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EPISODE – 61
नींद से उठाने पर वो कुछ देर माँ और माँ दोनों के पास बैठा… माँ को किसी ने भी गोविन्द का वर्षा और अक्षरा से मिलने का नहीं बताया था… अगर माँ को पता चलता तो शायद वो अपना सबर खो कर फ़ौरन होनी बेटिओ से मिलने की ज़िद करती… माँ उस से बोहत मसरूफ होने का गिला कर रही थी…
माँ की सोच के अनुसार वो उन लम्हो को नहीं भूल प् रही थी जब गोविन्द उन के पास रत को सोया था और वो दोनों कुछ कामुक लम्हो की ग्रिफ्ट में रहे थे… गोविन्द जनता था के उस को जल्द या देर से माँ के साथ कुछ शामे बिताना hi परे गए… उस का अपना मन भी बोहत आकर्षित था माँ की ओर…
आज एक नयी बात और ये हुई के वो अपनी माँ के पास जब बैठा 3-सीटर सोफे पर तो उस ने अपना सर रख दिया था माँ के सीने पर तो उस को माँ के गुदाज़ चुके का स्पर्श उत्तेजित करने लगा… और उस का लुंड बेकाबू होने लगा… माँ बेटे का प्यार देखते हुए माँ को इतना ाचा लगा के वो सिंगल सीट सोफे से उठ कर गोविन्द के बराबर में बेथ गयी… और बोली…
माँ… “रजनी बहन मेरा भी बोहत मन करता हे के गोविन्द बीटा मेरे साथ भी इसी तरह लाड करे…”
माँ… “गंगा बहन… ये जितना मेरा बीटा हे उतना hi आप का भी हे… आप खुद इस से लाड कर लिया करे अगर ये नहीं करता… और इस के कान भी खेंचे ये मुझे बोहत सताता हे…”
गोविन्द ये सुनते hi माँ को दुसरे बाज़ू से अपने करीब करते हुए उस के गाल पे चूम लिया… और बोलै… “माँ… प्लीज… में आप से भी बोहत प्यार करता हु मगर ये ज़रूर हे के सोचता हु के आप को बुरा न लगे…”
गंगा भावक हो गयी और बोली… “मुझे क्यों बुरा लगे गए… तू तो मेरे चाँद बीटा हे…” और ये कहते कहते वो फाई जैसे उस पे लड़ सी गयीं…
और उन का एक हाथ पर गया गोविन्द की रनो पर और थोड़ा सा टच हो गया लुंड पर जो के इस वक़्त कुछ कुछ हार्ड हो रहा था… गंगा को पहले तो थोड़ा अजीब सा लगा मगर फिर वो खुद को जाने क्यों दूर न कर सकीय और सोचा के बीटा hi तो हे…
एक तो माँ के गुदाज़ जिस्म का स्पर्श और ऊपर से माँ का जिस्म भी कुछ काम भरा हुआ और गदराया न था… और साथ साथ एक हाथ माँ का लग गया गोविन्द के ाकरते लुंड पर और माँ ने वो हाथ हटाया भी नहीं… तो गोविन्द कुछ देर एक लिए… तो मनो जैसे होश खोने लगा था और क़रीब था के वो माँ के चुके भी मसल देता… कमरे से सीमा और ेषणा निकली और दोनों ीखते बोली के… “दोनों माँ बस अपने बेटे से प्यार करना… बेटिओ को तो कोई पूछता hi नहीं… और भैया तुम तो रत को भी घर से बहार रहने लगे हो… चाकर क्या हे…??”
गोविन्द ये बात सुनते hi बहनो के पास चला गया ताकि रत को बहार रहने की बात पे ज़याद चर्चा न हो… क्यों के माँ को नहीं इल्म इस सब क़िस्से का…
माँ… गोविन्द के अपने पास से उठने के बाद कुछ देर तक उस अजीब से अहसास के असर में रही जो आज उन को गोड़िन्द के जिस्म से मिला था और दिल ये छह रहा था के कुछ और आनंद लिया जये…
गोविन्द ने सीमा और ेषणा को एक साथ अपने गले से लगा लिया…
गोविन्द ने साफ महसूस किया के सीमा और ेषणा की पाकर में फ़र्क़ हे… ेषणा कुछ ज़यादा नज़दीक आते हुए अपनी तंग उस की टैंगो के बीच करके पूरा उस के लुंड को टच हो गयी और सीमा बस उस के सीने के साथ सटने में ज़याद दिलचस्पी ले रही थी…
सीमा का गले लग्न एक बहन भाई की तरह का था जब के ेषु एक लड़की की तरह उस के गुप्त अंग को चेर रही थी…
गोविन्द के लिए ये सब कुछ ज़यादा हो रहा था और सामने सोफे पर माँ और माँ भी उन की hi तरफ देख रही थी…
उस ने खतरे को भांपते हुए अपने होश कण्ट्रोल में रखते हुए कहा के माँ… माँ देखो न ये बहने भी मुझे तंग कर यही हे…
सब हंसने लगे तो गोविन्द ने मौके का फायदा उठाते हुए… कमरे की तरफ चला गया ये कहते हुए के उससे गयम जाना हे…
ेषणा… हँसते हुए… “हाँ हाँ भाई और स्ट्रांग बनाओ बॉडी…” गोविन्द ने उस की सोच पढ़ी….
ेषणा… “पता हे मुझे बॉंधु तू अपने किस अंग को स्ट्रांग बनाना में जूता हुआ हे…”
गोविन्द… “ेषु… तू नहीं सुधरने वाली…” सोचते सोचते कपड़े चेंज कर के जोग्गेर्स वग़ैरा पहन कर स्पोर्ट्स बैग उठाया और अकादमी का रुख किया…
अकादमी में आज उसे कुछ देर वार्म उप एक्सरसाइजेज के बाद उस को कहा गया के स्विमिंग करे… उस ने स्विमिंग कस्टम अपने बैग में से निकल कर चेंज कर के आधा घंटा स्विमिंग की और फिर उस को फिर से कुछ बॉडी स्ट्रेचिंग एक्सरसाइजेज करवाई गयी… 6 बज रहे थे… उस ने वही से कॉल मिला कर द्क्प से बात की और उस को कहा के वो रेजिडेंस से कपड़े चेंज कर के… साथ वाले पार्क में पोहंचे 7 बजे अपनी जारी में अकेली और उस का वेट करे…
और अपनी कार में बेथ कर साइकेट्रिस्ट के दिमाग़ में पोहंच गया… माँ और पापा आ चुके थे उस के कमरे में… डिटेल में हिस्ट्री लेने के बाद… उस ने काउन्सलिंग स्टार्ट कर दी… वो उन दोनों को यही समझा रहा था के इंसान की फितरत के अनुसार हर काम ठीक हे और अगर न किया जये तो जिस्म या तो उस काम को न करने का आदि हो जाता हे या फिर उस काम की खाव्हिश जिस्म चोर देता हे… और ये के पति पत्नी का शारीरिक बंधन भी इसी तरह से होता हे जब तक रेगुलरली उस का उपयोग करते रहे गए तब तक एक दुसरे के बदन की आदत और ज़रुरत रहती हे… उस ने उन दोनों को राज़ी किया के वो दोनों फिर से एक दुसरे को वक़्त दे गए… और कोशिश करे गए के सब पहले जैसा हो सके… इस में शामे लग सकता हे मगर निराश होने से और मुश्किलें बढ़ें गई… और नेक्स्ट विजिट का टाइम दिया एक वीक के बाद का…
माँ और पापा दोनों वह से निकले तो पापा तो खुश थे मगर माँ अब भी कुछ परेशां सी लग रही थी… वापसी में कार में ड्राइवर होने की वजा से दोनों खामोश रहे… और घर पोहंच गए…
गोविन्द भी अकादेमी से निकल कर जब पोहंचा पार्क के पास तो आशा आ चुकी थी वह… और अपनी जारी से उतर कर उस की कार में आ बैठी…
शाम का वक़्त था… बहार वैसे भी अँधेरा होने की वजा से रौशनी काम थी और कार के अंदर के शीशे भी काले थे… गोविन्द ने कार में बैठे बैठे आशा को अपने पास करते हुए उस के होंटो को चूमा… दोनों कुछ देर तक चूमते रहे होंठ… गोविन्द उस के होंटो का रास यूँही चूसता रहता अगर आशा उस को दूर न धकेलती…
आशा… “अब बस भी करो… खा hi जाओ गए मेरे होंटो को… कल कहा थे…”
गोविन्द ने कार वह से निकलते हुए कहा… “यार एक आध दिन न मिलने से मोहबत बढ़ती हे…”
आशा… “ाचा कितनी मोहबत बढ़ गयी अब ये कैसे पता चले गए…” खुश थी बोहत…
गोविन्द… उस का हाथ पकड़ते हुए… “इतनी बढ़ गयी के… के रत को नींद भी न आयी…”
आशा इस बात को सच समझते हुए… बोली… “यार… नींद तो मेरी भी ग़ायब हे अब… ऐसा लगता हे के बस चुपके से तुम कही से आ जाओ गए मेरे पास…”
और कुछ भावक सी हो कर अपना सर रख दिया उस के कंधे पे…
और पोहंच गए… एक शॉपिंग मॉल के बहार… गोविन्द ने कार पार्क कर के आशा को बहार आने को कहा… वो भी ख़ामोशी से कार उतर कर उस के साथ चल दी…
पहले गोविन्द ने एक साड़ी उस के लिए ली अपनी पसंद से फिर उस को कहा के उस की डीडीओ के लिए… कुछ साड़ी और दुसरे कपड़े लेने में हेल्प करे… गोविन्द ने अपनी डीडीओ के लिए काफी साडी शोपिंग की… जब साड़ी शॉपिंग ख़तम हुई तो आशा ने उस से कहा के वो भी कुछ देना चाहती हे उस को… फिर दोनों गिफ्ट्स शॉप पर ए और वह से आशा ने एक ताज महल का बारे खूबसूरत मॉडल परचेस कर के गिफ्ट किया गोविन्द को… सेल्स गर्ल मसरूफ थी पैक करने में तो जल्दी से गोविन्द ने उस को किश कर लिया गाल पे…
आशा झूट मूट का घुसा करने लगी…
फिर दोनों ने सारा सामान उठाया और कार में रखा… कार में रखते वक़्त गोविन्द ने जो डीडीओ के लिए शॉपिंग की थी उस के दो हिस्से किये… एक एक साड़ी अलग करके बाक़ी सरे एक्प्रे ीखते पैक कर के दिग्गी में रख दिए…
आशा ने कहा के ेषणा बोहत अछि लड़की हे… और ये भी कहा के बाक़ी डीडीओ से भी मिलना हे… तो गोविन्द ने कहा के कुछ दिन थेर जाओ उन से भी मिल लेना…
एक जगा से आइस क्रीम ले कर… दोनों साथ कार में कहते भी रहे और घुमते भी रहे… दोनों को एक दुसरे का साथ बोहत ाचा लग रहा था… आशा ने गोविन्द को मिलने के लिए बोलै… तो गोविन्द ने उस को बताया के कल तैयार रहे…
पार्क के पास आशा को ड्राप कर के गोविन्द घर आ गया और ख़ामोशी से सरे कपड़े अपनी अलमारी में रख दिए…
खाना वग़ैरा खा कर सब अपने अपने कमरे में चले गए… गोविन्द पापा और प्रकाश के साथ बेथ गया लाउन्ज में और उन को बताया के वो वेडनेसडे को डीडीओ को लये गए 2 बजे यहाँ घर पे तो उन को अभी आना होगा उस वक़्त ताकि वो भी मिल ले उन से… माँ और ेषणा को नहे बताया था… ये सरप्राइज होता उन के लिए…. 12 से कुछ पहले वो पोहंच गया सेठ राजेंदर की हवेली के बहार...
नींद से उठाने पर वो कुछ देर माँ और माँ दोनों के पास बैठा… माँ को किसी ने भी गोविन्द का वर्षा और अक्षरा से मिलने का नहीं बताया था… अगर माँ को पता चलता तो शायद वो अपना सबर खो कर फ़ौरन होनी बेटिओ से मिलने की ज़िद करती… माँ उस से बोहत मसरूफ होने का गिला कर रही थी…
माँ की सोच के अनुसार वो उन लम्हो को नहीं भूल प् रही थी जब गोविन्द उन के पास रत को सोया था और वो दोनों कुछ कामुक लम्हो की ग्रिफ्ट में रहे थे… गोविन्द जनता था के उस को जल्द या देर से माँ के साथ कुछ शामे बिताना hi परे गए… उस का अपना मन भी बोहत आकर्षित था माँ की ओर…
आज एक नयी बात और ये हुई के वो अपनी माँ के पास जब बैठा 3-सीटर सोफे पर तो उस ने अपना सर रख दिया था माँ के सीने पर तो उस को माँ के गुदाज़ चुके का स्पर्श उत्तेजित करने लगा… और उस का लुंड बेकाबू होने लगा… माँ बेटे का प्यार देखते हुए माँ को इतना ाचा लगा के वो सिंगल सीट सोफे से उठ कर गोविन्द के बराबर में बेथ गयी… और बोली…
माँ… “रजनी बहन मेरा भी बोहत मन करता हे के गोविन्द बीटा मेरे साथ भी इसी तरह लाड करे…”
माँ… “गंगा बहन… ये जितना मेरा बीटा हे उतना hi आप का भी हे… आप खुद इस से लाड कर लिया करे अगर ये नहीं करता… और इस के कान भी खेंचे ये मुझे बोहत सताता हे…”
गोविन्द ये सुनते hi माँ को दुसरे बाज़ू से अपने करीब करते हुए उस के गाल पे चूम लिया… और बोलै… “माँ… प्लीज… में आप से भी बोहत प्यार करता हु मगर ये ज़रूर हे के सोचता हु के आप को बुरा न लगे…”
गंगा भावक हो गयी और बोली… “मुझे क्यों बुरा लगे गए… तू तो मेरे चाँद बीटा हे…” और ये कहते कहते वो फाई जैसे उस पे लड़ सी गयीं…
और उन का एक हाथ पर गया गोविन्द की रनो पर और थोड़ा सा टच हो गया लुंड पर जो के इस वक़्त कुछ कुछ हार्ड हो रहा था… गंगा को पहले तो थोड़ा अजीब सा लगा मगर फिर वो खुद को जाने क्यों दूर न कर सकीय और सोचा के बीटा hi तो हे…
एक तो माँ के गुदाज़ जिस्म का स्पर्श और ऊपर से माँ का जिस्म भी कुछ काम भरा हुआ और गदराया न था… और साथ साथ एक हाथ माँ का लग गया गोविन्द के ाकरते लुंड पर और माँ ने वो हाथ हटाया भी नहीं… तो गोविन्द कुछ देर एक लिए… तो मनो जैसे होश खोने लगा था और क़रीब था के वो माँ के चुके भी मसल देता… कमरे से सीमा और ेषणा निकली और दोनों ीखते बोली के… “दोनों माँ बस अपने बेटे से प्यार करना… बेटिओ को तो कोई पूछता hi नहीं… और भैया तुम तो रत को भी घर से बहार रहने लगे हो… चाकर क्या हे…??”
गोविन्द ये बात सुनते hi बहनो के पास चला गया ताकि रत को बहार रहने की बात पे ज़याद चर्चा न हो… क्यों के माँ को नहीं इल्म इस सब क़िस्से का…
माँ… गोविन्द के अपने पास से उठने के बाद कुछ देर तक उस अजीब से अहसास के असर में रही जो आज उन को गोड़िन्द के जिस्म से मिला था और दिल ये छह रहा था के कुछ और आनंद लिया जये…
गोविन्द ने सीमा और ेषणा को एक साथ अपने गले से लगा लिया…
गोविन्द ने साफ महसूस किया के सीमा और ेषणा की पाकर में फ़र्क़ हे… ेषणा कुछ ज़यादा नज़दीक आते हुए अपनी तंग उस की टैंगो के बीच करके पूरा उस के लुंड को टच हो गयी और सीमा बस उस के सीने के साथ सटने में ज़याद दिलचस्पी ले रही थी…
सीमा का गले लग्न एक बहन भाई की तरह का था जब के ेषु एक लड़की की तरह उस के गुप्त अंग को चेर रही थी…
गोविन्द के लिए ये सब कुछ ज़यादा हो रहा था और सामने सोफे पर माँ और माँ भी उन की hi तरफ देख रही थी…
उस ने खतरे को भांपते हुए अपने होश कण्ट्रोल में रखते हुए कहा के माँ… माँ देखो न ये बहने भी मुझे तंग कर यही हे…
सब हंसने लगे तो गोविन्द ने मौके का फायदा उठाते हुए… कमरे की तरफ चला गया ये कहते हुए के उससे गयम जाना हे…
ेषणा… हँसते हुए… “हाँ हाँ भाई और स्ट्रांग बनाओ बॉडी…” गोविन्द ने उस की सोच पढ़ी….
ेषणा… “पता हे मुझे बॉंधु तू अपने किस अंग को स्ट्रांग बनाना में जूता हुआ हे…”
गोविन्द… “ेषु… तू नहीं सुधरने वाली…” सोचते सोचते कपड़े चेंज कर के जोग्गेर्स वग़ैरा पहन कर स्पोर्ट्स बैग उठाया और अकादमी का रुख किया…
अकादमी में आज उसे कुछ देर वार्म उप एक्सरसाइजेज के बाद उस को कहा गया के स्विमिंग करे… उस ने स्विमिंग कस्टम अपने बैग में से निकल कर चेंज कर के आधा घंटा स्विमिंग की और फिर उस को फिर से कुछ बॉडी स्ट्रेचिंग एक्सरसाइजेज करवाई गयी… 6 बज रहे थे… उस ने वही से कॉल मिला कर द्क्प से बात की और उस को कहा के वो रेजिडेंस से कपड़े चेंज कर के… साथ वाले पार्क में पोहंचे 7 बजे अपनी जारी में अकेली और उस का वेट करे…
और अपनी कार में बेथ कर साइकेट्रिस्ट के दिमाग़ में पोहंच गया… माँ और पापा आ चुके थे उस के कमरे में… डिटेल में हिस्ट्री लेने के बाद… उस ने काउन्सलिंग स्टार्ट कर दी… वो उन दोनों को यही समझा रहा था के इंसान की फितरत के अनुसार हर काम ठीक हे और अगर न किया जये तो जिस्म या तो उस काम को न करने का आदि हो जाता हे या फिर उस काम की खाव्हिश जिस्म चोर देता हे… और ये के पति पत्नी का शारीरिक बंधन भी इसी तरह से होता हे जब तक रेगुलरली उस का उपयोग करते रहे गए तब तक एक दुसरे के बदन की आदत और ज़रुरत रहती हे… उस ने उन दोनों को राज़ी किया के वो दोनों फिर से एक दुसरे को वक़्त दे गए… और कोशिश करे गए के सब पहले जैसा हो सके… इस में शामे लग सकता हे मगर निराश होने से और मुश्किलें बढ़ें गई… और नेक्स्ट विजिट का टाइम दिया एक वीक के बाद का…
माँ और पापा दोनों वह से निकले तो पापा तो खुश थे मगर माँ अब भी कुछ परेशां सी लग रही थी… वापसी में कार में ड्राइवर होने की वजा से दोनों खामोश रहे… और घर पोहंच गए…
गोविन्द भी अकादेमी से निकल कर जब पोहंचा पार्क के पास तो आशा आ चुकी थी वह… और अपनी जारी से उतर कर उस की कार में आ बैठी…
शाम का वक़्त था… बहार वैसे भी अँधेरा होने की वजा से रौशनी काम थी और कार के अंदर के शीशे भी काले थे… गोविन्द ने कार में बैठे बैठे आशा को अपने पास करते हुए उस के होंटो को चूमा… दोनों कुछ देर तक चूमते रहे होंठ… गोविन्द उस के होंटो का रास यूँही चूसता रहता अगर आशा उस को दूर न धकेलती…
आशा… “अब बस भी करो… खा hi जाओ गए मेरे होंटो को… कल कहा थे…”
गोविन्द ने कार वह से निकलते हुए कहा… “यार एक आध दिन न मिलने से मोहबत बढ़ती हे…”
आशा… “ाचा कितनी मोहबत बढ़ गयी अब ये कैसे पता चले गए…” खुश थी बोहत…
गोविन्द… उस का हाथ पकड़ते हुए… “इतनी बढ़ गयी के… के रत को नींद भी न आयी…”
आशा इस बात को सच समझते हुए… बोली… “यार… नींद तो मेरी भी ग़ायब हे अब… ऐसा लगता हे के बस चुपके से तुम कही से आ जाओ गए मेरे पास…”
और कुछ भावक सी हो कर अपना सर रख दिया उस के कंधे पे…
और पोहंच गए… एक शॉपिंग मॉल के बहार… गोविन्द ने कार पार्क कर के आशा को बहार आने को कहा… वो भी ख़ामोशी से कार उतर कर उस के साथ चल दी…
पहले गोविन्द ने एक साड़ी उस के लिए ली अपनी पसंद से फिर उस को कहा के उस की डीडीओ के लिए… कुछ साड़ी और दुसरे कपड़े लेने में हेल्प करे… गोविन्द ने अपनी डीडीओ के लिए काफी साडी शोपिंग की… जब साड़ी शॉपिंग ख़तम हुई तो आशा ने उस से कहा के वो भी कुछ देना चाहती हे उस को… फिर दोनों गिफ्ट्स शॉप पर ए और वह से आशा ने एक ताज महल का बारे खूबसूरत मॉडल परचेस कर के गिफ्ट किया गोविन्द को… सेल्स गर्ल मसरूफ थी पैक करने में तो जल्दी से गोविन्द ने उस को किश कर लिया गाल पे…
आशा झूट मूट का घुसा करने लगी…
फिर दोनों ने सारा सामान उठाया और कार में रखा… कार में रखते वक़्त गोविन्द ने जो डीडीओ के लिए शॉपिंग की थी उस के दो हिस्से किये… एक एक साड़ी अलग करके बाक़ी सरे एक्प्रे ीखते पैक कर के दिग्गी में रख दिए…
आशा ने कहा के ेषणा बोहत अछि लड़की हे… और ये भी कहा के बाक़ी डीडीओ से भी मिलना हे… तो गोविन्द ने कहा के कुछ दिन थेर जाओ उन से भी मिल लेना…
एक जगा से आइस क्रीम ले कर… दोनों साथ कार में कहते भी रहे और घुमते भी रहे… दोनों को एक दुसरे का साथ बोहत ाचा लग रहा था… आशा ने गोविन्द को मिलने के लिए बोलै… तो गोविन्द ने उस को बताया के कल तैयार रहे…
पार्क के पास आशा को ड्राप कर के गोविन्द घर आ गया और ख़ामोशी से सरे कपड़े अपनी अलमारी में रख दिए…
खाना वग़ैरा खा कर सब अपने अपने कमरे में चले गए… गोविन्द पापा और प्रकाश के साथ बेथ गया लाउन्ज में और उन को बताया के वो वेडनेसडे को डीडीओ को लये गए 2 बजे यहाँ घर पे तो उन को अभी आना होगा उस वक़्त ताकि वो भी मिल ले उन से… माँ और ेषणा को नहे बताया था… ये सरप्राइज होता उन के लिए…. 12 से कुछ पहले वो पोहंच गया सेठ राजेंदर की हवेली के बहार...