंघ कर नशे में जाने लगा. मोहनलाल जैसे hi पीछे से दिया के नजदीक आकर उसकी पीठ पर मोहनलाल की छाती का स्पर्श मिला तू दिया के मन में तरंगे उठाने लगी. दोनों एक दूसरे की तरफ आकर्षित तू पहले hi हो चुके थे.

अब इस प्यार भरे माहौल में दोनों के आकर्षण में वक़्त की जरुरत की वजह से बढ़ावा मिल रहा था. मोहनलाल की छाती ने जैसे hi दिया की अर्धनग्न पीठ को छुआ तू उसके दिल में रकत का संचार बढ़ने लगा. उसने अपने आप को नियंत्रण में रखते हुए जैसे hi अपने हाथों को दिया के पेट की तरफ ले जाने लगा तू दोनों की हालत ख़राब होने लगी, लेकिन वक़्त की नजाकत को ध्यान में रखते हुए अपने हाथों को आगे ले गया. ऐसा करने पर उसकी बाजुओं के नीचे दिया के उरोजों का दबाना स्वाभाविक था.

दिया को जैसे hi अपने उरोजों पर मोहनलाल की बाजुओं का एहसास हुआ तू उसके शरीर में रकत परवाह एक डैम से बढ़ गया और दिल की धड़कन तेज हो गयी. उसने जल्दी से अपने हाथों को मोहनलाल के हाथों पर रखकर उन्हें थम लिया.

अब मोहनलाल दिया के शरीर के और नजदीक हो गया जिससे दिया के नितम्बों ने मोहनलाल की टांगों के ऊपरी भाग को छुआ जिससे मोहनलाल की भी धड़कन बढ़ गयी और पहली बार उससे एहसास हुआ की वो दिया के साथ इस तरह से उससे आलिंगन में लिए हुए है. वो उचित अनुचित के फेर में पड़ने लगा.

तभी किसी ने मोहनलाल को पुकारा, लेकिन वो तू अपने ख्यालों में गम था तू दिया ने आवाज़ की दिशा में गर्दन घुमाई लेकिन मोहनलाल तू सीधा hi देख रहा था. जैसे hi दिया ने गर्दन घुमाई तू उसके नरम नरम होठों ने मोहनलाल के गलों को स्पर्श किया. ऐसा होते hi मोहनलाल की तन्द्रा टूटी, लेकिन अब क्या हो सकता था जो होना था वो तू हो hi गया था.

मोहनलाल ने जैसे hi गर्दन दिया की तरफ घुमाई तू दिया के होंठों ने उसके गलों पर पूरी तरह से रगड़ते हुए एक लाइन बना दी और दोनों के होठों ने बस हल्का सा एक दूसरे के होठों को स्पर्श किया hi था की......
 
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