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- Dec 5, 2013
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सब कुछ जायज़ है....
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बीएड पर पड़ा मैं काफी देर तक अपनी पिछली लाइफ के बारे में सोचता रहा. मेरे पास मेरे घर का कोई कांटेक्ट नंबर नहीं था. पांच साल पहले जब मैं घर से निकला था तो खली हाथ hi था. मुझे घर का कोई नंबर याद नहीं था. मेरा खुद का जो मोबाइल था वो भी घर में hi रह गया था. मुझे अपना नंबर ज़रूर याद था. आज भी याद है. कई बार मेरे मन में आया भी था की एक बार अपने नंबर पर कॉल कर के चेक करू की नंबर अभी चालू है या नहीं. अगर चालू है तो कॉल कौन उठता है.?
मगर मैंने हर बार अपने मन की इस चाहत को दबा दिया था. इसका रीज़न ये था की मैं जब घर से निकला था तो बहुत दुखी और गुस्से में था. मुझे लग रहा था की मैं खुद को ख़तम कर दू. लाइफ इतनी दुःख भरी बन जाएगी ये सोचा नहीं था. जाने क्या लिखा था मेरी किस्मत में की मैं घर से खाली हाथ निकला तो हर जगह भूख प्यास और ठोकरों से बुरा हाल हो गया था.
मैंने भी ठान लिया था की मर जाउगा मगर घर में किसी से अब कभी बात नहीं करुगा और पिछले पांच साल से सच में मैंने किसी को फ़ोन तक नहीं लगाया था. इन पांच सालो में घर में क्या हुआ इसका मुझे कुछ भी पता नहीं था. मुझे सबसे ज़्यादा माँ और कुसुम दीदी की याद आती थी.
आ गया हु अजनबी शहर में घर से किनारा कर के.
अपनी ख़ुशी अपनी ज़िन्दगी को यु hi बेसहारा कर के.
जब भी नींद आती है तो ख्वाबो में देख कर,
मैं जी उठता हु फिर से बस तेरा नज़ारा कर के.
रात आधे से ज़्यादा गुज़र गयी थी मगर दक्षिणा दुबारा मेरे कमरे में नहीं आयी थी. शायद आज कुछ ज़्यादा hi नाराज़ हो गयी थी मुझसे. मेरी बातो से शायद उसके दिल को कुछ ज़्यादा hi दर्द हो गया था. मगर इसमें मैं क्या कर सकता था. उसे सब कुछ पता था इसके बाद भी उसने ऐसी चाहत की तो इसमें मेरी क्या गलती थी. ऐसा तो था नहीं की मैंने उसे पहले से बताया नहीं था. धोखे में नहीं रखा था मैंने उसे. बल्कि सब कुछ साफ़ साफ़ बता दिया था की मैं अपनी फॅमिली को ठुकरा कर सिर्फ उसका नहीं हो सकता.
उस वक्त मैंने फैसला कर लिया था की अब मैं यहाँ से चला जाउगा मगर अब जब दिमाग कुछ ठंडा हुआ तो मैंने सोचा की ऐसे अचानक चले जाना अच्छा नहीं होगा. क्यों की मेरे चले जाने से दक्षिणा का बहुत कुछ नुक्सान हो सकता था. उसकी रोज़ी रोटी उसकी दूकान hi थी जो चांदनी चौक में थी. उस दूकान पर अस ा ओनर मैं hi बैठता था और सम्हालता था. मेरे चले जाने से उसकी दूकान का क्या होगा.?
आखिर एक अकेली औरत कैसे ऐसी जगह में दूकान पर बैठ कर काम सम्हाल सकती थी.? ये उसके बस का काम बिलकुल भी नहीं था. दक्षिणा मेरे चले जाने से बिलकुल बेबस सी हो जाएगी. वो मुझे बेहद प्यार करती थी. सो ये भी हो सकता था की दुःख और परेशानी में वो कोई उल्टा सीधा कदम उठा ले.
मैं इन साड़ी सीटुएशन्स के बारे में डिटेल में सोचे जा रहा था. मुझे अहसास हुआ की यहाँ से चले जाना इतना आसान नहीं है मेरे लिए. मैं इतना खुदगर्ज़ भी नहीं हु की किसी को बेबस कर के यहाँ से चला जाओ. दक्षिणा मुझसे प्यार करती थी तो उसके प्यार की कुछ तो क़द्र करना hi चाहिए था मुझे.
मैंने फैसला कर लिया की कल दक्षिणा से इस बारे में तरीके से बात करुगा. उसे समझाऊंगा की हर चीज़ इंसान के चाहने से नहीं होती. सबकी अपनी अपनी चोइसस हैं. सब का अपना एक अलग परिवार है जिसकी जिम्मेदारियों में हर इंसान बंधा होता है.
अब एक क्वेश्चन ये था की मेरे बाद उसकी दूकान को कौन सम्हालेगा तो उसका भी कोई न कोई अच्छा सा इंतजाम करना hi पड़ेगा. इन्ही सब चीज़ो के बारे में सोचते सोचते जाने कब मेरी आँख लग गयी.
सुबह जब मेरी आँख खुली तो देखा 6 बज के 36 मिनट हो रहे थे. मैं टाइम देखने के बाद फ्रेश होने के लिए जल्द hi बाथरूम में घुस गया. बाथरूम से मैं सब कुछ क्लियर करके hi बाहर आया. आज की सुबह में चेंज ये था की हर रोज़ की तरह दक्षिणा मेरे पास नहीं थी और न hi वो मुझे बीएड टिया देने आयी थी. मैं समझ गया की मामला अभी भी गरम है.
तैयार होने के बाद मैं कमरे से बाहर आया और ड्रिंग रूम में जा कर सोफे पर बैठ गया. अंदर किचन से कुछ बर्तनो की आवाज़ आ रही थी. शायद दक्षिणा किचन में थी और ब्रेकफास्ट बना रही थी. उसको खाने में सब कुछ बनाना आता था. दक्षिणा के हाथ का बना खाना बहुत hi टेस्टी होता था. माइड 8 बजे तक आ जाती थी और अगर कभी वो आने में लेट हो जाती थी तो दक्षिणा खुद hi किचन में ब्रेकफास्ट तैयार करने लगती थी.
सुबह के 8 बज hi गए थे और रात से अब तक में दक्षिणा मेरे सामने नहीं आयी थी. मुझे भी समझ नहीं आ रहा था की मैं कैसे उसके पास जाओ और उससे बात करू.? थोड़ी hi देर में दूर बेल्ल बजी तो मैं उठ कर गया और दरवाज़ा खोला. दरवाज़े के बाहर माइड कड़ी थी. दरवाज़ा खोल कर मैं वापस चला आया जबकि माइड ने खुद hi दवाज़ा बंद किया और फिर अंदर की तरफ आयी थी.
यहाँ जो ये माइड आती थी वो एक औरत थी करीब 40 या 42 साल की. शकल सूरत कुछ ख़ास नहीं थी. थोड़ी सांवली थी मगर वो बन थान के hi आती थी. उसको सजने सवारने का बड़ा शौक था. दक्षिणा से वो कोई न कोई चीज़ ले hi लेती थी.
मैं सोफे पर बैठा टीवी देख रहा था. तभी माइड मेरे पास आयी और मुझसे नास्ता करने के लिए कहा तो मैंने टीवी बंद किया और डाइनिंग टेबल पर आ गया. मेरे कुर्सी पर बैठते hi माइड आयी और टेबल पर नास्ता लगाने लगी. वैसे तो ये काम माइड अक्सर hi करती थी. मगर दक्षिणा मेरे लिए नास्ते की थाली खुद hi लेके आती थी. बाद में भले hi माइड मुझे खाने की चीज़े देने आती रहे.
मैंने इस बारे में ज़्यादा नहीं सोचा और चुप चाप नास्ता करने लगा. मैंने महसूस किया की पुरे घर के अंदर शान्ति फैली हुयी थी. नास्ता करने के बाद मैं फिर से टीवी देखने के लिए सोफे पर आ कर बैठ गया. टीवी चालू करने के लिए मैंने रिमोट उठाया मगर फिर रख दिया. पता नहीं क्यों मुझे फिर से टीवी देखने की इच्छा hi न हुयी.
मैं सोफे से उठ कर कमरे में आ गया और बीएड पर लेट गया. लेट कर मैं दक्षिणा के बारे में सोचने लगा. माइड की वजह से मैं उससे खुल कर बात भी नहीं कर सकता था और इस तरह की सिचुएशन में मुझे यहाँ पर रहना भी मुश्किल लग रहा था. मुझे लग रहा था की कितना जल्दी मैं यहाँ से दूकान पर चला जाओ. वैसे तो मेरे जाने का टाइम हो hi गया था मगर मैं इस उम्मीद में यहाँ लेता हुआ था की शायद दक्षिणा मेरे कमरे में आये और कोई बात करे.
जब काफी देर तक इंतज़ार करने के बाद भी दक्षिणा नहीं आयी तो मुझे भी गुस्सा आने लगा. मैं बीएड से उठा और अपने कपड़ो को सही करने के बाद मोबाइल कार की चाभी और मिनी सूटकेस लिया. उसके बाद कमरे से बाहर आ गया. बाहर आते hi मैंने माइड के ज़रिये hi कहा की मैं दूकान जा रहा हु. किचन से रिप्लाई में कोई जवाब न आया तो मेरा दिमाग और भी ख़राब हो गया. मैं फिर रुका नहीं और पेअर पटकते हुए घर से बाहर निकल गया.
कार में बैठा मैं तेज़ स्पीड में कार चला रहा था. मेरे दिमाग में गुस्सा भरा हुआ था. दूकान पर जब मैं पंहुचा तो सरे worker's भी आ चुके थे. इन worker's में ये सबसे अच्छी बात थी की ये लोग टाइम से आ जाते थे. शायद इस लिए की मैं इन सबसे बहुत अच्छे ताल्लुकात बना के रखता था.
सारा दिन काउंटर में बैठा मैं कस्टमर्स का चेहरा देखता रहा और उनसे कई तरह की बाते करता रहा. लंच टाइम में मैंने आज फिर अपने एक वर्कर के साथ उसका लाया हुआ खाना hi थोड़ा बहुत खाया. उसके बाद फिर काउंटर पर बैठ गया.
मैं कभी शराब की तरफ देखता भी नहीं था. मैंने शराब पिने का अंजाम अपनी आँखों से देखा था. इस लिए शराब की तरफ कभी देखता तक नहीं था. मगर सिगरेट पि लेता था. दक्षिणा को नहीं पता था की मैं सिगरेट पिता हु. वैसे मैं रोज़ नहीं पिता था मगर किसी किसी दिन पि hi लेता था. अगर मुझे डेली की आदत होती तो मैं सिगरेट का पैकेट खरीद कर अपने पास hi रखता.
रात में दूकान बंद करवा के जब मैं कार से घर की तरफ जा रहा था तो रास्ते में एक पैन की दूकान के पास कार रोक कर मैंने उससे एक सिगरेट खरीदी और कार से बाहर hi पिने लगा था. इस वक्त मेरा दिमाग बहुत hi खराब था. इसकी वजह ये थी की आज सारा दिन मेरे मोबाइल पर दक्षिणा का कोई फ़ोन कॉल या मैसेज तक नहीं आया था. उसने मेरा कॉल तक नहीं उठाया था और न hi मेरे मैसेज का जवाब दिया था.
कहा मैंने उसके बारे में ये सोच कर यहाँ से चले जाने का अपना फैसला चेंज कर दिया था की वो अकेली औरत ऐसे में परेशां और दुखी हो जाएगी. मगर उसने तो मुझसे ऐसे बैर कर लिया था की मेरा कॉल तक नहीं उठाया था और न hi मेरे मैसेज का कोई जवाब दिया था. मुझे दक्षिणा पर बहुत गुस्सा आ रहा था. मुझे लग रहा था की इसी वक्त उसको अकेला छोड़ कर यहाँ से चला जाओ. फिर बैठी रहेगी रट हुए.
दक्षिणा समझती होगी की मैं उसके ऐसा करने पर उसे मनाऊंगा और उसकी चाहत को एक्सेप्ट कर लगा तो ये उसकी बहुत बड़ी भूल थी. उसने अपनी मर्ज़ी से अपना सब कुछ मुझे दिया था. उसने अपनी मर्ज़ी से मुझे ऐसा बनाया था. इसमें मेरी कही कोई गलती नहीं थी. मैं तो स्टार्टिंग में hi यहाँ से जाना चाहता था मगर उसने hi मुझे रोका था. उस वक्त सिचुएशन ठीक नहीं थी इस लिए मुझे भी इन दोनों माँ बेटी पर दया आ गयी थी और मैं रुक गया था.
मगर हर बार उसकी hi चाहत पूरी हो ऐसा तो नहीं हो सकता था न. सिगरेट पिटे पिटे मैं यही सब सोच रहा था. मैंने किरण से भी सब कुछ बता दिया था. वो मुझे अच्छी तरह समझती थी और कहती भी थी की मैं अपनी जगह सही हु. किरण भी इस बात पर राज़ी थी की उसकी माँ अगर चाहे तो दूसरी शादी कर ले. आखिर अकेले इतनी बड़ी लाइफ कैसे काट लेगी वो.? उसकी देख बाल के लिए और घर का खर्चा चलने के लिए कोई तो मर्द होना hi चाहिए था उसके लिए.
मैंने किरण से बात करने का सोचा और फिर मोबाइल निकाल कर उसे फ़ोन किया. कुछ देर बाद उसने मेरा कॉल उठाया तो मैंने पहले उससे उसका हाल चाल पूछा. उसके बाद मैंने कल रात की साडी कहानी उसे बतायी और आज सरे दिन की भी. मेरी साडी कहानी सुनने के बाद वो कुछ बोल न सकीय. मैंने उससे कहा की अब बताओ मैं इस सिचुएशन में क्या करू.? क्यों की अगर उसकी माँ मुझे किसी चीज़ के लिए फाॅर्स करेगी तो मैं यहाँ रुक नहीं सकता और न hi उसकी चाहत को एक्सेप्ट कर सकता हु.
मेरी बाते सुन कर किरण ने मुझसे कहा की वो माँ से बात कर के मुझे कॉल करेगी. किरण से बात करने के बाद मैंने बची हुयी सिगरेट को ज़मीन पर फेंक कर उसे जुटे से कुचला और फिर कार में आ कर बैठ गया.
कार की ड्राइविंग शीट पर बैठ कर मैं दक्षिणा और किरण के बारे में सोचने लगा. मैंने किरण को सब कुछ बता दिया था. उसने मुझसे कहा था की वो इस बारे में अपनी माँ से बात करेगी और फिर मुझे कॉल करेगी.
मुझे किरण के फ़ोन कॉल का इंतज़ार था. मैं उससे बात करने के बाद hi घर जाना चाहता था. इस लिए मैं कार में hi ख़ामोशी से बैठा था. मैं सोच रहा था की किरण आखिर अपनी माँ से इस बारे में क्या बात करेगी.? आखिर वो कैसे उसे समझाएगी की वो जो चाहती है वैसा हो सकने के बाद भी नहीं हो सकता. सबसे बड़ा सवाल ये की क्या दक्षिणा अपनी बेटी के समझने से समझेगी.? जब उसे पता चलेगा की मैंने उसकी बेटी से पिछली रात की साडी बातो को बता दिया है तो उसका मेरे लिए कैसा रिएक्शन होगा.?
मुझे बहुत टेंशन सी होने लगी थी. काफी देर हो गयी थी मगर अभी तक किरण की कॉल नहीं आयी थी. मैंने सोचा कही ऐसा तो नहीं की किरण ने अपनी माँ से बात hi न की हो. बल्कि मुझसे ऐसे hi कह दिया हो. मगर वो इतनी लापरवाह नहीं हो सकती थी. उसे पता था की ये बात कितनी गंभीर थी और कितना मायने रखती थी.
जब कुछ देर तक और किरण का कॉल न आया तो मैंने खुद उसे फ़ोन किया मगर उसका कॉल बिजी बता रहा था. इसका मतलब वो अपनी माँ से hi फ़ोन पर बात कर रही थी. मेरे पास अब इतंज़ार करने के अलावा कोई रास्ता नहीं था.
मुझे इंतज़ार करना बहुत मुश्किल लग रहा था. मुझे लग रहा था की टाइम एक जगह पर रुक गया है और अब आगे बढ़ hi नहीं रहा है. कार के अंदर बैठे बैठे मुझे घुटन सी होने लगी तो मैं कार से बाहर आ गया. एक दो बार इधर से उधर चार दो चार कदम चला उसके बाद मैं फिर से पैन की दुकान के पास आ गया.
पैन वाले से मैंने एक और सिगरेट खरीदी और उसे जला कर पिने लगा. मेरे दिमाग में काफी हलचल सी मची हुयी थी. मैं बार बार यही सोच रहा था की किरण ने अपनी माँ से क्या कहा होगा.? मैं ये सोच hi रहा था की मेरा मोबाइल बजने लगा.
मैंने जल्दी से पेंट की पॉकेट से मोबाइल निकला और कॉल पिक किया. कॉल किरण की hi थी. उसने मुझे बताया की उसने माँ से बात कर ली है. मैंने पूछा की क्या बात की है और उसकी माँ ने इस बारे में क्या कहा है तो उसने मुझे बताया की उसकी माँ बहुत रो रही थी. बार बार यही कह रही थी की वो मेरे बिना जी नहीं पायेगी. वो अकेले कैसे ये सब कर पायेगी. किरण ने कहा की मैंने उसे समझाया की विकाश उसका बन कर उसके पास हमेशा नहीं रह सकता. आखिर उसका भी अपना एक परिवार है.
किरण के समझने बुझाने का कोई फायदा नहीं हुआ शायद ऐसा उसने बताया. किरण की बाते सुन कर मुझे समझ न आया की अब मैं क्या करू.? दक्षिणा अपने दामाद को घर जमाई बनाना नहीं चाहती थी और किसी दूसरे से शादी नहीं करना चाहती थी. वो सिर्फ मुझे चाहती थी और अपने पास हमेशा के लिए रखना चाहती थी जो की संभव hi नहीं था.
किरण ने उल्टा मुझसे hi कहा की मैं किसी तरह सिचुएशन को हैंडल करू. मैं खुद अपने तरीके से उसे प्यार से समझाऊ तो शायद कुछ बात बने. किरण खुद भी अपनी माँ के लिए दुखी थी. उसे भी अहसास था की उसकी माँ का अकेले में क्या होगा.?
किरण से बात करने के बाद मैं बहुत देर तक सोचता रहा की क्या करू क्या न करू. जब कुछ समझ न आया तो कार में बैठ कर घर के लिए निकल पड़ा.
घर पंहुचा तो 10 से ज़्यादा का टाइम हो चूका था. दूर बेल्ल बजने पर दक्षिणा ने दरवाज़ा खोला तो मैं चुप चाप अंदर चला आया और सीधा कमरे में hi गया. कमरे में आ कर मैंने मिनी सूटकेस को एक तरफ रखा और कपडे उतार कर बाथरूम में घुस गया.
फ्रेश होने के बाद मैं वापस कमरे में आया और रात वाले कपडे पहन कर बीएड पर आराम से लेट गया. दरवाज़े के पास मैंने दक्षिणा से कोई बात नहीं की थी और न hi उसने कुछ कहा था मुझसे. मुझे समझ नहीं आ रहा था की दक्षिणा को फेस कैसे करू और उससे क्या बात करू.? आखिर कैसे इस सिचुएशन को सम्हालू.?
करीब 10 मिनट बाद दक्षिणा मेरे कमरे में आयी. उसके चेहरे से hi लग रहा था की वो खूब रोई थी. उसकी आँखे सुर्ख और सूझी हुयी थी. दक्षिणा में कोई कमी नहीं थी. इस आगे में भी वो अपनी बेटी की बड़ी बहन hi लगती थी. साफ़ गोरा चेहरा और सुंदरता की मूरत थी वो. उसके जिसम का हर हिस्सा आज भी वैसा hi कैसा हुआ था जैसे उसकी जवानी में कैसा हुआ रहा होगा. ये कुदरती बनावट थी उसके जिसम की. वो कोई योग या कसरत वगैरा नहीं करती थी. उसका जिसम hi ऐसा था.
कमरे में आ कर दक्षिणा बीएड के पास आ कर कड़ी हो गयी और मुझे दुखी अंदाज़ से देखने लगी. इस वक्त वो ऐसे लग रही थी जैसे कोई रूठी हुयी या नाराज़ सी कोई बच्ची हो. उसे इस तरह देख कर मुझे उस पर तरस भी आया और प्यार भी. मुझे उससे पूरी हमदर्दी थी और मुझे पूरा अहसास भी था की वो मुझे कितना चाहती है.
"मैंने फैसला कर लिया है विकाश की मुझे क्या करना है." उसने मुझे देखते हुए बच्चियों जैसे अंदाज़ में hi कहा तो मैंने उसकी तरफ देखते हुए नार्मल तरीके से कहा.
"कैसा फैसला.?" मैंने पूछा तो उसने कहा.
"यही की मेरे पास जो कुछ भी है वो सब कुछ मैं तुम्हारे नाम कर दूगी और फिर ज़हर खा कर खुद ख़ुशी कर लगी. खुद ख़ुशी करने से पहले मैं एक नोट भी लिख दूगी. उस नोट में ये लिखा होगा की मैं अपनी मौत की खुद hi जिम्मेदार हु. मेरी मौत के पीछे किसी का कोई हाथ नहीं है." दक्षिणा ने एक hi सांस में ऐसा कहा तो मेरे होश उड़ गए. मैं एक डैम से बीएड पर उठ कर बैठ गया था.
"व्हाट थे हेलल अरे यू टॉकिंग थिस नॉनसेन्स.? तुम्हारा दिमाग ख़राब हो गया है क्या.? पागल हो गयी हो तुम.?" मैंने गुस्से में कहा तो दक्षिणा की आँखों से आँशु बाह चले और फिर वो तेज़ आवाज़ में बोली.
"हाँ पागल हो गयी हु मैं. मेरा दिमाग ख़राब हो गया है. मुझे इसके अलावा अब कुछ भी नहीं सूझ रहा. तुम्हे मेरी कैफियत का ज़रा भी अहसास नहीं है. तुम ये सोचना hi नहीं चाहते की तुम्हारे चले जाने से मैं अकेली कैसे जी पाओगी और इतना बड़ा घर और प्रॉपर्टी को कैसे सम्हालूगी.? तुम्हे तो बस अपनी फॅमिली दिख रही है. मेरा प्यार मेरी बेबसी नहीं दिखती तुम्हे." दक्षिणा ने रट हुए तेज़ आवाज़ में ये सब कहा तो मैं देखता रह गया उसे.
"मुझे सब कुछ दीखता है दक्षिणा और मुझे हर बात का अहसास भी है. मैं पत्थर दिल नहीं hu...mere सीने में भी एक धड़कता हुआ दिल है जो किसी के भी जज़्बातो को अच्छी तरह से समझता है. अगर मुझे तुम्हारी कैफियत का और तुम्हारी बेबसी का अहसास नहीं होता तो इतने टाइम से तुम्हारे पास नहीं रह रहा होता. बल्कि कब का यहाँ से चला गया होता. मगर कही नहीं गया मैं. तुम्हारे पास hi रहा और तुम्हारे कारोबार को पूरी ईमानदारी से सम्हालता रहा. तुम प्यार में पागल हो चुकी हो दक्षिणा और इसी लिए तुम सिर्फ अपने बारे में सोचती हो. तुम्हे सिर्फ अपना दुःख और अपना अकेलापन hi दिखाई देता है. दूसरे का दुःख और दूसरे की मज़बूरी नहीं दिखती तुम्हे. मैं तो इतने साल से तुम्हारे बारे में सोच कर hi तुम्हारे पास रहा हु मगर क्या तुमने कभी ये सोचा की अगर मैं हमेशा के लिए तुम्हारा हो कर यहाँ रहने लगूंगा तो मेरी अपनी फॅमिली का क्या होगा.? मैंने पिछले 5 सालो में एक बार भी अपनी फॅमिली से बात नहीं की. मैं नहीं जनता की वो लोग किस हाल में होंगे. गांव में जिस तरह के हालात थे उन हालातो में वो कैसे खुद को सम्हाले होंगे. उनके साथ गांव के सरपंच ने क्या किया होगा. इन सब बातो के बारे में मुझे कुछ भी नहीं पता. मगर क्या तुमने कभी मुझे ज़ोर दे कर ये कहा की मैं एक बार अपने घर में फ़ोन लगा कर उनसे बात करू.?" मैंने अपने अंदर का सारा लावा उगलते हुए ऐसा कहा तो दक्षिणा चुप रह गयी.
शायद मेरी बातो का असर हुआ था उस पर. पहले जिस तरह के रंग में वो नज़र आयी थी अब वो रंग फीका पड़ा हुआ दिखने लगा था. जब वो कुछ न बोली तो मैंने फिर से चोट की.
"अपने बारे में और अपने सुख दुःख के बारे में तो हर कोई सोचता है. मगर इंसान वो है दक्षिणा जिसे दुसरो की तकलीफो का भी अहसास हो. सिर्फ अपने बारे में सोचना hi सही नहीं hota...kuch दुसरो के बारे में भी सोचना चाहिए. तुम्हे मुझसे ज़्यादा लाइफ का एक्सपीरियंस है मगर ये सब बाते मुझे खुद बताना पद रहा है तुम्हे." इस बार मैंने नार्मल लहजे में कहा तो दक्षिणा के चेहरे का वो बचा हुआ रंग भी कही गायब सा हो गया. वो अब एक डैम शांत दिखने लगी थी.
मैं भी यही चाहता था की दक्षिणा का दिल और दिमाग शांत हो जाये और फिर वो ठन्डे दिमाग से सोचे की क्या सही है क्या गलत. वो चुप चाप बीएड पर आ कर मेरे पास hi बैठ गयी.
"मैं जानती हु विकाश की तुम जो कह रहे हो वो सब सही है. मुझे भी इस बात का अहसास है की तुम अपनी फॅमिली को छोड़ कर हमेशा के लिए मेरे पास नहीं रह सकते और सच कहु तो ऐसा जायज़ भी नहीं है. हर इंसान के लिए उसकी फॅमिली सबसे इम्पोर्टेन्ट होती है. मगर मैं क्या करू vikash...jis सिचुएशन में मैं हु उस सिचुएशन में मुझे सिर्फ अपना hi दुःख सुख दिखाई देता है." दक्षिणा ने गंभीरता से ऐसा कहा तो मैंने उसकी तरफ देखा. उसने अपना सर झुका लिया था.
"चलो छोडो ये baate...is बारे में हम ठन्डे दिमाग से सोचेंगे और इसका कोई न कोई हल ज़रूर निकालेंगे." मैंने ऐसा कहा तो दक्षिणा ने आस भरी नज़रो से मेरी तरफ देखा मगर बोली कुछ न.
"ऐसे क्या देख रही हो.? मैंने कहा न कोई न कोई हल निकलेंगे." मैंने कहा तो वो बोली.
"किस तरह का हल निकालेंगे हम.?" दक्षिणा ने पूछा तो मैंने कहा.
"जिसमे तुम्हारा भी भला हो जाये और मेरा भी." मैंने मुस्कुरा कर कहा तो दक्षिणा हैरान सी होती दिखी मुझे.
"मैं कुछ समझी नहीं." दक्षिणा ने मेरे चेहरे की तरफ देखते हुए ऐसा कहा तो मैंने कहा.
"बड़ी साफ़ बात है दक्षिणा की मैं अपनी फॅमिली को तो छोड़ नहीं sakta...magar ये भी सच है की तुम्हे इस हाल में छोड़ कर भी नहीं जाना चाहता. सो हम कुछ ऐसा सोचेंगे की मुझसे मेरी फॅमिली भी न छूटे और तुम्हे मेरा साथ भी मिल जाये." मैंने ऐसा कहा तो दक्षिणा फिर हैरान हुयी.
"ऐसा कैसे हो सकेगा.?" दक्षिणा ने पूछा तो मैंने कहा.
"यही तो सोचना है हमें. मान लो अगर ऐसा हो जाता है तो क्या तुम ऐसा करना चाहोगी.?" मैंने ये कहते हुए उससे पूछा तो दक्षिणा ने हाँ में सर हिलाया.
"मुझे मंजूर है. मुझे अच्छी तरह पता है की दो में से एक हì चीज़ नहीं हो सकती. दोनों hi चीज़े इम्पोर्टेन्ट हैं इस लिए अगर ऐसा हो जाता है तो मुझे ये मंजूर है. तुम अपनी फॅमिली को न छोडो और न मैं कभी कहुगी की उन्हें छोडो. मैं बस ये चाहती हु की इतनी बड़ी दुनिया में मैं अकेली न रह जाओ. मेरा दिल मेरी जान तुमसे लगे हुए हैं तो तुम मेरे भी बने रहना. मगर ऐसा होगा कैसे.?" दक्षिणा ने पूछा तो मैं सोच में पद गया. मैं सोच नहीं प् रहा था की ऐसा कैसे करुगा मैं.?
"अभी तो मुझे खुद कुछ समझ नहीं आ रहा दक्षिणा मगर हम दोनों इस बारे में सोचेंगे तो ज़रूर कोई न कोई सलूशन निकलेगा." मैंने दक्षिणा के दोनों कंधो को पकड़ते हुए कहा तो दक्षिणा मेरी आँखों में देखने लगी. मैं भी उसकी आँखों में देख रहा था.
दक्षिणा के चेहरे पर अब मुझे राहत और सुकून नज़र आने लगा था. शायद उसके दिल और दिमाग से बहुत बड़ा बोझ हैट गया था. वो मुस्कुराई और फिर मुझसे लिपट गयी. थोड़ी देर बाद वो मुझसे अलग हुयी और मेरे होठो को हलके से चूम कर बीएड से उतर गयी.
"चलो मेरे बालम अब कुछ पेट पूजा भी कर लो. पता नहीं आज दिन में कुछ खाया भी था या नहीं." दक्षिणा ने मुस्कुराते हुए ये कहा तो मैं भी मुस्कुराया.
"चलो मैं आता हु." मैंने कहा तो दक्षिणा कुछ देर मुझे देखती रही फिर जल्दी से आने का कह कर कमरे से बाकर निकल गयी.
रात में खाना पीना कर के मैं अपने कमरे में आया और बीएड पर लेट गया. कुछ देर बाद दक्षिणा भी आ गयी और मेरे बगल से hi लेट गयी. वो मुझसे चिपक कर लेती हुयी थी और उसने अपना चेहरा मेरे सीने में रखा हुआ था. मैं जनता था की वो अब नाराज़ नहीं है बल्कि खुश है.
"I'm सॉरी.." दक्षिणा ने धीरे से कहा तो मैंने उसकी तरफ देखा और फिर बोलै.
"किस बात के लिए.?" मैंने पूछा तो दक्षिणा ने अपना चेहरा उठाया और फिर मेरी तरफ देखते हुए बोली.
"कल रात और आज सरे दिन के लिए." दक्षिणा ने कहा तो मुझे कुछ समझ न आया.
"क्या मतलब.?" मैंने उसकी तरफ देखते हुए कहा तो वो बोली.
"मतलब ये की मैं कल रात तुमसे नाराज़ हो कर चली आयी थी और फिर आज सारा दिन भी तुमसे कोई बात नहीं की थी और नहीं तुम्हारे फ़ोन कॉल्स और मेस्सगेस का कोई जवाब दिया था. इस लिए इस सबके लिए सॉरी." दक्षिणा ने पुरे डिटेल में ये सब बताया तो मैं मुस्कुरा पड़ा.
"छोडो इस बात को." मैंने कहा तो दक्षिणा ने मेरी तरफ कुछ देर तक देखा फिर बोली.
"अच्छा ये बताओ की हम ऐसा क्या करेंगे की हम दोनों का hi काम बन जाये.? मतलब तुम मेरे पास भी रहो और तुम्हे अपनी फॅमिली को भी न छोड़ना पड़े.?" दक्षिणा ने ये कहा तो मैं एक बार फिर सोच में पद गया.
"अभी कुछ सोचा नहीं hai...magar सोचना ज़रूर पड़ेगा. अभी तो यही एक मसला है की मैंने अपनी फॅमिली से पिछले 5 सालो से कोई बात hi नहीं की है." मैंने ऐसा कहा तो दक्षिणा ने कहा.
"तुम्हे एक बार अपने घर वालो को फ़ोन करना चाहिए था. गलतिया हर इंसान से होती हैं मगर इसका ये मतलब नहीं की हम उन गलतियों के लिए किसी को माफ़ hi न करे." दक्षिणा ने ऐसा कहा तो मुझे अपना पिछले सब कुछ याद आने लगा. मैंने बड़ी मुश्किल से अपने आपको सम्हाला.
"शायद कुछ गलतियों के लिए कोई माफ़ी नहीं होती dakshina...wo भी अगर वैसी hi गलतिया बार बार हो तो. एक गुनाह तो चलो हजम भी हो जायेगा मगर दूसरा गुनाह कैसे हजम कर लेगा कोई.?" मैंने गंभीरता से कहा तो दक्षिणा ने मेरे कंधे पर अपना हाथ रख कर दबाया.
"मगर ये गुनाह तो नहीं है न विकाश." दक्षिणा ने ये कहा तो मैं बोल पड़ा.
"सब को तो यही लगता है न की मैंने जो किया वो कभी न माफ़ करने वाला गुनाह किया है. जिसके लिए मेरे बाप ने मुझे घर से निकाल दिया था. मेरी किसी ने एक न सुनी थी. मैं चीखता रहा tha...mujhe लाठियों से मारा गया था. मेरी माँ मेरी दोनों जुड़वाँ बहने मुझे मार कहते देख रोटी बिलखती रही थी मगर मेरे बाप के दर से कोई मुझे बचने नहीं आया था और फिर मेरे बाप ने उसी हालत में मुझे घर से निकल जाने के लिए कह दिया था. उस वक्त मुझे लग रहा था की मैं खुद को क्या कर दालु. हर तरफ मौत hi मौत नज़र आ रही थी मुझे." मैंने तेज़ लहजे में ऐसा कहा और चुप हो गया. मेरी आँखों से आँशु निकलने लगे थे. दक्षिणा को साडी कहानी पता थी. वो मेरे दिल का हाल समझती थी इस लिए वो मुझे खुद से छुपका कर दिलाशा देने लगी थी.
"दिल जब दुःख जाता है न दक्षिणा तो फिर किसी से भी लगाव नहीं रह जाता. दिल और दिमाग वैरागी सा हो जाता है. वही हाल मेरा है. मुझे आज भी सब की याद आती है मगर जब उस हादसे की याद आती है न तो ज़ख्म फिर से हरा हो जाता है." मैंने दक्षिणा से अलग हो कर उससे ऐसा कहा तो उसने कहा.
"ऐसा कब तक चलेगा और इससे हासिल भी क्या होगा विकाश.? नाराज़गी या गुस्सा थोड़े टाइम के लिए hi अच्छा होता है. तुम पिछले 5 सालो से अपने घर वालो से दूर हो और इन 5 सालो में तुमने कभी उनसे बात करने की कोशिश तक नहीं की. ये अच्छा नहीं किया तुमने. तुम्हे सोचना चाहिए था की जिन हालातो में तुम अपनी फॅमिली को छोड़ कर चले आये थे उसके बाद उनका क्या हुआ होगा.? तुम्हारी कुसुम दीदी जिसकी हर सुबह सिर्फ तुम्हे देखने के बाद hi शुरू होती थी उसका क्या हाल हुआ होगा.? तुम्हारी दोनों जुड़वाँ बहने और तुम्हारी माँ जो तुम्हे अपने कलेजे का टुकड़ा मानती है. रही बात तुम्हारे पिता जी की तो उन हालातो में अगर उन्होंने तुम्हारे साथ ऐसा किया भी था तो वो गलत नहीं था. गुस्से में इंसान बहुत कुछ कर जाता है मगर जब दिमाग शांत हो जाता है तब उसे अहसास होता है उसने गुस्से में क्या कर दिया है. मुझे पूरा भरोसा है विकाश की जब तुम्हारे पिता जी का दिमाग शांत हुआ होगा तो उन्हें अपनी गलती का अहसास ज़रूर हुआ होगा. मगर शायद तब तक देर हो चुकी थी." दक्षिणा ने ये सब कहा तो मैं कुछ न बोलै. मुझे चुप देख कर उसने फिर बोलना शुरू किया.
"अगर तुम ये कहते हो की तुम अपनी फॅमिली को नहीं छोड़ सकते तो फिर तुम्हे अपनी फॅमिली से बात करना चाहिए. गलती किसी की भी हो मगर झुकने से अगर बात बन जाती है तो झुकना hi चाहिए. आखिर वो तुम्हारे अपने हैं. एक पिता कभी अपना दिल खोल कर नहीं dikhata...wo अपना प्यार दिल में hi छुपा कर रखता है. तुम भी इस बात को जानते होंगे की तुम्हारे पिता जी तुमसे कितना प्यार करते रहे होंगे. बच्चे भले hi बुरे हो जाये मगर वो अपने माँ बाप के लिए सबसे प्यारे hi होते हैं. इस लिए विकाश तुम इतने पत्थर दिल मत bano...aur अपने परिवार के लोगो से बात करो. अपने पिता जी के बाद एक तुम hi हो जो अपनी माँ और बहनो का ख़याल रख सकते हो. इस बारे में तुम्हे सोचना चाहिए था." दक्षिणा ने ये सब कहा तो मेरे दिमाग में जैसे कोई धमाका सा हुआ.
इतने सालो से मैं सिर्फ एक hi चीज़ को लिए बैठा था और उसकी hi वजह से मैं अपने परिवार से बात तक नहीं करता था. सच hi तो कह रही थी दक्षिणा की पिता जी के बाद एक मैं hi था जो अपनी माँ और बहनो का अच्छे से ख़याल रख सकता था और ये मेरी रेस्पॉन्सिबिल्टी भी थी. आज मेरे घर वाले किस हाल में होंगे इसका मुझे कोई आईडिया नहीं था. मैं ये सब सोचते सोचते अपने आपको एक डैम से बहुत बड़ा गुनहगार सा फील करने लगा था.
दक्षिणा मेरी हालत को समझ सकती थी इस लिए उसने मुझे फिर से खुद से लगा लिया. मैं आँखे बंद किये लेता हुआ था. दक्षिणा सिचुएशन को समझती थी इस लिए उसने आज मुझसे सेक्स से रिलेटेड कोई बात नहीं की थी. मेरी भी सेक्स की कोई इच्छा नहीं थी.
दक्षिणा तो सो गयी थी मगर मुझे नींद नहीं आ रही थी. मेरे दिमाग में दक्षिणा की बाते घूम रही थी. मेरे घर वाले किस हाल में honge..ye सोच सोच कर अब मेरा दिल बैठा जा रहा था.
मैं बीएड पर लेते काफी देर तक यही सब सोचता रहा. तभी मुझे फेसबुक की कुसुम पांडेय का ख़याल आया तो मैं अपना मोबाइल लेने के लिए बीएड से नीचे उतर कर हेंगर पर लटके अपने पेंट के पास आया. पेंट की पोचेट से मोबाइल ले कर मैं फिर से बीएड पर आ गया.
मोबाइल में मैंने सीधे मैसेंजर ओपन किया. मैं ये सोच रहा था की अगर वो लड़की सच में मेरी दीदी hi हैं तो वो इनबॉक्स में hi मुझसे बात करेंगी या कोई मैसेज भेजेंगी. सो मैंने मैसेंजर ओपन किया था और अब इनबॉक्स में देख रहा था. मैसेंजर में सबसे ऊपर जो पहला नाम था वो कुसुम पांडेय का hi था. मगर उसमे कोई मैसेज आया हुआ नज़र न आया. ये देख कर पता नहीं क्यों मैं मायूस सा हो गया.
अब मेरा दिल चाहता था की वो लड़की कुसुम दीदी hi हो और उनका कोई मैसेज आये. मैं मन hi मन गॉड से प्रे भी कर रहा था की प्ल्ज़ गॉड ये लड़की मेरी दीदी hi हो और ये मुझे मैसेज करे.
मैं अपनी तरफ से कोई मैसेज नहीं करना चाहता था क्यों की मैं पूरी तरह से अभी सूरे नहीं था की ये लड़की मेरी दीदी hi है. मगर मुझे कही न कही यकीन भी हो रहा था और मुझे इस नाम की लड़की के मैसेज का इंतज़ार था. मैं चाहता था की जल्द से जल्द इस नाम से कोई मैसेज मेरे पास आये.
रात काफी गुज़र चुकी थी. मुझे पता hi नहीं चला की मोबाइल हाथ में लिए मैं कब नींद के आगोश में चला गया था. कुछ देर बाद hi मेरी पलकों टेल एक ख्वाब चलने लगा था.
भाई लोग....
आज के लिए इतना hi....
रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....
कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....
:थैंक्यू:
अपडेट = 10
बीएड पर पड़ा मैं काफी देर तक अपनी पिछली लाइफ के बारे में सोचता रहा. मेरे पास मेरे घर का कोई कांटेक्ट नंबर नहीं था. पांच साल पहले जब मैं घर से निकला था तो खली हाथ hi था. मुझे घर का कोई नंबर याद नहीं था. मेरा खुद का जो मोबाइल था वो भी घर में hi रह गया था. मुझे अपना नंबर ज़रूर याद था. आज भी याद है. कई बार मेरे मन में आया भी था की एक बार अपने नंबर पर कॉल कर के चेक करू की नंबर अभी चालू है या नहीं. अगर चालू है तो कॉल कौन उठता है.?
मगर मैंने हर बार अपने मन की इस चाहत को दबा दिया था. इसका रीज़न ये था की मैं जब घर से निकला था तो बहुत दुखी और गुस्से में था. मुझे लग रहा था की मैं खुद को ख़तम कर दू. लाइफ इतनी दुःख भरी बन जाएगी ये सोचा नहीं था. जाने क्या लिखा था मेरी किस्मत में की मैं घर से खाली हाथ निकला तो हर जगह भूख प्यास और ठोकरों से बुरा हाल हो गया था.
मैंने भी ठान लिया था की मर जाउगा मगर घर में किसी से अब कभी बात नहीं करुगा और पिछले पांच साल से सच में मैंने किसी को फ़ोन तक नहीं लगाया था. इन पांच सालो में घर में क्या हुआ इसका मुझे कुछ भी पता नहीं था. मुझे सबसे ज़्यादा माँ और कुसुम दीदी की याद आती थी.
आ गया हु अजनबी शहर में घर से किनारा कर के.
अपनी ख़ुशी अपनी ज़िन्दगी को यु hi बेसहारा कर के.
जब भी नींद आती है तो ख्वाबो में देख कर,
मैं जी उठता हु फिर से बस तेरा नज़ारा कर के.
रात आधे से ज़्यादा गुज़र गयी थी मगर दक्षिणा दुबारा मेरे कमरे में नहीं आयी थी. शायद आज कुछ ज़्यादा hi नाराज़ हो गयी थी मुझसे. मेरी बातो से शायद उसके दिल को कुछ ज़्यादा hi दर्द हो गया था. मगर इसमें मैं क्या कर सकता था. उसे सब कुछ पता था इसके बाद भी उसने ऐसी चाहत की तो इसमें मेरी क्या गलती थी. ऐसा तो था नहीं की मैंने उसे पहले से बताया नहीं था. धोखे में नहीं रखा था मैंने उसे. बल्कि सब कुछ साफ़ साफ़ बता दिया था की मैं अपनी फॅमिली को ठुकरा कर सिर्फ उसका नहीं हो सकता.
उस वक्त मैंने फैसला कर लिया था की अब मैं यहाँ से चला जाउगा मगर अब जब दिमाग कुछ ठंडा हुआ तो मैंने सोचा की ऐसे अचानक चले जाना अच्छा नहीं होगा. क्यों की मेरे चले जाने से दक्षिणा का बहुत कुछ नुक्सान हो सकता था. उसकी रोज़ी रोटी उसकी दूकान hi थी जो चांदनी चौक में थी. उस दूकान पर अस ा ओनर मैं hi बैठता था और सम्हालता था. मेरे चले जाने से उसकी दूकान का क्या होगा.?
आखिर एक अकेली औरत कैसे ऐसी जगह में दूकान पर बैठ कर काम सम्हाल सकती थी.? ये उसके बस का काम बिलकुल भी नहीं था. दक्षिणा मेरे चले जाने से बिलकुल बेबस सी हो जाएगी. वो मुझे बेहद प्यार करती थी. सो ये भी हो सकता था की दुःख और परेशानी में वो कोई उल्टा सीधा कदम उठा ले.
मैं इन साड़ी सीटुएशन्स के बारे में डिटेल में सोचे जा रहा था. मुझे अहसास हुआ की यहाँ से चले जाना इतना आसान नहीं है मेरे लिए. मैं इतना खुदगर्ज़ भी नहीं हु की किसी को बेबस कर के यहाँ से चला जाओ. दक्षिणा मुझसे प्यार करती थी तो उसके प्यार की कुछ तो क़द्र करना hi चाहिए था मुझे.
मैंने फैसला कर लिया की कल दक्षिणा से इस बारे में तरीके से बात करुगा. उसे समझाऊंगा की हर चीज़ इंसान के चाहने से नहीं होती. सबकी अपनी अपनी चोइसस हैं. सब का अपना एक अलग परिवार है जिसकी जिम्मेदारियों में हर इंसान बंधा होता है.
अब एक क्वेश्चन ये था की मेरे बाद उसकी दूकान को कौन सम्हालेगा तो उसका भी कोई न कोई अच्छा सा इंतजाम करना hi पड़ेगा. इन्ही सब चीज़ो के बारे में सोचते सोचते जाने कब मेरी आँख लग गयी.
सुबह जब मेरी आँख खुली तो देखा 6 बज के 36 मिनट हो रहे थे. मैं टाइम देखने के बाद फ्रेश होने के लिए जल्द hi बाथरूम में घुस गया. बाथरूम से मैं सब कुछ क्लियर करके hi बाहर आया. आज की सुबह में चेंज ये था की हर रोज़ की तरह दक्षिणा मेरे पास नहीं थी और न hi वो मुझे बीएड टिया देने आयी थी. मैं समझ गया की मामला अभी भी गरम है.
तैयार होने के बाद मैं कमरे से बाहर आया और ड्रिंग रूम में जा कर सोफे पर बैठ गया. अंदर किचन से कुछ बर्तनो की आवाज़ आ रही थी. शायद दक्षिणा किचन में थी और ब्रेकफास्ट बना रही थी. उसको खाने में सब कुछ बनाना आता था. दक्षिणा के हाथ का बना खाना बहुत hi टेस्टी होता था. माइड 8 बजे तक आ जाती थी और अगर कभी वो आने में लेट हो जाती थी तो दक्षिणा खुद hi किचन में ब्रेकफास्ट तैयार करने लगती थी.
सुबह के 8 बज hi गए थे और रात से अब तक में दक्षिणा मेरे सामने नहीं आयी थी. मुझे भी समझ नहीं आ रहा था की मैं कैसे उसके पास जाओ और उससे बात करू.? थोड़ी hi देर में दूर बेल्ल बजी तो मैं उठ कर गया और दरवाज़ा खोला. दरवाज़े के बाहर माइड कड़ी थी. दरवाज़ा खोल कर मैं वापस चला आया जबकि माइड ने खुद hi दवाज़ा बंद किया और फिर अंदर की तरफ आयी थी.
यहाँ जो ये माइड आती थी वो एक औरत थी करीब 40 या 42 साल की. शकल सूरत कुछ ख़ास नहीं थी. थोड़ी सांवली थी मगर वो बन थान के hi आती थी. उसको सजने सवारने का बड़ा शौक था. दक्षिणा से वो कोई न कोई चीज़ ले hi लेती थी.
मैं सोफे पर बैठा टीवी देख रहा था. तभी माइड मेरे पास आयी और मुझसे नास्ता करने के लिए कहा तो मैंने टीवी बंद किया और डाइनिंग टेबल पर आ गया. मेरे कुर्सी पर बैठते hi माइड आयी और टेबल पर नास्ता लगाने लगी. वैसे तो ये काम माइड अक्सर hi करती थी. मगर दक्षिणा मेरे लिए नास्ते की थाली खुद hi लेके आती थी. बाद में भले hi माइड मुझे खाने की चीज़े देने आती रहे.
मैंने इस बारे में ज़्यादा नहीं सोचा और चुप चाप नास्ता करने लगा. मैंने महसूस किया की पुरे घर के अंदर शान्ति फैली हुयी थी. नास्ता करने के बाद मैं फिर से टीवी देखने के लिए सोफे पर आ कर बैठ गया. टीवी चालू करने के लिए मैंने रिमोट उठाया मगर फिर रख दिया. पता नहीं क्यों मुझे फिर से टीवी देखने की इच्छा hi न हुयी.
मैं सोफे से उठ कर कमरे में आ गया और बीएड पर लेट गया. लेट कर मैं दक्षिणा के बारे में सोचने लगा. माइड की वजह से मैं उससे खुल कर बात भी नहीं कर सकता था और इस तरह की सिचुएशन में मुझे यहाँ पर रहना भी मुश्किल लग रहा था. मुझे लग रहा था की कितना जल्दी मैं यहाँ से दूकान पर चला जाओ. वैसे तो मेरे जाने का टाइम हो hi गया था मगर मैं इस उम्मीद में यहाँ लेता हुआ था की शायद दक्षिणा मेरे कमरे में आये और कोई बात करे.
जब काफी देर तक इंतज़ार करने के बाद भी दक्षिणा नहीं आयी तो मुझे भी गुस्सा आने लगा. मैं बीएड से उठा और अपने कपड़ो को सही करने के बाद मोबाइल कार की चाभी और मिनी सूटकेस लिया. उसके बाद कमरे से बाहर आ गया. बाहर आते hi मैंने माइड के ज़रिये hi कहा की मैं दूकान जा रहा हु. किचन से रिप्लाई में कोई जवाब न आया तो मेरा दिमाग और भी ख़राब हो गया. मैं फिर रुका नहीं और पेअर पटकते हुए घर से बाहर निकल गया.
कार में बैठा मैं तेज़ स्पीड में कार चला रहा था. मेरे दिमाग में गुस्सा भरा हुआ था. दूकान पर जब मैं पंहुचा तो सरे worker's भी आ चुके थे. इन worker's में ये सबसे अच्छी बात थी की ये लोग टाइम से आ जाते थे. शायद इस लिए की मैं इन सबसे बहुत अच्छे ताल्लुकात बना के रखता था.
सारा दिन काउंटर में बैठा मैं कस्टमर्स का चेहरा देखता रहा और उनसे कई तरह की बाते करता रहा. लंच टाइम में मैंने आज फिर अपने एक वर्कर के साथ उसका लाया हुआ खाना hi थोड़ा बहुत खाया. उसके बाद फिर काउंटर पर बैठ गया.
मैं कभी शराब की तरफ देखता भी नहीं था. मैंने शराब पिने का अंजाम अपनी आँखों से देखा था. इस लिए शराब की तरफ कभी देखता तक नहीं था. मगर सिगरेट पि लेता था. दक्षिणा को नहीं पता था की मैं सिगरेट पिता हु. वैसे मैं रोज़ नहीं पिता था मगर किसी किसी दिन पि hi लेता था. अगर मुझे डेली की आदत होती तो मैं सिगरेट का पैकेट खरीद कर अपने पास hi रखता.
रात में दूकान बंद करवा के जब मैं कार से घर की तरफ जा रहा था तो रास्ते में एक पैन की दूकान के पास कार रोक कर मैंने उससे एक सिगरेट खरीदी और कार से बाहर hi पिने लगा था. इस वक्त मेरा दिमाग बहुत hi खराब था. इसकी वजह ये थी की आज सारा दिन मेरे मोबाइल पर दक्षिणा का कोई फ़ोन कॉल या मैसेज तक नहीं आया था. उसने मेरा कॉल तक नहीं उठाया था और न hi मेरे मैसेज का जवाब दिया था.
कहा मैंने उसके बारे में ये सोच कर यहाँ से चले जाने का अपना फैसला चेंज कर दिया था की वो अकेली औरत ऐसे में परेशां और दुखी हो जाएगी. मगर उसने तो मुझसे ऐसे बैर कर लिया था की मेरा कॉल तक नहीं उठाया था और न hi मेरे मैसेज का कोई जवाब दिया था. मुझे दक्षिणा पर बहुत गुस्सा आ रहा था. मुझे लग रहा था की इसी वक्त उसको अकेला छोड़ कर यहाँ से चला जाओ. फिर बैठी रहेगी रट हुए.
दक्षिणा समझती होगी की मैं उसके ऐसा करने पर उसे मनाऊंगा और उसकी चाहत को एक्सेप्ट कर लगा तो ये उसकी बहुत बड़ी भूल थी. उसने अपनी मर्ज़ी से अपना सब कुछ मुझे दिया था. उसने अपनी मर्ज़ी से मुझे ऐसा बनाया था. इसमें मेरी कही कोई गलती नहीं थी. मैं तो स्टार्टिंग में hi यहाँ से जाना चाहता था मगर उसने hi मुझे रोका था. उस वक्त सिचुएशन ठीक नहीं थी इस लिए मुझे भी इन दोनों माँ बेटी पर दया आ गयी थी और मैं रुक गया था.
मगर हर बार उसकी hi चाहत पूरी हो ऐसा तो नहीं हो सकता था न. सिगरेट पिटे पिटे मैं यही सब सोच रहा था. मैंने किरण से भी सब कुछ बता दिया था. वो मुझे अच्छी तरह समझती थी और कहती भी थी की मैं अपनी जगह सही हु. किरण भी इस बात पर राज़ी थी की उसकी माँ अगर चाहे तो दूसरी शादी कर ले. आखिर अकेले इतनी बड़ी लाइफ कैसे काट लेगी वो.? उसकी देख बाल के लिए और घर का खर्चा चलने के लिए कोई तो मर्द होना hi चाहिए था उसके लिए.
मैंने किरण से बात करने का सोचा और फिर मोबाइल निकाल कर उसे फ़ोन किया. कुछ देर बाद उसने मेरा कॉल उठाया तो मैंने पहले उससे उसका हाल चाल पूछा. उसके बाद मैंने कल रात की साडी कहानी उसे बतायी और आज सरे दिन की भी. मेरी साडी कहानी सुनने के बाद वो कुछ बोल न सकीय. मैंने उससे कहा की अब बताओ मैं इस सिचुएशन में क्या करू.? क्यों की अगर उसकी माँ मुझे किसी चीज़ के लिए फाॅर्स करेगी तो मैं यहाँ रुक नहीं सकता और न hi उसकी चाहत को एक्सेप्ट कर सकता हु.
मेरी बाते सुन कर किरण ने मुझसे कहा की वो माँ से बात कर के मुझे कॉल करेगी. किरण से बात करने के बाद मैंने बची हुयी सिगरेट को ज़मीन पर फेंक कर उसे जुटे से कुचला और फिर कार में आ कर बैठ गया.
कार की ड्राइविंग शीट पर बैठ कर मैं दक्षिणा और किरण के बारे में सोचने लगा. मैंने किरण को सब कुछ बता दिया था. उसने मुझसे कहा था की वो इस बारे में अपनी माँ से बात करेगी और फिर मुझे कॉल करेगी.
मुझे किरण के फ़ोन कॉल का इंतज़ार था. मैं उससे बात करने के बाद hi घर जाना चाहता था. इस लिए मैं कार में hi ख़ामोशी से बैठा था. मैं सोच रहा था की किरण आखिर अपनी माँ से इस बारे में क्या बात करेगी.? आखिर वो कैसे उसे समझाएगी की वो जो चाहती है वैसा हो सकने के बाद भी नहीं हो सकता. सबसे बड़ा सवाल ये की क्या दक्षिणा अपनी बेटी के समझने से समझेगी.? जब उसे पता चलेगा की मैंने उसकी बेटी से पिछली रात की साडी बातो को बता दिया है तो उसका मेरे लिए कैसा रिएक्शन होगा.?
मुझे बहुत टेंशन सी होने लगी थी. काफी देर हो गयी थी मगर अभी तक किरण की कॉल नहीं आयी थी. मैंने सोचा कही ऐसा तो नहीं की किरण ने अपनी माँ से बात hi न की हो. बल्कि मुझसे ऐसे hi कह दिया हो. मगर वो इतनी लापरवाह नहीं हो सकती थी. उसे पता था की ये बात कितनी गंभीर थी और कितना मायने रखती थी.
जब कुछ देर तक और किरण का कॉल न आया तो मैंने खुद उसे फ़ोन किया मगर उसका कॉल बिजी बता रहा था. इसका मतलब वो अपनी माँ से hi फ़ोन पर बात कर रही थी. मेरे पास अब इतंज़ार करने के अलावा कोई रास्ता नहीं था.
मुझे इंतज़ार करना बहुत मुश्किल लग रहा था. मुझे लग रहा था की टाइम एक जगह पर रुक गया है और अब आगे बढ़ hi नहीं रहा है. कार के अंदर बैठे बैठे मुझे घुटन सी होने लगी तो मैं कार से बाहर आ गया. एक दो बार इधर से उधर चार दो चार कदम चला उसके बाद मैं फिर से पैन की दुकान के पास आ गया.
पैन वाले से मैंने एक और सिगरेट खरीदी और उसे जला कर पिने लगा. मेरे दिमाग में काफी हलचल सी मची हुयी थी. मैं बार बार यही सोच रहा था की किरण ने अपनी माँ से क्या कहा होगा.? मैं ये सोच hi रहा था की मेरा मोबाइल बजने लगा.
मैंने जल्दी से पेंट की पॉकेट से मोबाइल निकला और कॉल पिक किया. कॉल किरण की hi थी. उसने मुझे बताया की उसने माँ से बात कर ली है. मैंने पूछा की क्या बात की है और उसकी माँ ने इस बारे में क्या कहा है तो उसने मुझे बताया की उसकी माँ बहुत रो रही थी. बार बार यही कह रही थी की वो मेरे बिना जी नहीं पायेगी. वो अकेले कैसे ये सब कर पायेगी. किरण ने कहा की मैंने उसे समझाया की विकाश उसका बन कर उसके पास हमेशा नहीं रह सकता. आखिर उसका भी अपना एक परिवार है.
किरण के समझने बुझाने का कोई फायदा नहीं हुआ शायद ऐसा उसने बताया. किरण की बाते सुन कर मुझे समझ न आया की अब मैं क्या करू.? दक्षिणा अपने दामाद को घर जमाई बनाना नहीं चाहती थी और किसी दूसरे से शादी नहीं करना चाहती थी. वो सिर्फ मुझे चाहती थी और अपने पास हमेशा के लिए रखना चाहती थी जो की संभव hi नहीं था.
किरण ने उल्टा मुझसे hi कहा की मैं किसी तरह सिचुएशन को हैंडल करू. मैं खुद अपने तरीके से उसे प्यार से समझाऊ तो शायद कुछ बात बने. किरण खुद भी अपनी माँ के लिए दुखी थी. उसे भी अहसास था की उसकी माँ का अकेले में क्या होगा.?
किरण से बात करने के बाद मैं बहुत देर तक सोचता रहा की क्या करू क्या न करू. जब कुछ समझ न आया तो कार में बैठ कर घर के लिए निकल पड़ा.
घर पंहुचा तो 10 से ज़्यादा का टाइम हो चूका था. दूर बेल्ल बजने पर दक्षिणा ने दरवाज़ा खोला तो मैं चुप चाप अंदर चला आया और सीधा कमरे में hi गया. कमरे में आ कर मैंने मिनी सूटकेस को एक तरफ रखा और कपडे उतार कर बाथरूम में घुस गया.
फ्रेश होने के बाद मैं वापस कमरे में आया और रात वाले कपडे पहन कर बीएड पर आराम से लेट गया. दरवाज़े के पास मैंने दक्षिणा से कोई बात नहीं की थी और न hi उसने कुछ कहा था मुझसे. मुझे समझ नहीं आ रहा था की दक्षिणा को फेस कैसे करू और उससे क्या बात करू.? आखिर कैसे इस सिचुएशन को सम्हालू.?
करीब 10 मिनट बाद दक्षिणा मेरे कमरे में आयी. उसके चेहरे से hi लग रहा था की वो खूब रोई थी. उसकी आँखे सुर्ख और सूझी हुयी थी. दक्षिणा में कोई कमी नहीं थी. इस आगे में भी वो अपनी बेटी की बड़ी बहन hi लगती थी. साफ़ गोरा चेहरा और सुंदरता की मूरत थी वो. उसके जिसम का हर हिस्सा आज भी वैसा hi कैसा हुआ था जैसे उसकी जवानी में कैसा हुआ रहा होगा. ये कुदरती बनावट थी उसके जिसम की. वो कोई योग या कसरत वगैरा नहीं करती थी. उसका जिसम hi ऐसा था.
कमरे में आ कर दक्षिणा बीएड के पास आ कर कड़ी हो गयी और मुझे दुखी अंदाज़ से देखने लगी. इस वक्त वो ऐसे लग रही थी जैसे कोई रूठी हुयी या नाराज़ सी कोई बच्ची हो. उसे इस तरह देख कर मुझे उस पर तरस भी आया और प्यार भी. मुझे उससे पूरी हमदर्दी थी और मुझे पूरा अहसास भी था की वो मुझे कितना चाहती है.
"मैंने फैसला कर लिया है विकाश की मुझे क्या करना है." उसने मुझे देखते हुए बच्चियों जैसे अंदाज़ में hi कहा तो मैंने उसकी तरफ देखते हुए नार्मल तरीके से कहा.
"कैसा फैसला.?" मैंने पूछा तो उसने कहा.
"यही की मेरे पास जो कुछ भी है वो सब कुछ मैं तुम्हारे नाम कर दूगी और फिर ज़हर खा कर खुद ख़ुशी कर लगी. खुद ख़ुशी करने से पहले मैं एक नोट भी लिख दूगी. उस नोट में ये लिखा होगा की मैं अपनी मौत की खुद hi जिम्मेदार हु. मेरी मौत के पीछे किसी का कोई हाथ नहीं है." दक्षिणा ने एक hi सांस में ऐसा कहा तो मेरे होश उड़ गए. मैं एक डैम से बीएड पर उठ कर बैठ गया था.
"व्हाट थे हेलल अरे यू टॉकिंग थिस नॉनसेन्स.? तुम्हारा दिमाग ख़राब हो गया है क्या.? पागल हो गयी हो तुम.?" मैंने गुस्से में कहा तो दक्षिणा की आँखों से आँशु बाह चले और फिर वो तेज़ आवाज़ में बोली.
"हाँ पागल हो गयी हु मैं. मेरा दिमाग ख़राब हो गया है. मुझे इसके अलावा अब कुछ भी नहीं सूझ रहा. तुम्हे मेरी कैफियत का ज़रा भी अहसास नहीं है. तुम ये सोचना hi नहीं चाहते की तुम्हारे चले जाने से मैं अकेली कैसे जी पाओगी और इतना बड़ा घर और प्रॉपर्टी को कैसे सम्हालूगी.? तुम्हे तो बस अपनी फॅमिली दिख रही है. मेरा प्यार मेरी बेबसी नहीं दिखती तुम्हे." दक्षिणा ने रट हुए तेज़ आवाज़ में ये सब कहा तो मैं देखता रह गया उसे.
"मुझे सब कुछ दीखता है दक्षिणा और मुझे हर बात का अहसास भी है. मैं पत्थर दिल नहीं hu...mere सीने में भी एक धड़कता हुआ दिल है जो किसी के भी जज़्बातो को अच्छी तरह से समझता है. अगर मुझे तुम्हारी कैफियत का और तुम्हारी बेबसी का अहसास नहीं होता तो इतने टाइम से तुम्हारे पास नहीं रह रहा होता. बल्कि कब का यहाँ से चला गया होता. मगर कही नहीं गया मैं. तुम्हारे पास hi रहा और तुम्हारे कारोबार को पूरी ईमानदारी से सम्हालता रहा. तुम प्यार में पागल हो चुकी हो दक्षिणा और इसी लिए तुम सिर्फ अपने बारे में सोचती हो. तुम्हे सिर्फ अपना दुःख और अपना अकेलापन hi दिखाई देता है. दूसरे का दुःख और दूसरे की मज़बूरी नहीं दिखती तुम्हे. मैं तो इतने साल से तुम्हारे बारे में सोच कर hi तुम्हारे पास रहा हु मगर क्या तुमने कभी ये सोचा की अगर मैं हमेशा के लिए तुम्हारा हो कर यहाँ रहने लगूंगा तो मेरी अपनी फॅमिली का क्या होगा.? मैंने पिछले 5 सालो में एक बार भी अपनी फॅमिली से बात नहीं की. मैं नहीं जनता की वो लोग किस हाल में होंगे. गांव में जिस तरह के हालात थे उन हालातो में वो कैसे खुद को सम्हाले होंगे. उनके साथ गांव के सरपंच ने क्या किया होगा. इन सब बातो के बारे में मुझे कुछ भी नहीं पता. मगर क्या तुमने कभी मुझे ज़ोर दे कर ये कहा की मैं एक बार अपने घर में फ़ोन लगा कर उनसे बात करू.?" मैंने अपने अंदर का सारा लावा उगलते हुए ऐसा कहा तो दक्षिणा चुप रह गयी.
शायद मेरी बातो का असर हुआ था उस पर. पहले जिस तरह के रंग में वो नज़र आयी थी अब वो रंग फीका पड़ा हुआ दिखने लगा था. जब वो कुछ न बोली तो मैंने फिर से चोट की.
"अपने बारे में और अपने सुख दुःख के बारे में तो हर कोई सोचता है. मगर इंसान वो है दक्षिणा जिसे दुसरो की तकलीफो का भी अहसास हो. सिर्फ अपने बारे में सोचना hi सही नहीं hota...kuch दुसरो के बारे में भी सोचना चाहिए. तुम्हे मुझसे ज़्यादा लाइफ का एक्सपीरियंस है मगर ये सब बाते मुझे खुद बताना पद रहा है तुम्हे." इस बार मैंने नार्मल लहजे में कहा तो दक्षिणा के चेहरे का वो बचा हुआ रंग भी कही गायब सा हो गया. वो अब एक डैम शांत दिखने लगी थी.
मैं भी यही चाहता था की दक्षिणा का दिल और दिमाग शांत हो जाये और फिर वो ठन्डे दिमाग से सोचे की क्या सही है क्या गलत. वो चुप चाप बीएड पर आ कर मेरे पास hi बैठ गयी.
"मैं जानती हु विकाश की तुम जो कह रहे हो वो सब सही है. मुझे भी इस बात का अहसास है की तुम अपनी फॅमिली को छोड़ कर हमेशा के लिए मेरे पास नहीं रह सकते और सच कहु तो ऐसा जायज़ भी नहीं है. हर इंसान के लिए उसकी फॅमिली सबसे इम्पोर्टेन्ट होती है. मगर मैं क्या करू vikash...jis सिचुएशन में मैं हु उस सिचुएशन में मुझे सिर्फ अपना hi दुःख सुख दिखाई देता है." दक्षिणा ने गंभीरता से ऐसा कहा तो मैंने उसकी तरफ देखा. उसने अपना सर झुका लिया था.
"चलो छोडो ये baate...is बारे में हम ठन्डे दिमाग से सोचेंगे और इसका कोई न कोई हल ज़रूर निकालेंगे." मैंने ऐसा कहा तो दक्षिणा ने आस भरी नज़रो से मेरी तरफ देखा मगर बोली कुछ न.
"ऐसे क्या देख रही हो.? मैंने कहा न कोई न कोई हल निकलेंगे." मैंने कहा तो वो बोली.
"किस तरह का हल निकालेंगे हम.?" दक्षिणा ने पूछा तो मैंने कहा.
"जिसमे तुम्हारा भी भला हो जाये और मेरा भी." मैंने मुस्कुरा कर कहा तो दक्षिणा हैरान सी होती दिखी मुझे.
"मैं कुछ समझी नहीं." दक्षिणा ने मेरे चेहरे की तरफ देखते हुए ऐसा कहा तो मैंने कहा.
"बड़ी साफ़ बात है दक्षिणा की मैं अपनी फॅमिली को तो छोड़ नहीं sakta...magar ये भी सच है की तुम्हे इस हाल में छोड़ कर भी नहीं जाना चाहता. सो हम कुछ ऐसा सोचेंगे की मुझसे मेरी फॅमिली भी न छूटे और तुम्हे मेरा साथ भी मिल जाये." मैंने ऐसा कहा तो दक्षिणा फिर हैरान हुयी.
"ऐसा कैसे हो सकेगा.?" दक्षिणा ने पूछा तो मैंने कहा.
"यही तो सोचना है हमें. मान लो अगर ऐसा हो जाता है तो क्या तुम ऐसा करना चाहोगी.?" मैंने ये कहते हुए उससे पूछा तो दक्षिणा ने हाँ में सर हिलाया.
"मुझे मंजूर है. मुझे अच्छी तरह पता है की दो में से एक हì चीज़ नहीं हो सकती. दोनों hi चीज़े इम्पोर्टेन्ट हैं इस लिए अगर ऐसा हो जाता है तो मुझे ये मंजूर है. तुम अपनी फॅमिली को न छोडो और न मैं कभी कहुगी की उन्हें छोडो. मैं बस ये चाहती हु की इतनी बड़ी दुनिया में मैं अकेली न रह जाओ. मेरा दिल मेरी जान तुमसे लगे हुए हैं तो तुम मेरे भी बने रहना. मगर ऐसा होगा कैसे.?" दक्षिणा ने पूछा तो मैं सोच में पद गया. मैं सोच नहीं प् रहा था की ऐसा कैसे करुगा मैं.?
"अभी तो मुझे खुद कुछ समझ नहीं आ रहा दक्षिणा मगर हम दोनों इस बारे में सोचेंगे तो ज़रूर कोई न कोई सलूशन निकलेगा." मैंने दक्षिणा के दोनों कंधो को पकड़ते हुए कहा तो दक्षिणा मेरी आँखों में देखने लगी. मैं भी उसकी आँखों में देख रहा था.
दक्षिणा के चेहरे पर अब मुझे राहत और सुकून नज़र आने लगा था. शायद उसके दिल और दिमाग से बहुत बड़ा बोझ हैट गया था. वो मुस्कुराई और फिर मुझसे लिपट गयी. थोड़ी देर बाद वो मुझसे अलग हुयी और मेरे होठो को हलके से चूम कर बीएड से उतर गयी.
"चलो मेरे बालम अब कुछ पेट पूजा भी कर लो. पता नहीं आज दिन में कुछ खाया भी था या नहीं." दक्षिणा ने मुस्कुराते हुए ये कहा तो मैं भी मुस्कुराया.
"चलो मैं आता हु." मैंने कहा तो दक्षिणा कुछ देर मुझे देखती रही फिर जल्दी से आने का कह कर कमरे से बाकर निकल गयी.
रात में खाना पीना कर के मैं अपने कमरे में आया और बीएड पर लेट गया. कुछ देर बाद दक्षिणा भी आ गयी और मेरे बगल से hi लेट गयी. वो मुझसे चिपक कर लेती हुयी थी और उसने अपना चेहरा मेरे सीने में रखा हुआ था. मैं जनता था की वो अब नाराज़ नहीं है बल्कि खुश है.
"I'm सॉरी.." दक्षिणा ने धीरे से कहा तो मैंने उसकी तरफ देखा और फिर बोलै.
"किस बात के लिए.?" मैंने पूछा तो दक्षिणा ने अपना चेहरा उठाया और फिर मेरी तरफ देखते हुए बोली.
"कल रात और आज सरे दिन के लिए." दक्षिणा ने कहा तो मुझे कुछ समझ न आया.
"क्या मतलब.?" मैंने उसकी तरफ देखते हुए कहा तो वो बोली.
"मतलब ये की मैं कल रात तुमसे नाराज़ हो कर चली आयी थी और फिर आज सारा दिन भी तुमसे कोई बात नहीं की थी और नहीं तुम्हारे फ़ोन कॉल्स और मेस्सगेस का कोई जवाब दिया था. इस लिए इस सबके लिए सॉरी." दक्षिणा ने पुरे डिटेल में ये सब बताया तो मैं मुस्कुरा पड़ा.
"छोडो इस बात को." मैंने कहा तो दक्षिणा ने मेरी तरफ कुछ देर तक देखा फिर बोली.
"अच्छा ये बताओ की हम ऐसा क्या करेंगे की हम दोनों का hi काम बन जाये.? मतलब तुम मेरे पास भी रहो और तुम्हे अपनी फॅमिली को भी न छोड़ना पड़े.?" दक्षिणा ने ये कहा तो मैं एक बार फिर सोच में पद गया.
"अभी कुछ सोचा नहीं hai...magar सोचना ज़रूर पड़ेगा. अभी तो यही एक मसला है की मैंने अपनी फॅमिली से पिछले 5 सालो से कोई बात hi नहीं की है." मैंने ऐसा कहा तो दक्षिणा ने कहा.
"तुम्हे एक बार अपने घर वालो को फ़ोन करना चाहिए था. गलतिया हर इंसान से होती हैं मगर इसका ये मतलब नहीं की हम उन गलतियों के लिए किसी को माफ़ hi न करे." दक्षिणा ने ऐसा कहा तो मुझे अपना पिछले सब कुछ याद आने लगा. मैंने बड़ी मुश्किल से अपने आपको सम्हाला.
"शायद कुछ गलतियों के लिए कोई माफ़ी नहीं होती dakshina...wo भी अगर वैसी hi गलतिया बार बार हो तो. एक गुनाह तो चलो हजम भी हो जायेगा मगर दूसरा गुनाह कैसे हजम कर लेगा कोई.?" मैंने गंभीरता से कहा तो दक्षिणा ने मेरे कंधे पर अपना हाथ रख कर दबाया.
"मगर ये गुनाह तो नहीं है न विकाश." दक्षिणा ने ये कहा तो मैं बोल पड़ा.
"सब को तो यही लगता है न की मैंने जो किया वो कभी न माफ़ करने वाला गुनाह किया है. जिसके लिए मेरे बाप ने मुझे घर से निकाल दिया था. मेरी किसी ने एक न सुनी थी. मैं चीखता रहा tha...mujhe लाठियों से मारा गया था. मेरी माँ मेरी दोनों जुड़वाँ बहने मुझे मार कहते देख रोटी बिलखती रही थी मगर मेरे बाप के दर से कोई मुझे बचने नहीं आया था और फिर मेरे बाप ने उसी हालत में मुझे घर से निकल जाने के लिए कह दिया था. उस वक्त मुझे लग रहा था की मैं खुद को क्या कर दालु. हर तरफ मौत hi मौत नज़र आ रही थी मुझे." मैंने तेज़ लहजे में ऐसा कहा और चुप हो गया. मेरी आँखों से आँशु निकलने लगे थे. दक्षिणा को साडी कहानी पता थी. वो मेरे दिल का हाल समझती थी इस लिए वो मुझे खुद से छुपका कर दिलाशा देने लगी थी.
"दिल जब दुःख जाता है न दक्षिणा तो फिर किसी से भी लगाव नहीं रह जाता. दिल और दिमाग वैरागी सा हो जाता है. वही हाल मेरा है. मुझे आज भी सब की याद आती है मगर जब उस हादसे की याद आती है न तो ज़ख्म फिर से हरा हो जाता है." मैंने दक्षिणा से अलग हो कर उससे ऐसा कहा तो उसने कहा.
"ऐसा कब तक चलेगा और इससे हासिल भी क्या होगा विकाश.? नाराज़गी या गुस्सा थोड़े टाइम के लिए hi अच्छा होता है. तुम पिछले 5 सालो से अपने घर वालो से दूर हो और इन 5 सालो में तुमने कभी उनसे बात करने की कोशिश तक नहीं की. ये अच्छा नहीं किया तुमने. तुम्हे सोचना चाहिए था की जिन हालातो में तुम अपनी फॅमिली को छोड़ कर चले आये थे उसके बाद उनका क्या हुआ होगा.? तुम्हारी कुसुम दीदी जिसकी हर सुबह सिर्फ तुम्हे देखने के बाद hi शुरू होती थी उसका क्या हाल हुआ होगा.? तुम्हारी दोनों जुड़वाँ बहने और तुम्हारी माँ जो तुम्हे अपने कलेजे का टुकड़ा मानती है. रही बात तुम्हारे पिता जी की तो उन हालातो में अगर उन्होंने तुम्हारे साथ ऐसा किया भी था तो वो गलत नहीं था. गुस्से में इंसान बहुत कुछ कर जाता है मगर जब दिमाग शांत हो जाता है तब उसे अहसास होता है उसने गुस्से में क्या कर दिया है. मुझे पूरा भरोसा है विकाश की जब तुम्हारे पिता जी का दिमाग शांत हुआ होगा तो उन्हें अपनी गलती का अहसास ज़रूर हुआ होगा. मगर शायद तब तक देर हो चुकी थी." दक्षिणा ने ये सब कहा तो मैं कुछ न बोलै. मुझे चुप देख कर उसने फिर बोलना शुरू किया.
"अगर तुम ये कहते हो की तुम अपनी फॅमिली को नहीं छोड़ सकते तो फिर तुम्हे अपनी फॅमिली से बात करना चाहिए. गलती किसी की भी हो मगर झुकने से अगर बात बन जाती है तो झुकना hi चाहिए. आखिर वो तुम्हारे अपने हैं. एक पिता कभी अपना दिल खोल कर नहीं dikhata...wo अपना प्यार दिल में hi छुपा कर रखता है. तुम भी इस बात को जानते होंगे की तुम्हारे पिता जी तुमसे कितना प्यार करते रहे होंगे. बच्चे भले hi बुरे हो जाये मगर वो अपने माँ बाप के लिए सबसे प्यारे hi होते हैं. इस लिए विकाश तुम इतने पत्थर दिल मत bano...aur अपने परिवार के लोगो से बात करो. अपने पिता जी के बाद एक तुम hi हो जो अपनी माँ और बहनो का ख़याल रख सकते हो. इस बारे में तुम्हे सोचना चाहिए था." दक्षिणा ने ये सब कहा तो मेरे दिमाग में जैसे कोई धमाका सा हुआ.
इतने सालो से मैं सिर्फ एक hi चीज़ को लिए बैठा था और उसकी hi वजह से मैं अपने परिवार से बात तक नहीं करता था. सच hi तो कह रही थी दक्षिणा की पिता जी के बाद एक मैं hi था जो अपनी माँ और बहनो का अच्छे से ख़याल रख सकता था और ये मेरी रेस्पॉन्सिबिल्टी भी थी. आज मेरे घर वाले किस हाल में होंगे इसका मुझे कोई आईडिया नहीं था. मैं ये सब सोचते सोचते अपने आपको एक डैम से बहुत बड़ा गुनहगार सा फील करने लगा था.
दक्षिणा मेरी हालत को समझ सकती थी इस लिए उसने मुझे फिर से खुद से लगा लिया. मैं आँखे बंद किये लेता हुआ था. दक्षिणा सिचुएशन को समझती थी इस लिए उसने आज मुझसे सेक्स से रिलेटेड कोई बात नहीं की थी. मेरी भी सेक्स की कोई इच्छा नहीं थी.
दक्षिणा तो सो गयी थी मगर मुझे नींद नहीं आ रही थी. मेरे दिमाग में दक्षिणा की बाते घूम रही थी. मेरे घर वाले किस हाल में honge..ye सोच सोच कर अब मेरा दिल बैठा जा रहा था.
मैं बीएड पर लेते काफी देर तक यही सब सोचता रहा. तभी मुझे फेसबुक की कुसुम पांडेय का ख़याल आया तो मैं अपना मोबाइल लेने के लिए बीएड से नीचे उतर कर हेंगर पर लटके अपने पेंट के पास आया. पेंट की पोचेट से मोबाइल ले कर मैं फिर से बीएड पर आ गया.
मोबाइल में मैंने सीधे मैसेंजर ओपन किया. मैं ये सोच रहा था की अगर वो लड़की सच में मेरी दीदी hi हैं तो वो इनबॉक्स में hi मुझसे बात करेंगी या कोई मैसेज भेजेंगी. सो मैंने मैसेंजर ओपन किया था और अब इनबॉक्स में देख रहा था. मैसेंजर में सबसे ऊपर जो पहला नाम था वो कुसुम पांडेय का hi था. मगर उसमे कोई मैसेज आया हुआ नज़र न आया. ये देख कर पता नहीं क्यों मैं मायूस सा हो गया.
अब मेरा दिल चाहता था की वो लड़की कुसुम दीदी hi हो और उनका कोई मैसेज आये. मैं मन hi मन गॉड से प्रे भी कर रहा था की प्ल्ज़ गॉड ये लड़की मेरी दीदी hi हो और ये मुझे मैसेज करे.
मैं अपनी तरफ से कोई मैसेज नहीं करना चाहता था क्यों की मैं पूरी तरह से अभी सूरे नहीं था की ये लड़की मेरी दीदी hi है. मगर मुझे कही न कही यकीन भी हो रहा था और मुझे इस नाम की लड़की के मैसेज का इंतज़ार था. मैं चाहता था की जल्द से जल्द इस नाम से कोई मैसेज मेरे पास आये.
रात काफी गुज़र चुकी थी. मुझे पता hi नहीं चला की मोबाइल हाथ में लिए मैं कब नींद के आगोश में चला गया था. कुछ देर बाद hi मेरी पलकों टेल एक ख्वाब चलने लगा था.
भाई लोग....
आज के लिए इतना hi....
रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....
कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....
:थैंक्यू: