Kya Govind yunhi tarasta rahe ga - Page 8 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

Kya Govind yunhi tarasta rahe ga

EPISODE – 61

नींद से उठाने पर वो कुछ देर माँ और माँ दोनों के पास बैठा… माँ को किसी ने भी गोविन्द का वर्षा और अक्षरा से मिलने का नहीं बताया था… अगर माँ को पता चलता तो शायद वो अपना सबर खो कर फ़ौरन होनी बेटिओ से मिलने की ज़िद करती… माँ उस से बोहत मसरूफ होने का गिला कर रही थी…

माँ की सोच के अनुसार वो उन लम्हो को नहीं भूल प् रही थी जब गोविन्द उन के पास रत को सोया था और वो दोनों कुछ कामुक लम्हो की ग्रिफ्ट में रहे थे… गोविन्द जनता था के उस को जल्द या देर से माँ के साथ कुछ शामे बिताना hi परे गए… उस का अपना मन भी बोहत आकर्षित था माँ की ओर…

आज एक नयी बात और ये हुई के वो अपनी माँ के पास जब बैठा 3-सीटर सोफे पर तो उस ने अपना सर रख दिया था माँ के सीने पर तो उस को माँ के गुदाज़ चुके का स्पर्श उत्तेजित करने लगा… और उस का लुंड बेकाबू होने लगा… माँ बेटे का प्यार देखते हुए माँ को इतना ाचा लगा के वो सिंगल सीट सोफे से उठ कर गोविन्द के बराबर में बेथ गयी… और बोली…

माँ… “रजनी बहन मेरा भी बोहत मन करता हे के गोविन्द बीटा मेरे साथ भी इसी तरह लाड करे…”

माँ… “गंगा बहन… ये जितना मेरा बीटा हे उतना hi आप का भी हे… आप खुद इस से लाड कर लिया करे अगर ये नहीं करता… और इस के कान भी खेंचे ये मुझे बोहत सताता हे…”

गोविन्द ये सुनते hi माँ को दुसरे बाज़ू से अपने करीब करते हुए उस के गाल पे चूम लिया… और बोलै… “माँ… प्लीज… में आप से भी बोहत प्यार करता हु मगर ये ज़रूर हे के सोचता हु के आप को बुरा न लगे…”

गंगा भावक हो गयी और बोली… “मुझे क्यों बुरा लगे गए… तू तो मेरे चाँद बीटा हे…” और ये कहते कहते वो फाई जैसे उस पे लड़ सी गयीं…

और उन का एक हाथ पर गया गोविन्द की रनो पर और थोड़ा सा टच हो गया लुंड पर जो के इस वक़्त कुछ कुछ हार्ड हो रहा था… गंगा को पहले तो थोड़ा अजीब सा लगा मगर फिर वो खुद को जाने क्यों दूर न कर सकीय और सोचा के बीटा hi तो हे…

एक तो माँ के गुदाज़ जिस्म का स्पर्श और ऊपर से माँ का जिस्म भी कुछ काम भरा हुआ और गदराया न था… और साथ साथ एक हाथ माँ का लग गया गोविन्द के ाकरते लुंड पर और माँ ने वो हाथ हटाया भी नहीं… तो गोविन्द कुछ देर एक लिए… तो मनो जैसे होश खोने लगा था और क़रीब था के वो माँ के चुके भी मसल देता… कमरे से सीमा और ेषणा निकली और दोनों ीखते बोली के… “दोनों माँ बस अपने बेटे से प्यार करना… बेटिओ को तो कोई पूछता hi नहीं… और भैया तुम तो रत को भी घर से बहार रहने लगे हो… चाकर क्या हे…??”

गोविन्द ये बात सुनते hi बहनो के पास चला गया ताकि रत को बहार रहने की बात पे ज़याद चर्चा न हो… क्यों के माँ को नहीं इल्म इस सब क़िस्से का…

माँ… गोविन्द के अपने पास से उठने के बाद कुछ देर तक उस अजीब से अहसास के असर में रही जो आज उन को गोड़िन्द के जिस्म से मिला था और दिल ये छह रहा था के कुछ और आनंद लिया जये…

गोविन्द ने सीमा और ेषणा को एक साथ अपने गले से लगा लिया…

गोविन्द ने साफ महसूस किया के सीमा और ेषणा की पाकर में फ़र्क़ हे… ेषणा कुछ ज़यादा नज़दीक आते हुए अपनी तंग उस की टैंगो के बीच करके पूरा उस के लुंड को टच हो गयी और सीमा बस उस के सीने के साथ सटने में ज़याद दिलचस्पी ले रही थी…

सीमा का गले लग्न एक बहन भाई की तरह का था जब के ेषु एक लड़की की तरह उस के गुप्त अंग को चेर रही थी…

गोविन्द के लिए ये सब कुछ ज़यादा हो रहा था और सामने सोफे पर माँ और माँ भी उन की hi तरफ देख रही थी…

उस ने खतरे को भांपते हुए अपने होश कण्ट्रोल में रखते हुए कहा के माँ… माँ देखो न ये बहने भी मुझे तंग कर यही हे…

सब हंसने लगे तो गोविन्द ने मौके का फायदा उठाते हुए… कमरे की तरफ चला गया ये कहते हुए के उससे गयम जाना हे…

ेषणा… हँसते हुए… “हाँ हाँ भाई और स्ट्रांग बनाओ बॉडी…” गोविन्द ने उस की सोच पढ़ी….

ेषणा… “पता हे मुझे बॉंधु तू अपने किस अंग को स्ट्रांग बनाना में जूता हुआ हे…”

गोविन्द… “ेषु… तू नहीं सुधरने वाली…” सोचते सोचते कपड़े चेंज कर के जोग्गेर्स वग़ैरा पहन कर स्पोर्ट्स बैग उठाया और अकादमी का रुख किया…

अकादमी में आज उसे कुछ देर वार्म उप एक्सरसाइजेज के बाद उस को कहा गया के स्विमिंग करे… उस ने स्विमिंग कस्टम अपने बैग में से निकल कर चेंज कर के आधा घंटा स्विमिंग की और फिर उस को फिर से कुछ बॉडी स्ट्रेचिंग एक्सरसाइजेज करवाई गयी… 6 बज रहे थे… उस ने वही से कॉल मिला कर द्क्प से बात की और उस को कहा के वो रेजिडेंस से कपड़े चेंज कर के… साथ वाले पार्क में पोहंचे 7 बजे अपनी जारी में अकेली और उस का वेट करे…

और अपनी कार में बेथ कर साइकेट्रिस्ट के दिमाग़ में पोहंच गया… माँ और पापा आ चुके थे उस के कमरे में… डिटेल में हिस्ट्री लेने के बाद… उस ने काउन्सलिंग स्टार्ट कर दी… वो उन दोनों को यही समझा रहा था के इंसान की फितरत के अनुसार हर काम ठीक हे और अगर न किया जये तो जिस्म या तो उस काम को न करने का आदि हो जाता हे या फिर उस काम की खाव्हिश जिस्म चोर देता हे… और ये के पति पत्नी का शारीरिक बंधन भी इसी तरह से होता हे जब तक रेगुलरली उस का उपयोग करते रहे गए तब तक एक दुसरे के बदन की आदत और ज़रुरत रहती हे… उस ने उन दोनों को राज़ी किया के वो दोनों फिर से एक दुसरे को वक़्त दे गए… और कोशिश करे गए के सब पहले जैसा हो सके… इस में शामे लग सकता हे मगर निराश होने से और मुश्किलें बढ़ें गई… और नेक्स्ट विजिट का टाइम दिया एक वीक के बाद का…

माँ और पापा दोनों वह से निकले तो पापा तो खुश थे मगर माँ अब भी कुछ परेशां सी लग रही थी… वापसी में कार में ड्राइवर होने की वजा से दोनों खामोश रहे… और घर पोहंच गए…

गोविन्द भी अकादेमी से निकल कर जब पोहंचा पार्क के पास तो आशा आ चुकी थी वह… और अपनी जारी से उतर कर उस की कार में आ बैठी…

शाम का वक़्त था… बहार वैसे भी अँधेरा होने की वजा से रौशनी काम थी और कार के अंदर के शीशे भी काले थे… गोविन्द ने कार में बैठे बैठे आशा को अपने पास करते हुए उस के होंटो को चूमा… दोनों कुछ देर तक चूमते रहे होंठ… गोविन्द उस के होंटो का रास यूँही चूसता रहता अगर आशा उस को दूर न धकेलती…

आशा… “अब बस भी करो… खा hi जाओ गए मेरे होंटो को… कल कहा थे…”

गोविन्द ने कार वह से निकलते हुए कहा… “यार एक आध दिन न मिलने से मोहबत बढ़ती हे…”

आशा… “ाचा कितनी मोहबत बढ़ गयी अब ये कैसे पता चले गए…” खुश थी बोहत…

गोविन्द… उस का हाथ पकड़ते हुए… “इतनी बढ़ गयी के… के रत को नींद भी न आयी…”

आशा इस बात को सच समझते हुए… बोली… “यार… नींद तो मेरी भी ग़ायब हे अब… ऐसा लगता हे के बस चुपके से तुम कही से आ जाओ गए मेरे पास…”

और कुछ भावक सी हो कर अपना सर रख दिया उस के कंधे पे…

और पोहंच गए… एक शॉपिंग मॉल के बहार… गोविन्द ने कार पार्क कर के आशा को बहार आने को कहा… वो भी ख़ामोशी से कार उतर कर उस के साथ चल दी…

पहले गोविन्द ने एक साड़ी उस के लिए ली अपनी पसंद से फिर उस को कहा के उस की डीडीओ के लिए… कुछ साड़ी और दुसरे कपड़े लेने में हेल्प करे… गोविन्द ने अपनी डीडीओ के लिए काफी साडी शोपिंग की… जब साड़ी शॉपिंग ख़तम हुई तो आशा ने उस से कहा के वो भी कुछ देना चाहती हे उस को… फिर दोनों गिफ्ट्स शॉप पर ए और वह से आशा ने एक ताज महल का बारे खूबसूरत मॉडल परचेस कर के गिफ्ट किया गोविन्द को… सेल्स गर्ल मसरूफ थी पैक करने में तो जल्दी से गोविन्द ने उस को किश कर लिया गाल पे…

आशा झूट मूट का घुसा करने लगी…

फिर दोनों ने सारा सामान उठाया और कार में रखा… कार में रखते वक़्त गोविन्द ने जो डीडीओ के लिए शॉपिंग की थी उस के दो हिस्से किये… एक एक साड़ी अलग करके बाक़ी सरे एक्प्रे ीखते पैक कर के दिग्गी में रख दिए…

आशा ने कहा के ेषणा बोहत अछि लड़की हे… और ये भी कहा के बाक़ी डीडीओ से भी मिलना हे… तो गोविन्द ने कहा के कुछ दिन थेर जाओ उन से भी मिल लेना…

एक जगा से आइस क्रीम ले कर… दोनों साथ कार में कहते भी रहे और घुमते भी रहे… दोनों को एक दुसरे का साथ बोहत ाचा लग रहा था… आशा ने गोविन्द को मिलने के लिए बोलै… तो गोविन्द ने उस को बताया के कल तैयार रहे…

पार्क के पास आशा को ड्राप कर के गोविन्द घर आ गया और ख़ामोशी से सरे कपड़े अपनी अलमारी में रख दिए…

खाना वग़ैरा खा कर सब अपने अपने कमरे में चले गए… गोविन्द पापा और प्रकाश के साथ बेथ गया लाउन्ज में और उन को बताया के वो वेडनेसडे को डीडीओ को लये गए 2 बजे यहाँ घर पे तो उन को अभी आना होगा उस वक़्त ताकि वो भी मिल ले उन से… माँ और ेषणा को नहे बताया था… ये सरप्राइज होता उन के लिए…. 12 से कुछ पहले वो पोहंच गया सेठ राजेंदर की हवेली के बहार...
 
happy-diwali-images.jpg


:हार्ट: ... तो आल फ्रेंड्स ... :हार्ट:
 
EPISODE – 62

मैनेजर, सेठ राजेंदर की हवेली के सिटींग रूम में अकेला मौजूद था और गोविन्द उस के दिमाग़ में… हवेली का पुराण मुलाज़िम मैनेजर को वह बिठा कर चला गया था… ठीक 12 बजे टेलीफोन रिंग हुई… मैनेजर ने फ़ौरन कॉल अट्टनेद कर ली…

सेठ राजेंदर… “रघु ने सारा काम ख़राब करदिया ज़मीन पर आग लगा कर… उस ने इस काम को ग़लत अंदाज़ में करने की कोशिश की… ये ज़मीन बोहत क़ीमती हे और हमें बारे प्रॉफिट दे सकती हे… जिस मला ने इनफार्मेशन दी थी वो भी नाराज़ हे… उस का शेयर भी था प्रॉफिट में… ख़ैर ज़मीन के किस्से को कुछ शामे के लिए चोर दो… उस को बाद में देखे गए… रोड कंस्ट्रक्शन में भी शामे लगे गए...”

मैनेजर… “जी ठीक हे…”

सेठ राजेंदर… “मेरी प्रोटेक्टिव बैल हो गयी हे दिल्ली से मगर मए अभी वापिस नहे आ सकता… अभी में जिस काम के लिए यहाँ हु उस के सिलसिले में अभी थोड़ी देर पहले मेरी मीटिंग ख़तम हुई हे और तुम ऐसा करो के बेसमेंट में 2 बैग्स रखे हे कॅश के वो तुम्हे ले जाओ मुंबई और वह कॉन्टिनेंटल होटल में कमरा रेंट पर लेकर रहो… 3 दिन के लिए… रोज़ाना शाम को 4 से 5 बजे तक लॉबी में बैठना हे… वह पर तुम से एक व्यक्ति खुद आ कर मिले गए… उस ने ब्लैक कलर का सूट पंत पहना होगा और उस के कोट के सामने वाले पॉकेट में वाइट कलर का रूमाल लगा होगा… वो तुम्हारे पास आ कर “224” कोड वर्ड बोले गए और तुम उस को जवाब में “350” कोड वर्ड बोलो गए… फिर वो तुम से वो बैग्स लेले गए… बस तुम्हारा काम ख़तम और तुम फिर दौलत पुर वापिस आजाओ गए… अब तुम मेरी बात करवा दो मुलाज़िम से ताकि वो तुम्हारी कार में बैग्स रखवा दे बेसमेंट से निकल कर…”

अब गोविन्द पोहंच चुक्का था सेठ राजेंदर के दिमाग़ में… तो पता चला के माफिया ने उस को रीजनल हेड चुन लिया हे… और इस लिए अभी उन के साथ मीटिंग में था…. जो पिछले रीजनल हेड था उस की डेथ एक दिन पहले अचानक हार्ट अटैक से हो गयी थी…

मीटिंग इस तरह से हुई थी के वो अपने होटल के कमरे में से उन के साथ टेलीग्राफिक मशीन के थ्रू बात कर रहा था… दुसरे माफिया हे हेड्स इस के सामने अभी नहीं आये थे… क्यों के राजेंदर अभी सेलेक्ट हुआ था और उन के लिए अभी इस ट्रस्ट के क़ाबिल नहीं हुआ था… टेलीग्राफिक मशीन में से मैसेज बहार निकलता था… जिस में साडी इंस्ट्रक्शंस होती थी… सेठ को रुपया पहले hi माफिया की तरफ से दे दिए गए थे पूरे इंडिया में ह्यूमन ट्रैफिकिंग और ड्रग्स का सेटअप बनाने के लिए… और हर महीने इंडिया से लडकिया भिजवानी थी यूरोप… और ड्रग्स को फैलाना था पूरी कंट्री में…

मैनेजर को रुपया पुहंचने थे तेजा नाम के डॉन के पास जो के मुंबई में शराब, जुआ, ड्रग्स, स्मगलिंग, प्रोस्टीटूशन, हर तरह के ग़लत कामो को चलता था… मैनेजर को सेठ ने ज़यादा न बताया था… और उस का काम बस वह तक रुपया पोहंचना था…

अब गोविन्द के पास मैनेजर सोर्स था तेजा तक पोहचने का…

गोविन्द ये भी सोच रहा था के अगर रुपया न पोहंचे तेजा के पास तो उन का काम डिले होगा… और गोविन्द ये सरे रुपया लेले मैनेजर से मंद इन्फ्लुएंस कर के… और सेठ राजेंदर की पोजीशन भी खराब हो जये गई माफिया के सामने…

लेकिन मैनेजर का मुंबई जाना भी ज़रूरी हे ताकि गोविन्द का कांटेक्ट हो सके तेजा के साथ…

गोविन्द ने इस की प्लानिंग इस तरह से की के… मैनेजर ने जाना था मुंबई ट्रैन में अगली रत को 9 बजे… इस बीच गोविन्द रुपया के बैग ले लेता मैनेजर से और अगले रोज़ उन बैग्स से रुपया निकल कर उस में कुछ और भर कर वापिस मैनेजर तक पोहंचा देता और मैनेजर भी उस बीच बैग्स न चेक करता… ये भांडा उस वक़्त फूटता जब मैनेजर वो बैग्स हवाले करता तेजा के बन्दे को मुंबई में…

गोविन्द अपनी कार को आगे ले जा कर ऐसी जगा साइड में पार्क कर दी जो के मैनेजर के घर जाने के रस्ते में थी मगर थी सुनसान…. और डिग्री खोल कर फिर से ड्राइविंग सीट पर बेथ गया और मैनेजर के दिमाग़ को कण्ट्रोल करते हुए वह तक ले आया…

मैनेजर ने अपनी कार गोविन्द की कार के पीछे खरी कर दी और अपनी कार में से दोनों बैग्स निकल कर गोविन्द की कार की डिग्री में रख कर डिग्री बंद कर के वापिस अपनी कार को ड्राइव कर के घर की तरफ चला गया…

गोविन्द ने भी बारे आराम से अपने घर आ कर डिग्री खोली तो हैरान हो गया क्यों के उस के ज़ेहन में ये था के बैग्स छोटे हों गए… मगर ये तो फुल साइज सूट केस थे… वो फिर से सेठ राजनेडर के दिमाग़ में जा कर चेक किया तो ये पूरे 20 करोड़ थे… जो के तेजा को दिए जा रहे थे और उस इस से पूरे इंडिया में सेटअप करना था ड्रग्स और ह्यूमन ट्रैफिकिंग का और हर महीने यूरोप लडकिया भेजनी थी किडनैप कर के…

अब गोविन्द भी परेशां हो गया के इतने सरे रुपया रखे गए कहाँ… उस ने चेक किया सरे घर वाले तो सो रहे थे… फिर एक एक करके दोनों बैग्स ले गया कमरे में और अपनी अलमारी में नोट्स के बंडल निकल कर इस तरह से सेट कर दिए के नज़र न ए… और बैग्स वापिस कार की डिग्री में दाल दिए… और सोचा के सुबह इन बैग्स में नेवसपपेर भर कर मैनेजर को देदे गए…

वापिस कमरे में आ कर अपने बीएड पर लेता तो फिर से ये परेशानी होने लगी के इतने सरे रुपया का करे गए क्या… और अब उस को अंदाज़ा हुआ के अपनी ज़रुरत से ज़यादा रुपया भी इंसान को परेशां कर देते हे…

ये बात भी गोविन्द के ज़ेहन में आयी के चाहे इस बार तेजा को रुपया न मिले या फिर सेठ राजेंदर से नाराज़ हो कर माफिया उस के खिलाफ एक्शन लेले और इस बार ह्यूमन ट्रैफिकिंग या ड्रग्स का काम रुक भी जये या डिले भी हो जये तो फिर कोई और तेजा या सेठ राजेंदर रुपया के लालच में अपने देश की मासूम नारियो को ज़बरदस्ती सेक्स के लिए दुसरे देश को बेचे गए… फिर उस को ख्याल आया के जिस तरह से वो उठ खरा हुआ हे इस पाप का सरविनाश करने के लिए तो उस वक़्त कोई और सामने ए गए अपने देश की लडकियो की हिफाज़त के लिए…

फिर उस को ख्याल आया के डीडीओ के लिए कपड़े लिए हे उन के देने हे और फिर कॉलेज भी जाना हे…

सुबह 7 बजे तक वो उठ चुक्का था… और रेडी हो कर निकल गया पहले वो सेठ गिरधारी लाल के घर के बहार पोहचा और उन के हाँ चेक किया तो चेतन और बिपिन, अस उसुअल, सो रहे थे और सेठ गिरधारी लाल भी जा चुके थे ऑफिस बस सेठ की पत्नी रह गयी थी… उन के निकलते hi… गोविन्द कार ला कर पार्क कर दी उन के घर से ज़रा दूर और डीडीओ के लिए कपड़े निकले अपनी कार में से और बेल्ल बजा कर वेट करने लगा घर के दरवाज़ा खुलने का… वैसे वो चेक कर चुक्का था… दोनों दिदिया किचन में थी और बेल्ल बजते hi वर्षा दीदी ने अक्षरा को दरवाज़ा खोलने का कह दिया और खुद किचन में काम करती रही..

अक्षरा ने दरवाज़ा खोल कर गोविन्द को देखते hi ख़ुशी से वर्षा को बताना चाहा तो गोविन्द ने फ़ौरन अपने होंटो पर ऊँगली रखते हुए उस को खामोश करते हुए इशारे से दरवाज़ा बंद करने का कहा… उस के दोनों हाथो में कपड़ो के शॉपिंग बैग्स थे… और उस ने अपने बाज़ू खोल लिए दीदी के लिए… अक्षरा शरमाते और मुस्कुराते हुए उस के गले लग गयी… उस ने अपने होंठ रख दिए अक्षरा के होतो पर तो वो भी उस को किश करने लगी… कुछ देर ऐसे hi गुज़र गए तो वर्षा की परेशानी से भरी आवाज़ आयी… “कोण हे दरवाज़े पे अक्षरा…??” और कहते कहते किचन से बहार आने लगी तो गोविन्द और अक्षरा एक दम से अलग हो गए…

अश्शारा के गाल लाल और साँस बेतरतीब हो चुकी थी… उस ने अपने आप पर काबू पते हुए उस को कहा के चले अंदर… उस वक़्त तक वर्षा भी बहार आ चुकी थी किचन से और गोविन्द को देखते hi तेज़ क़दमों से उस के पास आकर उस को अपने सीने से लगा लिया… “मुन्ना… तू अचानक.. ऐसे…???”

गोविन्द… “क्यों दीदी… मेरे आने से खुश नहीं हुई क्या…??”

वर्षा… “मुन्ना तू भी न… किसी बाटे करता हे… बोहत ख़ुशी हुई तुझे देख के… आ अंदर आ…”

और सब इस तरह से चलते हुए लौंग में आगये…

गोविन्द ने शॉपिंग बैग्स में से साड़ी और दुसरे कपड़े निकल कर दोनों बहनो को दिए तो वो दोनों खुश होते हुए… कहने लगी के क्यों लाया हे और इन की क्या ज़रूअत थी…

गोविन्द… “इन बातो को चोरो छाए पिलवाओ जल्दी से फिर मुझे कॉलेज जाना हे…”

वर्षा… “जा न छोटी जल्दी से छाए ले आ… थरमस में हे… एक कप मेरे लिए भी निकल लेना…”

अक्षरा बुरा सा मुंह बनती हुई लिचें की तरफ गयी तो गोविन्द ने वर्षा को इशारा किया अपने पास आने का…

वर्षा शर्मा कर चेहरा नीचे कर लिया और वही बैठी रही…

गोविन्द… “आओ न दीदी… मेरे पास…”

वर्षा… “अरे नहीं मुन्ना अभी नहीं… अक्षरा आती होगी छाए ले कर…” और नीचे सर झुका लिया… गाल पूरे शर्म से लाल हो चुके थे…
 
jiye मेरी पहली कहानी हे... और आज आप के कमैंट्स पढ़ कर मुझे ऐसा लगा जैसे लिटेराल्ल्य मेरी सांसे थम गयी थी... आप यक़ीन करो या नहीं... ये इतने खूबसूरत शब्द नहीं मुझे ये अनमोल मोती लग रहे हे...

जेसे अभी समंदर की तेह में घेहराइयों में किसी सीप ने अपनी मुठी खोल कर बोहत सरे मोती सामने कर दिए हो... जैसे बोहत सरे जुगनू जगमगा उठे हो... जैसे दिवाली के इस अवसर पर बोहत सरे डीप जल उठे हो...

वक़्त थम सा गया हे... फिर से अब कोई तमना बाक़ी नहीं रही किसी और कमैंट्स को पढ़ने की...

सब कुछ जैसे फीका सा हे इस के बाद...

आप के आकर्षक कमैंट्स की नज़र एक छोटी भेंट...

एक दिल है

एक जान है

दोनों तुझपे...

दोनों तुझपे क़ुर्बान हैं

एक मैं हूँ, एक ईमान है

दोनों तुझपे हाँ तुझपे

दोनों तुझपे क़ुर्बान हैं

इश्क़ भी तू मेरा प्यार भी तू

मेरी बात ज़ात जज़्बात भी तू

परवाज़ भी तू rooh-e-saaz भी तू

मेरी सांस नब्ज़ और हयात भी तू

मेरा राज़ भी तू

पुखराज भी तू

मेरी आस प्यास और लिबास भी तू

मेरी जीत भी तू, मेरी हार भी तू

मेरा काज राज और मिज़ाज भी तू...

मेरे इश्क़ के, हर मक़ाम में

हर सुबह में, हर शाम में

इक रुतबा है, एक शान है

दोनों तुझपे हाँ तुझपे

दोनों तुझपे हाँ तुझपे

दोनों तुझपे क़ुर्बान हैं

एक राइटर की लेखनी के लिए जो शब्द अपने कहे... इतने खूबसूरत शब्द शायद मेरे पास न हों.... और मेरे पास तो अब लिखने के लिए कुछ बचा hi नहे...

कही मुझे ऐसा लगा के आप ने कुछ लिखते लिखते अपने पेन के क़दम रोक लिए... यक़ीन की जिए... पूरी अक़ीदत और नम्रता से में ये बात के रहा हु के अब कुछ और में ने लिखा तो अपनी नुम आँखों से आंसू शायद न रोक पौन...

🙏
 
EPISODE – 63

अक्षरा भी छाए ले कर आ गयी… और तीनो बहन भाई छाए पीने लगी… वर्षा अभी भी चुप और खामोश थी…

अक्षरा ने नोट कर लिया… “दीदी कुछ हुआ क्या… तू इतनी चुप क्यों हे… मुन्ना को देख कर पहले तो तेरी ज़बान नहीं रुक रही थी…”

वर्षा ने आँखे ऊपर की तो उस की आँखे पूरी लाल थी… और बोली गोविन्द की तरफ देखते हुए… “माँ से मिलने का भी मन कर रहा हे…” और अक्षरा भी उदास हो गयी…

गोविन्द समझ गया के वर्षा ने बात को बदल दिया हे तो उस की जब नज़र मिली वर्षा से तो उस ने वर्षा को आँख मर दी…

वर्षा ने फिर से आँखे नीची कर ली…

अब गोविन्द उठा अपनी जगा से वर्षा के पास बैठते हुए कहा… “दीदी दिल छोटा न कर… कल वेडनेसडे को आऊं गए न 2 बजे तो मिल लेना माँ से…”

और अपना एक बाज़ू उस के गिर्द करते हुए अपने हाथ से उस के चुके का साइड दबाया… वर्षा ने उस का हाथ न हटाया मगर देखा अक्षरा की तरफ… उस का धयान नहीं था…

वर्षा चुपके से अपने हाथ से उस का हाथ हटने लगी… और आँखों से अक्षरा की तरफ इशारा करने लगी…

अक्षरा को जैसे ख्याल आया के गैस स्टोव को ऑफ नहीं किया और किचन की तरफ चली गयी…

उस के जाते hi गोविन्द ने किश किया वर्षा के होतो पर… वर्षा ने भी उस की किश का जवाब देते हुए अपने होंठ फ़ौरन हटा कर कहा… “मुन्ना कुछ तो ख्याल कर… अक्षरा के सामने तो न कर…”

गोविन्द… “अरे दीदी… अक्षरा को तो सब पता हे न… क्यों घबरा रही हो उस से…”

वर्षा ने उस के होतो को चूमा और कहा… “मुन्ना… प्लस उस के सामने मत कर…” और उठ खरी हुई… तो गोविन्द भी उस के साथ hi खरा हो कर अपने गले से लगा कर ज़ोर से भींचते हुए… “चलो अब में चलता हु… कॉलेज जाना हे…”

और बहार निकल कर अक्षरा को भी गले से लगते हुए उस के माथे पर किश किया और bye बोलता हुआ कॉलेज के लिए निकल गया…

क्लासेज अटेंड कर के वो लाइब्रेरी आ बैठा और वह से पहले तो लाइब्रेरियन के मंद में जा कर चेक किया के पुराने न्यूज़ पेपर्स का क्या करते हे… तो उस को पता चला के 3 महीने के पेपर ीखते करके दे देते हे राडी वाले को… और अभी राडी वाला आया हुआ हे पपेर्स लेने लास्ट 3 मोनथस के… गोविन्द ने चेक किया तो राडी वाले को पेपर्स ले कर कॉलेज गेट से बहार निकलने में 20 मिनट लगने थे तो वो वही बेथ कर सब के दिमाग़ चेक करने लगा… बापू प्रकाश को चेक किया… प्लाट पर काम काफी तेज़ी से चल रहा था और प्रकाश ट्रक की देलिएवेर्य लेने गया हुआ तह अपने साथ दो कर्मचारी ले कर… ट्रक पूरी तरह से रिपेयर हो चुक्का था…

पापा के पास गया तो पता चला के माँ ने कोआपरेट नहीं क्या रत को और रोने लग गयी थी रत को तो इस लिए कुछ हुआ नहे… माँ के दिमाग़ में गया तो देखा के वो भी परेशां थी और उनका मन नहीं हो रहा था पापा की ओर और वो गोविन्द के स्पर्श को यद् कर रही थी… गोविन्द ने कुछ देर उन के दिमाग़ में रह कर उन को समझाया जो के पहले साइकेट्रिस्ट समझा चूका था और राज़ी किया आज रत फिर से तरय करने के लिए… द्क्प कुछ बिजी थी मगर सोच रही थे के गोविन्द पता नहीं कब मुलाक़ात करे गए… विक्रम को चेक किया तो वो शोरूम पर था…

इतनी देर में… राडी वाला पेपर्स ले कर निकला तो गोविन्द भी उस के पीछे निकल आया और उस के ठेले के पास कार रोक ली और उस के मंद को इन्फ्लुएंस करते हुए उस से को वह ठहराते हुए जीतनेय नेव्स्पपेर्स भी बैग्स में आसक्ति थे… उतने बैग्स में भर कर उन को अछि तरह से लॉक करदिया… और राडी वाले को उस की पेमेंट कर दी… फिर वो पोहंच गया शोरूम…

गोविन्द… “यार विक्रम कल तू अगर लेट निकले गाँव से तो ेषणा के स्कूल से ट्रांसफर सर्टिफिकेट लेता आना…”

विक्रम… “यार एक hi तो मेरे दोस्त था तू गाँव में… और फिर ेषणा के जाने से किरण भी बोहत उदास हो जये गई…”

गोविन्द… “यार अगर तू भी शहर सेटल होना चाहे तो किरण का भी बनवा ले ट्रांसफर सर्टिफिकेट स्कूल से और अपने लिए घर देख ले यहाँ वो परचेस कर लेते हे…”

विक्रम इस बात से बोहत खुश हुआ और कहा… “में आज hi कह देता हु पोपेर्टी डीलर से…” विक्रम जनता था के उस का दोस्त अब बारे आदमी बन चुक्का हे मगर दोस्ती की क़दर हे इस के दिल में इस लिए उस ने गोविन्द की मदद को अहसान न समझते हुए हाँ कर दी… “किरण भी बोहत खुश होगी…”

गोविन्द ने चेक किया उस को और उस के बॉस को तो जाना के उस का या किसी और दोस्त का उस के बॉस के दुसरे माकन पे जाने का कोई इरादा नहे हे…

फिर उस ने सेठ राजिंदर के मैनेजर को चेक किया… और उस के ऑफिस के क़रीब पोहंच कर एक सुनसान जगा पर उस को उस की कार में अकेले बुला लिया इस पूरे शामे उस को अपने कण्ट्रोल में रखा और मैनेजर ने अपनी कार गोविन्द की कार के पास में रोकते हुए उतर कर दोनों बैग्स उठा कर पानी कार की डिग्री में रख कर वह से वापिस अपनी ऑफिस पोहंच कर जब सीट पर बैठा तो गोविन्द ने उस के मंद का कण्ट्रोल छोरा… और इस तरह से के मैनेजर को कुछ यद् न था के वो कही बहार गया भी था या नहे…

वह से निकल कर द्क्प ऑफिस पोहंचा… आशा बोहत खुश हुई उसे देख कर…

गोविन्द… “6.30 बजे ताका आ जाना पार्क के पास… में वह से पिक कर लूंगा तुम्हे…”

आशा… “क्यों… आज कहा जाना हे…”

गोविन्द ने अब उस की आँखों में देखते हुए एक आँख मरते हुए कहा… “प्यार करने के लिए…”

आशा… शरमाते हुए… “कहाँ चलें गए यार… किसी जगा हे… सेफ तो हे ना…”

गोविन्द… “वैसे तो सेफ हे… मगर है एक बात हे…”

आशा… अपनी एएब्रोस को उचकते हुए परेशानी से… “वो क्या…”

गोविन्द… मुस्कुराते हुए… “बस तुम्हे मुझ से खतरा हो सकता हे…”

आशा शरमाते हुए… “स्टुपिड… बेशरम…”

गोविन्द… हँसते हुए उठा… “ok सी यू ात थे पार्क ात 6.30 पं…”

वह से निकल कर गोविन्द अपनी कार में बैठा तो उस को एक ख्याल आया और विक्रम के दिमाग़ में गया तो विक्रम उस वक़्त एक प्रॉपर्टी दलेर के साथ बैठा घर किराये पर लेने की बात कर रह था… गोविन्द भी उसी तरफ चल दिया…

गोविन्द ने प्रॉपर्टी दलेर के दिमाग़ में से चेक किया तो जिस तरफ उन का प्लाट था उस के करीब में एक घर था 3 बीएड रूम, लाउन्ज, ड्राइंग रूम, किचन का… सिर्फ 20 लाख का… वह से स्कूल भी ज़यादा दूर नहे था…

उस ने विक्रम को वही बैठने के लिए गाइड किया… और खुद भी वह पोहंच गया और विक्रम को कहा के फाइनल कर ले डील… और एडवांस पेमेंट 5 लाख कर दिए… और उस को कहा के अगले दिन पार्टी को बुला कर पपेर्स वग़ैरा बनवा ले… बाक़ी पेमेंट भी कल हो जाये गई… गोविन्द अब कार में कुछ रुपया रखता था ताकि ज़रूरत के वक़्त काम ाज्येन…

बहार निकल कर विक्रम को कोंग्रटुलते किया और उस को कहा के कल वो अपने घर का विजिट करले और जो ज़रूरी रिपेयर हो और नया पेंट वो स्टार्ट कर ले… उस ने 50 हज़ार उस को दे दिए और ये भी कहा के कोई मोटरसाइकिल अछि देखो फिर मुझे बताओ ताकि वो भी लेलें उस के लिए…

विक्रम की आँखे झुक गयी… “यार कितना करे गए मेरे लिए…”

गोविन्द… “यार तेरे लिए नहे कर रहा अपनी माँ और बहन किरण के लिए कर रहा हु…”

विक्रम अपने आप को रोक न सका और गले लगा लिया गोविन्द को… और रोने लगा…

गोविन्द ने अपने दोस्त को प्यार से अलग करते हुए… “ड्रामा न कर यार… कल यद् से गाँव के स्कूल से ेषणा और किरण दोनों के स्कूल सर्टिफिकेट्स लेते आना… में कल hi उन के यहाँ शहर में स्कूल में एडमिशन के लिए बात करू गए… और मोटर साइकिल कल hi लेनी हे…”

उस के बाद… अकादमी पोहंच कर रेगुलर warm-up और बॉडी स्ट्रेचिंग एक्सरसाइजेज करता हे और 6.30 पर पार्क के पास पोहंच जाता हे…

गोविन्द के वह पोहचने तक आशा भी आ अज्ञेय थी… स्माइल करते हुए अपनी जीप से उतर कर इस की कार में बेथ गयी… और अपने हैंड बैग से एक चादर निकल कर अपने आप को कवर कर लिया… चेहरा भी काफी चुप गया था आशा का… कार 10 मिनट के अंदर hi शोरूम के मालिक के माकन के पास पोहंच गए… चौकीदार का दिमाग़ भी इन्फ्लुएंस हो चुक्का था उस ने गेट खोल दिया था… और खुद बहार खरा हो कर बहार से दरवाज़ा बंद कर लिया… गोविन्द नीचे उतरा… कार में से मिनरल वाटर, जूस और कुछ स्नैक्स भी निकल कर आशा को बहार आने को कहा…
 
EPISODE – 64

आशा पूरी तरह चादर में कवर थी… चेहरा भी ढाका हुआ था… अपना हैंड बैग ले कर अंदर चली गयी… और 1सत फ्लोर पर आ गए… गोविन्द ने स्टैर्स वाला दूर लॉक करदिया… अब नीचे से कोई ऊपर नहीं आ सकता था… और 1सत फ्लोर पर बैडरूम में ले आया आशा को… कमरा साफ सुथरा और था… अटैच्ड बाथ था… कमरे में एक 2 सीटर काउच और एक बीएड था… सब से खास बात कमरे की चाट पर और दीवारों पर बारे बारे मिर्रोर्स लगे हुए थे जो कमरे की रौशनी को और बढ़ा रहे थे…

जेसे hi आशा ने चादर उतरी तो कमरे की रौशनी की जगा कमरा भर गया नूर से….

साड़ी में वो क़यामत लग रहे थी… एक तो आशा का फिगर… तन्ना हुआ सीना… पेट अंदर… साड़ी इस तरह से बंधी हुई थी के नाभि पूरी दिख रही थी… चमक रही थी… आज कुछ ग्लो या कोई और चीज़ लगायी थी आशा ने नाभि के पास… कमर के पास से कासी हुई साड़ी… उस की गिडाज़ टैंगो और पेट के निचले हिस्से को उबार रही थी…

आशा मुस्कुरा दी… गोविन्द की आँखे जहा की वही टिक गयी… आशा खुद से घूम गयी… पीछे कमर पूरी नंगी… ब्लाउज बस हलकी सी डोरी से बंधा हुआ था… और बारीक सी स्ट्रिप ब्रा की भी दिख रही थी… गोर चमकते बदन पर…

आशा जब फिर से मूर्ति गोविन्द की तरफ तो उस का मुंह खुला हुआ था…

आशा हंसने लगी… “ऐ मिस्टर… क्या हुआ…”

गोविन्द ने एक दम से अपना मुंह बंद किया और एक ठंडी आह भरी “ाः”…. फिर जैसे खवाब से जागते हुए बारे लोफर अंदाज़ में आशा को आँख मरी और बोलै… “द्क्प आज तो पूरा सामान ले कर आयी हो मेरे क़त्ल का…”

आशा अपना एक हाथ ोप्पर हवा में उठाते हुए कमर को खुम दिया और दूसरा हाथ अपनी कमर के पास रखते हुए रक़्स का पोज़ बना लिया जैसे कोई नर्तकी अपने राजा को अपनी जवानी की भेंट दे रही हो… और बोली खनकती आवाज़ में… “सामान तो अभी मेरे राजा तुम ने पूरा देखा नहीं… आज तुम्हे एक द्क्प बताये गई के मिलान किस्से कहते हे…”

गोविन्द अब इस आँख मटके को ज़यादा न झेल सका और अपना हाथ आशा की कमर पर रखते हुए उस को अपने क़रीब करके उस के होंटो पर अपने होंठ रख दिए…

आशा ने कुछ देर तो उस के लबो को जैम इ हयात पिलाया और फिर उस के सीने पे हाथ रखती उस को ज़रा सा दूर किया और बोली… “राजा आज मुझे सवारी करने दो…”

ये शब्द सुन कर गोविन्द ने सर झुकाते हुए कहा… “आप का घोरा तो कब से तैयार हे…”

आशा भी मुस्क़ुएरते हुए उस की शर्ट के बटन खोलने लगी और मुसलसल दोनों एक दुसरे की आँखों में देखते रहे… शर्ट उतरने के बाद आशा ने अपने हाथ रख दिए… गोविन्द के बेल्ट पर और बेल्ट को खोलते हुए भी दोनों की आँखे एक दुसरे पर जमी रही…

बेल्ट खोलने के बाद… आशा ने अपना पूरा हाथ गोविन्द के लुंड के ऊपर नीचे फेरा और फिर उस की पंत की ज़िप खोलते हुए… अपने आँखों से इशारा किया के पाऊँ उठाओ… नज़रे अब तक नहीं हटाई थी एक दुसरे की आँखों से…

एक तिलिस्म था हर तरफ… जुगनू से चमक रहे थे… दोनों की आँखों में… गोविन्द की नज़रो में प्यार था तो आशा की नज़रो में अक़ीदत… जैसे के वो इबादत करने जा रही हो…

पंत नीचे उतर गयी… आशा ने हल्का सा ढाका दिया गोविन्द के सीने पर हाथ रख के… गोविन्द लेट गया बीएड पर…

आशा अब भी उस की आँखों में देख रही थी…

गोविन्द बीएड पर लेता किसी खावबनक माहौल में जा चुक्का था…

आशा ने जिस्म को लहराते हुए… एक नर्तकी की तरह रक़्स के अणडज में जहतका दिया और एक hi पल में अपनी साड़ी जिस्म से अलग कर दी…

गोविन्द का मुंह फिर से खुल गया…

और फिर जब आशा ने शेर पढ़ा….

आज फिर से तुम्हे देखा

फिर से आँखों ने वज़ू करलिया

फिर से मैं चाहने लगा

नमाज़ इ इश्क़ पढ़ने को

और होल होल से अपनी कमर को लहराते हुए… गोविन्द की आँखों में देखते हुए… ब्लाउज की डोरी खोल दी… और जिस्म को हलकोरे देते हुए रक़्स की तरह से ब्लाउज को दूर फ़ेंक दिया…

काली ब्रा में छुपे क़ीमती ख़ज़ाने को देख कर गोविन्द ने बेइख़्तयार अंडरवियर के ऊपर से अपने लुंड को मसल दिया… साफ पता चल रहा था के… वो अब सबर नहीं कर प् रहा…

और फिर आशा घूम गयी और उस की बैक सामने आ गयी गोविन्द के… और फिर से कमर को लहराते हुए नीचे झुक गयी पूरी की पूरी… और अपने सर को जैसे अपने पैरो के पास ले जाते हुए अपने हाथो से पाने पेटीकोट को नीचे सरकने लगी… बोहत आराम से… बोहत धीरज से… जैसे उस को शामे की चिंता न हो… गोविन्द के लिए तो वैसे भी वक़्त रुक चुक्का था…

काळा रंग की पंतय दिखने लगी थी और गोर दमकते सोने जेसे गुदाज़ नितम्ब… भी सामने आने लगे…

गोविन्द की तो सांस भी अब रुकने लगी थी… एक लम्हे के लिए एक ख्याल आया गोविन्द के मैं में… के उस के पास कोई ऐसी शक्ति हो जो चुटकी बजाते इस पंतय और ब्रा को आग लगा दे… ग़ायब कर दे इन चार हाथ कपड़े को जो इतनी आकर्षक अंग को ढांपे था…

फिर हैरान भी हुआ ये सोच कर ये कपड़े खुद से जल क्यों नहे गए इन आकर्षक अंगो की गर्मी से… जिन की तपिश वो अपने जिस्म में महसूस कर रहा था…

फिर से मूर्ति आशा और देखा अपने मेहबूब को और उस की तरफ बढ़ने लगी… वो अब सिर्फ काली ब्रा और काली पंतय में थी…

गोविन्द उठने लगा अपनी जगा से… तो आशा ने अपने हाथ के इशारे से उसे रोक दिया…

आशा ने बीएड पर उस के ऊपर झुकते हुए बीएड के साइड में नीचे रखा अपना अब्ग उठा कर पिलो के पास रख दिया और झुक गयी गोविन्द के होंटो को चूमने के लिए…

गोविन्द जैसे फँसी सी आवाज़ में बोलै… “इन को भी उतर दो न…”

आशा…. “सस्शह्ह्ह्ह…” बोलती हुई उस के होंटो को चूमने लगी… और उस के हाथ अपने हाथो में ले कर उस के सर के पीछे कर दिए… गोविन्द ने भी अपने आप को जीरो करते हुए अपने हाथ अपने सर के पीछे पिलो के पास कर दिए…

आशा जो के किश कर रही थी गोविन्द को, अपने एक हाथ से बैग की ज़िप खोली और एक झटके में बैग से निकलते हुए हथकड़ी पहना दी गोविन्द के हाथो में…

गोविन्द एक दम झटका खा गया… उस के हाथ बांध चुके थे हथकड़ी में… हेरात से देखा आशा की ओर… जेसे पूछ रहा हो… “में तो पहले hi ग्रिफ्तार हु… हथकड़ी क्यों लगाई…”

आशा… मुस्कुराते हुए… उस के होंटो से ऊपर होंठ उठा कर… उस के कण के पास लेजा कर सरगोशी में… “बोहत द्क्प द्क्प करते थे ना… आज में तुम्हे छोडूं गई…” फिर से दोहराया… “I’ll फ़क यू टुनाइट…”

गोविन्द भी मुस्कुराते हुए… “माय प्लेअसुरे…”

फिर आशा उस के कण को… फिर गर्दन को किश करते हुए उस के दोनों निप्पल्स को एक एक बार चूमते हुए…

उस के सीने पर ज़बान फेरते हुए उस के पेट पर से नीचे आयी और दांतो से उस के अंडरवियर को नीचे खेंचने लगी…

गोविन्द ने अपनी गांड थोड़ी ऊपर को उठायी… अंडरवियर कुछ नीचे सरका…

लुंड झटके खता बहार निकल आया…

आशा ने अंडरवियर को चोरते हुए एक बार पूरे लुंड को मुंह में लिया और फिर प्यार से उस की टोपी पर ज़बान फेरते हुए… उस को चूम लिया…

और अपने दोनों हाथो से अंडरवियर उतर दिया… गोविन्द के हाथ बंधे थे… मगर उस का लुंड आज़ाद हो चुक्का था…

अचानक गोविन्द की नज़र चाट पर लगे मिरर पे गयी… वह पर आशा की पंतय में बंद गुदाज़ नितम्ब और कमर क़हर का मंज़र दे रही थी…

फिर से आशा गोविन्द के होंटो को चूमते हुए वह से अपना बैग उठा लिया और सीढ़ी खरी हो गयी…

आशा… “मेरी जान अपनी आँखे बंद करो…”

गोविन्द समझा के शायद ये अपनी ब्रा और पंतय उतरे गई…

उस ने फ़ौरन से अपनी आँखे बंद कर लीं…

होश उस को तब आया जब ये महसूस हुआ के उस के दोनों पैर भी बांध गए थे रेशमी डोरी से…

उस ने हेरात से देखा तो आशा कमल महारत से उस के दोनों पेरो को पूरा खोल कर बीएड की साइड से बांध चुकी थी एक डोरी से… “ो तेरी… ये कहा से सीखा तुम ने…”

आशा मुस्कुराती हुई… “क्या सब गुर्जर तुम्हारे पास हैं… तुम मर्द हम औरतो को इतना अंडर एस्टीमेट क्यों करते हो…” आवाज़ में अब भी सरगोशी थी…

गोविन्द… “यार तुम भी ब्रा और पंतय उतर दो अब…”

आशा… “सबर मेरे राजा… तुम ने भी बारे तर्पया हे मुझे…”
 
यार बोहत कोशिश की के आज कम्पलीट कर के पोस्ट कर दूँ...

मगर एडल्ट स्टोरी में इरोटिक part लिखना इतना आसान नहीं होता... क्यों के जो लिख रहा होता हे वो खुद भी वो सब फील करके लिख रहा होता हे और अगर एक जवान मर्द ये सब फील करे गए तो लिखे गए कैसे.... तो बार बार अपने आप को कूल ऑफ करना परता हे... और फिर सब से बरी बात ये के ये एक सेडक्टिव या फिर सैडिस्ट तरह का प्यार था... इस को लिखना वैसे भी आसान नहीं होता... अगर ईमानदारी से लिखा जये तो... अगर ईमानदारी से नहीं लिखा तो आप लोगो को वो फील नहीं ए गई... सो ब्रोठेर्स सॉरी... हाँ ये ज़रूर हे के कल दूँ गए ये अपडेट... और यक़ीन मनो अब तक जो अपडेट लिखा हे वो काफी जानदार हे... मज़ा ाज्ये गए आप लोगो को पढ़ कर...
 
जी

आपकी प्यारी और उदार टिप्पणियों के लिए मैं आपका आभारी हूँ. एक कामुक कहानी लिखना बहुत मुश्किल काम है. कामुक दृश्य लिखते समय लेखक को उस चरित्र में पूरी भावनाओं के साथ उतरना होता है ताकि कहानी या दृश्य वास्तविक लगे, जिससे लेखक को, यदि वह युवा है, तो उस गर्मी को भी महसूस करता है. और उसे खुद को ठंडा करने के लिए अक्सर ब्रेक की ज़रुरत होती है. मेरे द्वारा लिखी गयी कामुक, अब तक पाठकों के baar-baar अनुरोध पर है क्योंकि मैं देख रहा हूँ की वे मेरी कामुक लेखन शैली को पसंद करते हैं. लेकिन मैं गंभीरता से मुक्त होना चाहता हूँ और कहानी पर अधिक ध्यान केंद्रित करना चाहता हूँ, जो अत्यधिक कामुक दृश्यों के कारण लुप्त होती जा रही है.

आप के व्यूज का इंतज़ार रहे गए.... :वेव:
 
EPISODE – 65

अब गोविन्द इस तरह से बीएड पर लेता था के उस के दोनों हाथ जाकर हुए थे हथकड़ी में और उस की टंगे यूँ खुली थी किसी ने चीयर दी हों…

और फिर से आशा… उठ खरी हुई और फतेहना नज़रो से देखने लगी… गोविन्द के हर अंग को…. छोरा चेहरा… मज़बूत सीना… लम्बी आकर्षक टंगे… विशाल फुंकारता लुंड…

उस ने अपने दोनों बाज़ू हवा में बुलंद कर्त हुए… अपनी कमर को हिलना शुरू कर दिया… जैसे रक़्स कर रही हो…

और कमर हिलाते हिलाते… फिर से पास आयी गोविन्द के और उस के चेहरे को चूमती… गलों, कानो और गर्दन पर ज़बान फेरती, उस के सीने के साथ अपना ब्रा में क़ैद सीना दबती और अपनी टैंगो में लुंड को मसलती नीचे को हो कर अपने होंठ रख दिए गोविन्द के सीने पर… पहले एक निप्पल को चूमा फिर दुसरे को… एक को छठा अपनी ज़बान से फिर दुसरे को…

और फिर गोविन्द के निप्पल के पास अपनी ज़बान गोल गोल घूमने लगी…

गोविन्द अब सिसकिया ले रहा था… तरप रहा था…

गोविन्द… “मेरी जान निकल जये गई… बस कर…”

आशा… “मेरी जान तो तुम हो और तुम्हारी जान मुझ में…”

फिर उठी और बैग को उठा लिया अपने हाथ में…

गोविन्द अब देख रहा था बैग को के अब इस में से क्या निकले गए….

आशा ने हाथ बहार निकला तो उस के हाथ में एक कैंडल और एक लाइटर…

उस ने कैंडल को जलाया और कैंडल को हाथ में सीधा पकड़ते हुए कुछ देर… और फिर कैंडल को ले आयी गोविन्द के निप्पल के पास और एक क़तरा टपका दिया उस के निप्पल पे…

गोविन्द ने सिसकी ली… गरम वैक्स का क़तरा… जिस ने जिस्म को जलाया तो नहीं मगर उस के जिस्म की गर्मी को और बढ़ा दिया…

उस के लुंड तक हिररत की लहर डोरी…. लुंड ने ठुमकी मरी…

गोविन्द ये फैसला न कर सका के लाज़त ज़यादा थी या दर्द…

उस के बाद दुसरे निप्पल के साथ भी इन्साफ हुआ…

फिर से गोविन्द ने सिसकी ली… लुंड ने झटका खाया… एक दर्द की लहर थी और उस के पीछे एक लाज़त की लहर…

वैक्स निप्पल्स पर गिरते hi जैम गयी थी और ऐसा लग रहा था के जैसे किसी ने स्ट्रॉबेरी पर कारमेल की टॉपिंग कर दी हो…

गोविन्द ने अपने निप्पल्स को देखा तो हैरान हो गया के उस के निप्पल्स इतने सख्त और बारे डेन की साइज के हो गए थे…

उस के बाद कैंडल को साइड में रख के आशा… गोविंद के आर्मपिट्स पे जापान फेरने लगी… पहल एक बाज़ू के आर्मपिट को छटा… फिर दुसरे को…

गोविन्द के लिए ये सब सहना अज़ीयत और लाज़त का इंतिज़ाज था…

दर्द के साथ जो लाज़त का आनंद था… उस के लिए उस का जिस्म तड़पने लगा… बोहत जल्द उस का बदन एडिक्ट हो गया उस नशे का…

नशा दर्द और लाज़त के पायल से भरा…

काफी देर के बाद आशा ने फिर से कैंडल ुताःई… गोविन्द अब मुन्तज़िर था के अब ये ज़ालिम हसीना उस के किस अंग को दर्द से भरी लाज़त दे गई…

कैंडल आयी नाभि के ऊपर… गोविन्द ने पहले hi आँखे बंद कर लीं…

एक क़तरा टपका… गोविन्द की टंगे… कमर… और फिर लुंड में झटका लगा…

फिर दूसरा क़तरा गिरा… फिर से बदन में दर्द के साथ लाज़त से बहरपुर लहर डोरी…

और फिर कैंडल हटते हुए… आशा ने लुंड को किश किया और गोविन्द अब कुछ कुछ आशा के इरादे समझ रहा था… मगर क्या करता आज तो खुद अपने आप को सौंपा था इस द्क्प के हाथ शिकार के लिए…

आशा ने पूरा लुंड मुंह में लेते हुए तीन बार अपने होंटो से पूरे लुंड को चूसा और फिर बैठते हुए गोविन्द की आँखों में देखते हुए… गोविन्द की आँखों में फर्याद थी… मगर आशा की आँखों में मस्ती…

एक बूँद वैक्स की टपक गयी लुंड की टोपी पर…

“उफ़…. ोीी” निकला गोविन्द के मुंह से…

“जान क्या कर रही हो….” गोविन्द तड़पते हुए बोलै…

“प्यार कर रही हु अपनी जान को….” आशा ने मस्ती में जवाब दिया…

आशा ने अपने होंटो से लुंड की टोपी को चूमा…

अब आशा ने अपने हाथ से लुंड के नीचे गोलिओ को सहलाया… और पहला दिया….

गोविन्द ने एक डैम टैंगो को झटका दिया… “नहीं यार… नहीं करना…”

आशा ने मस्ती भरी आँखों से गोविन्द को देखते हुए कैंडल से एक क़तरा टपका दिया गोलिओ पर….

“ोीी…. म्मम्मा… ोीी…. आशा….” गोविन्द सिस्का…

“अब द्क्प नहीं बोलै….” आशा ने बारे प्यार से गोविन्द की आँखों में देखते हुए कहा….

फिर से एक क़तरा गिरा गोलिओ पर…. और इस बार लुंड ने एक और झटका खाया और उस में से माननी फूट फूट कर निकलने लगी….

गोविन्द ने बेबसी से आँखे खोली और देखा आशा की ओर… आँखों में अब नमी थी…

आशा ने देर न करते हुए… कैंडल को साइड में रख दिया और अपना मुंह लगा दिया लुंड के ऊपर और सारा मॉल निगलने लगी…

और फिर से लुंड को चूसने लगी… लुंड ज़रा देर के लिए कुछ नरम सा हुआ था और फिर कड़क हो गया…

गोविन्द बेबस आवाज़ में बोलै… “मेरी जान आज तुम ने मुझे छोड़ भी लिया और मेरी गांड भी मर ली… अब तो बस करो…”

आशा ने कोई जवाब न दिया और खरी हो कर फिर से वही रक़्स के अंदाज़ में पहले ब्रा उतरी और अपने चुचो को अपने हाथो से मसलने लगी…

और चुके मसलते हुए उस के पास आ गयी और अपने चुके उस के मुंह के सामने कर दिए….

इतनी देर से गोविन्द उस के बदन के लिए तरप रहा था और अपने हाथ या मुंह से के किसी अंग को चूना छह रहा था… अब इस की खवाहिश पूरी हुई और जब चुके सामने आये तो भूके बचे की तरह टूट पारा… इन्तेक़ाम भी तो लेना था उस ने…

अब वो चुचो को बोहत बुरी तरह से चूस रहा था चाट रहा था… काट रहा था…

अब सिसकिया लेने की बारी आशा की थी…

जैसे hi इस के मुंह में एक निप्पल आया उस ने फ़ौरन अपने दांतो में उस को पाकर लिया… और आशा छटपटाने लगी…

चुरा नहीं रही थी… बस तरप रही थी…

निप्पल पूरा का पूरा सुर्ख हो गया… जैसे बस अब इस में से खून निकल परे गए….

जब उस जा दिल एक निप्पल बाहर गया तो फिर उस ने दुसरे निप्पल को मुंह में ले कर चूसने लगा…

सिसकिया आशा की बढ़ती जा रही थी…

काफी देर के बाद जब गोविन्द साँस लेने के लिए रुका तो आशा उठ खरी हुई और उस की तरफ अपनी पीठ कर के झुक गयी और अपनी गांड पूरी हिलती और कूल्हे मटकती अपनी पंतय भी उतर दी…

उस की छूट पूरी गीली थी… पंतय को हाथो में पाकर कर गोविन्द को दिखते हुए जब पंतय को निचोरा तो उस में छूट का रास निकलने लगा… वो जो इतने देर से गोविन्द के साथ खेल रही थी तो खुद भी मज़ा लेते हुए पानी चोर रही थी…

आशा फिर से कूल्हे मटकती बीएड पर चढ़ कर अपनी छूट रख दी गोविन्द के मुंह पर और इशारे से उस को ज़बान बहार निकलने को कहा… गोविन्द ने थोड़ी निकली तो फिर से उस को इशारा किया के पूरी निकालो… गोविन्द ने अब पूरी ज़बान बहार निकली तो बस उस की ज़बान की टिप पर अपनी छूट को हल्का सा टच किया और खुद एक झटका खाया…

थोड़ी ऊपर को गांड उठा कर फिर से छूट को नीचे लायी और फिर से ज़बान की टिप को छुआ… छूट के होंटो से…

ज़बान और छूट का खेल… मादक सुगंध आ रही थी… गोविन्द को छूट में से… पता नहीं वो खुद कीतिनि बार झरि थी गोविन्द को तैसे करते करते…

अब फिर से मज़ा आ रहा था गोविन्द को… उस ने अपनी पूरी ज़बान बहार को निकली हुई थी…

आशा फिर से छूट को नीचे लायी और फिर से उस की ज़बान की टिप को लगते हुए इस बार नीचे तक ले गयी…

गोविन्द ने भी ज़बान से छत्ते हुए उस की पूरी छूट को अपने मुंह से पकड़ने की कोशिश की…

आशा ने अपना सर पीछे को करते हुए… थोड़ा ऊपर उठी और ज़ोर से अपनी छूट गोविन्द मुंह पर रअग्रि… ऐसा लग रहा था के अब आशा के लिए भी मुश्किल हो रहा था इस खेल को मज़ीद जारी रखना…
 
:थैंक्यू: बीआरओ.... आप जैसे मित्रो के लिए hi तो लिख रहा हु.... वर्ण जिस तरह से दोस्त be-mann से अप्प्रेसियते करते हे या फिर बस एक लिखे बटन क्लिक कर के समझते हे के फ़र्ज़ पूरा हो गया...

ये नहीं देखते के में रोज़ाना रेगुलर अपडेट दे रहा हु और इतनी म्हणत से लिख कर पोस्ट करता हु... दो लफ्ज़ मैसेज के भी नहीं पोस्ट कर सकते.... यक़ीन करो दोस्त बोहत दुख होता हे और बोहत बार सोचता हु के लिखना बंद कर दू मगर फिर आप जैसे कुछ दोस्तों का ख्याल मैं में आता हे तो हौसला फिर से ताज़ा हो जाता हे...

खुश रहो मित्र.....
 
Back
Top