SAB KUCH JAYAZ HAI... - Page 3 - SexBaba
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SAB KUCH JAYAZ HAI...

सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 10


बीएड पर पड़ा मैं काफी देर तक अपनी पिछली लाइफ के बारे में सोचता रहा. मेरे पास मेरे घर का कोई कांटेक्ट नंबर नहीं था. पांच साल पहले जब मैं घर से निकला था तो खली हाथ hi था. मुझे घर का कोई नंबर याद नहीं था. मेरा खुद का जो मोबाइल था वो भी घर में hi रह गया था. मुझे अपना नंबर ज़रूर याद था. आज भी याद है. कई बार मेरे मन में आया भी था की एक बार अपने नंबर पर कॉल कर के चेक करू की नंबर अभी चालू है या नहीं. अगर चालू है तो कॉल कौन उठता है.?

मगर मैंने हर बार अपने मन की इस चाहत को दबा दिया था. इसका रीज़न ये था की मैं जब घर से निकला था तो बहुत दुखी और गुस्से में था. मुझे लग रहा था की मैं खुद को ख़तम कर दू. लाइफ इतनी दुःख भरी बन जाएगी ये सोचा नहीं था. जाने क्या लिखा था मेरी किस्मत में की मैं घर से खाली हाथ निकला तो हर जगह भूख प्यास और ठोकरों से बुरा हाल हो गया था.

मैंने भी ठान लिया था की मर जाउगा मगर घर में किसी से अब कभी बात नहीं करुगा और पिछले पांच साल से सच में मैंने किसी को फ़ोन तक नहीं लगाया था. इन पांच सालो में घर में क्या हुआ इसका मुझे कुछ भी पता नहीं था. मुझे सबसे ज़्यादा माँ और कुसुम दीदी की याद आती थी.

आ गया हु अजनबी शहर में घर से किनारा कर के.

अपनी ख़ुशी अपनी ज़िन्दगी को यु hi बेसहारा कर के.

जब भी नींद आती है तो ख्वाबो में देख कर,

मैं जी उठता हु फिर से बस तेरा नज़ारा कर के.

रात आधे से ज़्यादा गुज़र गयी थी मगर दक्षिणा दुबारा मेरे कमरे में नहीं आयी थी. शायद आज कुछ ज़्यादा hi नाराज़ हो गयी थी मुझसे. मेरी बातो से शायद उसके दिल को कुछ ज़्यादा hi दर्द हो गया था. मगर इसमें मैं क्या कर सकता था. उसे सब कुछ पता था इसके बाद भी उसने ऐसी चाहत की तो इसमें मेरी क्या गलती थी. ऐसा तो था नहीं की मैंने उसे पहले से बताया नहीं था. धोखे में नहीं रखा था मैंने उसे. बल्कि सब कुछ साफ़ साफ़ बता दिया था की मैं अपनी फॅमिली को ठुकरा कर सिर्फ उसका नहीं हो सकता.

उस वक्त मैंने फैसला कर लिया था की अब मैं यहाँ से चला जाउगा मगर अब जब दिमाग कुछ ठंडा हुआ तो मैंने सोचा की ऐसे अचानक चले जाना अच्छा नहीं होगा. क्यों की मेरे चले जाने से दक्षिणा का बहुत कुछ नुक्सान हो सकता था. उसकी रोज़ी रोटी उसकी दूकान hi थी जो चांदनी चौक में थी. उस दूकान पर अस ा ओनर मैं hi बैठता था और सम्हालता था. मेरे चले जाने से उसकी दूकान का क्या होगा.?

आखिर एक अकेली औरत कैसे ऐसी जगह में दूकान पर बैठ कर काम सम्हाल सकती थी.? ये उसके बस का काम बिलकुल भी नहीं था. दक्षिणा मेरे चले जाने से बिलकुल बेबस सी हो जाएगी. वो मुझे बेहद प्यार करती थी. सो ये भी हो सकता था की दुःख और परेशानी में वो कोई उल्टा सीधा कदम उठा ले.

मैं इन साड़ी सीटुएशन्स के बारे में डिटेल में सोचे जा रहा था. मुझे अहसास हुआ की यहाँ से चले जाना इतना आसान नहीं है मेरे लिए. मैं इतना खुदगर्ज़ भी नहीं हु की किसी को बेबस कर के यहाँ से चला जाओ. दक्षिणा मुझसे प्यार करती थी तो उसके प्यार की कुछ तो क़द्र करना hi चाहिए था मुझे.

मैंने फैसला कर लिया की कल दक्षिणा से इस बारे में तरीके से बात करुगा. उसे समझाऊंगा की हर चीज़ इंसान के चाहने से नहीं होती. सबकी अपनी अपनी चोइसस हैं. सब का अपना एक अलग परिवार है जिसकी जिम्मेदारियों में हर इंसान बंधा होता है.

अब एक क्वेश्चन ये था की मेरे बाद उसकी दूकान को कौन सम्हालेगा तो उसका भी कोई न कोई अच्छा सा इंतजाम करना hi पड़ेगा. इन्ही सब चीज़ो के बारे में सोचते सोचते जाने कब मेरी आँख लग गयी.

सुबह जब मेरी आँख खुली तो देखा 6 बज के 36 मिनट हो रहे थे. मैं टाइम देखने के बाद फ्रेश होने के लिए जल्द hi बाथरूम में घुस गया. बाथरूम से मैं सब कुछ क्लियर करके hi बाहर आया. आज की सुबह में चेंज ये था की हर रोज़ की तरह दक्षिणा मेरे पास नहीं थी और न hi वो मुझे बीएड टिया देने आयी थी. मैं समझ गया की मामला अभी भी गरम है.

तैयार होने के बाद मैं कमरे से बाहर आया और ड्रिंग रूम में जा कर सोफे पर बैठ गया. अंदर किचन से कुछ बर्तनो की आवाज़ आ रही थी. शायद दक्षिणा किचन में थी और ब्रेकफास्ट बना रही थी. उसको खाने में सब कुछ बनाना आता था. दक्षिणा के हाथ का बना खाना बहुत hi टेस्टी होता था. माइड 8 बजे तक आ जाती थी और अगर कभी वो आने में लेट हो जाती थी तो दक्षिणा खुद hi किचन में ब्रेकफास्ट तैयार करने लगती थी.

सुबह के 8 बज hi गए थे और रात से अब तक में दक्षिणा मेरे सामने नहीं आयी थी. मुझे भी समझ नहीं आ रहा था की मैं कैसे उसके पास जाओ और उससे बात करू.? थोड़ी hi देर में दूर बेल्ल बजी तो मैं उठ कर गया और दरवाज़ा खोला. दरवाज़े के बाहर माइड कड़ी थी. दरवाज़ा खोल कर मैं वापस चला आया जबकि माइड ने खुद hi दवाज़ा बंद किया और फिर अंदर की तरफ आयी थी.

यहाँ जो ये माइड आती थी वो एक औरत थी करीब 40 या 42 साल की. शकल सूरत कुछ ख़ास नहीं थी. थोड़ी सांवली थी मगर वो बन थान के hi आती थी. उसको सजने सवारने का बड़ा शौक था. दक्षिणा से वो कोई न कोई चीज़ ले hi लेती थी.

मैं सोफे पर बैठा टीवी देख रहा था. तभी माइड मेरे पास आयी और मुझसे नास्ता करने के लिए कहा तो मैंने टीवी बंद किया और डाइनिंग टेबल पर आ गया. मेरे कुर्सी पर बैठते hi माइड आयी और टेबल पर नास्ता लगाने लगी. वैसे तो ये काम माइड अक्सर hi करती थी. मगर दक्षिणा मेरे लिए नास्ते की थाली खुद hi लेके आती थी. बाद में भले hi माइड मुझे खाने की चीज़े देने आती रहे.

मैंने इस बारे में ज़्यादा नहीं सोचा और चुप चाप नास्ता करने लगा. मैंने महसूस किया की पुरे घर के अंदर शान्ति फैली हुयी थी. नास्ता करने के बाद मैं फिर से टीवी देखने के लिए सोफे पर आ कर बैठ गया. टीवी चालू करने के लिए मैंने रिमोट उठाया मगर फिर रख दिया. पता नहीं क्यों मुझे फिर से टीवी देखने की इच्छा hi न हुयी.

मैं सोफे से उठ कर कमरे में आ गया और बीएड पर लेट गया. लेट कर मैं दक्षिणा के बारे में सोचने लगा. माइड की वजह से मैं उससे खुल कर बात भी नहीं कर सकता था और इस तरह की सिचुएशन में मुझे यहाँ पर रहना भी मुश्किल लग रहा था. मुझे लग रहा था की कितना जल्दी मैं यहाँ से दूकान पर चला जाओ. वैसे तो मेरे जाने का टाइम हो hi गया था मगर मैं इस उम्मीद में यहाँ लेता हुआ था की शायद दक्षिणा मेरे कमरे में आये और कोई बात करे.

जब काफी देर तक इंतज़ार करने के बाद भी दक्षिणा नहीं आयी तो मुझे भी गुस्सा आने लगा. मैं बीएड से उठा और अपने कपड़ो को सही करने के बाद मोबाइल कार की चाभी और मिनी सूटकेस लिया. उसके बाद कमरे से बाहर आ गया. बाहर आते hi मैंने माइड के ज़रिये hi कहा की मैं दूकान जा रहा हु. किचन से रिप्लाई में कोई जवाब न आया तो मेरा दिमाग और भी ख़राब हो गया. मैं फिर रुका नहीं और पेअर पटकते हुए घर से बाहर निकल गया.

कार में बैठा मैं तेज़ स्पीड में कार चला रहा था. मेरे दिमाग में गुस्सा भरा हुआ था. दूकान पर जब मैं पंहुचा तो सरे worker's भी आ चुके थे. इन worker's में ये सबसे अच्छी बात थी की ये लोग टाइम से आ जाते थे. शायद इस लिए की मैं इन सबसे बहुत अच्छे ताल्लुकात बना के रखता था.

सारा दिन काउंटर में बैठा मैं कस्टमर्स का चेहरा देखता रहा और उनसे कई तरह की बाते करता रहा. लंच टाइम में मैंने आज फिर अपने एक वर्कर के साथ उसका लाया हुआ खाना hi थोड़ा बहुत खाया. उसके बाद फिर काउंटर पर बैठ गया.

मैं कभी शराब की तरफ देखता भी नहीं था. मैंने शराब पिने का अंजाम अपनी आँखों से देखा था. इस लिए शराब की तरफ कभी देखता तक नहीं था. मगर सिगरेट पि लेता था. दक्षिणा को नहीं पता था की मैं सिगरेट पिता हु. वैसे मैं रोज़ नहीं पिता था मगर किसी किसी दिन पि hi लेता था. अगर मुझे डेली की आदत होती तो मैं सिगरेट का पैकेट खरीद कर अपने पास hi रखता.

रात में दूकान बंद करवा के जब मैं कार से घर की तरफ जा रहा था तो रास्ते में एक पैन की दूकान के पास कार रोक कर मैंने उससे एक सिगरेट खरीदी और कार से बाहर hi पिने लगा था. इस वक्त मेरा दिमाग बहुत hi खराब था. इसकी वजह ये थी की आज सारा दिन मेरे मोबाइल पर दक्षिणा का कोई फ़ोन कॉल या मैसेज तक नहीं आया था. उसने मेरा कॉल तक नहीं उठाया था और न hi मेरे मैसेज का जवाब दिया था.

कहा मैंने उसके बारे में ये सोच कर यहाँ से चले जाने का अपना फैसला चेंज कर दिया था की वो अकेली औरत ऐसे में परेशां और दुखी हो जाएगी. मगर उसने तो मुझसे ऐसे बैर कर लिया था की मेरा कॉल तक नहीं उठाया था और न hi मेरे मैसेज का कोई जवाब दिया था. मुझे दक्षिणा पर बहुत गुस्सा आ रहा था. मुझे लग रहा था की इसी वक्त उसको अकेला छोड़ कर यहाँ से चला जाओ. फिर बैठी रहेगी रट हुए.

दक्षिणा समझती होगी की मैं उसके ऐसा करने पर उसे मनाऊंगा और उसकी चाहत को एक्सेप्ट कर लगा तो ये उसकी बहुत बड़ी भूल थी. उसने अपनी मर्ज़ी से अपना सब कुछ मुझे दिया था. उसने अपनी मर्ज़ी से मुझे ऐसा बनाया था. इसमें मेरी कही कोई गलती नहीं थी. मैं तो स्टार्टिंग में hi यहाँ से जाना चाहता था मगर उसने hi मुझे रोका था. उस वक्त सिचुएशन ठीक नहीं थी इस लिए मुझे भी इन दोनों माँ बेटी पर दया आ गयी थी और मैं रुक गया था.

मगर हर बार उसकी hi चाहत पूरी हो ऐसा तो नहीं हो सकता था न. सिगरेट पिटे पिटे मैं यही सब सोच रहा था. मैंने किरण से भी सब कुछ बता दिया था. वो मुझे अच्छी तरह समझती थी और कहती भी थी की मैं अपनी जगह सही हु. किरण भी इस बात पर राज़ी थी की उसकी माँ अगर चाहे तो दूसरी शादी कर ले. आखिर अकेले इतनी बड़ी लाइफ कैसे काट लेगी वो.? उसकी देख बाल के लिए और घर का खर्चा चलने के लिए कोई तो मर्द होना hi चाहिए था उसके लिए.

मैंने किरण से बात करने का सोचा और फिर मोबाइल निकाल कर उसे फ़ोन किया. कुछ देर बाद उसने मेरा कॉल उठाया तो मैंने पहले उससे उसका हाल चाल पूछा. उसके बाद मैंने कल रात की साडी कहानी उसे बतायी और आज सरे दिन की भी. मेरी साडी कहानी सुनने के बाद वो कुछ बोल न सकीय. मैंने उससे कहा की अब बताओ मैं इस सिचुएशन में क्या करू.? क्यों की अगर उसकी माँ मुझे किसी चीज़ के लिए फाॅर्स करेगी तो मैं यहाँ रुक नहीं सकता और न hi उसकी चाहत को एक्सेप्ट कर सकता हु.

मेरी बाते सुन कर किरण ने मुझसे कहा की वो माँ से बात कर के मुझे कॉल करेगी. किरण से बात करने के बाद मैंने बची हुयी सिगरेट को ज़मीन पर फेंक कर उसे जुटे से कुचला और फिर कार में आ कर बैठ गया.

कार की ड्राइविंग शीट पर बैठ कर मैं दक्षिणा और किरण के बारे में सोचने लगा. मैंने किरण को सब कुछ बता दिया था. उसने मुझसे कहा था की वो इस बारे में अपनी माँ से बात करेगी और फिर मुझे कॉल करेगी.

मुझे किरण के फ़ोन कॉल का इंतज़ार था. मैं उससे बात करने के बाद hi घर जाना चाहता था. इस लिए मैं कार में hi ख़ामोशी से बैठा था. मैं सोच रहा था की किरण आखिर अपनी माँ से इस बारे में क्या बात करेगी.? आखिर वो कैसे उसे समझाएगी की वो जो चाहती है वैसा हो सकने के बाद भी नहीं हो सकता. सबसे बड़ा सवाल ये की क्या दक्षिणा अपनी बेटी के समझने से समझेगी.? जब उसे पता चलेगा की मैंने उसकी बेटी से पिछली रात की साडी बातो को बता दिया है तो उसका मेरे लिए कैसा रिएक्शन होगा.?

मुझे बहुत टेंशन सी होने लगी थी. काफी देर हो गयी थी मगर अभी तक किरण की कॉल नहीं आयी थी. मैंने सोचा कही ऐसा तो नहीं की किरण ने अपनी माँ से बात hi न की हो. बल्कि मुझसे ऐसे hi कह दिया हो. मगर वो इतनी लापरवाह नहीं हो सकती थी. उसे पता था की ये बात कितनी गंभीर थी और कितना मायने रखती थी.

जब कुछ देर तक और किरण का कॉल न आया तो मैंने खुद उसे फ़ोन किया मगर उसका कॉल बिजी बता रहा था. इसका मतलब वो अपनी माँ से hi फ़ोन पर बात कर रही थी. मेरे पास अब इतंज़ार करने के अलावा कोई रास्ता नहीं था.

मुझे इंतज़ार करना बहुत मुश्किल लग रहा था. मुझे लग रहा था की टाइम एक जगह पर रुक गया है और अब आगे बढ़ hi नहीं रहा है. कार के अंदर बैठे बैठे मुझे घुटन सी होने लगी तो मैं कार से बाहर आ गया. एक दो बार इधर से उधर चार दो चार कदम चला उसके बाद मैं फिर से पैन की दुकान के पास आ गया.

पैन वाले से मैंने एक और सिगरेट खरीदी और उसे जला कर पिने लगा. मेरे दिमाग में काफी हलचल सी मची हुयी थी. मैं बार बार यही सोच रहा था की किरण ने अपनी माँ से क्या कहा होगा.? मैं ये सोच hi रहा था की मेरा मोबाइल बजने लगा.

मैंने जल्दी से पेंट की पॉकेट से मोबाइल निकला और कॉल पिक किया. कॉल किरण की hi थी. उसने मुझे बताया की उसने माँ से बात कर ली है. मैंने पूछा की क्या बात की है और उसकी माँ ने इस बारे में क्या कहा है तो उसने मुझे बताया की उसकी माँ बहुत रो रही थी. बार बार यही कह रही थी की वो मेरे बिना जी नहीं पायेगी. वो अकेले कैसे ये सब कर पायेगी. किरण ने कहा की मैंने उसे समझाया की विकाश उसका बन कर उसके पास हमेशा नहीं रह सकता. आखिर उसका भी अपना एक परिवार है.

किरण के समझने बुझाने का कोई फायदा नहीं हुआ शायद ऐसा उसने बताया. किरण की बाते सुन कर मुझे समझ न आया की अब मैं क्या करू.? दक्षिणा अपने दामाद को घर जमाई बनाना नहीं चाहती थी और किसी दूसरे से शादी नहीं करना चाहती थी. वो सिर्फ मुझे चाहती थी और अपने पास हमेशा के लिए रखना चाहती थी जो की संभव hi नहीं था.

किरण ने उल्टा मुझसे hi कहा की मैं किसी तरह सिचुएशन को हैंडल करू. मैं खुद अपने तरीके से उसे प्यार से समझाऊ तो शायद कुछ बात बने. किरण खुद भी अपनी माँ के लिए दुखी थी. उसे भी अहसास था की उसकी माँ का अकेले में क्या होगा.?

किरण से बात करने के बाद मैं बहुत देर तक सोचता रहा की क्या करू क्या न करू. जब कुछ समझ न आया तो कार में बैठ कर घर के लिए निकल पड़ा.

घर पंहुचा तो 10 से ज़्यादा का टाइम हो चूका था. दूर बेल्ल बजने पर दक्षिणा ने दरवाज़ा खोला तो मैं चुप चाप अंदर चला आया और सीधा कमरे में hi गया. कमरे में आ कर मैंने मिनी सूटकेस को एक तरफ रखा और कपडे उतार कर बाथरूम में घुस गया.

फ्रेश होने के बाद मैं वापस कमरे में आया और रात वाले कपडे पहन कर बीएड पर आराम से लेट गया. दरवाज़े के पास मैंने दक्षिणा से कोई बात नहीं की थी और न hi उसने कुछ कहा था मुझसे. मुझे समझ नहीं आ रहा था की दक्षिणा को फेस कैसे करू और उससे क्या बात करू.? आखिर कैसे इस सिचुएशन को सम्हालू.?

करीब 10 मिनट बाद दक्षिणा मेरे कमरे में आयी. उसके चेहरे से hi लग रहा था की वो खूब रोई थी. उसकी आँखे सुर्ख और सूझी हुयी थी. दक्षिणा में कोई कमी नहीं थी. इस आगे में भी वो अपनी बेटी की बड़ी बहन hi लगती थी. साफ़ गोरा चेहरा और सुंदरता की मूरत थी वो. उसके जिसम का हर हिस्सा आज भी वैसा hi कैसा हुआ था जैसे उसकी जवानी में कैसा हुआ रहा होगा. ये कुदरती बनावट थी उसके जिसम की. वो कोई योग या कसरत वगैरा नहीं करती थी. उसका जिसम hi ऐसा था.

कमरे में आ कर दक्षिणा बीएड के पास आ कर कड़ी हो गयी और मुझे दुखी अंदाज़ से देखने लगी. इस वक्त वो ऐसे लग रही थी जैसे कोई रूठी हुयी या नाराज़ सी कोई बच्ची हो. उसे इस तरह देख कर मुझे उस पर तरस भी आया और प्यार भी. मुझे उससे पूरी हमदर्दी थी और मुझे पूरा अहसास भी था की वो मुझे कितना चाहती है.

"मैंने फैसला कर लिया है विकाश की मुझे क्या करना है." उसने मुझे देखते हुए बच्चियों जैसे अंदाज़ में hi कहा तो मैंने उसकी तरफ देखते हुए नार्मल तरीके से कहा.

"कैसा फैसला.?" मैंने पूछा तो उसने कहा.

"यही की मेरे पास जो कुछ भी है वो सब कुछ मैं तुम्हारे नाम कर दूगी और फिर ज़हर खा कर खुद ख़ुशी कर लगी. खुद ख़ुशी करने से पहले मैं एक नोट भी लिख दूगी. उस नोट में ये लिखा होगा की मैं अपनी मौत की खुद hi जिम्मेदार हु. मेरी मौत के पीछे किसी का कोई हाथ नहीं है." दक्षिणा ने एक hi सांस में ऐसा कहा तो मेरे होश उड़ गए. मैं एक डैम से बीएड पर उठ कर बैठ गया था.

"व्हाट थे हेलल अरे यू टॉकिंग थिस नॉनसेन्स.? तुम्हारा दिमाग ख़राब हो गया है क्या.? पागल हो गयी हो तुम.?" मैंने गुस्से में कहा तो दक्षिणा की आँखों से आँशु बाह चले और फिर वो तेज़ आवाज़ में बोली.

"हाँ पागल हो गयी हु मैं. मेरा दिमाग ख़राब हो गया है. मुझे इसके अलावा अब कुछ भी नहीं सूझ रहा. तुम्हे मेरी कैफियत का ज़रा भी अहसास नहीं है. तुम ये सोचना hi नहीं चाहते की तुम्हारे चले जाने से मैं अकेली कैसे जी पाओगी और इतना बड़ा घर और प्रॉपर्टी को कैसे सम्हालूगी.? तुम्हे तो बस अपनी फॅमिली दिख रही है. मेरा प्यार मेरी बेबसी नहीं दिखती तुम्हे." दक्षिणा ने रट हुए तेज़ आवाज़ में ये सब कहा तो मैं देखता रह गया उसे.

"मुझे सब कुछ दीखता है दक्षिणा और मुझे हर बात का अहसास भी है. मैं पत्थर दिल नहीं hu...mere सीने में भी एक धड़कता हुआ दिल है जो किसी के भी जज़्बातो को अच्छी तरह से समझता है. अगर मुझे तुम्हारी कैफियत का और तुम्हारी बेबसी का अहसास नहीं होता तो इतने टाइम से तुम्हारे पास नहीं रह रहा होता. बल्कि कब का यहाँ से चला गया होता. मगर कही नहीं गया मैं. तुम्हारे पास hi रहा और तुम्हारे कारोबार को पूरी ईमानदारी से सम्हालता रहा. तुम प्यार में पागल हो चुकी हो दक्षिणा और इसी लिए तुम सिर्फ अपने बारे में सोचती हो. तुम्हे सिर्फ अपना दुःख और अपना अकेलापन hi दिखाई देता है. दूसरे का दुःख और दूसरे की मज़बूरी नहीं दिखती तुम्हे. मैं तो इतने साल से तुम्हारे बारे में सोच कर hi तुम्हारे पास रहा हु मगर क्या तुमने कभी ये सोचा की अगर मैं हमेशा के लिए तुम्हारा हो कर यहाँ रहने लगूंगा तो मेरी अपनी फॅमिली का क्या होगा.? मैंने पिछले 5 सालो में एक बार भी अपनी फॅमिली से बात नहीं की. मैं नहीं जनता की वो लोग किस हाल में होंगे. गांव में जिस तरह के हालात थे उन हालातो में वो कैसे खुद को सम्हाले होंगे. उनके साथ गांव के सरपंच ने क्या किया होगा. इन सब बातो के बारे में मुझे कुछ भी नहीं पता. मगर क्या तुमने कभी मुझे ज़ोर दे कर ये कहा की मैं एक बार अपने घर में फ़ोन लगा कर उनसे बात करू.?" मैंने अपने अंदर का सारा लावा उगलते हुए ऐसा कहा तो दक्षिणा चुप रह गयी.

शायद मेरी बातो का असर हुआ था उस पर. पहले जिस तरह के रंग में वो नज़र आयी थी अब वो रंग फीका पड़ा हुआ दिखने लगा था. जब वो कुछ न बोली तो मैंने फिर से चोट की.

"अपने बारे में और अपने सुख दुःख के बारे में तो हर कोई सोचता है. मगर इंसान वो है दक्षिणा जिसे दुसरो की तकलीफो का भी अहसास हो. सिर्फ अपने बारे में सोचना hi सही नहीं hota...kuch दुसरो के बारे में भी सोचना चाहिए. तुम्हे मुझसे ज़्यादा लाइफ का एक्सपीरियंस है मगर ये सब बाते मुझे खुद बताना पद रहा है तुम्हे." इस बार मैंने नार्मल लहजे में कहा तो दक्षिणा के चेहरे का वो बचा हुआ रंग भी कही गायब सा हो गया. वो अब एक डैम शांत दिखने लगी थी.

मैं भी यही चाहता था की दक्षिणा का दिल और दिमाग शांत हो जाये और फिर वो ठन्डे दिमाग से सोचे की क्या सही है क्या गलत. वो चुप चाप बीएड पर आ कर मेरे पास hi बैठ गयी.

"मैं जानती हु विकाश की तुम जो कह रहे हो वो सब सही है. मुझे भी इस बात का अहसास है की तुम अपनी फॅमिली को छोड़ कर हमेशा के लिए मेरे पास नहीं रह सकते और सच कहु तो ऐसा जायज़ भी नहीं है. हर इंसान के लिए उसकी फॅमिली सबसे इम्पोर्टेन्ट होती है. मगर मैं क्या करू vikash...jis सिचुएशन में मैं हु उस सिचुएशन में मुझे सिर्फ अपना hi दुःख सुख दिखाई देता है." दक्षिणा ने गंभीरता से ऐसा कहा तो मैंने उसकी तरफ देखा. उसने अपना सर झुका लिया था.

"चलो छोडो ये baate...is बारे में हम ठन्डे दिमाग से सोचेंगे और इसका कोई न कोई हल ज़रूर निकालेंगे." मैंने ऐसा कहा तो दक्षिणा ने आस भरी नज़रो से मेरी तरफ देखा मगर बोली कुछ न.

"ऐसे क्या देख रही हो.? मैंने कहा न कोई न कोई हल निकलेंगे." मैंने कहा तो वो बोली.

"किस तरह का हल निकालेंगे हम.?" दक्षिणा ने पूछा तो मैंने कहा.

"जिसमे तुम्हारा भी भला हो जाये और मेरा भी." मैंने मुस्कुरा कर कहा तो दक्षिणा हैरान सी होती दिखी मुझे.

"मैं कुछ समझी नहीं." दक्षिणा ने मेरे चेहरे की तरफ देखते हुए ऐसा कहा तो मैंने कहा.

"बड़ी साफ़ बात है दक्षिणा की मैं अपनी फॅमिली को तो छोड़ नहीं sakta...magar ये भी सच है की तुम्हे इस हाल में छोड़ कर भी नहीं जाना चाहता. सो हम कुछ ऐसा सोचेंगे की मुझसे मेरी फॅमिली भी न छूटे और तुम्हे मेरा साथ भी मिल जाये." मैंने ऐसा कहा तो दक्षिणा फिर हैरान हुयी.

"ऐसा कैसे हो सकेगा.?" दक्षिणा ने पूछा तो मैंने कहा.

"यही तो सोचना है हमें. मान लो अगर ऐसा हो जाता है तो क्या तुम ऐसा करना चाहोगी.?" मैंने ये कहते हुए उससे पूछा तो दक्षिणा ने हाँ में सर हिलाया.

"मुझे मंजूर है. मुझे अच्छी तरह पता है की दो में से एक हì चीज़ नहीं हो सकती. दोनों hi चीज़े इम्पोर्टेन्ट हैं इस लिए अगर ऐसा हो जाता है तो मुझे ये मंजूर है. तुम अपनी फॅमिली को न छोडो और न मैं कभी कहुगी की उन्हें छोडो. मैं बस ये चाहती हु की इतनी बड़ी दुनिया में मैं अकेली न रह जाओ. मेरा दिल मेरी जान तुमसे लगे हुए हैं तो तुम मेरे भी बने रहना. मगर ऐसा होगा कैसे.?" दक्षिणा ने पूछा तो मैं सोच में पद गया. मैं सोच नहीं प् रहा था की ऐसा कैसे करुगा मैं.?

"अभी तो मुझे खुद कुछ समझ नहीं आ रहा दक्षिणा मगर हम दोनों इस बारे में सोचेंगे तो ज़रूर कोई न कोई सलूशन निकलेगा." मैंने दक्षिणा के दोनों कंधो को पकड़ते हुए कहा तो दक्षिणा मेरी आँखों में देखने लगी. मैं भी उसकी आँखों में देख रहा था.

दक्षिणा के चेहरे पर अब मुझे राहत और सुकून नज़र आने लगा था. शायद उसके दिल और दिमाग से बहुत बड़ा बोझ हैट गया था. वो मुस्कुराई और फिर मुझसे लिपट गयी. थोड़ी देर बाद वो मुझसे अलग हुयी और मेरे होठो को हलके से चूम कर बीएड से उतर गयी.

"चलो मेरे बालम अब कुछ पेट पूजा भी कर लो. पता नहीं आज दिन में कुछ खाया भी था या नहीं." दक्षिणा ने मुस्कुराते हुए ये कहा तो मैं भी मुस्कुराया.

"चलो मैं आता हु." मैंने कहा तो दक्षिणा कुछ देर मुझे देखती रही फिर जल्दी से आने का कह कर कमरे से बाकर निकल गयी.

रात में खाना पीना कर के मैं अपने कमरे में आया और बीएड पर लेट गया. कुछ देर बाद दक्षिणा भी आ गयी और मेरे बगल से hi लेट गयी. वो मुझसे चिपक कर लेती हुयी थी और उसने अपना चेहरा मेरे सीने में रखा हुआ था. मैं जनता था की वो अब नाराज़ नहीं है बल्कि खुश है.

"I'm सॉरी.." दक्षिणा ने धीरे से कहा तो मैंने उसकी तरफ देखा और फिर बोलै.

"किस बात के लिए.?" मैंने पूछा तो दक्षिणा ने अपना चेहरा उठाया और फिर मेरी तरफ देखते हुए बोली.

"कल रात और आज सरे दिन के लिए." दक्षिणा ने कहा तो मुझे कुछ समझ न आया.

"क्या मतलब.?" मैंने उसकी तरफ देखते हुए कहा तो वो बोली.

"मतलब ये की मैं कल रात तुमसे नाराज़ हो कर चली आयी थी और फिर आज सारा दिन भी तुमसे कोई बात नहीं की थी और नहीं तुम्हारे फ़ोन कॉल्स और मेस्सगेस का कोई जवाब दिया था. इस लिए इस सबके लिए सॉरी." दक्षिणा ने पुरे डिटेल में ये सब बताया तो मैं मुस्कुरा पड़ा.

"छोडो इस बात को." मैंने कहा तो दक्षिणा ने मेरी तरफ कुछ देर तक देखा फिर बोली.

"अच्छा ये बताओ की हम ऐसा क्या करेंगे की हम दोनों का hi काम बन जाये.? मतलब तुम मेरे पास भी रहो और तुम्हे अपनी फॅमिली को भी न छोड़ना पड़े.?" दक्षिणा ने ये कहा तो मैं एक बार फिर सोच में पद गया.

"अभी कुछ सोचा नहीं hai...magar सोचना ज़रूर पड़ेगा. अभी तो यही एक मसला है की मैंने अपनी फॅमिली से पिछले 5 सालो से कोई बात hi नहीं की है." मैंने ऐसा कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"तुम्हे एक बार अपने घर वालो को फ़ोन करना चाहिए था. गलतिया हर इंसान से होती हैं मगर इसका ये मतलब नहीं की हम उन गलतियों के लिए किसी को माफ़ hi न करे." दक्षिणा ने ऐसा कहा तो मुझे अपना पिछले सब कुछ याद आने लगा. मैंने बड़ी मुश्किल से अपने आपको सम्हाला.

"शायद कुछ गलतियों के लिए कोई माफ़ी नहीं होती dakshina...wo भी अगर वैसी hi गलतिया बार बार हो तो. एक गुनाह तो चलो हजम भी हो जायेगा मगर दूसरा गुनाह कैसे हजम कर लेगा कोई.?" मैंने गंभीरता से कहा तो दक्षिणा ने मेरे कंधे पर अपना हाथ रख कर दबाया.

"मगर ये गुनाह तो नहीं है न विकाश." दक्षिणा ने ये कहा तो मैं बोल पड़ा.

"सब को तो यही लगता है न की मैंने जो किया वो कभी न माफ़ करने वाला गुनाह किया है. जिसके लिए मेरे बाप ने मुझे घर से निकाल दिया था. मेरी किसी ने एक न सुनी थी. मैं चीखता रहा tha...mujhe लाठियों से मारा गया था. मेरी माँ मेरी दोनों जुड़वाँ बहने मुझे मार कहते देख रोटी बिलखती रही थी मगर मेरे बाप के दर से कोई मुझे बचने नहीं आया था और फिर मेरे बाप ने उसी हालत में मुझे घर से निकल जाने के लिए कह दिया था. उस वक्त मुझे लग रहा था की मैं खुद को क्या कर दालु. हर तरफ मौत hi मौत नज़र आ रही थी मुझे." मैंने तेज़ लहजे में ऐसा कहा और चुप हो गया. मेरी आँखों से आँशु निकलने लगे थे. दक्षिणा को साडी कहानी पता थी. वो मेरे दिल का हाल समझती थी इस लिए वो मुझे खुद से छुपका कर दिलाशा देने लगी थी.

"दिल जब दुःख जाता है न दक्षिणा तो फिर किसी से भी लगाव नहीं रह जाता. दिल और दिमाग वैरागी सा हो जाता है. वही हाल मेरा है. मुझे आज भी सब की याद आती है मगर जब उस हादसे की याद आती है न तो ज़ख्म फिर से हरा हो जाता है." मैंने दक्षिणा से अलग हो कर उससे ऐसा कहा तो उसने कहा.

"ऐसा कब तक चलेगा और इससे हासिल भी क्या होगा विकाश.? नाराज़गी या गुस्सा थोड़े टाइम के लिए hi अच्छा होता है. तुम पिछले 5 सालो से अपने घर वालो से दूर हो और इन 5 सालो में तुमने कभी उनसे बात करने की कोशिश तक नहीं की. ये अच्छा नहीं किया तुमने. तुम्हे सोचना चाहिए था की जिन हालातो में तुम अपनी फॅमिली को छोड़ कर चले आये थे उसके बाद उनका क्या हुआ होगा.? तुम्हारी कुसुम दीदी जिसकी हर सुबह सिर्फ तुम्हे देखने के बाद hi शुरू होती थी उसका क्या हाल हुआ होगा.? तुम्हारी दोनों जुड़वाँ बहने और तुम्हारी माँ जो तुम्हे अपने कलेजे का टुकड़ा मानती है. रही बात तुम्हारे पिता जी की तो उन हालातो में अगर उन्होंने तुम्हारे साथ ऐसा किया भी था तो वो गलत नहीं था. गुस्से में इंसान बहुत कुछ कर जाता है मगर जब दिमाग शांत हो जाता है तब उसे अहसास होता है उसने गुस्से में क्या कर दिया है. मुझे पूरा भरोसा है विकाश की जब तुम्हारे पिता जी का दिमाग शांत हुआ होगा तो उन्हें अपनी गलती का अहसास ज़रूर हुआ होगा. मगर शायद तब तक देर हो चुकी थी." दक्षिणा ने ये सब कहा तो मैं कुछ न बोलै. मुझे चुप देख कर उसने फिर बोलना शुरू किया.

"अगर तुम ये कहते हो की तुम अपनी फॅमिली को नहीं छोड़ सकते तो फिर तुम्हे अपनी फॅमिली से बात करना चाहिए. गलती किसी की भी हो मगर झुकने से अगर बात बन जाती है तो झुकना hi चाहिए. आखिर वो तुम्हारे अपने हैं. एक पिता कभी अपना दिल खोल कर नहीं dikhata...wo अपना प्यार दिल में hi छुपा कर रखता है. तुम भी इस बात को जानते होंगे की तुम्हारे पिता जी तुमसे कितना प्यार करते रहे होंगे. बच्चे भले hi बुरे हो जाये मगर वो अपने माँ बाप के लिए सबसे प्यारे hi होते हैं. इस लिए विकाश तुम इतने पत्थर दिल मत bano...aur अपने परिवार के लोगो से बात करो. अपने पिता जी के बाद एक तुम hi हो जो अपनी माँ और बहनो का ख़याल रख सकते हो. इस बारे में तुम्हे सोचना चाहिए था." दक्षिणा ने ये सब कहा तो मेरे दिमाग में जैसे कोई धमाका सा हुआ.

इतने सालो से मैं सिर्फ एक hi चीज़ को लिए बैठा था और उसकी hi वजह से मैं अपने परिवार से बात तक नहीं करता था. सच hi तो कह रही थी दक्षिणा की पिता जी के बाद एक मैं hi था जो अपनी माँ और बहनो का अच्छे से ख़याल रख सकता था और ये मेरी रेस्पॉन्सिबिल्टी भी थी. आज मेरे घर वाले किस हाल में होंगे इसका मुझे कोई आईडिया नहीं था. मैं ये सब सोचते सोचते अपने आपको एक डैम से बहुत बड़ा गुनहगार सा फील करने लगा था.

दक्षिणा मेरी हालत को समझ सकती थी इस लिए उसने मुझे फिर से खुद से लगा लिया. मैं आँखे बंद किये लेता हुआ था. दक्षिणा सिचुएशन को समझती थी इस लिए उसने आज मुझसे सेक्स से रिलेटेड कोई बात नहीं की थी. मेरी भी सेक्स की कोई इच्छा नहीं थी.

दक्षिणा तो सो गयी थी मगर मुझे नींद नहीं आ रही थी. मेरे दिमाग में दक्षिणा की बाते घूम रही थी. मेरे घर वाले किस हाल में honge..ye सोच सोच कर अब मेरा दिल बैठा जा रहा था.

मैं बीएड पर लेते काफी देर तक यही सब सोचता रहा. तभी मुझे फेसबुक की कुसुम पांडेय का ख़याल आया तो मैं अपना मोबाइल लेने के लिए बीएड से नीचे उतर कर हेंगर पर लटके अपने पेंट के पास आया. पेंट की पोचेट से मोबाइल ले कर मैं फिर से बीएड पर आ गया.

मोबाइल में मैंने सीधे मैसेंजर ओपन किया. मैं ये सोच रहा था की अगर वो लड़की सच में मेरी दीदी hi हैं तो वो इनबॉक्स में hi मुझसे बात करेंगी या कोई मैसेज भेजेंगी. सो मैंने मैसेंजर ओपन किया था और अब इनबॉक्स में देख रहा था. मैसेंजर में सबसे ऊपर जो पहला नाम था वो कुसुम पांडेय का hi था. मगर उसमे कोई मैसेज आया हुआ नज़र न आया. ये देख कर पता नहीं क्यों मैं मायूस सा हो गया.

अब मेरा दिल चाहता था की वो लड़की कुसुम दीदी hi हो और उनका कोई मैसेज आये. मैं मन hi मन गॉड से प्रे भी कर रहा था की प्ल्ज़ गॉड ये लड़की मेरी दीदी hi हो और ये मुझे मैसेज करे.

मैं अपनी तरफ से कोई मैसेज नहीं करना चाहता था क्यों की मैं पूरी तरह से अभी सूरे नहीं था की ये लड़की मेरी दीदी hi है. मगर मुझे कही न कही यकीन भी हो रहा था और मुझे इस नाम की लड़की के मैसेज का इंतज़ार था. मैं चाहता था की जल्द से जल्द इस नाम से कोई मैसेज मेरे पास आये.

रात काफी गुज़र चुकी थी. मुझे पता hi नहीं चला की मोबाइल हाथ में लिए मैं कब नींद के आगोश में चला गया था. कुछ देर बाद hi मेरी पलकों टेल एक ख्वाब चलने लगा था.

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
थैंक्स फॉर योर लवली कमेंट...

यारा वो दक्षिणा इस लिए निकल आयी क्यों की सब रीडर्स फ्लैशबैक को ख़तम करने को कह रहे थे तो मैंने उसी वक्त ख़तम ककर दिया और प्रेजेंट में आ गया.

हीरो अपनी फॅमिली को और दक्षिणा को एक साथ रखेगा या नहीं इसके बारे में अभी क्या बोलू bhaya....:hmm::stupidp:

नेक्स्ट अपडेट पोस्टेड ों पेज no. 45....

रीड & एन्जॉय...
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 11


सुबह जब मेरी आँख खुली तो मैंने देखा दक्षिणा मेरे चेहरे के एक डैम पास hi झुकी हुयी थी. मुझे सोते वक्त ऐसा लगा था की जैसे किसी ने मेरे होठो को छुआ है. मुझे जगा देख कर दक्षिणा मुस्कुराई और फिर झुक कर मेरे होठो को हलके से किश किया.

"गुड मॉर्निंग मेरी jaan...have ा ग्रेट डे." दक्षिणा ने मुस्कुराते हुए कहा तो मैं भी मुस्कुराया और फिर उठ कर बैठ गया. मैंने उसके गुड मॉर्निंग का रिप्लाई भी उसके होठो को हलके से किश करके hi दिया.

"आज तुम दूकान पर नहीं जाना." दक्षिणा ने ये कहा तो मैंने कहा.

"Kyo...koi ख़ास बात है क्या.?" मैंने पूछा तो दक्षिणा ने हाँ में सर हिलाया.

"वो हमें साथ में गुडगाँव चलना है आज. वह पर उस घर को देखना है जिसके बारे में एजेंट ने मुझे बताया था. मैं सोच रही हु की हम उस घर को देखने के लिए साथ hi चले. अगर वो घर तुम्हे पसंद आ जायेगा तो मैं उसी को फाइनल करुँगी." दक्षिणा ने कहा तो मैं उसकी तरफ देखने लगा.

"ठीक hai...magar इस घर का क्या करना है.? क्या इसे बेचना है.?" मैंने पूछा तो दक्षिणा ने कहा.

"जैसा तुम कहो. अगर तुम न कहोगे तो नहीं बेचूगी. वैसे यहाँ पर अब रहना तो है नहीं सो इसे बेच देने में कोई प्रॉब्लम नहीं है." दक्षिणा ने ऐसा कहा तो मैंने कहा.

"बात तो सही है तुम्हारी. हम यहाँ से दूसरी जगह जा hi इस लिए रहे हैं की फिर हमें कोई पहचान न सके. अगर ये घर नहीं बेचेंगे तो इसकी देख रेख भी करनी पड़ेगी या फिर किसी को किराये पर देना पड़ेगा." मैंने कहा तो दक्षिणा ने कहा.

"किराये से देने का मतलब है की बीच बीच में हमें यहाँ आना पड़ेगा किराया लेने के लिए. इससे यहाँ पर कोई न कोई पहचान के लोग हमसे टकरा hi जायेगे फिर वो हमसे पूछेंगे की हम अब कहा रहते हैं तो क्या कहेगे.? हम तो यहाँ से जा hi इस लिए रहे हैं न की यहाँ के लोग हमारे बारे में कभी जान hi न सके. दूसरी जगह पर वह के लोग वही जानेगे जो हम उनको बतायेगे." दक्षिणा ने कहा तो मैंने हाँ में सर हिलाया.

"ठीक है जैसा तुम्हे अच्छा लगे. तो इस घर को किसे बेचोगी tum...kya कोई खरीदने वाला मिल गया है तुम्हे.?" मैंने पूछा तो दक्षिणा ने कहा.

"अभी तक तो nahi..magar जल्द hi मिल जायेगा कोई न कोई. मैंने उस एजेंट से बात की थी. देखो क्या होता है. वैसे अगर तुम्हारी नज़र में कोई ऐसा मिले तो तुम बात कर लो उससे." दक्षिणा ने मेरी तरफ देखते हुए कहा तो मैंने कहा.

"देखता हु. शायद कोई मिल hi जाये." मैंने कहा तो दक्षिणा मेरी तरफ देखती रही.

"अच्छा एक बात बताओ. क्या इस बारे में तुम अपने माँ बाप को भी नहीं बताओगी की तुमने इस घर को बेच कर दूसरी जगह पर एक नया घर ले लिया है.?" मैंने पूछा तो दक्षिणा ने कुछ पल सोचा फिर बोली.

"उनसे तो बताना hi पड़ेगा. उन सबसे कभी कभी बात होती hi है इस लिए घर लेने के बाद मैं खुद hi बता दूगी." दक्षिणा ने कहा तो मैंने भी यही कहा की बता देना.

कुछ देर बाद दक्षिणा ब्रेकफास्ट बनाने का कह कर कमरे से चली गयी तो मैं भी बाथरूम में घुस गया. फ्रेश होने के बाद मैंने कपडे पहने और फिर मोबाइल ले कर वर्कर्स को फ़ोन लगाया और उन सबको बताया की आज दूकान नहीं खुलेगी इस लिए वो लोग दूकान पर न आये.

8 बजे माइड आयी तो दक्षिणा और वो दोनों ने hi साथ मिल कर ब्रेकफास्ट तैयार किया और फिर दक्षिणा ब्रेकफास्ट की थाली ले कर मेरे पास आयी. हम दोनों साथ साथ hi ब्रेकफास्ट करने लगे. माइड हमें परोसती रही.

ब्रेकफास्ट के बाद दक्षिणा ने मुझसे कहा की एजेंट ने उसे 11 बजे का टाइम दिया है मिलने को. सो 11 बजे hi उससे मिलेंगे हम. अभी काफी टाइम था इस लिए मैं उठ कर अपने कमरे में आ गया. दक्षिणा वही हाल में सोफे पर बैठ कर टीवी देखने लगी. घर में माइड थी इस लिए वो मेरे कमरे में नहीं आ सकती थी.

कमरे में बीएड पर लेता मैं दक्षिणा के hi बारे में सोच रहा था. लाइफ कितनी बदल गयी थी मेरी. इसके पहले मैं एक सिंपल सा लड़का hi था मगर यहाँ आने के बाद एक जिम्मेदार और परिपक्क्व सा बन गया था. मैंने ख्वाब में भी नहीं सोचा था की मेरी लाइफ में ऐसा कुछ होगा. मैं तो 5 साल पहले घर से दुखी हो कर निकला था और मेरे दिमाग में हर वक्त यही रहता था की अपने आपको ख़तम कर दू. मगर किस्मत को तो कुछ और hi मंजूर था.

दक्षिणा के साथ मेरा रिलेशन बहुत आगे तक बढ़ चूका था. वो मुझे अपना सब कुछ मानती थी. अगर वो आगे में मुझसे इतनी ज़्यादा बड़ी न होती तो मैं उससे शादी करने के बारे में ज़रूर सोचता. मगर वो एक 27 साल की बेटी की माँ थी. मेरी माँ की आगे से भी ज़्यादा उसकी आगे थी. उसकी पर्सनालिटी ऐसी थी की उसकी आगे के बारे में कोई आईडिया नहीं लगा सकता था. उसके जिसम में आज भी किसी जवान लड़की की तरह कसावट थी. चेहरे पर वही नूर चमकता था जो किसी जवान लड़की के चेहरे पर चमकता है.

मैं काफी देर तक दक्षिणा के बारे में सोचता रहा. उसके दिल और दिमाग में कोई छल कपट नहीं था. वो मुझसे बेपनाह प्यार करती थी और चाहती थी की मैं हमेशा के लिए उसका हो जाओ. अपनी इज्जत तो उसने मुझे पहले hi दे दी thi...beti को भी ख़ुशी ख़ुशी मेरे लिए परोस दिया था. अपना पैसा अपनी प्रॉपर्टी सब कुछ मेरे नाम करने को तैयार थी. मैं कभी कभी सोचता था की क्या कोई ऐसा भी कर सकता है.? कोई इतना भरोसा किसी गैर पर कैसे कर सकता है की उसको अपना सब कुछ दे दे और खुद कंगाल होने को तैयार जाये. मान लो अगर उसने अपना सब कुछ मेरे नाम कर दिया और मैं उस सब को ले कर भाग गया तो फिर क्या कर पायेगी वो.?

मैं जनता था की दक्षिणा मेरे बारे में ऐसा सोच भी नहीं सकती है और अगर मैंने उसे धोखा दे कर ऐसा कर भी दिया तो मुझे यकीन है की वो मुझे बद्दुआ तक नहीं देगी. ये सब बाते ऐसी थी की मैं चाह कर भी दक्षिणा के साथ ऐसा नहीं कर सकता था. मुझे उसके पैसे का या उसकी प्रॉपर्टी का कोई लालच नहीं था और न hi अब तक मैंने उसके पैसो का गलत उसे किया था अपने लिए. वो मेरी साडी ज़रूरते खुद hi पूरी करती थी. मेरे कच्छे बनियान से ले कर महज महज कपड़ो तक वो खुद hi खरीद कर मुझे देती थी. जब भी कपडे लेना होता था तो वो मुझे खुद ले जाती और अपनी पसंद के कपडे मेरे लिए खरीदती या फिर बनवाती थी. मेरे पास कपड़ो की अच्छी खासी लाइन लगी हुयी थी. इसके बावजूद वो मुझे कपडे खरीदती रहती थी.

मैं हमेशा उससे कहता की ये बहुत ज़्यादा hai...magar वो है कर कहती तो क्या हुआ. वो चाहती थी की मैं ये कभी फील न करू की मैं उसके यहाँ अस ा सर्वेंट था बल्कि यही फील करू की मैं इस घर का मालिक हु और वो मेरी कनीज़. बहुत अजीब लगता था मुझे ये सब मगर जो भी था उसमे मेरा कोई ज़ोर नहीं था.

काफी देर तक मैं अपने और दक्षिणा के बारे में ये सब सोचता रहा. फिर मुझे अपनी फॅमिली का ख़याल आया. फॅमिली का ख़याल आते hi मेरी आँखों के सामने माँ और कुसुम दीदी का चेहरा आ गया. मेरे दिमाग में एक डैम से फेसबुक वाली बात आयी तो मैंने जल्दी से अपना मोबाइल उठाया और उसमे मैसेंजर ओपन किया.

मैसेंजर में देख कर मुझे निराशा hi हुयी क्यों की उसमे कुसुम पांडेय का कोई मैसेज नहीं आया हुआ था. दिमाग में भले hi ये बात थी की हो सकता है ये लड़की कोई दूसरी hi हो मगर मेरा दिल कहता था की ये मेरी कुसुम दीदी hi हैं. अगर अपने दिल के हिसाब से सोचु तो यही था की अगर दीदी ने फेसबुक में 2 महीने पहले ईद बनायीं थी और मुझे फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजा था तो अब उनका कोई मैसेज क्यों नहीं आ रहा.? या फिर उन्होंने अभी तक ये देखा hi नहीं की मैंने उनकी रिक्वेस्ट एक्सेप्ट कर ली है.

मुझे पूरा भरोसा था की दीदी ने मुझसे कांटेक्ट करने के लिए hi फेसबुक में ईद बनायीं होगी. क्यों की मेरा फ़ोन नंबर तो घर में किसी के भी पास नहीं हो सकता था. दीदी के दिमाग में यही आया होगा की वो मुझे फेसबुक के ज़रिये hi दूध सकती हैं.

मैं मैसेंजर से वापस आया और कुसुम पांडेय नाम की लड़की की प्रोफाइल को फिर से ओपन किया. किसी किसी की फेसबुक प्रोफाइल फ्रेंड बनने के बाद डिटेल में ओपन होती है. उसका फुल इन्फो निकल आता है. मैंने यही सोच कर प्रोफाइल ओपन किया था. प्रोफाइल पिछ में माखन चोर कृष्णा की पिछ लगी थी. कवर में कोई पिछ नहीं लगी थी. मैंने नीचे जा कर देखा तो डेट ऑफ़ बिरथ और जोइनेड डेट hi दिखा. साडी प्रोफाइल वैसी hi दिखी जैसे रिक्वेस्ट एक्सेप्ट करने से पहले थी.

मैंने इन्फो में भी dekha...wahi पहले जैसा hi सब कुछ. ये देख कर मैं एक डैम से मायूस हो गया. मेरा दिल सिर्फ ये देख कर मान रहा था की इस नाम की लड़की का डेट ऑफ़ बिरथ मेरी दीदी के डेट ऑफ़ बिरथ से मैच खा रहा था. बाकि और कोई इनफार्मेशन नहीं थी. प्रोफाइल पिछ में उनकी कोई पिछ नहीं थी बल्कि माखन चोर कृष्णा की hi पिछ लगी थी.

काफी देर तक मैं कुसुम पांडेय की प्रोफाइल को खंगालता रहा मगर कुछ भी पता नहीं चला. मैंने मोबाइल को एक तरफ रख दिया. मेरा दिल और दिमाग परेशां सा हो गया था. मेरा बहुत दिल कर रहा था की मैं अपनी दीदी से किसी तरह बात करू मगर कैसे.?

मुझे अपने उस मोबाइल का ध्यान आया जो घर में hi रह गया था. उसका नंबर मुझे अब भी याद था. मेरे दिमाग में आया की क्यों न एक बार अपने उस नंबर पर कॉल करू और देखु की कौन उठता है कॉल. ये दिमाग में आते hi मैंने फिर से अपना मोबाइल उठाया.

मेरा दिल ये सोच कर ज़ोरो से धड़कने लगा था की अगर मैंने कॉल किया और किसी ने उठा लिया तो क्या बात करुगा.? किस तरीके से बात करुगा मैं.? अगर कॉल मेरे पिता जी ने पिक किया तो मैं कैसे बात कर पाउगा उनसे.?

मैं इस बारे में यही सब सोचता जा रहा था. मैं मेंटली तैयार नहीं था ऐसी किसी सीटुएशन्स को फेस करने के लिए और इसी लिए मैंने कॉल करने का इरादा कैंसिल कर दिया. मगर दिल है की मानता नहीं वाली कहानी हो गयी थी अब. मेरा दिल चाह रहा था की मैं कॉल करू और बात करू. मुझे समझ में नहीं आ रहा था की अपने दिल की सुनु या दिमाग की.?

बहुत बड़ी उलझन में फास गया था मैं. फिर मैंने यु hi फैसला ले लिया की अब दिल की hi सुन लेता हु. मैंने मोबाइल फिर से उठाया और उसमे नंबर पंच करने लगा. मेरा दिल ज़ोर ज़ोर से ये सोच कर धड़के जा रहा था की कॉल लग जाने के बाद क्या होगा.?

मैंने नंबर पंच करके कॉल लगा दिया. थोड़ी hi देर में मेरे कानो में एक आवाज़ आयी जिसे सुन कर मेरा सारा मूड ऑफ हो गया. मेरा वो नंबर अब अवेलेबल नहीं था जो घर में रह गया था. कान में बताया गया की आप जिस नंबर पर कॉल कर रहे हैं वो सेवा में नहीं है.

5 साल हो गए थे. मैं मानता हु की नंबर बंद हो सकता था मगर मैं ये भी जनता हु की अगर किसी नंबर से बात करते रहो तो वो एक्टिव hi रहता है. तो क्या मेरे उस नंबर से किसी ने किसी से कोई बात नहीं की.? ऐसा कैसे हो सकता है.? मेरा मोबाइल घर में hi रह गया था तो क्या वो किसी के हाथ नहीं लगा होगा. कीपैड मोबाइल था वो और उसमे कोई ऐसा पासवर्ड भी नहीं था जो आसानी से खुल न सके.

मुझे समझ नहीं आ रहा था की कैसे किसी ने मेरे मोबाइल को हाथ न लगाया होगा. अगर ये मान लिया जाये की मोबाइल hi ख़राब हो गया होगा तो उसमे से सिम कार्ड तो निकाल hi लिया जाता और फिर उसे किसी दूसरे मोबाइल में दाल लिया जाता.

मैंने दो चार बार फिर से कॉल किया मगर शामे रिस्पांस. ये देख कर मेरा दिल बैठ सा गया. मेरी साडी उम्मीदों पर पानी फिर गया था. मैं बेबसी और मायूसी में डूब गया. इसके पहले इस सबके लिए इतना बेबस या मायूस नहीं हुआ था मैं और न hi मेरा दिल करता था इतना की मैं घर में किसी से बात करू. मगर आज मैं चाहता था की मैं अपने घर वालो से बात करू. ख़ास कर अपनी कुसुम दीदी से. मुझे सबसे ज़्यादा उनकी hi फ़िक्र थी. अब तक मैंने अपने दिल को पत्थर बना रखा था. एक मैं hi था जो उनके चेहरे को हमेशा ख़ुशी से खिला हुआ बनाने की कोशिशे करता था और वो भी मेरी इस प्यारी सी कोशिशों से खुश रहती थी.

मैं बहुत देर तक यही सब सोचता रहा और दुखी होता रहा. मुझे पता hi नहीं चला की इस सब में कितना टाइम निकल गया. दक्षिणा के आने पर hi पता चला की मैं किस दुनिया में खोया हुआ था. उसने मुझसे चलने को कहा तो मुझे याद आया की आज मुझे उसके साथ एजेंट से मिलने जाना है.

मैंने अपने आपको सम्हाला और बीएड से नीचे आ गया. दक्षिणा ने आलमारी से अपनी पसंद के मेरे लिए कपडे निकले और फिर मुझे पहनने को कहा तो मैं उन्हें चुप चाप पहनने लगा. मुझे इस तरह चुप देख कर उसने इसका रीज़न पूछा तो मैंने उसे साडी बात बता दी. वो भी सोच में पद गयी. फिर उसने मुझे समझाया की टेंशन मत लो. अगर आज तुमने दिल से इतना किया है तो ज़रूर इसके आगे का रास्ता भी कही न कही से निकल आएगा.

दक्षिणा तैयार हो कर hi आयी थी. जब मैं तैयार हो गया तो मैंने कार की के ली और फिर दक्षिणा के साथ hi कमरे से बाहर आ गया. घर में जो माइड थी वो बाथरूम में हमारे कपडे धो रही थी. दक्षिणा ने उसे घर का ख़याल रखने को कहा और ये भी की हम 2 या 3 घंटे में आ जायेगे.

कार में बैठ कर हम दोनों एजेंट से मिलने के लिए उसकी बताई हुयी लोकेशन की तरफ चल पड़े. रास्ते में हमारे बीच कई तरह की बाते होती रही और फिर हम दोनों एजेंट के पास पहुंच गए. एजेंट के साथ hi हम गुडगाँव गए जहा पर वो हमारे लिए नया घर दिखाना चाहता था.

गुडगाँव में जिस जगह पर नया घर था वो जगह काफी शानदार थी और बड़े बड़े लोगो की रिहाइशी थी. जिस नए घर के पास वो एजेंट हमें ले कर पंहुचा वो काफी खूबसूरत बना हुआ था. मगर एक कमी ये थी की उसकी दीवारों का पेंट कुछ पुराण सा नज़र आ रहा था. उस घर का ओनर भी आ गया था. उसने बताया की वो यहाँ रहता नहीं था. इस लिए घर में कुछ सालो से पेंट नहीं हुआ था.

मैं और दक्षिणा घर को अच्छे से देखने के लिए एजेंट और उस घर के ओनर के साथ घर के अंदर की तरफ गए. घर के अंदर का हाल बाहर के हाल से अच्छा था मगर दक्षिणा ने कहा की घर के अंदर बाहर दोनों तरफ पेंट का काम करना पड़ेगा. पेंट किस कलर का होगा ये वो खुद देसीडे करेगी.

घर में कोई कमी नहीं थी. ओनर ने बताया की घर अभी नया hi है. वो और उसकी बीवी मीरुत शिफ्ट हो गए हैं. क्यों की वो वही के हैं. दिल्ली में वो गोवत जॉब पर थे जो अब रिटायर्ड हो चुके हैं. उनके बचे सब आउट ऑफ़ इंडिया हैं. इस लिए वो ये घर बेचना चाहते हैं और अपने शहर में hi रहना चाहते हैं.

घर की कीमत और घर के कागजात वगैरा की बात एजेंट से पहले hi हो चुकी थी. दक्षिणा ने घर को अच्छे से देखा था. वो इस घर को देख कर बहुत खुश दिख रही थी. शायद ये घर वैसा hi था जैसा वो चाहती थी. ये दो मंजिल की एक शानदार कोठी थी और यहाँ की लोकेशन के हिसाब से दक्षिणा को बहुत पसंद आयी थी. दक्षिणा ने मुझसे भी पूछा था की घर कैसा है तो मैंने यही कहा की तुम्हारी पसंद हमेशा hi लाजवाब होती है सो मेरे कुछ कहने का सवाल hi नहीं है.

घर देखने के बाद हमने डील फाइनल की और दो दिन बाद पैसो के लें दें का कह कर मैं और दक्षिणा उस एजेंट के साथ वह से चले आये और फिर एक अच्छे से रेस्टोरेंट में आ कर बैठे. यहाँ पर हमने थोड़ा बहुत खाया पिया और बाकी की बाते की उस एजेंट से. एजेंट ने कहा की वो कोठी में अंदर बाहर वैसा hi हद क्वालिटी का पैन करवा देगा जैसे दक्षिणा चाहती है.

रेस्टोरेंट में उस एजेंट से करीब आधे एक घंटे तक इस सिलसिले में बात हुयी उसके बाद मैं और दक्षिणा घर की तरफ चल दिए. दक्षिणा बार बार मुझसे यही कह रही थी की अब वो मेरे साथ खुल कर रहेगी और मुझसे खूब प्यार करेगी. मैं उसकी इन बातो से मन hi मन अजीब सा फील कर रहा था. मैं सोच रहा था की अगर ऐसा हुआ तो मेरी लाइफ कैसी हो जाएगी.?

मेरे दिमाग में ये बाते चल रही थी की अगर मैं अपनी फॅमिली के पास आ गया और अगर वो सब मुझे एक्सेप्ट कर लेते हैं तो ये भी होगा की पिता जी मुझसे शादी की बात करेंगे और मैं उन्हें इंकार नहीं कर सकूगा. मेरी शादी की बात से दक्षिणा का क्या राशन होगा.? क्या वो किसी और से मेरी शादी होने की बात एक्सेप्ट करेगी.? जिस तरह से उसने अपने और मेरे बारे में सोच कर यहाँ एक अलग घर ले रही है उससे तो यही लगता है की वो यहाँ पर मेरे साथ मेरी बीवी बन कर hi रहना चाहती है. फिर भला वो कैसे ये चाहेगी की मैं अपने फॅमिली वालो के कहने पर किसी लड़की से शादी कर लू.

मुझे अंदाज़ा हो रहा था की आने वाला टाइम मेरे लिए बहुत hi ज़्यादा मुशिकलों से भरा होने वाला है और ये भी की दक्षिणा इस सब के लिए किस हद तक जाएगी. मैं इस सबके बारे में जितना सोच रहा था मुझे उतनी hi टेंशन सी होने लगी थी.

दक्षिणा को मैंने समझाया था की हम दोनों कोई ऐसा उपाय करेंगे की हम दोनों का hi काम हो जाये और वो इस बात से एग्री भी हुयी थी. सो अब देखना ये है की वो आने वाले टाइम में अपनी उस बात पर कायम रहती है या नहीं. उसे ये भी समझाना होगा की फॅमिली से मिलने के बाद मेरे पिता जी मुझसे शादी के लिए भी कहेगे और मैं उन्हें इंकार नहीं कर सकूगा. मेरी इस बात से दक्षिणा को भी कोई प्रॉब्लम नहीं होनी चाहिए.

सरे रास्ते मैं यही सब सोचता रहा था. दक्षिणा की बातो का मैं नार्मल तरीके से जवाब भी देता रहा था. मैं इस वक्त उसे ये नहीं दिखाना चाहता था की मेरे मन में क्या क्या बाते चल रही हैं.

मैंने सोच लिया था की मुझे जल्द से जल्द इस बारे में कोई परफेक्ट कदम उठाना होगा और इस सबके लिए दक्षिणा को भी राज़ी करना होगा. वर्ण कुछ भी हो सकता था. मैं और दक्षिणा घर वापस आये तो माइड घर के अंदर hi थी और हाल में बैठ कर टीवी देख रही थी. हम दोनों को देख कर वो उठी और किचन की तरफ चली गयी.

मैं और दक्षिणा वही हाल पर रखे सोफों पर बैठ गए थे. थोड़ी hi देर में माइड हम दोनों के लिए ट्रे में पानी से भरे दो गिलास ले कर आयी और हमें दिया. पानी पि कर मैं अपने कमरे में आ गया और कपडे उतर कर बीएड पर लेट गया.

मैं जनता था की घर में माइड के रहते दक्षिणा मेरे कमरे में नहीं आएगी इस लिए मैं आराम से लेट गया था. मेरी नज़र दरवाज़े पर पड़ी तो वो खुला था. मैं नहीं चाहता था की अब मेरे कमरे में कोई ए और मुझे डिस्टर्ब करे. सो मैं उठा और दरवाज़ा अंदर से बंद करके फिर से बीएड पर आ कर लेट गया.

मैं सोच रहा था की दक्षिणा इस बात के लिए भले hi राज़ी थी की मैं अपनी फॅमिली को न छोड़ू मगर क्या वो इस बात के लिए भी राज़ी होगी की मैं किसी लड़की से शादी कर लू.? ये एक पॉइंट था जिसके बारे में मुझे लगता था की शायद दक्षिणा ये बिलकुल भी न चाहेगी. मैं अगर किसी लड़की से शादी कर लगा तो फिर मैं उस लड़की का hi हो कर रहुगा और दक्षिणा ये कैसे मंजूर कर लेगी. वो तो यही सोच कर यहाँ से दूर गुडगाँव में एक नया घर ले रही थी की वो वह पर मेरे साथ खुल कर रहेगी और अपनी ज़रूरतों को पूरा करेगी.

इन सब बातो को सोच कर मुझे लगा की मैं घूम फिर कर फिर से पहले जैसी hi सिचुएशन में आ गया हु. मुझे फील हुआ की प्रॉब्लम तो अब भी वही है जो पहले थी. मुझे इस बारे में भी दक्षिणा से बात करना चाहिए और क्लियर करना होगा की अगर ऐसा होता है तो उसे इस बात से भी कोई ऐतराज़ नहीं होना चाहिए. आखिर मैं अपनी फॅमिली के कहने पर किसी लड़की से शादी तो करुगा hi. मैं पूरी लाइफ उसका बन के तो नहीं रह सकूगा. मेरी फॅमिली को अगर इसका पता चलेगा तो वो क्या सोचेंगे मेरे बारे में और क्या गुज़रेगी उन पर.?

बीएड पर लेते लेते मैं यही सब सोचे जा रहा था और मुझे इससे भारी टेंशन भी होने लगी थी. मुझे समझ नहीं आ रहा था की इस सिचुएशन से कैसे बाहर निकलू मैं.? इस दक्षिणा ने तो अजीब चक्कर में फसा लिया था मुझे.

मैं दक्षिणा के प्यार और उसके जज़्बातो की क़द्र करता था इस लिए मैं उसे यु hi छोड़ कर नहीं जाना चाहता था वर्ण मैं इस तरह की सिचुएशन में फसा न बैठा रहता बल्कि कब का यहाँ से कही दूसरी जगह भाग जाता. दक्षिणा मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती थी.

मैंने फैसला किया की दक्षिणा से इस बारे में भी मैं अच्छे से बात करुगा और उसे समझाऊंगा की अगर ऐसा होगा तो उसे ये भी मंजूर करना होगा. क्यों की मैं अपनी फॅमिली की उम्मीदों और उनकी खुशियों का गाला नहीं घोट सकूगा. अगर दक्षिणा को ये सब मंजूर होगा तो मैं भी उसके बारे में कुछ न कुछ sochuga.....warna मेरे लिए मेरी फॅमिली से बढ़ कर कुछ भी नहीं होगा.

यही सब सोचते हुए मैं अपनी फॅमिली के बारे में सोचने लगा. एक बार फिर से मैं अपने पास्ट में खोने लगा था. मेरी आँखों के सामने फिर से वही सब चलने लगा था जो 5 साल पहले हुआ था. एक एक पिक्चर एक एक बात मेरी आँखों के सामने हिंदी फीचर फिल्म जैसे चलने लगी थी.

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....

एक बात पूछना है की यहाँ से मैं फ्लैशबैक का कुछ किस्सा स्टार्ट करू या ऐसे hi चलने दू....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 12

फ्लैशबैक स्टार्ट....


पंचायत का फैसला हमारे हक़ में हुआ था और गांव के सरपंच को लाइफ में पहली बार पुरे गांव के सामने करारी हार का स्वाद चखना पद गया था. उसे इस बात की कोई उम्मीद hi नहीं थी की मेरे पिता जी के ऐसे लोगो से ताल्लुकात होंगे और वो उन्हें इस तरह यहाँ पंचायत में ला कर सरपंच के हाथो से अपनी जीत छीन लेंगे.

हम सब जानते थे की इस सबसे सरपंच अंदर hi अंदर हम सबसे बहुत गुस्सा होगा और वो कोई न कोई ऐसा काम ज़रूर करेगा जिससे वो अपनी इस हार का बदला ले सके.

पिता जी इस बात को अच्छे से जानते थे और इसी लिए उन्होंने हम सब को साफ़ साफ़ कह दिया था की हम कुछ दिन कही भी अकेले बाहर न निकले. क्यों की सरपंच गुस्से में कुछ भी कर सकता था या करवा सकता था. पिता जी के कहने पर मैं सच में हप्तो तक घर से बाहर कही नहीं गया था. दिन भर घर में hi रहता और अपनी कुसुम दीदी के पास बैठ कर उनसे प्यारी प्यारी बाते करता रहता. वो जब तक मेरे पास रहती तब तक उनके चेहरे में ख़ुशी की चमक बानी रहती थी.

पंचायत वाले फैसले को गुज़रे हुए 10 दिन हो गए थे. अब तक सिचुएशन पहले से काफी नार्मल हो गयी थी. गांव के जो लोग हमारे साथ थे वो पिता जी को गांव के माहौल की पूरी खबर देते थे. ख़ास कर सरपंच की और उसके आदमियों की. गांव के वो लोग भी ये बात समझते थे की इस हार से सरपंच हमारे साथ कुछ भी कर सकता था इस लिए वो लोग हमेशा हमारे आस पास hi रहते थे. पिता जी अगर खेतो की तरफ जाते तो उन लोगो में से कोई कुछ लोग उनके आस पास hi रहते थे. पिता जी को पहली बार पता चला था की गांव के ये लोग उनको कितना मानते थे. वर्ण आज के टाइम में कौन ऐसा है जो अपनी जान की परवाह किये बिना दुसरो की रक्षा के लिए हर वक्त पास बना रहता है.

धीरे धीरे हमारे घर के अंदर का टेंशन भरा तनाव भी ख़तम हो गया और हम सब पहले की hi तरह आज़ादी से रहने लगे थे. मैं अगर घर से कही घूमने के लिए गांव की तरफ जाता भी तो पिता जी की हिदायत पर टाइम से वापस भी आ जाता था. उस दिन के बाद से मुझे रुपेश कही दिखा नहीं था.

एक दिन मैं अपने खेत की तरफ से पैदल hi घर आ रहा था तो रास्ते में मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने मुझे पुकारा हो. मैंने आस पास देखा तो बगल के एक खेत में एक लड़की कड़ी थी और हाथ के इशारे से मुझे अपने पास बुला रही थी. पहले तो मैं ये समझा की शायद वो किसी और को इशारा कर रही है इस लिए मैंने रुक कर इधर उधर देखा. फिर जब उसने मेरा नाम ले कर पुकारा और अपने पास आने का इशारा किया तो मुझे समझ न आया की मैं उसके पास जाओ या नहीं.

मैं अपने गांव में किसी लड़की से ज़्यादा बात नहीं करता था और न hi मेरा किसी से कोई ऐसा वैसा चक्कर था. मुझे इन चक्करो से बड़ा दर सा लगा करता था और मैं ये भी सोचा करता था की अगर किसी ने मुझे किसी लड़की के साथ देख लिया और फिर उसने मेरे पिता जी को बता दिया तब तो जूतों की मार पक्का पड़ेगी मुझे. मैं पिता जी से बहुत डरता था.

उस लड़की ने जब मुझे फिर से पुकारा तो मैंने अपने चारो तरफ देखा. दूसरा कोई न दिखा वह पर मुझे. अभी शाम नहीं हुयी थी बल्कि 3 बज रहे थे. वैसे तो सड़क के दोनों तरफ खेत hi खेत थे मगर इस वक्त उन खेतो पर मुझे कोई नज़र न आया. जिस तरफ वो लड़की कड़ी मुझे बुला रही थी उस तरफ भी खेत hi थे मगर वह पर एक छोटा सा घर भी बना हुआ और घर के चारो तरफ कई तरह के फल पेड़ लगे हुए थे. जिससे वह पर हरियाली hi हरियाली नज़र आती थी.

उस लड़की के पास और कोई नहीं था. मेरे दिमाग में सवाल आया की ये लड़की मुझे क्यों बुला रही है.? मुझसे क्या काम हो सकता है इसका.? कही ऐसा तो नहीं की मैं इसके पास जाओ और ये मुझे किसी उलटे सीधे चक्कर में फसा दे. पंचायत वाली बात को भले hi गुज़रे हुए 10 दिन से ऊपर हो गए थे मगर क्या पता ये सब कोई चक्कर हो जिसमे सरपंच का hi कोई हाथ हो.

मुझे अपनी ये सोच सही लगी और मैं उस लड़की की तरफ न गया बल्कि फिर से सड़क पर चलते हुए अपने घर की तरफ चल दिया. मुझे अपने पास न आता देख वो लड़की इस बार और ज़ोर से चिल्लाई. मगर मैंने इस बार उसकी तरफ देखा तक नहीं. मेरा दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा था. मेरे दिमाग में एक hi बात फिट हो गयी थी की मैं अगर इस लड़की के पास गया तो फास जाउगा किसी चक्कर में.

मैं ये सब सोचते हुए चला hi जा रहा था की तभी मेरे कानो में उसकी आवाज़ पड़ी और मैं रुक गया. उस लड़की की आवाज़ मेरे एक डैम करीब से hi आयी थी. मैंने पलट कर देखा तो वो लड़की भागते हुए सड़क तक आ गयी थी. मैंने जब उसे ठीक से देखा तो मैं पहचान गया उसे. ये लड़की हमारे घर के पास की hi थी. इसके बाप को हम लोग बिहारी काका कहते थे. वैसे उनका पूरा नाम कृष्ण बिहारी गौतम है मगर सब उन्हें बिहारी hi कहते हैं. ये भी ब्राह्मण hi हैं मगर बाकी ब्रह्मिनो की तरह ये भी हमारे घर का ख़ास मौको पर पानी नहीं पिटे.

"बहरे हो क्या तुम.? कितनी देर से आवाज़ दे कर बुला रही हु तुमको और एक तुम हो की सुनते hi नहीं. तुमको पता है इतना ज़ोर से मैं आज तक नहीं chillayi..dekho तो गाला तक दुखने लगा मेरा और ये महाशय सुन कर भी अनसुना कर रहे थे. ारी अब कहा चले जा रहे हो रुको तो." मेरे पीछे से उस लड़की ने ये सब कहा तो मैं रुक गया और उसकी तरफ पलटा.

"तुम तो मुझे देख कर ऐसे भागने लगे जैसे मैं तुम्हे कच्चा चबा जोगी. रुको आज ाउगि काकी के पास और तुम्हारी शिकायत लगोगी उनसे. कहुगी की मैं तुम्हे चिल्ला रही थी और तुम सुन hi नहीं रहे थे." वो लड़की जिसका नाम माया गौतम था एक hi सांस में जाने क्या क्या बोल गयी थी. वो मेरी hi आगे की थी और मैं उसे अच्छी तरह से जनता था मगर कभी बात नहीं करता था.

"क्या काम hai..aur क्यों चिल्ला रही थी मुझे.?" मैंने पूछा तो उसने कहा.

"ारी मेरा तुमसे कोई काम नहीं था. तुम जैसे खड़ूस से किसी को कोई काम भी क्या होगा.? दो साल शहर में रह कर पढ़ क्या लिया किसी को देखता तक nahi...huh." उसने मुँह बना कर ऐसा कहा तो मैंने कहा.

"अगर मुझसे कोई काम नहीं था तो मुझे पुकार क्यों रही थी तुम.?" मैं उससे रीज़न जानना चाहता था और फिर जल्दी से यहाँ से जाना भी चाहता था.

"आज कल बड़ा फिल्मी हीरो बने फिरते हो तुम. उस दिन सरपंच काका के लड़के की अच्छी खासी धुनाई कर दी थी तुमने. ऐसा क्या हो गया था भला जो धुन था दिया.?" माया ने ऐसा कहा तो मुझे अच्छा नहीं लगा. मैं सोच रहा था की क्या इसने यही बात करने के लिए मुझे रोका है.

"कुछ नहीं हुआ tha...main जा रहा हु." मैंने कहा और फिर चल दिया तो उसने जल्दी से कहा.

"ारी रुको to...asli बात तो मैंने तुम्हे बताई hi नहीं जिसके लिए मैं तुम्हे बुला रही थी." माया ने ये कहा तो मैं फिर रुक गया और उसकी तरफ देखने लगा.

"देखो जो भी बात है जल्दी कहो. मेरे पास टाइम नहीं है रुकने का." मैंने कहा तो वो बोली.

"ोये खड़ूस इंसान रुक जा थोड़ी देर. ज़्यादा भाव मत खा समझा.?" माया ने इस बार तेज़ आवाज़ में कहा तो मैं हैरानी से उसकी तरफ देखने लगा बोलै कुछ नहीं.

"अच्छा एक बात बताओ की सरपंच की बेटी रचना पर क्या जादू किया है तुमने.?" उसने मेरी तरफ ध्यान से देखते हुए कहा तो मैं कुछ समझ न पाया.

"ये क्या कह रही हो तुम.?" मैंने कहा तो वो मुस्कुरायी.

"क्यों ठीक से सुनाई नहीं दिया तुम्हे.? वैसे ऐसा कोई जादू मुझ पर करते तो हाय मेरी तो किस्मत hi जाग जाती न विक्की. मगर उस कलमुही पर क्यों किया ऐसा.?" माया ने ऐसा कह तो मेरा दिमाग हैंग सा होने लगा. ये क्या बकवास कर रही थी. मेरे दिमाग में फुल स्पीड में ये बात आयी की लगता है ये कोई चक्कर hi है जिसमे ये मुझे फ़साना चाहती है.

"अगर तुम्हे यही बकवास करना है तो करती raho...mujhe तुम्हारी बकवास सुनने में कोई इंट्रेस्ट नहीं है." मैंने कहा और फिर से पलट कर चल दिया. मैं आस पास भी देख रहा था की इस तरह बीच सड़क पर मुझे इसके साथ कोई देख न ले. वैसे भी इस टाइम सितारे कुछ ठीक नहीं थे हमारे.

"ारी सुनो तो सही yaar...ye कोई बकवास नहीं है. सच कह रही हु मैं. वो रचना तुम्हारे बारे में मुझसे पूछ रही थी. उसे लगता है की मेरा घर तुम्हारे घर के पास में hi है तो मुझे तुम्हारे बारे में सब कुछ पता होगा. अब मुझे जो पता था वो तो मैंने उसे बता दिया है. मगर जब मैंने उससे पूछा की तुम विक्की के बारे में ये सब क्यों पूछ रही हो तो उसने मुझे कुछ भी नहीं बताया. पता नहीं कामिनी के मन में क्या था. अभी जब तुम मुझे दिखे तो मैं यही जानने के लिए तुम्हे बुला रही थी की कौन सा जादू किया है तुमने उस पर.?" माया ने ये सब मुझसे कहा तो मैं एक डैम से हैरान रह गया. मेरे दिमाग ने भी सोचा की सरपंच की बेटी रचना मेरे बारे में माया से क्यों पूछ रही थी और किस लिए पूछ रही थी.

"क्या hua....kuch बताओगे भी या ऐसे hi चुप खड़े रहोगे. देखो मुझे सब कुछ सच सच बताओ की क्या चक्कर है तुम्हारा और उसका.? अगर नहीं बताओगे तो मैं ये बात तुम्हारी उन दोनों जुड़वाँ बहनो को बता दूगी. वैसे इतना तो मैं भी जानती हु की तुम ऐसे नहीं हो. मगर जब रचना ने मुझसे तुम्हारे बारे में पूछा तो मैं सोच में पद गयी थी. मुझे लगा क्या पता शहर में रहने से तुम्हारे मिजाज़ बदल गए हो." माया ने ये सब कहा तो मैं परेशां सा हो गया. बिना मतलब का इलज़ाम मेरे सर थोप रही थी ये लड़की. सरपंच की बेटी से मेरे चक्कर की बात कर रही थी जब के मेरा तो उससे कोई वास्ता hi नहीं था.

"ये सब झूठ है. मेरा उससे कोई चक्कर वक्कर नहीं है. मैंने तो उससे बात hi नहीं की कभी. तुम भी जानती हो की मैं ज़्यादा किसी से कोई मतलब नहीं रखता. सबसे बड़ी बात ये की एक तो मेरा उससे कोई वास्ता hi नहीं है दूसरा पूरा गांव जनता है की सरपंच के बेटे के साथ मेरा क्या पन्गा हुआ था और फिर क्या पंचायत हुयी थी." मैंने एक hi सांस में ये सब कहा तो माया मुझे अजीब तरह से देखती रही फिर बोली.

"ये सब मैं जानती हु लेकिन मैं झूठ नहीं बोल रही तुमसे. अभी कल hi की बात है ये जब रचना ने मुझसे तुम्हारे बारे में पूछा था. अगर तुम ये कहते हो की तुम्हारा उससे कोई चक्कर नहीं है तो फिर वो क्यों पूछ रही थी तुम्हारे बारे में मुझसे.?" माया ने कहा तो मेरा दिमाग ख़राब हो गया.

"अब मुझे क्या पता की क्यों पूछ रही थी.? तुमने खुद hi क्यों नहीं पूछ लिया उससे." मैंने परेशां हो कर कहा तो माया फिर मुझे अजीब तरह से देखने लगी.

"उसने मुझे कुछ नहीं बताया. मगर मैं ये कैसे यकीन करू की तुम्हारा और उसका कोई चक्कर नहीं है.?" माया ने ये कहा तो मैं बोलै.

"न करो यकीन. जो सच है वो मैंने बता दिया है. अब मैं जा रहा हु." मैंने कहा और जाने लगा तो वो फिर बोली.

"सोच लो vicky...agar मुझे सच नहीं बताया तो मैं ये बात काकी से भी बता सकती हु. उसके बाद क्या होगा ये तुम अच्छी तरह जानते हो." माया ने मुझे चेतावनी देते हुए कहा तो मुझे अब गुस्सा आने लगा उस पर.

मुझे समझ नहीं आ रहा था की अब ये क्या नया ड्रामा हो रहा है मेरे साथ. साला मैंने जिससे कभी बात hi नहीं किया उसके साथ ये मेरे चक्कर होने की बात कर रही है और वो रचना भी साली पता नहीं क्यों मेरे बारे में इससे पूछ रही थी.

"देखो maya...tum बिना वजह के मुझ पर इलज़ाम लगा रही हो. मैं अपनी माँ की कसम खा कर कहता हु की मेरा उस सरपंच की बेटी से कोई चक्कर नहीं है. मैं नहीं जनता की उसने तुमसे मेरे बारे में क्यों पूछा. एक बात aur...maan लो अगर मेरा उससे कोई चक्कर हो भी तो तुम्हे इससे क्या प्रॉब्लम है.?" मैंने ऐसा कहा तो माया एक डैम से चुप हो गयी.

"दुसरो पर बिना वजह इलज़ाम लगाना बहुत आसान होता है और मज़ा भी आता है. मगर ये गलत बात है. अगर मैं भी तुम्हारे बारे में कोई ऐसा hi उल्टा सीधा इलज़ाम लागू तो कैसा लगेगा तुम्हे.?" मैंने ये कहा तो माया ने मेरी तरफ देखा फिर बोली.

"इलज़ाम लगा के तो देखो तुम. मैं ऐसी वैसी नहीं हु समझे तुम." माया ने कहा तो मैं इस बार मुस्कुरा उठा.

"ये तो मैं भी समझा रहा था तुम्हे मगर तुमको यकीन नहीं हो रहा था और जब वैसी hi बात मैंने तुम्हारे लिए कही तो तुम्हारा पारा गरम हो गया. मतलब तुम अपने आपको सच्ची समझती हो और दूसरे को ऐसा वैसा." मैंने ये कहा तो माया फिर चुप हो गयी.

"चलो chhodo...main जा रहा हु अब.. और तुम भी जाओ. वर्ण यहाँ पर अगर कोई तुम्हे मेरे साथ देख लिया तो वो भी यही समझेगा की मेरा तुमसे कोई चक्कर है." मैंने ऐसा कहा तो माया ने हैरानी से मेरी तरफ देखा और फिर मुस्कुरा पड़ी.

"हाँ तो ठीक है na...samajhne दो." माया ने धीरे से कहा था मगर मैंने सुन लिया था इसी लिए हैरानी से बोलै.

"क्या कहा तुमने.?" मैंने कहा तो माया इधर उधर देखने लगी और फिर कुछ नहीं कह कर वापस खेत की तरफ भाग गयी.

उसे इस तरह भाग कर जाते देख मुझे कुछ समझ न आया और मैं समझना भी नहीं चाहता था. उसके जाते hi मैंने इधर उधर देखा और घर की तरफ चल दिया. सरे रास्ते मैं यही सोचता रहा की सरपंच की बेटी ने माया से मेरे बारे में क्यों पूछा होगा.? आखिर वो माया से मेरे बारे में क्या जानना चाहती थी.?

कच्चे रस्ते से चलते हुए जब मैं गांव की आरसीसी सड़क पर आया तो रास्ते में hi मुझे मेरा एक दोस्त मिल गया. वो मुझे देख कर मुस्कुराया और फिर कहने लगा की क्या यार तू तो गांव में हीरो बन गया है. सरपंच के लड़के की अच्छी खासी धुनाई कर दी है. अभी भी वो बिस्तर पर पड़ा है.

मैं दोस्त की इस बात पर ज़्यादा कुछ न बोलै. थोड़ी देर इधर उधर की बात करने के बाद मैं घर की तरफ चल दिया. पक्की सड़क के दोनों तरफ लोगो के घर बने हुए थे. कुछ कच्चे घर तो कुछ पक्के बने हुए थे. गांव के बीच में एक बड़ा सा कुआ था जिसमे लोग पानी भरते थे और नहाते भी थे. इस वक्त भी कुछ लेडीज उसमे से पानी भर रही थी. मेरे घर के लिए पानी इस कुए से नहीं जाता था. मेरे घर में बोर था उसी से हमारा सारा काम होता था.

कुछ hi देर में मैं अपने घर आ गया. घर आ कर मैंने सबसे पहले आँगन में जा कर हाथ मुँह धोया और फिर बैठक के पास आ गया. पिता जी घर पर नहीं थे. शाम अभी पूरी तरह से हुयी नहीं थी. मैंने देखा माँ बैठक के अंदर वाले हिस्से में ज़मीन पर hi बैठी गेहू को सूपे में फाटक रही थी और फिर फटकने के बाद उसे एक अलग बोरी में दाल रही थी. मैं समझ गया की घर में आता ख़तम होने वाला है इस लिए माँ गेहू पीसने के लिए गेहू को अच्छे से साफ़ करके बोरी में भर रही है.

मुझे देख माँ ने मुझसे पिता जी के बारे में पूछा तो मैंने बताया की वो खेत पर hi हैं. माँ से कुछ देर इधर उधर की बाते करने के बाद मैं अपने कमरे में आ गया. मेरे कमरे में मेरी दोनों जुड़वाँ बहने आराम से बीएड पर लेती हुयी मोबाइल में गेम खेल रही थी. मुझे देखते hi दोनों मुस्कुरायी और दोनों झट से बीएड पर उठ कर बैठ गयी.

"भाई पता है मैंने आज इसे हर बार हराया. एक बार भी मुझसे नहीं जीत पायी ये हेहेहे." पूजा ने प्रिय की तरफ देख कर हस्ते हुए मुझसे कहा तो मैंने प्रिय की तरफ देखा तो वो भी बोल पड़ी.

"ोये तू न ठूठ मत बोल समझी. 3 बार तो मैंने तुझे हराया है. बस अभी 3 बार मैं लगातार हारी हु." प्रिय ने ऐसा कहा तो पूजा ने आखे दिखाई उसे और फिर बोली.

"हाँ तो मैंने 3 बार लगातार तुझे हराया है न. तूने तो मुझे एक बार भी 3 बार में लगातार नहीं हराया." पूजा ने कहने के बाद गर्व से सर उठा लिया.

"हाँ हाँ ठीक है मगर तू भाई से झूठ मूठ का क्यों बताती है की मैंने तुझे एक बार भी नहीं haraya...jhoothi कही ki..huh." प्रिय ने मुँह बनाया तो पूजा ने भी मुँह बना लिया.

"हाँ एक तू hi तो सटी सावित्री है दुनिया में. बड़ी आयी सत्यवादी." पूजा ने कहा और दूसरी तरफ मुँह कर कर लिया उससे. मैं दोनों को देख कर मन hi मन मुस्कुराये जा रहा था. ये दोनों ऐसी hi थी. दोनों एक दूसरे से ऐसी hi छोटी छोटी बातो में लड़ पड़ती और फिर एक हो जाती थी. दोनों एक दूसरे के बिना रह भी नहीं पति थी. मगर एक बात सोचने वाली थी की दोनों में इतने से ज़्यादा कभी कोई लड़ाई नहीं होती थी.

दोनों hi अब जवान हो चुकी थी मगर बचपना अभी भी था इनमे. माँ हमेशा इन्हे डाटती रहती थी की अपनी इन हरकतों से बाज आ जाओ. अब बड़ी हो गयी हो तुम दोनों मगर दोनों hi माँ की बातो को एक कान से सुनती और दूसरे कान से उदा देती थी.

"अच्छा ये सब छोडो और मुझे बढ़िया सी गरमा गरम चाय बना कर पिलाओ. जो भी पिलायेगा उसको मैं शम्भू काका के ठेले पर ले जा कर चाट खिलाऊंगा." मैंने ऐसा कहा तो उन दोनों ने एक दूसरे की तरफ देखा और फिर दोनों hi बीएड से उतर कर कमरे के बाहर की तरफ दौड़ पड़ी.

मैं उन्हें इस तरह भागते देख हसने लगा था. दोनों को शम्भू काका के यहाँ की चाट बहुत पसंद थी. माँ की डाट की वजह से वो जा नहीं पति थी. फिर वो मेरे पास आती और मुझसे बड़े प्यार से कहती भाई आज चाट खिला do..bada दिल करता है. मैं उन दोनों को ले कर जाता और फिर चाट खिला कर लता था. मेरे साथ जब वो जाती तो माँ मुझे भी डाटती मगर मैं उन्हें समझा कर ले hi जाता उन दोनों को.

दोनों के जाते hi दो मिनट बाद कुसुम दीदी मेरे कमरे में आ गयी. उन्होंने मुझसे हस्ते हुए कहा की क्या मैंने उन्हें चाट खिलने का लालच दिया है जो वो दौड़ते हुए किचन में गयी हैं.? मैंने हस्ते हुए उन्हें हाँ कहा.

"वैसे तो तेरी इन दोनों से बनती नहीं है और न hi ये तेरी कोई बात मानती हैं. मगर एक ये तीर ऐसा है जो सही निशाने पर लगता है तेरा. चाट खिलने का सुनते hi ये दोनों तेरा हर हुकुम मानने को तैयार हो जाती हैं." कुसुम दीदी ने ऐसा कहा तो मैं मुस्कुरा उठा. मेरा ध्यान कुसुम दीदी की नाक पर था. उनके नाक में सोने की एक खूबसूरत सी नथुनी थी जो बहुत hi सुन्दर लग रही थी.

मुझे अपनी तरफ इस तरह देखते देख उन्होंने इशारे से hi पूछा की क्या देख रहा हु मैं तो मैंने उन्हें बताया की मैं उनके नाक की नाथ देख रहा हु. मेरी इस बात से दीदी मुस्कुरायी.

"वो कल माँ लायी थी मेरे लिए तो मैंने आज अभी पहना है इसे. क्या अच्छी नहीं लग रही तुझे.?" दीदी ने नाथ में हाथ लगते हुए मुझसे पूछा तो मैंने कहा.

"आपकी हर चीज़ बहुत अच्छी लगती है मुझे." मैंने कहा तो दीदी ने बड़े ध्यान से मेरी तरफ देखा. उनके चेहरे पर हल्का सुर्ख रंग झलकता नज़र आया.

"अच्छा ji...zara ढंग से बता तो मुझे." दीदी ने कहा तो मुझे कोई जवाब नहीं सुझा. मुझे एक डैम से ख़याल आया की ये मैंने क्या कह दिया था उन्हें. कही वो मेरे बारे में कुछ गलत न सोच ले.

"इसमें बताना क्या है didi..aapko बताया तो है मैंने की आप दुनिया की सबसे सुन्दर और मासूम दीदी हैं मेरी. आप कोई भी कपडा पहनो सब सुन्दर hi नज़र आता है और आज तो आपकी नाक की ये नाथ और भी ज़्यादा सुन्दर बना रही है आपको." मैंने ऐसा कहा तो दीदी मेरी तरफ देखते हुए मुस्कुराने लगी. उनके चेहरे पर लाज और शर्म की लाली सी नज़र आने लगी थी.

"चल झूठ मुठ की तारीफ न कर तू. मुझे पता है की तू मुझे खुश रखने के लिए हर बार यही बोलता रहता है." दीदी ने ये कहा तो मैं उनको देखता रह गया. मुझे समझ न आया की अब मैं उनको कैसे यकीन दिलाओ की मैं जो कह रहा हु वो सच hi है. वैसे मुझे भी ये पता था की वो बस ऐसे hi कह रही हैं.

उनको मेरे मुख से अपनी तारीफ सुन्ना अच्छा लगता था मगर मुख से हमेशा ऐसा hi कहती थी. कुछ देर तक दीदी मेरे पास रही उसके बाद वो माँ के कामो में उनका हाथ बताने के लिए चली गयी.

उनके जाने के बाद मैं बीएड पर लेट गया था और फिर मेरा ध्यान एक डैम से माया की तरफ चला गया. मैं फिर से सोचने लगा की सरपंच काका की बेटी मेरे बारे में माया से क्यों पूछ रही थी. मैंने बहुत सोचा मगर मुझे कुछ समझ न आया तो मैंने अपने दिमाग से ये सब निकाल देने का फैसला किया.

अभी मैं ये सोच hi रहा था की तभी प्रिय पूजा कमरे में आ गयी. पूजा के हाथ में ट्रे था जिसमे उसने 3 कप रखे हुए थे. दोनों के चेहरे ख़ुशी से चमक रहे थे. पूजा ने आते hi ट्रे मेरी तरफ किया तो मैंने मुस्कुराते हुए उसमे से एक कप उठा लिया.

"भाई अब तो हम चलेंगे न शम्भू काका के ठेले के पास चाट खाने.?" पूजा ने मुझे चाय देते हुए ख़ुशी ख़ुशी कहा तो मैंने हाँ में सर हिला दिया और चाय पिने लगा. वो दोनों भी एक एक कप ले कर बीएड पर मेरे दोनों साइड से बैठ कर चाय पिने लगी. दोनों एक दूसरे से बोल रही थी की आज की चाट में मिर्ची ज़्यादा डलवाना देखना कितना मज़ा आता है. दूसरी बोलती की न बाबा न मिर्ची वाली चाट तो तू hi खाना.

मैं उन दोनों की बाते सुनता रहा. चाय पिने के बाद मैं उन दोनों को ले कर नीचे आया और माँ को बता कर उन दोनों को चाट खिलने ले गया. दोनों ने दो दो बार चाट खायी. उसके बाद मैंने शम्भू काका से माँ और दीदी के लिए भी पैक कर देने के लिए कहा तो वो पैक करने लगे. शम्भू काका को उनके चाट के पैसे दे कर मैं अपनी दोनों बहनो को ले कर घर की तरफ वापस चल दिया.

थोड़ी देर में हम घर आ गए. मेरी दोनों जुड़वाँ बहने माँ की डाट से बचने के लिए अपने कमरे की तरफ चली गयी. जबकि मैं पैक करवाई हुयी चाट ले कर गया और उसे माँ को पकड़ा दिया.

दिन ऐसे hi गुज़र रहे थे. धीरे धीरे माहौल ठीक हो रहा था. पंचायत वाली घटना के बाद से सरपंच का हमसे बोल चाल बंद हो चूका था. गांव के लोगो से hi पता चलता रहता था की हमारे बारे में सरपंच क्या क्या कहता फिरता है हर जगह.

मैं पिता जी के साथ उनके कामो में हाथ बताता था. वो मुझे ज़रूरी सामान लेन के लिए शहर भी भेज देते थे. वो खुश थे की अब मैं उनकी बराबरी का हो गया हु और उनके कामो में उनका हाथ बताता हु.

एक दिन पिता जी ने मुझे किसी काम से शहर भेजा. मैं घर से अपनी मोटर सिक्ले में hi गया था. शहर पहुंच कर मैंने सामान ख़रीदा और उसे पैक करवा लिया. उसके बाद वापस घर के लिए चलने लगा. तभी मेरी नज़र एक जगह पड़ी तो मैं रुक कर उस तरफ देखने लगा.

भाई लोग....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
थैंक्स फॉर योर लवली कमेंट...

मैं भी यही कहना चाहता हु भय की फ्लैशबैक को सारा ख़तम कर दू उसके बाद साडी स्टोरी प्रेजेंट में hi राखु. अब आप hi बताओ के क्या 1 या 2 अपडेट फ्लैशबैक ख़तम हो जायेगा जैसा की बाकि लोग मुझे कहते hain....:hmm::hmm:

नेक्स्ट अपडेट पोस्टेड....

रीड & एन्जॉय....
 
थैंक्स फॉर योर लवली कमेंट...

भय एक बात बताओ आप लोग की फ्लैशबैक को जल्दी ख़तम करने से क्या मिल जायेगा या प्रेजेंट में ऐसा क्या मिल जायेगा....

एन्जॉय तो पास्ट प्रेजेंट दोनों में हो सकता है यारा. आप एक बार उसको पढ़ो to....:adore:

नेक्स्ट अपडेट पोस्टेड ों पेज no. 53....

रीड & एन्जॉय....
 
सब कुछ जायज़ है....

अपडेट = 13

फ्लैशबैक रनिंग....


मैं शहर में जिस जगह पर था वो मार्किट थी और जिधर मैं देखने लगा था उस तरफ हमारे गांव के सरपंच यानी की मणि शंकर की बेटी कड़ी थी कपड़ो की दूकान के बिलकुल सामने. उसके साथ एक औरत भी थी जो नीले कलर की साड़ी पहने हुए थी.

कपडे की उस दूकान से करीब 3 या 4 चार दूकान पहले hi मैं अपनी मोटर सिक्ले को पकडे खड़ा था और चलने के लिए तैयार था. इस तरफ से hi मैंने सामान लिया था और अब घर जाने वाला था की मेरी नज़र सामने की दूकान के पास hi कड़ी रचना पर पड़ी थी. उसने मुझे नहीं देखा था. उसके साथ जो औरत थी वो उसकी बड़ी बहन थी. उसकी बहन का नाम मुझे पता नहीं था. मैं उसे बस उसके चेहरे से hi पहचानता था.

वो दोनों उस दुकान के सामने कड़ी ऊपर लगे दुकान के बड़े से बोर्ड को देख रही थी. शायद वो दोनों उस दूकान को ढूढ़ रही थी जिस दुकान से वो कपडे वगैरा ले जाती होगी हमेशा. रचना को देख कर मुझे माया की कही बात याद आ गयी की रचना मेरे बारे में उससे पूछ रही थी. मैं अब घर जाने के लिए रेडी हो गया था और मुझे उन दोनों के पास से hi हो कर निकलना था क्यों की गांव की तरफ जाने का वही रास्ता था.

मैं एक दो मिनट तक उन दोनों को देखता रहा फिर मैं अपनी मोटर सिक्ले पर बैठ गया. उनकी तरफ देखते हुए hi मैंने किक मारी और चल दिया उनकी तरफ. मैं चाहता था की जब मैं उन दोनों के करीब से निकलू तो उनकी नज़र मुझ पर न पड़े. मगर ऐसा हुआ नहीं. शैतान को याद करो तो शैतान जैसे सामने आ hi जाता है. वही हुआ.

मोटर सिक्ले जब उन दोनों के पास पहुंची तो मोटर सिक्ले की आवाज़ से hi उनका ध्यान मेरी तरफ गया. रचना की बहन ने तो एक बार मेरी तरफ देखा और फिर वो दुकान के अंदर की तरफ देखने लगी थी. शायद वो मुझे पहचानती नहीं थी. मगर जब रचना की नज़र मुझ पर पड़ी तो वो मुझे देखती hi रह गयी थी. मैं बस उसके पास पहुंच hi गया था. उसने जल्दी से अपनी बहन की तरफ देखा और फिर जल्दी से hi मुझे कोई इशारा किया मगर मैं उसका इशारा समझ नहीं पाया और न hi मैं उसका कोई इशारा समझना चाहता था.

जैसे hi मैं उसके पास से गुज़र कर कुछ दूर गया तो मेरे दिमाग में आया की आखिर पता तो चलना hi चाहिए की इसने माया से मेरे बारे में क्यों पूछा था. आखिर ऐसी क्या बात थी जिसकी वजह से इसने माया से मेरे बारे में पूछा था. मेरे दिमाग में इस बात के आते hi मैंने मोटर सिक्ले को किनारे की तरफ लगा कर रोक दिया.

पीछे मुद के देखा तो रचना मुझे hi देख रही थी. मैं जैसे hi रुका तो उसके होठो पर स्माइल आ गयी. उसने अपनी बड़ी बहन की तरफ देखा जो दूकान के अंदर जा चुकी थी. उसके बाद उसने मेरी तरफ देखते हुए हाथ के इशारे से मुझे रुकने को कहा और अपनी बड़ी बहन के पीछे hi दूकान के अंदर चली गयी.

मैं हैरान था की ये कैसी लड़की है. मतलब की हमारी कभी कही कोई मुलाकात नहीं हुयी और न hi हमने कभी कोई बात hi की थी फिर भी वो इस तरह से रियेक्ट कर रही थी जैसे हमारी काफी पहले से जान पहचान हो. उसके बेहेवियर से लग hi नहीं रहा था की वो किसी अजनबी लड़के को इस तरह के इशारे कर रही है.

मैं अभी ये सोच hi रहा था की तभी वो उस दूकान से बाहर निकली और एक बार पलट कर दुकान के अंदर की तरफ देखा फिर तेज़ी से चलते हुए मेरे पास आयी. मैं हैरानी से उसी को देखे जा रहा था. वो मेरे पास आ रही थी और मेरा दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा था. मेरे पास आते hi उसने इधर उधर देखा और फिर मेरी तरफ देखने लगी. उसके चेहरे से लग तो रहा था की मेरे पास आने से उसकी हालत भी कुछ ठीक नहीं है. क्यों की मैंने पास से देखा तो पता चला की वो कुछ उनकंफर्टबले फील कर रही थी.

"देखो यहाँ पर मैं तुमसे ज़्यादा कोई बात नहीं कर सकती. मैं अपनी दीदी से बहाना बना कर दूकान से बाहर आयी हु. मुझे तुमसे कुछ ज़रूरी बाते करनी है." रचना ने ये सब कहा तो मुझे समझ न आया की मैं उसे क्या जवाब दू.

"भगवन के लिए मुझे गलत मत समझना. ये lo...is कागज़ में तुम मुझे अपना फ़ोन no लिख कर दे दो. मैं तुम्हे बाद में खुद फ़ोन करुँगी. उसके बाद hi बताऊगी की क्या बात करनी है तुमसे." ये कहते हुए रचना ने एक कागज़ का टुकड़ा मेरी तरफ बढ़ाया और साथ में पेन भी.

वो कागज़ वाला हाथ मेरी तरफ बढ़ाये हुए थी और मैं बेवकुफो की तरह हैरानी से उसको देखे जा रहा था. मैं समझ नहीं प् रहा था की ये लड़की आज के मॉडर्न ज़माने की है या इसका नेचर hi इतना फ्रैंक टाइप का है.

"मैं जानती हु की इस टाइम तुम्हारे मन में बहुत सरे सवाल होंगे मगर तुम चिंता मत करो. मैं फ़ोन पर सब कुछ बता दूगी तुम्हे. अब जल्दी से अपना no लिख दो इस कागज़ में. मैं यहाँ ज़्यादा देर नहीं रुक सकती." रचना ने ये कहा तो मैंने उसके हाथ से पेन कागज़ लिया और उस पर अपना no लिख कर कागज़ पेन उसे पकड़ा दिया.

मेरे हाथ से कागज़ और पेन लेते hi उसने मुझे मुस्कुरा कर थैंक यू कहा और पलट कर दूकान की तरफ भाग गयी. उसके जाने के बाद hi मेरे दिमाग ने काम किया की ये मैंने क्या कर दिया है. बिना सोचे समझे मैं सरपंच की लड़की के कहने पर उसे अपना फ़ोन no कैसे दे सकता हु. मुझे सोचना चाहिए था की अभी कुछ दिन पहले hi तो इसके भाई से मेरा झगड़ा हुआ था और पूरे गांव में हंगामा हो गया था.

रचना तो मेरा मोबाइल no ले कर ख़ुशी ख़ुशी चली गयी थी मगर अब मैं ये सब सोच सोच के बुरी तरह परेशां हो गया था. सरपंच को अगर पता चल जाये की मैंने उसकी बेटो को अपना पर्सनल no दिया है तो वो क्या करेगा मेरे साथ इसका मैं अंदाज़ा भी नहीं लगा सकता था. हो सकता है की रचना खुद अपने बाप से कह दे की मैंने उसे रास्ते में रोका और उसे ज़बरदस्ती अपना no दिया था. उस सिचुएशन में सरपंच कुछ भी कर सकता था. कोई ये यकीन नहीं करेगा की इसमें मेरी कोई गलती नहीं है. सब रचना की बात पर hi भरोसा करेंगे. मेरे घर वाले भी कुछ नहीं कर पाएंगे.

मोटर सिक्ले में बैठा मैं ये सब सोच सोच कर बहुत ज़्यादा परेशां हो गया था और घबरा भी गया था. मुझे अपने आप पर गुस्सा भी आ रहा था की मैंने रचना के कहने पर उसे अपना no क्यों दे दिया. क्या पता ये उसकी कोई चाल hi हो मुझसे अपने भाई की मार का बदला लेने के लिए.

मुझे अपने चारो तरफ से रचना के कहकहो की आवाज़ सुनाई देने लगी. जैसे चारो तरफ से रचना अपनी इस जीत पर ज़ोर ज़ोर से ठहाके लगा रही हो.

मुझसे अब उस जगह पर रुका नहीं गया. मैंने जल्दी से मोटर सिक्ले स्टार्ट की और तेज़ स्पीड में गांव की तरफ दौड़ा दिया उसे. सरे रास्ते मेरे दिल और दिमाग में जुंग छिड़ी रही. मुझे टाइम का पता hi न चला और मैं घर के सामने पहुंच गया.

मोटर सिक्ले को घर के अंदर बैठक के पास hi किनारे साइड स्टैंड पर लगा कर मैं अंदर की तरफ आ गया. मार्किट से जो सामान मैं लाया था वो मोटर सिक्ले पर hi पीछे शीट पर बढ़ा हुआ था. मुझे उसे छोर कर अंदर लेन का ध्यान hi नहीं आया था. जब माँ ने मुझसे सामान के बारे में पूछा तब मुझे ध्यान आया. उसके बाद मैं गया और मोटर सिक्ले से उस सामान को छोर कर लाया और उसे माँ को पकड़ा कर मैं सीधा अपने कमरे में चला गया.

दोपहर में प्रिय मुझे खाने का कहने आयी तो मैंने जा कर खाना खाया और फिर थोड़ी देर आराम करने के बाद खेत की तरफ निकल गया. मुझे कही चैन नहीं मिल रहा था. मेरे दिमाग में बस वही सब चल रहा था. जिसकी वजह से मैं भरी टेंशन में आ गया था. मुझे पता था की दीदी से अगर सामना हुआ तो वो ज़रूर समझ जाएगी की मैं किसी बात से टेंशन में हु. तब वो मुझसे पूछेंगी और मैं उनको कुछ बता नहीं पाउगा. उनको बता देने का मतलब था की उन्हें भी टेंशन दे देना.

कोई नार्मल सिचुएशन होती तो इतनी सी बात से इतनी ज़्यादा टेंशन नहीं होती और न hi मैं इतना ज़्यादा घबराता मगर गांव में जिस तरह का माहौल ब्राह्मण समाज में हमारे लिए बना हुआ था उस हिसाब से ये सिचुएशन नार्मल नहीं कही जा सकती थी. ऊपर से उस दिन सरपंच के लड़के की वजह से और पंचायत वाले किस्से की वजह से और भी ज़्यादा सिचुएशन खराब हो गयी थी. ऐसे में अगर सरपंच की लड़की से मेरे किसी चक्कर की बात खुद रचना के बाप को hi पता चल जाये तो अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं था की इसका कितना गंभीर रिजल्ट हो सकता था.

हमारे गांव का सरपंच बहुत hi खराब आदमी था. वो अपने मतलब के लिए और अपनी जीत के लिए कुछ भी कर सकता था. मैंने सुना था की माँ बाप के अच्छे बुरे विचार उनके बच्चो में भी थोड़ा बहुत आ जाते हैं. सो अगर सरपंच की सोच को ले कर अंदाज़ा लगाए तो यही कहा जा सकता है की मणि शंकर की hi तरह उसके बच्चे भी बुरे विचारो वाले हो सकते हैं.

रचना मेरे hi गांव की लड़की थी और ब्राह्मण की hi बेटी थी. गांव के लोग एक दूसरे को थोड़ा बहुत तो जानते hi हैं. मैं भी रचना को थोड़ा बहुत hi जनता था. मेरी उससे पर्सनल कोई जान पहचान नहीं थी. उस घटना के बाद रचना का एक डैम से मुझसे ताल्लुक बनाना ऐसी बात थी जो समझ में नहीं आ रही थी. उससे बस यही समझ आ रहा था की जिससे मेरा कोई मतलब hi नहीं रहा था अब तक वो अचानक कैसे मुझसे किसी तरह का ताल्लुक बना सकती है. क्या ये नार्मल तरीके से एक लड़का लड़की के बीच का आकर्षण है या फिर इसके पीछे कोई ऐसी बात है जो मुझे ऐसी सिचुएशन में दाल दे जहा से मुझ पर और मेरे घर वालो पर कोई भयंकर प्रॉब्लम आ जाये.

खेतो में सारा दिन मैं इसी के बारे में सोचता रहा. मेरे पिता जी किसी दूसरी फसल के लिए खेतो को ट्रैक्टर से जोतवा रहे थे. मैं उनके पास नहीं था बल्कि खेतो के बीच जो हमारा एक छोटा सा घर बना था वह पर मैं बाहर hi बोर के पास बैठा था. घर के पीछे नहर थी जो दूसरे खेतो के पार से चलते हुए गांव के पीछे पीछे hi दूसरे गांव तरफ निकल गयी थी.

मेरा मोबाइल फ़ोन मेरे पास hi था. मैं जब भी अपनी सोच से बाहर निकलता तो मेरा ध्यान एक बार मेरे मोबाइल की तरफ ज़रूर जाता और मैं उसे खोल कर देखने लगता. मुझे लगता था की रचना का फ़ोन कही इसी वक्त न आ जाये. मैं भगवन से यही मन रहा था की वो कभी मुझे फ़ोन hi न करे. जिस वक्त मैंने उसे अपना no लिख कर दिया था उस वक्त मेरे दिमाग ने काम hi नहीं किया था वर्ण मैं उसे कभी अपना no देता hi नहीं. उससे मैं ऐसे hi पूछ लेता की वो मेरे बारे में माया से क्यों पूछ रही थी.

शाम को मैं पिता जी के साथ hi घर आया. अब तक मैं कुछ नार्मल हो गया था. इसकी दो वजह थी. एक तो ये की मैं किसी को दिखाना नहीं चाहता था की मैं किसी बात से टेंशन में हु और दूसरा ये की सारा दिन जब रचना का फ़ोन नहीं आया तो मैंने कुछ राहत की सांस ली थी. मुझे लगने लगा था की शायद वो मुझे फ़ोन नहीं करेगी. मैं ये भी सोच रहा था की हो सकता है की रचना ने मेरा no किसी बुरी नियत से न लिया हो और मैं बेकार में hi इस बारे में इतना ज़्यादा सोच कर टेंशन ले रहा हु.

रात में खाना पीना करके मैं जल्दी hi अपने कमरे में आ गया था. कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद नहीं किया था. क्यों की अब कुसुम दीदी मेरे साथ hi बीएड पर सोती थी. कुसुम दीदी मेरे साथ सोती हैं ये बात किसी को पता नहीं थी. वैसे अगर किसी को पता चल भी जाता तो इसमें कुछ गलत सोचने वाली बात नहीं थी. मेरे माँ पिता जी को अच्छे से पता था की हम दोनों भाई बहन एक दूसरे के बिना नहीं रहते और हम दोनों के बीच बड़ा प्यार है.

बीएड पर पड़ा मैं सोच रहा था की क्या ये बात दीदी को बताना चाहिए. वो ये बात जान कर ज़रूर परेशां हो जाएँगी क्यों की सिचुएशन hi ऐसी थी. सो मैंने सोच लिया की मैं दीदी को इस बारे में अभी कुछ नहीं बताउगा. अगर रचना मुझे सच में फ़ोन करती है तो मैं सबसे पहले ये जानने की कोशिश करुगा की उसने किस ज़रूरी बात के लिए मुझसे मेरा no लिया है. अगर वैसी कोई बात नहीं है जिस बात को सोच सोच कर मैं टेंशन ले रहा हु तो फिर मैं दीदी को बता दुगा.

कुसुम दीदी मेरे पास तभी आयी जब वो माँ के साथ सरे बर्तन धुलवा कर फ्री हो गयी और सब अपने अपने कमरों में सोने चले गए थे. दीदी के आने का टाइम फिक्स हो चूका था. हमारे घर में सबसे लास्ट में माँ hi सोती थी. दीदी को पता है की माँ रात को 11 बजे तक सो जाती हैं. सो दीदी मेरे कमरे में 11 बजे या फिर 11:30 बजे hi आती थी.

स्टार्टिंग के कुछ दिनों तक तो हम दोनों साडी साडी रात जागते थे और बाते करते रहते थे. दीदी बार बार कहती की सुबह माँ को पता चल जायेगा मगर इसके बाद भी हम दोनों बाते करते रहते. दुनिया जहां की बाते शुरू हो जाती तो फिर वो ख़तम होने का नाम hi न लेती. मगर फिर हमने साडी रात जागने वाला किस्सा ख़तम कर दिया.

दीदी जब मेरे कमरे में आयी तो हम दोनों के बीच कुछ देर तक इधर उधर की बाते होती रही. मैंने दीदी को महसूस नहीं होने दिया था की मैं टेंशन में हु. खेर उसके बाद हमने एक दूसरे को गुड नाईट बोलै और आँख बंद करके सो गए.

सुबह रोज़ाना की hi तरह अलार्म क्लॉक बजने से दीदी की आँख खुल गयी साथ में मेरी भी. दीदी ने अलार्म बंद किया और फिर मेरी तरफ देखा तो हमने रोज़ाना की hi तरह एक दूसरे को गुड मॉर्निंग बोलै. उसके बाद दीदी मेरे कमरे से चली गयी. उनके जाने के 10 मिनट बाद मैं भी नीचे आँगन के पास एक तरफ बने बाथरूम में फ्रेश होने गया. फ्रेश हो कर जब मैं अपने कमरे में आया तो थोड़ी hi देर में दीदी मेरे लिए चाय ले कर आ गयी.

ये अब डेली का नियम बन गया था. मैं दीदी की ख़ुशी के लिए हर काम कर सकता था और यही हाल दीदी का भी था. हम दोनों की सुबह और रात एक दूसरे का चेहरा देख कर hi होती थी. मेरे दिल और दिमाग में कभी भी दीदी के लिए कोई गलत ख़याल नहीं आता था. जब के वो मेरे साथ hi सोती थी और ज़्यादातर मेरे पास hi रहती थी. मैं इतना तो अब महसूस कर चूका था की हम दोनों एक दूसरे से बहुत प्यार करते the...bhai बहन का सच्चा प्यार.

कुसुम दीदी गंभीर नेचर की थी. जैसे जैसे उनकी आगे गुज़र रही थी उनमे वैसे वैसे hi गंभीरता भी आती जा रही थी. हमारे गांव में हर लड़की की 18 या 20 की आगे में शादी हो जाती थी. मेरी दीदी तो 20 के पार हो गयी थी और जिस तरह उनके लिए रिश्ते टूट जाते थे उससे वो और भी ज़्यादा टेंशन में आने लगी थी. उनके दिमाग में ये बात बैठ गयी थी की अब उनकी किसी से शादी नहीं हो पायेगी. गांव का ये ब्राह्मण समाज मेरी मासूम सी बहन के लिए जैसे दुश्मन बन गया था.

दूसरे दिन की शुरुआत हुयी. मेरे दिमाग में सरपंच की बेटी का बार बार ख़याल आ रहा था. मैं भगवन से दुआ कर रहा था की उसका मेरे पास कोई फ़ोन न आये. उस दिन का सारा दिन गुज़र गया और रचना का मेरे पास फ़ोन नहीं आया. मैं इस बात से खुश था की चलो भगवन ने मेरी दुआ कबूल कर ली. मगर मैं ये भी सोचता की रचना ने मुझसे ज़रूरी बात करने की बात कही थी और वो फ़ोन पर hi वो ज़रूरी बात कर सकती थी क्यों की हम दोनों के मिलने का तो कोई सवाल hi नहीं था. वो अगर मुझसे कही मिलने के लिए कहती भी तो मैं उसकी ये बात कभी न मानता.

सारा दिन ऐसे hi गुज़र गया. मैं पिता जी के साथ खेतो पर hi रहा. शाम को जब मैं पिता जी के साथ घर की तरफ चलने लगा तो मेरा मोबाइल फ़ोन बजने लगा. मोबाइल के बजने से सबसे पहले मेरे दिमाग में रचना का hi ख़याल आया और उसका ख़याल आते hi मेरे दिल की धड़कने फुल स्पीड में दौड़ने लगी. पिता जी मेरे आगे आगे चल रहे थे और मैं उनके पीछे था. मैंने जल्दी से अपनी पेंट की पॉकेट से मोबाइल निकला और उसकी स्क्रीन पर देखा तो अननोन no से कॉल आ रही थी.

अननोन no देखते hi मैं समझ गया की ये रचना की hi कॉल है. मोबाइल बजे जा रहा था और मुझमे उस कॉल को उठाने की हिम्मत नहीं हो रही थी. मैं कभी मोबाइल को देखता तो कभी अपने आगे आगे चल रहे पिता जी को. उनके सामने मैं रचना से कोई बात करना नहीं चाहता था. पिता जी बड़े आराम से hi चल रहे थे. उनको मेरे मोबाइल की रिंग सुनाई तो दे रही थी मगर उन्होंने पलट कर मेरी तरफ देखा नहीं था.

थोड़ी hi देर में मेरा मोबाइल बजना बंद हो गया. ये देख कर मैंने सुकून की सांस ली. मगर मैं जनता था की ये फिर से बजने लगेगा. सो मैंने जल्दी से मोबाइल को फ्लाइट मोड में दाल दिया और मोबाइल को अपनी पेंट की पॉकेट में आराम से दाल लिया. अब मैं टेंशन फ्री था क्यों की फ्लाइट मोड होने से रचना को मेरा मोबाइल नेटवर्क एरिया से बाहर hi बताएगा.

मैं पिता जी के साथ घर पंहुचा. हाथ मुँह धोने के बाद हम सबने साथ में hi बैठ के चाय पि. उसके बाद मैं अपने कमरे में आ गया. मेरे पीछे पीछे मेरी जुड़वाँ बहने भी आ गयी. वो दोनों मुझसे शम्भू काका के ठेले पर चलने का कहने लगी. कल की तरह आज भी उनका दिल कर रहा था चाट खाने का. मगर मैंने थकान का बहाना बना कर मन कर दिया. मेरे मन कर देने पर दोनों मुझसे नाराज़ हो गयी और फिर पता नहीं क्या क्या सुना कर कमरे से चली गयी. मुझे अच्छा तो नहीं लगा की मैंने अपनी मासूम सी बहनो को मन कर दिया मगर मेरा दिल hi नहीं कर रहा था अब कही जाने का.

बीएड पर लेता मैं सोच रहा था की मैंने अपने मोबाइल को फ्लाइट मोड में दाल कर सही किया या गलत.? रचना मुझसे कौन सी ज़रूरी बात करना चाहती है.? क्या मुझे एक बार उसकी कॉल पिक कर के उसकी वो ज़रूरी बात सुन लेना चाहिए.?

मैंने इस बारे में बहुत सोचा और फिर मैंने फैसला लिया की मुझे उसकी बात सुन hi लेना चाहिए. आखिर पता तो चल hi जाये की वो कौन सी ज़रूरी बात करना चाहती है मुझसे. ये सोच कर मैंने मोबाइल को फ्लाइट मोड से हटा दिया.

मैं रचना के कॉल आने का वेट करता रहा मगर उसके बाद उस रात उसका कोई कॉल नहीं आया. मुझे समझ न आया की उसने कॉल क्यों न किया होगा. दूसरा दिन भी ऐसे hi गया. मैं पिता जी के साथ खेतो पर hi था. खेतो पर मेरा बढ़िया टाइम पास हो जाता था. शाम को मैं पिता जी के साथ घर की तरफ चला तो रास्ते में फिर मेरा मोबाइल बजने लगा. कल की तरह hi मैं पिता जी के पीछे पीछे चल रहा था मगर आज जब मेरा मोबाइल बजा तो पिता जी ने पलट कर मेरी तरफ देखा.

पिता जी के इस तरह पलट कर देखने से मुझे बड़ा अजीब सा फील हुआ. मैंने जल्दी से मोबाइल निकाल कर देखा. कॉल अननोन no से hi थी. मैं समझ गया की ये रचना hi होगी मगर अब प्रॉब्लम ये थी की मैं पिता जी के सामने उससे कैसे बात करू.? मैं कॉल को कट hi करने वाला था की मेरे दिमाग में ये ख़याल आया की हो सकता है रचना मुझे इसी टाइम पर कॉल कर पति हो. इतर टाइम में शायद उसे टाइम hi न मिलता होगा.

मैंने देखा की पिता जी मेरे आगे करीब 5 या 6 कदम की दूरी पर चल रहे थे. ये देख कर मैंने जल्दी से कॉल उठा कर फ़ोन कान से लगा लिया. मेरा दिल ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था. जाने रचना मुझसे क्या बोलने वाली थी.

"शुक्र है की तुमने फ़ोन उठा लिया. कल मैंने लगाया था तो तुमने उठाया hi नहीं. उसके बाद तुम्हारा no नेटवर्क से बाहर बताने लगा था." मैंने जैसे hi कॉल उठाया तो रचना ने एक hi सांस में ये सब बोल दिया था. मुझे जवाब न सुझा की क्या बोलू.

"देखो मेरे पास ज़्यादा टाइम नहीं है. मेरे पास मेरा खुद का कोई मोबाइल नहीं है. ये मैंने कंचन दीदी के मोबाइल से तुम्हे फ़ोन लगाया है." मैं कुछ न बोलै तो रचना ने कहा था.

"किस बात के लिए फ़ोन लगाया है मुझे.?" मैंने बहुत सोच समझ कर सीधे पॉइंट की बात करने का सोचते हुए उससे पूछा तो उसने कहा.

"समझ में नहीं आता की कैसे कहु तुमसे.? पता नहीं तुम क्या सोच रहे होंगे मेरे बारे में." उसने एक डैम धीमी आवाज़ में ऐसा कहा तो मेरा दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा. मेरे दिमाग में बहुत सरे सवाल उठने लगे.

"देखो मैं ऐसा वैसा कुछ भी नहीं सोच रहा. तुम बस ये बताओ की ऐसी कौन सी ज़रूरी बात करने की बात कह रही थी मुझसे.?" मैंने आगे आगे चल रहे पिता जी की तरफ देखते हुए धीमी आवाज़ में hi ऐसा कहा तो रचना ने कहा.

"मुझे पता है की उस दिन मेरे भैया की hi गलती रही होगी तभी तुमने उन्हें इतना मारा था. मैं अपने भैया के बारे में अच्छे से जानती हु. मुझे पता चला है की उन्होंने तुम्हारी दीदी को कुछ गलत बात कही थी." रचना ने ऐसा कहा तो मैंने कहा.

"गलत करने का रिजल्ट यही निकलेगा न. खेर मैं अब उस बात को भूल चूका हु और इस बारे में अब कोई बात नहीं करना चाहता. तुम अगर इसी बारे में मुझसे बात करना चाहती थी तो मैंने तुम्हे बता दिया है की मैं उस बारे में कोई बात नहीं करना chahta...Aur हाँ प्ल्ज़ अब मुझे कॉल मत करना." मैंने एक hi सांस में ये सब कहा तो रचना बोल पड़ी.

"बड़े अजीब आदमी हो तुम. एक लड़की तुमसे खुद बात करना चाहती है और तुम कह रहे हो की अब मैं तुम्हे कॉल न करू. मैं जानती हु की गलती मेरे भैया ने की थी और उस गलती की सजा भी तुमने खुद hi दे दी थी. इसके बाद भी अगर तुम हमसे गुस्सा हो तो मैं अपने भैया की तरफ से तुमसे माफ़ी मांगती हु उस सब के लिए." रचना ने ऐसा कहा तो मुझे समझ न आया की मैं उससे क्या कहु.

"मैं जानती हु की तुम बहुत अच्छे ho...aur इसी लिए मैं चाहती थी की तुमसे बात करू और उस सब के लिए तुमसे माफ़ी मागु. मेरी तो तुमसे कोई दुश्मनी या नाराज़गी नहीं होनी चाहिए न.?" रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"मैं किसी को अपना दुश्मन नहीं मंटा और न hi मेरी किसी से कोई नाराज़गी है." मैंने कहा तो रचना ने कहा.

"तो फिर ये क्यों कहा की अब मैं तुम्हे कॉल न करू.?" रचना ने कहा तो मैंने एक बार फिर से पिता जी की तरफ देखा.

सामने रास्ते से दो आदमी इस तरफ hi चले आ रहे थे. वो दोनों ठाकुर थे. पिता जी को देख उन दोनों ने उन्हें नमस्ते किया और पिता जी के पास आ कर उनसे बाते करने लगे. पिता जी ने मुझसे घर जाने को कहा तो मैं चुप चाप किनारे से निकल गया उनके.

"क्या हुआ कुछ बोल क्यों नहीं रहे तुम.? ठीक है अगर तुम मुझसे बात नहीं करना चाहते तो नहीं करुँगी तुम्हे कॉल." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"ऐसी बात नहीं है. मैं बस इस लिए बात नहीं करना चाहता की अगर सरपंच काका को पता चल गया तो वो मेरे पिता जी को पुरे गांव के सामने जलील करेंगे." मैंने ऐसा कहा तो रचना की हसी की आवाज़ आयी.

"तुम भी कमाल करते हो विक्की. भला ऐसे कैसे मेरे पिता जी को पता चल जायेगा.? न तुम बताओगे और न hi मैं. फिर कैसे उन्हें पता चल जायेगा.?" रचना ने कहा तो मैंने कहा.

"मैं ये सब नहीं जनता. मैं बस ये जनता हु की मुझे तुमसे कोई बात नहीं करना चाहिए." मैंने साफ़ साफ़ कहा तो रचना कुछ न बोली. मैं भी कुछ न बोलै. थोड़ी देर में रचना ने कहा ठीक है न करो बात. मैं भी अब फ़ोन नहीं लगोगी तुम्हे."

रचना ने फ़ोन काट दिया था. मुझे बहुत अजीब सा लग रहा था. मगर मैं कही न कही खुश भी था की अच्छा हुआ बाला ताल गयी. मेरे लिए मेरी फॅमिली की सेफ्टी से बढ़ कर कुछ नहीं था. रचना के बारे में सोचते सोचते hi मैं घर पहुंच गया.

ऐसे hi एक हप्ता गुज़र गया. लाइफ अब नार्मल तरीके से चल रही थी. मेरी सुबह दीदी का खूबसूरत सा चेहरा देख कर शुरू होती और रात भी उनका हसीं चेहरा देख कर hi होती. दिन में मैं पिता जी के साथ खेतो पर काम करता रहता. उस दिन के बाद से रचना का मेरे पास कोई फ़ोन नहीं आया था. मैंने भी सोचा की चलो अच्छा hi हुआ की बाला ताल गयी है. मैं अब उसके बारे में सोचता भी नहीं था.

ऐसे hi एक दिन पिता जी ने मुझे फिर से किसी सामान को लेन के लिए शहर भेजा. मैं मोटर सिक्ले से सुबह 10 बजे घर से निकला था. हमारे गांव से शहर जाने में मोटर सिक्ले से करीब एक घंटा लगता था. मैं अपनी धुन में जा रहा था की तभी मेरा फ़ोन बजने लगा. मैंने मोटर सिक्ले को सड़क के किनारे लगा कर रोका और फिर पेंट की पॉकेट से मोबाइल निकला. मैंने सोचा था की शायद मेरे घर से फ़ोन होगा मगर जब मैंने मोबाइल की स्क्रीन पर देखा तो कोई अननोन no से कॉल आ रहा था.

पहले मुझे लगा की कही ये रचना तो नहीं मगर फिर ध्यान से देखा तो पता चला की ये वो no नहीं है जिसमे से रचना ने मुझे कॉल किया था. मैंने कॉल उठा कर मोबाइल कान से लगा कर hello किया तो मेरे कानो में जो आवाज़ आयी उसे सुन कर मैं शॉक रह गया. कॉल रचना की hi थी. उसी के hello की आवाज़ आयी थी मेरे कानो में जिसे सुन कर मैं शॉक सा रह गया था.

"क्या मैं थोड़ी देर तुमसे बात कर सकती hu..mujhe पता है की तुम मुझसे बात नहीं करना चाहते मगर जिस बात से तुम दर रहे हो उसका अहसास मुझे भी है. मैं यही कहुगी की तुम इतना ज़्यादा मत सोचो क्यों की ऐसा कुछ भी नहीं होगा." रचना ने ये सब कहा तो मैंने कहा.

"बोलो क्या बात करनी है तुम्हे.?" मैंने साफ़ लहजे में कहा तो रचना ने कहा.

"इतना रूखेपन से मत बोलो विक्की. मैं कसम खा कर कहती हु की मेरे अंदर तुम्हारे लिए कोई दुश्मनी जैसी बात नहीं है." रचना ने ये कहा तो मैंने कहा.

"ठीक है मगर मेरी समझ में ये नहीं आ रहा की तुम मुझसे क्या बात करना चाहती हो और क्यों.?" मैंने कहा तो रचना कुछ देर के लिए चुप रही फिर बोली.

"क्या हम एक दूसरे के दोस्त नहीं बन सकते विक्की.? मुझे पता है की तुम बहुत अच्छे नेचर के हो. इसके पहले हम कभी मिले भी होंगे मगर कभी बात नहीं की थी. उस दिन पंचायत में मैंने तुम्हे देखा था. साडी कहानी जानने के बाद मुझे भी बहुत गुस्सा आया था अपने भैया पर मगर मैं भला क्या कर सकती थी. बाद में मैंने तुम्हारे बारे में बहुत सोचा और फिर मैंने फैसला किया की मैं ऐसे लड़के से दोस्ती ज़रूर करुँगी जो सच में अच्छे नेचर का है. जिसके अंदर किसी के लिए भी कोई बुरी भावना नहीं है. मैंने तुमसे दोस्ती करने का फैसला तो ले लिया मगर मुझे समझ में नहीं आया की मैं तुमसे कैसे बात कर सकुंगी और कैसे तुमसे मिल सकुंगी. तब मैंने अपनी एक सहेली माया से तुम्हारे बारे में पूछा. उसने मुझे बताया की तुम कितने अच्छे नेचर के हो. वो मुझसे कहने लगी की मैं क्यों तुम्हारे बारे में पूछ रही हु तो मैंने उसे कुछ नहीं बताया. बताती भी कैसे जब मुझे hi कुछ पता नहीं था." रचना ने ये सब कहा तो मुझे समझ न आया की अब मैं उससे क्या कहु.

"तुम टेंशन मत लो विक्की. मुझे भी पता है की हम दोनों के घरो के बीच आज के टाइम में कितनी टेंशन वाली बात हो चुकी है. इस लिए मैं भी नहीं चाहुगी की मेरी वजह से मेरे दोस्त पर या उसके घर वालो पर कोई मुसीबत आये. हम बस दोस्ती के रिश्ते से बात करेंगे और अगर कभी मौका मिलेगा तो मिल भी लेंगे." रचना ने ऐसा कहा तो मैंने कहा.

"मैं सोचुगा इस बारे में." मैंने इतना hi कहा तो रचना के हसने की आवाज़ आयी.

"हे भगवन अभी सोचोगे इस बारे में तुम.? हद है vicky...main एक लड़की हो कर खुद तुमसे दोस्ती के लिए कह रही हु और तुम एक लड़का हो कर भी अभी सोचने की बात कह रहे हो. इससे तो यही लगता है की तुम अभी भी मुझ पर भरोसा नहीं कर प् रहे हो."

"नहीं ऐसी कोई बात नहीं है. मैं बस थोड़ा टाइम चाहता हु इसके लिए. मैंने इससे पहले कभी भी किसी लड़की से दोस्ती जैसा कोई रिश्ता नहीं रखा था इस लिए मुझे ये सब बहुत अजीब लग रहा है." मैंने ये कहा तो रचना ने कहा.

"अच्छा ठीक है. तुम सोच lo...main इंतज़ार करुँगी तुम्हारे जवाब का. मगर ज़्यादा टाइम सोचने में मत लगाना विक्की." रचना ने कहा तो मैंने हामी भरी.

"अच्छा ये no मेरा hi है. मैंने भी एक मोबाइल ले लिया है. उस दिन जो दीदी मेरे साथ थी न उन्होंने hi मोबाइल के लिए मुझे पैसा दिया था. अब से मैं तुमसे अपने मोबाइल से hi बात किया करुँगी अगर तुम जल्दी से सोच कर मुझे अपना दोस्त बना लोगो तो." रचना ने ये सब कहा तो मैंने कहा.

"ठीक है. अब मैं फ़ोन रखता हु. मैं अभी रास्ते में हु और शहर जा रहा हु कुछ ज़रूरी सामान लेने." मैंने कहा तो रचना ने कहा.

"ठीक है जाओ और हाँ थोड़ा जल्दी सोच लेना. मुझसे शायद इंतज़ार न हो पाए." रचना ने ये कहा तो मैंने हाँ कहा और फिर फ़ोन काट कर मोबाइल को पेंट में दाल लिया.

सरे रास्ते मैं रचना के बारे में hi सोचता रहा. मेरे दिमाग में बहुत सी बाते बहुत से सवाल घूम रहे थे मगर मैं किसी भी नतीजे पर नहीं पहुंच प् रहा था. शहर पहुंच कर मैंने दूकान से सामान ख़रीदा और फिर वापस गांव के लिए चल दिया. गांव की तरफ चलते हुए भी मैं रचना के hi बारे में सोचता रहा और फिर घर आ गया.

रात में खाना पीना करने के बाद मैं अपने कमरे में आ गया था. 11:35 के करीब दीदी मेरे कमरे में आयी. हम दोनों ने कुछ देर बात की उसके बाद गुड नाईट बोल कर सो गए. दीदी तो सो hi गयी थी मगर मुझे नींद नहीं आ रही थी. मेरे अंदर रचना की कही बाते चल रही थी. उसने कहा था की वो मुझसे दोस्ती करना चाहती है.

मैं हैरान था की एक ऐसी लड़की जिससे मैंने कभी बात तक नहीं की थी वो अचानक मुझे फ़ोन करती है और मुझसे दोस्ती करने की बात करती है. मैं समझ नहीं प् रहा था की रचना के बारे में मैं क्या समझू.? क्या वो सच में मुझसे दोस्ती करना चाहती है या फिर उसके अंदर अपने भाई का बदला लेने के लिए कोई ऐसी साज़िश है जिसका मुझे अहसास तक नहीं हो प् रहा है....

भाई लोग.....

आज के लिए इतना hi....

रीड एन्जॉय & गिव योर फीडबैक....

कीप सपोर्टिंग & स्टे विथ....

:थैंक्यू:
 
भाई लोग....

अब से मैं वीक में ओनली एक hi अपडेट दुगा. भय मुझे पता है की स्टार्टिंग में ज़्यादा लोग स्टोरी पर कमेंट नहीं करते मगर मैं देख रहा हु की जो लोग कमेंट करते भी थे वो भी अब नहीं कर रहे हैं. सो मैंने फैसला किया है की अब से मैं वीक में एक hi अपडेट दुगा. डेली अपडेट देने पर भी लोगो को प्रॉब्लम है तो ठीक है न अब नहीं दुगा update....:boredom:

यारा मैं तो चाहता था की डेली अपडेट दू और स्टोरी को जल्दी से एन्ड तक लिखता चला जाओ. मगर आप लोग hi नहीं चाहते ऐसा वर्ण इट्टू सा कमेंट करके मेरा मज़ाक न udaate..:doodh:

भाई लोग ये स्टोरी तो मैं कम्पलीट करुगा hi मगर अब डेली म्हणत करके नहीं बल्कि जब मेरा दिल करेगा tab....aur हाँ अब कोई ये न बोलना की मैं ये गलत कर रहा हु क्यों की इसके रेस्पोंसिबल तो खुद तुम लोग hi ho....:doodh:

किसी भय ने मुझको बताया था की यहाँ ऐसा hi होता है सो अगर मुझे अपनी स्टोरी कम्पलीट करना है तो मैं इन सब बातो पर ध्यान न दू. तो भय क्या करू मैं. मैं रसगुल्ला परोसता जाओ और लोग कहते रहे और वाह वाह भी न kare....:doodh:

अब से वीक में ओनली ओने update....jaao करो अपनी marzi...:don:

:थैंक्यू:
 
भय इसके पहले कहा थे. अभी मैंने वीकली अपडेट देने को बोलै तो ये बोलने के लिए आ गए यहाँ. ऐसे कितने लोग और भी हैं जो स्टोरी पढ़ते होंगे मगर कमेंट नहीं करते और जब ऐसी बात आएगी तो बस बोलने के लिए आ जाओगे sab....🦇

भय मैंने इन्सेस्ट को स्टोरी में रखा तो इन्सेस्ट भी आएगा न अपने टाइम पे. मगर जो अभी चल रहा है क्या उसके बारे में कुछ नहीं बोल सकते अपडेट में. क्या सिर्फ चुदाई hi इम्पोर्टेन्ट है स्टोरी me....:beaten:

नई राइटर हु तो आप लोग सपोर्ट करो न. मैं डेली अपडेट देता हु इससे ज़्यादा क्या करू बोलो. भाई लोग कुछ अपनी भी गलती देख लिया करो. स्टोरी पढ़ने के बाद कमेंट भी नहीं करते उसका kya....:huh:

भय ऐसा मत किया करो की जब चुदाई का अपडेट आये तभी किसी को सपोर्ट करो. बाकि स्टोरी को तेल लेने भेज दो. मैं तो एक दिन में दो अपडेट भी दे सकता हु मगर सपोर्ट तो mile....:doodh:
 
भय मैंने ऐसा फैसला लिया तो उससे क्या होगा इससे मतलब नहीं है. आप बोलते हो की सब रीडर्स कमेंट नहीं करते कुछ hi करते हैं. मैं पूछता हु की वो ऐसा करके क्या सही करते हैं.? वो क्यों नहीं सोचते की राइटर को म्हणत का फल कमेंट करके देना चाहिए. उनकी वजह से जो रीडर्स कमैंट्स करते हैं उनको सजा क्यों mile....:cry2:

यारा मैं डेली अपडेट देता हु मगर इसके बाद भी प्रॉब्लम है की लोग जान बुझ के कमेंट नहीं करते. बस स्टोरी पढ़ के निकल जाते हैं. वो खुद क्यों नहीं सोचते की वो ऐसा करके कौन सा महान काम करते hain....:lift:

भय स्टोरी तो मैं कम्पलीट करुगा hi बस ये होगा की टाइम ज़्यादा लगेगा बस. मगर अब डेली अपडेट देने का कोई फायदा नहीं रह गया. साला अपने टाइम की माँ बहन करके अपडेट लिखो डेली उसमे भी रीडर्स की ये nautanki...:party2:
 
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