SAB KUCH JAYAZ HAI... - Page 2 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

SAB KUCH JAYAZ HAI...

सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 06

फ्लैशबैक कंटिन्यू....


मैं और कुसुम दीदी घर से खेतो पर जाने के लिए चल पड़े. हमारे खेत हमारे घर से करीब 15 या फिर 20 मिनट की दूरी पर थे. यु तो हमारे पास घर में दो पहिया वाहन में एक मोटर सिक्ले भी थी जो की पिता जी ने मुझे मेरे जन्म दिन के तोहफे में पिछले साल खरीद कर दिया था. खेतो की जुताई के लिए एक ट्रैक्टर भी था हमारे पास. बाकी कार जैसा कोई वाहन नहीं था हमारे पास. पर हम सब इतने में hi बाकी ब्राह्मण समाज वालो से ज़्यादा खुश थे. उनके पास तो दो तीन लोगो के पास hi ये सब था. जब के उनकी तादात काफी ज़्यादा थी.

मैं और कुसुम दीदी घर से पैदल hi खेतो की तरफ चल पड़े थे. मैं दीदी के आगे आगे चल रहा था. गांव की मैं रोड से निकलने के बाद एक कच्चा रास्ता हमारे खेतो की तरफ जाता था. जब के गांव की मैं रोड पर आरसीसी रोड बानी हुयी थी. इधर कच्चे रास्ते के दोनों तरफ काफी सरे खेत थे जो की हमारे नहीं थे. ये रोड के दोनों तरफ के खेत इतर ब्रह्मिनो के थे. इनके बाद कुछ इतर कास्ट के लोगो के खेत पड़ते थे. उसके बाद हमारे खेत आते थे. एक अच्छी बात ये थी की हमारे खेतो के पास से hi एक बड़ी सी नहर निकली हुयी थी जिससे हमें अपने खेतो पर सिचाई करने में बड़ी आसानी होती थी. इतर ब्राह्मण जो हमसे जलते थे वो इस नहर के द्वारा हमारे खिलाफ कुछ नहीं कर सकते थे क्यों की नहर का बहाव हमारे खेतो की तरफ से चलते हुए hi इन लोगो के खेतो की तरफ आता था. अगर इनकी तरफ से हमारे खेतो की तरफ नहर के पानी का बहाव होता तो ये लोग ज़रूर नहर के पानी को बीच से कही बाँधने का काम बहुत पहले hi कर चुके होते.

मैं और कुसुम दीदी आपस में बाते करते हुए कच्चे रास्ते से पैदल hi चल रहे थे. मैं दीदी के साथ खुश तो था hi मगर मैं दीदी को भी खुश देख रहा था. शायद मेरे जैसी hi ख़ुशी उनको भी थी की वो मेरे साथ थी. ऐसा मुझे लगता था. बाकी इसमें कितनी सच्चाई थी ये मैं कह नहीं सकता था.

आरसीसी रोड से इस तरफ मुद कर हम कच्चे रास्ते से चलते हुए काफी आगे तक आ गए थे. तभी मुझे सामने की तरफ से एक मोटर सिक्ले आती हुयी दिखी. मैं दूर से hi मोटर सिक्ले पर चढ़े उस इंसान को पहचान गया जिससे मेरा 36 का आकड़ा था. उस इंसान को देखते hi मेरा अच्छा खासा दिमाग खराब होने लगा. यु तो गांव में मेरी किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी और न hi मैं किसी से कोई लड़ाई झगड़ा करता था. मैं अपने पिता जी के बताये हुए रास्ते पर hi हमेशा चलता था. मगर कहते हैं न की हम कितना भी सोचे की सब अच्छा hi हो मगर ऐसा होता नहीं है.

मोटर सिक्ले से आता हुआ वो इंसान हमारे करीब आ गया था. हम दोनों को देखते hi उसने हमारे सामने अपनी मोटर सिक्ले रोक दी. पहले उसने मेरी तरफ देखा फिर उसकी नज़र कुसुम दीदी पर जैम सी गयी. वो दीदी को ऊपर से नीचे एक देखे जा रहा था. उसकी आँखों में गंदगी भरी हुयी मुझे जल्द hi नज़र आ गयी और इसके साथ hi मेरा खराब दिमाग और भी ज़्यादा खराब हो गया. मैं ये किसी कीमत पर बर्दास्त नहीं कर सकता था की कोई ऐसा घटिया ब्यक्ति मेरी मासूम बहन पर गन्दी नज़र डाले.

"क्यों रे chirkut...aaj तो बड़ा अच्छा आइटम साथ ले कर घूम रहा है. हाय इसे देख कर कुछ कुछ होने लगा है मुझे." उसने दीदी की तरफ देखने के बाद मेरी तरफ कामिनी मुस्कान के साथ देखते हुए कहा तो मेरा पारा एकदम से चढ़ गया.

उसकी इस बात का असर मेरी दीदी पर भी हुआ था. वो एकदम से घबराई हुयी नज़र आने लगी थी. इधर उसकी इस बात से मेरी मुट्ठियाँ कास गयी.

"तमीज से बात कर रुपेश तिवारी. तुझे अच्छी तरह पता है की ये मेरी कुसुम दीदी हैं. इसके बावजूद तूने इस तरह की घटिया बात की. अगर कोई तेरी बहन के बारे में ऐसा बोले तो कैसा लगेगा तुझे.?" मैंने गुस्से में कहा तो रुपेश तिलमिला गया. उसने गुस्से से मेरी तरफ देखा.

"किस्मे इतना डैम है रे चिरकुट जो मेरी बहन के बारे में ऐसा बोले. साले जानता नहीं क्या मुझे.? रुपेश नाम है मेरा. रुपेश तिवारी. जुबां काट के हाथ में दे दूँगा अगर कोई मेरी बहन के बारे में कुछ बोलै तो." उसने आँखे दिखते हुए मुझसे ऐसा कहा तो मैं आगे बढ़ा.

"आग लगी न तुझे.? अब तू खुद सोच की तेरे ऐसा बोलने पर मुझे कितनी आग लगी होगी. मैं तेरी तरह गंदे खयालो का नहीं हु और न hi मैं तुझसे कोई लड़ाई करना चाहता हु. मेरे माँ बाप ने मुझे ऐसे संस्कार दिए hi नहीं हैं की मैं किसी की माँ बहनो के बारे में ऐसे गंदे लफ्ज़ बोलू." मैंने जब उसके करीब जा कर ऐसा कहा तो उसने अपना हाथ मेरी तरफ ऐसे अंदाज़ में किया जैसे मुझे रुक जाने का संकेत दे रहा हो.

"ज़्यादा भाषण मत दे मुझे. सेल तेरी और तेरे बाप की औकात hi क्या है जो हमसे जुबां लड़ने की हिम्मत कर सके. तुम सालो गन्दी नाली के कीड़े हो. भूल गया क्या की तेरे जैसे गिरे हुए लोगो के घर का हम लोग पानी तक नहीं पिटे." उसने कामिनी मुस्कान के साथ ऐसा कहा तो मुझे बहुत ज़्यादा गुस्सा आ गया.

"ये सब बर्षो पुराणी कहानी है रुपेश. जिसने किया वो तो कब का मर चूका है. आज के वक्त में ये सब कोई नहीं देखता. ये सब नियम कानून इंसानो ने अपने मतलब के लिए बनाये थे. वर्ण बड़े बड़े धर्म ग्रंथो को खोल के देख लो. ऐसे बहुत से एक्साम्प्ले मिल जायेगे तुझे जिसमे बड़े बड़े महा पुरुषो ने भी नीच जाती की लड़की से ब्याह किया था. उनके वक्त में तो किसी ने कोई आपत्ति नहीं जताई थी. बल के उनके उस काम से उनका यश hi हुआ tha....aur रही औकात की बात तो सारा गांव जनता है की हमारी औकात तुम लोगो की औकात से कितनी बेहतर है. इस लिए तू भी ज़्यादा उड़ मत. मैं तेरे मुँह नहीं लग्न चाहता. इस लिए तू जा यहाँ से अपना रास्ता नाप." मैंने उससे ऐसा कहा तो उसका जैसे खून खौल गया.

"सेल तेरी इतनी हिम्मत की मुझसे जुबां ladaye...ruk अभी तुझे बताता हु मैं." वो ये कहते हुए मोटर सिक्ले से एक झटके में निचे उतर आया. ये देख कर कुसुम दीदी और भी ज़्यादा घबरा गयी. वो दौड़ कर मेरे पास आ गयी और मेरा हाथ पकड़ कर पीछे की तरफ खींचने लगी.

"Vicky..chal यहाँ se...tujhe किसी से बात ज़ुबानी करने की या लड़ाई करने की कोई ज़रूरत नहीं है. उसे जो बोलना है बोलने दे. तू चल यहाँ se....pita जी को पता चलेगा तो वो हम पर hi गुस्सा करेंगे." दीदी मुझे ज़बरदस्ती खींच रही थी. इधर रुपेश मोटर सिक्ले से उतर कर मेरे सामने आ खड़ा हुआ था.

रुपेश गांव के सरपंच मणि शंकर तिवारी का इकलौता लड़का था. आगे में मुझसे कुछ hi महीने का बड़ा था. बाकी ब्राम्हीनो में रुपेश का बाप घर से थोड़ा संपन्न था. पिछले कई पंचवर्षीय से वो hi सरपंची का चुनाव जीत रहा था. बहुत hi धूर्त किसम का आदमी था मणि शंकर. रुपेश भी अपने बाप की तरह hi था. रुपेश मणि शंकर की सन्तानो में दूसरे नंबर का था. इसकी एक बड़ी बहन है जिसकी शादी चार साल पहले हो चुकी थी. रुपेश के बाद इसकी तीन बहने और हैं जो इससे छोटी हैं मगर जवान हो चुकी हैं.

"अपने चिरकुट भाई को कहा ले जा रही है मेरी jaan...dar mat...teri वजह से इसके साथ कुछ भी बुरा नहीं करुगा main....magar इसने जो मुझसे जुबां लड़ाई है उसकी कीमत इसके बदले तुझे चुकानी होगी. कीमत बहुत छोटी और आसान है. बस एक बार मुझे अपनी जवानी का रास पिलाना होगा तुझे. उसके बाद मैं तेरे भाई को कुछ नहीं कहुगा. इसे बक्श दुगा मैं." रुपेश ने मेरी दीदी को ये कहा hi था की मैं गुस्से में जलते हुए उस पर टूट पड़ा.

वो मुझसे कुछ hi महीने का बड़ा था. मगर मेरी पर्सनल्टी के सामने उसकी पर्सनल्टी कुछ भी नहीं थी. दुबला पतला था वो. दिन भर गांजा दारु करता था और इतर लौ कास्ट की लड़कियों के साथ गंदे काम करता रहता था. अपने बाप की वजह से वो सबसे ऐसे hi अकड़ कर पेश आता था.

मैंने रुपेश के पेट में खींच के एक लात मारी तो वो पीछे की तरफ अपनी hi मोटर सिक्ले से जा टकराया और भरभरा कर उसी पर गिरता चला गया. उसकी मोटर सिक्ले भी पीछे की तरफ गिर गयी थी. मैंने गुस्से में बहुत तेज़ लात मारी थी उसे. रुपेश का हाल देख कर मेरी दीदी की चील्ह निकल गयी. मगर मैं नहीं रुका. आगे बढ़ कर मैंने रुपेश को उसके कॉलर से पकड़ कर उठाया और फिर दे दाना दान उस पर लात घुसे बरसता चला गया. वो बुरी तरह चीखे जा रहा था और गन्दी गन्दी गालिया दे रहा था.

कुसुम दीदी मुझे इस तरह रुपेश को मारते देख कर बुरी तरह रोये जा रही थी. मुझे पीछे से पकड़ कर अपनी पूरी ताकत से खींच रही थी मगर मैं इस वक्त अपने आप पर नहीं था. रुपेश ने मेरी दीदी को उतनी बड़ी बात कही थी जो मुझसे किसी भी तरह बर्दास्त नहीं हो रही थी. मुझे लग रहा था की मैं अभी इसी वक्त रुपेश नाम के इस घटिया इंसान का खून कर दू.

थोड़ी hi देर में रुपेश को मैंने मारते मारते अधमरा कर दिया. उसमे अब उठने की हिम्मत नहीं बची थी. वो ज़मीन पर पड़ा बुरी तरह दर्द से कराह रहा था और उसके मुख से नाक से खून बाह रहा था.

अभी मैं उसको और मारता मगर तभी कुसुम दीदी मेरे सामने आयी और रट हुए मेरे गालो पर थप्पड़ बरसाने लगी.

"ये तूने क्या किया vicky...tu ऐसा कैसे किसी के साथ कर सकता है.? तुझे हम सब का ख़याल कैसे न रहा.? ये लोग हमें अब जीने नहीं देंगे." जाने क्या क्या कहती हुयी दीदी मुझे मारे जा रही थी और मैं एक डैम से सुन्न सा पद गया था.

दीदी को भी होश नहीं था. उन्हें इस बात का अहसास hi नहीं था की वो रट हुए मेरे गालो पर थप्पड़ बरसाए जा रही हैं और मेरे दोनों गाल लाल सुर्ख पड़ते जा रहे हैं.

"बस करो bitiya...vicky बाबू को और मत मारो." तभी हमारे पीछे से किसी ने ऐसा कहा तो दीदी का मारना एक डैम से बंद हो गया. हम दोनों ने hi पलट कर उस तरफ देखा तो चौंक पड़े.

हमारे चारो तरफ काम से काम 8 या 10 आदमी और औरत खड़े थे. वो सब हमारी तरफ hi देख रहे थे. ये सरे लोग हमारे hi गांव के थे जो सड़क के दोनों तरफ खेतो पर कही काम में लगे हुए थे. यहाँ पर ये सब होता देख ये लोग शायद यहाँ पर भागते हुए आ गए थे. ये सब के सब इतर लौ कास्ट के लोग थे. कुछ ठाकुर थे और कुछ नीच जाती के.

"Kaka...Dekhiye न विक्की ने ये क्या गज़ब कर दिया.? इसने सरपंच काका के लड़के पर हाथ उठाया और उसकी ये हालत कर दी. इसने ज़रा सा भी नहीं सोचा की इसके ऐसा करने से हम पर कितनी बड़ी मुसीबत आ जाएगी. आप सब तो जानते hi हैं की सरपंच काका कैसे हैं." कुसुम दीदी ने रट हुए उस आदमी से कहा जिसने दीदी को आ कर मुझे मारने से रोका था.

इधर मैं अब एक डैम से शांत खड़ा रह गया था. ये मेरी लाइफ में पहली बार हुआ था की मैं किसी पर इस हद तक गुस्सा हुआ था और उसे इतना मारा था. मैं अपने आप पर अब हैरान था की मैंने ये सब कैसे कर दिया. अब मुझे भी सिचुएशन की गंभीरता का अहसास हो रहा था और मैं इस सबसे अब अंदर hi अंदर घबराये जा रहा था.

मुझे सबसे ज़्यादा फ़िक्र पिता जी की थी. मैं जनता था की गांव के बाकी सभी ब्राह्मण मेरे पिता जी से बहुत जलते थे. सामने भले hi वो है कर और ख़ुशी से बोले मगर मन में उन लोगो के अंदर हमेशा कटुता hi रहती थी.

"ये तो सच मच गज़ब hi हो गया है बिटिया. विक्की बाबू को रुपेश बाबू के साथ ऐसा नहीं करना चाहिए था. सरपंच जी को पता चला तो समझो अनर्थ हो जायेगा. मगर ये सब हुआ कैसे विक्की बाबू.?" उस आदमी ने मेरी तरफ देखते हुए पूछा तो मैं कुछ बोल नहीं सका. मैं बोलने की हालत में था hi नहीं. मेरे अंदर तो जैसे विचारो का कोई तूफ़ान चल रहा था. मैं अंदर से बहुत ज़्यादा घबरा गया था. मुझे अपनी नहीं बल के पिता जी की फ़िक्र हो रही थी. आज इस काण्ड से उस ब्राह्मण समाज को मेरे पिता जी पर ऊँगली उठाने का और कुछ भी बोलने का मौका मिल जायेगा.

मैं जनता था की इस सबके बाद पिता जी उन लोगो के सामने अपना सर झुकाये खड़े रह जायेंगे. ये सब मेरी वजह से हुआ था. आज मेरी वजह से मेरे सज्जन और सुशील स्वभाव पिता जी को शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी. ये सब सोचते हुए मेरी आँखों से आँशु बाह चले. मेरा जी चाहा की यही पर ज़मीन फाटे और मैं उसमे समां जाओ.

"बात चाहे जो भी रही हो मंगल मगर मुझे यकीन है की इसमें विक्की बाबू की पहली गलती नहीं रही होगी. हम सब जानते हैं की विक्की बाबू ऐसा किसी के साथ कर hi नहीं सकते. मुझे पूरा यकीन है की रुपेश बाबू ने hi कुछ उल्टा सीधा काम किया होगा जिसकी वजह से ये सब हुआ है." एक दूसरा आदमी हमारे पास आते हुए काका से कहा तो दीदी ने उसकी तरफ देखा और फिर मेरी तरफ. न वो कुछ बोली और न hi मैं.

"ये तो मैं भी जनता हु laakhan...mujhe भी यकीन है की इसमें विक्की बाबू का कोई दोष नहीं होगा. ज़रूर रुपेश बाबू ने hi इनसे कुछ उल्टा सीधा कहा होगा. मगर बात भले hi चाहे जो ho...ye जो भी हुआ है अच्छा नहीं हुआ है. सरपंच जी को पता चला तो बहुत बड़ा हंगामा हो जायेगा." मंगल काका ने कहा तो दीदी का चेहरा फक्क पड़ता चला गया.

"पता तो चलेगा hi mangal...mujhe तो दर लग रहा है की इस सब की वजह से गांव में बहुत बड़ा बखेड़ा न हो जाये. विक्की बाबू के साथ साथ महेश बाबू पर भी मुसीबत आ जाएगी." लाखन काका ने कहा तो मेरे अंदर दर की एक लहार दौड़ती चली गयी.

"ये सब छोडो और ये सोचो की हमें करना क्या chahiye...ham सब ने देखा है ये सब कुछ." एक तीसरे आदमी ने कहा तो मैंने और दीदी ने उसकी तरफ देखा.

"कहना क्या चाहते हो तुम जग्गू.?" मंगल काका ने उसकी तरफ देख कर कहा.

"यहाँ जो कुछ भी हुआ hai...uske बाद ये तो पक्की बात है की गांव में पंचायत बैठायी जाएगी और पंचायत में सरपंच जी प्रमुख hi होंगे. सारा दोष भले hi रुपेश बाबू का होगा मगर पंचायत के बाकी सब पांच लोग सरपंच जी के पक्ष में hi रहेंगे. उसके बाद क्या निर्णय होगा ये हम सब खुद hi सोच सकते हैं." जग्गू नाम के उस आदमी ने ऐसा कहा तो सब के सब चुप रह गए. कोई कुछ बोल न सका. मैं और दीदी तो चुप चाप खड़े hi रहे.

"जग्गू सही कह रहा hai...sare पंचायत के लोग रुपेश बाबू को hi सही ठहराएंगे और विक्की बाबू को दोषी करार देंगे. मगर भला इसमें कोई कर hi क्या सकता है.? अनर्थ तो अब हो hi गया है." एक चौथे आदमी ने ऐसा कहा तो जग्गू नाम के आदमी ने उसकी तरफ देखा.

"इतना तो हम सब जानते हैं बल्ली काका की गांव के सब ब्राह्मण महेश बाबू के खिलाफ एक जुट हैं. हम सब ये भी जानते हैं की महेश बाबू का स्वभाव बहुत अच्छा hai...wo हम सबको अपना मानते हैं और ज़रूरत के वक्त हमेशा उन्होंने हमारी भारी मदद भी की है. जब के बाकी के सब ब्राह्मण कितने अच्छे हैं ये तुम सब भी जानते हो. ये रुपेश बाबू के बारे में क्या तुम सब नहीं जानते.? बोलो gullu...chhoti मुँह बड़ी baat...ham नीच जाती के हैं मगर हमारी भी कोई इज्जत होती hai...hamare घर की बहु बेतिया क्या कोई कोठे वाली हैं जो इनकी हवस का शिकार होती हैं.?" जग्गू ने जब ऐसा कहा तो सबके बीच ख़ामोशी छ गयी.

"तो तुम कहना क्या चाहते हो जग्गू.?" मंगल ने आगे बढ़ कर कहा तो जग्गू ने उसकी तरफ देखा.

"मैं ये कहना चाहता हु मंगल की हमें इस बारे में महेश बाबू का साथ देना चाहिए. उन्होंने हमेशा हमारी मुश्किल वक्त में मदद की hai...aaj अगर उन पर कोई मुसीबत आने वाली है तो क्या हम उनके लिए इतना नहीं कर सकते..?" जग्गू ने कहा.

"चाहते तो हम सब भी यही हैं जग्गू. मगर हम नीच जाती के हैं. हमारी बात पंचायत में बैठे वो लोग कभी नहीं मानेगे." बल्ली कहा ने कहा तो जग्गू के होठो पर मुस्कान उभर आयी.

"उन्हें मानना पड़ेगा kaka..ham सब लोग अपनी बिरादरी के बाकी सब लोगो को इकठ्ठा करेंगे और फिर सब एक साथ पंचायत में पहुंचेंगे. इतने सरे लोगो को एक साथ देख कर पंचायत के पांच लोग मनमानी नहीं कर पाएंगे. काका गांव से बड़ी बरात नहीं hoti...mana की वो सब ब्राह्मण एक जुट हैं महेश बाबू के खिलाफ मगर हम भी महेश बाबू के साथ hain...aur हमारी तादात भी उनसे ज़्यादा हो जाएगी. इंसान जब अकेला होता है तभी बाकी सब लोग उसको आसानी से घेरने की हिम्मत करते हैं. मगर जब दोनों तरफ बराबरी वाला सवाल हो जाता है तो सामने वाले को घेरने के बारे में फिर सोचना पड़ता है. तुम मेरी बात समझ रहे हो न कहा.?"

"तूने तो कमाल कर दिया रे jaggu...sach मुँह छोटी मुँह बड़ी बात कही है तूने." बल्ली काका ने जब ऐसा कहा तो बाकी सब मुस्कुरा उठे.

"तो तुम सब लोग मेरी बात से सहमत हो न.? अगर सहमत हो तो चलो अभी से हमें अपने काम पर लग जाना चाहिए. वर्ण देर हो गयी तो गज़ब हो जायेगा." जग्गू ने उन सब को चेताया.

"सही कह रहा है तू jaggu...hame जल्द hi सब को इकठ्ठा करना होगा. अभी तो ये बात यही तक hai...bechare महेश बाबू को भी पता नहीं होगा की यहाँ क्या गज़ब हो गया है." लाखन ने कहा तो सब के सब एक साथ इकठ्ठा खड़े हो गए. मैं और दीदी ख़ामोशी से ये सब देख सुन रहे थे.

मैं सोच रहा था की ये लोग कितने अच्छे थे. ये सब अनपढ़ थे मगर इतना ज्ञान तो इन्हे भी था की क्या सही है और क्या गलत. पर सोचने वाली बात थी की ये सब हमारा साथ देने के लिए खुद hi तैयार हो गए थे. सिर्फ इस लिए की इन सबकी नज़रो में मेरे पिताजी एक अच्छे इंसान थे या फिर इनकी नज़रो में महान थे.

"विक्की babu....aap कुसुम बिटिया को ले कर घर चले jaiye...aur हाँ फ़िक्र मत कीजिये. हम सब आपके साथ hain...ham सब जी जान लगा देंगे. हम भी देखते हैं की सरपंच जी और बाकी के सब लोग कैसे आपके साथ और हमारे महेश बाबू के साथ कुछ गलत करते हैं." जग्गू काका ने मुझसे ऐसा कहा तो मेरे चेहरे पर राहत के भाव आये. मैं बोलै कुछ नहीं बस हाँ में सर हिलाया और फिर कुसुम दीदी को साथ ले कर वापस घर की तरफ बढ़ चला.

सारे रास्ते मैं और दीदी चुप hi रहे. दीदी गुमसुम सी नज़र आ रही थी. मेरे मन में भी बहुत सी बाते चल रही थी. मैं सोच रहा था की आगे क्या होगा.? पिता जी को पता चलेगा तो वो क्या कहेंगे.? यही सब सोचते हुए मैं दीदी को लिए घर पहुंच गया.

घर में मेरी माँ और दोनों छोटी बहने थी. पिता जी तो सुबह hi कुछ सामान लेने के लिए शहर की तरफ चले गए थे. मैं और दीदी चुप चाप घर के अंदर आये तो बैठक में hi मुझे माँ दिख गयी. उनके पास गांव की दो तीन औरते बैठी हुयी थी.

माँ ने जब मुझे दीदी के साथ वापस आते देखा तो पूछ बैठी की इतना जल्दी खेतो से कैसे आ गए.? तो मैं उन औरतो के सामने कुछ न बोलै. दीदी ने मुझे मेरे कमरे में जाने का इशारा किया तो मैं चुप चाप चला गया.

मेरे इस तरह चले जाने पर माँ हैरानी से दीदी की तरफ देखने लगी. दीदी के चेहरे पर उन्हें कुछ नज़र आया तो उन्होंने दीदी को अंदर जाने को कहा. माँ के कहने पर दीदी भी अंदर आ गयी. थोड़ी hi देर में जब गांव की औरते अपने अपने घर चली गयी तो माँ जल्दी से दीदी के पास आ गयी.

"क्या बात hai...tum दोनों भाई बहन इतनी जल्दी खेतो से कैसे आ गए.? और तुमने अपना ये चेहरा कैसा बना रखा है.? मुझे ऐसा क्यों लगता है जैसे तुम बहुत रोई हो.?" माँ ने जब ऐसा कहा तो दीदी चुप न रह सकीय और वो बिलख बिलख कर रोने लगी. उनके इस तरह रोने लग जाने से माँ को झटका लगा. फिर घबराते हुए दीदी से पूछने लगी की क्या हुआ है.?

दीदी ने मान के पूछने पर रट हुए सारा किस्सा सुना दिया जिसे सुन कर माँ के पैरो टेल से ज़मीन खिसक गयी. काफी देर तक उनके मुख से कोई लफ्ज़ नहीं निकला. उसके बाद वो बहुत ज़्यादा परेशां दिखने लगी और कहने लगी की ये सब ठीक नहीं हुआ. इस सबसे हम बहुत बड़ी मुसीबत में आ गए हैं. पिता जी को पता चलेगा तो वो भी बहुत परेशां हो जायेंगे.

सिचुएशन काफी ज़्यादा ख़राब हो चुकी थी. माँ ने कुछ देर बाद दीदी को अपने कमरे में भेज दिया और वो खुद मेरे पास मेरे कमरे में आ गयी. मैं अपने कमरे में गुमसुम सा बीएड पर चुप चाप बैठा हुआ था. माँ ने मुझे गुमसुम बैठे देखा तो वो मेरे पास आयी और बीएड पर मेरे बगल से hi बैठ गयी.

"क्या ज़रूरत थी बीटा उस नीच इंसान से जुबां लड़ने की.? अगर वो कुछ कह रहा था तो कहने देते. तुम दोनों अपने रास्ते चले जाते. अब बताओ इस सबसे अब जो मुसीबत होने वाली है उसका सामना तेरे पिता जी कैसे करेंगे.? तुझे तो पता hi है की गांव में हमारी क्या अहमियत है उनके बीच. वो लोग तो चाहते hi हैं की हम यहाँ से चले जाये या हमारा अहित हो जाये." माँ ने ऐसा कहा तो मैं कुछ बोल न सका.

"तेरी दीदी ने मुझे बताया की किस वजह से तूने उस सरपंच के लड़के को मार मार कर उसकी हालत खराब की है. मैं ये मानती हु की उसने जो कुछ भी कुसुम को बोलै वो अच्छा नहीं था मगर ऐसे लोगो की तरफ ध्यान नहीं देना चाहिए था तुझे. इस संसार में ऐसे बहुत से लोग मिलेंगे तुझे जो तेरे सामने तेरी बहन को उल्टा सीधा बोलेंगे तो क्या तू उन सब को ऐसे hi मारता फिरेगा.? हमने तो तुझे ऐसे संस्कार नहीं दिए the...fir आज ये कैसे कर दिया तूने.?" माँ ने ये सब समझते हुए मुझसे कहा तो मैंने इस बार माँ की तरफ चेहरा उठा कर देखा.

"उस वक्त मुझे उसकी वो गन्दी बात सुन कर बहुत ज़्यादा गुस्सा आ गया था माँ. इसी लिए मैंने गुस्से में इतना मारा उसे. अब बल्कि मुझे इस बात का अहसास हो रहा है की ये सब कर के मैंने सच में कितनी बड़ी गलती कर दी है. मेरी वजह से पिता जी को गांव में सब के सामने सर झुका के खड़े हो जाना पड़ेगा. मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गयी है माँ. मुझे इसके लिए सजा दीजिये आप." मैंने ऐसा कहा और मेरी आँखों में आशु आ गए. ये देख कर माँ ने मुझे प्यार से चुपके लिया.

"मैं जानती हु की तूने ये सब जान बुझ कर नहीं किया. तेरी जगह कोई भी भाई होता तो वो भी यही करता. जो होना था वो तो हो hi गया है. अब तो बस इस बात की फ़िक्र है की इसका अंजाम क्या होगा.?" माँ ने मेरे सर पर हाथ फेरते हुए कहा तो मैं उनसे अलग हो कर उनकी तरफ देखने लगा.

"क्या आपने पिता जी को इसके बारे में बता दिया है.?" मैंने माँ की तरफ देखते हुए कहा तो माँ ने मुझे देखते हुए अपने सर को न में हिला दिया.

"उन्हें फ़ोन कर के बता दीजिये माँ. कही ऐसा न हो की कुछ ज़्यादा hi गड़बड़ हो जाये. वैसे गांव के जो नीच जाती के लोग हैं वो सब हमारे साथ hi हैं. उन सबने कहा है की वो सब पंचायत में हमारे पक्ष में hi गवाही देंगे." मैंने ऐसा कहा तो माँ कुछ न बोली बस मेरी तरफ देखती रही.

"वो सब तो ठीक hai...lekin तू ये बता की तुझे तो कही चोट वोट नहीं आयी.?" माँ ने ये कहते हुए मेरे जिसम के हर भागो पर देखते हुए कहा.

"नहीं माँ मैं ठीक hu...bal के मेरी मार से रुपेश ज़रूर बुरी तरह घायल हो गया है. उसकी नाक और मुँह से खून निकलने लगा था." मैंने अपना सर झुकाते हुए माँ को बताया तो माँ जाने क्या सोचने लगी.

कुछ देर बाद माँ मुझे कमरे में hi रहने का बोल कर चली गयी. शायद अब वो पिता जी को फ़ोन द्वारा इस सब के बारे में बताने वाली थी. इधर उनके जाने के थोड़ी hi देर बाद मेरे कमरे पर किसी के आने की आहात हुयी.

सॉरी भाई लोग कल रात को hi मैं अपडेट देने वाला था बूत फिर मैं सो गया और मुझे अपडेट देने की बात याद hi नहीं आयी थी.

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....
 
भाई लोग कैसे हो....

इतना कतयीय & इनोसेंट कौन..?? मेरा एक भतीजा है 2 साल का. मैंने आज उससे पूछा की क्या खाया है aaj...to कहता है चावल Roti....maine कहा यार ये कैसा कॉम्बिनेशन है.??

मैंने तो दाल चावल, दाल रोटी, रोटी सब्जी, ेट्स. जैसा कॉम्बिनेशन hi सुना था. साला ये कैसा कॉम्बिनेशन है..???

भाई लोग इस साइट पर इतना सारा मेंबर है मगर दीखते कुछ लोग hi हैं....

यारा कमेंट करो सब चाहे अच्छा हो या बुरा. अच्छा अच्छा रिव्यु किधर से आता है....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....
 
भाई लोग आप सबको दशहरा की मुबारकबाद....

:flowers2::flowers::flowers2::flowers::flowers2::flowers::flowers2:

यारा दशहरे की वजह से मैंने अपडेट लिखा hi नहीं. दुकानदारी भी देखनी है न भाई. कल अपडेट पक्का दुगा. एक बात और अब से हप्ते में 2 या 3 hi अपडेट दुगा....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 07

फ्लैशबैक कंटिन्यू....


मणि शंकर तिवारी 52 साल का माध्यम कद का इंसान था. उसका रूप रंग कला तो नहीं था मगर साफ़ भी नहीं था. सर पर जो बाल थे वो किनारे किनारे पर hi बचे थे बाकी वो तकला hi था. चेहरे पर बड़ी बड़ी मुछे रखता था वो. पेट बाहर को निकला हुआ था. पिछले 15 सालो से गांव का सरपंच बनता आया था. दूसरा कोई क्तिड़ते उसके खिलाफ खड़ा तो होता था मगर कभी चुनाव जीत नहीं पता था. इसकी वजह ये थी की एक तो वो खुद भी बहुत धूर्त और जालसाज़ था दूसरे उसने कुछ ऐसे आदमी भी पाल रखे थे जो लोगो को डरने धमकाने का काम भी करते थे.

ब्राह्मण समाज में सबसे संपन्न मणि शंकर तिवारी hi था. सर्कार का जो भी पैसा गांव के विकास के लिए आता था वो सब पैसा वो खुद hi निगल जाता था. उसके खिलाफ कोई आवाज़ नहीं उठता था. इतर लौ कास्ट के लोग तो उसके शिकार थे hi साथ hi सामान्य वर्ग भी उससे परेशां था. उसकी पहुंच प्रदेश के मंत्री विधायक तक थी. पुलिस वालो से उसकी अच्छी साथ गाठ थी.

मणि शंकर औरतो का रसिया था. ये हर कोई जनता था. पैसो के बल पर और ताकत के बल पर वो गांव की बहु बेटियों को बड़ी सफाई से अपने जाल में फसता और फिर उनको बड़े बड़े लोगो को परोस कर अपना काम निकाल लेता था.

इस वक्त मणि शंकर पड़ोस के गांव में था. पड़ोस के गांव के सरपंच के यहाँ वो कल शाम को आया था. पड़ोस के गांव का जो सरपंच था वो मणि शंकर का पक्का यार था. उम्र में वो मणि शंकर से 2 साल बड़ा था. उसके दो बच्चे थे. जिन में एक बड़ी बेटी थी जो शादी शुदा थी और एक बीटा था जो अपने परिवार के साथ कही बाहर रह कर नौकरी करता था. घर पर वो अकेला hi रहता था. उसकी बीवी कुछ साल पहले सांप के डसने से मर गयी थी. दोनों वक्त का खाना पीना बनाने के लिए एक औरत आती थी. वो औरत इसी गांव की थी और रिश्ते में मणि शंकर के दोस्त की साली लगती थी.

उस सरपंच के बारे में अफवाहे कई साडी थी मगर उन अफवाहों से उसे कोई फर्क नहीं पड़ता था. मणि शंकर इस वक्त अपने यार के साथ नास्ता करने बैठा हुआ था. कल रात वो यही रुका था. दोनों ने 8 बजे तक उस औरत के साथ मज़ा लूटा था उसके बाद वो औरत अपने घर चली गयी थी. सुबह हुयी तो 8 बजे वो फिर से आ गयी थी और इस वक्त उसी के द्वारा बनाया हुआ ये दोनों नास्ता कर रहे थे.

"क्या देख रहा है.?" मणि शंकर के यार ने मणि शंकर की तरफ देखते हुए कहा और मुस्कुराया. मणि शंकर बार बार रसोई की तरफ देखने लगता था.

"यार narayan...mera मन अभी भरा नहीं है." मणि शंकर ने आह सी भरते हुए कहा तो नारायण उसकी बात सुन कर है पड़ा.

"अगर ऐसी बात है तो जा fir...aur भर ले अपना मन." नारायण ने रसोई की तरफ एक नज़र डालते हुए कहा तो मणि शंकर के चेहरे पर चमक आ गयी.

"पर इस बार मैं अकेले hi karuga...tu बाद में अपना काम कर लेना." मणि शंकर ने नारायण से कहा तो नारायण ने सहमति में अपना सर हिला दिया.

नारायण की हाँ सुनते hi मणि शंकर ने नास्ते का आखिरी निवाला खाया और फिर हाथ मुँह धो कर उठ गया. गीले हाथो को अपने गमछे से पोछते हुए वो रसोई की तरफ बढ़ चला. उधर नारायण मणि शंकर को जाता देख मुस्कुराया और हाथ मुँह धो कर बाहर बैठक की तरफ निकल गया.

रसोई में जो औरत थी वो रोटियां बना रही थी. यही से वो गरम गरम रोटियां ले कर नारायण और मणि शंकर की थाली में रख आती थी. ये औरत इसी गांव की थी. ये भी ब्राह्मण hi थी. रिश्ते में ये नारायण की साली लगती थी. नारायण की बीवी इसकी बड़ी बहन थी. इसका नाम सविता था. 40 साल की उम्र की थी. 22 साल पहले शादी हुयी थी मगर आज तक कोई औलाद न हुयी थी इसके. सविता का पति खेती बाड़ी का काम करता है. उसका स्वभाव बहुत hi भोला टाइप का है. सविता के खानदान में दूसरा और कोई नहीं था. नारायण सविता की वजह से उसकी काफी मदद करता रहता है.

सविता कोई रंडी टाइप की तो नहीं थी मगर अब के समय में वो नारायण के इशारे पर उसकी रंडी ज़रूर बन जाती थी. इसकी वजह ये थी की एक बार सविता का पति बहुत ज़्यादा बीमार पद गया था. इलाज़ में बहुत सरे पैसे खर्च हो गए थे. यहाँ तक की सविता के जो जेवर थे वो भी बिक गए थे मगर इसके बाद भी सविता के पति की तबियत में सुधार न आया था. ज़मीन बेचने की नौबत आयी तो वो नारायण के पास इस बारे में बात करने आयी. नारायण की बीवी हमेशा अपनी छोटी बहन की मदद किया करती थी इस लिए नारायण भी कर रहा था. मगर जब ज़मीन बेचने की बात आयी तो नारायण ने उसे समझाया की वो ज़मीन न बेचे वर्ण खायेगी क्या.?

नारायण को एक औरत की ज़रूरत थी. अपने घर में वो अकेला hi रहता था. उसका बीटा अपने परिवार को लिए बाहर रहता था. नारायण ने सविता को तरीके से इस बारे में समझाया और ये भी कहा की वो उसकी मज़बूरी का फायदा नहीं उठा रहा hai..bas ये उसकी ज़रूरत है. अगर उसे मंजूर हो तो ठीक है.

सविता ने सोचने में दो दिन का समय लिया और फिर उसने नारायण की बात मान लेना hi ठीक समझा. तब से यही सिलसिला चल रहा था. सविता के पति को सब पता था मगर उसे ये नहीं पता था की उसकी बीवी नारायण को अपनी इज्जत भी देती है. वो भोला भला था. नारायण उसे अपने कण्ट्रोल में hi रखता था.

मणि शंकर रसोई में पंहुचा और फिर उसने पीछे से सविता को अपनी बाहो में भर लिया. सविता अचानक हुयी इस हरकत से दर गयी थी मगर फिर जब उसने देखा की माजरा क्या है तो उसके होठो पर मुस्कान उभर आयी.



images




"क्या बात है जीजा ji...ab क्या सुबह भी शुरू होने का इरादा है.?" सविता मणि शंकर को भी नारायण की तरह जीजा जी hi कहती थी.

"क्या करे rani...tum हो hi ऐसी की मन नहीं भरता. कल शाम को दो बार किया था मगर फिर भी मन नहीं भरा." मणि शंकर ने ऐसा कहा तो सविता खिल खिला कर है पड़ी.

"अच्छा ji...chaliye ठीक है मगर पहले मुझे खाना तो बना लेने दीजिये. उसके बाद आपके पास आती हु. फिर जो करना हो कर लीजियेगा." सविता ने ऐसा कहा तो मणि शंकर ने सविता के दोनों तरफ से हाथ दाल कर उसकी बड़ी बड़ी छतियो को पकड़ कर ज़ोर से मसल दिया.

"आअह्ह्ह्ह sshhhhh....ruk जाइये न जीजा ji..bas कुछ hi देर की तो बात है." सविता के मुख से सिसकी निकल गयी थी. पीछे से उसकी गांड में मणि शंकर का लुंड मनो उसकी साड़ी और पेटीकोट को फाड़ कर अंदर घुसने को तैयार था. सविता खुद भी पीछे की तरफ अपनी गांड को तेल रही थी.

"कुछ देर नहीं रुका जायेगा मेरी छमिया. मैं तो अभी इसी वक्त तुम्हे तबियत से छोड़ना चाहता हु. एक काम karo...yahi पर नंगी हो जाओ. हम यही पर चुदाई कार्यक्रम कर लेंगे." मणि शंकर ने सविता की साडी को एक तरफ से खींचते हुए कहा तो सविता ने हाथ में पकड़ा हुआ बेलन छोड़ दिया.

"बहुत बेसब्री हो जाते हैं जीजा जी आप. क्या दीदी के साथ भी ऐसा hi करते हैं.?" सविता पलट कर कहते हुए मुस्कुरायी तो मणि शंकर ने उसकी साड़ी को पूरी खींच कर नीचे गिरा दिया और अब सविता के ब्लॉउज के बटन खोलने लगा.

"अरे उसमे अब वो बात कहा rani...wo तो अब कचरा हो गयी है. असल माल तो तुम हो मेरी छम्मक छल्लो." मणि शंकर ने कहा तो सविता मुस्कुरा उठी.

मणि शंकर बड़ी जल्दी में लग रहा था. वो सविता के ब्लॉउज को निकलने में लगा हुआ था. सविता खुद कुछ नहीं कर रही थी बल्कि वो आराम से कड़ी थी. उसकी बड़ी बड़ी छातिया उसके ब्लॉउज को फाड़ कर बाहर आने को ब्याकुल थी. सविता का जिसम इस उम्र में भी काफी कैसा हुआ दिख रहा था. सविता गोरी तो नहीं थी मगर सावली भी नहीं थी. उसके जिसम की बनावट किसी भी मर्द के लुंड को खड़ा कर देने के लिए काफी थी.

मणि शंकर ने सविता का ब्लॉउज निकाल कर नीचे साड़ी के ऊपर hi गिरा दिया. अब सविता ऊपर से पूरी तरह नंगी थी. उसने ब्लॉउज के अंदर ब्रा नहीं पहना हुआ था. नीचे पीले रंग का एक पेटीकोट था. सविता का पेट हल्का सा बाहर निकला हुआ था. साफ़ सफ्फाक पेट के हल्का नीचे एक गहरी नाभि थी. ऐसा लगता था जैसे कोई कुआ हो.

मणि शंकर ने एक पल सविता की बड़ी बड़ी छातियों को देखा और फिर मानो उन पर टूट पड़ा. दोनों हाथो से दोनों छातियों को पकड़ कर वह उन्हें ज़ोर ज़ोर से मसलते हुए बरी बरी से उनको चूमने चाटने लगा. सविता के जिसम में मज़े की लहार दौड़ पड़ी. उसके मुख से मीठी मीठी सी सिसकारियां निकलने लगी. अपनी छतियो पर वो मणि शंकर के सर को पकड़ कर दबाने लगी.

मणि शंकर पागल कुत्ते की तरह सविता की छतियो को चूम चाट रहा था. किसी किसी पल तो वो उनको मुँह में भर कर काट भी लेता था. जिससे सविता की दर्द भरी आहे निकल जाती थी. रसोई में वासना से भरी सिसकारियां गूंजने लगी.

मणि शंकर ने सविता की छातियों से अपना मुँह हटाया और फिर नीचे की तरफ जाने लगा. पेट पर चूमते हुए वो उसकी नाभि पर आ गया. नाभि में उसने अपना पूरा मुँह hi घुसेड़ दिया. मणि शंकर अपने एक हाथ से सविता की छतियो को बुरी तरह मसलता जा रहा और एक हाथ से उसकी गांड को.

कुछ देर नाभि पर चूमते हुए वो अपने एक हाथ से सविता के पेटीकोट को उसकी जांघो तक उठा कर जांघो पर अपनी जीभ से चाटने लगा. सविता मज़े में थी. उसकी साँसे काफी चढ़ गयी थी. उससे खड़े रहना मुश्किल पद रहा था.

सविता के पेटीकोट को पूरा ऊपर उठा कर मणि शंकर ने अंदर उसकी छूट पर अपना मुँह दाल दिया. सविता की छूट पर हलके बाल थे शायद उसने कुछ दिन पहले hi अपनी छूट के बाल साफ़ किये जो अब फिर से उग आये थे. मणि शंकर किसी कुत्ते की तरह जीभ निकाल सविता की छूट को छाते जा रहा था. उसके इस तरह चाटने से सविता का जिसम बुरह हिलने लगा था. वो अपने दोनों हाथो से मणि शंकर के सर को पकड़ कर अपनी छूट पर दबाने लगी थी.

कुछ देर सविता की छूट चाटने के बाद मणि शंकर ने अपना मुँह निकला और जल्दी जल्दी पेटीकोट का नाडा खोलने लगा. नाडा खुला तो पेटीकोट सरक कर निचे गिर गया. अब सविता पूरी तरह नंगी हो गयी थी.

मणि शंकर जल्दी से खड़ा हुआ और अपना सफ़ेद पजामा खोलने लगा. पजामा उतार कर उसने उसे एक तरफ रखा. पजामा के अंदर उसने एक बड़ा सा कच्चा पहन रखा था. जल्द hi उसने उस कच्चे का नाडा खोला और उसे भी उतार कर एक तरफ रख दिया. मणि शंकर अब नीचे से नंगा था. उसका कला लुंड नीचे झूल रहा था.

"रानी इसे जल्दी से तैयार करो." मणि शंकर ने अपने लुंड को एक हाथ से सहलाते हुए कहा तो सविता ने नीचे देखा और फिर घुटनो पर बैठ गयी. बैठने के बाद उसने अपने एक हाथ से मणि शंकर के आधे खड़े लुंड को पकड़ा और उसे मुट्ठियों में ले कर ऊपर नीचे करने लगी. उधर मणि शंकर ने अपना सफ़ेद कुरता उतार कर एक तरफ रख दिया.

रसोई में दोनों hi पूरी तरह नंगे थे. सविता ने थोड़ी देर उसके लुंड को ऊपर निचे किया उसके बाद उसने उसे अपने मुँह में भर लिया. जैसे hi उसने लुंड को मुँह में लिया इधर मणि शंकर के जीएम में मज़े की लहार दौड़ गयी. उसने सविता के सर को पकड़ लिया और उसे अपने लुंड की तरफ खींचने लगा. सविता बड़े आराम से लुंड को मुँह में ले कर अंदर बाहर कर रही थी. बीच बीच में वो अपने एक हाथ से मणि शंकर के अंडकोषों को भी सहला देती थी.

मणि शंकर सविता के सर को पकडे अपनी गांड को आगे पीछे करने लगा. उसकी आँखे मज़े में बंद थी और उसका चेहरा ऊपर की तरफ हो गया था. वो अपने लुंड को सविता के मुख में पूरा दाल रहा था. थोड़ी hi देर में उसका लुंड खड़ा हो गया तो सविता ने उसे मुँह से निकाल दिया.

मणि शंकर ने सविता की तरफ देखा और फिर उसकी बड़ी बड़ी छतियो को कुछ देर ज़ोर ज़ोर से मसला और फिर उसने सविता को नीचे ज़मीन पर लेटने को कहा तो सविता लेट गयी. सविता के लेटते hi मणि शंकर सविता की दोनों टांगो के बीच आया और उसकी दोनों टांगो को पकड़ कर अपने कंधे पर रख कर अपने लुंड को उसकी छूट में सेट किया.

छूट के मुहाने पर लुंड को सेट करने के बाद मणि शंकर ने ज़ोर से धक्का मारा तो एक hi बार में उसका पूरा लुंड सविता की पनियाई हुयी छूट में अंदर तक चला गया. छूट के अंदर तक लुंड जाते hi सविता के मुख से मज़े में डूबी हुयी सिसकी निकल गयी. मणि शंकर ने सविता की छूट में लुंड डाले डाले hi सविता के ऊपर झुका और फिर उसकी दोनों बड़ी बड़ी छातियों को बरी बरी से चुभलाते हुए अपनी कमर को आगे पीछे करने लगा.

रसोई में दोनों नीचे ज़मीन पर पूरी तरफ नंगे काम वासना में लगे हुए थे. मणि शंकर अधेड़ उम्र का हो चला था मगर उसमे जान बाकी थी अभी. वो पूरी ताकत से धक्के लगा रहा था. उसके हर धक्के पर सविता की मानो हिचकी निकल जाती थी और उसकी बफी बड़ी छातिया हिलने लगती थी. सविता बहुत गरम हो चुकी थी और मज़े से उसकी आँखे बंद थी. मुख से आनंद भरी सिसकारियां लेते हुए वो अपने दोनों हाथो को मणि शंकर की पीठ पर रख अपनी तरफ खींचे जा रही थी.

मणि शंकर दे दाना दान धक्के मरे जा रहा था और सविता की बड़ी बड़ी छतियो को दोनों हाथो से मसलता भी रहा था. थोड़ी देर बाद मणि शंकर ने सविता की छूट से अपना लुंड निकाल लिया तो सविता ने झट से आँखे खोल कर उसे देखा. इधर मणि शंकर लुंड निकलने के बाद सविता को घोड़ी बनने का इशारा कर रहा था. उसका ये इशारा पाते hi सविता मुस्कुरायी और फिर जल्दी से उठ कर घोड़ी बन गयी.

घोड़ी बानी सविता के पीछे आ कर मणि शंकर ने अपने गीले लुंड को फिर से सविता की छूट में एक hi बार में उतार दिया और फिर अपने दोनों हाथो से सविता के भरी नितम्बो को पकड़ कर धक्के लगाने लगा.

करीब 15 मिनट मणि शंकर के धक्के लगाने के बाद अचानक hi सविता तेज़ तेज़ आवाज़े मुख से निकलने लगी. वो अपनी भरी गांड को मणि शंकर के लुंड पर पीछे की तरफ ज़ोर ज़ोर से ठेलने लगी. मणि शंकर खुद भी बुरी तरह साँसे लेते हुए धक्के मारे जा रहा था. थोड़ी hi देर में दोनों एक साथ hi सातवे आसमान में पहुंचे और फिर नीचे ज़मीन पर गिर पड़े.

कुछ देर तक दोनों ऐसे hi गुत्थम गुत्था पड़े रहे उसके बाद मणि शंकर उठा और अपने लुंड को पास hi में पड़ी सविता की साड़ी से पोंछने लगा. लुंड पोंछने के बाद उसने एक बार सविता के गालो पर और उसके होठो पर चूमा फिर सविता की बड़ी बड़ी छातियों को बरी बरी से मसलने के बाद वो मुस्कुराते हुए रसोई से बाहर चला गया.

कपडे पहन कर मणि शंकर जब बाहर बैठक में आया तो नारायण को बेंच पर बैठे पाया. सामने एक टेबल पर कुछ फाइल्स खुली हुयी थी जिन्हे वो देख रहा था. मणि शंकर को आया देख वो मुस्कुराया तो मणि शंकर भी मुस्कुराया और उसके बगल से hi बैठ गया.

"तो मन भर गया न तेरा या अभी भी कसार बाकी है कुछ.?" नारायण ने ऐसा कहा तो मणि शंकर ज़ोर से हँसा और फिर अपने कुर्ते की जेब से अपना मोबाइल निकला. मोबाइल के लाल बटन पर अंगूठा रखा उसने मगर मोबाइल की स्क्रीन जाली नहीं.

"लगता है इसकी बैटरी चूक गयी है यार. ला दे अपना charger...main थोड़ी देर इसे चार्ज कर लू फिर निकलता हु. वैसे भी बहुत देर हो गयी है मुझे." मणि शंकर ने ऐसा कहा तो नारायण ने पीछे दिवार पर बानी एक छोटी सी अलमारी से चार्जर निकल कर मणि शंकर को पकड़ा दिया.

"सेल जैसे तू डिस्चार्ज हो के आया है वैसे hi तेरा ये मोबाइल भी डिस्चार्ज हो गया है." नारायण ने हस्ते हुए कहा तो मणि शंकर भी है पड़ा. उसके बाद उसने चार्जर को बिजली के स्विच में लगा कर मोबाइल उसमे लगा दिया.

"वैसे ये तेरे सोचने का नजरिया है narayan...warna मुझे तो ऐसा लग रहा है की तेरी साली को तबियत से छोड़ने के बाद मैं और भी ज़्यादा चार्ज हो गया हु." मणि शंकर ने मुस्कुराते हुए ऐसा कहा तो नारायण ज़ोर से है पड़ा.

"अगर ऐसा है तो जा fir...ek बार और उसे तबियत से छोड़ le...tab तक तेरा ये मोबाइल भी चार्ज हो जायेगा." नारायण ने कहा तो मणि शंकर मुस्कुरा पड़ा.

"मुझे कोई दिक्कत नहीं है मगर सोचता हु की तेरी साली को क्यों ज़्यादा परेशां करू. कल से बेचारी को रगड़ रहे हैं हम दोनों." मणि शंकर ने कहा और फिर कुर्ते की जेब से बीड़ी का बण्डल निकल कर उससे एक बीड़ी निकली और माचिस से उसे जलाया.

"अच्छा बड़ी फ़िक्र दिखा रहा है उसके लिए. क्या इरादा है तेरा..? देख उसे ले कर कही भाग मत जाना. यहाँ चाहे जितना उससे मज़े ले ले मगर उसे यहाँ से भगा कर ले नहीं जाने दुगा तुझे." नारायण ने मुस्कुराते हुए कहा तो मणि शंकर ज़ोर से हँसा.

"भगा कर ले जाने की क्या ज़रूरत है मुझे.? जिसकी ज़रूरत है वो तो मिल hi रहा है मुझे. खेर छोड़ ये बात... ये बता की उस ज़मीन का क्या हुआ.?" मणि शंकर ने पूछा तो नारायण ने उसकी तरफ देखा.

"ज़मीन मिल तो जाएगी मणि मगर थोड़ी मुश्किल तो है hi. तुझे तो पता hi है की जिसकी वो ज़मीन है उसको मरे हुए एक अरसा हो चूका है. उसका अपना कोई बीटा नहीं था बस एक लड़की थी. जिसका बर्षो पहले ब्याह हो गया था. अब तो उसके बच्चे भी बड़े बड़े honge..ye भी हो सकता है की उसके बच्चो का भी ब्याह हो गया हो." नारायण ने कहा तो मणि शंकर बीच में hi बोल पड़ा.

"ये सब मैं पहले भी सुन चूका हु. तूने कहा था की तू ज़मीन मालिक की बेटी का पता lagwayega...agar वो कही है तो तू उससे बात करेगा और अगर वो कही है hi नहीं तो मामला आसानी से हम खुद hi सुलझा लेंगे." मणि शंकर ने कहा तो नारायण बेंच से उठा और दरवाजे के पास जा कर सविता को चाय के लिए कहा और फिर वापस आ कर बेंच पर बैठ गया.

"मुझे तो लगता है मणि की ज़मीन के मालिक की तरह उसकी बेटी भी कही मर खाप गयी hogi...warna तू खुद सोच की इतने बर्षो में क्या कभी उसे यहाँ आना नहीं चाहिए था अपनी ज़मीन को देखने के लिए.?" नारायण ने कहा तो मणि शंकर चुप रह गया. उसके माथे पर कुछ सोचने वाले भाव दिखे.

"लगता तो मुझे भी ऐसा hi है नारायण. मगर एक बार पता करने में क्या जाता है.? कही ऐसा न हो की ज़मीन को अपना बनाते hi वो कही से टपक पड़े. हम ये नहीं जानते की आज के वक्त में वो किस िस्थित में होगी. अगर वो ज़िंदा है और उसके बच्चे भी हैं तो कुछ भी हो सकता है. किस्मत को कोई नहीं जनता नारायण. मान ले की अगर उसके बच्चे कोई बड़े आदमी निकले तो..??? ज़मीन के असली कागजात भी उसके पास हो सकते hain...sala लम्बे से नपवा सकते हैं वो हमें." मणि शंकर ने कहा तो नारायण भी सोचने लगा.

"चल मैं देखता हु mani...aaj पता करता हु शहर जा कर. कुछ लोगो से बात भी की थी मैंने. देखो क्या नतीजा निकलता है.?" नारायण ने कहा तो मणि शंकर कुछ न बोलै. तभी सविता हाथ में ट्रे लिए आयी. उसने नारायण और मणि शंकर को चाय दी और फिर वापस अंदर चली गयी.

चाय पिने के बाद मणि शंकर ने चार्जिंग पर लगे अपने मोबाइल को उठाया और उसको ों किया. ों होते hi उसमे बहुत सरे सन्देश आये. मणि शंकर ने देखा की मोबाइल में तीन पॉइंट बैटरी चढ़ चुकी है. ये देख कर मणि शंकर ने मोबाइल को चार्जर से निकाल लिया और बेंच से उठ गया.

मणि शंकर बेंच से उठा hi था की उसका मोबाइल बजने लगा. मोबाइल के बजने से मणि शंकर ने मोबाइल की स्क्रीन पर देखा. फ़ोन उसके घर से था. ये देख कर उसने मोबाइल का हरा वाला बटन दबा कर कान से लगा लिया. कान से लगते hi उसके कान में उसकी बेटी के रोने की आवाज़ आयी तो मणि शंकर चौंक पड़ा.

उसकी बेटी ने रट हुए उससे जाने क्या क्या कहा. जिसे सुन कर मणि शंकर के चेहरा गुस्से से भर गया. उसने फ़ोन काट कर कुर्ते की जेब में रखा.

"क्या hua...achanak इतने गुस्से में क्यों नज़र आने लगा तू.?" नारायण ने उसके चेहरे की तरफ देखते हुए कहा तो मणि शंकर ने उसे अपनी बेटी की साडी बाते बता दी. मणि शंकर की बात सुन कर नारायण सन्न रह गया.

"ये कैसे हुआ मणि.?" नारायण ने अभी कहा hi था की मणि शंकर बोल पड़ा.

"नहीं छोड़ूगा उस मादरचोद ko...sale की हिम्मत कैसे हुयी मेरे बेटे पर हाथ उठाने की.?" मणि शंकर गुस्से में फत्ते हुए बोलै तो नारायण बेंच से उठ कर नीचे खड़ा हो गया.

"मैं भी तेरे साथ चलता हु." नारायण बोलै और पास hi खूटी पर टंगे अपने कुर्ते को निकाल कर पहनने लगा.

"मौका तो मैं चाहता था नारायण मगर सोचा नहीं था की इस तरह से मौका मिलेगा. आज अच्छे से सबक सिखाऊंगा इन दो कौड़ी के लोगो को." मणि शंकर जाने क्या क्या बड़बड़ाता रहा. नारायण जब अपने कपडे पहन चूका तो दोनों एक साथ hi घर से बाहर निकल गए.

भाई लोग....

अपडेट पोस्ट कर दिया है मैंने.....

रीड & एन्जॉय....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 08

फ्लैशबैक कंटिन्यू....


कमरे में किसी के आने की आहात से मैंने दरवाज़े की तरफ देखा तो कुसुम दीदी कमरे के अंदर आ रही थी. उनके चेहरे पर वही गंभीरता थी जो हमेशा रहती थी. कमरे के अंदर आ कर उन्होंने कमरे का दरवाज़ा बंद कर अंदर से कुण्डी लगायी तो मैं ये देख कर चौंका पर बोलै कुछ नहीं.

कुण्डी लगा कर दीदी मेरे पास आयी और बीएड के किनारे पर बैठ गयी. मैं चुप चाप सर झुकाये बैठ गया था बीएड पर. दीदी ने कुछ देर मेरी तरफ देखा फिर मेरे और पास आ कर उन्होंने मेरे चेहरे को अपनी दोनों हथेलियों में लेकर अपनी तरफ किया.

मेरा चेहरा उनके चेहरे की तरफ ज़रूर हो गया मगर मैंने नज़र उठा कर उनकी तरफ देखा नहीं. पता नहीं क्यों पर मैं उनसे नज़रे नहीं मिला प् रहा था. तभी मुझे उनके सिसकने की आवाज़ आयी तो मैंने जल्दी से नज़र उठा कर उनकी तरफ देखा. उनकी खूबसूरत आँखों से आँशु बहते नज़र आये मुझे.

"क्या हुआ दीदी आप रो क्यों रही हैं.?" मैंने पूछा तो दीदी ने मेरे दोनों गालो को सहलाते हुए कहा.

"बहुत ज़ोर से मारा था न मैंने तुझे.? तभी तो तेरे दोनों गालो पर निशाँ पद गए हैं. मुझे माफ़ कर दे vicky...maine तुझ पर हाथ उठाया. अपने विक्की पर हाथ उठाया maine...apne भाई को मारा मैंने. कितनी बुरी हु मैं." दीदी ने रट हुए ऐसा कहा तो मैं एकदम से तड़प उठा.

"नहीं दीदी ऐसी कोई बात नहीं है. आपने मुझे मारा तो क्या हुआ वो भी तो आपका मेरे लिए प्यार hi था. आपने मुझे मेरे अच्छे के लिए hi मारा था. मुझे इसका कोई दुःख नहीं hai...aur आप प्ल्ज़ मत roiye...aapka पूरा हक़ है मुझ पर हाथ उठाने का." मैंने ऐसा कहा तो दीदी के अंशु और भी तेज़ी से बहने लगे. उनका गोरा चेहरा लाल सुर्ख पड़ता जा रहा था.

"मत रोइये न didi...aap जानती हैं न की मैं आपको इस तरह रट हुए नहीं देख सकता. प्ल्ज़ शांत हो जाइये." मैंने दीदी से कहा तो दीदी झपट कर मुझसे लिपट गयी. मैंने भी उन्हें अपने सीने से लगा लिया.

कुछ देर बाद दीदी मुझसे अलग हुयी. अब वो रो नहीं रही थी. मैंने अपने हाथो से उनके आँशु पोंछे. वो मुझे बड़े प्यार से देखने लगी.

"क्या ज़रूरत थी तुझे उससे झगड़ा करने की.? अगर तुझे कही कोई चोट वोट लग जाती तो.? तुझे पता है मैं उस वक्त बहुत ज़्यादा दर गयी थी." दीदी ने बड़ी मासूमियत से कहा तो मैं बस हलके से मुस्कुरा उठा मगर मेरी मुस्कान जल्द hi गायब हो गयी.

"अगर आप मुझे उस वक्त न रोकती तो मैं सच में उस घटिया इंसान को आज जान से मार देता." मैंने ऐसा कहा तो दीदी के चेहरे पर फिर से दर के भाव आ गए.

"क्या कह रहा है तू.?" दीदी ने कहा तो मैं कुछ पल चुप रहा फिर बोलै.

"हाँ didi..usne आपसे गंदे लहजे में बात की थी जो मेरे बर्दास्त से बाहर थी. उस वक्त मुझे इतना ज़्यादा गुस्सा आ गया था की अगर आप मुझे न रोकती तो गुस्से में मैं उसे जान से मार देता. फिर भले hi बाद में मुझे जेल हो जाती." मैंने ऐसा कहा तो दीदी की सिसकी निकल गयी.

"नहीं vicky...aisa मत kah...us सूरत में मैं कैसे जी पाती.?" कुसुम दीदी ने मेरे चेहरे पर सहलाया तो मैंने उनके उस हाथ को पकड़ लिया.

"फिर जो होता देखा जाता दीदी." मैंने कहा तो दीदी ने कहा.

"छोड़ इन बातो ko...aur खबरदार जो फिर कभी ऐसी बात की." दीदी ने कहा तो मैं चुप हो गया.

"वैसे आज जो कुछ भी हुआ है उससे तुझे क्या लगता है विक्की.? क्या वो लोग सच में हमारा साथ देंगे.?" दीदी ने कहा तो मैंने फिर से उनकी तरफ देखा.

"कहा तो सबने यही है didi...ab ये तो वक्त बताएगा की क्या होता है. हालात बहुत hi खराब हैं. बस दुआ कीजिये की सब अच्छा hi हो." मैंने कहा तो दीदी मेरी तरफ ध्यान से देखती रही.

"मुझे तो बहुत दर लग रहा है विक्की. पता नहीं सरपंच क्या करेगा.? गांव के बाकी ब्राह्मण उसी का पक्ष लेंगे. हमारी तो कोई सुनेगा भी नहीं." दीदी ने डरे हुए लहजे में कहा तो मुझे समझ न आया की क्या कहु.

"ज़्यादा से ज़्यादा क्या होगा didi...sarpanch अपने बेटे की मार की वजह से मुझे पुलिस के हत्थे चढ़ा देगा और क्या.? इससे ज़्यादा क्या करेगा वो.?" मैंने ऐसा कहा तो दीदी एक डैम से घबरा गयी.

"ऐसा न कह vicky....mujhe दर है कही वो इससे ज़्यादा न कुछ करे. सुना है की उसकी पहुंच बड़े बड़े लोगो तक है. ये तो पक्की बात है की वो पिता जी को भरे गांव के सामने जलील करेगा और पिता जी कुछ नहीं कर सकेंगे." दीदी ने गंभीरता से कहा तो मुझे इस बार समझ न आया की क्या कहु.

मेरे कुछ न बोलने पर कुसुम दीदी भी कुछ न बोली. वो बस मेरी तरफ बड़े ध्यान से देखती रही. मैं उनकी तरफ नहीं देख रहा. मेरी नज़रे तो कमरे के बंद दरवाज़े पर तिकी हुयी थी. मैं वह कुछ देख नहीं रहा था बस कही खोया हुआ था.

"जाने दे vicky...jo हो गया अब उसे फिर से पहले जैसा बनाया तो नहीं जा सकता. माँ को भी पता है की तूने ये सब जान बुझ कर नहीं किया. पिता जी को जब माँ से साडी बातो का पता चलेगा तो वो भी यही सोचेंगे." दीदी ने मेरे चेहरे को अपनी हथेली से अपनी तरफ करते हुए कहा तो मैंने उनकी तरफ देखा.

दीदी के चेहरे पर इस वक्त गंभीरता थी. इस गंभीर चेहरे में इस वक्त संसार भर की मासूमियत भी थी. इस मासूम चेहरे के लिए मैं कुछ भी करने को तैयार था. मैं हमेशा सोचता था की मैं ऐसा क्या करू की ये चेहरा हमेशा ख़ुशी से खिला हुआ रहे.

"इस हादसे के पहले हम सब कितना खुश थे न दीदी.? सोचा नहीं था की हसी ख़ुशी के इस माहौल में किसी दिन ऐसा भी हो जायेगा और हम सब इस तरह की मुसीबत में फास जायेंगे." मैंने उदास भाव से कहा तो दीदी ने मेरे चेहरे को अपने हाथो में लिया और फिर अपने गले से लगा लिया मुझे.

"यु निराश न हो vicky...sab ठीक हो जायेगा. मुझे अपने भगवन जी पर पूरा यकीन है की वो हम सबके साथ कुछ नहीं होने देंगे. बस तू उदास न हो और न hi अपने मन में किसी बात का बोझ रख. तूने कोई गलती नहीं की hai..tune वही किया है जो एक भाई को करना चाहिए था." दीदी मुझे अपने गले लगाए मेरे सर के बालो पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा.

मुझे उनके गले लगने से बहुत सुकून सा मिल रहा था. कुछ देर बाद मैं उनसे अलग हुआ और दीदी से चाय पिने की बात कही तो दीदी मुस्कुरा उठी. फिर ये कह कर कमरे से चली गयी की अभी स्पेशल चाय बना कर पिलाती हु तुझे. उनके जाने के बाद मैं एक बार फिर से इन्ही सब के बारे में सोचने लगा. मैं चाह कर भी अपने दिल और दिमाग से इन बातो को निकाल नहीं प् रहा था.

कुछ देर बाद दीदी चाय ले कर आयी तो हम दोनों ने साथ hi बैठ कर चाय पि. उसके बाद दीदी के hi कहने पर मैं भी उनके साथ नीचे चला आया. नीचे सीढ़ियों से कुछ hi दूरी पर लकड़ी की कुर्सियां राखी हुयी थी. जिनमे मेरी माँ और दोनों जुड़वाँ बहने बैठी हुयी थी. उन सबके बीच अजीब सी शान्ति फैली हुयी थी.

मेरी दोनों जुड़वाँ बहने जो आम सिचुएशन में चुप बैठने वालो में से नहीं थी वो भी इस वक्त चुप चाप hi बैठी हुयी थी. घर के अंदर और बाहर हर तरफ ऐसा सन्नाटा फैला हुआ था जैसे कोई मर गया हो. मैं और कुसुम दीदी भी अलग अलग कुर्सियों में बैठ गए. हमारे बीच कोई कुछ बोल नहीं रहा था. मुझे भी समझ नहीं आ रहा था की इस सिचुएशन में क्या बात करू.

करीब 20 मिनट बाद घर का मैं दरवाज़ा खुला और उससे पिता जी अंदर आये. उन्हें देख कर हम सबकी जान में जान आयी. मैं तो पहले से hi कुछ घबराया हुआ था अब उन्हें देख कर और भी घबराने लगा.

पिता जी जब अंदर आये तो कुसुम दीदी अपनी कुर्सी से उठ गयी और पिता जी के बैठने के लिए उस कुर्सी को खाली कर दिया. पिता जी आ कर उस कुर्सी पर बैठ गए. उनका चेहरा कुछ ज़्यादा hi गंभीर दिखाई दे रहा था.

कुछ देर की ख़ामोशी के बाद पिता जी ने मेरी तरफ देखा तो मैंने अपना सर झुका लिया. वो मुझे कुछ देर तक देखते रहे. जैसे सोच रहे हो की मुझसे क्या कहना चाहिए. फिर उन्होंने मेरी तरफ से अपनी नज़रे हटा कर माँ की तरफ देखा. माँ खुद भी उन्ही को देख रही थी.

"Renuka...zara चाय नास्ते का इंतज़ाम कर लो. कुछ लोग बाहर से आने वाले हैं." पिता जी ने माँ से ऐसा कहा तो माँ ने हाँ में सर हिलाया और कुर्सी से उठ कर अंदर की तरफ चली गयी. उनके पीछे पीछे कुसुम दीदी भी चली गयी.

माँ और कुसुम दीदी के जाने के बाद मैं और मेरी छोटी बहने बहने की बचे थे अब. मैं मन hi मन दर रहा था की अब जाने पिता जी क्या कहेंगे मुझसे. मेरी दोनों जुड़वाँ बहनो का भी कोई भरोसा नहीं था. वो इस वक्त कुछ भी ऐसा बोल सकती थी जिससे पिता जी गुस्से में मुझे डाटने लग जाते. वैसे मैं हैरान था की जब से ये सिचुएशन क्रिएट हुयी थी तब से मेरी वो दोनों शैतान बहने चुप hi थी. दोनों में से किसी ने भी कोई शरारत नहीं की थी.

"अब इस तरह मुँह लटका के क्यों बैठे हो तुम.?" मेरे कानो में पिता जी की ये बात पड़ी तो मैं एक डैम से दर गया. मेरे दिल की धड़कन जैसे रुक hi गयी. मुझ में इतनी हिम्मत न हुयी की मैं सर उठा कर पिता जी की तरफ dekhu...kuch बोलने की तो बात hi दूर थी.

"देखो मैं जनता हु की ये सब तुमने जान बुझ कर नहीं किया है. आज तक तो ऐसा नहीं किया था तुमने. इस लिए जो हुआ उसके लिए अब मुँह लटकने की कोई ज़रूरत नहीं है तुम्हे. मुझे ख़ुशी है की तुमने अपनी बहन को अपशब्द बोलने वाले को अच्छा खासा सबक सिखाया है." पिता जी ने ऐसा कहा तो मैं हैरान रह गया.

कहा मैं ये सोच सोच कर मारा जा रहा था की पिता जी मुझ पर गुस्सा करेंगे और डाटेंगे मगर यहाँ तो ऐसा कुछ था hi नहीं. बल्कि वो मेरे उस काम से खुश थे. मैंने हिम्मत कर के एक बार पिता जी की तरफ देखा तो पिता जी ने फिर कहा.

"हाँ bete...koi और बात होती तो मैं ज़रूर तुम पर गुस्सा करता मगर इस तरह की बात पर नहीं. कोई हमारी इज्जत और मान सम्मान को इस तरह चोट पहुचाये ये बर्दास्त नहीं किया जा सकता. हमें इन लोगो ने अपनी बिरादरी से अलग कर रखा है तो इसका मतलब ये नहीं की हमारी कोई इज्जत hi नहीं है. तुम फ़िक्र मत करो bete....main देख लगा सरपंच को और उन पंचायत करने वालो को." पिता जी ने ऐसा कहा तो मेरे मन से सारा दर निकल गया और मैंने पहली बार सुकून की सांस ली.

"ये तो आपने बिलकुल सही कहा पिता ji...koi ऐरा गैर नत्थू खैरा कैसे दीदी को उल्टा सीधा बोल सकता है.? अच्छा किया भाई ने जो उस कमीने का मार मार के भुर्ता बना दिया. वैसे भी इन लोगो के कुछ ज़्यादा hi भाव बढ़ गए थे. गली से निकलना मुश्किल कर दिया था हमारा." प्रिय ने ऐसा कहा तो पिता जी और मैंने उसकी तरफ देखा.

"क्या कहा तुमने.?" पिता जी ने हैरानी से कहा तो प्रिय से पहले पूजा बोल पड़ी.

"हाँ पिता ji...wo रुपेश और उसके कुछ लफंगे दोस्त अक्सर गली चलते हमारा रास्ता रोकट देते थे." पूजा ने ऐसा कहा तो पिता जी के चेहरे पर भी गुस्से के भाव आ गए.

"तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया.?" पिता जी ने कहा तो पूजा चुप हो गयी मगर इस बार प्रिय बोली.

"वो हमने इस लिए नहीं बताया की इस वजह से कही आप उनके साथ कुछ ऐसा वैसा न करे जिससे उनके घर वाले और गांव के लोग आप को कुछ कहे." प्रिय ने ऐसा कहा तो पिता जी देखते रह गए उसे.

"ऐसा कुछ नहीं था beta...tumhe इस बारे में मुझे न सही लेकिन अपनी माँ को तो बताना चाहिए था. हम अपने रास्ते चलते हैं और किसी से कोई मतलब नहीं रखते हैं तो इसका मतलब ये नहीं होता की हम कायर हैं और उनसे डरते हैं. अगर हम गलत नहीं हैं तो हम किसी गलत करने वाले के सामने झुकेंगे भी नहीं." पिता जी ने कहा तो प्रिय पूजा कुछ न बोली.

"अब से अगर ऐसी कोई बात होती है तो तुम सब भाई बहन उस बात को मुझसे या अपनी माँ से ज़रूर बताना hai...theek है न.?" पिता जी ने हम तीनो की तरफ देखते हुए कहा तो हम तीनो ने हाँ में सर हिला दिया.

तभी कुसुम दीदी और माँ आ गयी और माँ कुर्सी पर बैठ गयी. कुसुम दीदी अंदर की तरफ गयी और एक और कुर्सी ले आयी और फिर उसमे बैठ गयी.

"आपने बताया नहीं की कौन लोग बाहर से आ रहे हैं.?" माँ ने पिता जी से पूछा तो पिता जी ने कहा.

"सब मेरे जान पहचान के hi हैं. शहर में hi रहते hain...bade लोग hain..aise लोगो से थोड़ा बहुत जान पहचान बनाना पड़ता है ताकि ज़रूरत में ये हमारे काम आ सके. वैसे अब तक तो कभी ज़रूरत hi न पड़ी थी मगर अब के हालात के हिसाब से ज़रूरत है." पिता जी ने कहा तो माँ बोली.

"आपका मतलब है की ये लोग इस हालात में हमारी मदद karnge..magar कैसे.?" माँ ने पूछा तो पिता जी ने कहा.

"वो ऐसे की अगर मणि शंकर ने पंचायत में खुद के बाटे को सही ठहरने की कोशिश की या उसने कोई गुंडा गर्दी करने की कोशिश की तो उस हालत में ये लोग उन्हें ऐसा नहीं करने देंगे." पिता जी ने कहा तो माँ को कुछ समझ न आया.

"ऐसे कैसे रोक सकेंगे भला ये लोग.?" माँ ने कहा तो पिता जी ने कहा.

"तुम नहीं जानती रेणुका. इनमे से एक अखबार वाला है. बाकी सब भी कुछ न कुछ हैं. अगर सरपंच कोई अन्याय करता है तो ये अखबार वाला उसको बताएगा की अगर उन लोगो ने सही न्याय नहीं किया तो वो इस सब की न्यूज़ बना कर पुरे प्रदेश में फैलाएगा. वो अखबार वाला बता रहा था की उसके पास सरपंच के खिलाफ काफी मशाला है. सो सरपंच उसके रहते कुछ कर नहीं पायेगा." पिता जी ने कहा तो माँ हैरान रह गयी.

"ऐसा कौन सा मसाला है उनके पास.?" माँ ने हैरान होते हुए कहा तो पिता जी हम सब की तरफ देखने के बाद माँ से बोले.

"है kuch....kher वो आने hi वाले होंगे. वैसे मेरे पास विक्रम सिंह का फ़ोन आया था उसने बताया की गांव के काफी लोग हमारे साथ हैं. जिनमे से वो अपनी बिरादरी के साथ खुद hai...yaani ठाकुर और नीच जाती के लोग." पिता जी ने कहा तो माँ ने हां में सर हिलाया और मेरी तरफ देखा.

कुछ देर तक ऐसी hi बाते होती रही. मैं खुश था की पिता जी ने मुझे कुछ नहीं कहा था बल्कि मैंने जो किया था उसे अच्छा hi कहा था. अब तो बस उस कड़ी का इंतज़ार था जब इस सबके लिए गांव में सरपंच पंचायत बैठायेगा और हमारा बुलावा होगा.

जैसा की पिता जी ने कहा था थोड़ी hi देर में हमारे घर के बाहर कुछ जीपो की आवाज़ आयी तो पिता जी जल्दी से उठ कर बहार की तरफ चले गए. इधर उनके जाने के बाद माँ और मेरी सभी बहने अंदर की तरफ चली गयी.

कुछ देर बाद बाहर से पिता जी के साथ 5 लोग आये तो मैं कुर्सी से उतर कर खड़ा हो गया. पिता जी ने उन्हें वही पर बैठाया और मुझसे कहा की मैं अंदर माँ से कहु की वो चाय नास्ता भेजवाये. पिता जी के कहने पर मैं अंदर की तरफ चला गया.

"हम लोग लेट तो नहीं हुए न महेश जी.?" उनमे से एक ने ऐसा कहा तो पिता जी ने मुस्कुराते हुए न में सर हिलाया.

"आप लोग सही टाइम पर hi आये हैं. हमारे गांव का जो सरपंच है उसी के बेटे के साथ मार पीट हुयी थी मेरे बेटे से. पता चला है की सरपंच यहाँ था hi नहीं. वो पास के hi एक गांव में कल शाम को गया था जो अभी तक आया नहीं था. वैसे उसे सुचना तो मिल hi गयी होगी. वो यहाँ जल्द से जल्द आएगा और फिर इस सब के लिए वो पंचायत बैठायेगा."

"चलिए कोई nahi...dekhte हैं क्या करता है वो.?" उनमे से एक दूसरे ने अपना सर हिला कर कहा तो पिता जी ने सिर्फ जी कहा और एक कुर्सी पर बैठ गए.

थोड़ी hi देर में माँ और कुसुम दीदी अपने हाथो में चाय नास्ते की सामग्री लिए आयी और उन सबके बीच राखी टेबल पर रख दिया. उन सब ने मेरी माँ को देख कर उनसे नमस्ते किया तो माँ ने भी उनसे नमस्ते किया. दीदी ने भी सबसे नमस्ते किया तो वो लोग भी दीदी को देख कर मुस्कुराते हुए उनके इस अभिवादन का जवाब दिया.

"ये मेरी बड़ी बेटी कुसुम है प्रताप ji..aur ये मेरा बीटा विकाश. दो बेतिया अंदर हैं जो इन दोनों से छोटी हैं और वो दोनों जुड़वाँ हैं." पिता जी ने उन लोगो से हम भाई बहनो का तार्रुफ़ कराया.

"बहुत खूबसूरत बच्चे हैं महेश जी आपके. लेकिन एक बात है ये सब के सब भाभी जी पर hi गए हैं. वर्ण आप तो इतने सुन्दर दीखते nahi...haan बेटे में कुछ कुछ आपकी छवि दिखती hai..magar इसका रूप रंग भाभी जी पर hi गया है." प्रताप ने मुस्कुराते हुए कहा तो पिता जी मुस्कुरा कर रह गए और उधर माँ भी मुस्कुरा दी.

"चलिए कोई बात नहीं रेणुका पर hi गए हैं तो क्या hua...kahlayenge तो मेरे बच्चे hi. खेर आप लोग नास्ता कीजिये न." पिता जी ने कहा तो वो लोग नास्ते की प्लेट से नमकीन और बिस्किट उठा कर खाने लगे.

करीब एक घंटे बाद हमारे घर में कुछ लोग आये जो सरपंच के hi आदमी थे. उन लोगो ने पिता जी को पंचायत में आने को कहा और चले गए. उनके जाने के बाद पिता जी उन लोगो से चलने की बात की तो वो लोग कुर्सियों से उठ कर खड़े हो गए.

पिता जी ने मुझे और कुसुम दीदी को साथ चलने को कहा और माँ को घर पर hi रहने को कहा. मेरी दोनों जुड़वाँ बहने घर पर hi माँ के पास रहेंगी.

पिता जी के कहे अनुसार हम सब घर से बाहर आये. बाहर आते hi उनमे से एक ने पिता जी से पूछा की कितनी दूर है पंचायत वाली जगह तो पिता जी ने बताया की गांव के बीच में hi है एक बड़े से बरगद के पेड़ के पास. पिता जी की बात सुन कर उनमे से एक ने कहा की हम सब जीपो में बैठ कर hi चलेंगे. पिता जी बोले की पास hi में तो है पर वो लोग बोले की महेश जी आप चलिए तो सही.

खेर हम सब उनके साथ hi जीपो में बैठ गए. पिता जी जिस जीप में बैठे थे उसी में मैं और दीदी भी बैठ गए. बैठने के बाद हम सब पंचायत वाली जगह की तरफ चल दिए.

पंचायत वाली जगह ज्यादा दूर नहीं थी. पैदल चलने में 5 से 7 मिनट का टाइम लगता था. जीप में बैठ कर गए तो 2 मिनट में hi पहुंच गए उस जगह. पिता जी ने फ़ोन पर किसी से बात की थी और उसे जल्दी से पंचायत िस्थल में आने को कहा था.

हम सब जब पंचायत वाली जगह पर पहुंचे तो वह काफी जमघट लगा हुआ था. बरगद के पेड़ के चारो तरफ काफी बड़ा मैदान था. जहा पर काफी लोग जमा हो सकते थे. बरगद के पेड़ के नीचे चार कोने वाला करीब 3 फिट ुचा चबूतरा बना हुआ था जो की पत्थर और सीमेंट से बना हुआ था. उसी चबूतरे में लकड़ी की कुर्सियों पर पांच लोग बैठे हुए थे. सरपंच उन पांचो में नहीं था क्यों के आज की पंचायत का मसला उसके hi घर से था इस लिए उसका पांच बनने का सवाल hi नहीं था.

मणि शंकर पांच भले hi नहीं बना हुआ था मगर पंचायत में उसका दखल बराबर का होने वाला था ये सब जानते थे. बाकी के पांच नाम के लिए hi होते थे. अंतिम फैसला हमेशा hi मणि शंकर का मन जाता था. फिर चाहे वो फैसला सही हो या गलत. कोई उसके फैसले के खिलाफ आवाज़ उठाने की हिम्मत नहीं कर सकता था.

पंचायत वाले मैदान में जब तीन तीन जीपे पहुंची तो वह जमा हुए लोगो की नज़रे हमारी तरफ मुड़ी और जब एक जीब से पिता जी के साथ साथ मैं और दीदी भी नीचे उतरे तो सब ये देख कर हैरान रह गए. कुछ ऐसा hi हाल गांव के सरपंच यानी मणि शंकर का भी था. वो आँखे फाड़े हमारी तरफ देख रहा था. तीन जीपो से जब सब लोग बाहर आ गए तो मणि शंकर प्रताप शर्मा को देख कर और भी ज़्यादा हैरान रह गया. उसे पता था की प्रताप शर्मा अखबार वाला था और उसके साथ आये बाकी लोग भी कमज़ोर लोग नहीं थे. मैंने साफ़ साफ़ देखा था की इन लोगो को देख कर मणि शंकर के चेहरे पर परेशानी के भाव दिखने लगे थे.

हम सब लोग जीप से उतर कर पंचायत के पास पहुंचे तो न चाहते हुए भी मणि शंकर को मुस्कुरा कर प्रताप शर्मा और बाकी लोगो से मिलना hi पड़ा और फिर मज़ेदार बात ये हुयी की खुद मणि शंकर ने hi उनके बैठने के लिए कुर्सियों का इंजाम करवाया. ये बहुत hi ज़्यादा हैरानी की बात थी. वह पर मौजूद लोग ये सब देख कर हैरान रह गए थे. वो सोच भी नहीं सकते थे की गांव का ये मठाधीस ऐसा भी कुछ कर सकता है.

कुछ देर तक ऐसे hi चलता रहा. मणि शंकर काफी परेशां दिख रहा था. उसके घर से उसका बीटा रुपेश तिवारी और उसके तीन छोटे भाई भी वह पर आये हुए थे. एक बेटी भी थी जिसका नाम रचना तिवारी था. रचना तिवारी उसकी छोटी बेटी थी.

कुछ देर बाद पांचो के कहने पर कार्यवाही शुरू हुयी. मणि शंकर के बेटे ने बना चढ़ा कर अपनी बात पांचो के सामने राखी. जिसमे उसने ये कहा की वो अपने खेतो की तरफ से आ रहा था और जब रास्ते में उसे मैं और कुसुम दीदी दिखे तो वो अपनी मोटर सिक्ले रोक कर उनसे हाल चाल पूछने लगा था. मगर हाल चाल पूछने पर विक्की को पता नहीं ऐसा क्या लगा की उसने उसे मारना शुरू कर दिया. उसे उससे इसकी कोई उम्मीद नहीं थी इस लिए अचानक हुए हमले से वो कुछ कर नहीं पाया. उसे समझ hi नहीं आया की उसने ऐसा क्या किया था जिस वजह से विक्की ने अचानक उसको मारना शुरू कर दिया था. वो उसे रोकने की कोशिश करता रहा मगर विक्की उसे मारता रहा था. यहाँ तक की उसकी मार से उसकी हालत बहुत खराब हो गयी थी और उसके नाक से मुख से खून भी बहने लगा था. उसके बाद उसे कुछ याद नहीं रहा की क्या हुआ. वो बेहोश हो चूका था.

रुपेश की बात सुन कर पांचो ने मेरी तरफ देखा और मुझसे इस बारे में सच्चाई बताने को कहा तो मैंने वही बताया जो हकीकत में हुआ था. मैंने सब कुछ सच सच बता दिया. मैं सच्चाई बताने में बिलकुल भी नहीं झिझका और न hi मैंने वह पर मौजूद लोगो की परवाह की. जब मैंने ये सब बताया तो रुपेश बीच में hi बोल पड़ा और चिल्लाते हुए कहने लगा की मैं ये सब झूठ कह रहा हु और उसे फसा रहा हु.

पांचो ने मणि शंकर की तरफ देखा तो मणि शंकर ने बड़े तरीके से यही कहा की उसका बीटा कभी किसी की बहन बेटी से ऐसी कोई बात कर hi नहीं सकता. गांव के सब जानते हैं की उसका बीटा कितना शरीफ है और सबकी कितनी इज्जत करता है. मणि शंकर ने अभी ये सब कहा hi था की तभी वह पर काफी शोर शराबा सुनाई दिया.

शोर शराबे की आवाज़ से वह मौजूद सबका ध्यान उस तरफ गया तो देखा की गांव के कुछ ठाकुर और नीच जाती के लोग भारी हुजूम सा बना कर आ रहे थे. थोड़ी hi देर में वो सब पंचायत के पास आ कर खड़े हो गए. मैंने देखा की उनमे मंगल काका बल्ली कहा जग्गू काका वगैरा सब थे. वो मुझे और पिता जी को देख आदम से सलाम किया और फिर बाकी सब को भी.

मणि शंकर नीच जाती के इन लोगो को देख कर नाराज़ सा दिखने लगा. उसे बिलकुल पसंद नहीं आया की उसके मशले के बीच नीच जाती के लोग यहाँ आये. उसने इस बारे में कहा भी मगर तभी प्रताप शर्मा ने मणि शंकर से मुस्कुराते हुए कहा की ये सब आपके गांव के hi लोग हैं और िप्स के तहत ये सब भी बराबर का अधिकार रखते हैं. इनके यहाँ होने से भला क्या मशला है आपको. प्रताप शर्मा की बात सुन कर मणि शंकर का खून खौलने लगा. उसने थोड़ा गुस्से से कहा की गांव और पंचायत के मश्लो पर िप्स की बात कहा से आ गयी. ये ब्रह्मिनो का मशला है इसमें नीच जाती के लोगो को आने की कोई ज़रूरत नहीं है.

मैंने देखा की मणि शंकर आग बबूला हुआ जा रहा था. प्रताप शर्मा और उसके साथ आये लोग मणि शंकर की बातो पर मन hi मन मुस्कुरा रहे थे. मणि शंकर ने यहाँ तक कह दिया की आप लोग इस मामले में कुछ न कहे तो hi बेहतर होगा. आप लोग हमारे गांव में सिर्फ एक मेहमान की हैसियत से आये हैं इस लिए मेहमान hi रहे. किसी मामले में कोई दखलंदाज़ी न करे.

प्रताप शर्मा को भी गुस्सा आ गया और उसने साफ़ शब्दों में कहा की वो मेहमान बन कर नहीं आया है बल्कि न्यूज़ के सिलसिले में hi आया है. वो यहाँ पर जो कुछ भी सही गलत देखेगा उसे कल के अखबार में छपेगा. उसकी ये बात सुन कर मणि शंकर के पैरो के नीचे ज़मीन सरक गयी. उसे कोई उम्मीद नहीं थी इतनी सी बात पर इतना बड़ा कारनामा होगा. वो तो इसी बात से चकित था की ये लोग मेरे पिता जी के साथ कैसे हो सकते हैं. इनसे भला मेरे पिता जी की जान पहचान कैसे हो सकती है.

पांचो ने दोनों पक्षों की बातो को सुना. अब बात थी की जो कुछ भी हुआ उसका कोई सबूत कोई गवाह क्या है. पांचो की इस बात से मणि शंकर अपने बेटे को और अपनी बिरादरी को जो कुछ भी सिखाया पढ़ाया था उस आधार पर रुपेश ने अपनी बिरादरी के लोगो में से दो लोगो को सामने आने को कहा. जब वो दो लोग सामने आये तो उसने पांचो से कहा की जब ये हादसा हुआ था तब ये दोनों पास में hi अपने खेतो पर काम कर रहे थे और इन दोनों ने साफ़ देखा था की विक्की ने कितना मुझे मारा था.

रुपेश की इस बात से पांचो ने उन दोनों आदमियों से पूछा तो उन दोनों ने हाँ में hi सर हिलाया तो पांचो ने पूछा की रुपेश और विक्की के बीच ऐसी क्या बात हुयी थी जिसकी वजह से विक्की ने रुपेश पर हाथ उठाया था. पांचो की इस बात से वो दोनों hi आदमी दये बाये देखने लगे. मणि शंकर ने बस यही समझाया था की वो यही कह देंगे की उन्होंने देखा था बस उसके बाद वो सब सम्हाल लेगा. मगर यहाँ उसकी उम्मीद के उलट hi हो रहा था. प्रताप शर्मा लोगो की मौजूदगी में वो खुल कर कुछ करने की पोजीशन में hi नहीं था. फिर भी उसने हार नहीं मणि.

जब वो दोनों आदमी दये बाये देखने लगे तो मणि शंकर बोल पड़ा और कहा की इन लोगो ने देखा क्या ये काफी नहीं है. मेरा बीटा बता रहा था की विक्की इसके पहले भी बहुतो बार इसे मारने की धमकिया दे चूका है. पता नहीं इसकी मेरे बेटे से क्या दुश्मनी है. शायद ये और इसका बाप जलता है हम ब्राह्मण बिरादरी से.

उसकी इस बात से मेरे पिता जी पहली बार बोले और कहे की बिरादरी से जलने का कोई सवाल hi नहीं है. बिरादरी ने अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए उनको और उनके परिवार को अलग कर रखा है. मगर उन्होंने कभी इसके लिए किसी से कोई शिकायत नहीं की. वो हमेशा अपने रास्ते पर चले थे. वो चाहते ज़रूर थे की बाकी ब्रह्मिनो की तरह बिरादरी में उनको भी जगह और सम्मान मिले मगर वो इसके लिए ऐसा कोई काम करने के पक्ष में कभी नहीं थे. सारा गांव जनता है की उनका कभी किसी से कोई विवाद नहीं हुआ. वो सबसे अच्छे से मिलते थे और सबका उचित सम्मान करते थे.

पिता जी की बात सुन कर वह पर आये ठाकुरो ने भी उनकी इस बात का समर्थन किया. ठाकुरो के समर्थन के बाद hi नीच जाती के लोग जो आये थे उनमे से मंगल काका जग्गू काका बल्ली काका ये सब बाहर आ गए. इन लोगो ने सब को पहले हाथ जोड़ कर प्रणाम किया और पांचो से कुछ बोलने की अनुमति मांगी. मणि शंकर ये सब देख कर गुस्से से आग बबूला हो गया. उसने आव देखा न taav...jhapat कर मंगल काका के पास आया और उससे गरजते हुए बोलै की तेरी हिम्मत कैसे हुयी यहाँ पर आ कर कुछ बोलने की. अपनी औकात भूल गया है तू.?

मणि शंकर की इस बात से मेरे पिता जी ने प्रताप लोगो की तरफ देखा और ठाकुरो की तरफ भी. ठाकुरो में से कई लोग मणि शंकर के पास पहुंचे और बोले की सरपंच जी ये आप बहुत गलत कर रहे हैं. आज तक यही होता आया था की आपने अपनी मर्ज़ी का किया था. हम लोगो पर आपने हर सितम किया जो नहीं करना चाहिए था और हम आपके हर सितम सहते भी रहे मगर अब नहीं. किसी चीज़ की सीमा होती है. अब तो ये समझ लीजिये की साबरा का घड़ा भर चूका है और छलक कर उसका लावा बाहर निकलने लगा है.

ठाकुरो की इस बात से मणि शंकर ने गुस्से से उनकी तरफ देखा. मगर कुछ कर नहीं पाया क्यों की उसने साफ़ देखा की ठाकुरो के ऊपर उसके गुस्से का कोई असर नहीं दिख रहा था. प्रताप के साथ आये एक दूसरे आदमी ने मणि शंकर से कहा की ये सब लोग आपके hi गांव के लोग हैं. सबको बोलने का अधिकार है. िप्स में ये नहीं देखा जाता की कौन छोटी जाती का है और कौन बड़ी जाती का. बल्कि सबको बराबर अधिकार है कुछ भी सफाई में बोलना का. इस लिए आपको ये सब शोभा नहीं देता. आप इस गांव के सरपंच हैं इस वजह से तो आपको खुद ये सोचना चाहिए की किसी के साथ अन्याय न हो सके.

उस आदमी की इस बात से मणि शंकर गुस्से का घुट पि कर रह गया. उसके बाद पांचो ने मंगल से कहा की जो भी कहना है कहो. पांचो की अनुमति मिलते hi मंगल काका ने वही कहा जो मैं पहले hi पांचो को बता चूका था. मंगल काका की इस बात से बल्ली काका जग्गू काका ने भी वही कहा और ये भी कहा की ये सब उन लोगो ने अपनी आँखों से देखा भी था और कानो से सुना भी था.

इन लोगो के ऐसे बयान से हर तरफ ख़ामोशी फ़ैल गयी. ऐसा पहली बार हुआ था की इतर लौ कास्ट के लोगो ने ब्रह्मिनो के खिलाफ ऐसा कुछ बोलने की हिम्मत की थी. मणि शंकर का चेहरा देखने लायक हो गया था. उसे यकीन नहीं हो रहा था की नीच जाती के लोगो ने भरे गांव के सामने ब्रह्मिनो के खिलाफ इस तरह बोलने की हिम्मत की थी.

मणि शंकर और उसके बेटे रुपेश ने काफी ज़ोर लगाया मगर प्रताप शर्मा और उसके साथ आये लोगो के सामने अन्याय हो hi नहीं पाया. लास्ट में यही साबित हुआ की साडी गलती सरपंच के लड़के रुपेश की थी. उसने खुद विक्की और उसकी बहन का रास्ता रोका और उनसे गन्दी भाषा में बात की थी.

पांचो ने अपना फैसला सुनाया और रुपेश को गुनहगार मन गया. रहा सवाल मार पीट का तो इसका फैसला यही हुआ की उस वक्त की सिचुएशन के अनुसार एक भाई ने अपनी बहन के ऊपर कहे गए गंदे शब्दों के चलते उस पर हाथ उठाया. उस हालत में कोई भी ऐसा hi करता. इस लिए विकाश को इसके लिए दोषी नहीं मन जा सकता.

मणि शंकर और उसका दोस्त नारायण कुछ नहीं कर सके. जब बात सजा की आयी तो पिता जी ने पांचो से साफ़ कह दिया की ये रुपेश की पहली गलती थी इस लिए वो उसे कोई सजा नहीं दिलवाना चाहते मगर ये ज़रूर चाहते हैं की फिर कभी ऐसी गलती रुपेश के द्वारा न हो.

पिता जी ने ऐसा शायद फ्यूचर का सोच कर कहा था. वो जानते थे की एक तो सरपंच वैसे भी इस सबसे उनको अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझने लगा होगा दूसरे अगर वो उसके बेटे को सजा दिलवाएंगे तो आगे के लिए बात बहुत बिगड़ जाएगी.

पिता जी की इस बात से पांचो ने भी सरपंच मणि शंकर से यही कहा की फिर कभी ऐसा न ho...warna अगली बार कोई रियायत नहीं होगी. मणि शंकर हैरान था की आज ये पांच भी उसके खिलाफ ज़हर उगल रहे थे. बस इसके साथ hi पंचायत बर्खास्त हो गयी और सब अपने अपने घरो को जाने लगे. नीच जाती के लोग इस फैसले से बहुत खुश थे और मुझे और पिता जी को बधाई दे रहे थे.

हमारे गांव में ये पहला ऐसा ऐतिहासिक काम हुआ था की सरपंच के खिलाफ जा कर ऐसा फैसला किया गया था. सबसे बड़ी बात ये की पहली बार नीच जाती के लोगो ने बड़ी जाती के लोगो के सामने आने की और कुछ बोलने की हिम्मत की थी. सोचने वाली बात थी इस हिमाकत के लिए उन लोगो के साथ मणि शंकर कुछ भी कर सकता tha...aur ये बात वो सब जानते भी the..magar इसके बावजूद उन लोगो ने ऐसा करने की हिम्मत की थी जो की बहुत बड़ी बात थी.

जाते जाते प्रताप शर्मा और उसके साथ आये उन आदमियों ने मणि शंकर को इंदिरेक्ट्ली इस बात की चेतावनी भी देते गए की आज के इस फैसले के बाद गांव में और गांव के लोगो के बीच शान्ति रहेगी ऐसी वो आशा करते हैं. मणि शंकर अच्छी तरह समझ गया था की ये उन लोगो की उसके लिए नसीहत नहीं बल्कि साफ़ साफ़ धमकी थी की वो नीच जाती के लोगो के साथ कुछ उल्टा सीधा करने की सोचे भी na...warna इसका परिणाम उसके लिए अच्छा नहीं होगा.

मणि शंकर और उसके भाई आज के इस ऐतिहासिक फैसले से बहुत नाराज़ और गुस्से में थे मगर कुछ कर नहीं सकते थे. मणि शंकर को इस सबकी कोई उम्मीद hi नहीं थी वर्ण वो अपनी तरफ से भी उस हिसाब से तयारी करके आता. मगर अब क्या हो सकता tha...ab तो रात गयी बात गयी वाली बात हो गयी थी.

हम सब घर पहुंचे. हमारे साथ पिता जी के वो जान पहचान वाले भी आ गए थे जो शहर से आये थे. हम सब बहुत खुश थे. घर आने के बाद पिता जी ने उन लोगो से खाना पीना करने की बात कही तो वो लोग कहने लगे की अब उनको जाना पड़ेगा क्यों की वो सब अपना अपना इम्पोर्टेन्ट काम छोड़ कर आये थे. मगर पिता जी ने उनकी एक न suni...aur फिर उन सब को खाना पीना खिला कर hi जाने दिया.

खाना पीना करते वक्त भी सब इसी बारे में बाते करते रहे. ये बात भी हुयी के मणि शंकर इस फैसले के बाद चैन से नहीं baithega...yaani वो खुंदक खा गया है इस लिए मुमकिन है की वो हमारे साथ और गांव के उन लोगो के साथ भी कुछ बुरा कर सकता है जिन नीच जाती के लोगो ने आज उसके खिलाफ जा कर गवाही देने की हिम्मत की थी.

प्रताप शर्मा और बाकी सबने पिता जी से यही कहा की अगर ऐसा कुछ होता है तो उसकी खबर पिता जी उन्हें ज़रूर देंगे. बाकी वो देख लेंगे. खेर खाना पीना करके वो सब लोग चले गए. उन लोगो के जाने के बाद माँ और मेरी बहने सब पिता जी के पास आ कर कुर्सियों में बैठ गयी और आज की घटना के बारे में पूछने लगी. पिता जी ने सब कुछ बता दिया. पिता जी की साडी बातो के बाद सब खुश हो गए.

माँ ने भी यही कहा की मणि शंकर आज के इस फैसले के बाद ज़रूर कुछ न कुछ उल्टा सीधा करेगा. माँ की बात से पिता जी ने कहा की आते वक्त उनकी इस बारे में प्रताप से बात हुयी थी. उन लोगो ने यही कहा की अगर हमें ऐसा कुछ होने का अंदेशा है तो वो चाहे तो पुलिस में इसके लिए फिर दर्ज़ करवा सकते हैं. उनकी इस बात से पिता जी अब यही करने का सोच रहे थे. कल वो पुलिस ठाणे जा कर फिर दर्ज़ करवाएंगे. पुलिस ठाणे में मणि शंकर की खासी जान पहचान है इस लिए इस फिर में प्रताप की हेल्प से सीधा ऊपर से आर्डर दिलवाया जायेगा.

कुछ देर और इस बारे में बाते हुयी उसके बाद पिता जी खेतो की तरफ निकल गए. उनके जाने के बाद हम सबने भी खाना पीना किया. खाना खा कर मैं अपने कमरे में चला गया. सच कहु तो अब ऐसा लग रहा था जैसे सर से बहुत बड़ा बोझ उतर गया हो. कमरे में बीएड पर मैं लेट गया और अपनी आँखे बंद करके आज की घटना के बारे में सोचने लगा. सोचते सोचते पता hi नहीं चला की कब मेरी आँख लग गयी.

सोते वक्त hi मुझे ऐसा लगा जैसे कोई मेरे होठो को बड़े शैलीके से चूम और चूस रहा हो. मुझे ये अहसास बड़ा hi आनंदित कर रहा tha...aur फिर मेरी नींद टूट गयी. आँखे खुली तो देखा की मेरे ऊपर कोई झुका हुआ था....

भाई लोग....

सॉरी फॉर लेट....

नेक्स्ट अपडेट पोस्ट कर दिया है मैंने....

रीड & एन्जॉय....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....
 
क्या भाई लोग.....

आप लोग तो कमेंट hi नहीं करते. गिनती के जो लोग कमेंट करते हैं वो भी गायब हो जाते हैं. यारा लगता है किसी को ये स्टोरी पसंद hi नहीं आ रही.

नीस update...Super update..ke अलावा किसी को कुछ आता hi नहीं है.

यारा मेरी म्हणत का कुछ तो ख़याल करो. अच्छा अच्छा रिव्यु दो और मुझे थोड़ा डिटेल में बताओ की अपडेट कैसे लगते हैं आप सबको.? कुछ अपने सुग्गेस्टियन्स भी दो. ऐसे कैसे काम चलेगा भाई लोग...?

प्ल्ज़ गिव योर फीडबैक & सपोर्टिंग में....

ी can't दो एनीथिंग विथाउट योर support..help & योर मोटिवेशनल फीडबैक.

सो प्ल्ज़ यारा don't इग्नोर एंड दो योर जॉब होनेस्त्ली....

:adore::adore::adore:
 
भाई अपडेट आपको सिर्फ डिटेलिंग लगा और स्टोरी कैसी लगी इसका आपको कुछ नहीं लगा. यारा ये कैसा कमेंट है. भाई थोड़ी बहुत डिटेलिंग तो ज़रूरी भी है. वर्ण स्टोरी में इमोशंस hi नहीं दिखेगा.

भाई मैं पूरी कोशिश करता हु की डिटेलिंग न हो मगर समझने के चक्कर में थोड़ी सी हो hi जाती है....

भाई लोग आप सबसे रिक्वेस्ट है की स्टोरी से रिलेटेड कुछ तो रिव्यु दिया करो. थोड़ा सा कमेंट कर के गायब हो जाना गलत बात है.

ऑलवेज नीडेड योर हेल्प & सपोर्ट....

योर फीडबैक इस थे मोस्ट कंपल्सरी. तहत इस थे मेडिसिन & एनर्जी फॉर में....
 
भाई किसी की भावनाओ को ठेस पहुंचने का मेरा कोई इरादा नहीं है. ये तो बस एक स्टोरी है....

यारा गांव समाज में ऐसे बहुत हैं जो ऐसी बातो से ऐसी जाती के लोगो को ठेस पहुंचते हैं. तो ये एक तरह की सचाई भी है....

भाई लोग....

अगर स्टोरी में इस बात से किसी को बुरा लगता है तो उसके सॉरी महार मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं है सच में....
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 09

नाउ प्रेजेंट......


मेरे ऊपर कोई झुका हुआ था. मेरी नींद टूट चुकी थी और आँखे भी खुल चुकी थी मगर मैं अपने ऊपर झुके हुए उस शख्स को जल्द पहचान न सका. मेरे दिमाग में अभी पंचायत और उस फैसले की बाते hi चल रही थी. तभी वो शक्श मेरे ऊपर से थोड़ा ऊपर को उठा तो अब मुझे ठीक से दिखा की वो कौन था.

वो कोई और नहीं बल्कि दक्षिणा थी. उसे देख कर मेरा दिल और दिमाग कुछ पल के झनझना कर रह गया और फिर मुझे याद आया की मैं तो इस वक्त दिल्ली में हु और रात को दक्षिणा के साथ सेक्स करके लेट गया था. दक्षिणा तो आराम से सो गयी थी मगर मुझे नींद नहीं आ रही थी और फिर मैं अपने अतीत की यादो में खो गया था. शायद उसी समय मैं अतीत की यादो में खोये खोये सो गया था और वो सब अभी भी मेरे दिमाग में घूम रहा था.

फिर जब नींद टूटी तो अतीत की यादो से वापस लौट कर प्रेजेंट में आ गया था. ये सब सोचते हुए मैंने दक्षिणा की तरफ देखा. वो दिलकश मुस्कान के साथ मुझे hi देख रही थी. उसे इस तरह मुस्कुराते देख मुझे कुसुम दीदी का मुस्कुराना याद आ गया और एक डैम से मेरे दिल में एक दर्द की लहार दौड़ती चली गयी.

"सोते वक्त बहुत प्यारे और बहुत मासूम दीखते हो तुम. जब मेरी आँख खुली तो देखा तुम आराम से सो रहे थे. कुछ देर तुम्हे सोता हुआ देखती रही फिर अपने आप hi मैं तुम्हारे होठो पर झुकती चली गयी. सच कहु तो ऐसे होठ और ऐसे होठो का टेस्ट तुम्हारे अलावा किसी में नहीं महसूस किया." दक्षिणा ने मुस्कुराते हुए ऐसा कहा तो मैं मुस्कुरा उठा और फिर शरारत से बोलै.

"मेरे अलावा और किसका टेस्ट किया है.?" मैंने ऐसा कहा तो दक्षिणा का मुस्कुराना बंद हो गया और फिर अजीब तरह से बोली.

"किसका टेस्ट किया है से क्या मतलब है तुम्हारा.? अरे मैंने तुम्हारे अल्वा अपने हस्बैंड के होठो का भी तो टेस्ट किया है. उसी की बात कर रही हु. जाने क्या सोच लेते हो तुम.?" दक्षिणा ने नाराज़गी वाले अंदाज़ में कहा तो मेरी मुस्कान और भी गहरी हो गयी.

"तो तुम्हारे कहने का मतलब है की तुम्हारे हस्बैंड के होठो में ऐसा टेस्ट नहीं था.?" मैंने कहा तो दक्षिणा ने हाँ में सर हिलाया और फिर मुस्कुराते हुए वो फिर से मेरे होठो पर झुक गयी. उसने मेरे होठो को पूरा अपने मुँह में भर कर चूमा छठा चूसा और फिर मुझसे अलग हो गयी.

"ये क्या था.? मेरे होठो को खा जाने का इरादा है क्या?" मैंने कहा तो दक्षिणा खिलखिला कर है पड़ी.

"मेरा बस चले तो सच में hi खा जाओ मगर फिर ये सोच कर रुक जाती हु की अगर खा गयी तो दुबारा ऐसे होठ कहा मिलेंगे मुझे.?" दक्षिणा ने ऐसा कहा तो मैं फिर मुस्कुरा उठा.

"चलो अब मैं जा रही हु. सुबह हो गयी है. बहुत सरे काम हैं मुझे. किरण का हस्बैंड आज 10 बजे तक यहाँ पहुंच जायेगा और फिर किरण को ले कर चला जायेगा." दक्षिणा ने ये कहा तो मेरा ध्यान किरण की तरफ गया. कल रात उसके साथ भी तो सेक्स किया था मैंने. दोनों माँ बेटी गजब की थी.

थोड़ी देर बाद दक्षिणा कमरे से चली गयी तो मैं भी उठ कर अपने कमरे में आ गया. सुबह तो हो hi गयी थी इस लिए मैंने दुबारा बीएड पर लेटने का नहीं सोचा. बल्कि सीधा बाथरूम में घुस गया.

10 बजे किरण का हस्बैंड आया तो मैं उससे मिला और उससे थोड़ी देर बात की. उसके बाद मैं चांदनी चौक दूकान पर चला गया. दक्षिणा का हस्बैंड शराब में काफी पैसा बहा चूका था. अच्छा खासा बुसिनेस था जिसे उसकी शराब ने चौपट कर दिया था. वो तो शुक्र था की उसने दक्षिणा के नाम और अपनी बेटी के नाम कुछ पैसा और प्रॉपर्टी की हुयी थी जो बच गयी थी.

दक्षिणा ने अपने पति की बिना जानकारी के hi चांदनी चौक में एक हार्डवेयर की बड़ी सी दूकान खुलवा दी थी. जिसे स्टार्टिंग से मैं hi सम्हालता था. इस दूकान के बारे में दक्षिणा के पति को कोई जानकारी नहीं थी. दूकान खुलने के 6 मंथ बाद hi दक्षिणा के पति की मौत हो गयी थी. उसकी मौत के बाद उसका कुछ बचा हुआ पैसा दक्षिणा को काफी मुश्किलों के बाद आखिर मिल hi गया था. जिसमे मैंने बहुत भाग दौड़ की थी. दक्षिणा हमेशा कहती थी की अगर मैं न होता तो वो अकेली ये सब कभी न कर पति.

दक्षिणा को मेरी अहमियत का अच्छे से अहसास था. धीरे धीरे वक्त गुज़रा और मैं दक्षिणा के लिए उसका अपना बनता चला गया. इन पांच सालो में बहुत कुछ चेंज हो गया था. आज सिचुएशन ये थी की दक्षिणा मुझे अपना नौकर नहीं बल्कि अपना सब कुछ मानती थी. सोसती में रहते हुए वो मुझसे खुल कर रिश्ता नहीं निभा पाती थी इस लिए उसने इसका भी एक उपाय कर लिया था.

दक्षिणा इस घर को बेच कर कही दूसरी जगह घर लेना चाह रही थी. जहा उसे कोई न जानता हो और वो मेरे साथ अच्छे से रह सके. ये उसकी दिली ख्वाहिश थी. वो मुझसे बहुत प्यार करती थी मगर मैं ऐसा नहीं चाहता था. मैं उसके पहलु में बांध कर नहीं रहना चाहता था. मेरा अपना एक परिवार था. आज भले hi मैं अपने परिवार से पिछले पांच सालो से अलग और दूर था मगर मुझे यकीन था की हमेशा ऐसा नहीं रहेगा. एक दिन ऐसा आएगा जब कुदरत अपना इरादा बदलेगी और मुझे वापस अपनी फॅमिली के पास जाने के लिए मजबूर करेगी.

दक्षिणा मुझ पर आँख बंद करके भरोसा करती थी. अगर ये कहु तो गलत न होगा की उसने अपना सारा कारोबार मेरे hi हवाले कर दिया था. उसे इस बात से कोई मतलब नहीं था की मैं उसके कारोबार के साथ क्या करता हु.? उसने कभी मुझसे कारोबार का हिसाब किताब नहीं पूछा. ऐसा लगता था जैसे उसने ये सोच लिया था की ये सब मेरा hi है. मगर मैं उसकी सोच को सही नहीं करना चाहता था.

मैं ये नहीं चाहता था की दक्षिणा अपना सब कुछ मेरे हवाले कर दे और मुझे हमेशा के लिए अपने पहलु में समेत ले. मैं पूरी ईमानदारी से उसके कारोबार को सम्हाल रहा था और उसके मुनाफे का एक एक पैसा उसके hi अकाउंट में दाल रहा था. मुझे नहीं पता की इस बात का पता दक्षिणा को है या नहीं. मेरे बहुत कहने पर उसने इतना ज़रूर किया था की मुझे हर महीने मेरी पगार ज़रूर दे देती थी. मैं आज भी खुद को उसका नौकर hi समझता था और उसी हैसियत से उसके कारोबार को देख रहा था.

पति की मौत के बाद दक्षिणा ने मुझे महीने की पगार देना बंद कर दिया था. जब मैंने इसकी वजह पूछी तो उसने साफ़ शब्दों में कह दिया था की मुझे पगार की क्या ज़रूरत है.? जब भी मुझे पैसो की ज़रूरत हो मैं खुद hi ले lu...Ye समझ कर की ये पैसा मेरा hi है.

मैं दक्षिणा की इस बात से हैरान रह गया था और फिर मैंने भी साफ़ कह दिया था की अगर आप चाहती हैं की मैं यहाँ राहु और आपके कारोबार को सम्हालू तो आपको मुझे हर महीने उसी तरह पगार देना पड़ेगा जैसे इसके पहले देती थी. वर्ण मैं यहाँ से किसी दूसरी जगह चला जाउगा. मेरी इन बातो से दक्षिणा को धक्का सा लगा था. उसको मेरी ये बात माननी hi पड़ी थी. वो मुझसे इस बात पर नाराज़ भी हुयी थी और कई दिन तक मुझसे कोई बात नहीं की थी मगर फिर खुद hi धीरे धीरे बात करने लगी थी.

दक्षिणा को अच्छी तरह पता था की मैं उसके पहलु में हमेशा के लिए बांध कर रहने वाला नहीं हु. मेरा जब भी जी चाहेगा मैं यहाँ से चला जाउगा. मैं अपने ऊपर दक्षिणा की कोई बंदिश नहीं चाहता था. मेरे और दक्षिणा के बीच कई बार इस मामले में बात हो चुकी थी. हर बार मैं अपनी hi बात पर ऐडा रहा था. दक्षिणा ने इसके लिए मुझे अपना सब कुछ सौंप दिया था. मैं उसकी इस चाल को भी समझता था. वैसे इसे उसकी चाल नहीं कहा जा सकता tha...kyo की मुझे पता था की दक्षिणा मुझे बहुत चाहती थी और इसी लिए वो चाहती थी की मैं हमेशा उसके पास राहु.

मैंने एक बार उससे ये तक कहा था की वो अपने दामाद को घर जमाई बना ले. ताकि उसे अकेले न रहना पड़े. मगर उसने मेरी इस बात से साफ़ इंकार कर दिया था. वो सिर्फ मुझे अपने पास चाहती थी.

आज कल ये हाल था की वो अब मुझे इसके लिए फाॅर्स नहीं करती थी. उसे समझ आ चूका था की मैं वो नहीं करुगा जो वो चाहती है. अब तो उसने ये सोच लिया था की उसकी किस्मत में जो भी लिखा होगा वो देख लेगी मगर जब तक मैं उसके पास हु तब तक वो मेरे साथ ख़ुशी ख़ुशी जीना चाहती थी.

दूकान पर मैं पंहुचा. आज लेट हो गया था मैं. वर्ण 10 बजे तक दूकान के सत्तर खुल hi जाते थे और सरे वर्कर भी आ जाते थे. मगर आज मैं लेट हो गया था. लेट होने की वजह किरण और उसका हस्बैंड hi था. जब मैं दूकान पर पंहुचा तो पुरे 2 घंटे लेट था. मैंने worker's को फ़ोन पर बता दिया था. इस लिए वो लोग भी लेट hi आये थे.

आप सब जानते हैं की दिल्ली में चांदनी चौक बहुत hi फेमस जगह है. यहाँ पर हर वो चीज़ मिल जाएगी जो दूसरी जगहों पर शायद मुश्किल से hi मिलती होगी. यहाँ पर दक्षिणा ने जो हार्डवेयर की दूकान खुलवाई थी वो काफी बड़ी दूकान थी और चांदनी चौक में ये दूकान काफी फेमस भी हो चुकी थी. यहाँ पर सब मुझे hi इस दूकान का मालिक समझते थे. दक्षिणा ने मुझसे रिक्वेस्ट करके कहा था की मैं ये कभी किसी से न कहु की मैं इस दूकान का सिर्फ एक नौकर हु.

दक्षिणा मुझे कितना चाहती थी इसका सबूत ये भी था की वो खुद मेरे लिए महज महज कपडे खरीदती थी और मुझे मालिक बना कर hi इस दूकान पर भेजती थी. दक्षिणा की बेटी किरण को भी इस बात का पता था. वो अक्सर मुझे इसके लिए प्यार से चिढ़ाया भी करती थी और मज़ाक में ये तक कह देती थी की और डैडी जी क्या हाल हैं आपके.? मैं उसके इस मज़ाक पर अजीब सा फील करता था. किरण को इस बात से कोई ऐतराज़ नहीं था की उसकी माँ मुझे क्या बना कर रखती है. बल्कि वो खुश थी की उसकी माँ के अकेलेपन का मैं एक खूबसूरत सहारा हु.

दूकान के worker's भी यही समझते थे की मैं hi इस दूकान का मालिक हु. स्टार्टिंग में मुझे ये बड़ा अजीब लगता था. दक्षिणा का हस्बैंड जब जीवित था तो दक्षिणा मुझे एक मिनी सूटकेस दे कर कार से भेजा करती थी. उस सूटकेस में महज वाले कपडे होते थे. घर से मैं मामूली इंसान बन कर hi निकलता था. ऐसा इस लिए ताकि दक्षिणा के शराबी पति को इसका पता न चल सके. वो यही समझता था की मैं उसकी फैक्ट्री जा रहा हु. जिस फैक्ट्री में अब कुछ नहीं रह गया था.

भारत बेनीवाल जब से शराब में डूबा था तब से फैक्ट्री की तरफ मुद के भी न देखा था. दिन भर शराब के नशे में टुन्न रहता और घर में दोनों माँ बेटी को गालिया देता और उन्हें मारता. वो अपने शराबी दोस्तों के पास चला जाता तो देर रात hi घर लौटता था. दक्षिणा ने उसके बुसिनेस और उसके पैसे की आस hi छोड़ दी थी और शायद यही वजह थी की उसने भारत बेनीवाल की गैर जानकारी में यहाँ चांदनी चौक में अपने पैसो से अलग एक दूकान खुलवा दी थी. उसने फ्यूचर का सोचा था. वो जानती थी की उसका पति शराब में बची कुछ दौलत भी बहा देगा और उन दोनों माँ बेटी को भीख मांगने पर मजबूर कर देगा.

भारत बेनीवाल यही समझता था की मैं उसकी फैक्ट्री जा रहा हु जबकि मैं घर से निकलने के बाद रास्ते में एक जगह कार कड़ी करता और फिर अपने कपडे उतार कर सूटकेस में रखे महज वाले कपडे पहन लेता. उसके बाद सीधा चांदनी चौक दूकान पर आ जाता. वैसे तो भारत को अपने बुसिनेस से कोई मतलब नहीं रह गया था मगर हर महीने के एन्ड में वो मुझसे हिसाब ज़रूर मांगता था. पूछता की कहा कितना मुनाफा हुआ और फिर मुझसे मुनाफे के पैसे मांगता. उसकी इस बात से मैं यही कहता की मैंने सारा पैसा उसके अकाउंट में दाल दिया है. उसे फाइल्स पर या कागजो पर लिखे हिसाब किताब से कोई मतलब नहीं था बल्कि सिर्फ पैसे से मतलब था. जब मैं ये कहता की मैंने सारा पैसा उसके अकाउंट में दाल दिया है तो वो खुश हो जाता और फिर रात को एक्स्ट्रा दारु पि कर घर आता.

भारत बेनीवाल की यही आदत बन चुकी थी. दक्षिणा उससे बेहद परेशां और दुखी हो चुकी थी. वो चाहती थी की ऐसा पति जल्द से जल्द मर जाये और जैसे भगवन ने उसकी चाहत को एक्सेप्ट भी कर लिया था. चांदनी चौक में दूकान खुलने के 6 महीने बाद भारत बेनीवाल सच में मर गया था. शराब के नशे में धुत्त भारत जब पैदल चलते हुए आ रहा था तो घर के मैं गेट से लड़खड़ा कर ज़ोर से टकराया था जिससे लोहे के गेट का नुकीला रोड उसकी कनपटी में धंस गया था और फिर कुछ hi देर में उसने डैम तोड़ दिया था. हम सब जानते थे की उसे देर रात को आने की आदत थी इस लिए उसके आने का इंतज़ार नहीं करते थे. उससे हम सब इतना परेशां और दुखी हो गए थे की अब उसकी तरफ देखने की इच्छा hi नहीं होती थी.

जब सुबह हमने बाहर आ कर देखा तो भारत बेनीवाल मैं गेट के पास hi नीचे ज़मीन पर लहू लुहान पड़ा था. पुलिस को फ़ोन किया गया. पुलिस आयी और पुलिस के खोजी कुत्ते भी आये. मगर यही साबित हुआ की भारत बेनीवाल की किसी ने हत्या नहीं की थी बल्कि वो सच में नशे की हालत में मैं गेट से टकराया था और फिर गेट का नुकीला रोड कनपटी में धंस जाने से कुछ hi देर में उसकी मौत हो गयी थी.

पुलिस को जब सब सबूत मिल गए तो उसने कोई केस बनाया hi नहीं. भारत की बॉडी को चीयर फाड़ कर देखने के बाद वापस दक्षिणा के सुपुर्द कर दिया था पुलिस ने. उसके बाद उसका अंतिम संस्कार किया गया था. भारत की मौत के बाद जैसे सारे दुखो का थे एन्ड हो गया था. हम सब की लाइफ अब बेहद इजी हो गयी थी और खुश हाल भी.

दूकान पर मैं काउंटर पर बैठा था जो की बहुत hi शानदार बनवाया था दक्षिणा ने मेरे बैठने के लिए. दूकान में दिन भर customer's का आना जाना लगा रहता था और इसी में hi सारा दिन गुज़र जाता था. मैं बैठा ज़रूर रहता था मगर फिर भी एक पल के लिए भी आराम नहीं मिल पता था. जाने कहा कहा से फ़ोन आते और लोग किसी न किसी सामान का आर्डर देते या सामान होने न होने के बारे में पूछते रहते.

दूकान के सरे worker's भी बेचारे दिन भर लगे रहते थे. सभी worker's से मेरा बड़ा अच्छा ताल मेल था. मैं उन पर कभी भी रौब नहीं झाड़ता था बल्कि उन सबसे तरीके से hi बात करता था. लंच टाइम में मैं कभी कभी उनका लाया हुआ खाना भी उनके साथ खा लेता था. वो मेरे इस अपनेपन से बेहद प्रभावित थे और मुझे अच्छा मानते थे. हर महीने मैं उन्हें टाइम पर पगार दे देता था और अगर उन में से किसी को एडवांस पैसो की ज़रूरत होती तो वो भी दे देता था.

दूकान में मुझे जब भी खली टाइम मिलता तो मैं मोबाइल में फेसबुक या व्हाट्सप्प खोल लेता था. मेरे पास वीवो कंपनी का मेरी हैसियत के हिसाब से काफी महगा मोबाइल tha...ye मोबाइल दक्षिणा ने hi खरीदा था मेरे लिए.

लंच के बाद कुछ देर के लिए मुझे टाइम मिला तो मैंने फिर से मोबाइल पर फेसबुक खोल लिया. फेसबुक में काफी साडी फ्रेंड रिक्वेस्ट पड़ी हुयी थी. मेरी आदत थी की मैं रिक्वेस्ट की तरफ कभी ध्यान नहीं देता था. बस तरह तरह के वीडियोस या न्यूज़ hi देखता रहता था. आज पता नहीं मेरे मन में कैसे ये ख़याल आ गया की फ्रेंड रिक्वेस्ट देखा जाये. सो मैंने ऊपर दिख रहे रेड कलर में क्लिक किया तो जल्द hi बहुत सरे लोगो की आयी हुयी रिक्वेस्ट दिखने लगी. मैं इनमे से ज़्यादातर को जानता भी नहीं था मगर कुछ ऐसे भी थे जिन्हे मैं जनता था. ये लोग दिल्ली के hi the...jinka हमारी इस दूकान में आना जाना होता था या जिनसे मेरे अच्छे ताल्लुकात थे.

मैं जिन्हे जनता था उनकी रिक्वेस्ट एक्सेप्ट भी करता जा रहा था और जिन्हे नहीं जनता था उनको इग्नोर कर रहा था. मैं अंगूठे से उन सभी को ऊपर करता जा रहा था. ऊपर करते करते hi मैं एक नाम पर रुक गया.

मैं जिस नाम पर रुक गया था वो एक फीमेल पर्सन का था और मैं रुका इस लिए क्यों की उसका नाम कुसुम पांडेय लिखा हुआ था. इस नाम को देख कर मेरा दिल और दिमाग कुछ देर के लिए थम सा गया. मैं सोच में पद गया की क्या ये नाम मेरी कुसुम दीदी का है.? मगर फेसबुक जैसी जगह पर उनके होने की मैं बिलकुल भी उम्मीद नहीं कर सकता था. मेरी छोटी जुड़वाँ बहनो के बारे में मैं सोच सकता था की वो फेसबुक चलने का सोच सकती हैं. मगर कुसुम दीदी को जितना मैं जनता था उस हिसाब से सच यही था की वो फेसबुक जैसी चीज़ो से कोसो दूर रहने वाली लड़की हैं.

मैंने सोचा की हो सकता है की ये कोई दूसरी लड़की हो. आफ्टरऑल दुनिया में इस नाम की बहुत सी लडकियां हो सकती हैं. मैंने प्रोफाइल को चेक करने का सोचा और फिर उस नाम पर क्लिक करके उसकी प्रोफाइल चेक करने लगा. प्रोफाइल में जो पिछ लगी थी वो माखन चोर यानी कृष्णा जी की थी. बाकि इन्फो में ज़्यादा कुछ नहीं दिखा मुझे. जोइनेड डेट और डेट ऑफ़ बिरथ ज़रूर दिखा मुझे. जोइनेड डेट दो महीने पहले की थी और डेट ऑफ़ बिरथ...12-12-1992 था.

डेट ऑफ़ बिरथ देख कर मेरा दिल ज़ोर से धड़का. ये तो मेरी कुसुम दीदी का hi डेट ऑफ़ बिरथ था. मेरे दिमाग में फिर से सवाल उठा की क्या ये सच में दीदी हो सकती हैं.? मेरा दिल कह रहा था की ये कुसुम दीदी hi hain..magar दिमाग कह रहा था की दीदी फेसबुक चला hi नहीं सकती. वो तो एक सीढ़ी साडी और हमेशा गंभीर रहने वाली लड़की हैं.

मैं काफी देर तक सोचता रहा इस बारे में और फिर मैंने यही फैसला किया की इस रिक्वेस्ट को एक्सेप्ट कर लेता हु. जो भी होगा शायद आगे पता चल जाये. सो मैंने कुसुम पांडेय की रिक्वेस्ट को एक्सेप्ट कर लिया. मेरी धड़कने बढ़ी हुयी थी.

तभी कुछ customer's आये तो मैंने मोबाइल को एक तरफ रखा और फिर उनसे बात चित करने लगा. उसके बाद ऐसे hi सारा दिन निकल गया और मैं रात को दूकान बंद करवा कर घर के लिए चल पड़ा.

रास्ते में मुझे फिर से फेसबुक की बात याद आयी तो मैं कुसुम पांडेय नाम की लड़की के बारे में सोचने लगा. मैं मन hi मन दुआ कर रहा था की वो लड़की मेरी कुसुम दीदी hi हो.

घर पंहुचा तो दक्षिणा मेरा hi वेट कर रही थी. दक्षिणा का ख़ुशी से दमकता चेहरा देखते hi मैं समझ गया की उसकी बेटी और दामाद जा चुके हैं और अब इस घर में हम दोनों hi बचे हैं. वैसे एक काम वाली लगा रखा था दक्षिणा ने मगर वो रात के 8 बजे तक चली जाती थी.

रात में खाना पीना करके मैं अपने कमरे में आ गया. मैं जनता था की थोड़ी देर में दक्षिणा भी मेरे कमरे में आ जाएगी. वो ज़्यादातर मेरे कमरे में मेरे साथ hi सोती थी. उसने जैसे मुझे अपना पक्का वाला हस्बैंड hi बना लिया था.

रात वाले कपडे पहन कर मैं आराम से बीएड पर लेट गया. दिन भर की थकान के बाद भी मुझे जल्दी नींद नहीं आती थी. तभी मुझे फिर से फेसबुक वाली उस लड़की कुसुम पांडेय का ध्यान आया तो मैं उठा और अपनी पेंट की पॉकेट से अपना मोबाइल निकाल कर आया और बीएड पर फिर से लेट गया.

बीएड पर लेट कर मैंने मोबाइल पर डाटा ों किया और फेसबुक ओपन किया. मुझे खुद पता नहीं था की मैंने क्या सोच कर फेसबुक ओपन किया था. जब के इसके पहले मैं रात को फेसबुक ओपन नहीं करता था और न hi मोबाइल चलने का मौका मिलता था. दक्षिणा के आने बाद दूसरा hi काम शुरू हो जाता था.

फेसबुक ओपन किया तो मेरी नज़र इनबॉक्स की तरफ पड़ी. इनबॉक्स वाली जगह पर भी रेड कलर था. उस में काफी सरे मेस्सगेस नज़र आ रहे थे. मैंने उस पर क्लिक किया तो इनबॉक्स ओपन हो गया. मैंने देखा की उसमे अलग अलग लोगो के बहुत सरे मेस्सगेस आये हुए थे. मगर मेरी नज़र उस नाम के मैसेज को खोज रही थी जो कुसुम पांडेय के नाम से आया हो. मैंने कई बार चेक किया मगर उसमे उस नाम से कही कोई मैसेज नहीं था.

एक इनबॉक्स और होता है जिस में उन लोगो के मेस्सगेस होते हैं जो हमारी फ्रेंड लिस्ट में नहीं होते. ये सोच कर मैंने ऊपर की तरफ उसी इनबॉक्स में क्लिक किया. जब वो ओपन हुआ तो उसमे भी मैंने चेक करना शुरू कर दिया. मैंने देखा था की कुसुम पांडेय नाम की लड़की का फेसबुक जोइनेड डेट 2 महीने पहले का था. सो मैं आज से ले कर दो महीने पहले तक के मेस्सगेस चेक कर रहा था. मैंने कई बार चेक किया मगर उस नाम से कही पर भी कोई मैसेज न दिखा.

फाइनली मैंने यही सोचा की शायद ये कोई इतर लड़की hi हो. या अगर ये सच में hi कुसुम दीदी hi हैं तो शायद बाद में इनका मैसेज आये. आज तो मैंने इनकी रिक्वेस्ट एक्सेप्ट की थी.

कुसुम दीदी की बात आते hi मैं फिर से अतीत की यादो में खोने जा hi रहा था की तभी दक्षिणा कमरे में आ गयी. कमरे में आ कर उसने सबसे पहले दरवाज़े को बंद करके उसकी कुण्डी लगाई फिर वो मेरे पास बीएड पास आ गयी. उसके चेहरे पर ख़ुशी अब भी दिख रही थी.

"क्या बात है आज बड़ा खिली खिली सी लग रही हो.? कुछ ख़ास बात है क्या.?" मैंने उसकी तरफ देखते हुए पूछा तो वो मुस्कुरायी और आलमारी की तरफ बढ़ गयी.

"हाँ ख़ास बात तो है hi." उसने आलमारी से एक क्रीम कलर की निघ्त्य निकलते हुए कहा तो मैंने कहा.

"ऐसी क्या ख़ास बात hai...kya मुझे नहीं बताओगी.?" मैंने ऐसा कहा तो वो आलमारी बंद करके मेरी तरफ पलटी और फिर सवाल किया.

"क्या ऐसा सोच सकते हो तुम की मैं तुम्हे कोई बात नहीं बताऊगी.?"

"हाँ ये भी hai...to फिर बताओ क्या ख़ास बात है.?" मैंने मुस्कुरा कर कहा तो वो भी मुस्कुरायी और फिर बोली.

"मैंने हमारे लिए नया घर ढूंढ लिया है. तुमसे कहा था मगर तुम्हे इसके लिए टाइम hi नहीं मिलता. सो मैंने सोचा की मैं भी सर्च करने की कोशिश करती हु." दक्षिणा ने कहा तो मैं हैरान हुआ.

"ओह्ह तो इस बात की ख़ुशी थी तुम्हे.? वैसे कहा मिला ये घर.?" मैं मन hi मन हैरान था की दक्षिणा जल्द से जल्द इस जगह से दूर कही जाना चाहती थी. जिसके लिए उससे साबरा नहीं हो रहा था और उसने खुद hi नयी जगह पर कोई घर ढूढ़ने का कदम उठा लिया था. मज़े की बात ये की उसने नया घर ढूंढ भी लिया था.

"गुडगाँव में. काफी सुन्दर कोठी है. एजेंट ने बताया की घर वैसा hi है जैसा मैंने उसे बताया था की ऐसा होना चाहिए." दक्षिणा ने बताया तो मैं और भी ज़्यादा हैरान हुआ. बड़ी लम्बी छलांग लगायी थी दक्षिणा ने. अभी जहा पर हम थे ये जगह रोहिणी सेक्टर 16 थी.

"ये तो कमाल hi हो gaya...rohini से सीधा गुडगाँव." मैंने ऐसा कहा तो दक्षिणा मुस्कुराने लगी.

"हाँ तो इतनी दूरी तो होनी hi चाहिए न मेरे राजा. यहाँ पर सब हमें जानते हैं. जब के गुडगाँव जैसी जगह में हम सब के लिए अजनबी hi होंगे. वह पर जिनसे भी हमारे ताल्लुकात होंगे उन्हें हम यही बतायेगे की हम दोनों......" दक्षिणा ने अपनी लास्ट वाली बात जान बुझ कर अधूरी छोड़ दी. मगर मैं जनता था की वो क्या कहने वाली थी. उसने लास्ट की बात पूरी न कह के भी जैसे मुझसे कह दिया था.

"मैं तुम्हे साफ़ साफ़ बता चूका हु की मैं वो नहीं कर सकता जो तुम चाहती हो. तुम मेरे बारे में सब कुछ जानती हो. मेरा अपना एक भरा पूरा परिवार है जो गांव में रहता है. आज मैं पिछले 5 साल से अपने परिवार से दूर यहाँ अलग रह रहा हु. मगर इसका मतलब ये नहीं है की मैं हमेशा यही रहुगा. एक दिन तो ज़रूर मैं अपने परिवार के पास जाउगा और फिर शायद ऐसा हो की मैं लौट कर यहाँ न आ पाउ. सो इतनी बड़ी हसरत और इतनी बड़ी उम्मीद मुझसे न रखो." मैंने कड़े शब्दों में कहा तो दक्षिणा कुछ न बोली.

उसकी इस बात से मेरा दिमाग खराब सा हो गया था. मैं जनता था की वो आज के टाइम पर अकेली है. एक बेटी थी जो अपने ससुराल जा चुकी है. अब यहाँ पर मेरे अलावा उसका कोई नहीं है. मगर मैं भी कहा उसका था.? मैं तो स्टार्टिंग में यहाँ नौकरी करने hi आया था. उसके पति की फैक्ट्री में काम करता था. मेरा अच्छा काम और मेरा अच्छा नेचर देख कर मेरे मालिक भारत बेनीवाल ने मुझे अपने साथ hi रख लिया था. उसने मुझे अपने घर में hi रहने के लिए एक अलग कमरा दे दिया था.

मुझे दक्षिणा के लिए सहानुभूति थी. मुझे उस पर तरस भी आता था मगर मैं इसके लिए उसका बन के तो नहीं रह सकता था लाइफ भर. मेरी बातो से दक्षिणा को दुःख पंहुचा था ये मैं अच्छी तरह जनता था मगर मैं इसमें क्या कर सकता था.?

"आखिर क्या कमी है मुझ में.? हाँ मैं ये मानती हु की मैं आगे में तुमसे थोड़ा नहीं बल्कि बहुत बड़ी हु. मगर आज के टाइम में आगे के इस फर्क से कोई फर्क नहीं पड़ता. मैं तुम्हे दिल ो जान से प्यार करती हु vikash.Tumhare कहने पर मैं कुछ भी करने को तैयार हु. ये घर ये पैसा ये कारोबार सब कुछ तुम्हारा hi है. मुझे ये सब नहीं चाहिए. मुझे तो बस तुम और तुम्हारा साथ चाहिए." दक्षिणा ने रट हुए कहा तो मुझे समझ न आया की मैं अब इससे क्या कहु.

"अगर तुम ये मानती हो की आज के टाइम में आगे के फर्क से कोई फर्क नहीं पड़ता तो ये भी मानती होगी की इस आगे में भी तुम किसी से दूसरी शादी कर सकती ho.Tumhari पर्सनल्टी देख कर कोई भी तुमसे शादी कर लेगा और तुम्हे प्यार देगा." मैंने ऐसा कहा तो दक्षिणा ने मुझे बड़े अजीब तरह से देखा.

"कितनी आसानी से ये बात कह दी न तुमने. तुम्हे मेरा बेपनाह प्यार नहीं दिखा विकाश. क्या सच में तुम्हारे दिल में मेरे लिए कोई जज़्बात नहीं है.? बोलो na...kya सच में तुम्हारे दिल में मेरे लिए कोई जगह नहीं है.?" दक्षिणा ने दुखी हो कर जब ऐसा कहा तो मैं कुछ बोल नहीं सका.

मैं इंकार करके दक्षिणा का दिल नहीं दुखाना चाहता था. ये सच था की वो मुझे बहुत चाहती थी. वो मेरे बिना जीने की कल्पना भी नहीं करना चाहती थी. मगर मैं मजबूर था. मैं उसकी चाहत के लिए अपने परिवार को नहीं ठुकरा सकता था.

"जवाब दो vikash...is तरह चुप मत रहो. मुझे जवाब चाहिए." दक्षिणा ने फिर से कहा तो मैंने उसकी तरफ देखा.

"क्या जवाब चाहिए तुम्हे.?" मैं गुस्सा नहीं होना चाहता था इस लिए धीरे से hi पूछा था.

"यही की क्या तुम्हारे दिल में मेरे लिए कुछ नहीं है.? क्या एक मैं hi पागल थी की तुम्हारी चाहत में अपना सब कुछ तुम्हे ख़ुशी ख़ुशी दे दिया." दक्षिणा ज़ोर ज़ोर से रोने लगी थी. ये देख कर मैं और भी ज़्यादा परेशां हो गया.

"देखो दक्षिणा सच बहुत कड़वा होता है. तुम भी जानती हो की हमारे बीच जो कुछ भी हुआ उसमे पहल किसने की थी. मैं तो सोच भी नहीं सकता था की ऐसा कुछ हमारे बीच होगा. मगर ऐसा हुआ. तुमने इसके लिए खुद पहल की thi...yaad करो जब मुझे समझ आ गया था की तुम क्या चाहती हो तो मैंने तुम्हारे पति से कह दिया था की मैं यहाँ नहीं रहुगा. मगर तुमने hi मुझे यहाँ से जाने नहीं दिया था. उसके बाद तुमने मुझे मजबूर किया. मैं जवान लड़का था कहा तक खुद को रोक पता. उसके बाद क्या हुआ ये बताने की ज़रूरत नहीं है तुम्हे. तुमने खुद ये कहा था की मैं तुम्हारी बेटी के साथ भी ख़ुशी ख़ुशी वो सब कर सकता hu...agar वो तैयार हो जाये तो."

"हाँ तो मैं क्या करती विकाश.? उस टाइम सीटुएशन्स hi ऐसी थी की मुझे तुम्हारे सहारे की ज़रूरत पद गयी थी. भारत को शराब की बुरी लत गयी थी और वो हम दोनों माँ बेटी को रोज़ाना गालिया देता था और मारता था. उस टाइम एक तुम hi थे जो उसे रोक सकते थे और हमारी दुर्गति होने से हमें बचा सकते थे. उस टाइम मुझे जो सही लगा मैंने किया. मैं हर कीमत पर यही चाहती थी की तुम हमारे पास hi रहो. मुझे लगा था की ऐसा करने से तुम हमारे पास रुक जाओगे. मैंने अपनी इज्जत की परवाह नहीं की और तुमको सब कुछ दे दिया. यहाँ तक की अपनी बेटी को भी तुम्हारे लिए परोस दिया. मैं नहीं जानती थी की इस सब का नतीजा ये निकलेगा की मुझे तुमसे अटूट प्यार हो जायेगा. मैं जानती थी की ये गलत है. क्योकि मैं आगे में तुमसे बहुत बड़ी थी. भला तुम कैसे मेरे प्यार को एक्सेप्ट कर लेते.? मैंने अपने आपको बहुत समझाया मगर समझा नहीं पायी. जब मुझे समझ आ गया की अब मैं अपने आप को नहीं समझा सकती तो मैंने तुमसे बात की." दक्षिणा ने सिसकते हुए ये सब कहा तो मैं इस बार भी कुछ न बोलै.

"मुझे पता है विकाश की तुम्हारी अपनी एक फॅमिली है जिसे ठुकरा कर तुम मुझे एक्सेप्ट नहीं कर सकते. मगर इसके बावजूद मैं यही चाहती हु की मैं तुम्हे अपने पास hi राखु. ये चाहत बहुत आगे निकल चुकी है विकाश. मेरा मुझ पर अब कोई ज़ोर नहीं है. तुम कहते हो की मैं दूसरी शादी कर लू. ारी यही करना होता तो पहले hi कर लेती जब मेरा हस्बैंड मुझे और मेरी बेटी को तड़पा रहा था. मैं उसे तलाक दे देती और किसी से भी शादी कर लेती. मगर मैंने ऐसा नहीं kiya...kyo की मैं तुमसे प्यार करती हु. किसी और के बारे में मैं सोचना hi नहीं चाहती मेरे हरजाई." दक्षिणा ने ये सब कहा तो मैं इस बार भी कुछ न बोल सका.

सच तो ये था की मैं अब दक्षिणा की बाते सुन hi नहीं रहा था. मैं समझ गया था की दक्षिणा ये कभी नहीं चाहेगी की मैं उससे दूर जाओ. इस लिए अब मैंने फैसला ले लिया था. मुझे दक्षिणा के लिए सहानुभूति थी और उस पर तरस भी आता था मगर इसके लिए मैं अपने परिवार को त्याग नहीं सकता था.

काफी देर तक दक्षिणा कुछ न कुछ कहती hi रही. मगर जब मैं कुछ न बोलै तो वो रट हुए कमरे से चली गयी. मैंने भी उसे रोकने की कोई कोशिश नहीं की. उसके जाने के बाद मैं उठा और कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद कर दिया.

मेरा दिमाग बहुत खराब हो चूका था. बीएड पर मैं करवाते बदलने लगा था. मेरे दिमाग में बहुत सी बाते घूम रही थी. कभी दक्षिणा के बारे में सोचता तो कभी अपने परिवार के बारे में.

5 साल गुज़र गए थे मुझे अपने परिवार से अलग हुए. इन 5 सालो में मैंने कभी उनसे बात करने की या गांव जाने की कोशिश नहीं की थी. मुझे घर में सबकी बहुत याद आती थी. मैं अकेले में उन सबको याद करके रोटा भी था मगर कभी बात नहीं की थी उनसे. इन 5 सालो में बहुत कुछ सहा था मैंने. मैं जनता था की मेरे जैसा हाल मेरे घर वालो का भी होगा. मगर सब पत्थर दिल बन के रह रहे होंगे.

आज फेसबुक पर कुसुम पांडेय नाम की फ्रेंड रिक्वेस्ट देख कर दिल बड़ी ज़ोर से धड़का था. सारा दिन उसी के बारे में सोचता रहा था मैं. बार बार दिमाग में आता की कैसे होंगे मेरे घर वाले.?

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....
 
थैंक्स फॉर योर लवली कमेंट...

फ्लैशबैक को इस अपडेट में नहीं दिया भाई. मैंने सोचा है की जहा फ्लैशबैक की ज़रूरत होगी वही दुगा बाकी स्टोरी प्रेजेंट में hi रहेगी.

मेरी इस सोच से एग्री हो या नहीं इसका रिप्लाई ज़रूर देना भाई लोग....

नेक्स्ट अपडेट पोस्टेड ों पेज no. 40....

रीड & एन्जॉय....
 
Back
Top