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- Dec 5, 2013
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सब कुछ जायज़ है....
अपडेट = 06
फ्लैशबैक कंटिन्यू....
मैं और कुसुम दीदी घर से खेतो पर जाने के लिए चल पड़े. हमारे खेत हमारे घर से करीब 15 या फिर 20 मिनट की दूरी पर थे. यु तो हमारे पास घर में दो पहिया वाहन में एक मोटर सिक्ले भी थी जो की पिता जी ने मुझे मेरे जन्म दिन के तोहफे में पिछले साल खरीद कर दिया था. खेतो की जुताई के लिए एक ट्रैक्टर भी था हमारे पास. बाकी कार जैसा कोई वाहन नहीं था हमारे पास. पर हम सब इतने में hi बाकी ब्राह्मण समाज वालो से ज़्यादा खुश थे. उनके पास तो दो तीन लोगो के पास hi ये सब था. जब के उनकी तादात काफी ज़्यादा थी.
मैं और कुसुम दीदी घर से पैदल hi खेतो की तरफ चल पड़े थे. मैं दीदी के आगे आगे चल रहा था. गांव की मैं रोड से निकलने के बाद एक कच्चा रास्ता हमारे खेतो की तरफ जाता था. जब के गांव की मैं रोड पर आरसीसी रोड बानी हुयी थी. इधर कच्चे रास्ते के दोनों तरफ काफी सरे खेत थे जो की हमारे नहीं थे. ये रोड के दोनों तरफ के खेत इतर ब्रह्मिनो के थे. इनके बाद कुछ इतर कास्ट के लोगो के खेत पड़ते थे. उसके बाद हमारे खेत आते थे. एक अच्छी बात ये थी की हमारे खेतो के पास से hi एक बड़ी सी नहर निकली हुयी थी जिससे हमें अपने खेतो पर सिचाई करने में बड़ी आसानी होती थी. इतर ब्राह्मण जो हमसे जलते थे वो इस नहर के द्वारा हमारे खिलाफ कुछ नहीं कर सकते थे क्यों की नहर का बहाव हमारे खेतो की तरफ से चलते हुए hi इन लोगो के खेतो की तरफ आता था. अगर इनकी तरफ से हमारे खेतो की तरफ नहर के पानी का बहाव होता तो ये लोग ज़रूर नहर के पानी को बीच से कही बाँधने का काम बहुत पहले hi कर चुके होते.
मैं और कुसुम दीदी आपस में बाते करते हुए कच्चे रास्ते से पैदल hi चल रहे थे. मैं दीदी के साथ खुश तो था hi मगर मैं दीदी को भी खुश देख रहा था. शायद मेरे जैसी hi ख़ुशी उनको भी थी की वो मेरे साथ थी. ऐसा मुझे लगता था. बाकी इसमें कितनी सच्चाई थी ये मैं कह नहीं सकता था.
आरसीसी रोड से इस तरफ मुद कर हम कच्चे रास्ते से चलते हुए काफी आगे तक आ गए थे. तभी मुझे सामने की तरफ से एक मोटर सिक्ले आती हुयी दिखी. मैं दूर से hi मोटर सिक्ले पर चढ़े उस इंसान को पहचान गया जिससे मेरा 36 का आकड़ा था. उस इंसान को देखते hi मेरा अच्छा खासा दिमाग खराब होने लगा. यु तो गांव में मेरी किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी और न hi मैं किसी से कोई लड़ाई झगड़ा करता था. मैं अपने पिता जी के बताये हुए रास्ते पर hi हमेशा चलता था. मगर कहते हैं न की हम कितना भी सोचे की सब अच्छा hi हो मगर ऐसा होता नहीं है.
मोटर सिक्ले से आता हुआ वो इंसान हमारे करीब आ गया था. हम दोनों को देखते hi उसने हमारे सामने अपनी मोटर सिक्ले रोक दी. पहले उसने मेरी तरफ देखा फिर उसकी नज़र कुसुम दीदी पर जैम सी गयी. वो दीदी को ऊपर से नीचे एक देखे जा रहा था. उसकी आँखों में गंदगी भरी हुयी मुझे जल्द hi नज़र आ गयी और इसके साथ hi मेरा खराब दिमाग और भी ज़्यादा खराब हो गया. मैं ये किसी कीमत पर बर्दास्त नहीं कर सकता था की कोई ऐसा घटिया ब्यक्ति मेरी मासूम बहन पर गन्दी नज़र डाले.
"क्यों रे chirkut...aaj तो बड़ा अच्छा आइटम साथ ले कर घूम रहा है. हाय इसे देख कर कुछ कुछ होने लगा है मुझे." उसने दीदी की तरफ देखने के बाद मेरी तरफ कामिनी मुस्कान के साथ देखते हुए कहा तो मेरा पारा एकदम से चढ़ गया.
उसकी इस बात का असर मेरी दीदी पर भी हुआ था. वो एकदम से घबराई हुयी नज़र आने लगी थी. इधर उसकी इस बात से मेरी मुट्ठियाँ कास गयी.
"तमीज से बात कर रुपेश तिवारी. तुझे अच्छी तरह पता है की ये मेरी कुसुम दीदी हैं. इसके बावजूद तूने इस तरह की घटिया बात की. अगर कोई तेरी बहन के बारे में ऐसा बोले तो कैसा लगेगा तुझे.?" मैंने गुस्से में कहा तो रुपेश तिलमिला गया. उसने गुस्से से मेरी तरफ देखा.
"किस्मे इतना डैम है रे चिरकुट जो मेरी बहन के बारे में ऐसा बोले. साले जानता नहीं क्या मुझे.? रुपेश नाम है मेरा. रुपेश तिवारी. जुबां काट के हाथ में दे दूँगा अगर कोई मेरी बहन के बारे में कुछ बोलै तो." उसने आँखे दिखते हुए मुझसे ऐसा कहा तो मैं आगे बढ़ा.
"आग लगी न तुझे.? अब तू खुद सोच की तेरे ऐसा बोलने पर मुझे कितनी आग लगी होगी. मैं तेरी तरह गंदे खयालो का नहीं हु और न hi मैं तुझसे कोई लड़ाई करना चाहता हु. मेरे माँ बाप ने मुझे ऐसे संस्कार दिए hi नहीं हैं की मैं किसी की माँ बहनो के बारे में ऐसे गंदे लफ्ज़ बोलू." मैंने जब उसके करीब जा कर ऐसा कहा तो उसने अपना हाथ मेरी तरफ ऐसे अंदाज़ में किया जैसे मुझे रुक जाने का संकेत दे रहा हो.
"ज़्यादा भाषण मत दे मुझे. सेल तेरी और तेरे बाप की औकात hi क्या है जो हमसे जुबां लड़ने की हिम्मत कर सके. तुम सालो गन्दी नाली के कीड़े हो. भूल गया क्या की तेरे जैसे गिरे हुए लोगो के घर का हम लोग पानी तक नहीं पिटे." उसने कामिनी मुस्कान के साथ ऐसा कहा तो मुझे बहुत ज़्यादा गुस्सा आ गया.
"ये सब बर्षो पुराणी कहानी है रुपेश. जिसने किया वो तो कब का मर चूका है. आज के वक्त में ये सब कोई नहीं देखता. ये सब नियम कानून इंसानो ने अपने मतलब के लिए बनाये थे. वर्ण बड़े बड़े धर्म ग्रंथो को खोल के देख लो. ऐसे बहुत से एक्साम्प्ले मिल जायेगे तुझे जिसमे बड़े बड़े महा पुरुषो ने भी नीच जाती की लड़की से ब्याह किया था. उनके वक्त में तो किसी ने कोई आपत्ति नहीं जताई थी. बल के उनके उस काम से उनका यश hi हुआ tha....aur रही औकात की बात तो सारा गांव जनता है की हमारी औकात तुम लोगो की औकात से कितनी बेहतर है. इस लिए तू भी ज़्यादा उड़ मत. मैं तेरे मुँह नहीं लग्न चाहता. इस लिए तू जा यहाँ से अपना रास्ता नाप." मैंने उससे ऐसा कहा तो उसका जैसे खून खौल गया.
"सेल तेरी इतनी हिम्मत की मुझसे जुबां ladaye...ruk अभी तुझे बताता हु मैं." वो ये कहते हुए मोटर सिक्ले से एक झटके में निचे उतर आया. ये देख कर कुसुम दीदी और भी ज़्यादा घबरा गयी. वो दौड़ कर मेरे पास आ गयी और मेरा हाथ पकड़ कर पीछे की तरफ खींचने लगी.
"Vicky..chal यहाँ se...tujhe किसी से बात ज़ुबानी करने की या लड़ाई करने की कोई ज़रूरत नहीं है. उसे जो बोलना है बोलने दे. तू चल यहाँ se....pita जी को पता चलेगा तो वो हम पर hi गुस्सा करेंगे." दीदी मुझे ज़बरदस्ती खींच रही थी. इधर रुपेश मोटर सिक्ले से उतर कर मेरे सामने आ खड़ा हुआ था.
रुपेश गांव के सरपंच मणि शंकर तिवारी का इकलौता लड़का था. आगे में मुझसे कुछ hi महीने का बड़ा था. बाकी ब्राम्हीनो में रुपेश का बाप घर से थोड़ा संपन्न था. पिछले कई पंचवर्षीय से वो hi सरपंची का चुनाव जीत रहा था. बहुत hi धूर्त किसम का आदमी था मणि शंकर. रुपेश भी अपने बाप की तरह hi था. रुपेश मणि शंकर की सन्तानो में दूसरे नंबर का था. इसकी एक बड़ी बहन है जिसकी शादी चार साल पहले हो चुकी थी. रुपेश के बाद इसकी तीन बहने और हैं जो इससे छोटी हैं मगर जवान हो चुकी हैं.
"अपने चिरकुट भाई को कहा ले जा रही है मेरी jaan...dar mat...teri वजह से इसके साथ कुछ भी बुरा नहीं करुगा main....magar इसने जो मुझसे जुबां लड़ाई है उसकी कीमत इसके बदले तुझे चुकानी होगी. कीमत बहुत छोटी और आसान है. बस एक बार मुझे अपनी जवानी का रास पिलाना होगा तुझे. उसके बाद मैं तेरे भाई को कुछ नहीं कहुगा. इसे बक्श दुगा मैं." रुपेश ने मेरी दीदी को ये कहा hi था की मैं गुस्से में जलते हुए उस पर टूट पड़ा.
वो मुझसे कुछ hi महीने का बड़ा था. मगर मेरी पर्सनल्टी के सामने उसकी पर्सनल्टी कुछ भी नहीं थी. दुबला पतला था वो. दिन भर गांजा दारु करता था और इतर लौ कास्ट की लड़कियों के साथ गंदे काम करता रहता था. अपने बाप की वजह से वो सबसे ऐसे hi अकड़ कर पेश आता था.
मैंने रुपेश के पेट में खींच के एक लात मारी तो वो पीछे की तरफ अपनी hi मोटर सिक्ले से जा टकराया और भरभरा कर उसी पर गिरता चला गया. उसकी मोटर सिक्ले भी पीछे की तरफ गिर गयी थी. मैंने गुस्से में बहुत तेज़ लात मारी थी उसे. रुपेश का हाल देख कर मेरी दीदी की चील्ह निकल गयी. मगर मैं नहीं रुका. आगे बढ़ कर मैंने रुपेश को उसके कॉलर से पकड़ कर उठाया और फिर दे दाना दान उस पर लात घुसे बरसता चला गया. वो बुरी तरह चीखे जा रहा था और गन्दी गन्दी गालिया दे रहा था.
कुसुम दीदी मुझे इस तरह रुपेश को मारते देख कर बुरी तरह रोये जा रही थी. मुझे पीछे से पकड़ कर अपनी पूरी ताकत से खींच रही थी मगर मैं इस वक्त अपने आप पर नहीं था. रुपेश ने मेरी दीदी को उतनी बड़ी बात कही थी जो मुझसे किसी भी तरह बर्दास्त नहीं हो रही थी. मुझे लग रहा था की मैं अभी इसी वक्त रुपेश नाम के इस घटिया इंसान का खून कर दू.
थोड़ी hi देर में रुपेश को मैंने मारते मारते अधमरा कर दिया. उसमे अब उठने की हिम्मत नहीं बची थी. वो ज़मीन पर पड़ा बुरी तरह दर्द से कराह रहा था और उसके मुख से नाक से खून बाह रहा था.
अभी मैं उसको और मारता मगर तभी कुसुम दीदी मेरे सामने आयी और रट हुए मेरे गालो पर थप्पड़ बरसाने लगी.
"ये तूने क्या किया vicky...tu ऐसा कैसे किसी के साथ कर सकता है.? तुझे हम सब का ख़याल कैसे न रहा.? ये लोग हमें अब जीने नहीं देंगे." जाने क्या क्या कहती हुयी दीदी मुझे मारे जा रही थी और मैं एक डैम से सुन्न सा पद गया था.
दीदी को भी होश नहीं था. उन्हें इस बात का अहसास hi नहीं था की वो रट हुए मेरे गालो पर थप्पड़ बरसाए जा रही हैं और मेरे दोनों गाल लाल सुर्ख पड़ते जा रहे हैं.
"बस करो bitiya...vicky बाबू को और मत मारो." तभी हमारे पीछे से किसी ने ऐसा कहा तो दीदी का मारना एक डैम से बंद हो गया. हम दोनों ने hi पलट कर उस तरफ देखा तो चौंक पड़े.
हमारे चारो तरफ काम से काम 8 या 10 आदमी और औरत खड़े थे. वो सब हमारी तरफ hi देख रहे थे. ये सरे लोग हमारे hi गांव के थे जो सड़क के दोनों तरफ खेतो पर कही काम में लगे हुए थे. यहाँ पर ये सब होता देख ये लोग शायद यहाँ पर भागते हुए आ गए थे. ये सब के सब इतर लौ कास्ट के लोग थे. कुछ ठाकुर थे और कुछ नीच जाती के.
"Kaka...Dekhiye न विक्की ने ये क्या गज़ब कर दिया.? इसने सरपंच काका के लड़के पर हाथ उठाया और उसकी ये हालत कर दी. इसने ज़रा सा भी नहीं सोचा की इसके ऐसा करने से हम पर कितनी बड़ी मुसीबत आ जाएगी. आप सब तो जानते hi हैं की सरपंच काका कैसे हैं." कुसुम दीदी ने रट हुए उस आदमी से कहा जिसने दीदी को आ कर मुझे मारने से रोका था.
इधर मैं अब एक डैम से शांत खड़ा रह गया था. ये मेरी लाइफ में पहली बार हुआ था की मैं किसी पर इस हद तक गुस्सा हुआ था और उसे इतना मारा था. मैं अपने आप पर अब हैरान था की मैंने ये सब कैसे कर दिया. अब मुझे भी सिचुएशन की गंभीरता का अहसास हो रहा था और मैं इस सबसे अब अंदर hi अंदर घबराये जा रहा था.
मुझे सबसे ज़्यादा फ़िक्र पिता जी की थी. मैं जनता था की गांव के बाकी सभी ब्राह्मण मेरे पिता जी से बहुत जलते थे. सामने भले hi वो है कर और ख़ुशी से बोले मगर मन में उन लोगो के अंदर हमेशा कटुता hi रहती थी.
"ये तो सच मच गज़ब hi हो गया है बिटिया. विक्की बाबू को रुपेश बाबू के साथ ऐसा नहीं करना चाहिए था. सरपंच जी को पता चला तो समझो अनर्थ हो जायेगा. मगर ये सब हुआ कैसे विक्की बाबू.?" उस आदमी ने मेरी तरफ देखते हुए पूछा तो मैं कुछ बोल नहीं सका. मैं बोलने की हालत में था hi नहीं. मेरे अंदर तो जैसे विचारो का कोई तूफ़ान चल रहा था. मैं अंदर से बहुत ज़्यादा घबरा गया था. मुझे अपनी नहीं बल के पिता जी की फ़िक्र हो रही थी. आज इस काण्ड से उस ब्राह्मण समाज को मेरे पिता जी पर ऊँगली उठाने का और कुछ भी बोलने का मौका मिल जायेगा.
मैं जनता था की इस सबके बाद पिता जी उन लोगो के सामने अपना सर झुकाये खड़े रह जायेंगे. ये सब मेरी वजह से हुआ था. आज मेरी वजह से मेरे सज्जन और सुशील स्वभाव पिता जी को शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी. ये सब सोचते हुए मेरी आँखों से आँशु बाह चले. मेरा जी चाहा की यही पर ज़मीन फाटे और मैं उसमे समां जाओ.
"बात चाहे जो भी रही हो मंगल मगर मुझे यकीन है की इसमें विक्की बाबू की पहली गलती नहीं रही होगी. हम सब जानते हैं की विक्की बाबू ऐसा किसी के साथ कर hi नहीं सकते. मुझे पूरा यकीन है की रुपेश बाबू ने hi कुछ उल्टा सीधा काम किया होगा जिसकी वजह से ये सब हुआ है." एक दूसरा आदमी हमारे पास आते हुए काका से कहा तो दीदी ने उसकी तरफ देखा और फिर मेरी तरफ. न वो कुछ बोली और न hi मैं.
"ये तो मैं भी जनता हु laakhan...mujhe भी यकीन है की इसमें विक्की बाबू का कोई दोष नहीं होगा. ज़रूर रुपेश बाबू ने hi इनसे कुछ उल्टा सीधा कहा होगा. मगर बात भले hi चाहे जो ho...ye जो भी हुआ है अच्छा नहीं हुआ है. सरपंच जी को पता चला तो बहुत बड़ा हंगामा हो जायेगा." मंगल काका ने कहा तो दीदी का चेहरा फक्क पड़ता चला गया.
"पता तो चलेगा hi mangal...mujhe तो दर लग रहा है की इस सब की वजह से गांव में बहुत बड़ा बखेड़ा न हो जाये. विक्की बाबू के साथ साथ महेश बाबू पर भी मुसीबत आ जाएगी." लाखन काका ने कहा तो मेरे अंदर दर की एक लहार दौड़ती चली गयी.
"ये सब छोडो और ये सोचो की हमें करना क्या chahiye...ham सब ने देखा है ये सब कुछ." एक तीसरे आदमी ने कहा तो मैंने और दीदी ने उसकी तरफ देखा.
"कहना क्या चाहते हो तुम जग्गू.?" मंगल काका ने उसकी तरफ देख कर कहा.
"यहाँ जो कुछ भी हुआ hai...uske बाद ये तो पक्की बात है की गांव में पंचायत बैठायी जाएगी और पंचायत में सरपंच जी प्रमुख hi होंगे. सारा दोष भले hi रुपेश बाबू का होगा मगर पंचायत के बाकी सब पांच लोग सरपंच जी के पक्ष में hi रहेंगे. उसके बाद क्या निर्णय होगा ये हम सब खुद hi सोच सकते हैं." जग्गू नाम के उस आदमी ने ऐसा कहा तो सब के सब चुप रह गए. कोई कुछ बोल न सका. मैं और दीदी तो चुप चाप खड़े hi रहे.
"जग्गू सही कह रहा hai...sare पंचायत के लोग रुपेश बाबू को hi सही ठहराएंगे और विक्की बाबू को दोषी करार देंगे. मगर भला इसमें कोई कर hi क्या सकता है.? अनर्थ तो अब हो hi गया है." एक चौथे आदमी ने ऐसा कहा तो जग्गू नाम के आदमी ने उसकी तरफ देखा.
"इतना तो हम सब जानते हैं बल्ली काका की गांव के सब ब्राह्मण महेश बाबू के खिलाफ एक जुट हैं. हम सब ये भी जानते हैं की महेश बाबू का स्वभाव बहुत अच्छा hai...wo हम सबको अपना मानते हैं और ज़रूरत के वक्त हमेशा उन्होंने हमारी भारी मदद भी की है. जब के बाकी के सब ब्राह्मण कितने अच्छे हैं ये तुम सब भी जानते हो. ये रुपेश बाबू के बारे में क्या तुम सब नहीं जानते.? बोलो gullu...chhoti मुँह बड़ी baat...ham नीच जाती के हैं मगर हमारी भी कोई इज्जत होती hai...hamare घर की बहु बेतिया क्या कोई कोठे वाली हैं जो इनकी हवस का शिकार होती हैं.?" जग्गू ने जब ऐसा कहा तो सबके बीच ख़ामोशी छ गयी.
"तो तुम कहना क्या चाहते हो जग्गू.?" मंगल ने आगे बढ़ कर कहा तो जग्गू ने उसकी तरफ देखा.
"मैं ये कहना चाहता हु मंगल की हमें इस बारे में महेश बाबू का साथ देना चाहिए. उन्होंने हमेशा हमारी मुश्किल वक्त में मदद की hai...aaj अगर उन पर कोई मुसीबत आने वाली है तो क्या हम उनके लिए इतना नहीं कर सकते..?" जग्गू ने कहा.
"चाहते तो हम सब भी यही हैं जग्गू. मगर हम नीच जाती के हैं. हमारी बात पंचायत में बैठे वो लोग कभी नहीं मानेगे." बल्ली कहा ने कहा तो जग्गू के होठो पर मुस्कान उभर आयी.
"उन्हें मानना पड़ेगा kaka..ham सब लोग अपनी बिरादरी के बाकी सब लोगो को इकठ्ठा करेंगे और फिर सब एक साथ पंचायत में पहुंचेंगे. इतने सरे लोगो को एक साथ देख कर पंचायत के पांच लोग मनमानी नहीं कर पाएंगे. काका गांव से बड़ी बरात नहीं hoti...mana की वो सब ब्राह्मण एक जुट हैं महेश बाबू के खिलाफ मगर हम भी महेश बाबू के साथ hain...aur हमारी तादात भी उनसे ज़्यादा हो जाएगी. इंसान जब अकेला होता है तभी बाकी सब लोग उसको आसानी से घेरने की हिम्मत करते हैं. मगर जब दोनों तरफ बराबरी वाला सवाल हो जाता है तो सामने वाले को घेरने के बारे में फिर सोचना पड़ता है. तुम मेरी बात समझ रहे हो न कहा.?"
"तूने तो कमाल कर दिया रे jaggu...sach मुँह छोटी मुँह बड़ी बात कही है तूने." बल्ली काका ने जब ऐसा कहा तो बाकी सब मुस्कुरा उठे.
"तो तुम सब लोग मेरी बात से सहमत हो न.? अगर सहमत हो तो चलो अभी से हमें अपने काम पर लग जाना चाहिए. वर्ण देर हो गयी तो गज़ब हो जायेगा." जग्गू ने उन सब को चेताया.
"सही कह रहा है तू jaggu...hame जल्द hi सब को इकठ्ठा करना होगा. अभी तो ये बात यही तक hai...bechare महेश बाबू को भी पता नहीं होगा की यहाँ क्या गज़ब हो गया है." लाखन ने कहा तो सब के सब एक साथ इकठ्ठा खड़े हो गए. मैं और दीदी ख़ामोशी से ये सब देख सुन रहे थे.
मैं सोच रहा था की ये लोग कितने अच्छे थे. ये सब अनपढ़ थे मगर इतना ज्ञान तो इन्हे भी था की क्या सही है और क्या गलत. पर सोचने वाली बात थी की ये सब हमारा साथ देने के लिए खुद hi तैयार हो गए थे. सिर्फ इस लिए की इन सबकी नज़रो में मेरे पिताजी एक अच्छे इंसान थे या फिर इनकी नज़रो में महान थे.
"विक्की babu....aap कुसुम बिटिया को ले कर घर चले jaiye...aur हाँ फ़िक्र मत कीजिये. हम सब आपके साथ hain...ham सब जी जान लगा देंगे. हम भी देखते हैं की सरपंच जी और बाकी के सब लोग कैसे आपके साथ और हमारे महेश बाबू के साथ कुछ गलत करते हैं." जग्गू काका ने मुझसे ऐसा कहा तो मेरे चेहरे पर राहत के भाव आये. मैं बोलै कुछ नहीं बस हाँ में सर हिलाया और फिर कुसुम दीदी को साथ ले कर वापस घर की तरफ बढ़ चला.
सारे रास्ते मैं और दीदी चुप hi रहे. दीदी गुमसुम सी नज़र आ रही थी. मेरे मन में भी बहुत सी बाते चल रही थी. मैं सोच रहा था की आगे क्या होगा.? पिता जी को पता चलेगा तो वो क्या कहेंगे.? यही सब सोचते हुए मैं दीदी को लिए घर पहुंच गया.
घर में मेरी माँ और दोनों छोटी बहने थी. पिता जी तो सुबह hi कुछ सामान लेने के लिए शहर की तरफ चले गए थे. मैं और दीदी चुप चाप घर के अंदर आये तो बैठक में hi मुझे माँ दिख गयी. उनके पास गांव की दो तीन औरते बैठी हुयी थी.
माँ ने जब मुझे दीदी के साथ वापस आते देखा तो पूछ बैठी की इतना जल्दी खेतो से कैसे आ गए.? तो मैं उन औरतो के सामने कुछ न बोलै. दीदी ने मुझे मेरे कमरे में जाने का इशारा किया तो मैं चुप चाप चला गया.
मेरे इस तरह चले जाने पर माँ हैरानी से दीदी की तरफ देखने लगी. दीदी के चेहरे पर उन्हें कुछ नज़र आया तो उन्होंने दीदी को अंदर जाने को कहा. माँ के कहने पर दीदी भी अंदर आ गयी. थोड़ी hi देर में जब गांव की औरते अपने अपने घर चली गयी तो माँ जल्दी से दीदी के पास आ गयी.
"क्या बात hai...tum दोनों भाई बहन इतनी जल्दी खेतो से कैसे आ गए.? और तुमने अपना ये चेहरा कैसा बना रखा है.? मुझे ऐसा क्यों लगता है जैसे तुम बहुत रोई हो.?" माँ ने जब ऐसा कहा तो दीदी चुप न रह सकीय और वो बिलख बिलख कर रोने लगी. उनके इस तरह रोने लग जाने से माँ को झटका लगा. फिर घबराते हुए दीदी से पूछने लगी की क्या हुआ है.?
दीदी ने मान के पूछने पर रट हुए सारा किस्सा सुना दिया जिसे सुन कर माँ के पैरो टेल से ज़मीन खिसक गयी. काफी देर तक उनके मुख से कोई लफ्ज़ नहीं निकला. उसके बाद वो बहुत ज़्यादा परेशां दिखने लगी और कहने लगी की ये सब ठीक नहीं हुआ. इस सबसे हम बहुत बड़ी मुसीबत में आ गए हैं. पिता जी को पता चलेगा तो वो भी बहुत परेशां हो जायेंगे.
सिचुएशन काफी ज़्यादा ख़राब हो चुकी थी. माँ ने कुछ देर बाद दीदी को अपने कमरे में भेज दिया और वो खुद मेरे पास मेरे कमरे में आ गयी. मैं अपने कमरे में गुमसुम सा बीएड पर चुप चाप बैठा हुआ था. माँ ने मुझे गुमसुम बैठे देखा तो वो मेरे पास आयी और बीएड पर मेरे बगल से hi बैठ गयी.
"क्या ज़रूरत थी बीटा उस नीच इंसान से जुबां लड़ने की.? अगर वो कुछ कह रहा था तो कहने देते. तुम दोनों अपने रास्ते चले जाते. अब बताओ इस सबसे अब जो मुसीबत होने वाली है उसका सामना तेरे पिता जी कैसे करेंगे.? तुझे तो पता hi है की गांव में हमारी क्या अहमियत है उनके बीच. वो लोग तो चाहते hi हैं की हम यहाँ से चले जाये या हमारा अहित हो जाये." माँ ने ऐसा कहा तो मैं कुछ बोल न सका.
"तेरी दीदी ने मुझे बताया की किस वजह से तूने उस सरपंच के लड़के को मार मार कर उसकी हालत खराब की है. मैं ये मानती हु की उसने जो कुछ भी कुसुम को बोलै वो अच्छा नहीं था मगर ऐसे लोगो की तरफ ध्यान नहीं देना चाहिए था तुझे. इस संसार में ऐसे बहुत से लोग मिलेंगे तुझे जो तेरे सामने तेरी बहन को उल्टा सीधा बोलेंगे तो क्या तू उन सब को ऐसे hi मारता फिरेगा.? हमने तो तुझे ऐसे संस्कार नहीं दिए the...fir आज ये कैसे कर दिया तूने.?" माँ ने ये सब समझते हुए मुझसे कहा तो मैंने इस बार माँ की तरफ चेहरा उठा कर देखा.
"उस वक्त मुझे उसकी वो गन्दी बात सुन कर बहुत ज़्यादा गुस्सा आ गया था माँ. इसी लिए मैंने गुस्से में इतना मारा उसे. अब बल्कि मुझे इस बात का अहसास हो रहा है की ये सब कर के मैंने सच में कितनी बड़ी गलती कर दी है. मेरी वजह से पिता जी को गांव में सब के सामने सर झुका के खड़े हो जाना पड़ेगा. मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गयी है माँ. मुझे इसके लिए सजा दीजिये आप." मैंने ऐसा कहा और मेरी आँखों में आशु आ गए. ये देख कर माँ ने मुझे प्यार से चुपके लिया.
"मैं जानती हु की तूने ये सब जान बुझ कर नहीं किया. तेरी जगह कोई भी भाई होता तो वो भी यही करता. जो होना था वो तो हो hi गया है. अब तो बस इस बात की फ़िक्र है की इसका अंजाम क्या होगा.?" माँ ने मेरे सर पर हाथ फेरते हुए कहा तो मैं उनसे अलग हो कर उनकी तरफ देखने लगा.
"क्या आपने पिता जी को इसके बारे में बता दिया है.?" मैंने माँ की तरफ देखते हुए कहा तो माँ ने मुझे देखते हुए अपने सर को न में हिला दिया.
"उन्हें फ़ोन कर के बता दीजिये माँ. कही ऐसा न हो की कुछ ज़्यादा hi गड़बड़ हो जाये. वैसे गांव के जो नीच जाती के लोग हैं वो सब हमारे साथ hi हैं. उन सबने कहा है की वो सब पंचायत में हमारे पक्ष में hi गवाही देंगे." मैंने ऐसा कहा तो माँ कुछ न बोली बस मेरी तरफ देखती रही.
"वो सब तो ठीक hai...lekin तू ये बता की तुझे तो कही चोट वोट नहीं आयी.?" माँ ने ये कहते हुए मेरे जिसम के हर भागो पर देखते हुए कहा.
"नहीं माँ मैं ठीक hu...bal के मेरी मार से रुपेश ज़रूर बुरी तरह घायल हो गया है. उसकी नाक और मुँह से खून निकलने लगा था." मैंने अपना सर झुकाते हुए माँ को बताया तो माँ जाने क्या सोचने लगी.
कुछ देर बाद माँ मुझे कमरे में hi रहने का बोल कर चली गयी. शायद अब वो पिता जी को फ़ोन द्वारा इस सब के बारे में बताने वाली थी. इधर उनके जाने के थोड़ी hi देर बाद मेरे कमरे पर किसी के आने की आहात हुयी.
सॉरी भाई लोग कल रात को hi मैं अपडेट देने वाला था बूत फिर मैं सो गया और मुझे अपडेट देने की बात याद hi नहीं आयी थी.
रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....
कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....
अपडेट = 06
फ्लैशबैक कंटिन्यू....
मैं और कुसुम दीदी घर से खेतो पर जाने के लिए चल पड़े. हमारे खेत हमारे घर से करीब 15 या फिर 20 मिनट की दूरी पर थे. यु तो हमारे पास घर में दो पहिया वाहन में एक मोटर सिक्ले भी थी जो की पिता जी ने मुझे मेरे जन्म दिन के तोहफे में पिछले साल खरीद कर दिया था. खेतो की जुताई के लिए एक ट्रैक्टर भी था हमारे पास. बाकी कार जैसा कोई वाहन नहीं था हमारे पास. पर हम सब इतने में hi बाकी ब्राह्मण समाज वालो से ज़्यादा खुश थे. उनके पास तो दो तीन लोगो के पास hi ये सब था. जब के उनकी तादात काफी ज़्यादा थी.
मैं और कुसुम दीदी घर से पैदल hi खेतो की तरफ चल पड़े थे. मैं दीदी के आगे आगे चल रहा था. गांव की मैं रोड से निकलने के बाद एक कच्चा रास्ता हमारे खेतो की तरफ जाता था. जब के गांव की मैं रोड पर आरसीसी रोड बानी हुयी थी. इधर कच्चे रास्ते के दोनों तरफ काफी सरे खेत थे जो की हमारे नहीं थे. ये रोड के दोनों तरफ के खेत इतर ब्रह्मिनो के थे. इनके बाद कुछ इतर कास्ट के लोगो के खेत पड़ते थे. उसके बाद हमारे खेत आते थे. एक अच्छी बात ये थी की हमारे खेतो के पास से hi एक बड़ी सी नहर निकली हुयी थी जिससे हमें अपने खेतो पर सिचाई करने में बड़ी आसानी होती थी. इतर ब्राह्मण जो हमसे जलते थे वो इस नहर के द्वारा हमारे खिलाफ कुछ नहीं कर सकते थे क्यों की नहर का बहाव हमारे खेतो की तरफ से चलते हुए hi इन लोगो के खेतो की तरफ आता था. अगर इनकी तरफ से हमारे खेतो की तरफ नहर के पानी का बहाव होता तो ये लोग ज़रूर नहर के पानी को बीच से कही बाँधने का काम बहुत पहले hi कर चुके होते.
मैं और कुसुम दीदी आपस में बाते करते हुए कच्चे रास्ते से पैदल hi चल रहे थे. मैं दीदी के साथ खुश तो था hi मगर मैं दीदी को भी खुश देख रहा था. शायद मेरे जैसी hi ख़ुशी उनको भी थी की वो मेरे साथ थी. ऐसा मुझे लगता था. बाकी इसमें कितनी सच्चाई थी ये मैं कह नहीं सकता था.
आरसीसी रोड से इस तरफ मुद कर हम कच्चे रास्ते से चलते हुए काफी आगे तक आ गए थे. तभी मुझे सामने की तरफ से एक मोटर सिक्ले आती हुयी दिखी. मैं दूर से hi मोटर सिक्ले पर चढ़े उस इंसान को पहचान गया जिससे मेरा 36 का आकड़ा था. उस इंसान को देखते hi मेरा अच्छा खासा दिमाग खराब होने लगा. यु तो गांव में मेरी किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी और न hi मैं किसी से कोई लड़ाई झगड़ा करता था. मैं अपने पिता जी के बताये हुए रास्ते पर hi हमेशा चलता था. मगर कहते हैं न की हम कितना भी सोचे की सब अच्छा hi हो मगर ऐसा होता नहीं है.
मोटर सिक्ले से आता हुआ वो इंसान हमारे करीब आ गया था. हम दोनों को देखते hi उसने हमारे सामने अपनी मोटर सिक्ले रोक दी. पहले उसने मेरी तरफ देखा फिर उसकी नज़र कुसुम दीदी पर जैम सी गयी. वो दीदी को ऊपर से नीचे एक देखे जा रहा था. उसकी आँखों में गंदगी भरी हुयी मुझे जल्द hi नज़र आ गयी और इसके साथ hi मेरा खराब दिमाग और भी ज़्यादा खराब हो गया. मैं ये किसी कीमत पर बर्दास्त नहीं कर सकता था की कोई ऐसा घटिया ब्यक्ति मेरी मासूम बहन पर गन्दी नज़र डाले.
"क्यों रे chirkut...aaj तो बड़ा अच्छा आइटम साथ ले कर घूम रहा है. हाय इसे देख कर कुछ कुछ होने लगा है मुझे." उसने दीदी की तरफ देखने के बाद मेरी तरफ कामिनी मुस्कान के साथ देखते हुए कहा तो मेरा पारा एकदम से चढ़ गया.
उसकी इस बात का असर मेरी दीदी पर भी हुआ था. वो एकदम से घबराई हुयी नज़र आने लगी थी. इधर उसकी इस बात से मेरी मुट्ठियाँ कास गयी.
"तमीज से बात कर रुपेश तिवारी. तुझे अच्छी तरह पता है की ये मेरी कुसुम दीदी हैं. इसके बावजूद तूने इस तरह की घटिया बात की. अगर कोई तेरी बहन के बारे में ऐसा बोले तो कैसा लगेगा तुझे.?" मैंने गुस्से में कहा तो रुपेश तिलमिला गया. उसने गुस्से से मेरी तरफ देखा.
"किस्मे इतना डैम है रे चिरकुट जो मेरी बहन के बारे में ऐसा बोले. साले जानता नहीं क्या मुझे.? रुपेश नाम है मेरा. रुपेश तिवारी. जुबां काट के हाथ में दे दूँगा अगर कोई मेरी बहन के बारे में कुछ बोलै तो." उसने आँखे दिखते हुए मुझसे ऐसा कहा तो मैं आगे बढ़ा.
"आग लगी न तुझे.? अब तू खुद सोच की तेरे ऐसा बोलने पर मुझे कितनी आग लगी होगी. मैं तेरी तरह गंदे खयालो का नहीं हु और न hi मैं तुझसे कोई लड़ाई करना चाहता हु. मेरे माँ बाप ने मुझे ऐसे संस्कार दिए hi नहीं हैं की मैं किसी की माँ बहनो के बारे में ऐसे गंदे लफ्ज़ बोलू." मैंने जब उसके करीब जा कर ऐसा कहा तो उसने अपना हाथ मेरी तरफ ऐसे अंदाज़ में किया जैसे मुझे रुक जाने का संकेत दे रहा हो.
"ज़्यादा भाषण मत दे मुझे. सेल तेरी और तेरे बाप की औकात hi क्या है जो हमसे जुबां लड़ने की हिम्मत कर सके. तुम सालो गन्दी नाली के कीड़े हो. भूल गया क्या की तेरे जैसे गिरे हुए लोगो के घर का हम लोग पानी तक नहीं पिटे." उसने कामिनी मुस्कान के साथ ऐसा कहा तो मुझे बहुत ज़्यादा गुस्सा आ गया.
"ये सब बर्षो पुराणी कहानी है रुपेश. जिसने किया वो तो कब का मर चूका है. आज के वक्त में ये सब कोई नहीं देखता. ये सब नियम कानून इंसानो ने अपने मतलब के लिए बनाये थे. वर्ण बड़े बड़े धर्म ग्रंथो को खोल के देख लो. ऐसे बहुत से एक्साम्प्ले मिल जायेगे तुझे जिसमे बड़े बड़े महा पुरुषो ने भी नीच जाती की लड़की से ब्याह किया था. उनके वक्त में तो किसी ने कोई आपत्ति नहीं जताई थी. बल के उनके उस काम से उनका यश hi हुआ tha....aur रही औकात की बात तो सारा गांव जनता है की हमारी औकात तुम लोगो की औकात से कितनी बेहतर है. इस लिए तू भी ज़्यादा उड़ मत. मैं तेरे मुँह नहीं लग्न चाहता. इस लिए तू जा यहाँ से अपना रास्ता नाप." मैंने उससे ऐसा कहा तो उसका जैसे खून खौल गया.
"सेल तेरी इतनी हिम्मत की मुझसे जुबां ladaye...ruk अभी तुझे बताता हु मैं." वो ये कहते हुए मोटर सिक्ले से एक झटके में निचे उतर आया. ये देख कर कुसुम दीदी और भी ज़्यादा घबरा गयी. वो दौड़ कर मेरे पास आ गयी और मेरा हाथ पकड़ कर पीछे की तरफ खींचने लगी.
"Vicky..chal यहाँ se...tujhe किसी से बात ज़ुबानी करने की या लड़ाई करने की कोई ज़रूरत नहीं है. उसे जो बोलना है बोलने दे. तू चल यहाँ se....pita जी को पता चलेगा तो वो हम पर hi गुस्सा करेंगे." दीदी मुझे ज़बरदस्ती खींच रही थी. इधर रुपेश मोटर सिक्ले से उतर कर मेरे सामने आ खड़ा हुआ था.
रुपेश गांव के सरपंच मणि शंकर तिवारी का इकलौता लड़का था. आगे में मुझसे कुछ hi महीने का बड़ा था. बाकी ब्राम्हीनो में रुपेश का बाप घर से थोड़ा संपन्न था. पिछले कई पंचवर्षीय से वो hi सरपंची का चुनाव जीत रहा था. बहुत hi धूर्त किसम का आदमी था मणि शंकर. रुपेश भी अपने बाप की तरह hi था. रुपेश मणि शंकर की सन्तानो में दूसरे नंबर का था. इसकी एक बड़ी बहन है जिसकी शादी चार साल पहले हो चुकी थी. रुपेश के बाद इसकी तीन बहने और हैं जो इससे छोटी हैं मगर जवान हो चुकी हैं.
"अपने चिरकुट भाई को कहा ले जा रही है मेरी jaan...dar mat...teri वजह से इसके साथ कुछ भी बुरा नहीं करुगा main....magar इसने जो मुझसे जुबां लड़ाई है उसकी कीमत इसके बदले तुझे चुकानी होगी. कीमत बहुत छोटी और आसान है. बस एक बार मुझे अपनी जवानी का रास पिलाना होगा तुझे. उसके बाद मैं तेरे भाई को कुछ नहीं कहुगा. इसे बक्श दुगा मैं." रुपेश ने मेरी दीदी को ये कहा hi था की मैं गुस्से में जलते हुए उस पर टूट पड़ा.
वो मुझसे कुछ hi महीने का बड़ा था. मगर मेरी पर्सनल्टी के सामने उसकी पर्सनल्टी कुछ भी नहीं थी. दुबला पतला था वो. दिन भर गांजा दारु करता था और इतर लौ कास्ट की लड़कियों के साथ गंदे काम करता रहता था. अपने बाप की वजह से वो सबसे ऐसे hi अकड़ कर पेश आता था.
मैंने रुपेश के पेट में खींच के एक लात मारी तो वो पीछे की तरफ अपनी hi मोटर सिक्ले से जा टकराया और भरभरा कर उसी पर गिरता चला गया. उसकी मोटर सिक्ले भी पीछे की तरफ गिर गयी थी. मैंने गुस्से में बहुत तेज़ लात मारी थी उसे. रुपेश का हाल देख कर मेरी दीदी की चील्ह निकल गयी. मगर मैं नहीं रुका. आगे बढ़ कर मैंने रुपेश को उसके कॉलर से पकड़ कर उठाया और फिर दे दाना दान उस पर लात घुसे बरसता चला गया. वो बुरी तरह चीखे जा रहा था और गन्दी गन्दी गालिया दे रहा था.
कुसुम दीदी मुझे इस तरह रुपेश को मारते देख कर बुरी तरह रोये जा रही थी. मुझे पीछे से पकड़ कर अपनी पूरी ताकत से खींच रही थी मगर मैं इस वक्त अपने आप पर नहीं था. रुपेश ने मेरी दीदी को उतनी बड़ी बात कही थी जो मुझसे किसी भी तरह बर्दास्त नहीं हो रही थी. मुझे लग रहा था की मैं अभी इसी वक्त रुपेश नाम के इस घटिया इंसान का खून कर दू.
थोड़ी hi देर में रुपेश को मैंने मारते मारते अधमरा कर दिया. उसमे अब उठने की हिम्मत नहीं बची थी. वो ज़मीन पर पड़ा बुरी तरह दर्द से कराह रहा था और उसके मुख से नाक से खून बाह रहा था.
अभी मैं उसको और मारता मगर तभी कुसुम दीदी मेरे सामने आयी और रट हुए मेरे गालो पर थप्पड़ बरसाने लगी.
"ये तूने क्या किया vicky...tu ऐसा कैसे किसी के साथ कर सकता है.? तुझे हम सब का ख़याल कैसे न रहा.? ये लोग हमें अब जीने नहीं देंगे." जाने क्या क्या कहती हुयी दीदी मुझे मारे जा रही थी और मैं एक डैम से सुन्न सा पद गया था.
दीदी को भी होश नहीं था. उन्हें इस बात का अहसास hi नहीं था की वो रट हुए मेरे गालो पर थप्पड़ बरसाए जा रही हैं और मेरे दोनों गाल लाल सुर्ख पड़ते जा रहे हैं.
"बस करो bitiya...vicky बाबू को और मत मारो." तभी हमारे पीछे से किसी ने ऐसा कहा तो दीदी का मारना एक डैम से बंद हो गया. हम दोनों ने hi पलट कर उस तरफ देखा तो चौंक पड़े.
हमारे चारो तरफ काम से काम 8 या 10 आदमी और औरत खड़े थे. वो सब हमारी तरफ hi देख रहे थे. ये सरे लोग हमारे hi गांव के थे जो सड़क के दोनों तरफ खेतो पर कही काम में लगे हुए थे. यहाँ पर ये सब होता देख ये लोग शायद यहाँ पर भागते हुए आ गए थे. ये सब के सब इतर लौ कास्ट के लोग थे. कुछ ठाकुर थे और कुछ नीच जाती के.
"Kaka...Dekhiye न विक्की ने ये क्या गज़ब कर दिया.? इसने सरपंच काका के लड़के पर हाथ उठाया और उसकी ये हालत कर दी. इसने ज़रा सा भी नहीं सोचा की इसके ऐसा करने से हम पर कितनी बड़ी मुसीबत आ जाएगी. आप सब तो जानते hi हैं की सरपंच काका कैसे हैं." कुसुम दीदी ने रट हुए उस आदमी से कहा जिसने दीदी को आ कर मुझे मारने से रोका था.
इधर मैं अब एक डैम से शांत खड़ा रह गया था. ये मेरी लाइफ में पहली बार हुआ था की मैं किसी पर इस हद तक गुस्सा हुआ था और उसे इतना मारा था. मैं अपने आप पर अब हैरान था की मैंने ये सब कैसे कर दिया. अब मुझे भी सिचुएशन की गंभीरता का अहसास हो रहा था और मैं इस सबसे अब अंदर hi अंदर घबराये जा रहा था.
मुझे सबसे ज़्यादा फ़िक्र पिता जी की थी. मैं जनता था की गांव के बाकी सभी ब्राह्मण मेरे पिता जी से बहुत जलते थे. सामने भले hi वो है कर और ख़ुशी से बोले मगर मन में उन लोगो के अंदर हमेशा कटुता hi रहती थी.
"ये तो सच मच गज़ब hi हो गया है बिटिया. विक्की बाबू को रुपेश बाबू के साथ ऐसा नहीं करना चाहिए था. सरपंच जी को पता चला तो समझो अनर्थ हो जायेगा. मगर ये सब हुआ कैसे विक्की बाबू.?" उस आदमी ने मेरी तरफ देखते हुए पूछा तो मैं कुछ बोल नहीं सका. मैं बोलने की हालत में था hi नहीं. मेरे अंदर तो जैसे विचारो का कोई तूफ़ान चल रहा था. मैं अंदर से बहुत ज़्यादा घबरा गया था. मुझे अपनी नहीं बल के पिता जी की फ़िक्र हो रही थी. आज इस काण्ड से उस ब्राह्मण समाज को मेरे पिता जी पर ऊँगली उठाने का और कुछ भी बोलने का मौका मिल जायेगा.
मैं जनता था की इस सबके बाद पिता जी उन लोगो के सामने अपना सर झुकाये खड़े रह जायेंगे. ये सब मेरी वजह से हुआ था. आज मेरी वजह से मेरे सज्जन और सुशील स्वभाव पिता जी को शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी. ये सब सोचते हुए मेरी आँखों से आँशु बाह चले. मेरा जी चाहा की यही पर ज़मीन फाटे और मैं उसमे समां जाओ.
"बात चाहे जो भी रही हो मंगल मगर मुझे यकीन है की इसमें विक्की बाबू की पहली गलती नहीं रही होगी. हम सब जानते हैं की विक्की बाबू ऐसा किसी के साथ कर hi नहीं सकते. मुझे पूरा यकीन है की रुपेश बाबू ने hi कुछ उल्टा सीधा काम किया होगा जिसकी वजह से ये सब हुआ है." एक दूसरा आदमी हमारे पास आते हुए काका से कहा तो दीदी ने उसकी तरफ देखा और फिर मेरी तरफ. न वो कुछ बोली और न hi मैं.
"ये तो मैं भी जनता हु laakhan...mujhe भी यकीन है की इसमें विक्की बाबू का कोई दोष नहीं होगा. ज़रूर रुपेश बाबू ने hi इनसे कुछ उल्टा सीधा कहा होगा. मगर बात भले hi चाहे जो ho...ye जो भी हुआ है अच्छा नहीं हुआ है. सरपंच जी को पता चला तो बहुत बड़ा हंगामा हो जायेगा." मंगल काका ने कहा तो दीदी का चेहरा फक्क पड़ता चला गया.
"पता तो चलेगा hi mangal...mujhe तो दर लग रहा है की इस सब की वजह से गांव में बहुत बड़ा बखेड़ा न हो जाये. विक्की बाबू के साथ साथ महेश बाबू पर भी मुसीबत आ जाएगी." लाखन काका ने कहा तो मेरे अंदर दर की एक लहार दौड़ती चली गयी.
"ये सब छोडो और ये सोचो की हमें करना क्या chahiye...ham सब ने देखा है ये सब कुछ." एक तीसरे आदमी ने कहा तो मैंने और दीदी ने उसकी तरफ देखा.
"कहना क्या चाहते हो तुम जग्गू.?" मंगल काका ने उसकी तरफ देख कर कहा.
"यहाँ जो कुछ भी हुआ hai...uske बाद ये तो पक्की बात है की गांव में पंचायत बैठायी जाएगी और पंचायत में सरपंच जी प्रमुख hi होंगे. सारा दोष भले hi रुपेश बाबू का होगा मगर पंचायत के बाकी सब पांच लोग सरपंच जी के पक्ष में hi रहेंगे. उसके बाद क्या निर्णय होगा ये हम सब खुद hi सोच सकते हैं." जग्गू नाम के उस आदमी ने ऐसा कहा तो सब के सब चुप रह गए. कोई कुछ बोल न सका. मैं और दीदी तो चुप चाप खड़े hi रहे.
"जग्गू सही कह रहा hai...sare पंचायत के लोग रुपेश बाबू को hi सही ठहराएंगे और विक्की बाबू को दोषी करार देंगे. मगर भला इसमें कोई कर hi क्या सकता है.? अनर्थ तो अब हो hi गया है." एक चौथे आदमी ने ऐसा कहा तो जग्गू नाम के आदमी ने उसकी तरफ देखा.
"इतना तो हम सब जानते हैं बल्ली काका की गांव के सब ब्राह्मण महेश बाबू के खिलाफ एक जुट हैं. हम सब ये भी जानते हैं की महेश बाबू का स्वभाव बहुत अच्छा hai...wo हम सबको अपना मानते हैं और ज़रूरत के वक्त हमेशा उन्होंने हमारी भारी मदद भी की है. जब के बाकी के सब ब्राह्मण कितने अच्छे हैं ये तुम सब भी जानते हो. ये रुपेश बाबू के बारे में क्या तुम सब नहीं जानते.? बोलो gullu...chhoti मुँह बड़ी baat...ham नीच जाती के हैं मगर हमारी भी कोई इज्जत होती hai...hamare घर की बहु बेतिया क्या कोई कोठे वाली हैं जो इनकी हवस का शिकार होती हैं.?" जग्गू ने जब ऐसा कहा तो सबके बीच ख़ामोशी छ गयी.
"तो तुम कहना क्या चाहते हो जग्गू.?" मंगल ने आगे बढ़ कर कहा तो जग्गू ने उसकी तरफ देखा.
"मैं ये कहना चाहता हु मंगल की हमें इस बारे में महेश बाबू का साथ देना चाहिए. उन्होंने हमेशा हमारी मुश्किल वक्त में मदद की hai...aaj अगर उन पर कोई मुसीबत आने वाली है तो क्या हम उनके लिए इतना नहीं कर सकते..?" जग्गू ने कहा.
"चाहते तो हम सब भी यही हैं जग्गू. मगर हम नीच जाती के हैं. हमारी बात पंचायत में बैठे वो लोग कभी नहीं मानेगे." बल्ली कहा ने कहा तो जग्गू के होठो पर मुस्कान उभर आयी.
"उन्हें मानना पड़ेगा kaka..ham सब लोग अपनी बिरादरी के बाकी सब लोगो को इकठ्ठा करेंगे और फिर सब एक साथ पंचायत में पहुंचेंगे. इतने सरे लोगो को एक साथ देख कर पंचायत के पांच लोग मनमानी नहीं कर पाएंगे. काका गांव से बड़ी बरात नहीं hoti...mana की वो सब ब्राह्मण एक जुट हैं महेश बाबू के खिलाफ मगर हम भी महेश बाबू के साथ hain...aur हमारी तादात भी उनसे ज़्यादा हो जाएगी. इंसान जब अकेला होता है तभी बाकी सब लोग उसको आसानी से घेरने की हिम्मत करते हैं. मगर जब दोनों तरफ बराबरी वाला सवाल हो जाता है तो सामने वाले को घेरने के बारे में फिर सोचना पड़ता है. तुम मेरी बात समझ रहे हो न कहा.?"
"तूने तो कमाल कर दिया रे jaggu...sach मुँह छोटी मुँह बड़ी बात कही है तूने." बल्ली काका ने जब ऐसा कहा तो बाकी सब मुस्कुरा उठे.
"तो तुम सब लोग मेरी बात से सहमत हो न.? अगर सहमत हो तो चलो अभी से हमें अपने काम पर लग जाना चाहिए. वर्ण देर हो गयी तो गज़ब हो जायेगा." जग्गू ने उन सब को चेताया.
"सही कह रहा है तू jaggu...hame जल्द hi सब को इकठ्ठा करना होगा. अभी तो ये बात यही तक hai...bechare महेश बाबू को भी पता नहीं होगा की यहाँ क्या गज़ब हो गया है." लाखन ने कहा तो सब के सब एक साथ इकठ्ठा खड़े हो गए. मैं और दीदी ख़ामोशी से ये सब देख सुन रहे थे.
मैं सोच रहा था की ये लोग कितने अच्छे थे. ये सब अनपढ़ थे मगर इतना ज्ञान तो इन्हे भी था की क्या सही है और क्या गलत. पर सोचने वाली बात थी की ये सब हमारा साथ देने के लिए खुद hi तैयार हो गए थे. सिर्फ इस लिए की इन सबकी नज़रो में मेरे पिताजी एक अच्छे इंसान थे या फिर इनकी नज़रो में महान थे.
"विक्की babu....aap कुसुम बिटिया को ले कर घर चले jaiye...aur हाँ फ़िक्र मत कीजिये. हम सब आपके साथ hain...ham सब जी जान लगा देंगे. हम भी देखते हैं की सरपंच जी और बाकी के सब लोग कैसे आपके साथ और हमारे महेश बाबू के साथ कुछ गलत करते हैं." जग्गू काका ने मुझसे ऐसा कहा तो मेरे चेहरे पर राहत के भाव आये. मैं बोलै कुछ नहीं बस हाँ में सर हिलाया और फिर कुसुम दीदी को साथ ले कर वापस घर की तरफ बढ़ चला.
सारे रास्ते मैं और दीदी चुप hi रहे. दीदी गुमसुम सी नज़र आ रही थी. मेरे मन में भी बहुत सी बाते चल रही थी. मैं सोच रहा था की आगे क्या होगा.? पिता जी को पता चलेगा तो वो क्या कहेंगे.? यही सब सोचते हुए मैं दीदी को लिए घर पहुंच गया.
घर में मेरी माँ और दोनों छोटी बहने थी. पिता जी तो सुबह hi कुछ सामान लेने के लिए शहर की तरफ चले गए थे. मैं और दीदी चुप चाप घर के अंदर आये तो बैठक में hi मुझे माँ दिख गयी. उनके पास गांव की दो तीन औरते बैठी हुयी थी.
माँ ने जब मुझे दीदी के साथ वापस आते देखा तो पूछ बैठी की इतना जल्दी खेतो से कैसे आ गए.? तो मैं उन औरतो के सामने कुछ न बोलै. दीदी ने मुझे मेरे कमरे में जाने का इशारा किया तो मैं चुप चाप चला गया.
मेरे इस तरह चले जाने पर माँ हैरानी से दीदी की तरफ देखने लगी. दीदी के चेहरे पर उन्हें कुछ नज़र आया तो उन्होंने दीदी को अंदर जाने को कहा. माँ के कहने पर दीदी भी अंदर आ गयी. थोड़ी hi देर में जब गांव की औरते अपने अपने घर चली गयी तो माँ जल्दी से दीदी के पास आ गयी.
"क्या बात hai...tum दोनों भाई बहन इतनी जल्दी खेतो से कैसे आ गए.? और तुमने अपना ये चेहरा कैसा बना रखा है.? मुझे ऐसा क्यों लगता है जैसे तुम बहुत रोई हो.?" माँ ने जब ऐसा कहा तो दीदी चुप न रह सकीय और वो बिलख बिलख कर रोने लगी. उनके इस तरह रोने लग जाने से माँ को झटका लगा. फिर घबराते हुए दीदी से पूछने लगी की क्या हुआ है.?
दीदी ने मान के पूछने पर रट हुए सारा किस्सा सुना दिया जिसे सुन कर माँ के पैरो टेल से ज़मीन खिसक गयी. काफी देर तक उनके मुख से कोई लफ्ज़ नहीं निकला. उसके बाद वो बहुत ज़्यादा परेशां दिखने लगी और कहने लगी की ये सब ठीक नहीं हुआ. इस सबसे हम बहुत बड़ी मुसीबत में आ गए हैं. पिता जी को पता चलेगा तो वो भी बहुत परेशां हो जायेंगे.
सिचुएशन काफी ज़्यादा ख़राब हो चुकी थी. माँ ने कुछ देर बाद दीदी को अपने कमरे में भेज दिया और वो खुद मेरे पास मेरे कमरे में आ गयी. मैं अपने कमरे में गुमसुम सा बीएड पर चुप चाप बैठा हुआ था. माँ ने मुझे गुमसुम बैठे देखा तो वो मेरे पास आयी और बीएड पर मेरे बगल से hi बैठ गयी.
"क्या ज़रूरत थी बीटा उस नीच इंसान से जुबां लड़ने की.? अगर वो कुछ कह रहा था तो कहने देते. तुम दोनों अपने रास्ते चले जाते. अब बताओ इस सबसे अब जो मुसीबत होने वाली है उसका सामना तेरे पिता जी कैसे करेंगे.? तुझे तो पता hi है की गांव में हमारी क्या अहमियत है उनके बीच. वो लोग तो चाहते hi हैं की हम यहाँ से चले जाये या हमारा अहित हो जाये." माँ ने ऐसा कहा तो मैं कुछ बोल न सका.
"तेरी दीदी ने मुझे बताया की किस वजह से तूने उस सरपंच के लड़के को मार मार कर उसकी हालत खराब की है. मैं ये मानती हु की उसने जो कुछ भी कुसुम को बोलै वो अच्छा नहीं था मगर ऐसे लोगो की तरफ ध्यान नहीं देना चाहिए था तुझे. इस संसार में ऐसे बहुत से लोग मिलेंगे तुझे जो तेरे सामने तेरी बहन को उल्टा सीधा बोलेंगे तो क्या तू उन सब को ऐसे hi मारता फिरेगा.? हमने तो तुझे ऐसे संस्कार नहीं दिए the...fir आज ये कैसे कर दिया तूने.?" माँ ने ये सब समझते हुए मुझसे कहा तो मैंने इस बार माँ की तरफ चेहरा उठा कर देखा.
"उस वक्त मुझे उसकी वो गन्दी बात सुन कर बहुत ज़्यादा गुस्सा आ गया था माँ. इसी लिए मैंने गुस्से में इतना मारा उसे. अब बल्कि मुझे इस बात का अहसास हो रहा है की ये सब कर के मैंने सच में कितनी बड़ी गलती कर दी है. मेरी वजह से पिता जी को गांव में सब के सामने सर झुका के खड़े हो जाना पड़ेगा. मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गयी है माँ. मुझे इसके लिए सजा दीजिये आप." मैंने ऐसा कहा और मेरी आँखों में आशु आ गए. ये देख कर माँ ने मुझे प्यार से चुपके लिया.
"मैं जानती हु की तूने ये सब जान बुझ कर नहीं किया. तेरी जगह कोई भी भाई होता तो वो भी यही करता. जो होना था वो तो हो hi गया है. अब तो बस इस बात की फ़िक्र है की इसका अंजाम क्या होगा.?" माँ ने मेरे सर पर हाथ फेरते हुए कहा तो मैं उनसे अलग हो कर उनकी तरफ देखने लगा.
"क्या आपने पिता जी को इसके बारे में बता दिया है.?" मैंने माँ की तरफ देखते हुए कहा तो माँ ने मुझे देखते हुए अपने सर को न में हिला दिया.
"उन्हें फ़ोन कर के बता दीजिये माँ. कही ऐसा न हो की कुछ ज़्यादा hi गड़बड़ हो जाये. वैसे गांव के जो नीच जाती के लोग हैं वो सब हमारे साथ hi हैं. उन सबने कहा है की वो सब पंचायत में हमारे पक्ष में hi गवाही देंगे." मैंने ऐसा कहा तो माँ कुछ न बोली बस मेरी तरफ देखती रही.
"वो सब तो ठीक hai...lekin तू ये बता की तुझे तो कही चोट वोट नहीं आयी.?" माँ ने ये कहते हुए मेरे जिसम के हर भागो पर देखते हुए कहा.
"नहीं माँ मैं ठीक hu...bal के मेरी मार से रुपेश ज़रूर बुरी तरह घायल हो गया है. उसकी नाक और मुँह से खून निकलने लगा था." मैंने अपना सर झुकाते हुए माँ को बताया तो माँ जाने क्या सोचने लगी.
कुछ देर बाद माँ मुझे कमरे में hi रहने का बोल कर चली गयी. शायद अब वो पिता जी को फ़ोन द्वारा इस सब के बारे में बताने वाली थी. इधर उनके जाने के थोड़ी hi देर बाद मेरे कमरे पर किसी के आने की आहात हुयी.
सॉरी भाई लोग कल रात को hi मैं अपडेट देने वाला था बूत फिर मैं सो गया और मुझे अपडेट देने की बात याद hi नहीं आयी थी.
रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....
कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....